भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

सुनो। भीष्म राजोचित सदाचारसे सम्पन्न थे। वे उत्तम बुद्धि और श्रेष्ठ कुलसे सम्पन्न थे॥ २१—२३॥ सत्कर्ता कुरुवृद्धानां पितृभक्तो महाव्रतः। जामदग्न्येन रामेण यः पुरा न पराजितः॥ २४॥ दिव्यैरस्त्रैर्महावीर्यः स हतोऽद्य शिखण्डिना। ‘महान् व्रतधारी भीष्म कुरुकुलवृद्ध पुरुषोंके सत्कार करनेवाले और अपने पिताके बड़े भक्त थे। हाय! पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुराम भी अपने दिव्य अस्त्रोंद्वारा जिस मेरे महापराक्रमी पुत्रको पराजित न कर सके, वह इस समय शिखण्डीके हाथसे मारा गया। यह कितने कष्टकी बात है॥ २४ १/२॥ अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम पार्थिवाः॥ २५॥ अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं यन्न दीर्यति मेऽद्य वै। ‘राजाओ! अवश्य ही मेरा हृदय पत्थर और लोहेका बना हुआ है, तभी तो अपने प्रिय पुत्रको जीवित न देखकर भी आज यह फट नहीं जाता है॥ २५ १/२॥ समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्यां स्वयंवरे॥ २६॥ विजित्यैकरथेनैव कन्याश्चायं जहार ह। ‘काशीपुरीके स्वयंवरमें समस्त भूमण्डलके क्षत्रिय एकत्र हुए थे, किंतु भीष्मने एकमात्र रथकी ही सहायतासे उन सबको जीतकर काशिराजकी तीनों कन्याओंका अपहरण किया था॥ २६ १/२॥ यस्य नास्ति बले तुल्यः पृथिव्यामपि कश्चन॥ २७॥ हतं शिखण्डिना श्रुत्वा न विदीर्येत यन्मनः। ‘हाय! इस पृथ्वीपर बलमें जिसकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, उसीको शिखण्डीके हाथसे मारा गया सुनकर आज मेरी छाती क्यों नहीं फट जाती॥ २७ १/२॥ जामदग्न्यः कुरुक्षेत्रे युधि येन महात्मना॥ २८॥ पीडितो नातियत्नेन स हतोऽद्य शिखण्डिना। ‘जिस महामना वीरने जमदग्निनन्दन परशुरामको कुरुक्षेत्रके युद्धमें अनायास ही पीड़ित कर दिया था, वही शिखण्डीके हाथसे मारा गया, यह कितने दुःखकी बात है’॥ २८ १/२॥ एवंविधं बहु तदा विलपन्तीं महानदीम्॥ २९॥ आश्वासयामास तदा गङ्गां दामोदरो विभुः।

अध्याय (पृष्ठ 1564)

⬅ विषय-सूची (TOC)

श्रीकृष्ण और व्यासजीके द्वारा पुत्र-शोकाकुला गङ्गाजीको सान्त्वना

ऐसी बातें कहकर जब महानदी गंगाजी बहुत विलाप करने लगीं, तब भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा— ।। २९ १/२ ।। समाश्र्वसिहि भद्रे त्वं मा शुचः शुभदर्शने ।। ३० ।। गतः स परमं लोकं तव पुत्रो न संशयः । ‘भद्रे! धैर्य धारण करो। शुभदर्शने! शोक न करो। तुम्हारे पुत्र भीष्म अत्यन्त उत्तम लोकमें गये हैं, इसमें संशय नहीं है ।। ३० १/२ ।। वसुरेष महातेजाः शापदोषेण शोभने ।। ३१ ।। मानुषत्वमनुप्राप्तो नैनं शोचितुमर्हसि । ‘शोभने! ये महातेजस्वी वसु थे, वसिष्ठजीके शाप-दोषसे इन्हें मनुष्य-योनिमें आना पड़ा था। अतः इनके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।। ३१ १/२ ।। स एष क्षत्रधर्मेण अयुध्यत रणाजिरे ।। ३२ ।। धनंजयेन निहतो नैष देवि शिखण्डिना । ‘देवि! इन्होंने समरांगणमें क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध किया था। ये अर्जुनके हाथसे मारे गये हैं, शिखण्डीके हाथसे नहीं ।। ३२ १/२ ।। भीष्मं हि कुरुशार्दूलमुद्यतेषुं महारणे ।। ३३ ।। न शक्तः संयुगे हन्तुं साक्षादपि शतक्रतुः । स्वच्छन्दतस्तव सुतो गतः स्वर्गं शुभानने ।। ३४ ।। ‘शुभानने! तुम्हारे पुत्र कुरुश्रेष्ठ भीष्म जब हाथमें धनुष-बाण लिये रहते, उस समय साक्षात् इन्द्र भी उन्हें युद्धमें मार नहीं सकते थे। ये तो अपनी इच्छासे ही शरीर त्यागकर स्वर्गलोकमें गये हैं ।। ३३-३४ ।। न शक्ता विनिहन्तुं हि रणे तं सर्वदेवताः । तस्मान्मा त्वं सरिच्छ्रेष्ठे शोचस्व कुरुनन्दनम् । वसूनेष गतो देवि पुत्रस्ते विज्वरा भव ।। ३५ ।। ‘सरिताओंमें श्रेष्ठ देवि! सम्पूर्ण देवता मिलकर भी युद्धमें उन्हें मारनेकी शक्ति नहीं रखते थे। इसलिये तुम कुरुनन्दन भीष्मजीके लिये शोक मत करो। ये तुम्हारे पुत्र भीष्म वसुओंके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं। अतः इनके लिये चिन्तारहित हो जाओ’ ।। ३५ ।। वैशम्पायन उवाच इत्युक्ता सा तु कृष्णेन व्यासेन तु सरिद्वरा । त्यक्त्वा शोकं महाराज स्वं वार्यवततार ह ।। ३६ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! जब भगवान् श्रीकृष्ण और व्यासजीने इस प्रकार समझाया, तब नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाजी शोक त्यागकर अपने जलमें उतर गयीं ।। ३६ ।। सत्कृत्य ते तां सरितं ततः कृष्णमुखा नृप ।

॥ अनुशासनपर्व सम्पूर्णम् ॥

अनुज्ञातास्तया सर्वे न्यवर्तन्त जनाधिपाः ॥ ३७ ॥
नरेश्वर! श्रीकृष्ण आदि सब नरेश गंगाजीका सत्कार करके उनकी आज्ञा ले वहाँसे लौट आये ॥ ३७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यामनुशासनपर्वणि
भीष्मस्वर्गारोहणपर्वणि दानधर्मे भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे
भीष्ममुक्तिर्नामाष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६८ ॥

इस प्रकार व्यासनिर्र्मत श्रीमद्महाभारत शतसाहस्री संहितामें अनुशासनपर्वके अन्तर्गत भीष्मस्वर्गारोहणपर्वमें दानधर्म तथा भीष्म-युधिष्ठिरसंवादके प्रसंगमें भीष्मजीकी मुक्ति नामक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६८ ॥


॥ अनुशासनपर्व सम्पूर्णम् ॥


अनुष्टुप्(अन्य बड़े छन्द)बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपरकुल योग
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये७३५८॥(३५०॥)४८१॥॥=७८४०।=
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये१९५४(१२)१६॥१९७०॥
अनुशासनपर्वकी कुल श्लोकसंख्या—९८१०॥॥=

आश्वमेधिकपर्व

⬅ विषय-सूची (TOC)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

आश्वमेधिकपर्व

अश्वमेधपर्व

प्रथमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका शोकमग्न होकर गिरना और धृतराष्ट्रका उन्हें समझाना

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

कृतोदकं तु राजानं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ।
पुरस्कृत्य महाबाहुरुत्तताराकुलेन्द्रियः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्र भीष्मको जलांजलि दे चुके, तब महाबाहु युधिष्ठिर उन्हें आगे करके जलसे बाहर निकले। उस समय उनकी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो रही थीं ॥ २ ॥

उत्तीर्य तु महाबाहुर्बाष्पव्याकुललोचनः ।
पपात तीरे गङ्गाया व्याधविद्ध इव द्विपः ॥ ३ ॥
बाहर निकलकर विशालबाहु युधिष्ठिर गंगाजीके तटपर व्याधके बाणोंसे बिंधे हुए गजराजके समान गिर पड़े। उस समय उनके दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी ॥ ३ ॥

तं सीदमानं जग्राह भीमः कृष्णेन चोदितः । मैवमित्यब्रवीच्चैनं कृष्णः परबलार्दनः ॥ ४ ॥ उन्हें शिथिल होते देख श्रीकृष्णकी प्रेरणासे भीमसेनने उन्हें पकड़ लिया। तत्पश्चात् शत्रुसेनाका संहार करनेवाले श्रीकृष्णने उनसे कहा—'राजन्! आपको ऐसा अधीर नहीं होना चाहिये' ॥ ४ ॥

तमार्तं पतितं भूमौ श्वसन्तं च पुनः पुनः । ददृशुः पार्थिवा राजन् धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ५ ॥ राजन्! वहाँ आये हुए समस्त भूपालोंने देखा कि धर्मपुत्र युधिष्ठिर शोकार्त होकर पृथ्वीपर पड़े हैं और बारंबार लंबी साँस खींच रहे हैं ॥ ५ ॥

तं दृष्ट्वा दीनमनसं गतसत्त्वं नरेश्वरम् । भूयः शोकसमाविष्टाः पाण्डवाः समुपाविशन् ॥ ६ ॥ राजाको इतना दीनचित्त और हतोत्साह देखकर पाण्डव फिर शोकमें डूब गये और उन्हींके पास बैठ रहे ॥ ६ ॥

राजा तु धृतराष्ट्रश्च पुत्रशोकाभिपीडितः । वाक्यमाह महाबुद्धिः प्रज्ञाचक्षुर्नरेश्वरम् ॥ ७ ॥ उस समय पुत्रशोकसे पीड़ित हुए परम बुद्धिमान् प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रने महाराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ७ ॥

उत्तिष्ठ कुरुशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम् । क्षत्रधर्मेण कौन्तेय जितेयमवनी त्वया ॥ ८ ॥ 'कुरुवंशके सिंह! कुन्तीकुमार! उठो और इसके बाद जो कार्य प्राप्त है, उसे पूर्ण करो। तुमने क्षत्रियधर्मके अनुसार इस पृथ्वीपर विजय पायी है ॥ ८ ॥

भुङ्क्ष्व भोगान् भ्रातृभिश्च सुहृद्भिश्च मनोऽनुगान् । शोचितव्यं न पश्यामि त्वया धर्मभृतां वर ॥ ९ ॥ 'धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! अब तुम अपने भाइयों और सुहृदोंके साथ मनोवांछित भोग भोगो। तुम्हारे लिये शोक करनेका कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता ॥ ९ ॥

शोचितव्यं मया चैव गान्धार्या च महीपते । ययोः पुत्रशतं नष्टं स्वप्नलब्धं यथा धनम् ॥ १० ॥ 'पृथ्वीनाथ! शोक तो मुझको और गान्धारीको करना चाहिये, जिनके सौ पुत्र स्वप्नमें प्राप्त हुए धनकी भाँति नष्ट हो गये ॥ १० ॥

अश्रुत्वा हितकामस्य विदुरस्य महात्मनः । वाक्यानि सुमहार्थानि परितप्यामि दुर्मतिः ॥ ११ ॥ 'अपने हितैषी महात्मा विदुरके महान् अर्थयुक्त वचनोंको अनसुना करके आज मैं दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र अत्यन्त संतप्त हो रहा हूँ ॥ ११ ॥

उक्तवान् विदुरो यन्मां धर्मात्मा दिव्यदर्शनः ।
दुर्योधनापराधेन कुलं ते विनशिष्यति ॥ १२ ॥
स्वस्ति चेदिच्छसे राजन् कुलस्य कुरु मे वचः ।
वध्यतामेष दुष्टात्मा मन्दो राजा सुयोधनः ॥ १३ ॥
‘दिव्य दृष्टि रखनेवाले धर्मात्मा विदुरने मुझसे यह पहले ही कह दिया था कि ‘दुर्योधनके अपराधसे आपका सारा कुल नष्ट हो जायगा। यदि आप अपने कुलका कल्याण करना चाहते हैं तो मेरी बात मान लीजिये। इस मन्दबुद्धि दुष्टात्मा राजा दुर्योधनको मार डालिये ।। १२-१३ ।।
कर्णश्च शकुनिश्चैव नैनं पश्यतु कर्हिचित् ।
द्यूतसंघातमप्येषामप्रमादेन वारय ॥ १४ ॥
“कर्ण और शकुनिको इससे कभी मिलने न दीजिये। आप पूर्ण सावधान रहकर इन सबके द्यूतविषयक संगठनको रोकिये ।। १४ ।।
अभिषेचय राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
स पालयिष्यति वशी धर्मेण पृथिवीमिमाम् ॥ १५ ॥
“धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरको अपने राज्यपर अभिषिक्त कीजिये। ये मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं, अतः धर्मपूर्वक इस पृथिवीका पालन करेंगे ।। १५ ।।
अथ नेच्छसि राजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
मेढीभूतः स्वयं राज्यं प्रतिगृह्णीष्व पार्थिव ॥ १६ ॥
“नरेश्वर! यदि आप कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राजा बनाना नहीं चाहते तो स्वयं ही मेठ बनकर सारे राज्यका भार स्वयं ही लिये रहिये ।। १६ ।।
समं सर्वेषु भूतेषु वर्तमानं नराधिप ।
अनुजीवन्तु सर्वे त्वां ज्ञातयो भ्रातृभिः सह ॥ १७ ॥
“महाराज! आप सभी प्राणियोंके प्रति समान बर्ताव करें और सभी सजातीय मनुष्य अपने भाई-बन्धुओंके साथ आपके आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करें' ।। १७ ।।
एवं ब्रुवति कौन्तेय विदुरे दीर्घदर्शिनि ।
दुर्योधनमहं पापमन्ववर्तं वृथामतिः ॥ १८ ॥
'कुन्तीनन्दन! दूरदर्शी विदुरके ऐसा कहनेपर भी मैंने पापी दुर्योधनका ही अनुसरण किया। मेरी बुद्धि निरर्थक हो गयी थी ।। १८ ।।
अश्रुत्वा तस्य धीरस्य वाक्यानि मधुराण्यहम् ।
फलं प्राप्य महत् दुःखं निमग्नः शोकसागरे ॥ १९ ॥
'धीर विदुरके मधुर वचनोंको अनसुना करके मुझे यह महान् दुःखरूपी फल प्राप्त हुआ है। मैं शोकके महान् समुद्रमें डूब गया हूँ ।। १९ ।।
वृद्धौ हि तेऽद्य पितरौ पश्य नौ दुःखितौ नृप ।

न शोचितव्यं भवता पश्यामीह जनाधिप ॥ २० ॥
‘नरेश्वर! दुःखमें डूबे हुए हम दोनों बूढ़े माता-पिताकी ओर देखो। तुम्हारे लिये शोक करनेका औचित्य मैं नहीं देख पाता हूँ’ ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1571)

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वितीयोऽध्यायः

श्रीकृष्ण और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु राज्ञा स धृतराष्ट्रेण धीमता ।
तूष्णीं बभूव मेधावी तमुवाचाथ केशवः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर भी मेधावी युधिष्ठिर चुप ही रहे। तब भगवान् श्रीकृष्णने कहा— ॥ १ ॥

अतीव मनसा शोकः क्रियमाणो जनाधिप ।
संतापयति चैतस्य पूर्वप्रेतान् पितामहान् ॥ २ ॥
'जनेश्वर! यदि मनुष्य मरे हुए प्राणीके लिये अपने मनमें अधिक शोक करता है तो उसका वह शोक उसके पहलेके मरे हुए पितामहोंको भारी संतापमें डाल देता है ॥ २ ॥

यजस्व विविधैर्यज्ञैर्बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ।
देवांस्तर्पय सोमेन स्वधया च पितॄनपि ॥ ३ ॥
'इसलिये आप बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये और सोमरसके द्वारा देवताओं तथा स्वधाद्वारा पितरोंको तृप्त कीजिये ॥ ३ ॥

अतिथीनन्नपानेन कामैरन्यैरकिंचनान् ।
विदितं वेदितव्यं ते कर्तव्यमपि ते कृतम् ॥ ४ ॥
'अतिथियोंको अन्न और जल देकर तथा अकिंचन मनुष्योंको दूसरी-दूसरी मनचाही वस्तुएँ देकर संतुष्ट कीजिये। आपने जाननेयोग्य तत्त्वको जान लिया है। करनेयोग्य कार्यको भी पूर्ण कर लिया है ॥ ४ ॥

श्रुताश्च राजधर्मास्ते भीष्माद् भागीरथीसुतात् ।
कृष्णद्वैपायनाच्चैव नारदाद् विदुरात् तथा ॥ ५ ॥
'आपने गंगानन्दन भीष्मसे राजधर्मोंका वर्णन सुना है। श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद और विदुरजीसे कर्तव्यका उपदेश श्रवण किया है ॥ ५ ॥

नेमामर्हसि मूढानां वृत्तिं त्वमनुवर्तितुम् ।
पितृपैतामहं वृत्तमास्थाय धुरमुद्वह ॥ ६ ॥
अतः आपको मूढ़ पुरुषोंके इस बर्तावका अनुसरण नहीं करना चाहिये। पिता-पितामहोंके बर्तावका आश्रय लेकर राजकार्यका भार सँभालिये ॥ ६ ॥

युक्तं हि यशसा क्षात्रं स्वर्गं प्राप्तुमसंशयम् ।
न हि कश्चिद्धि शूराणां निहतोऽत्र पराङ्मुखः ॥ ७ ॥

'इस युद्धमें वीरोचित सुयशसे युक्त हुआ सारा क्षत्रियसमुदाय स्वर्गलोक पानेका अधिकारी है, क्योंकि इन शूरवीरोंमेंसे कोई भी युद्धमें पीठ दिखाकर नहीं मारा गया है ॥ ७ ॥ त्यज शोकं महाराज भवितव्यं हि तत्तथा । न शक्यास्ते पुनर्दृष्टुं त्वया येऽस्मिन् रणे हताः ॥ ८ ॥ 'महाराज! शोक त्याग दीजिये, क्योंकि जो कुछ हुआ है, वैसी ही होनहार थी। इस युद्धमें जो लोग मारे गये हैं, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते' ॥ ८ ॥ एतावदुक्त्वा गोविन्दो धर्मराजं युधिष्ठिरम् । विरराम महातेजास्तमुवाच युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो गये। तब युधिष्ठिरने उनसे कहा ॥ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच गोविन्द मयि या प्रीतिस्तव सा विदिता मम । सौहृदेन तथा प्रेम्णा सदा मय्यनुकम्पसे ॥ १० ॥ युधिष्ठिर बोले—गोविन्द! आपका जो मेरे ऊपर प्रेम है, वह मुझे अच्छी तरह ज्ञात है। आप स्नेह और सौहार्दवश सदा ही मुझपर कृपा करते रहते हैं ॥ १० ॥ प्रियं तु मे स्यात् सुमहत्कृतं चक्रगदाधर । श्रीमन् प्रीतेन मनसा सर्वं यादवन्दन ॥ ११ ॥ यदि मामनुजानीयाद् भवान् गन्तुं तपोवनम् । (कृतकृत्यो भविष्यामि इति मे निश्चिता मतिः ।) चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीमान् यादवनन्दन! यदि आप प्रसन्न मनसे मुझे तपोवनमें जानेकी आज्ञा दे दें तो मेरा सारा और महान् प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय। उस दशामें मैं कृतकार्य हो जाऊँगा, यह मेरा निश्चित विचार है ॥ ११ १/२ ॥ न हि शान्तिं प्रपश्यामि पातयित्वा पितामहम् ॥ १२ ॥ (नृशंसः पुरुषव्याघ्रं गुरुं वीर्यबलान्वितम् ।) कर्णं च पुरुषव्याघ्रं संग्रामेष्वपलायिनम् । मैं क्रूरतापूर्वक पितामह भीष्मको, बल-पराक्रमसे सम्पन्न पुरुषसिंह गुरुदेव द्रोणाचार्यको और युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले नरश्रेष्ठ कर्णको मरवाकर कभी शान्ति नहीं पा सकता ॥ १२ १/२ ॥ कर्मणा येन मुच्येयमस्मात् क्रूरादरिंदम ॥ १३ ॥ कर्मणा तद् विधत्स्वेह येन शुध्यति मे मनः ।

शत्रुदमन श्रीकृष्ण! अब जिस कर्मके द्वारा मुझे अपने इस क्रूरतापूर्ण पापसे छुटकारा मिले तथा जिससे मेरा चित्त शुद्ध हो, वही कीजिये ।। १३ १/२ ।। तमेवं वादिनं पार्थं व्यासः प्रोवाच धर्मवित् ।। १४ ।। सान्त्वयन् सुमहातेजाः शुभं वचनमर्थवत् । अकृता ते मतिस्तात पुनर्बाल्येन मुह्यसे ।। १५ ।। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख धर्मके तत्त्वको जाननेवाले महातेजस्वी व्यासजीने उन्हें सान्त्वना देते हुए यह शुभ एवं सार्थक वचन कहा—‘तात! तुम्हारी बुद्धि अभी शुद्ध नहीं हुई है। तुम पुनः बालकोचित अविवेकके कारण मोहमें पड़ गये ।। १४-१५ ।। किमाकारा वयं तात प्रलपामो मुहुर्मुहुः । विदिताः क्षत्रधर्मास्ते येषां युद्धेन जीविका ।। १६ ।। ‘तात! अब हमलोग किस लायक रह गये। हम बारंबार जो कुछ कहते या समझाते हैं वह सब व्यर्थका प्रलाप सिद्ध हो रहा है। युद्धसे ही जिनकी जीविका चलती है, उन क्षत्रियोंके धर्म भलीभाँति तुम्हें विदित हैं ।। १६ ।। तथाप्रवृत्तो नृपतिर्नाधिबन्धेन युज्यसे । मोक्षधर्माश्च निखिला याथातथ्येन ते श्रुताः ।। १७ ।। ‘उनके अनुसार बर्ताव करनेवाला राजा कभी मानसिक चिन्तासे ग्रस्त नहीं होता। तुमने सम्पूर्ण मोक्षधर्मोंको भी यथार्थरूपसे सुना है ।। १७ ।। (यथा वै कामजां मायां परित्यक्तुं त्वमर्हसि । तथा तु कुर्वन् नृपतिर्नानुबन्धेन युज्यते ।।) ‘तुम्हें कामजनित मायाका जिस प्रकार परित्याग करना चाहिये, उस प्रकार उसका त्याग करनेवाला नरेश कभी बन्धनमें नहीं पड़ता ।। असकृच्चापि संदेहाश्छिन्नास्ते कामजा मया । अश्रद्दधानो दुर्मेधा लुप्तस्मृतिरसि ध्रुवम् ।। १८ ।। ‘मैंने अनेक बार तुम्हारे कामजनित संदेहोंका निवारण किया है; परंतु तुम दुर्बुद्धि होनेके कारण उसपर श्रद्धा नहीं करते। निश्चय इसलिये तुम्हारी स्मरणशक्ति लुप्त हो गयी है ।। १८ ।। मैवं भव न ते युक्तमिदमज्ञानमीदृशम् । प्रायश्चित्तानि सर्वाणि विदितानि च तेऽनघ । राजधर्माश्च ते सर्वे दानधर्माश्च ते श्रुताः ।। १९ ।। ‘तुम ऐसे न बनो, तुम्हारे लिये इस तरह अज्ञानका अवलम्बन उचित नहीं है। निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके प्रायश्चित्तोंका भी ज्ञान है। तुमने सब प्रकारके राजधर्म और दानधर्म भी सुने हैं ।। १९ ।।

स कथं सर्वधर्मज्ञः सर्वागमविशारदः ।
परिमुह्यसि भूयस्त्वमज्ञानादिव भारत ॥ २० ॥
‘भारत! इस प्रकार सब धर्मोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् होकर भी तुम अज्ञानवश बारंबार मोहमें क्यों पड़ते हो?’ ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २२ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 1575)

⬅ विषय-सूची (TOC)

तृतीयोऽध्यायः

व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना

व्यास उवाच

युधिष्ठिर तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मतिः ।
न हि कश्चित्स्वयं मर्त्यः स्ववशः कुरुते क्रियाम् ॥ १ ॥
**व्यासजीने कहा—**युधिष्ठिर! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारी बुद्धि ठीक नहीं है। कोई भी मनुष्य स्वाधीन होकर अपने-आप कोई काम नहीं करता है ॥ १ ॥

ईश्वरेण च युक्तोऽयं साध्वसाधु च मानवः ।
करोति पुरुषः कर्म तत्र का परिदेवना ॥ २ ॥
यह मनुष्य अथवा पुरुषसमुदाय ईश्वरसे प्रेरित होकर ही भले-बुरे काम करता है।* अतः इसके लिये शोक करनेकी क्या आवश्यकता है? ॥ २ ॥

आत्मानं मन्यसे चाथ पापकर्मार्णमन्ततः ।
शृणु तत्र यथापापमपकृष्येत भारत ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! यदि तुम अन्ततोगत्वा अपने-आपको ही युद्धरूपी पापकर्मका प्रधान हेतु मानते हो तो वह पाप जिस प्रकार नष्ट हो सकता है, वह उपाय बताता हूँ, सुनो ॥ ३ ॥

तपोभिः क्रतुभिश्चैव दानेन च युधिष्ठिर ।
तरन्ति नित्यं पुरुषा ये स्म पापानि कुर्वते ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! जो लोग पाप करते हैं, वे तप, यज्ञ और दानके द्वारा ही सदा अपना उद्धार करते हैं ॥ ४ ॥

यज्ञेन तपसा चैव दानेन च नराधिप ।
पूयन्ते नरशार्दूल नरा दुष्कृतकारिणः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! पुरुषसिंह! पापाचारी मनुष्य यज्ञ, दान और तपस्यासे ही पवित्र होते हैं ॥ ५ ॥

असुराश्च सुराश्चैव पुण्यहेतोर्मखक्रियाम् ।
प्रयतन्ते महात्मानस्तस्माद् यज्ञाः परायणम् ॥ ६ ॥
महामना देवता और दैत्य पुण्यके लिये यज्ञ करनेका ही प्रयत्न करते हैं, अतः यज्ञ परम आश्रय है ॥ ६ ॥

यज्ञैरेव महात्मानो बभूवुरधिकाः सुराः ।
ततो देवाः क्रियावन्तो दानवानभ्यधर्षयन् ॥ ७ ॥

यज्ञोंद्वारा ही महामनस्वी देवताओंका महत्त्व अधिक हुआ है और यज्ञोंसे ही क्रियानिष्ठ देवताओंने दानवोंको परास्त किया है ॥ ७ ॥

राजसूयाश्वमेधौ च सर्वमेधं च भारत ।
नरमेधं च नृपते त्वमाहर युधिष्ठिर ॥ ८ ॥
भरतवंशी नरेश युधिष्ठिर! तुम राजसूय, अश्वमेध, सर्वमेध और नरमेध यज्ञ करो ॥ ८ ॥

यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता ।
बहुकामान्नवित्तेन रामो दाशरथिर्यथा ॥ ९ ॥
विधिवत् दक्षिणा देकर बहुत-से मनोवांछित पदार्थ, अन्न और धनसे सम्पन्न अश्वमेध यज्ञके द्वारा दशरथनन्दन श्रीरामकी भाँति यजन करो ॥ ९ ॥

यथा च भरतो राजा दौष्यन्तिः पृथिवीपतिः ।
शाकुन्तलो महावीर्यस्तव पूर्वपितामहः ॥ १० ॥
तथा तुम्हारे पूर्वपितामह महापराक्रमी दुष्यन्तकुमार शकुन्तलानन्दन पृथ्वीपति राजा भरतने जैसे यज्ञ किया था, उसी प्रकार तुम भी करो ॥ १० ॥

युधिष्ठिर उवाच

असंशयं वाजिमेधः पावयेत् पृथिवीमपि ।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं त्वं श्रोतुमिहार्हसि ॥ ११ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**विप्रवर! इसमें संदेह नहीं कि अश्वमेध यज्ञ सारी पृथ्वीको भी पवित्र कर सकता है, किंतु इसके विषयमें मेरा एक अभिप्राय है, उसे आप यहाँ सुन लें ॥ ११ ॥

इमं ज्ञातिवधं कृत्वा सुमहान्तं द्विजोत्तम ।
दानमल्पं न शक्नोमि दातुं वित्तं च नास्ति मे ॥ १२ ॥
द्विजश्रेष्ठ! अपने जाति-भाइयोंका यह महान् संहार करके अब मुझमें थोड़ा-सा भी दान देनेकी शक्ति नहीं रह गयी है; क्योंकि मेरे पास धन नहीं है ॥ १२ ॥

न तु बालानिमान् दीनानुत्सहे वसु याचितुम् ।
तथैवार्द्रव्रणान् कृच्छ्रे वर्तमानान् नृपात्मजान् ॥ १३ ॥
यहाँ जो राजकुमार उपस्थित हैं, ये सब-के-सब बालक और दीन हैं, महान् संकटमें पड़े हुए हैं और इनके शरीरका घाव भी अभी सूखने नहीं पाया है; अतः इन सबसे मैं धनकी याचना नहीं कर सकता ॥ १३ ॥

स्वयं विनाश्य पृथिवीं यज्ञार्थं द्विजसत्तम ।
करमाहारयिष्यामि कथं शोकपरायणः ॥ १४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! स्वयं ही सारी पृथ्वीका विनाश कराकर शोकमग्न हुआ मैं इनसे यज्ञके लिये कर किस तरह वसूल करूँगा ॥ १४ ॥

दुर्योधनापराधेन वसुधा वसुधाधिपाः ।
प्रणष्टा योजयित्वास्मानकीर्त्या मुनिसत्तम ॥ १५ ॥
मुनिश्रेष्ठ! दुर्योधनके अपराधसे यह पृथ्वी और अधिकांश राजा हमलोगोंके माथे अपयशका टीका लगाकर नष्ट हो गये ॥ १५ ॥

दुर्योधनेन पृथिवी क्षयिता वित्तकारणात् ।
कोशश्चापि विशीर्णोऽसौ धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ १६ ॥
दुर्योधनने धनके लोभसे समस्त भूमण्डलका संहार कराया; किन्तु धन मिलना तो दूर रहा, उस दुर्बुद्धिका अपना खजाना भी खाली हो गया ॥ १६ ॥

पृथिवी दक्षिणा चात्र विधिः प्रथमकल्पितः ।
विद्वद्भिः परिदृष्टोऽयं शिष्टो विधिविपर्ययः ॥ १७ ॥
अश्वमेध यज्ञमें समूची पृथ्वीकी दक्षिणा देनी चाहिये। यही विद्वानोंने मुख्य कल्प माना है। इसके सिवा जो कुछ किया जाता है, वह विधिके विपरीत है ॥ १७ ॥

न च प्रतिनिधिं कर्तुं चिकीर्षामि तपोधन ।
अत्र मे भगवन् सम्यक् साचिव्यं कर्तुमर्हसि ॥ १८ ॥
तपोधन! मुख्य वस्तुके अभावमें जो दूसरी कोई वस्तु दी जाती है, वह प्रतिनिधि दक्षिणा कहलाती है; किन्तु प्रतिनिधि दक्षिणा देनेकी मेरी इच्छा नहीं होती; अतः भगवन्! इस विषयमें आप मुझे उचित सलाह देनेकी कृपा करें ॥ १८ ॥

एवमुक्तस्तु पार्थेन कृष्णद्वैपायनस्तदा ।
मुहूर्तमनुसंचिन्त्य धर्मराजानमब्रवीत् ॥ १९ ॥
कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने दो घड़ीतक सोच-विचारकर धर्मराजसे कहा— ॥ १९ ॥

कोशश्चापि विशीर्णोऽयं परिपूर्णो भविष्यति ।
विद्यते द्रविणं पार्थ गिरौ हिमवति स्थितम् ॥ २० ॥
उत्सृष्टं ब्राह्मणैर्यज्ञे मरुत्तस्य महात्मनः ।
तदानयस्व कौन्तेय पर्याप्तं तद् भविष्यति ॥ २१ ॥
'पार्थ! यद्यपि तुम्हारा खजाना इस समय खाली हो गया है तथापि वह बहुत शीघ्र भर जायगा। हिमालय पर्वतपर महात्मा मरुत्तके यज्ञमें ब्राह्मणोंने जो धन छोड़ दिया था, वह वहीं पड़ा हुआ है। कुन्तीकुमार! उसे ले आओ। वह तुम्हारे लिये पर्याप्त होगा' ॥ २०-२१ ॥

युधिष्ठिर उवाच
कथं यज्ञे मरुत्तस्य द्रविणं तत् समाचितम् ।
कस्मिंश्च काले स नृपो बभूव वदतां वर ॥ २२ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! मरुत्तके यज्ञमें इतने धनका संग्रह किस प्रकार किया गया था तथा वे महाराज मरुत्त किस समय इस पृथ्वीपर प्रकट हुए थे? ॥ २२ ॥

व्यास उवाच

यदि शुश्रूषसे पार्थ शृणु कारन्धमं नृपम् ।
यस्मिन् काले महीवीर्यः स राजासीन्महाधनः ॥ २३ ॥
**व्यासजीने कहा—**पार्थ! यदि तुम सुनना चाहते हो तो करन्धमके पौत्र मरुत्तका वृत्तान्त सुनो। वे महाधनी और महापराक्रमी राजा किस कालमें इस पृथ्वीपर प्रकट हुए थे, यह बता रहा हूँ ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥


* यह कथन युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये गौणरूपमें इस दृष्टिसे है कि मरनेवालोंकी मृत्यु उनके प्रारब्ध-कर्मानुसार अवश्यम्भावी थी; अतः यह जो कुछ हुआ है, ईश्वर प्रेरणाके ही अनुसार हुआ है।

शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षेः परिकीर्तनम् ।

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्थोऽध्यायः

मरुत्तके पूर्वजोंका परिचय देते हुए व्यासजीके द्वारा उनके गुण, प्रभाव एवं यज्ञका दिग्दर्शन

युधिष्ठिर उवाच

शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षेः परिकीर्तनम् ।
द्वैपायन मरुत्तस्य कथां प्रब्रूहि मेऽनघ ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— धर्मके ज्ञाता, निष्पाप महर्षि द्वैपायन! मैं राजर्षि मरुत्तकी कथा और उनके गुणोंका कीर्तन सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझसे कहिये ॥ १ ॥

व्यास उवाच

आसीत् कृतयुगे तात मनुर्दण्डधरः प्रभुः ।
तस्य पुत्रो महाबाहुः प्रसन्धिरिति विश्रुतः ॥ २ ॥
व्यासजीने कहा— तात! सत्ययुगमें राजदण्ड धारण करनेवाले शक्तिशाली वैवस्वत मनु एक प्रसिद्ध राजा थे। उनके पुत्र महाबाहु प्रसन्धिके नामसे विख्यात थे ॥ २ ॥
प्रसन्धेरभवत् पुत्रः क्षुप इत्यभिविश्रुतः ।
क्षुपस्य पुत्र इक्ष्वाकुर्महीपालोऽभवत् प्रभुः ॥ ३ ॥
प्रसन्धिके पुत्र क्षुप और क्षुपके पुत्र शक्तिशाली महाराज इक्ष्वाकु हुए ॥ ३ ॥
तस्य पुत्रशतं राजन्नासीत् परमधार्मिकम् ।
तांस्तु सर्वान् महीपालानिक्ष्वाकुरकरोत् प्रभुः ॥ ४ ॥
राजन्! इक्ष्वाकुके सौ पुत्र हुए, जो बड़े धार्मिक थे। प्रभावशाली इक्ष्वाकुने उन सभी पुत्रोंको इस पृथ्वीका पालक बना दिया ॥ ४ ॥
तेषां ज्येष्ठस्तु विंशोऽभूत् प्रतिमानं धनुष्मताम् ।
विंशस्य पुत्रः कल्याणो विविंशो नाम भारत ॥ ५ ॥
उनमें सबसे ज्येष्ठ पुत्रका नाम था विंश, जो धनुर्धर वीरोंका आदर्श था। भारत! विंशके कल्याणमय पुत्रका नाम विविंश हुआ ॥ ५ ॥
विविंशस्य सुता राजन् बभूवुर्दश पञ्च च ।
सर्वे धनुषि विक्रान्ता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥ ६ ॥
दानधर्मरताः शान्ताः सततं प्रियवादिनः ।
तेषां ज्येष्ठः खनीनेत्रः स तान् सर्वानपीडयत् ॥ ७ ॥
राजन्! विविंशके पन्द्रह पुत्र हुए। वे सब-के-सब धनुर्विद्यामें पराक्रमी, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, दान-धर्मपरायण, शान्त और सर्वदा मधुर भाषण करनेवाले थे। इन सबमें जो

ज्येष्ठ था, उसका नाम खनीनेत्र था। वह अपने उन सभी छोटे भाइयोंको बहुत कष्ट देता था ॥ ६-७ ॥ खनीनेत्रस्तु विक्रान्तो जित्वा राज्यमकण्टकम् । नाशकद् रक्षितुं राज्यं नान्वरज्यन्त तं प्रजाः ॥ ८ ॥ खनीनेत्र पराक्रमी होनेके कारण निष्कण्टक राज्यको जीतकर भी उसकी रक्षा न कर सका; क्योंकि प्रजाका उसमें अनुराग न था ॥ ८ ॥ तमपास्य च तद्राज्ये तस्य पुत्रं सुवर्चसम् । अभ्यषिञ्चन्त राजेन्द्र मुदिता ह्यभवंस्तदा ॥ ९ ॥ राजेन्द्र! उसे राज्यसे हटाकर प्रजाने उसीके पुत्र सुवर्चाको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया। उस समय प्रजावर्गको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ९ ॥ स पितुर्विक्रियां दृष्ट्वा राज्यान्निर्सनं च तत् । नियतो वर्तयामास प्रजाहितचिकीर्षया ॥ १० ॥ सुवर्चा अपने पिताकी वह दुर्दशा, वह राज्यसे निष्कासन देखकर सावधान हो नियमपूर्वक प्रजाके हितकी इच्छासे सबके साथ उत्तम बर्ताव करने लगे ॥ १० ॥ ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शुचिः शमदमान्वितः । प्रजास्तं चान्वरज्यन्त धर्मनित्यं मनस्विनम् ॥ ११ ॥ वे ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति रखते, सत्य बोलते, बाहर-भीतरसे पवित्र रहते और मन तथा इन्द्रियोंको अपने वशमें रखते थे। सदा धर्ममें लगे रहनेवाले उन मनस्वी नरेशपर प्रजाजनोंका विशेष अनुराग था ॥ ११ ॥ तस्य धर्मप्रवृत्तस्य व्यशीर्यत् कोशवाहनम् । तं क्षीणकोशं सामन्ताः समन्तात् पर्यपीडयन् ॥ १२ ॥ किंतु केवल धर्ममें ही प्रवृत्त रहनेके कारण कुछ ही दिनोंमें राजाका खजाना खाली हो गया और उनके वाहन आदि भी नष्ट हो गये। उनका खजाना खाली हो गया, यह जानकर सामन्त नरेश चारों ओरसे धावा करके उन्हें पीड़ा देने लगे ॥ १२ ॥ स पीड्यमानो बहुभिः क्षीणकोशाश्ववाहनः । आर्तिमार्च्छत् परां राजा सह भृत्यैः पुरेण च ॥ १३ ॥ उनका कोष और घोड़े आदि वाहन तो नष्ट हो ही गये थे। बहुसंख्यक शत्रुओंने एक साथ धावा करके उन्हें सताना आरम्भ कर दिया। इससे राजा सुवर्चा अपने सेवकों और पुरवासियोंसहित भारी संकटमें पड़ गये ॥ १३ ॥ न चैनमभिहन्तुं ते शक्नुवन्ति बलक्षये । सम्यग्वृत्तो हि राजा स धर्मनित्यो युधिष्ठिर ॥ १४ ॥ युधिष्ठिर! सेना और खजाना नष्ट हो जानेपर भी वे आक्रमणकारी शत्रु सुवर्चाका वध न कर सके; क्योंकि वे राजा नित्यधर्मपरायण और सदाचारी थे ॥ १४ ॥

यदा तु परमामार्तिं गतोऽसौ सपुरो नृपः । ततः प्रदध्मौ स करं प्रादुरासीत् ततो बलम् ॥ १५ ॥ जब वे नरेश नगरवासियोंसहित भारी विपत्तिमें पड़ गये, तब उन्होंने अपने हाथको मुँहसे लगाकर उसे शंखकी भाँति बजाया। इससे बहुत बड़ी सेना प्रकट हो गयी ॥ १५ ॥

ततस्तानजयत् सर्वान् प्रातिसीमान् नराधिपान् । एतस्मात् कारणाद् राजन् विश्रुतः स करन्धमः ॥ १६ ॥ राजन्! उसीकी सहायतासे उन्होंने अपने राज्यकी सीमापर निवास करनेवाले सम्पूर्ण शत्रु नरेशोंको परास्त कर दिया। इसी कारणसे अर्थात् करका धमन करने (हाथको बजाने)-से उनका नाम करन्धम हो गया ॥ १६ ॥

तस्य कारन्धमः पुत्रस्त्रेतायुगमुखेऽभवत् । इन्द्रादनवरः श्रीमान् देवैरपि सुदुर्जयः ॥ १७ ॥ करन्धमके त्रेतायुगके आरम्भमें एक कान्तिमान् पुत्र हुआ, जो कारन्धम कहलाया। वह इन्द्रसे किसी भी बातमें कम नहीं था। उसे परास्त करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था ॥ १७ ॥

तस्य सर्वे महीपाला वर्तन्ते स्म वशे तदा । स हि सम्राडभूत् तेषां वृत्तेन च बलेन च ॥ १८ ॥ उस समयके सभी भूपाल कारन्धमके अधीन हो गये थे। वह अपने सदाचार और बलके द्वारा उन सबका सम्राट् हो गया था ॥ १८ ॥

अविक्षिन्नाम धर्मात्मा शौर्येणेन्द्रसमोऽभवत् । यज्ञशीलो धर्मरतिर्धृतिमान् संयतेन्द्रियः ॥ १९ ॥ उस धर्मात्मा करन्धमकुमारका नाम अविक्षित् था। वह अपने शौर्यके द्वारा इन्द्रकी समानता करता था। वह यज्ञशील, धर्मानुरागी, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय था ॥ १९ ॥

तेजसाऽऽदित्यसदृशः क्षमया पृथिवीसमः । बृहस्पतिसमो बुद्ध्या हिमवानिव सुस्थिरः ॥ २० ॥ तेजमें सूर्य, क्षमामें पृथ्वी, बुद्धिमें बृहस्पति और सुस्थिरतामें हिमवान् पर्वतके समान माना जाता था ॥ २० ॥

कर्मणा मनसा वाचा दमेन प्रशमेन च । मनांस्याराधयामास प्रजानां स महीपतिः ॥ २१ ॥ राजा अविक्षित् मन, वाणी, क्रिया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रहके द्वारा प्रजाजनोंका चित्त संतुष्ट किये रहते थे ॥ २१ ॥

य ईजे हयमेधानां शतेन विधिवत् प्रभुः । याजयामास यं विद्वान् स्वयमेवाङ्गिराः प्रभुः ॥ २२ ॥

उन प्रभावशाली नरेशने विधिपूर्वक सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। साक्षात् विद्वान् प्रभु, अंगिरा मुनिने ही उनका यज्ञ कराया था॥ २२॥
तस्य पुत्रोऽतिचक्राम पितरं गुणवत्तया।
मरुत्तो नाम धर्मज्ञश्चक्रवर्ती महायशाः ॥ २३ ॥
उन्हींके पुत्र हुए महायशस्वी, चक्रवर्ती, धर्मज्ञ राजा मरुत्त। जो अपने गुणोंके कारण पितासे भी बढ़े-चढ़े थे ॥ २३ ॥
नागायुतसमप्राणः साक्षाद् विष्णुरिवापरः।
स यक्ष्यमाणो धर्मात्मा शातकुम्भमयान्युत ॥ २४ ॥
कारयामास शुभ्राणि भाजनानि सहस्रशः।
उनमें दस हजार हाथियोंके समान बल था। वे साक्षात् दूसरे विष्णुके समान जान पड़ते थे। धर्मात्मा मरुत्त जब यज्ञ करनेको उद्यत हुए, उस समय उन्होंने सहस्रों सोनेके समुज्ज्वल पात्र बनवाये ॥ २४ १/२ ॥
मेरुं पर्वतमासाद्य हिमवत्पार्श्व उत्तरे ॥ २५ ॥
काञ्चनः सुमहान् पादस्तत्र कर्म चकार सः।
ततः कुण्डानि पात्रींश्च पिठराण्यासनानि च ॥ २६ ॥
चक्रुः सुवर्णकर्तारो येषां संख्या न विद्यते।
तस्यैव च समीपे तु यज्ञवाटो बभूव ह ॥ २७ ॥
हिमालय पर्वतके उत्तर भागमें मेरु पर्वतके निकट एक महान् सुवर्णमय पर्वत है। उसीके समीप उन्होंने यज्ञशाला बनवायी और वहीं यज्ञ-कार्य आरम्भ किया। उनकी आज्ञासे अनेक सुनारोंने आकर सुवर्णमय कुण्ड, सोनेके बर्तन, थाली और आसन (चौकी आदि) तैयार किये। उन सब वस्तुओंकी गणना असम्भव है॥ २५—२७॥
ईजे तत्र स धर्मात्मा विधिवत् पृथिवीपतिः।
मरुत्तः सहितैः सर्वैः प्रजापालैर्नराधिपः ॥ २८ ॥
जब सब सामग्री तैयार हो गयी, तब वहाँ धर्मात्मा, पृथिवीपति राजा मरुत्तने अन्य सब प्रजापालोंके साथ विधिपूर्वक यज्ञ किया ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥