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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages
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तात! पहलेकी बात है, मेरे घरमें एक हरित-पिंगल वर्णवाले ब्राह्मणने निवास किया था। वह चिथड़े पहिनता और बेलका डंडा हाथमें लिये रहता था। उसकी मूँछें और दाढ़ियाँ बढ़ी हुई थीं। वह देखनेमें दुबला-पतला और ऊँचे कदका था ॥ १४ ॥ दीर्घेभ्यश्च मनुष्येभ्यः प्रमाणादधिको भुवि । स स्वैरं चरते लोकान् ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ १५ ॥ इस भूतलपर जो बड़े-से-बड़े मनुष्य हैं, उन सबसे वह अधिक लंबा था और दिव्य तथा मानव लोकोंमें इच्छानुसार विचरण करता था ॥ १५ ॥ इमां गाथां गायमानश्चत्वरेषु सभासु च । दुर्वाससं वासयेत् को ब्राह्मणं सत्कृतं गृहे ॥ १६ ॥ वे ब्राह्मण देवता जिस समय यहाँ पधारे थे, उस समय धर्मशालाओंमें और चौराहोंपर यह गाथा गाते फिरते थे कि 'कौन मुझ दुर्वासा ब्राह्मणको अपने घरमें सत्कारपूर्वक ठहरायेगा ॥ १६ ॥ रोषणः सर्वभूतानां सूक्ष्मेऽप्यपकृते कृते । परिभाषां च मे श्रुत्वा को नु दद्यात् प्रतिश्रयम् ॥ १७ ॥ यो मां कश्चिद् वासयीत न स मां कोपयेदिति । 'यदि मेरा थोड़ा-सा भी अपराध बन जाय तो मैं समस्त प्राणियोंपर अत्यन्त कुपित हो उठता हूँ। मेरे इस भाषणको सुनकर कौन मेरे लिये ठहरनेका स्थान देगा? जो कोई मुझे अपने घरमें ठहराये, वह मुझे क्रोध न दिलाये। इस बातके लिये उसे सतत सावधान रहना होगा' ॥ १७ ½ ॥ यस्मान्नाद्रियते कश्चित् ततोऽहं समवासयम् ॥ १८ ॥ स सम्भुङ्क्ते सहस्राणां बहूनामन्नमेकदा । एकदा सोऽल्पकं भुङ्क्ते न चैवैति पुनर्गृहम् ॥ १९ ॥ बेटा! जब कोई भी उनका आदर न कर सका तब मैंने उन्हें अपने घरमें ठहराया। वे कभी तो एक ही समय इतना अन्न भोजन कर लेते थे, जितनेसे कई हजार मनुष्य तृप्त हो सकते थे और कभी बहुत थोड़ा अन्न खाते तथा घरसे निकल जाते थे। उस दिन फिर घरको नहीं लौटते थे ॥ १८-१९ ॥ अकस्माच्च प्रहसति तथाकस्मात् प्ररोदिति । न चास्य वयसा तुल्यः पृथिव्यामभवत् तदा ॥ २० ॥ वे अकस्मात् जोर-जोरसे हँसने लगते और अचानक फूट-फूटकर रो पड़ते थे। उस समय इस पृथ्वीपर उनका समवयस्क कोई नहीं था ॥ २० ॥ अथ स्वावसथं गत्वा स शय्यास्तरणानि च । कन्याश्चालंकृता दग्ध्वा ततो व्यपगतः पुनः ॥ २१ ॥

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एक दिन अपने ठहरनेके स्थानपर जाकर वहाँ बिछी हुई शय्याओं, बिछौनों और वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हुई कन्याओंको उन्होंने जलाकर भस्म कर दिया और स्वयं वहाँसे खिसक गये ।। २१ ।।

अथ मामब्रवीद् भूयः स मुनिः संशितव्रतः ।
कृष्ण पायसमिच्छामि भोक्तुमित्येव सत्वरः ।। २२ ।।
फिर तुरंत ही मेरे पास आकर वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि मुझसे इस प्रकार बोले—‘कृष्ण! मैं शीघ्र ही खीर खाना चाहता हूँ’ ।। २२ ।।

तदैव तु मया तस्य चित्तज्ञेन गृहे जनः ।
सर्वाण्यन्नानि पानानि भक्ष्याश्चोच्चावचास्तथा ।। २३ ।।
भवन्तु सत्कृतानीह पूर्वमेव प्रचोदितः ।
ततोऽहं ज्वलमानं वै पायसं प्रत्यवेदयम् ।। २४ ।।
मैं उनके मनकी बात जानता था, इसलिये घरके लोगोंको पहलेसे ही आज्ञा दे दी थी कि ‘सब प्रकारके उत्तम, मध्यम अन्नपान और भक्ष्य-भोज्य पदार्थ आदरपूर्वक तैयार किये जायँ।’ मेरे कथनानुसार सभी चीजें तैयार थीं ही, अतः मैंने मुनिको गरमागरम खीर निवेदन किया ।। २३-२४ ।।

तं भुक्त्वैव स तु क्षिप्रं ततो वचनमब्रवीत् ।
क्षिप्रमङ्गानि लिम्पस्व पायसेनेति स स्म ह ।। २५ ।।
उसको थोड़ा-सा ही खाकर वे तुरंत मुझसे बोले—‘कृष्ण! इस खीरको शीघ्र ही अपने सारे अंगोंमें पोत लो’ ।। २५ ।।

अविमृश्यैव च ततः कृतवानस्मि तत् तथा ।
तेनोच्छिष्टेन गात्राणि शिरश्चैवाभ्यमृक्षयम् ।। २६ ।।
मैंने बिना विचारे ही उनकी इस आज्ञाका पालन किया। वही जूठी खीर मैंने अपने सिरपर तथा अन्य सारे अंगोंमें पोत ली ।। २६ ।।

स ददर्श तदाभ्याशे मातरं ते शुभाननाम् ।
तामपि स्मयमानां स पायसेनाभ्यलेपयम् ।। २७ ।।
इतनेहीमें उन्होंने देखा कि तुम्हारी सुमुखी माता पास ही खड़ी-खड़ी मुसकरा रही हैं। मुनिकी आज्ञा पाकर मैंने मुसकराती हुई तुम्हारी माताके अंगोंमें भी खीर लपेट दी ।। २७ ।।

मुनिः पायसदिग्धाङ्गीं रथे तूर्णमयोजयत् ।
तमारुह्य रथं चैव निर्ययौ स गृहान्मम ।। २८ ।।
जिसके सारे अंगोंमें खीर लिपटी हुई थी, उस महारानी रुक्मिणीको मुनिने तुरंत रथमें जोत दिया और उसी रथपर बैठकर वे मेरे घरसे निकले ।। २८ ।।

अग्निवर्णो ज्वलन् धीमान् स द्विजो रथधुर्यवत् ।
प्रतोदेनातुदद् बालां रुक्मिणीं मम पश्यतः ।। २९ ।।

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वे बुद्धिमान् ब्राह्मण दुर्वासा अपने तेजसे अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने मेरे देखते-देखते जैसे रथके घोड़ोंपर कोड़े चलाये जाते हैं, उसी प्रकार भोली-भाली रुक्मिणीको भी चाबुकसे चोट पहुँचाना आरम्भ किया ॥ २९ ॥ न च मे स्तोकमप्यासीद् दुःखमीर्ष्याकृतं तदा । तथा स राजमार्गेण महता निर्ययौ बहिः ॥ ३० ॥ उस समय मेरे मनमें थोड़ा-सा भी ईर्ष्याजनित दुःख नहीं हुआ। इसी अवस्थामें वे महलसे बाहर आकर विशाल राजमार्गसे चलने लगे ॥ ३० ॥ तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं दाशार्हा जातमन्यवः । तत्राजल्पन् मिथः केचित् समाभाष्य परस्परम् ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणा एव जायेरन् नान्यो वर्णः कथंचन । को ह्येनं रथमास्थाय जीवेदन्यः पुमानिह ॥ ३२ ॥ यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर दशार्हवंशी यादवोंको बड़ा क्रोध हुआ। उनमेंसे कुछ लोग वहाँ आपसमें इस प्रकार बातें करने लगे—'भाइयो! इस संसारमें ब्राह्मण ही पैदा हों, दूसरा कोई वर्ण किसी तरह पैदा न हो। अन्यथा यहाँ इन बाबाजीके सिवा और कौन पुरुष इस रथपर बैठकर जीवित रह सकता था ॥ ३१-३२ ॥ आशीविषविषं तीक्ष्णं ततस्तीक्ष्णतरो द्विजः । ब्रह्माशीविषदग्धस्य नास्ति कश्चिच्चिकित्सकः ॥ ३३ ॥ 'कहते हैं—विषैले साँपोंका विष बड़ा तीखा होता है, परंतु ब्राह्मण उससे भी अधिक तीक्ष्ण होता है। जो ब्राह्मणरूपी विषधर सर्पसे जलाया गया हो, उसके लिये इस संसारमें कोई चिकित्सक नहीं है' ॥ ३३ ॥ तस्मिन् व्रजति दुर्धर्षे प्रास्खलद् रुक्मिणी पथि । तन्नामर्षयत श्रीमांस्ततस्तूर्णमचोदयत् ॥ ३४ ॥ उन दुर्धर्ष दुर्वासाके इस प्रकार रथसे यात्रा करते समय बेचारी रुक्मिणी रास्तेमें लड़खड़ाकर गिर पड़ी, परंतु श्रीमान् दुर्वासा मुनि इस बातको सहन न कर सके। उन्होंने तुरंत उसे चाबुकसे हाँकना शुरू किया ॥ ३४ ॥ ततः परमसंक्रुद्धो रथात् प्रस्कन्द्य स द्विजः । पदातिरुत्पथेनैव प्राद्रवद् दक्षिणामुखः ॥ ३५ ॥ जब वह बारंबार लड़खड़ाने लगी, तब वे और भी कुपित हो उठे और रथसे कूदकर बिना रास्तेके ही दक्षिण दिशाकी ओर पैदल ही भागने लगे ॥ ३५ ॥ तमुत्पथेन धावन्तमन्वधावं द्विजोत्तमम् । तथैव पायसादिग्धः प्रसीद भगवन्निति ॥ ३६ ॥ इस प्रकार बिना रास्तेके ही दौड़ते हुए विप्रवर दुर्वासाके पीछे-पीछे मैं उसी तरह सारे शरीरमें खीर लपेटे दौड़ने लगा और बोला—'भगवन्! प्रसन्न होइये' ॥ ३६ ॥

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ततो विलोक्य तेजस्वी ब्राह्मणो मामुवाच ह । जितः क्रोधस्त्वया कृष्ण प्रकृत्यैव महाभुज ॥ ३७ ॥ न तेऽपराधमिह वै दृष्टवानस्मि सुव्रत । प्रीतोऽस्मि तव गोविन्द वृणु कामान् यथेप्सितान् ॥ ३८ ॥ तब वे तेजस्वी ब्राह्मण मेरी ओर देखकर बोले—‘महाबाहु श्रीकृष्ण! तुमने स्वभावसे ही क्रोधको जीत लिया है। उत्तम व्रतधारी गोविन्द! मैंने यहाँ तुम्हारा कोई भी अपराध नहीं देखा है, अतः तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे मनोवांछित कामनाएँ माँग लो ॥ ३७-३८ ॥

प्रसन्नस्य च मे तात पश्य व्युष्टिं यथाविधि । यावदेव मनुष्याणामन्ने भावो भविष्यति ॥ ३९ ॥ यथैवान्ने तथा तेषां त्वयि भावो भविष्यति । ‘तात! मेरे प्रसन्न होनेका जो भावी फल है, उसे विधिपूर्वक सुनो। जबतक देवताओं और मनुष्योंका अन्नमें प्रेम रहेगा, तबतक जैसा अन्नके प्रति उनका भाव या आकर्षण होगा, वैसा ही तुम्हारे प्रति भी बना रहेगा ॥ ३९ १/२ ॥

यावच्च पुण्या लोकेषु त्वयि कीर्तिर्भविष्यति ॥ ४० ॥ त्रिषु लोकेषु तावच्च वैशिष्ट्यं प्रतिपत्स्यसे । सुप्रियः सर्वलोकस्य भविष्यसि जनार्दन ॥ ४१ ॥ ‘तीनों लोकोंमें जबतक तुम्हारी पुण्यकीर्ति रहेगी, तबतक त्रिभुवनमें तुम प्रधान बने रहोगे। जनार्दन! तुम सब लोगोंके परम प्रिय होओगे ॥ ४०-४१ ॥

यत्ते भिन्नं च दग्धं च यच्च किंचिद् विनाशितम् । सर्वं तथैव द्रष्टासि विशिष्टं वा जनार्दन ॥ ४२ ॥ ‘जनार्दन! तुम्हारी जो-जो वस्तु मैंने तोड़ी-फोड़ी, जलायी या नष्ट कर दी है, वह सब तुम्हें पूर्ववत् या पहलेसे भी अच्छी अवस्थामें सुरक्षित दिखायी देगी ॥ ४२ ॥

यावदेतत् प्रलिप्तं ते गात्रेषु मधुसूदन । अतो मृत्युभयं नास्ति यावदिच्छसि चाच्युत ॥ ४३ ॥ ‘मधुसूदन! तुमने अपने सारे अंगोंमें जहाँतक खीर लगायी है, वहाँतकके अंगोंमें चोट लगनेसे तुम्हें मृत्युका भय नहीं रहेगा। अच्युत! तुम जबतक चाहोगे, यहाँ अमर बने रहोगे ॥ ४३ ॥

न तु पादतले लिप्ते कस्मात्ते पुत्रकाद्य वै । नैतन्मे प्रियमित्येवं स मां प्रीतोऽब्रवीत् तदा ॥ ४४ ॥ इत्युक्तोऽहं शरीरं स्वं ददर्श श्रीसमायुतम् ।

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‘परंतु यह खीर तुमने अपने पैरोंके तलवोंमें नहीं लगायी है। बेटा! तुमने ऐसा क्यों किया? तुम्हारा यह कार्य मुझे प्रिय नहीं लगा।’ इस प्रकार जब उन्होंने मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहा, तब मैंने अपने शरीरको अद्भुत कान्तिसे सम्पन्न देखा ।। ४४ १/२ ।। रुक्मिणीं चाब्रवीत् प्रीतः सर्वस्त्रीणां वरं यशः ।। ४५ ।। कीर्तिं चानुत्तमां लोके समवाप्स्यसि शोभने । न त्वां जरा वा रोगो वा वैवर्ण्यं चापि भाविनि ।। ४६ ।। स्प्रक्ष्यन्ति पुण्यगन्धा च कृष्णमाराधयिष्यसि । फिर मुनिने रुक्मिणीसे भी प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘शोभने! तुम सम्पूर्ण स्त्रियोंमें उत्तम यश और लोकमें सर्वोत्तम कीर्ति प्राप्त करोगी। भामिनि! तुम्हें बुढ़ापा या रोग अथवा कान्तिहीनता आदि दोष नहीं छू सकेंगे। तुम पवित्र सुगन्धसे सुवासित होकर श्रीकृष्णकी आराधना करोगी ।। ४५-४६ १/२ ।। षोडशानां सहस्राणां वधूनां केशवस्य ह ।। ४७ ।। वरिष्ठा च सलोक्या च केशवस्य भविष्यसि । ‘श्रीकृष्णकी जो सोलह हजार रानियाँ हैं, उन सबमें तुम श्रेष्ठ और पतिके सालोक्यकी अधिकारिणी होओगी’ ।। ४७ १/२ ।। तव मातरमित्युक्त्वा ततो मां पुनरब्रवीत् ।। ४८ ।। प्रस्थितः सुमहातेजा दुर्वासाग्निरिव ज्वलन् । एषैव ते बुद्धिरस्तु ब्राह्मणान्प्रति केशव ।। ४९ ।। प्रद्युम्न! तुम्हारी मातासे ऐसा कहकर वे अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाले महातेजस्वी दुर्वासा यहाँसे प्रस्थित होते समय फिर मुझसे बोले—‘केशव! ब्राह्मणोंके प्रति तुम्हारी सदा ऐसी ही बुद्धि बनी रहे’ ।। ४८-४९ ।। इत्युक्त्वा स तदा पुत्र तत्रैवान्तरधीयत । तस्मिन्नन्तर्हिते चाहमुपांशुव्रतमाचरम् ।। ५० ।। यत्किंचिद् ब्राह्मणो ब्रूयात् सर्वं कुर्यामिति प्रभो । प्रभावशाली पुत्र! ऐसा कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके अदृश्य हो जानेपर मैंने अस्पष्ट वाणीमें धीरेसे यह व्रत लिया कि ‘आजसे कोई ब्राह्मण मुझसे जो कुछ कहेगा, वह सब मैं पूर्ण करूँगा’ ।। ५० १/२ ।। एतद् व्रतमहं कृत्वा मात्रा ते सह पुत्रक ।। ५१ ।। ततः परमहृष्टात्मा प्राविशं गृहमेव च । बेटा! ऐसी प्रतिज्ञा करके परम प्रसन्नचित्त होकर मैंने तुम्हारी माताके साथ घरमें प्रवेश किया ।। ५१ १/२ ।। प्रविष्टमात्रश्च गृहे सर्वं पश्यामि तन्नवम् ।। ५२ ।।

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यद् भिन्नं यच्च वै दग्धं तेन विप्रेण पुत्रक ।
पुत्र! घरमें प्रवेश करके मैं देखता हूँ तो उन ब्राह्मणने जो कुछ तोड़-फोड़ या जला दिया था, वह सब नूतनरूपसे प्रस्तुत दिखायी दिया ॥ ५२ १/२ ॥
ततोऽहं विस्मयं प्राप्तः सर्वं दृष्ट्वा नवं दृढम् ॥ ५३ ॥
अपूजयं च मनसा रौक्मिणेय सदा द्विजान् ।
रुक्मिणीनन्दन! वे सारी वस्तुएँ नूतन और सुदृढ़ रूपमें उपलब्ध हैं, यह देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ और मैंने मन-ही-मन द्विजोंकी सदा ही पूजा की ॥ ५३ १/२ ॥
इत्यहं रौक्मिणेयस्य पृच्छतो भरतर्षभ ॥ ५४ ॥
माहात्म्यं द्विजमुख्यस्य सर्वमाख्यातवांस्तदा ।
भरतभूषण! रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नके पूछनेपर इस तरह मैंने उनसे विप्रवर दुर्वासाका सारा माहात्म्य कहा था ॥ ५४ १/२ ॥
तथा त्वमपि कौन्तेय ब्राह्मणान् सततं प्रभो ॥ ५५ ॥
पूजयस्व महाभागान् वाग्भिर्दानैश्च नित्यदा ।
प्रभो! कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार आप भी सदा मीठे वचन बोलकर और नाना प्रकारके दान देकर महाभाग ब्राह्मणोंकी सर्वदा पूजा करते रहें ॥ ५५ १/२ ॥
एवं व्युष्टिमहं प्राप्तो ब्राह्मणस्य प्रसादजाम् ।
यच्च मामाह भीष्मोऽयं तत्सत्यं भरतर्षभ ॥ ५६ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार ब्राह्मणके प्रसादसे मुझे उत्तम फल प्राप्त हुआ। ये भीष्मजी मेरे विषयमें जो कुछ कहते हैं, वह सब सत्य है ॥ ५६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दुर्वासोभिक्षा नाम एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दुर्वासाकी भिक्षा नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५९ ॥

श्रीकृष्णद्वारा भगवान् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन

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⬅ विषय-सूची (TOC)

षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा भगवान् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

दुर्वाससः प्रसादात् ते यत् तदा मधुसूदन ।
अवाप्तमिह विज्ञानं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— मधुसूदन! उस समय दुर्वासाके प्रसादसे इहलोकमें आपको जो विज्ञान प्राप्त हुआ, उसे विस्तारपूर्वक मुझे बताइये ॥ १ ॥

महाभाग्यं च यत् तस्य नामानि च महात्मनः ।
तत् त्वत्तो ज्ञातुमिच्छामि सर्वं मतिमतां वर ॥ २ ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! उन महात्माके महान् सौभाग्यको और उनके नामोंको मैं यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। वह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ २ ॥

वासुदेव उवाच

हन्त ते कीर्तयिष्यामि नमस्कृत्य कपर्दिने ।
यदवाप्तं मया राजन् श्रेयो यच्चार्जितं यशः ॥ ३ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन्! मैं जटाजूटधारी भगवान् शंकरको नमस्कार करके प्रसन्नतापूर्वक यह बता रहा हूँ कि मैंने कौन-सा श्रेय प्राप्त किया और किस यशका उपार्जन किया ॥ ३ ॥

प्रयतः प्रातरुत्थाय यदधीये विशाम्पते ।
प्राञ्जलिः शतरुद्रीयं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! मैं प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए हाथ जोड़कर जिस शतरुद्रियका जप एवं पाठ करता हूँ, उसे बता रहा हूँ; सुनो ॥ ४ ॥

प्रजापतिस्तत् ससृजे तपसोऽन्ते महातपाः ।
शङ्करस्त्वसृजत् तात प्रजाः स्थावरजङ्गमाः ॥ ५ ॥
तात! महातपस्वी प्रजापतिने तपस्याके अन्तमें उस शतरुद्रियकी रचना की और शंकरजीने समस्त चराचर प्राणियोंकी सृष्टि की ॥ ५ ॥

नास्ति किंचित् परं भूतं महादेवाद् विशाम्पते ।
इह त्रिष्वपि लोकेषु भूतानां प्रभवो हि सः ॥ ६ ॥
प्रजानाथ! तीनों लोकोंमें महादेवजीसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ देवता नहीं है; क्योंकि वे समस्त भूतोंकी उत्पत्तिके कारण हैं ॥ ६ ॥

न चैवोत्सहते स्थातुं कश्चिदग्रे महात्मनः ।

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न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ७ ॥ उन महात्मा शंकरके सामने कोई भी खड़ा होनेका साहस नहीं कर सकता। तीनों लोकोंमें कोई भी प्राणी उनकी समता करनेवाला नहीं है ॥ ७ ॥

गन्धेनापि हि संग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः । विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ते च पतन्ति च ॥ ८ ॥ संग्राममें जब वे कुपित होते हैं, उस समय उनकी गन्धसे भी सारे शत्रु अचेत और मृतप्राय होकर थर-थर काँपने एवं गिरने लगते हैं ॥ ८ ॥

घोरं च निनदं तस्य पर्जन्यनिनदोपमम् । श्रुत्वा विशीर्येद् हृदयं देवानामपि संयुगे ॥ ९ ॥ संग्राममें मेघगर्जनाके समान गम्भीर उनका घोर सिंहनाद सुनकर देवताओंका भी हृदय विदीर्ण हो सकता है ॥ ९ ॥

यांश्च घोरेण रूपेण पश्येत् क्रुद्धः पिनाकधृत् । न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न पन्नगाः ॥ १० ॥ कुपिते सुखमेधन्ते तस्मिन्नपि गुहागताः । पिनाकधारी रुद्र कुपित होकर जिन्हें भयंकररूपसे देख लें, उनके भी हृदयके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ। संसारमें भगवान् शंकरके कुपित हो जानेपर देवता, असुर, गन्धर्व और नाग यदि भागकर गुफामें छिप जायँ तो भी सुखसे नहीं रह सकते ॥ १० १/२ ॥

प्रजापतेश्च दक्षस्य यजतो वितते क्रतौ ॥ ११ ॥ विव्याध कुपितो यज्ञं निर्भयस्तु भवस्तदा । धनुषा बाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च ॥ १२ ॥ प्रजापति दक्ष जब यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनका यज्ञ आरम्भ होनेपर कुपित हुए भगवान् शंकरने निर्भय होकर उनके यज्ञको अपने बाणोंसे बींध डाला और धनुषसे बाण छोड़कर गम्भीर स्वरमें सिंहनाद किया ॥ ११-१२ ॥

ते न शर्म कुतः शान्तिं विषादं लेभिरे सुराः । विद्धे च सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ॥ १३ ॥ इससे देवता बेचैन हो गये, फिर उन्हें शान्ति कैसे मिले। जब यज्ञ सहसा बाणोंसे बिंध गया और महेश्वर कुपित हो गये तब बेचारे देवता विषादमें डूब गये ॥ १३ ॥

तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोकाः समाकुलाः । बभूवुरवशाः पार्थ विषेदुश्च सुरसुराः ॥ १४ ॥ पार्थ! उनके धनुषकी प्रत्यंचाके शब्दसे समस्त लोक व्याकुल और विवश हो उठे और सभी देवता एवं असुर विषादमें मग्न हो गये ॥ १४ ॥

आपश्चक्षुभिरे चैव चकम्पे च वसुन्धरा । व्यद्रवन् गिरयश्चापि द्यौः पफाल च सर्वशः ॥ १५ ॥

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समुद्र आदिका जल क्षुब्ध हो उठा, पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत पिघलने लगे और आकाश सब ओरसे फटने-सा लगा ॥ १५ ॥

अन्धेन तमसा लोकाः प्रावृता न चकाशिरे ।
प्रणष्टा ज्योतिषां भाश्व सह सूर्येण भारत ॥ १६ ॥
समस्त लोक घोर अन्धकारसे आवृत होनेके कारण प्रकाशित नहीं होते थे। भारत! ग्रहों और नक्षत्रोंका प्रकाश सूर्यके साथ ही नष्ट (अदृश्य) हो गया ॥ १६ ॥

भृशं भीतास्ततः शान्तिं चक्रुः स्वस्त्ययनानि च ।
ऋषयः सर्वभूतानामात्मनश्च हितैषिणः ॥ १७ ॥
सम्पूर्ण भूतोंका और अपना भी हित चाहनेवाले ऋषि अत्यन्त भयभीत हो शान्ति एवं स्वस्तिवाचन आदि कर्म करने लगे ॥ १७ ॥

ततः सोऽभ्यद्रवद् देवान् रुद्रो रौद्रपराक्रमः ।
भगस्य नयने क्रुद्धः प्रहारेण व्यशातयत् ॥ १८ ॥
तदनन्तर भयानक पराक्रमी रुद्र देवताओंकी ओर दौड़े। उन्होंने क्रोधपूर्वक प्रहार करके भगदेवताके नेत्र नष्ट कर दिये ॥ १८ ॥

पूषणं चाभिदुद्राव पादेन च रुषान्वितः ।
पुरोडाशं भक्षयतो दशनान् वै व्यशातयत् ॥ १९ ॥
फिर उन्होंने रोषमें भरकर पैदल ही पूषादेवताका पीछा किया और पुरोडाश भक्षण करनेवाले उनके दाँतोंको तोड़ डाला ॥ १९ ॥

ततः प्रणेमुर्देवास्ते वेपमानाः स्म शङ्करम् ।
पुनश्च संदधे रुद्रो दीप्तं सुनिशितं शरम् ॥ २० ॥
तब सब देवता काँपते हुए वहाँ भगवान् शंकरको प्रणाम करने लगे। इधर रुद्रदेवने पुनः एक प्रज्वलित एवं तीखे बाणका संधान किया ॥ २० ॥

रुद्रस्य विक्रमं दृष्ट्वा भीता देवाः सहर्षिभिः ।
ततः प्रसादयामासुः शर्वं ते विबुधोत्तमाः ॥ २१ ॥
रुद्रका पराक्रम देखकर ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता थर्रा उठे। फिर उन श्रेष्ठ देवताओंने भगवान् शिवको प्रसन्न किया ॥ २१ ॥

जेपुश्च शतरुद्रीयं देवाः कृत्वाञ्जलिं तदा ।
संस्तूयमानस्त्रिदशैः प्रसाद महेश्वरः ॥ २२ ॥
उस समय देवतालोग हाथ जोड़कर शतरुद्रियका जप करने लगे। देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति की जानेपर महेश्वर प्रसन्न हो गये ॥ २२ ॥

रुद्रस्य भागं यज्ञे च विशिष्टं ते त्वकल्पयन् ।
भयेन त्रिदशा राजन् शरणं च प्रपेदिरे ॥ २३ ॥

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राजन्! देवतालोग भयके मारे भगवान् शंकरकी शरणमें गये। उन्होंने यज्ञमें रुद्रके लिये विशिष्ट भागकी कल्पना की (यज्ञावशिष्ट सारी सामग्री रुद्रके अधिकारमें दे दी) ॥ २३ ॥
तेन चैव हि तुष्टेन स यज्ञः संधितोऽभवत् ।
यद् यच्चापहृतं तत्र तत्तथैवान्वजीवयत् ॥ २४ ॥
भगवान् शंकरके संतुष्ट होनेपर वह यज्ञ पुनः पूर्ण हुआ। उसमें जिस-जिस वस्तुको नष्ट किया गया था, उन सबको उन्होंने पुनः पूर्ववत् जीवित कर दिया ॥ २४ ॥
असुराणां पुराण्यासंत्रीणि वीर्यवतां दिवि ।
आयसं राजतं चैव सौवर्णमपि चापरम् ॥ २५ ॥
पूर्वकालमें बलवान् असुरोंके तीन पुर (विमान) थे; जो आकाशमें विचरते रहते थे। उनमेंसे एक लोहेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा सोनेका बना हुआ था ॥ २५ ॥
नाशकत् तानि मघवा जेतुं सर्वायुधैरपि ।
अथ सर्वेऽमरा रुद्रं जग्मुः शरणमर्दिताः ॥ २६ ॥
इन्द्र अपने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करके भी उन पुरोंपर विजय न पा सके। तब पीड़ित हुए समस्त देवता रुद्रदेवकी शरणमें गये ॥ २६ ॥
तत ऊचुर्महात्मानो देवाः सर्वे समागताः ।
रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु ॥ २७ ॥
जहि दैत्यान् सह पुरैर्लोकांस्त्रायस्व मानद ।
तदनन्तर वहाँ पधारे हुए सम्पूर्ण महामना देवताओंने रुद्रदेवसे कहा—'भगवन् रुद्र! पशुतुल्य असुर हमारे समस्त कर्मोंके लिये भयंकर हो गये हैं और भविष्यमें भी ये हमें भय देते रहेंगे। अतः मानद! हमारी प्रार्थना है कि आप तीनों पुरोंसहित समस्त दैत्योंका नाश और लोकोंकी रक्षा करें' ॥ २७ १/२ ॥
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा कृत्वा विष्णुं शरोत्तमम् ॥ २८ ॥
शल्यमग्निं तथा कृत्वा पुङ्खं वैवस्वतं यमम् ।
वेदान् कृत्वा धनुः सर्वान् ज्यां च सावित्रिमुत्तमाम् ॥ २९ ॥
ब्रह्माणं सारथिं कृत्वा विनियुज्य च सर्वशः ।
त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तेन तानि बिभेद सः ॥ ३० ॥
उनके ऐसा कहनेपर भगवान् शिवने 'तथास्तु' कहकर उनकी बात मान ली और भगवान् विष्णुको उत्तम बाण, अग्निको उस बाणका शल्य, वैवस्वत यमको पंख, समस्त वेदोंको धनुष, गायत्रीको उत्तम प्रत्यंचा और ब्रह्माको सारथि बनाकर सबको यथावत् रूपसे अपने-अपने कार्योंमें नियुक्त करके तीन पर्व और तीन शल्यवाले उस बाणके द्वारा उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला ॥ २८—३० ॥
शरेणादित्यवर्णेन कालाग्निसमतेजसा ।
तेऽसुराः सपुरास्तत्र दग्धा रुद्रेण भारत ॥ ३१ ॥

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भारत! वह बाण सूर्यके समान कान्तिमान् और प्रलयाग्निके समान तेजस्वी था। उसके द्वारा रुद्रदेवने उन तीनों पुरोंसहित वहाँके समस्त असुरोंको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ३१ ॥

तं चैवाङ्कगतं दृष्ट्वा बालं पञ्चशिखं पुनः । उमा जिज्ञासमाना वै कोऽयमित्यब्रवीत् तदा ॥ ३२ ॥ फिर वे पाँच शिखावाले बालकके रूपमें प्रकट हुए और उमादेवी उन्हें अंकमें लेकर देवताओंसे पूछने लगीं—‘पहचानो, ये कौन हैं?’ ॥ ३२ ॥

असूयतश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः । स वज्रं स्तम्भयामास तं बाहुं परिघोपमम् ॥ ३३ ॥ उस समय इन्द्रको बड़ी ईर्ष्या हुई। वे वज्रसे उस बालकपर प्रहार करना ही चाहते थे कि उसने परिघके समान मोटी उनकी उस बाँहको वज्रसहित स्तम्भित कर दिया ॥ ३३ ॥

न सम्बुबुधिरे चैव देवास्तं भुवनेश्वरम् । सप्रजापतयः सर्वे तस्मिन् मुमुहुरीश्वरे ॥ ३४ ॥ समस्त देवता और प्रजापति उन भुवनेश्वर महादेवजीको न पहचान सके। सबको उन ईश्वरके विषयमें मोह छा गया ॥ ३४ ॥

ततो ध्यात्वा च भगवान् ब्रह्मा तममितौजसम् । अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तमुमापतिम् ॥ ३५ ॥ तब भगवान् ब्रह्माने ध्यान करके उन अमित-तेजस्वी उमापतिको पहचान लिया और ‘ये ही सबसे श्रेष्ठ देवता हैं’ ऐसा जानकर उन्होंने उनकी वन्दना की ॥ ३५ ॥

ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुराः । बभूव स तदा बाहुर्बलहन्तुर्यथा पुरा ॥ ३६ ॥ तत्पश्चात् उन देवताओंने उमादेवी और भगवान् रुद्रको प्रसन्न किया। तब इन्द्रकी वह बाँह पूर्ववत् हो गयी ॥ ३६ ॥

स चापि ब्राह्मणो भूत्वा दुर्वासा नाम वीर्यवान् । द्वारवत्यां मम गृहे चिरं कालमुपावसत् ॥ ३७ ॥ वे ही पराक्रमी महादेव दुर्वासा नामक ब्राह्मण बनकर द्वारकापुरीमें मेरे घरके भीतर दीर्घकालतक टिके रहे ॥ ३७ ॥

विप्रकारान् प्रयुङ्क्ते स्म सुबहून् मम वेश्मनि । तानुदारतया चाहं चक्षमे चातिदुःसहान् ॥ ३८ ॥ उन्होंने मेरे महलमें मेरे विरुद्ध बहुत-से अपराध किये। वे सभी अत्यन्त दुःसह थे तो भी मैंने उदारतापूर्वक क्षमा किया ॥ ३८ ॥

स वै रुद्रः स च शिवः सोऽग्निः सर्वः स सर्वजित् । स चैवेन्द्रश्च वायुश्च सोऽश्विनौ स च विद्युतः ॥ ३९ ॥

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वे ही रुद्र हैं, वे ही शिव हैं, वे ही अग्नि हैं, वे ही सर्वस्वरूप और सर्वविजयी हैं। वे ही इन्द्र और वायु हैं, वे ही अश्विनीकुमार और विद्युत् हैं ॥ ३९ ॥

स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः। स कालः सोऽन्तको मृत्युः स यमो रात्र्यहानि च ॥ ४० ॥

वे ही चन्द्रमा, वे ही ईशान, वे ही सूर्य, वे ही वरुण, वे ही काल, वे ही अन्तक, वे ही मृत्यु, वे ही यम तथा वे ही रात और दिन हैं ॥ ४० ॥

मासार्धमासा ऋतवः संध्ये संवत्सरश्च सः। स धाता स विधाता च विश्वकर्मा स सर्ववित् ॥ ४१ ॥

मास, पक्ष, ऋतु, संध्या और संवत्सर भी वे ही हैं। वे ही धाता, विधाता, विश्वकर्मा और सर्वज्ञ हैं ॥ ४१ ॥

नक्षत्राणि गृहाश्चैव दिशोऽथ प्रदिशस्तथा। विश्वमूर्तिरमेयात्मा भगवान् परमद्युतिः ॥ ४२ ॥

नक्षत्र, गृह, दिशा, विदिशा भी वे ही हैं। वे ही विश्वरूप, अप्रमेयात्मा, षड्विध ऐश्वर्यसे युक्त एवं परम तेजस्वी हैं ॥ ४२ ॥

एकधा च द्विधा चैव बहुधा च स एव हि। शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा ॥ ४३ ॥

उनके एक, दो, अनेक, सौ, हजार और लाखों रूप हैं ॥ ४३ ॥

ईदृशः स महादेवो भूयश्च भगवानतः। न हि शक्या गुणा वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥ ४४ ॥

भगवान् महादेव ऐसे प्रभावशाली हैं, बल्कि इससे भी बढ़कर हैं। सैकड़ों वर्षोंमें भी उनके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ईश्वरप्रशंसा नाम षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ईश्वरकी प्रशंसा नामक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६० ॥


भगवान् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन

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एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

भगवान् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन

वासुदेव उवाच

युधिष्ठिर महाबाहो महाभाग्यं महात्मनः।
रुद्राय बहुरूपाय बहुनाम्ने निबोध मे ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाबाहु युधिष्ठिर! अब मैं अनेक नाम और रूप धारण करनेवाले महात्मा भगवान् रुद्रका माहात्म्य बतला रहा हूँ, सुनिये ॥ १ ॥

वदन्त्यग्निं महादेवं तथा स्थाणुं महेश्वरम्।
एकाक्षं त्र्यम्बकं चैव विश्वरूपं शिवं तथा ॥ २ ॥
विद्वान् पुरुष इन महादेवजीको अग्नि, स्थाणु, महेश्वर, एकाक्ष, त्र्यम्बक, विश्वरूप और शिव आदि अनेक नामोंसे पुकारते हैं ॥ २ ॥

द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः।
घोरामन्यां शिवामन्यां ते तनू बहुधा पुनः ॥ ३ ॥
वेदमें उनके दो रूप बताये गये हैं, जिन्हें वेदवेत्ता ब्राह्मण जानते हैं। उनका एक स्वरूप तो घोर है और दूसरा शिव। इन दोनोंके भी अनेक भेद हैं ॥ ३ ॥

उग्रा घोरा तनुर्यस्य सोऽग्निर्विद्युत् स भास्करः।
शिवा सौम्या च या त्वस्य धर्मस्त्वापोऽथ चन्द्रमाः ॥ ४ ॥
इनकी जो घोर मूर्ति है, वह भय उपजानेवाली है। उसके अग्नि, विद्युत् और सूर्य आदि अनेक रूप हैं। इससे भिन्न जो शिव-नामवाली मूर्ति है, वह परम शान्त एवं मंगलमयी है। उसके धर्म, जल और चन्द्रमा आदि कई रूप हैं ॥ ४ ॥

आत्मनोऽर्धं तु तस्याग्निः सोमोऽर्धं पुनरुच्यते।
ब्रह्मचर्यं चरत्येका शिवा चास्य तनुस्तथा ॥ ५ ॥
यास्य घोरतमा मूर्तिर्जगत् संहरते तथा।
ईश्वरत्वान्महत्त्वाच्च महेश्वर इति स्मृतः ॥ ६ ॥
महादेवजीके आधे शरीरको अग्नि और आधेको सोम कहते हैं। उनकी शिवमूर्त्ति ब्रह्मचर्यका पालन करती है और जो अत्यन्त घोर मूर्ति है, वह जगत्‌का संहार करती है। उनमें महत्त्व और ईश्वरत्व होनेके कारण वे 'महेश्वर' कहलाते हैं ॥ ५-६ ॥

यन्निर्दहति यत्तीक्ष्णो यदुग्रो यत् प्रतापवान्।
मांसशोणितमज्जादो यत् ततो रुद्र उच्यते ॥ ७ ॥
वे जो सबको दग्ध करते हैं, अत्यन्त तीक्ष्ण हैं, उग्र और प्रतापी हैं, प्रलयाग्निरूपसे मांस, रक्त और मज्जाको भी अपना ग्रास बना लेते हैं; इसलिये 'रुद्र' कहलाते हैं ॥ ७ ॥

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देवानां सुमहान् यच्च यच्चास्य विषयो महान् ।
यच्च विश्वं महत् पाति महादेवस्ततः स्मृतः ॥ ८ ॥
वे देवताओंमें महान् हैं, उनका विषय भी महान् है तथा वे महान् विश्वकी रक्षा करते हैं; इसलिये ‘महादेव’ कहलाते हैं ॥ ८ ॥
धूम्ररूपं च यत्तस्य धूर्जटीत्यत उच्यते ।
समेधयति यन्नित्यं सर्वान् वै सर्वकर्मभिः ॥ ९ ॥
मनुष्यान् शिवमन्विच्छंस्तस्मादेष शिवः स्मृतः ।
अथवा उनकी जटाका रूप धूम्र वर्णका है, इसलिये उन्हें ‘धूर्जटि’ कहते हैं। सब प्रकारके कर्मोंद्वारा सब लोगोंकी उन्नति करते हैं और सबका कल्याण चाहते हैं; इसलिये इनका नाम ‘शिव’ है ॥ ९ ½ ॥
दहत्यूर्ध्वं स्थितो यच्च प्राणान् नॄणां स्थिरश्च यत् ॥ १० ॥
स्थिरलिंगश्च यन्नित्यं तस्मात् स्थाणुरिति स्मृतः ।
ये ऊर्ध्वभागमें स्थित होकर देहधारियोंके प्राणोंका नाश करते हैं। सदा स्थिर रहते हैं और जिनका लिंग-विग्रह सदा स्थिर रहता है। इसलिये ये ‘स्थाणु’ कहलाते हैं ॥ १० ½ ॥
यदस्य बहुधा रूपं भूतं भव्यं भवत्तथा ॥ ११ ॥
स्थावरं जङ्गमं चैव बहुरूपस्ततः स्मृतः ।
विश्वे देवाश्च यत्तस्मिन् विश्वरूपस्ततः स्मृतः ॥ १२ ॥
भूत, भविष्य और वर्तमानकालमें स्थावर और जंगमोंके आकारमें उनके अनेक रूप प्रकट होते हैं, इसलिये वे ‘बहुरूप’ कहे गये हैं। समस्त देवता उनमें निवास करते हैं; इसलिये वे ‘विश्वरूप’ कहे गये हैं ॥ ११-१२ ॥
सहस्राक्षोऽयुताक्षो वा सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
चक्षुषः प्रभवेत् तेजो नास्त्यन्तोऽथास्य चक्षुषाम् ॥ १३ ॥
उनके नेत्रसे तेज प्रकट होता है तथा उनके नेत्रोंका अन्त नहीं है। इसलिये ये ‘सहस्राक्ष’, ‘आयुताक्ष’ और ‘सर्वतोऽक्षिमय’ कहलाते हैं ॥ १३ ॥
सर्वथा यत् पशून् पाति तैश्च यद् रमते सह ।
तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात् पशुपतिः स्मृतः ॥ १४ ॥
वे सब प्रकारसे पशुओंका पालन करते हैं, उनके साथ रहनेमें सुख मानते हैं तथा पशुओंके अधिपति हैं। इसलिये वे ‘पशुपति’ कहलाते हैं ॥ १४ ॥
नित्येन ब्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यदा स्थितम् ।
महयत्यस्य लोकश्च प्रियं ह्येतन्महात्मनः ॥ १५ ॥
मनुष्य यदि ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए प्रतिदिन स्थिर शिवलिंगकी पूजा करता है तो इससे महात्मा शंकरको बड़ी प्रसन्नता होती है ॥ १५ ॥
विग्रहं पूजयेद् यो वै लिङ्गं वापि महात्मनः ।

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लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते ॥ १६ ॥ जो महात्मा शंकरके श्रीविग्रह अथवा लिंगकी पूजा करता है, वह लिंगपूजक सदा बहुत बड़ी सम्पत्तिका भागी होता है ॥ १६ ॥

ऋषयश्चापि देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तथा । लिङ्गमेवार्चयन्ति स्म यत् तदूर्ध्वं समास्थितम् ॥ १७ ॥ पूज्यमाने ततस्तस्मिन् मोदते स महेश्वरः । सुखं ददाति प्रीतात्मा भक्तानां भक्तवत्सलः ॥ १८ ॥ ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ ऊर्ध्वलोकमें स्थित शिवलिंगकी ही पूजा करती हैं। इस प्रकार शिवलिंगकी पूजा होनेपर भक्तवत्सल भगवान् महेश्वर बड़े प्रसन्न होते हैं और प्रसन्नचित्त होकर वे भक्तोंको सुख देते हैं ॥ १७-१८ ॥

एष एव श्मशानेषु देवो वसति निर्दहन् । यजन्ते ते जनास्तत्र वीरस्थाननिषेविणः ॥ १९ ॥ ये ही भगवान् शंकर अग्निरूपसे शवको दग्ध करते हुए श्मशानभूमिमें निवास करते हैं। जो लोग वहाँ उनकी पूजा करते हैं, उन्हें वीरोंको प्राप्त होनेवाले उत्तम लोक प्राप्त होते हैं ॥ १९ ॥

विषयस्थः शरीरेषु स मृत्युः प्राणिनामिह । स च वायुः शरीरेषु प्राणापानशरीरिणाम् ॥ २० ॥ वे प्राणियोंके शरीरोंमें रहनेवाले और उनके मृत्युरूप हैं तथा वे ही प्राण-अपान आदि वायुके रूपसे देहके भीतर निवास करते हैं ॥ २० ॥

तस्य घोराणि रूपाणि दीप्तानि च बहूनि च । लोके यान्यस्य पूज्यन्ते विप्रास्तानि विदुर्बुधाः ॥ २१ ॥ उनके बहुत-से भयंकर एवं उद्दीप्त रूप हैं, जिनकी जगत्में पूजा होती है। विद्वान् ब्राह्मण ही उन सब रूपोंको जानते हैं ॥ २१ ॥

नामधेयानि देवेषु बहून्यस्य यथार्थवत् । निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात् कर्मभिस्तथा ॥ २२ ॥ उनकी महत्ता, व्यापकता तथा दिव्य कर्मोंके अनुसार देवताओंमें उनके बहुत-से यथार्थ नाम प्रचलित हैं ॥ २२ ॥

वेदे चास्य विदुर्विप्राः शतरुद्रीयमुत्तमम् । व्यासेनोक्तं च यच्चापि उपस्थानं महात्मनः ॥ २३ ॥ वेदके शतरुद्रिय प्रकरणमें उनके सैकड़ों उत्तम नाम हैं, जिन्हें वेदवेत्ता ब्राह्मण जानते हैं। महर्षि व्यासने भी उन महात्मा शिवका उपस्थान (स्तवन) बताया है ॥ २३ ॥

प्रदाता सर्वलोकानां विश्वं चाप्युच्यते महत् । ज्येष्ठभूतं वदन्त्येनं ब्राह्मणा ऋषयोऽपरे ॥ २४ ॥

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ये सम्पूर्ण लोकोंको उनकी अभीष्ट वस्तु देनेवाले हैं। यह महान् विश्व उन्हींका स्वरूप बताया गया है। ब्राह्मण और ऋषि उन्हें सबसे ज्येष्ठ कहते हैं ॥ २४ ॥ प्रथमो ह्येष देवानां मुखादग्निमजीजनत् । ग्रहैर्बहुविधैः प्राणान् संरुद्धानुत्सृजत्यपि ॥ २५ ॥ वे देवताओंमें प्रधान हैं, उन्होंने अपने मुखसे अग्निको उत्पन्न किया है। वे नाना प्रकारकी ग्रह-बाधाओंसे ग्रस्त प्राणियोंको दुःखसे छुटकारा दिलाते हैं ॥ २५ ॥ विमुञ्चति न पुण्यात्मा शरण्यः शरणागतान् । आयुरायोग्यमैश्वर्यं वित्तं कामांश्च पुष्कलान् ॥ २६ ॥ स ददाति मनुष्येभ्यः स एवाक्षिपेते पुनः । पुण्यात्मा और शरणागतवत्सल तो वे इतने हैं कि शरणमें आये हुए किसी प्राणीका त्याग नहीं करते। वे ही मनुष्योंको आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन और सम्पूर्ण कामनाएँ प्रदान करते हैं और वे ही पुनः उन्हें छीन लेते हैं ॥ २६ १/२ ॥ शक्रादिषु च देवेषु तस्यैश्वर्यमिहोच्यते ॥ २७ ॥ स एव व्यापृतो नित्यं त्रैलोक्यस्य शुभाशुभे । इन्द्र आदि देवताओंके पास उन्हींका दिया हुआ ऐश्वर्य बताया जाता है। तीनों लोकोंके शुभाशुभ कर्मोंका फल देनेके लिये वे ही सदा तत्पर रहते हैं ॥ २७ १/२ ॥ ऐश्वर्याच्चैव कामानामीश्वरः पुनरुच्यते ॥ २८ ॥ महेश्वरश्च लोकानां महतामीश्वरश्च सः । समस्त कामनाओंके अधीश्वर होनेके कारण उन्हें 'ईश्वर' कहते हैं और महान् लोकोंके ईश्वर होनेके कारण उनका नाम 'महेश्वर' हुआ है ॥ २८ १/२ ॥ बहुभिर्विविधै रूपैर्विश्वं व्याप्तमिदं जगत् । तस्य देवस्य यद् वक्त्रं समुद्रे वडवामुखम् ॥ २९ ॥ उन्होंने नाना प्रकारके बहुसंख्यक रूपोंद्वारा इस सम्पूर्ण लोकको व्याप्त कर रखा है। उन महादेवजीका जो मुख है, वही समुद्रमें वडवानल है ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महेश्वरमाहात्म्यं नाम एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महेश्वरमाहात्म्य नामक एक सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६१ ॥

धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण

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⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तवति वाक्यं तु कृष्णे देवकिनन्दने ।
भीष्मं शान्तनवं भूयः पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार उपदेश देनेपर युधिष्ठिरने शान्तनुनन्दन भीष्मसे पुनः प्रश्न किया— ॥ १ ॥
निर्णये वा महाबुद्धे सर्वधर्मविदां वर ।
प्रत्यक्षमागमो वेति किं तयोः कारणं भवेत् ॥ २ ॥
‘सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महाबुद्धिमान् पितामह! धार्मिक विषयका निर्णय करनेके लिये प्रत्यक्ष प्रमाणका आश्रय लेना चाहिये या आगमका। इन दोनोंमेंसे कौन-सा प्रमाण सिद्धान्त-निर्णयमें मुख्य कारण होता है?’ ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

नास्त्यत्र संशयः कश्चिदिति मे वर्तते मतिः ।
शृणु वक्ष्यामि ते प्राज्ञ सम्यक् त्वं मेऽनुपृच्छसि ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा—बुद्धिमान् नरेश! तुमने ठीक प्रश्न किया है। इसका उत्तर देता हूँ, सुनो। मेरा तो ऐसा विचार है कि इस विषयमें कहीं कोई संशय है ही नहीं ॥ ३ ॥
संशयः सुगमस्तत्र दुर्गमस्तस्य निर्णयः ।
दृष्टं श्रुतमनन्तं हि यत्र संशयदर्शनम् ॥ ४ ॥
धार्मिक विषयोंमें संदेह उपस्थित करना सुगम है, किंतु उसका निर्णय करना बहुत कठिन होता है। प्रत्यक्ष और आगम दोनोंका ही कोई अन्त नहीं है। दोनोंमें ही संदेह खड़े होते हैं ॥ ४ ॥
प्रत्यक्षं कारणं दृष्ट्वा हेतुकाः प्राज्ञमानिनः ।
नास्तीत्येवं व्यवस्यन्ति सत्यं संशयमेव च ॥ ५ ॥
अपनेको बुद्धिमान् माननेवाले हेतुवादी तार्किक प्रत्यक्ष कारणकी ओर ही दृष्टि रखकर परोक्षवस्तुका अभाव मानते हैं। सत्य होनेपर भी उसके अस्तित्वमें संदेह करते हैं ॥ ५ ॥
तदयुक्तं व्यवस्यन्ति बालाः पण्डितमानिनः ।
अथ चेन्मन्यसे चैकं कारणं किं भवेदिति ॥ ६ ॥
शक्यं दीर्घेण कालेन युक्तेनातन्द्रितेन च ।

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प्राणयात्रामनेकां च कल्पमानेन भारत ॥ ७ ॥
तत्परेणैव नान्येन शक्यं ह्येतस्य दर्शनम् ।
किंतु वे बालक हैं। अहंकारवश अपनेको पण्डित मानते हैं। अतः वे जो पूर्वोक्त निश्चय करते हैं, वह असंगत है। (आकाशमें नीलिमा प्रत्यक्ष दिखायी देनेपर ही वह मिथ्या ही है, अतः केवल प्रत्यक्षके बलसे सत्यका निर्णय नहीं किया जा सकता। धर्म, ईश्वर और परलोक आदिके विषयमें शास्त्र-प्रमाण ही श्रेष्ठ है; क्योंकि अन्य प्रमाणोंकी वहाँतक पहुँच नहीं हो सकती) यदि कहो कि एकमात्र ब्रह्म जगत्‌का कारण कैसे हो सकता है तो इसका उत्तर यह है कि मनुष्य आलस्य छोड़कर दीर्घकालतक योगका अभ्यास करे और तत्त्वका साक्षात्कार करनेके लिये निरन्तर प्रयत्नशील बना रहे। अपने जीवनका अनेक उपायसे निर्वाह करे। इस तरह सदा यत्नशील रहनेवाला पुरुष ही इस तत्त्वका दर्शन कर सकता है, दूसरा कोई नहीं ॥ ६-७ ½ ॥

हेतूनामन्तमासाद्य विपुलं ज्ञानमुत्तमम् ॥ ८ ॥
ज्योतिः सर्वस्य लोकस्य विपुलं प्रतिपद्यते ।
न त्वेव गमनं राजन् हेतुतो गमनं तथा ।
अग्राह्यमनिबद्धं च वाचा सम्परिवर्जयेत् ॥ ९ ॥
जब सारे तर्क समाप्त हो जाते हैं तभी उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होती है। वह ज्ञान ही सम्पूर्ण जगत्‌के लिये उत्तम ज्योति है। राजन्! कोरे तर्कसे जो ज्ञान होता है, वह वास्तवमें ज्ञान नहीं है; अतः उसको प्रामाणिक नहीं मानना चाहिये। जिसका वेदके द्वारा प्रतिपादन नहीं किया गया हो, उस ज्ञानका परित्याग कर देना ही उचित है ॥ ८-९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

प्रत्यक्षं लोकतः सिद्धिर्लोकश्चागमपूर्वकः ।
शिष्टाचारो बहुविधस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १० ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! प्रत्यक्ष प्रमाण, जो लोकमें प्रसिद्ध है; अनुमान, आगम और भाँति-भाँतिके शिष्टाचार ये बहुत-से प्रमाण उपलब्ध होते हैं। इनमें कौन-सा प्रबल है, यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १० ॥

भीष्म उवाच

धर्मस्य ह्रियमाणस्य बलवद्भिर्दुरात्मभिः ।
संस्था यत्नेरपि कृता कालेन प्रतिभिद्यते ॥ ११ ॥
**भीष्मजीने कहा—**बेटा! जब बलवान् पुरुष दुराचारी होकर धर्मको हानि पहुँचाने लगते हैं, तब साधारण मनुष्योंद्वारा यत्नपूर्वक की हुई रक्षाकी व्यवस्था भी कुछ समयमें भंग हो जाती है ॥ ११ ॥

अधर्मो धर्मरूपेण तृणैः कूप इवावृतः ।

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ततस्तैर्भिद्यते वृत्तं शृणु चैव युधिष्ठिर ॥ १२ ॥
फिर तो घास-फूससे ढके हुए कुएँकी भाँति अधर्म ही धर्मका चोला पहनकर सामने आता है। युधिष्ठिर! उस अवस्थामें वे दुराचारी मनुष्य शिष्टाचारकी मर्यादा तोड़ डालते हैं। तुम इस विषयको ध्यान देकर सुनो ॥ १२ ॥
अवृत्ता ये तु भिन्दन्ति श्रुतित्यागपरायणाः ।
धर्मविद्वेषिणो मन्दा इत्युक्तस्तेषु संशयः ॥ १३ ॥
जो आचारहीन हैं, वेद-शास्त्रोंका त्याग करनेवाले हैं, वे धर्मद्रोही मन्दबुद्धि मानव सज्जनोंद्वारा स्थापित धर्म और आचारकी मर्यादा भंग कर देते हैं। इस प्रकार प्रत्यक्ष, अनुमान और शिष्टाचार—इन तीनोंमें संदेह बताया गया है (अतः वे अविश्वसनीय हैं) ॥ १३ ॥
अतृप्यन्तस्तु साधूनां य एवागमबुद्धयः ।
परमित्येव संतुष्टास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥ १४ ॥
कामार्थौ पृष्ठतः कृत्वा लोभमोहानुसारिणौ ।
धर्म इत्येव सम्बुद्धास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥ १५ ॥
ऐसी स्थितिमें जो साधुसंगके लिये नित्य उत्कण्ठित रहते हों—उससे कभी तृप्त न होते हों, जिनकी बुद्धि आगम प्रमाणको ही श्रेष्ठ मानती हो, जो सदा संतुष्ट रहते तथा लोभ-मोहका अनुसरण करनेवाले अर्थ और कामकी उपेक्षा करके धर्मको ही उत्तम समझते हों, ऐसे महापुरुषोंकी सेवामें रहो और उनसे अपना संदेह पूछो ॥ १४-१५ ॥
न तेषां भिद्यते वृत्तं यज्ञाः स्वाध्यायकर्म च ।
आचारः कारणं चैव धर्मश्चैकस्त्रयं पुनः ॥ १६ ॥
उन संतोंके सदाचार, यज्ञ और स्वाध्याय आदि शुभ-कर्मोंके अनुष्ठानमें कभी बाधा नहीं पड़ती। उनमें आचार, उसको बतानेवाले वेद-शास्त्र तथा धर्म—इन तीनोंकी एकता होती है ॥ १६ ॥

युधिष्ठिर उवाच
पुनरेव हि मे बुद्धिः संशये परिमुह्यति ।
अपारे मार्गमाणस्य परं तीरमपश्यतः ॥ १७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! मेरी बुद्धि संशयके अपार समुद्रमें डूब रही है। मैं इसके पार जाना चाहता हूँ, किंतु ढूँढ़नेपर भी मुझे इसका कोई किनारा नहीं दिखायी देता ॥ १७ ॥
वेदः प्रत्यक्षमाचारः प्रमाणं तत्त्रयं यदि ।
पृथक्त्वं लभ्यते चैषां धर्मश्चैकस्त्रयं कथम् ॥ १८ ॥

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यदि प्रत्यक्ष, आगम और शिष्टाचार—ये तीनों ही प्रमाण हैं तो इनकी तो पृथक्-पृथक् उपलब्धि हो रही है और धर्म एक है; फिर ये तीनों कैसे धर्म हो सकते हैं? ।। १८ ।।

भीष्म उवाच

धर्मस्य ह्रियमाणस्य बलवद्भिर्दुरात्मभिः ।
यद्येवं मन्यसे राजंस्त्रिधा धर्मविचारणा ।। १९ ।।
भीष्मजीने कहा— राजन्! प्रबल दुरात्माओं‌द्वारा जिसे हानि पहुँचायी जाती है, उस धर्मका स्वरूप यदि तुम इस तरह प्रमाण-भेदसे तीन प्रकारका मानते हो तो तुम्हारा यह विचार ठीक नहीं है। वास्तवमें धर्म एक ही है, जिसपर तीन प्रकारसे विचार किया जाता है—तीनों प्रमाणों‌द्वारा उसकी समीक्षा की जाती है ।। १९ ।।
एक एवेति जानीहि त्रिधा धर्मस्य दर्शनम् ।
पृथक्त्वे च न मे बुद्धिस्त्रयाणामपि वै तथा ।। २० ।।
यह निश्चय समझो कि धर्म एक ही है। तीनों प्रमाणों‌द्वारा एक ही धर्मका दर्शन होता है। मैं यह नहीं मानता कि ये तीनों प्रमाण भिन्न-भिन्न धर्मका प्रतिपादन करते हैं ।। २० ।।
उक्तो मार्गस्त्रयाणां च तत्तथैव समाचर ।
जिज्ञासा न तु कर्तव्या धर्मस्य परितर्कणात् ।। २१ ।।
उक्त तीनों प्रमाणोंके द्वारा जो धर्ममय मार्ग बताया गया है, उसीपर चलते रहो। तर्कका सहारा लेकर धर्मकी जिज्ञासा करना कदापि उचित नहीं है ।। २१ ।।
सदैव भरतश्रेष्ठ मा तेऽभूदत्र संशयः ।
अन्धो जड इवाशङ्की यद् ब्रवीमि तदाचर ।। २२ ।।
भरतश्रेष्ठ! मेरी इस बातमें तुम्हें कभी संदेह नहीं होना चाहिये। मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे अन्धों और गूँगोंकी तरह बिना किसी शंकाके मानकर उसके अनुसार आचरण करो ।। २२ ।।
अहिंसा सत्यमक्रोधो दानमेतच्चतुष्टयम् ।
अजातशत्रो सेवस्व धर्म एष सनातनः ।। २३ ।।
अजातशत्रो! अहिंसा, सत्य, अक्रोध और दान—इन चारोंका सदा सेवन करो। यह सनातन धर्म है ।। २३ ।।
ब्राह्मणेषु च वृत्तिर्या पितृपैतामहोचिता ।
तामन्वेहि महाबाहो धर्मस्यैते हि देशिकाः ।। २४ ।।
महाबाहो! तुम्हारे पिता-पितामह आदिने ब्राह्मणोंके साथ जैसा बर्ताव किया है, उसीका तुम भी अनुसरण करो; क्योंकि ब्राह्मण धर्मके उपदेशक हैं ।। २४ ।।
प्रमाणमप्रमाणं वै यः कुर्यादबुधो जनः ।
न स प्रमाणतामर्हो विवादजननो हि सः ।। २५ ।।