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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

बाबूलाल ठाकुर ज्योतिषाचार्य

सचित्र

ज्योतिष शिक्षा

(प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड)

This image shows a close-up of a severely aged and damaged piece of paper or parchment. The surface is a mottled brownish-tan color, covered in a network of fine, irregular cracks and creases that suggest significant age and handling. A prominent, vertical, light-colored stain or discoloration runs along the right side of the frame, indicating water damage or mold growth. The texture appears rough and brittle, with some darker, more saturated areas of staining, particularly towards the bottom right. The overall appearance is that of an old, weathered document or book cover.

सचित्र ज्योतिष-शिक्षा

प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

रचयिता

बी० एल० ठाकुर, ज्योतिषाचार्य

मोतीलाल बनारसीदास

दिल्ली वाराणसी पटना बंगलौर मद्रास

द्वितीय संशोधित एवं परिवर्धित संस्करणः वाराणसी, १९८२ पुनर्मुद्रणः दिल्ली, १९८९, १९९४

© मोतीलाल बनारसीदास

बंगलो रोड, जवाहरनगर, दिल्ली ११० ००७ १२० गंघेड़ा हाई रोड, मैलापुर, मद्रास ६०० ००४ १६ सेन्ट मार्क्स रोड, बंगलौर ५६० ००१ अशोक राजपथ, पटना ८०० ००४ चौक, वाराणसी २२१ ००१

मूल्यः रु० ६५

नोरेन्द्रप्रकाश जैन, मोतीलाल बनारसीदास, बंगलो रोड, दिल्ली ११० ००७ द्वारा प्रकाशित तथा जैनेन्द्रप्रकाश जैन, श्री जैनेन्द्र प्रेस, ए-४५ नारायणा, फेज-१, नई दिल्ली ११० ०२८ द्वारा मुद्रित

समर्पण

पुण्य प्रताप पुंज से जिनके,

मैंने ज्योतिष शास्त्र पढ़ा ॥

जिनके उत्साहित करने से,

इसमें मेरा ज्ञान बढ़ा ॥१॥

परम पूज्यवर पिता आप की,

पुण्य स्मृति ये सच्चित है ॥

सेवा में लघु सेवक की यह,

सादर भेंट समर्पित है ॥२॥

संज्ञा

संज्ञा ही है जो आत्मा का

॥ १ ॥ आत्मा का अतीत है

संज्ञा का अतीत है

॥ २ ॥ आत्मा का अतीत है

संज्ञा का अतीत है

॥ ३ ॥ आत्मा का अतीत है

संज्ञा का अतीत है

॥ ४ ॥ आत्मा का अतीत है

प्राच्यकथन

वैदिक काल से भारतीय विज्ञानों में ज्योतिष शास्त्र का एक प्रमुख स्थान रहा है। विना दूरबीन के गणित और फलित ज्योतिष दोनों ही में, प्राचीन काल में जितना विशद विवेचन ज्योतिष के सम्बन्ध में भारतवर्ष में हुआ है, शायद ही किसी अन्य राष्ट्र में हुआ हो। जब से हिन्दी भारत की राष्ट्र-भाषा घोषित की गई है, तब से आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनेकानेक ग्रन्थ हिन्दी में लिखे जा रहे हैं। इस कार्य में अनेक कठिनाइयाँ सम्मुख आती हैं। पारिभाषिक शब्द ही हजारों की संख्या में गढ़ने पड़ते हैं। परन्तु यह दुःख की बात है कि जहाँ पारिभाषिक शब्दों का कोई सवाल नहीं, जो विद्याएं हमारी पैतृक सम्पत्ति हैं, उनकी भी सरल सुन्दर और विस्तृत व्याख्याएं हिन्दी में आज भी दुष्प्राप्य हैं।

हर्ष का विषय है कि ज्योतिष शास्त्र सम्बन्धी इस कभी को पूरा करने में 'सिंहसदन' नरसिंहपुर के श्री वी० एल० ठाकुर सलमन हैं। उन्होंने अपने "सचित्र ज्योतिष शास्त्र" का प्रथम भाग पूर्ण कर लिया है। इस शास्त्र में स्वयं मुझे रुचि है।

यह सुन्दर ग्रन्थ पढ़ कर मुझे संतोष हुआ। पुस्तक में यथा स्थान अनेक चित्र दिये हैं और यद्यपि ठाकुर साहब ने अनेक भागों का काफी विस्तार से समझाया है, भाषा सरल है और ठाकुर साहब ने इस बात को सदा ध्यान में रखा है कि पुस्तक उनके लिये लिखी जा रही है जिन्होंने पहिले कभी भारतीय ज्योतिष शास्त्र में कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की।

आशा है, ठाकुर साहब का यह स्तुत्य प्रयत्न सफल होगा और हिन्दी ससार उनके ज्योतिष शास्त्र को पूर्णतया अपनावेगा।

नागपुर

दिनांक २२ फरवरी १९४४

}

कुञ्जीलाल दुबे

उपकुलपति

नागपुर विश्वविद्यालय

लेफ्ट० कर्नल पंडित को० एल० दुबे

वी० ए०, एल-एल० बी०, एम० एल० ए०

वाइस चान्सलर नागपुर यूनिवर्सिटी

व स्पीकर मध्य प्रदेश लेजिसलेटिव असेम्बली

नागपुर म० प्र०

Page 8 Illustration

(चित्र / चक्र पृष्ठ 8)

उद्देश्य

बहुत से ज्योतिष ग्रन्थों के होने पर भी इस पुस्तक के लिखने की क्यों आवश्यकता हुई यहाँ संक्षेप में यह बता देना अनुचित न होगा।

आज कल पाश्चात्य देशों में भी फलित में विश्वास बढ़ने लगा है। कई पुरुष स्वयं भी अनुभव कर फलित पर विश्वास करने लगे हैं, इस कारण इस शास्त्र के अध्ययन की ओर लोगों की रुचि बढ़ रही है, परन्तु ज्योतिष के अधिकतर ग्रन्थ संस्कृत में ही हैं और वे ग्रन्थ विद्वानों के समझने योग्य ही लिखे गये हैं, अर्थात् वे ही उनको समझ सकते हैं जो उस विषय में कुछ जानते हों। परन्तु जो उस विषय में कुछ भी न जानते हों उनके समझने में वे पुस्तकें भाषा टीका में होने पर भी समझ में नहीं आ सकती। कारण कि नवीन विचार्यों को उन पुस्तकों के समझने में बड़ी कठिनाई होती है। संस्कृत की भी उतनी योग्यता प्राप्त करने का समय या साधन का अभाव भी बहुत खटकता है।

इस कारण राष्ट्रभाषा हिन्दी में एक ऐसी पुस्तक की आवश्यकता है कि जिससे कोई विचार्यों यदि ज्योतिष का एक अक्षर भी न जानता हो तो बिना किसी दूसरी पुस्तक का सहारा लिये घर बैठे स्वयं ज्योतिष का अध्ययन कर सके।

मैंने भी ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन में बहुत वर्ष व्यतीत किये हैं और कई पण्डितों से मिल कर इसका अध्ययन करते समय आवश्यक संक्षिप्त नोट भी तैयार करता गया जिससे उस विषय की विस्मृति न हो।

कई मित्रों ने जिनको इस विषय के अध्ययन की तीव्र इच्छा हुई ये नोट देख कर प्रसन्न हुए और जन साधारण के लाभार्थ प्रकाशित करा देने की सम्मति दी। इस कारण इस पुस्तक के प्रकाशित करने की आवश्यकता हुई।

यह पुस्तक इस बात को ध्यान में रखकर लिखी गई है कि पाठक इस विषय से अनभिज्ञ हैं, इसी कारण किसी विषय को समझाते समय नवीन विचार्यों को अध्ययन करते समय कठिनाई न हो, कहीं-कहीं एक बात की पुनरुक्ति भी करनी पड़ी है और इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि कोई कठिन शब्द न आवे जिससे भावार्थ समझने में कठिनाई जान पड़े। जहाँ आवश्यक हुआ है वहाँ कठिन शब्दों को समझा दिया गया है। पारिभाषिक शब्द तो सर्वत्र ही समझा दिये गये हैं। इसमें स्थान स्थान पर विशेष शब्दों के अंग्रेजी में भी अर्थ दे दिये गये हैं जिससे अंग्रेजी जानने वालों को इसके अतिरिक्त भी इतर अंग्रेजी के ज्योतिष ग्रंथों को भी समझने की योग्यता प्राप्त हो जायगी। तात्पर्य यह है कि शास्त्ररूपी सागर को पार करने के लिये पाठक इस पुस्तक को नौका रूप में पायेंगे।

( ८ )

केवल इस ज्ञान खण्ड के ही पढ़ लेने से कोई पूरा ज्योतिषी नहीं बन सकता, किन्तु यह खण्ड ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान की वृद्धि में सहायक होगा, एवम् ज्योतिष शास्त्र में प्रवेश करने के लिये सच्चे मार्ग दर्शक का काम देगा।

नवीन विद्यार्थी को क्रमानुसार इसके सम्पूर्ण खण्डों का अध्ययन करना होगा। ज्ञान खण्ड अध्ययन कर लेने से ज्योतिष सम्बन्धी बहुत सी महत्त्वपूर्ण मुख्य मुख्य बातें समझ में आने लगेगी। इसमें ज्योतिषियों के लाभार्थ बहुत से उपयोगी बुटकुले भी दिये हैं। जैसे किसी का जन्म सम्बत् मास पक्ष दिन समय आदि न ज्ञात हो तो केवल कुंडली चक्र को देख कर ही ये सब बातें किस प्रकार बताई जा सकती हैं या बिना पंचांग के तिथि नक्षत्र करण वार सूर्य चन्द्र स्पष्ट आदि किस प्रकार बताये जा सकते हैं समझाया है। इनके अतिरिक्त तारीख से तिथि आदि कैसे जानना भी बताया है और अनन्त वर्षों की जन्मी देकर जन्मी बनाने की युक्ति भी बताई गई है। इस ज्ञान खण्ड के अध्ययन करने के उपरान्त आगे अध्ययन करना चाहिए। इस ज्ञान खण्ड के अध्ययन कर लेने से किसी की टिप्पणी ( संक्षिप्त जन्मपत्रिका ) बना लेना आ जाता है। अन्त में फलित सम्बन्धी मुख्य मुख्य बातें संक्षेप में बताई गई हैं जिनको जानना आवश्यक है और जिनके जान लेने पर फलित समझने की योग्यता बढ़ेगी। इसके उपरान्त ज्यों ज्यों आप आगे के और भी खण्ड अध्ययन करते जायेंगे योग्यता बढ़ती जायगी और पूर्ण अध्ययन कर लेने पर आप ज्योतिष के अच्छे जानकार अवश्य बन जायेंगे।

गणित खण्ड के अध्ययन से आप किसी की भी पूरी जन्मपत्री बना सकेंगे, और जन्मपत्र बनाने के सम्बन्ध की सम्पूर्ण बातें आप को आ जावेगी। इसमें समय ज्ञान, इष्ट साधन, ग्रह साधन, लग्न साधन, द्वादश भाव साधन, वर्ग साधन, अष्टक वर्ग साधन, ग्रह षड्वल साधन, भाव षड्वल साधन, आयु साधन, दशा साधन, अर्हण साधन, अर्हण से ग्रह साधन आदि अनेक प्रकार का गणित उदाहरण देकर सरलता पूर्वक समझाया है, जिससे नवीन विद्यार्थी को समझने में अड्डवन न हो। इसके उत्तरार्द्ध में प्रत्येक गणित की क्रिया करने की रीति भी समझाई गई है।

फलित खण्ड— फलित सम्बन्धी शेष सब बातें रहेंगी और महान् पुरुषों की कुंडली से उदाहरण देकर अभ्यास कराया जायगा जिससे फल कथन करने की योग्यता आ जायगी। यह योग्य विद्वानों के अध्यक्षता में तैयार होगा जिन्होंने सारा जीवन इसे अध्ययन कर व इसमें अनुभव प्राप्त कर फलादेश कथन में कीति प्राप्त की है।

वर्षफल खण्ड— वर्षफल बनाने का पूरा गणित उदाहरण देकर समझाया जायगा और वर्ष भर का सम्पूर्ण फल रहेगा जिससे आप अपना या किसी का भी वर्षफल बना सकेंगे।

( १ )

प्रश्न खण्ड—प्रश्न ज्योतिष सम्बन्धी सम्पूर्ण बातें रहेंगी और किसी प्रश्न का उत्तर देने का अभ्यास उदाहरण देकर कराया जायगा।

मुहूर्त खण्ड—मुहूर्त सम्बन्धी सम्पूर्ण बातें इसमें रहेंगी।

संहिता खण्ड—ज्योतिष की शेष बातें भेदनीसंहिता आदि सम्बन्धी बातें इसमें रहेंगी। इसमें वर्षों का विचार देश के फल का विचार वस्तु की महंगाई आदि का विचार इत्यादि बातें रहेंगी।

यह पुस्तक ज्योतिष के नवीन विद्यार्थी को लाभ पहुँचाने की दृष्टि से लिखी गई है। इस कारण यदि इसके प्रकाशन से जनता का कुछ भी लाभ हुआ तो मैं अपना उद्देश्य सफल समझूंगा।

पाठक यदि इस ज्ञान खण्ड को अपना कर यदि मेरा उत्साह बढ़ायेगे तो इसके इतर खण्डों के प्रकाशन में शीघ्रता होगी।

अंत में विशेष प्रार्थना है कि भूल होना मानुषीय है, यदि किसी विषय को समझाने में कोई त्रुटि हुई हो तो या अन्य प्रकार की कोई भूल हुई हो तो सज्जनों से आशा है कि क्षमा प्रदान कर भूल की सूचना देगे या अपनी कठिनाई सूचित करेंगे तो मैं अति अनुगृहीत होऊँगा और भविष्य में भूल मुधार दी जायेगी और कठिनाई दूर कर आवश्यक बातों का समावेश कर दिया जायगा।

इस खण्ड के लिखने में श्री उमाप्रसाद जी पोतदार हस्तरेखा शास्त्री और ज्योतिषाचार्य और मेरे भाई नर्मदा प्रसाद ठाकुर ( जो हस्तरेखा और ज्योतिष शास्त्र में दक्ष हैं) ने उचित परामर्श देकर बहुत सहायता की है। इसलिये उनको धन्यवाद है।

भवदीय

वी० एल० ठाकुर ज्योतिषाचार्य

सिंह सदन

नरसिंहपुर म० प्र०

नरसिंहपुर

दिनांक १८-७-१९४५

A small, bright yellow circular sticker is affixed to the left margin of the page, positioned roughly in the middle vertically. The rest of the page contains extremely faint, illegible text that appears to be bleed-through from the reverse side.

ज्योतिष शिक्षा

( ज्ञान खण्ड )

अध्यायानुसार विषय-सूची

अध्याय विषयपृष्ठअध्याय विषयपृष्ठ
समर्पण१९ अंग्रेजी पंचांग१०२
प्राकथन२० कुण्डली विचार१०५
उद्देश्य२१ लग्न निकालना११२
१ ज्योतिष शास्त्र के भेद२२ इष्टकाल और कुण्डली बनाना११९
२ ज्योतिष शास्त्र में विश्वास२३ राशियाँ और कालांग१२४
३ सौर जगत और ग्रह२४ राशि गुण धर्म१२८
४ राशि चक्र१२२५ ग्रह विचार और स्वगृह१३०
५ नक्षत्र विचार१९२६ ग्रह की उच्च नीच
६ ध्रुव की पहिचान२१राशियाँ१३५
७ नक्षत्रों की पहिचान और चित्र२३२७ ग्रहमंजी१३८
८ राशियों के स्वरूप३६२८ ग्रहों की दृष्टि विचार१४५
९ अक्षांश देशान्तर विचार३८२९ ग्रहों का परिचय१५५
१० आकाश की कल्पित रेखाओं का स्पष्टीकरण४५३० ग्रह गुण धर्म१५६
११ ग्रहों की गति५१३१ ग्रहों का प्रभाव१६०
१२ सम्पात विचार५५३२ भाव परिचय नाम आदि१६३
१३ सायन निरयन विचार५९३३ भाव विचार१६९
१४ काल प्रमाण और वर्ष आदि विचार६०३४ धूपघड़ी बनाना१७३
१५ मास और पक्षादि विचार६७३५ बिना पंचांग के तिथि आदि ज्ञान१७६
१६ पंचांग के अंग तिथि आदि का विचार७१३६ सायन सूर्य-चन्द्र साधन१८२
१७ मुहूर्त का संक्षिप्त ज्ञान७९३७ नारीख से तिथि जानना अनन्त वर्षों की जन्मी आदि१९४
१८ पंचांग कैसे देखना और उपयोग९१३८ दिन मान चन्द्रोदय आदि जानना२१८

( १२ )

अध्यायविषयपृष्ठ
३९कुण्डली पर से जन्म सगय
ज्ञान२१६
४०ग्रह वल विचार२२०
४१तन्त्र गुण धर्म२२६
४२जन्म पत्री बनाना२२७
४३फलित सम्बन्धी स्थूल विचार२३८
४४फलित विचार करने के कुछ नियम२४३
अध्यायविषयपृष्ठ
४५गोचर विचार२५०
४६शनि का विशेष विचार२५२
४७आयुर्दाय विचार२५४
४८मारकेश विचार२५७
४९दशा साधन२५८
५०कार्यसिद्धि योग२६५
५१नवांश ज्ञान२६६

चित्रों की सूची

चित्रपृष्ठचित्रपृष्ठ
१ सूर्य के आस-पास ग्रह इस प्रकार घूमते हैं१९ मृगशिर२५
२ ग्रहों के परिक्रमा करने का क्रम२० आर्द्रा२५
३ ग्रहों के आकार का आनुपा-तिक मिलाव२१ पुनर्वसु२६
४ राहु केतु की स्थिति१०२२ पुष्य२६
५ राशि चक्र और ग्रह घूमने की दिशा व पृथ्वी के आस पास ग्रहों का घूमना११२३ आश्लेषा२६
६ राशि चक्र विषुवत वृत्त का ध्रुव१३२४ मघा२७
७ पृथ्वी की कक्षा या परिक्रमा मार्ग१३२५ पूर्वा फाल्गुनी उत्तरा फाल्गुनी२७
८ कोण१५२६ हस्त२७
९ समकोण१५२७ चित्रा२७
१० एक चक्र के समकोण१६२८ स्वाती२७
११ ऊर्ध्व रेखा के दोनों ओर के कोण१६२९ विशाखा२७
१२ कोण नापने का चक्र१७३० अनुराधा२७
१३ आकाश में अशों का अनुमान१८३१ ज्येष्ठा२८
१४ सप्त ऋषि, लघु ऋक्ष, ध्रुव और ग्रहषि२२३२ मूल२८
१५ अश्विनी२४३३ पूर्वाषाढा उत्तराषाढा२८
१६ भरणी२४३४ अभिजित२९
१७ कृत्तिका२४३५ श्रवण२९
१८ रोहिणी२४३६ धनिष्ठा२९
३७ पूर्वा भाद्रपद उत्तरा भाद्र-पद३०
३८ रेवती३०
३९ आकाश के नक्षत्रों का चित्रपट १३३
४० आकाश के नक्षत्रों का चित्रपट २३४
४१ आकाश के नक्षत्रों का चित्रपट ३३५

( १४ )

चित्रपृष्ठ
बारह राशियों के कल्पित स्वरूप
४२ मेष३७
४३ वृष३७
४४ मिथुन३७
४५ कर्क३७
४६ सिंह३७
४७ कन्या३७
४८ तुला३८
४९ वृश्चिक३८
५० धन३८
५१ मकर३८
५२ कुंभ३८
५३ मीन३८
५४ अक्षांश और देशान्तर३९
५५ ध्रुव की ऊँचाई का नाप४२
५६ इलाहाबाद में मध्याह्न में
सूर्य की ऊँचाई४३
५७ नरासिंह पुर में मध्याह्न में
सूर्य की ऊँचाई४३
५८ नाड़ीवृत्त, क्रांतिवृत्त, भोग
और शर४८
५९ दूसरा उदाहरण शर भोग
आदि का४९
६० क्षितिज, क्रांतिवृत्त,
नाड़ीवृत्त ध्रुव५०
६१ सम्पात बिन्दु५५
६२ क्रांति सीमा नाड़ी वृत्त
आदि५६
६३ आकाश में पूर्व दशम अस्त
पाताल१०६
६४ आकाश की दिशाओं दर्शक
चित्र१०६
चित्रपृष्ठ
६५ आकाश का चौकोर चित्र१०८
६६ लग्न दशम अस्त पाताल
दर्शक चौकोर चित्र१०९
६७ आकाश में द्वादश भाव११०
६८ लग्न कुंडली११०
६९ भाव सूचक लग्न कुंडली१११
७० आकाश में लग्न से अस्त
तक भाव११६
७१ राशियों के घूमने का क्रम
और स्वराशि१३२
७२ स्वराशि दर्शक चित्र१३३
७३ ग्रह की दृष्टि सूचक चित्र
ग्रहों के कल्पित स्वरूप के चित्र१४६
७४ रवि१५९
७५ चन्द्र"
७६ मंगल"
७७ बुध"
७८ शुक्र"
७९ शुक"
८० शनि"
८१ राहु"
८२ केतु"
८३ ध्रूपघड़ी बनाना१७४
८४ ध्रूपघड़ी का चक्र बनाना१७५
८५ समय सूचक चक्र और ध्रुव
का अक्षांश१७५
८६ सू्मि पर ध्रूपघड़ी बनाना
८७ कुण्डली के भिन्न-भिन्न प्रकार
और पाश्चात्य पद्धति से कुंडली२३३-२३६
८८ दिशाओं की राशियाँ
और भाव२६७

३३

ज्योतिष-शिखा

[ प्रारम्भिक ज्ञानखण्ड ]

बुद्धि विनायक विघ्न हर, बिनवों बारम्बार । विनय करू वागीश की, विमल बुद्धि दातार ॥ १ ॥ जय महेश जिन तन लसै, वर नक्षत्र की माल । जाकी आज्ञा से भ्रमत, ग्रह आदिक अरु काल ॥ २ ॥ ग्रह प्रभाव से प्रगट हो, पूर्व जन्म का कर्म । कष्ट कटै प्रभु ध्यान से, अरु प्रगटै शुभ धर्म ॥ ३ ॥ धरू ध्यान कल्याण हित, किरपा करहु कृपाल । शीघ्र पूर्ण हो ग्रन्थ यह, दो शस्ती तत्काल ॥ ४ ॥

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अध्याय १

ज्योतिष शास्त्र के भेद

ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि ज्योतिष शास्त्र के कितने भेद हैं। इसके मुख्य दो भेद हैं—

( १ ) गणित ज्योतिष Astra-Nomy ( एस्ट्रा नमी ) = जिससे पंचाङ्ग आदि बनाये जाते हैं।

( २ ) फलित ज्योतिष Astra-logy ( एस्ट्रा लजी ) = जिससे ग्रहों के फल का विचार होता है।

इनके भी कई भेद हो गये हैं जो नीचे समझाये जाते हैं:—

१ गणित ज्योतिष—इससे ग्रहों का स्वरूप अवस्था गति आदि का निश्चय किया जाता है। इसके तीन भेद हैं—

( १ ) सिद्धान्त—जिसमें कल्प ( सूक्ति के आदि ) से ग्रह आदि स्पष्ट करने के लिए गणित करने की रीति दी है।

( २ ) तन्त्र—जिसमें युग ( वर्तमान कलियुग ) से गणित करने की रीति दी है।

( ३ ) करण—जिसमें इष्ट शाका से गणित करने की रीति दी है।

गणित ज्योतिष के अन्तर्गत वह गणित भी है जिसमें जोडना, घटाना, गुणा, भाग वर्गमूल आदि निकालना तथा भूमि, आकाश आदि के नापने की विधि बतलाई गई है। इसी गणित द्वारा ग्रहों की स्थिति आदि निकाली जाती है।

२ फलित ज्योतिष ( नजूम )—ग्रहों की स्थिति पर से शुभाशुभ फलों का विचार इससे होता है। इसके भेद इस प्रकार हैं—

( १ ) होरा अर्थात् जातक—आधान कुंडली से दुःख सुख का विचार।

( २ ) ग्रहूत—कार्य आरम्भ करने में ग्रह, तिथि, नक्षत्र, वार आदि के प्रमाण से शुभाशुभ फल का विचार।

( ३ ) ताजिक—वर्ष प्रवेश, मास प्रवेश, दिन प्रवेश आदि बनाकर वर्ष भर के शुभाशुभ फल का विचार।

( ४ ) प्रश्न ज्योतिष—किसी भी समय इष्टकाल पर से किसी भी प्रश्न का तत्सम्बन्धी दुःख सुख आदि के परिणाम का विचार।

( ५ ) मेदनीय किंवा राष्ट्र ज्योतिष—किसी देश या राष्ट्र की उन्नति-अवन्ति दुःख सुख आदि का विचार।

( ६ ) संहिता खण्ड—किसी सम्बत का शुभाशुभ, भूकम्प, इन्द्र धनुष, केतु उदय आदि का फल, शुभाशुभ शकुन, शरीर बिल्ह द्वारा मरण होने का ज्ञान, स्वरोदय, पल्लीपतन, सामुद्रिक, अङ्ग स्फुरण आदि का विचार।

अध्याय २

ज्योतिष शास्त्र में विश्वास

इस ग्रन्थ में फलित ज्योतिष का अध्ययन करने के लिए ही प्रारम्भिक बातें बताई गई हैं। फलित ज्योतिष में कई मनुष्य विश्वास करते हैं कई नहीं करते और कहते हैं कि यह इतने दूर होते हुए पृथ्वी पर किस प्रकार प्रभाव पहुँचा सकते हैं। इस कारण प्रारम्भ में ही संक्षेप में ग्रहों के प्रभाव के विषय में थोड़ा बता देना अनावश्यक न होगा।

यह निर्विवाद सिद्ध है कि सूर्य के आस-पास पृथ्वी आदि कई ग्रह परिक्रमा करते हैं और समस्त ग्रह आदि एवं सूर्य अन्ततः विश्व के अन्तरिक्ष में निराधार लटके हुए निरन्तर नियमित रूप से गतिशील रहते हैं। सूर्य के आस पास चन्द्र सहित पृथ्वी एवं बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि आदि ग्रह घूम रहे हैं। इन सबों के समुदाय को सौर जगत् या सूर्य का परिवार कहते हैं।

ये सब ग्रह सूर्य की आकर्षण शक्ति के वशीभूत होकर विशेष नियम के अनुसार सूर्य के आस पास घूम रहे हैं। इनमें प्रत्येक ग्रहों की भी पृथक-पृथक आकर्षण शक्ति है जिसे पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा, पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से खिंचा हुआ पृथ्वी के आस पास घूम रहा है और सूर्य की आकर्षण शक्ति से खिंचे हुए चन्द्र और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। इसी प्रकार शनि आदि ग्रहों के भी उपग्रह हैं जो उन ग्रहों के आकर्षण के प्रभाव से इन ग्रहों की परिक्रमा करते हुए सूर्य के आकर्षण से प्रभावित होकर सूर्य की भी परिक्रमा कर रहे हैं।

पृथ्वी से १.३६ लाख मील दूर होते हुए भी जब समस्त पृथ्वी पर सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव पड़ता है तो पृथ्वी में रहने वाले जड़ एवं चैतन्य पशु-पक्षी, मनुष्य आदि भी सूर्य के प्रभाव से प्रभावित होने से कैसे बच सकते हैं।

प्रत्यक्ष देखने में आता है कि जब सूर्य विशेष राशियों में आता है तो किस प्रकार जाड़ा, गर्मी, बरसात आदि ऋतुओं में परिवर्तन होता है जिसका प्राणी मात्र पर प्रभाव पड़ता है। सूर्य के ही कारण प्रकाश, उष्णता, ग्रह गति होती है। सूर्य न हो तो प्राणी मात्र का जीना असम्भव हो जाय। आज कल सूर्य की किरणों से चिकित्सा भी होने लगी है।

प्रातः काल सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं। मध्याह्न में सीधी पड़ती है और रात्रि में किरणों का अभाव रहता है। इस प्रकार जैसे समय में जिस बालक का जन्म हो उस समय का प्रभाव उसके स्वभाव में परिणत हो जाता है। अर्थात् समय के अनुसार ही स्वभाव पड़ जाता है। भीष्म में ( वृष और मिथुन के सूर्य में ) सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। हेमन्त ऋतु में ( वृश्चिक-धनु के सूर्य में ) तिरछी पड़ती