संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
विचारसूत्र और कार्यक्रम ।
जनवरी सन् १९२० ई० कि जबसे मैंने भार्गव पत्रिकाका सम्पादन-कार्य छोड़ा, उसी समयसे हिन्दी भाषामें सन्तान स्वन्ध्नी एक ग्रंथ लिखनेका विचार मेरे चित्तमें उत्पन्न हुआ । प्रायः सोचा करता था कि अपने मनोरथको किन्तु प्रकार पूरा करूँ । कभी अपनी अयोग्यताकी श्रांर देखकर निराश होता, कभी सेवा-प्रणाली सुखद और हृदय-आहिष्णी न होनेसे लज्जित होता था, परन्तु एक लालायित हृदय अपनी लालसाको पूरी किये बिना कैसे रहे ? ज्यों ज्यों दिन व्यतीत होते थे चित्त कार्य-क्षेत्रमें प्रवेश करना चाहता था । ज्यों ज्यों लालायित हृदय पर विचारों की चर्चा होती थी, अधीर्य होता जाता था । उत्साह नित्य चर्चा-कालीन नदीके समान बह रहा था, विचारोंनी तरंगें उत्साह-रूपी नदीमें मौजे मारती थीं, चित्त मनोरथ-रूपी नव विकसित सुमनको ले किसी सुसम्पति रूपी नौकाके सहारे अथाह नदीके पार होना चाहता था । कितने ही दिवस इसी भाँति व्यतीत हुए । एक दिन मैंने अपने विचारोंको सह-धर्मिणीसे कहा । कुछ देर बाद मुझे यह उत्तर मिला कि—
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निवासस्थान गोरखपुर जिलेके किसी ग्राममें था, आए। उनपर, मैंने अपने विचार प्रगट किये। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ कई ग्रंथ देनेके वचन दिये। कुछ ही दिन बाद उक्त पण्डितजी अयोध्या जाते हुए लौटे और अपने साथ शरीर-कल्पद्रुम और रतिशास्त्र लाए। इन दोनों पुस्तकोंको देखकर मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ और पण्डितजीसे एक मासतक इन पुस्तकोंको मेरे पास रखनेकी प्रार्थना की। परन्तु मेरे मित्रने इस बातको स्वीकार न किया, इसलिये कि ये पुस्तकें छपी नहीं थीं और गायद मैं इनको नकल कर लूँ और फिर छपवाऊँ। पण्डितजी मेरे इतने कहने पर चौकने हो गये। अतएव अपनी उपस्थितिमें पुस्तकें मुझे देखनेके लिये देते और चलते समय ले जाया करते थे। इसी प्रकार चार दिन दो दो तीन तीन घण्टे मैं उन पुस्तकोंको देख सका और जो कुछ अपने विषयकी बात पाई नोट कर ली। कुछ ही दिन बाद पण्डितजीका देहान्त हो गया। न जाने पुस्तकें कहाँ हैं; क्योंकि पण्डितजी घरके अकेले ही थे।
दूसरे ग्रंथोंका देखना भी जारी रहा। कुछ दूसरे काव्योंके रहनेसे समय अधिक व्यतीत हुआ। विशेषतः इस कारण कि मेरे जीवनमें इस प्रकारका यह पहला ही कार्य था। सच है, एक नए मनुष्यके लिये सरल कार्य भी प्रारम्भमें कठिन हो जाता है। लिखनेका कार्य प्रारंभ हुआ, परन्तु अनेक शंकाओंके उपस्थित होते हुए बीच बीचमें कई बार रुक जाना पड़ा और
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शंकाओंपर विचार करनेमें समय अधिक व्यतीत हुआ । इसी प्रकार धीरे धीरे लिखते और शंकाओंपर विचार करते करते पाण्डुलिपी ( मसचिद्रा ) तैयार हो गयी । फल यह हुआ कि एक लालायित हृदयसे संवन्ध रखता हुआ सन्तान सम्बन्धी विषय 'सन्तति-शास्त्रके' नामसे सर्व साधारणकी सेवा में उपस्थित है ।
अयोध्याप्रसाद भागवत
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श्रीमान् वावु अयोध्याप्रसाद भार्गव
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भूमिका ।
किसी देश, समाज या मनुष्यकी उन्नतिका विचार करने-पर यह प्रश्न आपसे आप मनमें उठता है कि वे कौनसे कारण हैं कि जो अभीतक उन्नतिको रोके थे और भविष्यमें उन कारणोंके दूर होनेसे उन्नतिकी आशा हैं या नहीं। इसपर विचार करते हुए सहसा बुद्धि इस बातको मान लेती है कि देश, समाज और मनुष्यकी अवनतिका मुख्य कारण स्त्रियोंकी हीन दशा ही है। एक विद्वानका कहना है कि जिस देश, समाज या घरकी दशा जाननेकी इच्छा हो तो सबसे पहले वहाँ के स्त्रियों की दशा देखनी चाहिये। क्या हमारे देश, हमारे समाज और हमारे घरों की स्त्रियाँ उन्नत दशामे है ? और क्या हम इनसे भविष्यमें उन्नति की आशा कर सकते हैं ? कभी नहीं। जो स्त्रियाँ गृहलक्ष्मी हैं, जो गृहस्वामिनी हैं, जो गृहस्थाश्रमकी आधार-रूपा और पुरुषोंकी सह-धर्मिणी हैं और जिनकी प्रशंसामें धर्मशास्त्र प्रयोजकोंने लिखा है कि
दाराधीनाः क्रियाः सर्वादारस्वर्गस्थसाधनम्
‘सारी क्रियायें स्त्रियोंके ही आधीन हैं। और स्त्रियाँ ही संस्वर्ग प्राप्त होता है।’ ऐसे मन्तव्यों पर एक साधारण तर मनुष्य क्या विचार कर सकता है ? परन्तु अनेक धर्मशास्त्र प्रयोजकों-
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की सम्मति यही है कि संसार-सेवामें पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियों-का बहुत बड़ा भाग गार्हस्थ्य जीवनमें है; क्योंकि धर्मशास्त्रमें ऐसा कहा है कि
भार्यया कथ्यते गृही
'जिसके स्त्री है वही गृहस्थ है।' अतएव संसार में स्त्रियों का बहुत बड़ा मान है, परन्तु शोक की बात है कि इन स्त्रियों से हम किसी प्रकार भविष्यमें उन्नतिकी आशा नहीं पाते। किसी समयमें इसी भारतमें इन्हीं स्त्रियोंसे ऐसे ऐसे रक्त उत्पन्न हो गए हैं कि जिनके नामपर भारतवासी अपनी मर्यादाको लिये बैठे हैं।
ऐसी ही माताओंके सुपुत्रोंकी वदौलत एक दिन हमारा भारत विद्या-बुद्धि-संपन्न और गुणोंकी खान था। उस समय इस देशकी कीर्ति का पताका भूमंडलवासियोंको दूरसे दिखलायी पड़ता था। कानोंसे सुनी बातोंको नेत्रोंसे देखनेके लिये अनेक देशोंके यात्री आते थे और यहाँकी योग्यता व फलाकौशलको देख इसकी अतुलनीय कीर्तिकी वर्णन अपनी मातृभाषाके ग्रन्थोंमें करते थे। वे ग्रन्थ आज इस भारतकी गुरुता, सभ्यता और योग्यताके साक्षी रूपमें उपस्थित हैं।
जिस समय संसार अज्ञानान्धकारमें मग्न था और पृथ्वीके अधिकांश भागोंमें असभ्यता फैली हुई थी, उस समय यही भारत धर्म, आस्तिकता; भक्ति, सभ्यताऔर कला कौशल के
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प्रकाशसे जगमगा रहा था। अधिकारके अनुसार ज्ञान, विज्ञान, गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद, साहित्य, वेद—वेदान्त, व्याकरण, न्याय, मीमांसा, योग, स्मृति, नीति और शासन इत्यादि अनेक विषयोंकी वायु घरमें प्रवाहित हो रही थी।
दमयंती, सुभद्रा, उत्तरा, लीलावती और चिन्ता इत्यादि देवियाँ जिस देशकी कन्याएँ, श्रुतकीर्ति, उर्मिला, जानकी और मारुडवी इत्यादि जिस देशकी बहुएँ; कौशिल्या, सुमित्रा और लक्ष्मी इत्यादि बहुओंकी पुष्ट-पोषिकाएँ; उभय भारती, मृदालसा, विद्योत्तमा, लोपामुद्रा, सलभा, देवहूती, विदूला, ऊषा, शकुन्तला, मायावती और गार्गी इत्यादि देवियाँ जिस देशकी पंडिता; अनुसुया, मैत्रेयी, अदिति और अरुन्धती इत्यादि देवियाँ जिस देशकी मुनि-पत्नियाँ, रघु, अज, दिलीप, दशरथ और रामचन्द्र इत्यादि जहाँके राजराजेश्वर; लव-कुश ऐसे जिस देशके राजकुमार, कश्यप, मरीचि, भृगु, अंगिरा, जयवन और पुलस्त्य इत्यादि जिस देशके महर्षि; वाल्मीकि, जयदेव, भूदेव, कालीदास और दंडी इत्यादि जहाँके कवि पांडित और पातंजलि जहाँके वै्याकरण, कपिल कण्णादि गौतम, व्यास जहाँके शास्त्रकार; धन्वन्तरि, चरक, सुश्रुत और वाग्भट्ट इत्यादि जहाँके वैद्य; वशिष्ठ, पराशर, आर्यभट्ट और नीलकंठ इत्यादि जहाँके ज्योतिषी; मनु, अत्रि, याज्ञवल्क्य और विष्णु इत्यादि जहाँके धर्मोपदेश, शंकराचार्य रामानुजाचार्य और बल्लभाचार्य इत्यादि जहाँके धर्मप्रचारक; सायण-
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चार्य और याज्ञवल्क्य जहाँके भाष्यकार, परशुराम, लक्ष्मण, उन्मजेय, श्रंगद श्रुर्जुन और भीम इत्यादि जहाँके रणवीर थे उसी समय भारत में गार्हस्थ्य धर्मकी महिमाने सर्वसाधारण चित्तोंको प्रफुल्लित कर अपनेको सर्वमान्य बना लिया था । घर घरमें स्त्री शिक्षाके फोहरासंस्नान की हुई कन्याएँ अपने भविष्य जीवनके हरियाले मैदान में गार्हस्थ्य जीवनकी मय्योदा-कों रखती हुई उत्तम और सुयोग्य सन्तान उत्पन्न कर देश और समाजका गौरव बढ़ाती थीं । आज भी उन्हींकी सन्तान-के नामपर भारत विक रहा है ।
इतना उन्नतिशील होकर भी क्या हुआ ? श्रवणतियों भी इस बूढ़े भारतसे पीछा छुड़ाना कठिन पड़ रहा है । ठीक है, हम इस बातको प्रत्यक्षमें देखते हैं कि जिस कूर्पका चोन बन्द हो जाता है, उसमें पानी नहीं रहता । ठीक यही उशा इस बूढ़े भारतकी हुई है । घर घरमें बहता हुआ स्त्री-शिक्षाका प्रबल गीत कि जिसपर हमारा सर्वस्व निर्भर था, आज बन्द टिख-लाई देता है । इसीके न होनेसे चारों ओर श्रध्दकारसा प्रतीत होता है । आकाश-मार्गोंको अविधारूपी वादलोंसे घेर लिया है । पाप-कर्मोंकी भयंकर वर्णने भारतके एक एक कोनेको भर दिया है । विरोध-द्वेष, वैर-भाव और नास्तिकता इत्यादि की फसलें स्त्री, पुरुष, बालक और बालिकाओंके हृदयरूपी खेतोंमें नैयार हो रही हैं । बालक बालिकाओंके श्रंगोंसे विला-सप्रियताके चिन्ह विवाहके पूर्व ही दिखताई पड़ते हैं। विचारों
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से अनेक तुच्छ भाव प्रगट होते हैं। किसी कविने सच कहा है कि बालक और-बालिकाओं ही से देश, जाति, समाज और घर का भविष्य मालूम होता है। जिनमें रजवीर्यका महत्त्व और उसके शुद्धाशुद्धकी पहचान, रजोधर्म और संयोग शक्तिका अनुमान; रजस्वला रजस्वाता और सहावासमें स्त्री पुरुषोंकी अनेक असावधानियाँ तथा सारभूत कर्तव्योंका ज्ञान, गर्भ न रहनेके अनेक कारणों तथा गर्भाधान रीति, कन्या और पुत्र या मनचाही सन्तान उत्पन्न करनेकी क्रियाश्रोका ज्ञान, सन्तान पर माता पिताकी मनःशक्ति, प्रेम अहार, आचरण, चेष्टा, व्यवहार, हर्ष, शोक, चिन्ता, दूषित रज-वीर्य और इच्छाके प्रभावोंका परिज्ञान, गर्भावस्था और प्रसव-कालकी अनेक क्रियाओं और असावधानियों, गर्भवतीके सारभूत कर्तव्यों, गर्भस्वाव और गर्भपातके कारणों, गर्भमें शरीर रचना तथा माता पिताके रजवीर्यसे अंग प्रत्यंगकी उत्पत्ति और उत्तम दीर्घजीवी संतान उत्पन्न करनेका ज्ञान, जिन स्त्री पुरुषों में नहीं हैं उनसे भविष्यमें उन्नतिकी इच्छा करना दुर्दाशा मात्र है।
जिस समय स्त्री और पुरुषोंकी मार्मिक शिक्षाका सूर्य भारतमें अपने पूर्ण प्रकाशसे जगमग रहा था, उस समय कन्याएँ अपने गार्हस्थ्य जीवनकी पंडिता और पुत्र इसके मर्मज्ञ होते थे। इनके हृदयमें गार्हस्थ्य जीवनेके लिये रजोधर्म और संयोग-शक्तिका भाव पूर्ण रीतिसे भरा रहता था। वह आज-कलकी भांति रजवती होते ही स्त्रियोंको गर्भधारण करने योग्य
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नहीं मानते थे और न छोटी अवस्थामें ललनाओंके विलास- प्रेमी थे । इनके हृदयोंमें रजवीर्य और स्त्रीके अवयवोंके पुष्ट होनेका सदैव विचार रहता था । वे विषयके लिये नित्य लाला- पित नहीं रहते थे । इनको अपने ब्रह्मचर्यका हर समय विचार रहता था । वे अपना अमूल्य जीवन पशुओंकी भांति व्यतीत नहीं करते थे । कन्या और पुत्र पैदा करना इनके हार्थोंमें था । माताएँ आहार, आचरण, चेषा, व्यवहार, इच्छा, प्रेम और मनशक्तिसे उत्तम सुयोग्य बलवान और मनचाही सन्तान उत्पन्न करती थीं । इस समय अधिकांश मनुष्योंका यह विचार हो रहा है कि मनचाही सन्तान पैदा करना माता पिताके हाथमें नहीं हैं । यह एक बहुत बड़ा अंध-विश्वास है । जय हम अपने पूर्वजोंकी बातोंको पढ़ते हैं तो, क्या हमें लज्जा नहीं आती ? क्या अपनी अयोगतिके लिये नीचा नहीं देखना पड़ता ? हम उन पूर्वजोंकी सन्तान होनेका अभिमान रखते हैं कि जिनमें मनचाही सन्तान उत्पन्न करनेकी शक्ति थी । सहस्रों प्रमाण इस बातके उपस्थित हैं । युधिष्ठिरकी माताने गर्भावस्थामें युधि- ष्ठिरको न्यायशाली बनानेके लिये धर्मशास्त्र पढ़ा था, इसी कारण युधिष्ठिर न्यायशाली और धर्मात्मा हुए । अभिमन्यु माताके गर्भमें पिताके उपदेशसे चक्रव्यूहके पाँच फाटककी लड़ाईका हाल सुन कर मर्म्भ हो गए थे, परन्तु माताके सो जानेसे आगेका हाल न सुन सके । परशुराम जिस समय गर्भमें थे तो उनकी माता रेणुका-देवीने परशुरामको युद्ध वीर होनेके
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लिये क्षत्रिय राजाओंकी लड़ाईका हाल मनन किया था । ये सब प्रमाण इस बातके साक्षी हैं कि मनचाही सन्तान उत्पन्न करना माता पिताके हाथोंमें है । माताका गर्भस्थान एक तरहकी विचित्र रसग़ाला है, उस रसशालासे अनेक विचार, अनेक स्वभाव, अनेक बुद्धि और अनेक आकृतिके बालक उत्पन्न होते हैं । सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस रसशालामें आहार, आचरण, व्यवहार और जैसी इच्छाका मेल किया जायगा उससे वैसी ही सन्तान उत्पन्न होगी । जिस प्रकार कुम्हार अनेक यत्न और अनेक विचारोंसे छोटे, बड़े, लम्बे, चौड़े, भारी और हलके पात्र एक ही मिट्टीसे बना लेता है, इसी प्रकार इच्छानुसार अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न करना माता पिताके हाथोंमें है ।
राम कृष्ण, युधिष्ठिर और भोज ऐसे सत्यव्रत रावण, कंस, जरासन्ध और हिरण्य कश्यप ऐसे दुष्टोंने भारत माताओंके ही कुक्षिसे जन्म लिया था, पर इनमें इतना अन्तर क्या हुआ ? पुराणोंके देखनेसे पता चलता है कि इनके माता-पिताके रजवीर्यमें विचारों और पोषण-तत्वोंमें बहुत बड़ा अन्तर था । इसी कारण राम, कृष्ण, युधिष्ठिर और भोज सरीखी धर्मात्मा तथा, रावण, कंस, जरासन्ध और हिरण्य-कश्यप सरीखी अधर्मी सन्तान उत्पन्न हुई ।
इन बातोंपर विचार करते हुये कलेजा मुँहको आता है । स्त्रियोंकी हीन दशापर ध्यान देते, हुए शरीर कंपायमान होता
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है। श्रविषासे प्रस्न माताएँ उन विदुषी माताओंकी समता नहीं कर सकतीं, क्योंकि कहाँ देश और समाजकी उन्नतिका विचार, कहाँ विलास-प्रियताका संचार। आज इन स्त्रियोंकी अधोगति क्यों है? इसके उत्तरमें यही कहना मुनासिब है कि स्त्री-शिक्षाके न होनेसे इनके हृदयोंमें सन्तान-सुधार और उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेके किराकूपी जितने रत्न थे वे सब खो गए हैं। इधर पुरुषोंकी भी पेसी ही दशा हुई है। अब मूल ही नहीं तो शाखा कैसे हो सकती है? जहाँ स्त्रियाँ पेसी हों गई हैं वहाँके पुरुषोंका कहना ही क्या है! इस स्त्री-शिक्षाके अभावका परिणाम यह हुआ है कि स्त्री पुरुष दोनों सन्तान सम्बन्धी विषयों से अनभिज्ञ हो गए, केवल स्वयं मनुष्य होने और मनुष्य जाति उत्पन्न करनेकी डाँग वाकी रह गयी है। तो क्या उन्नतिके साथ श्रवणति लगी हुई है? दृष्टिद्रष्टो धन-वानको दृष्टि होना आवश्यक है। इसी प्रकार सूर्य भगवान को भी पूर्व दिशामें नीचेसे उठ कर दीपहरके समय ऊँचे चढ़ कर सार्यकाल में नीचे उतर कर अस्त हो जाना पड़ता है। अपने हृदयको इसी प्रकार संतोष देते हुए यदि एक दृष्टि धनवान होनेकी आशा करे और यलमें लगे तो क्या कुछ अनुचित है? कभी नहीं। दैवके मरोसे भाग्य-भगवानके जगमोहन में पड़े रहना कितना अनुचित है? इसमें सन्देह नहीं कि विपत्तिके समय बुद्धि अवश्य विपरीति हो जाती है। महाराज रामचन्द्र भी झनसे नहीं चले। जानकी-हरणके पहले श्रीराव-
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वेन्द्रजीको सोनेका भुग सच्चा मान लेना पड़ा । इसका अर्थ यह नहीं कि दरिद्र मनुष्य अपने अभ्युदय-का यत्नही न करे । अवश्य करना चाहिये, क्योंकि संसार में उसीका जन्म पाना सफल है कि जिसने अपने देश और समाजकी उन्नति की हो । यों तो सब ही जन्म लेते और मरते हैं । जिस जातिके लोगोंमें जातिबल, जातीय-जीवन और जातीय प्रेम नहीं है वह जाति संसारमें चिरकालतक नहीं जी सकती; क्योंकि जातिका जीवन मरण लोगोंके हाथमें है और जातिके लोगोंका अभ्युदय जातीय जीवनके साथमें होता है । अतएव दरिद्र मनुष्यको भी अपने जीते जी देश और समाजकी उन्नतिको न भूलना चाहिये ।
अबसे पहले डेढ़ सौ वर्षका समय कि जबसे हमारी विद्या और शिक्षाका पुनरुत्थान हुआ है, उससे आठ सौ वर्ष पूर्वके समयको हम अच्छा नहीं कहेंगे । उस समय में जो जो अत्याचार हमारी कन्याओं और स्त्रियोंपर हुए हैं कि जिनसे विवश होकर हमको स्त्रियोंकी शिक्षाका कष्ट विरोधी बनना पड़ा, परदा और बाल-विवाहकी प्रथा जारी करनी पड़ी, उसी समयमें स्त्री शिक्षा पर उठे हुए कुठारने ऐसा नाश किया कि जिसके कारण हमारे बच्चों, हमारी कन्याओं और बहूओंमें गार्हस्थ्य जीवनके महत्वको समझनेकी शक्ति ही नहीं रह गयी । अब सौ सौ हाथ मारते और पूर्ण बल लगानेपर भी हम इतने योग्य नहीं हैं कि जितने पतनके समयमें थे । हमारे ऋषि महर्षिके ही हवन कुंडकी विभूति ले कर चाहे संसार
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सिद्ध बन जावे. चाहे कोई इश्वर बननेका दावा करें, परंतु मैं यह कहता हूँ कि तुमको हमारे ही यहाँसे अधिकार करनेकी गति और योग्यता प्राप्त हुई है। यह कहा जाता है कि सन्तान संबंधी विषयोंको जाननेके लिये हमारे पास कुछ भी सामान नहीं है। इस विषयपर ध्यान न देने वाले लोग केवल इतना ही कहकर अपनी जिम्मेदारीसे अलग होना चाहते हैं; परंतु ऐसा नहीं हो सकता। क्योंकि जो खी पुत्र सन्तान पैदा करने-वाले हैं, इश्वरकी शीरसे उनपर यह जिम्मेदारी लागू होती है कि वे सन्तान उत्पन्न करनेकी क्रियाओंको आरम्भ करनेके पहले ही इस विषयका ज्ञान प्राप्त कर लें। यदि ऐसा न होगा तो निःसन्देह यह कहा जायगा कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पर कुछ भी विचार नहीं किया। हमारे यहाँ क्या नहीं है? लाखों पुस्तकोंके जलाये जानेपर भी इतना सामान है कि जिसका कोई ग्राहक नहीं मिलता। चरक, नुश्रुत और वागभट्ट इत्यादि प्राचीन और नवीन वैद्याने क्या कुछ कम कहा है? परंतु सब कुछ होनेपर भी हम उनपर विश्वास नहीं करते। इसका कारण यह है कि हमको अपने शास्त्रोंपर विश्वास करनेका शिक्षा ही माताओंसे नहीं मिली। हमारे हृदयोंपर अपने शास्त्रोंपर विश्वास करनेका श्रंकुर ही नहीं जमाया गया, जिसके बदौलत आज सर्वस्व हानि हमारी ही है। अतएव दरिद्रोंकी भाँति हमको अपनी पैतृक संपत्ति और अपनी पूँजी-से समृद्धिशाली बननेका प्रयत्न करते रहना चाहिये। हम इस
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बातको मानते हैं कि इस विषयका अधिकांश क्या, प्रायः सारा सामान संस्कृत विद्यामें है और हिन्दी साहित्यमें लानेके लिये बहुत बड़े यत्न किये गये हैं और होंगे ।
इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य गर्भार्धानादि नियमोंको जान कर उत्तम सन्तान पैदा करनेका है । वे ही माता-पिता भाग्य-मान हैं कि जिनकी गोदसे उत्तम और सुयोग्य सन्तान पृथ्वीपर जन्म लेकर संसारका हित करती हैं । अतएव प्रत्येक मनुष्यको उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेकी इच्छा न छोड़नी चाहिये । वेद भगवानका वचन है कि
आत्मा वै जायते पुत्रः
‘पुत्र पिताकी आत्मासे पैदा होता है ।’ अतएव उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेके नियमोंको जाननेके पहले आपको अपनी आत्मा-को बलवान बनाना चाहिये । जब आपकी आत्मा बलवान होगी और आप उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेके नियमोंका पालन करेंगे, तभी उत्तम सन्तान हो सकती है । निदान यह है कि बिना बल-वान आत्मा के उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के नियमोंको जाननेपर भी सुयोग्य सन्तान नहीं हो सकती । प्रिय पाठक, अब भूमिका समाप्त होती है । विद्वानो द्वारा सन्तानोत्पत्ति-विषयक मालूम किये हुए प्राकृतिक नियमोंको अपनी तुच्छ बुद्धिके अनुसार पाठकोंके सामने रखनेकी चेष्टा मैंने की है । इत्यलम् ।
अयोध्याप्रसाद भार्गव
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( ३ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ३६ माताके दूषित व्यवहारोंका सन्तानपर प्रभाव .. | १७२ |
| ३७ सन्तानपर दूषित रजका प्रभाव | १७४ |
| ३८ सन्तानपर दूषित वीर्यका प्रभाव | १७६ |
| ३९ माताके आचरणका सन्तानपर प्रभाव | १७८ |
| ४० सन्तानपर माताकी इच्छाका प्रभाव .. | १८१ |
| ४१ माताके भोजनका सन्तानपर प्रभाव | १८५ |
| ४२ गर्भवतीके लक्षण | १८६ |
| ४३ गर्भमें क्या है ? | १८८ |
| ४४ मूढ़ गर्भ .. | १९० |
| ४५ गर्भ रह जानेपर कवचक संयोग करना चाहिये ? | १९२ |
| ४६ गर्भवतीके कर्तव्य .. | १९४ |
| ४७ गर्भवतीके रोग .. | १९४ |
| ४८ गर्भलाव और गर्भपात.. | २०४ |
| ४९ मातापिताके किस किस अंशसे क्या क्या उत्पन्न होता है ? .. | २०६ |
| ५० गर्भमें शरीर कैसे बनता है ? | २०६ |
| ५१ गर्भमें बच्चेका पालन कैसे होता है ? .. | २१७ |
| ५२ बच्चोंमें मातापिताके रोगोंका संचार | २१८ |
| ५३ शरीरका वर्ण (रंग) .. | २२१ |
| ५४ मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ? .. | २२५ |
| ५५ नेत्रोंका उत्तम और मध्यम होता | २२८ |
( ४ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ५६ अवयजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती है ? | २२६ |
| ५७ वच्चा कितने दिनोंमें उत्पन्न होता है ? | २३२ |
| ५८ तत्काल वच्चा जननेवाली स्त्रीके लक्षण | २३३ |
| ५९ वचकेकी पैदाइशके समयका कर्तव्य | २३४ |
| ६० जन्म लेनेपर वचको दूध कब पिलाना चाहिये ? | २४८ |
| ६१ वच्चोंकी तौल | २५० |
| ६२ धाय कैसी होनी चाहिये ? | २५२ |
| ६३ वच्चा उत्पन्न होनेके कितने दिन बाद संयोग करना चाहिये ? | २५४ |
| ६४ वच्चोंका मल-भूत्र और नींद | २५५ |
| ६५ वच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? | २५६ |
| ६६ वच्चोंकी शानेन्डिय | २६५ |
| ६७ स्त्री और पशुओंके दूधका अन्तर | २६५ |
| ६८ दूध कैसे विगडता है ? | २६७ |
| ६९ स्तनोंके रोग | २७१ |
| ७० वच्चोंको कैसे छुलाना चाहिये ? | २७७ |
| ७१ वच्चा होनेके कितने दिन बाद गर्भधारण होना चाहिये ? | २७९ |
1. रज और वीर्य क्या हैं और कैसे बनते हैं ?
सन्तति-शास्त्र
अर्थात्
मनुष्य जातिकी उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेके नियमोंका संग्रह ।
( १ ) रज और वीर्य क्या हैं और कैसे बनते हैं ?
वैद्यकका मत है कि जो कुछ भोजन किया जाता है वह पकाशयमें पहुँचता है, वहाँ पाचन-शक्तिसे पचकर उसका रस बनता है । इस रसके तीन भाग होते हैं । पहला उत्तम भाग हृदयमें जाता है, मध्यम मल ( पाखाना ) कहलाता है, और तीसरे जलके भागको मूत्र कहते हैं । हृदयमें गया हुआ रस हृदयकी अग्निसे पचता है और रुधिरके रूपमें बदलकर शरीर-रसक रुधिरमें मिल जाता है । रुधिरकी अग्निसे पाचन होकर मल सूक्ष्म और स्थूल दो भागोंमें बँट जाता है । रुधिरका मल पित्त है । यह पित्तसे मिलकर उसको पुष्ट करता है । दूसरा सूक्ष्म भाग रुधिरमें ही रहकर उसकी कमीको पूरा करता है । तीसरा स्थूल भाग शरीरारसक माँसमें मिलता है, और माँसकी अग्निसे पचकर ऊपर बतलाई हुई रीति से बँट जाता है ॥