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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished276 pages

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१

प्रार्थनारूपं शृण्वन्तु विश्वेऽमृतस्य | [विद्वान्‌की कीर्तिकी भाँत मेरा श्लोक ब्रह्मणः पुत्राः सूत्रात्मनो हिरण्य- | विस्तारको प्राप्त हो—] इस प्रार्थनारूप गर्भस्य । के ते ? ये धामानि | वाक्यको अमृत—ब्रह्म यानी दिव्यानि दिवि भवान्यातस्थु- | हिरण्यगर्भके सूर्यरूप समस्त पुत्र रधितिष्ठन्ति ॥ ५ ॥ | सुनें । वे कौन हैं ?—जिन्होंने | सम्पूर्ण दिव्य—द्युलोकान्तर्गत धामों- | पर अधिकार कर रखा है ॥ ५ ॥

सविताकी अनुज्ञाके बिना हानि युञ्जानः प्रथमं मन इत्यादिना | ‘युञ्जानः प्रथमं मनः’ इत्यादि सवित्रादिप्रार्थना प्रतिपादिता । | मन्त्रसे सविता आदिकी प्रार्थना कही यस्तु पुनः प्रार्थनामक़त्वा तैर- | गयी । किन्तु जो पुरुष उनकी ननुज्ञातः सन्योगे प्रवर्तते स | प्रार्थना न करके उनकी अनुज्ञाके भोगहेतौ कर्मण्येव प्रवर्तत | बिना ही योगमें प्रवृत्त होता है इत्याह— | उसकी भोगके हेतुभूत कर्मोंमें ही | प्रवृत्ति हो जाती है—यह बात अब | श्रुति बतलाती है— अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते । सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥ ६ ॥ जहाँ ( अग्न्याधानादि कर्ममें ) अग्निका मन्थन किया जाता है, जहाँ वायुका अधिरोध होता है और जहाँ सोमरसकी अधिकता होती है उन कर्मोंमें ही [ उसके ] मनकी प्रवृत्ति होती है ॥ ६ ॥ अग्निर्यत्रेति । अग्निर्यत्राभिम- | ‘अग्निर्यत्र’ इत्यादि । जहाँ अग्न्या- | धानादिमें अग्निका मन्थन किया जाता थ्यत आधानादौ । वायुर्यत्राधि- | है, जहाँ प्रवग्र्यादि ( वायुकी स्तुति

१३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

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१३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

रुध्यते प्रवर्यादौ। सवित्रा प्रेरितः | आदि) में वायुका अधिरोध होता है | अर्थात् जहाँ सवितासे प्रेरित होकर शब्दमभिव्यक्तं करोति। सोमो | वायु शब्दको अभिव्यक्त करता है | और जहाँ दशापवित्र (छाननेके यत्र दशापवित्रात्पूयमानोऽति- | वस्त्र) से पवित्र किये (छाने हुए) | सोमरसकी अधिकता होती है उस रिच्यते तत्र क्रतौ संजायते मनः। | यज्ञकार्यमें उसका मन लग जाता है। अग्निर्यत्राभिमथ्यत इत्यत्रापरा | 'अग्निर्यत्राभिमथ्यते' इस मन्त्रकी | यह दूसरी व्याख्या की जाती है— व्याख्या—अग्निः परमात्मा, | अग्नि परमात्माको कहते हैं, क्योंकि अविद्यातत्कार्यस्य दाहकत्वात् । | वह अविद्या और उसके कार्यको उक्तं च—"......अहमज्ञानजं | दग्ध करनेवाला है। [श्रीमद्भगवद्गीता- | में] कहा भी है "मैं अपने भक्तोंके तमः । नाशयाम्यआत्मभावस्थो | अन्तःकरणमें स्थित होकर प्रकाशमय ज्ञानदीपेन भास्वता" (गीता | ज्ञानदीपकसे उनके अज्ञानजनित १०।११) इति । यत्र | अन्धकारको नष्ट कर देता हूँ।" यस्मिन्पुरुषे मथ्यते स्वदेह- | उस परमात्मारूपिका 'स्वदेहमरणिं | कृत्वा' इत्यादि पूर्वमन्त्रसे कहे हुए मरणिं कृत्वेत्यादिना पूर्वो- | ध्यानरूप निर्मन्थनके द्वारा जिस क्तध्याननिर्मथनेन वायुर्यत्राधि- | पुरुषमें मन्थन होता है, तथा जहाँ | वायुका अधिरोध होता है अर्थात् रुध्यते शब्दमव्यक्तं करोति | रेचकादि क्रियाओके कारण जहाँ रेचकादिकरणात् । सोमो यत्रा- | वायु अव्यक्त शब्द करता है और | जहाँ अनेक जन्मोंतक [अग्निकी] तिरिच्यतेऽनेकजन्मसेवया तत्र | सेवा करनेसे सोमकी बहुलता होती तस्मिन्यज्ञदानतपःप्राणायामसमा- | है, उस यज्ञ, दान, तप, प्राणायाम धिविशुद्धान्तःकरणे संजायते | एवं समाधि आदिसे विशुद्ध हुए

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ परिपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्माकारं | अन्तःकरणमें ही पूर्णानन्दाद्वितीय मनः समुत्पद्यते, नान्यत्रा- | ब्रह्माकार मन ( मनोवृत्ति ) का उदय शुद्धान्तःकरणे । उक्तं च— | होता है, अन्यत्र अशुद्ध अन्तः- | करणमें नहीं । कहा भी है— “प्राणायामविशुद्धात्मा | “क्योंकि जिसका चित्त यस्मात्पश्यति तत्परम् । | प्राणायामके अभ्याससे शुद्ध हो तस्मान्नातः परं किञ्चि- | गया है वही उस परमात्माका त्प्राणायामादिति श्रुतिः ॥ | साक्षात्कार करता है, इसलिये इस अनेकजन्मंसंसार- | प्राणायामसे बढ़कर कुछ भी नहीं चिते पापसमुच्चये । | है—ऐसी श्रुति है । अनेक जन्मके तत्क्षीणे जायते पुंसां | संसारसे जो पापराशि सञ्चित हो गोविन्दाभिमुखी मतिः॥ | गयी है उसके क्षीण हो जानेपर जन्मान्तरसहस्रेषु | पुरुषोंकी बुद्धि श्रीगोविन्दकी ओर तपोज्ञानसमाधिभिः । | होती है । सहस्रों जन्मोंके अनन्तर नराणां क्षीणपापानां | तप, ज्ञान और समाधिके द्वारा जिनके कृष्णे भक्तिः प्रजायते ॥” | पाप क्षीण हो गये हैं उन पुरुषोंकी तस्मात्प्रथमं यज्ञाद्यनुष्ठानं ततः | श्रीकृष्णचन्द्रमें भक्ति होती है ।” | अतः सबसे पहले यज्ञादिका प्राणायामादि ततः समाधिस्ततो | अनुष्ठान किया जाता है, फिर | प्राणायामादिका, फिर समाधिका और वाक्यार्थज्ञाननिष्पत्तिस्ततः कृत- | उसके पश्चात् महावाक्यके अर्थका | ज्ञान होता है, तथा उससे कृत- कृत्यतेति ॥ ६ ॥ | कृत्यता होती है ॥ ६ ॥ सविताकी अनुज्ञासे लाभ यस्मादननुज्ञातस्य तस्य भोग- | क्योकि [सविता देवताकी] अनुज्ञा | न होनेपर उसकी भोगके हेतुभूत हेतौ कर्मण्येव प्रवृत्तिस्तस्मात्— | कर्ममें ही प्रवृत्ति होती है, इसलिये—

१३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

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१३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम् । तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्तमक्षिपत् ॥ ७ ॥ सविता देवताके द्वारा अनुज्ञात होकर उस चिरन्तन ब्रह्मका सेवन करना चाहिये । तुम उस ब्रह्ममें निष्ठा ( समाधि ) करो । इससे पूर्त कर्म तुम्हारा बन्धन करनेवाला नहीं होगा ॥७॥ सवित्रा प्रसवेन सस्यप्रसवेनेति | सविताद्वारा प्रसूत यानी जो अन्न यावत् । जुषेत सेवेत ब्रह्म पूर्व्यं | प्रसव करनेवाला है उस सविता- चिरन्तनम् । तस्मिन्ब्रह्मणि योनिं | द्वारा अनुज्ञात होकर चिरन्तन ब्रह्मका निष्ठां समाधिलक्षणां कृणवसे | सेवन करना चाहिये। उस ब्रह्ममें तुम कुरुष्व । एवं कुर्वतो मम किं | योनि—समाधिरूप निष्ठा करो । ततो भवति? इत्यत आह—न हि | ऐसा करनेपर मुझे उससे क्या त इति। न हि ते पूर्तं स्मार्तं कर्मेष्टं | होगा ? सो श्रुति बतलाती है— श्रौतं च कर्माक्षिपन्न पुनर्भोग- | 'न हि ते' इत्यादि । इससे तुम्हारा हेतोर्बध्नाति, ज्ञानाग्निना सबीजस्य | पूर्त्त—स्मार्त्त इष्टकर्म और श्रौत- दग्धत्वात् । उक्तं च—"यथेषी- | कर्म भी पुनः भोगके हेतुसे कातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयत एवं हास्य | बन्धन नहीं करेगा; क्योंकि ज्ञानाग्निके सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते" (छा० | द्वारा वह बीजसहित भस्म हो जायगा । उ० ५। २४। ३) इति। "ज्ञानाग्निः | कहा भी है—"जिस प्रकार अग्निमें सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा" | डाला हुआ सींकका रूआँ भस्म ( गीता ४।३७) इति च ॥ ७ ॥ | हो जाता है उसी प्रकार इस (ज्ञानी) | के समस्त पाप भस्म हो जाते हैं", | "इसी प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त कर्मों- | को भस्म कर डालता है" इत्यादि ॥७॥

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५ ध्यानयोगकी विधि और उसका महत्त्व तत्र योनिं कृणवस् इत्युक्तं | ऊपर यह कहा गया कि 'उसमें | समाधि करो, सो वह समाधि किस कथं योनिकरणम् ? इत्याशङ्क्य | प्रकार की जाय, ऐसी आशङ्का तत्प्रकारं दर्शयति— | करके उसका प्रकार दिखाते हैं— त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ ८ ॥ [ शिर, ग्रीवा और वक्षःस्थल इन ] तीनोंको ऊँचे रखते हुए शरीरको सीधा रख मनके द्वारा इन्द्रियोंको हृदयमें सन्निविष्ट कर विद्वान् ओंकाररूप नौकाके द्वारा सम्पूर्ण भयानक जलप्रवाहोंको पार कर जाता है ॥८॥ त्रिरुन्नतमिति । त्रीण्युुरोग्रीवा- | ‘त्रिरुन्नतम्’ इत्यादि । वक्षःस्थल, शिरांस्युन्नतानि यस्मिञ्शरीरे | ग्रीवा और शिर ये तीन जिसमें उन्नत तत्तिरुन्नतं संस्थाप्यते समं | (उठे हुए) रखे जाते हैं उस त्रिरुन्नत शरीरम् । हृदीन्द्रियाणि मन- | शरीरको समानभावसे स्थित किया जाता श्चक्षुरादीनि मनसा संनिवेश्य | है। तथा मनके द्वारा मन एवं चक्षु आदि संनियम्य ब्रह्मैवोडुपस्तरणसाधनं | इन्द्रियोंको हृदयमें नियन्त्रित कर ब्रह्म | ही उडुप—तरणका साधन है, उस तेन ब्रह्मोडुपेन । ब्रह्मशब्दं प्रणवं | ब्रह्मरूप उडुपके द्वारा—यहाँ आचार्य- | लोग 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ प्रणव बतलाते वर्णयन्ति । तेनोडुपस्थानीयेन | हैं, उस उडुप (नौका) स्थानीय प्रणवेन, काकाक्षिवदुभयत्र संब- | प्रणवके द्वारा । काकाक्षिन्यायसे १. कौएके दोनों नेत्रगोलकोंमें एक ही आँख होती है, उसीसे वह दोनों ओर देख लेता है। इसी प्रकार जहाँ एक वस्तुका दो वस्तुओंके साथ सम्बन्ध होता है वहाँ काकाक्षिन्याय कहा जाता है।

१३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

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१३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

ध्यते । तेनोपसंहृत्य तेन प्रत- | इसका [ संनिवेश और तरण ] | दोनोंके साथ सम्बन्ध है । अर्थात् रेतातिकामेद्विद्वान्स्रोतांसि संसार- | प्रणवके द्वारा मन और इन्द्रियोंको सरितः स्वाभाविकाविद्याकाम- | नियमित कर प्रणवहीसे विद्वान् संसार- | सरिताके स्वाभाविक अविद्या, कामना कर्मप्रवर्तितानि भयावहानि प्रेत- | और कर्मोंद्वारा प्रवर्तित भयावह— तिर्यगूर्ध्वप्राप्तिकराणि पुनरावृत्ति- | प्रेत, तिर्यक् एवं ऊर्ध्व योनियोंको प्राप्त | करानेवाले पुनरावृत्तिके हेतुभूत भाञ्जि ॥ ८ ॥ | स्रोतोंको पार कर लेता है ॥ ८ ॥ प्राणायामका क्रम और उसकी महत्ता प्राणायामक्षपितमनोमलस्य चित्तं | प्राणायामके द्वारा जिसके पाप प्राणायाम- ब्रह्मणि स्थितं भव- | क्षीण हो गये हैं उसका चित्त ब्रह्ममें निर्देशः | स्थिर हो जाता है, इसलिये प्राणायाम- तीति प्राणायामो | का वर्णन किया जाता है । पहले निर्दिश्यते । प्रथमं नाडीशोधनं | नाडीशोधन करना चाहिये । उसके कर्तव्यम् । ततः प्राणायामेऽधि- | पीछे प्राणायाममें अधिकार होता है। कारः । दक्षिणनासापुटमङ्गु- | दायें नासारन्ध्रको अँगूठेसे दबाकर ल्यावष्टभ्य वामेन वायुं पूरये- | बायेंसे यथाशक्ति वायु खींचे। द्यथाशक्ति । ततोऽनन्तरमुत्सृज्यैवं | तत्पश्चात् दायीं नासिकाको छोड़कर दक्षिणेन पुटेन समुत्सृजेत् । | इसी प्रकार [ वाम नासारन्ध्रको सव्यमपि धारयेत् । पुनर्दाक्षिणेन | अँगुलीयोंसे दबावे और] दायेंसे वायुको पूरयित्वा सव्येन समुत्सृजेद्यथा- | बाहर निकाले। फिर दायेंसे पूरक करके शक्ति । त्रिः पञ्चकृत्वो वा एवम् | यथाशक्ति बायें नासिकारन्ध्रसे रेचक अभ्यस्यतः सवनचतुष्टयमपररात्रे | करे । इस प्रकार शेषरात्रि, मध्याह्न, मध्याह्ने पूर्वरात्रेऽर्धरात्रे च पक्षा- | पूर्वरात्रि और अर्धरात्रि इन चार | समय तीन-तीन या पाँच-पाँच बार | अभ्यास करनेवालेकी एक पक्ष या एक

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ · १३७

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ · १३७

न्मासाद्विशुद्धिर्भवति । त्रिविधः | मासमें नाडीशुद्धि हो जाती है । प्राणायामो रेचकः पूरकः कुम्भक | यह रेचक, कुम्भक और पूरकभेदसे इति । तदेवाह— | तीन प्रकारका प्राणायाम है । ऐसा | ही कहा भी है— “आसनानि समभ्यस्य | “हे गार्गि ! अपने अभीष्ट वाञ्छितानि यथाविधि । | आसनोंका यथाविधि अभ्यास कर प्राणायामं ततो गार्गि | फिर जिस आसनका अभ्यास हो जितासनगतोऽभ्यसेत् ॥ | उससे बैठकर प्राणायामका अभ्यास मृद्वासने कुशान्सम्य- | करे। कोमल आसनपर सम्यक् प्रकार- गास्तीर्याजिनमेव च । | से कुशा और मृगचर्म बिछाकर फल लम्बोदरं च संपूज्य | तथा मोदक आदि नैवेद्यके द्वारा फलमोदकभक्षणैः ॥ | गणेशजीका पूजन कर उस आसनपर तदासने सुखासीनः | बायें हाथपर दायाँ हाथ रखे हुए सव्ये न्यस्येतरं करम् । | सुखपूर्वक बैठे । शिर और ग्रीवाको समग्रीवशिरः सम्य- | सीधे रखे, मुखको [ किसी वस्त्रसे ] क्संवृतास्यः सुनिश्चलः ॥ | अच्छी तरह ढँक ले तथा शरीरको प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि | निश्चल रखे । इस प्रकार नासिकाग्र- नासाग्रन्यस्तलोचनः । | पर दृष्टि लगाकर पूर्व या उत्तरकी अतिभुक्तमभुक्तं च | ओर मुख करके बैठ जाय । तथा वर्जयित्वा . प्रयत्नतः ॥ | अतिभोजन और अभोजनको प्रयत्न- नाडीसंशोधनं कुर्या- | पूर्वक त्यागकर शास्त्रोक्त पद्धतिसे दुक्तमार्गेण यत्नतः । | नाडीशोधन करे । जो योगी नाडी- वृथा क्लेशो भवेत्तस्य | शोधन किये बिना अभ्यास करता तच्छोधनमकुर्वतः ॥ | है उसका श्रम व्यर्थ होता है । नासाग्रे शशभृद्बीजं | नासिकाग्रपर चन्द्रिकायुक्त विश्वव्यापी चन्द्रातपवितानितम् । | चन्द्रबीज ( ठँ या मँ ) को तथा

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१३८ श्वैताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ ❦❦~❦ सप्तमस्य तु वर्गस्य सप्तम वर्गके बिन्दुयुक्त चतुर्थ वर्ण (वं) चतुर्थं बिन्दुसंयुतम् ॥ को स्थापित कर दोनों नेत्रोंको विश्वमध्यस्थमालोक्य नासिकाके अग्रभागपर स्थापित नासाग्रे चक्षुषी उभे । करे । इडा (वाम) नाडीद्वारा इडया पूरयेद्वायुं द्वादशमात्रा-क्रमसे बाह्यवायुको भीतर बाह्यं द्वादशमात्रकैः ॥ खींचे । फिर पूर्ववत् देदीप्यमान- ततोऽग्निं पूर्ववद्ध्याये- शिखाओंसे युक्त अग्निका ध्यान करे त्स्फुरज्जवालावलीयुतम् । और उस अग्निमण्डलमें स्थित रेफं च बिन्दुसंयुक्तं बिन्दुयुक्त रेफ (रं) का ध्यान करे। शिखिमण्डलसंस्थितम् ॥ तत्पश्चात् धीरे-धीरे पिङ्गला (दायीं) ध्यायेद्विरेचयेद्वायुं नाडीसे वायुको निकाल दे । फिर मन्दं पिङ्गलया पुनः । वह मतिमान् योगी दायें नासारन्ध्रसे पुनः पिङ्गलयापूर्य पिङ्गला नाडीद्वारा प्राण खींचकर घ्राणं दक्षिणतः सुधीः ॥ उसे धीरे-धीरे इडा नाडीद्वारा बाहर तद्वद्विरेचयेद्वायु- निकाले। इस प्रकार गुरुकी बतलायी मिडया तु शनैः शनैः । हुई विधिसे एकान्तमें तीन-चार वर्ष त्रिचतुर्वत्सरं चापि या तीन-चार मासतक अभ्यास त्रिचतुर्मासमेव वा ॥ करे । प्रातःकाल, मध्याह्न तथा गुणोक्तप्रकारेण सायंकालमें स्नान कर सन्ध्यादि कर्मों- रहस्येवं समभ्यसेत् । से निवृत्त हो छः-छः प्राणायाम करे प्रातर्मध्यांदिने सायं तथा नित्यप्रति मध्यरात्रिमें भी स्नात्वा षट्कृत्व आचरेत्॥ अभ्यास करे । ऐसा करनेसे उसकी संध्यादिकर्म कृत्वैव नाडीशुद्धि हो जाती है और उसके मध्यरात्रेऽपि नित्यशः । चिह्न स्पष्ट दीखने लगते हैं। नाडीशुद्धिमवाप्नोति तच्चिह्नं दृश्यते पृथक् ॥ १. जितने समयमें हाथ जानुमण्डलके चारों ओर घूम जाय उसे एक मात्रा कहते हैं।

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३९

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३९ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦

[वाम भाग / Left Column] शरीरलघुता दीप्ति- जठराग्निविवर्धनम् । नादाभिव्यक्तिरित्येत- ल्लिङ्गं तच्छुद्धिसूचनम् ॥ शुष्यन्ति न जपैस्तेन स्पर्शशुद्धेरेहेतवः । प्राणायामं ततः कुर्या- द्रेचपूरककुम्भकैः ॥ प्राणापानसमायोगः प्राणायामः प्रकीर्तितः । प्रणवं त्र्यात्मकं गार्गि रेचपूरककुम्भकम् ॥ तदेतत्प्रणवं विद्धि तत्स्वरूपं ब्रवीम्यहम् । यो वेदादौ स्वरः प्रोक्तो वेदान्तेषु प्रतिष्ठितः ॥ तयोरन्तं तु यद्गार्गि वर्गपञ्चकपञ्चमम् । रेचकं प्रथमं विद्धि द्वितीयं पूरकं विदुः ॥ तृतीयं कुम्भकं प्रोक्तं प्राणायामस्त्रिरात्मकः । त्रयाणां कारणं ब्रह्म भारूपं सर्वकारणम् ॥ रेचकः कुम्भको गार्गि सृष्टिस्थित्यात्मकावुभौ ।


[दक्षिण भाग / Right Column] शरीरका हल्कापन, कान्ति, जठराग्नि- की वृद्धि, नादका सुनायी देने लगना—ये सब नाडीशुद्धिकी सूचना देनेवाले चिह्न हैं। नाडियों- की शुद्धि जप करनेसे नहीं होती, अतः वह नाडीशुद्धिका हेतु नहीं है। "इसके पश्चात् रेचक, पूरक और कुम्भक क्रमसे प्राणायाम करे। प्राण और अपानका संयोग होना ही प्राणायाम कहलाता है। हे गार्गि! प्रणव त्रिरूप है। ये जो रेचक, पूरक और कुम्भक हैं इन्हें प्रणव ही समझो। मैं तुम्हें प्रणवका स्वरूप बतलाता हूँ। वेदके आदिमें जो स्वर (अ) है और जो स्वर (उ) वेदान्तोंमें स्थित है तथा इनके पीछे जो पञ्चम वर्ग (पवर्ग) का पञ्चम वर्ण (म) है, इन [ओंकारकी तीन मात्रा अ, उ और म] में प्रथम वर्णको रेचक जानो, द्वितीयको पूरक समझा जाता है और तृतीयको कुम्भक बतलाया गया है। इस प्रकार यह तीन अङ्गोंवाला प्राणायाम है। इन तीनोंका कारण सभीका कारणरूप प्रकाशमय ब्रह्म है। हे गार्गि! रेचक और कुम्भक—ये दोनों तो क्रमशः सृष्टि और स्थिति-

१४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

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१४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

पूरकस्त्वथ संहारः | रूप हैं तथा पूरक संहाररूप है । कारणं योगिनामिह ॥ | इस प्रकार ये योगियोंकी उत्पत्त्यादि- पूरयेत्षोडशैर्मात्रै- | के कारण हैं । पहले षोडशमात्रां- रापादतलमस्तकम् । | क्रमसे पैरोंसे लेकर मस्तकपर्यन्त मात्रैर्द्वात्रिंशकैः पश्चा- | पूरक करे । फिर खूब सावधानीसे द्रेचयेत्सुसमाहितः ॥ | बत्तीसमात्राक्रमसे रेचक करे और संपूर्णकुम्भबद्वायो- | हे गार्गि ! भरे हुए घड़ेके समान निश्चलं मूर्धदेशतः । | चौसठमात्राक्रमसे मूर्द्धदेशमें कुम्भक कुम्भकं धारणं गार्गि | करता हुआ वायुको निश्चलभावसे चतुःषष्ट्या तु मात्रया ॥ | धारण करे । ऋषयस्तु वदन्त्यन्ये | "इसके सिवा हे सुन्दरि ! जिन्होंने प्राणायामपरायणाः । | भूत और आँतोंकी शुद्धि की है पवित्रभूताः पूतान्त्राः | ऐसे प्राणजयमें तत्पर कुछ अन्य प्रभञ्जनजये रताः ॥ | प्राणायामपरायण ऋषियोंका कहना तत्रादौ कुम्भकं कृत्वा | है कि पहले चौसठमात्राक्रमसे चतुःषष्ट्या तु मात्रया । | कुम्भक करके एक नासारन्ध्रसे रेचयेत्षोडशैर्मात्रै- | षोडशमात्राक्रमसे रेचक करे । र्नासेनैकैन सुन्दरि ॥ | इसके पश्चात् षोडशमात्राक्रमसे तयोश्च पूरयेद्वायुं | दोनों नासारन्ध्रोंमें वायु पूर्ण करे । शनैः षोडशमात्रया । | इस प्रकार प्राणजयी योगी प्राणसंयमको प्राणस्यायमनं त्वेवं | अपने अधीन कर ले । वशं कुर्याज्जयी वशी ॥ | पञ्च प्राणाः समाख्याता | "प्राण पाँच कहे गये हैं, वे वायवः प्राणमाश्रिताः । | प्राणके आश्रित पाँच दैहिक वायु | हैं । समस्त प्राणियोंके शरीरोंके प्राणो मुख्यतमस्तेषु | अन्तर्गत उन पाँच प्राण-वायुओंमें सर्वप्राणभृतां सदा ॥ | प्राण सबसे मुख्य है । वह प्राण

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१ ൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘ ओष्ठनासिकयोर्मध्ये | ओष्ठ और नासिकाके मध्यमें, हृदये नाभिमण्डले । | हृदयमें, नाभिमण्डलमें तथा पैरोंके पादाङ्गुष्ठाश्रितः प्राणः | अँगूठोंमें भी रहता हुआ शरीरके सर्वाङ्गेषु च तिष्ठति ॥ | सभी अङ्गोंमें विद्यमान है। नित्यप्रति नित्यं षोडशसंख्याभिः | सोलह प्राणायामोंका अभ्यास करे, प्राणायामं समभ्यसेत् । | इससे मनोवाञ्छित पदार्थ प्राप्त होते मनसा प्रार्थितं याति | हैं और वह योगाभ्यासी समस्त सर्वप्राणजयी भवेत् ॥ | प्राणोंपर विजय प्राप्त कर लेता है। प्राणायामैर्दहेद्दोषान् | साधकको चाहिये कि प्राणायामद्वारा धारणाभिश्च किल्विषान् । | शारीरिक दोषोंको भस्म करे, धारणा- प्रत्याहाराच्च संसर्गान् | से पापोंका नाश करे, प्रत्याहारसे ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ | वैषयिक संसर्गोंका अन्त करे और प्राणायामशतं स्नात्वा | ध्यानसे अनीश्वर गुणोंकी निवृत्ति यः करोति दिने दिने । | करे। जो पुरुष प्रतिदिन स्नान मातापितृगुरुघ्नोऽपि | करके सौ प्राणायाम करता है वह त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥” | यदि माता, पिता या गुरुकी हत्या तदेतदाह प्राणानित्यादिना— | करनेवाला हो तो भी तीन वर्षमें | उस पापसे मुक्त हो जाता है।” | यही बात ‘प्राणान्’ इत्यादि मन्त्रसे | बतलायी जाती है--

प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत । दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ६ ॥ साधकको चाहिये कि युक्त आहार-विहार करता हुआ प्राणोंका निरोध कर जब प्राणशक्ति (प्राणधारणका सामर्थ्य) क्षीण हो जाय तब

१४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

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१४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ नासिकारन्ध्रद्वारा उसे बाहर निकाल दे। और फिर वह विद्वान् पुरुष दुष्ट अश्वसे युक्त रथके सारथिके समान सावधान होकर मनका नियन्त्रण करे ॥९॥ प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः | जिसकी चेष्टा “नात्यश्नतस्तु “नात्यश्नतः” (गी० ६।१६) | योगोऽस्ति”इत्यादिश्लोकमें बतलाये हुए इति श्लोकोक्तप्रकारेण संयुक्ता | नियमके अनुसार संयुक्त यानी संयत चेष्टा यस्य स संयुक्तचेष्टः। क्षीणे | है उसे संयुक्तचेष्ट कहते हैं। प्राणके शक्तिहान्या तनुत्वं गते मनसि | क्षीण होनेपर अर्थात् प्राणशक्तिका नासिकायाः पुटाभ्यां शनैः शनै- | ह्रास होनेसे मनके तनु हो जानेपर रुत्सृजेन्न मुखेन। वायुं प्रतिष्ठाप्य | नासिकारन्ध्रोके द्वारा धीरे-धीरे श्वास शनैर्नासिकयोत्सृजेदिति। उदा- | बाहर निकाले, मुखसे नहीं। तात्पर्य त्ताश्वयुतं रथनियन्तारमिव मननेन | यह है कि वायुको रोककर फिर उसे मनो धारयेताप्रमत्तः प्रणिहि- | धीरे-धीरे नासिकासे निकाले। फिर तात्मा ॥९॥ | अप्रमत्त—सावधान रहकर उद्धत | घोड़ोंवाले रथके सारथिके समान | मनको मनन करनेसे रोके ॥९॥ ध्यानके लिये उपयुक्त स्थानोंका निर्देश समे शुचौ शर्करावह्निवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः । मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥ जो समतल, पवित्र, शर्करा, अग्नि और बालूसे रहित तथा शब्द, जल और आश्रयादिसे भी शून्य हो, मनके अनुकूल हो एवं नेत्रोंको पीड़ा देनेवाला न हो ऐसे गुहा आदि वायुशून्य स्थानमें मनको युक्त करे ॥१०॥

[अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १४३

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[अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १४३


[संस्कृत-भाष्य] सम इति । समे निम्नोन्नत- रहिते देशे । शुचौ शुद्धे। शर्करा- वह्निवालुकाविवर्जिते । शर्कराः क्षुद्रोपलाः, वालुकास्तच्चूर्णम् । तथा शब्दजलाश्रयादिभिः । शब्दः कलहादिध्वनिः जलं सर्वप्राण्युपभोग्यम् । मण्डप आ- श्रयः । मनोऽनुकूले मनोरमे चक्षु- पीडने प्रतिवाद्यभिमुखे । छान्दसो विसर्गलोपः । गुहानिवाताश्रयणे गुहायामेकान्ते निवाते समाश्रित्य प्रयोजयेत्प्रयुञ्जीत चित्तं परमा- त्मनि ॥ १०॥

[हिन्दी-अनुवाद] 'समे' इत्यादि । सम अर्थात् जो देश ऊँचाई-नीचाईसे रहित हो, तथा जो शुचि—शुद्ध हो, शर्करा, अग्नि और वालूसे रहित हो—शर्करा छोटे-छोटे पत्थरके टुकड़ोंको और बालू उनके चूरेको कहते हैं—तथा शब्द, जल और आश्रयादिसे भी शून्य हो, यानी शब्द—कलह आदिके कोलाहल, समस्त प्राणियोंके उपयोगमें आनेवाले जल (पनघट) और आश्रय— जनसाधारणके ठहरनेके स्थानसे रहित हो, मनोऽनुकूल-मनोरम हो, नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाला अर्थात् जहाँ कोई विरोधी सामने [न] हो। यहाँ 'चक्षु- पीडने' में चक्षुःके विसर्गका लोप वैदिक है। ऐसे गुहादि एकान्त और वायुशून्य स्थानमें बैठकर चित्तको प्रयुक्त करे अर्थात् परमात्मा- में लगावे ॥ १० ॥


योगसिद्धिके पूर्वलक्षण

[संस्कृत-भाष्य] इदानीं योगमभ्यस्यतोऽभि- व्यक्तिचिह्नानि वक्ष्यन्ते नीहार इत्यादिना—

[हिन्दी-अनुवाद] अब 'नीहार०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा योगाभ्यासीको प्रकट होनेवाले ब्रह्माभिव्यक्तिके पूर्वचिह्न बतलाये जाते हैं—


नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।

१४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

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१४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥११॥ योगाभ्यास आरम्भ करनेपर पहले अनुभव होनेवाले कुहरे, धूम, सूर्य, वायु, अग्नि, खद्योत (जुगनू), विद्युत्, स्फटिकमणि और चन्द्रमा इनके रूप ब्रह्मकी अभिव्यक्ति करनेवाले होते हैं ॥११॥ नीहारस्तुषारः । तद्वत्प्राणैः | नीहार कुहरेको कहते हैं, प्राणों- समा चित्तवृत्तिः प्रवर्तते । ततो | के सहित चित्तवृत्ति कुहरेके समान | प्रवृत्त होने लगती है ।* उसके धूम इवाभाति । ततोऽर्कवत्ततो | पश्चात् धूआँ-सा भासने लगता है । | फिर सूर्यवत् और उसके पश्चात् वायुरिवाभाति । ततो वह्निरिवा- | वायु-सा प्रतीत होता है । तदनन्तर | वायु अग्निके समान अत्यन्त उष्ण त्युष्णो वायुः प्रकाशदहनः प्रव- | एवं प्रकाश और दाह करनेवाला र्तते । बाह्यवायुरिव संक्षुभितो | जान पड़ता है तथा बाह्यवायुके | समान अत्यन्त क्षुभित होकर बड़ा बलवान्विजृम्भते । कदाचित्ख- | बलवान् जान पड़ता है । कभी द्योतखचितमिवान्तरिक्षमालक्ष्यते । | जुगनुओंसे जगमगाता हुआ-सा आकाश विद्युदिव रोचिष्णुरालक्ष्यते | दिखायी देने लगता है, कभी | विद्युत्के समान तेजोमयी वस्तु दीखती कदाचित्स्फटिकाकृतिः । कदा- | है, कभी स्फटिकका आकार दीख चित्पूर्णशशिवत् । एतानि रूपाणि | पड़ता है और कभी पूर्ण चन्द्रमा-सा | दिखायी देता है । ब्रह्मानुसन्धानके योगे क्रियमाणे ब्रह्मण्याविष्क्रिय- | प्रयोजनसे किये जानेवाले योगमें ये माणे निमित्ते पुरःसराण्यग्रगा- | सब रूप पहले दिखायी देते हैं । | इसके पश्चात् परमयोगकी सिद्धि मीणि । तदा परमयोगसिद्धिः ११ | होती है ॥११॥

  • अर्थात् अभ्यासकालमें मनोवृत्तिके सामने कुहरा-सा छा जाता है ।

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५ रोग, जरा और अकालमृत्युपर विजय पानेके चिह्न पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥१२॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाशकी अभिव्यक्ति होनेपर अर्थात् पञ्चभूतमय योग-गुणोंका अनुभव होनेपर जिसे योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो गया है उस योगीको न रोग होता है, न वृद्धावस्था प्राप्त होती है और न उसकी असामयिक मृत्यु ही होती है ॥ १२ ॥ लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं स्वरसौष्ठवं च । गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति ॥१३॥ शरीरका हल्कापन, नीरोगता, विषयासक्तिकी निवृत्ति, शारीरिक कान्तिकी उज्ज्वलता, स्वरकी मधुरता, सुगन्ध और मल-मूत्रकी न्यूनता— इन सबको योगकी पहली सिद्धि कहते हैं ॥१३॥ पृथ्वीति । पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे | 'पृथ्व्यप्तेजो०' इत्यादि । 'पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे' इस पदसे पृथिव्यादीनि भूतानि द्वन्द्वैक- | समाहारद्वन्द्वसमाससम्बन्धी एकवद्भाव- वद्भावेन निर्दिश्यन्ते । तेषु | द्वारा पृथिवी आदि पाँच भूतोंका निर्देश किया गया है । उन पाँचों पञ्चसु भूतेषु समुत्थितेषु पञ्चात्मके | भूतोंके प्रकट होनेपर अर्थात् पञ्चात्मक योगगुणके प्रवृत्त होनेपर योगगुणे प्रवृत्त इत्यस्य व्याख्यानम्। | —इस प्रकार यह इसकी व्याख्या कः पुनर्योगगुणः प्रवर्तते ? | है । वह कौन योगगुण प्रवृत्त होता

१४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

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१४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

पृथिव्या गन्धवत्या गन्धो योगिनो | है ? [ सो बतलाते हैं—] गन्धवती भवति । तथाद्भ्यो रसः । एव- | पृथिवीका गुण गन्ध उस योगीको मन्यत्र । उक्तं च— | अनुभव होता है तथा जलसे रस- “ज्योतिष्मती स्पर्शवती | की प्रवृत्ति होती है । इसी प्रकार तथा रसवती परा । | अन्य भूतोंके विषयमें समझना गन्धवत्यपरा प्रोक्ता | चाहिये । कहा भी है— “ज्योति- चतस्रस्तु प्रवृत्तयः॥ | ष्मती, स्पर्शवती और रसवती आसां योगप्रवृत्तीनां | तथा इनसे भिन्न एक गन्धवती—ये यद्येकापि प्रवर्तते । | योगीकी चार प्रवृत्तियाँ कही गयी हैं। प्रवृत्तयोगं तं प्राहु- | इन योगप्रवृत्तियोंमेंसे यदि एककी र्योगिनो योगचिन्तकाः ॥” | भी प्रवृत्ति हो जाय तो योगिजन उस | साधकको योगमें प्रवृत्त हुआ | बतलाते हैं ।” न तस्य योगिनो रोगो न | उस योगीको न रोग होता है, | न वृद्धावस्था होती है और न मृत्यु- जरा न मृत्युर्वा प्रभवति । कस्य ? | का ही उसपर प्रभाव होता है । | किसे ? जिसे योगाग्निमय शरीर प्राप्त प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् । | हो गया है अर्थात् जिसे ऐसा शरीर | प्राप्त हो गया है कि जिसके दोषसमूह योगाग्निसंप्लुष्टदोषकलापं शरीरं | योगाग्निसे भस्म हो गये हैं । शेष | ( तेरहवें मन्त्रका ) अर्थ स्पष्ट प्राप्तस्य । स्पष्टमन्यत् ॥१२-१३॥ | है ॥१२-१३॥

योगसिद्धि या तत्त्वज्ञानका प्रभाव किञ्च— | तथा— यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् ।

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७

तद्द्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः ॥१४॥ जिस प्रकार मृत्तिकासे मलिन हुआ बिम्ब (सोने या चाँदीका टुकड़ा) शोधन किये जानेपर तेजोमय होकर चमकने लगता है, उसी प्रकार देहधारी जीव आत्मतत्त्वका साक्षात्कार कर अद्वितीय, कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता है ॥ १४ ॥ यथैवेति । यथैव बिम्बं सौवर्णं | 'यथैव' इत्यादि । जिस प्रकार राजतं वा मृदयोपलिप्तं मृदादिना | सुवर्ण या रजतका पिण्ड पहले | मिट्टीसे भरा हुआ अर्थात् मिट्टी मलिनीकृतं पूर्वं पश्चात्सुधान्तं | आदिसे मलिन हुआ रहनेपर फिर सुधौतमित्यस्मिन्नर्थे सुधान्तमिति | सुधान्त अर्थात् अग्नि आदिसे सुधौत | यानी निर्मल किये जानेपर तेजोमय च्छान्दसम् । अग्न्यादिना विम- | होकर चमकने लगता है—मूलमें लीकृतं तेजोमयं भ्राजते । तद्वा | 'सुधौतम्' के अर्थमें 'सुधान्तम्' यह तदेवात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य दृष्ट्वैको- | प्रयोग वैदिक है—उसी प्रकार | आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करनेपर ऽद्वितीयः कृतार्थो भवते वीत- | जीव अद्वितीय, कृतार्थ और शोक- शोकः । परेषां पाठे तद्वात्सत्तत्त्वं | रहित हो जाता है। अन्य शाखाओं- | में जहाँ 'तद्वात्सत्तत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही' प्रसमीक्ष्य देहीति । तत्राप्ययमे- | ऐसा पाठ है । वहाँ भी यही अर्थ वार्थः ॥ १४ ॥ | है ॥ १४ ॥

योगसिद्ध या तत्त्वज्ञकी स्थिति कथं ज्ञात्वा वीतशोको भवति ? | किस प्रकार जानकर जीव इत्याह— | शोकरहित होता है, सो श्रुति बतलाती है—

१४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

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१४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् । अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१५॥ जिस समय योगी दीपकके समान प्रकाशस्वरूप आत्मभावसे ब्रह्म- तत्त्वका साक्षात्कार करता है उस समय उस अजन्मा, निश्चल और समस्त तत्त्वोंसे विशुद्ध देवको जानकर वह सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥१५॥ यदेति । यदा यस्यामवस्था- | 'यदा' इत्यादि । जिस समय यामात्मतत्त्वेन स्वेनात्मना । किं- | अर्थात् जिस अवस्थामें आत्मतत्त्व- | से--अपने आत्मस्वरूपसे, कैसे विशिष्टेन ? दीपोपमेन दीपस्था- | आत्मस्वरूपसे ? दीपोपम--दीपक- | स्थानीय अर्थात् प्रकाशस्वरूपसे ब्रह्म- नीयेन प्रकाशस्वरूपेण ब्रह्मतत्त्वं | तत्त्वका साक्षात्कार करता है । यहाँ प्रपश्येत् । तुशब्दोऽवधारणे । | 'तु' शब्द निश्चयार्थक है । अतः | तात्पर्य यह है कि परमात्माको परमात्मानमात्मनैव जानीयादि- | आत्मभावसे ही जानना चाहिये । | कहा भी है—"उसने आत्माको ही त्यर्थः । उक्तं च—"तदात्मान- | जाना कि मैं ब्रह्म हूँ।" कैसे ब्रह्मका मेवावेदहं ब्रह्मास्मि” ( बृ० उ० | साक्षात्कार करता है ?--जो किसी १।४।१०) इति । कीदृ- | अन्यसे उत्पन्न नहीं हुआ, ध्रुव | अर्थात् अपने स्वरूपसे च्युत नहीं शम् ? अन्यस्मादजायमानं ध्रुवम- | होता और सम्पूर्ण तत्त्वों यानी प्रच्युतस्वरूपं सर्वतत्त्वैरविद्यात- | अविद्या और उसके कार्योंसे विशुद्ध- | असंस्पृष्ट है; उस देवको जानकर त्कार्यैर्विशुद्धमसंस्पृष्टं ज्ञात्वा देवं | जीव अविद्यादि समस्त पाशोंसे मुक्त मुच्यते सर्वपाशैरविद्यादिभिः।१५। | हो जाता है ॥ १५ ॥

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४९

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४९

परमात्मस्वरूपका वर्णन परमात्मानमात्मत्वेन विज्ञानी- | परमात्माको आत्मभावसे जाने— यादित्युक्तं तदेव संभावय- | यह कहा गया, अब उसीका | सम्भावन (सम्मान) करते हुए मन्त्र न्नाह— | कहता है— एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः । स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥१६॥ यह देव ही सम्पूर्ण दिशा-विदिशा है, यही [हिरण्यगर्भरूपसे] पहले उत्पन्न हुआ था, यही गर्भके अन्तर्गत है, यही उत्पन्न हुआ है और यही उत्पन्न होनेवाला है। यह समस्त जीवोंमें प्रतिष्ठित और सर्वतोमुख है ॥१६॥ एष हेति । एष एव देवः | 'एष ह' इत्यादि । यह देव ही प्रदिशः प्राच्याद्या दिश उपदि- | प्रदिश अर्थात् पूर्वादि सम्पूर्ण दिशा शश्च सर्वाः, पूर्वो ह जातः सर्व- | और उपदिशाएँ हैं, यह हिरण्यगर्भ- | रूपसे सबसे पहले उत्पन्न हुआ था, स्माद्धिरण्यगर्भात्मना, स उ गर्भे- | यही गर्भके भीतर विद्यमान है, यही ऽन्तर्वर्तमानः, स एव जातः शिशुः, | शिशुरूपसे उत्पन्न हुआ है, यही स जनिष्यमाणोऽपि, स एव सर्वांश्च | उत्पन्न होनेवाला भी है, यही समस्त जनान्प्रत्यङ् तिष्ठति, सर्वप्राणि- | जीवोंमें प्रत्यङ्—अन्तरात्मरूपसे | स्थित है, समस्त प्राणियोंके मुख गतानि मुखान्यस्येति सर्वतो- | इसीके हैं, इसलिये यह सर्वतोमुख मुखः ॥ १६ ॥ | है ॥ १६ ॥

१५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

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१५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ ❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧ इदानीं योगवत्साधनान्तराणि | अब योगके समान नमस्कारादि | अन्य साधनोंको भी कर्त्तव्यरूपसे नमस्कारादीनि कर्तव्यत्वेन दर्श- | प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति यितुमाह— | कहती है— यो देवो अग्नौ यो अप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश । य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥१७॥ जो देव अग्निमें है, जो जलमें है और जिसने सम्पूर्ण भुवनको व्याप्त कर रखा है तथा जो ओषधि और वनस्पतियोंमें भी विद्यमान है उस देवको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ १७ ॥ यो देव इति । यो विश्वं | ‘यो देवो’ इत्यादि । जिसने भुवनं स्वेन विरचितं संसार- | सम्पूर्ण भुवनको अर्थात् स्वयं रचे | हुए संसारमण्डलको व्याप्त कर रखा मण्डलमाविवेश । य ओषधीषु | है, जो शालि आदि ओषधियोंमें और शाल्यादिषु वनस्पतिष्वश्वत्थादिषु | अश्वत्थादि वनस्पतियोंमें भी विद्यमान तस्मै विश्वात्मने भुवनमूलाय | है उस विश्वात्मा—जगत्के मूल | कारण परमेश्वरको नमस्कार है, परमेश्वराय नमो नमः। द्विर्वच- | नमस्कार है । ‘नमः’ शब्दकी द्विरुक्ति नमादरार्थमध्यायपरिसमाप्त्यर्थं | आदरके लिये और अध्यायकी च ॥ १७ ॥ | समाप्तिके लिये है ॥ १७ ॥

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ ❧❦❧❦❧