श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
किया था। यह बात इस उपनिषद्के षष्ठ अध्यायके इक्कीसवें
ॐ प्रस्तावना 'श्वेताश्वतरोपनिषद्' कृष्णयजुर्वेदके अन्तर्गत है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। उन्होंने चतुर्थाश्रमियोंको इस विद्याका उपदेश किया था। यह बात इस उपनिषद्के षष्ठ अध्यायके इक्कीसवें मन्त्रसे विदित होती है। इस उपनिषद्की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। इसमें साधन, साध्य, साधक और प्रति- पाद्य विषयके महत्त्वका बहुत स्पष्ट और मार्मिक भाषामें निरूपण किया है। इसमें प्रसंगानुसार सांख्य, योग, सगुण, निर्गुण, द्वैत, अद्वैत आदि कई प्रकारके सिद्धान्तोंका उल्लेख हुआ है। अतः इसके वाक्योंके आधारसे सांख्यवादी और द्वैतमतावलम्बियोंने भी बड़े समारोहसे अपने सिद्धान्तोंका समर्थन किया है। इसका आरम्भ जगत्के कारणकी मीमांसासे होता है । कुछ ब्रह्मवादी आपसमें मिलकर इस विषयमें विचार करते हैं कि जगत्का कारण क्या है ? हम कहाँसे उत्पन्न हुए ? किसके द्वारा हम जीवन धारण करते हैं? कौन हमारा आधार है ? और किसकी प्रेरणासे हम दुःख-सुख भोग करते हैं? संसारके सम्पूर्ण दार्शनिक इन प्रश्नोंको हल करनेमें ही व्यस्त रहे हैं। और उन्होंने अपनी-अपनी अनुभूतिके आधारपर जो-जो निर्णय किये हैं वे ही विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्तोंके रूपमें प्रसिद्ध हुए हैं । वस्तुतः इस प्रकारकी जिज्ञासा ही सारे दर्शनशास्त्रका बीज है और यह जितनी तीव्र एवं निरपेक्ष होती है उतनी ही अधिक वास्तविकताके समीप ले जानेवाली होती है। अस्तु । ऋषियोंने जगत्के कारणकी मीमांसा करते हुए काल-स्वभावादि लोकप्रसिद्ध कारणोंपर विचार किया; किन्तु उनमेंसे कोई भी उनकी जिज्ञासा शान्त करनेमें सफल न हुआ, उन्हें सभी अपूर्ण और अशाश्वत दिखायी दिये। अन्तमें उन्होंने ध्यानयोगके द्वारा यह अनुभव किया कि भगवान्की स्वरूपभूता माया ही जगत्का कारण है। उन्हें इस संसारसरिताका स्पष्ट दर्शन हुआ और उन्होंने देखा
( ४ ) कि जड़-चेतन दोनोंसे परे इनका अधिष्ठाता और प्रेरक जो एक देव है वही अपनी मायाशक्तिसे जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है और उसका साक्षात्कार होनेपर ही जीव मायाके चक्रसे मुक्त हो सकता है। उसे कहीं अन्यत्र ढूँढ़नेकी आवश्यकता नहीं है। वह सर्वदा अपने अन्तःकरणमें ही स्थित है। इस अपने अन्तरात्मासे भिन्न कोई और देव नहीं है तथा यही भोक्ता, भोग्य और प्रेरक भी कहा जाता है। इस प्रकार प्रथम अध्यायमें जगत्कारणका निर्णय कर प्रणवचिन्तन- पूर्वक ध्यानाभ्यासको ही उसके साक्षात्कारका साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण द्वितीय अध्यायमें है। वहाँ ध्यानकी विधि, ध्यानके योग्य स्थान, योगकी प्रथम प्रवृत्ति और उसके फलका बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है। इस तरह साधनका निरूपण कर फिर तृतीय अध्यायमें साध्यका प्रतिपादन किया है। वहाँ उस एक ही तत्त्वका पहले सगुण-साकाररूपसे, फिर अन्तर्यामी और विराट्रूपसे तथा अन्तमें शुद्धरूपसे निरूपण हुआ है। चतुर्थ अध्यायमें तत्त्वबोधकी प्राप्ति और मायासे मुक्त होनेके लिये उस देवकी स्तुति की गयी है तथा अनेक प्रकारसे उसके स्वरूप और महत्त्वका वर्णन किया गया है। पञ्चम अध्यायमें क्षर, अक्षर और इन दोनोंके प्रेरक परमात्माके स्वरूपोंका स्पष्टीकरण हुआ है। वहाँ क्षरका भोग्यत्व, अक्षर (जीव) का भोक्तृत्व और परमात्माका नियन्तृत्व बतलाया गया है तथा यह भी प्रदर्शित किया है कि जीव अपने संकल्पके अनुसार विभिन्न योनियोंको प्राप्त होता है और परमात्माका ज्ञान होनेपर सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। इसके पश्चात् छठे अध्यायमें भी परमात्माके स्वरूप और महत्त्वका ही प्रतिपादन करते हुए अन्तमें उसीके ज्ञानसे सारे दुःखोंकी निवृत्ति बतलायी है और यह कहा है कि उस देवको जाने बिना दुःखोंका अन्त होना इसी प्रकार असम्भव है जैसे व्यापक और निरवयव आकाशको चमड़ेके समान लपेटना। इस प्रकार इस उपनिषद्में आदिसे अन्ततक केवल परमार्थतत्त्व- का ही निरूपण हुआ है। फिर अन्तमें एक मन्त्रद्वारा इस विद्याके
सम्प्रदायका और दो मन्त्रोंसे इसके अधिकारीका वर्णन करके उप-
सम्प्रदायका और दो मन्त्रोंसे इसके अधिकारीका वर्णन करके उप- संहार किया गया है। यही संक्षेपमें इस ग्रन्थके प्रतिपाद्य विषयोंका विवेचन है। ऊपर कहा जा चुका है कि इस ग्रन्थके वाक्योंके आधारसे सांख्यवादी और द्वैतमतावलम्बियोंने भी अपने सिद्धान्तोंका समर्थन किया है। सांख्यवादियोंके लिये तो इस ग्रन्थके दो वाक्य ही परम प्रमाण हैं। उनमें एक चतुर्थ अध्यायका पञ्चम मन्त्र और दूसरा पञ्चम अध्यायका द्वितीय मन्त्र है। पहला मन्त्र इस प्रकार है— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ इस मन्त्रकी लोहितशुक्लकृष्णा अजा ही उनकी रजःसत्त्वतमो- मयी प्रकृति है। तथा उसे सेवन करनेवाला अज बद्ध पुरुष है और उसे त्याग देनेवाला दूसरा अज मुक्त पुरुष है। इस मन्त्रको यदि सांख्यवादका बीज कहें तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी । यही उनके प्रधानकी पोषक एकमात्र श्रुति है । किन्तु भगवान् शंकराचार्यने अपने शारीरकभाष्यमें इस मतका खण्डन करते हुए लोहितशुक्लकृष्णा अजासे त्रिगुणमयी प्रकृति न लेकर छान्दोग्योपनिषद्के छठे अध्यायमें बताये हुए पृथिवी, अप्, तेज तीन सूक्ष्म भूत लिये हैं। उनमें पृथिवी कृष्णवर्ण, अप् शुक्लवर्ण और तेज लोहितवर्ण है । इस प्रकार वहाँ आचार्यने अनेकों युक्तियोंसे प्रधानवादका खण्डन किया है। सांख्यसिद्धान्तका दूसरा मन्त्र इस प्रकार है— यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः । ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ इस मन्त्रके आधारपर सांख्यवादियोंने परमर्षि कपिलकी प्राची- नता और प्रामाणिकता सिद्ध करके उनके उपदेश किये हुए सांख्य- सिद्धान्तकी पुष्टि की है। किन्तु आचार्यने इस मतका इसी उपनिषद्- के भाष्यमें खण्डन किया है और 'कपिल' शब्दको कनकवर्ण हिरण्य- गर्भका वाचक बताया है।
पुष्टिके लिये वे इसके कई मन्त्र उद्धृत करते हैं; परन्तु उनमें प्रधान
( ६ ) इसी प्रकार द्वैतवादियोंने भी इस ग्रन्थके वाक्योंसे अपने सिद्धान्तको पुष्ट करनेका प्रयत्न किया है। यों तो अपने सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये वे इसके कई मन्त्र उद्धृत करते हैं; परन्तु उनमें प्रधान चतुर्थ अध्यायके छठे और सातवें मन्त्र ही हैं। वे इस प्रकार हैं— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ इन मन्त्रोंके द्वारा द्वैतवादी आचार्योंने जीव और ईश्वरका भेद सिद्ध करनेकी चेष्टा की है; परन्तु आचार्यने पूर्वमन्त्रके दो सखा सुवर्ण विज्ञानात्मा और परमात्मा तथा द्वितीय मन्त्रके पुरुष और ईश अविद्याग्रस्त जीव और प्रत्यगात्मा बतलाकर उनका केवल औपा- धिक भेद प्रदर्शित करते हुए परमार्थतः एकत्व ही सिद्ध किया है। इस विषयमें शारीरकभाष्यमें भी बड़ा युक्तियुक्त विचार किया गया है। यह सब होते हुए भी यह नहीं कहा जा सकता कि अन्य मताव- लम्बियोंके सिद्धान्त सर्वथा अलीक ही हैं। वस्तुतः परमप्रमाणभूता श्रुति और उसके प्रमेय श्रीभगवान् दोनों ही वाञ्छाकल्पतरु हैं। उन्हें जो जिस भावसे भजता है उसे उनकी उसी रूपमें अनुभूति होती है। उनका परमार्थस्वरूप सर्वथा अनिर्वचनीय और मन-बुद्धि आदिका अविषय है; किन्तु जिस रूपमें उनकी अनुभूति होती है उससे भी उनका किसी प्रकारका भेद नहीं है। इसलिये उसके द्वारा भी उन्हीं- की झाँकी होती है। वे सर्वरूप हैं, सर्वातीत हैं और सबके साक्षी हैं। बस, एकमात्र वे ही वे हैं। जिसे हम उनसे भिन्न समझते हैं वह भी उन्हींकी प्रतिकृति है। वस्तुतः ऐसा कोई देश, काल या पदार्थ नहीं है जो उनसे भिन्न हो और यों किसी भी देश, काल या पदार्थके द्वारा उनका ग्रहण भी नहीं किया जा सकता; सारे मत उन्हींका प्रतिपादन करते हैं और वस्तुतः वे किसी भी मतके विषय भी नहीं हो सकते। यह
( ७ ) एक विचित्र पहेली है। व्यवहारमें किन्हीं भी दो विरुद्ध धर्मोंका सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता; परन्तु यहाँ सारे विरोधोंका समन्वय हो जाता है, क्योंकि वे सर्वाधिष्ठान हैं। यदि यहाँ भी सबका सामञ्जस्य न हुआ तो और हो ही कहाँ सकता है ? अस्तु । इस प्रकार यह उपनिषद् परमार्थतत्त्वके जिज्ञासुओंके लिये बहुत ही उपयोगी है। इसपर शाङ्करभाष्यके अतिरिक्त श्रीशङ्करानन्दकृत दीपिका, श्रीनारायणविरचित दीपिका और श्रीविज्ञानभगवान्कृत विवरणनामक तीन टीकाएँ और हैं। भगवान् शङ्करकी विवेचनशैली बड़ी ही गम्भीर, प्रसादपूर्ण और युक्तियुक्त होती है। उनके पाण्डित्य और युक्तिकौशलको विपक्षी विद्वान् भी मुक्तकण्ठसे स्वीकार करते हैं। परन्तु प्रस्तुत भाष्यमें वह प्रतिभा नहीं देखी जाती। इसमें न वह गाम्भीर्य है, न प्रसाद है और न युक्तिकौशल ही है। इसीसे अधि- कांश विद्वानोंका ऐसा मत है कि यह आचार्यकी रचना नहीं है। किन्हीं अन्य मठस्थ शङ्कराचार्यने इसे लिखकर अपने भाष्यकी प्रतिष्ठा- के लिये भगवान् भाष्यकारके नामसे प्रसिद्ध कर दिया है। इसके आचार्यकृत न होनेमें और भी कई कारण बताये जाते हैं। परन्तु यहाँ उन्हें उद्धृत करनेका कोई विशेष प्रयोजन नहीं है। इस प्रकारकी खोज ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टिसे तो अवश्य बहुत आवश्यक है; परन्तु जिज्ञासुओंका तो मुख्य लक्ष्य अपनी ज्ञानपिपासाकी शान्ति- पर ही होना चाहिये। इसकी रचना कैसी ही शिथिल और प्रसाद- शून्य हो, इसमें कल्याणकामियोंकी शान्तिके लिये पुष्कल सामग्री है। इसलिये इसका अनुशीलन उनके लिये किसी प्रकार अनुपयोगी नहीं हो सकता। इस उपनिषद्के प्रकाशनसे एक चिरकालिक अभिलाषाकी पूर्तिके कारण मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। आजसे प्रायः सात वर्ष पूर्व इन एकादश उपनिषदोंके भाष्यका हिन्दी-अनुवाद करनेका संकल्प हुआ था। भगवत्कृपासे वह संकल्प पूरा हो गया। छान्दोग्यतक नौ उपनिषदोंको प्रकाशित हुए प्रायः दो वर्ष हो गये हैं। बृहदारण्यक
( ८ ) और श्वेताश्वतर शेष थे। इनका अनुवाद भी समाप्त हो गया। प्रचलित क्रमके अनुसार पहले बृहदारण्यक प्रकाशित होना चाहिये था, परन्तु छोटा होनेके कारण पहले श्वेताश्वतरका अनुवाद किया गया और वही पहले प्रकाशित भी हो रहा है। बृहदारण्यककी छपाई भी आरम्भ हो गयी है, आशा है वह भी शीघ्र ही प्रकाशित हो जायगा। इस प्रकार अनुवादके ही बहाने जो यत्किञ्चित् सत्पुरुषोंकी सेवा और सद्ग्रन्थोंका मनन होता है, उससे किसी प्रकार भगवत्कृपाका पात्र बन सकूँ-ऐसा प्रेमी पाठक आशीर्वाद देनेकी कृपा करें। विनीत अनुवादक
प्रथम अध्याय
श्रीहरिः विषय-सूची विषय पृष्ठ १. शान्तिपाठ ... ... १ प्रथम अध्याय २. सम्बन्ध-भाष्य ... ... २ ३. जगत्-कारण ब्रह्मके स्वरूपके विषयमें ब्रह्मवादी ऋषियोंका विचार ... ५६ ४. काल, स्वभाव आदिकी जगत्-कारणताका खण्डन ... ५९ ५. ध्यानके द्वारा ऋषियोंको कारणभूता ब्रह्मशक्तिका साक्षात्कार ... ६२ ६. कारण-ब्रह्मका चक्ररूपसे वर्णन ... ... ७४ ७. कार्यब्रह्मका नदीरूपसे वर्णन ... ... ८३ ८. जीवके संसार-बन्धन और मोक्षके कारणका निर्देश ... ... ८५ ९. परब्रह्मकी प्राप्तिसे मुक्तिका वर्णन ... ... ८८ १०. व्यावहारिक भेद और ज्ञानद्वारा मोक्षका प्रदर्शन ... ... ९५ ११. ईश्वर, जीव और प्रकृतिकी विलक्षणता तथा उनके तत्त्व-ज्ञानसे ... मोक्षका कथन ... ... १०१ १२. प्रधान और परमेश्वरकी विलक्षणता तथा उनके तत्त्व-ज्ञानसे ... मोक्षका कथन ... ... १०७ १३. ब्रह्मके ज्ञान और ध्यान-जन्य फलोंमें भेद ... ... १०८ १४. ब्रह्मकी ज्ञातव्यता ... ... ११५ १५. प्रणव-चिन्तनसे ब्रह्म-साक्षात्कारका दृष्टान्तोंद्वारा समर्थन ... ११८ द्वितीय अध्याय १६. ध्यानकी सिद्धिके लिये सवितासे अनुज्ञा-प्रार्थना ... ... १२४ १७. सविताकी अनुज्ञाके बिना हानि ... ... १३१ १८. सविताकी अनुज्ञासे लाभ ... ... १३३ १९. ध्यानयोगकी विधि और उसका महत्त्व ... ... १३५ २०. प्राणायामका क्रम और उसकी महत्ता ... ... १३६ २१. ध्यानके लिये उपयुक्त स्थानोंका निर्देश ... ... १४२ २२. योगसिद्धिके पूर्वरक्षण ... ... १४३ २३. रोग, जरा और अकाल मृत्युपर विजय पानेके चिह्न ... १४५
तृतीय अध्याय
( १० ) २४. योगसिद्धि या तत्त्वज्ञानका प्रभाव ... ... १४६ २५. योगसिद्ध या तत्त्वज्ञकी स्थिति ... ... १४७ २६. परमात्मस्वरूपका वर्णन ... ... १४९ तृतीय अध्याय २७. एक ही परमात्मामें शासक और शासनीय भावका समर्थन ... १५१ २८. परमेश्वरसे जगत्की सृष्टिका प्रतिपादन ... ... १५४ २९. परमेश्वरका स्तवन ... ... १५६ ३०. परमात्मतत्त्वके ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति ... ... १५८ ३१. परमेश्वरके विषयमें ज्ञानीजनोंके अनुभवका प्रदर्शन ... ... १६० ३२. परमेश्वरके सर्वात्मभाव या विराट्-स्वरूपका वर्णन ... ... १६५ ३३. आत्माके देहावस्थान और इन्द्रिय-सम्बन्धराहित्यका निरूपण ... १६७ ३४. ब्रह्मका निर्विशेष रूप ... ... १७० ३५. आत्मज्ञानसे शोकनिवृत्तिका निरूपण ... ... १७१ ३६. आत्मस्वरूपके विषयमें ब्रह्मवेत्ताका अनुभव ... ... १७२ चतुर्थ अध्याय ३७. परमेश्वरसे सद्बुद्धिके लिये प्रार्थना ... ... १७४ ३८. परमात्माकी सर्वरूपता ... ... १७५ ३९. प्रकृति और जीवके सम्बन्धका विचार ... ... १७७ ४०. जीव और ईश्वरकी विलक्षणता ... ... १७८ ४१. ब्रह्मकी अधिष्ठानरूपता और उसके ज्ञानसे कृतार्थता ... १८२ ४२. मायोपाधिक ईश्वर ही सबका स्रष्टा है ... ... १८३ ४३. प्रकृति और परमेश्वरका स्वरूप तथा उनकी सर्वव्यापकता ... १८४ ४४. कारण-ब्रह्मके साक्षात्कारसे परम शान्तिकी प्राप्ति ... ... १८६ ४५. अखण्डज्ञानकी सिद्धिके लिये परमात्माकी प्रार्थना ... १८८ ४६. परमात्मज्ञानसे शान्ति-प्राप्ति एवं बन्धननाशका पुनः उपदेश ... १९० ४७. परमात्मसाक्षात्कारके साधन ... ... १९४ ४८. ज्ञानसे द्वैत-निवृत्तिका उपदेश ... ... १९६ ४९. ब्रह्मके अनुपम एवं इन्द्रियातीत स्वरूपका वर्णन ... १९८ ५०. परमेश्वरका स्तवन ... ... २०० पञ्चम अध्याय ५१. अक्षराश्रित विद्या-अविद्या और उनके शासक परमेश्वरके स्वरूप तथा माहात्म्यका वर्णन ... ... २०३
षष्ठ अध्याय
( ११ ) ५२. कर्तृत्वादि धर्मोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपका वर्णन ... २१० ५३. जीवको कर्मोंके अनुसार विविध देहकी प्राप्तिका निर्देश ... २१४ ५४. परमात्मतत्त्वके जाननेसे जीवकी मुक्तिका कथन ... ... २१६ षष्ठ अध्याय ५५. परमेश्वरकी महिमासे सृष्टिचक्रका सञ्चालन ... ... २१९ ५६. चिन्तनीय परमेश्वरका स्वरूप तथा उसकी महिमा ... २२० ५७. भगवदर्पण कर्मसे भगवत्प्राप्ति ... ... २२२ ५८. उपासनासे भगवत्प्राप्ति ... ... २२४ ५९. ज्ञानसे भगवत्प्राप्ति ... ... २२६ ६०. ज्ञानियोंके तत्त्वानुभवका उल्लेख ... ... २२७ ६१. परमेश्वरकी महत्ता ... ... २२८ ६२. ब्रह्मसायुज्यके लिये परमेश्वरसे प्रार्थना ... ... २३० ६३. परमेश्वरके स्वरूपका निर्देश ... ... २३० ६४. परमात्मज्ञानसे नित्यसुखकी प्राप्ति और मोक्ष ... ... २३२ ६५. ब्रह्मके प्रकाशसे ही सबको प्रकाशकी प्राप्ति ... ... २३४ ६६. मोक्षके लिये ज्ञानके सिवा अन्य हेतुओंका निषेध ... ... २३६ ६७. परमेश्वरके स्वरूपका विशेषरूपसे वर्णन ... ... २३७ ६८. मुमुक्षुके लिये भगवच्छरणागतिका उपदेश ... ... २३९ ६९. परमात्मज्ञानके बिना दुःख-निवृत्तिकी असम्भवता ... २४२ ७०. श्वेताश्वतर-विद्याका सम्प्रदाय तथा इसके अधिकारी ... २४४ ७१. अनधिकारीके प्रति विद्योपदेशका निषेध ... ... २४७ ७२. परमेश्वर और गुरुमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले शिष्यके प्रति किये गये उपदेशकी सफलता ... ... २४९
(१) [अस्पष्ट पाठ / Illegible text due to extreme blur] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] विषयानुक्रमणिका [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text] [अस्पष्ट पाठ / Illegible text]
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः श्वेताश्वतरोपनिषद् मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित नित्यानन्दं निराधारं निखिलाधारमव्ययम् । निगमाद्यगतं नित्यं नीलकण्ठं नमाम्यहम् ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! वह परमात्मा हम [ आचार्य और शिष्य ] दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करें । हम दोनोंका साथ-साथ पालन करें । हम साथ-साथ विद्यासम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें । हम दोनोंका पढ़ा हुआ तेजस्वी हो । हम द्वेष न करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।
२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ प्रथमोऽध्यायः सम्बन्ध-भाष्य श्वेताश्वतरोपनिषद इदं विवरण- | ब्रह्मतत्त्वके जिज्ञासुओंको सरलतासे ग्रन्थारम्भ- मल्पग्रन्थं ब्रह्मजि- | बोध करानेके लिये यह श्वेताश्वतरो- प्रयोजनम् ज्ञासूनां सुखाव- | पनिषद्की व्याख्या छोटे-से ग्रन्थके बोधायारभ्यते । चित्सदानन्दा- | रूपमें आरम्भ की जाती है । यद्यपि द्वितीयब्रह्मस्वरूपोऽप्यात्मा स्वा- | आत्मा सच्चिदानन्द अद्वितीय ब्रह्म- श्रयया स्वविषययाविद्यया स्वानु- | स्वरूप ही है, तथापि अपने ही आश्रित भवगम्यया साभासया प्रति- | रहनेवाली, अपनेहीको विषय करने- बद्धस्वाभाविकाशेषपुरुषार्थः प्राप्ता- | वाली और [ 'मैं अज्ञानी हूँ' इस प्रकार] शेषानर्थोऽविद्यापरिकल्पितैरेव सा- | अपने अनुभवसे ही ज्ञात होनेवाली धनैरिष्टप्राप्तिं चापुरुषार्थं पुरुषार्थं | चिदाभासयुक्त अविद्यासे उस मन्यमानो मोक्षार्थमलभमानो | (जीवात्मा) के सब प्रकारके स्वा- मकरादिभिरिव रागादिभिरितस्त- | भाविक पुरुषार्थका अवरोध हो जानेसे तः समाकृष्यमाणः सुरनरति- | उसे सम्पूर्ण अनर्थकी प्राप्ति हुई है और र्यगादिप्रभेदभेदितनानायोनिषु | वह अज्ञानवश कल्पना किये हुए ही संचरन्केनापि सुकृतकर्मणा ब्रा- | साधनोंसे अपनी इष्टप्राप्तिरूप अपुरुषार्थ- ह्मणाद्यधिकारिशरीरं प्राप्त ईश्वरार्थ- | को ही पुरुषार्थ मानकर परमपुरुषार्थरूप कर्मानुष्ठानेनापगतरागादिमलो- | मोक्षपद प्राप्त न कर सकनेके कारण | मकरादिके समान रागादि दोषोंसे | इधर-उधर खींचा जाकर देवता, | मनुष्य एवं तिर्यक् आदि विभिन्न | भेदोंसे युक्त अनेकों योनियोंमें | विचरता रहता है। जब किसी पुण्य- | कर्मके द्वारा ब्रह्मविद्याका अधिकारी | ब्राह्मणादि शरीर प्राप्तकर वह ईश्वरार्थ | कर्मानुष्ठान करनेसे रागादि मलोंसे
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३ ऽनित्यत्वादिदर्शनेनोत्पन्नेहामु- | मुक्त और वस्तुओंका अनित्यत्वादि त्रार्थभोगविराग उपेत्याचार्यमा- | देखनेसे ऐहिक और पारलौकिक चार्यद्वारेण वेदान्तश्रवणादिनाहं | भोगोंसे विरक्त हो जाता है तब ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्मतत्त्वमवगम्य | आचार्यके पास जाकर उनके द्वारा निवृत्ताज्ञानतत्कार्यो वीतशोको | वेदान्तश्रवणादि करके 'मैं ब्रह्म हूँ' भवति । अविद्यानिवृत्तिलक्षणस्य | इस प्रकार ब्रह्मात्मतत्त्वका साक्षात्कार मोक्षस्य विद्याधीनत्वायुज्यते च | कर वह अज्ञान और उसके कार्यकी तदर्थोपनिषदारम्भः । | निवृत्ति हो जानेके कारण शोकरहित तथा तद्विज्ञानादमृतत्वम् । | हो जाता है । क्योंकि अज्ञाननिवृत्ति- आत्मज्ञानस्य "तमेवं विद्वान- | रूप मोक्ष ज्ञानके अधीन है, इसलिये माहात्म्यम् मृत इह भवति ।" | ज्ञान ही जिसका प्रयोजन है उस उप- ( नृसिंह पूर्व० १ । ६) "नान्यः | निषद्का आरम्भ करना उचित ही है । पन्था विद्यतेऽयनाय " ( श्वेता० | तथा उस (ब्रह्मात्मतत्त्व) के ज्ञानसे ६ । १५) । "न चेदि- | अमृतत्व प्राप्त होता है । "उसको हावेदीन्महती विनष्टिः" ( के० | जाननेवाला इस लोकमें अमृत (मुक्त) उ० २ । ५) । "य एतद्विदुर- | हो जाता है", "मोक्षप्राप्तिके लिये कोई मृतास्ते भवन्ति" (बृ० उ० ४ । | दूसरा मार्ग नहीं है", "यदि यहाँ ४ । १४) । "किमिच्छन्कस्य | उसे न जाना तो बड़ी भारी हानि कामाय शरीरमनु संज्वरेत्" (बृ० | है", "जो इसे जानते हैं अमर हो उ० ४ । ४ । १२) । "तं विदि- | जाते हैं", "[ यदि पुरुष 'यह त्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेन।" | परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा जान ले (बृ० उ० ४ । ४ । २३) | तो वह ] क्या इच्छा करता हुआ "तरति शोकमात्मवित्" ( छा० | किस कामके लिये शरीरके पीछे सन्तप्त उ० ७ । १ । ३) । "निचाय्य | हो", "उसे जान लेनेपर जीव पाप- तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते।" (क० | कर्मसे लिप्त नहीं होता", "आत्मज्ञानी | शोकके पार हो जाता है," | "उसका अनुभव कर लेनेपर मृत्युके | मुखसे छूट जाता है", "इसे जो
४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
उ० १ । ३ । १५) "एतद्यो | बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ जानता वेद निहितं गुहायां सोऽवि- | है, हे सोम्य ! वह अविद्यारूप द्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य" | ग्रन्थिको छिन्न-भिन्न कर देता है", (मु० उ० २ । १ । १०) । | "उस परावर ( ब्रह्मादि देवताओंसे "भिद्यते हृदयग्रन्थि- | भी उत्तम ) परमात्माका साक्षात्कार श्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । | कर लेनेपर इसके हृदयकी ग्रन्थि क्षीयन्ते चास्य कर्माणि | टूट जाती है, सारे संशय कट जाते तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥" | हैं तथा समस्त कर्म क्षीण हो जाते (मु० उ० २।२।८) | हैं", "जिस प्रकार नदियाँ बहती "यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- | हुई अपने नाम और रूपको छोड़कर ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । | समुद्रमें लीन हो जाती हैं उसी तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः | प्रकार विद्वान् नाम और रूपसे मुक्त परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥" | होकर परसे भी पर दिव्य पुरुषको (मु० उ० ३।२।८) | प्राप्त हो जाता है", "वह, जो कि "स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म | उस परब्रह्मको जानता है, ब्रह्म ही हो वेद ब्रह्मैव भवति" (मु० उ० | जाता है", "हे सोम्य ! जो भी उस ३।२।९)। "स यो ह वै | छायाहीन, अशरीर, अलोहित, शुद्ध तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्र- | अक्षर ब्रह्मको जानता है [ वह सर्वज्ञ हो मक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य" | जाता है ]" "वह सब कुछ जानता (प्र० उ० ४।१०) । "स सर्व- | है", "उस जाननेयोग्य पुरुषको मवैति ।" "तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा | जान, जिससे मृत्यु तुझे व्यथित न मा वो मृत्युः परिव्यथाः" (प्र० | करे", "उस अवस्थामें एकत्व देखने- उ० ६ । ६) । "तत्र को मोहः | वाले पुरुषको क्या मोह और क्या कः शोक एकत्वमनुपश्यतः" | शोक हो सकता है ?" "ज्ञानसे (ईशा० ७)। "विद्ययामृतमश्नुते" | अमरत्वको प्राप्त होता है", ईशा० ११) । "भूतेषु भूतेषु | "बुद्धिमान् लोग उसे समस्त प्राणियोंमें
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकाद- | उपलब्धकर [ मृत्युके पश्चात् ] इस मृता भवन्ति।” (के० उ० २।५) | लोकसे जाकर अमर हो जाते हैं”, “अपहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे | “[ जो परात्मविद्याको जानता है लोके ज्येये प्रतितिष्ठति” (के० | वह ] पापको त्यागकर विनाशरहित उ० ४।९) । “तन्मया अमृता वै | सुखमय स्वयं-प्रकाश परम महान् बभूवुः” (श्वेता० उ० ५।६) । | ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होता है”, “वे - “तद्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः | ब्रह्मस्वरूप होकर निश्चय ही अमर कृतार्थो भवते वीतशोकः” | हो गये”, “उस आत्मतत्त्वका (श्वेता० उ० २ । १४) । “य | साक्षात्कार कर कोई देहधारी जीव एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति” (बृ० | कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता उ० ४ । ४ । १४) । “ईशं तं | है”, “जो इसे जानते हैं, अमर हो ज्ञात्वामृता भवन्ति” (श्वेता० | जाते हैं”, “उस ईश्वरको जानकर उ० ३ । ७) । “तदेवोपयन्ति”। | अमर हो जाते हैं”, “उसीको प्राप्त “निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति” | होते हैं”, “इसे अनुभव करके जीव (क० उ० १ । १ । १७)। “तमेवं | परमशान्ति प्राप्त करता है”, “उसे इस ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति” | प्रकार जानकर यह मृत्युके बन्धनोंको (श्वेता० उ० ४।१५) । “ये पूर्वं | काट देता है”, “पूर्वकालमें जिन देवा ऋषयश्च तं विदुः” (श्वेता० | देवता और ऋषियोंने उसे जाना उ० ५।६) । “तेषां शान्तिः शाश्वती | [ वे अमर हो गये ]” “[ अपनी नेतरेषाम्” (क० उ० २।२।१३)। | बुद्धिमें स्थित उन परमात्माको जो “बुद्धियुक्तो जहातीह | देखते हैं ] उन्हें ही नित्य शान्ति उभे सुकृतदुष्कृते ।” | प्राप्त होती है औरोंको नहीं।” (गीता २ । ५०) | “समत्वयोगविषयक बुद्धिसे युक्त “कर्मजं बुद्धियुक्ता हि | हुआ पुरुष [ ज्ञान-प्राप्तिके द्वारा ] | पुण्य और पाप दोनोंको इसी लोकमें | त्याग देता है”, “समत्वबुद्धिसे युक्त
६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ ൠ फलंत्यक्त्वा मनीषिणः । | पुरुष कर्मजनित फल ( इष्टानिष्ट जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः | देहकी प्राप्ति) को त्यागकर ज्ञानी पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥” | हो जीते-जी जन्म-बन्धनसे मुक्त (गीता २।५१) | होकर समस्त उपद्रवोंसे रहित मोक्ष- “सर्वं ज्ञानप्लवेनैव | नामक परमपद प्राप्त करते हैं”, वृजिनं संतरिष्यसि ।” | “तू ज्ञानरूप नौकाके द्वारा ही “ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि | सम्पूर्ण पापोंके पार हो जायगा”, भस्मसात्कुरुते तथा ।” | “उसी प्रकार ज्ञानरूप अग्नि (गीता ४।३६-३७) | सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म (निर्बीज) “एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्या- | कर देता है”, “हे भारत ! इस त्कृतकृत्यश्च भारत ।” | गुह्यतम शास्त्रको जानकर ही मनुष्य (गीता १५।२०) | बुद्धिमान् और कृतकृत्य होता है”, “ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा | “फिर मुझे तत्त्वतः जानकर तत्काल विशते तदनन्तरम् ।” | मुझहीमें प्रवेश कर जाता है”, “इन (गीता १८।५५) | सब साधनोंमें आत्मज्ञान ही उत्कृष्ट “सर्वेषामपि चैतेषा- | माना गया है तथा सम्पूर्ण विद्याओंमें मात्मज्ञानं परं स्मृतम् । | भी वही सबसे बढ़कर है, क्योंकि तद्ध्यग्र्यं सर्वविद्यानां | उससे अमृतत्वकी प्राप्ति होती है। प्राप्यते ह्यमृतं यतः। | इसे प्राप्त कर लेनेपर ही द्विज कृत- प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि | कृत्य होता है, अन्य किसी प्रकार द्विजो भवति नान्यथा ॥ | नहीं। इस प्रकार जो मन-ही-मन एवं यः सर्वभूतेषु | सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्माको ही देखता पश्यत्यात्मानमात्मना । | है वह सबमें साम्यबुद्धिको प्राप्त करके स सर्वसमतामेत्य | सनातन ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ | तथा सम्यग्दृष्टिसे सम्पन्न होनेके सम्यग्दर्शनसम्पन्नः | कारण वह कर्मोंसे बन्धनको प्राप्त कर्मभिर्न निबध्यते ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
दर्शनेन विहीनस्तु | नहीं होता। जो पुरुष इस दृष्टिसे संसारं प्रतिपद्यते ॥” | रहित है वह संसारको प्राप्त होता “कर्मणा बध्यते जन्तु- | है”, “जीव कर्मसे बँधता है और र्विद्यया च विमुच्यते । | ज्ञानसे मुक्त हो जाता है, इसलिये तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति | पारदर्शी मुनिजन कर्म नहीं करते । यतयः पारदर्शिनः ॥ | स्थिरबुद्धि प्राचीन आचार्योंने ज्ञानं निःश्रेयसं प्राहु- | ज्ञानको ही मोक्षका साधन बतलाया है, र्वृद्धा निश्चयदर्शिनः । | अतः शुद्ध ज्ञानसे जीव सम्पूर्ण पापोंसे तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन | मुक्त हो जाता है”, “इस प्रकार मुच्यते सर्वपातकैः ॥” | मृत्युको अवश्य होनेवाली जानकर “एवं मृत्युं जायमानं विदित्वा | विद्वान् ज्ञानके द्वारा नित्य तेजः- ज्ञानेन विद्वांस्तेज अभ्येति नित्यम्। | स्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होता है, इसके न विद्यते ह्यन्यथा तस्य पन्था- | सिवा उसके लिये कोई और मार्ग स्तं मत्वा कविरास्ते प्रसन्नः ॥” | नहीं है, उसे जान लेनेपर विद्वान् “क्षेत्रज्ञस्येश्वरज्ञाना- | प्रसन्नचित्त हो जाता है”, द्विशुद्धिः परमा मता ।” | “परमात्माके ज्ञानसे जीवकी अत्य- “अयं तु परमो धर्मो | न्तिकी शुद्धि मानी गयी है”, यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥” | “योगसाधनके द्वारा आत्माका “आत्मज्ञः शोकसंतीर्णो | साक्षात्कार करना—यही परमधर्म न बिभेति कुतश्चन । | है”, “आत्मज्ञानी शोकसे पार मृत्योः सकाशान्मरणा- | होकर मृत्यु, मरण अथवा किसी दथवान्यकृताद्भयात् ॥” | अन्य कारणसे होनेवाले भय— “न जायते न म्रियते | इनमेंसे किसीसे भी नहीं डरता”, न वध्यो न च घातकः । | “परमात्मा न उत्पन्न होता है, न न बध्यो बन्धकारी वा | मरता है, न मारा जाता है और न न मुक्तो न च मोक्षदः ॥ | मारता है, वह न तो बाँधा जानेवाला पुरुषः परमात्मा तु | है और न बाँधनेवाला है तथा न मुक्त यदतोऽन्यदसच्च तत् ।” | है और न मोक्षप्रद ही है, उससे | भिन्न जो कुछ है वह असत् ही है ।”
८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत मूल एवं भाष्य]
एवं श्रुतिस्मृतीतिहासादिषु ज्ञानस्यैव मोक्षसाधनत्वावगमा- द्युज्यत एवोपनिषदारम्भः । किंचोपनिषत्समाख्ययैव ज्ञान- स्यैव परमपुरुषार्थ- साधनत्वमव- गम्यते । तथा हि— उपनिषदित्युपनिपूर्वस्य सदेर्वि- शरणगत्यवसादनार्थस्य रूपमा- चक्षते । उपनिषच्छब्देन व्याचि- ख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवस्तुविषया विद्योच्यते । तादर्थ्याद्ग्रन्थोऽप्यु- पनिषत् । ये मुमुक्षवो दृष्टानु- श्रविकविषयवितृष्णाः सन्त उप- निषच्छब्दितविद्यां तन्निष्ठतया निश्चयेन शीलयन्ति तेषाम- विद्यादेः संसारबीजस्य विशरणा- द्दिनाशात्परब्रह्मगमयितृत्वाद्वर्भ- जन्मजरामरणाद्युपद्रवावसादयितृ-
(पार्श्व-टिप्पणी: उपनिषत्समाख्यायापि ज्ञानस्य परमपुरुषार्थसाधनत्वम्)
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
इस प्रकार श्रुति, स्मृति और इतिहासादिमें ज्ञान ही मोक्षका साधन जाना जाता है, अतः इस [ज्ञान-साधक] उपनिषद्को आरम्भ करना उचित ही है । इसके सिवा उपनिषद् नामसे भी ज्ञानका ही परमपुरुषार्थमें साधन होना जाना जाता है । जाननेका प्रकार यह है—'उपनिषद्'—यह उप और नि उपसर्गपूर्वक विशरण, विनाश, गति और अवसादन (अन्त) अर्थवाले सद् धातुका रूप बतलाया जाता है । उपनिषद् शब्दसे, हम जिस ग्रन्थकी व्याख्या करना चाहते हैं उसके द्वारा प्रतिपाद्य वस्तुको विषय करनेवाले ज्ञानका कथन होता है । उस ज्ञानकी प्राप्ति ही इसका प्रयोजन है इसलिये यह ग्रन्थ भी उपनिषद् कहा जाता है । जो मोक्षकामी पुरुष दृष्ट और श्रुत विषयसे विरक्त हो उपनिषद् शब्दसे कही जानेवाली विद्याका निश्चयपूर्वक तत्परतासे अनुशीलन करते हैं उनकी संसारकी बीजभूता अविद्यादि- का विशरण—विनाश हो जानेके कारण, उन्हें परब्रह्मके पास ले जानेके कारण और उनके जन्म- मरणादि उपद्रवोंका अवसादन (अन्त)
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९
त्वादुपनिषत्समाख्यायाप्यन्यकृता- | करनेके कारण यह उपनिषद् है; | इस प्रकार नामसे भी अन्य सब त्परं श्रेय इति ब्रह्मविद्योपनिष- | साधनोंकी अपेक्षा परम श्रेयस्कर | होनेके कारण ब्रह्मविद्या 'उपनिषद्' दुच्यते । | कही जाती है । ननु भवेदेवमुपनिषदारम्भो | पूर्व०—यदि विज्ञान ही मोक्षका [कर्मणामपि मोक्षसाधनत्व-मित्याक्षेपः] यदि विज्ञानस्यैव | साधन होता तो इस प्रकार ( इस मोक्षसाधनत्वं भवेत्। | उद्देश्यसे ) उपनिषद्का आरम्भ न चैतदस्ति । कर्म- | किया जा सकता था; किन्तु ऐसी | बात है नहीं; क्योंकि “हमने णामपि मोक्षसाधनत्वावगमात्— | सोमपान किया है, अतः हम अमर “अपाम सोमममृता अभूम ।” | हो गये हैं”, “चातुर्मास्ययाग करने- | वालेका पुण्य अक्षय होता है” “अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः | इत्यादि वाक्योंसे कर्मोंका भी सुकृतं भवति” इत्यादिना । | मोक्षसाधनत्व स्वीकार किया गया है । न त्वेतदस्ति, श्रुतिस्मृतिविरो- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, [उक्ताक्षेपनिरासः] धान्न्यायविरोधाच्च । | क्योंकि इससे श्रुति-स्मृतियोंका | विरोध है और यह युक्तिसे भी श्रुतिविरोधस्तावत्-- | विरुद्ध है। श्रुतिका विरोध तो इस “तद्यथेह कर्मजितो लोकः | प्रकार है—“जिस प्रकार यह कर्म- क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्य- | द्वारा उपार्जित लोक क्षीण हो जाता जितो लोकः क्षीयते” ( छा० उ० | है उसी प्रकार वह पुण्यद्वारा प्राप्त ८।१।६) । “तमेवं विद्वान- | लोक भी क्षीण हो जाता है”, मृत इह भवति” ( नृसिंह पूर्व० | “उसीको जाननेवाला पुरुष इस | लोकमें अमर हो जाता है”, १।१६ ) नान्यः पन्था विद्यते- | “मोक्षप्राप्तिके लिये कोई दूसरा मार्ग ऽयनाय” ( श्वेता० उ० ६।१५ ) । | नहीं है”, “कर्म, प्रजा अथवा धनसे
१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ "न कर्मणा न प्रजया धनेन | नहीं, किन्हीं-किन्हींने त्यागसे ही त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः" (कैव० | अमरत्व प्राप्त किया है", "जिनपर ३)। "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञ- | ज्ञानकी अपेक्षा निकृष्ट श्रेणीका कर्म रूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म। | अवलम्बित कहा गया है वे [सोलह एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा | ऋत्विक्, यजमान और यजमानपत्नी-] जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति" | ये यज्ञके अठारह रूप अस्थिर एवं (मु० उ० १ । २ । ७)। "ना- | नाशवान् हैं; जो मूढ 'यही श्रेय है' स्तकृतः कृतेन” (मु० उ० १ । | ऐसा मानकर प्रसन्न होते हैं वे फिर भी २ । १२)। | जरा-मरणको प्राप्त होते हैं।" "इस "कर्मणा बध्यते जन्तु- | संसारमें कोई नित्य पदार्थ नहीं है, र्विद्यया च विमुच्यते। | अतः [अनित्य फलके साधक] तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति | कर्मसे हमें क्या प्रयोजन है?" यतयः पारदर्शिनः ॥" | [अब स्मृतिका विरोध दिखलाते “अज्ञानमलपूर्णत्वात् | हैं-] "जीव कर्मसे बँधता है और पुराणो मलिनः स्मृतः । | ज्ञानसे मुक्त हो जाता है; इसीसे तत्क्षयाद्वै भवेन्मुक्ति- | पारदर्शी मुनिजन कर्म नहीं करते", र्नान्यथा कर्मकोटिभिः ॥" | "अज्ञानरूपी मलसे पूर्ण होनेके “प्रजया कर्मणा मुक्ति- | कारण यह पुरातन जीव मलिन र्धनेन च सतां न हि। | माना जाता है, उस मलका क्षय त्यागेनैकेन मुक्तिः स्या- | होनेसे ही इसकी मुक्ति होती है, त्तदभावे भ्रमन्त्यहो ॥" | अन्यथा करोड़ों कर्मोंसे भी इसका “कर्मोदये कर्मफलानुरागा- | छुटकारा नहीं हो सकता", स्तथानुयन्ति न तरन्ति मृत्युम् ।" | "सत्पुरुषोंकी मुक्ति प्रजा, कर्म अथवा धनसे नहीं होती, एकमात्र त्यागसे ही होती है; त्याग न होनेपर तो वे भटकते ही रहते हैं", "कर्मका उदय होनेपर उसके फलमें अनुराग होता है, अतः उसीका अनुगमन करते हैं, मृत्युको पार नहीं कर पाते,"