१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
१६२ ] [ पंचम अध्याय
१६२ ] [ पंचम अध्याय केचित्तृणौषधिवृक्षफलमूलपतंगकाः । केचित् कदम्बजम्बीरसालतालतमालकाः ॥१४० केचिन्महेन्द्रमलयसह्यमन्दरमेरवः । केचित् क्षारोदधिक्षीरघृते क्षुजलराशयः ॥१४१॥ केचिद्दिशालाः ककुभः केचिन्नद्यो महारयाः । विहरन्त्युच्चकैः केचिन्निपतन्त्युत्पतन्ति च ॥१४२ कन्दुकाइव हस्तेन मृत्युनाऽविरतं हताः । भुक्त्वा जन्मसहस्राणि भूयः संसारसंकटे ॥१४३ पतन्ति केचिदबुधाः संप्राप्यापि विवेकिताम् । दिक्कालाद्यनवच्छिन्नमात्मतत्त्वं स्वशक्तितः ॥१४४ लीलयैव यदादत्ते दिक्कालकलितं वपुः । तदेव जीवपर्यायवासनावेशतः परम्ः ॥१४५ मनः संपद्यते लोलं कलनाकलनोन्मुखम् । कलयन्ती मनः शक्तिरादौ भावयति क्षणात् ॥१४६ आकाशभावनामच्छां शब्दबीजरसोन्मुखीम् । ततस्तद् घनतां यातं घनस्पन्दक्रमन्मनः ॥१४७ भावयत्यनिलस्पन्दं स्पर्शवीजरसोन्मुखम् । ताभ्यामाकाशवाताभ्यां दृढाभ्यासवशात्ततः ॥१४८ शब्दस्पर्शस्वरूपाभ्यां संघर्षाज्जम्यतेऽनलः । रूपतन्मात्रसहितं त्रिभिस्तैः सह संमितम् ॥१४६ मनस्ताहग्गुणगतं रसतन्मात्रवेदनम् । क्षणाच्चेतत्यपां शैत्यं जलसंवित्ततो भवेत् ॥१५० ततस्तादृग्गुणगतं मनो भावयति क्षणात् । गन्धतन्मात्रमेतस्माद् भूमिसंवित्ततो भवेत् ॥१५१
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri महोपनिषत् ] [ १६३ अथेत्थंभूततन्मात्रवेष्टितं तनुतां जहत् । वपुर्वृत्तिकणाकारं स्फुरितं व्योम्नि पश्यति ॥१५२ अहंकारकलायुक्तं बुद्धिबीजसमन्वितम् । तत्पुर्यष्टकमित्युक्तं भूतहृत्पद्मषट्पदम् ॥१५३ तस्मिंस्तु तीव्रसंवेगाद्भावयद् भासुरं वपुः स्थूलतामेति पाकेन मनो विल्वफलं यथा ॥१५४ मूषास्थद्रुतहेमाभं स्फुरितं विमलाम्बरे । संनिवेशमथादत्ते तत्तजः स्वस्वभावतः ॥१५५ ऊर्ध्वं शिरः पिण्डमयमधः पादमयं तथा । पार्श्वयोर्हस्तसंस्थानं मध्ये चोदरधर्मिणम् ॥१५६ कालेन स्फुटतामेत्य भवत्यमलविग्रहम् । बुद्धिसत्त्वबलोत्साहविज्ञानैश्वर्यस्थितः । स एव भगवान् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥१५७ हे ब्रह्मन् ! जैसे हाथी कीचड़ में फँस जाता है, वैसे ही यह मन चिन्तारूपी अग्नि की ज्वाला से जलाया हुआ, क्रोधरूप अजगर द्वारा काटा हुआ और कामरूपी समुद्र के भंवर जाल में पड़ा हुआ है । यह अपने पितामह आत्मा को भी भूल गया है इसलिये इसी का सर्वप्रथम उद्धार करो । जीव के आश्रित हुये अनेक भाव लाखों, करोड़ों भेदों में ब्रह्म के द्वारा कल्पित होकर उत्पन्न हुए और हो रहे हैं। जैसे निर्झर में जल-कणों की उत्पत्ति होती है वैसे ही यह भविष्य में भी होते रहेंगे । कुछ भाव तो सैकड़ों बार उत्पन्न हो चुके हैं, कुछ असंख्य बार उत्पन्न हुये हैं, कोई दो-तीन बार ही उत्पन्न हुये और कुछ तो ऐसे हैं जो प्रथम बार ही जन्म ग्रहण कर रहे हैं । इन सबने विभिन्न नामरूप धारण किये हैं । कोई सूर्य, चन्द्रमा, हरि, शिव, वरुण, ब्रह्मा आदि के रूप में हैं तो कोई किन्नर, यक्ष, गन्धर्व और नाग रूप में प्रकट हुये हैं ।
१६४ ] [ पंचम अध्याय
१६४ ] [ पंचम अध्याय कुछ ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि नाम धारण किया है। कोई ताड़, तमाल, कदम्ब, नींबू, आम, तृण औषधि वृक्ष, मूल, पत्र एवं फल बन गए हैं, तो कोई विभिन्न पर्वतों के आकार में स्थित होकर मन्दर, मेरु, मलय, महेन्द्र आदि कहे जाते हैं। कोई जल-राशि के रूप में, कोई समुद्र, दूध, घृत, इक्षु-रस आदि के रूप में स्थित हुये हैं। कुछ ने महती दिशाओं का रूप धारण किया है तो कोई अत्यन्त वेगवाली नदी के रूप में प्रवाहित हो रहे हैं। जैसे हाथ से गेंद को बारम्बार गिराते हुये उछालते हैं उस प्रकार कुछ को मृत्यु बारम्बार ताड़ित करती है। अनेकों ऐसे हैं कि आकाश में उठते और फिर नीचे गिर जाते हैं। अनेक मनुष्य ऐसे हैं जो विवेकी होकर भी अच्छे कर्म नहीं करते और हजारों जन्म भोग लेने पर भी उनका आवागमन नहीं मिटता। आत्म- तत्व जब दिशा और काल के प्रभाव से तथा अपनी शक्ति के द्वारा देह धारण करता है तब वही वासना से प्रभावित सङ्कल्पों की ओर जाने वाले चंचल मन के रूप में हो जाता है। यह सङ्कल्पों से ओत प्रोत मन शक्ति क्षण भर में ही स्वच्छ आकाश की भावना वाली हो जाती है उसमें शब्द रूप बीज के अंकुर फूटते हैं। फिर वही मन अधिक घनीभूत होकर स्पन्दन क्रम के कारण वायु-स्पन्दन के भाव में रमता है। उसमें स्पर्श रूप वीज के अंकुर लगते हैं। फिर दृढ़ अभ्यास से शब्द-स्पर्श रूप आकाश की उत्पत्ति होती है और वायु की टक्कर से अग्नि प्रकट होता है। वह अग्नि रूप तन्मात्रा के सहयोग से त्रिगुणात्मक हो जाता है और उन तीनों गुणों के साथ मिलकर मन रस-तन्मात्रा की भावना करता है। उस समय वह जल के शीतल गुण का चिन्तन करता हुआ जल का अनुभव करने लगता है। फिर वह चार गुणों वाला होकर गंध तन्मात्रा मय होकर पृथिवी का अनुभव करता है। इस प्रकार पांचों तन्मात्राओं से युक्त होकर वह अपनी सूक्ष्मता त्याग कर आकाश में अग्नि की चिङ्गारियों के रूप में स्फुरित होते हुये शरीर को देख पाता
महोपनिषत् [ १६५ है। वह शरीर ही अहङ्कार कलाओं से युक्त और बुद्धिबीज से समन्वित पुर्यष्टक कहा गया है। वह प्राणियों के हृदय कमल में मँडराने वाले भौंरे के समान है। जैसे पाक कराने पर विल्वफल स्थूलता को प्राप्त होता है वैसे ही उस सूक्ष्म शरीर में तीव्र संवेगात्मक तेजस्वी शरीर की भावना होने पर स्थूल हो जाता है। वह तेज उस स्वच्छ आकाश में मूषा में लगाये हुये सोने के समान स्फुरित होता और अपने स्वभावा- नुकूल ही गठित हो जाता है। वह ऊपर सिर के समान, नीचे पांवों के समान, पार्श्वों में भुजाओं और मध्य में उदर के समान होता जाता है। इस प्रकार पूर्ण शरीर को प्राप्त हो जाता है। वही शरीर बुद्धि, बल, वीर्य, उत्साह, विज्ञान एवं वैभव से सम्पन्न हुआ सब लोकों का पितामह ब्रह्मा बन जाता है ॥ १३४-१५७ ॥
अवलोक्य वपुर्ब्रह्मा कान्तमात्मोयमुत्तमम् ।।१५८ चिन्तामभ्येत्य भगवांस्त्रीकालामलदर्शनः । एतस्मिन् परमाकाशे चिन्मात्रैकात्मरूपिणि ।।१५६ अदृष्टापारपर्यन्ते प्रथमं किं भवेदिति । इति चिन्तितवान् ब्रह्मा सद्योजातामलात्महक् ।।१६० अपश्यत् सर्गवृन्द्वानि समतीतान्यनेकंशः । स्मरत्यथो स सकलान् सर्गधर्मगुणक्रमात् ।।१६१ लीलया कल्पयामास चित्राः संकल्पतः प्रजाः । नानाऽऽचारसमारम्भा गन्धर्वनगरं यथा ।।१६२ तासां स्वर्गापवर्गार्थं धर्मकामार्थसिद्धये । अनन्तानि विचित्राणि शास्त्राणि समकल्पयत् ।।१६३ विरिञ्चिरूपान्मनसः कल्पितत्वाज्जगत्स्थितेः । तावत्स्थितिरियं प्रोक्ता तन्नाशे नाशमाप्नुयात् ।।१६८ न जायते न म्रियते क्वचित् किंचित कदाचन ।
१६६ ] [ पंचम अध्याय
१६६ ] [ पंचम अध्याय परमार्थेन विप्रेन्द्र मिथ्या सर्वं तु दृश्यते ॥१६५ कोशमाशाभुजंगानां संसाराडम्बरं त्यज । असदेतदिति ज्ञात्वा मातृभाव निवेशय ॥१६६ गन्धर्वनगरस्यार्थे भूषितेऽभूषिते तथा । अविद्यांशे सुतादौ वा कः क्रमः सुखदुःखयोः ॥१६७ धनदारेषु वृद्धेषु दुःखं युक्तं न तुष्टता । वृद्धायां मोहमायायां कः समाश्वासवानिह ॥१६८ यैरेव जायते रागो मूर्खस्याधिकतां गतै । तैरेव भोगैः प्राज्ञस्य विराग उपजायते ॥१६६ अतो निदाघ तत्त्वज्ञ व्यवहारेषु संसृतेः । नष्टं नष्टंपेक्षस्व प्राप्तं प्राप्तमुपाहर ॥१७० अनागतानां भोगानामवाञ्छनमकृत्रिमम् । आगतानां च संभोग इति पण्डितलक्षणम् ॥१७१ शुद्धं सदतोर्मध्यं पदं बुद्ध्वाऽवलम्ब्य च । सबाह्याभ्यन्तरं दृश्यं मा गृहाण विमुञ्च मा ॥१७२ यस्य नेच्छा तथाऽनिच्छा ज्ञस्य कर्मणि तिष्ठतः । न तस्य लिप्यते प्रज्ञा पद्मपत्रमिवाम्बुभिः ॥१७३ यदि ते नेन्द्रियार्थश्रीः स्वदते हृदि वै द्विज । तदा विज्ञातविज्ञेयः समुत्तीर्णो भवार्णवात् ॥१७४ उच्चैः पदाय परया प्रज्ञया वासनागणात् । पुष्पाद्गन्धमिवोदारं चेतोवृत्तिं पृथक्कुरु ॥१७५ इस प्रकार प्रकट हुये ब्रह्मा जी भूत, भविष्यत, वर्तमान के प्रत्यक्ष देखने वाले हैं। उन्होंने अपने सुन्दर देह को देखकर विचार किया कि इस चिन्मात्र रूपी परमाकाश का आदि अन्त नहीं दिखाई देता । इसमें
महोपनिषत् [ १६७ सर्व प्रथम क्या हो ?' ऐसा विचार करते हुये उनकी आत्म-दृष्टि चैतन्य हुई और उन्हें अतीत में हुई सृष्टि के अनेकों सर्ग दिखाई दिए । उससे उन्हें सब धर्मों और गुणों के क्रम याद हो आए । उन्होंने अपने संकल्पों के द्वारा ही लीला पूर्वक विभिन्न प्रकार के रङ्गरूप और आचार विचार वाली प्रजा को उत्पन्न किया । उनके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि के लिये उन्होंने चित्र-विचित्र पदार्थों पद्धतियों, शास्त्रों और स्वर्ग नरकादि की कल्पना की। हे पुत्र ! यह मन ही ब्रह्मरूप है, क्योंकि कल्पना द्वारा संसार के स्थित होने के कारण ब्रह्मा के जीवन के साथ ही इसका जीवन है। जब ब्रह्मा की आयु समाप्त होती है, तब यह मन भी समाप्त हो जाता है । हे ब्रह्मन् ! यथार्थ में तो न कहीं कोई जन्म लेता है और न मृत्यु को प्राप्त होता है। यह जो कुछ दिखाई देता है वह सब मिथ्या है । यह संसार प्रपंच आशारूपी सर्पिणियों की पिटारी मात्र है, इसका त्याग करना ही श्रेयस्कर है। इसे असत् जानकर मातृ- भाव में अवस्थित होना उचित है। गंधर्व नगर सुसज्जित या असज्जित कैसा भी क्यों न हो, तुच्छ ही है। उसी के समान अविद्या के अंश रूप यह पुत्र, पत्नी आदि भी तुच्छ ही हैं। फिर इनके कारण सुख-दुःख मानने से क्या लाभ है ? धन, स्त्री आदि सब कुछ प्रपंच है, इनकी वृद्धि दुःख का ही कारण है। इसमें संतोष मानना ही निरर्थक है। मोह- माया की वृद्धि होने पर कोई भी सुख-शान्ति नहीं पा सका । जो वस्तुएँ अज्ञानी पुरुष को सुखमय प्रतीत होती हैं, उन्हीं वस्तुओं के प्रति ज्ञानी पुरुष विरक्त रहते हैं । इसलिये हे पुत्र ! तुम तत्वज्ञानी हो, जागतिक व्यवहारों में जिस-जिस का अभाव होता जाय उसकी इच्छा मत करो और जो-जो सहज प्राप्त हो, उसे ग्रहण करते रहो । अप्राप्त भोगों की इच्छा न करना और प्राप्त भोगों का उपभोग करना, यही पाण्डित्य है । सत्-असत् के मध्य शुद्ध पद का ज्ञान पाकर उसका अवलम्बन करना और बाह्याभ्यांतरिक दृश्यों का न ग्रहण करना और न त्याग करना,
१६८ ] पंचम अध्याय
१६८ ] पंचम अध्याय यही कर्म है। जैसे कीचड़ में कमल पत्र पड़ा रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता, वैसे ही इच्छा और अनिच्छा को समान मानने वाले ज्ञानी- जन कर्म में लिप्त रहते हुए भी अपनी बुद्धि को उनमें लिप्त नहीं होने देते। यदि तुम्हारे हृदय में इन्द्रियों से युक्त विषय स्पन्दन नहीं करते, तो अवश्य ही तुम जानने योग्य पदार्थ का ज्ञान प्राप्त करके जगत रूप समुद्र से पार हो गए। वासना रूपी पुष्पों की सुगन्ध लेकर भी यदि उससे चित्तवृत्ति को शीघ्र हटा लिया जाय तो उच्चपद की प्राप्ति संभव है ॥१५८--१७५॥ संसाराम्बुनिधावस्मिन् वासनाऽम्बुपरिप्लुते । ये प्रज्ञानावमारुढास्ते तीर्णाः पण्डिताः परे ॥१७६॥ न त्यजन्ति न वाञ्छन्ति व्यवहारं जगद्गतम् । सर्वमेवानुवर्तन्ते पारावारविदो जनाः ॥१७७॥ अनन्तस्यात्मतत्वस्य सत्तासामान्यरूपिणः । चितश्चेत्योन्मुखत्वं यत्तत् सङ्कल्पाङ्कुरं विदुः ॥१७८॥ लेशतः प्राप्तसत्ताकः स एव घनतां शनैः । याति चित्तत्वमापूर्य दृढं जाड्यायमेधघत् ॥१७९॥ भावयन्ति (न्ती) चितिश्चैत्य व्यतिरिक्तमिवात्मनः । सङ्कल्पतामिवायाति बीजमङ्कुरतामिव ॥१८०॥ संकल्पनं हि संकल्पः स्वयमेव प्रजायते । वर्धते स्वयमेवाशु दुःखाय न सुखाययत् ॥१८१॥ मा सकल्पय संकल्प मा भावं भावय स्थितौ । संकलपनाशने यत्तो न भूयोजननुगच्छति ॥१८२॥ भावनाऽभावमात्रेण संकल्पः क्षीयते स्वयम् । संकल्पेनैव संकल्पं मनसैव मनो मुने ॥१८३॥
महोपनिषत् [ १६६ ] छित्त्वा स्वात्मनि तिष्ठ त्वं किमेतावति दुष्करम् । यथैवेदं नभः शून्यं जगच्छून्यं तथैव हि ॥१८४॥ तण्डुलस्य यथा चर्म यथा ताम्रस्य कालिमा । नश्यति क्रियया विप्र पुरुषस्य तथा मलम् ॥१८५॥ जीवस्य तण्डुलस्येव मलं सहजमप्यलम् । नश्यत्येव न संदेहस्तस्मादुद्योगवान् भव ॥१८६॥ यह संसार-सागर वासनारूपी जल से परिपूर्ण है। जो ज्ञानी पुरुष प्रज्ञा रूप नाव पर चढ़ गए, वे इससे पार हो गए। जो पुरुष इस सांसारिक प्रपञ्च के ज्ञाता हैं, वे न तो संसार के व्यवहारों की आकांक्षा करते हैं और न उसका त्याग ही करते हैं। वे सभी व्यवहारों में अनासक्त रहते हैं। विद्वानों ने संकल्प का अंकुरित होना आत्मतत्व रूप चेतन का विषयों की ओर दौड़ने को ही माना है क्योंकि संकल्प धीरे-धीरे दृढ़ होते जाते हैं और तब उनसे चित्ताकाश आच्छन्न होकर जड़त्व को प्राप्त होता है। जैसे बीज अंकुर रूप होने लगता है, वैसे ही चेतन-विषयों को अपने से पृथक-सा मानते हुये वह संकल्प रूप में स्थित होता है। संकल्प के द्वारा उसकी क्रिया स्वयं ही प्रकट होती है और जल्दी-जल्दी वृद्धि को प्राप्त होने लगती है। परन्तु वह क्रिया सुख देने वाली नहीं होती, बल्कि दुःख ही देती है। इसलिये हे पुत्र ! अपने चित्त में होने वाली संकल्प की क्रिया का अवरोध करो। यदि संकल्प उत्पन्न भी तो उसमें पदार्थ भावना न करो क्योंकि जो संकल्प को नष्ट करने के लिये कटिबद्ध है, वे उसको क्रियात्मक नहीं होने देते। यदि भावना नष्ट हो जाय तो संकल्प भी स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। मन के द्वारा मन को जीतो और संकल्प के द्वारा संकल्प को नष्ट कर डालो। इस प्रकार आत्म-स्वरूप में स्थित होकर उद्योगी पुरुष बनने की चेष्टा करो। आकाश के समान यह संसार भी शून्य-
१७० ] [ षष्ठ अध्याय
१७० ] [ षष्ठ अध्याय है। जैसे ताँवे की कालौंच अथवा धान का छिलका प्रयत्न द्वारा पृथक किया जाता है, वैसे ही मनुष्य का मल-दोष क्रिया द्वारा ही नष्ट होना सम्भव है ॥१७६--१८६॥ ॥ पंचम अध्याय समाप्त ॥ षष्ठ अध्याय अन्तरास्थां परित्यज्य भावश्रीं भावनामयीम् । योऽसि सोऽसि जगत्यस्मिन् लीलया विहरानघ ॥१ सर्वत्राहमकर्तेति दृढभावनयाऽनया । परमामृतनाम्नी सा समतैवाशिष्यते ॥२ खेदोल्लासविलासेषु स्वात्मकर्तृतयैकया । स्वसंकल्पे क्षयं याते समतैवावशिष्यते ॥३ समताः सर्वभावेषु याऽसौ सत्यपरा स्थितिः । तस्यामवस्थितं चित्तं न भूयो जन्मभागभवेत् ॥४ अथवा सर्वकर्तृत्वमकर्तृत्वं च वै मुने । सर्वं त्यक्त्वा मनः पीत्वा योऽसि सोऽसि स्थिरो भव ॥५ शेषस्थिरसमाधानो येन त्यजसि तत्त्यज । चिन्मनः कलनाऽऽकारं प्रकाशतिमिरादिकम् ॥६ वासनां वासितारं च प्राणस्पन्दनपूर्वकम् । समूलमखिलं त्यक्त्वा व्योमसाम्यः प्रशान्तधीः ॥७ हृदयात् संपरित्यज्य सर्वां वासनापङ्क्तिकाम् । यस्तिष्ठति गतव्यग्रः स मुक्तः परमेश्वरः ॥८ दृष्टं द्रष्टव्यमखिलं भ्रान्तं भ्रान्त्या दिशो दश । युक्त्या वै चरतोऽज्ञस्य संसारो गोष्पदाकृतिः ॥६
महोपनिषत् ] [ १७१ सबाह्याभ्यान्तरे देहे ह्यध ऊर्ध्वं च दिक्षु च । इत आत्मा ततोऽप्यात्मा नास्त्यनात्ममय जगत ॥१०॥ हे पाप-रहित ! अन्तर की आस्था और भाव रूप सम्पत्ति का त्याग करके, अपने यथार्थ रूप में इस संसार में विचरण करो और स्वयं की सर्वत्र अकर्त्ता मानो, ऐसा करने से अमृता नाम वाली समता ही अवशिष्ट रहती है। खेद और उल्लास यह दोनों हो मनुष्य द्वारा स्वयं उत्पन्न किये हुये हैं। ऐसा समझ लेने पर समता ही शेष रहेगी । समता की यथार्थ स्थिति के भले प्रकार धारण कर लेने पर फिर आवागमन का कारण समाप्त हो जाता है। अथवा कर्त्तव्याकर्त्तव्य का त्याग कर डालो और मन का पान कर अपने यथार्थ रूप में स्थित हो जाओ । अन्त में सबका त्याग कर समाधिस्थ हो जाओ । चेतन ही प्रकाशरूप है और वही अन्धकार बन जाता है, क्योंकि वही मानसिक संकल्प का रूप धारण कर लेता है, इसलिए वासना के कारण का मूल सहित त्याग करके आकाश के समान स्वच्छ और शान्त मन वाले बनो। मुक्त वही जो हार्दिक रूप से सब वासनाओं को त्याग देता है और किसी प्रकार की आकुलता को मन में नहीं टिकने देता । वह भ्रान्ति के वश में पड़ कर दसों दिशाओं में चक्कर काटते हुये द्रष्टव्य पदार्थों को देखने में समर्थ है। देह के बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे सर्वत्र आत्मा है, उसके लिए यह विश्व अनात्ममय कभी नहीं होता । अपितु जो लोग प्रयत्नपूर्वक सदाचार में रत रहते हैं वे ज्ञानी पुरुष इस संसार सागर को सहज में ही तरने योग्य बना लेते हैं ॥१-१०॥ न तदस्ति न यत्राहं य तदस्ति न तन्मयम् । किमन्यदभिवाञ्छामि सर्वं सच्चिन्मयं ततम् ॥११॥ समस्तं खल्विदं ब्रह्म सर्वमात्मेदमाततम् । अहमन्य इदं चान्यदिति भ्रान्तिं त्यजनघ ॥१२॥
१७२ ] षष्ठ अध्याय
१७२ ] षष्ठ अध्याय तते ब्रह्मघने नित्ये संभवन्ति न कल्पिताः । न शोकोऽस्ति न मोहोऽस्ति न जराऽस्ति न जन्म वा ॥१३॥ यदस्तीह तदेवास्ति विज्वरो भव सर्वदा । यथाप्राप्तानुभवतः सर्वत्वानभिवाञ्छनात् ॥१४॥ त्यागादानपरित्यागी विज्वरो भव सर्वदा । यस्येदं जन्म पाश्चात्यं तमाश्वेव महामते ॥१५॥ विशन्ति विद्या विमला मुक्ता वेणुमिवोत्तमम् । विरक्तमनसां सम्यक् स्वप्रसङ्गादुदाहृतम् ॥१६॥ द्रष्टृदृश्यसमायोगात् प्रत्ययानन्दनिश्चयः । यस्तं स्वमात्मतत्त्वोत्थं निष्पन्दं समुपास्महे ॥१७॥ द्रष्टृदर्शनदृश्यानि त्यक्त्वा वासनया सह । दर्शनप्रथमाभासमात्मानं समुपास्महे ॥१८॥ द्वयोर्मध्यगं नित्यमस्तिनास्तीति पक्षयोः । प्रकाशनं प्रकाशानामात्मानं समुपास्महे ॥१९॥ संत्यज्य हृद्गुहेशानं देवमन्यं प्रयान्ति ये । ते रत्नमभिवाञ्छन्ति त्यक्तहस्तस्थकौस्तुभाः ॥२०॥ उत्थितानुत्थितानेतानिन्द्रियारीन् पुनः पुनः । हन्याद्विवेकदण्डेन वज्रेणेव हरिर्गिरीन् ॥२१॥ हे पाप रहित-निदाघ ! मैं अन्य हूँ और यह अन्य है, इस प्रकार की भ्रांति त्याग देने योग्य ही है । जहाँ मैं नहीं हूँ, वह स्थान नहीं है, उस वस्तु का भी अभाव है, जो आत्ममय नहीं हो । यह सभी कुछ सत् और चिन्मय है तो मैं अन्य किस वस्तु की अभिलाषा करूँ ? यह सभी कुछ आत्मा है, यह निश्चय ही ब्रह्म है । इसमें शोक, मोह, जरा, जन्म कुछ भी नहीं है । इस नित्य सच्चिदानन्द घन परमेश्वर में कल्प-
नात्मक भावों की संभावना नहीं है । जो आत्मतत्व में है, वही सब कुछ है। इसलिए कहीं भी, किसी भी वस्तु की कामना न करते हुए जो सहज में ही प्राप्त हो जाय, उसको निर्लिप्त भाव से भोगता रहे । न किसी का त्याग और न ग्रहण, इस प्रकार विकार रहित रहो । हे पुत्र ! जिस पुरुष का यह जन्म अन्तिम अर्थात् जिसका आगे जन्म नहीं होना है उस पुरुष में श्रेष्ठ जाति के मुक्ता के समान स्वच्छ विद्या प्रविष्ट होती है । जिनके चित्त में वैराग्य का समावेश है उनके द्वारा भले प्रकार अपने अनुभव द्वारा यह मत व्यक्त किया जाता है कि दृष्टा को दृश्य के द्वारा जिस सुख की अनुभूति होती है, वह आत्मतत्व से उत्पन्न हुआ स्पन्दन ही है और हम उसी का भले प्रकार से उपासना करते हैं । अस्ति और नास्ति के मध्यस्थ, प्रकाशों के भी प्रकाशक आत्मा के हम उपासक हैं । वह आत्मा हमारे हृदय में महेश्वर रूप में स्थित है। जो व्यक्ति उस शाश्वत आत्मा को छोड़कर अन्य वस्तुओं की उपलब्धि के लिए प्रयत्नशील हैं, वे अपनी हस्तगता कौस्तुभ मणि का परित्याग कर अन्य रत्न की कामना करते हैं । यह इन्द्रिय रूपी शत्रु सबल हों या बलहीन, विवेक रूपी दण्ड से बारम्बार ताडन करने योग्य हैं । जैसे इन्द्र अपने वज्र के प्रहार द्वारा बड़े-बड़े पर्वतों को भी गिरा देते हैं, वैसे ही विवेक बुद्धि के द्वारा इन्द्रिय रूपी शत्रुओं को उठने न देना चाहिए ॥११-२१॥
संसाररात्रिदुःस्वप्ने शून्ये देहमये भ्रमे । सर्वतवापवित्रं तद्दृष्टं संसृतिविभ्रमम् ॥२२॥ अज्ञानोपहतो बाल्ये यौवने वनिताहतः । शेषे कलत्रचिन्तार्त्तः किं करोति नराधमः ॥२३॥ सतोऽसत्ता स्थिता मूर्ध्नि रम्याणां मूर्च्छयंरम्यता । सुखानां मूर्ध्नि दुःखानि किमेकं संश्रयाम्यहम् ॥२४॥ येषां निमेषणोन्मेषौ जगतः प्रलयोदयौ ।
१७४ ] [ षष्ट अध्याय
१७४ ] [ षष्ट अध्याय तादृशाः पुरुषा यान्ति मादृशां गणनैव का ॥२५॥ संसार एव दुःखानां सीमान्त इति कथ्यते । तन्मध्ये पतिते देहे सुखमासाद्यते कथम् ॥२६॥ प्रबुद्धोऽस्मि प्रबुद्धोऽस्मि दुष्टश्चोरोऽयमात्मनः । मनो नाम निहन्म्येनं मनसाऽस्मि चिरं हतः ॥२७॥ मा खेदं भज हेयेषु नोपादेयपरो भवः । हेयादेयहशो त्यक्त्वा शेषस्थः सुस्थिरो भव ॥२८॥ निराशता निर्भयता नित्यता समता ज्ञता । निरीहता निष्क्रियता सौम्यता निर्विकल्पता ॥२६॥ धृतिमैत्री मनस्तुष्टिर्मुदुता मृदुभाषता । हेयोपादेयनिर्मुक्ते ज्ञे तिष्ठन्त्यपवासनम् ॥३०॥ गृहीततृष्णाशबरीवासनाजालमाततम् । संसारवारिप्रसृतं चिन्तातन्तुभिराततम् ॥३१॥ अनया तीक्ष्णया तात छिन्दि बुद्धिशलाकया । वात्ययेवाम्बुदं जालं छित्त्वा तिष्ट तते पदे ॥३२॥ यह देह रूप भ्रम संसार रूप रात्रि में दुःख स्वप्न के समान है और इसका प्रसार भी पवित्रता से परे है । बाल्यकाल में अज्ञान घेरे रहता है और युवावस्था में नारी के नयन बाण द्वारा मारा हुआ रहता है, तो अन्तकाल में ही यह स्त्री पुत्रादि की चिन्ता में रत रहने वाला अधम अपना क्या उपकार कर सकता है ? सत् के ऊपर असत् का बोल- बाला है, रमणीयता पर कुरुपता चढ़ी हुई है, सुख के ऊपर दुःख है तब मुझे किसकी शरण लेनी चाहिये ? जिनके निमेष और उन्मेष में संसार का अन्त और उत्पत्ति निहित है, वैसे पुरुष भी जब काल कलवित हो जाते हैं, तब मेरे जैसे तुच्छ पुरुषों की तो बात ही क्या है । जिस संसार को दुःखों की अन्तिम परिधि माना गया है, उस संसार में पड़े रहने वाला देह सुख का रस कैसे चख सकता है । मेरी आत्मा को चुराने वाला चोर
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri महोपनिषत् ] [ १७५ मेरा यह दूषित मन ही है। इससे मुझे न जाने कब का चुरा लिया है ? अब मैं जान गया हूँ। इसलिए इसका संहार कर डालूँगा। हेय पदार्थों के लिए दुःखित होने से कोई लाभ नहीं और उपादेय पदार्थों में भी आसक्ति रखना व्यर्थ है। इसलिए हेय और उपादेय की भेद-दृष्टि का त्याग करके शेष में ही अवस्थित हो जाओ क्योंकि ज्ञानी पुरुष में नित्यता, अभिज्ञता, समता, निष्क्रियता, निष्कामता, सांसारिक विकारों में निराशा, निर्विकल्पता, सौम्यता, मृदुता, धृति, मैत्री, सन्तोष और मिष्ट भाषण आदि गुण विद्यमान रहते हैं। तृष्णा रूपिणी भीलनी ने वासना रूपी जाल फैला दिया है, उसमें तुम फँस गये हो। यह मृग मरीचि- कात्मक जल चिन्ता रूपिणी रश्मियों द्वारा सब ओर फैला दिया गया है। हे पुत्र ! इस माया को ज्ञानरूपी तीक्ष्ण अस्त्र से काट कर अपने व्यापक रूप में उसी प्रकार स्थिति होओ, जिस प्रकार बवंडर मेघों के जाल को काट डालता है ॥ २२-२३ ॥ मनसैव मनश्छित्त्वा कुठारेगोव पादपम् । पदं पावनमासाद्य सद्य एव स्थिरो भव ॥२३ तिष्ठन् तच्छन् स्वपन् जाग्रन्निवसन्नुत्पतन् पतन् । असदेवेदमित्यन्तर्निश्चित्यास्थां परित्यज्य ॥३४ दृश्यमाश्रयसीदं चेत् तत् सचित्तोऽसि बन्धवान् । दृश्यं संत्यजसीदं चेत् तदचित्तोऽसि मोक्षवान् ॥३५ नाहं नेदमिति ध्यायस्तिष्ठ त्वमचलाचलः । आत्मनो जगत्क्ष्यान्तर्द्रष्टृदृश्यदशान्तरे ॥३६ दर्शनाख्यं स्वात्मनः सर्वदा भावयन् भव । स्वाद्यस्वादकसंयक्तं स्वाद्यस्वादकमध्यगम् ॥३७ स्वदनं केवलं ध्यायन् परमात्ममयो भव । अवलम्ब्य निरालम्बं मध्येमध्ये स्थिरो भव ॥३८ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
१७६ ] [ षष्ठ अध्याय
१७६ ] [ षष्ठ अध्याय रज्जुबद्धा विमुच्यन्ते तृष्णाबद्धा न केनचित् । तस्मान्निदाघ तृष्णां त्वं त्यज संकल्पवर्जनात् ॥३६॥ एतामहं भावमयीमपुण्यां छित्त्वाऽनहंभावशलाकयैव । स्वभावजां भव्यभवान्तभूमौ भव प्रशान्ताखिलभूत- भीतिः ॥४०॥ अहमेषां पदार्थानामेते च मम जीवितम् । नाहमेभिर्विना कश्चिन्न मयैते विना किल ॥४१॥ इत्यन्तर्निश्चयं त्यक्त्वा विचार्य मनसा सह । नाहं पदार्थस्य न मे पदार्थ इति भाविते ॥४२॥ अन्तःशीतलया बुद्ध्या कुर्वतो लीलया क्रियाम् । यो नूनं वासनात्यागो ध्येयो ब्रह्मन् प्रकीर्तितः ॥४३॥ जैसे वृक्ष के बँटे में लगी हुई कुल्हाड़ी वृक्ष को ही काट डालती है, वैसे ही मन से मन को काट कर पवित्र पद में अवस्थित होओ । उठते-बैठते, चलते, खड़े होते, सोते, जागते आदि सभी स्थितियों में सब को असत् रूप मानने हुए दृश्य पदार्थों से आस्था को हटा लो क्योंकि दृश्य का आश्रय लेने मात्र से चित्त युक्त बन्धन में पड़ना होता है । दृश्य का त्याग कर देने मात्र से चित्त-शून्यता के कारण मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी होते हो । 'न संसार है और न मैं हूँ' इस प्रकार की भावना करते हुए पर्वत के समान दृढ़ हो जाओ । आत्मा और विश्व के मध्य तथा दृश्य के मध्य भी स्वयं को दर्शन रूप आत्मा ही मानो । स्वादयुक्त पदार्थ तथा उसे चखने वाले से और इन दोनों के मध्य में स्थिति केवल स्वाद का ध्यान करते हुए परमात्ममय होकर रहो । यह ध्यान रखो कि रस्सी के बन्धन में पड़े हुए तो छूट जाते हैं, परन्तु तृष्णा से बन्धन में पड़े प्राणी किसी प्रकार भी नहीं छूटते । इसलिए इस पापमयी तृष्णा को छिन्न-भिन्न कर डालो क्योंकि यह अहङ्कार वाली और संकल्पमयी
महोपनिषत् ] [ १७७ है। अहम्भाव शून्यता ही इसके काटने वाला महान् अस्त्र है। जिस जन्म-मरण के भीषण भय में सभी प्राणी डूबे रहते हैं, उससे अभय होकर परमार्थ लोक में घूमो। ध्येय वही है जिसमें शान्त मन के द्वारा विचार करते हुए वासना त्याग दी जाती है। तुम भी 'यह पदार्थ मेरे नहीं हैं और न मैं इन पदार्थों का कुछ हूँ' ऐसी भावना द्वारा निरालम्ब अवस्था में स्थिति होओ ॥ ३३–४३ ॥ सर्वं समतया बुद्ध्या यः कृत्वा वासनाक्षयम् । जहाति निर्ममो देहं नेयोऽसौ वासनाक्षयः ॥४४ अहंकारमयीं त्यक्त्वा वासनां लीलयैव यः । तिष्ठति ध्येयसं त्यागी स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४५ निर्मूलं कलानां त्यक्त्वा वासनां यः शमं गतः । नेयत्यागमिमं विद्धि मुक्तं तं ब्राह्मणोत्तमम् ॥४६ द्वावेतौ ब्रह्मतां यातौ द्वावेतौ विगतज्वरौ । आपतत्सु यथाकालं सुखदुःखेष्वनारतौ ॥४७ संन्यासियोगिनौ दान्तौ विद्धि शान्तौ मुनीश्वर । ईप्सितानीप्सिते न स्तो यस्यान्र्तवृत्तिवृत्तिषु ॥४८ सुषुप्तबधश्चरति स जीव मुक्त उच्यते । हर्षामर्षभयक्रोधकामकार्पण्यदृष्टिभिः ॥४९ न हृष्यति ग्लायति यः परामर्शविवर्जितः । बाह्यार्थवासनोद्भूता तृष्णा बद्धेति कथ्यते ॥५० सर्वार्थवासनोन्मुक्ता तृष्णा मुक्तेति भण्यते । इदमस्तु ममेत्य तमिच्छां प्रार्थनयाऽन्विताम् ॥५१ तां तीक्ष्णां शृंखलां विद्धि दुःखजन्मभयप्रदाम् । तामेतां सर्वभावेषु सत्स्वसत्सु च सर्वदा ॥५२
१७८ षष्ठ अध्याय
१७८ षष्ठ अध्याय संन्तज्य परमोदारं पदमेति महामनाः । बन्धास्थामथ मोक्षास्थां सुखदुःखदशामपि ॥५३ समत्व बुद्धि के द्वारा जो पुरुष वासना को सर्वथा क्षीण करके ममत्व रहित हो जाता है, उसी से देह का बन्धन भी त्यागा जा सकता है। इसलिए वासना को नष्ट कर देना परम कर्तव्य है। जीवन्मुक्त उसी को कहते हैं जो अहङ्कारात्मिका वासना का सहज ही त्याग कर, ध्येय वस्तु का भी त्याग कर देता है। संकल्प रूपिणी वासना का समूल त्याग ही शांति-लाभ कराने वाला है। जीवन्मुक्त पुरुष ही वैसा त्याग करने में समर्थ है और वही पुरुष ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ कहा जाता है। ऐसे ही मनुष्य संसार के संतापों से मुक्त होकर ब्रह्मत्व को प्राप्त होते हैं। योगी जन शम और दम से युक्त होने के कारण समय-समय पर प्राप्त होने वाले सुख-दुःखों में लिप्त नहीं होते। इच्छा और अनिच्छा दोनों से ही जो रहित हैं और जो सुषुप्त के समान व्यवहार करने वाला है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जिस पुरुष में वासना का अभाव है वह काम, क्रोध, मोह, हर्ष, अमर्ष और भय आदि के वशीभूत होकर सुख-दुःख को नहीं मानता। बाह्य विषयों से आविर्भूत तृष्णा बन्धन में डालने वाली है और सब प्रकार से विषय वासनाओं से शून्य तृष्णा मुक्ति प्राप्त कराने वाली है। किसी वस्तु के प्राप्त करने की कामना दुःख भय की जन्मदायिनी है। उसे घोर बन्धन स्वरूपा समझनी चाहिए। सन्त जन सत्-असत् रूप पदार्थों की अभिलाषा का सर्वथा त्याग करके परम श्रेष्ठ पद पाते हैं। हे पुत्र ! बन्धन में विश्वास तथा मोक्ष में विश्वास सत्-असत् में विश्वास यह सब सुख-दुःख स्वरूप ही है। इनके त्याग द्वारा प्रशान्त महासागर के समान निश्चल और अत्यन्त शांत होना श्रेयस्कर है ॥ ४५-५३ ॥ त्यक्त्वा सदसदास्थां त्वं तिष्ठाक्षुब्धमहाब्धिवत् । जायते निश्चयः साधो पुरुषस्य चतुर्विधः ॥५४
महोपनिषद् ] [ १७६ आपादमस्तकमहं मातापितृविनिर्मितः । इत्येको निश्चयो ब्रह्मन् बन्धायासवलोकनात् ॥५५ अतीतं सर्वभावेभ्यो वालाग्रादप्यहं तनुः । इति द्वितीयो मोक्षाय निश्चयो जायते सताम् ॥५६ जगज्जालपदार्थात्मा सर्व एवाहमक्षयः । तृतीयो निश्चयश्चोक्तो मोक्षायैव द्विजोत्तम् ॥५७ अहं जगद्वा सकलं शून्यं व्योम समं सदा । एवमेष चतुर्थोऽपि निश्चयो मोक्षसिद्धिदः ॥५८ एतेषां प्रथमः प्रोक्तस्तृष्णया बन्धयोग्यया । शुद्धतृष्णास्त्रयः स्वच्छा जीवन्मुक्ता विलासिनः ॥५९ सर्वं चाप्यहमेवेति निश्चयो यो महामते । तमादाय विषादाय न भूयो जायते मतिः ॥६० हे श्रेष्ठ आत्मन् ! मनुष्य चार प्रकार के निश्चय वाला है । ‘मेरे देह की रचना माता-पिता द्वारा हुई है’ यह प्रथम निश्चय मानना चाहिए । ‘मैं जगदात्मक भावों से रहित केशाग्र से भी सूक्ष्माकार आत्मा हूँ’ यह दूसरे प्रकार का निश्चय है । इस निश्चय के द्वारा सन्तजनों को मुक्ति प्राप्त होती है । ‘मैं अखिल विश्व के पदार्थों का आत्मा सर्वस्वरूप एवम् अविनाशी हूँ’ यह तीसरे प्रकार का निश्चय भी मुक्ति का कारण होता है । ‘मैं और यह सम्पूर्ण विश्व आकाश के समान शून्य हैं’ यह चौथे प्रकार का निश्चय मोक्ष-सिद्धि का दाता है । इनमें प्रथम निश्चय बन्धन प्रदान करने वाली तृष्णा से ओत-प्रोत है । शेष तीन प्रकार के निश्चय पवित्र तृष्णा वाले हैं । जो लोग इन तीन प्रकार के निश्चयों से युक्त होते हैं वे आत्मतत्व में रत रहने वाले जीवन्मुक्त हैं । सब कुछ अपने को ही मानने वाले पुरुष फिर-फिर कर विषाद में नहीं पड़ते हैं ॥ ५४-६० ॥ शून्यं तत् प्रकृतिर्माया ब्रह्म विज्ञानमित्यपि । शिवः पूरुष ईशानो नित्यमात्मेति कथ्यते ॥६१
१८० ] [ षष्ठ अध्याय
१८० ] [ षष्ठ अध्याय द्वैताद्वैतसमुद्भूतैर्जगन्निर्माणलीलया । परमात्ममयी शक्तिरद्वैतैव विजृम्भते ॥६२ सर्वातीतपदालम्बी परिपूर्णैकचिन्मयः । नोद्वेगी न च तुष्टात्मा संसारे नावसीदति ॥६३ प्राप्तकर्मकरो नित्यं शत्रुमित्रसमानदृक् । ईहितानीहितैर्मुक्तो न शोचति न काङ्क्षति ॥६४ सर्वस्याभिमतं वक्ता चोदितः पेशलोक्तिमान् । आशयज्ञश्च भूतानां संसारे नावसीदति ॥६५ पूर्वा दृष्टिमवष्टभ्य ध्येयेत्यागविलासिनीम् । जीवन्मुक्ततया स्वस्थो लोके विहर विज्वरः ॥६६ अन्तः संत्यक्तसर्वाशो वीतरागो विवासनः । बहिः सर्वसमाचारो लोके विहर विज्वरः ॥६७ बहिः कृत्रिमसंरम्भो हृदि संरम्भवर्जितः । कर्ता बहिरकर्तान्तर्लोके विहर शुद्धधीः ॥६८ त्यक्ताहंकृतिराश्वस्तमतिराकाशशोभनः । अगृहीतकलाङ्काङ्को लोके विहर शुद्धधीः ॥६९ आत्मा के नाम से बोला जाने वाला शून्य ही प्रकृति, माया, शिव, पुरुष, ईशान, नित्य एवम् ब्रह्मज्ञान है । परब्रह्म के सम्बन्धित अद्वैत शक्ति ही द्वैत दिखाई देती है और अद्वैत द्वारा प्रकट पदार्थों से विश्व निर्माण की माया करती हुई बढ़ती है । जो पुरुष विश्व प्रपञ्च से दूर आत्मवाद में स्थित रहकर सन्तोष-असन्तोष न करते हुए परिपूर्ण चिन्मय अवस्था में रहते हैं वे सांसारिक विषाद में कभी नहीं पड़ते । हे पुत्र ! तुम समस्त आशाओं का त्याग करते हुये वासना शून्य होकर राग-रहित और ताप-रहित होकर दिखावे के रूप में सभी सांसारिक व्यवहारों को करो । बाह्य क्रोध का रूपक बनाते हुए भी भीतर से क्रोध-हीन बन जाओ तथा बाहर से कर्त्ता परन्तु भीतर से अकर्त्ता बने रहो । इस प्रकार
महोपनिषत् ] [ १८१ शुद्ध चित्त वाले होकर लोक में विचरण करो क्योंकि जो शत्रु-मित्र को समान समझता और नित्य प्राप्त कर्म को करता है और जो इच्छा- अनिच्छा से मुक्त है, जिसे न किसी वस्तु की कामना है और न हर्ष-शोक है, प्रिय भाषी तथा सबके आशय का ज्ञाता है, वह इस संसार में कभी शोक को प्राप्त नहीं होता । हे पुत्र ! अहङ्कार का त्याग कर कलङ्क की कालिमा से सर्वथा बचे रहो और आकाश के समान निर्मल जीवन वाले शुद्ध मन से स्वच्छन्द विचरण करो ॥ ६१-६६ ॥ उदारः पेशलाचारः स [पू] र्वाचारानुवृत्तिमान् । अन्तः सङ्गपरित्यागी बहिः संसारवानिव ॥७० अन्तर्वैराग्यमादाय बहिराशोन्मुखेहितः । अयं बन्धुरयं नेति कलना लघुचेतसाम् ॥७१ उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् । भवभावनया मुक्तं जरामरणवर्जितम् ॥७२ प्रशान्तकलनाऽऽरम्भं नीरागं पदमाश्रय । एषा ब्राह्मी स्थितिः स्वच्छा निष्कामा विगतामया ॥७३ आदाय विहरन्नवं संकटेपु विमुह्यति । वैराग्येणाय शस्त्रेण महत्त्वादिगुणैरपि ॥७४ यत्नोपविहरार्थं तत् स्वयमेवोन्नयेन्मनः । वैराग्यात् पूर्णतामेति मनोनाशवशानुगम् ॥७५ आशया रिक्ततामेति शरदीव सरोऽमलम् । ममेव भुक्तविरसं व्यापारौघ पुनः पुनः ॥७६ दिवसे दिवसे कुर्वन् प्राज्ञः कस्मान्नं लज्जते । चिच्चैत्यकलितो बन्धस्तन्मुक्तो मुक्तिरुच्यते ॥७७ चिदचैत्याऽखिलात्मेति सर्वसिद्धान्तसंग्रहः । एतं निश्चयमादाय विलोकय धियेच्छया ॥७८