भारतकोश
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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

सर्ग ७ ] अरण्यकाण्ड १३१


ततो रामोऽपि विज्ञाय राक्षसोऽयमिति स्फुटम् १६
विव्याध शरमादाय राक्षसं मृगरूपिणम् ।
पपात रुधिराक्तास्यो मारीचः पूर्वरूपधृक् ॥१७॥
हा हतोऽस्मि महाबाहो त्राहि लक्ष्मण मां द्रुतम् ।
इत्युक्त्वा रामवद्वाचा पपात रुधिराशनः ॥१८॥

यन्नामाज्ञोऽपि मरणे स्मृत्वा तत्साम्यमाप्नुयात् ।
किमुताग्रे हरिं पश्यंस्तेनैव निहतोऽसुरः ॥१९॥

तद्देहादुत्थितं तेजः सर्वलोकस्य पश्यतः ।
राममेवाविशद्देवा विस्मयं परमं ययुः ॥२०॥

किं कर्म कृत्वा किं प्राप्तः पातकी मुनिहिंसकः ।
अथवा राघवस्यायं महिमा नात्र संशयः ॥२१॥

रामबाणेन संविद्धः पूर्वं राममनुस्मरन् ।
भयात्सर्वं परित्यज्य गृहवित्तादिकं च यत् ॥२२॥
हृदि रामं सदा ध्यात्वा निर्धूताशेषकल्मषः ।
अन्ते रामेण निहतः पश्यन् राममवाप सः ॥२३॥

द्विजो वा राक्षसो वाऽपि पापी वा धार्मिकोऽपि वा
त्यजन्कलेवरं रामं स्मृत्वा यान्ति परं पदम् ॥२४॥

इति तेऽन्योन्यमाभाष्य ततो देवा दिवं ययुः ।

रामस्तच्चिन्तयामास म्रियमाणोऽसुराधमः ॥२५॥
हा लक्ष्मणेति मद्वाक्यमनुकुर्वन्ममार किम् ।
श्रुत्वा मद्वाक्यसदृशं वाक्यं सीताऽपि किं भवेत् २६
इति चिन्तापरीतात्मा रामो दूरान्न्यवर्तत ।

सीता तद्भाषितं श्रुत्वा मारीचस्य दुरात्मनः ॥२७॥
भीताऽतिदुःखसंविग्ना लक्ष्मणं त्विदमब्रवीत् ।
गच्छ लक्ष्मण वेगेन भ्राता तेऽसुरपीडितः ॥२८॥


तब रामचन्द्रजीने यह निश्चयपूर्वक जानकर कि यह राक्षस ही है, उस मृगरूप राक्षसको एक बाण छोड़कर बींध डाला । बाणके लगते ही मारीच अपना पूर्वरूप धारणकर लोहू भरे मुखसे पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १६-१७ ॥ वह रक्तपायी दैत्य रामकी-सी बोलीमें यह कहता हुआ कि 'हे महाबाहो लक्ष्मण ! मैं मारा गया; मेरी शीघ्र ही रक्षा करो' पृथिवीपर गिरा ॥१८॥

मरण-समयमें जिनके नामका स्मरण करनेसे अज्ञ-जन भी जिनके समान हो जाते हैं उन्हीं हरिंको देखते-देखते उन्हींके हाथसे मरे हुए उस राक्षसके विषयमें तो कहना ही क्या है ? ॥ १९ ॥ उसके शरीरसे निकला हुआ तेज सबके देखते-देखते श्रीराममें ही समा गया । यह देखकर देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥२०॥ वे कहने लगे—"अहो ! इस मुनिजनहिंसक पापी निशाचरने कैसे-कैसे कुकर्म किये और फिर कैसी शुभ गति प्राप्त की । निस्सन्देह यह श्रीरघुनाथजीकी ही महिमा है ॥ २१ ॥ रामके बाणसे बींधे जानेपर यह पहलेसे ही भयसे अपना सब गृह और धन आदि छोड़ें रामचन्द्रजीके स्मरणमें लगा हुआ था ॥ २२ ॥ निरन्तर रामका ध्यान करनेसे इसके सारे पाप नष्ट हो गये थे, तथा अन्तमें यह रामको देखते-देखते उन्हींके हाथसे मारा भी गया; इसलिये इसने रामहीको प्राप्त कर लिया ॥ २३ ॥ जो श्रीरामका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ते हैं, वे ब्राह्मण हों या राक्षस, पापी हों या धार्मिक—परम पदको ही प्राप्त होते हैं" ॥ २४ ॥ परस्पर इस प्रकार कहते हुए फिर देवगण स्वर्गको चले गये ।

तब रामचन्द्रजी सोचने लगे कि 'इस अधम राक्षसने मरते समय मेरी-सी बोलीमें 'हा लक्ष्मण !' कहकर प्राण क्यों छोड़े ? इन मेरे-से वाक्योंको सुनकर सीताकी क्या दशा होगी ?' ॥ २५-२६ ॥ इस प्रकार चिन्ता करते हुए राम बड़ी दूरसे लौटे ।

इधर सीताने दुरात्मा मारीचका वह शब्द सुनकर अत्यन्त भय और दुःखसे व्याकुल हो लक्ष्मणसे यों कहा—"लक्ष्मण ! तुम बहुत शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई राक्षसोंसे कष्ट पा रहे हैं ॥ २७-२८ ॥ क्या

१३२अध्यात्मरामायण[सर्ग ७

हा लक्ष्मणेति वचनं भ्रातुस्ते न शृणोषि किम् ।
तामाह लक्ष्मणो देवि रामवाक्यं न तद्भवेत् ॥ २९ ॥
यः कश्चिद्राक्षसो देवि म्रियमाणोऽब्रवीद्वचः ।
रामस्त्रैलोक्यमपि यः क्रुद्धो नाशयति क्षणात् ॥ ३० ॥
स कथं दीनवचनं भाषतेऽमरपूजितः ।
क्रुद्धा लक्ष्मणमालोक्य सीता वाष्पविलोचना ॥ ३१ ॥
प्राह लक्ष्मण दुर्बुद्धे भ्रातुर्व्यसनमिच्छसि ।
प्रेषितो भरतेनैव रामनाशाभिकाङ्क्षिणा ॥ ३२ ॥
मां नेतुमागतोऽसि त्वं रामनाशे उपस्थिते ।
न प्राप्स्यसे त्वं मामद्य पश्य प्राणांस्त्यजाम्यहम् ॥
न जानातीदृशं रामस्त्वां भार्याहरणोद्यतम् ।
रामादन्यं न स्पृशामि त्वां वा भरतमेव वा ॥ ३४ ॥

इत्युक्त्वा वध्यमाना सा स्वबाहुभ्यां रुरोद ह ।
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणः कर्णौ पिधायातीव दुःखितः ३५
मामेवं भाषसे चण्डि धिक् त्वां नाशमुपैष्यसि ।
इत्युक्त्वा वनदेवीभ्यः समर्प्य जनकात्मजाम् ॥ ३६ ॥
ययौ दुःखादतिसंविग्नो राममेव शनैः शनैः ।
ततोऽन्तरं समालोक्य रावणो भिक्षुवेषधृक् ॥ ३७ ॥
सीतासमीपमगमत्स्फुरद्दण्डकमण्डलुः ।
सीता तमवलोक्याशु नत्वा सम्पूज्य भक्तितः । ३८ ।
कन्दमूलफलादीनि दत्त्वा स्वागतमब्रवीत् ।
मुने भुङ्क्ष्व फलादीनि विश्रमस्व यथासुखम् ॥ ३९ ॥
इदानीमेव भर्ता मे ह्यागमिष्यति ते प्रियम् ।
करिष्यति विशेषेण तिष्ठ त्वं यदि रोचते ॥ ४० ॥


हिन्दी अनुवाद:

तुम अपने भाईका 'हा लक्ष्मण' यह वाक्य नहीं सुनते ?"

लक्ष्मणजीने कहा—"देवि ! यह वाक्य श्रीरामचन्द्रजीका नहीं है ॥ २९ ॥ किसी राक्षसने मरते-मरते ये वचन कहे हैं । जो रामजी क्रोधित होनेपर एक क्षणमें सम्पूर्ण त्रिलोकीको भी नष्ट कर सकते हैं ॥ ३० ॥ वे देववन्दित प्रभु भला ऐसा दीन-वचन कैसे बोल सकते हैं ?"

तब सीताजीने नेत्रोंमें जल भरकर क्रोधपूर्वक लक्ष्मणजीकी ओर देखते हुए कहा—"रे लक्ष्मण ! क्या तू अपने भाईको विपत्तिमें पड़े देखना चाहता है ? अरे दुर्बुद्धे ! मालूम होता है, तुझे रामका नाश चाहनेवाले भरतने ही भेजा है ॥ ३१-३२ ॥ क्या तू रामके नष्ट हो जानेपर मुझे ले जानेके लिये ही आया है, किन्तु तू मुझे पा न सकेगा । देख मैं अभी प्राण त्याग किये देती हूँ ॥ ३३ ॥ राम तुझे इस प्रकार स्त्रीहरणके लिये उद्यत नहीं जानते थे । रामके अतिरिक्त मैं भरत या तुझे किसीको भी नहीं छू सकती" ॥ ३४ ॥

ऐसा कहकर वे अपनी भुजाओंसे छाती पीटती हुई रोने लगीं । उनके ऐसे कठोर शब्द सुन लक्ष्मणजीने अति दुःखित हो अपने दोनों कान मूँद लिये और कहा—"हे चण्डि ! तुम्हें धिक्कार है, तुम मुझे ऐसी बातें कह रही हो ! इससे तुम नष्ट हो जाओगी ।" ऐसा कह लक्ष्मणजी सीताको वनदेवियोंको सौंपकर दुःखसे अत्यन्त खिन्न हो धीरे-धीरे रामके पास चले ।

इसी समय सूना देखकर रावण भिक्षुका वेष बना दण्ड-कमण्डलु घुमाता हुआ सीताके पास आया । सीताने उसे देखकर तुरन्त ही प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक उसका पूजन कर कन्द-मूल-फल आदि देकर स्वागत करते हुए कहा—"हे मुने ! ये फल आदि पाकर सुखपूर्वक विश्राम कीजिये । अभी थोड़ी देरमें ही मेरे पतिदेव आते होंगे । यदि आपकी इच्छा हो तो कुछ देर ठहरिये । वे आपका कुछ विशेष सत्कार कर सकेंगे" ॥ ३५-४० ॥

सर्ग ७ ]अरण्यकाण्डे१३३
भिक्षुरुवाच<br>का त्वं कमलपत्राक्षि को वा भर्ता तवानघे ।<br>किमर्थमत्र ते वासो वने राक्षससेविते ।<br>ब्रूहि भद्रे ततः सर्वं स्ववृत्तान्तं निवेदये ॥४१॥भिक्षु बोला— हे कमलोचने ! तुम कौन हो ? तुम्हारे पति कौन हैं ? हे अनघे ! इस राक्षससेवित वनमें तुम क्यों रहती हो ? हे कल्याणि ! ये सब बातें बताओ, तब मैं भी तुम्हें अपना सारा वृत्तान्त सुनाऊँगा ॥४१॥
सीतोवाच<br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथो महान् ।<br>तस्य ज्येष्ठः सुतो रामः सर्वलक्षणलक्षितः ॥४२॥<br>तस्याहं धर्मतः पत्नी सीता जनकनन्दिनी ।<br>तस्य भ्राता कनीयांश्च लक्ष्मणो भ्रातृवत्सलः ॥४३॥<br>पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डके वस्तुमागतः ।<br>चतुर्दश समास्त्वां तु ज्ञातुमिच्छामि मे वद ॥४४॥सीताजी बोलीं— हे भिक्षो ! श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्याके राजा थे, उनके ज्येष्ठ पुत्र सर्व-सुलक्षणसम्पन्न राम हैं ॥४२॥ मैं जनकनन्दिनी सीता उन्हींकी धर्मपत्नी हूँ । उनका छोटा भाई लक्ष्मण है । वह अपने भाईका अत्यन्त स्नेही है ॥४३॥ (हम दोनोंके साथ) श्रीरामचन्द्रजी पिताकी आज्ञासे चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहनेके लिये आये हैं । अब मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती हूँ, तुम भी मुझे अपना परिचय दो ॥४४॥
भिक्षुरुवाच<br>पौलस्त्यतनयोऽहं तु रावणो राक्षसाधिपः ।<br>त्वत्कामपरितप्तोऽहं त्वां नेतुं पुरमागतः ॥४५॥<br>मुनिवेषेण रामेण किं करिष्यसि मां भज ।<br>भुङ्क्ष्व भोगान्मया सार्धं त्यज दुःखं वनोद्भवम् ४६भिक्षु बोला— मैं पुलस्त्यनन्दन विश्रवाका पुत्र राक्षसराज रावण हूँ । मैं तुम्हें पानेकी इच्छासे सन्तप्त था; अतः इस समय तुम्हें ले जानेके लिये यहाँ आया हूँ ॥४५॥ उस मुनिवेषधारी रामसे तुम्हें क्या मिलेगा । तुम मुझसे प्रेम करो और इन वनवासके दुःखोंसे छूटकर मेरे साथ नाना प्रकारके भोग भोगो ॥४६॥
श्रुत्वा तद्वचनं सीता भीता किञ्चिदुवाच तम् ।<br>यद्येवं भाषसे मां त्वं नाशमेष्यसि राघवात् ॥४७॥<br>आगमिष्यति रामोऽपि क्षणं तिष्ठ सहानुजः ।<br>मां को धर्षयितुं शक्तो हरेर्भार्यां शशो यथा ॥४८॥<br>रामवाणैर्विभिन्नस्त्वं पतिष्यसि महीतले ।<br>इति सीताचचः श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥४९॥<br>स्वरूपं दर्शयामास महापर्वतसन्निभम् ।<br>दशास्यं विंशतिभुजं कालमेघसमद्युतिम् ॥५०॥<br>तद्दृष्ट्वा वनदेव्यश्च भूतानि च वितत्रसुः ।<br>ततो विदार्य धरणीं नखैरुद्धृत्य बाहुभिः ॥५१॥उसके ये वचन सुनकर सीताजीने कुछ डरते हुए उससे कहा—"यदि तू मुझसे ऐसी बात कहेगा तो रामचन्द्रजी तुझे नष्ट कर देंगे ॥४७॥ जरा ठहर तो, भाईके सहित श्रीरामचन्द्रजी अभी आते होंगे ! मेरे साथ कौन बलात्कार कर सकता है ? क्या सिंह-पत्नी-के साथ खरहा भी बलप्रयोग कर सकता है ? ॥४८॥ रामजीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर तू अभी पृथिवीतलपर सोवेगा।" सीताजीके ऐसे वचन सुनकर रावणने क्रोधाकुल हो अपना महापर्वताकार रूप दिख-लाया, जिसके दश मुख और बीस भुजाएँ थीं तथा जिसकी काले मेघके समान आभा थी ॥४९-५०॥ उस भयंकर रूपको देखकर वनदेवियाँ और वन्य जीव भयभीत हो गये। तब रावणने (सीताजीके पैरोंके नीचेकी) पृथिवीको नखोंसे खोदकर*उन्हें अपने हाथोंसे उठा लिया

* वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग १३ में रावण कहता है कि एक बार मैंने पुञ्जिकस्थली नामकी अप्सराको आकाशमार्गसे ब्रह्माजीके पास जाते देखा । तब मैंने कामातुर हो उसे बलात्कारसे वस्त्रहीन कर उसके साथ सम्भोग किया । जब उसने यह बात ब्रह्माजीसे जाकर कही तो उन्होंने मुझे शाप दिया कि 'यदि तू आजसे किसी स्त्रीसे बलात्कार करेगा तो तेरे मस्तकके सौ टुकड़े हो जायँगे ।' मालूम होता है इस शापके भयसे ही रावणने सीताजीको स्पर्श नहीं किया । किन्हीं-किन्हींका मत है कि रावणको इसी प्रकारका शाप कुबेरपुत्र नलकूबरने दिया था ।

१३४ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ७

तोलयित्वा रथे क्षिप्त्वा ययौ क्षिप्रं विहायसा । हा राम हा लक्ष्मणेति रुदती जनकात्मजा ॥५२॥ भयोद्विग्नमना दीना पश्यन्ती भुवमेव सा । श्रुत्वा तत्क्रन्दितं दीनं सीतायाः पक्षिसत्तमः ॥५३॥ जटायुरुत्थितः शीघ्रं नगाग्रात्तीक्ष्णतुण्डकः । तिष्ठ तिष्ठेति तं प्राह को गच्छति ममाग्रतः ॥५४॥ मुषित्वा लोकनाथस्य भार्यां शून्याद्वनालयात् । शुनको मन्त्रपूतं त्वं पुरोडाशमिवाध्वरे ॥५५॥ इत्युक्त्वा तीक्ष्णतुण्डेन चूर्णयामास तद्रथम् । वाहान्विभेद पादाभ्यां चूर्णयामास तद्धनुः ॥५६॥ ततः सीतां परित्यज्य रावणः खड्गमाददे । चिच्छेद पक्षौ सामर्षः पक्षिराजस्य धीमतः ॥५७॥ पपात किञ्चिच्छेषेण प्राणेन भुवि पक्षिराट् । पुनरन्यरथेनाशु सीतामादाय रावणः ॥५८॥ क्रोशन्ती रामरामेति त्रातारं नाधिगच्छति । हा राम हा जगन्नाथ मां न पश्यसि दुःखिताम् ॥५९॥ रक्षसा नीयमानां स्वां भार्या मोचय राघव । हा लक्ष्मण महाभाग त्राहि मामपराधिनीम् ॥६०॥ वाक्शरेण हतस्त्वं मे क्षन्तुमर्हसि देवर । इत्येवं क्रोशमानां तां रामागमनशङ्कया ॥६१॥ जगाम वायुवेगेन सीतामादाय सत्वरः । विहायसा नीयमाना सीतापश्यदधोमुखी ॥६२॥ पर्वताग्रे स्थितान्पञ्च वानरान्वारिजानना । उत्तरीयार्धखण्डेन विमुच्याभरणादिकम् ॥६३॥ बध्वा चिक्षेप रामाय कथयन्त्विति पर्वते । ततः समुद्रमुल्लङ्घ्य लङ्कां गत्वा स रावणः ॥६४॥

और रथमें डालकर तुरन्त आकाशमार्गसे चल दिया।

उस समय सीताजी अति भयभीत होकर दीन-दृष्टिसे पृथिवीकी ओर देखती हुई 'हा राम ! हा लक्ष्मण !' ऐसा कहकर रोने लगीं। सीताजीका वह आर्तक्रन्दन सुनकर तुरन्त ही तीखी चोंचवाला पक्षिश्रेष्ठ जटायु पहाड़ की चोटीपरसे उठा। और बोला—"अरे ! ठहर, ठहर, यज्ञके मन्त्रपूत पुरोडाशको ले जानेवाले कुत्तेके समान मेरे सामने ही जगन्नाथ श्रीरघुनाथजीकी भार्याको सूने तपोवनसे तू कौन लिये जाता है ? ॥५१-५५॥ जटायुने ऐसा कहकर अपनी तीक्ष्ण चोंचसे रावणके रथको चूर-चूर कर डाला और अपने पञ्जोंसे घोड़ोंको मारकर उसके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ५६

तब रावणने सीताजीको छोड़कर अपना खड्ग निकाला और झुँझलाकर मतिमान् जटायुके पंख काट डाले ॥ ५७॥ पंख कट जानेसे पक्षिराज जटायु अधमरे होकर पृथिवीपर गिर पड़े। फिर तुरन्त ही रावण सीताजीको दूसरे रथपर चढ़ाकर चलता बना ॥ ५८ ॥

उस समय वह सीता किसी रक्षकको न देखकर वारम्वार रामको पुकारती हुई रो-रोकर कह रही थीं—"हा राम ! हा जगन्नाथ ! क्या आप मुझ दुःखिनीको नहीं देखते ? ॥ ५९॥ हे राघव ! आपकी भार्याको राक्षस लिये जाता है, आप छुड़ाइये। हा महाभाग लक्ष्मण ! मुझ अपराधिनीकी रक्षा करो ॥ ६० ॥ हे देवर ! मैंने तुम्हें वाग्बाण मारे थे, तुम मुझे क्षमा करना।" सीताजीके इस प्रकार रुदन करनेसे रामके आनेकी आशंका करता हुआ रावण उन्हें लेकर वायुके समान अति तीव्र वेगसे चलने लगा।

इस प्रकार आकाशमार्गसे जाते हुए नीचेकी ओर देखती हुई कमलानना सीताजीने एक पर्वत-शिखरपर पाँच वानरोंको बैठे देखा। यह देखकर उन्होंने अपने आभूषणादि उतारकर अपने दुपट्टेके टुकड़ेमें बाँधे और यह कहकर कि 'रामको मेरा समाचार सुना देना' पर्वतपर फेंक दिये।

तदनन्तर रावणने समुद्र पारकर लंकामें पहुँचकर

अरण्यकाण्ड - सर्ग ८: सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट

सर्ग ८ ] अरण्यकाण्ड १३५


स्वान्तःपुरे रहस्येतामशोकविपिनेऽक्षिपत् ।
राक्षसीभिः परिवृतां मातृबुद्धयाऽन्वपालयत् ॥ ६५ ॥
कृशाऽतिदीना परिकर्मवर्जिता
दुःखेन शुष्यद्वदनाऽतिविह्वला ।
राम रामेति विलप्यमाना
सीता स्थिता राक्षसवृन्दमध्ये ॥ ६६ ॥

उन्हें अपने अन्तःपुरके एकान्त देश अशोकवनमें रखा और राक्षसियोंसे घेरे रखकर मातृबुद्धिसे उनकी रक्षा करने लगा ॥ ६१–६५ ॥ उस स्थानमें अति कृश और दीनवदना सीताजी सब प्रकारका श्रृंगार छोड़कर दुःखके कारण अति शुष्कवदन और विह्वल होकर 'हा राम ! हा राम !' ऐसे विलाप करती हुई राक्षसोंके बीचमें रहने लगीं ॥ ६६ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टम सर्ग

सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट ।

श्रीमहादेव उवाच
रामो मायाविनं हत्वा राक्षसं कामरूपिणम् ।
प्रतस्थे स्वाश्रमं गन्तुं ततो दूराद्ददर्श तम् ॥ १ ॥
आयान्तं लक्ष्मणं दीनं मुखेन परिशुष्यता ।
राघवश्चिन्तयामास स्वात्मन्येव महामतिः ॥ २ ॥
लक्ष्मणस्तन्न जानाति मायासीतां मया कृताम् ।
ज्ञात्वाप्येनं वञ्चयित्वा शोचामि प्राकृतो यथा ॥ ३ ॥
यद्यहं विरतो भूत्वा तूष्णीं स्थास्यामि मन्दिरे ।
तदा राक्षसकोटीनां वधोपायः कथं भवेत् ॥ ४ ॥
यदि शोचामि तां दुःखसन्तप्तः कामुको यथा ।
तदा क्रमेणानुचिन्वन्सीतां यास्येऽसुरालयम् ।
रावणं सकुलं हत्वा सीतामग्नौ स्थितां पुनः ॥ ५ ॥
मयैव स्थापितां नीत्वा याताऽयोध्द्यामतन्द्रितः ।
अहं मनुष्यभावेन जातोऽस्मि ब्रह्मणाऽर्थितः ॥ ६ ॥
मनुष्यभावमापन्नः किञ्चित्कालं वसामि कौ ।
ततो मायामनुष्यस्य चरितं मेऽनुशृण्वताम् ॥ ७ ॥
मुक्तिः स्यादप्रयासेन भक्तिमार्गानुवर्तिनाम् ।

**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! इधर रामचन्द्रजी जब कामरूपधारी मायावी राक्षसको मारकर अपने आश्रमपर चलनेको प्रस्तुत हुए तो उन्होंने दूरसे ही दीन और उदास मुखसे लक्ष्मणको आते देखा । तब महामति रघुनाथजी मन-ही-मन सोचने लगे ॥ १-२ ॥ 'लक्ष्मणको यह पता नहीं है कि मैंने मायामयी सीता बना दी है । मैं यह जानता हूँ तथापि लक्ष्मणसे यह बात छिपाकर मैं साधारण मनुष्यके समान शोक करूँगा ॥ ३ ॥ यदि मैं उपराम होकर चुपचाप अपनी कुटीमें बैठ गया तो इन करोड़ों राक्षसोंके नाशका उपाय कैसे होगा ? ॥ ४ ॥ यदि मैं उसके लिये दुःखातुर होकर कामी पुरुषके समान शोक करूँगा तो क्रमशः सीताकी खोज करता हुआ राक्षसराज रावणके यहाँ पहुँच जाऊँगा और उसे कुलसहित मारकर अपने आप ही अग्निमें स्थापित की हुई सीताको उसमेंसे निकालकर फिर तुरन्त अयोध्या चला जाऊँगा । ब्रह्माकी प्रार्थनासे मैंने मनुष्यावतार लिया है अतः मैं कुछ समय पृथिवीपर मनुष्य-भावसे ही रहूँगा । इससे मुझ माया-मानवके चरित्रोंको सुननेवाले भक्ति-परायण पुरुषोंकी अनायास ही मुक्ति हो जायगी ।'

१३६अध्यात्मरामायण[सर्ग. ८

निश्चित्यैवं तदा दृष्ट्वा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥८॥
किमर्थमागतोऽसि त्वं सीतां त्यक्त्वा मम प्रियाम्।
नीता वा भक्षिता वापि राक्षसैर्जनकात्मजा ॥९॥

लक्ष्मणः प्राञ्जलिः प्राह सीताया दुर्वचो रुदन्।
हा लक्ष्मणेति वचनं राक्षसोक्तं श्रुतं तया ॥१०॥
त्वद्वाक्यसदृशं श्रुत्वा मां गच्छेति त्वराब्रवीत्।
रुदन्ती सा मया प्रोक्ता देवि राक्षसभाषितम्।
नेदं रामस्य वचनं स्वस्था भव शुचिस्मिते ॥११॥
इत्येवं सान्त्विता साध्वी मया प्रोवाच मां पुनः।
यदुक्तं दुर्वचो राम न वाच्यं पुरतस्तव ॥१२॥
कर्णौ पिधाय निर्गत्य यातोऽहं त्वां समीक्षितुम्।

रामस्तु लक्ष्मणं प्राह तथाऽप्यनुचितं कृतम् ॥१३॥
त्वया स्त्रीभाषितं सत्यं कृत्वा त्यक्ता शुभानना।
नीता वा भक्षिता वाऽपि राक्षसैर्नात्र संशयः ॥१४॥

इति चिन्तापरो रामः स्वाश्रमं त्वरितो ययौ।
तत्रादृष्ट्वा जनकतां विललापातिदुःखितः ॥१५॥
हा प्रिये क्व गताऽसि त्वं नासि पूर्ववदाश्रमे।
अथवा मन्विमोहार्थं लीलया क्व विलीयसे ॥१६॥

इत्याचिन्वन्वनं सर्वं नापश्यज्जानकीं तदा।
वनदेव्यः कुतः सीतां ब्रुवन्तु मम वल्लभाम् ॥१७॥
मृगाश्च पक्षिणो वृक्षा दर्शयन्तु मम प्रियाम्।
इत्येवं विलपन्नेव रामः सीतां न कुत्रचित् ॥१८॥
सर्वज्ञः सर्वथा क्वापि नापश्यद्रघुनन्दनः।
आनन्दोऽप्यन्वशोचत्तामचलोऽप्यनुधावति ॥१९॥


हिन्दी-अनुवाद:

श्रीरामचन्द्रजीने इसप्रकार निश्चयकर लक्ष्मणजीकी ओर देखकर कहा—॥५-८॥ “लक्ष्मण ! तुम प्राणप्रिया सीताको छोड़कर कैसे चले आये ? अब राक्षसगण जनकनन्दिनी सीताको हर ले गये होंगे अथवा उन्हें खा गये होंगे” ॥९॥

तब लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर रोते हुए सीताजीके दुर्वाक्य कह सुनाये। वे बोले— “आपके वाक्यके समान राक्षसके कहे हुए 'हा लक्ष्मण !' इस शब्दको सुनकर सीताजीने अति आतुरतासे रोते हुए मुझसे कहा 'फौरन जाओ'। तब मैंने उन्हें समझाया कि देवि ! यह रघुनाथजीका वाक्य नहीं है, राक्षसका शब्द है, हे शुचिस्मिते ! तुम निश्चिन्त रहो ॥१०-११॥ मेरे इस प्रकार ढाढस बँधानेपर भी साध्वी सीताजीने मुझसे जैसे दुर्बचन कहे हैं, हे रघुनाथजी ! वे आपके सामने कहने योग्य नहीं हैं ॥१२॥ अतः मैं कान मूँदकर वहाँसे आपको देखनेके लिये चला आया।”

इसपर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—“लक्ष्मण ! ठीक है, तथापि तुमने उचित नहीं किया ॥१३॥ जो स्त्रीकी बातको सत्य मानकर शुभानना सीताको छोड़ दिया ! इसमें सन्देह नहीं अब राक्षसलोग या तो उन्हें हर ले गये होंगे या खा गये होंगे” ॥१४॥

इस प्रकार चिन्ता करते हुए श्रीरामचन्द्रजी बड़ी शीघ्रतासे अपने आश्रममें आये और वहाँ जानकीजीको न देखकर अति दुःखित होकर विलाप करने लगे—॥१५॥ 'हा प्रिये ! आज तुम पूर्ववत् आश्रममें दिखायी नहीं देती हो, सो कहाँ चली गयी हो ? अथवा मुझे मोहित करनेके लिये विनोदसे ही कहीं छिप रही हो ? ॥१६॥

इस प्रकार विलाप करते हुए उन्होंने सारा वन छान डाला किन्तु कहीं भी जानकीजीको न पाया। तब वे कहने लगे—“अयि वनदेवियो ! बताओ मेरी प्राणवल्लभा सीता कहाँ है ? अरे मृग, पक्षी और वृक्षो ! तुम्हीं मेरी प्रियाको दिखाओ।” ॥१७॥ इस प्रकार विलाप करते हुए सर्वज्ञ श्रीरघुनाथजीने सीताजीका कहीं कुछ भी पता न पाया ॥१८॥ अहो ! भगवान् रामने आनन्दस्वरूप होकर भी सीताजीके लिये शोक किया, निश्चल होनेपर भी उनकी खोजमें इधर-उधर

सर्ग ८ ]अरण्यकाण्ड१३७
निर्ममो निरहङ्कारोऽप्यखण्डानन्दरूपवान् ।<br>मम जायेति सीतेति विललापातिदुःखितः ॥२०॥दौड़ते फिरे तथा ममता और अहंकारसे शून्य अखण्डा- <br>नन्दस्वरूप होकर भी अत्यन्त दुःखित हो 'हे मेरी<br>प्रिये ! हे सीते !' ऐसा कहकर विलाप किया ॥१९-२०॥
एवं मायामनुचरन्नसक्तोऽपि रघूत्तमः ।<br>आसक्त इव मूढानां भाति तत्त्वविदां नहि ॥२१॥इस प्रकार मायाका अनुसरण करते हुए श्रीरघुनाथजी<br>अनासक्त होते हुए भी मूढ़ पुरुषोंको आसक्त-से प्रतीत<br>होते हैं किन्तु तत्त्वज्ञानियोंको ऐसा भ्रम नहीं<br>होता ॥ २१ ॥
एवं विचिन्वन्सकलं वनं रामः सलक्ष्मणः ।<br>भग्नं रथं छत्रचापं कूबरं पतितं भुवि ॥२२॥<br>दृष्ट्वा लक्ष्मणमाहेदं पश्य लक्ष्मण केनचित् ।<br>नीयमानां जनकतां तं जित्वान्यो जहार ताम् ॥२३॥इस प्रकार लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीने सम्पूर्ण<br>वनमें सीताजीको ढूँढते-ढूँढते पृथिवीपर टूटे रथ-<br>छत्र, धनुष और कूबर पड़े देखे । उन्हें देखकर<br>भगवान् रामने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! देखो<br>यहाँ सीताजीको ले जाते हुए किसी पुरुषको कोई अन्य<br>व्यक्ति (युद्धमें) जीतकर उन्हें हर ले गया है" ॥२२-२३॥
ततः कञ्चिद्भुवो मार्गं गत्वा पर्वतसन्निभम् ।<br>रुधिराक्तवपुर्दृष्ट्वा रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥२४॥<br>एष वै भक्षयित्वा तां जानकीं शुभदर्शनाम् ।<br>शेते विविक्तेऽतितृप्तः पश्य हन्मि निशाचरम् ॥२५॥<br>चापमानय शीघ्रं मे बाणं च रघुनन्दन ।फिर कुछ दूर जानेपर एक पर्वत-सदृश शरीरको<br>रुधिरसे लथपथ देखकर रामने कहा—॥ २४ ॥<br>"देखो, निस्सन्देह यही उस शुभदर्शना सीताको खाकर<br>अत्यन्त तृप्त हो यहाँ एकान्तमें सो रहा है; मैं इस<br>निशाचरको अभी मारे डालता हूँ ॥ २५ ॥ हे रघुश्रेष्ठ<br>लक्ष्मण ! शीघ्र ही मेरा धनुष-बाण लाओ ।"
तच्छ्रुत्वा रामवचनं जटायुः प्राह भीतवत् ॥२६॥<br>मां न मारय भद्रं ते म्रियमाणं स्वकर्मणा ।<br>अहं जटायुस्ते भार्याहारिणं समनुद्रुतः ॥२७॥<br>रावणं तत्र युद्धं मे बभूवारिचिमर्दन ।<br>| तस्य वाहान् रथं चापं च्छित्त्वाऽहं तेन घातितः ॥२८॥<br>पतितोऽस्मि जगन्नाथ प्राणांस्त्यक्ष्यामि पश्य माम् ॥रामका यह कथन सुन जटायुने भयभीत होकर<br>कहा—॥ २६ ॥ "मैं अपने ही कर्मसे मर रहा हूँ;<br>आपका कल्याण हो, आप मुझे न मारें । मैं जटायु<br>हूँ, मैंने आपकी भार्याको ले जानेवाले रावणका पीछा<br>किया था । हे शत्रुदमन ! मेरा उससे घोर युद्ध हुआ<br>और मैंने उसके रथ, घोड़े और धनुष आदि भी काट<br>डाले, किन्तु अब मैं उसका घायल किया हुआ पड़ा<br>हूँ । हे जगन्नाथ ! आप मेरी ओर देखिये, मैं अब प्राण<br>छोड़ना ही चाहता हूँ" ॥ २७-२९ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो दीनं कण्ठप्राणं ददर्श ह ।<br>हस्ताभ्यां संस्पृशन् रामो दुःखाश्रुप्लुतलोचनः ॥३०॥<br>जटायो ब्रूहि मे भार्या केन नीता शुभानना ।<br>मत्कार्यार्थं हतोऽसि त्वमतो मे प्रियबान्धवः ॥३१॥यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने (जटायुके पास जाकर)<br>उसे कण्ठगतप्राण और अति दीन अवस्थामें देखा ।<br>तब वे आँखोंमें आँसू भरकर उसपर हाथ फेरते हुए<br>बोले—॥ ३० ॥ "हे जटायो ! कहो, मेरी सुमुखी<br>भार्या सीताजीको कौन ले गया है ? अहो ! तुम मेरे<br>कार्यके लिये मारे गये ! अतः अवश्य ही तुम मेरे प्रिय<br>बन्धु हो" ॥ ३१ ॥
१३८अध्यात्मरामायण[सर्ग ८

मूल श्लोक:

जटायुः सन्नया वाचा वक्त्राद्रक्तं समुद्वमन् ।
उवाच रावणो राम राक्षसो भीमविक्रमः ॥ ३२॥
आदाय मैथिलीं सीतां दक्षिणाभिमुखो ययौ ।
इतो वक्तुं न मे शक्तिः प्राणांस्त्यक्ष्यामि तेऽग्रतः ॥३३॥
दिष्ट्या दृष्टोऽसि राम त्वं म्रियमाणेन मेऽनघ ।
परमात्माऽसि विष्णुस्त्वं मायामानुषरूपधृक् ॥३४॥
अन्तकालेऽपि दृष्ट्वा त्वां मुक्तोऽहं रघुसत्तम ।
हस्ताभ्यां स्पृश मां राम पुनर्यास्यामि ते पदम् ॥ ३५॥
तथेति रामः पस्पर्श तदङ्गं पाणिना स्मयन् ।
ततः प्राणान्परित्यज्य जटायुः पतितो भुवि ॥३६॥
रामस्तमनुशोचित्वा बन्धुवत्साश्रुलोचनः ।
लक्ष्मणेन समानाय्य काष्ठानि प्रददाह तम् ॥३७॥
स्नात्वा दुःखेन रामोऽपि लक्ष्मणेन समन्वितः ।
हत्वा वने मृगं तत्र मांसखण्डान्समन्ततः ॥३८॥
शाद्वले प्राक्षिपद्रामः पृथक् पृथगनेकधा ।
भक्षन्तु पक्षिणः सर्वे तृप्तो भवतु पक्षिराट् ॥३९॥
इत्युक्त्वा राघवः प्राह जटायो गच्छ मत्पदम् ।
मत्सारूप्यं भजस्वाद्य सर्वलोकस्य पश्यतः ॥४०॥
ततोऽनन्तरमेवासौ दिव्यरूपधरः शुभः ।
विमानवरमारुह्य भास्वरं भानुसन्निभम् ॥४१॥
शङ्खचक्रगदापद्मकिरीटवरभूषणैः ।
द्योतयन्स्वप्रकाशेन पीताम्बरधरोऽमलः ॥४२॥
चतुर्भिः पार्षदैर्विष्णोस्तादृशैरेभिपूजितः ।
स्तूयमानो योगिगणै राममाभाष्य सत्वरः ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तुष्टाव रघुनन्दनम् ॥४३॥

जटायुरुवाच
अगणितगुणमप्रमेयमाद्यं
सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम् ।


हिन्दी अनुवाद:

जटायुने रक्त वमन करते हुए लड़खड़ाती बोलीमें कहा—"हे राम ! महापराक्रमी राक्षसराज रावण मिथिलेशनान्दिनी सीताको दक्षिणकी ओर ले गया है। और अधिक कहनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। मैं अभी आपके सामने ही प्राण छोड़ना चाहता हूँ ॥३२-३३॥ हे राम ! आज बड़े भाग्यसे मैंने मरते समय आपको देख पाया है। हे अनघ ! आप मायामानवरूप साक्षात् परमात्मा विष्णु ही हैं ॥ ३४ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! वैसे तो अन्त समय आपका दर्शन करनेसे ही मैं मुक्त हो गया, तथापि आप मुझे अपने करकमलोंसे स्पर्श कीजिये । फिर मैं आपके परमपदको जाऊँगा" ॥ ३५ ॥

तब रामचन्द्रजीने मुसकाते हुए 'बहुत अच्छा' कह उसका शरीर अपने करकमलोंसे छुआ । तदनन्तर जटायु प्राण छोड़कर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ ३६ ॥ रामचन्द्रजीने नेत्रोंमें जल भरकर उसके लिये अपने स्वजनके समान शोक करते हुए लक्ष्मणसे लकड़ियां मँगवा उसका दाह-कर्म किया ॥ ३७ ॥

तत्पश्चात् रामजीने लक्ष्मणके सहित दुःखितचित्तसे स्नान किया और वनमें एक मृग मारकर घासपर सब ओर अलग-अलग उसके अनेकों मांसखण्ड बिखेर दिये । 'इन्हें सब पक्षिगण खायँ और उनसे पक्षिराज जटायु तृप्त हों' ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी बोले-“जटायो ! तुम मेरे परमपदको जाओ और आज सबके देखते-देखते मेरा सारूप्य प्राप्त करो" ॥ ३८-४० ॥ तदनन्तर वह तुरन्त ही सुन्दर दिव्य रूप धारण कर एक सूर्य-सदृश प्रकाशमान विमानपर आरूढ हुआ ॥ ४१ ॥

उस समय वह सुन्दर पीताम्बर धारण किये शंख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट आदि श्रेष्ठ आभूषणोंके सहित अपने प्रकाशसे (सम्पूर्ण दिशाओंको) प्रकाशित कर रहा था ॥ ४२ ॥ वैसे ही वेष-भूषावाले चार विष्णु-पार्षद उसकी सेवा कर रहे थे तथा योगिगण उसकी स्तुति कर रहे थे। तदनन्तर वह हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीको सम्बोधन कर उनकी स्तुति करने लगा।४३।

जटायु बोला—"जो अगणित गुणशाली हैं, अप्रमेय हैं, जगत्के आदिकारण हैं, तथा उसकी स्थिति और लय आदिके हेतु हैं उन परम शान्त-स्वरूप परमात्मा

सर्ग ८ ]अरण्यकाण्ड१३९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उपरमपरं परात्मभूतं<br>सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम् ॥४४॥श्रीरामचन्द्रजीकी मैं निरन्तर वन्दना करता हूँ ॥ ४४ ॥
निरवधिसुखमिन्दिराकटाक्षं<br>क्षपितसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम् ।<br>नरवरमनिशं नतोऽस्मि रामं<br>वरदमहं वरचापबाणहस्तम् ॥४५॥जो असीम आनन्दमय और श्रीकमलादेवीके कटाक्षके आश्रय हैं तथा जो ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं उन धनुष-बाणधारी वरदायक नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ४५ ॥
त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं<br>रविशतभासुरमीहितप्रदानम् ।<br>शरणदमनिशं सुरागमूले<br>कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥४६॥जो त्रिलोकीमें सबसे अधिक रूपवान् हैं, सबके स्तुत्य हैं, सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं तथा वाञ्छित फल देनेवाले हैं उन शरणप्रद और रागाश्रित हृदयमें रहनेवाले श्रीरघुनाथजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ४६ ॥
भवविपिनदवाग्निनामधेयं<br>भवमुखदैवतदैवतं दयालुम् ।<br>दनुजपतिसहस्रकोटिनाशं<br>रवितनयासदृशं हरिं प्रपद्ये ॥४७॥जिनका नाम संसाररूप वनके लिये दावानलके समान है, जो महादेव आदि देवताओंके भी पूज्य देव हैं तथा जो करोड़ों दानवेन्द्रोंका दलन करनेवाले और श्रीयमुनाजीके समान श्यामवर्ण हैं उन दयामय श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ ॥४७॥
अविरतभवभावनातिदूरं<br>भवविमुखैर्मुनिभिः सदैव दृश्यम् ।<br>भवजलधिसुतारणाङ्घ्रिपोतं<br>शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥४८॥जो संसारमें निरन्तर वासना रखनेवालोंसे अत्यन्त दूर हैं और संसारसे उपराम मुनिजनोंके सदैव दृष्टिगोचर रहते हैं तथा जिनके चरणरूप पोत (जहाज) संसारसागरसे पार करनेवाले हैं उन रघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४८ ॥
गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं<br>गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम् ।<br>सुरवरदनुजेन्द्रसेविताङ्घ्रिं<br>सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥४९॥जो श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन-मन्दिरमें निवास करते हैं, जिनकी लीलाएँ अति मनोहारिणी हैं तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरण-कमलोंकी सेवा करते हैं उन गिरिवरधारी सुरवरदायक रघुनायककी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४९ ॥
परधनपरदारवर्जितानां<br>परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् ।<br>परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं<br>रघुवरमम्बुजलोचनं प्रपद्ये ॥५०॥जो परधन और परस्त्रीसे सदा दूर रहते हैं तथा पराये गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं उन निरन्तर परोपकार-परायण महात्माओंसे सुसेवित कमलनयन श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५० ॥
स्मितरुचिरविकासिताननाब्ज-<br>मतिसुलभं सुरराजनीलनीलम् ।<br>सितजलरुहचारुनेत्रशोभं<br>रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये ॥५१॥जिनका मुखकमल मनोहर मुसकानसे सुशोभित हो रहा है, जो भक्तोंके लिये अति सुलभ हैं, जिनके शरीरकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान सुन्दर नीलवर्ण है; तथा जिनके मनोहर नेत्र श्वेत कमलकी-सी शोभावाले हैं उन महादेवजीके परम गुरु श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५१ ॥
हरिकमलजशम्भुरूपभेदा-<br>त्त्वमिह विभासि गुणत्रयानुवृत्तः ।हे प्रभो ! जलसे भरे हुए पात्रोंमें जैसे एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणोंकी वृत्तिके कारण

अरण्यकाण्ड - सर्ग ९: कबन्धोद्धार

१४०अध्यात्मरामायण[सर्ग ९
रविरिव जलपूरितोदपात्रे- <br>   ष्वामरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे ॥५२॥आप ही विष्णु, ब्रह्मा और महादेवके रूपसे भासित होते हैं। हे ईश ! आप देवराज इन्द्रकी भी स्तुतिके पात्र हैं, मैं आपकी स्तुति करता हूँ ॥ ५२ ॥
रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्गं <br>   शतपथगोचरभावनाविदूरम् । <br> यतिपतिहृदये सदा विभातं <br>   रघुपतिमार्तिहरं प्रभुं प्रपद्ये ॥५३॥आपका दिव्य शरीर करोड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर है, सैकड़ों मार्गोंमें फँसे हुए लोगोंसे आप अत्यन्त दूर हैं और योगिराजोंके हृदयमें आप सदा ही भासमान हैं। ऐसे आप आर्तिहर प्रभु रघुपतिकी मैं शरण लेता हूँ” ॥ ५३ ॥
इत्येवं स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः । <br> उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्णोः परं पदम् ॥५४॥जटायुके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरघुनाथजी उसपर प्रसन्न होकर बोले, “जटायो ! तुम्हारा कल्याण हो तुम मेरे परमधाम विष्णुलोकको जाओ ॥ ५४ ॥
शृणोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत् । <br> स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥५५॥जो पुरुष मेरे इस स्तोत्रको एकाग्रचित्तसे सुनता, लिखता अथवा पढ़ता है वह मेरा सारूप्य-पद प्राप्त करता है और मरते समय उसे मेरा स्मरण होता है” ॥५५॥
इति राघवभाषितं तदा <br>   श्रुतवान् हर्षसमाकुलो द्विजः । <br> रघुनन्दनसाम्यमास्थितः <br>   प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं पदम् ॥५६॥पक्षिराज जटायुने रघुनाथजीका यह कथन बड़े हर्षसे सुना और उन्हींके समान रूप धारण कर ब्रह्मा आदि लोकपालोंसे पूजित परमधामको चला गया ॥ ५६ ॥
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इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

नवम सर्ग

कबन्धोद्धार ।

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श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
ततो रामो लक्ष्मणेन जगाम विपिनान्तरम् । <br> पुनर्दुःखं समाश्रित्य सीतान्वेषणतत्परः ॥ १ ॥हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी दुःखित-चित्तसे सीताजीको खोजते हुए लक्ष्मणजीके साथ दूसरे वनको गये ॥ १ ॥
तत्राद्भुतसमाकारो राक्षसः प्रत्यदृश्यत । <br> वक्षस्येव महावक्त्रश्चक्षुरादिविवर्जितः ॥ २ ॥वहाँ उन्होंने एक बड़े ही विचित्र आकारका राक्षस देखा, जिसके वक्षःस्थलमें ही नेत्रादिसे रहित एक बड़ा भारी मुख था ॥ २ ॥
बाहू योजनमात्रेण व्यापृतौ तस्य रक्षसः । <br> कबन्धो नाम दैत्येन्द्रः सर्वसत्वविहिंसकः ॥ ३ ॥इस राक्षसकी भुजाएँ एक-एक योजन-तक फैली हुई थीं। यह सम्पूर्ण प्राणियोंकी हिंसा करनेवाला 'कबन्ध' नामक दैत्यराज था ॥ ३ ॥
तद्बाहोर्मध्यदेशे तौ चरन्तौ रामलक्ष्मणौ । <br> ददर्शतुर्महासत्वं तद्बाहुपरिवेष्टितौ ॥ ४ ॥उसकी भुजाओंके बीचमें चलते हुए उनसे घिरे हुए राम और लक्ष्मणने उस महाबलवान् राक्षसको देखा ॥ ४ ॥
रामः प्रोवाच विहसन्पश्य लक्ष्मण राक्षसम् ।तब रामचन्द्रजीने हँसते हुए कहा—“लक्ष्मण !

सर्ग ९ ] अरण्यकाण्ड १४१

शिरःपादविहीनोऽयं यस्य वक्षसि चाननम् ॥ ५ ॥<br>बाहुभ्यां लभ्यते यद्यत्तत्तद्भक्षन् स्थितो ध्रुवम् ।<br>आवामप्येतयोर्बाह्वोर्मध्ये सङ्कलितौ ध्रुवम् ॥ ६ ॥<br>गन्तुमन्यत्र मार्गो न दृश्यते रघुनन्दन ।<br>किं कर्तव्यमितोऽस्माभिरिदानीं भक्षयेत्स नौ ॥७॥<br>लक्ष्मणस्तमुवाचेदं किं विचारेण राघव ।<br>आवामेकैकमन्यग्रौ छिन्द्यावास्य भुजौ ध्रुवम् ॥८॥<br>तथेति रामः खड्गेन भुजं दक्षिणमाच्छिनत् ।<br>तथैव लक्ष्मणो वामं चिच्छेद भुजमञ्जसा ॥ ९ ॥<br>ततोऽतिविस्मितो दैत्यः कौ युवां सुरपुङ्गवौ ।<br>मद्वाहुच्छेदकौ लोके दिवि देवेषु वा कुतः ॥१०॥इस राक्षसको देखो; यह शिर-पैरसे रहित है और इसकी छातीमें ही मुँह है ॥ ५ ॥ अपनी भुजाओंसे ही इसे जो कुछ मिल जाता है उसीको खाकर यह जीवित रहता है। हम भी निश्चय ही इसकी भुजाओंके बीचमें फँस गये हैं ॥ ६ ॥ हे रघुनन्दन ! इनके चंगुलमेंसे निकलनेका हमें कोई मार्ग दिखायी नहीं देता; अब हमें क्या करना चाहिये ? (जल्दी विचार करो नहीं तो) यह हमें अभी खा जायगा" ॥ ७ ॥<br>लक्ष्मणजीने कहा—"हे राघव ! इसमें अधिक विचारनेकी क्या बात है ? हम दोनों सावधान होकर अभी इसकी एक-एक भुजा काट डालें" ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजीने कहा 'बहुत ठीक', और खड्ग निकालकर उसकी दायीं भुजा काट डाली। वैसे ही लक्ष्मणजीने भी तुरन्त ही उसकी बायीं भुजा उड़ा दी ॥ ९ ॥<br>तब उस दैत्यराजने अति विस्मयपूर्वक कहा—"मेरी भुजाओंको काटनेवाले तुम कौन देवश्रेष्ठ हो ? इस लोकमें अथवा स्वर्गवासी देवताओंमें भी कोई ऐसा (समर्थ) होना सम्भव नहीं" ॥ १० ॥
ततोऽब्रवीद्धसन्नेव रामो राजीवलोचनः ।<br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथो महान् ११<br>रामोऽहं तस्य पुत्रोऽसौ भ्राता मे लक्ष्मणः सुधीः ।<br>मम भार्या जनकजा सीता त्रैलोक्यसुन्दरी ॥१२॥<br>आवां मृगयया यातौ तदा केनापि रक्षसा ।<br>नीतां सीतां विचिन्वन्तौ चागतौ घोरकानने ॥१३॥<br>बाहुभ्यां वेष्टितावत्र तव प्राणरिरक्षया ।<br>छिन्नौ तव भुजौ त्वं च को वा विकटरूपधृक् ॥१४॥इसपर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीने हँसते हुए कहा—"श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्याके स्वामी थे ॥ ११ ॥ मैं उन्हींका पुत्र 'राम' हूँ और यह बुद्धिमान् मेरा छोटा भाई 'लक्ष्मण' है तथा त्रैलोक्यसुन्दरी जनकनन्दिनी सीता मेरी भार्या है ॥ १२ ॥ हम मृगया (शिकार) के लिये बाहर गये हुए थे कि किसी राक्षसने सीताको चुरा लिया, उसीको ढूँढ़ते हुए हम यहाँ इस घोर वनमें आ गये। इतनेहीमें तुमने हमें अपनी भुजाओंसे घेर लिया। तब हमने अपने प्राण बचानेके लिये तुम्हारी भुजाएँ काट डालीं। अब यह बताओ—ऐसे विकट रूपवाले तुम कौन हो ? ॥ १३-१४ ॥
कबन्व उवाच<br>धन्योऽहं यदि रामस्त्वमागतोऽसि ममान्तिकम् ।<br>पुरा गन्धर्वराजोऽहं रूपयौवनदर्पितः ॥१५॥<br>विचरँल्लोकमखिलं वरनारीमनोहरः ।कबन्धनें कहा—"हे राम ! यदि आज आप स्वयं मेरे पास आये हैं तो मैं धन्य हूँ। पूर्वकालमें मैं रूप और यौवनके मदसे उन्मत्त एक गन्धर्वराज था ॥ १५ ॥ हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मैंने तपस्याद्वारा ब्रह्माजीसे अवध्यता (किसीसे भी न मारे जा सकनेकी योग्यता) प्राप्त कर ली थी और मैं अपनी रूपकान्तिसे सुन्दर
१४२अध्यात्मरामायण[सर्ग ९

तपसा ब्रह्मणो लब्धमवध्यत्वं रघूत्तम ॥१६॥
अष्टावक्रं मुनिं दृष्ट्वा कदाचिदहसं पुरा ।
क्रुद्धोऽसावाह दुष्ट त्वं राक्षसो भव दुर्मते ॥१७॥
अष्टावक्रः पुनः प्राह वन्दितो मे दयापरः ।
शापस्यान्तं च मे प्राह तपसा द्योतितप्रभः ॥१८॥
त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणः स्वयम् ।
आगमिष्यति ते वाहू च्छेद्येते योजनायतौ ॥१९॥
तेन शापाद्विनिर्मुक्तो भविष्यसि यथा पुरा ।
इति शप्तोऽहमद्राक्षं राक्षसीं तनुमात्मनः॥२०॥
कदाचिद्देवराजानमभ्याद्रवमहं रुषा ।
सोऽपि वज्रेण मां राम शिरोदेशेऽभ्यताडयत् ॥२१॥
तदा शिरो गतं कुक्षिं पादौ च रघुनन्दन ।
ब्रह्मदत्तवरान्मृत्युर्नाभून्मे वज्रताडनात् ॥२२॥
मुखाभावे कथं जीवेदियमित्ममराधिपम् ।
ऊचुः सर्वे दयाविष्टा मां विलोक्यास्यवर्जितम् २३
ततो मां प्राह मघवा जठरे ते मुखं भवेत् ।
वाहू ते योजनायामौ भविष्यत इतो व्रज ॥२४॥
इत्युक्तोऽत्र वसन्नित्यं बाहुभ्यां वनगोचरान् ।
भक्षयाम्यधुना वाहू खण्डितौ मे त्वयाऽनघ ॥२५॥
इतःपरं मां श्वभ्रास्ये निक्षिप्याग्नीन्धनावृते ।
अग्निना दह्यमानोऽहं त्वया रघुकुलोत्तम ॥२६॥
पूर्वरूपमनुप्राप्य भार्यामार्गं वदामि ते ।
इत्युक्ते लक्ष्मणेनाशु श्वभ्रं निर्माय तत्र तम् ॥२७॥
निक्षिप्य प्रादहत्काष्ठैस्ततो देहात्समुत्थितः ।
कन्दर्पसदृशाकारः सर्वाभरणभूषितः ॥२८॥
रामं प्रदक्षिणं कृत्वा साष्टाङ्गं प्रणिपत्य च ।

स्त्रियोंके चित्तोंको चुराता हुआ सम्पूर्ण लोकोंमें भ्रमा करता था ॥ १६ ॥ एक बार अष्टावक्र मुनिको देखकर मैं हँस पड़ा, अतः उन्होंने क्रोधित होकर कहा— "अरे दुर्बुद्धे ! तू बड़ा दुष्ट है, अतः तू राक्षस हो जा" ॥ १७ ॥ उनके शापसे भयभीत होकर जब मैंने उनकी बहुत कुछ अनुनय-विनय की तो तपके कारण परम तेजस्वी उन दयालु मुनीश्वरने मेरे शापका अन्त इस प्रकार बताया ॥ १८ ॥ वे बोले, "त्रेतायुगमें स्वयं नारायण दशरथके यहाँ अवतार लेकर तेरे पास आयेंगे और वे तेरी एक-एक योजन लम्बी भुजाओंको काट डालेंगे ॥ १९ ॥ तब तू शापसे छूटकर अपना पूर्वरूप धारण करेगा।" उनके इस प्रकार शाप देनेसे मैंने अपनेको राक्षसरूपमें देखा ॥ २० ॥

एक बार मैं रोषपूर्वक देवराज इन्द्रके पीछे दौड़ा। तब उसने क्रोधित होकर मेरे शिरपर अपना वज्र मारा ॥ २१ ॥ हे रघुनन्दन ! उस वज्रके आघातसे मेरे शिर और पैर पेटमें घुस गये किन्तु ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे मैं मरा नहीं ॥ २२ ॥ मुझे मुखहीन देखकर समस्त देवताओंने दयावश हो देवराजसे कहा— "यह बिना मुखके कैसे जीवित रह सकेगा ?" ॥ २३ ॥ तब इन्द्रने मुझसे कहा— "तेरे पेटमें ही मुख होगा और तेरी भुजाएँ एक-एक योजन लम्बी हो जायँगी, अब तू यहाँसे चला जा" ॥ २४ ॥ इन्द्रके ऐसा कहनेपर मैं यहीं रहकर नित्यप्रति अपनी भुजाओंसे वनके जीवोंको खींचकर खाता रहा हूँ। हे अनघ ! अब उन भुजाओंको आपने काट डाला ॥ २५ ॥ हे रघुकुलश्रेष्ठ ! अब आप मुझे एक अग्नि और ईंधनसे युक्त गड्ढेमें डाल दीजिये । आपके द्वारा अग्निसे दग्ध होनेपर अपना पूर्वरूप धारण कर मैं आपकी भार्याका पता बताऊँगा ।

उसके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे तुरन्त ही एक बड़ा गड्ढा तैयार कराया और उसे उसमें डालकर लकड़ियोंसे जला दिया। तब उसके शरीरसे एक सर्वालंकारविभूषित कामदेवके समान अति सुन्दर पुरुष प्रकट हुआ ॥ २६–२८ ॥ उसने रामचन्द्रजीकी परिक्रमा कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिसे

सर्ग ९ ]अरण्यकाण्ड१४३

कृताञ्जलिरुवाचेदं भक्तिगद्गदया गिरा ॥२९॥गद्गद-कण्ठ हो हाथ जोड़कर कहने लगा ॥ २९ ॥
गन्धर्व उवाच**गन्धर्व बोला—**हे राम ! आप अनन्त, आदि-अन्तसे रहित और मन-वाणीके अविषय हैं; तथापि आज मेरा मन आपकी स्तुति करनेको बड़े वेगसे उत्सुक हो रहा है ॥ ३० ॥ हे प्रभो ! आपके स्थूल और सूक्ष्म रूप (विराट् और हिरण्यगर्भ) से आपका वास्तविक ज्ञानस्वरूप अति सूक्ष्म और अदृश्य है । उससे अतिरिक्त जो कुछ है वह जड दृश्य और अनात्मा है । अतः आपसे भिन्न यह जड मन आपको कैसे जान सकता है ? बुद्धि और चिदाभासका अन्योन्याध्यासरूप ऐक्य ही जीव कहलाता है । इन बुद्धि आदि सबका साक्षी ब्रह्म ही है; वह मन-वाणी आदि किसीका भी विषय नहीं है, उसी निर्विकार सर्वात्मामें अज्ञानवश इस सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को आरोपित किया जाता है । हे राम ! आपका सूक्ष्म रूप हिरण्यगर्भ और स्थूल रूप विराट् कहलाता है । आपका भावनामय सूक्ष्म रूप जिसमें भूत, भविष्यत् और वर्तमान यह सम्पूर्ण जगत् दीख पड़ता है अपने ध्यान करनेवालोंका मंगल करनेवाला है ॥ ३१–३४ ॥ (एकसे एक दशगुण) महत्तत्त्वादि सात आवरणोंसे घिरे हुए आपके स्थूल ब्रह्माण्डशरीरमें ही धारणाका आश्रयरूप विराट् शरीर स्थित है ॥ ३५ ॥ आप ही एकमात्र मोक्षरूप हैं । सम्पूर्ण लोक आपहीके अवयव हैं । पाताल आपका चरणतल (तलुआ) है, महातल ऐँड़ी है ॥ ३६ ॥ हे राम ! रसातल गुल्फ (टखने) हैं, तलातल जानु हैं तथा सुतल और वितल आपकी जंघाएँ हैं ॥ ३७ ॥ अतलं और भूर्लोक आपकी जंघाओंके नीचे और ऊपरके भाग हैं, भुवर्लोक नाभि है, स्वर्लोक वक्षःस्थल है तथा महर्लोक आपकी ग्रीवा है ॥ ३८ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! जनःलोक आपका मुख है, तपःलोक ललाट है तथा हे प्रभो ! सत्यलोक आपका मस्तक है ॥ ३९ ॥ हे राम ! इन्द्रादि लोकपालगण आपकी भुजाएँ हैं, दिशाएँ कर्ण हैं, अश्विनीकुमार नासिका हैं और अग्नि आपका मुख बताया गया है ॥ ४० ॥ हे राम ! सूर्य आपके नेत्र हैं, चन्द्रमा मन है, काल भ्रूभंगी है और बृहस्पतिजी आपकी बुद्धि हैं ॥ ४१ ॥ रुद्र
स्तोतुमुत्सहते मेऽद्य मनो रामातिसम्भ्रमात् ।<br>त्वामनन्तमनाद्यन्तं मनोवाचामगोचरम् ॥३०॥
सूक्ष्मं ते रूपमव्यक्तं देहद्वयविलक्षणम् ।<br>दृग्रूपमितरत्सर्वं दृश्यं जडमनात्मकम् ।<br>तत्कथं त्वां विजानीयाद्व्यतिरिक्तं मनः प्रभो ३१
बुद्ध्यात्माभासयोरैक्यं जीव इत्यभिधीयते ।<br>बुद्ध्यादिसाक्षी ब्रह्मैव तस्मिन्निर्विषयेऽखिलम् ३२
आरोप्यतेऽज्ञानवशान्निर्विकारेऽखिलात्मनि ।<br>हिरण्यगर्भस्ते सूक्ष्मं देहं स्थूलं विराट् स्मृतम् ॥३३॥
भावनाविषयो राम सूक्ष्मं ते ध्यातृमङ्गलम् ।<br>भूतं भव्यं भविष्यच्च यत्रेदं दृश्यते जगत् ॥३४॥
स्थूलेऽण्डकोशे देहे ते महदादिभिरावृते ।<br>सप्तभिरुत्तरगुणैर्विराजो धारणाश्रयः ॥३५॥
त्वमेव सर्वकैवल्यं लोकास्तेऽवयवाः स्मृताः ।<br>पातालं ते पादमूलं पाष्णिस्तव महातलम् ॥३६॥
रसातलं ते गुल्फौ तु तलातलमितीर्यते ।<br>जानुनी सुतलं राम ऊरू ते वितलं तथा ॥३७॥
अतलं च मही राम जघनं नाभिंगं नभः ।<br>उरःस्थलं ते ज्योतींषि ग्रीवा ते मह उच्यते ॥३८॥
वदनं जनलोकस्ते तपस्ते शङ्खदेशगम् ।<br>सत्यलोको रघुश्रेष्ठ शीर्षण्यास्ते सदा प्रभो ॥३९॥
इन्द्रादयो लोकपाला बाहवस्ते दिशः श्रुती ।<br>अश्विनौ नासिके राम वक्त्रं तेऽग्निरुदाहृतः ॥४०॥
चक्षुस्ते सविता राम मनश्चन्द्र उदाहृतः ।<br>भ्रूभङ्ग एव कालस्ते बुद्धिस्ते वाक्पतिर्भवेत् ॥४१॥
१४४अध्यात्मरामायण[सर्ग ९

रुद्रोऽहङ्काररूपस्ते वाचश्छन्दांसि तेऽव्यय ।<br>यमस्ते दंष्ट्रदेशस्थो नक्षत्राणि द्विजालयः ॥४२॥आपका अहंकार है, वेद आपकी अविनाशी वाणी है, यम आपकी दाढ़ें हैं और नक्षत्रगण आपकी दन्तावलि है ॥४२॥
हासो मोहकरी माया सृष्टिस्तेऽपाङ्गमोक्षणम् ।<br>धर्मः पुरस्तेऽधर्मश्च पृष्ठभाग उदीरितः ॥४३॥सबको मोहित करनेवाली माया आपका हास्य है, सृष्टि आपका कटाक्ष है, धर्म आपका आगेका भाग है और अधर्म पीठिका भाग है ॥४३॥
निमिषोन्मेषणे रात्रिर्दिवा चैव रघूत्तम ।<br>समुद्राः सप्त ते कुक्षिर्नाड्यो नद्यस्तव प्रभो ॥४४॥हे रघूत्तम ! रात्रि और दिन आपके निमेषोन्मेष हैं, हे प्रभो ! सातों समुद्र आपकी कुक्षि और नदियाँ नाड़ियाँ हैं ॥४४॥
रोमाणि वृक्षौषधयो रेतो वृष्टिस्तव प्रभो ।<br>महिमा ज्ञानशक्तिस्ते एवं स्थूलं वपुस्तव ॥४५॥हे प्रभो ! वृक्ष और ओषधियाँ आपके रोम, वृष्टि आपका वीर्य और ज्ञानशक्ति आपकी महिमा है। यही आपका स्थूल शरीर है ॥४५॥
यदस्मिन् स्थूलरूपे ते मनः सन्धार्यते नरैः ।<br>अनायासेन मुक्तिः स्यादतोऽन्यन्नहि किञ्चन ॥४६॥यदि पुरुष आपके इस स्थूल शरीरमें मन स्थिर करें तो वह अनायास ही मुक्त हो जाता है। हे राम ! आपके इस स्थूल रूपसे पृथक् और कोई पदार्थ नहीं है ॥४६॥
अतोऽहं राम रूपं ते स्थूलमेवानुभावये ।<br>यस्मिन्ध्याते प्रेमरसः सरोमपुलको भवेत् ॥४७॥अतः हे राम ! मैं आपके उस स्थूल रूपका ही सदा चिन्तन करता हूँ जिसके ध्यानमात्रसे ही शरीरमें रोमाञ्चके सहित मनुष्यके हृदयमें प्रेम-रसका सञ्चार हो जाता है ॥४७॥
तदैव मुक्तिः स्याद्राम यदा ते स्थूलभावकः ।<br>तदप्यास्तां तथैवाहमेतद्रूपं विचिन्तये ॥४८॥हे राम ! जब यह जीव आपके विराट् रूपका चिन्तन करता है तो तत्काल ही उसकी मुक्ति हो जाती है तो भी मुझे उसकी आवश्यकता नहीं। मैं तो आपके इस रामरूपका ही चिन्तन करूँगा ॥४८॥
धनुर्बाणधरं श्यामं जटावल्कलभूषितम् ।<br>अपीच्यवयसं सीतां विचिन्वन्तं सलक्ष्मणम् ॥४९॥<br>इदमेव सदा मे स्यान्मानसे रघुनन्दन ।<br>सर्वज्ञः शङ्करः साक्षात्पार्वत्या सहितः सदा ॥५०॥<br>त्वद्रूपमेवं सततं ध्यायन्नास्ते रघूत्तम ।<br>मुमूर्षूणां तदा काश्यां तारकं ब्रह्मवाचकम् ॥५१॥<br>रामरामेत्युपदिशन्सदा सन्तुष्टमानसः ।<br>अतस्त्वं जानकीनाथ परमात्मा सुनिश्चितः ॥५२॥हे रघुनन्दन ! (मेरी यही प्रार्थना है कि) लक्ष्मणजीके सहित सीताको खोजता हुआ आपका यह जटा-वल्कल-विभूषित धनुषबाणधारी अति सुन्दर सुकुमार श्याम शरीर सदा मेरे मनमें विराजमान रहे। हे रघुश्रेष्ठ ! आपके इस दिव्य रूपका पार्वतीजीके सहित सर्वज्ञ श्रीशंकरभगवान् सर्वदा चिन्तन किया करते हैं और काशीमें मरनेवालोंको ब्रह्मवाचक रामनाम-रूप तारक-मन्त्रका उपदेश करते हुए सदा अति आनन्दमें मग्न रहते हैं। अतः हे जानकीनाथ ! आप निश्चय ही परमात्मा हैं ॥४९-५२॥
सर्वे ते मायया मूढास्त्वां न जानन्ति तत्त्वतः ।<br>नमस्ते रामभद्राय वेधसे परमात्मने ॥५३॥आपकी मायासे मोहित होनेके कारण सब लोग आपका वास्तविक स्वरूप नहीं जानते। हे संसारकी रचना करनेवाले परमात्मा राम ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥५३॥
अयोध्याधिपते तुभ्यं नमः सौमित्रिसेवित ।<br>त्राहि त्राहि जगन्नाथ मां माया नावृतोणुतु ते ॥५४॥हे सौमित्रिसेवित अयोध्यानाथ ! आपको नमस्कार है। हे जगन्नाथ ! आप मेरी रक्षा कीजिये, आपकी माया मुझे मोहित न करे ॥५४॥

अरण्यकाण्ड - सर्ग १०: शबरीसे भेंट

सर्ग १० ]अरण्यकाण्ड१४५

श्रीराम उवाच**श्रीरामचन्द्रजी बोले—**हे देवगन्धर्व ! मैं तुम्हारी
तुष्टोऽहं देवगन्धर्व भक्त्या स्तुत्या च तेऽनघ।<br>याहि मे परमं स्थानं योगिगम्यं सनातनम् ॥५५॥भक्ति और स्तुतिसे अति सन्तुष्ट हूँ । हे अनघ ! तुम योगियोंके प्राप्त करनेयोग्य मेरे सनातन परमधामको जाओ ॥ ५५ ॥
जपन्ति ये नित्यमनन्यबुद्ध्या<br>भक्त्या त्वदुक्तं स्तवमागमोक्तम्।<br>तेऽज्ञानसम्भूतभवं विहाय<br>मां यान्ति नित्यानुभवानुमेयम् ॥५६॥जो लोग तुम्हारे इस शास्त्रोक्त स्तोत्रका अनन्य बुद्धिसे नित्य भक्ति-पूर्वक जप करेंगे वे अन्तमें अज्ञानजन्य संसारसे मुक्त होकर मुझ नित्यानुभवरूप परमात्माको प्राप्त करेंगे ॥ ५६ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


दशम सर्ग

शबरीसे भेंट।

श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! (भगवान् रामसे)
लब्ध्वा वरं स गन्धर्वः प्रयास्यन् राममब्रवीत् ।<br>शबर्यास्ते पुरोभागे आश्रमे रघुनन्दन ॥ १ ॥वर पाकर (उनके परमधामको) जाते हुए उस गन्धर्व राजने कहा—"हे रघुनन्दन ! सामनेवाले आश्रममें शबरी रहती है।
भक्त्या त्वत्पादकमले भक्तिमार्गविशारदा ।<br>तां प्रयाहि महाभाग सर्वं ते कथयिष्यति ॥ २ ॥वह आपके चरण-कमलोंमें अति अनुराग रखनेके कारण भक्ति-मार्गमें कुशल है। हे महाभाग ! आप वहाँ पधारिये। वह आपको (सीताजी-के सम्बन्धमें ) सब बातें बता देगी" ॥ १-२ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ सोऽपि विमानेनार्कवर्चसा ।<br>विष्णोः पदं रामनामस्मरणे फलमीदृशम् ॥ ३ ॥ऐसा कहकर वह एक सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर विष्णुलोकको चला गया । सच है, राम-नाम-स्मरणका फल ऐसा ही है ॥ ३ ॥
त्यक्त्वा तद्विपिनं घोरं सिंहव्याघ्रादिदूषितम् ।<br>शनैरथाश्रमपदं शबर्या रघुनन्दनः ॥ ४ ॥तदनन्तर सिंह, व्याघ्रादिसे दूषित उस घोर वनको छोड़कर श्रीरघुनाथजी धीरे-धीरे शबरीके आश्रमपर पहुँचे ॥ ४ ॥
शबरी राममालोक्य लक्ष्मणेन समन्वितम् ।<br>आयान्तमारार्द्धूपेण प्रत्युत्थायाचिरेण सा ॥ ५ ॥लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीको समीप ही आते देख शबरी अत्यन्त हर्षसे तुरन्त उठ खड़ी हुई ॥ ५ ॥
पतित्वा पादयोरग्रे हर्षपूर्णाश्रुलोचना ।<br>स्वागतेनाभिनन्द्याथ खासने संन्यवेशयत् ॥६॥उसके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर आये और वह भगवान् रामके चरणोंमें गिर पड़ी तथा उनका स्वागत कर कुशल-प्रश्नादिके अनन्तर उन्हें सुन्दर आसनपर बैठाया ॥ ६ ॥
रामलक्ष्मणयोः सम्यक्पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः ।<br>तज्जलेनाभिषिच्याङ्गमथार्घ्यादिभिरादृता ॥७॥तदनन्तर अत्यन्त भक्तिसे श्रीराम और लक्ष्मणके चरण अच्छी प्रकार धोये और उस चरणोदकको अपने अङ्गोंपर छिड़क-कर अर्ध्यादिसे भगवान्‌का सत्कार किया ॥ ७ ॥ फिर

१४६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १०


सम्पूज्य विधिवद्रामं ससौमित्रिं सपर्यया ।<br>सङ्गृहीतानि दिव्यानि रामार्थं शबरी मुदा ॥८॥<br>फलान्यमृतकल्पानि ददौ रामाय भक्तितः ।<br>पादौ सम्पूज्य कुसुमैः सुगन्धैः सानुलेपनैः ॥९॥विविध सामग्रियोंसे राम और लक्ष्मणका विधिवत् पूजन-कर जो अमृतके समान दिव्य फल उसने श्रीरामचन्द्रजीके लिये इकट्ठे कर रखे थे वे अत्यन्त हर्षसे लाकर उन्हें दिये और उनके चरण-कमलोंका सुगन्धित पुष्प और चन्दन आदिसे पूजन किया ॥ ८-९ ॥
कृतातिथ्यं रघुश्रेष्ठमुपविष्टं सहानुजम् ।<br>शबरी भक्तिसम्पन्ना प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥१०॥इसप्रकार आतिथ्य-सत्कार हो चुकनेपर जब श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके सहित आसनपर विराजमान थे, शबरीने भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर कहा— ॥ १०॥
अत्राश्रमे रघुश्रेष्ठ गुरवो मे महर्षयः ।<br>स्थिताः शुश्रूषणं तेषां कुर्वती समुपस्थिता ॥११॥<br>बहुवर्षसहस्राणि गतास्ते ब्रह्मणः पदम् ।<br>गमिष्यन्तोऽब्रुवन्मां त्वं वसात्रैव समाहिता ॥१२॥<br>रामो दाशरथिर्जातः परमात्मा सनातनः ।<br>राक्षसानां वधार्थाय ऋषीणां रक्षणाय च ॥१३॥<br>आगमिष्यति सैकाग्रध्यानानिष्ठा स्थिरा भव ।<br>इदानीं चित्रकूटार्द्रावाश्रमे वसति प्रभुः ॥१४॥<br>यावदागमनं तस्य तावद्रक्ष कलेवरम् ।<br>दृष्ट्वैव राघवं दग्ध्वा देहं यास्यसि तत्पदम् ॥१५॥"हे रघुश्रेष्ठ ! इस आश्रममें पहले मेरे गुरु महर्षि ( मतंग ) रहा करते थे; मैं उनकी सेवा-शुश्रूषा करती हुई यहाँ हज़ारों वर्षोंसे रहती हूँ। अब वे महर्षिश्रेष्ठ ब्रह्मलोकको चले गये हैं। जाते समय उन्होंने मुझसे कहा था कि तू एकाग्रचित्त होकर यहीं रह ॥ ११-१२ ॥ सनातन परमात्माने राक्षसोंको मारने और ऋषियोंकी रक्षा करनेके लिये राजा दशरथके पुत्र रामरूपसे अवतार लिया है ॥ १३ ॥ वे (शीघ्र ही) यहाँ आयेंगे। तू एकाग्र-चित्तसे उनका ध्यान करती हुई यहाँ रह। आजकल भगवान् रामजी चित्रकूट पर्वतके आश्रममें विराजमान हैं ॥ १४ ॥ जबतक वे आवें तबतक तू अपने शरीरका पालन कर। रघुनाथजीके आनेपर उनका दर्शन करते हुए इस शरीरको जलाकर तू उनके परमधामको चली जायगी ॥ १५ ॥
तथैवाकरवं राम त्वद्ध्यानैकपरायणा ।<br>प्रतीक्ष्यागमनं तेऽद्य सफलं गुरुभाषितम् ॥१६॥हे राम ! गुरुजीके कथनानुसार मैं तभीसे आपका ध्यान करती हुई आपके आनेकी बाट देख रही थी। आज गुरुजीका वह वाक्य सफल हो गया ॥ १६ ॥
तव सन्दर्शनं राम गुरूणामपि मे नहि ।<br>योषिन्मूढाऽप्रमेयात्मन् हीनजातिसमुद्भवा ॥१७॥हे राम ! आपका दर्शन तो मेरे गुरुदेवको भी नहीं हुआ। फिर हे अप्रमेयात्मन् ! मैं तो नीच-जातिमें उत्पन्न हुई एक गँवारी नारी ही हूँ ! मेरी तो बात ही क्या है ? ॥ १७ ॥
तव दासस्य दासानां शतसङ्ख्योत्तरस्य वा ।<br>दासीत्वे नाधिकारोऽस्ति कुतः साक्षात्तवैव हि ॥१८॥जो आपके दासोंके दास हैं उनके भी जो उत्तरोत्तर सैकड़ों दासानुदास हैं मैं तो उनकी दासी होनेकी भी अधिकारिणी नहीं हूँ; फिर साक्षात् आपकी दासी कहलानेका तो मेरा मुँह ही कहाँ है ? ॥ १८ ॥
कथं रामाद्य मे दृष्टस्त्वं मनोवागगोचरः ।<br>स्तोतुं न जाने देवेश किं करोमि प्रसीद मे ॥१९॥हे राम ! आप तो मन या वाणीके विषय नहीं हैं फिर न जाने आज मुझे आपका दर्शन कैसे हो गया। हे देवेश्वर ! मैं आपकी स्तुति करना नहीं जानती। अब मैं क्या करूँ? प्रभो ! आप स्वयं ही (अपनी दयालुतासे) मुझपर प्रसन्न होइये" ॥ १९ ॥

सर्ग १० ] अरण्यकाण्ड १४७


श्रीराम उवाचश्रीरामचन्द्रजी बोले—पुरुषत्व-स्त्रीत्वका भेद अथवा
पुंस्त्वे स्त्रीत्वे विशेषो वा जातिनामाश्रमादयः ।जाति, नाम और आश्रम—ये कोई भी मेरे भजन-
न कारणं मद्भजने भक्तिरेव हि कारणम् ॥२०॥के कारण नहीं हैं। उसका कारण तो एकमात्र मेरी भक्ति ही है ॥२०॥ जो मेरी भक्तिसे विमुख हैं वे
यज्ञदानतपोभिर्वा वेदाध्ययनकर्मभिः ।यज्ञ, दान, तप अथवा वेदाध्ययन आदि किसी भी कर्मसे
नैवं द्रष्टुमंहं शक्यो मद्भक्तिविमुखैः सदा ॥२१॥मुझे कभी नहीं देख सकते ॥२१॥ अतः हे भामिनि ! मैं संक्षेपसे अपनी भक्तिके साधनोंका वर्णन
तस्माद्भाभिनि सङ्क्षेपाद्वक्ष्येऽहं भक्तिसाधनम् ।करता हूँ। उनमें पहला साधन तो सत्सङ्ग ही है
सतां सङ्गतिरेवात्र साधनं प्रथमं स्मृतम् ॥२२॥॥२२॥ मेरे जन्म-कर्मोंकी कथाका कीर्तन करना
द्वितीयं मत्कथालापस्तृतीयं मद्गुणेरणम् ।दूसरा साधन है, मेरे गुणोंकी चर्चा करना—यह तीसरा उपाय है और (गीता-उपनिषदादि) मेरे वाक्योंकी
व्याख्यातृत्वं मद्वचसां चतुर्थं साधनं भवेत् ॥२३॥व्याख्या करना उसका चौथा साधन है ॥२३॥ हे
आचार्योपासनं भद्रे मद्बुद्ध्याऽमायया सदा ।भद्रे ! अपने गुरुदेवकी निष्कपट होकर भगवद्बुद्धिसे सेवा करना पाँचवाँ, पवित्र स्वभाव, यम-नियमादिका
पञ्चमं पुण्यशीलत्वं यमादि नियमादि च ॥२४॥पालन और मेरी पूजामें प्रेम होना छठा, तथा मेरे
निष्ठा मत्पूजने नित्यं षष्ठं साधनमीरितम् ।मन्त्रकी सांगोपांग उपासना करना सातवाँ साधन कहा
मम मन्त्रोपासकत्वं साङ्गं सप्तममुच्यते ॥२५॥जाता है ॥२४-२५॥ मेरे भक्तोंकी मुझसे भी अधिक पूजा करना, समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करना,
मद्भक्तेष्वधिका पूजा सर्वभूतेषु मन्मतिः ।बाह्य पदार्थोंमें आसक्त न होना और शम-दमादि-
वाह्यार्थेषु विरागित्वं शमादिसहितं तथा ॥२६॥सम्पन्न होना—यह मेरी भक्तिका आठवाँ साधन है तथा तत्त्व-विचार करना नवाँ है। हे भामिनि !
अष्टमं नवमं तत्त्वविचारो मम भामिनि ।इस प्रकार यह नौ प्रकारकी भक्ति है। हे शुभ-
एवं नवविधा भक्तिः साधनं यस्य कस्य वा ॥२७॥लक्षणे ! जिस किसीमें ये साधन होते हैं वह स्त्री, पुरुष अथवा पशु-पक्षी आदि कोई भी क्यों न हो उसमें प्रेम-
स्त्रियो वा पुरुषस्यापि तिर्यग्योनिगतस्य वा ।लक्षणा-भक्तिका आविर्भाव हो ही जाता है ॥२६-
भक्तिः सञ्जायते प्रेमलक्षणा शुभलक्षणे ॥२८॥२८॥ भक्तिके उत्पन्न होने मात्रसे ही मेरे स्वरूपका
भक्तौ सञ्जातमात्रायां मत्तत्त्वानुभवस्तदा ।अनुभव हो जाता है और जिसे मेरा अनुभव हो जाता है उसकी उसी जन्ममें निस्सन्देह मुक्ति हो जाती है
ममानुभवसिद्धस्य मुक्तिस्तत्रैव जन्मनि ॥२९॥अतः यह सिद्ध हुआ कि मोक्षका कारण भक्ति ही
स्यात्तस्मात्कारणं भक्तिर्मोक्षस्येति सुनिश्चितम् ।है। (भक्तिके उपरोक्त नौ साधनोंमेंसे) जिसमें पहला
प्रथमं साधनं यस्य भवेत्तस्य क्रमेण तु ॥३०॥साधन होता है उसमें क्रमशः ये सभी आ जाते हैं। तब फिर उसे भक्ति तथा मुक्तिका प्राप्त होना निश्चित
भवेत्सर्वं ततो भक्तिर्मुक्तिरेव सुनिश्चितम् ।ही है। तू मेरी भक्तिसे युक्त है इसीलिये मैं तेरे पास
यस्मान्मद्भक्तियुक्ता त्वं ततोऽहं त्वामुपस्थितः॥३१॥आया हूँ ॥२९-३१॥ अब, मेरा दर्शन होनेसे तेरी मुक्ति हो ही जायगी—इसमें सन्देह नहीं। यदि तुझे
इतो मदर्शनान्मुक्तिस्तव नास्त्यत्र संशयः ।पता हो तो बता इस समय कमललोचना सीता
यदि जानासि मे ब्रूहि सीता कमललोचना ॥३२॥कहाँ है। मेरी प्रियदर्शना प्रियाको कौन ले गया है ?
कुत्रास्ते केन वा नीता प्रिया मे प्रियदर्शना ॥३३॥॥३२-३३॥
१४८अध्यात्मरामायण[ सर्ग १०

शबर्युवाच देव जानासि सर्वज्ञ सर्वं त्वं विश्वभावन । तथाऽपि पृच्छसे यन्मां लोकानुसृतः प्रभो ॥३४॥ ततोऽहमभिधास्यामि सीता यत्राधुना स्थिता । रावणेन हृता सीता लङ्कायां वर्ततेऽधुना ॥३५॥ इतः समीपे रामास्ते पम्पानाम सरोवरम् । ऋष्यमूकगिरिर्नाम तत्समीपे महानगः ॥३६॥ चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं सुग्रीवो वानराधिपः । भीतभीतः सदा यत्र तिष्ठत्यतुलविक्रमः ॥३७॥ वालिनश्च भयाद्भ्रातुस्तदगम्यमृषेर्भयात् । वालिनस्तत्र गच्छ त्वं तेन सख्यं कुरु प्रभो ॥३८॥ सुग्रीवेण स सर्वं ते कार्यं सम्पादयिष्यति । अहमग्निं प्रवेक्ष्यामि तवाग्रे रघुनन्दन ॥३९॥ मुहूर्तं तिष्ठ राजेन्द्र यावद्दग्ध्वा कलेवरम् । यास्यामि भगवन् राम तव विष्णोः परं पदम् ॥४०॥ इति रामं समामन्त्र्य प्रविवेश हुताशनम् । क्षणात्रिर्धूय सकलमविद्याकृतबन्धनम् । रामप्रसादाच्छबरी मोक्षं प्रापातिदुर्लभम् ॥४१॥ किं दुर्लभं जगन्नाथे श्रीरामे भक्तवत्सले । प्रसन्नेऽधमजन्माऽपि शबरी मुक्तिमाप सा ॥४२॥ किं पुनर्ब्राह्मणा मुख्याः पुण्याः श्रीरामचिन्तकाः । मुक्तिं यान्तीति तद्भक्तिर्मुक्तिरेव न संशयः ॥४३॥ भक्तिर्मुक्तिविधायिनी भगवतः $\qquad\quad$श्रीरामचन्द्रस्य हे । लोकाः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजयुगलं $\qquad\quad$सेवध्वमत्युत्सुकाः । नानाज्ञानविशेषमन्त्रविततिं $\qquad\quad$त्यक्त्वा सुदूरे भृशं । रामं श्यामतनुं स्मरारिहृदये $\qquad\quad$भान्तं भजध्वं बुधाः ॥४४॥


शबरी बोली—हे देव ! हे सर्वज्ञ ! हे विश्वभावन ! आप सभी कुछ जानते हैं । तथापि हे प्रभो ! लोकाचारका अनुसरण करते हुए यदि आप मुझसे पूछते हैं तो इस समय सीताजी जहाँ हैं वह मैं आपको बतलाती हूँ । सीताजीको रावण हर ले गया है और इस समय वे लङ्कामें हैं ॥ ३४-३५ ॥ हे राम ! यहाँसे पास ही पम्पा नामका एक सरोवर है । उसके समीप ऋष्यमूक नामका एक बहुत बड़ा पर्वत है ॥ ३६ ॥ वहाँ अतुलित पराक्रमी वानरराज सुग्रीव अपने भाई वालीके भयसे सदा डरता हुआ अपने चार मन्त्रियोंके साथ रहता है । ऋषि-शापके भयसे वह स्थान वालीके लिये सर्वथा अगम्य है हे प्रभो ! आप वहाँ जाइये और उस सुग्रीवके मित्रत कीजिए वह आपका सब कार्य सिद्ध करेगा । हे रघुनन्दन ! अब मैं आपके सामने ही अग्निमें प्रवेश करूँगी ॥ ३७-३९ ॥ हे राजेश्वर ! हे भगवन् ! हे राम ! जबतक मैं अपने शरीरको जलाकर आप विष्णुभगवान्‌के परमधामको जाऊँ तबतक आप एक मुहूर्त्त यहाँ और ठहरिये ॥ ४० ॥

श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस प्रकार सम्भाषण करनेके अनन्तर शबरीने अग्निमें प्रवेश किया और एक क्षणमें ही समस्त अविद्याजन्य बन्धनोंको नष्ट कर भगवान् रामकी कृपासे अति दुर्लभ मोक्ष-पद प्राप्त किया ॥ ४१ ॥ भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीरामके प्रसन्न होनेपर संसारमें क्या दुर्लभ है । देखो, उनकी कृपासे नीच जातिमें उत्पन्न हुई शबरीने भी मोक्ष-पद प्राप्त कर लिया ॥ ४२ ॥ फिर श्रीरामका ध्यान करनेवाले पुण्यजन्मा ब्राह्मणादि यदि मुक्त हो जायें तो इसमें क्या आश्चर्य है ? निस्सन्देह, भगवान् रामकी भक्ति ही मुक्ति है ॥ ४३ ॥ अरे लोगो ! भगवान् श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ही मोक्ष देनेवाली है । अतः कामधेनुरूप उनके चरण-युगलोंकी अति उत्साहपूर्वक सेवा करो । हे बुद्धिमान् लोगो ! इन विविध विज्ञान-वार्ताओं और मन्त्र-विस्तारको अलग रखकर तुरन्त ही श्रीशंकरके हृदयधाममें शोभा पानेवाले श्यामशरीर भगवान् रामका भजन करो ॥ ४४ ॥


'इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥
समाप्तमिदमरण्यकाण्डम् ।

किष्किन्धाकाण्ड

श्रीसीतारामाभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण

किष्किन्धाकाण्ड

यो वालिना ध्वस्तबलं सुकण्ठं न्ययोजयद्राजपदे कपीनाम्।
तं स्वीयसन्तापसुतप्तचित्तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि॥

(इस पृष्ठ पर केवल सजावटी चित्र/रेखांकन है, कोई पाठ्य सामग्री नहीं है।)