अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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दास-भक्त हनुमानजी
तथेति तस्यारुरोह स्कन्धं रामोऽथ लक्ष्मणः । उत्पपात गिरेर्मूर्ध्नि क्षणादेव महाकपिः ॥
(अ० रा० कि० १ । २८-२९)
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग १: सुग्रीवसे भेंट
ॐ
अध्यात्मरामायण
किष्किन्धाकाण्ड
प्रथम सर्ग
सुग्रीवसे भेंट।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके सहित धीरे-धीरे पम्पासरके तटपर आये। उस सुन्दर सरोवरको देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ ॥ १ ॥ उसका विस्तार एक कोशका था और उसमें अति निर्मल अगाध जल भरा हुआ था तथा सब ओर खिले हुए कमल, कह्लार, कुमुद और उत्पल आदि सुशोभित हो रहे थे ॥ २ ॥ उस सरोवरमें जहाँ-तहाँ हंस और कारण्डव आदि पक्षी विहार कर रहे थे, चक्रवाकादि उसकी शोभा बढ़ा रहे थे और जलकुक्कुट, कोयष्टि तथा क्रौंच आदि पक्षियोंके कलरवसे वह शब्दायमान हो रहा था ॥ ३ ॥ वह चित्र-विचित्र पुष्प-लताओंसे परिपूर्ण और नाना प्रकारके फलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ था तथा उसका कमलकेशरसे सुवासित जल सज्जनोंके चित्तके समान स्वच्छ था ॥ ४ ॥ |
|---|---|
| ततः सलक्ष्मणो रामः शनैः पम्पासरस्तटम् ।<br>आगत्य सरसां श्रेष्ठं दृष्ट्वा विस्मयमाययौ ॥ १ ॥<br><br>क्रोशमात्रं सुविस्तीर्णमगाधामलशम्बरम् ।<br>उत्फुल्लाम्बुजकह्लारकुमुदोत्पलमण्डितम् ॥ २ ॥<br><br>हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकादिशोभितम् ।<br>जलकुक्कुटकोयष्टिकौञ्चनादोपनादितम् ॥ ३ ॥<br><br>नानापुष्पलताकीर्णं नानाफलसमावृतम् ।<br>सतां मनःस्वच्छजलं पद्मकिञ्जल्कवासितम् ॥ ४ ॥ | |
| तत्रोपस्पृश्य सलिलं पीत्वा श्रमहरं विभुः ।<br>सानुजः सरसस्तीरे शीतलेन पथा ययौ ॥ ५ ॥<br><br>ऋष्यमूकगिरेः पार्श्वे गच्छन्तौ रामलक्ष्मणौ ।<br>धनुर्वाणकरौ दान्तौ जटावल्कलमण्डितौ ।<br>पश्यन्तौ विविधान्वृक्षान् गिरेः शोभां सुविक्रमौ ॥ ६ ॥<br><br>सुग्रीवस्तु गिरेर्मूर्ध्नि चतुर्भिः सह वानरैः । | वहाँ पहुँचनेपर छोटे भाई लक्ष्मणके सहित प्रभु रामने आचमनकर उस सरोवरका श्रमहारी शीतल जल पीया और फिर उसके किनारे-किनारे शीतल छायायुक्त मार्गसे चलने लगे ॥ ५ ॥ इस प्रकार जटा-वल्कलविभूषित जितेन्द्रिय परम पराक्रमी राम और लक्ष्मण, जब हाथमें धनुष-बाण लिये विविध वृक्षों और पर्वतकी शोभाको निहारते हुए ऋष्यमूक पर्वतकी बगलमें चल रहे थे ॥ ६ ॥ उस समय अपने चार मन्त्रियोंके सहित गिरि-शिखरपर बैठे हुए सुग्रीवने उन्हें उधर |
| '१५२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १ |
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स्थित्वा ददर्श तौ यान्तावारुरोह गिरेः शिरः॥ ७॥
भयादाह हनूमन्तं कौ तौ वीरवरौ सखे ।
गच्छ जानीहि भद्रं ते बटुर्भूत्वा द्विजाकृतिः ॥८॥
वालिना प्रेषितौ किंवा मां हन्तुं समुपागतौ ।
ताभ्यां सम्भाषणं कृत्वा जानीहि हृदयं तयोः॥९॥
यदि तौ दुष्टहृदयौ संज्ञां कुरु कराग्रतः ।
विनयावनतो भूत्वा एवं जानीहि निश्चयम् ॥१०॥
तथेति वटुरूपेण हनुमान् समुपागतः ।
विनयावनतो भूत्वा रामं नत्वेदमब्रवीत् ॥११॥
कौ युवां पुरुषव्याघ्रौ युवानौ वीरसम्मतौ ।
द्योतयन्तौ दिशः सर्वाः प्रभया भास्कराविवा॥ १२॥
युवां त्रैलोक्यकर्ताराविति भाति मनो मम ।
युवां प्रधानपुरुषौ जगद्धेतू जगन्मयौ ॥१३॥
मायया मानुषाकारौ चरन्ताविच लीलया ।
भूभारहरणार्थाय भक्तानां पालनाय च ॥१४॥
अवतीर्णाविह परौ चरन्तौ क्षत्रियाकृती ।
जगत्स्थितिलयौ सर्गं लीलया कर्तुमुद्यतौ ॥१५॥
स्वतन्त्रौ प्रेरकौ सर्वहृदयस्थाविहेश्वरौ ।
नरनारायणौ लोके चरन्ताविति मे मतिः ॥१६॥
श्रीरामो लक्ष्मणं प्राह पश्यैनं वटुरूपिणम् ।
शब्दशास्त्रमशेषेण श्रुतं नूनमनेकधा ॥१७॥
अनेन भाषितं कृत्स्नं न किञ्चिदपशब्दितम् ।
ततः प्राह हनूमन्तं राघवो ज्ञानविग्रहः ॥१८॥
अहं दाशरथी रामस्त्वयं मे लक्ष्मणोऽनुजः ।
सीतया भार्यया सार्धं पितुर्वचनगौरवात् ॥१९॥ | जाते देखा और वह सबसे ऊँचे शिखरपर चढ़ गया ॥ ७॥ फिर भयभीत होकर हनुमान्जीसे बोला— "मित्र ! देखो, ये दो वीरवर कौन हैं। तुम्हारा कल्याण हो, तुम ब्राह्मण ब्रह्मचारीके वेषमें उनके पास जाकर यह मालूम तो करो ॥ ८॥ तुम उनसे बातचीत करके उनके यहाँ आनेका अभिप्राय मालूम करना । ऐसा न हो, वे वालीके भेजनेसे मुझे मारनेके लिये आ रहे हों ॥ ९ ॥ यदि तुम्हें उनका हृदय दूषित मालूम हो तो अपनी अंगुलीसे मुझे संकेत कर देना । देखो, बड़े विनीत होकर यह सब भेद मालूम कर लेना ॥ १०॥<br><br>तब हनुमान्जी सुग्रीवसे 'जो आज्ञा' कह ब्रह्मचारीका वेष बनाकर रघुनाथजीके पास आये और बड़ी नम्रतासे उन्हें नमस्कार कर बोले—॥ ११॥ "हे पुरुषव्याघ्र! आप दोनों कौन हैं? आपकी युवावस्था है और आप बड़े वीर मालूम होते हैं। अहो! अपने शरीरकी कान्तिसे आपने समस्त दिशाओंको सूर्यके समान प्रकाशमान कर रक्खा है ॥ १२॥ मेरा मन तो यह कहता है कि आप दोनों त्रिलोकीके रचनेवाले संसारके कारणभूत जगन्मय प्रधान और पुरुष ही हैं ॥ १३ ॥ आप मानो पृथ्वीका भार उतारने और भक्तजनोंकी रक्षा करनेके लिये ही लीलावश अपनी मायासे मनुष्यरूप धारण-कर विचर रहे हैं ॥ १४॥ आप साक्षात् परमात्मा ही क्षत्रियकुमारके रूपमें अवतीर्ण होकर पृथिवीपर घूम रहे हैं ! आप लीलाहीसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और (दुष्टोंका) नाश करनेमें तत्पर हैं ॥ १५ ॥ मेरी बुद्धिमें तो यही आता है कि आप सबके हृदयमें विराजमान, सबके प्रेरक, परम स्वतन्त्र भगवान् नर-नारायण ही इस लोकमें विचर रहे हैं" ॥ १६॥<br><br>तब श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! इस ब्रह्मचारीको देखो। अवश्य ही इसने सम्पूर्ण शब्दशास्त्र (व्याकरण) कई बार भली प्रकार पढ़ा है ॥ १७॥ देखो, इसने इतनी बातें कहीं किन्तु इसके बोलनेमें कहीं कोई एक भी अशुद्धि नहीं हुई।" तदनन्तर विज्ञानघन श्रीरघुनाथजीने हनुमान्जीसे कहा—॥ १८॥ "हे द्विज ! मैं दशरथका पुत्र राम हूँ और यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है। मैं पिताकी आज्ञा मानकर अपनी स्त्री सीताके सहित वनमें आया
सर्ग १ ] किष्किन्धाकाण्ड १५३
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| आगतस्तत्र विपिने स्थितोऽहं दण्डके द्विज ॥१९॥<br>तत्र भार्या हृता सीता रक्षसा केनचिन्मम ।<br>तामन्वेष्टुमिहायातौ त्वं को वा कस्य वा वद॥२०॥ | था और यहाँ दण्डकारण्यमें रहता था। वहाँ किसी राक्षसने मेरी भार्या सीताको हर लिया। उसे ढूँढ़नेके लिये हम यहाँ आये हैं। कहिये, आप कौन हैं और किसके पुत्र हैं ? ॥ १९-२० ॥ |
| बटुरुवाच<br>सुग्रीवो नाम राजा यो वानराणां महामतिः ।<br>चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं गिरिमूर्धनि तिष्ठति ॥२१॥<br>भ्राता कनीयान् सुग्रीवो वालिनः पापचेतसः ।<br>तेन निष्कासितो भार्या हृता तस्येह वालिना॥२२॥<br>तद्भयादृष्यमूकाख्यं गिरिमाश्रित्य संस्थितः ।<br>अहं सुग्रीवसचिवो वायुपुत्रो महामते ॥२३॥<br>हनूमान्नाम विख्यातो ह्यञ्जनीगर्भसम्भवः ।<br>तेन सख्यं त्वया युक्तं सुग्रीवेण रघूत्तम ॥२४॥<br>भार्यापहारिणं हन्तुं सहायस्ते भविष्यति ।<br>इदानीमेव गच्छाम आगच्छ यदि रोचते ॥२५॥ | ब्रह्मचारी बोले— महामति सुग्रीव वानरोंके राजा हैं। वे अपने चार मन्त्रियोंके साथ इस पर्वतके शिखरपर रहते हैं ॥ २१ ॥ वे दुष्टचित्त वालीके छोटे भाई हैं। उस वालीने उनकी स्त्री छीनकर उन्हें घरसे निकाल दिया है ॥ २२ ॥ अतः उसके भयसे वे इस ऋष्यमूक पर्वतपर ही रहते हैं। हे महामते ! मैं उन्हीं सुग्रीवका मन्त्री और वायुका पुत्र हूँ ॥ २३ ॥ मेरा जन्म माता अञ्जनीके गर्भसे हुआ है और मैं 'हनूमान्' नामसे विख्यात हूँ। हे रघुश्रेष्ठ ! आपको महाराज सुग्रीवसे मित्रता करनी चाहिये ॥ २४ ॥ वे आपकी भार्याको चुरानेवालेका वध करनेमें आपके सहायक होंगे। आइये, यदि आपकी इच्छा हो तो अभी उनके पास चलें ॥ २५ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>अहमप्यागतस्तेन सख्यं कर्तुं कपीश्वर ।<br>सख्युस्तस्यापि यत्कार्यं तत्करिष्याम्यसंशयम्॥२६॥ | श्रीरामचन्द्रजी बोले— हे कपीश्वर ! मैं भी उनसे मित्रता करनेके लिये ही आया हूँ। उन मित्रवरका भी जो कुछ कार्य होगा वह मैं निस्सन्दह पूर्ण कर दूँगा ॥ २६ ॥ |
| हनूमान् स्वस्वरूपेण स्थितो राममथाब्रवीत् ।<br>आरोहतां मम स्कन्धौ गच्छामः पर्वतोपरि ॥२७॥<br>यत्र तिष्ठति सुग्रीवो मन्त्रिभिर्वालिनो भयात् ।<br>तथेति तस्यारुरोह स्कन्धं रामोऽथ लक्ष्मणः॥२८॥<br>उत्पपात गिरेर्मूर्ध्नि क्षणादेव महाकपिः ।<br>वृक्षच्छायां समाश्रित्य स्थितौ तौ रामलक्ष्मणौ॥२९॥ | यह सुनकर हनूमान्जीने अपना रूप धारण कर रामसे कहा, “आइये, आप दोनों मेरे कन्धोंपर चढ़ जाइये, अब हम पर्वतके ऊपर चलते हैं, जहाँ अपने मन्त्रियोंके सहित सुग्रीव वालीके भयसे (छिपकर) रहते हैं।” तब राम और लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कह उनके कन्धोंपर चढ़ गये ॥ २७-२८ ॥ वानरराज हनूमान् एक क्षणमें ही पर्वतके शिखरपर कूदकर पहुँच गये। वहाँ राम और लक्ष्मण एक वृक्षकी छायामें खड़े हो गये ॥ २९ ॥ |
| हनूमानपि सुग्रीवमुपगम्य कृताञ्जलिः ।<br>व्येतु ते भयमायातो राजन् श्रीरामलक्ष्मणौ ॥३०॥<br>शीघ्रमुत्तिष्ठ रामेण सख्यं ते योजितं मया ।<br>अग्निं साक्षिणमारोप्य तेन सख्यं द्रुतं कुरु ॥३१॥<br>ततोऽतिहर्षात्सुग्रीवः समागम्य रघूत्तमम् । | इधर हनूमान्जीने सुग्रीवके पास जा उनसे हाथ जोड़कर कहा—“राजन् ! अब अपनी शंका दूर कीजिये, क्योंकि आपके यहाँ श्रीराम और लक्ष्मण पधारे हैं ॥ ३० ॥ शीघ्र उठिये, मैंने रामके साथ आपकी मित्रता होनेका योग लगा दिया है। शीघ्र ही अग्निको साक्षी करके उनसे मित्रता कीजिये ॥ ३१ ॥<br>तब सुग्रीव अति प्रसन्न होकर रघुनाथजीके पास |
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| १५४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग १ . |
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वृक्षशाखां स्वयं छित्त्वा विष्टराय ददौ मुदा ॥३२॥
हनूमांल्लक्ष्मणायादात्सुग्रीवाय च लक्ष्मणः ।
हर्षेण महताऽऽविष्टाः सर्व एवावतस्थिरे ॥३३॥
लक्ष्मणस्त्वब्रवीत्सर्वं रामवृत्तान्तमादितः ।
वनवासाभिगमनं सीताहरणमेव च ॥३४॥
लक्ष्मणोक्तं वचः श्रुत्वा सुग्रीवो राममब्रवीत् ।
अहं करिष्ये राजेन्द्र सीतायाः परिमार्गणम् ॥३५॥
साहाय्यमपि ते राम करिष्ये शत्रुघातिनः ।
शृणु राम मया दृष्टं किञ्चित्ते कथयाम्यहम् ॥३६॥
एकदा मन्त्रिभिः सार्धं स्थितोऽहं गिरिमूर्धनि ।
विहायसा नीयमानां केनचित्प्रमदोत्तमाम् ॥३७॥
क्रोशन्तीं रामरामेति दृष्ट्वाऽस्मान्पर्वतोपरि ।
आमुच्याभरणान्याशु स्वोत्तरीयेण भामिनी ॥३८॥
निरीक्ष्याधः परित्यज्य क्रोशन्ती तेन रक्षसा ।
नीताऽहं भूषणान्याशु गुहायामक्षिपं प्रभो ॥३९॥
इदानीमपि पश्य त्वं जानीहि तव वा न वा ।
इत्युक्त्वाऽऽनीय रामाय दर्शयामास वानरः॥४०॥
विमुच्य रामस्तद्दृष्ट्वा हा सीतेति मुहुर्मुहुः ।
हृदि निक्षिप्य तत्सर्वं रुरोद प्राकृतो यथा ॥४१॥
आश्वास्य राघवं भ्राता लक्ष्मणे वाक्यमब्रवीत् ।
अचिरेणैव ते राम प्राप्स्यते जानकी शुभा ।
वानरेन्द्रसहायेन हत्वा रावणमाहवे ॥४२॥
सुग्रीवोऽप्याह हे राम प्रतिज्ञां करवाणि ते ।
समरे रावणं हत्वा तव दास्यामि जानकीम् ॥४३॥
ततो हनूमान्प्रज्वाल्य तयोरग्निं समीपतः ।
तावुभौ रामसुग्रीवावग्नौ साक्षिणि तिष्ठति ॥४४
| आये और प्रसन्नमनसे अपने हाथसे एक वृक्षकी शाखा तोड़कर उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया ॥३२॥ इसी प्रकार हनुमान्जीने लक्ष्मणजीको तथा लक्ष्मणजीने सुग्रीवको आसन दिया और सब लोग अति आनन्दपूर्वक अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये ॥३३॥ तदनन्तर लक्ष्मणजीने आरम्भसे लेकर वनमें आने और सीताजीके हरे जानेतकका रामचन्द्रजी का सारा वृत्तान्त सुनाया ॥३४॥ | लक्ष्मणजीके वचन सुनकर सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजी से कहा—"हे राजराजेश्वर ! मैं सीताजीकी खोज करूँगा ॥३५॥ और शत्रु का वध करते समय भी आपकी सहायता करूँगा। हे राम ! इस सम्बन्धमें मैंने जो कुछ देखा है वह आपको सुनाता हूँ, सुनिये ॥३६॥ | "एक दिन अपने मन्त्रियोंके साथ मैं पर्वतके शिखरपर बैठा था । उस समय हमने देखा कि कोई राक्षस किसी उत्तम कामिनीको आकाश-मार्गसे लिये जाता है ॥३७॥ वह 'राम ! राम !' कहकर विलाप कर रही थी । हमें पर्वतपर बैठे देख कर उसने तुरन्त ही अपने आभूषण उतारकर एक वस्त्रमें बाँधे और हमारी ओर देखते हुए नीचे गिरा दिये । हे प्रभो ! इसी प्रकार निरन्तर विलाप करती हुई उस अबलाको वह राक्षस ले गया। प्रभो ! मैंने तुरन्त ही उन आभूषणोंको उठाकर गुफामें रख दिया ॥३८–३९॥ आप उन्हें अभी देखिये और पहचानिये कि वे आपकी हैं या नहीं।" ऐसा कह कपिराज सुग्रीवने वे आभूषण लाकर रामको दिखाये ॥४०॥ रामचन्द्रजी ने उन्हें खोलकर देखा तो (उन्हें पहचानकर) छातीसे लगा लिया और साधारण पुरुषोंके समान वारम्बार 'हा सीते ! हा सीते !' कहकर रोने लगे ॥४१॥ | तब भाई लक्ष्मणने उन्हें ढाँढस बँधाकर कहा— "हे राम ! वानरराज सुग्रीवकी सहायतासे युद्धमें रावणको मारकर आप शीघ्र ही शुभलक्षणा जनक-नन्दिनीको प्राप्त करेंगे" ॥४२॥ सुग्रीवने भी कहा— "हे राम ! मैं आपसे प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रावण-को युद्धमें मारकर आपको सीता दिला दूँगा" ॥४३॥ | तदनन्तर हनूमान्जीने उन दोनोंके पास अग्नि प्रज्वलित की । तब निष्पाप राम और सुग्रीव दोनों ही
सर्ग १] | किष्किन्धाकाण्ड | १५५
| बाहू प्रसार्य चालिङ्गय परस्परमकल्मषौ ।<br>समीपे रघुनाथस्य सुग्रीवः समुपाविशत् ॥४५॥ | अग्निको साक्षी कर परस्पर एक-दूसरेसे भुजा फैलाकर मिले । तत्पश्चात् सुग्रीव रामचन्द्रजीके पास बैठ गये ॥४४-४५॥ |
| स्वोदन्तं कथयामास प्रणयाद्रघुनायके ।<br>सखे शृणु ममोदन्तं वालिना यत्कृतं पुरा ॥४६॥ | और अति प्रेमपूर्वक उन्हें अपना वृत्तान्त सुनाने लगे । वे बोले—"मित्र ! अब हमारी कहानी सुनो; वालीने पूर्वकालमें मेरे साथ जो कुछ किया है वह सुनाता हूँ ॥४६॥ |
| मयपुत्रोऽथ मायावी नाम्ना परमदुर्मदः ।<br>किष्किन्धां समुपागत्य वालिनं समुपाव्हयत् ॥४७॥ | एक बार अति मदोन्मत्त मय दानवके पुत्र मायावीने किष्किन्धा-पुरीमें आकर वालीको युद्धके लिये ललकारा ॥४७॥ |
| सिंहनादेन महता वाली तु तदमर्षणः ।<br>निर्ययौ क्रोधताम्राक्षो जघान दृढमुष्टिना ॥४८॥ | वह दैत्य बड़ा भारी सिंहनाद करने लगा । वाली उसका यह दर्प न देख सका, उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और उसने बाहर आ उसके बड़े जोरसे एक घूँसा मारा ॥४८॥ |
| दुद्राव तेन संविग्नो जगाम स्वगुहां प्रति ।<br>अनुदुद्राव तं वाली मायाविनमहं तथा ॥४९॥ | उसके आघातसे व्याकुल होकर मायावी अपनी गुफाकी ओर दौड़ा । तब वाली और मैं दोनोंहीने उसका पीछा किया ॥४९॥ |
| ततः प्रविष्टमालोक्य गुहां मायाविनं रुषा ।<br>वाली मामाह तिष्ठ त्वं बहिर्गच्छाम्यहं गुहाम् ।<br>इत्युक्त्वाविश्य स गुहां मासमेकं न निर्ययौ ॥५०॥ | मायावीको गुफामें गया देखकर वालीको बड़ा रोष हुआ । उसने मुझसे कहा—"तुम यहीं रहो, मैं गुफामें जाता हूँ।" ऐसा कहकर वह गुफामें घुस गया और एक मास-तक उससे न निकला ॥५०॥ |
| मासादूर्ध्वं गुहाद्वारान्निर्गतं रुधिरं बहु ।<br>तद्दृष्ट्वा परितप्ताङ्गो मृतो वालीति दुःखितः ॥५१॥ | एक महीना बीत जाने-पर उस गुफाके द्वारसे बहुत-सा रक्त निकला । उसे देख-कर यह समझकर कि वाली मारा गया, मुझे बड़ा दुःख और सन्ताप हुआ ॥५१॥ |
| गुहाद्वारि शिलामेकां निधाय गृहमागतः ।<br>ततोऽब्रुवं मृतो वाली गुहायां रक्षसा हतः ॥५२॥ | तब (इस भयसे कि कहीं वालीको मारनेवाला दैत्य बाहर आकर मुझे भी न मार डाले) उस गुफाके द्वारपर एक शिला रखकर मैं घर लौट आया; और सबसे यह कह दिया कि वाली गुफामें राक्षसके हाथसे मारा गया ॥५२॥ |
| तच्छ्रुत्वा दुःखिताः सर्वे मामनिच्छन्तमप्युत ।<br>राज्येऽभिषेचनं चक्रुः सर्वे वानरमन्त्रिणः ॥५३॥ | यह सुनकर सबको बड़ा दुःख हुआ और मेरी इच्छा न होनेपर भी समस्त वानर-मन्त्रिमण्डलने मुझे राजपद्पर अभिषिक्त कर दिया ॥५३॥ |
| शिष्टं तदा मया राज्यं किञ्चित्कालमरिन्दम ।<br>ततः समागतो वाली मामाह परुषं रुषा ॥५४॥ | हे शत्रुदमन ! मैंने कुछ ही दिन राज्य-शासन किया होगा कि वाली आ गया और क्रोधपूर्वक मुझसे बड़ी कड़वी-कड़वी बातें कहने लगा ॥५४॥ |
| बहुधा भर्त्सयित्वा मां निजघान च मुष्टिभिः ।<br>ततो निर्गत्य नगरादधावं परया भिया ॥५५॥ | इस प्रकार, मुझे बहुत कुछ भला-बुरा कहकर वह मुझे घूँसोंसे मारने लगा । तब मैं अत्यन्त भयभीत होकर नगर छोड़कर भाग गया ॥५५॥ |
| लोकान् सर्वान्परिक्रम्य ऋष्यमूकं समाश्रितः ।<br>ऋषेः शापभयात्सोऽपि नायातीमं गिरि प्रभो ॥५६॥ | हे प्रभो ! मैंने सम्पूर्ण लोकोंमें घूमकर अन्तमें इस ऋष्यमूक-पर्वतकी शरण ली है क्योंकि ऋषिशापके भयसे वह इस पर्वत-पर नहीं आता ॥५६॥ |
| तदादि मम भार्या स स्वयं भुङ्क्ते विमूढधीः ।<br>अतो दुःखेन सन्तप्तो हृतदारो हृताश्रयः ॥५७॥ | तबसे मेरी भार्याको वह दुर्मति स्वयं भोगता है और मैं स्त्री तथा घरके छिन जानेसे मन-ही-मन कुढ़ता हुआ यहाँ रहता हूँ । आज |
१५६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १
वसाम्यद्य भवत्पादसंस्पर्शात्सुखितोऽस्म्यहम् ।
मित्रदुःखेन सन्तप्तो रामो राजीवलोचनः ॥५८॥
हनिष्यामि तव द्वेष्यं शीघ्रं भार्यापहारिणम् ।
इति प्रतिज्ञामकरोत्सुग्रीवस्य पुरस्तदा ॥५९॥
सुग्रीवोऽप्याह राजेन्द्र वाली बलवतां बली ।
कथं हनिष्यति भवान्देवैरपि दुरासदम् ॥६०॥
शृणु ते कथयिष्यामि तद्बलं बलिनां वर ।
कदाचिद्दुन्दुभिर्नाम महाकायो महाबलः ॥६१॥
किष्किन्धामगमद्राम महामहिषरूपधृक् ।
युद्धाय वालिनं रात्रौ समाह्वयत भीषणः ॥६२॥
तच्छ्रुत्वाऽसहमानोऽसौ वाली परमकोपनः ।
महिषं शृङ्गयोर्धृत्वा पातयामास भूतले ॥६३॥
पादेनैकेन तत्कायमाक्रम्यास्य शिरो महत् ।
हस्ताभ्यां भ्रामयञ्छित्त्वा तोलयित्वाक्षिपद्भुवि ॥६४॥
पपात तच्छिरो राम मातङ्गाश्रमसन्निधौ ।
योजनात्पतितं तन्मान्मुनेराश्रममण्डले ॥६५॥
रक्तवृष्टिः पपातोर्व्यान्दृष्ट्वा तां क्रोधमूर्च्छितः ।
मातङ्गो वालिनं प्राह यद्यागन्तासि मे गिरिम् ॥६६॥
इतः परं भग्नशिरा मरिष्यसि न संशयः ।
एवं शप्तस्तदारभ्य ऋष्यमूकं न यात्यसौ ॥६७॥
एतज्ज्ञात्वाहमध्येत्र वसामि भयवर्जितः ।
राम पश्य शिरस्तस्य दुन्दुभेः पर्वतोपमम् ॥६८॥
तत्क्षेपणे यदा शक्तः शक्तस्त्वं वालिनो वधे ।
इत्युक्त्वा दर्शयामास शिरस्तद्गिरिसन्निभम् ॥६९॥
आपके चरणकमलोंका स्पर्श करनेसे मुझे सुख चैन मिला है।" तब कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीने सखा सुग्रीवके दुःखसे आतुर होकर उसके सामने प्रतिज्ञा की कि 'मैं बहुत ही शीघ्र तुम्हारी पत्नीको छीननेवाले तुम्हारे शत्रु का नाश कर डालूँगा' ॥ ५७-५९॥
सुग्रीवने कहा--"हे राजेन्द्र ! वाली सम्पूर्ण योद्धाओंमें अग्रणी है, (वह कोई साधारण बलवाला नहीं है।) उसको पराजित करना देवताओंके लिये भी अति कठिन है। फिर आप उसे कैसे मार सकेंगे ? ॥ ६० ॥ हे वीरश्रेष्ठ ! सुनिये मैं आपको उसके बलका वृत्तान्त सुनाता हूँ। एक बार दुन्दुभि नामका एक बड़ा बलवान् और स्थूलकाय दैत्य किष्किन्धापुरीमें भैंसेका रूप बनाकर आया और उस महाभयानक असुरने रात्रिके समय वालीको युद्धके लिये ललकारा ॥ ६१-६२ ॥ उसकी गर्जना वालीको सहन न हुई और उसने अति क्रोधपूर्वक उस भैंसेके सींग पकड़कर उसे पृथिवीपर पटक दिया ॥ ६३ ॥ तथा अपने एक पैरसे उसके शरीरको दबाकर उसके महान् मस्तकको अपने हाथोंसे मरोड़कर तोड़ डाला और उसे उछालकर पृथिवीपर दूर फेंक दिया ॥ ६४ ॥ हे राम ! वह फिर वहाँसे एक योजन दूर मुनियोंके आश्रममण्डलमें महर्षि मतंगके आश्रमके पास जाकर गिरा ॥ ६५ ॥ उससे जहाँ-तहाँ बहुत-सा रक्त बरसा। उसे देखकर मुनिवर मतंगको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने क्रोधमें भरकर वालीसे कहा—"यदि आजसे तुम कभी मेरे इस पर्वतपर आओगे तो निस्सन्देह तुम्हारा शिर फट जायगा और तुम मर जाओगे।" हे रामजी ! मुनिके इस प्रकार शाप देनेसे ही वह तबसे इस ऋष्यमूक-पर्वतपर नहीं आता ॥ ६६-६७ ॥ ऐसा जानकर ही मैं यहाँ निर्भय होकर रहता हूँ। हे राम ! (जिसे वालीने मारा था) आप ज़रा उस दुन्दुभि दैत्यके पर्वताकार शिरको तो देखिये। (इसीसे आपको उसके बलका कुछ अनुमान हो जायगा ।) ॥ ६८ ॥ यदि आप उस मस्तकको फेंक सकेंगे तो अवश्य वालीका वध भी कर सकेंगे।"
ऐसा कहकर सुग्रीवने वह पर्वत-सदृश शिर
सर्ग १ ] किष्किन्धाकाण्ड १५७
दृष्ट्वा रामः स्मितं कृत्वा पादाङ्गुष्ठेन चाक्षिपत् ।
दशयोजनपर्यन्तं तदद्भुतमिवाभवत् ॥७०॥
साधु साध्विति सम्प्राह सुग्रीवो मन्त्रिभिः सह ।
पुनरप्याह सुग्रीवो रामं भक्तपरायणम् ॥७१॥
एते ताला महासाराः सप्त पश्य रघूत्तम ।
एकैकं चालयित्वाऽसौ निष्पत्रान्कुरुतेऽञ्जसा ॥७२॥
यदि त्वमेकबाणेन विद्ध्वा छिद्रं करोषि चेत् ।
हतस्त्वया तदा वाली विश्वासो मे प्रजायते ।
तथेति धनुरादाय सायकं तत्र सन्दधे ॥७३॥
बिभेद च तदा रामः सप्त तालान्महाबलः ।
तालान्सप्त विनिर्भिद्य गिरिं भूमिं च सायकः॥७४॥
पुनरागत्य रामस्य तूणीरे पूर्ववत्स्थितः ।
ततोऽतिहर्षात्सुग्रीवो राममाहातिविस्मितः ॥७५॥
देव त्वं जगतां नाथः परमात्मा न संशयः ।
मत्पूर्वकृतपुण्यौघैः सङ्गतोऽद्य मया सह ॥७६॥
त्वां भजन्ति महात्मानः संसारविनिवृत्तये ।
त्वां प्राप्य मोक्षसचिवं प्रार्थयेऽहं कथं भवम् ॥७७॥
दाराः पुत्रा धनं राज्यं सर्वं त्वन्मायया कृतम् ।
अतोऽहं देवदेवेश नाकाङ्क्षेऽन्यत्प्रसीद मे ॥७८॥
आनन्दानुभवं त्वाऽद्य प्राप्तोऽहं भाग्यगौरवात् ।
मृदर्थं यतमानेन निधानमिव सत्पते ॥७९॥
अनाद्यविद्यासंसिद्धं बन्धनं छिन्नमद्य नः ।
यज्ञदानतपःकर्मपूर्तेष्टादिभिरप्यसौ ॥८०॥
न जीर्यते पुनर्दाढ्यं भजते संसृतिः प्रभो ।
त्वत्पाददर्शनात्सद्यो नाशमेति न संशयः ॥८१॥
दिखलाया ॥ ६९ ॥ उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाते हुए अपने पैरके अँगूठेसे उसे दश योजन दूर फेंक दिया। यह बड़े आश्चर्यकी बात हुई ॥ ७० ॥ अपने मन्त्रियोंके सहित सुग्रीव भी 'वाह ! वाह !' करने लगे और फिर वह भक्तोंके एकमात्र आश्रय भगवान् रामसे बोले—॥ ७१ ॥ "हे रघूश्रेष्ठ ! देखिये, तालके ये सात वृक्ष कैसे सुदृढ़ हैं, किन्तु वाली इनमेंसे प्रत्येकको हिलाकर अनायास ही पत्र-हीन (बे-पत्तेके) कर दिया करता है ॥ ७२ ॥ यदि आप एक बाणसे ही इन सबको बेधकर इनमें छिद्र कर देंगे तो मुझे यह विश्वास हो जायगा कि आप अवश्य ही वालीको मार डालेंगे।"
तब महाबली रघुनाथजीने 'बहुत अच्छा' कह अपना धनुष लेकर उसपर बाण चढ़ाया और उन सातों ताल-वृक्षोंको बेध दिया । तत्पश्चात् वह बाण सातों ताल, पर्वत और पृथिवीको बेधकर पहलेके समान फिर आकर रामचन्द्रजीके तरकशमें स्थित हो गया ।
तब सुग्रीवने आश्चर्यचकित होकर श्रीरामचन्द्रजीसे अत्यन्त हर्षके साथ कहा—॥ ७३–७५ ॥ "हे देव ! आप सम्पूर्ण जगत्के स्वामी साक्षात् परमात्मा हैं—इसमें सन्देह नहीं। मेरे पूर्वकृत पुण्य-पुञ्जके परिपाकसे ही आज आपसे मेरा संयोग हुआ है ॥ ७६ ॥ महात्मा लोग संसार-बन्धनकी निवृत्तिके लिये आपका भजन करते हैं, फिर आप मोक्षदायक प्रभुको पाकर मैं सांसारिक पदार्थोंकी कामना कैसे करूँ ? ॥ ७७ ॥ हे देव-देवेश्वर ! ये स्त्री, पुत्र, धन, राज्य आदि सभी आपकी मायाके कार्य हैं । अतः अब आपके अतिरिक्त और किसी पदार्थकी मुझे इच्छा नहीं है, आप मुझपर कृपा कीजिये ॥ ७८ ॥ हे सत्पते ! आप आनन्दस्वरूप हैं । मिट्टी खोदते हुए जैसे किसीको खजाना हाथ लग जाय उसी प्रकार आज बड़े भाग्यसे मुझे आपके दर्शन हुए हैं ॥ ७९ ॥ आज हमारा अनादि अविद्याजन्य बन्धन कट गया । हे प्रभो ! यह संसार-बन्धन यज्ञ, दान, तप तथा इष्टापूर्त्त आदि कर्मोंसे भी नहीं टूटता बल्कि और दृढ़ हो जाता है । किन्तु आपके चरणकमलोंका दर्शन करते ही यह तुरन्त नष्ट हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं ॥ ८०-८१ ॥
१५८ अध्यात्मरामायण [सर्ग १
क्षणार्धमपि यच्चित्तं त्वयि तिष्ठत्यचञ्चलम् । तस्याज्ञानमनर्थानां मूलं नश्यति तत्क्षणात्॥८२॥ तत्तिष्ठतु मनो राम त्वयि नान्यत्र मे सदा ॥८३॥ रामरामेति यद्वाणी मधुरं गायति क्षणम् । स ब्रह्महा सुरापो वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥८४॥ न काङ्क्षे विजयं राम न च दारसुखादिकम् । भक्तिमेव सदा काङ्क्षे त्वयि बन्धविमोचनीम्॥८५॥ त्वन्मायाकृतसंसारस्त्वदंशोऽहं रघूत्तम । स्वपादभक्तिमादिश्य त्राहि मां भवसङ्कटात्॥८६॥ पूर्वं मित्रार्युदासीनास्त्वन्मायाऽऽवृतचेतसः । आसन्मेऽद्य भवत्पाददर्शनादेव राघव ॥८७॥ सर्वं ब्रह्मैव मे भाति क्व मित्रं क्व च मे रिपुः । यावत्त्वन्मायया बद्धस्तावद्गुणविशेषता ॥८८॥ सा यावदस्ति नानात्वं तावद्भवति नान्यथा । यावन्नानात्वमज्ञानात्तावत्कालकृतं भयम् ॥८९॥ अतोऽविद्यामुपास्ते यः सोऽन्धे तमसि मज्जति । मायामूलमिदं सर्वं पुत्रदारादिबन्धनम् । तदुत्सारय मायां त्वं दासीं तव रघूत्तम ॥९०॥ त्वत्पादपद्मर्पितचित्तवृत्ति- स्त्वन्नामसङ्गीतकथासु वाणी । त्वद्भक्तसेवानिरतौ करौ मे त्वदङ्गसङ्गं लभतां मदङ्गम् ॥९१॥ त्वन्मूर्तिभक्तान् स्वगुरुं च चक्षुः पश्यत्वजस्रं स शृणोतु कर्णः ।
जिसका चित्त आपके स्वरूपमें आधे क्षणके लिये भी निश्चल होकर संलग्न हो जाता है उसका सम्पूर्ण अनर्थोंका मूलकारण अज्ञान तत्काल नष्ट हो जाता है, अतः हे राम ! मेरा मन सदा आपहीमें लगा रहे, वह आपको छोड़कर और कहीं भी न जाय ॥८२-८३॥ जिसकी वाणी एक क्षण भी 'राम-राम' ऐसा सुमधुर गान करती है, वह ब्रह्मघाती अथवा मद्यपी भी क्यों न हो, समस्त पापोंसे छूट जाता है ॥८४॥ हे राम! अब मुझे वालीको जीतने अथवा स्त्री आदिका सुख प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं है। मैं तो संसार-बन्धनको काटनेवाली आपकी भक्ति ही चाहता हूँ ॥८५॥ हे रघुश्रेष्ठ ! यह संसार आपकी मायाका विलास है और मैं भी आपहीका अंश हूँ। अतः अपने चरणकमलोंकी भक्ति देकर मुझे इस संसार-संकटसे बचाइये ॥८६॥ पहले, जब मेरा चित्त आपकी मायासे ढँका हुआ था, मुझे अपने शत्रु-मित्र और उदासीन दिखायी देते थे। किन्तु हे रघुनाथजी ! अब आपके चरणकमलोंका दर्शन पाते ही मुझे सब कुछ ब्रह्मरूप ही भासता है। प्रभो ! संसारमें मेरा कौन मित्र है और कौन शत्रु ? जबतक जीव आपकी मायासे बँधा रहता है तभीतक उसपर सत्त्वादि गुणोंका प्रभाव पड़ता रहता है ॥८७-८८॥ जबतक मायाका प्रभाव रहता है तभी-तक शत्रु-मित्रादि भेद-भाव रहता है। उसके दूर होते ही समस्त भेद-भाव दूर हो जाता है। और जबतक यह अज्ञानजन्य भेद-भाव रहता है तभीतक मृत्युका भय है ॥८९॥ इसलिये जो पुरुष अविद्याकी उपासना करता है (अर्थात् अविद्याजन्य पदार्थोंकी कामना करता है) वह घोर अन्धकारमें पड़ता है। ये पुत्र-स्त्री आदि सम्पूर्ण बन्धन मायामय ही हैं अतः हे रघुश्रेष्ठ ! अपनी दासीरूप इस मायाको हमसे दूर कीजिये ॥९०॥ प्रभो ! मेरी चित्तवृत्ति सदा आपके चरणकमलोंमें लगी रहे, वाणी आपके नामसंकीर्तन और कथा-वार्तामें लगी रहे, हाथ आपके भक्तोंकी सेवामें लगे रहें और मेरा शरीर (आपके पाद-स्पर्श आदिके मिससे) सदा आपका अङ्गसङ्ग करता रहे ॥९१॥ मेरे नेत्र सर्वदा आपकी मूर्ति, आपके भक्त और अपने गुरुका दर्शन करते रहें, कान निरन्तर आपके अवतारोंकी लीलाओंका श्रवण करें
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग २: वालीका वध और भगवान्के साथ उसका सम्भाषण
| सर्ग २ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १५९ |
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त्वज्जन्मकर्माणि च पादयुग्मं<br> व्रजत्वजस्रं तव मन्दिराणि ॥९२॥<br>अङ्गानि ते पादरजोविमिश्र-<br> तीर्थानि बिभ्रत्वहिशत्रुकेतो।<br>शिरस्त्वदीयं भवपद्मजाद्यै-<br> र्जुष्टं पदं राम नमत्वजस्रम् ॥९३॥ | और मेरे पैर सदा आपके मन्दिरोंकी यात्रा करते रहें ॥ ९२ ॥ हे गरुडध्वज ! मेरा शरीर आपकी चरण-रजसे युक्त तीर्थोदकको धारण करे और मेरा शिर निरन्तर आपके उन चरणोंमें प्रणाम किया करे जिनकी शिव और ब्रह्मा आदि देवगण भी सदैव सेवा करते हैं" ॥ ९३ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे<br>प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीय सर्ग
वालीका वध और भगवान्के साथ उसका सम्भाषण।
श्रीमहादेव उवाच|श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! इस प्रकार अपने संसर्गसे जिसके सब पाप दूर हो गये हैं उस सुग्रीवकी ओर देखते हुए श्रीरघुनाथजी कार्य सिद्ध करनेके लिये उसपर अपनी मोह उत्पन्न करनेवाली मायाका विस्तार करते हुए मुसका कर बोले—"मित्र ! तुमने मुझसे जो कुछ कहा है वह निस्सन्देह सब ठीक है ॥१-२॥ तथापि (यदि तुम राज्यादिसे उपराम हो जाओगे तो) लोग मेरेलिये कहेंगे कि रघुनाथजीने वानरराज सुग्रीवसे अग्निको साक्षी बनाकर मित्रता की; किन्तु उन्होंने उसका कौन-सा काम सिद्ध किया ? ॥ ३ ॥ इस प्रकार लोगोंमें मेरी निन्दा होगी इसमें सन्देह नहीं। अतः तुम्हारा कल्याण हो, तुम अभी जाकर वालीको युद्धके लिये ललकारो ॥ ४ ॥ मैं उसे एक ही वाणसे मारकर तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त कर दूँगा ।" तब सुग्रीव 'बहुत अच्छा' कह तुरन्त ही किष्किन्धापुरीके उपवनमें गया और अति घोर शब्दसे गरजकर वालीको युद्धके लिये पुकारा । इत्थं स्वात्मपरिष्वङ्गनिर्धूताशेषकल्मषम् ।| रामः सुग्रीवमालोक्य सस्मितं वाक्यमब्रवीत् ॥१॥| मायां मोहकरीं तस्मिन्वितन्वन् कार्यसिद्धये ।| सखे त्वदुक्तं यत्तन्मां सत्यमेव न संशयः ॥ २ ॥| किन्तु लोका वदिष्यन्ति मामेवं रघुनन्दनः ।| कृतवान्किं कपीन्द्राय सख्यं कृत्वाऽग्निसाक्षिकम् ३| इति लोकापवादो मे भविष्यति न संशयः ।| तस्मादाह्वय भद्रं ते गत्वा युद्धाय वालिनम्॥ ४॥| बाणेनैकेन तं हत्वा राज्ये त्वामभिषेचये ।| तथेति गत्वा सुग्रीवः किष्किन्धोपवनं द्रुतम् ॥५॥| कृत्वा शब्दं महानादं समाह्वयत वालिनम् ।| तच्छ्रुत्वा भ्रातृनिनदं रोषताम्रविलोचनः ॥ ६॥|भाईका सिंहनाद सुनते ही वालीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह तत्काल अपने घरसे निकलकर वानरराज सुग्रीवके पास आया। उसके आते ही सुग्रीवने तुरन्त उसके वक्षःस्थलमें प्रहार किया ॥५–७॥ इसपर वालीने भी क्रोधातुर होकर सुग्रीवपर अपने दोनों घूँसोंसे प्रहार किया और सुग्रीवने वालीपर आक्रमण किया । इस प्रकार वे दोनों ही अति क्रोध- निर्जगाम गृहाच्छीघ्रं सुग्रीवो यत्र वानरः ।| तमापतन्तं सुग्रीवः शीघ्रं वक्षस्यताडयत् ॥ ७॥| सुग्रीवमपि मुष्टिभ्यां जघान क्रोधमूर्च्छितः ।|
| १६० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
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वाली तमपि सुग्रीव एवं क्रुद्धौ परस्परम् ॥ ८ ॥
अयुद्धेतामेकरूपौ दृष्ट्वा रामोऽतिविस्मितः ।
न मुमोच तदा बाणं सुग्रीववधशङ्कया ॥ ९ ॥
ततो दुद्राव सुग्रीवो वमन् रक्तं भयाकुलः ।
वाली स्वभवनं यातः सुग्रीवो राममब्रवीत् ॥ १० ॥
किं मां घातयसे राम शत्रुगा भ्रातृरूपिणा ।
यदि मद्हनने वाञ्छा त्वमेव जहि मां विभो ॥ ११ ॥
एवं मे प्रत्ययं कृत्वा सत्यवादिन् रघूत्तम ।
उपेक्षसे किमर्थं मां शरणागतवत्सल ॥ १२ ॥
श्रुत्वा सुग्रीववचनं रामः साश्रुविलोचनः ।
आलिङ्ग्य मास्म भैषीस्त्वं दृष्ट्वा वामेकरूपिणौ ॥ १३ ॥
मित्रघातित्वमाशङ्क्य मुक्तवान्सायकं नहि ।
इदानीमेव ते चिह्नं करिष्ये भ्रमशान्तये ॥ १४ ॥
गत्वाऽऽह्वय पुनः शत्रुं हतं द्रक्ष्यसि वालिनम् ।
रामोऽहं त्वां शपे भ्रातर्हनिष्यामि रिपुं क्षणात् ॥ १५ ॥
इत्याश्वास्य स सुग्रीवं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
सुग्रीवस्य गले पुष्पमालामामुच्य पुष्पिताम् ॥ १६ ॥
प्रेषयस्व महाभाग सुग्रीवं वालिनं प्रति ।
लक्ष्मणस्तु तदा बद्ध्वा गच्छ गच्छेति सादरम् ॥ १७ ॥
प्रेषयामास सुग्रीवं सोऽपि गत्वा तथाऽकरोत् ।
पुनरप्यद्भुतं शब्दं कृत्वा वालिनमाह्वयत् ॥ १८ ॥
तच्छ्रुत्वा विस्मितो वाली क्रोधेन महता वृतः ।
बद्ध्वा परिकरं सम्यग्गमनायोपचक्रमे ॥ १९ ॥
गच्छन्तं वालिनं तारा गृहीत्वा निषिषेध तम् ।
पूर्वक एक-दूसरेसे लड़ने लगे। उन दोनोंका रूप ऐसा समान था कि श्रीरामचन्द्रजी उन्हें देखकर आश्चर्य-चकित हो गये (और उनमेंसे कौन वाली है तथा कौन सुग्रीव ? यह न पहचान सके)। अतः इस आशंकासे कि कहीं सुग्रीव न मारा जाय, बाण नहीं छोड़ा ॥ ८-९ ॥
अन्तमें सुग्रीव भयातुर होकर रक्त वमन करता हुआ दौड़ा और वाली अपने घर चला गया। तब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ॥ १० ॥ "हे राम ! क्या आप इस भ्रातारूपी शत्रुसे मुझे मरवाना चाहते हैं। हे प्रभो ! यदि आपकी इच्छा मुझे मरवानेकी ही है तो आप स्वयं ही मार डालिये ॥ ११ ॥ हे सत्यवादी शरणागतवत्सल रघुनाथजी ! मुझे इस प्रकार विश्वास दिलाकर अब आप मेरी उपेक्षा क्यों करते हैं?" ॥ १२ ॥
सुग्रीवके ये वचन सुनकर रामचन्द्रजीने उसे हृदयसे लगा लिया और नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"भैया ! डरो मत, तुम दोनोंको एक रूप देखकर मैंने इस भयसे कि कहीं मित्रका वध न हो जाय, बाण नहीं छोड़ा। अब इस भ्रमको दूर करनेके लिये मैं तुम्हारे शरीरमें कोई चिह्न कर दूँगा ॥ १३-१४ ॥ एक बार तुम फिर जाकर अपने शत्रुको पुकारो। अबकी बार तुम वालीको अवश्य मरा हुआ देखोगे। भैया ! मैं राम तुम्हारी शपथ करके कहता हूँ कि इस बार मैं अवश्य एक क्षणमें ही तुम्हारे शत्रुको मार डालूँगा" ॥ १५ ॥
सुग्रीवको इस प्रकार ढाँढ़स बँधाकर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! सुग्रीवके गलेमें एक फूले हुए पुष्पोंकी माला डाल दो ॥ १६ ॥ और हे महाभाग ! इसे वालीसे लड़नेके लिये भेज दो।" तब लक्ष्मणजीने सुग्रीवके गलेमें पुष्पमाला बाँधकर उससे आदरपूर्वक 'भाई जाओ, जाओ' ऐसा कहकर भेज दिया। सुग्रीवने भी वहाँ पहुँचकर पहलेकी भाँति ही फिर बड़ा विचित्र शब्द करते हुए वालीको पुकारा ॥ १७-१८ ॥
सुग्रीवका शब्द सुनकर वालीको बड़ा विस्मय और साथ ही अत्यन्त क्रोध हुआ और वह अपनी कमर कसकर चलनेके लिये तैयार हो गया ॥ १९ ॥ जाते समय
| सर्ग २ ] | ·किष्किन्धाकाण्ड | १६१ |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न गन्तव्यं त्वयेदानीं शङ्का मेऽतीव जायते ॥२०॥<br><br>इदानीमेव ते भग्नः पुनरायाति सत्वरः।<br>सहायो बलवांस्तस्य कश्चिन्नूनं समागतः ॥२१॥<br><br>वाली तामाह हे सुभ्रु शङ्का ते व्येतु तद्गता ।<br>प्रिये करं परित्यज्य गच्छ गच्छामि तं रिपुम् ॥२२॥<br><br>हत्वा शीघ्रं समायास्ये सहायस्तस्य को भवेत् ।<br>सहायो यदि सुग्रीवस्ततो हत्वोभयं क्षणात् ॥२३॥<br><br>आयास्ये मा शुचः शूरः कथं तिष्ठेद्गृहे रिपुम्।<br>ज्ञात्वाऽप्याह्वयमानं हि हत्वाऽऽयास्यामि सुन्दरि ॥<br><br>तारोवाच<br>मत्तोऽन्यच्छृणु राजेन्द्र श्रुत्वा कुरु यथोचितम् ।<br>आह मामङ्गदः पुत्रो मृगयायां श्रुतं वचः ॥२५॥<br><br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् रामो दाशरथिः किल<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया भार्यया सह ॥२६॥<br><br>आगतो दण्डकारण्यं तत्र सीता हृता किल ।<br>रावणेन सह भ्रात्रा मार्गमाणोऽथ जानकीम् ॥२७॥<br><br>आगतो ऋष्यमूकाद्रिं सुग्रीवेण समागतः ।<br>चकार तेन सुग्रीवः सख्यं चानलसाक्षिकम् ॥२८॥<br><br>प्रतिज्ञां कृतवान् रामः सुग्रीवाय सलक्ष्मणः।<br>वालिनं समरे हत्वा राजानं त्वां करोम्यहम् ॥२९॥<br><br>इति निश्चित्य तौ यातौ निश्चितं शृणु मद्वचः।<br>इदानीमेव ते भग्नः कथं पुनरुपागतः ॥३०॥<br><br>अतस्त्वं सर्वथा वैरं त्यक्त्वा सुग्रीवमानय ।<br>यौवराज्येऽभिषिञ्चाशु रामं त्वं शरणं व्रज ॥३१॥<br>२१ | उसकी स्त्री ताराने उसका हाथ पकड़कर रोका और कहा—"देव ! इस समय आप न जाइये, मेरे हृदयमें बड़ी शंका हो रही है ॥२०॥ यह अभी-अभी आपसे मार खाकर भागा था, तो भी तुरन्त ही लौट आया ! इससे मालूम होता है कि अवश्य ही इसे कोई बलवान् सहायक मिल गया है" ॥२१॥<br><br>वालीने कहा—"हे सुन्दर भृकुटिवाली ! तुम इस विषयमें कोई शंका न करो। हे प्रिये ! मेरा हाथ छोड़कर तुम घर लौट जाओ, मैं भी अभी जाकर उस शत्रुको मारकर लौट आता हूँ। उस (अभागे) को भला कौन सहायक मिलेगा ? और यदि कोई होगा भी, तो मैं एक क्षणमें ही दोनोंको मारकर आ जाऊँगा । हे सुन्दरि ! तुम किसी प्रकारकी चिन्ता न करो। (मैं इस समय रुक नहीं सकता) शत्रुको बाहरसे युद्धके लिये ललकारता हुआ जानकर कोई शूरवीर अपने घरमें कैसे ठहर सकता है ? अतः अब मैं उसे मारकर ही लौटूंगा” ॥ २२—२४॥<br><br>तारा बोली—हे राजेन्द्र ! आप मुझसे कुछ और भी वृत्तान्त सुन लीजिये । उसे सुनकर जो उचित समझें करें। मुझसे आपके पुत्र अंगदने मृगयाके समय (वनमें) सुनी हुई यह बात कही थी ॥ २५ ॥ कि अयोध्याधिपति दशरथनन्दन भगवान् रामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित दण्डकारण्यमें आये थे। वहाँ उनकी प्रिया सीताको रावण हर ले गया। अब वे अपने भाईके सहित जानकी-जीको ढूँढ़ते हुए ऋष्यमूक-पर्वतपर आकर सुग्रीवसे मिले हैं। वहाँ सुग्रीवने उनसे अग्निको साक्षी कर मित्रता जोड़ी है ॥ २६-२८ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीके सहित सुग्रीवसे यह प्रतिज्ञा की है कि मैं युद्धमें वाली-को मारकर तुम्हें राजा बना दूँँगा ॥ २९ ॥ इसी निश्चयको लेकर वे दोनों भी (उसके साथ) आये हैं; मेरी यह बात सच मानिये, नहीं तो अभी-अभी आपसे मार खाकर भागा हुआ वह कैसे लौट आता ? ॥ ३० ॥ इसलिये अब आप सर्वथा सुग्रीवसे वैरभाव छोड़कर उसे ले आइये और उसे तुरन्त युवराजपदपर अभिषिक्त कर श्रीरामकी शरणमें जाइये ॥ ३१ ॥ और हे कपिश्रेष्ठ ! मेरी, अंगदकी तथा इस राज्य और कुलकी रक्षा कीजिये । ऐसा कह- |
| १६२ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
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पाहि मामङ्गदं राज्यं कुलं च हरिपुङ्गव ।
इत्युक्त्वाश्रुमुखी तारा पादयोः प्रणिपत्य तम् ॥३२॥
हस्ताभ्यां चरणौ धृत्वा रुरोद भयविह्वला ।
तामालिङ्ग्य तदा वाली सस्नेहमिदमब्रवीत् ॥३३॥
स्त्रीस्वभावाद्विभेषि त्वं प्रिये नास्ति भयं मम ।
रामो यदि समायातो लक्ष्मणेन समं प्रभुः ॥३४॥
तदा रामेण मे स्नेहो भविष्यति न संशयः ।
रामो नारायणः साक्षादवतीर्णोऽखिलप्रभुः ॥३५॥
भूभारहरणार्थाय श्रुतं पूर्वं मयाऽनघे ।
स्वपक्षः परपक्षो वा नास्ति तस्य परात्मनः ॥३६॥
आनेष्यामि गृहं साध्वि नत्वा तच्चरणाम्बुजम् ।
भजतोऽनुभजत्येष भक्तिगम्यः सुरेश्वरः ॥३७॥
यदि स्वयं समायाति सुग्रीवो हन्मि तं क्षणात् ।
यदुक्तं यौवराज्याय सुग्रीवस्याभिषेचनम् ॥३८॥
कथमाहूयमानोऽहं युद्धाय रिपुणा प्रिये ।
शूरोऽहं सर्वलोकानां सम्मतः शुभलक्षणे ॥३९॥
भीतभीतमिदं वाक्यं कथं वाली वदेत्प्रिये ।
तस्माच्छोकं परित्यज्य तिष्ठ सुन्दरि वेश्मनि॥४०॥
एवमाश्वास्य तारां तां शोचन्तीमश्रुलोचनाम् ।
गतो वाली समुद्युक्तः सुग्रीवस्य वधाय सः ॥४१॥
दृष्ट्वा वालिनमायान्तं सुग्रीवो भीमविक्रमः ।
उत्पपात गले बद्धपुष्पमालः मतङ्गजवत् ॥४२॥
मुष्टिभ्यां ताडयामास वालिनं सोऽपि तं तथा ।
अहन्वाली च सुग्रीवं सुग्रीवो वालिनं तथा ॥४३॥
रामं विलोकयन्नेव सुग्रीवो युयुधे युधि ।
इत्येवं युध्यमानौ तौ दृष्ट्वा रामः प्रतापवान्॥४४॥
बाणमादाय तूणीरादैन्द्रे धनुषि सन्दधे ।
आकृष्य कर्णपर्यन्तमदृश्यो वृक्षखण्डगः ॥४५॥
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कर तारा वालीके चरणोंमें गिर पड़ी। उस समय उसके मुखपर आँसुओंकी धाराएँ बह रही थीं ॥ ३२ ॥ वह भयसे अधीर होकर अपने हाथोंसे उसके दोनों चरण पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगी।
तब वालीने उसका प्रेमपूर्वक आलिंगन कर इस प्रकार कहा ॥ ३३ ॥ "प्रिये! तुम अपने स्त्री-स्वभावसे व्यर्थ डरती हो, मुझे तो भयका कोई भी कारण दिखलायी नहीं देता। यदि लक्ष्मणके सहित प्रभु राम यहाँ आये हैं तो इसमें कोई सन्देह नहीं, कि उनसे मेरा प्रेम हो जायगा। हे अनघे ! राम तो साक्षात् सर्वेश्वर श्रीनारायण हैं, उन्होंने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही अवतार लिया है—यह बात मैंने पहलेसे ही सुन रखी है। वे तो प्रकृति आदिसे परे सबके आत्मारूप हैं उनका कोई अपना या पराया पक्ष नहीं है ॥ ३४-३६ ॥ हे साध्वि ! मैं उनके चरणकमलोंमें प्रणाम कर उन्हें घर ले आऊँगा। वे देव-देवेश्वर भक्तिसे प्राप्त होते हैं और जो कोई उनका भजन करता है उसीके अनुकूल हो जाते हैं ॥ ३७ ॥ और यदि अकेला सुग्रीव ही आया है तो उसे मैं एक क्षणमें मार डालूँगा। इसके सिवा, तुमने जो उसे युवराजपदपर अभिषिक्त करनेकी बात कही, सो हे शुभलक्षणे प्रिये ! मैं सम्पूर्ण लोकोंमें माननीय शूरवीर हूँ। भला शत्रुद्वारा युद्धके लिये पुकारे जानेपर वाली उससे ऐसा अत्यन्त भयपूर्ण वाक्य कैसे कह सकता है ? अतः हे सुन्दरि ! तुम निश्चिन्त होकर घर बैठो" ॥ ३८-४० ॥
इस प्रकार शोकसे आँसू बहाती हुई ताराको धीरज बँधा, वाली सुग्रीवको मारनेपर उतारू होकर चला ॥ ४१ ॥ वालीको आता देख प्रचण्ड पराक्रमी सुग्रीव गलेमें पुष्पमाला पहने हुए मत्त गजराजके समान उछलने लगा ॥ ४२ ॥ फिर सुग्रीवने अपने घूँसोंसे वालीपर और वालीने सुग्रीवपर प्रहार किया। इसी प्रकार परस्पर बारम्बार वाली सुग्रीवपर और सुग्रीव वालीपर मुष्टिकाघात करने लगे ॥ ४३ ॥ युद्ध करते समय सुग्रीवकी दृष्टि रामकी ओर ही लगी हुई थी।
परमप्रतापी श्रीरघुनाथजीने उन दोनोंको इस प्रकार लड़ते देख अपने तरकशसे एक बाण निकाल कर अपने ऐन्द्र धनुषपर चढ़ाया और एक वृक्षकी ओटमें छि-
सर्ग २ ] किष्किन्धाकाण्ड १६३
| निरीक्ष्य वालिनं सम्यग्लक्ष्यं तद्हृदयं हरिः ।<br>उत्ससर्जाशनिसमं महावेगं महाबलः ॥४६॥<br>बिभेद स शरो वक्षो वालिनः कम्पयन्महीम् ।<br>उत्पपात महाशब्दं मुञ्चन्स निपपात ह ॥४७॥<br>तदा मुहूर्त्तं निःसंज्ञो भूत्वा चेतनामपाप सः ।<br>ततो वाली ददर्शग्रे रामं राजीवलोचनम् ।<br>धनुरालम्ब्य वामेन हस्तेनान्येन सायकम् ॥४८॥<br>बिभ्राणं चीरवसनं जटामुकुटधारिणम् ।<br>विशालवक्षसं भ्राजद्वनमालाविभूषितम् ॥४९॥<br>पीनचार्व्वायतभुजं नवदूर्वादलच्छविम् ।<br>सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां च पार्श्वयोः परिसेवितम्॥५०॥ | छिपे धनुषको कर्णपर्यन्त तानकर महाबलवान् श्रीहरिने वालीको देख उसके हृदयको ठीक लक्ष्य करके वह वज्रके समान कठोर और महावेगशाली बाण छोड़ दिया ॥ ४४–४६ ॥ उस बाणने वालीके वक्षःस्थलको वेध डाला । बाणके लगते ही वाली बड़ा घोर शब्द करता हुआ उछलकर पृथिवीपर गिर पड़ा । उसके गिरते समय पृथिवी डगमगा उठी ॥ ४७ ॥ उस समय एक मुहूर्त्तके लिये वह संज्ञाशून्य हो गया; पीछे जब उसे चेत हुआ तो उसने अपने सामने कमलनयन श्रीरघुनाथजीको खड़े देखा । वे बायें हाथसे धनुषका सहारा लेकर दाहिनेमें बाण लिये हुए थे तथा शरीरमें चीरवस्त्र और शिरपर जटाओंका मुकुट धारण किये थे। उनका विशाल वक्षःस्थल मनोहर वनमालासे विभूषित था ॥ ४८-४९ ॥ भुजाएँ स्थूल, सुन्दर और लम्बी-लम्बी थीं, शरीरकी कान्ति नवीन दूर्वादलके समान श्यामवर्ण थी तथा उनके दोनों ओर सुग्रीव और लक्ष्मण उनकी सेवामें खड़े थे ॥ ५० ॥ |
| विलोक्य शनकैः प्राह वाली रामं विगर्हयन् ।<br>किं मयाऽपकृतं राम तव येन हतोऽस्म्यहम् ॥५१॥<br>राजधर्ममविज्ञाय गर्हितं कर्म ते कृतम् ।<br>वृक्षखण्डे तिरोभूत्वा त्यजता मयि सायकम्॥५२॥<br>यशः किं लप्स्यसे राम चोरवत्कृतसङ्गरः ।<br>यदि क्षत्रियदायादो मनोर्व्वंशसमुद्भवः ॥५३॥<br>युद्धं कृत्वा समक्षं मे प्राप्स्यसे तत्फलं तदा ।<br>सुग्रीवेण कृतं किं ते मया वा न कृतं किमु ॥५४॥<br>रावणेन हृता भार्या तव राम महावने ।<br>सुग्रीवं शरणं यातस्तदर्थमिति शुश्रुम ॥५५॥<br>बत राम न जानीषे मद्बलं लोकविश्रुतम् ।<br>रावणं संकुलं बद्ध्वा ससीतं लङ्कया सह ॥५६॥<br>आनयामि मुहूर्त्तार्द्धाद्यदि चेच्छामि राघव । | रामचन्द्रजीको देखकर वालीने कुछ तिरस्कार करते हुए मन्दस्वरमें कहा—“हे राम ! मैंने आपका क्या बिगाड़ा था, जो आपने मुझे मारा ॥ ५१ ॥ राजनीति को न जाननेके कारण ही आपने ऐसा निन्दनीय कार्य किया है। इस प्रकार वृक्षकी आड़में छिपकर मुझपर बाण छोड़ते हुए चोरके समान युद्ध करनेसे आपको क्या यश मिलेगा ? यदि आप क्षत्रियकुमार हैं और आपका जन्म मनुजीके पवित्र वंशमें हुआ है, तो मेरे सामने आकर युद्ध किया होता, तब आपको उसका (यश अथवा स्वर्गरूप) कोई फल भी मिलता । हे राम ! सुग्रीवने आपके साथ ऐसा कौन-सा उपकार किया था और मैंने क्या नहीं किया ? ॥ ५२-५४ ॥ मैंने तो यही सुना है कि दण्डकारण्यमें रावण आपकी भार्याको हर ले गया था; उसे पानेके लिये ही आपने सुग्रीवकी शरण ली है ॥ ५५ ॥ किन्तु खेद है कि आपने मेरा विश्वविख्यात बल नहीं सुना । हे राघव ! मैं यदि चाहूँ तो आधे मुहूर्त्तमें ही रावणको कुलसहित बाँधकर |
| १६४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
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धर्मिष्ठ इति लोकेऽस्मिन् कथ्यसे रघुनन्दन ॥५७॥
वानरं व्याधवद्धत्वा धर्मं कं लप्स्यसे वद ।
अभक्ष्यं वानरं मांसं हत्वा मां किं करिष्यसि ॥५८॥
इत्येवं बहु भाषन्तं वालिनं राघवोऽब्रवीत् ।
धर्मस्य गोप्ता लोकेऽस्मिंश्चरामि सशरासनः॥५९॥
अधर्मकारिणं हत्वा सद्धर्मं पालयाम्यहम् ।
दुहिता भगिनी भ्रातृभार्या चैव तथा स्नुषा ॥६०॥
समा यो रमते तासामेकामपि विमूढधीः ।
पातकी स तु विज्ञेयः स वध्यो राजभिः सदा॥६१॥
त्वं तु भ्रातुः कनिष्ठस्य भार्यायां रमसे बलात् ।
अतो मया धर्मविदा हतोऽसि वनगोचर ॥६२॥
त्वं कपित्वान्न जानीषे महान्तो विचरन्ति यत् ।
लोकं पुनानाः सञ्चारैस्तस्मान्नातिभाषयेत् ॥६३॥
तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्तो ज्ञात्वा रामं रमापतिम् ।
वाली प्रणम्य रभसाद्रामं वचनमब्रवीत् ॥६४॥
राम राम महाभाग जाने त्वां परमेश्वरम् ।
अजानता मया किञ्चिदुक्तं तत्क्षन्तुमर्हसि ॥६५॥
साक्षात्त्वच्छरघातेन विशेषेण तवाग्रतः ।
त्यजाम्यसूनन्महायोगािदुर्लभं तव दर्शनम् ॥६६॥
यन्नाम विवशो गृह्णन् म्रियमाणः परं पदम् ।
याति साक्षात्स एवाद्य मुमूर्षोर्मे पुरः स्थितः ॥६७॥
देव जानामि पुरुषं त्वां श्रियं जानकीं शुभाम् ।
रावणस्य वधार्थाय जातं त्वां ब्रह्मणार्यितम् ॥६८॥
सीताजी और लंकाके सहित ले आऊँ। और हे रघुनन्दन ! आप तो संसारमें बड़े धर्मात्मा कहे जाते हैं॥ ५६-५७ ॥
बताइये, एक वानरको व्याधके समान मारकर आपको क्या पुण्य मिलेगा ? वानरका मांस तो अभक्ष्य है फिर मुझे मारकर आप क्या करेंगे ?' ॥ ५८ ॥
वालीके इस प्रकार बहुत कुछ कहनेपर रघुनाथजीने कहा—"मैं धर्मकी रक्षा करनेके लिये ही लोकमें धनुष धारण कर विचरता हूँ ॥ ५९ ॥ और अधर्म करनेवालोंको मारकर सद्धर्मका पालन करता हूँ। पुत्री, बहिन, (छोटे) भाईकी स्त्री और पुत्रवधू ये चारों समान हैं। जो मूढ़ इनमेंसे किसी एकके साथ भी रमण करता है उसे महापापी जानना चाहिये; राजाको उचित है कि उसे अवश्य मार डाले ॥ ६०-६१ ॥
अरे वनचर ! तू बलात्कारसे अपने छोटे भाईकी स्त्रीके साथ रमण करता था इसीलिये मुझ धर्मज्ञने तुझे मारा है ॥ ६२ ॥ तू वानर ही तो है; तुझे इस बातका पता नहीं है कि महापुरुष सदैव अपने आचरणोंसे लोकोंको पवित्र करते हुए विचरा करते हैं। इसलिये उनसे इस प्रकार बढ़-बढ़कर बातें न करनी चाहिये" ॥ ६३ ॥
भगवान्के ये वचन सुनकर वाली उन्हें साक्षात् लक्ष्मीपति श्रीनारायण जानकर भयभीत हो गया और उन्हें शीघ्रतासे प्रणाम करके बोला—॥ ६४ ॥ "हे राम ! हे राम ! हे महाभाग ! मैं जान गया, आप साक्षात् परमेश्वर हैं। अज्ञानवश मैं जो कुछ कह गया हूँ उसे आप क्षमा करें ॥ ६५ ॥
हे प्रभो ! आपका दर्शन तो बड़े-बड़े योगियोंको भी अत्यन्त दुर्लभ है; बड़े भाग्यकी बात है कि मैं आपहीके बाणसे विद्ध होकर फिर आपहीके सामने प्राण छोड़ रहा हूँ ॥ ६६ ॥
मरते समय विवश होकर भी जिनका नाम लेनेसे पुरुष परम-पद प्राप्त कर लेता है, वही आप आज इस अन्तिम घड़ीपर साक्षात् मेरे सामने विराजमान हैं ॥ ६७ ॥
हे देव ! मैं यह जानता हूँ कि आप साक्षात् परमपुरुष नारायण हैं और जानकीजी लक्ष्मी हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे रावणका वध करनेके लिये ही आपने अवतार लिया है ॥ ६८ ॥ हे राम ! अब मैं
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ३: ताराका विलाप, श्रीरामचन्द्रजीका उसे समझाना तथा सुग्रीवका राज्याभिषेक
सर्ग ३ ] किष्किन्धाकाण्ड : १६५
अनुजानीहि मां राम यान्तं त्वत्पदमुत्तमम् । मम तुल्यबले बाले अङ्गदे त्वं दयां कुरु ॥ ६९ ॥
विशल्यं कुरु मे राम हृदयं पाणिना स्पृशन् । तथेति बाणमुद्धृत्य रामः पस्पर्श पाणिना । त्यक्त्वा तद्वानरं देहममरेन्द्रोऽभवत्क्षणात् ॥ ७० ॥
वाली रघूत्तमशराभिहतो विमृष्टो रामेण शीतलकरेण सुखाकरेण । सद्यो विमुच्य कपिदेहमनन्यलभ्यं प्राप्तं परं परमहंसगणैर्दुरापम् ॥ ७१ ॥
आपके सर्वश्रेष्ठ परमधामको जा रहा हूँ, आप मुझे आज्ञा दीजिये । मेरा बालक अंगद मेरे ही समान बलशाली है, उसपर आप दयादृष्टि रखें ॥ ६९ ॥
हे राम ! मेरे हृदयको अपने कर-कमलोंसे स्पर्शकर इस बाणको निकाल दीजिये।" तब रामचन्द्रजीने 'अच्छा' कह उसे स्पर्श करते हुए वह बाण निकाल दिया । उसके निकलते ही वाली वानर-शरीर छोड़कर इन्द्र-रूप हो गया ॥ ७० ॥
हे पार्वति ! वाली रघुनाथजीके बाणसे मारा गया था और फिर उसे उनके सुखमय कर-कमलका शीतल स्पर्श भी मिला । अतः वह शीघ्र ही अपना वानर-देह छोड़कर उस परम श्रेष्ठ पदको प्राप्त हुआ जो और किसीके लिये बहुत ही दुर्लभ है। और तो क्या, महान् परमहंसोंको भी उसका मिलना अत्यन्त कठिन है ॥ ७१ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
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तृतीय सर्ग
ताराका विलाप, श्रीरामचन्द्रजीका उसे समझाना तथा सुग्रीवका राजपद प्राप्त करना ।
श्रीमहादेव उवाच
निहते वालिनि रणे रामेण परमात्मना । दुद्रुवुर्वानराः सर्वे किष्किन्धां भयविह्वलाः ॥ १ ॥
तारामूचुर्महाभागे हतो वाली रणाजिरे । अङ्गदं परिरक्षाद्य मन्त्रिणः परिनोदय ॥ २ ॥
चतुर्द्वार कपातादीन् बद्ध्वा रक्षामहे पुरीम् । वानराणां तु राजानमङ्गदं कुरु भामिनि ॥ ३ ॥
निहतं वालिनं श्रुत्वा तारा शोकविमूर्च्छिता । अताडयत्स्वपाणिभ्यां शिरो वक्षश्च भूरिशः ॥ ४ ॥
किमङ्गदेन राज्येन नगरेण धनेन वा । इदानीमेव निधनं यास्यामि पतिना सह ॥ ५ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! परमात्मा रामके द्वारा युद्धमें वालीके मारे जानेपर समस्त वानरगण भयसे व्याकुल होकर किष्किन्धापुरीमें दौड़े गये ॥ १ ॥
और तारासे बोले— "हे महाभागे ! वानरराज वाली युद्धक्षेत्रमें मारे गये । अब आप राजकुमार अंगदकी रक्षा कीजिये और मन्त्रियोंको सावधान कर दीजिये ॥ २ ॥
हे भामिनि ! हमलोग चारों द्वारोंके किवाड़ आदि लगाकर नगरकी रक्षा करते हैं, आप अंगदको वानरोंका राजा बनाइये" ॥ ३ ॥
वालीको मरा हुआ सुनकर तारा शोकसे मूर्च्छित हो गयी और अपने शिर और छातीको बारम्बार हाथोंसे पीटने लगी ॥ ४ ॥
और बोली, "मुझे अंगद, राज्य, नगर और धन आदिसे क्या काम है, मैं तो अभी अपने पतिदेवके साथ ही प्राण त्याग करूँगी" ॥ ५ ॥ ऐसा कह वह रोती हुई तुरन्त ही वहाँ
१६६ अध्यात्मरामायण [सर्ग ३
इत्युक्त्वा त्वरिता तत्र रुदती मुक्तमूर्धजा ।
ययौ ताराऽतिशोकार्ता यत्र भर्तृकलेवरम् ॥ ६ ॥
पतितं वालिनं दृष्ट्वा रक्तैः पांसुभिरावृतम् ।
रुदती नाथनाथेति पतिता तस्य पादयोः ॥ ७ ॥
करुणं विलपन्ती सा ददर्श रघुनन्दनम् ।
राम मां जहि बाणेन येन वाली हतस्त्वया ॥ ८ ॥
गच्छामि पतिसालोक्यं पतिर्मामभिकाङ्क्षते ।
स्वर्गेऽपि न सुखं तस्य मां विना रघुनन्दन ॥ ९ ॥
पत्नीवियोगजं दुःखमनुभूतं त्वयाऽनघ ।
वालिने मां प्रयच्छाशु पत्नीदानफलं भवेत् ॥ १० ॥
सुग्रीव त्वं सुखं राज्यं दापितं वालिघातिना ।
रामेण रुमया सार्धं भुङ्क्ष्व सापत्नवजितम् ॥ ११ ॥
इत्येवं विलपन्तीं तां तारां रामो महामनाः ।
सान्त्वयामास दयया तत्त्वज्ञानोपदेशतः ॥ १२ ॥
किं भीरु शोचसि व्यर्थं शोकस्याविषयं पतिम् ।
पतिस्तवायं देहो वा जीवो वा वद तत्त्वतः ॥ १३ ॥
पञ्चात्मको जडो देहस्त्वङ्मांसरुधिरास्थिमान् ।
कालकर्मगुणोत्पन्नः सोऽप्यास्तेऽद्यापि ते पुरः ॥ १४ ॥
मन्यसे जीवमात्मानं जीवस्तर्हि निरामयः ।
न जायते न म्रियते न तिष्ठति न गच्छति ॥ १५ ॥
न स्त्री पुमान्न षण्ढो वा जीवः सर्वगतोऽव्ययः ।
एक एवाद्वितीयोऽयमाकाशवदलेपकः ।
नित्यो ज्ञानमयः शुद्धः स कथं शोकमर्हति ॥ १६ ॥
गयी जहाँ उसके पतिका देह पड़ा हुआ था, उस समय वह अत्यन्त शोकाकुल थी और उसके बाल बिखरे हुए थे ॥ ६ ॥ वहाँ वालीको रक्त और धूलिसे लथपथ पड़ा देख वह 'हा नाथ ! हा नाथ !' कहकर रोती हुई उसके पैरोंपर गिर पड़ी ॥ ७ ॥
इस प्रकार करुणक्रन्दन करते हुए उसकी दृष्टि श्रीरघुनाथजीपर पड़ी । (उन्हें देखकर वह बोली—) "राम ! आपने जिस बाणसे वालीको मारा है उसीसे मुझे भी मार डालिये ॥ ८ ॥ जिससे मैं तुरन्त ही पति-लोकको चली जाऊँ; वे मेरी बाट देख रहे होंगे, क्योंकि हे रघुनन्दन ! मेरे विना उन्हें स्वर्गमें भी चैन नहीं होगा ॥ ९ ॥ हे अनघ ! पत्नीके वियोगका दुःख आपने अनुभव किया ही है (अतः आपको उसकी तीव्रताका अनुमान हो ही सकता है।) इसलिये अब आप मुझे वालीके पास पहुँचा दीजिये । इससे आपको स्त्री-दानका फल मिलेगा ॥ १० ॥ सुग्रीव ! तुम्हें वालीको मारनेवाले रामने राज्य दिला ही दिया है । अब उस निष्कण्टक राज्यको तुम रुमाके साथ सुखपूर्वक भोगो" ॥ ११ ॥
इस प्रकार विलाप करती हुई उस ताराको महामना रामने दयापूर्वक तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर शान्त किया ॥ १२ ॥ वे बोले—"अयि भीरु ! तेरा पति शोक करनेयोग्य नहीं है, तू उसके लिये व्यर्थ क्यों शोक करती है ? तू विचारकर ठीक-ठीक बता वास्तवमें तेरा पति यह देह है या इसमें रहनेवाला जीव ? (यदि यह देह ही तेरा पति है तो) यह तो जड, पञ्चभूतजय एवं त्वचा, मांस, रुधिर और अस्थियोंसे बना हुआ है तथा काल, कर्म और गुणोंसे उत्पन्न हुआ है; और वह तो अब भी तेरे सामने पड़ा है । (फिर उसके लिये शोक क्यों करती है ?) ॥ १३-१४ ॥ और यदि तू जीवको अपना पति मानती है तो भी तुझे शोक न करना चाहिये क्योंकि वह निर्विकार है। वह न उत्पन्न होता है, न मरता है, न स्थिर रहता है और न आता-जाता है ॥ १५ ॥ जीव सर्वव्यापी और अव्यय है, वह स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक कुछ भी नहीं है बल्कि एक, अद्वितीय, आकाशके समान निर्लेप, नित्य, ज्ञानमय और शुद्ध है फिर वह शोचनीय कैसे हो सकता है ?" ॥ १६ ॥
सर्ग ३ ]
किष्किन्धाकाण्ड
१६७
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तारोवाच<br>देहोऽचित्काष्ठवद्राम जीवो नित्यश्चिदात्मकः ।<br>सुखदुःखादिसम्बन्धः कस्य स्याद्राम मे वद ॥१७॥ | तारा बोली- हे राम ! देह तो काष्ठके समान जड है और जीव नित्य तथा चैतन्यरूप है, (उसका नाश हो नहीं सकता) फिर सुख-दुःखादिका सम्बन्ध किससे होता है, यह मुझे बतलाइये ॥ १७ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>अहङ्कारादिसम्बन्धो यावद्देहेन्द्रियैः सह ।<br>संसारस्तावदेव स्यादात्मनस्त्वविवेकिनः ॥१८॥ | श्रीरामचन्द्रजी बोले- जबतक देह और इन्द्रियोंके साथ 'मैं' 'मेरापन' आदिका सम्बन्ध रहता है तबतक आत्मा और अनात्माके विवेकसे रहित जीवका सुख-दुःखादिके भोगरूप संसारसे सम्बन्ध रहता है ॥ १८ ॥ |
| मिथ्याऽऽरोपितसंसारो न स्वयं विनिवर्तते ।<br>विषयान्ध्यायमानस्य स्वप्ने मिथ्याऽऽगमो यथा ॥१९॥ | यह संसार आत्मामें मिथ्या ही आरोपित हुआ है तथापि ज्ञानोदयके बिना यह अपने-आप निवृत्त नहीं होता; जिस प्रकार विषयोंका निरन्तर ध्यान करनेवाले पुरुषको स्वप्नमें अनेक पदार्थ दीखते हैं, परन्तु वे होते मिथ्या ही हैं ॥१९॥ |
| अनाद्यविद्यासम्बन्धात्तत्कार्याहङ्कृतेस्तथा ।<br>संसारोऽपार्थकोऽपि स्याद्रागद्वेषादिसङ्कुलः ॥२०॥ | अनादि अविद्या और उसके कार्य अहंकारके सम्बन्धसे स्थित हुआ यह संसार निरर्थक (अत्यन्त मिथ्या) होते हुए भी राग-द्वेष आदिसे पूर्ण है ॥ २० ॥ |
| मन एव हि संसारो बन्धश्चैव मनः शुभे ।<br>आत्मा मनः समानत्वमेत्य तद्गतबन्धभाक् ॥२१॥ | हे शुभे ! मन ही संसार है और मन ही बन्धन है । उस अनात्म वस्तु मनके साथ (अन्योन्याध्याससे) एक हो जानेसे ही यह आत्मा तद्गत सुख-दुःखादिके बन्धनमें पड़ता है ॥ २१ ॥ |
| यथा विशुद्धः स्फटिकोऽलक्तकादिसमीपगः ।<br>तत्तद्वर्णयुगाभाति वस्तुतो नास्ति रञ्जनम् ॥२२॥ | जैसे स्फटिकमणि स्वभावसे शुक्लवर्ण होने पर भी लाख आदिके समीप होनेपर उसीके रंगकी मालूम होने लगती है, परन्तु वास्तवमें उसमें वह रंग नहीं होता ॥ २२ ॥ |
| बुद्धीन्द्रियादिसामीप्यादात्मनः संसृतिर्बलात् ।<br>आत्मा स्वलिङ्गं तु मनः परिगृह्य तदुद्भवन् ॥२३॥<br><br>कामान् जुषन् गुणैर्बद्धः संसारे वर्ततेऽवशः ।<br>आदौ मनोगुणान् सृष्ट्वा ततः कर्माण्यनेकधा ॥२४॥<br><br>शुक्ललोहितकृष्णानि गतयस्तत्समानतः ।<br>एवं कर्मवशाज्जीवो भ्रमत्याभूतसम्प्लवम् ॥२५॥ | वैसे ही बुद्धि और इन्द्रिय आदिकी सन्निधिसे आत्माको बलात्कारसे संसारकी प्रतीति होती है। आत्मा, अपने लिंग (पहचाननेके साधन) मनको स्वीकार कर उससे प्राप्त होनेवाले विषयोंका सेवन करता हुआ उसके राग-द्वेषादि गुणोंमें बँधकर विवश हो संसार-चक्रमें फँसा रहता है। पहले वह राग-द्वेषादि मनके गुणोंकी रचना करता है और फिर (उनके योगसे) नाना प्रकारके कर्म करता है । वे कर्म शुक्ल (जप, ध्यानादि) लोहित (हिंसामय यज्ञ-यागादि) और कृष्ण (मद्यपानादि पापकर्म) तीन प्रकारके होते हैं । उन कर्मोंके अनुसार ही उसकी गतियाँ होती हैं । इस प्रकार यह जीव कर्मोंके वशीभूत होकर प्रलय-पर्यन्त आवागमनके चक्रमें पड़ा रहता है ॥२३-२५॥ |
| सर्वोपसंहृतौ जीवो वासनाभिः स्वकर्मभिः ।<br>अनाद्यविद्यावशगास्तिष्ठत्यभिनिवेशतः ॥२६॥ | प्रलयकालमें सब भूतोंका लय हो जानेपर भी अपने कर्त्ता-भोक्तापनके अभिनिवेशसे यह अपनी... |
| १६८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सृष्टिकाले पुनः पूर्ववासनामानसैः सह ।<br>जायते पुनरप्येवं घटीयन्त्रमिवावशः ॥२७॥ | वासनाओं और कर्मोंके साथ अनादि अविद्यासे आच्छादित हुआ रहता है ॥२६॥ जब नवीन सृष्टि आरम्भ होती है तो यह विवश होकर अपनी पूर्व वासनाओंसे युक्त मनके सहित घटीयन्त्रके समान फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ २७ ॥ |
| यदा पुण्यविशेषेण लभते सङ्गतिं सताम् ।<br>मद्भक्तानां सुशान्तानां तदा मद्विषया मतिः ॥२८॥ | जिस समय किसी विशेष पुण्यपरिपाकसे इसे मेरे भक्त और शान्तचित्त महात्माओंकी संगति मिलती है उस समय इसका चित्त मेरी ओर लगता है ॥ २८ ॥ |
| मत्कथाश्रवणे श्रद्धा दुर्लभा जायते ततः ।<br>ततः स्वरूपविज्ञानमनायासेन जायते ॥२९॥ | उससे मेरी कथा सुननेमें इसकी श्रद्धा होती है, जो बहुत ही दुर्लभ है। मेरी कथा सुननेसे इसको अनायास ही मेरे स्वरूपका ज्ञान हो जाता है ॥ २९ ॥ |
| तदाचार्यप्रसादेन वाक्यार्थज्ञानतः क्षणात् ।<br>देहेन्द्रियमनःप्राणाहङ्कृतिभ्यः पृथक्स्थितम् ॥३०॥ | उस समय गुरु-कृपाद्वारा तत्त्वमसि आदि महावाक्योंके अर्थ-ज्ञानसे तथा स्वयं अपने अनुभवसे भी यह अपने सच्चिदानन्दस्वरूप अद्वितीय आत्माको देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और अहंकारादिसे पृथक् जानकर एक क्षणमें ही तुरन्त मुक्त हो जाता है। हे तारे ! मैंने यह वास्तविक सत्य तुझसे कह दिया ॥ ३०-३१ ॥ |
| स्वात्मानुभवतः सत्यमानन्दात्मानमद्वयम् ।<br>ज्ञात्वा सद्यो भवेन्मुक्तः सत्यमेव मयोदितम् ॥३१॥ | |
| एवं मयोदितं सम्यगालोचयति योऽनिशम् ।<br>तस्य संसारदुःखानि न स्पृशन्ति कदाचन ॥३२॥ | मेरे कहे हुए इस परमार्थ-ज्ञानका जो अहर्निश मनन करता है उसे सांसारिक दुःख कभी स्पर्श नहीं करते ॥ ३२ ॥ |
| त्वमप्येतन्मया प्रोक्तमालोचय विशुद्धधीः ।<br>न स्पृश्यसे दुःखजालैः कर्मबन्धाद्विमोक्ष्यसे ॥३३॥ | तू भी शुद्ध-चित्त होकर मेरे इस उपदेशका मनन कर । ऐसा करनेसे क्लेश-कलाप तुझे छू भी न सकेंगे और तू कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जायगी ॥ ३३ ॥ |
| पूर्वजन्मनि ते सुभ्रु कृता मद्भक्तिरुत्तमा ।<br>अतस्तव विमोक्षाय रूपं मे दर्शितं शुभे ॥३४॥ | हे सुभ्रु ! अपने पूर्वजन्ममें तूने मेरी उत्कृष्ट भक्ति की थी, इसीलिये हे सुन्दरि ! तुझे मुक्त करनेके लिये मैंने अपना दर्शन दिया है ॥ ३४ ॥ |
| ध्यात्वा मद्रूपमनिशमालोचय मयोदितम् ।<br>प्रवाहपतितं कार्यं कुर्वन्त्यपि न लिप्यसे ॥३५॥ | तू रात-दिन मेरे रूपका ध्यान करती हुई मेरे उपदेशका मनन कर । ऐसा करनेसे प्रारब्ध-क्रमसे प्राप्त हुए कर्मोंको करती हुई भी तू उनसे लिप्त न होगी ॥ ३५ ॥ |
| श्रीरामेणोदितं सर्वं श्रुत्वा ताराऽतिविस्मिता ।<br>देहाभिमानजं शोकं त्यक्त्वा नत्वा रघूत्तमम् ॥३६॥ | भगवान् रामका यह अद्भुत उपदेश सुनकर ताराको बड़ा ही विस्मय हुआ और उसने देहाभिमानजनित शोक छोड़कर श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया, तथा आत्मानुभवसे सन्तुष्ट होकर वह तत्काल जीवन्मुक्त हो गयी । |
| आत्मानुभवसन्तुष्टा जीवन्मुक्ता बभूव ह ।<br>क्षणसङ्गममात्रेण रामेण परमात्मना ॥३७॥ | परमात्मा रामके क्षणमात्रके सत्संगसे वह अनादि अविद्याके बन्धनको काटकर निष्पाप और मुक्त हो गयी । |
| अनादिबन्धं निर्धूय मुक्ता साऽपि विकल्मषा ।<br>सुग्रीवोऽपि च तच्छ्रुत्वा रामवक्त्रात्समीरितम् ॥३८॥ | भगवान्के श्रीमुखका वक्तव्य सुनकर सुग्रीवका भी समस्त अज्ञान जाता रहा और वह शान्त- |