अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
६३६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
(मतान्तरके अनुसार उसके सिरके केश ऊपरकी ओर उठे रहते हैं।) वह लगुडधारी है। उसका स्थान जया-विजयाके बाह्यभागमें है। इस प्रकार पूजन करके सिद्धिके लिये हवनीय द्रव्योंद्वारा योन्याकार कुण्डमें हवन करे॥११-१४॥
उज्ज्वल धान्यसे हवन करनेपर सुवर्ण-लाभ होता है। गोधूमसे हवन करनेपर पुष्टि-सम्पत्ति प्राप्त होती है। जौ, धान्य (चावल) और तिलोंकी मिश्रित हवनसामग्रीसे हवन करनेपर सब प्रकारकी सिद्धि सुलभ होती है तथा ईतिभयका नाश हो जाता है। बहेड़ेका हवन किया जाय तो शत्रुको उन्माद हो जाता है। सेमरसे हवन करनेपर शत्रुके प्रति मारणका प्रयोग सफल होता है। जामुनके फलकी आहुतियाँ दी जायँ तो उनसे धन-धान्यकी प्राप्ति होती है। नील कमलके हवनसे तुष्टि होती है। लाल कमलोंद्वारा होम करनेसे महापुष्टि होती है। कुन्दके फूलोंसे होम किया जाय तो महान् अभ्युदय होता है। मल्लिका-कुसुमोंसे हवन करनेपर ग्राम या नगरमें क्षोभ होता है। कुमुद-कुसुमोंकी आहुतिसे साधक सब लोगोंका प्रिय हो जाता है॥१५-१७॥
अशोक-सुमनोंसे होम किया जाय तो पुत्रकी और पाटलासे होम करनेपर उत्तम अङ्गनाकी प्राप्ति होती है। आम्रफलकी आहुतिसे आयु, तिलोंके हवनसे लक्ष्मी, बिल्वके होमसे श्री तथा चम्पाके फूलोंके हवनसे धनकी प्राप्ति होती है। महुएके फूलों और बेलके फलोंसे एक साथ होम करनेपर सर्वज्ञता-शक्ति सुलभ होती है। त्वरितामन्त्रके तीन लाख जप, होम, ध्यान तथा पूजनसे समस्त अभिलषित वस्तुओंकी प्राप्ति होती है। मण्डलमें त्वरितादेवीकी अर्चना करके त्वरिता-गायत्रीसे पचीस आहुतियाँ दे। फिर मूलमन्त्रसे पल्लवोंकी तीन सौ आहुतियाँ देकर दीक्षा ग्रहण करे। दीक्षासे पूर्व पञ्चगव्य-पान कर ले। दीक्षितावस्थामें सदा चरु (हविष्य)-का भोजन करना चाहिये॥१८-२०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरितापूजा-कथन' नामक तीन सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ॥३०९॥
तीन सौ दसवाँ अध्याय
अपरत्वरिता-मन्त्र एवं मुद्रा आदिका वर्णन
**अग्निदेव कहते हैं—**मुने! अब मैं दूसरी 'अपरा विद्या' का वर्णन करता हूँ, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। धूलिसे निर्मित, वज्र-चिह्नसे आवृत और चौकोर भूपुरमण्डलमें त्वरितादेवीकी पूजा करे। उस मण्डलके भीतर योगपीठपर कमलका निर्माण भी होना चाहिये। मण्डलके पूर्वादि दिशाओं तथा कोणोंमें कुल मिलाकर आठ वज्र अङ्कित होंगे। मण्डलके भीतर वीथी, द्वार, शोभा तथा उपशोभाकी भी रचना करे। उसके भीतर उपासक मनुष्य त्वरितादेवीका चिन्तन करे। उनके अठारह भुजाएँ हैं। उनकी बायीं जङ्घा तो सिंहकी पीठपर प्रतिष्ठित है और दाहिनी जङ्घा उससे दुगुनी बड़ी आकृतिमें पीढ़े या खड़ाऊँपर अवलम्बित है। वे नागमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। दायें भागके हाथोंमें क्रमशः वज्र, दण्ड, खड्ग, चक्र, गदा, शूल, बाण, शक्ति तथा वरद मुद्रा धारण करती हैं और वामभागके हाथोंमें क्रमशः धनुष, पाश, शर, घण्टा, तर्जनी, शङ्ख, अङ्कुश, अभयमुद्रा तथा वज्र नामक आयुध लिये रहती हैं॥१-५॥
त्वरितादेवीके पूजनसे शत्रु का नाश होता है। त्वरिताका आराधक राज्यको भी अनायास ही जीत लेता है। वह दीर्घायु तथा राष्ट्रकी विभूति बन जाता है। दिव्य और अदिव्य (दैविक और
- अध्याय ३१० * | ६३७ ---|---
लौकिक) सभी सिद्धियाँ उसके अधीन हो जाती हैं। (त्वरिताको 'तोतला त्वरिता' भी कहते हैं। इस नामकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये—) 'तल' शब्दसे सातों पाताल, काल, अग्नि और सम्पूर्ण भुवन गृहीत होते हैं। ॐकारसे परमेश्वरसे लेकर जितना भी ब्रह्माण्ड है, उन सबका प्रतिपादन होता है। अपने मन्त्रके आदि अक्षर ॐकारसे देवी तलपर्यन्त 'तोय'का त्वरित भ्रामण (प्रक्षेपण) करती हैं, इसलिये वे 'तोतला त्वरिता' कही गयी हैं॥ ६-७$\frac{१}{२}$॥
अब मैं त्वरिता-मन्त्रको प्रस्तुत करनेका प्रकार (अर्थात् मन्त्रोद्धार) बता रहा हूँ। भूतलपर स्वरवर्ग लिखे। (स्वरवर्गमें सोलह अक्षर हैं—अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः। इसके बाद व्यञ्जन वर्णोंको भी वर्गक्रमसे लिखे—) कवर्गके लिये सांकेतिक नाम तालुवर्ग है। स्वरवर्ग पहला है और तालुवर्ग दूसरा। तीसरा जिह्वा-तालुकवर्ग है। (इसमें चवर्गके अक्षर संयोजित हैं।) चतुर्थ वर्ग तालु-जिह्वाग्र कहा गया है। (इसमें टवर्गके अक्षर हैं।) पञ्चम जिह्वादन्तक वर्ग है। (इसमें तवर्गके अक्षर हैं।) षष्ठ वर्गका नाम है—ओष्ठपुट-सम्पन्न। (इसमें पवर्गके अक्षर हैं।) सातवाँ मिश्रवर्ग है। (इसमें अन्तःस्थ—य, र, ल, वका समावेश है।) आठवाँ वर्ग ऊष्मा या शवर्ग है। इन्हीं वर्गोंके अक्षरोंसे मन्त्रका उद्धार करे॥ ८-१०॥
छठे स्वर ऊकारपर आरूढ़ ऊष्माका द्वितीय अक्षर हकार बिन्दु (अनुस्वार)-से युक्त हो (हूं)। तालुवर्गका द्वितीय अक्षर 'खकार' ग्यारहवें स्वर 'एकार'से युक्त हो (खे)। जिह्वा-तालु-समायोगका केवल प्रथम अक्षर 'चकार' हो, उसके नीचे उसी वर्गका दूसरा अक्षर 'छकार' हो और वह ग्यारहवें स्वर 'एकार'से संयुक्त (च्छे) हो। तालुवर्गका प्रथम अक्षर 'क्' हो, फिर उसके नीचे ऊष्माका द्वितीय अक्षर 'ष्'को देखकर जोड़ दे और उसे सोलहवें स्वर—'अः'से संयुक्त करे (क्षः)। ऊष्माका तीसरा अक्षर 'स्' हो, उसके नीचे जिह्वादन्त-समायोगके प्रथम अक्षर 'तकार'को जोड़े। उसके नीचे मिश्रवर्गका दूसरा अक्षर 'रकार' जोड़े और उसे चौथे स्वर 'ईकार'से जोड़ दे—(स्त्री)। तदनन्तर तालुवर्गके आदि अक्षर 'क्' के नीचे ऊष्माका द्वितीय अक्षर 'ष्' जोड़ दे और उसको ग्यारहवें स्वरसे मिला दे—(क्षे)। इसके बाद ऊष्माके अन्तिम अक्षर 'हकार'को अनुस्वारयुक्त करके पाँचवें स्वरपर आरूढ़ कर दे (हुं)। ओष्ठसम्पुटयोगसे दूसरा अक्षर 'फ्' और जिह्वाग्र तालुयोगसे द्वितीय अक्षर 'ट्'को पञ्चम 'ण'के रूपमें परिणत करके जोड़ना चाहिये। स्वर तथा अर्द्ध-व्यञ्जन वर्णोंके साथ उद्धृत हुए—ये अक्षर 'तोतला त्वरिता'के मन्त्र हैं। इनके आदिमें ॐकार और अन्तमें 'नमः' जोड़नेपर जो मन्त्र बने, उसका तो जप करे, किंतु अग्निकार्य (हवन)-में 'नमः'को हटाकर 'स्वाहा' जोड़ देना चाहिये। (तात्पर्य यह है कि 'ॐ हूं खे च्छे क्षः स्त्री क्षे हुं फट् नमः।'—यह जपमन्त्र है और 'ॐ हूं खे च्छे क्षः स्त्री क्षे हुं फट् स्वाहा'—यह हवनोपयोगी मन्त्र है) ॥ ११–१८॥
इसका अङ्गन्यास इस प्रकार है—ॐ ह्रीं हूं हः हृदयाय नमः। हां हः शिरसे स्वाहा। ह्रीं ज्वल ज्वल शिखायै वषट्। हनु हनु (अथवा हुलु हुलु), कवचाय हुम्। ह्रीं श्रीं क्षूं नेत्रत्रयाय वौषट्। नवाँ (फ) और आधा अक्षर (ट्) रूप जो तोतला-त्वरिता-विद्या है, उसीको देवीका नेत्र कहा गया है। 'क्षौं हः खौं हूं फट् अस्त्राय फट्।' ये गुह्य अङ्गमन्त्र हैं। इनका पहले न्यास करे॥ १९-२०॥
त्वरिताके अङ्गोंका वर्णन आगे चलकर करूँगा। इस समय त्वरिता-विद्याके अङ्गोंका वर्णन मुझसे सुनो—प्रथम दो बीजाक्षर या मन्त्राक्षर हृदय हैं, तीसरा और चौथा—ये दो अक्षर स्थिर हैं, पाँचवाँ और छठा—ये अक्षर शिखाके मन्त्र
६३८ * अग्निपुराण *
कहे गये हैं। सातवाँ और आठवाँ कवच-मन्त्र हैं, नवाँ और आधा अक्षर तारक (फट्) है। यही नेत्र कहा गया है। (प्रयोग - ॐ हूं हृदयाय नमः। खे च्छे शिरसे स्वाहा। क्षः स्त्री शिखायै वषट्। क्षे हुम् कवचाय हुम्। फट् नेत्रत्रयाय वौषट्।) ॥ २१-२२ ॥
‘तोतले वज्रतुण्डे ख ख हूं’— इन दस अक्षरोंसे युक्त ‘वज्रतुण्डिका’ नामक ‘इन्द्रदूतिका विद्या’ है। ‘खेचरि ज्वालिनि ज्वाले ख ख’— इन दस अक्षरोंसे युक्त ‘ज्वालिनी विद्या’ है। ‘वर्चे शरविभीषणि (अथवा शवरि भीषणि) ख खे’— यह दशाक्षरा ‘शबरी विद्या’ है। ‘छे छेदनि करालिनि ख ख’— यह दशाक्षरा ‘कराली विद्या’ है। ‘क्षः श्रव द्रव प्लवङ्गि ख खे’— यह दशाक्षर ‘प्लवङ्गदूती विद्या’ है। ‘स्त्रीबलं कलिधुननि शासी’— यह दशाक्षरा ‘श्वसनवेगिका विद्या’ है। ‘क्षे पक्षे कपिले हंस’— यह दशाक्षरा ‘कपिलादूतिका विद्या’ है। ‘हूं तेजोवति रौद्रि मातङ्गि’— यह दशाक्षरा ‘रौद्री’ दूतिका है ‘पुटे पुटे ख ख खड्गे फट्’— यह दशाक्षरा ‘ब्रह्मदूतिका विद्या’ है। ‘वैताली’ में उक्त सभी मन्त्र दशाक्षर होते हैं। अन्य विस्तारकी बातें पुआलकी भाँति सारहीन हैं। उन्हें छोड़ देना चाहिये। न्यास आदिमें हृदयादि अङ्गोंका उपयोग है। नेत्रका सुधी पुरुष मध्यमें न्यास करे॥ २३–२८॥
पैरसे लेकर मस्तकतक तथा मस्तकसे लेकर पैरोंतक चरण, जानु, ऊरु, गुह्य, नाभि, हृदय तथा कण्ठदेशसे मुखमण्डलपर्यन्त ऊपर-नीचे आदिबीजसे निर्गत सोमरूप ‘अकार’, जो अमृतकी धारा एवं सुवाससे परिपूर्ण है, ब्रह्मरन्ध्रसे मुझमें प्रवेश कर रहा है, ऐसा साधक चिन्तन करे। मन्त्रोपासक मूर्धा, मुख, कण्ठ, हृदय, नाभि, गुह्य, ऊरु, जानु और पैरोंमें तथा तर्जनी आदिमें आदिबीजका बारंबार न्यास करे। ऊपर अमृतमय सोम है, नीचे बीजाक्षररूप शरीर-कमल है। इस गूढ़ रहस्यको जो जानता है, उसकी मृत्यु नहीं होती है। इस मन्त्रके जपसे रोग-व्याधिका अभाव हो जाता है। न्यास और ध्यानपूर्वक त्वरितादेवीका पूजन और उनके मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे*॥ २९–३३॥
अब मैं ‘प्रणीता’ आदि मुद्राओंका वर्णन
* ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में त्वरिता-नित्याका प्रयोग संक्षेपसे इस प्रकार उपलब्ध होता है— अन्यत्र कथित आसनादि योगपीठन्यासान्त कर्म करके त्वरिता-विद्याद्वारा तीन प्राणायाम करके निम्नाङ्कित रूपसे विनियोग करे—‘अस्य त्वरितमन्त्रस्य सौरिऋषिर्विराट्छन्दः त्वरिता नित्या देवता स्त्री कवचम्। ॐ बीजं हुं शक्तिः क्षे कीलकम् ममाभीष्टसिद्धये जपे विनियोगः।’ इसका न्यासवाक्य इस प्रकार है—‘सौरये ऋषये नमः शिरसि। विराट्छन्दसे नमः मुखे। त्वरितानित्यादेवतायै नमः हृदि। ॐ बीजाय नमः गुह्ये। हुं शक्तये नमः पादयोः। क्षे कीलकाय नमः नाभौ।’ अग्निपुराणमें दशाक्षरा ‘तोतला-त्वरिता’का मन्त्र है। परंतु ‘श्रीविद्यार्णव’ में द्वादशाक्षरा त्वरिता-विद्या बतायी गयी है। यथा—‘ॐ ह्रीं हुं खे च छे क्षः स्त्री हुं क्षे ह्रीं फट्।’ आदिके तीन और अन्तके दो अक्षर छोड़कर जो शेष सात अक्षर बचते हैं, उन्हींसे दो-दो अक्षर जोड़ते हुए न्यास करे। यथा—‘ॐ खे च हृदयाय नमः। च छे शिरसे स्वाहा। छे क्षः शिखायै वषट्। क्षः स्त्री कवचाय हुम्। स्त्री हुं नेत्रत्रयाय वौषट्। हुं क्षे अस्त्राय फट्।’ इसी तरह करन्यास भी करे। तत्पश्चात्—‘शिरसि—ह्रीं ॐ ह्रीं नमः।’ ललाटे—ह्रीं हुं ह्रीं नमः। कण्ठे—ह्रीं खे ह्रीं नमः। हृदि—ह्रीं च ह्रीं नमः। नाभौ—ह्रीं छे ह्रीं नमः। मूलाधारे—ह्रीं क्षः ह्रीं नमः। ऊरुद्वये—ह्रीं स्त्री ह्रीं नमः। जानुद्वये—ह्रीं हुं ह्रीं नमः। जङ्घाद्वये—ह्रीं क्षे ह्रीं नमः। पादद्वये—ह्रीं फट् ह्रीं नमः।’ इस प्रकार ‘ह्रीं’ बीजसे सम्पुटित अक्षरोंका न्यास करके समस्त विद्या (द्वादशाक्षरविद्या) द्वारा व्यापकन्यास करे। तदनन्तर ध्यानादि मानसपूजनान्त कर्म करके स्वर्णादि पट्टपर कुङ्कुम आदिद्वारा पश्चिमादि द्वारोंसे युक्त दो चतुरस्र रेखा बनाकर, उसके भीतर दो वृत्त बनाकर उसमें अष्टदलकमल अङ्कित करे। फिर पूर्ववत् आत्मपूजान्त कर्म करके भुवनेश्वरीपीठकी अर्चनाके बाद मूलविद्यासे मूर्तिनिर्माण कर आवाहनादि पुष्पोपचार अर्पित करे। कर्णिकामें षडङ्ग, गुरुपङ्क्तित्रयकी पूजाके बाद बाहरकी वृत्तत्रयान्तररालगत्त दो वीथियोंमें देवीके अग्रवर्ती दलके अग्रभागमें फटकायिका, बाह्यवीथी—देवीके अग्रभागमें हीं किंकराका, द्वारपार्श्वमें जया-विजयाका, आठ दलोंमें क्रमशः हुंकारी, खेचरी, चण्डा, छेदिनी, क्षेपिणी, स्त्रीकारी, हुंकारी एवं क्षेमकारीकी पूजा करे। फिर पूर्ववत् लोकपालादिकोंकी पूजा करके पूजा समाप्त करे।
- अध्याय ३११ * ६३९
करूँगा। 'प्रणीता' मुद्राएँ पाँच प्रकारकी मानी गयी हैं—'प्रणीता', 'सबीजा प्रणीता', 'भेदनी', 'कराली' और 'वज्रतुण्डा'। दोनों हाथोंको परस्पर ग्रथित करके बीचमें अँगूठोंको डाल दे और तर्जनीको ऊपर लगाये रखे, इसका नाम 'प्रणीता' है। इसे हृदयदेशमें लगाये। इसी मुद्रामें कनिष्ठिका अँगुलीको ऊपरकी ओर उठाकर मध्यमें रखे तो वह द्विजोँद्वारा 'सबीजा' के नामसे मानी जाती है। यदि तर्जनीके बीचमें अनामिकाको परस्पर संलग्न करके अङ्गुष्ठके अग्रभागको मध्यभागमें रखे तो वह 'भेदनी' मुद्रा कही गयी है। उस मुद्राको नाभिदेशमें निबद्ध करके अङ्गुष्ठका जल छिड़के। उसीको मन्त्रसाधकके हृदयमें योजित करनेपर 'कराली' नामक महामुद्रा होती है। फिर पूर्ववत् ब्रह्मलग्ना ज्येष्ठाको ऊपर उठाये तो वह 'वज्रतुण्डा मुद्रा' होती है। उसको वज्रदेशमें आबद्ध करे। दोनों हाथोंसे मणिबन्ध (कलाई)-को बाँधे और तीन-तीन अँगुलियोंको फैलाये रखे, इसे 'वज्रमुद्रा' कहते हैं। दण्ड, खड्ग, चक्र और गदा आदि मुद्राएँ उनकी आकृतिके अनुसार बतायी गयी हैं। अङ्गुष्ठसे तीन अँगुलियोंको आक्रान्त करे, वे तीनों ऊर्ध्वमुख हों तो 'त्रिशूलमुद्रा' होती है। एकमात्र मध्यमा अँगुली ऊपरकी ओर उठी रहे तो 'शक्तिमुद्रा' सम्पादित होती है। बाण, वरद, धनुष, पाश, भार, घण्टा, शङ्ख, अङ्कुश, अभय और पद्म—ये (प्रणीतासे लेकर पद्मतक कुल) अट्ठाईस मुद्राएँ कही गयी हैं। ग्रहणी, मोक्षणी, ज्वालिनी, अमृता और अभया—ये पाँच 'प्रणीता' नामवाली मुद्राएँ हैं। इनका पूजन और होममें उपयोग करना चाहिये॥ ३४—३७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरितामन्त्र तथा मुद्रा आदिका वर्णन' नामक तीन सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१०॥
तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय
त्वरिता-मन्त्रके दीक्षा-ग्रहणकी विधि
अग्निदेव कहते हैं— मुने! अब सिंहासनपर स्थित वज्रसे व्याप्त कमलमें मन्त्र-न्यासपूर्वक दीक्षा आदिका विधान बताऊँगा॥ १॥
'हे हे हुति वज्रदन्त पुरु पुरु लुलु गर्ज गर्ज इह सिंहासनाय नमः*।' यह सिंहासनके पूजनका मन्त्र है। चार रेखा खड़ी और चार रेखा तिरछी या (पड़ी) खींचे। इस प्रकार नौ भागोंके विभाग करके विद्वान् पुरुष नौ कोष्ठ बनाये। प्रत्येक दिशाके कोष्ठ तो रख ले और कोणवर्ती कोष्ठ मिटा दे। अब बाह्य दिशामें जो कोष्ठ बच जाते हैं, उनके कोणोंतक जो रेखाएँ आयी हैं, उनकी संख्याएँ आठ कही गयी हैं। बाह्यकोष्ठके बाह्य-भागमें ठीक बीचों-बीचमें वज्रका मध्यवर्ती शृङ्ग होता है। बाह्यरेखाके दो भाग करनेपर जो रेखार्द्ध बनता है, उतना ही बड़ा शृङ्ग होना चाहिये। बाहरी रेखा टेढ़ी होनी चाहिये। विद्वान् पुरुष उसे द्विभङ्गी बनाये। मध्यवर्ती कोष्ठको कमलकी आकृतिमें परिणत करे। वह पीले रंगकी कर्णिकासे सुशोभित हो। काले रंगके चूर्णसे कुलिशचक्र बनाकर उसके ऊपरी सिरे या शृङ्गकी आकृति खड्गाकार बनाये। चक्रके बाह्यभागमें चौकोर (भूपुर-चक्र) लिखे, जो वज्रसम्पुटसे चिह्नित हो। भूपुरके द्वारपर मन्त्रोपासक चार वज्रसम्पुट दिलाये। पद्म और वामवीथी सम होनी चाहिये।
* पूनासे प्रकाशित 'अग्निपुराण' के प्राचीन और नवीन संस्करणोंमें 'सिंहासन-मन्त्र' का पाठ इस प्रकार मिलता है—'तु तु हेति वजदेति पुरु पुरु लुलु गर्ज गर्ज ह ह सिंहाय नमः।'
६४० * अग्निपुराण *
कमलका भीतरी भाग (कर्णिका) और केसर लाल रंगके लिखे और मण्डलमें स्त्रियोंको दीक्षित करके मन्त्र-जपका अनुष्ठान करवाये तो राजा शीघ्र ही परराष्ट्रोंपर विजय पाता है और यदि अपना राज्य छिन गया हो तो उसे भी वह शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है। प्रणव-मन्त्र (ॐकार)-से संदीप्त (अतिशय तेजस्विनी) की हुई मूर्तिको हुंकारसे नियोजित करे। ब्रह्मन्! वायु तथा आकाशके बीज (यं हं)-से सम्पुटित मूलविद्याका उच्चारण करके आदि और अन्तमें भी कर्णिकामें पूजन करे। इस प्रकार प्रदक्षिण-क्रमसे आदिसे ही एक-एक अक्षरलूप बीजका उच्चारण करते हुए कमलदलोंमें पूजन करना चाहिये॥ २-११॥
दलोंमें विद्याके अङ्गोंकी पूजा करे। आग्नेय दिशासे लेकर वामक्रमसे नैर्ऋत्य-दिशातक हृदय, सिर, शिखा, कवच तथा नेत्र—इन पाँच अङ्गोंकी पूजा करके मध्यभाग (कर्णिका)-में पुनः नेत्रकी तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें अस्त्रकी पूजा करनी चाहिये। गुह्याङ्गमें रक्षाकी तथा केसरोंमें वाम-दक्षिण-पार्श्वमें विद्यमान पाँच-पाँच हुतियोंकी अपने-अपने नाम-मन्त्रोंसे पूजा करे। गर्भमण्डलके बाह्यभागमें आठ लोकपालोंका न्यास करे। वर्णान्त (क्ष या ह)-को अग्नि (र)-के ऊपर चढ़ाकर उसे छठे स्वर (ऊ)-से विभेदित करे और पंद्रहवें स्वर (ं) बिन्दुओंको उसके सिरपर चढ़ाकर उस (क्षूं) (अथवा हूं) बीजको* आदिमें रखकर दिक्पालोंके अपने-अपने नाममन्त्रोंसे संयुक्त करके उनकी पूजा करे। फिर शीघ्र ही सिंहासनपर कमलकी कर्णिकामें गन्ध आदि उपचारोंद्वारा पूजन करे। इससे श्रीकी प्राप्ति होती है॥ १२-१५॥
तदनन्तर एक सौ आठ मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित आठ कलशोंद्वारा कमलको वेष्टित कर दे। फिर एक हजार बार मन्त्र-जप करके दशांश होम करे। पहले अग्नि-मन्त्र (रं)-से कुण्डमें अग्निको ले जाय और हृदयमन्त्र (नमः)-से उसको वहाँ स्थापित करे। साथ ही कुण्डके भीतर अग्नियुक्त शक्तिका ध्यान करे। तदनन्तर उस शक्तिमें गर्भाधान, पुंसवन तथा जातकर्म-संस्कारके उद्देश्यसे हृदयमन्त्रद्वारा एक सौ आठ बार होम करे। फिर गुह्याङ्गके द्वारसे नूतन अग्निके जन्म होनेकी भावना करे। फिर मूलविद्याके उच्चारणपूर्वक पूर्णाहूति दे। इससे शिवाग्निका जन्म सम्पादित होता है। फिर मूलमन्त्रसे उसमें सौ आहुतियाँ दे। तत्पश्चात् अङ्गोंके उद्देश्यसे दशांश होम करे। इसके बाद शिष्यको देवीके हाथमें सौंपे और उसका मण्डलमें प्रवेश कराये। फिर अस्त्र-मन्त्रसे ताड़न करके गुह्याङ्गोंका न्यास करे। विद्याके अङ्गोंसे संनद्ध शिष्यको विद्याङ्गोंमें नियोजित करे। उसके द्वारा पुष्पका प्रक्षेप करवाये तथा उसे अग्निकुण्डके समीप ले जाय। तदनन्तर जौ, धान्य, तिल और घीसे मूलविद्याके उच्चारणपूर्वक सौ आहुतियाँ दे। प्रथम होम स्थावरयोनिमें पहुँचाकर उससे मुक्ति दिलाता है और दूसरा सरीसृप (साँप, बिच्छू आदि)-की योनिसे। तदनन्तर क्रमशः पक्षी, मृग, पशु और मानव-योनिकी प्राप्ति और उससे मुक्ति होती है। फिर क्रमशः ब्रह्मपद, विष्णुपद तथा अन्तमें रुद्रपदकी प्राप्ति होती है। अन्तमें पूर्णाहूति कर देनी चाहिये। एक आहुतिसे शिष्य दीक्षित होता है और उसे मोक्षप्राप्तिका अधिकार मिल जाता है। अब मोक्ष कैसे होता है, यह सुनो॥ १६-२४॥
जब मन्त्रोपासक सुमेरुपर सदाशिवपदमें स्थित हो तो दूसरे दिन स्वस्थचित्त होकर अकर्म और कर्मक्षयके लिये एक हजार आहुतियाँ दे। फिर पूर्णाहूति करके मन्त्रयोगी पुरुष धर्म-अधर्मसे लिप्त
* तन्त्रशास्त्रमें वर्णमालाका अन्तिम अक्षर 'क्ष' है, इसके अनुसार 'क्षूं' बीज बनता है। यदि वर्णान्त शब्दसे 'ह' लिया जाय तो 'हूं' बीज बनेगा।
- अध्याय ३१२ * ६४१
नहीं होता है, मोक्ष प्राप्त कर लेता है। वह उस परमपदको पहुँच जाता है, जहाँ जाकर मनुष्य फिर इस संसारमें नहीं लौटता। जैसे जलमें डाला हुआ जल उसमें मिलकर एकरूप हो जाता है, उसी प्रकार जीव शिवमें मिलकर शिवरूप हो जाता है। जो कलशोंद्वारा अभिषेक करता है, वह विजय तथा राज्य आदि सब अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न कुमारी कन्याका पूजन करे तथा गुरु आदिको दक्षिणा दे। प्रतिदिन पूजा करके एक सहस्र आहुतियाँ अग्निमें देनी चाहिये। तिल और घीसे पूर्ण आहुति देनेपर त्वरिता देवी लक्ष्मी एवं अभिमत वस्तु देती हैं। वे विपुल भोग प्रदान करती हैं तथा और भी जो कुछ साधक चाहता है, उसे माता त्वरिता पूर्ण करती हैं। मन्त्रके जितने अक्षर हैं, उतने लाख जप करनेसे मनुष्य निधियोंका अधिपति होता है, दुगुना जप करनेपर राज्यकी प्राप्ति होती है, त्रिगुण जप करे तो यक्षिणी सिद्ध हो जाती है, चौगुने जपसे ब्रह्मपद, पाँचगुने जपसे विष्णुपद तथा छःगुने जपसे महासिद्धि सुलभ होती है। मन्त्रके एक लाख जपसे मनुष्य अपने पापोंका नाश कर देता है, दस बार जप करनेसे देहशुद्धि होती है, सौ बारके जपसे तीर्थस्नानका फल होता है। वेदीपर पट या प्रतिमा रखकर उसके समक्ष सौ, हजार अथवा दस हजारकी संख्यामें जप करके हवन करना बताया गया है। इस प्रकार विधानपूर्वक जप करके एक लाख हवन करे। तिल, जौ, लावा, धान, गेहूँ, कमल-पुष्प (पाठान्तरके अनुसार आमके फल) तथा श्रीफल (बेल) - इन सबको एकत्र करके इनमें घी मिलावे और उस होम-सामग्रीसे हवन करके व्रत करे। रातमें कवच आदिसे संनद्ध हो खड्ग, धनुष तथा बाण आदि लेकर एक वस्त्र धारण करके उपर्युक्त वस्तुओंसे ही देवीकी पूजा करे। वस्त्रका रंग चितकबरा, लाल, पीला, काला अथवा नीला होना चाहिये। मन्त्रवेत्ता विद्वान् दक्षिणदिशामें जाकर मण्डपके द्वारपर दूती-मन्त्रसे बलि अर्पित करे। यह बलि द्वार आदिमें अथवा एक वृक्षवाले श्मशानमें भी दी जा सकती है। ऐसा करनेसे साधक राजा हो समस्त कामनाओंका तथा सारी पृथ्वीके राज्यका उपभोग कर सकता है॥ २५-३७॥
'इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरिता-मूलमन्त्रकी दीक्षा आदिका कथन' नामक तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३११॥
तीन सौ बारहवाँ अध्याय त्वरिता-विद्यासे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं-मुने! अब मैं विद्याप्रस्तावका वर्णन करूँगा, जो धर्म, काम आदिकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। नौ कोष्ठोंके विभागसे विद्याभेदकी उपलब्धि होती है। अनुलोम-विलोमयोग, समास-व्यासयोग, कर्णाविकर्णयोग, अध-ऊर्ध्व-विभागयोग तथा त्रित्रिकयोगसे देवीके द्वारा जिसके शरीरकी सुरक्षा सम्पादित हुई है, वह साधक सिद्धिदायक मन्त्रों तथा बहुत-से निर्गत प्रस्तावोंको जानता है। शास्त्र-शास्त्रमें मन्त्र बताये गये हैं, किंतु वहाँ उनके प्रयोग दुर्लभ हैं। प्रथम गुरु वर्ण ही होता है। उसका पूर्वकालमें वर्णन नहीं हुआ है। वहाँ प्रस्तावमें एकाक्षर, द्वयक्षर तथा त्र्यक्षर मन्त्र प्रकट हुए। चार-चार खड़ी तथा पड़ी रेखाएँ खींचे। इस प्रकार नौ कोष्ठ होते हैं। मध्यकोष्ठसे आरम्भ करके प्रदक्षिणक्रमसे मन्त्रके अक्षरोंका उनमें न्यास करे। तदनन्तर प्रस्ताव-भेदन करे। प्रस्तावक्रमयोगसे जो प्रस्तावको प्राप्त करता है, उस साधककी
६४२ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
मुट्ठीमें सारी सिद्धियाँ आ जाती हैं। सारी त्रिलोकी उसके चरणोंमें झुक जाती है। वह नौ खण्डोंमें विभक्त जम्बूद्वीपकी सम्पूर्ण भूमिपर अधिकार प्राप्त कर लेता है। कपाल (खप्पर)-पर अथवा श्मशानके वस्त्र (शवके ऊपरसे उतारे हुए कपड़े)- पर सब ओर शिवतत्त्व लिखकर मन्त्रवेत्ता पुरुष बाहर निकले और मध्यभागमें कर्णिकाके ऊपर अभीष्ट व्यक्तिविशेषका भोजपत्रपर नाम लिखकर रख दे। फिर खैरकी लकड़ीसे तैयार किये गये अङ्गारोंद्वारा उस भोजपत्रको तपाकर दोनों पैरोंके नीचे दबा दे। यह प्रयोग एक ही सप्ताहमें चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिभुवनको भी चरणोंमें ला सकता है। वज्रसम्पुट गर्भसे युक्त द्वादशारचक्रके मध्यमें द्वेष्य व्यक्तिका नाम लिखकर रखे। उस नामको 'सदाशिव' मन्त्रसे विदर्भित (कुशोंद्वारा मार्जित) कर दे। उक्त द्वादशारचक्र तथा नाम आदिका उल्लेख हल्दीसे दीवारपर, काष्ठफलकपर अथवा शिलापट्टपर करना चाहिये। ऐसा करनेसे शत्रुके मुख, गमनशक्ति तथा सेनाका भी स्तम्भन (अवरोध) हो जाता है॥ १-१२॥
श्मशानके वस्त्रपर विषमिश्रित रक्तसे षट्कोणचक्रका उल्लेख कर उसके मध्यमें शत्रुुका नाम लिखे। फिर उस चक्रको चारों ओर शक्तिबीजसे योजित करके उसपर डंडा रख दे। फिर साधक श्मशानभूमिपर रखे हुए उस शत्रुपर शीघ्र दण्डसे प्रहार करे। यह प्रयोग उस शत्रु-राजाके राष्ट्रको खण्डित कर देता है। इसी तरह चक्राकार मण्डल बनाकर उसके मध्यभागमें शत्रुके नामको स्थापित कर दे। चक्रकी धारामें शक्तिबीजका न्यास करे। शत्रुुका नाम लेकर उसपर भावनाद्वारा उक्त चक्रधारसे प्रहार करे। इससे शत्रुुका हरण होता है। इसी प्रकार खड्गके मध्यभागमें गरुडबीजके साथ शत्रुुका नाम लिखकर उसका पूर्ववत् विदर्भीकरण करे। उक्त नाम श्मशानभूमिकी चिताके कोयलेसे लिखना चाहिये। उसपर चिताके भस्मसे प्रहार करे। ऐसा करनेसे साधक एक ही सप्ताहमें शत्रुके देशको अपने अधिकारमें कर लेता है। वह छेदन, भेदन और मारणमें शिवके समान शक्तिशाली हो जाता है। तारक (फट्)- को नेत्र कहा गया है। उसका शान्ति-पुष्टिकर्ममें नियोग करे। यह दहनादि प्रयोग शाकिनीको भी आकर्षित कर लेता है। पूर्वोक्त नौ चक्रोंमें मध्यगत मन्त्राक्षरसे लेकर पश्चिम-दिशावर्ती कोष्ठकके दो अक्षरोंको वक्रतुण्ड-मन्त्रके साथ जपनेसे कुष्ठ आदि जितने भी चर्मगत रोग हैं, उन सबका नाश हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। (यह अध- ऊर्ध्व-विभागयोग है।) मध्यकोष्ठसे उत्तरवर्ती कोष्ठकके दो अक्षरवाले मन्त्रको 'करालीबन्ध' के साथ जप करे तो वह द्व्यक्षरी-विद्या, यदि साक्षात् शिव प्रतिवादी हों तो उनसे भी अपनी रक्षा करवाती है। इसी प्रकार पश्चिमगत मन्त्राक्षरको आदिमें रखकर उत्तर कोष्ठकके मन्त्राक्षरोंको 'वक्रतुण्ड-मन्त्र'के साथ जप किया जाय तो ज्वर तथा खाँसीका नाश होता है। उत्तरकोष्ठसे लेकर मध्यकोष्ठकके मन्त्राक्षरोंका एक-एक साथ जप किया जाय तो साधककी इच्छासे वटके बीजमें गुरुता (भारीपन) आ सकती है। इसी तरह पूर्वादि-मध्यमान्त अक्षरोंके जपसे वह तत्काल उसमें लघुता (हल्कापन) ला सकता है। भोजपत्रपर गोरोचनाद्वारा वज्रसे व्याप्त भूपूरचक्र लिखकर, अनुलोमक्रमसे स्थित मन्त्र-बीजोंको लिखकर, उसे मन्त्रवत् धारण करके साधक अपने शरीरकी रक्षा करे। भावपूर्वक सुवर्णमें मढ़ाकर धारण किया गया यह 'रक्षायन्त्र' मृत्युका भी नाश करनेवाला होता है। वह विघ्न, पाप तथा शत्रुओंका दमन करनेवाला है तथा सौभाग्य और दीर्घायु देनेवाला है। यह 'रक्षायन्त्र' धारण किया जाय तो वह जूआ तथा युद्धमें भी विजयदायक होता है। इन्द्रकी सेनाके साथ संग्राम हो तो उसमें भी वह विजय दिलाता
- अध्याय ३१३ * | ६४३ ---|---
है, इसमें संशय नहीं है। यह 'रक्षायन्त्र' वन्ध्याको भी पुत्र देनेवाला तथा दूसरी चिन्तामणिके समान मनोवाञ्छाकी पूर्ति करनेवाला है। इससे रक्षित हुआ मनुष्य परराष्ट्रोंपर भी अधिकार पाता है तथा राज्य और पृथ्वीको जीत लेता है। 'फट् स्त्रीं क्षें हूं'—इन चार अक्षरोंका एक लाख जप करनेसे यक्ष आदि भी वशीभूत हो जाते हैं॥ १३—२५॥
'इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरिता-विद्यासे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन' नामक तीन सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१२॥
तीन सौ तेरहवाँ अध्याय
नाना मन्त्रोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— अब मैं सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् विनायक (गणेश)-के पूजनकी विधि बताऊँगा। योगपीठपर प्रथम तो आधारशक्तिकी पूजा करे। फिर अग्नि आदि कोणों तथा पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य—इन आठकी अर्चना करे। तदनन्तर कन्द, नाल, पद्म, कर्णिका, केसर और सत्त्वादि तीन गुणोंकी और पद्मासनकी पूजा करे। इसके बाद तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, सुयशा (भोगदा), कामरूपिणी, उग्रा, तेजोवती, सत्या तथा विघ्ननाशिनी—इन नौ शक्तियोंकी पूजा करे। तत्पश्चात् गणेशजीकी मूर्तिका अथवा मूर्तिके अभावमें ध्यानोक्त गणपतिमूर्तिका पूजन करे। इसके बाद हृदयादि अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके प्रयोगवाक्य इस प्रकार हैं—'गणंजयाय हृदयाय नमः। एकदन्ताय उत्कटाय शिरसे स्वाहा। अचलकर्णिने शिखायै वषट्। गजवक्त्राय हुं फट् कवचाय हुम्। महोदराय दण्डहस्ताय अस्त्राय फट्*।'—इन पाँच अङ्गोंमेंसे चारकी तो पूर्वादि चार दिशाओंमें और पाँचवेंकी मध्यभागमें पूजा करे॥ १—४॥
तदनन्तर गणंजय, गणाधिप, गणनायक, गणेश्वर, वक्रतुण्ड, एकदन्त, उत्कट, लम्बोदर, गजवक्त्र और विकटानन—इन सबकी पद्मदलोंमें पूजा करे। फिर मध्यभागमें—'हूं विघ्ननाशनाय नमः। महेन्द्राय-धूम्रवर्णाय नमः।'—यों बोलकर विघ्ननाशन एवं धूम्रवर्णकी पूजा करे। फिर बाह्यभागमें विघ्नेशका पूजन करे॥ ५-६॥
अब मैं 'त्रिपुराभैरवी'के पूजनकी विधि बताऊँगा। इसमें आठ भैरवोंका पूजन करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं—असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, चण्डभैरव, क्रोधभैरव, उन्मत्तभैरव, कपालिभैरव, भीषणभैरव तथा संहारभैरव। ब्राह्मी आदि मातृकाएँ भी पूजनीय हैं। (उनके नाम इस प्रकार हैं—ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा तथा महालक्ष्मी)। 'अकार' आदि ह्रस्व स्वरोंके बीजको आदिमें रखकर
* 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में षडङ्गन्यासके जो प्रयोगवाक्य दिये गये हैं, वे यहाँके मूलभागसे कुछ भिन्नता रखते हैं। उनमें करन्यास एवं अङ्गन्यास एक साथ निर्दिष्ट हैं, यथा—'अङ्गुष्ठयोः गणंजयाय स्वाहा हृदयाय नमः। तर्जन्योः एकदंष्ट्राय हुं फट् शिरसे स्वाहा। मध्यमयोः अचलकर्णिने नमो नमः शिखायै वषट्। अनामिकयोः गजवक्त्राय नमो नमः कवचाय हुम्। कनिष्ठिकयोः महोदराय चण्डाय हुं फट् अस्त्राय फट्।' इसमें करन्यासगत वाक्योंमें करतल-करपृष्ठको और अङ्गन्यासगत वाक्योंमें नेत्रको छोड़ दिया गया है। षडङ्गपक्षमें हृदयादि अङ्गोंका न्यास अथवा पूजन बीजमन्त्रसे करना चाहिये। यथा—'गां हृदयाय नमः। गीं शिरसे स्वाहा। गूं शिखायै वषट्। गैं कवचाय हुम्। गौं नेत्रत्रयाय वौषट्। गः अस्त्राय फट्।' इनमेंसे चार अङ्गोंका तो आराध्य देवताके चारों दिशाओंमें और नेत्र तथा अस्त्रका मध्यवर्ती स्थान-देवताके अग्रभागमें पूजन करना चाहिये।
६४४
- अग्निपुराण *
भैरवोंकी पूजा करनी चाहिये तथा 'आकार' आदि दीर्घ अक्षरोंके बीजको आदिमें रखकर 'ब्राह्मी' आदि मातृकाओंकी अर्चना करनी चाहिये$^१$। अग्नि आदि चार कोणोंमें चार वटुकोंका पूजन कर्तव्य है। समयपुत्र वटुक, योगिनीपुत्र वटुक, सिद्धपुत्र वटुक तथा चौथा कुलपुत्र वटुक—ये चार वटुक हैं। इनके अनन्तर आठ क्षेत्रपाल पूजनीय हैं। इनमें 'हेतुक' क्षेत्रपाल प्रथम हैं और 'त्रिपुरान्त' द्वितीय। तीसरे 'अग्निवेताल' चौथे 'अग्निजिह्व', पाँचवें 'कराल' तथा छठे 'काललोचन' हैं। सातवें 'एकपाद' तथा आठवें 'भीमाक्ष' कहे गये हैं। (ये सभी क्षेत्रपाल यक्ष हैं।) इन सबका पूजन करके त्रिपुरादेवीके प्रेतरूप पद्मासनकी पूजा करे। यथा—'ऐं क्षं प्रेतपद्मासनाय नमः। ॐ ऐं ह्रीं हसौः त्रिपुरायै प्रेतपद्मासनसमास्थितायै नमः।'—इस मन्त्रसे प्रेतपद्मासनपर विराजमान त्रिपुरभैरवीकी पूजा$^२$ करे। उनका ध्यान इस प्रकार है—'त्रिपुरादेवी' बायें हाथमें अभय एवं पुस्तक (विद्या) धारण करती हैं तथा दायें हाथमें वरदमुद्रा एवं माला (जपमालिका)। देवी बाणसमूहसे भरा तरकस और धनुष भी लिये रहती हैं।' मूलमन्त्रसे हृदयादि न्यास करे$^३$॥ ७—१२॥
(अब प्रयोगविधि बतायी जाती है—) गोसमूहके मध्यमें स्थित हो, श्मशान आदिके वस्त्रपर चिताके कोयलेसे अष्टदलकमलका चक्र लिखे या लिखावे। उसमें द्वेषपात्रका नाम लिखकर लपेट दे। फिर चिताकी राखको सानकर एक मूर्ति बनावे। उसमें द्वेषपात्रकी स्थितिका चिन्तन करके उक्त यन्त्रको नीले रंगके डोरेसे लपेटकर मूर्तिके पेटमें घुसेड़ दे। ऐसा करनेसे उस व्यक्तिका उच्चाटन हो जाता है॥ १३-१४॥
ज्वालामालिनी-मन्त्र
'ॐ नमो भगवति ज्वालामालिनि गृध्रगणपरिवृते स्वाहा।' इस मन्त्रका जप करते
१. 'शारदातिलक'के नवम पटलमें कहा गया है कि आठ मातृकाओंका कमलके आठ दलोंमें पूजन करे। मातृकाएँ अपने-अपने भैरवके अङ्कमें विराजती हैं। 'दीर्घाद्या मातरः प्रोक्ता ह्रस्वाद्या भैरवाः स्मृताः।'—अर्थात् दीर्घस्वरोंको बीजके रूपमें नामके आदिमें लगाकर मातृकाओंकी पूजा करनी चाहिये और ह्रस्व अक्षरोंको आदिमें बीजके रूपमें जोड़कर भैरवोंका पूजन होना चाहिये।' यहाँ ह्रस्व और दीर्घ अक्षर पारिभाषिक लिये गये हैं। इनका परिचय देते हुए राघवभट्टने 'शा० ति०' की 'पदार्थादर्श' नामक टीकामें लिखा है कि 'अ इ उ ऋ लृ ए ओ अं'—ये आठ अक्षर 'ह्रस्व'के नामसे उपयोगमें लाये जाते हैं और 'आ ई ऊ ॠ ॡ ऐ औ अः'—ये आठ अक्षर दीर्घ-स्वरके नामसे। इनके प्रयोगवाक्य 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में इस प्रकार दिये गये हैं—'आं ब्राह्मयै नमः। अं असिताङ्गभैरवाय नमः। ईं माहेश्वर्यै नमः। इं रुरुभैरवाय नमः। ऊं कौमार्यै नमः। उं चण्डभैरवाय नमः। ॠं वैष्णव्यै नमः। ऋं क्रोधभैरवाय नमः। ॡं वाराह्यै नमः, लृं उन्मत्तभैरवाय नमः। ऐं इन्द्राण्यै नमः। एं कपालिभैरवाय नमः। औं चामुण्डायै नमः। ओं भीषणभैरवाय नमः। अः महालक्ष्म्यै नमः। अं संहारभैरवाय नमः।' इस प्रकार भैरवके अङ्कमें स्थित मातृकाओंका प्रदक्षिणक्रमसे पूजन करना चाहिये।'
२. 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'के २५ वें श्वासमें त्रिपुरादेवीके पूजनका क्रम यों बताया गया है—प्रातःकृत्य और प्राणायाम करके पीठन्यास करे। अन्यत्र बताये हुए क्रमसे आधारशक्ति आदिकी अर्चनाके पश्चात् हृदयकमलके पूर्वादिकेसरोंमें इच्छा, ज्ञाना, क्रिया, कामिनी, कामदायिनी, रति, रतिप्रिया और नन्दाका पूजन करे तथा मध्य भागमें मनोन्मनीका। उसके ऊपर 'ऐं परायै अपरायै परापरायै हसौः सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनाय नमः।'—इस प्रकार न्यास करके मस्तकपर दक्षिणामूर्ति ऋषिका, मुखमें पङ्क्ति छन्दका, हृदयमें त्रिपुरभैरवी देवताका, गुह्यमें वाग्भव बीजका, चरणोंमें तार्तीय शक्तिका तथा सर्वाङ्गमें कामराज कीलकका न्यास करे। तत्पश्चात् वाग्भवबीज (ह्रीं नमः)-का नाभिसे चरणपर्यन्त, कामबीज (ह सकल रीं नमः)-का हृदयसे नाभिपर्यन्त तथा तार्तीय बीज (ह्स्रौंः)-का सिरसे हृदयपर्यन्त न्यास करे। इसी तरह आद्यबीजका दाहिने हाथमें, द्वितीय बीजका बायें हाथमें तथा तृतीय बीजका दोनों हाथोंमें न्यास करे। इसी क्रमसे मस्तक, मूलाधार और हृदयमें उक्त तीनों बीजोंका न्यास करना चाहिये। दायें कान, बायें कान और चिबुकमें भी उक्त तीनों बीजोंका क्रमशः न्यास करे। फिर आगे बताये जानेवाले तीन-तीन अङ्गोंमें क्रमशः तीनों बीजोंका न्यास करे। यह 'नवयोनिन्यास' है। यथा—दायाँ गाल, बायाँ गाल और मुख। दायाँ नेत्र, बायाँ नेत्र और नासिका। दायाँ कंधा, बायाँ कंधा और पेट। दायीं कोहनी, बायीं कोहनी और कुक्षि। दायाँ घुटना, बायाँ घुटना और लिङ्ग। दायाँ पैर, बायाँ पैर तथा गुह्य भाग। दायाँ पार्श्व, बायाँ पार्श्व और हृदय। दायाँ स्तन, बायाँ स्तन और कण्ठ।
३. मूलमन्त्र बीजत्रयात्मक है। यथा—ह्सैं नमः। हस कल रीं नमः। हसौः नमः।
- अध्याय ३१३ * ६४५
हुए युद्धमें जानेवाले पुरुषको प्रत्यक्ष विजय प्राप्त होती है॥ १५-१६॥
श्रीमन्त्र
‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रियै नमः’ ॥ १७॥
चतुर्दल कमलमें उत्तरादि दलके क्रमसे क्रमशः घृणिनी, सूर्या, आदित्या और प्रभावती—इन चार श्रीदेवियोंका उक्त मन्त्रसे पूजन करके मन्त्र जपनेसे श्रीकी प्राप्ति होती है। ये सभी श्रीदेवियाँ सुवर्णगिरिके समान परम सुन्दर कान्तिवाली हैं॥ १८॥
गौरीमन्त्र
‘ॐ ह्रीं गौर्यै नमः।’
—इस मन्त्रद्वारा जप, होम, ध्यान तथा पूजन किया जाय तो यह साधकको सब कुछ प्रदान करनेवाला है। गौरीदेवीकी अङ्गकान्ति अरुणाभ गौर है। उनके चार भुजाएँ हैं। वे दाहिने दो हाथोंमें पाश तथा वरदमुद्रा धारण करती हैं और बायें दो हाथोंमें अङ्कुश एवं अभय। शुद्ध चित्तसे गौरीदेवीकी प्रार्थना (आराधना) करनेवाला बुद्धिमान् पुरुष सौ वर्षोंतक जीवित रहता है तथा उसे चोर आदिका भय नहीं प्राप्त होता है। युद्धस्थलमें इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलको पी लेनेसे अपने ऊपर क्रोधसे भरा हुआ पुरुष भी प्रसन्न हो जाता है। इस मन्त्रसे अञ्जन और तिलक लगानेपर वशीकरण सिद्ध होता है तथा जिह्वाग्रपर इसके लेखसे (अथवा जपसे भी) कवित्व-शक्ति प्रस्फुटित होती है। इसके जपसे स्त्री-पुरुषके जोड़े वशमें हो जाते हैं। इसके जपसे सूक्ष्म योनियोंके भी दर्शन होते हैं। स्पर्श करनेमात्रसे मनुष्य वशमें हो जाता है। इस मन्त्रद्वारा तिलकी आहुति देनेपर सारे मनोरथ सिद्ध होते हैं। इस मन्त्रसे सात बार अभिमन्त्रित करके अन्नका भोजन करनेवाले पुरुषके पास सदा श्री(धन-सम्पत्ति) बनी रहती है। इसके आदिमें लक्ष्मी-बीज (श्रीं) और वैष्णव-बीज (क्लीं) जोड़ दिया जाय तो यह ‘अर्धनारीश्वर-मन्त्र’ हो जाता है। अनङ्गरूपा, मदनातुरा, पवनवेगा, भुवनपाला, सर्वसिद्धिदा, अनङ्गमदना और अनङ्गमेखला—ये शक्तियाँ हैं। इनके नाममन्त्रोंके जपसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। कमलके दलोंमें ह्रीं, स्वर, कादि व्यञ्जन लिखकर बीचमें अभीष्ट स्त्रीका नाम लिखे। षट्कोण-चक्र या कलशमें भी लिख सकते हैं। लिखकर उसके उद्देश्यसे जप करनेपर ‘वशीकरण’ होता है॥ १९—२६॥
नित्यक्लिन्ना-मन्त्र
‘ॐ ह्रीं ऐं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा।*’
[किसी-किसीने इस मन्त्रको पञ्चदशाक्षर भी माना है। उस दशामें ‘स्वाहा’ से पहले ‘ऐं ह्रीं’ जोड़ा जाता है।] यह छः अङ्गोंवाला मूलमन्त्र है (तीन बीज और तीन पद मिलाकर छः अङ्ग होते हैं)। लाल रंगके त्रिकोण-चक्रमें अष्टदल कमलका चिन्तन करके उसमें ‘द्राविणी’ आदिका पूजन करे। पूर्वादि दिशाओंमें ‘द्राविणी’ आदि चार शक्तियों तथा ईशानादि कोणोंमें ‘अपरा’ आदि चार शक्तियोंका चिन्तन-पूजन करना चाहिये। उनके क्रमानुसार नाम यों जानने चाहिये—द्राविणी, वामा, ज्येष्ठा, आह्लादकारिणी, अपरा, क्षोभिणी, रौद्री तथा गुणशक्ति। देवीका ध्यान इस प्रकार करे—‘वे रक्तवर्णा हैं और उसी रंगके वस्त्राभूषण धारण करती हैं। उनके दो हाथोंमें पाश और अङ्कुश है, दो हाथोंमें कपाल तथा कल्पवृक्ष हैं तथा दो हाथोंसे उन्होंने वीणा ले रखी है।’ नित्या, अभया, मङ्गला, नववीरा, सुमङ्गला, दुर्भगा और
* अग्निपुराणकी छपी प्रतियोंमें ‘ॐ ह्रीं छं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ओं ओं’—ऐसा पाठ मिलता है; परंतु अन्य तन्त्रोंमें ‘छं’ की जगह ‘ऐं’ मिलता है। उद्धारस्थलमें ‘वाग्भवं’ कहा गया है, जो ‘ऐं’ का ही वाचक है और अन्तमें अग्निवधू (स्वाहा)-का ही उल्लेख है; अतः वही रूप लिया गया है।
६४६ * अग्निपुराण *
मनोन्मनी तथा द्रावा—इन आठ देवियोंका पूर्वादि दिशाके कमल-दलोंमें पूजन करे। [‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में ये नाम इस प्रकार मिलते हैं—नित्या, सुभद्रा, समझला, वनचारिणी, सुभगा, दुर्भगा, मनोन्मनी तथा रुद्ररूपिणी।] इनके बाह्यभागमें पाँच दलोंमें कामदेवोंका पूजन होता है। ‘ॐ ह्रीं अनङ्गाय नमः। ॐ ह्रीं स्मराय नमः। ॐ ह्रीं मन्मथाय नमः। ॐ ह्रीं माराय नमः। ॐ ह्रीं कामाय नमः।’ ये ही पाँच काम हैं। कामदेवोंके हाथोंमें पाश, अङ्कुश, धनुष और बाणका चिन्तन करे। इनके भी बाह्यभागमें दस दलोंमें क्रमशः रति-विरति, प्रीति-विप्रीति, मति-दुर्मति, धृति-विधृति, तुष्टि-वितुष्टि—इन पाँच कामवल्लभाओंका पूजन करे॥ २७—३३॥
‘ॐ छं (एं) नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ओं ओं (स्वाहा) अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ लृ लॄ ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह क्षः ॐ छं (एं) नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा।’ यह ‘नित्यक्लिन्ना-विद्या’ है॥ ३४॥
सिंहासनपर आधारशक्ति तथा पद्मका पूजन करके उसके दलोंमें हृदय आदि अङ्गोंकी स्थापना एवं पूजन करनेके अनन्तर मध्यकर्णिकामें देवीकी पूजा करनी चाहिये॥ ३५॥
गौरीमन्त्र (२) ‘ॐ ह्रीं गौरि रुद्रदयिते योगेश्वरि हूं फट् स्वाहा’ ॥ ३६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘नाना प्रकारके मन्त्रोंका वर्णन’ नामक तीन सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१३॥
तीन सौ चौदहवाँ अध्याय
त्वरिताके पूजन तथा प्रयोगका विज्ञान
निग्रहयन्त्र अग्निदेव कहते हैं—मुने! ‘ॐ ह्रीं हूं खे च च्छे क्षः स्त्रीं हूं क्षे ह्रीं फट् त्वरितायै नमः।’— इस मन्त्रसे न्यासपूर्वक त्वरितादेवीकी पूजा करे। उनके द्विभुज या अष्टभुज रूपका ध्यान करे। आधारशक्ति तथा अष्टदल कमलका पूजन करे। सिंहासन और उसके ऊपर विराजित त्वरितादेवीकी तथा उनके चारों ओर हृदयादि अङ्गोंकी पूजा करे*। पूर्वादि दिशाओंमें हृदयादि अङ्गोंकी पूजा करके मण्डलमें प्रणीता तथा गायत्रीकी पूजा करे। (देवीके अग्रभागके केसरसे लेकर प्रदक्षिणक्रमसे छः केसरोंमें छः अङ्गोंका पूजन करके अवशिष्ट दोमें प्रणीता तथा गायत्रीका पूजन करना चाहिये।) इसके बाद आठ दलोंमें हुंकारी, खेचरी, चण्डा, छेदिनी, क्षेपिणी, स्त्री, हुंकारी तथा क्षेमंकरीकी पूजा करे। फिर मध्यभागमें देवीके सामने फट्कारीकी अर्चना करे। देवीके सम्मुखवर्ती द्वारके दक्षिण तथा वामपार्श्वमें जया एवं विजयाकी पूजा करके
* ‘सारसंग्रह’ तथा ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ आदिमें जो मन्त्रोद्धार किया गया है, उससे उपर्युक्त द्वादशाक्षर-बीज ही ‘त्वरिता-विद्याके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। अग्निपुराणकी आजकलकी छपी प्रतियोंमें मन्त्रका शुद्ध रूप नहीं रह गया है, अतः तन्त्रान्तरसे मिलाकर ही शुद्ध रूपका यहाँ ग्रहण किया गया है। न्यासकी विधि पहले बता चुके हैं, अतः यहाँ संकेतमात्र किया गया है। तन्त्रोंमें देवीके द्विभुज, अष्टभुज तथा अष्टादशभुज रूप भी वर्णित हुए हैं। यहाँ मूलमें द्विभुज तथा अष्टभुज रूपकी ओर संकेत है। आधारशक्ति आदिका पूजन भी पूर्ववत् समझना चाहिये। सिंहासनका मन्त्र इस प्रकार है—‘क्षं हूं हं वज्रदेहे मुरु मुरु क्षिं गुल गुल गर्ज गर्ज हं हुं क्षां पद्मासनाय नमः।’ एक-एक अक्षरका उद्धार करके यह मन्त्रस्वरूप निश्चित हुआ है, अतः इसीको शुद्ध मानकर अन्यत्रके विकृत पाठको भी शुद्ध किया जा सकता है। यहाँ कही हुई अधिकांश बातें पिछले तीन सौ नवें अध्यायमें आ गयी हैं।’
- अध्याय ३१४ * ६४७
द्वाराग्रभागमें 'किंकराय रक्ष रक्ष त्वरिताज्ञया स्थिरो भव हुं फट् किंकराय नमः।' इस मन्त्रसे किंकरका पूजन करना चाहिये॥ १-४॥
त्वरिता-मन्त्रसे तिलोंद्वारा होम करनेसे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति होती है। नामोच्चारणपूर्वक देवीके आभूषणस्वरूप आठ नागोंकी पूजा करनी चाहिये। यथा—अनन्ताय नमः स्वाहा। कुलिकाय नमः स्वधा। वासुकिराजाय स्वाहा। शङ्खपालाय वौषट्। तक्षकाय वषट्। महापद्माय नमः। कर्कोटनागाय स्वाहा। पद्माय नमः फट्$^१$॥ ५-६$\frac{१}{२}$॥
निग्रहयन्त्र$^२$
दस खड़ी रेखाएँ खींचकर उनपर दस पड़ी रेखाएँ खींचे तो इक्यासी पद (कोष्ठ) बन जाते हैं। इन पदोंद्वारा 'निग्रहचक्र' का निर्माण करे। यह चक्र वस्त्रपर, वेदीपर, वृक्षके तनेपर, शिलापट्टपर तथा यष्टिकाओंपर भी लिखा जा सकता है। इसके मध्यवर्ती कोष्ठमें साध्य (शत्रु आदि)-का नाम लिखे। (उस नामको दो 'रं' बीजोंद्वारा आवेष्टित कर दे। अर्थात् दो 'रं' बीजोंके बीचमें 'साध्य-नाम' लिखना चाहिये।) उसके पार्श्वभागकी पूर्वादि दिशाओंकी चार पट्टिकाओंमें 'भ्रूं क्षूं छूं हूं'—इन चार बीजोंको लिखे। फिर ईशान आदि कोणोंमें भीतरकी ओर 'कालरात्रि-मन्त्र' (काली-आनुष्टुभ सर्वतोभद्र) लिखे तथा बाहरकी ओर 'यमराज-मन्त्र' (यम-आनुष्टुभ)-का उल्लेख करे। (यदि साध्य-व्यक्ति पुरुष है, तब तो यही क्रम ठीक है। यदि वह स्त्री हो तो उसपर निग्रहके लिये भीतरकी ओर 'यम-आनुष्टुभ' मन्त्र लिखा जाय और बाहरकी ओर 'काली-आनुष्टुभ' मन्त्रका उल्लेख किया जाय—यह 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में विशेष बात कही गयी है)॥ ७-९॥
काली-आनुष्टुभ मन्त्र
का ली मा र र मा ली का लीनमोक्षक्षमोनली।
मामोदेततदेमोमा रक्षतत्वत्वतक्षर॥ १०॥
$^१$. 'नारायणीय-तन्त्र' में ब्राह्मण-नागोंको कुण्डलोंके स्थानमें चिन्तनीय बताया है, क्षत्रिय-नाग दोनों भुजाओंमें केयूरका काम करते हैं, वैश्य-नाग कटिबन्ध (करधनी)-की आवश्यकता पूर्ण करते हैं तथा शूद्र-नाग दोनों पैरोंमें नूपुर बनकर शोभा बढ़ाते हैं। इनका ध्यान इस प्रकार करना चाहिये—'अनन्त और कुलिक ब्राह्मण-नाग हैं। इनका वर्ण अग्निके समान तेजस्वी है। ये दोनों नाग सहस्र-सहस्र फणोंसे समलंकृत हैं। वासुकि और शङ्खपाल क्षत्रिय हैं। इनकी अङ्गकान्ति पीली है। ये दोनों सात-सात सौ फण धारण करते हैं। तक्षक और महापद्म वैश्य-नाग हैं। इनका रंग नीला है। इन दोनोंने पाँच-पाँच सौ फण धारण कर रखे हैं। पद्म तथा कर्कोटक शूद्र-नाग हैं। इनकी अङ्गकान्ति श्वेत है तथा ये तीन-तीन सौ फण धारण करते हैं। त्वरितादेवीके वामहस्तमें वरदमुद्रा और दाहिने हाथमें अभयमुद्रा शोभा पाती है।'
२. निग्रह-यन्त्र
६४८ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
यम-आनुष्टुभ-मन्त्र
यमावाटटवामाय माटमोटटमोटमा।
वामोभूरिरिभूमोवा टटरीत्वत्वरीटट॥ ११॥
यम-मन्त्रके बाह्यभागमें चारों ओर 'रं' लिखे, फिर 'रं' के नीचे 'यं' लिखे। इससे 'मारणात्मक निग्रहयन्त्र' सम्पादित होता है। नीमकी गोंद, मज्जा, रक्त तथा विषसे$^१$ मिश्रित स्याहीमें थोड़ा चिताका कोयला कूट-पीसकर मिला दे और उसे पिङ्गलवर्णकी दावातमें रखे। फिर कौएके पंखकी कलमसे उक्त 'निग्रह-यन्त्र'को लिखकर उसे श्मशानभूमिमें या चौराहेपर किसी गड्ढेमें नीचेकी ओर गाड़ दे, अथवा बाँबीकी मिट्टीमें उसे डाल दे, अथवा बहेड़ेके वृक्षकी डालीके नीचे भूमिमें गाड़ दे। ऐसा करनेसे सभी शत्रुओंका नाश हो जाता है॥ १२—१४॥
अनुग्रह-चक्र
शुक्लपक्षमें भोजपत्रपर, भूमिपर तथा दीवारपर लाक्षाके रङ्गसे, कुङ्कुमसे अथवा खड़िया मिट्टीके चन्दनसे 'अनुग्रह-चक्र'$^२$ लिखे (यह 'अनुग्रह-चक्र' पूर्वोक्त निग्रह-चक्रकी भाँति इक्यासी पदोंका होना चाहिये।) मध्यकोष्ठमें साध्य व्यक्तिका नाम लिखे। उस नामको 'ठं ठं' के मध्यमें रखे। पूर्वादिक वीथीमें 'जूं सः वषट्' का उल्लेख करे। ईशान आदि कोणसे आरम्भ करके वीथीको छोड़ते हुए अग्निकोणपर्यन्त लक्ष्मीका आनुष्टुभ-मन्त्र (जो सर्वतोभद्रबन्धमें निबद्ध है) लिखे। यह ऊपरकी चार पङ्क्तियोंमें पूरा हो जायगा। तत्पश्चात् नीचेकी चार पङ्क्तियोंमें सबसे नीचेके नैर्ऋत्यकोणस्थ कोष्ठसे आरम्भ करके दाहिनेसे बायें पार्श्वकी ओर लिखे। निचली पङ्क्तिके बाद ऊपरी पङ्क्तिमें भी बायेंसे दाहिने लिखे। इस तरह चार पङ्क्तियोंमें वही 'लक्ष्मी-मन्त्र' पूरा लिख दे। वह मन्त्र इस प्रकार है—
'श्री सा मा या या मा सा श्री, सा नो या ज्ञे ज्ञे या नो सा। मा या ली ला ला ली या मा, या ज्ञे ला ली ली ला ज्ञे या॥'
चक्रके बहिर्भागमें चारों ओर त्वरिता-मन्त्र लिखे। प्रत्येक दिशामें एक बार, इस प्रकार चार बार वह मन्त्र लिखा जायगा। फिर उस चौकोर चक्रको इस प्रकार गोल रेखासे घेर दे, जिससे वह कलशके भीतर हो जाय। उक्त कलशके नीचे एक कमल बनाकर उसीपर उस कमलको स्थापित किया हुआ दिखाये। (ऊपरकी ओर कलशके मुखकी-सी आकृति बना दे। दो वृत्ताकार रेखाओंसे कलशकी आकृति स्पष्ट करनी चाहिये। कलशके मुखपर दो आड़ी रेखाएँ खींचकर उन रेखाओंके बीचमें 'नववव'—इस प्रकारकी माला-सी बनाकर उस मालासे घटको परिपूरित दिखाये। इस प्रकार इस चक्रका मनोरथपूर्तिके लिये तन्त्र-शास्त्रोक्त रीतिसे प्रयोग करे।)॥ १५—१८॥
१. नमक, ऊसरकी मिट्टी, स्रोतका जल, गृहधूम (घरकी कालिख), चित्रक, चिताका कोयला और नीमकी गोंद—इनसे युक्त जो स्याही है, उसे 'विष' कहा गया है।
२. 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में इस 'अनुग्रह-यन्त्र' के लेखनके विषयमें इस प्रकार कहा गया है—
कुङ्कुमैर्लाक्षया वापि लिखितं स्वर्णपट्टके। धवले वसने वापि लेखिन्या स्वर्णजातया॥
सम्पूज्य जपसंसिद्धं स्थापयेद् यत्र तत्र वै। भवेल्लक्ष्मीरतिस्फीता नीरोगाश्च प्रजास्तथा॥
गजाश्वपशवस्त्वन्ये प्राणिनः सुखिनो भृशम्। भूतप्रेतपिशाचादिपीडासु बिभृयादिदम्॥
अलक्ष्मीशान्तये वश्यसिद्धये सर्वसम्पदे।
अर्थात् 'रोली अथवा लाक्षा (महावर)-के रङ्गसे सोनेके पत्रपर या श्वेत वस्त्रपर सोनेकी ही लेखनीसे इस अनुग्रह-यन्त्रको लिखे। लिखकर इसकी पूजा करके त्वरिता-मन्त्रके जपद्वारा इसे सिद्ध कर ले। जपसिद्ध-यन्त्रको जहाँ रखा जायगा, वहाँ अत्यन्त वृद्धिशीला लक्ष्मीका वास होगा। वहाँकी समस्त प्रजाएँ नीरोग होंगी। हाथी, घोड़े तथा अन्य पशु-प्राणी अत्यन्त सुखी होंगे। भूत, प्रेत तथा पिशाच आदिकी बाधा प्राप्त होनेपर इस यन्त्रको धारण करना चाहिये। दरिद्रताकी शान्ति, वशीकरणकी सिद्धि तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंकी प्राप्तिके लिये भी इस यन्त्रको धारण करना आवश्यक है।'
- अध्याय ३१५ * ६४९
कमलपर स्थापित पद्मचक्र लिखकर उसे धारण किया जाय तो वह मृत्युको जीतनेवाला तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। वह शान्तिके साधनोंमें भी परम शान्तिप्रद है। सौभाग्य आदि देनेवाला है१ ॥ १९ ॥
बारह खड़ी रेखाओंपर बारह पड़ी रेखाएँ खींचकर बराबर-बराबर एक सौ इक्कीस कोष्ठ बनावे। उसके मध्यकोष्ठमें साध्यका नाम लिखे। फिर ईशानकोणवाले कोष्ठसे आरम्भ करके प्रदक्षिणक्रमसे बारह बार त्वरिता-विद्याके अक्षर लिखे। मायाबीज (ह्रीं) को छोड़कर ही मन्त्र लिखना चाहिये। रेखाओंके अग्रभागोंपर बारंबार त्रिशूल अङ्कित करे। इस यन्त्रको जपद्वारा सिद्ध कर ले२। मध्यकोष्ठमें साध्य-नामके पहले 'ॐ' तथा अन्तमें 'हूं फट्' जोड़ दे। त्वरिता-विद्याके वर्णोंको क्रमसे ही लिखना चाहिये। अन्तमें नीचेकी ओर 'वषट्' जोड़ देना चाहिये। यह 'प्रत्यङ्गिरा-विद्या' कहलाती है, जो सम्पूर्ण मनोरथ एवं प्रयोजनको सिद्ध करनेवाली है॥ २०-२१॥
इक्यासी कोष्ठवाले चक्रमें आदिसे ही वर्णक्रमके अनुसार सम्पूर्ण चक्रोंमें त्वरिता-विद्याके अक्षर लिखे। छः बार मन्त्र लिखनेके बाद अन्तके शेष कोष्ठोंमें साध्यका नाम तथा उसके अन्तमें 'वषट्' लिखे। यह दूसरी 'प्रत्यङ्गिरा-विद्या' है, जो समस्त कार्य आदिकी सिद्धि करनेवाली है। चौंसठ कोष्ठवाले चक्रोंमें भी 'निग्रह-चक्र' और 'अनुग्रह-चक्र' लिखे। वह 'अमृती-विद्या' है। उसके मध्यकोष्ठमें 'क्रीं सा हूं' और साध्य-नाम लिखे। (पाठान्तरके अनुसार उस चक्रके मध्यभागमें साध्यका नाम तथा नामके उभय पार्श्वमें 'ह्रीं' लिखे।) उसके बाह्यभागमें द्वादशदल कमल बनाकर उसके दलोंमें त्वरिता-विद्याको विलोमक्रमसे लिखे। अर्थात् पहले 'फट्' लिखे, फिर पूर्व-पूर्वके अक्षर। फिर उसे ह्रींकारयुक्त तीन वृत्ताकार पङ्क्तियोंसे वेष्टित करे। कुम्भाकार यन्त्रके भीतर लिखित इस विद्याको धारण किया जाय तो यह समस्त शत्रुओंका नाश करनेवाली और सब कुछ देनेवाली होती है। यदि रोगीके कानमें इसका जप किया जाय तो सर्पादि विष भी शान्त हो जाते हैं। यदि इसके अक्षरोंसे अङ्कित (अथवा इस यन्त्रसे अङ्कित) डंडोंद्वारा इसके शरीरपर ठोंका जाय तो उससे भी विषका शमन हो जाता है॥ २२-२५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरिता-मन्त्रके प्रयोगोंका वर्णन' नामक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१४॥
तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय
स्तम्भन आदिके मन्त्रोंका कथन
**अग्निदेव कहते हैं—**मुने! अब मैं स्तम्भन, मोहन, वशीकरण, विद्वेषण तथा उच्चाटनके प्रयोग बताता हूँ। विषव्याधि, आरोग्य, मारण तथा उसके शमनके प्रयोग भी बता रहा हूँ। भोजपत्रपर ताड़की कलमसे 'कूर्मचक्र' लिखे। वह छः अङ्गुलके मापका होना चाहिये। तदनन्तर द्विज उसके मुख तथा चारों पैरोंमें मन्त्रका न्यास करे। चारों पैरोंमें 'क्रीं' तथा मुखमें 'ह्रीं' लिखे।
१. इस चक्रकी विधि 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र' में इस प्रकार दी गयी है—दस दलवाला पद्म बनाकर उसकी कर्णिकामें माया-बीजके उदरमें साध्य-नाम लिखकर उसके दलोंमें मूल त्वरिता-विद्याके प्रणवादि दस वर्णोंको लिखे। माया-बीजके अक्षर छोड़ दे। उस कमलचक्रके बाह्यभागमें षट्कोण तथा उसके भी बाह्यभागमें चौकोर मण्डल बनावे। २. इस यन्त्रका उल्लेख 'शारदातिलक' के दशम पटलमें उपलब्ध होता है।
६५० * अग्निपुराण *
गर्भस्थानमें त्वरिता-विद्याका उल्लेख करके पृष्ठभागमें साध्य-नाम लिखे। फिर मालामन्त्रोंसे वेष्टित करके उस यन्त्रको ईंटके ऊपर स्थापित करे। तत्पश्चात् उसे ढककर कूर्मपीठगत 'करालमन्त्र' से अभिमन्त्रित करे। महाकूर्मका पूजन करके चरणोदकको शत्रुके उद्देश्यसे फेंके तथा शत्रुका स्मरण करके उसे सात बार बायें पैरसे ताड़ित करे। इससे मुखभागसे शत्रुका स्तम्भन होता है॥ १—५$\frac{१}{२}$॥
भैरवकी मूर्ति लिखकर उसके चारों ओर निम्नाङ्कित मालामन्त्र लिखे—
'ॐ शत्रुमुखस्तम्भनी कामरूपा आलीढकरी। ह्रीं फें फेत्कारिणी मम शत्रूणां देवदत्तानां मुखं स्तम्भय स्तम्भय मम सर्वविद्वेषिणां मुखस्तम्भनं कुरु कुरु कुरु ॐ हूं फें फेत्कारिणि स्वाहा।'
इसके बाद 'फट्' और हेतु (प्रयोगका उद्देश्य) लिखकर उक्त मन्त्रका जप करते हुए उस महाबली भैरवके वाम हाथमें 'नग' (पर्वत या वृक्ष) और दाहिने हाथमें 'शूल' लिखे। तदनन्तर 'अघोरमन्त्र' लिखे। इससे वह संग्राममें शत्रुओंको स्तम्भित कर देता है॥ ६—९॥
'ॐ नमो भगवत्यै भगमालिनि विस्फुर विस्फुर, स्पन्द स्पन्द, नित्यक्लिन्ने द्रव द्रव हूं सः क्रींकाराक्षरे स्वाहा।'
—इस मन्त्रका जप करते हुए रोचना आदिसे तिलक करनेपर मनुष्य सारे जगत्को मोहित कर सकता है॥ १०—११॥
'ॐ फें हुं फट् फेत्कारिणि ह्रीं ज्वल ज्वल, त्रैलोक्यं मोहय मोहय, गुह्यकालिके स्वाहा।'
—इससे तिलक करके मनुष्य राजा आदिको भी वशमें कर लेता है॥ १२$\frac{१}{२}$॥
जहाँ गधा बैठा हो उस स्थानकी धूल, शवके ऊपर चढ़ा हुआ फूल तथा स्त्रीके रजमें संलग्न वस्त्रका टुकड़ा लेकर रातमें शत्रुकी शय्या आदिपर फेंक दे। इससे उसके स्वजनोंमें विद्वेष उत्पन्न हो जाता है। गायका खुर और शृङ्ग, घोड़ेकी टापका कटा हुआ टुकड़ा तथा साँपका सिर—इन सबको कूटकर एकमें मिला दे और द्वेषपात्रके घरोंपर फेंक दे। इससे शत्रुवर्गका उच्चाटन होता है। कनेरकी पीली शिफा (मूल या जड़) मारणके प्रयोगमें संसिद्ध (सफल) है। साँप और छछूँदरका रक्त तथा कनेरका बीज भी मारणरूपी प्रयोजनका साधक है। मरे हुए गिरगिट, भ्रमर, केकड़ा और बिच्छूका चूर्ण बनाकर तेलमें डाल दे। उस तेलको अपने शरीरमें लगानेवाला मनुष्य कोढ़ी हो जायगा॥ १३—१६॥
'ॐ नवग्रहाय सर्वशत्रून् मम साधय साधय, मारय मारय आं सों मं बुं गुं शुं शं रां कें ॐ स्वाहा।' इस मन्त्रको भोजपत्र या नवग्रह-प्रतिमापर लिखकर आक (मदार)-के सौ फूलोंसे पूजा करके शत्रु-मारणके उद्देश्यसे उस यन्त्र या प्रतिमाको श्मशानभूमिमें गाड़ दे। इससे समस्त ग्रह साधकके शत्रुको मार डालते हैं॥ १७—१८॥
'ॐ कुञ्जरी ब्रह्माणी, ॐ मञ्जरी माहेश्वरी, ॐ वेताली कौमारी, ॐ काली वैष्णवी, ॐ अघोरा वाराही, ॐ वेतालीन्द्राणी, ॐ उर्वशी चामुण्डा, ॐ वेताली चण्डिका, ॐ जयाली यक्षिणी, नवमातरो हे मम शत्रुं गृह्णत गृह्णत।'
भोजपत्रपर इस मन्त्रको लिखे। 'शत्रु' पदके स्थानमें शत्रुके नामका निर्देश करे। फिर श्मशान-भूमिमें उस यन्त्रकी पूजा करे तो शत्रुकी मृत्यु हो जाती है॥ १९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्तम्भन आदिके मन्त्रका कथन' नामक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१५॥
- अध्याय ३१७ * ६५१
तीन सौ सोलहवाँ अध्याय
त्वरिता आदि विविध मन्त्र एवं कुब्जिका-विद्याका कथन
अग्निदेव कहते हैं—मुने! पहले 'हुं' रखे, फिर 'खे च च्छे'—ये तीन पद जोड़कर मन्त्रकी शोभा बढ़ावे। तत्पश्चात् 'क्षः स्त्रीं हूं क्षे' लिखकर अन्तमें 'फट्' जोड़ दे। (कुल मिलाकर) 'हुं खे च च्छे क्षः स्त्रीं हूं क्षे ह्रीं फट्।' यह दशाक्षरा त्वरिता-विद्या हुई। यह विद्या समस्त कार्योंको सिद्ध करनेवाली तथा विष, सर्पादिकामर्दन करनेवाली है। 'खे च च्छे'—यह त्र्यक्षर-विद्या काल (अथवा काले साँप)-के डँसे हुएको भी जीवन देनेवाली है॥ १-२॥
'ॐ हूं खे क्षः'—इस चतुरक्षरी विद्याका प्रयोग विष एवं सर्पदंशकी पीड़ाको नष्ट करनेवाला है। (पाठान्तर 'विषशत्रुप्रमर्दनः' के अनुसार उक्त विद्याका प्रयोग विष एवं शत्रु की बाधाको दूर करनेवाला है।) 'स्त्रीं हूं फट्'—इस विद्याका प्रयोग पाप तथा रोग आदिपर विजय दिलाता है। 'खे च'—इस द्वयक्षर मन्त्रका प्रयोग शत्रु एवं दुष्ट आदिकी बाधाको दूर करता है। 'हूं स्त्रीं ॐ'—इस मन्त्रका प्रयोग स्त्री आदिको वशमें करनेवाला है। 'खे स्त्रीं खे'—इस मन्त्रका प्रयोग कालसर्पद्वारा डँसे गये मनुष्यके जीवनकी रक्षा करता है तथा शत्रुओंपर विजय दिलाता है। 'क्षः स्त्रीं क्षः'—इसका प्रयोग वशीकरण तथा विजयका साधक है॥ ३-५॥
कुब्जिका-विद्या
**'ऐं ह्रीं श्रीं हसख्फ्रें हसौः ॐ नमो भगवति हसख्फ्रें कुब्जिके हस्रूं हस्रूं अघोरे घोरे अघोरमुखि छां छीं किणि किणि विच्चे हसौः हसख्फ्रें श्रीं ह्रीं ऐं'**¹—यह श्रीमती कुब्जिकाविद्या सब कार्योंको सिद्ध करनेवाली मानी गयी है॥ ६॥
अब उन मन्त्रोंका वर्णन किया जायगा, जिनका उपदेश भगवान् शंकरने स्कन्दको दिया था॥ ७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरिता आदि नाना मन्त्रोंका तथा कुब्जिका-विद्याका वर्णन' नामक तीन सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१६॥
तीन सौ सत्रहवाँ अध्याय
सकलादि मन्त्रोंके उद्धारका क्रम
भगवान् शिव कहते हैं—स्कन्द! सकल, निष्कल, शून्य, कलाढ्य, समलंकृत, क्षपण, क्षय, अन्तःस्थ, कण्ठोष्ठ तथा आठवाँ शिव—'ये प्रासादपरासंज्ञक² मन्त्रके आठ स्वरूप माने गये हैं। ('कलाढ्य' सकलके और 'शून्य' निष्कलके अन्तर्गत है।) यह शब्दमय मन्त्र साक्षात् सदाशिवरूप
१. यह मन्त्र अग्निपुराणकी विभिन्न पोथियोंमें विभिन्न रूपसे छपा है। कोई भी शुद्ध नहीं है, अतः 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र' (अष्टम श्वास)-में जो इसका शुद्ध पाठ मिलता है, वही यहाँ रखा गया है। वहीं इसका विनियोग-वाक्य यों दिया गया है—'अस्य श्रीकुब्जिकामन्त्रस्य रुद्र ऋषिर्गायत्री छन्दः कुब्जिका देवता हसौः बीजं हसख्फ्रें शक्तिः हस्रूं कीलकम्, श्रीविद्याङ्गत्वेन विनियोगः।' पूनावाले अग्निपुराणमें इस मन्त्रका पाठ यों है—'ऐं ह्रीं श्रीं स्र्य्यै भगवति अम्बिके कुब्जिके स्म्र्य्यै स्फं स्फम् ऊं उं उं रण नमो घोरमुखिच्छां छीं किणि किणि बिच्छू स्फों ह्रों श्रीं ह्रीम् ऐं।' यही मन्त्र बहुल पाठान्तरके साथ चौखम्बावाले संस्करणमें भी है। दोनों जगहका पाठ अशुद्ध ही है। पिछले १४३, १४४ अध्यायोंमें भी कुब्जिकाका प्रसङ्ग द्रष्टव्य है।
२. 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र' में 'प्रासादपरा-संज्ञक' मन्त्रका उद्धार प्राप्त होता है। उसके अनुसार इसका स्वरूप है—'हसौँ'। यही यदि सादि हो जाय, अर्थात् 'सहौं' के रूपमें लिखा जाय तो 'परा-प्रासाद-मन्त्र' कहलाता है। केवल 'हौं' हो अर्थात् सकारसे संयुक्त न हो तो वह शुद्ध 'प्रासाद-मन्त्र' है।
६५२ * अग्निपुराण *
है। इसके जपसे सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है॥ १-२॥
अमृत, अंशुमान्, इन्द्र, ईश्वर, उग्र, ऊहक्, एकपाद, ऐल, ओज, औषध, अंशुमान् और वशी—ये क्रमशः अकार आदि बारह स्वरोंके वाचक हैं (यथा—अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः)। तथा आगे जो शब्द दिये जा रहे हैं, ये ककार आदि अक्षरोंके सूचक हैं। कामदेव, शिखण्डी, गणेश, काल, शंकर, एकनेत्र, द्विनेत्र, त्रिशिख, दीर्घबाहु, एकपाद, अर्धचन्द्र, वलय, योगिनीप्रिय, शक्तीश्वर, महाग्रन्थि, तर्पक, स्थाणु, दन्तुर, निधीश, नन्दि, पद्म, शाकिनीप्रिय, मुखबिम्ब, भीषण, कृतान्त (यम), प्राण, तेजस्वी, शक्र, उदधि, श्रीकण्ठ, सिंह, शशाङ्क, विश्वरूप तथा नारसिंह (क्ष)। विश्वरूप अर्थात् हकारको बारह मात्राओंसे युक्त करके लिखे। (इस प्रकार ये बारह बीज होते हैं, जो अङ्गन्यास एवं करन्यासके उपयोगमें आते हैं।)॥ ३-८॥
विश्वरूप (ह)-को अंशुमान् (अनुस्वार) तथा ओज (ओकार)-से युक्त करके रखा जाय; उसमें शशिबीज (स)-का योग न किया जाय तो 'हौं'—यह प्रथम बीज उद्धृत होता है, जो 'ईशान'से सम्बद्ध है। उपर्युक्त बारह बीजोंमें पाँच ह्रस्वयुक्त बीज माने जाते हैं और छः दीर्घ-बीज। पहली और ग्यारहवीं मात्रामें एक ही 'हं' बीज बनता है। 'हं हिं हुं हैं हौं'—ये पाँच ह्रस्वयुक्त बीज हैं तथा शेष दीर्घयुक्त। ह्रस्व बीजोंमें विलोम-गणनासे (हौं) प्रथम है। शेष क्रमशः तृतीय, पञ्चम, सप्तम और नवम कहे गये हैं। द्वितीय आदि दीर्घ हैं। तृतीय बीज है—'हैं'। यह तत्पुरुष-सम्बन्धी बीज है, ऐसा जानो। पाँचवाँ बीज 'हुं' है, जो दक्षिणदिशावर्ती मुख—'अघोर'का बीज है। सातवाँ बीज है—'हिं'। इसे 'वामदेवका बीज' जानना चाहिये। इसके बाद रस (अमृत) संज्ञक मात्रा (अकार)-से युक्त सानुस्वार हकार अर्थात् 'हं' बीज है; वह उपर्युक्त गणनाक्रमसे नवाँ है और 'सद्योजात'से सम्बद्ध है। इस प्रकार उक्त पाँच बीजोंसे युक्त 'ईशान' आदि मुखोंको 'ब्रह्मपञ्चक' कहा गया है। इनके आदिमें 'प्रणव' तथा अन्तमें 'नमः' जोड़ दे। 'ईशान' आदि नामोंका चतुर्थ्यन्त प्रयोग करे तो सभी उनके लिये पूजोपयुक्त मन्त्र हो जाते हैं। यथा—'ॐ हौं ईशानाय नमः।' इत्यादि। इसी प्रकार 'ॐ हं सद्योजाताय नमः।' यह सद्योजात-देवताका मन्त्र है। द्वितीय, चतुर्थ आदि मात्राएँ दीर्घ हैं, अतः उनका हृदयादि अङ्गोंमें न्यास किया जाता है। द्वितीय बीजको बोलकर हृदय और अङ्ग-मन्त्र (नमः) बोलकर हृदयमें न्यास करे। यथा—'हां हृदयाय नमः, हृदि।' चतुर्थ बीज 'शिरोमन्त्र' है, जो हकारमें ईश्वर तथा अंशुमान् (ं) जोड़नेसे सम्पन्न होता है। यथा—'हीं शिरसे स्वाहा, शिरसि।' विश्वरूप (ह)-में ऊहक (ऊ) तथा अनुस्वार जोड़नेपर छठा बीज 'हूँ' बनता है। उसे 'शिखामन्त्र' जानना चाहिये। यथा—'हूं शिखायै वषट्, शिखायां हुम्।' अर्थात् कवचका मन्त्र आठवाँ बीज 'हैं' है। यथा—'हैं कवचाय हुम्—बाहुमूलयोः।' दसवाँ बीज 'हौं' नेत्र-मन्त्र कहा गया है। यथा—'हौं नेत्रत्रयाय वौषट्, नेत्रयोः।' अस्त्र-मन्त्र वशी (विसर्गयुक्त) है। शिखिध्वज! इसे शिवसंज्ञक माना गया है। यथा—'हः अस्त्राय फट्।' (इससे चारों ओर तर्जनी और अङ्गुष्ठद्वारा ताली बजाये।) हृदयादि अङ्गोंकी छः जातियाँ क्रमशः इस प्रकार हैं—नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् तथा फट्। अब मैं 'प्रासाद-मन्त्र' बताता हूँ। 'हीं हौं हूं'—ये प्रासादमन्त्रके तीन बीज हैं। इसे 'कुटिल' संज्ञा दी गयी है। इस प्रकार यह प्रासाद-मन्त्र समस्त कार्योंको सिद्ध करनेवाला है। हृदय-
- अध्याय ३१७ * | ६५३
शिखा आदि बीजोंका पूर्वोक्त रीतिसे उद्धार करके फट्कारपर्यन्त सब अङ्गोंका न्यास करना चाहिये। अर्धचन्द्राकार आसन दे। 'भगवान् पशुपति कामपूरक देवता हैं तथा सर्पोंसे विभूषित हैं।' इस प्रकार ध्यान करके महापाशुपतास्त्र$^१$ मन्त्रका जप करे। यह समस्त शत्रुओंका मर्दन करनेवाला है। यह 'सकल (कलासहित) प्रासाद-मन्त्र'का वर्णन किया गया। अब 'निष्कल-मन्त्र' कहा जाता है॥ ९-१९॥
औषध (औ), विश्वरूप (ह), ग्यारहवीं मात्रा, सूर्यमण्डल (अनुस्वार) इनसे युक्त अर्धचन्द्र (अनुनासिक) एवं नादसे युक्त जो 'हौं' मन्त्र है। यह 'निष्कल प्रासाद-मन्त्र' है; इसे संज्ञाविहीन 'कुटिल' भी कहते हैं। 'निष्कल प्रासाद-मन्त्र' भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। सदाशिवस्वरूप 'प्रासाद-मन्त्र' ईशानादि पाँच ब्रह्ममूर्तियोंसे युक्त होता है; अतः वह 'पञ्चाङ्ग' या 'साङ्ग' कहा गया है$^२$। अंशुमान् (अनुस्वार), विश्वरूप (ह) तथा अमृत (अ)—इन तीनोंके योगसे व्यक्त हुआ 'हं' बीज 'शून्य' नामसे अभिहित होता है। (यह 'हिं हुं हें हों'—इन सबका उपलक्षण है।) ईशान आदि ब्रह्मात्मक अङ्गों (मुखों)—से रहित होनेपर ही उसकी शून्य संज्ञा होती है। ईशानादि मूर्तियाँ इन बीजोंके अमृततरु हैं। इनका पूजन समस्त विघ्नोंका नाश करनेवाला है॥ २०-२२॥
अंशुमान् (अनुस्वार) युक्त विश्वरूप (ह) यदि ऊहक (ऊ)-के ऊपर अधिष्ठित हो तो वह 'हूं' बीज 'कलाढ्य' कहा गया है। वह 'सकल'के ही अन्तर्गत है। सकलके ही पूजन और अङ्गन्यास आदि सदा होते हैं। (इसी तरह जो 'शून्य' कहा गया है, वह 'निष्कल'के ही अन्तर्गत है।) नरसिंह यमराजके ऊपर बैठे हों, अर्थात् षकार मकारके ऊपर चढ़ा हो, साथ ही तेजस्वी (र) तथा प्राण (य)—का भी योग हो, फिर ऊपर अंशुमान् (अनुस्वार) हो तथा नीचे ऊहक (दीर्घ ऊकार) हो तो 'क्ष्म्यूं'—यह बीज उद्धृत होता है। इसकी 'समलंकृत' संज्ञा है। यह ऊपर और नीचे भी मात्रासे अलंकृत होनेके कारण 'समलंकृत' कहा गया है। यह भी 'प्रासादपर' नामक मन्त्रका एक भेद है। चन्द्रार्धाकार बिन्दु और नादसे युक्त ब्रह्मा एवं विष्णुके नामोंसे विभूषित क्रमशः उदधि (व) और नरसिंह (क्ष)—को बारह मात्राओंसे भेदित करे। ऐसा करनेपर पूर्ववत् ह्रस्वस्वरोंसे युक्त बीज ईशानादि ब्रह्मात्मक अङ्ग होंगे तथा दीर्घस्वरोंसे युक्त बीजसहित मन्त्र हृदयादि अङ्गोंमें विन्यस्त किये जायँगे$^३$॥ २३-२५$\frac{१}{२}$॥
अब दस बीजरूप प्रणव बताये जाते हैं—ओजको अनुस्वारसे युक्त करके 'ओम्' इस प्रथम वर्णका उद्धार करे। अंशुमान् और अंशुका योग 'आं' यह नायकस्वरूप द्वितीय वर्ण है। अंशुमान् और ईश्वर—'ईं'—यह तृतीय वर्ण है, जो मुक्ति प्रदान करनेवाला है। अंशु (अनुस्वार)—से आक्रान्त ऊहक अर्थात् 'ऊँ' यह चतुर्थ वर्ण है। सानुस्वार वरुण (व्), प्राण (य्) और तेजस्
१. 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'में महापाशुपतास्त्र-मन्त्र इस प्रकार उद्धृत किया गया है—'ॐ श्लौं हसकलहीं पशुहसकलहीं हूं सकल हीं फट्।'
२. साङ्ग-मन्त्रके बीज ह्रस्व स्वरोंसे भेदित होते हैं। न्यास तथा पूजनके लिये उनका स्वरूप यों समझना चाहिये—'हों ईशानायोर्ध्ववक्त्राय नमः। हें तत्पुरुषाय पूर्ववक्त्राय नमः। हुं अघोराय दक्षिणवक्त्राय नमः। हिं वामदेवाय उत्तरवक्त्राय नमः। हं सद्योजाताय पश्चिमवक्त्राय नमः।'
३. यथा—वों ब्रह्मणे क्षों विष्णवे ईशानाय नमः। वें ब्रह्मणे क्षें विष्णवे तत्पुरुषाय नमः। वुं ब्रह्मणे क्षुं विष्णवे अघोराय नमः। विं ब्रह्मणे क्षिं विष्णवे वामदेवाय नमः। वं ब्रह्मणे क्षं विष्णवे सद्योजाताय नमः। ये पूजनके मन्त्र हैं। अङ्गन्यास—वां ब्रह्मणे क्षां विष्णवे हृदयाय नमः। वीं ब्रह्मणे क्षीं विष्णवे शिरसे स्वाहा। वूं ब्रह्मणे क्षूं विष्णवे शिखायै वषट्। वैं ब्रह्मणे क्षैं विष्णवे कवचाय हुम्। वौं ब्रह्मणे क्षौं विष्णवे नेत्रत्रयाय वौषट्। वः ब्रह्मणे क्षः विष्णवे अस्त्राय फट्।
६५४ * अग्निपुराण *
(२)—अर्थात् 'व्यूं' इसे पञ्चम बीजाक्षर बताया गया है। तत्पश्चात् सानुस्वार कृतान्त (मकार) अर्थात् 'मं' यह षष्ठ बीज है। सानुस्वार उदक और प्राण (व्यं) सप्तम बीजके रूपमें उद्धृत हुआ है। इन्दुयुक्त पद्म—'पं' आठवाँ तथा एकपादयुक्त नन्दीश 'नें' नवाँ बीज है। अन्तमें प्रथम बीज 'ओम्' का ही उल्लेख किया जाता है। इस प्रकार जो दशबीजात्मक मन्त्र है, इसे 'क्षपण' कहा गया है। इसका पहला, तीसरा, पाँचवाँ, सातवाँ तथा नवाँ बीज क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजातस्वरूप है। द्वितीय आदि बीज हृदयादि अङ्गन्यासमें उपयुक्त होते हैं। दसों प्रणवात्मक बीजोंके एक साथ उच्चारणपूर्वक 'अस्त्राय फट्' बोलकर अस्त्रन्यास^१ करे। ईशानादि मूर्तियोंके अन्तमें 'नमः' जोड़कर ही बोलना चाहिये, अन्यथा नहीं। द्वितीय बीजसे लेकर नवम बीजतकके जो आठ बीज हैं, वे आठ विद्येश्वररूप हैं। उनके नाम ये हैं—अनन्तेश, सूक्ष्म, शिवोत्तम, एकमूर्ति, एकरूप, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डी—ये आठ विद्येश्वर कहे गये हैं। शिखण्डीसे लेकर अनन्तेशपर्यन्त विलोम-क्रमसे बीजमन्त्रोंका सम्बन्ध जोड़ना चाहिये^२ (यही प्रासाद-मन्त्रका 'क्षय' नामक भेद है।) इस तरह यहाँ मूर्ति-विद्या बतायी गयी॥ २६—३४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सकलादि मन्त्रोंके उद्धारका वर्णन' नामक तीन सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१७॥
तीन सौ अठारहवाँ अध्याय
अन्तःस्थ, कण्ठोष्ठ तथा शिवस्वरूप मन्त्रका वर्णन; अघोरास्त्र-मन्त्रका उद्धार; 'विघ्नमर्द' नामक मण्डल तथा गणपति-पूजनकी विधि
**भगवान् शिव कहते हैं—**स्कन्द! जिसके ऊपर तेज (र्) हो, ऐसे विश्वरूप (ह्)-को उद्धृत करके फिर नरसिंह (क्ष्)-के नीचे कृतान्त (म्) रखे। उसके अन्तमें 'प्रणव' लगा दे। ऐसा कर 'र्हक्ष्मों' बना। इसके बाद ऊहक (ऊ), अंशुमान् (ं) तथा विश्व (ह्)-को संयुक्त करे। इससे 'हूं' बनेगा। ये दोनों क्रमशः अन्तःस्थ और कण्ठोष्ठ कहे गये हैं। [(र्) अन्तःस्थ वर्ण आदिमें होनेसे उस पूरे मन्त्रकी 'अन्तःस्थ' संज्ञा हुई है। दूसरे मन्त्रमें ह् कण्ठ स्थानीय है और ऊकार ओष्ठस्थानीय; अतः उसे 'कण्ठोष्ठ' नाम दिया गया है।] इनके अन्तमें 'नमः' जोड़ देनेसे ये दोनों मन्त्र चार अक्षरवाले हो जाते हैं। यथा—'ॐ र्हक्ष्मों नमः। ॐ हूं नमः।' विश्वरूप (हकार) कारण माना गया है। उसे बारह मात्राओंसे गुणित करे। इन बारहमेंसे पाँच ह्रस्व-बीजोंद्वारा पूर्ववत् 'ईशान' आदि पाँच ब्रह्ममूर्तियोंकी पूजा करे और दीर्घात्मक छः बीजोंद्वारा पहलेकी ही भाँति यहाँ अङ्गन्यासका कार्य सम्पन्न करे॥ १—३॥
[अब अघोरास्त्र^३-मन्त्रका उद्धार करते हैं—] 'ह्रीं' लिखकर दो बार 'स्फुर-स्फुर' लिखे।
^१. **यथा—**ओम् ईशानाय नमः। ईं तत्पुरुषाय नमः। व्यं अघोराय नमः। व्यं वामदेवाय नमः। नें सद्योजाताय नमः॥ अङ्गन्यासका क्रम इस प्रकार है—आं हृदयाय नमः। ॐ शिरसे स्वाहा। मं शिखायै वषट्। पं कवचाय हुम्। ओम् नेत्रत्रयाय वौषट्। ओं आं ईं ॐ न्यं मं न्यं पं नें ओम् अस्त्राय फट्। इसी क्रमसे करन्यास भी कर सकते हैं।
^२. **यथा—**आं शिखण्डिने नमः। ईं श्रीकण्ठाय नमः। ॐ त्रिमूर्तये नमः। न्यं एकरूपाय नमः। मं एकमूर्तये नमः। इत्यादि।
^३. अग्निपुराणकी उपलब्ध पुस्तकें लिखावट या छपाईके दोषसे 'अघोरास्त्र-मन्त्र' पूरा व्यक्त नहीं कर पाती हैं। 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'के अनुसार किंचिन्मात्र संशोधनसे मन्त्र स्पष्ट हो जाता है; अतः यहाँ शुद्ध पाठ दिया गया है।
- अध्याय ३१८ * ६५५
इसके बाद इन दोनोंके आदिमें 'प्र' जोड़कर पुनरुल्लेख करे—'प्रस्फुर प्रस्फुर'। तत्पश्चात् 'कह', 'वम' और 'बन्ध'—इन तीनों पदोंको दो-दो बार लिखे। फिर दो बार 'घातय' लिखकर अन्तमें 'हुं फट्'का उच्चारण करे। (सब जोड़नेपर ऐसा बनता है—'ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोरतरतनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट्।'—इक्यावन अक्षरोंका मन्त्र है।) इस प्रकार 'अघोरास्त्र-मन्त्र' होता है। (इसके विनियोग और न्यास आदिकी विधि 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र'के ३०वें श्वासमें द्रष्टव्य है।) अब 'शिव-गायत्री' बतायी जाती है। 'महेशाय विद्महे। महादेवाय धीमहि। तन्नः शिवः प्रचोदयात्।'—यह 'शिव-गायत्री' (ही पूर्वाध्यायमें कथित प्रासाद-मन्त्रका आठवाँ भेद 'शिव-रूप' है।) सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको सिद्ध करनेवाली है॥ ४-७॥
यात्रामें तथा विजय आदिके कार्यमें पहले गणकी पूजा करनी चाहिये; इससे 'श्री'की प्राप्ति होती है। पहले चौकोर क्षेत्रको सब ओरसे बारह-बारह कोष्ठोंमें विभाजित करे। [ऐसा करनेसे एक सौ चौवालीस पदोंका चतुष्कोण क्षेत्र बनेगा।] मध्यवर्ती चार पदोंमें त्रिकोणकी रचना करके उसके बीचमें तीन दलोंसे युक्त कमल लिखे। उसके पृष्ठभागमें पदिका और वीथीके भागमें तीन दलवाला अश्वयुक्त कमल बनावे। तदनन्तर वसुदेव-पुत्रों (वासुदेव, संकर्षण और गद)-से, जो तीन दलवाले कमलोंसे सुशोभित हैं, पादपट्टिकाका निर्माण करे। उसके ऊपर भागमात्रके प्रमाणसे एक वेदीकी रचना करे। पूर्वादि दिशाओंमें द्वार तथा कोणभागोंमें उपद्वारकी रचना करे। इस प्रकार द्वारों तथा उपद्वारोंसे रचित मण्डल विघ्ननाशक है। मध्यमें जो कमल है, वह आरक्त वर्णका हो। उसके बाहरके कमल भी वैसे ही हों। वीथी श्वेतवर्णकी होनी चाहिये। द्वारोंका रंग अपने इच्छानुसार रख सकते हैं। कर्णिका पीले रंगसे रँगी जायगी तथा केसर भी पीले ही होंगे। यह 'विघ्नमर्द' नामक मण्डल है। इसके मध्यभागमें गणपतिका पूजन करे। नामका आदि अक्षर अनुस्वारसहित बोलकर आदिमें 'ओं' और अन्तमें 'नमः' जोड़ दे। (यथा—ॐ गं गणपतये नमः।') ह्रस्वान्त बीजोंसे युक्त ईशान-तत्पुरुषादि मन्त्रोंसे ब्रह्ममूर्तियोंका पूजन तथा दीर्घान्त बीजोंसे हृदय, सिर आदि अङ्गोंमें न्यास करे। उपर्युक्त मण्डलकी पूर्वदिशागत पङ्क्तिमें गज, गजशीर्ष (गजानन), गाङ्गेय, गणनायक, गगनग तथा गोपति—इन नामोंका उल्लेख करे। इनमेंसे अन्तिम दो नामोंकी तीन आवृत्तियाँ होंगी। (इस प्रकार ये दस नाम दस कोष्ठोंमें लिखे जायँगे और किनारेके एक-एक कोष्ठ खाली रहेंगे, जो दक्षिण-उत्तरकी नामावलीसे भरेंगे।) ॥ ८-१५॥
विचित्रांश, महाकाय, लम्बोष्ठ, लम्बकर्ण, लम्बोदर, महाभाग, विकृत (विकट), पार्वती-प्रिय, भयावह, भद्र, भगण और भयसूदन—ये बारह नाम दक्षिण दिशाकी पङ्क्तिमें लिखे। पश्चिममें देवत्रास, महानाद, भासुर, विघ्नराज, गणाधिप, उद्भटस्वन, उद्भटशुण्ड, महाशुण्ड, भीम, मन्मथ, मधुसूदन तथा सुन्दर और भावपुष्ट—ये नाम लिखे। फिर उत्तर दिशामें ब्रह्मोश्वर, ब्राह्म-मनोवृत्ति, संलय, लय, नृत्यप्रिय, लोल, विकर्ण, वत्सल, कृतान्त, कालदण्ड तथा कुम्भका पूर्ववत् उल्लेख करके इन सबका यजन करे ॥ १६-२०॥
पूर्वोक्त मन्त्रका दस हजार जप और उसके दशांशसे होम करे। शेष नाम-मन्त्रोंका दस-दस बार जप करके उनके लिये एक-एक बार