अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय ३४५ * ७२५
सिद्ध अभिलषित हो, ऐसे अर्थका साधक 'हेतु'१ अलंकार कहलाता है। उस 'हेतु' अलंकारके भी 'कारक' एवं 'ज्ञापक'—ये दो भेद हो जाते हैं। इनमें कारक-हेतु कार्य-जन्मके पूर्वमें और पश्चात् भी रहनेवाला है, जो 'पूर्वशेष' कहा जाता है और उन्हीं भेदोंमें कार्य-कारणभावसे अथवा किसी नियामक स्वभावसे या अविनाभावके दर्शनसे जो अविनाभावका नियम होता है, वह ज्ञापक हेतुका भेद है। 'नदीपूर' आदिका दर्शन ज्ञापकका उदाहरण है२ ॥ २४-३२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अर्थालंकारका वर्णन' नामक तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४४ ॥
तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय शब्दार्थोभयालंकार
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! 'शब्दार्थालंकार' शब्द और अर्थ दोनोंको समानरूपसे अलंकृत करता है; जैसे एक ही अङ्गमें धारण किया हुआ हार कामिनीके कण्ठ एवं कुचमण्डलकी कान्तिको बढ़ा देता है। 'शब्दार्थालंकार'के छः भेद काव्यमें उपलब्ध होते हैं—प्रशस्ति, कान्ति, औचित्य, संक्षेप, यावदर्थता तथा अभिव्यक्ति। दूसरोंके मर्मस्थलको द्रवीभूत करनेवाले वाक्-कौशलको 'प्रशस्ति' कहते हैं। वह प्रशस्ति 'प्रेमोक्ति' एवं 'स्तुति'के भेदसे दो प्रकारकी मानी गयी है। प्रेमोक्ति और स्तुतिके पर्यायवाचक शब्द क्रमशः 'प्रियोक्ति' एवं 'गुण-कीर्तन' हैं। वाच्य-वाचककी सर्वसम्मत एवं रुचिकर संगतिको 'कान्ति' कहते हैं। यदि ओज एवं माधुर्ययुक्त संदर्भमें—वस्तुके अनुसार रीति एवं वृत्तिके अनुसार रसका प्रयोग हो तो औचित्यका प्रादुर्भाव होता है। अल्पसंख्यक शब्दोंसे अर्थ-बाहुल्यका संग्रह 'संक्षेप' तथा शब्द एवं वस्तुका अन्यूनाधिक्य 'यावदर्थता' कहा जाता है। अर्थ-प्राकट्यको 'अभिव्यक्ति' कहते हैं। उसके दो भेद हैं—'श्रुति' और 'आक्षेप'। शब्दके द्वारा अपने अर्थका उद्घाटन 'श्रुति' कहा जाता है। श्रुतिके दो भेद हैं—'नैमित्तिकी' और 'पारिभाषिकी'। 'संकेत' को परिभाषा कहते हैं। परिभाषाके सम्बन्धसे ही वह पारिभाषिकी है।
दण्डीने "जहाँ प्रस्तुत वस्तुकी विशेषता (उत्कर्ष) दिखानेके लिये परस्परविरुद्ध संसर्ग (एकत्र अवस्थान) प्रदर्शित किया जाय, वह 'विरोध' नामक अलंकार है"—ऐसा लक्षण किया है। वामनने 'विरुद्धाभासत्वं विरोधः।' (४।३।१२)—ऐसा कहा है। 'काव्यप्रकाश'में 'विरुद्धः सोऽविरुद्धेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः।'—ऐसा विरोधका लक्षण देखा जाता है। इन सबकी शब्दावलीमें किंचित् भेद होते हुए भी, अभिप्राय सबका एक ही जान पड़ता है। विरोधपूर्वक संगतिकरणको कुछ लोग 'असंगति' अलंकार भी मानते हैं।
१. अग्निपुराणमें वर्णित 'हेतु' अलंकारको भामहने चमत्कार-शून्य बताकर अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने 'सूक्ष्म' और 'लेश'को भी अलंकार नहीं माना है। परंतु दण्डीने 'वाचामुत्तमभूषणम्'—यों कहकर इन तीनोंको उत्तम अलंकारकी कोटिमें रखा है। उन्होंने 'हेतु' का कोई स्वतन्त्र लक्षण नहीं दिया है, परंतु अग्निपुराणोक्त कारक और ज्ञापक दोनों हेतुओंका उल्लेख किया है। अतः अग्निपुराणोक्त लक्षण ही उन्हें अभिमत है। अग्नि धूमका कारक हेतु है और धूम अग्निका ज्ञापक हेतु। इस प्रकार हेतुके दोनों भेद देखे जाते हैं। आचार्य दण्डी 'हेतु'में ही 'काव्यलिङ्ग', 'अनुमान' तथा कार्यकारणमूलक 'अर्थान्तरन्यास'का अन्तर्भाव मानते हैं। अतएव उन्होंने इन सबके पृथक् लक्षण आदि नहीं लिखे हैं। भोजराजने 'हेतु'का 'क्रियायाः कारणे हेतुः'—ऐसा लक्षण किया है।
२. जैसे नदीके जलप्रवाहके दर्शनसे उसके उद्गम-स्थानकी सत्ता सिद्ध होती है तथा धूमके दर्शनसे अग्निकी सत्ता सूचित होती है। इस तरहके वर्णनोंमें ज्ञापक हेतु समझना चाहिये।
७२६ * अग्निपुराण *
पारिभाषिकीको 'मुख्या' और नैमित्तिकीको 'औपचारिकी' कहते हैं। [ये ही क्रमशः 'अभिधा' और 'लक्षणा' हैं।] उस औपचारिकीके भी दो भेद हैं। जिसके द्वारा अभिधेय अर्थसे स्खलित हुआ शब्द किसी निमित्तवश अमुख्य अर्थका बोधक होता है, वह वृत्ति 'औपचारिकी' है। ये ही दोनों भेद नैमित्तिकीके भी होते हैं। वह लक्षणायोगसे 'लाक्षणिकी' और गुणयोगसे 'गौणी' कहलाती है। अभिधेय अर्थके साथ सम्बद्ध रहकर जो अन्यार्थकी प्रतीति होती है, उसको 'लक्षणा' कहते हैं। अभिधेयके साथ सम्बन्ध, सामीप्य, समवाय, वैपरीत्य एवं क्रियायोगसे लक्षणा पाँच प्रकारकी मानी जाती है। गुणोंकी अनन्तता होनेसे उनकी विवक्षाके कारण गौणीके अनन्त भेद हो जाते हैं। लोकसीमाके पालनमें तत्पर कविद्वारा जब अप्रस्तुत वस्तुके धर्म प्रस्तुत वस्तुपर सम्यग्रूपसे आहित—आरोपित किये जाते हैं, तब उसे 'समाधि'१ कहते हैं। जिसके द्वारा श्रुतिसे अनुपलब्ध अर्थ चैतन्ययुक्त होकर भासित होता है, वह 'आक्षेप'२ कहा जाता है। इसको 'ध्वनि' भी माना गया है; क्योंकि वह ध्वनिसे ही व्यक्त होता है। इसमें ध्वनिके आश्रयसे शब्द और अर्थके द्वारा स्वतः संकलित अर्थ ही व्यञ्जित होता है। अभीष्ट कथनका विशेष विवक्षासे अर्थात् उसमें और भी उत्कर्षकी प्रतीति करानेके लिये जो प्रतिषेध-सा होता है, उसको 'आक्षेप'३ कहते हैं। अधिकार (प्रकरण)-से पृथक्, अर्थात् अप्रकृत या अप्रस्तुत अन्य वस्तुकी जो स्तुति की जाती है, उसे 'अस्तुतस्तोत्र'४ (अप्रस्तुतप्रशंसा) कहते हैं। जहाँ किसी एक वस्तुके कहनेपर उसके समान विशेषणवाले दूसरे अर्थकी प्रतीति हो, उसे विद्वान् पुरुष अर्थकी संक्षिप्तताके कारण 'समासोक्ति'५ कहते हैं। वास्तविक पदार्थका अपलाप या निषेध करके किसी अन्य
१. अग्निपुराणमें 'समाधि' का जो लक्षण किया गया है, वह भरतमुनिके निम्नाङ्कित श्लोकपर आधारित है—
अभियुक्तैर्विशेषस्तु योऽर्थस्यैवोपलभ्यते। तेन चार्थेन सम्पन्नः समाधिः परिकीर्त्यते॥
(नाट्य० १६। १०२)
दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणको अविकलरूपसे अपने ग्रन्थमें ले लिया है। वामनने आरोहावरोहक्रमरूप 'समाधि' को शब्दगुण स्वीकार किया है, किंतु भोजराजने अग्निपुराण और दण्डीके ही भावको लेकर—'समाधिः सोऽन्यधर्माणां यदन्यत्राधिरोपणम्।'—यह लक्षण लिखा है। वाग्भटने भी यही बात कही है—'अन्यस्य धर्मो यत्रान्यत्रारोप्यते स समाधिः'।
२. यहाँ आक्षेपको ध्वनिरूप बताया गया है; क्योंकि उससे अर्थविशेषका ध्वनन होता है।
३. यह 'आक्षेपालंकार' का लक्षण है। आचार्य मम्मटने भी इसी भावका आश्रय लेकर कहा है कि—
निषेधो वक्तुमिष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया। वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः॥
इस लक्षणमें उक्त विषय और वक्ष्यमाण विषयके भेदसे आक्षेपके दो प्रकार बताये गये हैं।
४. इस 'अस्तुत-स्तोत्रको ही परवर्ती आलंकारिकोंने 'अप्रस्तुतप्रशंसा' नाम दिया है; इसी को 'अन्योक्ति' भी कहते हैं। अग्निपुराणमें जो लक्षण दिया गया है, उसीको भामहने अविकलरूपसे उद्धृत किया है। अन्तर इतना ही है कि वे 'अस्तुतस्तोत्र' के स्थानमें 'अप्रस्तुतप्रशंसा' लिखते हैं। उनका लक्षण इस प्रकार है—
अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः। अप्रस्तुतप्रशंसोति सा चैवं कथ्यते यथा॥
(३।२९)
दण्डीने इसी भावको संक्षिप्त शब्दोंमें व्यक्त किया है—'अप्रस्तुतप्रशंसा स्यादप्रक्रान्तेषु या स्तुतिः।' (२। ३४०) वामनने उपमेयकी अनुक्तिमें 'समासोक्ति' और किंचिद् उक्तिमें 'अप्रस्तुतप्रशंसा' मानी है।
५. आचार्य भामहने अपने ग्रन्थमें अग्निपुराणोक्त लक्षणको ज्यों-का-त्यों ले लिया है। अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'उदिता' है और भामहके ग्रन्थमें 'उद्दिष्टा'। वहाँ अन्तमें 'बुधैः' पदका प्रयोग है और यहाँ 'यथा' का। दण्डीने इसी भावको कुछ अधिक स्पष्टताके साथ इस प्रकार लिखा है—
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पदार्थको सूचित करना 'अपह्नुति'$^१$ है। जो अभिधेय दूसरे प्रकारसे कहा जाता है अर्थात् सीधे न कहकर प्रकारान्तरसे घुमा-फिराकर प्रस्तुत किया जाता है, उसको 'पर्यायोक्ति'$^२$ कहते हैं। इनमेंसे किसी भी एकका नाम 'ध्वनि'$^३$ है॥ १—१८॥'
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शब्दार्थोभयालंकारोंका कथन' नामक तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४५ ॥
तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय
काव्यगुण-विवेक
अग्निदेव कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ! गुणहीन काव्य अलंकारयुक्त होनेपर भी सहृदयके लिये प्रीतिकारक नहीं होता, जैसे नारीके यौवनजनित लालित्यसे$^४$ रहित शरीरपर हार भी भारस्वरूप हो जाता है। यदि कोई कहे कि 'गुणनिरूपणकी क्या आवश्यकता है? दोषोंका अभाव ही गुण हो जायगा' तो उसका ऐसा कथन उचित नहीं है; क्योंकि 'श्लेष' आदि गुण और 'गूढार्थत्व' आदि दोष पृथक्-पृथक् कहे गये हैं। जो काव्यमें महती शोभाका आनयन करता है, उसको 'गुण' कहा जाता है। यह सामान्य और वैशेषिकके भेदसे दो प्रकारका हो जाता है। जो गुण सर्वसाधारण हो, उसे 'सामान्य' कहा जाता है। सामान्य गुण शब्द, अर्थ और शब्दार्थको प्राप्त होकर तीन प्रकारका हो जाता है। जो गुण काव्य-शरीरमें शब्दके आश्रित होता है, वह
वस्तु किंचिदभिप्रेत्य तत्तुल्यस्यान्यवस्तुनः। उक्तिः संक्षेपरूपत्वात् सा समासोक्तिरुच्यते ॥
(२।२०५)
'समासोक्ति'की गणना व्यङ्ग्य अलंकारोंमें होती है, इस दृष्टिसे अग्निपुराणोक्त लक्षणमें 'गम्यते'—इस क्रियापदका प्रयोग अधिक महत्त्वका है। अर्वाचीन आलंकारिक 'समासोक्ति'के लक्षणोंमें अप्रकृत व्यवहारके समारोपका भी उल्लेख करते हैं।
१. काव्यादर्शकार दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणकी आनुपूर्वीको ही उद्धृत कर लिया है। अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'किंचिदन्यार्थसूचनम्' पाठ है और काव्यादर्शमें 'सूचनम्'के स्थानमें 'दर्शनम्' कर दिया गया है। भामहने शब्दान्तरसे इसी भावको प्रकट किया है—
अपह्नुतिरभीष्टा च किंचिदन्तर्गतोपमा। भूतार्थापह्नवादस्याः क्रियते चाभिधा यथा ॥
(२।२१)
इस लक्षणमें 'किंचिदन्तर्गतोपमा' यह अंश विशेष है। वामनने तुल्य वस्तुके द्वारा वाक्यार्थके अपलापको 'अपह्नुति' कहा है—'समानवस्तुनान्यापलापोऽपह्नुतिः।' (३।५) परवर्ती आलंकारिकोंने प्रकृत वस्तुका निषेध करके अन्य वस्तुकी स्थापनाको 'अपह्नुति' कहा है।
२. भामहने भी 'पर्यायोक्ति'का यही लक्षण लिखा है।
३. प्राचीनोंने आक्षेप, अप्रस्तुतप्रशंसा, समासोक्ति तथा पर्यायोक्तिको 'ध्वनि' कहकर जो उसे अलंकारोंमें अन्तर्भूत करनेकी चेष्टा की है, उसका ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धनने बड़ी प्रौढ़िके साथ खण्डन किया है।
४. इसी भावको लेकर वामनने कहा है—
यदि भवति वचश्च्युतं गुणेभ्यो वपुरिव यौवनवन्ध्यमङ्गनायाः।
अपि जनदयितानि दुर्भगत्त्वं नियतमलङ्करणानि संश्रयन्ते ॥
अर्थात्—'गुणरहित वचन नारीके यौवनरहित रूपकी भाँति मनोरम नहीं होता। यदि उसे अलंकृत भी किया जाय तो वे अलंकार अपना दुर्भाग्य सूचित करते हैं।'
७२८ * अग्निपुराण *
'शब्दगुण' कहलाता है। शब्दगुणके सात$^१$ भेद होते हैं—श्लेष, लालित्य, गाम्भीर्य, सौकुमार्य, उदारता, ओज और यौगिकी (समाधि)। शब्दोंका सुश्लिष्ट संनिवेश 'श्लेष'$^२$ कहा जाता है। जहाँ गुणादेश आदिके द्वारा पूर्वपदसम्बद्ध अक्षर संधिको प्राप्त नहीं होता, वहाँ 'लालित्य'$^३$ गुण माना गया है। विशिष्ट लक्षणके अनुसार उल्लेखनीय उच्चभावव्यञ्जक शब्दसमूहको श्रेष्ठ पुरुष 'गाम्भीर्य'$^४$ कहते हैं। वही अन्यत्र 'उत्तान शब्दक' या 'शब्दत्व' नामसे प्रसिद्ध है। जिसमें निष्ठुरतारहित कोमल अक्षरोंका बाहुल्य हो, उस शब्दसमूहको 'सौकुमार्य'$^५$ गुणविशिष्ट माना गया है। जहाँ श्लाघ्य विशेषणोंसे युक्त उत्कृष्ट पदका प्रयोग हो, वहाँ 'औदार्य'$^६$ गुण माना जाता है। समासोंका बाहुल्य 'ओज'$^७$ कहलाता है। यह गद्य-पद्यरूप काव्यका प्राण है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जो कोई भी प्राणी हैं, उनके 'पौरुष'का वर्णन एकमात्र 'ओज' गुणविशिष्ट पदावलीसे ही होता है। जिस-किसी भी शब्दके द्वारा वर्ण्यमान वस्तुका उत्कर्ष वहन करनेवाला गुण 'अर्थगुण' कहा जाता है। अर्थगुणके छः भेद प्रकाशित होते हैं—माधुर्य, संविधान, कोमलता, उदारता, प्रौढि एवं सामयिकता। क्रोध और ईर्ष्यामें भी आकारकी गम्भीरता तथा धैर्यधारणको 'माधुर्य'$^८$ कहते हैं। अपेक्षित कार्यकी सिद्धिके लिये उद्योग 'संविधान' माना गया है। जो कठिनता
१. भरतमुनिने काव्यार्थ-गुण दस माने हैं—
श्लेषः प्रसादः समता समाधिर्माधुर्यमोजः पदसौकुमार्यम्।
अर्थस्य च व्यक्तिरुदारता च कान्तिश्च काव्यार्थगुणा दशैते॥
अग्निदेवने शब्दगुण सात, अर्थगुण छः और शब्दार्थ-गुण छः माने हैं। काव्यादर्शकार दण्डीने भी भरतोक्त दस गुणोंका ही उल्लेख किया है। वामनने बीस और भोजने अड़तालीस गुण प्रदर्शित किये हैं।
२. भामहने माधुर्य, प्रसाद और ओज—इन तीन गुणोंको ही स्वीकार किया है। वामनने शब्दगुण दस और अर्थगुण भी दस माने हैं। नाम दोनों विभागोंके एक ही हैं, केवल लक्षणमें अन्तर है। उन्होंने 'शब्दश्लेष'का लक्षण इस प्रकार किया है—'मसृणत्वं श्लेषः'। इसकी व्याख्या करते हुए वे स्वयं लिखते हैं—' 'मसृणत्वं नाम यस्मिन् सति बहून्यपि पदानि एकवद् भासन्ते।—अर्थात् जिसके होनेपर बहुत-से पद एकपदके तुल्य प्रतीत होते हैं, उसका नाम 'मसृणत्व' है।' 'उदाहरणके लिये 'अस्त्युत्तरस्याम्'—यह पद्यांश है। इसमें दो पद संधियुक्त होकर एकपदवत् प्रतीत होते हैं। दण्डीने 'श्लिष्टमस्पृष्टशैथिल्यम्'—यह श्लेषका लक्षण लिखा है। इसके अनुसार जिस वाक्यमें शिथिलता छू भी न गयी हो, वह 'श्लेष' है। इसका और वामनोक्त लक्षणका आधार अग्निपुराणका 'सुश्लिष्टसंनिवेशत्वं शब्दानां श्लेषः।'—यह लक्षण ही है। भोजराजने इसीका भाव लेकर 'सुश्लिष्टपदता श्लेषः।'—यह लक्षण लिखा है।
३-४.'लालित्य' नामक गुणका उल्लेख अन्यत्र नहीं मिलता। गाम्भीर्यका लक्षण भोजराजने इस प्रकार किया है—'ध्वनिमत्ता तु गाम्भीर्यम्'। इसमें भी अग्निपुराणोक्त लक्षणकी भावच्छाया दीख पड़ती है।
५. भोजराजके 'अनिष्ठुराक्षरप्रायं सुकुमारमिति स्मृतम्।'—इस लक्षणमें अग्निपुराणकी शब्दावलीका ही समावेश किया गया है। दण्डीने भी इसी आनुपूर्वीमें 'सुकुमारता'को लक्षित कराया है। वामनने बन्धकी अकठोरताको ही 'सौकुमार्य' कहा है। उसका आधार भी अग्निपुराणोक्त लक्षण ही है।
६. काव्यादर्शकार दण्डीने 'औदार्यका' यही लक्षण थोड़े-से पदोंके हेर-फेरके साथ अपने ग्रन्थमें ले लिया है। भोजराजने वैभवके उत्कर्षका प्रतिपादन 'औदार्य' माना है, किंतु यह उनका अर्थगुण है—'भूत्युत्कर्ष उदारता।'—शब्दगुणान्तर्गत उदारताका लक्षण उनके मतमें 'विकटाक्षरबन्धत्व' है, जो वामनोक्त लक्षणसे मेल खाता है। वामनने ग्राम्यत्वदोषसे रहित रचनाको 'औदार्यगुणशालिनी' स्वीकार किया है। यथा—'अग्राम्यत्वमुदारता।' (३।२।१२) किंतु यह उनके 'अर्थगुण'का लक्षण है। शब्दगुणके लक्षणमें वे बन्धकी विकटताको ही 'उदारता' मानते हैं। जिसके होनेपर पद नृत्य करते-से प्रतीत होते हैं।
७. 'काव्यादर्श'में भी 'ओज'का यही लक्षण उद्धृत किया गया है। वामनने निबन्धके गाढ़त्वको 'ओज' कहा है। यह गाढ़त्व समास-बाहुल्यसे ही आता है। अतः वामनने कोई नयी बात नहीं कही है। 'सरस्वतीकण्ठाभरण'के निर्माता भोजराजने भी अग्निपुराणकी आनुपूर्वीमें ही 'ओजः' समासभूयष्ठम्।'—इस प्रकार 'ओज'का लक्षण लिखा है।
८. वामनने 'पृथक्-पदत्वं माधुर्यम्।'—यह लिखकर बताया है, जहाँ पद्यमें सभी पद पृथक्-पृथक् हों, समासमें आबद्ध होनेके कारण विकट या जटिल न हो जायें, वहाँ 'माधुर्य' है। यह शब्दगत माधुर्यका लक्षण है। अर्थगत माधुर्य वे वहाँ मानते हैं, जहाँ उक्ति-वैचित्र्य
- अध्याय ३४६ * ७२९
आदि दोषोंसे रहित है तथा संनिवेश विशेषका तिरस्कार करके मृदुरूपमें ही भासित होता है, वह गुण 'कोमलता'के नामसे प्रसिद्ध है॥ १-१४॥
जिसमें स्थूललक्ष्यत्वकी प्रवृत्तिका लक्षण लक्षित होता है, आशय अत्यन्त सुन्दररूपमें प्रकट होता है, वह 'उदारता'¹ नामक गुण है। इच्छित अर्थके प्रति निर्वाहका उपपादन करनेवाली हेतुगभिणी युक्तियोंको 'प्रौढ़ि'² कहते हैं। स्वतन्त्र या परतन्त्र कार्यके बाह्य एवं आन्तरिक संयोगसे अर्थकी जो व्युत्पत्ति होती है, उसको 'सामयिकता' कहते हैं। जो शब्द एवं अर्थ—दोनोंको उपकृत करता है, वह 'उभयगुण' (शब्दार्थगुण) कहलाता है। साहित्यशास्त्रियोंने इसका विस्तार छः भेदोंमें किया है—प्रसाद, सौभाग्य, यथासंख्य, प्रशस्तता, पाक और राग। सुप्रसिद्ध अर्थसे समन्वित पदोंका संनिवेश 'प्रसाद'³ कहा जाता है। जिसके उक्त होनेपर कोई गुण उत्कर्षको प्राप्त हुआ प्रतीत होता है, विद्वान् उसको 'सौभाग्य' या 'औदार्य' बतलाते हैं। तुल्य वस्तुओंका क्रमशः कथन 'यथासंख्य'⁴ माना जाता है। समयानुसार वर्णनीय दारुण वस्तुका भी अदारुण शब्दसे वर्णन 'प्राशस्त्य' कहलाता है। किसी पदार्थकी उच्च परिणतिको 'पाक' कहते हैं। 'मृद्वीकापाक' एवं 'नारिकेलाम्बुपाक'के भेदसे 'पाक' दो प्रकारका होता है। आदि और अन्तमें भी जहाँ सौरस्य हो, वह 'मृद्वीकापाक' है। काव्यमें जो छायाविशेष (शोभाधिक्य) प्रस्तुत किया जाय, उसे 'राग' कहते हैं। यह राग अभ्यासमें लाया जानेपर सहज कान्तिको भी लाँघ जाता है, अर्थात् उसमें और भी उत्कर्ष ला देता है। जो अपने विशेष लक्षणसे अनुभवमें आता हो, उसे 'वैशेषिक गुण' जानना चाहिये। यह राग तीन प्रकारका होता है—हारिद्रराग, कौसुम्भराग और नीलीराग। (यहाँतक सामान्य गुणका विवेचन हुआ)। अब 'वैशेषिक'का परिचय देते हैं। वैशेषिक उसको जानना चाहिये, जो स्वलक्षणगोचर हो—अनन्यसाधारण हो ॥ १५-२६ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'काव्यगुणविवेककथन' नामक तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४६॥
हो। दण्डीने सरस वाक्यको 'मधुर' बताया है, परंतु राजा भोजने 'सरस्वतीकण्ठाभरण' में अग्निपुराणोक्त लक्षणका ही भाव लेकर लिखा है—'माधुर्यमुक्तमाचार्यैः क्रोधादावप्यतीव्रता'। यह अर्थगत माधुर्य है। शब्दगत माधुर्यका लक्षण वे भी वामनकी भाँति 'पृथक्पदत्व' ही मानते हैं। १. दण्डीने शब्दान्तरसे अपने लक्षणमें कुछ ऐसा ही भाव प्रकट किया है। उनका कहना है कि—"जिस वाक्यका उच्चारण करनेपर उसमें किसी उत्कृष्ट गुणकी प्रतीति हो, वहाँ 'उदारता' नामक गुण है। उसके द्वारा काव्यपद्धति 'कृतार्थ' (चमत्कारकारिणी) होती है।" २. भोजराजने इसी अभिप्रायको और भी सरल रीतिसे व्यक्त किया है—'विवक्षितार्थनिर्वाहः काव्ये प्रौढिरिति स्मृता'। ३. दण्डीने इसी लक्षणका भाव लेकर 'प्रसादवत् प्रसिद्धार्थम्।'—ऐसा लक्षण किया है। वामनने भी 'अर्थवैमल्यं प्रसादः।'—यों कहकर इसी अभिप्रायकी पुष्टि की है। भोजराजने भी 'यत्तु प्राकट्यमर्थस्य प्रसादः सोऽभिधीयते'—यों लिखकर पूर्वोक्त अभिप्रायका ही पोषण किया है। ४. 'यथासंख्य'को अर्वाचीन आलंकारिकोंने गुण नहीं माना है, उसे अलंकारकी कोटिमें रखा है।
७३० * अग्निपुराण *
तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय
काव्यदोष-विवेक
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! ‘दृश्य’ और ‘श्रव्य’ काव्यमें यदि ‘दोष’$^१$ हो तो वह सहृदय सभ्यों (दर्शकों और पाठकों)-के लिये उद्वेगजनक होता है। वक्ता, वाचक एवं वाच्य—इनमेंसे एक-एकके नियोगसे, दो-दोके नियोगसे और तीनोंके नियोगसे सात प्रकारके दोष$^२$ होते हैं। इनमें ‘वक्ता’ कविको माना गया है, जो संदिहान, अविनीत, अज्ञ और ज्ञाताके भेदसे चार प्रकारका है। निमित्त और परिभाषा (संकेत)-के अनुसार अर्थका स्पर्श करनेवाले शब्दको ‘वाचक’ कहते हैं। उसके दो भेद हैं—‘पद’ और ‘वाक्य’। इन दोनोंके लक्षणोंका वर्णन पहले हो चुका है। पददोष दो प्रकारके होते हैं—असाधुत्व और अप्रयुक्तत्व। व्याकरणशास्त्रसे विरुद्ध पदमें विद्वानोंने ‘असाधुत्व’ दोष माना है। काव्यकी व्युत्पत्तिसे सम्पन्न विद्वानोंद्वारा जिसका कहीं उल्लेख न किया गया हो, उसमें ‘अप्रयुक्तत्व’ दोष कहा जाता है। अप्रयुक्तत्वके भी पाँच भेद होते हैं—छान्दसत्व, अविस्पष्टत्व, कष्टत्व, असामयिकत्व एवं ग्राम्यत्व। जिसका लोकभाषामें प्रयोग न हो, वह ‘छान्दसत्व’ दोष एवं जो बोधगम्य न हो, वह ‘अविस्पष्टत्व’ दोष कहलाता है। अविस्पष्टत्वके भेद निम्नलिखित हैं—गूढार्थता, विपर्यस्तार्थता तथा संशयितार्थता। जहाँ अर्थका क्लेशपूर्वक ग्रहण हो, वहाँ ‘गूढार्थता’ दोष होता है। जो विवक्षितार्थसे भिन्न शब्दार्थके ज्ञानसे दूषित हो उसे ‘विपर्यस्तार्थता’ कहते हैं। अन्यार्थत्व एवं असमर्थत्व—ये दोनों दोष भी ‘विपर्यस्तार्थता’ का ही अनुगमन करते हैं। जिसमें अर्थ संदिग्ध होता है, उसको ‘संशयितार्थता’ कहते हैं। यह सहृदयके लिये उद्वेगकारक न होनेपर दोष नहीं माना जाता। सुखपूर्वक उच्चारण न होना ‘कष्टत्वदोष’ माना जाता है। जो रचना समय—कविजन-निर्धारित मर्यादासे च्युत हो, उसमें ‘असामयिकता’ मानी जाती है। उस असामयिकताको मुनिजन ‘नेया’ कहते हैं। जिसमें निकृष्ट एवं दूषित अर्थकी प्रतीति होती है, उसमें ‘ग्राम्यतादोष’ होता है। निन्दनीय ग्राम्यार्थके कथनसे, उसके स्मरणसे तथा उसके वाचक पदके साथ समानता होनेसे ‘ग्राम्यदोष’ तीन प्रकारका है। ‘अर्थदोष’ साधारण और प्रातिस्वितकके भेदसे दो प्रकारका होता है। जो दोष अनेकवर्ती होता है, उसको ‘साधारण’ माना
१. काव्यमें ‘दोष’का परिहार अत्यन्त आवश्यक माना गया है। दण्डीने कहा है कि—‘जिस प्रकार सुन्दर-से-सुन्दर शरीर श्वेतकुष्ठके एक दागसे भी अपनी कमनीयता खो बैठता है, उसी प्रकार कितना भी रमणीय काव्य क्यों न हो, थोड़े-से दोषसे भी दूषित होकर सहृदयोंके लिये अग्राह्य हो जाता है। अतः दोषकी कदापि उपेक्षा नहीं करनी चाहिये।’ (काव्या० १।७) भामहने दोषयुक्त काव्यको कुपुत्रके समान निन्दाजनक माना है। वाग्भट (प्रथम)-का कहना है कि दोषरहित काव्य ही कीर्तिका विस्तार करनेवाला है। अग्निपुराणमें नाटक और काव्यके दोषको सहृदयोंके लिये उद्वेगजनक कहा गया है। भरतमुनिने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में काव्यके दस दोष गिनाये हैं। यथा—निगूढ़, अर्थान्तर, अर्थहीन, भिन्नार्थ, एकार्थ, अभिप्लुतार्थ, न्यायापेत, विषम, विसंधि तथा शब्दच्युति। अग्निपुराणमें इन सबका वर्णन तो है ही, अन्यान्य दोषोंकी भी विस्तारपूर्वक उद्भावना की गयी है। भामहके प्रथम निर्दिष्ट दस दोष भरतोक्त दोषोंपर ही आधारित हैं। दण्डीने भी किञ्चित् शब्दान्तरके साथ उन्हीं दस दोषोंको वर्जनीय बताया है। भामहने सबसे अधिक दोषोंकी उद्भावना की है, किंतु उनका कोई क्रमबद्ध वर्णन देखनेमें नहीं आता, यद्यपि उन्होंने अपना आधा ग्रन्थ दोषनिरूपणमें ही लगा दिया है।
२. अग्निपुराणमें पहले वक्तृ, वाचक और वाच्य—इन तीनोंमें एक-एक, दो-दो और तीनोंके नियोग (सम्बन्ध)-से सात प्रकारके दोष माने हैं। यथा—वक्तृनियुक्तदोष, वाचकनियुक्तदोष, वाच्यनियुक्तदोष, वक्तृवाचकनियुक्तदोष, वाचकवाच्यनियुक्तदोष, वक्तृवाच्यनियुक्तदोष और वक्तृवाचकवाच्यनियुक्तदोष।
- अध्याय ३४७ * \hfill ७३१
गया है। क्रियाभ्रंश, कारकभ्रंश, विसंधि, पुनरुक्तता एवं व्यस्त-सम्बन्धताके भेदसे 'साधारण दोष' पाँच प्रकारके होते हैं। क्रियाहीनताको 'क्रियाभ्रंश', कर्त्ता आदि कारकके अभावको 'कारकभ्रंश' एवं संधिदोषको 'विसंधि' कहते हैं॥ १—१५॥
विसंधि दोष दो प्रकारका होता है—'संधिका अभाव' एवं 'विरुद्ध संधि'। विरुद्ध पदार्थान्तरकी प्रतीति होनेसे विरुद्ध संधिको कष्टकर माना गया है। बार-बार कथनको 'पुनरुक्तत्व' दोष कहते हैं। वह भी दो प्रकारका होता है—'अर्थावृत्ति' एवं 'पदावृत्ति'। 'अर्थावृत्ति' भी दो प्रकारकी होती है—काव्यमें प्रयुक्त अभीष्ट या विवक्षित शब्दके द्वारा एवं शब्दान्तरके द्वारा 'पदावृत्ति'में अर्थकी आवृत्ति नहीं होती, पदमात्रकी ही आवृत्ति होती है। जहाँ व्यवधानसे भली-भाँति सम्बन्ध हो, वहाँ 'व्यस्त-सम्बन्धता' दोष होता है। सम्बन्धान्तरकी प्रतीतिसे, सम्बन्धान्तरजन्य होनेसे तथा इन दोनोंके अभावमें भी अन्तर्व्यवधानसे व्यस्त-सम्बन्धताके तीन भेद हो जाते हैं। बीचमें पद अथवा वाक्यसे व्यवधान होनेके कारण उक्त भेदोंमेंसे प्रत्येकके दो-दो भेद और होते हैं। पद और वाक्यमें अर्थ और अर्थ्यमानके भेदसे वाच्यार्थके दो भेद होते हैं। पदगत वाच्य 'व्युत्पादित' और 'व्युत्पाद्य'के भेदसे दो प्रकारका माना जाता है। यदि हेतु अभीष्टसिद्धिमें व्याघातकारी हो तो यह उसका दोष माना गया है। यह 'हेतुदोष' ग्यारह प्रकारका होता है—असमर्थत्व, असिद्धत्व, विरुद्धत्व, अनेकान्तिकता, सत्प्रतिपक्षत्व, कालातीतत्व, संकर, पक्षमें अभाव, सपक्षमें अभाव, विपक्षमें अस्तित्व और ग्यारहवाँ निरर्थत्त्व। वह इष्टव्याघातकारित्व दोष काव्य और नाटकोंमें तथा सहृदय सभासदोंमें (श्रोताओं, दर्शकों और पाठकोंमें) मार्मिक पीड़ा उत्पन्न करनेवाला है। निरर्थत्वदोष दुष्कर चित्रबन्धादि काव्यमें दूषित नहीं माना जाता। पूर्वोक्त गूढार्थत्वदोष दुष्कर चित्रबन्धमें विद्वानोंके लिये दुःखप्रद नहीं प्रतीत होता। 'ग्राम्यत्व' भी यदि लोक और शास्त्र दोनोंमें प्रसिद्ध हो तो उद्वेगकारक नहीं जान पड़ता। क्रियाभ्रंशमें यदि क्रियाका अध्याहार करके उसका सम्बन्ध जोड़ा जा सके तो वह दोष नहीं रह जाता। इसी तरह भ्रष्टकारकता दोष नहीं रह जाता, जब कि आक्षेपबलसे कारकका अध्याहार सम्भव हो जाय। जहाँ 'प्रगृह्य' संज्ञा होनेके कारण प्रकृतिभाव प्राप्त हो, वहाँ विसंधित्व दोष नहीं माना गया है। जहाँ संधि कर देनेपर उच्चारणमें कठिनाई आ जाय, वैसे दुर्वाच्य स्थलोंमें विसंधित्व दोषकारक नहीं है॥ १६—२७॥
'अनुप्रास' अलंकारकी योजनामें पदोंकी आवृत्ति तथा व्यस्त-सम्बन्धता शुभ है। अर्थात् दोष न होकर गुण है। अर्थसंग्रहमें अर्थावृत्ति दोषकारक नहीं होती। वह व्युत्क्रम (क्रमोल्लङ्घन) आदि दोषोंसे भी लिप्त नहीं होती। उपमान और उपमेयमें विभक्ति, संज्ञा, लिङ्ग और वचनका भेद होनेपर भी वह तबतक दोषकारक नहीं माना जाता, जबतक कि बुद्धिमान् पुरुषोंको उससे उद्वेगका अनुभव नहीं होता। (उद्वेगजनकता ही दूषकताका बीज है।) वह न हो तो माने गये दोष भी दोषकारक नहीं समझे जाते। अनेककी एकसे और बहुतोंकी बहुतोंसे दी गयी उपमा शुभ मानी गयी है। (अर्थात् यदि सहृदयोंको उद्वेग न हो तो लिङ्ग-वचनादिके भेद होनेपर भी दोष नहीं मानना चाहिये।) कविजनोंका परम्परानुमोदित सदाचार 'समय' कहा जाता है। जिसके द्वारा समस्त सिद्धान्तवादी निर्बाध संचरण करते हैं तथा जिसके ऊपर कुछ ही सिद्धान्तवादी चल पाते हैं—इस पक्षद्वयके कारण सामान्य
७३२
* अग्निपुराण *
समय दो भेदोंमें विभक्त हो जाता है। यह मतभेद किसीको तो सिद्धान्तका आश्रय लेनेसे और किसीको भ्रान्तिसे होता है। किसी मुनिके सिद्धान्तका आधार तर्क होता है और किसीके मतका आलम्बन क्षणिक विज्ञानवाद। किसीका यह मत है कि पञ्चभूतोंके संघातसे शरीरमें चेतनता आ जाती है, कोई स्वतःप्रकाश ज्ञानको ही चैतन्यरूप मानते हैं। कोई प्रज्ञात स्थूलतावादी है और कोई शब्दानेकान्तवादी। शैव, वैष्णव, शाक्त तथा सौर सिद्धान्तोंको माननेवालोंका विचार है कि इस जगत्का कारण 'ब्रह्म' है। परंतु सांख्यवादी प्रधानतत्त्व (प्रकृति)-को ही दृश्य जगत्का कारण मानते हैं। इसी वाणीलोकमें विचरते हुए विचारक जो एक-दूसरेके प्रति विपर्यस्त दृष्टि रखते हुए परस्पर युक्तियोंद्वारा एक-दूसरेको बाँधते हैं, उनका वह भिन्न-भिन्न मत या मार्ग ही 'विशिष्ट समय' कहा गया है। यह विशिष्ट समय 'असत्के परिग्रह' तथा 'सत्के परित्याग'के कारण दो भेदोंमें विभक्त होता है। जो 'प्रत्यक्ष' आदि प्रमाणोंसे बाधित हो, उस मतको 'असत्' मानते हैं। कवियोंको वह मत ग्रहण करना चाहिये, जहाँ ज्ञानका प्रकाश हो। जो अर्थक्रियाकारी हो, वही 'परमार्थ सत्' है। अज्ञान और ज्ञानसे परे जो एकमात्र ब्रह्म है, वही परमार्थ सत् जाननेयोग्य है। वही सृष्टि, पालन और संहारका हेतुभूत विष्णु है, वही शब्द और अलंकाररूप है। वही अपरा और परा विद्या है। उसीको जानकर मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त होता है ॥ २८—४०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'काव्यदोषविवेकका कथन' नामक तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४७॥
तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय
एकाक्षरकोष
अग्निदेव कहते हैं—अब मैं तुम्हें 'एकाक्षराभिधान' तथा मातृकाओंके नाम एवं मन्त्र बतलाता हूँ। सुनो—'अ' नाम है भगवान् विष्णुका। 'अ' निषेध अर्थमें भी आता है। 'आ' ब्रह्माजीका बोध कराता है। वाक्य-प्रयोगमें भी उसका उपयोग होता है। 'सीमा' अर्थमें 'आ' अव्ययपद है। क्रोध और पीड़ा अर्थमें भी उसका प्रयोग किया जाता है। 'इ' काम-अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'ई' रति और लक्ष्मीके अर्थमें आता है। 'उ' शिवका वाचक है। 'ऊ' रक्षक आदि अर्थोंमें प्रयुक्त होता है। 'ऋ' शब्दका बोधक है। 'ॠ' अदितिके अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'ऌ', 'ॡ'—ये दोनों अक्षर दिति एवं कुमार कार्तिकेयके बोधक हैं। 'ए' का अर्थ है—देवी। 'ऐ' योगिनीका वाचक है। 'ओ' ब्रह्माजीका और 'औ' महादेवजीका बोध करानेवाला है। 'अं' का प्रयोग काम अर्थमें होता है। 'अः' प्रशस्त (श्रेष्ठ)-का वाचक है। 'क' ब्रह्मा आदिके अर्थमें आता है। 'कु' कुत्सित (निन्दित) अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'खं'—यह पद शून्य, इन्द्रिय और मुखका वाचक है। 'ग' अक्षर यदि पुल्लिंगमें हो तो गन्धर्व, गणेश तथा गायकका वाचक होता है। नपुंसकलिङ्ग 'ग' गीत अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'घ' घण्टा तथा करधनीके अग्रभागके अर्थमें आता है। 'ताडन' अर्थमें भी 'घ' आता है। 'ङ' अक्षर विषय, स्पृहा तथा भैरवका वाचक है। 'च' दुर्जन तथा निर्मल-अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'छ'का अर्थ छेदन है। 'जि' विजेयके अर्थमें
- अध्याय ३४८ * । ७३३
आता है। 'ज' पद गीतका वाचक है। 'झ' का अर्थ प्रशस्त, 'ञ' का बल तथा 'ट' का गायन है। 'ठ' का अर्थ चन्द्रमण्डल, शून्य, शिव तथा उद्बन्धन है। 'ड' अक्षर रुद्र, ध्वनि एवं त्रासके अर्थमें आता है। ढक्का और उसकी आवाजके अर्थमें 'ढ' का प्रयोग होता है। 'ण' निष्कर्ष एवं निश्चयके अर्थमें आता है। 'त' का अर्थ है—तस्कर (चोर) और सूअरकी पूँछ। 'थ' भक्षणके और 'द' छेदन, धारण तथा शोभनके अर्थमें आता है। 'ध' धाता (धारण करनेवाले या ब्रह्माजी) तथा धूस्तूर (धतूरे)-के अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'न' का अर्थ समूह और सुगत (बुद्ध) है। 'प' उपवनका और 'पूः' झंझावातका बोधक है। 'फु' फूँकने तथा निष्फल होनेके अर्थमें आता है। 'बि' पक्षी तथा 'भ' ताराओंका बोधक है। 'मा' का अर्थ है—लक्ष्मी, मान और माता। 'य' योग, याता (यात्री अथवा दयादिन) तथा 'ईरिण' नामक वृक्षके अर्थमें आता है॥ १-१०॥
'र' का अर्थ है—अग्नि, बल और इन्द्र। 'ल' का विधाता, 'व' का विश्लेषण (वियोग या बिलगाव) और वरुण तथा 'श' का अर्थ शयन एवं सुख है। 'ष' का अर्थ श्रेष्ठ, 'स' का परोक्ष, 'सा' का लक्ष्मी, 'स' का बाल, 'ह' का धारण तथा रुद्र और 'क्ष' का क्षेत्र, अक्षर, नृसिंह, हरि, क्षेत्र तथा पालक है। एकाक्षरमन्त्र देवतारूप होता है। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है। 'क्षौं हयशिरसे नमः' यह सब विद्याओंको देनेवाला मन्त्र है। अकार आदि नौ अक्षर भी मन्त्र हैं;' उन्हें उत्तम 'मातृका-मन्त्र' कहते हैं। इन मन्त्रोंको एक कमलके दलमें स्थापित करके इनकी पूजा करे। इनमें नौ दुर्गाओंकी भी पूजा की जाती है। भगवती, कात्यायनी, कौशिकी, चण्डिका, प्रचण्डा, सुरनायिका, उग्रा, पार्वती तथा दुर्गाका पूजन करना चाहिये। 'ॐ चण्डिकायै विद्महे भगवत्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्'—यह दुर्गा-मन्त्र है। षडङ्ग आदिके क्रमसे पूजन करना उचित है। अजिता, अपराजिता, जया, विजया, कात्यायनी, भद्रकाली, मङ्गला, सिद्धि, रेवती, सिद्ध आदि वटुक तथा एकपाद, भीमरूप, हेतुक, कापालिकका पूजन करे। मध्यभागमें नौ दिक्पालोंकी पूजा करनी चाहिये। मन्त्रार्थकी सिद्धिके लिये 'ह्रीं दुर्गे रक्षिणि स्वाहा'—इस मन्त्रका जप करे। गौरीकी पूजा करे; धर्म आदिका, स्कन्द आदिका तथा शक्तियोंका यजन करे। प्रज्ञा, ज्ञानक्रिया, वाचा, वागीशी, ज्वालिनी, वामा, ज्येष्ठा, रौद्रा, गौरी, ह्री तथा पुरस्सरा देवीका 'ह्रींः सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा'—इस मन्त्रसे महागौरीका तथा ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, सुभगा, ललिता, कामिनी, काममाला और इन्द्रादि शक्तियोंका पूजन भी एकाक्षर मन्त्रोंसे होता है। गणेश-पूजनके लिये 'ॐ गं स्वाहा' 'यह मूलमन्त्र है। अथवा—'गं गणपतये नमः।' से भी उनकी पूजा होती है। रक्त, शुक्ल, दन्त, नेत्र, परशु और मोदक—यह 'षडङ्ग' कहा गया है। 'गन्धोल्काय नमः।' से क्रमशः गन्ध आदि निवेदन करे। गज, महागणपति तथा महोल्क भी पूजनके योग्य हैं। 'कूष्माण्डाय, एकदन्ताय, त्रिपुरान्तकाय, श्यामदन्तविकटहरहासाय, लम्बनासाननाय, पद्मदंष्ट्राय, मेघोल्काय, धूमोल्काय, वक्रतुण्डाय, विघ्नेश्वराय, विकटोत्कटाय, गजेन्द्रगमनाय, भुजगेन्द्रहाराय, शशाङ्कधराय, गणाधिपतये स्वाहा।'—इन मन्त्रोंके आदिमें 'क' आदि एकाक्षर बीज-मन्त्र लगाये और अन्तमें 'नमः' एवं 'स्वाहा' शब्दका प्रयोग करे। फिर इन्हीं मन्त्रोंद्वारा तिलोंसे होम आदि करके मन्त्रार्थभूत देवताका पूजन करे। अथवा द्विरेफ, द्विमुख एवं
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द्व्यक्ष आदि पृथक्-पृथक् मन्त्र हो सकते हैं। अब कुमार कार्तिकेयजीने कात्यायनको जिसका उपदेश किया था, वह व्याकरण बतलाऊँगा ॥ १९-२८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'एकाक्षराभिधान' नामक तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४८ ॥
तीन सौ उनचासवाँ अध्याय
व्याकरण-सार
स्कन्द बोले—कात्यायन! अब मैं बोधके लिये तथा बालकोंको व्याकरणका ज्ञान करानेके लिये सिद्ध शब्दरूप सारभूत व्याकरणका वर्णन करता हूँ; सुनो। पहले प्रत्याहार आदि संज्ञाएँ बतलायी जाती हैं, जिनका व्याकरणशास्त्रीय प्रक्रियामें व्यवहार होता है।
अइउण्, ऋऌक्, एओङ्, ऐऔच्, हयवरट्, लण्, ञमङणनम्, झभञ्, घढधष्, जबगडदश्, खफछठथचटतव्, कपय्, शषसर्, हल्।
ये 'माहेश्वर सूत्र' एवं 'अक्षर-समाम्नाय' कहलाते हैं। इनसे 'अण्' आदि 'प्रत्याहार' बनते हैं। उपदेशावस्था में अन्तिम 'हल्'<sup>१</sup> तथा अनुनासिक 'अच्'<sup>२</sup> की 'इत्'<sup>३</sup> संज्ञा होती है। अन्तिम इत्संज्ञक वर्णके साथ गृहीत होनेवाला आदि वर्ण उन दोनोंके मध्यवर्ती अक्षरोंका तथा अपना भी ग्रहण करानेवाला होता है। इसीको 'प्रत्याहार'<sup>४</sup> कहते हैं, जैसा कि निम्नाङ्कित उदाहरणसे स्पष्ट होता है—अण्, एङ्, अट्, यय्, (अथवा यञ्), छव्, झष्, भष्, अक्, इक्, उक्। अण्, इण्, यण्—ये तीनों पर णकार अर्थात् लण् सूत्रके णकारसे बनते हैं। अम्, यम्, ङम्, अच्, इच्, एच्, ऐच्, अय्, मय्, झय्, खय्, जश्, झर्, खर्, चर्, यर्, शर्, अश्, हश्, वश्, झश्, अल्, हल्, वल्, रल्, झल्, शल्—ये सभी प्रत्याहार हैं ॥ १-७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'व्याकरण-सार-वर्णन' नामक तीन सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४९ ॥
१. 'उपदेश' कहते हैं—आदि उच्चारणको। यहाँ जो चौदह 'माहेश्वरसूत्र' हैं, वे ही 'उपदेश' पदसे गृहीत होते हैं।
२. 'हल्' का अर्थ है—व्यञ्जन वर्ण।
३. 'अच्' स्वर अक्षरोंका नाम है।
४. जिसकी 'इत्' संज्ञा होती है, उसका लोप हो जाता है। 'अइउण्' आदिमें जो अन्तिम णकार आदि हैं, उनकी भी 'इत्संज्ञा' होती है, अतः वे भी लुप्त ही समझने चाहिये। उनका ग्रहण केवल 'अण्' आदि प्रत्याहार-सिद्धिके लिये है। वे उन प्रत्याहारोंके अक्षरोंमें गिने नहीं जाते।
५. जिसमें अक्षरोंका प्रत्याहरण—संक्षेप किया गया हो, वह 'प्रत्याहार' कहलाता है। जैसे 'अक्' प्रत्याहारमें 'अ, इ, उ, ऋ, ऌ'—इतने वर्णोंका संक्षेप किया गया है। अर्थात् 'अक्' इस छोटेसे पदके उच्चारणसे उक्त पाँच अक्षरोंका ग्रहण होता है। 'प्रत्याहार' बनानेकी विधि इस प्रकार है—'अइउण्' आदि सूत्र उपदेश हैं; उनके अन्तिम हल् 'ण्' आदि हैं, उनकी 'इत्संज्ञा' होती है, यह बात बतायी जा चुकी है। अब अन्तिम इत्संज्ञक वर्ण 'ण्'के साथ गृहीत होनेवाला आदिवर्ण 'अ' हो तो दोनों मिलकर 'अण्' हुआ। यह 'अण्' बीचके 'इ उ'का भी ग्रहण कराता है और अपना अर्थात् अकारका भी बोधक होता है। इसी प्रकार अन्तिम इत्संज्ञक 'ऐऔच्'का जो 'च्' है, उसके साथ आदि वर्ण 'अ'को ग्रहण करनेपर 'अच्' बनता है, जो 'अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ'—इन नौ स्वरोंका बोध कराता है। ऐसे ही 'हल्' सूत्रका अन्तिम अक्षर 'ल्' इत्संज्ञक है। इसके साथ आदिमें 'ह य व र ट्' का 'ह' गृहीत हुआ तो 'हल्' प्रत्याहार बना; यह 'हल्' 'ह य व र ल ञ म ङ ण न झ भ घ ढ ध ज ब ग ड द ख फ छ ठ थ च ट त क प श ष स ह'—इन सभी व्यञ्जनवर्णोंका बोधक हुआ। इसी तरह अन्य प्रत्याहारोंको भी समझना चाहिये।
* अध्याय ३५० * ७३५
तीन सौ पचासवाँ अध्याय
संधिके १ सिद्ध रूप
कुमार कार्तिकेय कहते हैं—कात्यायन! अब सिद्ध संधिका वर्णन करूँगा। पहले 'स्वरसंधि'२ बतलायी जाती है—दण्डाग्रम्, साऽऽगता, दधीदम्, नदीहते, मधूदकम्, पितॄषभः, लृकारः ३, तवेदम्, सकलोदकम्, अर्धर्चोऽयम्, तवल्कारः४, सैषा, सैन्द्री, तवौदनम्, खट्वौघोऽभवत्,५ इत्येवम्, व्युसुधीः, वस्वलंकृतम्, पित्रर्थोपवनम्, दात्री,६ नायकः, लावकः, नयः,७ त इह, तयिह
१. अक्षरोंके मेलनको 'संधि' कहते हैं, संधि के साधारणतया पाँच भेद माने जाते हैं—(१) स्वरसंधि, (२) व्यञ्जनसंधि, (३) अनुस्वारसंधि, (४) विसर्गसंधि और (५) स्वादिसंधि। अनुस्वारसंधिमें व्यञ्जनका 'अनुस्वार' और अनुस्वारका 'व्यञ्जन' बनता है; अतः उसका व्यञ्जनसंधिमें ही अन्तर्भाव हो सकता है। ऐसे ही स्वादिसंधि भी उसीके अन्तर्गत है; क्योंकि 'शिवोऽर्च्यः' इत्यादिमें विभक्ति-सकार आदि हलरूप ही हैं। इस प्रकार मुख्यतः तीन ही संधियाँ हैं—स्वर, व्यञ्जन और विसर्ग। कौमार-व्याकरणमें इन्हीं तीनोंका नामतः उल्लेख हुआ है। पाणिनि-व्याकरण तथा कौमार-व्याकरण—दोनों ही माहेश्वर सूत्रोंको आधार मानकर प्रवृत्त हुए हैं, अतः दोनोंकी प्रक्रियामें बहुत कुछ साम्य है।
२. जहाँ स्वर अक्षर विकृत हो वर्णान्तरसे मिले, वह 'स्वर-संधि' है; इसके मुख्यतः पाँच भेद हैं—यणादेश, अयाद्यादेश, य्-व्-लोपादेश, अवङ्ङादेश तथा एकादेश। 'यणादेश'के भी चार भेद हैं—य् व् र् ल्। ये क्रमशः इ उ ऋ लृ के स्थानमें कोई स्वर परे रहनेपर होते हैं। अयाद्यादेशके छः भेद हैं—अय्, अव्, आय्, आव्, यान्तादेश और वान्तादेश। पहलेवाले चार आदेश क्रमशः ए, ओ, ऐ, औके स्थानमें कोई स्वर परे रहनेपर होते हैं। 'यान्तादेश' ऐ, औके स्थानमें 'यादि' प्रत्यय परे रहनेपर होते हैं और 'वान्तादेश' ओ, औके स्थानमें यकारादि प्रत्यय परे होनेपर होते हैं। 'य्-व् लोपादेश', में अवर्णपूर्वक पदान्त 'य् व्'का लोप होता है। 'अश्' प्रत्याहार परे होनेपर एङन्त 'गो' शब्दको 'अवङ्' आदेश होता है; 'अच्' परे रहनेपर तथा 'इन्द्र' शब्द परे रहनेपर भी यह आदेश होता है। जहाँ दो अक्षरोंके स्थानमें एक आदेश हो, वह 'एकादेश' है। एकादेश-संधिके भी पाँच भेद हैं—गुण, वृद्धि, पूर्वरूप, पररूप और दीर्घ। 'गुण-एकादेश' चार हैं—ए, ओ, अर्, अल्। ये क्रमशः अ+इ, अ+उ, अ+ऋ तथा अ+लृके स्थानमें होते हैं। वृद्धि-संधिके भेद तीन ही हैं—ऐ, औ, आर्। इनमें, पहला अ, आ, ए, ऐके स्थानमें; दूसरा अ, आ, ओ, औके स्थानमें, तथा तीसरा अ, आ, ऋ, ॠके स्थानमें होता है। पदान्त ए, ओ से परे 'अ' हो तो 'पूर्वरूप' होता है; यह 'अयादेश'का अपवाद है। अ से परे ए, ओ और 'अ'के स्थानमें 'पररूप' होता है, यह वृद्धि तथा दीर्घका अपवाद है; अतः इसकी प्रवृत्तिके स्थल परिगणित होते हैं। अ-आ+अ-आ, इ-ई+इ-ई, उ-ऊ+उ-ऊ, ऋ-ॠ + ऋ-ॠ तथा लृ-लॄ + लृ-लॄ के स्थानमें 'दीर्घ एकादेश' होता है। जैसे अ+अ=आ इत्यादि।
३. 'दण्डाग्रम्' से लेकर 'लृकारः' तक ऊपर बताये अनुसार 'दीर्घ एकादेश' हुआ है। यहाँ 'अकः सवर्णे दीर्घः।' (६।१।१०१)—इस पाणिनि-सूत्रकी प्रवृत्ति होती है। इस स्थलमें सबका पदच्छेदमात्र दिया जाता है। दण्ड + अग्रम्=दण्डाग्रम्। इसमें 'दण्ड'के 'ड' में जो 'अ' है, वह और 'अग्रम्' का 'अ' मिलकर 'आ' हुआ; इसलिये 'दण्डाग्रम्' बना। इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये। सा+आगता=साऽऽगता। दधि+इदम्=दधीदम्, नदी+ईहते=नदीहते। मधु+उदकम्=मधूदकम्। पितृ+ऋषभः=पितॄषभः। लृ+लृकार=लॄकारः।
४. अब गुण-एकादेश ('आद्गुणः।'-पा०सू० ६।१।८७) के उदाहरण दिये जाते हैं—तव+इदम्=तवेदम्। यहाँ 'तव'के अन्तिम 'अ' और 'इदम्'के 'इ'के स्थानमें 'ए' हो गया है। इसी तरह अन्यत्र समझना चाहिये। सकल + उदकम् = सकलोदकम्। अर्ध+ऋचोऽयम् = अर्धर्चोऽयम्। तव+लृकारः=तवल्कारः।
५. वृद्धिसंधि ('वृद्धिरेचि।'-पा० सू० ६।१।८८), के उदाहरण-सा+एषा=सैषा। यहाँ आ+एके स्थानमें 'ऐ' हुआ है। एवमन्यत्र। सा+ऐन्द्री=सैन्द्री। तव+ओदनम्=तवौदनम्। खट्वा+ओघः=खट्वौघः।
६. अब 'यणादेश' ('इको यणचि।'-पा० सू० ६।१।७७) के उदाहरण दिये जाते हैं। इति+एवम्=इत्येवम्। यहाँ 'इति'के अन्तिम 'इकार'के स्थानमें 'य्' हुआ है। वि+असुधीः=व्युसुधीः। वसु + अलंकृतम्=वस्वलंकृतम्। यहाँ 'उ'के स्थानमें 'व्' हुआ है। पितृ + अर्थोपवनम्=पित्रर्थोपवनम्। दातृ+ई = दात्री। यहाँ 'ऋ'के स्थानमें 'र्' हुआ है। अन्यत्र चौथे 'यण्'के उदाहरणमें 'लाकृतिः' पद आता है, उसका पदच्छेद है—ल+आकृतिः = लाकृतिः।
७. यह 'अयादेश-संधि' ('एचोऽयवायावः।'-पा० सू० ६।१।७८) है। नै+अकः=नायकः। यहाँ 'नै'के 'ऐ'के स्थानमें 'आय्' हुआ है। लौ+अकः = लावकः ('औ'की जगह 'आव्')। ने+अः=नयः ('ए'के स्थानमें 'अय्'); अन्यत्र 'लवः', 'विष्णवे' आदि उदाहरण भी मिलते हैं। लो+अः=ल् अव् अः=लवः। विष्णो+ए=विष्णवे।
७३६ * अग्निपुराण *
इत्यादि$^१$। तेऽत्र, योऽत्र जलेऽकजम् $^२$। जहाँ संधि न होकर प्रकृत रूप ही रह जाता है, उसे 'प्रकृतिभाव' कहते हैं। उसके उदाहरण—नो अहो, ऐहि, अ अवेहि, इ इन्द्रकम्, उ उत्तिष्ठ, कवी एतौ, वायु एतौ, वने इमे, अमी एते, यज्ञभूते एहि देव इमं नय $^३$ ॥ १-५ ॥
अब 'व्यञ्जनसंधि'$^४$का वर्णन करूँगा—वाग्यतः। अजेकमात्रुकः। षडेते। तदिमे। अबादि। वाङ्नीतिः। षण्मुखः। वाङ्मनसम्। इत्यादि। वाग्भावादिः। वाक्श्लक्ष्णम्। तच्छरीरकम्। तल्लुनाति। तच्चरेत्। कुङ्ङनस्ते। सुगणिणह। भवांश्चरन्। भवांश्छात्रः। भवांष्टीका। भवांष्ठकः। भवांस्तीर्थम्। भवांस्थेत्याह।
१. यह 'लोपादेश-संधि' ('लोपः शाकल्यस्य।'-पा० सू० ८।३।१९) है। ते+इह-इस अवस्थामें 'ए'की जगह हुआ- त्+अय+इह बना। फिर 'लोपादेश'के नियमानुसार 'य्' का लोप हो गया-'त इह' बना। लोप न होनेपर 'तयिह' बना।
२. यहाँ 'पूर्वरूप-संधि' ('एङः पदान्तादति।'-पा० सू० ६।१।१०९) है। ते+अत्र, यो+अत्र, जले+अकजम्-इन तीनों ही पदोंमें 'अ' अपने पहलेके अक्षरमें मिल गया है।
३. अब 'प्रकृतिभाव'के उदाहरण देते हैं। 'नो अहो'-इस अवस्थामें ('एङः पदान्तादति'के अनुसार) 'पूर्वरूप एकादेश' प्राप्त था; किन्तु यहाँ प्रकृतिभावका विधान है; यह पद ज्यों-का-त्यों रहेगा; इसमें संधिजनित विकृति नहीं होगी। प्रकृतिभावके लिये पाणिनिने कई नियम बनाये हैं। ('नो अहो'-जैसे स्थलोंके नियम इस प्रकार हैं—'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्।' (पा० सू० ६।१।१२५) 'प्लुत' तथा 'प्रगृह्य' संज्ञावाले पदोंका 'प्रकृतिभाव' होता है, उनमें संधि नहीं होती। 'दूराद्धूते च।' (पा० सू० ८।२।८४) दूरसे किसीको बुलाते समय जिस वाक्यका प्रयोग होता है, उसके अन्तिम स्वरकी 'प्लुत' संज्ञा होती है; क्योंकि उसका उच्चारण दीर्घतर स्वरमें होता है। 'प्रगृह्य' संज्ञाके अनेक भेद हैं-(१) ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त द्विवचन। (२) 'अदस्' शब्द-सम्बन्धी मकारके बाद होनेवाले ई और ऊ। (३) एक स्वरवाला आङ्वर्जित निपात। (४) ओकारान्त निपात। (द्रव्यार्थभिन्न 'च' आदि अव्यय तथा 'प्र' आदि उपसर्ग भी 'निपात' कहलाते हैं।) (५) सम्बोधन-निमित्तक ओकार 'वैकल्पिक प्रगृह्य' होता है; किंतु उसके बाद अवैदिक 'इति' शब्दका रहना आवश्यक है। (६) 'मयू' प्रत्याहारसे परे जो 'उकार' हो, वह भी 'वैकल्पिक प्रगृह्य' है; किंतु उसके बाद कोई भी स्वर रहना चाहिये। (इनके सिवा और भी कई नियम हैं, जो विस्तारभयसे नहीं दिये जाते।) 'अहो+एहि' में 'अयाद्यादेश'के नियमानुसार 'ओ' की जगह 'अव्' प्राप्त था, किंतु 'अहो' पद 'ओकारान्त निपात' होनेसे 'प्रगृह्य' है; अतएव वह प्रकृतरूपमें रह गया। 'अ+अवेहि', इ+इन्द्रकम्, उ+उत्तिष्ठ-इनमें दीर्घ एकादेश प्राप्त था; किंतु नंबर ३ नियमके अनुसार 'प्रगृह्य' होनेसे यहाँ प्रकृतिभाव होता है। 'कवी+एतौ', वायु+एतौ इनमें 'यणादेश' प्राप्त था और 'वने इमे' में 'अय्' आदेशकी प्राप्ति थी; किंतु नं० १ नियमके अनुसार प्रगृह्य होनेसे यहाँ भी प्रकृतरूप ही रह जाता है। 'कवी', 'वायु' और 'वने'-ये तीनों पद द्विवचनान्त हैं। 'अमी एते' में 'यण्' प्राप्त था; नं० २ नियमके अनुसार प्रगृह्य होनेसे प्रकृतिभाव हो गया। 'यज्ञभूते! एहि' इसमें अयादेश और 'देव! इमं नय' में गुण एकादेश प्राप्त था; किंतु प्लुत होनेसे यहाँ प्रकृतिभाव हुआ। दूरसे सम्बोधनका वाक्य है 'यज्ञभूते! एहि' 'देव! इमं नय।'
४. व्यञ्जनसंधिके बहुत-से प्रकार या भेद पाणिनिसूत्रोंमें वर्णित हैं। परंतु अग्निपुराणमें उल्लिखित इस कौमार-व्याकरणमें व्यञ्जनसंधिके सिद्ध रूपोंका जो उल्लेख मिलता है, उसके अनुसार व्यञ्जनसंधिके ग्यारह प्रकार निर्दिष्ट हुए हैं (१)-जश्त्वविधान [जो 'झलां जशोऽन्ते'-इस पाणिनिसूत्र (८।२।३९)-में निर्दिष्ट है]। (२)-अनुनासिकविधान [जो 'यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा'-इस पाणिनिसूत्र (८।४।४५) तथा 'प्रत्यये भाषायां च नित्यम्।' इस कात्यायन-वार्तिकद्वारा प्रतिपादित है]। (३)-छत्वविधान [जो 'शश्छोऽटि'-(८।४।६३) 'छत्वममीति वाच्यम्।'-इन सूत्र-वार्तिकोंद्वारा निर्दिष्ट है]। (४)-श्चुत्वविधान [जो 'स्तोः श्चुना श्चुः'-इस पा० सू० (८।४।४०) में कहा गया है]। (५)-ष्टुत्वविधान [जो 'ष्टुना ष्टुः'-इस पा० सू० (८।४।४१) में वर्णित है]। (६)-लकारात्मक परसवर्णविधान [जो 'तोर्लि'-इस पा० सू० (८।४।६०) के नियमसे आबद्ध है]। (७)-ङमुडागमविधान [जो 'ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम्'-इस पा० सू० (८।३।३२) द्वारा कथित है]। (८)-नकारसत्त्वविधान [जो 'नश्छव्यप्रशान्।'-इस पा० सू० (८।३।७) के नियमानुसार सम्पादित होता है]। (९)-परसवर्णविधान [जो 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः।'-पा० सू० (८।४।५८) तथा 'वा पदान्तस्य।' (८।४।५९)-इन पा० सूत्रोंद्वारा कथित है]। (१०)-तुगागमविधान [जो 'शि तुक्।', (८।३।३१) 'छे च।', (६।१।७३) 'दीर्घात् (६।१।७५) तथा 'पदान्ताद्वा' (६।१।७६)-इन सूत्रोंके नियमोंसे सम्बद्ध है]। ११-परसवर्णविधान [जो 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः।' (८।४।५८)] 'वा पदान्तस्य' (८।४।५९)-इन पा० सूत्रोंद्वारा प्रतिपादित है।
* अध्याय ३५० * ७३७
भवाँल्लेखा। भवाञ्जयः। भवाञ्छेते, भवाञ्शेते, भवाञ्शेते। भवाण्ड्डीनः। सम्भर्त्ता। त्वङ्करिष्यसि*
इत्यादि॥ ६-९॥ इसके बादकी पदावलियोंमें विसर्ग-
* वाक् यतः=वाग्यतः। ('झलां जशोऽन्ते।' पा० सू० ८।२।३९) 'पदान्तमें 'झल्' के स्थानमें 'जश्' होता है'—इस नियमके अनुसार 'वाक्'के 'क्' का 'ग्' हो गया है। यद्यपि जश्में ज् ब् ग् ड् द्—ये पाँच अक्षर हैं, तथापि 'क्'के स्थानमें 'ग्' होनेका कारण है स्थानकी समानता। 'क्' और 'ग्'का स्थान एक है। दोनों ही कण्ठस्थानसे निकलते हैं। आगेके चार उदाहरणोंमें भी यही नियम है—अच्+एकमातृकः=अजेकमातृकः। यहाँ 'च्' के स्थानमें 'ज्' हो गया है। स्वरहीन अक्षर अपने बादवाले अक्षरसे मिल जाते हैं, अतः 'ज्' 'ए' में मिलकर 'जे' बन गया। 'षट्+ एते'—इसमें 'ट्' के स्थानमें 'ड्' हुआ है। इसी तरह 'तत् + इमे' में 'त्'के स्थानमें 'द्' तथा 'अप्+आदि' में 'प्' के स्थानमें 'ब्' हुआ है। ये पूर्वनिर्दिष्ट जश्त्वविधानके उदाहरण हैं। अब अनुनासिकविधानके उदाहरण दिये जाते हैं—वाक्+नीतिः=वाङ्नीतिः। पदान्त 'यर्' प्रत्याहारके अक्षरोंका विकल्पसे अनुनासिक होता है, कोई अनुनासिक अक्षर परे हो तब। यदि प्रत्यय अनुनासिक परे हो तो 'यर्'के स्थानमें नित्य अनुनासिक होता है। इस नियमके अनुसार 'क्' के स्थानमें उसी वर्गका अनुनासिक अक्षर 'ङ्' हो गया। अनुनासिक न होनेकी स्थितिमें पूर्वनियमानुसार 'जश्त्व' होता है। उस दशामें 'वाग्नीतिः' रूप होता है। षट्+मुखः=षण्मुखः (षड्मुखः)। उक्त नियमसे 'ट्' की जगह उसीके स्थान (मूर्धा)-का अनुनासिक 'ण्' हुआ। जश्त्व होनेपर 'ड्' होता है। निम्नाङ्कित पदोंका पदच्छेद इस प्रकार है—वाक्+मनसम्=वाङ्मनसम्। वाक्+मात्रम्=वाङ्मात्रम्। अब छत्वविधानके उदाहरण देते हैं—वाक्+श्लक्ष्णम्= वाक्छ्लक्ष्णम्, वाक्श्लक्ष्णम्। यहाँ 'श्'के स्थानमें विकल्पेन 'छ्' हुआ है। नियम इस प्रकार है—'झय्' से परे 'श्' का 'छ्' हो जाता है, 'अम्' प्रत्याहार परे रहनेपर। श्चुत्वविधान— सकार-तवर्गके स्थानमें 'शकार' 'चवर्ग' होते हैं, शकार-चवर्गका योग होनेपर। 'तत्+शरीरम्'='तच्छरीरम्'। यहाँ 'शरीरम्'के शकारका योग होनेसे 'तत्' के 'त्' की जगह 'च्' हो गया। इसके बाद छत्व-विधानके नियमानुसार 'शकार'के स्थानमें 'छकार' हो गया। 'तल्लुनाति' यह लकारात्मक परसवर्णका उदाहरण है। नियम यह है कि 'तवर्गसे परे लकार हो तो उस तवर्गका 'परसवर्ण' होता है।' इसके अनुसार 'तत्+लुनाति' इस अवस्थामें 'त्' के स्थानमें 'ल्' हो गया। तत्+चरेत्=तच्चरेत्। यहाँ श्चुत्वविधानके नियमानुसार पूर्ववत् 'त्' की जगह 'च्' हो गया है। कृङ्+आस्ते=कृङ्ङास्ते। यह ङ्मुडागम-विधानका उदाहरण है। नियम है कि ह्रस्व अक्षरसे परे यदि 'ङ् ण् न्'—ये व्यञ्जन हों और इनके बाद स्वर अक्षर हों तो उक्त 'ङ्' आदिकी जगह एक और 'ङ्' आदि बढ़ जाते हैं। अर्थात् वे ङ् ङ्, ण् ण् और न् न् हो जाते हैं। इस नियमसे उक्त उदाहरणमें एक 'ङ्' की जगह दो 'ङ् ङ्' हो गये हैं। इसी तरह 'सुगण्+इह' की जगह 'सुगण्णह' बनता है। भवान्+चरन्='भवांश्चरन्'—यह नकाररुत्वविधानका उदाहरण है। नियम यह है—'प्रशान्' से भिन्न जो नकारान्त पद हैं, उनके 'न्' की जगह 'र्' हो जाता है, यदि बादमें 'छ् ठ् थ् च् ट् त्'—इनमेंसे कोई अक्षर विद्यमान हो, तब। इस नियमसे उक्त उदाहरणमें 'न्' के स्थानमें 'र्' हुआ। 'र्' का विसर्ग, विसर्गके स्थानमें 'स्' हुआ। 'स्' का श्चुत्व-विधानके अनुसार 'श्' हो गया। उसके पूर्व अनुस्वारका आगम होता है। कहीं-कहीं 'चिरम्' पाठ मिलता है। उस दशामें 'भवांश्चिरम्' रूप सिद्ध होगा। यदि 'चिरम्' के साथ परवर्ती 'भवान्' शब्द ले लिया जाय तो निम्नाङ्कितरूप सिद्ध होगा। चिरम्+भवान्=चिरंभवान्, चिरम्भवान्—यहाँ मकारके स्थानमें अनुस्वार हुआ है। अनुस्वारका वैकल्पिक परसवर्ण होनेपर 'चिरम्भवान्' रूप बनता है। 'मोऽनुस्वारः।'—इस पा० सूत्र (८।३।२३) के अनुसार मकारानुस्वारविधानका नियम इस प्रकार है—पदान्तमें 'म्'का अनुस्वार होता है, 'हल्' परे रहनेपर। ('नश्चापदान्तस्य झलि।' पा० सू० ८।३।२४) के अनुसार 'झल्' परे रहनेपर अपदान्त 'न् म्' के स्थानमें भी अनुस्वार होता है। 'न्'के अनुस्वारका उदाहरण है—'यशांसि'। 'म्' के अनुस्वारका उदाहरण है 'आक्रंस्यते'। भवान्+छात्रः=भवांश्छात्रः। यहाँ पूर्ववत् नकाररुत्व-विधानके अनुसार नकारका रुत्व, विसर्ग, सकार तथा अनुस्वारागम होकर श्चुत्वविधानके अनुसार 'स्' के स्थानमें 'श्' हो गया है। भवान्+टीका=भवाँष्टीका। यहाँ भी 'न्' की जगह रुत्व, विसर्ग और सकार होकर अनुस्वारागम हुआ और ष्टुत्व-विधानके अनुसार 'स्'के स्थानमें 'ष्' हो गया। यही बात 'भवाँष्ठकः'के साधनमें भी समझनी चाहिये—भवान्+ठकः। भवान्+तीर्थम्—भवाँस्तीर्थम्। यहाँ भी नकारका रुत्व, विसर्ग, सकार और अनुस्वारागम समझना चाहिये। 'भवान्+था+इत्याह—इसमें भी पूर्ववत् सब कार्य होंगे और था+इत्याहमें गुण एकादेश होनेपर 'भवांस्थेत्याह'—ऐसा रूप सिद्ध होगा। 'भवान्+लेखाः=भवाँल्लेखाः।'—यहाँ लकारातमक परसवर्ण सानुनासिक हुआ है। 'भवान्+जयः' इसमें श्चुत्वविधानके अनुसार चवर्ग-योगके कारण तवर्गीय 'न्' की जगह चवर्गीय 'ज्' हो गया है। 'भवान्+शेते' इस पदच्छेदमें 'भवाञ्छेते, भवाञ्छेते, भवाञ्शेते, भवाञ् शेते।'—ये रूप बनते हैं। पहलेमें 'शि तुक्।' पा० सू० (८।३।३१) के अनुसार 'शकार' परे रहते नान्त पदको 'तुक्'का आगम होता है। इसे 'नान्ततुगागम' कहा जा सकता है। इसी तरह ह्रस्व, दीर्घ और पदान्तसे परे भी तुगागम होते हैं। यहाँ 'नान्ततुगागम'के अनुसार 'तुक्' हुआ। 'उक्' की इत्संज्ञा हुई, लोप हुआ। 'भवान् त् शेते' रहा। श्चुत्वविधानके अनुसार 'त्' के स्थानमें 'च्' और 'न्' के स्थानमें 'ज्' हुआ और 'श्' की जगह 'छ्' हुआ तो 'भवाञ्छेते' बना। 'झरो झरि सवर्णे।' (पा० सू० ८।४।६५) के अनुसार 'झर्'का लोप होनेपर 'च्' अदृश्य हो जाता है, अतः
| ७३८ | * अग्निपुराण * |
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संधि* जाननी चाहिये—कश्चिञ्छ्यात्१, कश्चरेत्। | कश्श्वशुरः१०, कः श्वशुरः। कस्स्वरः११, कः कष्टः२। कष्ठः३। कः स्थः४। कश्चलेत्५। | स्वरः। कः फलेत्१२। कः शयिता१३। क ᳵखनेत्६। क ᳵकरोति७। क ᳶपठेत्८। क ᳶफलेत्९। | कोऽत्रयोधः१४। क उत्तमः१५। देवाएते१६।
'भवाञ्छेते' रह जाता है। 'लोप' और 'छत्त्व' वैकल्पिक हैं, अतः इनके अभावमें 'भवाञ्शेते' बना। तुगागम भी वैकल्पिक है; उसके न होनेपर 'भवाञ् शेते' बना। भवान्+डीनः=भवाण्डीनः। यहाँ ष्टुत्वविधानके अनुसार 'न्' की जगह 'ण्' हो गया है। 'त्वं+भर्ता=त्वम्भर्ता', 'त्वं करिष्यसि=त्वङ्करिष्यसि'—ये दोनों वैकल्पिक परसवर्णके उदाहरण हैं। यहाँ अनुस्वारकी जगह 'वा पदान्तस्य।' (पा० सू० ८।४।५९) के नियमानुसार परसवर्ण क्रमशः 'भ्' और 'ङ्' हो गये हैं।
'व्यञ्जनसंधि'के कुछ और भी भेद हैं, जो यहाँ कौमार व्याकरणमें निर्दिष्ट नहीं हैं—जैसे 'पूर्वसवर्ण-संधि'। इसके दो प्रकारके स्थल हैं। 'झयो होऽन्यतरस्याम्' (८।४।६२)—इस सूत्रके अनुसार 'झय्' से परे हकारके स्थानमें पूर्वसवर्ण होता है। इसके 'वाग्घरिः' इत्यादि उदाहरण हैं। यहाँ 'वाक्+हरिः' इस अवस्थामें 'ह' की जगह पूर्वसवर्ण—'घ' हो गया है। 'उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य।'—इस पा० सूत्र (८।४।६१) के अनुसार 'उद्' उपसर्गसे परे 'स्थ' और 'स्तम्भ'के आदि वर्णकी जगह पूर्व-सवर्ण होता है। इसके उदाहरण हैं—उत्थानम्, उत्तम्भनम्। 'सम्' के मकारका भी रुत्वविधान होता है, 'सुट्' परे रहनेपर। इसके 'संस्कर्ता' आदि उदाहरण हैं।
* विसर्गसंधिके भी अनेक प्रकार-भेद हैं—यहाँ लगभग दस प्रकारकी कार्य-विधि वर्णित हुई है—(१) विसर्गस्थाने सत्वविधान (इसका विधायक है—'विसर्जनीयस्य सः।' पा० सू० ८।३।३४)। (२) वैकल्पिकविसर्गत्वविधान (इसका निर्देशक है—'वा शरि'—यह पा० सूत्र ८।३।३६)। (३) क ᳵ प-विधान (यह 'कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च'—इस पाणिनिसूत्र ८।३।३७ पर आधारित है)। (४) रुत्वविधान (इसका आधार है—'ससजुषो रुः।' यह पा० सूत्र ८।२।६६)। (५) रोरुत्वविधान (यह 'अतो रोरप्लुतादप्लुते।' ६।१।११३, 'हशि च।' ६।१।११४ इत्यादि सूत्रोंपर अवलम्बित है)। (६) रोर्यत्वविधान (जो 'भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि।' इस पा० सूत्र ८।३।१७ तथा अतो रोरप्लुतादप्लुते ६।१।११३ पर आधारित है)। (७) यलोपविधान (इसका आधार 'हलि सर्वेषाम्' यह पा० सूत्र ८।३।२२ है)। (८) रकार-विसर्गविधान (इसका विधायक 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः।'—यह पा० सूत्र ८।३।१५ है)। (९) सुलोपविधान (इसके आधार हैं—'एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ् समासे हलि।', 'सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम्।' इत्यादि ६।१।१३२, ३४ सूत्र)। (१०) ढ्रलोपदीर्घविधान (इसके आधारभूत पा० सूत्र हैं—'रोरि।', 'ढो ढे लोपः।', 'ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः।' ८।३।१४, १३; ६।३।१११)।
१. 'कः+छिन्द्यात्'=कश्चिञ्छ्यात्। यहाँ विसर्गके स्थानमें 'स्' और श्चुत्वविधानके अनुसार 'स्' के स्थानमें 'श्' हुआ है। कः+चरेत्=कश्चरेत्। यहाँ भी पूर्ववत् विसर्गके स्थानमें 'स्' और श्चुत्वेन 'श्' हुआ है। २. कः+टः=कष्टः। ३. कः+ठः=कष्ठः—इन दोनों उदाहरणोंमें विसर्गके स्थानमें सकार होकर ष्टुत्वविधानके अनुसार 'सकार'के स्थानमें 'षकार' हो गया है। ४. कः+स्थः=कः स्थः, कस्स्थः। यहाँ वैकल्पिक विसर्गताका विधान है। 'वा शरि' (पा० सूत्र ८।३।३६)-के नियमानुसार यदि विसर्गसे परे 'श्', 'ष्' और 'स्'—ये अक्षर हों तो एक पक्षके मतानुसार उस विसर्गके स्थानमें 'स्' न होकर विसर्ग ही रह जाता है। पक्षान्तरसे 'सकार' हो जाता है। उक्त उदाहरणोंमें पहले विसर्गरूप, फिर सकाररूपका साक्षात्कार कराया गया है। ५. 'कः+चलेत्=कश्चलेत्।' यहाँ भी सब बातें 'कश्चरेत्' के अनुसार समझनी चाहिये। ६-७. 'कः+खनेत्'=क ᳵ खनेत्। कः+करोति=क ᳵ करोति—इन दोनों उदाहरणोंमें 'क ᳵ प विधान'के अनुसार विसर्गके स्थानमें 'क ᳵ ख हो गये हैं। कवर्ग और पवर्गके प्रथम-द्वितीय अक्षर परे हों तो विसर्गके स्थानमें क्रमशः 'क ᳵ प होते हैं—ऐसा नियम है। ८-९. 'कः+पठेत्', 'कः+फलेत्'—इस अवस्थामें अभी बताये हुए नियमके अनुसार विसर्गकी जगह 'ᳶप ᳶफ'—हो गये हैं। १०-११. इन उदाहरणोंमें 'वा शरि' (पा० सू० ८।३।३६) के नियमानुसार एक पक्षमें विसर्गका विसर्ग ही रह गया है; पक्षान्तरमें 'विसर्ग' की जगह 'स्' होकर 'श्वशुरः' के शकारका योग मिलनेसे श्चुत्वेन 'स्' की जगह 'श्' हो गया है। 'स्वरः' के साथ विसर्गका सकार उसी रूपमें दृष्टिगोचर होता है। १२. 'कः+फलेत्'—इस जगह ᳶफ प्राप्त था; परंतु वह वैकल्पिक है, अतः पक्षान्तरके अनुसार विसर्गके स्थानमें विसर्ग ही रह गया है। १३. यहाँ भी वही बात है। विसर्गकी जगह 'स्' या 'श्' नहीं हुआ है। १४. 'कस् अत्र योधः।' यह पदच्छेद है। यहाँ 'कस्' के सकारकी जगह 'रु' तथा 'रु' के स्थानमें 'उ' हुआ है; फिर गुण और पूर्वरूप होकर 'कोऽत्र योधः' बना है। रोरुत्वविधानका नियम यह है—अप्लुत 'अ' से परे 'रु' हो तो उसकी जगह 'उ' होता है, अप्लुत अकार परे विद्यमान हो तब। १५. कस् उत्तमः—इस अवस्थामें 'स्' के स्थानमें 'रु' हुआ। फिर 'रोर्यत्वविधान' के अनुसार 'रु'के स्थानमें 'य' हो गया। फिर य-लोपविधानसे 'य्' का लोप हो गया। 'लोपः शाकल्यस्य।' (८।३।१९)—इस पा० सूत्रके अनुसार यहाँ 'य्' लोप हुआ है, अतः 'क उत्तमः' प्रयोग सिद्ध हुआ है। १६. 'देवास+एते'—
| * अध्याय ३५१ * | ७३९ |
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| भो इह$^{१७}$। स्वदेवा यान्ति$^{१८}$। भगो व्रज$^{१९}$। सु पूः$^{२०}$। | स यातीह$^{२५}$। सैष$^{२६}$ याति। क ईश्वरः। ज्योतीरूपम्$^{२७}$। |
| सुदूरात्रित्र$^{२१}$। वायुर्याति$^{२२}$। पुनर्नहि$^{२३}$। पुनर्$^{२४}$ राति। | तवच्छत्रम्$^{२८}$। म्लेच्छ$^{२९}$ धीः। छिद्रमांच्छिदत्॥ १०—१३॥ |
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'संधिसिद्धरूपकथन' नामक तीन सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५०॥
तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय
सुबन्त-सिद्ध रूप
स्कन्द कहते हैं— कात्यायन! अब मैं तुम्हारे सम्मुख विभक्ति-सिद्ध रूपोंका वर्णन करता हूँ। विभक्तियाँ दो हैं—'सुप्' और 'तिङ्'। 'सुप्' विभक्तियाँ सात हैं। 'सु औ जस्'—यह प्रथमा विभक्ति है। 'अम् औट् शस्'—यह द्वितीया, 'टा भ्याम् भिस्'—यह तृतीया, 'ङे भ्याम् भ्यस्'—यह चतुर्थी, 'ङसि भ्याम् भ्यस्'—यह पञ्चमी, 'ङस् ओस् आम्'—यह षष्ठी तथा 'ङि ओस् सुप्'—यह सप्तमी विभक्ति है। ये सातों विभक्तियाँ प्रातिपदिक संज्ञावाले शब्दोंसे परे प्रयुक्त होती हैं॥ १—३॥
'प्रातिपदिक' दो प्रकारका होता है—'अजन्त' और 'हलन्त'। इनमेंसे प्रत्येक पुँल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्गके भेदसे तीन-तीन प्रकारका है। उन पुँल्लिङ्ग आदि शब्दोंके नायकोंका* यहाँ दिग्दर्शन कराया जाता है। जो शब्द नहीं कहे गये हैं (किंतु जिनके रूप इन्हींके समान होते हैं) उन्हींके ये 'वृक्ष' आदि शब्द सामर्थ्यतः नायक हैं। 'वृक्ष' शब्द पेड़का वाचक है। यह अकारान्त पुँल्लिङ्ग है। इसके सात विभक्तियोंमें तथा सम्बोधनमें एकवचन, द्विवचन और बहुवचनके भेदसे कुल मिलाकर चौबीस रूप होते हैं। उन सबको यहाँ उद्धृत किया जाता है। १—वृक्षः, वृक्षौ, वृक्षाः। २—वृक्षम्, वृक्षौ, वृक्षान्। ३—वृक्षेण, वृक्षाभ्याम्, वृक्षैः। ४—वृक्षाय, वृक्षाभ्याम्, वृक्षेभ्यः। ५—वृक्षात्, वृक्षाभ्याम्, वृक्षेभ्यः। ६—वृक्षस्य, वृक्षयोः, वृक्षाणाम्। ७—वृक्षे, वृक्षयोः, वृक्षेषु। सम्बोधने—हे वृक्ष, हे वृक्षौ, हे वृक्षाः। इसी
इस पदच्छेदमें 'स्' की जगह 'रु' और 'रु' की जगह 'य्' हो गया। फिर पूर्ववत् 'य' लोप होनेसे 'देवा एते'—ऐसा प्रयोग सिद्ध हुआ। १७-१८-१९. 'भोस् इह', 'भगोस् व्रज' तथा 'अघोस् याहि', 'स्वदेवास् यान्ति'—इन वाक्योंमें 'स्' की जगह रुत्व-यत्व हुआ। फिर पहलेमें तो 'लोपः शाकल्यस्य।'—इस सूत्रसे और अन्य उदाहरणोंमें 'हलि सर्वेषाम्।' (पा० सू० ८। ३। २२)—इस सूत्रसे 'य' लोप होनेपर निर्दिष्ट रूप बनते हैं। २०. 'सुपूः' यहाँ 'सुपूर्'—इस अवस्थामें 'रकार'के स्थानमें 'विसर्ग' हुआ है। २१. 'सुदुर्+रात्रित्र=सुदूरात्रित्र।' यहाँ 'रोरि' से 'र्' लोप होकर पूर्वस्वरको दीर्घत्व प्राप्त हुआ है। २२. इस उदाहरणमें 'वायुस्+याति'—ऐसा पदच्छेद है। यहाँ 'स्' के स्थानमें 'रु', उकारकी इत्संज्ञा और रेफका यकारसे मिलन हुआ है। २३. इस उदाहरणमें यह दिखाया गया है कि यहाँ 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः।' (पा० सू० ८। ३। १५) से रकारका विसर्ग नहीं हो सकता; क्योंकि न रेफ अवसानमें है और न उससे परे 'खर्' प्रत्याहारका ही कोई अक्षर है। २४. 'पुनर्+राति'—इस अवस्थामें 'रो रि।' (पा० सू० ८। ३। १४) से रकारका लोप हुआ और पूर्व 'अण्' को दीर्घत्व प्राप्त हुआ है। २५. 'सस् याति इह'—इस अवस्थामें 'एतत्तदोः सुलोपो।'—इस (पा० सूत्र ६। १। १३२) के अनुसार 'तत्'-शब्दसम्बन्धी 'सु' विभक्तिसे सकारका लोप हो गया है। २६. 'सस् एषस् याति', 'क ईश्वरः'—इस अवस्थामें 'सस्'के सकारका लोप श्लोककी पादपूर्तिके लिये हुआ है, 'एषस्'—के सकारका लोप पूर्ववत् हुआ है। २७. 'ज्योतिर्+रूपम्'—यहाँ रलोप और दीर्घ हुआ है। २८. 'तव + छत्रम्।' यहाँ 'छे च।'—इस (पा० सू० ६। १। ७३) सूत्रसे तुगागम हुआ है, फिर 'त' का श्चुत्वेन 'च' हो गया है। (यह व्यञ्जनसंधिका उदाहरण है।) २९. यहाँ भी 'दीर्घात्', 'पदान्ताद्वा' (पा०सू० ६। १। ७५-७६) से तुगागम हुआ है। शेष पूर्ववत् (यहाँ भी व्यञ्जनसंधि ही है)।
* अकारान्तसे लेकर औकारान्तक जितने शब्द हैं, सब 'अजन्त' हैं। ऐसे शब्द असंख्य हैं, उन सबका उल्लेख असम्भव है। अतः कुछ शब्द यहाँ नमूनेके तौरपर दिये गये हैं, उन्हींके समान अन्य शब्दोंके रूप भी होंगे। इन नमूनेके तौरपर दिये गये शब्दोंको ही यहाँ 'नायक' कहा गया है।
७४० * अग्निपुराण *
प्रकार राम, देव, इन्द्र, वरुण, भव आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'देव' आदि शब्दोंके तृतीयाके एकवचनमें 'देवेन' तथा षष्ठीके बहुवचनमें 'देवानाम्' इत्यादि रूप होते हैं। वहाँ 'न' के स्थानमें 'ण' नहीं होता। रेफ और षकारके बाद जो 'न' हो, उसीके स्थानमें 'ण' होता है। अकारान्त शब्दोंमें जो सर्वनाम हैं, उनके रूपोंमें कुछ भिन्नता होती है। उस भिन्नताका परिचय देनेके लिये सर्वनामका 'प्रथम' या 'नायक' जो 'सर्व' शब्द है, उसके रूप यहाँ दिये जाते हैं; उसी तरह अन्य सर्वनामोंके भी रूप होंगे। यथा—१—सर्वः सर्वौ सर्वे। २—सर्वम् सर्वौ सर्वान्। ३—सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः। ४—<u>सर्वस्मै</u> सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः। ५—<u>सर्वस्मात्</u> सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः। ६—सर्वस्य सर्वयोः <u>सर्वेषाम्</u>। ७—<u>सर्वस्मिन्</u> सर्वयोः सर्वेषु। सम्बोधनमें—<u>हे सर्व</u> हे सर्वौ हे सर्वे।* यहाँ रेखाङ्कित रूपोंपर दृष्टिपात कीजिये। साधारण अकारान्त शब्दोंकी अपेक्षा सर्वनाम शब्दोंके रूपोंमें भिन्नताके पाँच ही स्थल हैं। इसके बाद 'पूर्व' शब्द आता है। यह सर्वनाम होनेपर भी अन्य सर्वनामोंसे कुछ विलक्षण रूप रखता है। पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर—ये व्यवस्था और असंज्ञा में सर्वनाम हैं। 'स्व' तथा 'अन्तर' शब्द भी अर्थ-विशेषमें ही सर्वनाम हैं। अतः उससे भिन्न अर्थमें वे असर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। प्रथमाके बहुवचनमें तथा पञ्चमी-सप्तमीके एकवचनमें पूर्वाद शब्दोंके रूप सर्वनामवत् होते हैं, किंतु विकल्पसे। अतः पक्षान्तरमें उनके असर्वनामवत् रूप भी होते ही हैं—जैसे पूर्वे पूर्वाः, परे पराः, इत्यादि। पूर्वस्मात् पूर्वात्। पूर्वस्मिन् पूर्वे इत्यादि। प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय—ये शब्द सर्वनाम नहीं हैं, तथापि 'प्रथम' शब्दके प्रथमा बहुवचनमें—प्रथमे प्रथमाः—यह रूप होता है। 'चरम' आदि शब्दोंके लिये भी यही बात है। 'द्वितीय' तथा 'तृतीय' शब्द चतुर्थी, पञ्चमी तथा सप्तमीके एकवचनमें विकल्पसे सर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। यथा—द्वितीयस्मै द्वितीयाय। तृतीयस्मै तृतीयाय—इत्यादि शेष रूप वृक्षवत् होते हैं।
अब आकारान्त शब्दका एक रूप उपस्थित करते हैं—खड्गपाः—खड्गं पातीति खड्गपाः अर्थात् 'खड्ग-रक्षक'। इसका रूप यों समझना चाहिये—१—खड्गपाः, खड्गपौ, खड्गपाः। २—खड्गपाम्, खड्गपौ, खड्गपः। ३—खड्गपा, खड्गपाभ्याम्, खड्गपाभिः। ४—खड्गपे, खड्गपाभ्याम्, खड्गपाभ्यः। ५—खड्गपः, खड्गपाभ्याम्, खड्गपाभ्यः। ६—खड्गपः, खड्गपोः, खड्गपाम्। ७—खड्गपि, खड्गपोः, खड्गपासु। सम्बो०—हे खड्गपाः, हे खड्गपौ, हे खड्गपाः। इसी तरह विश्वपा (विश्वपालक), गोपा (गोरक्षक), कीलालपा (जल पीनेवाला), शङ्खध्मा (शङ्ख बजानेवाला) आदि शब्दोंके रूप होंगे। (अब ह्रस्व इकारान्त 'वह्नि' शब्दका रूप प्रस्तुत करते हैं—) १—वह्निः, वह्नी, वह्नयः। २—वह्निम्, वह्नी, वह्नीन्। ३—वह्निना, वह्निभ्याम्, वह्निभिः। ४—वह्नये, वह्निभ्याम्, वह्निभ्यः। ५—वह्नेः, वह्निभ्याम्, वह्निभ्यः। ६—वह्नेः, वह्न्योः, वह्नीनाम्। ७—वह्नौ, वह्न्योः, वह्निषु। सम्बो०—हे वह्ने, हे वह्नी, हे वह्नयः। 'वह्नि'का अर्थ है अग्नि। इसी तरह अग्रि, रवि, कवि, गिरि, पवि इत्यादि शब्दोंके रूप होंगे। इकारान्त शब्दोंमें 'सखि' और 'पति' शब्दोंके रूप कुछ भिन्नता रखते हैं। जैसे—१—सखा, सखायौ, सखायः। २—सखायम्, सखायौ, सखीन्। तृतीयाके
* यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिये कि यदि किसीका नाम 'सर्व' रख दिया जाय तो उस 'सर्व' का रूप वृक्षकी तरह ही होगा। 'सब' इस अर्थमें प्रयुक्त 'सर्व' शब्दका ही रूप ऊपर बताये अनुसार होगा। यही बात अन्य सर्वनामोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। संज्ञा एवं उपसर्जनीभूत 'सर्व' आदि शब्दोंकी सर्वनामोंमें गणना नहीं होती। 'अतिसर्व' आदि शब्दोंमें जो 'सर्व' शब्द है; वह उपसर्जन है।
- अध्याय ३५१ * ७४१
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एकवचनमें—सख्या, चतुर्थीके एकवचनमें सख्ये, पञ्चमी और षष्ठीके एकवचनमें सख्युः तथा सप्तमीके एकवचनमें सख्यौ रूप होते हैं। शेष सभी रूप 'वह्नि' शब्दके समान हैं। 'पति' शब्दके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें वह्निवत् रूप होते हैं, शेष विभक्तियोंमें वह 'सखि' शब्दके समान रूप रखता है। 'अहर्पतिः' का अर्थ है सूर्य। यहाँ 'पति' शब्द समासमें आबद्ध है। समासमें उसका रूप वह्नितुल्य ही होता है।
(अब उकारान्त शब्दका रूप प्रस्तुत करते हैं।) पहले पुँल्लिङ्ग 'पटु' शब्दके रूप दिये जाते हैं। पटुका अर्थ है—कुशल—निपुण। १—पटुः, पटू, पटवः। २—पटुम्, पटू, पटून्। ३—पटुना, पटुभ्याम्, पटुभिः। ४—पटवे, पटुभ्याम्, पटुभ्यः। ५—पटोः, पटुभ्याम्, पटुभ्यः। ६—पटोः, पट्वोः, पटूनाम्। ७—पटौ, पट्वोः, पटुषु। सम्बो०—हे पटो, हे पटू, हे पटवः। इसी तरह भानु, शम्भु विष्णु आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। दीर्घ ईकारान्त 'ग्रामणी' शब्द है। इसका अर्थ है—गाँवका मुखिया। इसका रूप इस प्रकार है—१—ग्रामणीः, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। २—ग्रामणीम्, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। ३—ग्रामण्या, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभिः। ४—ग्रामण्ये, ग्रामणीभ्याम् २, ग्रामणीभ्यः २। ५—ग्रामण्यः २। ६—ग्रामण्योः २। बहुवचन—ग्रामण्याम्। ७—ग्रामण्याम्, ग्रामणीषु। इसी तरह 'प्रधी' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। दीर्घ ऊकारान्त 'दृन्भू' शब्द है। इसका अर्थ है—राजा, वज्र, सूर्य, सर्प और चक्र। इसका रूप—दृन्भूः, दृन्भौ, दृन्भ्वः इत्यादि। 'खलपूः'—खलिहान या भूमिको शुद्ध—स्वच्छ करनेवाला। इसके रूप खलपूः, खलप्वौ, खलप्वः इत्यादि। 'मित्रभूः'—मित्रसे उत्पन्न। इसका रूप है—मित्रभूः, मित्रभुवौ, मित्रभुवः इत्यादि। 'स्वभू' का अर्थ है—स्वयम्भूः—स्वतः प्रकट होनेवाला। इसके रूप—स्वभूः, स्वभुवौ, स्वभुवः इत्यादि हैं॥ ४—६॥
'सुश्रीः' का अर्थ है—सुन्दर शोभासे सम्पन्न। इसके रूप हैं—सुश्रीः, सुश्रियौ, सुश्रियः इत्यादि। 'सुधीः' का अर्थ है—उत्तम बुद्धिसे युक्त विद्वान्। इसके रूप हैं—सुधीः, सुधियौ, सुधियः इत्यादि। (अब ऋकारान्त पुँल्लिङ्ग 'पितृ' तथा 'भ्रातृ' शब्दोंके रूप दिये जाते हैं—'पिता' का अर्थ है—बाप और 'भ्राता' का अर्थ है—भाई। 'पितृ' शब्दके सब रूप इस प्रकार हैं—१—पिता, पितरौ, पितरः। २—पितरम्, पितरौ, पितॄन्। ३—पित्रा, पितृभ्याम्, पितृभिः। ४—पित्रे, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ५—पितुः, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ६—पितुः, पित्रोः, पितॄणाम्। ७—पितरि, पित्रोः, पितृषु। सम्बो०—हे पितः, हे पितरौ, हे पितरः। इसी तरह 'भ्रातृ' और 'जामातृ' शब्दोंके भी रूप होते हैं। 'नृ' शब्द नरका वाचक है। इसके रूप ना, नरौ, नरः इत्यादि 'पितृ' शब्दवत् होते हैं। केवल षष्ठीके बहुवचनमें दो रूप होते हैं—नृणाम् नॄणाम्। 'कर्तृ' शब्दका अर्थ है करनेवाला। यह 'तृजन्त' शब्द है। इसके दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार हैं—कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः। कर्तारम्, कर्तारौ, कर्तॄन्। शेष 'पितृ' शब्दकी भाँति। 'क्रोष्टु' शब्द सियारका वाचक है। क्रोष्टु विकल्पसे 'क्रोष्ट्र' शब्दके रूपमें प्रयुक्त होता है। उस दशामें इसका रूप 'कर्तृ' शब्दकी भाँति होता है। 'क्रोष्टु'के रूपमें ही यदि इसके रूप लिये जायें तो 'पटु' शब्दकी तरह लेने चाहिये। 'नप्तृ' शब्द नातीका वाचक है। इसके रूप 'कर्तृ' शब्दकी भाँति होते हैं। 'सुरै' शब्दका अर्थ उत्तम धनवान् है। 'रै' शब्दका अर्थ है—धन। ये ऐकारान्त पुँल्लिङ्ग हैं। इन दोनोंके रूप एक-से होते हैं—१—सुराः, सुरायौ, सुरायः। २—सुरायम्, सुरायौ, सुरायः। ३—सुराया,
७४२ * अग्निपुराण *
सुराभ्याम्, सुराभिः इत्यादि। ‘रै’—राः, रायौ, रायः इत्यादि। हलादि विभक्तियोंमें ‘रै’ की जगह ‘रा’ हो जाता है। ओकारान्त ‘गो’ शब्दपर विचार कीजिये। ‘गो’ का अर्थ है—बैल। इसके रूप—गौः, गावौ, गावः। गाम्, गावौ, गाः इत्यादि हैं। औकारान्त पुँल्लिङ्ग—‘द्यौ’ का अर्थ है—आकाश और ‘ग्लौ’ का अर्थ है—चन्द्रमा। इनके रूप—द्यौः, द्यावौ, द्यावः इत्यादि। ग्लौः, ग्लावौ, ग्लावः इत्यादि हैं। ये पुँल्लिङ्गमें ‘स्वरान्त नायक’ शब्द बताये गये ॥७॥
(अब हलन्त पुँल्लिङ्ग शब्दोंका परिचय कराया जाता है—)
सुवाक् (श्रेष्ठ वक्ता), सुत्वक् (सुन्दर त्वचावाला), पृषत् (जलबिन्दु), सम्राट् (चक्रवर्ती नरेश), जन्मभाक् (जन्म ग्रहण करनेवाला), सुराट् (श्रेष्ठ राजा), अयम् (यह), मरुत् (वायु), भवन् (होता हुआ), दीव्यन् (क्रीडा करता हुआ), भवान् (आप), मघवान् (इन्द्र), पिबन् (पीता हुआ), भगवान् (समग्र ऐश्वर्यसे सम्पन्न), अघवान् (पापयुक्त), अर्वा (अश्व), वह्निमान् (अग्नियुक्त), सर्ववित् (सर्वज्ञ), सुपृत् (भलीभाँति पालन करनेवाला), सुसीमा (उत्तम सीमावाला), कुण्डी (कुण्डधारी शिव), राजा, श्वा (कुत्ता), युवा (तरुण), मघवा (इन्द्र), पूषा (सूर्य), सुकर्मा (उत्तम कर्म करनेवाला), यज्वा (यज्ञकर्ता), सुवर्मा (उत्तम कवचधारी), सुधर्मा (उत्तम धर्मवाला), अर्यमा (सूर्य), वृत्रहा (इन्द्र), पन्थाः (मार्ग), सुककुप् (स्वच्छ दिशावाला समय), अष्ट (आठ), पञ्च (पाँच), प्रशान् (पूर्णतः शान्त), सुत्वा, ‘प्राङ् प्राञ्चौ प्राञ्चः’ तथा प्रत्यङ् इत्यादि। सुद्यौः (शोभन आकाशवाला काल), सुभ्राट् (विशेष शोभाशाली), सुपूः (सुन्दर नगरीवाला देश), चन्द्रमा, सुवचाः, श्रेयान्, विद्वान्, उशना (शुक्राचार्य), पेचिवान् (पूर्वकालमें जिसने पाचन किया हो), अनड्वान्—गाड़ी खींचनेवाला बैल, गोधुक् (गायको दुहनेवाला), मित्रध्रुक् (मित्रद्रोही), मुक् (विवेकशून्य), तथा लिट् (चाटनेवाला),—ये सभी हलन्त पुँल्लिङ्गके ‘नायक’ (आदर्श या प्रमुख शब्द) हैं*॥८—११$\frac{१}{२}$॥
* ‘सुवाक्’ यह ‘सुवाच्’ शब्दका प्रथम विभक्तिमें एकवचनान्तरूप है। जिज्ञासुओंकी सुविधाके लिये इन शब्दोंके कतिपय रूप यहाँ उदाहरणके तौरपर दिये जाते हैं—१. ‘सुवाक्’, सुवाग्, सुवाचौ, सुवाचः। २. सुवाचम्, सुवाचौ, सुवाचः। ३. सुवाचा, सुवाग्भ्याम्, सुवाग्भिः इत्यादि। सप्तमीके बहुवचनमें ‘सुवाक्षु’ यह रूप होता है। इसी तरह ‘त्वच्’ शब्दके—त्वक्, त्वचौ, त्वचः इत्यादि, ‘पृषत्’ शब्दके—पृषत्, पृषतौ, पृषतः इत्यादि, ‘सम्राज्’ शब्दके—सम्राट् सम्राड्, सम्राजौ, सम्राजः इत्यादि, ‘जन्मभाज्’ शब्दके—‘जन्मभाक्, जन्मभाग्, जन्मभाजौ, जन्मभाजः, इत्यादि तथा ‘सुराज्’ शब्दके—सुराट्, सुराड्, सुराजौ, सुराजः इत्यादि रूप होते हैं। ‘अयम्’—यह ‘इदम्’ शब्दका प्रथमविभक्तीक एकवचनान्त रूप है। व्यवहारमें इसके रूपोंकी अधिक आवश्यकता रहती है। इसलिये इसके पूरे रूप यहाँ दिये जाते हैं—
१. अयम्, इमौ, इमे। २. इमम्, इमौ, इमान्। (अन्वादेशमें) एनम्, एनौ, एनान्। ३. अनेन (अन्वादेशमें) एनेन, आभ्याम्, एभिः। ४. अस्मै, आभ्याम्, एभ्यः। ५. अस्मात् अस्माद्, आभ्याम्, एभ्यः। ६.अस्य, अनयोः (अन्वादेशमें) एनयोः, एषाम्। ७. अस्मिन्, अनयोः (एनयोः), एषु। त्यदादि गणके शब्दोंमें सम्बोधन नहीं होता।
‘मरुत्’ आदि शब्दोंके प्रथमान्त रूप क्रमसे इस प्रकार जानने चाहिये—मरुत्, मरुद्, मरुतौ, मरुतः। भवन्, भवन्तौ, भवन्तः। दीव्यन्, दीव्यन्तौ, दीव्यन्तः। भवान्, भवन्तौ, भवन्तः। मघवान्, मघवन्तौ, मघवन्तः। पिबन्, पिबन्तौ, पिबन्तः। भगवान्, भगवन्तौ, भगवन्तः। अघवान्, अघवन्तौ, अघवन्तः। अर्वा, अर्वन्तौ, अर्वन्तः। वह्निमान्, वह्निमन्तौ, वह्निमन्तः। सर्ववित् सर्वविद्, सर्वविदौ, सर्वविदः। सुपृत्, सुपृद्, सुपृतौ, सुपृतः। सुसीमा, सुसीमानौ, सुसीमानः। कुण्डी, कुण्डिनौ, कुण्डिनः। ‘राजन्’ आदि शब्दोंके तीन विभक्तियोंके रूप दिये जाते हैं। शेष रूप तदनुसार ही समझ लेने चाहिये। १. राजा, राजानौ, राजानः। २. राजानम्, राजानौ, राज्ञः। ३. राज्ञा, राजभ्याम्, राजभिः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें—राज्ञि, राजनि। १. श्वा, श्वानौ, श्वानः। २. श्वानम्, श्वानौ, शुनः। ३. शुना, श्वभ्याम्, श्वभिः। १. युवा, युवानौ, युवानः। २. युवानम्, युवानौ, यूनः। ३. यूना, युवभ्याम्, युवभिः। १. मघवा, मघवानौ, मघवानः। २. मघवानम्, मघवानौ, मघोनः।
- अध्याय ३५१ * ७४३
अब स्त्रीलिङ्गमें नायकस्वरूप शब्दोंको उपस्थित किया जा रहा है—जाया (स्त्री), जरा (वृद्धावस्था), बाला (नूतन अवस्थाकी स्त्री), एडका (भेड़), वृद्धा (बूढ़ी), क्षत्रिया (क्षत्रिय जातिकी स्त्री), बहुराजा (जहाँ बहुतसे राजा निवास करते हों, वह नगरी), बहुदा (अधिक देनेवाली), मा (लक्ष्मी), अथवा बहुदामा (अधिक दाम—रज्जु या दीसीवाली), बालिका (लड़की), माया (भगवान्की शक्ति या प्रकृति), कौमुदगन्धा (कुमुदकी-सी सुगन्धवाली), सर्वा (सब), पूर्वा (पूर्व दिशा या पहली), अन्या (दूसरी), द्वितीया (दूसरी), तृतीया (तीसरी), बुद्धिः (मति), स्त्री (औरत), श्री (लक्ष्मी), नदी, सुधी (उत्तम बुद्धिवाली), भवन्ती (होती हुई), दीव्यन्ती (क्रीड़ा करती हुई), भाती, भान्ती (शोभमाना), यान्ती (जाती हुई), शृण्वती (सुनती हुई), तुदती, तुदन्ती (व्यथित करती हुई), कर्त्री (करनेवाली), कुर्वती (करती हुई), मही (पृथ्वी), रुन्धती (अवरोध करती हुई), क्रीडन्ती (खेलती हुई), दान्ती (दाँतकी बनी हुई वस्तु), पालयन्ती (पालती हुई), सुवाणी (उत्तम वाणी), गौरी (पार्वती), पुत्रवती (पुत्रवाली), नौः (नाव), वधूः (स्त्री), देवता, भूः (पृथ्वी), तिस्रः (तीन), द्वे (दो), कति, वर्षाभूः (वर्षाकालमें उत्पन्न होनेवाली मेढकी), स्वसा (बहिन), माता (माँ), अवरा (लघु), गौः (गाय), द्यौः (स्वर्ग), वाक् (वाणी), त्वक् (चमड़ा), प्राची (पूर्व दिशा), अवाची (दक्षिण दिशा), तिरश्ची (टेढ़ी या मादा पशु-पक्षी), उदीची (उत्तर दिशा), शरद् (ऋतुविशेष), विद्युत् (बिजली), सरित् (नदी), योषित् (स्त्री), अग्निवित् (अग्निको जाननेवाली), सस्यदा (अन्न देनेवाली) अथवा सम्पद् (सम्पत्ति), दृषत् (शिला), या (जो), एषा (यह), सा (वह), वेदवित् (वेदज्ञा), संविद् (ज्ञानशक्ति), बह्वी (बहुत), राज्ञी (रानी), त्वया, मया (युष्मद्-अस्मद् शब्दोंके तीनों लिङ्गोंमें समान रूप होते हैं, ये तृतीयाके एक वचनके रूप हैं)। सीमा (अवधि), पञ्च आदि (संख्यावाचक नान्त शब्द), राका (पूर्णिमा), धूः (बोझ), पूः (नगरी), दिशा (दिक्), गिरा (गीः), चतस्रः (चार), विदुषी (पण्डिता), का (कौन), इयम् (यह), दिक्
३. मघोना, मघवभ्याम्, मघवभिः। १. पूषा, पूषणौ, पूषणः। २. पूषणम्, पूषणौ, पूष्णः। ३. पूष्णा, पूषभ्याम्, पूषभिः। सप्तमीके एकवचनमें पूष्णि, पूषण्णि। १. सुकर्मा, सुकर्माणौ, सुकर्माणः। २. सुकर्माणम्, सुकर्माणौ, सुकर्मणः। ३. सुकर्मणा, सुकर्मभ्याम्, सुकर्मभिः। १. यज्वा, यज्वानौ, यज्वानः। २. यज्वानम्, यज्वानौ, यज्वनः। ३. यज्वना, यज्वभ्याम्, यज्वभिः। १. सुवर्मा, सुवर्माणौ, सुवर्माणः इत्यादि। शेषरूप 'यज्वन्' शब्दके समान हैं। सुधर्मा, सुधर्माणौ, सुधर्माणः इत्यादि। १. अर्यमा, अर्यमणौ, अर्यमणः। २. अर्यमणम्, अर्यमणौ, अर्यम्णः। ३. अर्यम्णा, अर्यमभ्याम्, अर्यमभिः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें—अर्यम्णि, अर्यमणि। १. वृत्रहा, वृत्रहणौ, वृत्रहणः। २. वृत्रहणम्, वृत्रहणौ, वृत्रघ्नः। ३. वृत्रघ्ना, वृत्रहभ्याम्, वृत्रहभिः इत्यादि। १. पन्थाः, पन्थानौ, पन्थानः। २. पन्थानम्, पन्थानौ, पथः। ३. पथा, पथिभ्याम्, पथिभिः। १. सुकक्पुङ्, सुकक्बुब्, सुकक्कुभौ, सुकक्कुभः, इत्यादि। १-२. अष्ट, अष्टौ, ३. अष्टाभिः, अष्टभिः इत्यादि। १-२. पञ्च, पञ्च। ३. 'पञ्चभिः' इत्यादि। 'अष्टन्', 'पञ्चन्' आदि शब्द नित्य बहुवचनान्त हैं। प्रशान्, प्रशामौ, प्रशामः। प्रशाम्भ्याम् इत्यादि। सुत्वा, सुत्वानौ, सुत्वानः, इत्यादि। प्राङ्, प्राञ्चौ, प्राञ्चः इत्यादि। सुद्यौः, सुदिवौ, सुदिवः, इत्यादि। सुभ्राट्, सुभ्राड्, सुभ्राजौ, सुभ्राजः इत्यादि। सुपूः, सुपुरौ, सुपुरः, इत्यादि। चन्द्रमाः, चन्द्रमसौ, चन्द्रमसः, इत्यादि। सुवचाः, सुवचसौ, सुवचसः, इत्यादि। १. श्रेयान्, श्रेयांसौ, श्रेयांसः। २. श्रेयांसम्, श्रेयांसौ, श्रेयसः। ३. श्रेयसा, श्रेयोभ्याम्, इत्यादि। १. विद्वान्, विद्वांसौ, विद्वांसः। २. विद्वांसम्, विद्वांसौ, विदुषः। ३. विदुषा, विद्वद्भ्याम्, विद्वद्भिः, इत्यादि। पेचिवान्, पेचिवांसौ, पेचिवांसः, इत्यादि। अनड्वान्, अनड्वाहौ, अनड्वाहः। २. अनड्वाहम्, अनड्वाहौ, अनडुहः। अनडुहा, अनडुद्भ्याम्, अनडुद्भिः, इत्यादि। गोधुक्, गोधुग्, गोदुहौ, गोदुहः, इत्यादि। मित्रध्रुक्, मित्रध्रुग्, मित्रधृट्, मित्रधृड्, मित्रध्रुग्भ्याम्, मित्रधृग्भ्याम् इत्यादि। मुक्, मुग्, मुट्, मुड्, मुडौ, मुडः, इत्यादि। लिट्, लिड्, लिहौ, लिहः इत्यादि।
७४४ * अग्निपुराण *
(दिशा), दृक् (नेत्र), तादृक् (तादृशी) तथा 'असौ'—ये स्त्रीलिङ्गके नायक शब्द हैं*। अब नपुंसकलिङ्गके नायक शब्द बताये जा रहे हैं॥ १२-१९ ॥
(सर्वप्रथम स्वरान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके प्रारम्भिक सिद्ध रूप दिये जाते हैं—) 'कुण्डम्'—यह अकारान्त नपुंसकलिङ्ग 'कुण्ड' शब्दका प्रथमान्त एकवचनरूप है। इसके प्रथम दो विभक्तियोंमें क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचनके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—कुण्डम्, कुण्डे, कुण्डानि। तृतीया आदि शेष विभक्तियोंके रूप पुँल्लिङ्गवत् जानने चाहिये। यथा—कुण्डेन, कुण्डाभ्याम्, कुण्डैः इत्यादि। सम्बोधनमें—हे कुण्ड, हे कुण्डे, हे कुण्डानि। 'कुण्डम्' का अर्थ है—पानीसे भरा हुआ गहरा गड्ढा। यह नदी और तालाब आदिमें होता है। मिट्टीके बड़े और गहरे पात्रविशेषको
* स्त्रीलिङ्गमें नामतः निर्दिष्ट 'नायक' शब्दोंके रूपोंका दिग्दर्शन मात्र कराया जा रहा है। 'जाया' शब्दका पूरा रूप इस प्रकार है—१. जाया जाये जायाः। २. जायाम् जाये जायाः। ३. जायया जायाभ्याम् जायाभिः। ४. जायायै जायाभ्याम् जायाभ्यः। ५. जायायाः जायाभ्याम् जायाभ्यः। ६. जायायाः जाययोः जायानाम्। ७. जायायाम् जाययोः जायासू। सम्बोधनमें—हे जाये हे जाये हे जायाः। 'जरा' शब्दका, स्वादि विभक्तियाँ परे हों तो 'जरस्' आदेश होता है। यह आदेश वैकल्पिक है। अतः 'जरा' का एक रूप तो 'जाया' की तरह ही होगा। औ, जस्, अम्, शस्, टा, ङे आदि विभक्तियोंमें क्रमशः—जरसौ, जरसः, जरसम्, जरसः, जरसा, जरसे इत्यादि वैकल्पिक रूप भी होंगे। बाला, एडका, वृद्धा आदिसे लेकर कौमुदगन्धातकतके सभी शब्दोंका रूप जायावत् होगा। 'सर्वा' शब्दका रूप—सर्वा सर्वे सर्वाः। सर्वाम् सर्वे सर्वाः। सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वाभिः। ङिद्-विभक्तियोंमें सर्वस्यै, सर्वस्याः, सर्वस्याः, सर्वस्याम् रूप होंगे। 'आम्' विभक्तिमें सर्वासाम्। शेष सब जगह जायावत् रूप चलेंगे। 'पूर्वा' और 'अन्या' शब्दोंके रूप 'सर्वा' की तरह होंगे। द्वितीया-तृतीया शब्द ङिड्-विभक्तियोंमें विकल्पसे सर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। जैसे 'ङे' विभक्तिमें 'द्वितीयायै', 'द्वितीयस्यै'। इसी प्रकार अन्य पञ्चमी आदिके एकवचनमें भी। 'बुद्धि' शब्दके रूप—'बुद्धिः, बुद्धीः, बुद्धयः। बुद्धिम्, बुद्धी, बुद्धीः। बुद्ध्या, बुद्धिभ्याम्, बुद्धिभिः। बुद्धयै इत्यादि। 'ङि'विभक्तिमें बुद्ध्याम्, बुद्धौ। इसी तरह 'मति' शब्दके भी रूप हैं। 'स्त्री' शब्दकी 'ई'को अजादि विभक्तियोंमें 'इयङ्' आदेश होता है। यथा स्त्रियौ, स्त्रियः इत्यादि। अम्-शस्में विकल्प है—स्त्रियम्, स्त्रीम्। स्त्रियः स्त्रीः। 'सु' विभक्तिमें 'स्त्री' रूप होता है। 'सु'का लोप हो जाता है। 'श्री' शब्दका रूप—श्रीः श्रियौ श्रियः इत्यादि। 'नदी' शब्दका रूप—नदी नद्यौ नद्यः। नदीम्, नद्यौ, नदीः। नद्या नदीभ्याम् नदीभिः। नद्यै नदीभ्यां नदीभ्यः। नद्याः, नदीभ्याम्, नदीभ्यः। नद्याः नद्योः नदीनाम्। नद्याम्, नद्योः नदीषु। हे नदि हे नद्यौ हे नद्यः। 'सुधी'का रूप सुधीः सुधियौ सुधियः इत्यादि। 'भवन्ती'का रूप नदीवत्। यहाँसे लेकर 'पुत्रवती' शब्दतकके रूप नदीवत् ही होंगे। 'नौ' शब्दका रूप—नौः नावौ नावः इत्यादि। वधू—वधूः वध्वौ वध्वः इत्यादि। 'देवता' का रूप जायावत्। 'भू'—भूः भुवौ भुवः इत्यादि। तिसृ—१. तिस्रः। २. तिस्रः। ३. तिसृभिः। ४-५. तिसृभ्यः। ६. तिसृणाम्। ७. तिसृषु। इसी प्रकार 'चतसृ'के रूप जानने चाहिये। 'द्वि' शब्दके स्त्रीलिङ्गमें—द्वे, द्वे, द्वाभ्याम् ३, द्वयोः २ रूप होते हैं। 'कति'—कति, कति, कतिभिः इत्यादि। 'वर्षाभू'—वर्षाभूः, वर्षाभ्वौ, वर्षाभ्वः इत्यादि। स्वसा स्वसारौ स्वसारः इत्यादि। माता मातरौ मातरः। मातरम्, मातृः इत्यादि। 'अवरा'का रूप पूर्वावत्। 'गो'—गौः गावौ गावः। गाम् गावौ गाः। गवा गोभ्याम् गोभिः। इत्यादि। द्यौः द्यावौ द्यावः इत्यादि। वाक् वाग्, वाचौ वाचः इत्यादि। त्वक्—'वाक्'के समान। 'प्राची'से लेकर 'उदीची' तकके रूप—नदीवत्। शरत्—शरत् शरद् शरदौ शरदः इत्यादि। विद्युत्—विद्युत् विद्युद् विद्युतो विद्युतः इत्यादि। सरित्-सरित् सरिद् सरितौ सरितः इत्यादि। 'अग्निवित्' शरत्के समान। 'सस्यदा' जायावत्। 'सम्पत्' शरत्के समान। 'दृषत्' शरत्के समान। या ये याः, याम् ये याः। यया याभ्याम् इत्यादि। यस्याः यासाम्, यस्याम् इत्यादि। एषा एते एताः इत्यादि। सा ते ताः इत्यादि। 'वेदविद्' शरत्के समान। 'संवित्' भी शरत्के समान। 'बह्नी', 'राज्ञी'—नदीके समान। त्वम् युवाम् यूयम्। त्वां युवाम् युष्मान्। त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः। तुभ्यम् युवाभ्याम् युष्मभ्यम्। त्वत् युवाभ्याम् युष्मत्। तव युवयोः युष्माकम्। त्वयि युवयोः युष्मासु। इसी तरह 'अस्मद्' शब्दके अहं आवाम् वयम्। माम् आवाम् अस्मान्। मया आवाभ्याम् अस्माभिः। मह्यम्, मत्, मम, अस्माकम् मयि इत्यादि रूप हैं। 'सीमा' टाबन्त हो तो सीमा सीमे सीमाः। नान्त हो तो सीमा सीमानौ सीमानः इत्यादि। 'पञ्चन्' शब्द—पञ्च पञ्च पञ्चभिः इत्यादि। 'राका' जायावत्। धूः धुरौ धुरः इत्यादि। पूः पुरौ पुरः इत्यादि। 'दिशा'—जायावत्। 'दिक्' शब्दके—दिक्-दिग् दिशौ दिशः। इत्यादि रूप हैं। गीः गिरौ गिरः इत्यादि। 'विदुषी'—नदीवत्। 'किम्' शब्दके—का के काः इत्यादि रूप हैं। 'इदम्'—इयम् इमे इमाः इत्यादि। 'दृक्' शब्द 'दिक्'के समान। तादृग्, तादृक्, तादृशौ तादृशः इत्यादि। 'अदस्' असौ अमू अमूः। अमूम् अमू अमूः। अमुया इत्यादि।