ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
अध्याय समाप्त
१३२ [ दूसरी पञ्चिका हविष्पंचक का याज्य मंत्र यह है :— हरि वाँ इन्द्रो धाना प्रत्तु पूषण्वान् करंभं सरस्वतीवान् भारतीवान् परिवाप इन्द्रस्यापूप” । “घोड़ों वाला इन्द्र धान खावे, पूषावाला करंभ, सरस्वती- वाला और भारतीवाला इन्द्र परिवाप खावे । इन्द्र का पुरोडाश या अपूप है ।” इन्द्र के दो घोड़े हैं ऋक् और साम । पशु पूषन हैं । करंभ अन्न है । सरस्वतीवान् और भारतीवान् कहा, इसमें सरस्वती का अर्थ है वाणी । प्राण भरत है । “परिवाप इन्द्रस्य अपूप” में परिवाप अन्न है और अपूप इन्द्रिय है । इस प्रकार यज्ञ करके होता यजमान को देवताओं का सायुज्य, सरूपता और सालो- क्यता प्राप्त करा देता है और स्वयं भी श्रेय, सायुज्य और श्रेष्ठता का लाभ करता है जो इस रहस्य को समझता है । पुरोडाश की हर सवन की स्विष्टकृत आहुति यह है “हविरग्नेवीहि”—“अग्नि हवि खा !” इस प्रकार अवत्सार ऋषि अग्नि के प्रिय धाम को पा गया और परम लोक को पहुँच गया । जो इस रहस्य को समझता है और समझकर हवि-पंचक की आहुति देता है और याज्य मंत्र बोलता है वह भी यही लाभ प्राप्त करता है । (६) ऐतरेय ब्राह्मण की दूसरी पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त
चौथा अध्याय २५-सोम राजा का पहले पान करने के लिये देव झगड़ पड़े। उन्होंने चाहा कि "मैं पहले पिऊँ", "मैं पहले पिऊँ।" अब वे इस बात पर राजी हुये कि बाजी लगाकर दौड़ें। जो जीत जाय वही पहले पीले। ऐसा कह कर वह दौड़े। जितने दौड़े थे उनमें वायु पहले नियत स्थान पर पहुँचा, फिर इन्द्र, फिर मित्र और वरुण, फिर दोनों अश्विन। इन्द्र यह सोच कर कि मैं वायु से आगे पहुँचूँ, (ऐसा दौड़ा कि) वायु के पास ही गिर पड़ा। तब उसने कहा, "हम दोनों साथ आये हैं इसलिये दोनों जीते हैं"। उस (वायु) ने कहा, "नहीं मैं ही जीता हूँ"। इन्द्र ने कहा, "तीसरा भाग मुझे मिले, हम दोनों जीते हैं"। उस (वायु) ने कहा, "नहीं, मैं ही जीता हूँ।" तब इन्द्र ने कहा, "चौथाई मुझे मिले, हम दोनों जीते हैं"। वायु मान गया और चौथाई भाग इन्द्र को मिला। तभी से इन्द्र को चौथाई भाग मिलता है और वायु को तीन भाग। इस प्रकार इन्द्र और वायु दोनों जीते। फिर मित्र और वरुण। फिर दोनों अश्विन। वह जिस जिस क्रम से जीते उसी क्रम से ( १३३ )
१३४ [ दूसरी पञ्चिका उनको सोम पीने का अधिकार मिला, इन्द्र और वायु पहले, फिर मित्र और वरुण, फिर अश्विन। ऐन्द्र-वायव ग्रह (वह घड़ा जो इन्द्र-वायु का है) वह है जिसमें इन्द्र का चौथाई भाग है। इस बात को एक ऋषि ने देखा था। उसने यह मन्त्र पढ़ा:— "नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः" ❄ (ऋ० ४।४६।२) "वायु और उसका सारथि इन्द्र।" इस लिये आजकल जब भरत अर्थात् वीर पुरुष शत्रुओं को जीत कर युद्ध में लूट का माल लेते हैं, तब सारथि लोग कहते हैं, कि इसमें चौथाई भाग हमारा है क्योंकि इन्द्र ने वायु का सारथि बनकर विजय पाई थी। (१) २६—यह जो दो देवतों के सोमग्रह या घड़े हैं वे प्राण हैं। इन्द्र और वायु के वाणी और प्राण। मित्र और वरुण के चक्षु और मन। और अश्विन के श्रोत्र और आत्मा। कुछ लोग ऐन्द्रवायु वाले घड़े में से आहुति देते समय दो अनुष्टुभ् छन्दों में पुरोनुवाक्य और दो गायत्री छन्दों में याज्य पढ़ते हैं। चूँकि ऐन्द्रवायव्य ग्रह वाणी और प्राण का है इस लिये ठीक- ठीक छन्द हो गये (अर्थात् अनुष्टुभ् वाणी का और गायत्री प्राण का)। परन्तु यह बात माननीय नहीं। क्योंकि जब पुरोनुवाक्य मंत्र याज्य मंत्र से बढ़ गया तो यज्ञ सफल नहीं होता। जब याज्य पुरोनुवाक्य से बढ़ जाता है तब सफलता होती है। इसी प्रकार जब दोनों बराबर हों (तब भी सफलता नहीं होती)। प्राण और वाणी की सफलता के लिये ऐसा (कि दो अनुष्टुभ् छन्दों में अनुवाक्य पढ़े और दो गायत्री ❄ पूरामंत्र शेतना नो० (ऋ० ४।४६।२) २६ वें खंड में देखो।
चौथा अध्याय ] १३५ छन्दों में याज्य )। इससे कामना पूरी होगी। पहला पुरोनु- वाक्य वायु का है :- वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः । तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥ ( ऋ० १।२।१ ) दूसरा इन्द्र और वायु का :- इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरागतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ ( ऋ० १।२।४ ) इसी प्रकार दो याज्यों में जो पहला याज्य मंत्र वायु का है अर्थात् :- अग्रं पिवा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु । त्वं हि पूर्वपा असि ॥ ( ऋ० ४।४६।१ ) उससे यजमान में प्राण धारण कराता है। क्योंकि वायु प्राण है। और जो इन्द्र वायु का याज्य है अर्थात् :- शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्र सारथिः । वायो सुतस्य तृम्पतम् ॥ ( ऋ० ४।४६।२ ) इसमें जो इन्द्र का पद है उससे वाणी को धारण कराता है। क्योंकि वाणी इन्द्र की है। इस प्रकार प्राण और वाणी की जो जो कामना है उसको बिना यज्ञ को विषम किये हुये पूरी कर देता है। (२) २७-दो देवतों का जो सोम है वह प्राण है। उसे एक ही पात्र से ग्रहण करते हैं। क्योंकि सब प्राण एक ही हैं। दो पात्रों से आहुति देते हैं क्योंकि प्राण दो हैं। इसके पश्चात् जिस यजु मंत्र से अध्वर्यु सोम के प्याले को देता है, उसी मन्त्र से होता ग्रहण करता है :- “एष वसुः पुरूवसुरहिवसुः पुरूवसुर्मयि वसुः पुरूवसुर्वाक्पा वाचं मे पाहि”
१३६ [ दूसरी पञ्चिका "यह अच्छा है। यह बहुत अच्छा है। यहाँ अच्छा है, बहुत अच्छा है। मुझमें अच्छा है, बहुत अच्छा है। हे वाणी के रक्षक, मेरी वाणी की रक्षा कर।" होता सोम को ऐन्द्रवायवी ग्रह से पीता है। अब पढ़ता है :— "उपहूता वाक् सह प्राणेनोरमां वाक सह प्राणेन ह्वयतामुपहूता ऋषयो दैव्यास्तनू पावानेस्तन्वस्तपोजा उपमामृषयो दैव्यासो ह्वयं तां तनूपावानस्तन्वस्तपोजा" । "वाणी प्राण के साथ बुलाई गई। वाणी प्राण के साथ मुझे बुलावे, दिव्य ऋषि जो शरीरों की रक्षा करने वाले और तप से उत्पन्न हुये हैं, बुलाये गये। दिव्य ऋषि जो शरीर के रक्षक और तप से उत्पन्न हुये हैं मुझे बुलावें।" दिव्य शरीरों के रक्षक और तप से उत्पन्न हुये ऋषियों का अर्थ है प्राण। उन्हीं को वह बुलाता है। मित्र और वरुण के ग्रह से इस मन्त्र को पढ़ कर पीता है— "एष वसुविद्वद् वसुरिह वसुविद्वद् वसुर्मयि वसुविद्वद् वसुश्चक्षुष्पा- श्चक्षुर्मे पाहि" । "यह वसु है, ज्ञान वाला वसु है। यहाँ वसु है, ज्ञान वाला वसु है। मुझमें वसु है, ज्ञान वाला वसु है। हे आँख के रक्षक, मेरी आँख की रक्षा कर।" अब वह कहता है:— "उपहूतं चक्षुः सहमनसोपमां चक्षुः सहमनसाह्वयतामुपहूता ऋषयो दैव्यास्तनूपावानस्तन्वस्तपोजा उपमामृषयो दैव्यासो ह्वयतां तनूपावान- स्तन्वस्तपोजा" । "मन के साथ आँख बुलाई गई। आँख मुझे मन के साथ बुलावे। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि बुलाये गये। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि मुझे बुलावें"।
चौथा अध्याय ] १३७ दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि प्राण हैं। इससे उन्हीं को बुलाता है। नीचे के मंत्र से अश्वि के ग्रहों से पान करता है :— “एष वसुः संयद् वसुरिहवसुः संयद् वसुर्मयि वसुः संयद् वसुः श्रोत्रपाः श्रोत्रं मे पाहि”। “यह वसु है, सदा रहने वाला वसु है। यहाँ वसु है, सदा रहने वाला वसु है। हे कान के रक्षक, मेरे कान की रक्षा कर”। अब वह कहता है:— उपहूतं श्रोत्रं सहात्मनोपमां श्रोत्रं सहात्मनाह्वयतामुपहूता ऋषयो दैव्यास्तनूपावानस्तन्वस्तपोजां उपमामृषयो दैव्यासोह्वयंतां तनूपावानस्तन्व- स्तपोजा”। “कान आत्मा के साथ बुलाया गया। कान आत्मा के साथ मुझे बुलावे। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि बुलाये गये। दिव्यतनूपा और तपोजा ऋषि मुझे बुलायें”। यह दिव्य तनूपा, तपोजा ऋषि प्राण हैं, इससे इन्हीं को बुलाता है। ऐन्द्रवायव्य ग्रह से पीते समय होता ग्रह (घड़े या प्याले) के मुँह को अपनी ओर करके उसमें से पीता है। क्योंकि प्राण और अपान उसके सामने है। इसी प्रकार मित्र-वरुण के ग्रह में से पीता है क्योंकि दोनों आँखें उसके सामने हैं, अश्विनों के ग्रह से पीते समय अपने मुख को पीछे फेर लेता है क्योंकि मनुष्य और पशु चारों ओर से शब्द सुनते हैं। (३) २८—दो देवताओं के सोम पात्र प्राण हैं। इसलिये प्राणों को जारी रखने और उनको टूटने न देने के लिये याज्य मन्त्रों को निरन्तर पढ़ना चाहिये। दो देवताओं के सोम पात्र प्राण हैं। अतएव होता अनुवषट्कार न पढ़े। इससे प्राणों का क्रम टूट जायगा। क्योंकि अनुवषट्कार क्रम के टूटने का द्योतक है। यदि
१३८ [ दूसरी पञ्चिका कोई होता को अनुवषट्कार करते देखे तो कहे कि तुमने प्राणों का क्रम बन्द कर दिया जो अन्यथा बन्द न होता और इसलिये तुम्हारा जीवन समाप्त हो जायगा। ऐसा सदा होता है। इसलिये दो देवताओं के सोमपात्रों पर अनुवषट्कार न पढ़े। इस पर कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि जब मित्र, वरुण सम्बन्धी पुरोहित दो बार आगू कहता है और दो बार याज्य मन्त्र पढ़ने की प्रेरणा करता है तो होता एक बार आगू कह कर दो बार वषट्कार क्यों बोलता है (आगू का अर्थ यह है कि पुरोहित कहता है "होता यक्षत" या "होतर्यज", यह वह दो बार कहता है। होता एक बार उत्तर देता है "ये ३ यजा- महे।" (प्रश्न यह है कि दो प्रश्नों का होता एक ही उत्तर क्यों देता है?) इसका उत्तर यह है कि दो देवताओं के सोम पात्र तो प्राण हैं और आगू वज्र है। इसलिये यदि होता दो याज्य मन्त्रों के बीच में आगू बोल दे तो वह वज्र से यजमान का जीवन काट दे। (यदि कोई होता को ऐसा करते देखे तो) कहे कि तूने यजमान के जीवन को आगू वज्र से काट कर अपना जीवन भी काट डाला। सदा ऐसा ही होता है। होता दो याज्य मन्त्रों के बीच में आगू न बोले। इसके अतिरिक्त मैत्रावरुण पुरोहित यज्ञ का मन है और होता वाणी है। मन से प्रेरित होकर ही वाणी बोलती है। जो मन से विरुद्ध वाणी बोलता है वह वाणी असुरों को प्यारी होती है, देवों को नहीं। होता का आगू मैत्रावरुण के पुरोहित के दोनों आगूओं के अन्तर्गत है। (४) २९—ऋतु याज प्राण हैं। जो ऋतु याज करते हैं अर्थात् जो ऋतुओं के लिये आहुतियाँ देते हैं वे यजमान को प्राण धारण कराते हैं। 'ऋतुना' शब्द से आरम्भ होते हुये ऋतुओं के छः मन्त्र बोल कर यजमान में प्राण धारण कराते हैं।
चौथा अध्याय ] १३९ “ऋतुभिः” शब्द से आरम्भ होते हुये चार मन्त्रों से अपान को यजमान में धारण कराते हैं। पीछे के दो मन्त्र जो 'ऋतुना' से आरम्भ होते हैं उनसे यजमान में व्यान धारण कराते हैं। यह प्राण तीन तरह का है—प्राण, अपान, व्यान। यह जो "ऋतुना", "ऋतुभिः", "ऋतुना" आदि वाले मन्त्रों को निरन्तर पढ़ते हैं वह प्राणों के सिलसिले को जारी रखने के लिये। उनका खंडन न होने देने के लिये। ऋतुयाज प्राण हैं। उनके पीछे अनुवषट्- कार न कहे। ऋतुओं का कोई अन्त नहीं। एक के बाद दूसरी आती है। अगर वह ऋतुयाजों के पीछे अनुवषट्कार कहेगा तो रोक देगा। क्योंकि अनुवषट्कार विराम का सूचक है। जो इसको कहेगा वह ऋतुओं को रोक देगा और आपत्ति में पड़ेगा। सदा ऐसा ही होता है। इसलिये ऋतुयाज के मन्त्र बोलने के बाद अनुवषट्कार न कहे। (५) ३०—दो देवों वाले सोम पात्र प्राण हैं। और इला अर्थात् पुरोडाश पशु हैं। सोम पात्रों में से पीकर इला को बुलाता है। पशु ही भोजन है। इस प्रकार पशुओं को बुलाता है यजमान में पशुओं को धारण कराता है। यहाँ प्रश्न उठता है कि पहले इला ( पुरोडाश ) को खावे या चमसे में से पान करे। इसका उत्तर यह है कि पहले भोजन कर ले, फिर सोम पान करे। दो देवतों के सोम ग्रह से उसने सोम पान पहले कर ही लिया। इसलिये अब पहले अपने हाथ का पुरोडाश खाले, फिर चमसे में से सोम पान करे। इस तरह से उसे दोनों तरह का अन्न अर्थात् खाना और पानी मिल जाता है। ( ग्रह और चमसा ) दोनों में से सोम पान करने से सब प्रकार का भोजन प्राप्त हो जाता है। दो देवतों के ग्रह प्राण हैं और होता का चमसा आत्मा है।
१४० [ दूसरी पञ्चिका ग्रहों में से चमसे में सोमरस उँडेलने का तात्पर्य यह है कि होता अपने में प्राण धारण कर रहा है, और पूर्ण आयु को प्राप्त हो रहा है। जो इस भेद को समझता है वह पूर्ण आयु को प्राप्त होता है। (६) ३१—देवों ने जो यज्ञ किया वही असुरों ने किया। वे बराबर शक्ति वाले हो गये, और देवों के अधीन न रहे। तब देवों ने "तूष्णीं शंस" (चुपचाप प्रार्थना या जाप) को देखा। असुरों ने इसको न किया। यह जो चुपचाप की प्रार्थना है वह मन्त्रों का सार रूप है। देव जिस जिस वज्र को उठाते थे असुर उसको जान जाते थे। देवों ने अब "चुपचाप की प्रार्थना" को देखा और इसी वज्र को उठाया। असुर न जान सके। देवों ने इस वज्र का असुरों पर प्रहार किया। असुर न जान सके। इस प्रकार देव असुरों पर विजय पा गये। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने शत्रु, अहितकर और अत्याचारी पर विजय पा लेता है। देवों ने अपने आपको विजयी समझ कर यज्ञ रोप दिया। असुर उसके निकट आये कि विघ्न डालें। उन्होंने बड़े असुरों को चारों ओर से आते देखा। तब उन्होंने कहा "इसे समाप्त कर दें जिससे असुर इसका विध्वंस न कर सकें।" उन्होंने ऐसा ही किया, "तूष्णीं शंस" अर्थात् चुपचाप प्रार्थना द्वारा उसको समाप्त किया। उन्होंने "भूरग्निज्योतिरग्निः" से आज्य और प्रउग को समाप्त किया है। "इन्द्रो ज्योतिर्भुवो ज्योतिरिन्द्रः" से उन्होंने निष्केवल्य और मरुत्वती को समाप्त किया। "सूर्यो- ज्योतिर्ज्योतिः स्वःसूर्यः" से वैश्वदेव और अग्निमारुत को समाप्त किया। (आज्य और प्रउग प्रातःकाल की प्रार्थनायें हैं। निष्केवल्य और मरुत्वती दोपहर की। तथा वैश्वदेव और अग्नि- मारुत शाम की)।
चौथा अध्याय ] १४१ इस प्रकार "चुपचाप प्रार्थना" से उन्होंने यज्ञ समाप्त किया । इस प्रकार "चुपचाप प्रार्थना" से यज्ञ को समाप्त करके यज्ञ की रक्षा के लिये उनको अन्तिम ऋचा मिल गई। जब होता "चुपचाप प्रार्थना" को कह लेता है तो यज्ञ समाप्त हो जाता है। "चुपचाप प्रार्थना" करने पर होता के लिये यदि कोई बुरा कहे तो उससे कहना चाहिये कि यह तेरे ही लिये हानि पहुँचावेगा। अब होता पढ़ता है :— “प्रातर्वाव वयमद्ये मं शस्ते तूष्णीं शंसे संस्थापयामः ।” "आज प्रातःकाल हम इस चुपचाप प्रार्थना को कह कर यज्ञ को समाप्त करते हैं।" जैसे घर में पाहुने का किसी कृत्य के द्वारा स्वागत करते हैं उसी प्रकार यज्ञ का इस "चुपचाप प्रार्थना' द्वारा स्वागत करते हैं। जो इस रहस्य को समझ कर 'चुपचाप प्रार्थना' के बाद होता को बुरा कहता है वह हानि उठाता है। इसलिये जो इस रहस्य को समझता है उसको "चुपचाप प्रार्थना" के बाद होता को बुरा नहीं कहना चाहिये। (७) ३२—यह जो तूष्णी शंस या "चुपचाप प्रार्थना" है, वे सवनों की आँखें हैं। "भूरग्निज्योतिः" “ज्योतिराग्निः" यह प्रातः सवन की दो आँखें हैं। "इन्द्रोज्योतिः" “भुवो ज्योतिरिन्द्र" यह दोपहर के सवन की दो आँखें हैं। "सूर्योंज्योतिर्ज्योतिः स्वः सूर्यः" यह शाम के सवन की दो आँखें हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह आँखों वाले सवनों से समृद्धि को प्राप्त होता है और आँखों वाले सवनों से स्वर्ग को जाता है। यह जो "तूष्णी शंस" है वह यज्ञ की आँख है। हर प्रार्थना में एक ही व्याहृति आती है पर वह दो बार बोली जाती है। आँख है तो एक पर मालूम दो होती है। यह जो "तूष्णी शंस" है, वह यज्ञ की जड़ है। जो कोई
१४२ [ दूसरी पञ्चिका यजमान की जड़ खोदना चाहे वह "चुपचाप की प्रार्थना" न पढ़े क्योंकि इसके न पढ़ने से यज्ञ बिना जड़ के हो जाता है और यजमान यज्ञ के साथ ही नष्ट हो जाता है। इस पर कहते हैं कि होता को यह प्रार्थना पढ़नी ही चाहिये। यह ऋत्विज् के लाभ के लिये है, जो "तूष्णीं शंस" पढ़ी जाती है। ऋत्विज् में ही यज्ञ प्रतिष्ठित है। और यज- मान यज्ञ में प्रतिष्ठित है। इसलिये "चुपचाप प्रार्थना" पढ़नी चाहिये। (८) ऐतरेय ब्राह्मण की दूसरी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त
पाँचवाँ अध्याय ३३—आज्य शस्त्र के तीन भागों में से "आहाव" नामी पहला ब्राह्मण है। "निविद्" नामी दूसरा क्षत्रिय है। "सूक्त" ० नामी तीसरा वैश्य है। आहाव के बाद निविद् को कह कर होता ब्राह्मण को क्षत्रिय से मिला देता है। 'सूक्त' से पहले निविद् को कहकर क्षत्रिय से वैश्य को मिला देता है। यदि होता यजमान को क्षत्ररहित करना चाहे तो निविद् के मध्य में सूक्त कह दे। ऐसा करने से वह उसको क्षत्र-रहित कर देता है। यदि होता चाहे कि यजमान को वैश्य-रहित कर दे तो सूक्त के मध्य में निविद् कह दे। ऐसा करने से वह यजमान को वैश्य-रहित कर देता है। अगर चाहे कि यजमान को ठीक ठीक सब वर्णों से मुक्त रक्खे तो पहले आहाव कहे, फिर निविद्, फिर सूक्त। यही ठीक ठीक क्रम है। पहले अकेला प्रजापति ही था। उसने चाहा कि बहुत हो जाऊँ। उसने तप तपा। उसने मौन धारण कर लिया। एक ( १४३ )
१४४ [ दूसरी पञ्चिका वर्ष के पश्चात् उसने बारह पद कहे, यही बारह निविद् के पद हैं। निविद् कहने के पश्चात् सब प्राणी उत्पन्न हुये। इसको (कुत्स) ऋषि ने नीचे का मन्त्र पढ़ते हुये देखा— स पूर्वया निविदा कव्यतायोरिमाः प्रजा अजनयन्मनूनाम्। विव- स्वता चक्षसा द्यामपश्च देवा अग्निं धारयन् द्रविणोदाम्॥ (ऋ० १।९६।२) "उस अग्नि ने पहले निविद् से और काव्य से मनुष्यों की प्रजा को उत्पन्न किया। हर जगह चमकते हुये प्रकाश से द्यौ और जलों को उत्पन्न किया। देवों ने धन देने वाले अग्नि को धारण किया।" इसीलिये जब होता सूक्त से पहले निविद् को कहता है तो उसे सन्तान का लाभ होता है। जो इस रहस्य को समझता है उसको सन्तान और पशु की प्राप्ति होती है। (१) ३४—होता कहता है : “अग्निर्देवेद्धः” "अग्नि देवों से प्रज्वलित की गई"। देवों की प्रज्वलित की हुई वह (स्वर्गीय) अग्नि है क्योंकि उसको देवों ने प्रज्वलित किया है। इसी के द्वारा वह उस लोक में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब कहता है : “अग्निर्मन्विद्धः” "अग्नि मनुष्यों द्वारा प्रज्वलित की गई।" मनुष्यों से प्रज्वलित की गई अग्नि यह (पृथ्वी) की अग्नि है। क्योंकि मनुष्यों ने इसे जलाया है। इसके द्वारा वह इस लोक की अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :— “अग्निः सुसमिद्” "अग्नि जो अच्छी तरह प्रज्वलित करता है"। यह "अग्निः
पांचवाँ अध्याय ] १४५ सुशमित्" वायु है । वायु अपने द्वारा अपने को और जो कुछ संसार में है उसको प्रज्वलित करता है । इसके द्वारा वह अन्त- रिक्ष में वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब कहता है :- "होता देववृतः" "देवों से वरण किया हुआ होता" । देवों से वरण किया हुआ होता वह ( स्वर्गीय ) अग्नि है । क्योंकि वह हर जगह देवों से वरण किया हुआ है । इस प्रकार वह उस लोक में उस पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब वह कहता है :- "होता मनुवृतः" "मनुष्यों से वरण किया गया होता ।" मनुष्यों से वरण किया हुआ होता यह (इस लोक की) अग्नि है । क्योंकि यह अग्नि हर जगह मनुष्यों द्वारा वरण की जाती है । इस प्रकार होता इस लोक में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब वह कहता है :- "प्रणीर्यज्ञानाम्" "यज्ञों को ले जाने वाला" । वायु यज्ञों का ले जाने वाला है । जब वह चलता है तब यज्ञ होता है तभी अग्निहोत्र होता है । इस प्रकार अन्तरिक्ष में वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब कहता है :- "रथीरध्वराणाम्" "अध्वरों का रथी ।" अध्वरों का रथी वह (सूर्य्य) है । क्योंकि वह रथी के समान चलता है । इस प्रकार होता इस अग्नि पर इस लोक में आधिपत्य प्राप्त करता है । १०
१४६ [ दूसरी पञ्चिका अब वह कहता है :- "ऋतूर्तों होता" "अपराजित होता" । यह अग्नि अपराजित होता है। क्योंकि कोई इसका मुकाविला नहीं कर सकता। इस प्रकार होता इस लोक में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :- "तूर्णिर्हव्यवाट्" "हव्य को ले जाने वाले वाहक" । हव्यों को ले जाने वाला वाहक वायु है। क्योंकि वायु सारे संसार में शीघ्रता से बहता है। वह हवियों को देवों तक ले जाता है। इस प्रकार वह अन्तरिक्ष में वायु पर आधिपत्य पाता है। अब वह कहता है :- "आ देवो देवान् वक्षत् ।" "देव देवों को लावें।" वह देव ( स्वर्गीय अग्नि ) है जो देवों को यहां लाता है। इस प्रकार वह उस लोक में उस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :- "यक्षादग्निर्देवो देवान् ।" "अग्नि देव देवों के प्रति मन्त्र बोले।" देवों के प्रति मन्त्र बोलने वाला यह अग्नि है। इस प्रकार वह इस लोक में अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :- "सो अध्वराकरति जातवेदाः ।" "वह जातवेद पवित्र आहुति को बनावे।"
पांचवाँ अध्याय ] १४७ वायु ही जातवेद है। वायु ही इस सब संसार को बनाता है। इस प्रकार वह अन्तरिक्ष में वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है। (निविद् के यह बारह पद हुये) । (२) ३५—अब होता इन अनुष्टुभ् मन्त्रों को पढ़ता है :— प्र वो देवायाग्नये बर्हिष्ठमर्चास्मै । गमद् देवेभिरा स नो यजिष्ठो बर्हिरा सदत् ॥ ऋतावा यस्य रोदसी दक्षं सचन्त ऊतयः । हविष्मन्तस्तमीलते तं सनिष्यन्तोऽवसे ॥ स यन्ता विप्र एषां स यज्ञानामथा हि षः । अग्निं तं वो दुवस्यत दाता यो वनिता मखम् ॥ स नः शर्माणि वीतयेऽग्निर्यच्छतु शन्तमा । यतो नः प्रुष्णवद् वसु दिवि क्षितिभ्यो अप्स्वा ॥ दीदिवांसमपूर्व्यं वस्वीभिरस्य धीतिभिः । ऋक्ववाणो अग्निमिन्धते होतारं विश्पतिं विशाम् ॥ उत नो ब्रह्मन्नविष उक्थेषु देवहूतमः । श नः शोचा मरुद् वृधोऽग्ने सहस्रसातमः ॥ नू नो रास्व सहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमद् वसु । द्युमदग्ने सुवीर्यं वर्षिष्ठमनुपक्षितम् ॥ (ऋ० ३।१३।१-७) वह पहले पद को अलग करता है। क्योंकि स्त्री अपनी जांघों को अलग करती है। वह अन्तिम पदों को जोड़ता है। क्योंकि पुरुष जांघों को मिलाता है। यह मैथुन है। वह आज्य मंत्र को पढ़ने के आरम्भ में संतान-प्रजनन के लिये मैथुन करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सन्तान और पशुओं से युक्त होता है। इस सूक्त को पढ़ते हुये पहले पदों को अलग करने से वज्र के पिछले भाग को मोटा कर देता है। और अन्तिम भागों को
१४८ [ दूसरी पञ्चिका मिलाकर अगले भाग को पतला कर देता है। यही हाल दण्ड या कुठार का है ! इस प्रकार वह अपने शत्रु पर प्रहार करता है। जिस शत्रु को दबाना हो, वज्र उसको दबा लेगा। (३) ३६—इन लोकों में देव और असुर लड़ते थे। देवों ने ( उत्तर वेदी के दक्षिण को ) ऋत्विजों के बैठने के स्थान (सदस् ) को ग्रहण किया। असुरों ने उनको वहाँ से उठा दिया। तब वे उत्तर वेदी के वांई ओर आग्नीध्र के स्थान पर चले गये। वहाँ वह पराजित न हो सके। इस लिये ऋत्विज् आग्नीध्र के पास बैठते हैं। सदस् पर नहीं। आग्नीध्र के पास बैठ कर वह अग्नि के पास घरे जाते हैं इसलिये उसे आग्नीध्र कहते हैं। आग्नीध्र का आग्नीध्रत्व यही है। असुरों ने देवों के सदस् की अग्नि को बुझा दिया। लेकिन देवों ने आग्नीध्र से अपने सदस् की अग्नि को जला लिया। इस प्रकार उन्होंने असुरों और राक्षसों को हरा दिया और बाहर निकाल दिया। इस लिए यजमान लोग आग्नीध्र से अग्नि लेकर असुरों और राक्षसों को हरा देते और निकाल देते हैं। उन्होंने प्रातःकाल के आज्यों द्वारा विजय पाई, और जीती हुई जगह पर आ गये। इसी लिये इनका नाम आज्य पड़ा। यही आज्यों का आज्यत्व है। उन विजय पाये हुये होताओं के शरीरों में से केवल अच्छा- वाक का शरीर न मिल सका क्योंकि इन्द्र और अग्नि उसमें घुस गये थे। देवों में इन्द्र और अग्नि ही बड़े और बलवान तथा जीतने वाले, उत्तम और अच्छे मित्रों वाले हैं। इस लिये प्रातः सवन में अच्छावाक इन्द्र और अग्नि की स्तुति करता है। क्योंकि इन्द्र और अग्नि ने ही अच्छावाक के शरीर में प्रवेश किया था। इस लिये अन्य होता अपने स्थान पर पहले जाते हैं और पीछे से अच्छावाक। जो पीछे आवे वही हीन
पाँचवाँ अध्याय ] १४९ है। क्योंकि वह देर में पहुँचेगा। इसलिये जो ब्राह्मण बह्वृच ( बहुत ऋचायें जानने वाला ) और वीर्यवान हो, वही अच्छा- वाक का कार्य करे। क्योंकि तभी वह अहीन ( न खोया हुआ ) हो सकता है। (४) ३७—यह जो यज्ञ है वह देवों का रथ है। आज्य और प्रउग दो बीच की रस्सियां हैं। पवमान स्तोत्र के बाद आज्य पढ़ने और आज्य स्तोत्र के बाद प्र-उग पढ़ने से होता देवों के रथ की रस्सियों को थाम लेता है कि रथ टूट न जाय। उसी का अनुकरण करके मनुष्यों के रथों की रस्सियों को सारथी थामते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसका देवरथ या मनुष्यरथ टूटने नहीं पाता। यहाँ एक शंका होती है। नियम यह है कि शस्त्रस्तोत्र के अनुकूल होना चाहिये। सामगाओं के पवमान गाने पर होता अग्नि के आज्य स्तोत्र को कहता है। तो यह पवमान के अनुकूल कैसे हो जाता है ? इसका समाधान यह है कि “अग्नि पवमान” है। जैसे ऋषि ने कहा :— अग्निऋषिः पवमानः। (ऋ० ६।६६।२०) इसलिये अग्नि वाले मंत्रों से आज्य शस्त्र आरंभ होता है, वह पवमान स्तोत्र के अनुकूल हो जाता है। अब प्रश्न होता है कि जब नियम यह है कि स्तोत्र शस्त्र के अनुकूल हो तो सामगाओं का स्तोत्र गायत्री छन्द में और होता का आज्य-शस्त्र अनुष्टुभ् में क्यों होता है ? इसका उत्तर यह है कि योग तो ठीक ही है। आज्य शस्त्र के अनुष्टुभ् छन्द में सात मन्त्र हैं। पहले और पिछले मन्त्र को तीन बार बोलने से ११ हो जाते हैं। बारहवाँ याज्य मन्त्र विराट् में है। उसे भी गिन लेना चाहिये क्योंकि एक या दो अक्षरों के बढ़ने से छन्दो- भेद नहीं होता। यह बारह अनुष्टुभ् १६ गायत्री के बराबर
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri १५० [ दूसरी पञ्चिका हैं। अनुष्टुभ् छन्द का शस्त्र इस प्रकार स्तोत्र के गायत्री छन्दों के बराबर हो जाता है। होता के आज्य शस्त्र का याज्य मन्त्र यह है। अग्न इन्द्रश्च दाशुषो दुरोणे सुता॒वतो य॒ज्ञमिहोप॑ यातम्। अमर्धन्ता सोम॑ पेयाय देवा ॥ (ऋ० ३।२५।४) (यहाँ 'इन्द्राग्नी' के बजाय अग्नि-इन्द्र कहा है। इसका कारण यह है कि) इन्होंने इन्द्राग्नी के रूप में विजय नहीं पाई किन्तु "अग्नीन्द्रौ" के रूप में। अग्नीन्द्र का याज्य वह विजय पाने के लिये पढ़ता है। यह मन्त्र विराट् छन्द में है जो तेतीस अक्षर का होता है। देव तेतीस हैं, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य ; एक प्रजापति और एक वषट्कार । इस प्रकार वह पहले ही शस्त्र में एक एक अक्षर एक एक देवता के लिये कह देता है। अक्षरों के क्रम से ही देव सोमपान करते हैं। इस प्रकार देवपात्र से देवता तृप्त हो जाते हैं। अब प्रश्न यह है कि जब याज्य मन्त्र शस्त्र के अनुकूल होना चाहिये तो आज्य शस्त्र केवल अग्नि का है, फिर याज्य मन्त्र अग्नीन्द्र का क्यों है ? इसका उत्तर यह है कि अग्नि-इन्द्र याज्य वही है जो इन्द्राग्नी याज्य है। यह इन्द्राग्नी का शस्त्र है जैसा ग्रह और तूष्णींशंस से प्रकट होता है। अध्वर्यु नीचे के मन्त्र से ग्रह को लेता है :– इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्। अस्य पातं धियेषि॒ता ॥ (ऋ० ३।१२।१) "हे इन्द्र और अग्नि, स्तुतियों के साथ बादल के समान पवित्र सोम के पास आओ। और बुद्धि से प्रेरित होकर इसको पियो"। होता की तूष्णीं-शंस या "चुपचाप प्रार्थना" यह है:–
पांचवाँ अध्याय ] १५१ “भूरग्निज्योतिरग्निर्इन्द्रो ज्योतिर्भुवो ज्योतिरिन्द्रः सूर्योज्योतिर्ज्योतिः स्वः सूर्यः” । (५) ३८—होता का जप रेत या वीर्य है । वीर्य सिंचन चुपचाप होता है । इसी प्रकार जप भी चुपचाप होता है । यह भी वीर्य- सिंचन ही है । 'आहाव' से पहले जप होता है । आहाव से पीछे जो कुछ होता है वह शस्त्र है । होता 'आहाव' को अध्वर्यु के प्रति उस समय कहता है जब अध्वर्यु चारों पैरों पर ( पशु के समान ) भूमि पर पड़ा होता है । और उसका मुँह दूसरो ओर होता है । चौपाये मुँह को फेर कर वीर्यसिंचन करते हैं । अब अध्वर्यु दो पैरों पर खड़ा हो जाता है और सामने मुँह कर लेता है क्योंकि मनुष्य (दुपाये) सामने मुँह करके वीर्य सिंचन करते हैं । जप के भिन्न-भिन्न भाग यह हैं :— “पिता मातरिश्वा” प्राण पिता है । प्राण मातरिश्वा है । प्राण वीर्य है । इन शब्दों को कहकर मानो वीर्यसिंचन करता है । “अच्छिद्रा पदाद्या” वीर्य छिद्र-रहित है । इस लिये इस छिद्ररहित या पूर्ण का जन्म होता है । “अच्छिद्रोक्थाकवयः शंसन” जो पढ़े हुये हैं वह कवि हैं । उन्होंने इस पूर्ण वीर्य को उत्पन्न किया । अब कहता है :— “सोमो विश्वविन् नीथानिनेषदू बृहस्पतिरुक्था मदानि शंसिषदू ।” बृहस्पति ब्राह्मण है । स्तुति किया गया सोम क्षत्रिय है । “नीथानि” और “उक्था मदानि” शस्त्र हैं । दैवी ब्राह्मण और