ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri दूसरी पञ्चिका CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
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पहला अध्याय १—यज्ञ द्वारा ही देव ऊँचे स्वर्ग लोक को गये। उनको भय हुआ कि हमारे इस ( यज्ञ ' को देखकर मनुष्य और ऋषि लोग पीछें से जिज्ञासा करेंगे। उन्होंने यूप ( यज्ञ शाला का खंभा जिसमें पशु बांधते हैं ) द्वारा उनको रोक दिया। ( आयोपयन् ) इसीलिये इसका नाम यूप पड़ा। ( यूप का अर्थ हुआ वह जिसके द्वारा रोका जाय )। उन ( देवों ) ने स्वर्ग जाते हुये यूप को भूमि में इस प्रकार गाड़ा कि सिरा नीचे को रहे। तब मनुष्य और ऋषि भी देवों के यज्ञ करने के स्थान पर आकर सोचने लगे कि हमको भी यज्ञ के विषय में कुछ ज्ञान हो जाय। उन्होंने केवल यूप को पृथ्वी में नीचे की ओर सिरा किये हुये गढ़ा पाया। उन्होंने जाना कि इसी से देवों ने यज्ञ के रहस्य को छिपा दिया। उन्होंने यूप को उखाड़ दिया और उसका सिरा ऊपर को कर दिया। इससे उन्होंने यज्ञ को मालूम किया और स्वर्ग को देख लिया। यही प्रयोजन है कि यूप का सिरा ऊपर को करके गाड़ते हैं कि यज्ञ को जानें और स्वर्ग को देखें। ( ८९ )
९० [ दूसरी पञ्चिका यह यूप वज्र है। इसमें आठ धारें होनी चाहियें। वज्र में आठ धारें होती हैं। जब कोई वज्र को अपने शत्रु या वैरी पर मारता है वह मर जाता है। जो वध करने के योग्य है उसका वध करने के लिये। यूप वज्र है जो शत्रु के मारने के लिये खड़ा किया जाता है। इसलिये जो यजमान से द्वेष करता है वह यह देखकर कि यह अमुक पुरुष का यूप है हानि को प्राप्त हो जाता है। स्वर्ग की कामना वाला खदिर का यूप बनावे। क्योंकि खदिर का यूप बना कर ही देवों ने स्वर्ग को प्राप्त किया। इसी प्रकार खदिर का यूप बना कर ही यजमान स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है। जो अन्न और पुष्टि की इच्छा करे वह बिल्व का यूप बनावे। बिल्व पर हर साल फल आता है। वह अन्न आदि का रूप है। वह मूल से शाखा तक बढ़ता है और पुष्टि का द्योतक है। जो इस रहस्य को समझ कर बिल्व का यूप बनाता है वह अपने बच्चों और पशुओं को पुष्ट करता है। बिल्व के यूप के विषय में यह बात है कि बिल्व ज्योति है। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने जाति वालों में ज्योति होता है श्रेष्ठ होता है। जिस को तेज और ब्रह्मज्ञान की इच्छा हो वह पलाश का यूप बनावे। वनस्पतियों में पलाश तेज और ब्रह्मवर्चस है। जो इस रहस्य को समझ कर पलाश का यूप बनाता है वह तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी होता है। पलाश के यूप के विषय में यह है कि पलाश सब वनस्पतियों की योनि है। इसीलिये पलाश वृक्ष के पलाशों अर्थात् पत्तों का अनुकरण करके ही हर वृक्ष के पत्तों को पलाश कहते हैं। जो
प्रथम अध्याय ] ९१ इस रहस्य को समझता है वह सब वृक्षों के सम्बन्ध में जो कामनायें होती हैं उनको पूरा कर लेता है । (१) २-अध्वर्यु होता से कहता है, "हम यूप को चुपड़ते हैं । उपयुक्त मंत्र बोलिये ।" होता पढ़ता है :- अञ्जन्ति त्वामध्वरे देवयन्तो वनस्पते मधुना दैव्येन । यदूर्ध्वस्तिष्ठा द्रविणेह धत्ताद् यद्वा क्षयो मातुरस्या उपस्थे । ( ऋ० ३।८।१ ) ( हे वनस्पति ! तुझ को ऋत्विज लोग यज्ञ में दिव्य मधु से चुपड़ते हैं । जो तू सीधा खड़ा है या इस माता ( भूमि ) की गोद में पड़ा है हमको धन दे ) । यह जो घी है वही दिव्य मधु है । अगले टुकड़े से यह तात्पर्य है कि चाहे खड़ा हो चाहे पड़ा हो मुझे धन दे । अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :- उच्छ्र यस्व वनस्पते वर्ष्मन् पृथिव्या अधि । सुमिती मीयमानो वर्चो धा यज्ञ वाहसे । ( ऋ० ३।८।३ ) ( हे वनस्पति पृथिवी के ऊपर उठ । तू जो अच्छी तरह पड़ा हुआ है। यज्ञ के वाहक या ले जाने वाले के लिये तेज धारण करा ) । यह मंत्र यूप के उठाने के लिये रूप-समृद्ध है । जिस में रूपसमृद्धता होती है वही सफल होता है । 'वर्ष्मन् पृथिव्या अधि' से तात्पर्य है उस स्थान का जहाँ यूप गाड़ते हैं । "सुमितीमीयमानो वर्चोधा यज्ञ वाहसे" से तात्पर्य है कि यूप से आशीर्वाद चाहता है । अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :- समिद्धस्य श्रयमाणः पुरस्ताद् ब्रह्म वन्वानो अजरं सुवीरम् । आरे अस्मदमतिं बाधमान उच्छ्रयस्व महते सौभगाय । ( ऋ० ३।८।२ ) ( प्रज्वलित अग्नि के सामने खड़ा हुआ तू नाश न होने वाले
९२ [ दूसरी पञ्चिका और वीरता युक्त ब्रह्म तेज को देता है हमारे शत्रुओं को रोकता हुआ हमारे बड़े भाग्य के लिये खड़ा हो ) 'समिद्धस्य श्रयमाणः पुरस्तात्' का अर्थ है प्रज्वलित हुई अग्नि के सामने । 'ब्रह्म चन्वानो अजरं सुवीर्यम्' से आशीर्वाद से तात्पर्य है 'आरे अस्मदमतिं बाधमानः' का अर्थ है कि 'अमति' अर्थात् पाप या भूख है। इस से वह यज्ञ और यजमान को भूख से और पाप से मुक्त कर देता है । 'उच्छ्रयस्व' ( खड़ा हो ) आशीर्वाद है । अब होता नीचे के मंत्र को पढ़ता है:- ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता । ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे । ( ऋ० १।३६ १३ ) ( सीधा खड़ा हो ! सविता के समान ! हमारी रक्षा के लिये । खड़ा होकर अन्न दे । जब हम तुझ को बुलाते हैं उस समय जब कि ऋत्विज तुझ को चुपड़ते हैं ) 'देवो न सविता' में 'न' का अर्थ है 'इव' या 'समान' । 'ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता' का अर्थ है अन्न का बांटने वाला । 'अंजिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे' का तात्पर्य है छन्दों से जिनके द्वारा देवों को बुलाते हैं । जब कई यज्ञों में देवों को बुलाते हैं कि 'मेरे यज्ञ में आइये' । 'मेरे यज्ञ में आइये' तो देवता उसके यज्ञ में जाते हैं जहाँ इस रहस्य को समझने वाला होता मंत्र पढ़ कर आवाहन करता है । अब नीचे का मंत्र पढ़ता है :- ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह । कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः । ( ऋ० १।३६।१४ ) ( सीधे खड़ा होकर पाप से बचा । अपनी आग से सब मांसाहारियों के जला । हमको सीधा कर कि हम खड़े हो सकें और जी सकें । हमार हवि को देवों तक ले जा ) । 'अत्रिणं' यां खाने वाले राक्षस हैं । इसके द्वारा यूप से पापी राक्षसों को मरवाता है । 'चरथाय' का अर्थ है 'चरणाय' ( चलने
प्रथम अध्याय ] ९३ के लिये ) । ‘जीवसे’ कहकर वह यजमान को छुड़ाता है चाहे उसे ( मृत्यु ने ) पकड़ ही क्यों न लिया हो। और उसे साल भर के लिये सुरक्षित कर देता है ‘विदा देवेषु नो दुवः’ से आशीर्वाद का तात्पर्य है ( अपने कर्मों की सफलता के लिये प्रार्थना करता है ) । होता अब नीचे का मन्त्र पढ़ता है :— जातो जायते सुदिनत्वे अह्नां समर्य आ विदथे वर्धमानः। पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा देव्या विप्र उदि यर्त्ति वाचम् ॥ ( ऋ० ३।८।५ ) ( उत्पन्न होकर अपनी युवावस्था में मनुष्य के हित के लिये बढ़ता है। धीर लोग इसको बुद्धिमत्ता से अलंकृत करते हैं। ऋत्विक ब्राह्मण समूह देव विषयक वाणी का उच्चारण करता है। इस मन्त्र के पहले भाग को पढ़ कर वह ( धूप को ) बढ़ाते हैं। “पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा” पढ़ कर उसे पवित्र या अलंकृत करते हैं। ‘देव या विप्र उदियीर्त वाचम्’ से धूप को देवों के प्रति निवेदन करते हैं। अर्थात् उसका देवों को परिचय कराते हैं। होता नीचे के मन्त्र के समाप्त करता है :— युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥ ( ऋ० ३।८।४ ) ( जवान वस्त्रों से अलंकृत आया है। वह उत्पन्न हुआ श्रेष्ठ है। बुद्धिमान विद्वान् लोग अपने उत्तम विचारों को प्रकट करके उसे बढ़ाते हैं ) । “युवा सुवासा” का अर्थ है प्राण। यह शरीरों से घिरा हुआ है। ‘श्रेयान् भवति जायमानः” ‘यूप’ से तात्पर्य है अर्थात् इस मंत्र को पढ़ने से यूप अधिक सुन्दर प्रतीत होता है। ‘कवयः’ का अर्थ है वह मंत्र वाले विद्वान् जो ‘यूप’ को उन्नत करते हैं।
९४ [दूसरी पञ्चिका इन सात रूप-समृद्धता युक्त मंत्रों के पढ़ने से यज्ञ सफल हो जाता है। मंत्रों की रूप-समृद्धता यह है कि उन मंत्रों में उसी क्रिया का वर्णन हो जिसके करने में वह मंत्र पढ़े जाते हैं। इसी से यज्ञ की सफलता है। इनमें से पहले और पिछले को तीन तीन बार पढ़ते हैं। इस प्रकार यह ग्यारह हो जाते हैं। त्रिष्टुभ् छन्द के प्रत्येक पाद् में ग्यारह ग्यारह अक्षर होते हैं। त्रिष्टुभ् इन्द्र का वज्र है। जो इस रहस्य को समझता है वह इन इन्द्र-सम्बन्धी ऋचाओं द्वारा वृद्धि पाता है। पहले और पिछले मंत्र को तीन तीन बार पढ़ने से मानो वह यज्ञ के दोनों सिरों में गांठ दे देता है। जिससे यज्ञ बँधा रहे और खिसक न जाय। (२) ३—अब प्रश्न उठता है कि यूप अग्नि के सन्मुख खड़ा रहे या अग्नि में डाल दिया जाय। इसका उत्तर यह है कि यदि पशु की कामना हो तो खड़ा रहे। एक बार देवों को खाना प्राप्त कराने के लिये पशु खड़े नहीं रहे। वे भाग कर देवों से कहते रहे कि "तुम हमको न पाओगे। तुम हमको न पाओगे।" तब देवों ने इस यूप-वज्र को देखा और गाड़ दिया। इस प्रकार डर कर वह लौट आये। यही कारण है कि यूप की ओर मुख करके ही पशु आज भी खड़े होते हैं। इस प्रकार पशु देवों को भोजन प्राप्त कराने के लिये खड़े रहे। इसी भाँति जो इस रहस्य को समझता है और यूप को खड़ा रखता है उसके पशु भी उसको खाना प्राप्त कराने के लिये खड़े रहते हैं। जिसको स्वर्ग की कामना हो उस यजमान के यूप को (आग में) छोड़ दे ! पहले जमाने के यजमान 'यूप' को अग्नि में छोड़ देते थे। यूप यजमान है, प्रस्तर अर्थात् दर्भ यजमान हैं। अग्नि देवतों की योनि है। इन आहुतियों द्वारा यजमान देवों की
प्रथम अध्याय ९५ योनि से संयुक्त होकर स्वर्ण का शरीर धारण करके स्वर्ग को जाता है । जो पिछले जमाने के यजमान थे वह कहते थे कि स्वरू यूप का टुकड़ा है । ( इस लिये यूप का प्रतिनिधि है ) । इस लिये उसी को अग्नि में डाल ते, इससे दोनों कामनायें पूरी हो जायंगी अर्थात् यूप को अग्नि में छोड़ने से जो बात सिद्ध होती है वह भी और यूप को खड़ा रखने से जो बात सिद्ध होती है वह भी । जो पुरुष दीक्षित होता है वह अपने को सब-देवताओं को प्राप्त कराता है । अग्नि सब देवता हैं । सोम सब देवता हैं । जब वह अग्नि और सोम दोनों के लिये पशु को अर्पण करता है तो यजमान सब देवताओं के लिये अपने को अर्पण करने से छुटकारा पा जाता है । कुछ लोग कहते हैं कि अग्नि और सोम के पशु के दो रूप होने चाहियें क्योंकि यह दो देवताओं का है । परन्तु इसकी आवश्यकता नहीं । यज्ञ का पशु मोटा होना चाहिये । क्योंकि पशु मोटे होते हैं और यजमान पतला होता है । यदि पशु मोटा होगा तो यजमान भी उसके मेध से मोटा होगा । कहते हैं कि अग्नि-सोम के पशु को न खाये । जो अग्नि और सोम के पशु को खाता है वह मनुष्य के मांस को खाता है । क्योंकि इसी के द्वारा तो यजमान अपने को छुड़ाता है । परन्तु इस नियम का आदर करना ठीक नहीं । यह जो अग्नि-सोम का पशु है वह वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिये हवि है । क्योंकि अग्नि और सोम के द्वारा ही तो इन्द्र ने वृत्र को मारा था । उन दोनों ने कहा, "तुमने हमारे द्वारा ही तो वृत्र को मारा है इसलिये हम दोनों वर मांगते हैं ।" उसने कहा "मांगो" । इसलिये उन्होंने इन्द्र से यह वर मांग लिया । इस प्रकार वह उस पशु को लेते हैं जो सोम-इष्टि से पहले दिन मारा जाने वाला होता है ।
९६ [दूसरी पञ्चिका यही उन दोनों का स्थायी भाग है। इसलिए इसमें से लेना चाहिये और खाना चाहिये। (३) ४-(अब आप्रि मंत्रों का वर्णन आता है) अब होता आप्रि मंत्रों का पाठ करता है। आप्रि मंत्र तेज और ब्रह्मवर्चस के देने वाले हैं। इसलिये इन मंत्रों को पढ़ कर यह यजमान को तेज और ब्रह्मवर्चस दिलाता है। वह समिधाओं के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण ही समिधा है। प्राण ही इस सब जगत् को प्रज्वलित करते हैं। इस प्रकार वह प्राणों को संतुष्ट करता है और यजमाने में प्राण धारण कराता है। अब तनूनपात् के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण ही तनूनपात् है। क्योंकि वह तनू अर्थात् शरीर की 'पाति' अर्थात् रक्षा करता है। इस प्रकार वह प्राणों को संतुष्ट करता है और प्राण ही यजमान में धारण कराता है। अब नराशंस के लिये याज्य मंत्र बोलता है। 'नर' का अर्थ है संतान और 'शंस' का अर्थ है वाणी। इस प्रकार वह संतान और वाणी को सन्तुष्ट करता है और यजमान में सन्तान और वाणी धारण करता है। अब इला के लिये याज्य मंत्र बोलता है। इला का अर्थ है अन्न। इस प्रकार वह अन्न को संतुष्ट करता है और यजमान में अन्न धारण कराता है। अब वह बर्हि के लिये याज्य मंत्र बोलता है। बर्हि पशु हैं। इस प्रकार वह पशुओं को संतुष्ट करता है और यजमान में पशुओं को धारण कराता है। अब वह यज्ञशाला के द्वारों के लिये याज्य मंत्र बोलता है। द्वार वृष्टि हैं। इस प्रकार वह वृष्टि को संतुष्ट करता है और वृष्टि तथा अन्न आदि को यजमान में धारण कराता है।
प्रथम अध्याय ] ६७ वह उषा और रात्रि के लिए याज्य मंत्र बोलता है। उषा और रात्रि का अर्थ है दिन और रात। इस प्रकार वह रात और दिन को संतुष्ट करता है और यजमान में रात और दिन को धारण कराता है। दो दिव्य होताओं के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण और अपान दिव्य होता है। इस प्रकार वह प्राण और अपान को संतुष्ट करता है और प्राण और अपान को यजमान में धारण कराता है। तीन देवियों के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण, अपान, और व्यान तीन देवियाँ हैं। इस प्रकार वह इनको संतुष्ट करता है और प्राण, अपान और व्यान को यजमान में धारण कराता है। वह त्वष्टा के लिये याज्य मंत्र बोलता है। वाणी ही त्वष्टा है। वाणी मानो सब संसार को “ताष्ट्रि” या बनाती है। इस प्रकार वह वाणी को संतुष्ट करता है और यजमान में वाणी को धारण कराता है, वनस्पति के लिये याज्य मंत्र बोलता है। वनस्पति प्राण है। इस प्रकार वह प्राण को संतुष्ट करता है और यजमान में प्राण को धारण कराता है। स्वाहाकृतियों के लिये मंत्र बोलता है। स्वाहाकृतियां प्रतिष्ठा हैं। इस प्रकार वह यज्ञ को ठीक ठीक स्थापित करता है। ऐसे मंत्र बोलने चाहिये जिनका सिलसिला ऋषियों से मिल सके। इस प्रकार वह यजमान की ऋषियों के साथ बन्धुता स्थापित कराता है। (४) ५—(अग्नि को ले जाना) जब अग्नि (पशु के) चारों ओर ले जाते हैं तो अध्वर्यु कहता है “मंत्र बोल”। अब होता अग्नि देवता और गायत्री छन्द वाले नीचे के तीन मंत्र बोलता है :— ७
९८ [ दूसरी पञ्चिका ( १ ) अग्नि॒र्होता॑ नो अध्व॒रे वा॒जी सन् परिणीयते । दे॒वो दे॒वेषु॑ य॒ज्ञियः॑ ॥ ( ऋ० ४।१५।१ ) ( २ ) परि॑ त्रि॒विष्ट्य॑ध्व॒रं यात्य॒ग्नी र॑थी॒रिव॑ । आ दे॒वेषु॒ प्रयो॒ दध॑त् ॥ ( ऋ० ४।१५।२ ) ( ३ ) परि॒ वाज॑पतिः क॒विर॒ग्निर्ह॒व्यान्य॑क्रमीत् । दध॒द्रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ॥ ( ऋ० ४।१५।३ ) ( अग्नि होता हमारे यज्ञ में घोड़े के समान बन जाता है । यह देवों में यज्ञ सम्बन्धी देव है ॥१॥ रथी के समान अग्नि यज्ञ के चारों ओर तीन बार जाता है । वह देवों के लिये आहुति को धारण करता है ॥२॥ अन्न का पति, कवि (वस्तुओं का प्रकाश) अग्नि, हवियों की परिक्रमा करता है । वह यजमान को धन देता है ॥३॥ ) इस लाई हुई अग्नि को इस प्रकार इसी के देवता और उसी के छन्दों द्वारा बढ़ाता है । "वाजी सन् परिणीयते" का अर्थ है कि घोड़े के समान उसको चारों ओर फिराते हैं । "परि त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव" का अर्थ है कि यह अग्नि रथी के समान यज्ञ के चारों ओर फिरता है । "परिवाजपतिः कविः" का अर्थ है कि वह वाज अर्थात् अन्नों का पति है । अब अध्वर्यु कहता है, "हे होता, देवों के हव्य के लिये आदेश कर" । अब मैत्रावरुण आदेश करता है, "अग्नि की विजय हो । अग्नि हव्य का खाना दे ।" यहाँ प्रश्न होता है कि जब अध्वर्यु ने आदेश देने के लिये होता को कहा तो मैत्रावरुण ने क्यों आदेश दिया ? इसका उत्तर यह है कि मैत्रावरुण तो यज्ञ का मन है । होता यज्ञ की वाणी है । मन से ही प्रेरित होकर वाणी बोलती है । जो बिना मन के बोलता है, वह आसुरी वाणी है और देव उसको ग्रहण नहीं
प्रथम अध्याय ] ९९ करले। जब मैत्रावरुण आदेश देता है तो वह मन द्वारा वाणी को प्रेरित करता है। मन द्वारा वाणी को प्रेरित करके वह हव्य को देवों के ग्रहण के योग्य करता है । (५) ६-अब होता कहता है, "हे शांति करने वाले देवो और शांति करने वाले मनुष्यो ! आरंभ करो।" इसका तात्पर्य यह है कि जो देवों में शांति करने वाले हैं और जो मनुष्यों में शांति करने वाले हैं उन सब को आदेश करता है। "यज्ञ के स्वामी अर्थात् यजमान और उसकी पत्नी के लिये यज्ञ की सफलता की प्रार्थना करते हुये यज्ञ के योग्य सुन्दर द्वार बनाओ।" पशु मेध है। और यजमान मेधपति है। इस प्रकार होता यजमान को उसी के मेध से बढ़ाता है। इसीलिये वह ठीक कहते हैं कि जिस देवता के लिये पशु लाया जाता है (आलभ्यते) वही मेध-पति हैं। यदि एक देवता के लिये पशु हो तो कहना चाहिये 'मेधपतये' (एकवचन चतुर्थी)। यदि दो देवतों के लिये, तो "मेधपतिभ्यां" (द्विवचन चतुर्थी)। यदि बहुत से देवतों के लिये, तो "मेधपतिभ्यः" (बहुवचन चतुर्थी)। यही स्थिति है। "इसके लिये आग लाओ।" जब पशु को ले जा रहे थे तो उसे सामने मौत दिखाई दी। उसने देवों के पीछे जाना न चाहा तब देवों ने उससे कहा, "तू चला आ ! हम तुझे स्वर्ग को ले जायंगे।" उसने कहा, "अच्छा तुम में से एक आगे-आगे चलो।" उन्होंने कहा, "अच्छा" और अग्नि उसके आगे-आगे चला। और वह अग्नि के पीछे चला। इसीलिये कहते हैं कि प्रत्येक पशु अग्नि का है क्योंकि वह अग्नि का अनुसरण करता है। इसीलिये अग्नि को आगे-आगे ले जाते हैं। "दर्भ बिछा दो।" पशु ओषधियों पर जीता है। इस प्रकार वह पशु को सब आत्मायुक्त करता है (अर्थात् घास पशु का आत्मा है)।
१०० [ दूसरी पत्रिका "माँ, बाप, भाई, बहिन, मित्र और साथी इस पशु को दे दें।" (ऐसा कहकर) वह पशु को लेते हैं मानों माँ बाप ने उसे हवाले कर दिया। 'इसके पैर उत्तर को करो। इसकी आँखें सूर्य की ओर करो। इसके प्राण वायु के लिये छोड़ो। जीवन को अन्तरिक्ष के लिये, कानों को दिशाओं के लिये, शरीर को पृथिवी के लिये।" इस प्रकार वह उन-उन शरीर के भागों को उन-उन लोकों के हवाले करता है। "पूरा चमड़ा उतार लो। नाभि काटने से पूर्व वपा अर्थात् अंतड़ियों (Omentum) को काट लो। इसको सांस को (मुँह बन्द करके) भीतर ही रोक दो।" इस प्रकार होता पशु को प्राण धारण कराता है। 'इसकी छाती को श्येन (गरुड) की आकृति का कर दो। बाहुओं को प्रशस (hatchets) की आकृति का। भुजाओं के अगले भागों को भालों के समान, कन्धों को दो कछुओं की आकृति का, कमर को न तोड़ो, जांघों को ढालों के समान, दोनों घुटनों को स्रेकवृक्ष के पत्तों के समान। इसकी छब्बीस पसलियों को क्रम- पूर्वक निकाल लो। इसके अंग अंग को पूरा रक्खो।" इस प्रकार यह शरीर के अङ्गों को लाभ पहुँचाता है। "इसके मल मूत्र के छिपाने के लिये भूमि में गड्ढा खोदो।" मलमूत्र 'ओषध' अर्थात् वनस्पति का होता है। पृथिवी वनस्पति की प्रतिष्ठा है। इस प्रकार होता इस मल मूत्र को उसी की ठीक जगह में रख देता है। (६) ७—"रुधिर राक्षसों को दे दो।" देवों ने राक्षसों को यज्ञ की हवियों से वंचित कर दिया और उन को भूसी तथा छोटे दाने दिये। और यज्ञ से निकाल कर उनको रुधिर अर्पण किया। इसलिये होता कहता है, "रुधिर राक्षसों को दे दो।" राक्षसों को रुधिर देकर वह उनको यज्ञ के अन्य भाग से वंचित
प्रथम अध्याय ] १०१ कर देता है। इस विषय में कुछ लोगों का कहना है कि यज्ञ में राक्षसों का नाम भी न लेना चाहिये, कोई भी राक्षस क्यों न हो। यज्ञ राक्षसों से सर्वथा मुक्त होना चाहिये। इस पर कुछ लोगों का उत्तर है कि उनका नाम लेना चाहिये। जो जिसका अधिकारी है उसको उस भाग से जो वंचित कर देता है वह दण्डनीय होता है; यदि वह नहीं तो उसका पुत्र, यदि पुत्र नहीं तो उसका पोता। परन्तु यदि होता (राक्षसों का) नाम ले तो धीरे से ले। क्योंकि जो धीमी आवाज है वह भी छिपी हुई है और जो राक्षस हैं वह भी छिपे हुये हैं। यदि जोर से नाम लेगा तो उसकी आवाज राक्षसों की सी हो जायगी। जो कोई क्रोध में बोलता है या उन्मत्त होकर बोलता है उसकी राक्षसी बोली हो जाती है। जो इस रहस्य को समझता है वह न तो स्वयं क्रुद्ध होगा, न उसकी सन्तान में कोई ऐसा होगा। "उल्लू के समान आकृति वाली अंतड़ियों को न काटो ! हे वध करने वालो (शमितारः), और न तुम्हारे पुत्रों या सन्तान में कोई ऐसा हो जो इनको काटे।" ऐसा कह कर वह इन अंतड़ियों को वध करने वाले देवतों और वध करने वाले मनुष्यों को दे देता है। अब कहता है। "हे अध्रिगु ! मारो, अच्छी तरह मारो। हे अध्रिगु मारो।" अब तीन बार कहे "अपाप" (अर्थात् पाप न लगे ! अप ! अप ! दूर ! दूर !) देवों में अध्रिगु वह है जो 'शमिता' अर्थात् पशु को चुप करता है। और अपाप वह है जो उसे नीचे डालता है। इन शब्दों को कह कर वह पशु को उनके हवाले कर देता है जो उसे चुप करते हैं या जो इसका वध करते हैं। होता तब कहता है कि "हे वध करने वालो (शमितारः), जो कुछ भी सुकृत
१०२ [ दूसरी पञ्चिका अर्थात् पुण्यकर्म है वह इसमें रहे, और दुष्कृत है वह अन्यत्र चला जाय ।” इस वाचा से (अर्थात् इन शब्दों से) होता (पशु वध का) आदेश देता है, क्योंकि जब अग्नि देवताओं का होता था, तब उसने भी इन्हीं शब्दों से (पशु के) वध का आदेश दिया था । इन शब्दों से ही होता (समस्त दुष्परिणामों को) उनसे अलग कर देता है जो पशु का दम घोंटते हैं और जो उसका वध करते हैं और जो कई प्रकार से नियमों का उल्लंघन करते हैं, जैसे एक टुकड़े को अति शीघ्र काट डालना और दूसरे को अति विलम्ब से, अथवा एक टुकड़े को बहुत बड़ा काट डालना, और दूसरे को बहुत छोटा । इस प्रकार सुख प्राप्त करता हुआ होता अपने को (पापों से) मुक्त कर लेता है, और सर्वायु अर्थात् पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, पूर्णायु प्राप्ति के लिए (वह समर्थ होता है) । जो इस (रहस्य को) जानता है, वह पूर्णायु प्राप्त करता है । ८—देवताओं ने (यज्ञ के लिये) पुरुष पशु को प्राप्त किया (या मारा) । पर उसका वह अंश जो मेध बनने या आहुति के योग्य था, उसमें से निकल गया और घोड़े में प्रविष्ट हो गया । और तब घोड़ा मेध्य पशु बन गया । तब देवताओं ने पुरुष को निकाल दिया, क्योंकि उसमें से वह भाग निकल चुका था, जो मेध्य था, और जिसके निकल जाने पर वह “किंपुरुष” अर्थात् सर्वथा अयोग्य हो चुका था । देवताओं ने तब घोड़े को मारा, पर मेध उसमें से निकल कर गौ (गाय या बैल) के शरीर में पहुँच गया, और तब गौ मेध्य बन गई । देवताओं ने अश्व को निकाल दिया क्योंकि अश्व के शरीर में से वह अंश निकल गया था जिसके कारण
प्रथम अध्याय ] १०३ वह मेध्य था और जिसके निकल जाने पर वह "गौरमृग" बन गया था। देवताओं ने तब गौ को मारा, पर गौ में से भी मेध निकल गया, और भेड़ के शरीर में प्रविष्ट हुआ, और तब भेड़ मेध्य बन गयी। जिस गाय में से मेध निकल चुका था उसको देवों ने निकाल दिया। और वह नील गाय बन गई। उन्होंने भेड़ को मार डाला। मरी हुई भेड़ में से मेध निकल कर बकरी में प्रविष्ट हुआ और बकरी मेध्य हो गई। जिस भेड़ में से मेध निकल चुका था उसे देवों ने निकाल दिया और वह ऊँट बन गई। बकरी में मेध बहुत दिनों तक रहा। इसलिये सब पशुओं में बकरी सब से अधिक बलि के योग्य है। उन्होंने बकरी को मारा। उस मरी हुई बकरी से मेध निकल कर पृथिवी में घुस गया। इसलिये पृथिवी बलि के योग्य हो गई। मरी हुई बकरी से जो मेध निकल गया तो देवों ने उसे निकाल दिया और वह शरभ बन गया। जिन पशुओं में से मेध निकल चुका वह अमेध्य हो गये। इसलिये उनका मांस न खाना चाहिये। जब मेध पृथिवी में चला गया, तो देवों ने उसे घेर लिया। वह चांवल (व्रीहि) हो गया। जब पशु के वध के पश्चात् पुरोडाश को बांटते हैं तो यह इच्छा करते हैं कि हमारी पशु- इष्टि मेधयुक्त हो। जो इस रहस्य को समझता है उसका पशु मेधयुक्त हो जाता है और उसमें इष्टि का पूर्ण रूप आ जाता है। (८) ९-(पशु-इष्टि में) जो पुरोडाश होता है वही मारा जाने वाला पशु है। चावल की जो किंशारु अर्थात् भूसी है वही पशु के लोम के तुल्य है। जो तुषा है वह खाल के। जो छोटे-छोटे कण हैं वह रुधिर के, चावल की पिट्ठी मांस के। जो कसार या कठोर भाग है वह हड्डियों के। जो चावल के पुरोडाश से
१०४ [ दूसरी पत्रिका यज्ञ करता है वह मानो सब पशुओं के मांस से यज्ञ करता है। इसीलिये कहते हैं कि पुरोडाश का सत्र या यज्ञ करना चाहिये। अब वपा के लिये याज्य मंत्र पढ़ता है :— युवमेतानि दिवि रोचनान्यग्निश्च सोम संक्रतू अबद्धतम् । युवं सिन्धूँरभिशस्तेरवद्यादग्नीषोमावमुञ्चतं गृभीतान् ॥ (ऋ० १।६३।५) (हे अग्नि और सोम ! तुम दोनों ने संयुक्त परिश्रम से आकाश में इन प्रकाश-युक्त पदार्थों को रक्खा है। हे अग्नि और सोम ! तुम दोनों ने (राक्षसों द्वारा) ली हुई नदियों को अपवित्र और खराब होने से मुक्त किया है)। जो दीक्षित होता है वह सब देवताओं से ग्रहण किया हुआ होता है। इसलिये कहते हैं कि दीक्षित के घर में न खाना चाहिये। इस पर कुछ लोग कहते हैं कि वपा के लिये जो आहुति दी जाय उसमें से अवश्य खा लेना चाहिये क्योंकि मंत्र में है कि "अग्नीषोमावमुञ्चतं गृभीतान्" इससे वह यजमान को सब देवताओं से छुड़ा देता है। इसीलिये तो वह यजमान हो जाता है, देवताओं के लिये दीक्षित नहीं रहता। अब पुरोडाश के लिये याज्य मंत्र पढ़ता है :— अन्यं दिवो मातरिश्वा जभारामथ्नादन्यं परि श्येनो अद्रेः । अग्नीषोमा ब्रह्मणा वावृधानोरुं यज्ञाय चक्रथुरु लोकम् ॥ (ऋ० १।६३।६) (मातरिश्वा द्यौलोक से अन्य को लाया। श्येन पत्थर से दूसरे को लाया।) इन शब्दों से यह अभिप्राय है कि जैसे पत्थर से आग निकली इसी प्रकार मेघ भी निकल गया था उसे वापिस लाया गया।
ब्राह्मण में मनोता स्त्रीलिङ्ग है (मनोतायै) और ऋग्वेद में
. प्रथम अध्याय ] १०५ नीचे के मंत्र से स्विष्टकृत पुरोडाश की आहुति दी जाती है :- स्वदस्व हव्या समिषोदीदीह्यस्मद्रयवसं मिमीहि श्रवांसि । विश्वाँ अग्ने पृत्सु ताञ्जेषु शत्रूनहा विश्वा सुमना दीदिही नः ॥ ( ऋ० ३।५४।२२ ) इसके द्वारा होता यजमान को आहुति का फल प्राप्त करा देता है और अपने लिये अन्न और ऊर्ज (दूध आदि रस) प्राप्त कराता है । अब वह इला कहता है । पशु ही इला हैं । इस प्रकार वह पशुओं को बुलाता है और उनको यजमान की प्राप्ति करा देता है । (६) १०-अब अध्वर्यु होता से कहता है :-"मनोता* के लिये हवि देने के निमित्त जो भाग काटे जाते हैं उनके प्रसंग का मंत्र पढ़ो । वह ऋग्वेद मंडल ६ का पहला सूक्त पढ़ता है जिसमें तेरह मंत्र हैं :--- त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोतास्या धियो अभवो दस्म होता । त्वं सीं वृषन्न- कृणोर्दुष्टरीतु सहो विश्वस्मै सहसे सहध्यै ॥ (ऋ० ६।१।१) (हे अग्नि ! तू पहला मनोता अर्थात् विचारों का बुनने वाला, Weaver of Thoughts, है । हे दस्म अर्थात् दर्शनीय अग्नि ! तू इस बुद्धि का होता अर्थात् बुलाने वाला है । हे वृषन् अर्थात् बलवान अग्नि ! तू ऐसा है जिसको कोई सता नहीं सकता । तूने सब बलवान शत्रुओं को पराजित करने के लिये बल धारण किया है) । अधा होता न्यसीदो यजीयानिलस्पदे इषयन्नीड्यः सन् । तं त्वा नरः प्रथमं देवयन्तो महो राये चितयन्तो अनुग्मन् ॥ . (ऋ० ६।१।२) *ब्राह्मण में मनोता स्त्रीलिङ्ग है (मनोतायै) और ऋग्वेद में पुँल्लिंग (प्रथमो मनोता) !
२०६ [ दूसरी पञ्चिका ( हे अग्नि ! तू आज बड़ा यज्ञ करने वाला होता बनकर पृथ्वी या वेदी के ऊपर बैठा है, पूज्य होता हुआ और इषयन् अर्थात् हमारा भला चाहता हुआ । नेता लोग पहले तेरी इच्छा करते हुये ही और बड़े धन का विचार करते हुये तेरे ही पीछे चले ) । [ (सः अग्निः) वह अग्निः (सपर्य्यण्यः) पूज्य (प्रियः) प्रिय (विक्षु) लोगों में (होता) होता, (मन्द्रः) सुखकारी (यजीयान्) यज्ञ का अधिकारी होकर (निषसाद) स्थित है। (वयं) हम लोग ज्ञुबाधः) घुटने टिकाये हुये (नमसा) नमस्कार द्वारा (तं त्वा दीदिवांसं) उस तुझ प्रकाश युक्त को (दमे) घर में (उप आसदेम) प्राप्त होते हैं ] तं त्वा वयं सुध्यो नव्यमग्ने सुम्नायव ईमहे देवयन्तः । त्वं विशो अनयो दीद्यानो दिवो अग्ने बृहतारोचनेन ॥ ( ऋ० ६।१।७ ) [ (सुध्यः) बुद्धिमान् (सुम्नायव) सुख चाहने वाले (देवयन्तः) देवों की पूजा करने वाले (वयं) हम लोग (तं त्वा नव्यम् ) उस तुझ पूजनीय को (ईमहे) खोजते हैं। (त्वं) तू (दीद्यानः) प्रकाश- वान् (अग्ने) हे अग्नि, (बृहता रोचनेन) बहुत प्रकाश के साथ (विशः) लोगों को (दिवः) दिवा लोक में (अनयः) ले जाता है । ] विशां कविं विश्पतिं शश्वतीनां नितोशनं वृषभं चर्षणीनाम् । प्रेती- षणिमिषयन्तं पावकं राजन्तमग्निं यजतं रयीणाम् ॥ ( ऋ० ६।१।८ ) [ हम तुझ अग्नि की उपासना करते हैं जो तू (शश्वतीनां विशां) सदा रहने वाले लोगों का (कविं) उपदेश या प्रकाश करने वाला (विश्पतिं) स्वामी, (नितोशनं) शत्रुओं का घातक, (वृषभं) कामनों की वर्षा करने वाला, (चर्षणीनाम् ) स्तुति करने वालों का (प्रेतीषणिं) प्राप्ति के योग्य (इषयन्तं) अन्न देने वाला, (पावकं) पवित्र करने वाला (राजन्तं) प्रकाशयुक्त (रयीणाम) धनों द्वारा (यजतं) पूजनीय है । ]