ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
तीसरा अध्याय ] ४३९ उत्तर देता है “एवं तथा” । 'ओम्' दैवी है और 'तथा' मानुषी । इस दैवी और मानुषी उत्तर से अध्वर्यु राजा को पाप और दोष से मुक्त कर देता है । इस लिए जो कोई राजा विजयी हो (और उसने युद्ध में हत्या की हो) वह चाहे यज्ञ न करे शुनः- शेप की कथा सुने । ऐसा करने से पाप का लेशमात्र न रहेगा । वह आख्याता (होता) को हज़ार गायें दे और प्रतिगरिता (अध्वर्यु) को सौ । और हर एक को वे स्वर्ण के आसन भी । होता को इसके सिवाय खच्चरों सहित चाँदी का रथ । जिनको सन्तान की कामना हो वह भी शुनःशेप की कथा सुनें । उनको अवश्य ही सन्तान की प्राप्ति होगी । (६) ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ।
चौथा अध्याय १९. प्रजापति ने यज्ञ रचा। यज्ञ रचकर ब्रह्म और क्षत्र हुये। ब्रह्म और क्षत्र के पीछे दो प्रकार की प्रजा हुई, एक हुताद् (यज्ञ शेष को खाने वाले) और दूसरे अहुताद् (यज्ञ शेष को न खाने वाले)। ब्रह्म हुताद् हुये और क्षत्र अहुताद्। जो ब्राह्मण हुये वह हुताद् हुये और जो क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र हुये वह अहुताद्। यज्ञ उन दोनों से भागा। ब्रह्म और क्षत्र ने उनका अनुसरण किया। जो ब्रह्म के आयुध थे उनको ब्रह्म ने लिया और जो क्षत्र के आयुध थे उनको क्षत्र ने लिया। जो यज्ञ के आयुध हैं, वही ब्रह्म के आयुध हैं। क्षत्र के आयुध यह हैं—घोड़ा, रथ, कवच, बाण, धनु। क्षत्र ने यज्ञ का पीछा तो किया पर कर न सका, इसलिये लौट आया क्योंकि क्षत्र के आयुधों से डर कर यज्ञ का पीछा किया और पा लिया। ब्रह्म यज्ञ को मार्ग में घेर ( ४४० )
चौथा अध्याय ] ४४१ कर खड़ा हो गया। यज्ञ भी घिर कर खड़ा हो गया और ब्रह्म के हाथ में अपने ही आयुध देखकर ब्रह्म के पास लौट आया। चूँकि यज्ञ ब्रह्म के ही साथ रहा इसलिये ब्राह्मण ही यज्ञ करते हैं। क्षत्र ने अब ब्रह्म का पीछा किया और कहा, "मुझे इस यज्ञ को दे।" उसने कहा, "अच्छा, अपने आयुध रख दो और ब्रह्म के आयुध ले लो। ब्रह्म का रूप बनकर यज्ञ के पास जाओ।" क्षत्र ने कहा, "अच्छा" और क्षत्र के आयुध रख दिये और ब्रह्म के आयुध ले लिये और ब्रह्म का रूप धारण करके यज्ञ को प्राप्त कर लिया। इसलिये क्षत्रिय भी जब क्षत्रिय के आयुध रख देता है और ब्राह्मण के (यज्ञ संबन्धी) आयुध ग्रहण कर लेता है तो यज्ञ का अधिकारी हो जाता है। (१) २०—अब राजा से देव यज्ञ करने की याचना करनी चाहिये। इस पर प्रश्न होता है कि जिस ब्राह्मण, क्षत्रिय, या वैश्य की दीक्षा होने को होती है वह राजा से देव यज्ञ का स्थान माँगता है तो यदि राजा यज्ञ करे तो वह किससे स्थान की याचना करे। इसका उत्तर देते हैं कि "दिव्य क्षत्र से।" यह दिव्य क्षत्र आदित्य है क्योंकि आदित्य ही दिव्य क्षत्रों का अधिपति है। जिस दिन राजा को दीक्षा लेनी हो, उस दिन प्रातःकाल सूर्य की ओर मुख करके खड़ा हो और कहे :- इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम् ।-- (ऋ० १०।१७०।३) देव सवितर्देवयजनं मे देहि देव याज्यायां ।... इससे वह "देव यजन" अर्थात् यज्ञ के स्थान की याचना करता है। आदित्य उत्तर की ओर चलता जाता है और कहता है, "हाँ मैं देता हूँ।" इस प्रकार जिसको आदित्य स्थान दे देता है उसका कोई अहित नहीं कर सकता।
४४२ [ सातवीं पञ्चिका जिस राजा को इस प्रकार याचना करके यज्ञ का स्थान मिल गया और जिसने इन मंत्रों का पाठ कर लिया उसकी श्री दिन प्रति दिन बढ़ेगी। उसे प्रजाओं का ऐश्वर्य और आधिपत्य भी सदैव प्राप्त रहता है। ( २ ) २१—अब इष्टापूर्त-परिज्यानि आहुतियाँ देवें। यह आहु- तियाँ दीक्षा से पहले ही देनी चाहियें। यह चार घी की आहु- तियाँ आहवनीय में दी जाती हैं। यह कहकर :— इष्टापूर्तस्या परिज्यान्त्यै पुनर्न इन्द्रो मघवा ददातु । ब्रह्म पुनरिष्टं पूर्तं दात् स्वाहा । “इन्द्र मघवा इस आहुति का पूरा प्रति फल दे। ब्रह्म इस आहुति का पूरा फल दे।” अब पशु को बाँधने के लिये जो समिष्ट यजु पढ़ने चाहियें उनको पढ़ने के पश्चात् यह मंत्र पढ़े :— पुनर्नो अग्निर्जातवेदा ददातु । क्षत्रं पुनरिष्टं पूर्तं दात् स्वाहा । यह दोनों इष्टापूर्त-परिज्यानि आहुतियाँ हैं जिनको दीक्षा पाने वाले क्षत्रिय को देनी चाहियें। इसलिये यह दोनों आहुतियाँ देनी चाहियें। ( ३ ) २२—आराह्न के पुत्र सौजात का कहना है कि अजीत पुनर्वणथ की यह दो आहुतियाँ इच्छा पर निर्भर हैं। चाहे तो दे। जो इस कथन के अनुसार आहुतियाँ दे वह यह पढ़े :— ब्रह्म प्रपद्ये ब्रह्म मा क्षत्राद् गोपाय तु ब्रह्मणो स्वाहा । यह ऐसा ही है। जो यज्ञ को करता है वह ब्रह्मा को प्राप्त करता है 'यज्ञ ब्रह्म है। जो दीक्षा लेता है वह यज्ञ से फिर जन्मता है। जो ब्रह्मप्रपन्न है उसको क्षत्र नहीं छोड़ सकता । यह जो कहा “ब्रह्म मा क्षत्राद् गोपायतु” इसका अर्थ है कि ब्रह्म मुझे क्षत्र से
चौथा अध्याय ] ४४३ बचावे । 'ब्रह्मणे स्वाहा' कहकर वह ब्रह्म को प्रसन्न करता है । यह प्रसन्न हुआ ब्रह्म क्षत्र से रक्षा करता है । अब पशु के बाँधने का समिष्ट-यजु पढ़ने के पश्चात् पढ़ता है :— “क्षत्रं प्रपद्ये॒ क्षत्रं मा ब्रह्मणो गोपायतु । क्षत्राय॒ स्वाहा॑” । ऐसा ही होता भी है । जो क्षत्र को प्राप्त होता है वह राष्ट्र को प्राप्त होता है । क्षत्र ही राष्ट्र है । जो क्षत्र से प्रपन्न है उसे ब्रह्म नहीं सताता । 'क्षत्राय स्वाहा' से क्षत्र को प्रसन्न करता है । इस प्रकार प्रसन्न होकर वह ब्रह्म से रक्षा करता है । यह दोनों आहुतियाँ इष्टापूर्त्त की कमी से बचने के लिये हैं । इन दोनों आहुतियों को देना चाहिये । (४) २३—क्षत्र का देवता इन्द्र है और छन्द त्रिष्टुभ्, स्तोम वह है जिसमें १५ ऋचायें हैं । राज्य के हिसाब से क्षत्र सोम है, सम्बन्ध से राजा । जब मृग चर्म धारण करके दीक्षा का व्रत लेता है और ब्राह्मण उसके चारों ओर रहते हैं तब वह ब्राह्म- णता को प्राप्त हो जाता है । ऐसे दीक्षा पाने वाले से इन्द्र इन्द्रिय लेता है, त्रिष्टुभ् वीर्य, पंद्रह स्तोम आयु, सोम राज्य, पितर यश और कीर्ति । क्योंकि लोग कहते हैं, यह हम से अलग हो गया, यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म हो गया है । अब वह दीक्षा से पहले आहुतियों को देकर आहवनीय के पास आकर कहता है :— "मैं इन्द्र देवता को नहीं छोड़ता, न त्रिष्टुभ् छन्द को, न १५ स्तोमों को, न सोम राजा को, न पितरों के सम्बन्ध को । इन्द्र मुझ से इन्द्रिय न ले, त्रिष्टुभ् वीर्य न ले, १५ स्तोम आयु न लें, सोम राजू न ले, पितर यश और कीर्ति न लें । मैं इन्द्रिय, वीर्य, आयु, राज्य, यश और कीर्ति से युक्त होकर अग्नि देवता
ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति को ले लेते हैं, यह कह कर कि
४४४ [ सातवीं पञ्चिका को प्राप्त करता हूँ। मैं गायत्री छन्द, तीन स्तोम, सोम राजा, और ब्रह्म को प्राप्त होता हूँ, मैं ब्रह्म हो गया हूँ।” जब आहवनीय के पास खड़ा होकर वह यह आहुति देता है तो उसके क्षत्र होने पर भी इन्द्र उससे इन्द्रिय नहीं लेता, न त्रिष्टुभ् वीर्य, न १५ स्तोम आयु, न सोम राज्य, और न पितर यश और कीर्ति। (५) २४—क्षत्रिय अग्नि देवता से दीक्षित होता है, गायत्री छन्द से, त्रिवृत स्तोम से, ब्राह्मण के सम्बन्ध से। यज्ञ को समाप्त करने पर वह क्षत्रिय हो जाता है। अग्नि उससे तेज ले लेता है, गायत्री वीर्य ले लेती है, त्रिवृत स्तोम आयु और ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति को ले लेते हैं, यह कह कर कि अब यह हम से भिन्न हो गया, अब यह क्षत्रिय है। अब यह क्षत्र में परिवर्तित हो गया है। (तात्पर्य यह है कि यज्ञ के समय उसमें ब्रह्मत्व आ गया था। अब वह फिर क्षत्रिय हो गया)। पशु बंधन सम्बन्धी समिष्ट यजु की आहुतियां देने के पश्चात् वह आहवनीय के पास आवे और कहे, “मैं अग्नि देवता को छोड़कर नहीं जा रहा, न गायत्री छन्द को, न त्रिवृत स्तोम को। न ब्रह्म के सम्बन्ध को। मुझ से अग्नि तेज को न ले, गायत्री वीर्य को न ले, त्रिवृत स्तोम आयु को न ले, ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति को न लें। तेज, वीर्य, आयु, ब्रह्म, यश और कीर्ति के साथ मैं इन्द्र के पास आता हूँ। और त्रिष्टुभ् छन्द के पास और १५ स्तोम के पास, सोमराजा के पास, मैं क्षत्रत्व में प्रवेश करता हूँ। मैं क्षत्रिय हुआ जाता हूँ। “हे देवपितर, हे पितर देव, जो मैं हूँ उसी रूप में यज्ञ करता हूँ (अर्थात् क्षत्रिय के रूप में, न कि ब्राह्मण के रूप में)। जो
ब्राह्मण क्षत्रिय के पुरोहित की जगह पर है। पुरोहित क्षत्रिय
चौथा अध्याय ] ४४५ मैंने इष्टि की वह मेरी है। मैंने अपनी ही चीज़ की पूर्ति की है, जो तप किया है वह मेरा ही है। अपनी ही चीज़ की आहुति दी है। इस मेरी बात का उपद्रष्टा ( साक्षी ) अग्नि है। उपश्रोता ( सुनने वाला ) वायु है, और आदित्य अनुख्याता है। मैं जो हूँ सो ही हूँ'। जब वह ऐसा कहता है और क्षत्रिय बनकर आहवनीय में आहुति देता है उससे अग्नि तेज नहीं लेता, गायत्री वीर्य नहीं लेती, त्रिवृत् स्तोम आयु नहीं लेता, ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति नहीं लेते। (६) २५—यहाँ प्रश्न करते हैं कि जब ब्राह्मण की दीक्षा होने को होती है तो कहा जाता है कि "ब्राह्मण की दीक्षा होगी"। जब क्षत्रिय की दीक्षा हो तो क्या कहना चाहिये। इसका उत्तर यह है कि कहा तो यही जायगा कि "ब्राह्मण की दीक्षा होगी" लेकिन क्षत्रिय के पुरोहित के ऋषि का नाम लें। ऐसा ही होता है। चूँकि उसने अपने ( क्षत्रियत्व के ) आयुध छोड़ कर ब्राह्मण के आयुध ग्रहण किये और ब्राह्मण हो कर यज्ञ किया इसलिये क्षत्रिय के पुरोहित के ऋषि की दीक्षा का नाम लिया जाता है और उसी का प्रवर कहा जाता है। (७) २६—अब यजमान-भाग का प्रश्न है कि क्षत्रिय खावे या न खावे। अगर खावे तो पापी होवे क्योंकि वह अहुताद है। अगर न खावे तो यज्ञ से अलग हो जाय क्योंकि यजमान- भाग यह है। इसको ब्राह्मण पुरोहित को देना चाहिये। क्योंकि ब्राह्मण क्षत्रिय के पुरोहित की जगह पर है। पुरोहित क्षत्रिय का आधा है, वह अपने मुँह में नहीं खाता तो भी पुरोहित का खाया हुआ उसी के खाये के बराबर हो जाता है। यह जो ब्रह्म है वह साक्षात् यज्ञ है। सब यज्ञ ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित है। यजमान यज्ञ में ही प्रतिष्ठित है। वह यज्ञ में यज्ञ को डालते
४४६ [ सातवीं पञ्चिका हैं जैसे जल में जल या अग्नि में अग्नि डाली जाती है। इसमें न तो अत्याचार है न यजमान को कोई हानि पहुँचती है। इस- लिये यह यजमान का भाग ब्राह्मण को देना चाहिये। कुछ ऋत्विज इसकी अग्नि में यह पढ़ कर आहुति दे- देते हैं। प्रजापते र्विभान्नाम लोकस्तस्मिंस्त्वादधामि सह यजमानेन स्वाहा। परन्तु ऐसा न करना चाहिये। यजमान भाग यजमान ही है। इसलिये जो यजमान भाग को अग्नि में छोड़ता है वह यजमान को अग्नि में छोड़ता है। (जिसको ऐसा करते देखे) उससे कहे "तूने यजमान को अग्नि में जला दिया। उसके प्राण अग्नि जला देगी और वह मर जायगा।" सदा ऐसा ही होता है। इसलिये ऐसा न करना चाहिये।(८) ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ।
पाँचवाँ अध्याय २७-सुपद्मा के लड़के विश्वतर ने श्यापर्णों को यज्ञ के अधिकार से वंचित कर दिया। उन श्यापर्णों ने यह सुना तो उसके यज्ञ में जाकर वेदी के भीतर बैठ गये। उनको देखकर विश्वन्तर ने कहा, “यह पाप कर्म करने वाले यहाँ बैठे हैं। यह दूसरे का नाम डुबोते हैं। इनको निकाल दो और वेदी के भीतर मत बैठने दो।” नौकरों ने सुन कर उनको निकाल दिया।' वे उठकर चिल्लाने लगे, “परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने जब कश्यपों के बिना यज्ञ करना आरंभ किया तो कश्यपों में से असितमृग लोगों ने भूतवीरों को (जो कश्यपों के स्थान में यज्ञ के लिये बुलाये गये थे) यज्ञ से निकाल दिया। यह असितमृग लोग वीर थे। क्या हम में भी कोई ऐसा बलवान है जो इस सोमपान को जीत ले (अर्थात् हमको यज्ञ में से वंचित न होने दे)!” ( १४७ )
ब्राह्मण को कहते हैं ), तू जो कोई हो बता तो सही कि तूने
:४४८ [ सातवीं पञ्चिका मृगंगु के पुत्र राम ने उत्तर दिया कि "वह वीर पुरुष मैं हूँ"। यह राममार्गवेय श्यापर्ण था जिसने वेदों का अध्ययन किया था। जब श्यापर्ण उठने लगे तो उसने राजा से कहा, "हे राजन्, क्या तुम वेदी से ( मुझ जैसे ) वेदपाठी को भी निकाल दोगे ?" उसने पूछा, "हे ब्रह्म बंधु (ब्रह्मबंधु पतित ब्राह्मण को कहते हैं ), तू जो कोई हो बता तो सही कि तूने यह ज्ञान कहाँ प्राप्त किया ?" (१) २८—( राम ने उत्तर दिया ) कि "जब इन्द्र ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप का अपमान किया, वृत्र को मारा, यतियों को गीदड़ों के सामने फेंक दिया, अरुन्मखों को मार डाला, ( अपने गुरु ) बृहस्पति को धिक्कारा, तो देवों ने इन्द्र को निकाल दिया और सोमपान से वंचित कर दिया। जब इन्द्र सोमपान से बहिष्कृत हो गया तो अन्य सब क्षत्रिय भी सोमपान से वंचित हो गये। जब इन्द्र ने त्वष्टा से सोम चुरा लिया तो उसको भी उसमें से फिर भाग मिल गया ! परन्तु क्षत्रिय अब भी सोमपान के अधिकार से वंचित हैं। यहाँ केवल एक आदमी है जो जानता है कि किस प्रकार सोमपान से वंचित क्षत्रिय को फिर सोमपान का अधिकार मिल सकता है। तेरे नौकर ऐसे आदमी को वेदी से क्यों निकालते हैं ?" राजा ने पूछा, "हे ब्राह्मण, क्या तू इस विधि को जानता है ?" राम ने कहा, "हाँ, मैं जानता हूँ।" राजा ने कहा, "हे ब्राह्मण, मुझे बता"। राम ने कहा, "राजन्, मैं बताऊँगा।" (२) २९-ऋत्विज् लोग इन भक्ष्य चीज़ों में से किसी एक को ले सकते हैं—सोम, या दही या जल। अगर वे सोम को लेंगे जो ब्राह्मणों का भक्ष है तो तू इस भक्ष के द्वारा ब्राह्मणों को प्रसन्न करेगा। तेरी सन्तान में ब्राह्मत्व आ जायगा। वह दान, सोमपान और भोजन के इच्छुक होंगे और इच्छानुसार
पाँचवाँ अध्याय ] ४४९ विचरेंगे । यदि क्षत्रिय में कोई दोष होगा, तो संतान में ब्राह्मणत्व आवेगा । दूसरी या तीसरी पीढ़ी में वह ब्राह्मण जैसा पैदा हो जायगा और वह ब्राह्मण लोगों के साथ रहना पसन्द करेगा । अगर दही लेंगे जो कि वैश्यों का भक्ष्य है तो इससे तू वैश्यों को प्रसन्न करेगा । तेरी सन्तान में वैश्यत्व आयेगा । वे दूसरों को कर देंगे, दूसरे उनको अपनी इच्छानुसार भोगेंगे । यदि उस क्षत्रिय में कोई दोष आ जायगा तो उसकी सन्तान वैश्य होगी और दो या तीन पीढ़ियों में वे पूरे वैश्य हो जायँगे और वैश्यों में रहना पसन्द करेंगे । यदि जल लेंगे जो कि शूद्रों का भक्ष्य है तो तू इस भक्ष्य से शूद्रों को प्रसन्न करेगा । तेरी सन्तान में शूद्रत्व आयेगा । वह दूसरों की सेवा करेंगे और दूसरे उनकी इच्छानुसार ताड़ना करेंगे । यदि क्षत्रिय में कोई दोष आजायगा तो उसकी सन्तान शूद्र होगी, और दो तीन पीढ़ियों में पूरी शूद्र हो जायगी और शूद्रों के साथ रहने लगेगी । (३) ३०—“हे राजन्, यह तीन भक्ष हैं जिनमें से क्षत्रिय को किसी को भी नहीं लेना चाहिये । परन्तु एक भाग उसी का है जिसको उसे लेना चाहिये । न्यग्रोध वृक्ष की नीचे लटकने वाली जड़ें, उदुम्बर, अश्वत्थ और प्लाक्ष के फल । इन का रस निकाल कर पिये । यह उसी का भाग है। जब देवता लोग यज्ञ करके स्वर्ग लोक को गये तो जिस चमसे में सोम था वह टेढ़ा हो गया ( न्युब्जन् ) । उसकी बूँदों के फैलने से न्यग्रोध वृक्ष हो गया, यह न्यग्रोध पहले कुरुक्षेत्र में उपजे थे, अन्य स्थानों पर उन्हीं में से उपज उठे । इस लिये कुरुक्षेत्र में अब तक न्यग्रोध को न्युब्ज कहते हैं । जो नीचे की ओर बढ़े ( रोहन् ) उसको कहेंगे “न्यङ्ग्रोह” । उसी से 'न्यग्रोध' २९
४५० [ सातवाँ पञ्चिका हुआ । और उसी का न्यग्रोध हो गया क्योंकि उसकी शाखायें नीचे को चलती हैं। देव परोक्ष प्रिय होते हैं। इसलिये “न्यग्रोह” कहकर कुछ उलट कर (परोक्ष बनाकर) न्यग्रोध कर लिया । (४) ३१—इस सोम रस में से जो नीचे गिरा उसकी नीचे जाने वाली शाखायें हो गईं और जो ऊपर को गया उसके फल हो गये। इसलिये जो क्षत्रिय न्यग्रोध की नीचे जाने वाली जड़ें और उसके फल को खाता है वह अपने निज भक्ष्य से वंचित नहीं होता । इसके सिवाय वह प्रतिनिधि रूप में सोम- पान कर लेता है, क्योंकि यद्यपि वह सोमपान नहीं करता किन्तु सोम के रूपान्तर का पान अवश्य करता है, क्योंकि न्यग्रोध सोम का रूपान्तर है। वह परोक्ष रूप से ही ब्राह्मणत्व को प्राप्त होता है। अर्थात् अपने पुरोहित, अपनी दीक्षा और पुरोहित के प्रवर द्वारा । जैसे वृक्षों में न्यग्रोध है वैसे ही मनुष्यों में क्षत्रिय। क्षात्र शक्ति (न्यग्रोध की भांति) सृष्टि में फैलती है। उन्हीं का राष्ट्र होता है। न्यग्रोध भूमि में गढ़ा भी होता है और अपनी शाखायें नीचे फैलाकर बढ़ता जाता है। जो क्षत्रिय यज्ञ में न्यग्रोध की जड़ों और फलों का रस पान करता है वह राष्ट्र में न्यग्रोध की सी प्रतिष्ठा पाता है और उसका राष्ट्र सुदृढ़ हो जाता है। जैसे वृक्षों में न्यग्रोध प्रतिष्ठित होता है वैसे ही क्षत्रिय राष्ट्र में प्रतिष्ठित है। जैसे न्यग्रोध अपनी जड़ों को ज़मीन में भेज कर बहुत मज़बूत हो जाता है वैसे ही राजा अपनी शक्ति की स्थापना करता है। और उसका राज्य नष्ट नहीं होने पाता । (५) ३२—यह जो उदुम्बर के फल हैं यह अन्न के रस से उत्पन्न हुये हैं और वनस्पतियों में सब से अधिक रस वाले हैं। (उदुम्बर के फल का रस पीकर) राजा क्षत्रियत्व को वन-
चौथा अध्याय ] ४५१ स्पतियों के ओज से सम्पन्न कर देता है । अश्वत्थ वनस्पतियों के तेज से उत्पन्न हुआ है । अश्वत्थ वनस्पतियों का राजा और तेज है । ( इस का रस पीने से ) क्षत्रियत्व में साम्राज्य और तेज धारण करता है । यह जो प्लाक्ष है वह वनस्पतियों के यश से उत्पन्न हुआ है । इसमें वनस्पतियों का साम्राज्य और तेज है । इस प्रकार क्षत्रिय क्षत्रियत्व में वनस्पतियों का साम्राज्य और यश धारण करा देता है । जब यह चीजें उपस्थित हो जाती हैं तो सोमराजा को खरीदते हैं । और उपवास के कृत्य करते हैं । उसी प्रकार जैसे असली सोम यज्ञ में किया जाता है । उपवास के दिन ( यज्ञ से एक दिन पूर्व ) अध्वर्यु के पास सोम निचोड़ने के सभी सामान आ जाने चाहियें जैसे चर्म, दो तख्ते, द्रोण, कलश दशापवित्र ( छन्ना ), पत्थर, पूतभृत, आधवनीय, स्थाली, उदंचन और चमसा । यह जो राजा के लिये रस निचोड़ा गया इसके दो भाग करने चाहिये एक प्रातः- सवन के लिये, दूसरा दोपहर के सवन के लिये । (६) ३३—जब त्रैत चमसों को आहुति के लिये उठाते हैं तब यजमान के चमसों को भी उठाते हैं । उसमें तो तरुण दर्भ डाल कर । और वषट् कार कहकर परिधि समिधाओं पर डालते हैं । एक दर्भ डालकर— दधिक्राव्णो अकारिषम्... ऋ० ४।३६।६ ) यह मंत्र पढ़ते हैं उसमें स्वाहा जोड़ कर और वषट्कार करके । दूसरा दर्भ डालकर यह मंत्र पढ़ते हैं— आ दधिक्राः शवसा पंच कृष्टीः... ( ऋ० ४।६८।१० )
४५२ [ सातवीं पञ्चिका जब ऋत्विज अपने चमसों को पीने के लिये उठावें, उस समय यजमान भी अपने चमसे को उठावे। जब होता 'इडा' कहे तब यजमान भी अपने चमसे को पिये यह कहता हुआ:— "यदत्र शिष्टं रसिनः सुतस्य यदिन्द्रो अपिबच्छचीभिः। इदं तदस्य मनसा शिवेन सोमं राजानमिह भक्षयामि।" अर्थात् "जो सोम इन्द्र ने इन्द्राणियों के साथ पिया और उसमें से बच रहा उसको मैं प्रसन्नचित्त होकर पीता हूँ।" यह वनस्पति का रस प्रसन्न चित्त से पिया जाकर हितकर होता है। और उसका राष्ट्र उग्र और व्यथा-रहित होता है, जो इस प्रकार सोम का भक्षण करता है। नीचे का मंत्र पढ़कर मुँह पोंछता है:— शं नः एधि हृदेपीतः प्रण आयूंजी'वसे सोम तारीरिति। "हे सोम, तुम जो पिये गये हो हमारे हृदय के लिये कल्याणकारी होओ। हमारे जीवन को बढ़ाओ।" यदि वह मुँह न पोंछे तो सोम कहेगा कि किस नालायक ने मुझे पिया और वह उसकी आयु को कम कर देगा। और जो मुँह को पोंछ डालेगा तो उसका जीवन बढ़ेगा। नीचे के दो मंत्रों से चमसा को आशीर्वाद देता है:— आ प्यायस्व समेतु...( ऋ० १।६१।१६ ) सं ते पयांसि समु यन्तु वाजः...( ऋ० १।६१।१८ ) इसमें रूप समृद्धता है। जिसमें रूप समृद्धता होती है वही सफल होता है। (७) ३४—जब ऋत्विज त्रैत चमसों को रख दें तो यजमान भी अपने चमसे को रख दे। जब वे अपने चमसों को हिलावें तो यजमान भी हिलावे।
पाँचवाँ अध्याय ] ४५३ अब नराशंस चमसे को उठावे और यह पढ़कर पियेः- "देव सोम ते मति विदं ऊमैः पितृभिर्भक्षितस्य भक्ष्यामि" "हे देव सोम, मैं तुम को पीता हूँ। तुम, जो मेरे मन को जानते हो और जिनका "ऊम" पितरों ने पिया है।" इस प्रकार यजमान नराशंस चमसे को प्रातः सवन में पीता है। दोपहर के सवन में 'ऊमैः' के स्थान में 'ऊर्वैः' कहता है और तीसरे सवन में "काव्यैः"। क्योंकि पितर लोग प्रातः काल को 'ऊम' होते हैं, दोपहर को 'ऊर्व' और शाम को 'काव्य'। इस प्रकार वह अमृत पितरों को सोम का पान कराता है। प्रियव्रत सोम पीने वाले (सोमपा) ने कहा था, "जो सोम पीता है और जिसके पितर सोम पीते हैं, उसके पितर अमर हो जाते हैं और उसका राज दृढ़ और व्यथारहित हो जाता है। प्रत्यभिमर्श (मुँह पोंछने की विधि) और आप्यायन (चमसे को पानी से धोने की विधि) समान ही हैं अर्थात् वही हैं जैसी ऊपर बयान की गईं। प्रातः सवन में उसी प्रकार कार्य्य करना चाहिये जैसे सोमरस निकालने में, मध्य सवन में भी उसी तरह और तृतीय सवन में भी उसी तरह। (तात्पर्य यह है कि जैसे असली सोमरस निकालने में क्रिया की जाती है उसी तरह राजा के लिये न्यग्रोध आदि का रस निकालने में भी वही क्रिया करनी चाहिये)। इस विधि को राम मार्गवेय ने सुषद्मान के पुत्र विश्वंतर से कहा था। इस पर राजा ने कहा, 'हे ब्राह्मण, हम तुझे एक हजार गौवें देते हैं। मेरे यज्ञ में श्यापर्ण लोग आवे"। इसी विधि का कथन कवष के पुत्र तुर ने परीक्षित के लड़के जन्मेजय से किया और इसी का पर्वत और नारद ने सहदेव के पुत्र सोमक से। फिर यह बात सहदेव सार्जय से कही गई। फिर बभ्रव दैवावृध से, फिर भीम वैदर्भ से, फिर नग्नजित
४५४ [ सातवीं पञ्चिका गांधार से। इसका कथन अग्नि ने सनश्रुत अरिन्दम से किया, ऋतुविद् जानकि से, वशिष्ठ ने पैजवन सुदास से। वे सब इस प्रकार पान करके बड़े हो गये। ये सब महा- राजा थे। जो क्षत्रिय यजमान इस प्रकार पान करता है उसकी श्री सूर्य्य के समान चमकती है। सब दिशाओं से वह सूर्य्य के समान बलि† (कर) लेता है और उसका राज्य व्यथा-रहित हो जाता है। (८) ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका समाप्त हुई। †बलि का अर्थ है कर या महसूल! बलि का अर्थ मांस या पशु- वध नहीं है।
आठवीं पञ्चिका
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
पहला अध्याय १—( राजसूय यज्ञ के ) प्रातःसवन और तृतीय सवन के स्तोत्र और शस्त्र ( सोम यज्ञ के ) ऐकाहिकों के ही समान होते हैं। क्योंकि ऐकाहिक के दोनों सवन शांत और प्रतिष्ठा-युक्त हैं और शांति और प्रतिष्ठा के देने वाले हैं। ( परन्तु मध्य सवन में भेद है ) । माध्यं दिन के पवमान का वर्णन हो चुका । जिसके पृष्ठ स्तोत्र में दोनों साम बृहत् सहित होते हैं। और दोनों साम गाये जाते हैं। रथंतर साम का पहला मंत्र यह है :— आ त्वा रथं यथोतये……(१) तुविष्म तुविक्रतो……(२) यस्य ते महिना……(३) (ऋ० ८।४६।१-३) और रथंतर का पिछला मंत्र यह है :— इदं वसो सुतमन्धः……(१) ( ४५७ )
४५८ [आठवीं पञ्चिका नृभिर्धूतः सुतो……(२) तं ते यवं यथा……(३) (ऋ० ८।२१-३) पवमान उक्थ मरुत्वतीय शस्त्र है जिसमें रथंतर साम है। (मध्य सवन में) पवमान स्तोत्र को रथंतर की रीति से गाते हैं। सहारा देने के लिये बृहत् पृष्ठ है। पहले और पिछले स्तुति के मन्त्रों को रथंतर से गाते हैं। रथंतर ब्राह्मण है, बृहत् क्षत्रिय है। ब्राह्मण क्षत्रिय से पहले होता है। राजा को समझना चाहिये कि जब ब्राह्मण मेरे आगे हैं तो मेरा राष्ट्र सुदृढ़ और विघ्नरहित होगा। रथन्तर अन्न है। पहले रखने से वह राजा को खाना प्राप्त कराता है। रथन्तर यह पृथ्वी है, यह प्रतिष्ठा है। पहले रखने से यह राजा को प्रतिष्ठा देता है। इन्द्र को बुलाने का प्रगाथ वही है बिना किसी तबदीली के (अविभक्तः) जो कि और सोम दिनों का है। ब्रह्मणस्पति का प्रगाथ जिसकी विशेषता “उत्” है दोनों सामों में एक सा है। धाय्या भी वही है बिना तबदीली के। मरुत्वतीय प्रगाथ ऐकाहिकों का विशेष है। (१) २—(पवमान उक्थ्य) का निविद् सूक्त यह है :— जनिष्ठा उग्रः……(ऋ० १०।७३) इसमें 'उग्र' भी है और 'सह' भी। यह क्षत्र का रूप है। 'ओजिष्ठ' भी क्षत्र का रूप है। 'बहुलाभिमानः' में 'अभि' शब्द है जो 'पराजित करने का' रूप है। इस सूक्त में ११ ऋचायें हैं। त्रिष्टुभ् में ११ अक्षर होते हैं। क्षत्रिय त्रिष्टुभ् का रूप है। ओज इन्द्र का बल है। यह त्रिष्टुभ् है। ओज क्षत्रिय का वीर्य है। इस प्रकार वह राजा को ओज, क्षत्र और वीर्य से सम्पन्न करता है। यह 'गौरिवीत' सूक्त है। इससे मरुत्वतीय शस्त्र समृद्ध हो जाता है। इसका ब्राह्मण पहले कहा जा चुका है।