अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल बिनोद ८२
भाई को बीरबल से पुराना परिचय होने का स्मरण हो आया । वह तत्क्षण बहन के उद्धार का उपाय पूछने के लिये बीरबल के घर पहुँचा । उस समय बीरबल चारपाई पर पड़े २ पुस्तक पढ़ रहा था, अपने मित्र का सन्देशा सुन उसे पास बुलाकर उसका कुशल समाचार पूछा । वह अपने बहिन की दुर्दशा का आद्योपान्त कारण बतलाकर बोला- "मैं आपसे अपने बहिन के उद्धार की तरकीब बूझने आया हूँ । मेरी मदद कीजिये ।” बीरबल बोला—"तुम चारो भाई नंगे सिर होकर अपने बहनोई के पास इस ढंग से जावो मानो कोई मर गया हो; तब तक मैं भी आ पहुँचता हूँ। उधर पंडितजी स्त्री के द्वार न खोलने पर क्रुद्ध होकर नौकरों से कहा- "अभी बढ़ई को बुला लाकर दरवाजे को तोड़ डालो। इसी बीच वे चारो भी नंगधड़ंग सिर खोले आ पहुँचे। इनके आनेके थोड़ी देर पश्चात बीरबल भी शवदाह का सब सामान लिये हुए आया और पंडितजी के ऐन द्वार पर टिकठी बाँधने लगा। उधर स्त्री के भाइयों ने पंडितजी को जबरन चारोतरफ से कपड़े से ढक कर कफनि- याना प्रारम्भ किया, जब पंडितजी ने चींचप्पड़ मचाया तो वे क्रोधित होकर बोले-“खबरदार ! चुपचाप पड़े रहो, बिना पहले तुम्हें कफनियाये किसकी मजाल है जो मेरी बहन को हाथ लगाये।” वे पंडितजी को बाँध कर बीरबल के पास ले गये। इस नवीन कौतूहल को देखने के लिये वहाँ पर आदमियों की जमघट सी लग रही थी । अपने पड़ोसियों के सामने अपनी ऐसी दुर्गति देख पंडितजी का शिर लज्जा के बोझ से दब गया और अपनी रिहाई के लिये चारो सालों से अनुनय
८३ अकबर बीरबल विनोद
८३ अकबर बीरबल विनोद
विनय करने लगे। उसकी स्त्री समीप की कोठरी से छिपकर सारी दुर्दशाएँ देख रही थी, पति को भाइयों से गिड़गिड़ाते देख उसे दया आ गई और उसका पवित्र हृदय धर्म-सागर में गोते मारने लगा। स्त्री ने कहा-“चाहे जो हो, मैं पति की ऐसी दुर्दशा अपनी आँखों नहीं देख सकती। वह मेरा देवता है, उसके कोप करने से मेरा सर्वनाश हो जायगा। पतिकी हँसी कराकर कुल्टाएँ भलेही प्रसन्न हो सकती हैं; परन्तु पतिपरायणा नहीं। वह कपाट खोलकर बाहर आई और अपने भाइयों से उसे छोड़ देने का आग्रह करने लगी। भाइयों को बहन कहने पर अमल न करते देख बीरबल स्वयं उनसे क्षमा- प्रार्थी हुआ और उसके पति को छोड़ देने की आज्ञा दी। पण्डितजी छोड़ दिये गये। अन्त में उन्हें अपनी हठधर्मी पर बड़ा पश्चात्ताप हुआ। इस स्वाँग से बीरबल का अभिप्राय था कि पति के जीवितावस्था में स्त्री का मुंडन नहीं हो सकता था। पहले पति मर ले तो स्त्री का मुंडन किया जाय। बीरबल पंडितजी को छोड़वा और उनकी स्त्री का कष्ट निवारण कर लौट गया। चारो भाई अपनी बहन के घर मिहमानी करने के लिये टिकरहे। धन्य है हमारी उन भारत ललनाओं को जो आने पर कठिन संकट उठा कर भी पतिव्रत की रक्षा करती हैं। ऐ देवियों ! पति से कष्ट उठाकर भी पति सेवा करना तेरा ही काम है! अपने पति को कष्ट में देख; भला तुम कैसे सहन कर सकती हो। पति को ईश्वर तुल्य मानकर पूजन करने वाली संसार प्रसिद्ध एक मात्र भारतललना ही है।
अकबर बीरबल विनोद
अकबर बीरबल विनोद ८४ संदेह की निवृत्ति एक दिन बीरबल और बादशाह में बहुत देर तक वार्ता- लाप होने पर भी उसबीच कोई हँसीकी बात नहीं आई, जिस कारण बादशाह ने अपने मनमें सोचा-“कुछ नहीं, बीरबल स्वाभाविक बुद्धिमान नहीं है, बल्कि इधर उधरसे कुछ व्योहार की बातें संग्रह कर बुद्धिमान बन बैठा है। एक स्वाभाविक बुद्धिमान को इतने देर की बार्तालाप में हास्यरस लादेना कोई बड़ी बात न थी। अगर वह ऐसा किये होता तो वार्तालाप के साथ ही साथ मेरा मनोरंजन भी हो जाता। ऐसे मूर्ख को अपने पास रखने से कोई लाभ नहीं है।” मनमें ऐसी दृढ़ धारणा बनाकर वह प्रकट रूप से बोला-“बीरबल ! आज मुझे तेरी बुद्धि काथाह लग गया ।” बीरबल उड़ती चिड़िया का दुम पहचानने वाला व्यक्ति था । इतने ही उद्गार से उसे निश्चित हो गया कि बादशाह मनोरंजन चाहता था जो उसको अभी तक नहीं मिला। उसकी बात काटकर बोला-“पृथ्वीनाथ ! अब मेरे शरीर में आपको बुद्धिका लेशमात्र भी नहीं दिखाई पड़ेगा, आप उसे क्योंकर देख सकेंगे। मेरी बुद्धिका निवासस्थान तो एकमात्र मेरा दिमाग है । यदि आप उसे देखने के लिये अकुला रहे हों तो आपकी मंशा पूरी हो जायगी, केवल पहले सा पागल बन जाइये । इतना सुनते ही बादशाह का भ्रम निवारण हो गया, वे संगति के प्रभाव से बहुत कुछ सुधर गये थे। वह उसकें प्रति दुर्बुद्धि का प्रयोग करना उचित न समझ कर चुप हो गये।
८५ अकबर बीरबल विनोद
८५ अकबर बीरबल विनोद इसी लिये कहा गया है कि अच्छी संगत से अच्छी और बुरी संगत से बुरी बुद्धि उत्पन्न होती है। बीरबल गाय राँधत ऐसा देखाजाता है कि बादशाह को हँसी मजाक से बड़ा प्रेम था, इसी कारण बात बात में उससे और बीरबल से हँसी हो जाया करती थी। हँसी हँसी में अक्सर बादशाह क्रुद्ध भी हो जाता, परन्तु बीरबल कभी क्रोधित नहीं होता था। इस बात को मनमें विचार कर बादशाहने बीरबल को क्रोधित करने की एक नई युक्ति निकाली। वह बोला-“बीरबल गाय राधत” तब उत्तर में बीरबल ने कहा-“बादशाह शूकर राँधत।” बीर- बल तो बादशाह के मुख से उपरोक्त पहेली के निकलते ही उसका अर्थ समझ कर क्रोधित न हुआ, परन्तु बादशाह क्रोधित हो गया और बीरबल से बोला-“तुम मुझे मजाक के बहाने शूकर खिलाते हो।” तब बीरबल बोला-“आप भी तो मुझको गाय खिलाते हैं।” बादशाह अपने काफिये का अर्थ बदल कर बोला-“मैं तो तुम्हें राधते वक्त गाने को कहा था।” बीरबल ने उत्तर दिया- “गरीबपरवर! भला मैं शूकर राधने को कब कहा था। मैं तो कह रहा था कि बादशाह शूकर रखाय। याने आप (शुक) तोते की रखवाली करते हैं।” आप बिना अर्थ समझे अकारण क्रोधित होते हैं।” बादशाह निरुत्तर हो गया। ─०:***०─
अकबर बीरबल विनोद ८६
अकबर बीरबल विनोद ८६ सबका ध्यान आपकी तरफ था फारस का बादशाह बीरबल की बुद्धि की बड़ी प्रशंसा सुना करता था इसलिये उसे बीरबल को देखने के लिये उत्कट इच्छा हुई। अकबर के पास एक पत्र लिख कर भेजा उस में बीरबलके बुलाने की बात लिखी थी। वह अहल्कार कई दिन की मंजिल तय कर दिल्ली पहुँचा और बादशाह को अदब से सलाम कर फारस के बादशाह का भेजा हुआ पत्र दिखलाया। अकबर बादशाह पत्र पढ़कर बहुत खुश हुआ और अहल्कार को अपनी सराय में आराम करने की आज्ञा दी। वहाँ उसके आराम की सभी वस्तुएँ प्रस्तुत थीं। दूसरे ही दिन बादशाह ने बड़े ठाटबाट के साथ बीरबल को फारस भेज दिया। बीरबल फारस पहुँचकर शहर के बाहर एक बाग़ में अपना डेरा खड़ा कराया और उस अहल्कार को अपने आने की सूचना देनेके लिए फारस के बादशाह के पास भेजा। जब बादशाह ने सुना कि बीरबल नगर के बाहर मेरे हुक्म की इन्तजार कर रहा है, तो उसने अपने समस्त कर्मचारियों को अपने ही सा वस्त्राभूषणों से सुसज्जित करा सबके सहित दरबार में जा बैठा और बीरबल को आने की आज्ञा दी। अहल्कारे से बादशाह के बुलावे का पत्र पाकर बीरबल राजभवन में उस से मिलने आया। वहाँ की अजीब हालत थी, सब लोग एक ही तरह की पोशाक पहने हुए यत्रतत्र बैठे थे। बीरबल एक तरफ से सबको लक्ष करता हुआ धीरे २
८७ अकबर बीरबल विनोद
८७ अकबर बीरबल विनोद
बादशाह के पास जा पहुँचा और उसे अदब से सलाम कर उसके समीप आप भी बैठ गया। बादशाह फारस ने पहले उसकी बड़ी आवभगत की पश्चात् उससे पूछा- "बीर- बल ! तुमको कैसे मालूम हुआ कि मैं ही फारस का बादशाह हूँ।" बीरबल ने उत्तर दिया-"गरीबपरवर ! आपका दृष्टि- कोण सब पर था और सबका ध्यान आप पर था। इससे मैंने आपको बिना परिश्रम ही आसानी से पहचान लिया।"
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सच्चे झूठे का भेद।
बादशाह और बीरबल में सिद्धान्त निरूपण हो रहा था इसी के अन्तरगत बादशाह ने बीरबल से सच्चे और झूठे का भेद पूछा। बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ ! इन दोनों के मध्य उतना ही भेद है जितना कि आँख और कानों में है।" बादशाह की समझ वहाँ तक न पहुँच सकी इस वास्ते बीरबल से फिर पूछा- "क्यों, ऐसा काहे को होता है?" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ ! सुनिये, जो बात आँखों देखी रहती है वह तो सच्ची और जो कान से सुनी जाती है वह झूठी।" बादशाह बीरबल के युक्तिसंगत और तर्कपूर्ण उत्तर से सन्तुष्ट हो गया।
चुप्पा सबसे भला।
एक दिन बादशाह को एक नई तरंग सूझी। उसने बीरबल को तुरत आज्ञा दी- "बीरबल ! एक ऐसा मनुष्य
अकबर बीरबल विनोद ८८
अकबर बीरबल विनोद ८८
ढूँढ ला जो सब सयानों का सरताज हो ?” बीरबल किसी बात से भला कब हताश होने वाला था, उसने झट उत्तर दिया-“पृथिवीनाथ ! शीघ्रातिशीघ्र ढूँढ़कर हाजिर करूँगा। परन्तु इस काम में दस हजार रुपयों की आवश्यकता है।” बादशाह की आज्ञा से बीरबल को तत्काल दस हजार रुपयों की थैली दी गई। बीरबल रुपयों को लेकर अपने घर चला गया। थैली घर पर रख आप “सौ सयाने का एक सयाना” की फिराक में शहर की गलियों को छानने लगा। मशाल मशहूर है-“जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ।” दैवात उसे एक अहीर मिला। उसको दिहाती चतुर देख बीरबल ने उसे अपने पास बुलाकर उसके कान में समझाया-“देखो यदि तुम मेरे कहने के अनुसार करोगे तो मैं तुझे एक सौ रुपया इनाम दूँगा ?” ग्वाला भला काहे को इन्कार करता, बिचारे ने इकट्ठी सौ रुपयों की गुल्ली आजन्म में नहीं देखी थी। उसको अपने अनुकूल समझ कर बीरबल बोला-“देखो मेरे साथ तुम्हें बाद- शाह के पास चलना होगा, यदि बादशाह तुमसे कुछ पूछें तो एकदम चुप रहजाना। वह बोला-“बहुत अच्छा ऐसाही करूँगा।” बीरबल उस अहीर को अच्छे २ वस्त्रों से सुसज्जित कर शाही दरबार में ले गया और बादशाह के समक्ष खड़ाकर बोला- “पृथिवीनाथ ! आपकी आज्ञानुसार सयाना मनुष्य हाजिर है उसकी परीक्षा कर लें।” बादशाह उसे और समीप खड़ा करा कर यों प्रश्न करना प्रारम्भ किया-“तुम कहाँ रहते हो ? तुम्हारे माता-पिता तुमको किस नाम से पुकारते हैं ? कौनसी बात
८६ अकबर बीरबल विनोद
८६ अकबर बीरबल विनोद विशेष जानते हो ? बादशाह ने बारी बारी से इसी प्रकार अनेकों प्रश्न किया, परन्तु वह तो सोहबल्ले की तरह पहले से ही पढ़ाकर पक्का कर दिया गया था, उत्तर काहेको देता । अब बीरबलको उसे सँभालने की बारी आई । वह बोला— “पृथिवीनाथ ! आपके पूछने का इस आदमी ने यह अर्थ निकाला है कि न जानें बादशाह यह सब बातें पूछकर पीछे क्या करें । क्योंकि ऐसी कहावत उसे पहले ही से याद है— “राजा योगी अग्नि जल, इनकी उल्टी रीति । डरते रहियो भाइयो थोड़ी पालैं प्रीति ।” पदार्थ मौन धारण कर लिया है। आपने सुना होगा—“चुप्पा सबसे भला ।” बादशाह को बारबल की शिक्षा से आनन्द प्राप्त हुआ और अहीर को घर जाने की छुट्टी मिल गई । ━०:*:०━ सौवाँ अंश । एक दिन बादशाह दरबार के कामों से निपटकर संध्या समय आराम बाग में बीरबल से मनोरंजन की बातें कर रहा था। इसी बीच उसने भुलावा देकर पूछा—“बीरबल ! तुम अनेकों बार अपनी स्त्री के हाथ से हाथ मिलाया होगा, क्या बतला सकते हो, उसके हाथ में कितनी चूड़ियाँ हैं ?” बीरबल ने उत्तर दिया—“गरीबपरवर ! इधर बहुत दिनों से मुझे अपनी बीबी के हाथ से हाथ मिलाने का सुअवसर नहीं मिला फिर भी मैं विश्वास के साथ कहने को तैयार हूँ कि आप जिस दाढ़ी पर अपना हाथ नित्य फेरते और उसे देखा करते
अकबर बीरबल विनोद ६०
अकबर बीरबल विनोद ६० हैं उसके सौवें हिस्सेके बराबर मेरी स्त्री के हाथमें चूड़ियाँ हैं यदि आपको विश्वास न हो तो उन्हें गिनकर अपनी शंका समाधान कर लें।” अधिकतर प्रिय क्या है ? एक दिन बादशाह अपने दरबार में बैठा था और दो वर्षीया शाहजादा सलीम उसकी गोद में सानन्द खेल रहा था। उसकी बाल-चपलता देखकर बादशाह आनन्द-मग्न हो गया और आनन-फानन उसके मनमें यह प्रश्न उपस्थित हुआ— “जीवधारी को अधिकतर प्रिय क्या है ?” बादशाह को चुप देखकर सलीम उसका ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट करने के अभिप्राय से तुतला कर कुछ बोला-“उसकी तोतरी बातों ने बादशाह के आनन्द को और भी बढ़ा दिया। आनन्दवश वह अपने मनोगत भावों को दबा न सका और तत्क्षण समस्त दरबारियों की तरफ लक्ष करके पूछा—“इस पृथिवी पर के प्राणियों को अधिकतर प्रिय क्या है ?” दरबारी सोच में पड़ गये ? कोई कुछ कहता तो कोई कुछ। अन्त में आपस में गोष्ठी करने लगे, परन्तु फिर भी किसी सिद्धांत पर अटल नहीं हुए। बीरबल की अनुप- स्थिति में इन बिचारों पर कभी २ ऐसी विपत्ति आ जाया करती थी। यदि बीरबल प्रस्तुत होता तब तो उनका पौ बारह था। बादशाह भी बीरबल के रहते ऐसी २ बातें किसी दूसरे दरबारी से कभी न पूछता था। आज की सभा में बीरबल
६१ अकबर बीरबल विनोद
६१ अकबर बीरबल विनोद न था जिस कारण इनके ऊपर ऐसी आफत आई। कुछ देर सोच समझ लेने के बाद सर्वसम्मति मिलाकर एक वृद्ध दरबारी बोला-"पृथिवीनाथ ! अधिकतर प्रिय लड़का होता है।" दरबारियों ने आपस की गोष्ठी से निश्चित किया था कि इस समय बादशाह लड़के को गोद में लिये हुए खिला रहा है अतएव उसके प्रश्न का इशारा लड़के की तरफ ही है। बादशाह उस समय वृद्ध दरबारी का उत्तर स्वीकार कर लिया और सभा बरखास्त हुई। बीरबल राजकीय कार्य से कहीं बाहर गया था दैवात दूसरे ही दिन आ पहुँचा। बादशाह को तो पहले की धुन बँधी हुई थी, बीरबल को सभा में बैठते ही वही प्रश्न उससे भी किया। वह बोला-"गरीबपरवर ! प्राणी को अपना जीव सबसे अधिक प्यारा होता है। इसकी तुलना और किसी से नहीं की जा सकती, चाहे वह अपना कितना ही सगा संबन्धी क्यों न हो ?" तब बादशाह अपने दरबारियों का मान रखने के लिये बीरबल की बात काटकर कहा-"तुम्हारा कहना गल्त है, क्या लड़का प्राण प्यारा नहीं होता ?" तुमको यदि अपने कहने पर अटल विश्वास है तो उसे प्रमाणित कर दिखावो,. बीरबल बादशाह की आज्ञा शिरोधार्य करता हुआ बोला- "पृथिवीनाथ ! बागका एक बड़ा हौज खाली करनेकी बागवान को आज्ञा दी जावे तब तक मैं बाजार से परीक्षा की चीजें लेकर लौट आता हूँ। आप सभासदों सहित बाग में उपस्थित रहें, वहीं पर मैं इस बात को प्रमाणित कर के दिखलाऊँगा। बादशाह की आज्ञा पाकर बागवान ने प्राणपण से परिश्रम
अकबरबीरबल विनोद ६२
अकबरबीरबल विनोद ६२ करके थोड़ी ही देर में सबसे बड़े हौजको खाली कर सूचना दी। बागमें बैठने के लिये बादशाह की तरफसे समुचित प्रबंध किया गया और वे दरबारियोंके सहित बाग में दाखिल हुए। तब- तक बीरबल भी एक बँदरिये को उसके बच्चे सहित लेकर बाग में आया। बीरबल ने बँदरिया को बच्चे सहित हौज के मध्य भाग में बिठला कर ऊपर से पानी भरने की आज्ञादी। हौज में पानी भरा जाने लगा। पानी क्रमशः हौज के ऊपर चढ़ आया। बँदरिया बराबर अपने बच्चे को ऊपर उठाती गई। यहाँ तक कि बच्चा उसकी पीठ पर बैठ गया और पानी का बढ़ना बराबर जारी रहा। जब पानी बढ़कर उसके गले तक पहुँचा तो वह खड़ी हो गई और अपने बच्चेको अपने हाथ पर रखकर ऊपर उठा लिया। सब लोग इस नजारे को बड़ी गौर से देख रहे थे। बादशाह बीरबल को चिताकर बोला-“क्यों बीरबल ! क्या देखते नहीं हो कि किस प्रकार बँदरिया अपने प्राणों पर खेलकर बच्चे की रक्षा कर रही है, क्या अब भी पुत्र को सर्वोपरि प्रिय मानने को तैयार नहीं हो?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथिवीनाथ! थोड़ा और ठहर जाइये, अभी बँदरिया के प्राण पर नहीं आई है, थोड़ी देर में आपही फैसला हो जाता है।” अभी बीरबल और बादशाह में उपरोक्त बातें हो रही थीं कि बँदरिये के मुख में पानी भरना शुरू हुआ। पानी भरने के कारण उसका दम घुटने की नौबत आ गई, नाक में पानी भरने लगा, वह अधीर होकर बहने लगी। आखिरकार लाचार हो उसने बच्चे की ममता छोड़ दी और अपना
६३ अकबर बीरबल विनोद
६३ अकबर बीरबल विनोद प्राण बचाने के लिये एक नया उपाय निकाला। झट बच्चे को पानी में डुबाकर आप स्वयं उसके ऊपर खड़ी हो गई, इस प्रकार उसका मुँह पानी से ऊपर हो गया। बीरबल ने बादशाह को उसे दिखला कर बागवान को पानी रोकने की आज्ञा दी। पानी आना तुरत बन्द हो गया और बँदरिया बच्चे सहित सजीव बाहर निकाल ली गई। बीरबल ने कहा-"पृथिवी नाथ ! आपने प्रत्यक्ष देखा है कि जब तक प्राण बचने की आशा थी तब तक बंदरिया बच्चे का प्राण बचाने की बराबर यत्न करती रही, परन्तु जब उसके ही प्राणों पर आफत आई तो वह बच्चे की जीवन-रक्षा भूल गई, बल्कि स्वयं उसके जान की गाहक होकर अपना प्राण बचाया। बादशाह दरबारियों सहित बीरबल के बुद्धि की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली। ━o*o━ मिश्री के डेली का हीरा। एक दिन रात्रि समय बीरबल किसी कार्यवश नगर से बाहर दूसरे ग्राम को जा रहा था, थोड़ी दूर जाने के बाद उसे एक झोपड़ा दिखाई पड़ा। उस झोपड़े से किसी के रोने की आवाज आ रही थी। अर्धरात्रि के समय फूट २ कर रोने का शब्द सुन बीरबल से न रहा गया। वह झोपड़े के पास जा पहुँचा। दरवाजा बन्द था, बीरबल ने आवाज देकर कई बार पुकारा-"भाई ! अभी इस झोपड़े में कौन आदमी रो रहा था ? उस झोपड़े से एक बुड्ढा मनुष्य बाहर निकला और
अकबर बीरबल विनोद ९४
अकबर बीरबल विनोद ९४ लड़खड़ाते हुए बोला-“आपको रोने वाले से क्या गरज पड़ी है, मैं ही रो रहा था ?” बीरबल उसे अँधेरे में देखकर भली- भाँति पहचान न सका। वह एक बूढ़ा पुरुष जान पड़ता था। उसके शरीर के चमड़े भूल गये थे। कमर झुककर धनुष्या- कार हो रही थी। बीरबल ने आग्रह पूर्वक उससे ऐसी रात्रि में रोने का कारण पूछा। तब बुड्ढा बोला-“भला आपसे रोने का कारण बत- लाने से मुझे क्या लाभ होगा, नाहक एक अपरिचित आदमी के सामने दुखड़ा रोकर अपनी अमर्यादा क्यों कराऊँ?” बीरबल ने उसकी सहायता करने का बचन दिया, तब वह बुड्ढा बोला- “अच्छा यदि आप सुनना ही चाहते हैं तो सुनें। इस समय मेरी अवस्था सत्तर के लगभग पहुँच चुकी है, ईश्वर ने एक लाल दिया था सो भी चल बसा। घर में मेरी रखवाली वा भरण पोषण करने वाला कोई भी नहीं है, विचारा लड़का कमा कर लाता था उससे हम पिता पुत्रों का भरण-पोषण भलीभाँति हो जाया करता था। मेरे से काम नहीं हो सकता, बड़ी जोर लगाकर भी तीन चार पैसेसे अधिक की मजदूरी नहीं करपाता। महीने में ऐसा एक भी सौभाग्य का दिन नहीं होता, जिस दिन मैं भर पेट भोजन कर चैन की नींद सोऊँ। लड़के की सोच अलग मारे डालती है।' आज तीन दिनों से बराबर फाँका कर रहा हूँ। उदर की ज्वाला अबर्दास्त होने से रो रहा था।” बीरबल ने सोचा-यह अँधेरी रात है, चारो तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा नजर आ रहा है। ऐसी हालत में तत्काल इस
६५ अकबर बीरबल विनोद
६५ अकबर बीरबल विनोद आदमी की भला मैं क्या सहायता कर सकता हूँ, बेहतर होगा कि कल प्रातःकाल इसे अपने मकान पर बुलाऊँ । उसने प्रकट रूपमें कहा— "चाचा जी ! यह रात्रिका समय है, थोड़ी देर और अपनी झोपड़ी में जाकर आराम कीजिए। तड़के उठकर दीवान- खाने में आना, मेरा नाम बीरबल है।" इतना कहकर बीरबल चला गया और बुड्ढा भी झोपड़ी में पड़ा हुआ सबेरा होने की प्रतीक्षा करने लगा, सारी रात उसको निद्रा न आई । सूर्यो- दय होते ही ठेगता हुआ दीवान के घर पहुँचा । बीरबल ने ने बुड्ढे की बड़ी आवभगत की और अच्छा अच्छा पदार्थ भोजन कराया । जब वह खा पीकर सन्तुष्ट हुआ तो बीरबल कहा-"चाचा जी ! इस समय मैं आपको केवल पन्द्रह दिन का खर्च देकर विदा करता हूँ । इसके बीच मिश्री की एक डेली लेकर उसे हीरे की शक्ल का बनाकर मेरे पास लाना, तब मैं आपको आगे की तरकीब बतलाऊँगा ।" बुड्ढा बीरबल को आशीर्वाद देता हुआ घर लौट गया । आठ दस दिनों के अन्त- र्गत वह एक मिश्री के टुकड़े को खूब घिस छोलकर हीरे के आकार का बनाकर बीरबलके पास ले आया । बीरबल ने उस नकली हीरे को हाथ में लेकर देखा, निसन्देह वह बनावटी हीरा असली हीरेको मात कर रहा था। बीरबलने बूढ़ेसे कहा- "चाचाजी इसको लेकर कल फिर आइयेगा, आपको बादशाह के पास चलना होगा। मैं इसे बादशाह के हाथ बेचकर आपको एक अच्छी रकम दिलाऊँगा । दूसरे दिन बीरबल बुड्ढे चाचा को साथलेकर रोज से पहले ही राज महल में जा पहुँचा । उसे देखकर बादशाह को कुछ
[header: अकबर बीरबल विनोद ६६]
[header: अकबर बीरबल विनोद ६६]
कारण विशेष जान पड़ा इसलिये उससे पूछा-“क्यों बीरबल आज इतनी जल्दी क्योंकर आना हुआ ?” बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! यह कारीगर एक उत्तम हीरा लेकर मेरे साथ आया है, यह उस हीरे को बेचना चाहता है। मुझे विश्वास है कि यह चीज आपके पसन्द की होगी ।” इतना कहकर उसने हीरे को बादशाह के हाथ में दे दिया । बादशाह ने हीरे को भली-भाँति देखकर कहा-“बीरबल ! हीरा तो लाजवाब है; परन्तु बूढ़े जौहरी से कहो कि इसे लेकर दो घण्टे पश्चात हाजिर होवे ।” बुड्ढा वहाँ से हट गया । तब बादशाह ने बीरबल को उसकी भलीभाँति जाँच कराने की आज्ञा दी । बीरबल इधर उधर घूम फिर कर आ गया और बोला-“पृथ्वीनाथ ! इसके अच्छा होनेमें कोई सन्देह नहीं है। हीरे को आप अपने पास रक्खें ।” बीरबल के इस उत्तर से बादशाह को सन्तोष हुआ और फिर बोला-“हीरे को खरी- दने से पहले और जाँच करा लो ।” बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ ! इस समय हीरे को अपने मुख में रख लीजिये, फिर जाँच होती रहेगी ।” बादशाह ने हीरे को मुख में छिपा लिया । बादशाह की आज्ञानुसार बूढ़े चाचा के आने का समय हुआ और वे ठेंगते २ दरबार में पुनः हाजिर हुए । उसे देख बीरबल ने बादशाह से कहा-“गरीबपरवर ! देखिये वह हीरे वाला वृद्ध भी आन पहुँचा, उसे अब क्या कहकर उत्तर देना होगा ।” बादशाहने बीरबल की तरफ देखकर पूछा-“क्यों बीरबल ! वह हीरा तो मैं ने तुम्हीं को दिया था न ।” बीरबल ने साफ इन्कार कर दिया और बोला-“पृथ्वीनाथ ! उसे तो आपने
अकबर बीरबल विनोद ६७
अकबर बीरबल विनोद ६७
अपने पास ही रखलिया था।” बादशाह को भी बीरबल की बात सच्ची जान पड़ी, खबर नहीं कि आखिरस उसे रक्खा किस जगह । उसने हीरे का बहुतेरा खोज किया, परन्तु जब कहीं हो तब तो मिले वह तो मुख में गलकर पानी होगया था । लाचार होकर बादशाह बोला-“अच्छा बीरबल ! बुड्ढे व्यो- पारी से उसका मूल्य निश्चित कर लो, परन्तु उससे कोई झकझक न करना।” हुक्म मिलते ही बीरबल ने बूढ़े चाचां से हीरे का मूल्य पूछा। वह बोला-“दीवान जी! हीरे का असली मूल्य दो हजार मुहरें हैं और दो सौ मुहरें मैं नफे में लूँगा।” बीरबल ने कहा-“नहीं तुम्हें नफे में पचास मुहरें ही दी जायँगी। बूढ़ा दुखित मन से बोला-“सरकार ! यदि आपको मुनाफे की दो सौ मोहरें देनीं स्वीकार हों तब तो लेवें, नहीं तो कृपाकर मेरा माल मेरे हवाले करें।” बीरबल मूल्य में कमी कराने के लिये उससे बारबार बना- वटी माथापच्ची करता रहा, अन्त में झुरुलाकर बोला-“बुड्ढे ! इतनी टिरटिर क्यों करता है, अच्छा पचास मोहरें और ले लेना।” परन्तु बूढ़े चाचा तो पक्के गुरु के चेला थे भला वे कब मानने लगे। मुँह बनाकर बोले-“दीवान जी! इस प्रकार मुझ गरीब को क्यों दबाते हैं, मैं दो सौ मुँहरों से एक कौड़ी भी कम न लूँगा।” बादशाह इन दोनों की बड़ी देर की झक झक सुन क्रोधित होकर पूछा-“क्यों बीरबल ! व्योपारी क्या कहता है?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ ! वह हीरे की लागत दो हजार मुहरें बतलाता है और मुनाफे की दो सौ मुँहरें अलग से माँगता
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६८ अकबर बीरबल विनोद
६८ अकबर बीरबल विनोद है। मैं इसके नफे में कमी करवाता हूँ और केवल एक सौ मुँहरें ही देना चाहता हूँ।” बादशाह ने बीरबल को इशारे से मना किया और उदारतापूर्वक बूढ़े जौहरी को हीरे का मूल्य और दो सौ मुनाफे की मुहरें खजाँची से दिलवा कर विदा किया। वृद्ध की प्रसन्नता बाँसों उछल पड़ी और मनोमन बीरबल को कोटिशः धन्यवाद देता हुआ अपने घर चला गया। शाम को दरबार से अवकाश पाकर जब बीरबल घर पहुँचा तो जौहरी बूढ़े चाचा को प्रस्तुत पाया। बूढ़ा बीरबल को देखकर प्रसन्नता से रोमांचित हो गया और बोला— “आपको और आपकी बुद्धि को धन्य है, दीवान साहब ! आपजो मुझ सरीखे दीनों पर उपकार कर रहे हैं उसका फल ईश्वर आपको हाथों हाथ देगा। मुझे विश्वास हो गया है कि इस पृथ्वी मंडल पर आप ऐसा प्रजापालक दूसरा दीवान नहीं है। उसकी ऐसी अनेकों प्रशंसा की बातें सुनकर उसके सन्तो- षार्थ बीरबल ने कहा-“चाचाजी ! इसमें मेरा क्या उपकार है। यह सब आपको आपकी बुद्धिमानी का प्रतिफल मिला है” बुड्ढा इस पर आवाक हो गया और कोटि कोटि आशीर्बाद देता हुआ अपने घर चला गया। नकली बीरबल जब से बादशाह को बीरबल के मृत्यु का समाचार मिला था तबसे उसके विछोह के कारण बड़ा दलगीर रहता और बराबर
अकबर बीरबल विनोद ६६
अकबर बीरबल विनोद ६६ उसका शोक मनाया करता था। बादशाह की उदासी मिटाने के लिये लोगों ने बड़ी बड़ी तरकीबें निकालीं, पर दिल की लगन बुरी होती है। जब उपायों से कार्य्य-सिद्धि न हुई तो दरबारियों ने अष्टकौशल कर एक नई युक्ति सोच निकाली और कितने नागरिकों से कानों कान कहलाया कि अभी बीरबल जीवित है। जब इस हौवा से भी बादशाह को सन्तोष नहीं हुआ तो दूर दूर के शहरों तथा दिहातों से बीरबल के जीवित रहने का समाचार आने लगा। लोग कहते थे कि वह लड़ाई से बचकर एक दूसरे शहर में छिप कर बैठा है। एक बार ऐसी घटना घटी कि किसी मनुष्य ने अपने को बीरबल कहकर घोषित किया, परन्तु उसका बादशाह से साक्षात न हो सका, वह आते २ बीच मार्ग में स्वर्गवासी हो गया। बादशाह का मन्तव्य पूरा नहीं हुआ। जीवनपर्यन्त उसे अपने प्रिय मंत्री बीरबल से फिर साक्षात न हो सका। एक गाँव सीड़ी था उसमें इस घटना के दो तीन वर्ष बाद एक द्विजाति कुलोद्भव ने अपने को बीरबल कहकर घोषित किया और लोगों में इस बात का खूब प्रचार किया कि मैं ही बीरबल हूँ। जब पठानों का युद्ध छिड़ा था तो मैं लड़ाई में आहत होकर एक महात्मा की कृपा से जीता-जागता निकल आया। महात्मा ने मेरी बड़ी शुश्रूषा की। जब मैं एक दम चंगा हो गया तो उस साधु से आज्ञा लेकर इस गाँव में आ बसा। उस आदमी की सूरत भी बीरबल से बहुत कुछ मिलती जुलती थी। वह बीरबल के जीवनकाल की सारी
१०० अकबर बीरबल विनोद
१०० अकबर बीरबल विनोद वातें भलीभाँति स्मरण कर लिया था जिस कारण बीर- बल सम्बन्धी प्रश्न उपस्थित होने पर वह उसका उचित उत्तर देता था । कितने ही लोगों को धोखा हो गया । वे उसे असली बीरबल समझकर बादशाह के पास पहुँचाने आये परन्तु वह रास्ते में ही स्वर्गवासी हो गया । बादशाह उसकी प्रतीक्षा करता रहा । ऐसी ही ऐसी और भी कितनी अफवाहें बादशाहके कान तक पहुँचीं, परन्तु जब उनकी जाँच कराई गई तो सारी बातें झूठी निकलीं । उसके गुप्तचर सच्ची खबर नहीं देते थे जिससे कालान्तर में उनका भेद खुल गया । बादशाह दूतों के ऐसे विश्वासघात करने पर आग बबूला हो गया और उनको कठिन दण्ड दिया । खुदा को अक्ल से पहचान करो बादशाहों की सभा में चित्रकारों के रहने की पुरानी प्रणाली है । अकबर बादशाह के दर्बार में भी नियम-परम्परा के अनुसार कई चित्रकार विद्यमान थे । उनमें एक सर्व- प्रधान था । वह प्रति चित्र के बनवाई में पाँच हजार पुरस्कार लेता था । एक दिन उस चित्रकार के पास एक बड़ा आदमी आया और बोला- "महाशय जी ! मुझे भी अपनी चित्र बनवानी है; यदि आप उसे सर्वांगपूर्ण बना सकेंगे तो मैं आप को पन्द्रह हजार रुपया इनाम दूँगा । चित्रकार सहमत हो गया और दूसरे ही दिन से चित्र बनाना शुरू किया । इस काम के सम्पादन में उसे कई मास का अरसा लगा । जब चित्र उसकी इच्छा नुकूल तय्यार हो गया तो उसे लेकर रईस
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के पास गया। वह चित्र को लेकर अपने चेहरे से भलीभाँति मिलान किया। उसमें एक स्थानपर ऐब रह गया था। साहूकार ने चित्रकार को उसे दिखलाया। वह विवश होकर दूसरा चित्र बना लाने का बचन देकर खाली हाथ लौट गया और फिर से चित्र बनाना प्रारम्भ किया। इस बार पहले से भी अधिक तत्परता से चित्र तय्यार किया। उसका विश्वास था कि इस मर्तवा साहूकार को चित्र पसंद आजायगा। दूसरे दिन फिर चित्र को लेकर शाहूकार के पास पहुँचा और पुरस्कार का दावो हुआ। भलेमानस ने चित्रका फिर से मिलान किया, फिर भी उसके गोड़ में ऐब रह गया था। इसी प्रकार सेठ और कई बार चित्रकार कोमूर्ख बनाकर लौटा चुका था। मनुष्य अपनी काम- याबी के लिये बार २ परिश्रम करता है, जब करते २ थक जाता है तो उसकी हिम्मत छूट जाती है और फिर उसके किये वह काम नहीं होता। इसी प्रकार वह चित्रकार भी अपनी नाकामयाबी से हताश हो गया और अपनी अपकीर्ति जन समुदाय में बढ़ने के भय से गंगा में डूब मरने का संकल्प किया। जिस समय गंगा तट पर पहुँचकर वह आत्मविसर्जन का उपाय सोच रहा था उसी समय हरेच्छा से बीरबल नामी एक ब्राह्मण का दीन लड़का भी वहाँ उपस्थित था। लड़का चित्रकार के मनोगत भावों को ताड़ गया और उसे ढाढ़स देने के विचारसे पूछा—"महाशय जी ! आप इतना चिन्ताग्रस्त क्यों दिखाई पड़ते हैं, जान पड़ता है चिन्ता रूपी साँपिन ने आपको डस लिया है ? कृपाकर मुझसे अपने दुख का कारण