अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
<u>अकबर बीरबल विनोद</u> २१४
<u>अकबर बीरबल विनोद</u> २१४ सौ गायों के एकमात्र अधिपति आप ही हैं एक दिन तानसेन और बीरबल में कुछ विवाद छिड़गया, वे प्रत्येक अपने २ को एकदूसरे से गुणी बतलाते थे । बादशाहने कहा-“इस प्रकार तुम्हारा विवाद नहीं मिट सकता, इसके लिये किसी को मध्यस्त बनाकर अपना न्याय करा लो ।” वे बोले- “पृथ्वीनाथ ! आपकी आज्ञा हमें सिरोधार्य है । हम दोनों इस बात पर सहमत हैं, परन्तु हमारी बुद्धि में नहीं आता कि हम किसको अपना मध्यस्थ बनावें । कृपया आपही इसका भी निपटारा कर दें । बादशाह ने कहा-“आपलोग महाराणा प्रतापसिंह के पास जावें ।” बीरबल और तानसेन दोनों ही एक साथ प्रतापसिंह से जा मिले। तानसेन तो गायनाचार्य्य था ही, वह वहाँ पहुँचतेही एक रागिनी छेड़ी । बीरबल अवसर की प्रतीक्षा करता हुआ खामोश बैठा रहा। जब उसने देखा कि तानसेन अपने गान वाद्य से राणा को मोहित कर बाजी मार लिया चाहता है तो बोला- “राणाजी! हम दोनों एकही साथ साही दरबार से चलकर आपके पास आये हैं और हम दोनोंही रास्ते में एक एक अलग अलग मन्नतें मान चुके हैं । मैंने पुष्करजी में पहुँचकर प्रार्थना करी है कि यदि मैं दरबार से मानपत्र प्राप्तकर लौटूँगा तो एकसौ गौ ब्राह्मणों को दान करूँगा और मिया तानसेनजी ने खाजेखिजिर की दरगाह में जाकर अपनी मन्नत की है कि जो मैं राणाजी से प्रसंशापत्र प्राप्त करूँगा तो यहाँ पर एक सौ गौवों की कुरबानी कराऊँगा । सौ गायों की जिन्दगी एकमात्र आपके हाथ है।
२१५ \hfill अकबर बीरबल विनोद
२१५ \hfill अकबर बीरबल विनोद \vskip 0.5em
आप चाहे उन्हें जीवदान दें वा बध करावें। यदि जिलाने का विचार हो तबतो मुझे प्रशंसापत्र दीजिये और यदि सौ गौवों को मरवाना हो तो तानसेन को दीजिये। राणासाहब हिन्दू होकर भला गौवों की कुरबानी कब पसन्द कर सकते थे उन्होंने तुरत अकबर को पत्र लिख भेजा-“बीरबल बड़ा गुणग्य है, इसकी जितनी प्रशंसा की जाय सब थोड़ी है।” विचारे तानसेन की गरदन झुक गई। वह चुपके से वहाँ से चलकर दिल्ली पहुँचे अपने जीवन में फिर उन्होंने कभी बीरबल का सामना नहीं किया।
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\begin{center} {\large\textbf{गरीब लड़की वेश्या के घर}} \end{center}
दिल्ली नगर में एक अति दरिद्री मनुष्य रहता था। उसकी हालत बड़ी अबतर थी। यहाँतक कि अन्न मिलता तो वस्त्र नहीं और यदि वस्त्र मिलता तो अन्न का ही अभाव रहता। उस मनुष्य को एक आठ वर्ष की कन्या थी, जो रूप रंग में भली और शरीर की सुडौल थी। एक दिन एक दुष्ट मनुष्य उस कन्या से मिला और उसे कुछ प्रलोभन देकर बहकाया। जब वह बालिका छोटी बुद्धि के कारण उसके बहकावे में आ गई तो वह उसे एक रंडी के घर ले जाकर बेच दिया। वेश्या के घर जाकर कन्या को सब उपभोग की सामग्रियाँ आसानीसे मिलने लगीं, खानेके लिये हरसमय नया नया और स्वादिष्ट पदार्थ मिलता था। ऐसे सुख के उपभोग में पड़कर
अकबर बीरबल विनोद २१६
अकबर बीरबल विनोद २१६
कन्या अपने पिता को एकदम भूलगई। इधर विचारा पिता अपनी कन्या के लिये बहुत हाय हाय किया और अपने भर सक उसकी बहुत खोज बीन की, परन्तु जब उसका कहीं भी पता न चला तो लाचार होकर बैठ रहा। वेश्या ने उस कन्या को नृत्य गान की शिक्षा दिलवाकर उसे अपने फन में गुणागरी बना दिया। वह धीरे धीरे सारे नगर में विख्यात हो गई। एक दिन ऐसी घटना घटी कि वह एक जगह महफिल में नाच रही थी और उसी बीच उसका पिता भी वहाँ पर जा पहुँचा। वह नाचने वाली कन्या को गौर करके देखा तो मालूम हुआ कि वह उसकी ही राम- पियारी नाम्नी कन्या है। उसके बदन में काटो तो खून नहीं; परन्तु उस समय छेड़खानी करने से अपना अपमान समझ कर वह चुप मार गया और उस वेश्या का पूरा परिचय लेकर बादशाह के पास पहुँचा। जब बादशाह दरबार में आये तो अपना एक अर्जीदावा पेश किया। बादशाह उसे पढ़ने के लिये बीरबल को दिया। तब बीरलब उसे पढ़कर बादशाह को सुनाया। बादशाह ने वेश्या को उसकी लड़की के सहित तलब करने की आज्ञा दी। दूसरे दिन वेश्या कन्या के सहित दरबार में उपस्थित हुई। बीरबल बादशाह की अनुमति से निम्नलिखित प्रश्न किया-“यह कन्या तुझे कहाँ से प्राप्त हुई है, और इसका पिता कौन है?” वेश्या तो वेश्या भला वह कब की चूकने वाली थी, इनकी पंडिताई सब पर विदित है, वह घर से ही कन्याको भलीभाँति सिखा पढ़ा कर दरबार में लाई थी। उसने
२१७ अकबर बीरबल विनोद
२१७ अकबर बीरबल विनोद कहा-“पृथ्वीनाथ ! यह एक फकीर की कन्या है, जब यह बहुत छोटी थी तभी वह फकीर इसे मेरे हाथ बेच गया था ।” इसकी उम्र उस समय दो तीन वर्ष की थी। भली भाँति बातचीत भी करना नहीं जानती थी। मेरे घर रहकर कई वर्षों के बाद अब सयानी हुई है। लालन पालन के अतिरिक्त और बहुत सा व्ययकरके मैंने इसे शिक्षिता बनाया है। बीरबल ने उस कन्या से पूछा-“क्यों री छोकरी ! तू अपने माता पिता को जानती है, तेरा जन्म किस जगह हुआ था ?” लड़की बोली-“ना सरकार ! मैं तो अपने माता पिता की सूरत भी नहीं पहचानती, जब से होश संभाले हूँ तब से आजतक बराबर इन्हीं का साथ है और मैं इन्हीं को अपनी माँ जानती हूँ ।” बीरबल ने वेश्या से पूछा-“तू इस लड़की का नाम जानती है ? वेश्या बोली-“हाँ मैं इसको काशी के नाम से पुकारती हूँ ?” बीरबल ने कहा-“अच्छा अब आज तुम अपने घर जावो कलह दरबार के समय फिर उपस्थित होना ।” दूसरे दिन बीरबल ने उससे पहले ही लड़की के पिता को तलब किया और उससे पूछा-“क्या तुम अपने लड़की का असली नाम बतला सकते हो ?” पिता बोला-“हाँ सरकार ! मैं उसे सुभद्रा नाम से पुकारता हूँ। यह हमारे अड़ोस पड़ोस के सभी लोग जानते हैं, आप उनसे भी पूछ सकते हैं। बीरबल को उनके नाम के सम्बन्ध में और पूछ ताछ करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ी, इसलिये उसे वहीं तक रक्खा । इधर वेश्या भी समय पर उपस्थित हुई। इस मामले की
अकबर बीरबल विनोद २१८
अकबर बीरबल विनोद २१८ बड़ी शोहरत हो गई थी इसलिये दोनों तरफ से बहुतेरे लोग फैसला सुनने के लिये आये। बीरबल ने चुपके से एक सिपाही को आज्ञा दी कि इस भीड़ में घुसकर सुभद्रा सुभद्रा कई बार पुकारा, जो कोई नाम को सुनकर कुछ भी संकुचित हो उसे पकड़ कर मेरे पास हाजिर करो। सिपाही ने चिल्लाकर सुभद्रा को पुकारा। उसके पुकारते ही सब लोग सन्न हो गये; परन्तु वह कन्या चुपके से खड़ी होकर इधर उधर देखने लगी। सिपाही बीरबल की आज्ञानुसार उसका हाथ पकड़ लिया और उसे उस के पास ले आया। वेश्या भी लड़की के साथ हो ली।' बीरबल ने कन्यासे पूछा— "क्यों री! तेरा नाम तो काशी है न, फिर तू सुभद्रा के नाम से क्यों खड़ी हो गई।" लड़की ने उत्तर दिया- "सरकार! मेरे पिता मुझे सुभद्रा के नाम से ही पुकारते थे। अतएव सुभद्रा नाम के सुनते ही मेरे कान खड़े हो गये।" बीरबल ने कहा- "अभी तू कल अपने बयान में कह चुकी है कि मैं अपने पिता को नहीं जानती और आज इस प्रकार कहती है?" वह लड़की चक्कर में आ गई और डरवश थरथर काँपने लगी। वेश्या बीच बीचमें अपने बचन की पुष्टि के लिये बोलना चाहती थी; परन्तु बीरबल ने उसको डाटकर रोक दिया। वे बोले- "तू झूठी साबित हो चुकी है क्योंकि तेरे बयानों में अन्तर पड़ रहा है। मैं इस मिथ्या के बदले तुझे अभी दण्ड देता हूँ। यह कह कर बीरबल ने एक कर्मचारी से कुछ सांकेतिक
२१६ अकबल बीरबल विनोद
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भाषण किया। कर्मचारी आज्ञा पाते ही एक कोड़ा हाथ में लेकर सामने आया। उसे देखकर वेश्या डर गई, और तुरत अपना कसूर गरदान लिया।” वह बोलो-“पृथ्वीनाथ ! मैं इस कन्या को आज से तीन चार वर्ष पहले एक आदमी से खरीदा था। वह आदमी मुझे झाँसा पट्टी पढ़ा इसके बदले में काफी धन हड़प ले गया है। आप मेरे अपराधों को क्षमा करें।” लड़की का पिता बीरबल के इसारे से अपनी कन्या के पास खड़ा हो गया; बीरबल ने उस लड़की से पूछा-“क्या तू इस आदमी को पहचानती है ? क्या इसकी शक्ल तेरे पिता से मिलती है ?” लड़की को डर उत्पन्न हो गया, उसने सोचा कि अगर झूठ बोलती हूँ तो बीरबल बीच सभा में कोड़े लगवावेगे। अतएव सच बोलना ही अच्छा है। उसने कहा-“हाँ हाँ यही मेरे जन्मदाता पिता हैं।” इतना कहकर वह अपने पिता के चरणों पर गिर पडी, पिता ने उसे उठाकर छाती से लगा लिया। बीरबल ने कहा-“वेश्या अब तेरे पास और कोई सफाई देने की बात नहीं रही, तू एक साथही तीन अपराधों में गिरफ्तार हुई है। पहला अपराध अबोध कन्या के फुसलाने का, दूसरा दास ब्योसाय को तरक्की देने का और तीसरा धोखा देने का है। इसलिये तुमको सात वर्ष की सजा दी जाती है।” वह सिपाहियों द्वारा तत्क्षण कैद करली गई और वे उसे लेकर कारागृह का मार्ग लिये। तब बीरबल उस वृद्ध पुरुष को समीप बुलाकर बोले-“मैं तुम्हारी कन्या को तुम्हें देता हूँ, परन्तु साथही इस बात की हिदायत भी करता हूँ कि अब यह लड़की तुम्हारे यहाँ न रह सकेगी, इसलिये
अकबर बीरबल विनोद २२०
अकबर बीरबल विनोद २२० तुम्हारो और इसकी इसी में भलाई है कि एक अच्छे बर की तलाश कर इसकी यथाशीघ्र शादी कर दो।” बूढ़े मनुष्य ने दीवानकी उचित सलाह को मानने का बचन दिया और उससे बिदा हो अपनी कन्या के साथ खुशी २ घर लौट आया। महाकाली के ठट्ठे एक दिन बीरबल को डराने के विचार से महाकाली ने अपना हजार मुख वाला विकराल रूप धारण कर रात्रि समय में उसको दर्शन दिया। बीरबल महामाया को देख हँसते हँसते उनको प्रणाम किया और फिर सन्न मार गया। इसका यह हाल देख देवी विचार-मग्न हो गई। उसने मन में विचारा—“पहले तो मेरे ऐसे भयानक स्वरूप को देखकर इसे डरना चाहिये था, सो यह कुछ भी भयभीत न हुआ। दूसरे मुझे देखकर हँसा, तीसरे तुरत ही गमगीन भी हो गया। इसलिये इसकी मार्मिक बातों का भेद लेना चाहिये। वह प्रगट में बोली-“भक्तवर बीरबल ! तू मुझे देखकर पहले तो हँसा फिर उदास क्यों हो गया।” बीरबल बड़ी दीनताई से बोला-“मातेश्वरी ! आप अन्तर- यामिनी हैं, आपसे किसीका कुछ छिपाव नहीं है। फिर भी आपके पूछने पर बिना बतलाये भी अनुचित है। मेरे हँसने का यह सबब है कि आपका दर्शन कर मैं बड़ा आनन्दित हुआ, परन्तु दूसरा कारण मैं नहीं बतलाऊँगा।” जब देवी ने उसे धीरज देकर अभयदान देने का वचन
२२१ अकबर बीरबल विनोद
२२१ अकबर बीरबल विनोद दिया तो बीरबल बोला-“हे जगज्जननी जी! मैं अपने मन में अनुमान कर रहा था कि मुझे केवल दो हाथ एक सिर और एक नाक है और आपको हजार शिर हजार नाक और केवल दो ही हाथ हैं। मैं जोखाम होने पर एक ही नाक को अपने दोनों हाथों से साफ करते २ थक जाता हूँ, फिर जब आपको जुखाम होगा तो आप हजार नाकों को केवल दो ही हाथों से कैसे साफ करेंगी। मुझे इसी चिन्ता ने शोकित कर दिया था। देवी अपने भक्त बीरबल के उत्तर से सन्तुष्ट हुई और उसको आशीर्वाद देती हुईं अन्तर्धान हो गई। हम दोनों एक साथ आवेंगे एक दिन कोचीन नगर से चलकर दो व्यापारी दिल्ली शहर में आये और घूमते फिरते एक नगर सेठ के पास जापहुँचे। नगर सेठ के सात्विक और सरल स्वभाव को देख कर इनके मन में बेईमानी समाई और उसे ठगने का विचार किया। ये थोड़ेसे आभूषण भी अपने साथ लाये थे, उसे व्यापारीको दिख- लाकर बोले-“आप मेरे इन आभूषणों को बिकवा दें तो हमपर आपका बड़ा उपकार होगा।” व्यापारी आभूषणों को देखकर उत्तर दिया-“आपका कहना बहुत ठीक है, पर यह कोई लड़कों का खेल नहीं है जो इधर बनाया और उधर बिगाड़ दिया। जब मैं इसे कुछ लोगों को दिखलाऊँगा और उन्हें पसन्द आयेगा तब कहीं बिकेगा। आप लोग आभूषणों को मेरे यहाँ छोड़ जाइये, फिर दूसरे दिन दोपहर में आना।”
अकबर बीरबल विनोद २२२
अकबर बीरबल विनोद २२२ ठगों ने कहा-"बहुत अच्छा, हम कल दोपहर को आपके पास आवेंगे, परन्तु आप भी एक बातका ध्यान रखना कि जब हम दोनों ही एक साथ होकर आवें तो आभूषणों को देना अन्यथा नहीं।" वे ठग इस प्रकार उसे बातों में बाँधकर वहाँ से आगे बढ़े। कुछ दूर जाकर वे फिर वापस लौटे। उनमें से एक आदमी कुछ दूर मोड़ पर एक आदमी से झूठी गप्प मारने लगा और दूसरा उस सेठ की दूकान पर पहुँचकर बोला-"सेठजी ! हमारा विचार रास्ते में जाकर पलट गया इसलिये हमको फिर लौटकर आपके पास आना पड़ा। हम चाहते हैं कि इस समय आप हमारे आभूषणों को लौटा दें, कल दोपहर को हम इनको लेकर आपके पास आवेंगे, तबतक आप भी ग्राहक ठीक कर रक्खें।" सेठने कहा-"तुम्हारी चीज तुमको लौटाने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है परन्तु तुमारा दूसरा साथी कहाँ है; उसको भीअपने साथ लेकर आओ।" ठगने अँगुली का संकेत कर उसे नुक्कड़ पर एक दूसरे आदमी से बातचीत करते हुए दिखलाया। व्योपारी ने देखा तो बात सही थी। वह नुक्कड़ पर खड़ा होकर किसी से कुछ वार्तालाप कर रहा था। व्योपारी को अब कोई शक न रहा, वह आभूषणों को तत्काल उसे दे दिया और अपने काम में दत्तचित्त हुआ। उसको इनकी तरफ से कोई शंका नहीं थी क्योंकि उसका हृदय साफ था। इससे वह दूसरोंको भी अपने ही समान समझता था। दूसरे दिन दोपहर के समय दूसरा ठग आया और सेठ से अपने गहनों की माँग। सेठने कहा-"गहने तो कल ही
२२३ अकबर बीरबल विनोद
२२३ अकबर बीरबल विनोद यहाँ से ले गये अब फिर क्या माँगने आये हो। ठग बोला- “कौन ले गया ?” सेठने उत्तर दिया-“तुम्हारा साथी।” वह कुछ क्रुद्ध होकर बोला-“आपने यह अनुचित किया है हमने आपको उसी समय सचेत कर दिया था कि जब हम दोनों एक साथ होकर आवें तो आप गहनों को वापस देना; फिर आप अकेले एकको क्योंकर दिया। आपकी यह थोथी दलील है, हमारा आभूषण हमें दीजिये।” सेठने जवाब दिया-“आप भी तो उस नुकड़ पर खड़े थे, जब कि आपका भाई लेने आया था।” ठग बोला-“इससे क्या ! मैं उसे गहने वापस लेने को नहीं कहा था। आप मेरे आभूषणों को वापस दें नहीं तो मैं आप पर नालिश करूँगा और नाहक आपको भी जेरबार होना पड़ेगा।” सेठ भी कुछ कहता और यह भी कुछ कहता, यहाँतक कि कहासुनी में घण्टों बीत गया; परन्तु वह ठग किसी प्रकार राजी नहीं होता था। तब क्रुद्ध होकर नगर व्योपारी ने कहा-“जा जो तेरे जीमें हो सो कर, मैंने तेरा कुछ कर्ज नहीं खाया है जो मुझे धमकी देता है।” ठग का तो मन बढ़ा ही था वह तत्क्षण बीरबल के पास जाकर फर्यादी हुआ। बीरबल उसकी फर्याद सुनकर तुरत व्योपारी को बुलवाया, जब वह आया तो बोला-“यह क्या कहता है, इसका व्योरा बतला।” वह व्योपारी शुरू से आखीर तक जो जो बातें हुई थीं बयान किया और तीन चार प्रतिष्ठित पुरुषों को साक्षी दिलवाई। बीरबल सारी बातों को सुनकर निश्चित कर लिया कि नालिश झूठी है
अकबर बीरबल विनोद २२४
अकबर बीरबल विनोद २२४ परन्तु फिर भी बिना किसी अपराध में गिरफ्तार किये सजा भी नहीं दी जा सकती। अतएव वह नालिश करने वाले व्योपारी से बोला-“तुमने यही कहा था न कि हम दोनों जब एक साथ आवें तभी आभूषणों को वापस देना?” उसने कहा-“हाँ, जो आप कह रहे हैं बिल्कुल कौड़ी पाई सत्य है, यही बात पक्की हुई थी।” तब बीरबल बोला-“जब ऐसी शर्तें तय हुई हैं तो फिर तुम अकेले क्योंकर आये। आप अपने भाई को साथ लेकर आओ तो मिलेगा।” ठग की दाल न गली बीरबल की ऐसी आज्ञा सुन वह वहाँ से खिसक गया। बीरबल नगर सेठ से बोला-“सेठजी! देखना, यदि यह इतने पर भी न माने और कदाचित आपसे फिर आभूषण माँगने आवे तो दोनों को मेरे पास पकड़ कर लाना। यदि दोनों ही साथ आवे तो अति उत्तम हो, नहीं तो इसे तो कदापि न छोड़ना।” सब लोग बीरबल की अनुमति से अपने २ घर गये; परन्तु ठगों का फिर कहीं पता न चला।
सुनार के हथकोड़े एक रोज बादशाह ने बीरबल से पूछा-“क्या यह बात सही है कि कारीगर लोग मालिक की आँखों में धूल झोंककर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं? इस विषय की लोगों में बराबर चरचा सुनने में आती है।” बीरबल ने कहा-“पृथिवी- नाथ! यह तो आँख देखी और कान सुनी बात है। जो जिस काम को करता है, वह उसमें पंडित हो जाता है। बादशाह
२२५ अकबर बीरबल विनोद
२२५ अकबर बीरबल विनोद ने फिर पूछा-“तो क्या सुनार लोहार दर्जी पेशा के सभी चोर ही होते हैं ?” बीरबल ने उत्तर दिया-“मैं यह कैसे कह सकता हूँ कि सभी कारीगढ़ चोर ही होते हैं, परन्तु फिर भी कितनों की चोरी सब को विदित हो चुकी है। जैसे सुनार ही को लीजिये । इनके सम्बन्ध में लोगों का विश्वास है कि कोई चाहे कितनी ही इनकी चौकसी करे, परन्तु ये येनकेन प्रकारेण माल में से चोरी कर ही लेते हैं। इनकी इस कला की चालाकी संसार में विख्यात है, लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि दुनियाँ की बातें तो दरकिनारे रहीं। ये अपने माता पुत्री तथा बहनों के आभूषणों में से भी चोरी करते हैं। यदि कहीं चुराना भूल गये तो समझ लीजिये कि उस रात में उन्हें नींद हराम हो जाती है ये कपटमुद्रा कर जबतक उसमें से कुछ माल निकाल न लेंगे, तबतक इनके पेट में चूहे कूदा करेंगे । इस सम्बन्ध की एक घटना मेरी आँखों के सामने भी घटी है, उसपर जरा विचार कीजिये। एक गाँव में एक वृद्ध सुनार रहता था बुढ़ापे के कारण वह सुनारी का काम नहीं कर सकता था। इसलिये विवश होकर दूकान में बैठा बैठा अपने एकलौते लड़केको सोनारी का काम सिखाया करता था। यदि लड़का कहीं चूक करता तो वह तुरत उसकी भूल सुधरवा देता था। दैवयोग से उस वृद्ध सुनार की लड़की ससुराल से पीहर आई। उसे भी कुछ सोने के गहने बनवाये थे। अतएव अन्य जगह न देकर उसने अपने भाई से ही गहने बनवाना उत्तम समझा। उसका ख्याल था कि भाई के हाथ १५
अकबर बीरबल विनोद २२६
अकबर बीरबल विनोद २२६ से बने हुए गहनों में फरक नहीं पड़ेगा। दूसरे सुनारों का क्या विश्वास । वह अपना सब सोना भाई को देकर आप उसके पास बैठकर गहने बनवाने लगी। उसका बूढ़ा बाप भी वहीं दूकान में बैठा हुआ था। बूढ़े ने मन में अनुमान किया- "जो मैं लड़के से प्रगट रूप में कहता हूँ तो लड़की सारी बातें जान जायगी और यदि नहीं कहता हूँ तो लड़का बहन के गहने सोच कर उसमें से चोरी नहीं करेगा। तब तो मेरे इस पेशेका नाम कलंकित होगा।" वह अँगड़ाई लेता हुआ बोला-"अरे राम अपने लिये तो सभी एक समान हैं।" ठग जाने ठगही की भाषा, ताते उमा गुप्त करि राखा।" वाली घटना घटी। लड़का बाप की शिक्षा से धीरे धीरे पंडित हो चुका था। उसने अपने पिता के कहने का भावार्थ समझ लिया; परन्तु प्रगट रूप से पिता को कुछ उत्तर नहीं दिया । बूढ़े ने समझा कि शायद लड़के को मेरा सांकेतिक शब्द समझ में नहीं आया अतएव रह रह कर वही पहले वाला शब्द पुनःपुनः कहने लगा। लड़का दत्तचित्त हो अपनी बहन से बातें करता हुआ गहने गढ़ रहा था। पिता के बारबार के टोकारे से खीझ कर बोला-"पिता जी ! आज आप इतना राम राम क्यों कह रहे हैं। अरे राम ने तो बहुत पहले ही लंका नगरी को लूट लिया था, अब उसमें रक्खा ही क्या है। अपने लाड़िले से ऐसा सन्तोषप्रद उत्तर पाकर वृद्ध गद- गद हो गया और उसे अपने पुत्र पर बहुत भरोसा हुआ।
२२७ अकबर बीरबल विनोद
२२७ अकबर बीरबल विनोद वह लड़का “कौवा से कबेला चतुर ।” वालो कहावत पहले ही चरितार्थ कर सोने की एक गुल्ली माल में से कपट कर राख में छिपा दिये था। इस घटना को सुनकर बीरबलने कहा- “पृथ्वीनाथ! कारीगर बड़े बज्र बेहया होते हैं। वे अपने कला में जब तक चोरी करना नहीं जानते तबतक उनको अपने कारीगर होने में सन्देह ही बना रहता है। आप इसे पक्का समझें कि जो जितना बड़ा कारीगर होता है वह उतनाही चोर भी होता है। यही इनकी विशेषता है कि माल चुरा लेते हैं और दूसरों पर इनका भेद प्रकट नहीं होने पाता। सुनार तो शास्त्रों द्वारा इस फन में विख्यात हैं। इनका नाम शास्त्रकारों ने “पश्यतो हर” बतलाया है। इसका भावार्थ यह है कि यह आँख के सामने ही चोरी करते हैं, परन्तु देखने वालों की बुद्धि कुछ काम नहीं करती।” व्यसनी की लत एक दिन बादशाह बीरबल के साथ नगर में होकर हवा खोरी के लिये निकला था। एक जगह नुक्कड़ पर उसे एक औरत दिखाई पड़ी। वह महा फूहड़ देख पड़ती थी। उसके मोटे मोटे होठों के बीच से दो बड़े २ दाँत बाहर को झाँक रहे थे। नाक से पोटा जारी था। मलीन वस्त्र, खुले बाल और शरीर पर मिट्टी पानी मिश्रित दाग पड़े हुए थे। बात करते समय मुँह से थूक बाहर निकला आता था। कहाँ तक कहें वह सर्वांग फूहड़ थी। राजा की तो बात ही अलग है, उसके
अकबर बीरबल विनोद २२८
अकबर बीरबल विनोद २२८ हाथ के स्पर्श किये फल तक भी किसी रंक का खाने को जी नहीं चाहता था। वह स्त्री गर्भिणी थी। यह देखकर बादशाह को बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बीरबल से बोले- "बीरबल ! जरा कामदेव का प्रबल प्रभाव तो देखो ! जिसके देखने मात्र से घृणा उत्पन्न होती है, उसके साथ रमण करनेवाला भला कैसा होगा ?" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ ! भूखे को जूठा मीठा नहीं सूझता। निद्रा देवी के आवाहन के समय मुलायम सेज वा जमीन का विचार नहीं उठता। उसी प्रकार कामकी ज्वाला के सामने भी भले बुरे का परिज्ञान भूल जाता है। उस समय काम से पीड़ित व्यक्ति को न जात सूझता है न कुजात। आपको अन्वेषण करने पर ऐसे बहुतेरे पुरुष मिलेंगे जो देखने में तो बड़े सुन्दर और फिटिक बाज होंगे, परन्तु ऐसी २ गलीज जगहों में उन्हीं का नम्बर निकलता है।" बादशाह ने कहा-"हाँ तुम्हारा कहना भी सत्य हो सकता है। इसलिये मैं चाहता हूँ कि इससे रमण करने वाले की खोज की जाय। मैं उसे देखना चाहता हूँ। बीरबल बोला- "शायद कुछ देर अगल बगल के लोगों से पूछताछ करने पर कुछ भेद खुले। ऐसा विचार कर वे वहाँ से कुछ दूर निकल गये, परन्तु बीरबलको उस बात की ही धुन बँधी रही। वह बराबर उसी स्त्री की तरफ लगा हुआ था। थोड़ी देर बाद एक ऐसी घटना घटी कि एक कामी पुरुष उसके बगल से होकर निकला और उस स्त्री से कुछ संकेत द्वारा कहकर आप आगे निकल गया। वह देखने में किसी उच्च कुल का जान पड़ता था, परन्तु
२२६ अकबर बीरबल विनोद
२२६ अकबर बीरबल विनोद स्वभाव से लम्पट प्रगट होता था । बीरबल ने उसे बादशाह को दिखाकर कहा-"पृथिवीनाथ ! यही पुरुष उस स्त्री का यार जान पड़ता है।" बादशाह को बीरबल की बातों से आश्चर्य हुआ और वे बोले- "इसपर कैसे विश्वास किया जाय ?" बीरबल ने उत्तर दिया-"उसकी तरफ कुछ देर तक ध्यान- पूर्वक देखने से आपको स्वयं सिद्ध हो जायगा।" बादशाह ने बीरबल के कहने का अनुशरण किया। वे अनजानों की तरह उसकी दृष्टि बचा कर बराबर उसी तरफ देखते रहे। कुछ कालोपरान्त वह लम्पट फिर घूम कर आया और अँगुली के संकेत से उसे कुछ कहकर आप अग्रसर हुआ। महामायां भी उसके पीछे २ चलीं। कुछ देर के बाद वे दोनों एक गली में मुड़कर इनकी आँखों से ओझल हो गये। यह देख कर बादशाह का भ्रम मिट गया और उन्हें उस लम्पट का जार उस होना निश्चित हो गया। परन्तु फिर भी उधर ही दृष्टि अड़ाये रहे। अब ये दोनों आगे बढ़े। बादशाह को बीरबल की परख पर बड़ा आश्चर्य हो रहा था। इसलिये बीरबल को छेड़कर बोले-"बीरबल ! तुम्हारी परख तो बड़ी सच्ची निकली। परन्तु यह तो बतलाओ कि पहले तुमने उसको कैसे पहचाना था।" बीरबल बोला-"पृथिवीनाथ ! यह सब आँखों की खूबियाँ हैं। हम लोग नगर में निकलते हैं तो बरा- बर रास्ते में आने जाने वालों की चाल ढाल का निरीक्षण किया करते हैं। जिससे आँखों को मनुष्यों से मिलकर वा दूर से देखकर उनके आचरण समझलेने की शक्ति प्राप्त हो गई है। मैं बहुत देर से बराबर उस लम्पट की हरकतों
अकबर बीरबल विनोद २३०
अकबर बीरबल विनोद २३० को देख रहा था। पहले जब वह आया तो उसके हाथ पर केवल खैनी थी। चूने की तलाश में अगल बगल की दीवारों को देखता जा रहा था। दैवात् एक सण्डास पर ताजा चूना छूया गया था। झट अँगुलियों से चूना पोछकर खैनी बनाकर खा लिया। अब आपही बतलावें कि जो सण्डास का चूना खैनी में मिलाकर खाने में नहीं हिचकता उसके लिये यह काम करना कौनसा आश्चर्य है।” उसी समय मुझे विदित हो गया कि यह व्यक्ति व्यसनों का सच्चा गुलाम है। बादशाह को बीरबल की ऐसी गुप्त पहिचान से बड़ी प्रसन्नता हुई और वह घर आकर उसको एक जोड़ी दुशाला पारितोषिक दिया। ━०*०━ लोहा और पारश का स्पर्श एक दिन सन्ध्या समय बादशाह बीरबल को साथ ले घोड़सवारी द्वारा हवा खाने के लिये महल से बाहर निकले। ये आपस में वार्तालाप करते हुए मध्य बाजार में जा पहुँचे। वहाँ सब प्रकार की वस्तुएँ बिक रही थीं, परन्तु इन्हें क्या प्रयोजन जो कहीं उतर कर कुछ सौदा खरीदते। इसी बीच बादशाह की दृष्टि एक वृद्धा स्त्री पर पड़ी। उसके हाथ में पुरानी म्यान से ढकी हुई एक तलवार लटक रही थी। उसकी तलवार देखते ही बादशाह के जी में आया कि अक्सर पुराने लोगों के पास अच्छी वस्तुए निकल आती हैं। इसलिये
२३१ अकबर बीरबल विनोद
२३१ अकबर बीरबल विनोद
इस वृद्धा की तलवार को देखना चाहिये। वह घोड़े की राश को बुढ़िया की तरफ मोड़ दिया। जब घोड़ा उसके समीप पहुँचा तो बादशाह ने उस वृद्धा से पूछा- "यह तलवार लेकर तू शहर में क्यों खड़ी है?" बुढ़िया ने दीनता भरी बाणी से कहा- "गरीबपरवर! मैं इसे बेचना चाहती हूँ। यह तलवार बहुत दिनों से मेरे घर में पड़ी हुई है आज बड़ी गिरीवस्था को प्राप्त होकर और कोई दूसरा सामान न रहने पर इस बेचने की गरज से बाज़ार में लाई हूँ।"
बादशाह उससे तलवार माँग उसे म्यान से निकालकर देखने लगे। वह एकदल खराब हो गई थी। उस पर जंग का गहरा परदा पड़ गया था और उसकी धार भी कई जगह से टूट गई थी। बादशाह ने बुढ़िया की तलवार को ज्यों का त्यों लौटा दिया। वह उसको हाथ में लेकर बड़े गौर से देखने लगी। ऐसा मालूम होता था मानो उसकी तलवार बदल गई हो। इसको ऐसी भौचक सी हुई देखकर बादशाह ने पूछा- "क्या बात है ! तेरी तलवार बदल तो नहीं गई है ?" वह वृद्धा बोली- "पृथिवीनाथ ! मैंने सुना था कि पारस के स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है, परन्तु यह हमारी लोहे की तलवार आपके पारस हाथों के स्पर्श से सोने की क्यों नहीं हुई। बस मैं यही देख रही हूँ।" बादशाह वृद्धा के इस उत्तर से गदगद हो गये और उसको तलवार के बराबर सोना देने की आज्ञा दी।
बीरबल अभी तक खड़े खड़े इनकी सब बातें सुन रहा था। बुढ़िया की बुद्धिमत्ता भरी बातें सुन और बादशाह
अकबर बीरबल विनोद २३२
अकबर बीरबल विनोद २३२ की उदारता देखकर उसे बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। दोनों सानन्द घोड़ा बढ़ाते हुये नगर से बाहर निकले। तुम बड़े गदहे हो एक दिन बीरबल और बादशाह दोनों एक साथ बैठे हुये आपस में कुछ वार्तालाप कर रहे थे। इसी बीच बीरबल को वायु सरी। बादशाह ने कहा-"बीरबल तुम बड़े गदहे हो।" बीरबलने उत्तर दिया-पृथिवीनाथ ! पहले तो मैं ऐसा नहीं था परन्तु गधों की संगत में पड़कर गधा हो गया हूँ। बीरबल के ऐसे उत्तर से बादशाह की बोलती बन्द हो गई। कौन कौन क्या क्या नहीं कर सकता एक दिन का यह समाचार है कि अकबर बादशाह दरबार में बैठे हुए सरकारी कामों को दत्तचित्त होकर देख रहे थे। जब वे उन कामों से निवृत्त हुए तो उन्हें गपाष्टक करनेकी सूझी और कुछ मुसाहिबों को साथ में लेकर आकाश पाताल की बातें करने लगे। कोई किसी विषय को लेकर विवेचन, करता, तो कोई किसी विषय को। इसी बीच बादशाह को पुराने कवियों का कहा हुआ एक दोहा याद आया- दोहा-"क्या नहिं अबला करि सकै, क्या नहिं सिन्धु समाय। क्या नहिं पावक जर सकै, क्यो काल न.हिं खाय ॥"
२३३ अकबर बीरबल विनोद
२३३ अकबर बीरबल विनोद वे दरबारियों से उपरोक्त दोहे का उत्तर पूछ बैठे, पर अफ- सोस कि एक दरबारी भी उत्तर देने को समर्थ न हुआ। तब बादशाह ने दीवानखाने से बीरबल को बुलवाया। जब वह आया तो उससे उसी दोहे का उत्तर पूछा-बीरबल अपनी बुद्धि से ऐसे ऐसे चुटकुलों को अँगुली पर नचाया करता था, वह तुरत बोला:- “पुत्र न अबला कर सके, यश नहिं सिन्धु समाय। धर्म अग्नि में नहिं जलै, नाम काल नहिं खाय ॥” बीरबल के ऐसे सटीक उत्तर को सुनकर बादशाह बहुत सन्तुष्ट हुए और बीरबल को कई बहुमूल्य आभूषण पारि- तोषिक में दिया। सभासद् बीरबल का मुख निहारते रह गये। उन लोगों ने बीरबल के बुद्धि की भूरि २ प्रसंशा की। दीपक तले अँधेरा एक दिन बादशाह अपनी सबसे ऊँची छतपर बीरबल के साथ बैठे हुए हवाखोरी कर रहे थे इसी बीच उनके सामने ही कुछ दूरी पर एक यात्री को कई चोर मिलकर लूटते हुये दिखाई पड़े। विचारे यात्री का कुछ वश नहीं चलता था। सारा धन लुट जाने पर उस यात्री ने बादशाह के महल के समीप पहुँच कर बम लगाया-“बड़े दुख की बात है, कि मैं सरकार के देखते देखते सरे बाजार लुटगया। बादशाह को इस यात्री की करुण कथा पर बड़ी दया आई और वे बीरबल