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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

५० आल्हखण्ड । ६८ तौ तौ लरिका देशराजका साँचो नाम उदयसिंहराय ८४ सवैया ॥ या कहिकै ऊदन त्यहि बार सो बेंदुल को लय ऊपर धाये । शुण्डसों दाबि लियो पचशबदा बापके बाहन बंधन आये ॥ कर बांधिलियो तबहीं करिया तहँ लै हौदा पै कूच कराये । ललिते मलखान तहां बलखान गुमानभरे रणखेतन आये ८५ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठे जैसे सिंह बिडारै गाय ॥ तैसे मारै औ ललकारै यहु रणबाघु बनाफरराय ८६ मलखे ठाकुरके मोर्चा पर कउ रजपूत न रोकै पायँ ॥ मारति मारति मलखाने जी पहुंचे जहां करिंगाराय ८७ देखिकै करिया राहुट हैगा औ मलखे से लगा बतान ॥ जो गति कीन्ह्यों बच्छराजकी सोई जानु अपनि मलखान ८८ त्यहिते तुमका समुझाइत है सम्मुख अवो न हमरे ज्वान ॥ सुनिकै बातें ये करिया की रिसहाभयो वीर मलखान ८६ ऐँड़ा मसके जब घोड़ी कें हौदा उपर पहुंची जाय ॥ पैर पकरिकै तब करियों के औ हौदा ते दीन गिराय ६० उतरिकै घोड़ा ते देवा तब औ हाथी पर भयो सवार ॥ छोरी मुशकें बघऊदन की यहु भीषमको राजकुमार ६१ रुपना वारी बेंदुल लीन्हे तापर बैठ´ लहुरवा भाय ॥ घोड़ा पपीहा की पीठी माँ तुरतै बैठ करिंगाराय ६२ मलखे ठाकुर ने ललकारा करिया खबरदार ह्वै जाय ॥ जियत न जैहौ तुम माड़ो को तुम्हरो कालरहा नगच्याय ६३ सुनिकै बातें मलखाने की तब जरिमरा करिंगाराय ॥

माड़ोका युद्ध । ६६ ५१ खैंचि सिरोही ली कम्मर से औ मलखे पर दई चलाय ९४ वार बचायो मलखाने ने करिया निकट पहूँच्यो जाय ॥ ढालकि औझरि मलखे मारा तब गिरपरा करिङ्गाराय ९५ घोड़ा पपीहा मलखे लीन्ह्यो औ क्षत्रिनते कह्यो सुनाय ॥ मारो मारो ओ रजपूतो तौ मिलिजाय बापका दायँ ९६ सुनिकै बातें मलखाने की ज्वानन खूब कीन घमसान ॥ रङ्गा बङ्गा शहाबाद के साथ म आये जौन पठान ६७ ते दउ मारैं दिशि करिया के रणमाँ बड़े लड़ैया ज्वान ॥ तिनके मुर्च्चा पर देवा रहे ठाकुर मैनपुरी चौहान ९८ सो- ललकारै तहँ रंगा को औ बंगाको दियो हटाय ॥ को गति बरणै तहँ देवा कै हमरे बूत कही ना जाय ६६ बड़ा लड़ैया रंगा रंगी जंगी खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचिकै मारा सो देवा को देवा लीन ढालपर वार १०० औ ललकारा फिरि रंगा को रंगा खबरदार ह्वैजाय ॥ खैंचि सिरोही देवा मारा रंगा गिरा भरहराखाय १०१ रंगा मरिगा जब मुर्च्चा पर बंगा चला तड़ाका धाय ॥ नंगी लीन्हें तलवारी को देवा पास पहूँचा आय १०२ सँभरिकै बैठो अब घोड़ापर तुम्हरो काल गयो नियराय ॥ यह कहि मारा तलवारी को बखतर काटि पार ह्वै जाय १०३ बचा दुलरूवा भीषमवाला ज्यहिका राखिलीन भगवान ॥ खैंचि सिरोही ली कम्मर ते औ हनिदियो बंगपरज्वान १०४ बंगा जूझा रणखेतन में तब जरिमरा करिङ्गाराय ॥ औ ललकारा रजपूतन को हमरे सुनो सिपाहिउ भाय १०५ जाय न पावैं मुहुबे वाले इनकी कटा लेउ करवाय ॥

५२ आल्हाखण्ड । १०० पिंशन देवे सब शूरन को दुहरी तलब देव करवाय १०६ सुनिकै बातें ये करिया की ठाकुर मोहबे का सरदार ॥ रिसहा ह्वैकै मलखाने तब गरुई हांक दीन ललकार १०७ जान न पावैं माड़ो वाले ओ रजपूतो बात बनाउ ॥ देव जगीरैं हम मुहबे माँ बैठे तीनि शाखिलौं खाउ १०८ सुनि सुनि बातें सरदारन की खूब लरिमेरे सिपाही जवान ॥ लालच लाग्यो अति रुपियाका सम्मुख लोहा लगे चवान १०६ सवैया ॥ सूमन को धन प्यार भलीविधि शूरन को धन नेक न भावै । शूर शिरोमणि भक्तनको धन प्रान द्वऊन को मोह न आवै ॥ सांच विभीषण की कहिये रहिये नहिं मौन यही मन भावै । प्रान धनौपर आनपरी ललिते तजि शान स्वई ढिग आवै ११० कौन गुमान करी अपने मन मान अमान लिये दुख पावै । मान वही रघुनाथ मिलैं नतु है अपमान यही कहि आवै ॥ ⊛ चार के साथ बचै नहिं एक विवेक से नेक यही मन भावै । गावै अमान न मानचहै ललिते रघुनाथ स्वई जन पावै १११ शूर सिपाही ईजतिवाले बोले द्वऊ दिशाके ज्वान ॥ काह बखानंत महराजा हौ यहनहिंसुनाचहैं हमकान ११२ देही नेही नरगेही के पाल्यो सदा द्रव्यसों प्रान ॥ मब भय आई नृपदेही में नेही नहीं हमारे प्रान ११३ ⊛ काम १ क्रोध २ लोभ ३ मोह ४ इन चारोंकी प्रबलता में एक देह नहीं बचसक्ती ॥

माड़ोका युद्ध । १०१ ५३ नालति त्यंहिकी रजपूती का पैदा होबे का धिकार ॥ सनमुख बैरी जो मारै ना रणमाँ लागैं प्राणपियार ११४ सुनिकै बातें रजपूतनकी दोऊ लड़न लाग सरदार ॥ मलखे करिया का मुर्चा है दोऊ विषधर बड़े जुझार ११५ करिया ठाकुर माड़ोवाला गरुई हांक देय ललकार ॥ सँभरिकै बैठो अब घोड़े पर ठाकुर मोहबे के सरदार ११६ इतना कहिकै करिया ठाकुर तुरतै ऐंचिलीन तलवार ॥ खैंचि कै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ११७ ढाल छूटिगै मलखाने कै दूनों हाथ गही तलवार ॥ ताकिकै मारा फिरि करिया को काटिकैगलानिकलिगैपार ११८ जूझिग करिया माड़ोवाला फौजैं रोईं छाँड़ि डिंडकार ॥ घोड़ बेंदुला की पीठी सों फाँदा उदयसिंह सरदार ११९ मूड पकरिकै सो करिया को धड़ते डारा तुरत उखार ॥ आल्हा ऊदन मलखे देवा सय्यद बनरस का सरदार १२० पांचो मिलिकै गे तम्बू में जहँपर रहै दिवलदे माय ॥ हाल बतायो सब द्यावलि को करियाशीशदीनदिखलाय १२१ शीश देखिकै त्यहि करिया को भइ मन खुशी देवलदे माय ॥ बड़ी बड़ाई की सय्यद की तुम्हरीदया जीति भै आय १२२ बड़ी सहाई की लरिकन की धर्मसों देवर लगो हमार ॥ सखा तुम्हारे की नारीहन सय्यद बनरस के सरदार १२३ कियो सहाई जस हमरी है तैसे भला करी कर्त्तार ॥ सय्यद बोले तब द्यावलिते सांची मानो कही हमार १२४ खुदा सहाई सब दुनियाँ का बिसमिल भलाकरैं सब क्यार ॥ बार न बांका इनका जाई अच्छा धर्म निबाहन हार १२५

५४ आल्हखण्ड । १०२ सुनिकै बातैं ये सय्यद की बोला उदयसिंह सरदार ॥ । आठमहीना कहि आये त्यन त्यहिते ह्वैगै बहुत अवार १२६ यहु शिर पठवो तुम मोहबे को दादा मानो कही हमार ॥ हार लयआयो यहु मल्हना को जामें मिलै जाय इउ हार १२७ सुनिकै बातैं ये ऊदन की रूपन बारी लीन बुलाय ॥ करिया ठाकुर को शिर लै कै आल्हा मोहवे दीन पठाय १२८ पूरि तरंग यहाँ सों ह्वैगै शारद तुही लगावै पार ॥ डगमग नैया भवसागर में माता तुही निवाहनहार १२६ पार को पावै यहु आल्हाकहि थाल्हा जौन शूरमनक्यार ॥ शारदमाता ज्यहि जिह्वा में ताको खेय लगावै पार १३० बन्दनकरिकै तिन शारद को ह्याँते करौं तरंग को अन्त ॥ सुनै सुनावै हरिगुण गावै ललिते स्वई जगतमें सन्त १३१ इति श्रीलखनऊनवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरआत्मजबाबू प्रयागनारा- यणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतकरियाबधोनामचतुर्थस्तरंगः ॥ ४ ॥ सवैया ॥ कूप तड़ाग औ मंदिर सुन्दर वृक्ष चिलौलहुके बहु राजैं। मंदिर में शिव मूरति थापित देखतही दुख दारिद भाजैं ॥ जानतहौं नहिं कौनैहिंथाप्यो भूरिदिनोंसे तहां सो बिराजैं। ग्रामक नाम बड़ी पड़री तहँ मंदिर में सगरेश्वर गाजैं १ सुमिरन ॥ वेनु बाँसुरी अब बाजै ना नाकहुँ फिरैं गलिनमें श्याम ॥ रहिगै ठकुरी ना दशरथ की ना रहिगयो धनुर्धर राम १

माड़ोका युद्ध । १०३ ५५ पैदा होई सो मरजाई आई कछू नहीं फिर काम ॥ भलो बुरो जो जग में करिहै सोई बना रही नितनाम २ परमसनेही रघुनन्दन बिन नेही और जगत में कौन ॥ तिनहित देही नरगेही तज जावै राम भौनको तौन ३ आलस देही नरगेही तज सो यमपुरी पहुँचे जाय ॥ पार न जावै बैतरणी के धरि धरि चील्हगीधसबखायँ ४ छूटि सुमिरनी गै देवनकै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ कल्हू पिरायी नृप जम्बै को ठाकुर उदयसिंह सरदार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ माहिल चलिभे ह्याँ उरई ते लिल्ली घोड़ीपर असवार ॥ तिक तिक हाँकै त्यहि घोड़ीका एँड़ी करें भड़ाभड़ मार १ थोड़ी देरी के अरसा माँ माहिल अटे मोहोबे आय ॥ पहिले मिलिकै परिमालिकको मल्हना भवन पहुँचे जाय २ दीख्यो मल्हना जब माहिलको उठिकै बड़ा कीन सत्कार ॥ पूँछन लागी फिरि भैयासों राजा उरई के सरदार ३ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे बोरेसे स्यये चारिहू भाय ॥ आठ महीना का कहिकै गे आयो एक साल नगच्याय ४ खबरि जो पाई कहुँ भाई हो हमको बेगि देउ बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये मल्हना की माहिल बोले बचन बनाय ५ मरे बनाफरगे माड़ो में खुपरी टँगी बरगदे डार ॥ सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना रोई छाँड़ि डिंडकार ६ स्वने कै लंका म्वारि जरिबरिगै अबधों कौन लगाई पार ॥ माहिल बोला फिरि बहिनीसों कीन्हे चुगुलिन का ब्यौपार ७ अब बुलवावो तुम पंडित को सूतक साइति करै बिचार ॥

५६ आल्हखण्ड । १०४ करो तिलाञ्जलि तिनपुत्रनको तुम्हरे हाथ होयँ उद्धार ८ इतना कहते भइ माहिल के रूपना अटा बराबरि आय ॥ मूड देखिकै त्यहि करिया का राजा गिरा पछाराखाय ६ हाथ जोरिकै रूपना बोला ओ महरजा रजापरिमाल ॥ मूड लयआये हम करिया को माड़ो कुशल तुम्हारे बाल १० जैसे पियासा जलको पावै सूखत परै धान में वारि ॥ रूपना बारी की बातें सुनि तैसे खुशीभये नर नारि ११ हल्ला सुनिकै नर नारिन सों मल्हना रूपना लीन बुलाय ॥ विदा मांगिकै माहिल चलिभे उरई तुरत पहुँचे जाय १२ मल्हना पूंछे तब रूपना ते बेटन हाल देउ बतलाय ॥ बदी सुनायो सब लड़िकनकै माहिल जौन हमारो भाय १३ सुनिकै बातें ये मल्हना की रूपना बोला शीशनवाय ॥ बेटा अनूपी टोंडर सूरज करिया सहित चारिहू भाय १४ चारो लड़का नृपजम्बा के बबुरीबन माँ गये नशाय ॥ खबरि तुम्हारी म्वहिं लेबे को पठयो वेगि उदयसिंहराय १५ हम चलि जावैं अब बबुरीबन हमको हुकुमदेव फर्माय ॥ कुशल तुम्हारी बिनपायेते ब्याकुल रहें चारिहू भाय १६ सुनिकै बातें ये रूपना की मल्हना हुकुम दीन फर्माय ॥ करो बियारी तुम महलन में माड़ो फेरि पहुँचो जाय १७ सुनिकै बातें ये मल्हना की रूपना जेयँ लीन ज्यँवनार ॥ सजा बछेड़ा तहँ ठाढ़ो थो रूपना फाँदि भयो असवार १८ सत्रहदिनकै मैजलि करिकै माड़ो फेरि पहुँचा जाय ॥ कही खबरिया सबमोहबेकी जहँ पर बैठ बनाफ़रराय १६ पाँचो मिलिकै सम्मत कीन्ह्यो यह फिरि ठीकलीन ठहराय ॥

माड़ोका युद्ध । १०५ ५७

किला घरेरैं अब लोहागढ़ लश्कर कूच देयँ करवाय २० पांचो मिलिकै सम्मत करिकै डंका तुरत दीन बजवाय ॥ घोड़ बेंदुला ऊदन बैठे मलखे चढ़े कबुतरी जाय २१ घोड़ मनोहर पर देवा है सय्यद सिरगा पर असवार ॥ आल्हा बैठे पत्रशब्दा पर सुमिरिकैदेव मोहोबे क्यार २२ कूच करायो बबुरीवनते लोहा गढ़ै पहुंचे जाय ॥ तोप लगायो तहँ फाटक पर बत्ती तुरत दीन करवाय २३ फाटक गाँसा जम्बै दीख्यो रानी महल पहुंचा जाय ॥ चारो पुत्रन कै सुधि करिकै रोवनलाग तहां पर आय २४ बंश बूड़िगा म्वर पापी का मेरो काल रहा नगञ्याय ॥ बड़ो लड़ैया सब शूरन में आल्हाकेर लहुरवाभाय २५ म्वहिं भय आई त्यहि ऊदनते ताते प्राण मोर घबड़ायँ ॥ सुनिकै बातें ये राजाकी बिजमाबोली बचन सुनाय २६ करिकै जादू मैं ऊदनको राखौं झारखण्ड में जाय ॥ इतनाकहिकै चली बिजैसिनि लश्कर तुरत पहुंची आय २७ डाखो गुटका मुखभीतर माँ जासों नजरबन्द हैजाय ॥ गायब ह्वैकै तहँ पर पहुँची जहँ पर रहै लहुरवाभाय २८ नारसिंह औ भैरों वाली तीसर जौन महमदा वीर ॥ पुरिया डारी तहँ जादू की ह्वैगे सबै बीर आधीर २९ डारि मशान दयो लश्कर में नाहीं मसा तलक भन्नाय ॥ जादू मारी बंगाले की ऊदन मेढ़ा लयो बनाय ३० लैके मेढ़ा बिजमाँ चलिभै पहुँची झारखण्ड में आय ॥ गुरू झिलमिलाकी मढ़ियामाँ मेढ़ा बँधा बिजैसिनिजाय ३१ हाथ जोरिकै गुरुबाबा के औ सब हाल दीन्ह समुझाय॥

५८ आल्हखण्ड । १०६ चली बिजैसिनि झारखण्डते पहुँची रङ्गमहल में आय ३२ जितने जादू बिजमाँ डारे सो लश्कर ते लये उतार ॥ उतरी जादू जब लश्कर ते चेते सबै शूर सरदार ३३ आल्हा बोले तब मलखेते नहिं लखिपरे लहुरवा भाय ॥ सुनिकै बातैं मलखे बोले देवा शकुनदेव बतलाय ३४ लैके पोथी ज्योतिष वाली देवा हाल गयो सब गाय ॥ गुरुझिलमिलाकी मढ़ियामाँ बांधा तहां लहुरवा भाय ३५ सुनिकै बातैं ये देवा की आल्हा बहुत गयो घबड़ाय ॥ देवा बोला फिरि मलखेते मानो कही बनाफरराय ३६ बाना छोरो रजपूती का अँगमाँ लेवो भस्म लगाय ॥ योगी बनिकै हम तुम जावैं तौ सबकाम सिद्ध है जायँ ३७ बातैं सुनिकै ये देवा की योगी बने बीर मलखान ॥ तुरतै चलिभे झारखण्ड को पहुँचे तहाँ दूनहू ज्वान ३८ गुरुझिलमिलाकी मढ़ियाढिग गावैं तान वीर मलखान ॥ बाजै डमरू भल देवाकै सो परिगई भनक त्याहिकान ३६ गुरु झिलमिला बाहर आयो योगी लखा तहाँ दुइ ज्वान ॥ हाथ पकरिकै लै मढ़िया में बाबा बड़ा कीन सनमान ४० बोले योगी हम दोउभाई ऐसा कह्यो वीर मलखान ॥ अब हम जावैं हरद्वार को चाहैं कछू नहीं सनमान ४१ रमता योगी बहता पानी ये नहिं करैं कतौ बिश्राम ॥ नहिं अभिलाषा क्यहू बातकी केवल जपें रामको नाम ४२ सुनिकै बातें ये योगी की बोला तुरत झिलमिला ज्वान ॥ जो कछु मांगो सो कछु पावो हमरे वचन करो परमान ४३ सुनिकै बातें ये बाबा की बोले तुरत बनाफरराय ॥

माड़ोका युद्ध । १०७ ५६ मेढ़ा पावैं यहु बाबा जो तौ हम हरद्वार को जायँ ४४ यहुतो कैदी है बिजमाका मांगो और बस्तु कछु भाय ॥ जो हम पावैं यहु मेढ़ा ना तुम्हरो योग अकारथ जाय ४५ सुनिकै बातें ये योगिन की झिलमिल मेढ़ा दीन गहाय ॥ योगी बोले तब झिलमिल ते याको मानुष देव बनाय ४६ तबजलछिनक्योझिलमिलतापर मानुष भयो लहुरवा भाय ॥ चलिकै बाहर भे मढ़ियाते बोल्यो तुरत उदयसिंहराय ४७ मारो दादा यहि योगी को तौ सब काम सिद्ध ह्वैजायँ ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की लौटा तुरत बनाफरराय ४८ मूड़ काटिकै फिरि बाबाको औ मढ़ियामाँ दीन चलाय ॥ तीनों चलिभे फिरि तहँनाते औ लश्करमें पहुंचे आय ४६ खबरि सुनाई सब आल्हा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अह्रतंका के मारू शब्द रहे हहराय ५० लैके फौजैं राजाजम्बा पहुँचा समरभूमिमाँ आय ॥ बम्बके गोला छूटन लागे धुँवना रहा सरग में छाय ५१ जौने हाथी के गोला लागै मानो गिरा धौरहर आय ॥ जौने बछेड़ा के गोला लागै मानो गिरह कबूतर खाय ५२ जौने क्षत्री के गोला लागै यमपुर तुरत देय दिखलाय ॥ गोला लागै ज्यहि सँड़िया के सो मुँहभरा तुरत गिरि जाय ५३ जौने तम्बू गोला लागै त्यहिकोलिये सरग मड़राय ॥ गोली ओली सम बर्षत भईं मानो मघा दीन झरि लाय ५४ भाला बलछी खट खट बोलैं डोलैं तीनों तहाँ बयारि ॥ कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि कहूँकहूँ देखिपरे तलवारि ५५ तेगा चटकैं बर्दवान के कोता खानी चलैं कटार ॥

६० आल्हखण्ड । १०८ चहला उठिरहि तहँ चरबिनकी औ वहिचली रक्तकी धार ५६ शूर सिपाही माड़ोवाले नंगी हाथ लिये तलवार ॥ चलै सिरोही तहँ सँभरा भरि ऊना चलै विलाइतिक्यार ५७ दूनों फौजैं यकामिल हैगइँ वीरन रहे वीर ललकार ॥ दुइ दुइ तुरैन के बँधवैया ई सब डारि भागि तलवार ५८ जितने कायर रहें फौजन में तर लोथिन के रहे लुकाय ॥ हेला आवै जब हाथिन का तब बिनमरे मौत है जाय ५६ देवा बोलै तब ऊदनते हमरे सुनो बनाफरराय ॥ भागे क्षत्रिन को मार्यो ना नहिं सब क्षत्री धर्मनशाय ६० फूल केतकी का सूंघ्यो ना जबलग फुलवामिलै गुलाब ॥ दाया राख्यो द्विज देवन में ऊदन यही धर्म की आव ६१ घोड़ी कबुतरी का चढ़वैया मलघे बड़ा लड़ैया ज्वान ॥ बहुतन मारै तलवारी सों बहुतन लेय ढालसों प्रान ६२ को गति बरणै तहँ सय्यद की नाहर सिरगापर असवार ॥ गुर्ज उठाये रणमाँ मटकै पटकै बड़े बड़े सरदार ६३ अली अली कहि सय्यद धावै रणमाँ गली गली है जाय ॥ भली भली कहि आल्हा बोले रणमाँ थली थली थर्राय ६४ चली चली तहँ धरती डोलै बोलैं हली हली सब गाय ॥ कली कली जस सारँग सम्पुट तैसे डली डली मिलिजायँ ६५ को गति बरणै समरभूमि कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ राजा जम्बा के मोर्चा पर कोउ रजपूत न रोकै पायँ ६६ चीरिकै धोती मारि लँगोटो कोउ कोउ अंग बिभूतिरमाय ॥ लोहुभरी माटी फिरि लैके रामानन्दी तिलक लगाय ६७ हमैं न मारो ओ रजपूतो हमतो जगन्नाथ को जायँ ॥

माड़ोका युद्ध । १०६ ५१ कोउकोउ ढालनको बचुकाकरि पीठिम डारिलीन भयखाय ६८ हम सौदागर हैं जयपुरके आये राजमहल में भाय ॥ पहिले फाटक के ऊपरमाँ मुर्चा परा बरोबरि आय ६६ जिन्हें पियारी रहें घर तिरिया तिन रण डारिदीन तलवारि ॥ हमें न मारो हमें न मारो दादा बापूकैरें गुहारि ७० त्यही समैया त्यहि अवसरमाँ बोला तहाँ बीरमलखान ॥ राजा जम्बाके मुर्चा पर ठहरे नहीं एकहू ज्वान ७१ सुनिकै बातें ये मलखे की आल्हा हाथी दीन बढ़ाय ॥ जम्बा केरे तहँ मुर्चामॉ पहुँचे तुरत बनाफरराय ७२ हाथी जानै भल आल्हा को यहु है देशराज को लाल ॥ देशराज औ बच्छराज दोउ मेरो भलो कीन प्रतिपाल ७३ ज्ञान जानवर में जैसो है मानुष नहीं दशो में पांच ॥ गर्भवती नारी के ऊपर फिरिनहिंचढ़ै जानवरसाँच ७४ ( रागानुरागोपदेशोपकारक सवैया ॥ ) साँच रह्यो मन ज्ञान विरागमें याँच रह्यो कर्त्ता कर्त्तारे ॥ आनि बिपत्तिपरी शिरऊपर राख हरी भर्त्ता भर्त्तारे ॥ जीव गुहारपुकार करी जब आय हरी कर्त्ता कर्त्तारे ॥ साँच न याँच करै ललिते तब नाहिं हरी भर्त्ता भर्त्तारे ७५ तैसो हाथी तहँ आल्हा को साँचो जाति पाँतिमें साँच ॥ मूंड़ि लपेटे जंजीरन को मारै हेरि हेरि दश पाँच ७६ बिकट लड़ाई हाथी कीन्ह्यो करणी रही समर में नाच ॥ जम्बा बोला तब आल्हा ते मानो बचन हमारे साँच ७७ तुम फिरिजावो म्वरे मुहराते हमरे बचन करो परमान ॥

६२ आल्हखण्ड । १९० अबै न आल्हा कछु बिगरा है नाकछु बहुतभयो नुकसान ७८ पुत्र हमारे मरि चारो गे हमरे बरै करेजे आग ॥ जो भगि जावो अब मोहबे को होवै बड़ी तुम्हारी भाग ७६ उठिकै हौदाते आल्हारण बोले दूनों भुजा उठाय ॥ रहे अधर्मी ना कौनों युग रावण कौरव के समुदाय ८० काह हकीकति त्वरि जम्बा है कोल्हू डारे बाप पिराय ॥ लरिका बिगरे अब ऊदन हैं जियतै कोल्हू डैरैं पिसाय ८१ सँभरिकै बैठै अब हौदापर जम्बा खबरदार है जाय ॥ मारु सिरोही म्वरि छाती माँ कैसी लाये शान धराय ८२ हमरो बाना मरदाना है यह हम ठीक दीन बतलाय ॥ उठै सिरोही जो रण हमरी तौ फिरि कौन परै दिखराय ८३ इतना सुनिकै नृप जम्बा ने कम्मर खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचि तड़ाका फिरि मारा शिर आल्हा लीन ढालपर वार ८४ आल्हा बोल्यो फिरि जम्बा ते दूसरि वार करो सरदार ॥ खैंचि सिरोही ज़म्बा मारी आल्हा लीन ढालपर वार ८५ कबों सिरोही जब बांधी ना मुर्चा खायगई तब धार ॥ वार तीसरी अब तुम मारो राजा माड़ो के सरदार ८६ साँकरि दीन्ही पचशबदाको आल्हा बोले वचन सुनाय ॥ हौदा गिरावै तुम जम्बा का हमरे निमक अदा है जाय ८७ खैंचि सिरोही दोउ हाथन सों जम्बा कीन तीसरी वार ॥ ढाल फटिगै गेंडावाली बचिगा आल्हा परमझुझार ८८ साँकरि फेरी पचशब्दाने हौदा तुरतै दीन गिराय ॥ आल्हा कूदे फिरि हौदा ते पकरयो नृपै तुरतही आय ८६ मलखे देवा सय्यद ऊदन चारो गये तहांपर आय ॥

बाँधिकै मुशकें नृप जम्बाकी कूदने लागि चारिहू भाय ६० रूपनबारी को बुलवायो ताही समय उदयसिंहराय ॥ तुम चलिजावो बबुरीबनका द्यावलि मातै लाउ बुलाय ६१ सुनिकै बातें ये ऊदन की रूपन तुरत पहुंचा जाय ॥ चढ़े पालकी द्यावलि आई जहाँपर रहे बनाफरराय ६२ आगि लगाय दई महलन में करिया पाखदये करवाय ॥ लैके कुंजी खोलि खजाना सो लक्कड़नमें लीन लदाय ६३ महल लूटिकै महारानिन के बबुरीबनका दीन पठाय ॥ तुरतै बांदी को बुलवायो औ यहकह्योउदयसिंहराय ६४ खबरि जनावो यह कुशलाको तुमको आल्हा रहे बुलाय ॥ सुनिकै बातें बघऊदनकी बाँदी तुरत पहुंचीजाय ६५ खबरि सुनाई सब कुशलाको आई सत्रू बेगिही धाय ॥ रानी बोली तहँ आल्हाते हमरे सुनो बनाफरराय ६६ हाथ औरतनपर छोड़योना नहिं सब क्षत्रीधर्म्म नशाय ॥ सुनिकै बातें ये कुशला की तुरतै ब्वला उदयसिंहराय ६७ नहीं जनाना म्वर बाना है जो हम डरैं और तैंमार ॥ चीरा कलँगी म्वरे बापके औ दै देव नौलखाहार ६८ डोला बिजैसिनि को मँगवावो हमरे साथ देउकरवाय ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की रानी गई सनाकाखाय ६६

  • कहा न मानै इन लरिकनका तो को बैठ पूत औ भाय ॥ यहै सोचिकै मन अपनेमाँ डोला तुरतदीन मँगवाय १०० चीरा कलँगीको मँगवायो औ दै डस्यो नौलखाहार ॥ ऊदन बरगदा के नीचेगे खपरी छुरी बापकी डार १०१ ऊदन देवा दोऊ मिलिकै कोल्हुन पास पहुंचेजाय ॥

६४ आल्हखण्ड । ११२ ठाढ़पिरायो नृप जम्बाको पाछे मूड़लीन कटवाय १०२ जहँ रहैं खुपड़ी देशराज की तहँ पर तुरतदीन टँगवाय ॥ तब रनबोले वहि समयामें स्याबसितुम्हेंउदयसिंहराय १०३ पूत सुपूते तुम अस होवैं नाही भलो गर्भ गिरि जाय ॥ पूत कपूते ज्यहि घर होवैं जरिजरिमरैंबाप औ माय १०४ पुरिखा रोवैं परे नरकमें नारी मरै जहर को खाय ॥ गली गली में भाई रोवैं करहत ज्ञाति परोसी जायँ १०५ पूत सुपुतिनि सिंहिनि माता निर्भय होय पूतको पाय ॥ गदही केरे दश बालक भे लादीअधिकअधिकसोजाय १०६ पूत सुपूता एक बंश में पालै जातिपांति को भाय ॥ जैसे बिरवा यक चन्दन को बनमाँ देय गंध फैलाय १०७ डाहु बुझान्यो अब जियरे को बैरी डारयो कल्हू पिराय ॥ लै कै खुपरी झरि काशी में किरियाकर्मकरो सबजाय १०८ इतना कहिकै रन झुप्पे भे आल्हा तुरत पहुंचे आय ॥ आल्हा बोले तहँ ऊदन ते लश्कर कूच देउ करवाय १०६ सुनिकै बातें ये आल्हा की रहिगे उदयसिंह शिरनाय ॥ खम्भ गड़ायो मलयागिरिको पंडित तुरतलीन बुलवाय ११० भाँवरि घूमी तहँ ऊदन ने आल्हा बोले बचन रिसाय ॥ नहिं लैजैहैं यहि मोहवे हम मानो कही उदयसिंहराय १११ जबसुधिकरि है पितु अपनेकी मारी स्त्रवत लहुरवाभाय ॥ कन्या वैरी की ज्यहिके घर नाचै मृत्यु शीश पर आय ११२ त्यहिते मारौ तुम ऊदन यहि तौ सब काम सिद्ध ह्रैजायँ ॥ ऊदन बोले तब आल्हा ते दादा साँची देयँ बताय ११३ हम जो मारैं यहि तिरिया को तौ रजपूती जाय नशाय ॥

माड़ोका युद्ध । ११३ ६५ बचन हमारे पर आई है मारैं कौन पारपर भाय ११४ आल्हा बोलैं तब मलखेते तुम सुनिलेउ हमारी ज्वान ॥ खैंचि सिरोही को कम्मरसे तुम यहि मरो बीरमलखान११५ सुनिकै बातें ये आल्हाकी मलखे रामचन्द्र को ध्याय ॥ खैंचिकै मारा रनि बिजमा को सो तहँ परी पछारखाय ११६ ऊदन दौरे त्यहि समया में गोदी तुरत लीन बैठाय ॥ आँसुन भिज्यो रनिबिजमाको धीरजदीन लहुरवाभाय ११७ यह नहिं जानत हम प्यारी थे तुमका मारैं बीर मलखान ॥ जेठे भाई मेरे मलखे हैं तिनसों काहकरौं मैदान ११८ और जो मारत कोउक्षत्री त्वहि तौ मैं कटा देत करवाय ॥ अब बसमेरो कछु प्यारी नहिं हैयहहु पितासरिस बड़भाय११६ धर्म पतिब्रत त्वर साँचो है हमरे मोह गयो मनछाय॥ अबकीबिछुुरी फिरिकबमिलिहौ साँचे हाल देउ बतलाय १२० सुनिकै बातें ये ऊदन की बिजमा बोली बचन सुनाय ॥ भोग बिलासै के कारण से संगिनिभइँनिपियातवआय१२१ जेठ हमारे मलखे लागैं तिन म्वहिं भुइँमादीनस्ववाय॥ मारे मलखे तहँ तुम जावो जहाँ न होय लहुरवाभाय१२२ शापित करिकै मलखाने को बिजमा बोली बचन उदार ॥ बेटी हैवे हम नरपति की फुलवा होई नाम हमार १२३ घोड़ खरीदन काबुल जैहौ तबहम मिलब तुम्हें सरदार ॥ यह तो देही हियनै रहि है नरवर लेव और अवतार १२४ इतना कहिकै रानी बिजमा औ मरिगई तड़ाका भाय ॥ लाश उठाई बघऊदन ने औ नर्मदा बहाई जाय १२५ कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥

६६ आल्हाखण्ड । ११४ लाखापातरि देशराज की सो बुलवई बीर मलखान १२६ संगै देवलि के पलकी त्यहि तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ जौन सिपाही रहें महोबे के आल्हा तुरत लीन बुलवाय १२७ साल दुसाला काहू दीन्हो काहू कड़ा दीन डरवाय ॥ चौरा कलँगी दी काहू को काहू मोहर दीन छिदाय १२८ कूच कराये लोहागढ़ते बबुरीबनै पहुंचे आय ॥ जितनी सामारहै माड़ो की ताको ठीकठाक करवाय १२६ जितनो करिया लै आवा ता ताते दशगुन अधिक बढ़ाय ॥ आल्हा लैके हुशियारी सों बोले मातै शीश नवाय १३० हुकुम जो पावैं महतारी को मलखे साथ बनारस जायँ ॥ चाचा दादा की किरिया करि पारैं पिण्ड गया में माय १३१ डरैं खुपड़ियाँ हम फलगू में तुमहूं कूच देव करवाय ॥ सुनिकै बातें ये आल्हा की माता बारबार बलिजाय १३२ स्यावसि स्यावसि सबदल बोल्यो भै मन बड़ेखुशी मलखाने ॥ पाँय लागिकै फिरि माता के तहँते चले दूनहू ज्वान १३३ ईतो पहुंचे हैं काशी में हाँ उन कूच दीन करवाय ॥ सत्रह दिनकी मैयाग परिकै सबदल अटा मोहोबे आय १३४ बाजै डंका ऊदन को बङ्का शङ्का को बिसराय ॥ कम्मर छोरैं कोउ कोउ क्षत्री कोऊ रहे रामको ध्याय १३५ सय्यद देवा ऊदन मिलिकै तीनों चले जहाँ परिमाल ॥ चरणन गिरिकै महाराजा के औसब कह्यो आपनो हाल १३६ तहँते उठिकै ऊदन चलिभे मल्हना महल पहुंचे जाय ॥ चरणन गिरिकै महरानी के अपना हाल गये सब गाय १३७ बड़ी खुशाली भै मल्हना के वरणी कौन भांति सो जाय ॥

माड़ोका युद्ध । ११५ ६७ दान दक्षिणा बाँटन लागी तुरतै महलनबिप्रबुलाय १३८ जितनी माया रहै माड़ो की सो सब ऊदन तुरत मँगाय ॥ जहाँ खजाना परिमालिक को तामें दीन सबै भरवाय १३६ बड़ी खुशहाली भै मोहबेमाँ घर घर होयँ मङ्गलाचार ॥ उजरिगो माड़ो त्यहिसमयामाँ जहँ तहँ घूमें श्वानासियार १४० मैं पदबन्दौं पितु अपने के फिरि फिरि बारबार शिरनाय ॥ करी सहायि यहि समया में ताते गयौं कथा सबगाय १४१ आशिर्वाद देउँ मुंशी सुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो होतो ना ललितेकहतकथाकसगाय १४२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द्र औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर १४३ माथ नवावौं रामचन्द्र को करिकै कृष्णचन्द्र को ध्यान ॥ दोउपद् बन्दों शिवशंकर के गणपतिगणाधीशबलवान १४४ दोउपद् ध्यावौं महरानी के जिनअभिमानी डरे नशाय ॥ पूरी तरंग यहाँ सों द्वैगै तव पद् सुमिरिदुर्गामाय १४५ इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजवाबूप्रयागनारायण जीकी आज्ञानुसार उत्तरामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसादकृतआल्हाविजयवर्णननामपञ्चमस्तरङ्गः ५॥ माड़ोका युद्ध समाप्त ॥ इति ॥

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अथ आल्हखण्ड ॥ नैनागढ़की लड़ाई अथवा आल्हाका विवाह ॥ सवैया ॥ दीनसहायक नाम तुम्हार सुना बहु ग्रन्थन में महराजा । है शबरी गजगीध अजामिल ते अजहूं जिहिकोयशछाजा॥ जो करणी सुमिरों इनकी तबहीं मन धैर्य्य लहै रघुराजा । दीन पुकारकरै ललिते प्रभु बेगि द्रवो हे गरीब नेवाजा १॥ सुमिरन ॥ गया न कीन्ही जिन कलियुगमाँ काशिम घोड़ दान नहिंदीन ॥ जन्मत बैरी जिन मारा ना नाहक जन्म जगत में लीन १ पूजा कीन्ही नहिं शम्भू की अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ॥ फिरि गलभँदरी जिनबाजी ना मुख ना बम्ब बम्ब गा छाय २ भसमरमायो नहिं देही माँ कवहूंन लीन सुमिरनी हाथ ॥ सोचन लायक ते आय हैं जिन नहिं कबौं नवायोमाथ ३ को अस देवता रहै शम्भूसम जिनको पूज्यो रामउदार ॥ वेद उपनिषदके ज्ञाता रहें जिनबल भयो रावणाद्धार ४