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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

६२ आल्हाखण्ड। शूर सिपाही बाजा सुनि सुनि मनमाँ अधिकअधिक हरषायँ ॥ मारु मारु कै कोउ बोलत भै कोऊ दांतन ओठ चबायँ ६५ या बिधि फौजैं सब दिल्ली की दावति चली कनौजे जायें ॥ आठ दिनौना के अर्सा में पहुँचीं जहाँ पिथौरा राय ६६ देखिकै फौजैं दिल्ली वालो ठाकुर समरधनी चौहान ॥ गले लगायो फिर हिरासिंह को कीन्ह्यो बहुतभांति सनमान ६७ गोबिंद राजै कान्ह कुँवर को भेंटत भयो पिथौरा राय ॥ कुँजधर ठाकुर और मुकुन्दा येऊ मिले शीश को नाय ६८ तम्बू गड़िगे महराजन के डेरा गड़े सिपाहिन केर ॥ बीचम तम्बू पृथुइराज को चारो तरफ रहे सब घेर ६६ गड़िगे झण्डा सब तम्बुन ढिग ते सब आसमान फहरायँ ॥ को गति बरौँ तिन झण्डन कै हमरे बून कही ना जाय १०० तंग बछेड़न के छूटतभे क्षत्रिन छोरिधरा हथियार ॥ ह्याँ महराजा कनउज वाला आला शूरवीर सरदार १०१ बहु ढुँढ़वावा त्यहि पिरथी का पावा कतों न पता निशान ॥ तब बुलवावा फिरि मंत्री को करिकै बहुतभांति सनमान १०२ हम सुनिपावा हरकारा सों मंत्री सुनो वचन धरिध्यान ॥ चढ़िकै आवा दिल्लीवाला ठाकुर समरधनी चौहान १०३ कालिह सबेरे संगर द्वैहै सीताराम लगइहैं पार ॥ पुरमें डौंडी को बजवावो सबियाँ होय फौज तय्यार १०४ सुनिकै बातें महराजा की मंत्री चला शीशको नाय ॥ जाय नगरची को बुलवायो ताको दीन्ह्यो हुकुम सुनाय १०५ ब्यारी करिकै फिरि संध्याको सोये तुरत पलँगपर जाय ॥ यहु महराजा कनउजवाला सोऊ महल पहुँचा जाय १०६

संयोगिनिस्वयंम्बर । २३ चौकी परिगै तहँ सोने की तापर बैठ राम को ध्याय ॥ मधुर मिठाई औ मेवा कछु भोजनकीन बहुतसुखपाय १०७ खबरि सुनई सब रानी को जो चढ़िआ पिथौराराय ॥ सुनिकै बातें महराजा की रानी बोली शीश नवाय १०८ तुम ना भाग्यो समरभूमि ते बहुतन धजीधजी उड़िजाय ॥ कोउ अमरौती ना खावा है नाकउआवा पीठिमढ़ाय १०९ कालके हाथ कमान चढ़ी है ना कोउ बची बूढ़ ना ज्वान ॥ यकदिन मरना है सबही को स्वामीकरो बचन परमान ११० जो तुम भगिहौ समरभूमिते बूड़ी तीनिसाखिको नाम ॥ लड़िकै मरिहौ जो सम्मुख में जैहौ तुरत राम के धाम १११ बचिकै अइहौ जो कनउज में पैहौ सदा नृपन में मान ॥ जीवन ताही को भलजानो जाकी रहै जगतमें शान ११२ ऐसी बातें रानी कहिकै पलँगापरै गई अलसाय ॥ राजौ सोये फिरि महलन में औअतिबिकृदनींदकोपाय११३ खेत छूटिगो दिननायक सों झंडागड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे चोरनखुशीभई अधिकाय ११४ होई लड़ाई अब आगे जस तब तस देबे गाय सुनाय ॥ बैठो यारो अब दमलेवो सीताराम चरणको ध्याय ११५ इति श्रीलखनऊ निवासि (सी, आई, ई) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजी की आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत पृथुइराज की चढ़ाई वर्णनंनाम द्वितीयस्तरंगः २ ॥

२४ आल्हखण्ड । सवैया ॥ हे मममातु बिदेह कुमारि खरारि किनारि पियारि पिताकी । जेऊ गये शरणागत में सुखि तेऊभये वसुधामें पताकी ॥ अन्तसमय स्वइ ऐसे भये जिनकी शरणागत इन्द्रहुताकी । दीन पुकार करै ललिते बलितेऊहौं जाऊं बिदेह सुताकी १ सुमिरन ॥ काली ध्यावों कलकत्ते की शारद मइहर की सरनाम ॥ बिन्ध्यवासिनी के पद ध्यावों ज्वालामुखिको करों प्रणाम १ देबी चण्डिका बकसरवाली तिनके दोऊ चरण मनाय ॥ देबी कुसेहिरी औ दुर्गा को ध्यावों बार बार शिरनाय २ महाकाल शिव उज्जैनी के जिनकाबिदितजगतपरताप ॥ तिनके दर्शन के कीन्हे ते छूटत नरन केर सब ताप ३ मैं पद ध्यावों शिवशंकर के काशी विश्वनाथ महराज ॥ जिनके दर्शन के कीन्हे ते अवहूं रहत जगत में लाज ४ फेरि मनावों रामेश्वर को पशुपतिनाथ क्यारकरिध्यान ॥ बैजनाथ लोधेश्वर गावों पावों बुद्धि और बल ज्ञान ५ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाखा सुनो शूरमन केर ॥ फौजैं सजिहैं चन्देले की कनउज लेई पिथौरा घेर ६ अथ कथाप्रसंग ॥ भयो आगमन जब सुर्यन को पक्षिन कीन बहुत तब शोर ॥ मुर्गा बोले सब गाँवन में जंगल नचनलाग तब मोर १ जगानगड़ची फिर कनउजमाँ करिकै कृष्णचन्द्र को ध्यान ॥ धरा नगाड़ा फिरि सँड़ियापर बाजन लाग घोर घमसान २ शब्द नगाड़ा का सुनतैखन खत्री सबै भये हुशियार ॥

संयोगिनिस्वयम्बर। २५ पहिरि सिपाही झिलमैलीन्ह्यो हाथ म लई ढाल तलवार ३ कच्छी मच्छी नकुला सब्जा हरियल मुश्की घोड़ अपार ॥ साजन लागे सब जल्दी सों जिनका तनक न लागैबार ४ डारि हयकलैं तिनके गलमा मुखमा दीन लगाम लगाय ॥ गंगा यमुनी छाँड़ि रकाबैं पूंजी पटा दीन पहिराय ५ नाल ठोकाई तिनके सुम्मन रेशम तंग दीन कसवाय ॥ को गति बरणै तिन घोड़न कै हमरे बूत कही ना जाय ६ हंथी महावत हाथी लै कै तिनका दीन तुरत बैठाय ॥ चुम्बक पत्थर का हौदा धरि जिनमें सेल बरौंवा खाय ७ साजि साँड़िया सब जल्दी सों छकरन लीन बरुद भराय ॥ बड़ी बड़ी तोपैं अष्टधातु की गोला एक मनाको खायँ ८ बैल नहाये तिन तोपन में औ डाँड़े को दीन हँकाय ॥ जागा राजा कनउज वाला मनमाँ श्रीगणेशको ध्याय ६ उठिकै महलन सों जल्दी सों औ दरबार पहूँचा आय ॥ हम्माँ जमाँ औ रायलंगरी इनका लीन्ह्यों तुरतबुलाय १० सुद्धत ठाकुर रतीभान औ दोऊ आंय गये दरबार ॥ माथ नवायो महराजा को दोऊ बड़े शूर सरदार ११ हाथ जोरिकै मंत्री बोल्यो राजन मानो बचन हमार ॥ हाथी घोड़ा सजे सिपाही छकड़ा नहे ठाढ़ तय्यार १२ धावन पठयो पृथीराज ने सो दरबार पहूँचा आय ॥ हाथ जोरिकै धावन बोल्यो ओ महराज कनौजीराय १३ मोहिं पठायो पृथुइराज ने औ यह कह्यो बात समुझाय ॥ डोला दैदें संयोगिनि का तौ हम लौटि धामको जायँ १४ नाहिंतो बचिहैं ना कनउजमाँ जो विधि आपु बचावै आय ॥

१. प्रथम भाग: नैनागढ़ व माड़ौ की लड़ाई, जच्छराज-वच्छराज बलिदान

२६ आल्हखण्ड । हवै भलाई डोला दीन्हें नहिं शिर कालरहा मन्नाय. १५ सुनिकै बातैं ये धावन की बोला तुरत कनौजीराय ॥ खवरि सुनावो तुम पिरथी को डाँड़ने कूच देयँ करवाय १६ जितनी राँड़ें लड़आये हैं सो बिन घाव एक ना जायँ ॥ खेदिकै मारों मैं दिल्ली लौं नेका टका लेउँ निकराय १७ दहीके धोखे कहुँ भूलैना जो वै जायँ कपास चबाय ॥ शूर सिपाही हैं कनउज के जिनका दीखे काल डेराय १८ सुनिकै बातें महराजा की धावन चला शीशको नाय ॥ खवरि सुनाई सब जयचँद की सुनि जरिमरा पिथौराराय १६. हुकुम लगायदद्यो क्षत्रिन को क्षत्री कमरबन्ध तय्यार ॥ लड़ने मरने के सब लायक एकते एक शूर सरदार २० मारू बाजा बाजन लागे घूमनलागे लाल निशान ॥ भयो सवार तुरत हाथीपर ठाकुर समरधनी चौहान २१ तीर कमान लयो हाथेमाँ कम्मर बँधी ढाल तलवार ॥ को गति वरणै तब पिरथी कै नाहर दिल्ली का सरदार २२ घूमन लाग्यो सब मुर्चन माँ तोपन गोला दीन भराय ॥ त्यही समइया त्यहि औसरमाँ यहु रणवाधु कनौजीराय २३ हुकुम लगायो रजपूतन को जल्दी कूच देउ करवाय ॥ आपौ चढ़िकै फिरि हाथीपर मनमाँ श्रीगणेशकोध्याय २४ चलिभो लश्कर सब कनउजते औ मुर्चा में पहुँचे आय ॥ बम्ब के गोला छूटन लागे हाहाकार शब्द गा छाय २५ को गति वरणै तब तोपनकै धुवना रहा सरग मड़राय ॥ गोला लागै जिन हाथिन के मानों गिरैं धौरहर आय २६ गोला लागै जिन ऊंटन के ते मुँहभरा गिरैं अललाय ॥

संयोगिनिस्वयंम्बर । २७ जौने बैलके गोला लागै मानों मगर कुल्याँचै खाय २७ जौने बछेड़ा के गोला लागै आधे सरग लिहे मड़राय ॥ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के साथै उड़ाचील्ह असजाय २८ बड़ी दुर्दशा भै तोपन में हाहाकारी शब्द सुनाय ॥ दोनों दल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द है जाय २९ गोला ओला सम बरसत भे सन सन सन्नकार गा ळाय ॥ चलैं बंदूकैं बादलपुरकी जो नब्बेकी एक बिकाय ३० मघा नखत सम गोली बरसैं डोलिन घहिया जायँ उठाय ॥ को गति वरणै बन्दूखन की हमरे बूत कही ना जाय ३१ दूनों दल आगेको बढ़िगे संगम भये शूर सरदार ॥ सूँढ़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुशभिड़े महौतनक्यार ३२ हौदा हौदा यकमिल हैगे क्षत्रिन खैंचि लीन तलवार ॥ भाला वरछिन सों कउ मारैं कोऊ लेयँ ढालकी वार ३३ सूँढ़ि लपेटे जंजीरन को हाथी रणमा रहे घुमाय ॥ लागि अँजीरै जिनके जावैं तिनके अंग भंग है जायँ ३४ मस्तक मस्तक गजके मारैं अद्भुत समर कहा ना जाय ॥ भाला छूटे असवारन के खन खन ठन्न ठन्न गा ळाय ३५ चम चम चमकैं तलवारी तहँ मर मर रगड़ ढालकी होय ॥ घम् घम् घम् घम् बजैं नगारा बोलैं मारु मारु सब कोय ३६ खट खट खट खट तेगा बोलैं बोलैं छपा छप्प तलवार ॥ झल् झल् झल् झल् झलूरी झलकैं तिनसों होयतहाँ उजियार ३७ ज्यहिकी वारन जो चढ़ि जावै सो हनिदेय ताहि तलवार ॥ अपन परावा कछु सूझैना दोनों हाथ होय तहँ मार ३८

२८ आल्हखण्ड । सवैया ॥ तीर छूटैं पृथुराज कमान सों ते बहु शूरन के शिरकाटैं। भूमिअकाशनदेखिपरे शिरऔभुजसों सबही दिशिपाटैं ॥ मत्त गयन्द गिरैं हहराय बजायकै ताल सबै नर डाटैं। शूरनकी ललकार सुने ललिते सब कायरके हियफाटैं ३९ भये सनाका कायर मनमाँ शूरन रहा मोद अतिछा बड़ी लड़ाई भै कनउज माँ कोउ रजपूत न रोकै पारे रकतकिनदियातहँवहिनिकरी जूझे बड़े बड़े सरद हाथी गिरिगे आस पास माँ सोहैं मानो नदी कगा छूरी मछली सम सोहत भईं ढालैं कछुवा सम उतर भुजा औ जाँधैं रणशूरन की गोहैं सरिस बही तहँ जा बहैं सिवारा जस नदिया माँ तैसे तहाँ वार उतर बहैं लहासैं जो शूरन की तिनमाचढ़े गिद्धलगजाये जैसे डेंगिया माँ चढ़िकै नर खेलैं नदी नेवारा उ तैसे लहासैं रण शूरनकी तिनपरचील्ह काग उतरा तीन दिनौना याविधि गुजरे तहँपर खूब चली तल ना ई हारे दिल्ली वाले ना उइ कनउज के सरद आगे बढ़िकै पृथुइराज ने गरुई हांक दीन लल बात हमारी तुम सुनिलेवो राजा कनउज के सरद डोला मँगावो संयोगिनि को सो रण खेलन देउ ध जीति विधाता जाको देई सो डोलाको ल्यई उठा बाम्हन केरी बहुवस्ती है ओ महराज कनौजी होई लड़ाई पुर भीतर में परजै दुःखमिली अधिक

संयोगिनिस्वयंम्बर । २६ दुखी जो बाम्हन हाँपर होइहैं तौ सब क्षत्री धर्म नशाय ॥ सुनिकै बातें पृथुइराज की भा मन खुशी चँदेलाराय ४६ डोला मँगायो संयोगिनि को सो रण खेतन दीन धराय ॥ देखिकै डोला संयोगिनि को बोला तुरत पिथौराराय ५० लड़ो सिपाही दिल्लीवाले डोला तुरत लेउ उठवाय ॥ जीतिकै चलिहौ जोकनउजते चौगुन तलब देब घरजाय ५१ दै दै पानी रजपूतन को पिरथी सब को दीन जुझाय ॥ फिरि मुकुन्द औ रतीभानको मुर्चा परो बरोबरि आय ५२ दोऊ बराबरि के क्षत्री हैं दोऊ समरधनी बलवान ॥ खैंचि सिरोही ली मुकुन्द ने करिकै रामचन्द्र को ध्यान ५३ हनिकै मारा रतीभान को ठाकुर लीन्ह्यों वार बचाय ॥ औ ललकारा फिरि मुकुन्दको अब तुम खबरदार द्वैजाय ५४ वार हमारी सों बचिहौना तुमका लावा काल बुलाय ॥ यह कहि मारा तलवारी को सो फिरि परी ढालपरजाय ५५ बचिगा ठाकुर दिल्ली वाला ज्यहिका राखिलीन भगवान॥ सो फिरि बोला रतीभान सों करिकै मनै बड़ा अभिमान ५६ किह्यो लड़ाई है लरिकन सों कबहूँन परा जवानते काम ॥ सँभरिकै बैठो अब घोड़ा पर तुमको पठैदेउँ यमधाम ५७ खैंचिकै मारा रतीभान को सोऊ लीन ढाल की वार ॥ मुठिया रहिगै कर मुकुन्द के रणमा टूटि गिरी तलवार ५८ गद्दी कटिगै मखमल वाली औ फटिगई गैंड़की ढाल ॥ रिसहा ह्वैगा रतीभान तहँ दोऊ नैन भये तब लाल ५६ ऐंचि सिरोही को कम्मर सों मारा रतीभान बलवान ॥ गिरा तड़ाका शिर धरती माँ मरिगा तुरत मुकुन्दाज्वान ६०

३० आल्हखण्ड । मरा मुकुन्दा रण खेतनमें सुद्धत ठाकुर चला रिसाय ॥ तब ललकारा त्यहि हिरसिंहने ठाकुर खबरदार है जाय ६१ जयो नगीचे ना डोलाके नहिं शिर धरती देउँ गिराय ॥ सुनिकै बातें ये हिरसिंह की सुद्धत भाला लीन उठाय ६२ ताकिकै मारा सो हिरसिंह के ठाकुर लैगा वार बचाय ॥ खाली वार परी सुद्धत की तबमनगयो सनाकाखाय ६३ ऐंचि सिरोही फिरि कम्मर सों मारा हरीसिंह को जाय ॥ बचिगा ठाकुर फिरि दिल्लीका औमनकोपकीन अधिकाय ६४ खैंचिकै मारा तलवारी को सुद्धत गिरा धरणि भहराय ॥ मरिगा ठाकुर जब कनउज का आयो हम्माँ जमाँ तब धाय ६५ हम्माँ जमाँ के तब मुर्चा में गोविंद नृपति पहुँचा आय ॥ औ ललकारा फिर शूरन को तुरतै डोला लेउ उठाय ६६ डोला उठायो रण शूरन ने औ दिल्ली को चले दबाय ॥ हम्माँ जमाँ तब निज शूरन ते बोले दोऊ भुजा उठाय ६७ जान न पावैं दिल्ली वाले मारो इनका खेत खेलाय ॥ सुनिकै बातें हम्माँ जमाँ की क्रोधित चले सिपाहीधाय ६८ चलीं जुनब्बी औ गुजराती ऊना चलै विलाइति क्यार ॥ भाला बरछिन की मारुइ भई कोताखानी चलै कटार ६९ कटि कटि क्षत्री गिरे खेत माँ हाथिन लागे ऊंच पहार ॥ पैदल पैदल सों मारुइ भई औ असवार साथ असवार ७० विकट लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो देवता कांपि उठे असमान ॥ शूर सिपाही ईजति वाले तिनतजिदीन सांसराप्रान ७१ मान न रहिगे कोउ क्षत्री के सब के टूटि गये अभिमान ॥ पृथुइराज औ जयचंद राजा दोऊ दीन लड़ाई ठान ७२

संयोगिनिस्वयम्बर। ३१ हमॉँ जमाँ औ गोबिंद राजा दोऊ समरधनी बलवान ॥ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं दोऊ एक बैस के ज्वान ७३ गदा बनेठी केर खिलारी करि पैंतड़ा लड़ैं मैदान ॥ बारु बराबरि प्राणन जानैं एकते एक बढ़े अभिमान ७४ हमॉँ जमाँ जब भाला मारैं गोबिंद राजा लेयँ बचाय ॥ मारैं गोबिंद तलवारी सों सोऊ लेयँ ढाल पर आय ७५ बड़ी लड़ाई भै गोबिंद कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ जो हम गावैं विस्तारित करि तौफिरिएकसाललगिजाय७६ खैंचि सिरोही हमॉँ जमाँ ने मार्यो बीच गला को ताकि ॥ तबहीं शिर धरती माँ गिरिगा बोल्यो मारुमारु मुह हांकि७७ बिन शिर धड़ रणमाँ तब दौरा हाथ में लिये ढाल तलवार ॥ ज्यहि दिशिजावै रणमंडलमें त्यहिदिशिजूंझैंशूरअपार ७८ ब्याकुल क्षत्री चौगिर्दा ते बिन शिर लड़ै वीरबलवान ॥ शंका ब्यापी रण शूरन के कायर भागे छांड़ि परान ७६ नील कि झंडी ताहि छुवायो छुवतैं गिरा तुरत भहराय ॥ तौलौं डोला संयोगिनि का लैगे ग्यरा कोस पर जाय ८० तब महराजा कनउज वाला बोला सब सों बचन रिसाय ॥ नालति ऐसी रजपूती का औधिरकाल जिंदगी भाय ८१ डोला जाई जो दिल्लीमाँ तौ यश जाई सबै नशाय ॥ मानुष देही फिरि मिलिहै ना तातेखालौ लोह अघाय ८२ बीर बखानों दुर्योधन को ज्यहियशआपनलीनबचाय ॥ जो कछु भाखासो सब राखा औतजिदीन पुत्रधन भाय ८३ धन्य बखानों त्यहि रावण को ज्यहि हरिलीन रामकी नारि ॥ सम्मुख जूझी त्यहि रथ्यतिसब करिकै रामचन्द सों रारि ८४

३२ आल्हखण्ड । समय समइया की बातें हैं समया परै न बारम्बार ॥ समया परिगा राजा नलपर खूंटी हरा नौलखाहार ८५ रोज न मुर्चा कनउज ह्वैहै रोज न चढ़ी पिथौरा ज्वान ॥ मारो मारो ओ - रजपूतो सुनिकै बात हमारी कान ८६ इतनी सुनिकै सब क्षत्रिन ने अपनो मरण कीनअख्तयार ॥ भाला बरछी दोउ दल छूटे औफिरिचलनलागितलवार८७ धरिधरि धमकैंकड़ाबीन कोउ कोऊ मारैं खेंचि कटार ॥ बड़ी लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो नदिया बही रकतकीधार ८८ जैसे फागुन फगुई खेलैं तैसे लड़ैं वीर चौहान ॥ मुहँ नहिं फेरैं समरभूमि ते एकते एक वीर बलवान ८६ तबलौं डोला संयोगिनि को पहुँचा तीस कोसपर जाय ॥ रिसहा राजा कनउज वाला बहुतक क्षत्री डरा नशाय ९० तबलौं डोला संयोगिनि को आइयो रतीभान तहँ जाय ॥ बहुतक क्षत्री घायल कैकै सो पृथीमाँ दीन खवाय ६१ कोगति वरणैं रतीभानकै हमरे बूत कही ना जाय ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै रणमाँ घोड़ा रहानचाय ६२ रतीभान के तब मुर्चा में कोउ राजपूत न रोंकै पायँ ॥ सम्मुख आवै जो लड़ने को ताको मारै खेत खेलाय ६३ देखि लड़ाई रतीभान की हिरसिंह ठाकुर उठा रिसाय ॥ औ ललकारा रतीभान को ठाकुर खबरदार ह्वैजाय ६४ तबलौं डोला संयोगिनि को दिल्ली शहर पहुँचा जाय ॥ पाछे मारै औ ललकारै यहु महराज कनौजीराय ६५ तीर अनेकन पिरथी मारे लाखन डारे शूर नशाय ॥ बड़ा लड़ैया यहुतीरन में ज्यहिका कही पिथौराराय ६६

संयोगिनिस्वयंम्बर । ३३ दिल्ली केरे तब फाटक पर भारी भीर भई तहँ आय॥ रतीभान औ कान्ह कुवँर तहँ दोऊ रहिगे पैर जमाय ६७ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं मानैं कोऊ नहीं तहँ हारि॥ वसरिन वसरिन याविधि खेलैं जैसे कुवाँ भरै पनिहारि ६८ बैस बराबरि है दोऊ कै दोऊ बड़े लड़ैया ज्वान॥ पृथुइराज औ जयचँदराजा येऊ करैं घोर घमसान ६६ शयलंगरी हिरासिंह ठाकुर येऊ खूब करैं तलवारि॥ अपने अपने सब मुर्चन में मानैं कऊ न नेको हारि १०० मारो मारो भुजा उखारो सब दिशि यहै रहे चिल्लाय॥ भरि भरि खप्पर नचैं योगिनी मज्जनकरैं भूत तहँ आय १०१ स्यार औ कुत्तनकी बनिआई कागन लागी कारि बजार॥ चील्ह गीध ये सउदा लै कै अपने घरका भये तयार १०२ रतीभान औ कान्ह कुवँर तहँ दोऊ बीर करैं मैदान॥ हनि हनि भाला दोऊ मारैं नहिं भयकरैं नेकहू ज्वान १०३ लाखन जूझे दिल्ली वाले लाखन कनउज के सरदार॥ रतीभानने त्यहि समया माँ हाथमलीन नांगि तलवार १०४ सवैया॥ जूझिगये बहु शूर अपार बही तहँ शोणित की अतिधारा। गावत चामुँड नाचत योगिनि प्रेत बजावत हैं करतारा॥ जोर बह्यो रतिभानकी खड्ग सो घोर मच्यो तहँ पै हहकारा। जात चढ़े शव ऊपर गृद्ध मनौं ललिते जल खेलैं निवारा १०५ को गति वरणै त्यहि समया कै हमरे बून कही ना जाय॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै यहु महराज कनौजीराय १०६

३४ आल्हखण्ड । कान्ह कुँवरहू अतिकोपित भा यहु रजपूत वीर चौहान ॥ लीन्हे भाला नागदवनि का क्षत्रिनमारिकीन खरिहान १०७ औ ललकारा रतीभान का ठाकुर खबरदार ह्वैजाय ॥ यह कहि मारा तलवारी का सोपै लैगा वार बचाय १०८ आपौ मारा तलवारी को परिगै कान्ह कुँवर शिरजाय ॥ ककरी ऐसी खपरी फाटी पै शिखांधि तहांरहिजाय १०९ खैंचि सिरोही को कम्मर सों मारा रतीभान को धाय ॥ रतीभान फाटक पर गिरिगे गिरिगो कान्हकुँवरभहराय ११० दोऊ जूझे जब फाटक में डोला अटा महल में जाय ॥ उतरिकै डोला सों संयोगिनि बैठी रङ्ग महल में आय १११ चंद कवीश्वर फिरि जल्दी सों पहुँचा जहां चँदेलाराय ॥ औ फिरि बोला हाथ जोरिकै ओ महराज कनौजीराय ११२ लाखन जूझे दिल्ली वाले लाखन कनउज के सरदार ॥ बड़ी लड़ाई दउदल कीन्ह्यो ज्यहिका रहा न वारा पार ११३ बचा पिथौरा अब इकलो है ज्यहिका राखिलीन भगवान ॥ त्यहि नहिं मारो महाराजा तुम मानों सत्य बचन परमान ११४ लौटि कनौजै जो चलि जइहौ कीरति बनी रही संसार ॥ हारि तुम्हारी कोउ गाईना राजा कनउज के सरदार ११५ कनउज तेनी औ दिल्ली लौं कीन्ह्यो घोर शोर घमसान ॥ अस कोउ क्षत्री मैं देखों ना जोफिरिकैरैसमरअभिमान ११६ चंद कवीश्वर की बातें सुनि बोला कनउज का महराज ॥ कहा तुम्हारो हम टारब ना मानोसत्यबचनकबिराज ११७ - बड़ो भरोसो तुम हमरो करि आयो मिलन हमारे पास ॥ कहा तुम्हारो जो मानैंना तौफिरिजावोआपनिराश ११८

संयोगिनिस्वयम्बर । ३५ करन निराशा नहिं चाहत हैं मानो सत्य बचन कबिराज ॥ तुमहूं जावो निज मन्दिर को हमहूं जात आपनी राज ११६ यह सुनि गमने चन्द कवीश्वर जयचँद कूच दीन करवाय ॥ राति दिनौनन के धावा करि पहुँचेकनउजमेंफिरिआय १२० पृथुइराज निज महलन पहुँचे पद्मिनि मिली तहांपर आय ॥ करि गन्धर्व ब्याह ताके सँग औसुखकरनलागिअधिकाय १२१ पूर स्वयम्बर संयोगिनि का गायों सत्य सत्य सब हाल ॥ माथ नवावों शिवशङ्करका अम्बुजसरिसनयनत्रयलाल १२२ किहे कोपिनी हैं सर्पन की धारे जटाजूट हैं शीश ॥ सकल जगत के सो स्वामी हैं किरपाकरें ललितपर ईश १२३ माथ नवावों पितु अपने को जिन म्वहिं विद्या दीन पढ़ाय ॥ आशिर्वाद देंव मुंशीसुत जीवहु प्रागनारायणभाय १२४ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १२५ इति श्रीलखनऊनिवार्सि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्त- र्गत पँडरीकलांनिवासि मिश्रबंशोद्भवबुध कृपाशङ्कर सूनु पण्डितललिताप्रसादकृत पृथुइराजजयचन्द युद्धवर्णनो नाम तृतीयस्तरङ्गः ॥ ३ ॥ संयोगिनिस्वयंम्वरसम्पूर्ण ॥ इति ॥

This page contains only an illustration (depicting the Rām Darbār / Lord Rama on the throne with Sita, Lakshmana, and attendants) framed by ornamental borders, with no printed text present to transcribe.

अथ आल्हखण्ड ॥ महोबे का प्रथमयुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ काको मैं ध्यावों मनावों सदा तुमको तजिकै सुनिये रघुनाथा । मेरे तो एक तुम्हीं प्रभुजी अब काह बनाय लिखों बहुगाथा ॥ स्वारथ साथ सबै नरदेत न देत कोऊ परमारथ साथा ॥ दीन पुकार करै ललिते प्रभु बेगिकरो जनजानि सनाथा १ सुमिरन ॥ कण्ठ में बैठो तुम कण्ठेश्वरि भुजबल बैठिजाउ हनुमान ॥ बैठु शारदा मोरि जिह्वा माँ जासों करूँ आल्ह को गान १ नहीं आसरा निजभुजबलको है यहु आल्हा सिंधु अपार ॥ डगमग डगमग नैया होवै माता तुही लगावै पार २ रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ जबलग रहे परीक्षित यार ३ अब बृद्धाई अति छाई है गाई जाय नहीं सो यार ॥

२ आल्हखण्ड । ३८ कलियुग बाबा की रजधानी माता तुही लगावै पार ४ जप तप भाग्यो मेरि देही ते अब मैं भयौं बहुत सुकुमार ॥ ताते नैया डगमग होवै बेड़ा कौन लगावै पार ५ तुही खेवैया शारद मैया माता खेय लगावै पार ॥ नाहिं तो बूडौं मँझधारा में माता होवै हँसी तुम्हार ६ छूटि सुमिरनी गै शारद कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ करिया आई अब मोहवे का जो जम्बैका राजकुमार ७ अथ कथाप्रसङ्ग ॥ एक समइया की बातें हैं यारो सुनिल्यो कांन लगाय ॥ परब दशहरा की बुड़की रहै गंगा न्हान सबै कोउ जाय १ बड़ा महातम श्रीगंगा को गायो वालमीकि महराज ॥ ब्यास बनायो महभारत जो तामें कह्यो जगत के काज २ सो सब जानै माड़ोवाला यहु जम्बै का राजकुमार ॥ हाथ जोरिकै फिरि बोलतभा दद्दुवा सुनिल्यो वचन हमार ३ भारी मेला श्री गंगा को दद्दुवा जाजमऊ के घाट ॥ पुरके बाहर हम देखा है जावैं राव रङ्क सब बाट ४ हुकुम जो पावैं हम दद्दुवा को तो गंगा को अवैं अन्ह्याय ॥ पाप नशावैं सब देही के गंगा चरण शरण में जाय ५ सुनिकै बातें ये करिया की जम्बै गोद लीन बैठाय ॥ चूम्यो चाट्यो गले लगायो बोल्यो बचन तुरत मुसुकाय ६ बारह वरसनका अरसा भो पैसा दीन न कनउज केर ॥ नायब मन्त्री चन्देले के तुमको लेयँ वहाँ जो हेर ७ बाँधिकै मुशकें म्वरे बचुवा त्वहिं तुरतै जेहल देयँ पहुँचाय ॥ पैसा देवौ तो बचिजावौ नाहिं तो जाय प्राणपर आय ८

महोबेकाप्रथमयुद्ध । ३६ ३ त्यहिते तुम का समुझावत हौं बचुवा मानो कहा हमार ॥ राह कनौजी कै तहँते है ठाकुर समरधनी तलवार ६ हाथ जोरिकै करिया बोल्यो दोऊ चरणन शीश नवाय ॥ मने न करिये म्वहिं गंगा को दहुवा बार बार बलिजायँ १० पार लगे हैं श्री गंगाजी मेरो बार न बांको जाय ॥ पकरो जइहौं जो मेला में पैसा माफ लेउँ करवाय ११ हुकुम जो पावौं मैं दहुवा को तौ फिरि गंगाअवौं अन्ह्याय ॥ बिनती सुनिकै बहु करिया की जम्बै हुकुम दीन फरमाय १२ हुकुम पायकै सो जम्बै को अपने कह्यो सिपाहिन बात ॥ करो तयारी जाजमऊ की गंगा न्हान हेतु हम जात १३ हुकुम पायकै सो करिया का तुरतै होन लागि तय्यार ॥ झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथ म लीन ढाल तलवार १४ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी लीन्हेनि कड़ाबीन सबज्वान ॥ बजे नगारा त्यहि सम या माँ भारी होन लाग घमसान १५ करिया चलिभा त्यहि समया माँ माता भवन पहूँचा जाय ॥ हाथ जोरिकै करिया बोल्यो माता चरणन शीशनवाय १६ मोहिं आज्ञा है दंदुवा की गंगा न्हान हेतु हम जायँ ॥ आज्ञा पाऊँ जो माता की तौसब काज सिद्धह्वैजायँ १७ बातैं सुनिकै ये करिया की मातैं हुकुम दीन फरमाय ॥ चूम्यो चाट्यो हृदय लगायो आशिर्वाद दीन हर्षाय १८ बहिनि बिजैंसिनि तब बोलत भै भैया बार बार बलिजाउँ ॥ मोहिं निशानी कछु लैआयो जासों यादिकरुं तव नाउँ १६ इतनी सुनिकै करिया बोला बहिनी मानो कहा हमार ॥ लवों निशानी मैं मेलाते बहिनी कहा न टारौं त्वार २०

४ आल्हखण्ड । ४० इतनी कहिकै करिया चलिभो फौजन फेरि पहुँचा आय ॥ तुरत नगड़ची को ललकार्यो मारू डंका देय बजाय २१ बजा नगाड़ा तब माड़ो में क्षत्रिन धरा रकावन पायँ ॥ आपो चढ़िकै फिरि घोड़ापर मनमें रामचन्द्र को ध्याय २२ कूच कराय दयो माड़ो सों पहुँचे जाजमऊ में जाय ॥ तम्बू गड़िगे तहँ करिया के चकरन विस्तर दीन बिछाय २३ उतरयो करिया तब तम्बू में मनमें सुमिरि शारदा माय ॥ लैकै धोती रेशमवाली गंगा निकट पहुँचा जाय २४ न्हवन करिकै श्री गंगा में आसन तहाँ लीन बिछवाय ॥ संध्या वन्दन करि प्रातः की विप्रन तुरत लीन बुलवाय २५ दान दक्षिणा दै विप्रन को तम्बू फेरि पहुँचा आय ॥ पहिरिकै कपड़ा अलबेला सो मेला फेरि पहुँचा जाय २६ जाय दुकानन माँ देखतभा कतहुँ न मिला नौलख्यहिहार ॥ तबलों माहिल उरई वाला तासों हैगै राम जुहार २७ माहिल बोल्यो तब करियाते ओ जम्बै के राजकुमार ॥ काह खरीदन को आयो है जो तुम घूमो सकल बजार २८ सुनिकै बातें ये माहिल की करिया बोला वचन उदार ॥ हार लखौटा नीको ढूंढें सो नहिं पावा कतौं बजार २९ बहिनि बिजैसिनि म्वरिमांगहैं ताते खोज करौं अधिकाय ॥ तुम्हरो जानों जो कतहूँ हो मोको वेगि देव बतलाय ३० सुनिकै बातें ये करिया की माहिल कहा वचन मुसुकाय ॥ हार नौलखा है मोहबे माँ तुरतै चला तहाँको जाय ३१ बहिनि हमारी मल्हना जानों औ बहनोई रजा परिमाल ॥ कऊ लड़ैया तिन घर नाहीं मानों सत्य सत्य सब हाल ३२

महोबेका प्रथमयुद्ध । ४१ ५ सुनिकै बातें ये माहिल की करिया चरण शीश नवाय ॥ बिदा माँगिकै फिरि माहिलसों तम्बू तुरत पहुंचा आय ३३ हुकुम लगायो सब क्षत्रिनको हाँते कूच देव करवाय ॥ करो तयारी अब मोहबे की सीताराम चरणको ध्याय ३४ सुनिकै बातें ये करिया की क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ३५ कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ चालिभो करिया फिरि मोहबेको मनमें किहे गंगको ध्यान ३६ त्यही समय की बातें हैं यारो सुनिल्यो कान लगाय ॥ चारो भाई हैं बकसर के जिनका कही बनाफरराय ३७ रहिमलें टोंडेर बच्छराजैं औ चौथे देशराजैं महराज ॥ मीराताल्हन हैं बनरस के जिनके नौ लड़िका शिरताज ३८ अली अलोमत औ दरियाखां बेटा जानबेगें सुल्तानै ॥ मियांबिसारतैं औ दरियाई नाहर कारे औ कल्यानै ३६ कारे बाना करे निशाना कारे घोड़न पर असवार ॥ चीरा शिर पर है सुलतानी मीराताल्हन केर कुमार ४० ये सब मिलिकै यकठौरी है डाँड़ पै किहेनि बखेड़ाजाय ॥ जयचंद केरी तहँ ठकुरी है जिनका कही कनौजीराय ४१ सब फिरियादी गे कनउज को पहुँचे नगर महोबा जाय ॥ नगर महोबा सों कनउज को रस्ता सीध निकरिगै भाय ४२ यक हरिकारा सों पूँछत भे चारों भई बनाफरराय ॥ जावा चाहें हम कनउज को जहँपै रहैं चँदेलोराय ४३ सुनिकै बातें इन चारों की सोऊ कहा बचन हर्षाय ॥ कौने मतलब को जावत हौ हमते सत्य देव बतलाय ४४