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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १ ] बालकाण्डम् १३


इत्युक्त्वा जनकं शिष्यः स्वगुरुं बोधमाययौ। जनकोऽपि मुदं युक्तस्तूर्णमेवेत्युदीर्य्य निजाम् ॥३८॥
नगर्य्याद्यैः शोभयित्वा सैन्येन परिवेष्टितः। वाद्येन्द्रं पुरस्कृत्य समाजैर्नृपैः सह ॥३९॥
सुमेधादिप्रमदाभिर्नानाधैर्यमनोहरैः। विश्वामित्रान्तिकं गत्वा नत्वा संपूज्य तं मुनिम् ॥४०॥
भ्राता इव तौ दृष्ट्वा श्रुत्वा तद्वृत्तममादरात्। वस्त्राद्यलङ्कारैधैर्यैः सत्कृत्य विधिवन्नृपः ॥४१॥
गजपोतौ समाशेष्य चामरेण सुवीजितौ। विश्वामित्रेण मुनिना निनाय मिथिलां पुरीम् ॥४२॥
ननृतुर्वारनार्यश्च तूर्यवृन्दैर्मनोहराः। नेदुनानामृदङ्गाश्च जगुस्ते तु नटास्तपः ॥४३॥
तदा तौ दृष्टमार्गेण व्रजन्तौनातिनिभितौ। श्रुत्वा च पूजनं यच्च वार्त्तामायल्लक्ष्मणौ ॥४४॥
समागतवतिनि मुदा व्रजन्तौविशोभिनौ। संजनेत्रैर्ददृशुस्तां ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥४५॥
तदा परस्परं प्रोचुः सीतायोग्या वरस्त्वयम्। रामोऽस्माकं रोचते हि कुर्याच्चेत् विधिरुत्तमः ॥४६॥
उर्मिलायास्तु योग्यश्च लक्ष्मणोऽस्ति सुलक्षणः। अस्माकं सुकृतस्य नयोरन्तो पन्थां शुभां ॥४७॥
श्रीमल्लक्ष्मणौ रम्यौ नयनैर्भानमोनमौ। एव तासां कामिनीनां वचनानि नृपात्मजौ ॥४८॥
शुश्रुवतुः शुभांश्चैव पश्यास्यौ तौ ददृशतुः। ततस्ते मिलिताः सर्वे नृपाः प्रोचुः परस्परम् ॥४९॥
एतादृशो विदेहेन यदाऽस्माभिः समागतम्। तदोत्सवः कृतो नैव ह्यनयोः क्रियते कथम् ॥५०॥
किमतःस्येन राज्ञाऽथ सीता रामाय ताऽर्पिता। किमस्माकं समाह्रय मानभङ्गोऽय नः कृतः ॥५१॥
एवं तेषां नृपाणां च वचनानि नृपात्मजौ। जनको गाधिश्र्चादि शुश्रुवुस्ते समन्ततः ॥५२॥
ततः शनैः शनैर्वारौ ययतुः संविर्भागतैर्जनैः। जग्मतुर्वाद्यघोषायैर्जनकस्य सभां प्रति ॥५३॥
ततोऽवतार्यतुर्वीरौ गजाभ्यां मुनिना सह। तन्मध्यवरशालायामुपविष्टेषु राजसु ॥५४॥


जनकजीसे यह कहकर शिष्य तत्क्षण अपने गुरुजीके पास लौट गया। राजा भी इस बातको मनमे रखकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपना मिथिला नगरीको तोरण तथा रत्नविचित्र वस्त्रजातो आदिसे सजाकर वहन, अगोरी मृत तथा सामन्त होटके मुगोधित उभय एवं दशनं व हाथीको आगे करके सेना, सभी राजाआ, सुमेधा आदि स्त्रिया और जनक प्रकारके मनोहर वाद्यद्रव्य बाज लेकर अपनी भार्याके साथ विश्वामित्र मुनिके पास गये और उनका नमस्कार करके पूजा की । ३८- ४०। मुनिस अगजानकी तरह उन दानो बालकोंका परिचय पूछकर विधिवत् वस्त्र-आभूषणसे उनका सत्कार करके हाथियोंपर चढाकर चमर डुलाते हुए जनकजा विश्वामित्रके साथ दोना भाइयाको मिथिलापुरीम ले चले ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ उस समय बहुसश वाराङ्गनाएं सुन्दर नृत्य करने लगीं। चारण तथा भाट लोग मन्त्रिपाठ एवं जयजयकार करन लगे, नाना प्रकारके वाद्यका मधुर स्वरू दसों दिशामे गूंज उठी। गायकजन मनहर गायन गाने लगे ॥ ४३ ॥ इस प्रकार उपहार तथा अति सुन्दर राम-लक्ष्मण बाजारकी सडकपर आ पहुंचे। उन्हे आते देख तथा वीरोसे सुनकर आबालवृद्ध मार महिलाए ही नगरके सर्व स्त्रिय नगरके प्रधान दरवाजपर, अपन-अपन घरकी छतोंपर, झरोखो और अट्टालियोंपर जा बैठी और अपने कञ्जसदृश नेत्रोंसे उन्ह बडे चावसे देखती हुई उनपर फूलोंका वर्षा करन लगी ॥ ४४॥ ४५ ॥ फिर वे आपसमे कहने लगी कि यह राम सीताके योग्य वर है। हमको तो राम बहुत प्रिय लगते हैं। इस लिए ईश्वर भी वैसा ही करे तो अच्छा हो। वे शुभ लक्षणोसे युक्त लक्ष्मण उर्मिलाके योग्य वर हैं। हमारे भाग्यम वे दोना उत्तम, रमणीय तथा सुन्दर बाहुवाले राम और लक्ष्मण साता तथा उर्मिलाके पति हा तो बहुत अच्छा हा। इस प्रकार उनके मनोहर वचनोको सुनकर राम-लक्ष्मण दोनों भाई ऊपर मुख उठाकर उन्हे देखन लगे। बादमें वे सब राजे परस्पर कहने लगे—॥ ४६-४९ ॥ जब हम तब यहा आये, तब तो राजा जनकने ऐसा उत्सव नहीं किया। अब इन बालकोंके लिये ऐसा क्यों किया । ५० ॥ राजाने कहीं बुद्धिके सीता रामको तो नहीं दे दी ? ऐसा ही था तो हम लोगोंको बुलाकर अपमानित क्यों किया गया ॥ ५१ ॥ उनकी बातें राम-लक्ष्मण, राजा जनक तथा विश्वामित्रजीने भी सुनी ॥ ५२ ॥ इधर झरोखोंमें बैठी हुई स्त्रियोंके द्वारा अवलोकित वे दोनों वीर गजे एवं बाजेकी ध्वनि

१४आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

विश्वामित्रानुगौ तौ द्वि मुनिशालां प्रहर्षयुतः । ऋद्धायां मुनिशालायां मुनेरग्रे निषीदतुः ॥५५॥
एवं सभासमृद्धायां राज्ञा कन्याप्रतिग्रहे । प्रतिज्ञातं मम धनुस्तन्सज्जं त्वमुपस्थितम् ॥५६॥
यदाऽधीता धनुर्विद्या मत्त परशुधारिणा । तदा दत्तं मया तस्मै धनुस्त्रिपुरदाहकम् ॥५७॥
तेनैकविंशद्वारं हि निःक्षत्रा पृथिवी कृता । सहस्रबाहुर्निहतः स्वपितुर्घातकारणात् ॥५८॥
तन्मैथिलांगणे स्थाप्य जामदग्न्यो नृपं ययौ । अश्वाबद्धधनुः कृत्वा जानकी क्रीडनं व्यधात् ॥५९॥
जामदग्न्यस्तेन सीतां ज्ञात्वा लक्ष्मीं तदिच्छया । ददौ नृपं पणार्थं तद्धनुरन्यैर्दुरानदम् ॥६०॥
पणीकृतं धनुस्तच्च विदेहेन स्वयंम्बरे । ततः सभासमृद्धायां जनकः प्राह शंकितः ॥६१॥
संस्थाप्य राज्ञां पुरतस्तन्मे चापमनुत्तमम् । शस्त्रागारान्मयानीतं भृत्यैः पंचशतैस्तु यत् ॥६२॥
सीतास्वयंवरार्थं यन्न्यस्तं परशुधारिणा । नृपः प्राह सभाध्ये यो वीरस्त्वत्र सदसि ॥६३॥
करिष्यति धनुः सज्जं तं वै सीता वरिष्यति । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा धनुर्दण्डावलोकनात् ॥६४॥
अधोमुखास्तदा सर्वे बभूवुः पृथिवीतमाः । केचित्स्तम्बेः समुद्बोढुं धनुः शक्ता न चाभवन् ॥६५॥
भूमेरुच्चालिते केचिदूर्ध्वं नेतुं न चाशकन् । सर्वेऽप्युत्थालने तस्य नृपाः शक्ता न चाभवन् ॥६६॥
सज्जीकारः कुतस्तस्य मनसाऽप्यविचिंतितः । धनुः सज्जीकृती सर्वान्नृपान् ज्ञात्वा पराङ्मुखान्॥६७॥
तदातिगर्वसंरूढः सभायां रावणोऽब्रवीत् । धनुषः सविधे गत्वा विहसन् जनकं प्रति । ६८ ।
येन वै निर्जिता देवास्त्रैलोक्यं स्ववशे कृतम् । आन्दोलितो भुजाभिर्हि कैलासो येन वै मया ॥६९॥


आदिके साथ धीरे-धीरे राजा जनकके सभामण्डपमें जा पहुंचे ॥५२॥ वहां दौर राम-लक्ष्मण तथा मुनिगण हाथीसे नीचे उतरे । पश्चात् सभामण्डपमे राजाओंके यथायोग्य बैठ जानेपर विश्वामित्रजीके साथ जाकर वे बालक भी मुनिमण्डपमे मुनिके आगे बैठ गये । ५४ ॥ ५५ ॥ इस प्रकार सभाके भर जानकर कन्यादानके लिये नियत किये हुए धनुषपर ज्या ( तांत या डोरी ) चढ़ानेके लिये राजाओंसे राजा जनकने कहा ॥ ५६ ॥ श्रीशिवजी कहते हैं-हे पार्वति जब परशुरामजीने मुझसे धनुर्विद्या प्राप्त की, उस समय मैंने उनको वह त्रिपुरको जलानेवाला धनुष दिया था ॥ ५७ ॥ उसके द्वारा उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर डाला और अपने पिताके घातक सहस्रबाहुको भी इस से मारा ॥ ५८ ॥ तदनन्तर परशुरामजी उस धनुषको राजा जनकके आंगनेमें रख जाये । बचपनमें जानकीजी उस धनुषकी लकड़ीका घोड़ा बनाकर खेल करती थी ॥ ५९ ॥ इस व्यवहारसे परशुराम सीताको लक्ष्मी समझने लग और इसी अभिप्रायसे दूर रहने के लिये दुर्लभ वह धनुष राजा जनकको प्रतिज्ञापालनार्थ दे दिया ॥ ६० । तद्नुसार विदेहने उस धनुषको सीतास्वयंवररूप प्रणकी जगहपर नियत किया । पश्चात् भरी सभामे सशंक भावसे जनकजीने इस मेरे सर्वोत्तम धनुषको सबके सामने रखकर राजाओंको अपनी प्रतिज्ञा कह सुनायी । वह धनुष शस्त्रागारसे पाँच सौ भृत्यों द्वारा खिंचवाकर राजा जनकने सीता स्वयंवरके लिये वहाँ स्थापित किया था। भरी सभाके मध्यमें राजा जनकने राजाओंसे कहा--जो राजा इन सभासदोंके सामने इस धनुषको सज्जित करेगा, उसीको सीता वरेगी । राजाके वचनको सुन तथा यमके समान अचल उस धनुषको देखकर सबके सब राजाओ तथा महाराजाओंने मुख नीचे कर लिया । उनमेंसे कुछ तो उस धनुषको जमीनसे तनिक भी नहीं उठा सके ॥ ६१-६५ ॥ कुछ लोगोंने कुछ ऊँचा भी किया तो जमीनसे बिल्कुल नहीं उठा सके। बादमे सबने सब मिलकर उठाना स्त्री तो भी वह जमीनसे तृण नहीं हिला। तब फिर उसपर डोरी चढ़ाना तो और भी कठिन काम था । सभामें धनुष चढ़ानेसे सब राजाओंको पराङ्मुख देखकर रावण गर्वके साथ धनुषके पास गया और हँसकर राजा जनकसे कहने लगा-॥ ६६-६८ ॥ हे राजन् ! जिस रावणने समस्त देवताओंको जीत लिया है, जिसने तीनों लोकोंको अपने वशमें कर लिया है तथा अपनी दो ही भुजाओंसे जिसने शिवजीके निवासस्थान कैलास पर्वतको हिला दिया है, उस रावणका यदि तुम राजाओंसे भरी सभामें बल देखना चाहते

सर्गः ३ ]

सर्गः ३ ] सारकाण्डम् १५

तस्य मे जनकाद्य स्वं बलं पार्थिवसंसदि । द्रष्टुमिच्छसि किंन्त्वस्मिन लघुचापे तृणोपमे ॥७०॥ एवं वदन् दशान्यः सन्नद्धो भूत्वा महद्धनुः । गृहीतुं वामहस्तेन चालयामास वै तदा ॥७१॥ न चचाल किंचिच्च तदा दक्षिणमन्कराम् । पुः कृत्वा गृहीतं तच्चालयामास वै पुनः ॥७२॥ न तञ्चचाल तदपि तदाश्चर्येण रावणः । भुजाभ्यां चालयामास तदा चापं चचाल न ॥७३॥ एवं क्रमेण सर्वाभिर्भुजाभिश्चालयन् धनुः । विशद्दोर्भिरंकदेशं चापस्योर्ध्वं चकार सः ॥७४॥ एकोनविंशद्दोर्भिञ्च धृत्वा चैव महद्धनुः । गुणे भूम्यां निपत्तिनं गृहीतुं हि दशाननः ॥७५॥ किंचिद्दुन्वा विनम्रः सदोष्षा जग्राह तं गुणम् । एतस्मिन्नन्तरे तच्च पपात त्वद्धृदये धनुः ॥७६॥ न तद्विशतिभुजामिश्च चचाल हृदयाद्धनुः । तदा सभायामूर्ध्वास्यः पपात स दशाननः ॥७७॥ मुकुटः पतितो भूमौ मुक्तकच्छोऽप्यभूत्तदा । तदा विजहसुः सर्वे सभायां पृथिवीजनाः ॥७८॥ तदा प्राणान्तिकं चासीद्रावणस्य सभांगणे । अक्षीणि भ्रामयामास लालास्येभ्यो विनिर्ययौ ॥७९॥ तदा तं वेष्टयामासुर्मंत्रिणो राक्षसास्तदा । धनुरुत्चालने शक्तास्तेऽभवन्नैव संमदि ॥८०॥ महत्क्रेषु दशत्वः स विष्टमृत्रे तदाऽकरोत् । ततः सभायां जनकः पुनः शङ्कान्वितोऽब्रवीत् ॥८१॥ कोऽपि वीरोऽस्ति भूमौ न किं निर्वीरं हि भूतलम् । चेदस्ति कश्चिन्मदसि तर्हि सोऽद्यसमांगणे ॥८२॥ जीवनदानं करोत्वस्मै दशान्याय नृपाग्रतः । इति वाक्यशराघातभिन्नौ तौ रामलक्ष्मणौ ॥८३॥ ददर्शतुर्गाधिजस्य मुखं तौ स्फुरितभ्रुवौ । विश्वामित्रस्तदा प्राह राम चोत्तिष्ठ राघव ॥८४॥ किमत रावणञ्चाद्य त्वं पश्यामि सभांगणे । जीवयंन् राक्षसेन्द्रं सज्जं कुरु धनूस्मि्वदम् ॥८५॥ तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स राघवः । तदोत्थायासनाद्वेगात्प्रणनाम मुनीश्वरम् ॥८६॥ निष्कास्य कण्ठाद्वारादीन् कटिं बद्ध्वा तदा प्रभुः । मुकुटादि दृढं कृत्वा शनैः प्राप सभांगणम् ॥८७॥

हो तो भले ही देख लो, किन्तु इस तिनकेके समान हल्के धनुषमे क्या वीरता देखना है ॥ ६३ । ७० ॥ ऐसा कह कर दशमुख रावणने उस बड़े भारी धनुषको पहिले अपने बायें हाथसे ही हिलाना चाहा ॥ ७१ ॥ लेकिन वह तणिक भी नहीं हिला। तब उसने दाहिने हाथसे पकड़कर हिलाना चाहा, तिसपर भी जब वह नहीं हिला, तब रावणको बड़ा आश्चर्य हुआ और एक साथ दोनो हाथोंसे उठाना चाहा। फिर तीनसे फिर चारसे इस प्रकार करते-करते जब बीसो भुजायें ऐक साथ लगा दीं, तब कहीं वह एक ओरसे कुछ ऊँचा हुआ ॥ ७२-७४ ॥ तब उसने उन्नीस भुजाओंसे उस महान् धनुषको सम्हाला तथा बीसवीं भुजासे जमीनपर लटकती हुई ताँतको पकड़कर ज्यों ही ऊपरको उठाना चाहा त्यों ही वह धनुष उचटकर उसकी छातीपर गिर पड़ा ॥ ७४ । ७६ ॥ सब बीसों हाथोने भी रावण उस धनुषको अपनी छातीपरसे नहीं हटा सका और ऊपर मुख किये पृथ्वीपर धड़ामसे गिर पड़ा ॥ ७७ ॥ उसके सिरका मुकुट दूर जा गिरा और धोतीकी लांग खुल गयी। यह देख सभाके सब राजे खिलखिलाकर हंस पड़े ॥ ७८ । रावण बेचारेके पसीना निकलने लगा, आँखें घूमने लगी और मुखसे लार गिरने लगी ॥ ७९ ॥ उसके सब मन्त्रियो तथा सैनिकोने आकर घेर लिया, परन्तु उन सबसे भी धनुष नहीं उठा ॥ ८० ॥ पहिने हुए सुन्दर वस्त्रोम रावणका मलमूत्र निकल पडा रावण जैसे वीरकी यह दशा देख राजा जनकको और भी शंका हुई और वे घबड़ाकर कहने लगे - ॥ ८१ । क्या कोई भी वीर पुरुष इस भूतलपर नहीं रहा ? क्या पृथ्वी वीरोंसे शून्य हो गयी ? यदि कोई हो तो इस सभा में राजाओंके सामने रावणको जीवनदान देकर बचाये उनके इस वाक्रूपबाणोसे पीड़ित होकर राम तथा लक्ष्मण जिनकी भौं हैं क्रोधके मारे फड़क रही थीं, विश्वामित्रके मुखकी ओर देखने लगे। तब विश्वामित्र बोले- हे राघव खड़े हो जाओ और इस रावणके प्राण बचाओ । तुम्हारे रहते रावण मर रहा है। सी ठीक नहीं है। इसे बचाकर धनुषको भी सज्जित करो ॥ ८२-८५ ॥ मुनिके वाक्य सुन तथा बहुत अच्छा कहकर राम तुरन्त आसनसे उठ खड़े हुए और मुनिको प्रणाम किया ॥ ८६ ॥ उन्होंने गलेमेसे हार आदि आभूषण उतारकर रख दिये, कमरको कस लिया,

१६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३


तं राममागतं दृष्ट्वा जनाः सर्वेऽतिविस्मिताः । चकिताः पार्थिवाः सर्वे ददृशुर्नैत्रपङ्कजैः ॥८८॥
परस्परं तदा प्रोचुः किम्भूतोऽस्ति शिशुस्त्वयम् । यत्रास्माभिः स्थितं तूष्णीं तत्रायं किं करिष्यति ॥८९॥
केचिदाहुर्दर्शनाय हि द्रष्टुं बालः समागतः । केचिदूचुर्बालचेष्टा क्रियते शिशुनाऽद्य हि ॥९०॥
केचिदूचुः किमर्थ हि हारा मुक्तास्त्वनेन हि । केचिदन्दर्गाभिधेन चापं प्रति सुयोजितः ॥९१॥
केचिदूचुर्बर्बुरुदया चोदितः किं शिशुस्त्वयम् वधार्थं चापपातेन विश्वामित्रेण राघवः ॥९२॥
केचिदूचुर्बलं स्वस्य मुनिनाऽत्र निरीक्षितुम् । चोदितोऽस्त्यत्र श्रीरामश्चापेऽयं किं करिष्यति ॥९३॥
एवं नानाविधांस्तर्कानावर्तकुर्वन्ति पार्थिवाः । तावद्दृष्ट्वाऽग्रतो रामं जनकः प्राह गाधिसूनुम् ॥९४॥
किमर्थं प्रेषितस्त्वत्र मुने बालः सभागणे । यत्रैते रावणाद्याश्च नृपाः सर्वेऽपि कुण्ठिताः ॥९५॥
तस्मिंश्चापे स्वयं बालः किमागच्छ करिष्यति । यस्त्वया शिष्यवाक्येन पूर्वं चाहं प्रबोधितः ॥९६॥
तन्मूर्ख तु मयैवाद्य चापाग्रे मुनिसत्तम । क्वायं बालः कोमलाङ्गः स्वेतं चापं सुदुर्धरम् ॥९७॥
किं चातकस्तृषाक्रान्तः सागरं शोषयिष्यति । एतस्मिन्नन्तरे सर्वाः सुवेषाद्याः स्त्रियश्च ताः ॥९८॥
द्विजराजाननं बालदोर्दण्डद्वयशोभिनम् । हेमवर्णोपमंरुचिं शृंगवालनृपंगंधिणम् ॥९९॥
शृंखलाफेनकपदद्वयशोभितमन्वहम् । दिव्यकुण्डलमुक्तरत्नजालंकारशोभितम् ॥१००॥
सुजंघं सुपदां शूरं सुजानुं सुन्दरोदरम् मुत्कण्ठं सुतनुं कंबुकंठं त्रिवलिशोभितम् ॥१०१॥
स्मितास्यं कोमलोष्ठं च मुदंतावलिराजितम् । सुनासं मुकपालं च कञ्जपत्रादिनेक्षणम् ॥१०२॥
सुम्रुमावं च सुस्निग्धं कुंचितालकशोभितम् । मुक्तामाणिक्यराजादिनानालंकाशोभितम् ॥१०३॥


दुपट्टेको अच्छी प्रकार बांध लिया और रंगभूमि सभाके बीचमे आ खड़े हुए । ८७॥ रामको वहां खड़े देख सब लोग बड़े विस्मयमे पड़ गये और चकित होकर सबके सब राज उस अपने कमलसदृश नेत्रोंसे देखने हुए परस्पर कहने लगे कि यह बालक कैसा सुन्दर है । अरे, जहां हम लोगोंको भय होता रहा वहीं यह क्या करेगा ? ॥८८॥८९॥ कोई कहने लगा कि यह बालक केवल धनुषको देखनेके लिए आया है । किसीने कहा कि यह बालक सी मानो मल्लका खेल ही रचा लगता है ॥९०॥ कोई बोला-सब इसके गलेसे हार तथा माला उड़ा उतार दीं हैं, किसीने उत्तर दिया कि इसको विश्वामित्रने धनुष उखाड़नेके लिए भेजा है ॥९१॥ कोई बोला कि इस बालकको विश्वामित्रने बहुत बड़ा भेजा है, जिससे यह धनुषमें दबकर मर जाय ॥९२। दूसरेने कहा कि नहीं मुनिने इसका बल देखनेके लिए भेजा है । परन्तु राम इस धनुषके विषयमे क्या कर सकता है ॥९३॥ इस प्रकार राजा लोग अनेक तरहके तर्क वितर्क कर ही रहे थे कि रामको देखकर जनकने विश्वामित्रसे कहा-हे मुनिराज ! आपने इस बालकको क्यों भेजा है ? जिस धनुषके विषयमे बड़े-बड़े राज-महाराज तथा रावणकी भी शक्ति कुण्ठित हो गयी वहां यह बालक आकर क्या करेगा ? जो आपने धनुष तोड़नेके लिए इसको भेजा था, सो सब आज इस धनुषके सामने झूठा होगा । क्योंकि कहां यह कोमल अंगका बालक और कहां यह अति दुर्धर्ष तथा महान् धनुष ! चातक चाहे कितना ही प्यासा क्यों न हो तो भी क्या वह समुद्रको सोख सकता है ? इसी समय सुवेषा आदि स्त्रियें झरोखोंसे, जालियोंसे, चौको और छज्जोंपरसे मन्दर हवा कोमल अङ्गवाले, कमलके सदृश नेत्रवाले, चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाले, महा बली भुजाओंसे शोभित, सुवर्णसदृश कान्तिसम्पन्न, नूपुर और किंकिणियोंका पादमे पहिने । ९४-९९॥ जिसके हाथोंमे सिकंडा और कड़े शोभित हो रहे थे। जिनके सिर-पर दिव्य मुकुट कानाम दिव्य कुण्डल, हृदयपर रत्न तथा मणियोंके विशाल हार झलक रहे थे, पेट तथा छातीपे त्रिवली पड़ी हुई थी। शंखके समान कंठ देखनेमे बड़ा ही अच्छा लगता था । जिसकी चिकनी ठोढ़ी, कोमल कपोल, हंसता हुआ मुखचन्द्र अनारकी पंक्तिके समान दांत, सुन्दर लम्बी और पतली नाक तथा अलकें लटक झांड थी। माणिक्य, मोती रत्न तथा हीरों आदिसे जड़े हुए अनेक अलंकारोसे अलंकृत,

सर्गः ३ ] सारकाण्डम् १७

सर्गः ३ ] सारकाण्डम् १७

मुक्कारत्नपुष्पमालान्यस्तमप्यतिशोभितम् । न्यस्तहारं न्यस्तवस्त्रं बद्धपीताम्बगन्वितम् ॥ १०४॥ दिव्यमुद्राङ्गुलिलसत्कङ्कणप्रभङ्करम् । एवं दृष्ट्वा स्त्रियो रामं सभासद्मविराजितम् ॥१०५॥ न्यस्तकोदण्डतूणीरं शिवचापाभिमुखम् । प्रार्थयामासुस्ताः सर्वा ऊर्ध्वास्या ऊर्ध्वसत्कराः ॥१०६॥ पश्यन्त्यो गगने शंभुं मोहान्नारायणं विधिम् । साक्षान्नारायणं शर्म न ज्ञात्वा ताश्च वै स्त्रियः ॥१०७॥ हे शंभो हे रमाकान्त हे विधेऽस्मत्पुराहृतैः । व्रतदानादिपुण्यैश्च चापं सज्जीकरोत्वयम् ॥१०८॥ युष्माभिर्नः सुकृतैश्च कर्तव्यं पुष्पवल्लघुः । अद्यास्य कण्ठदेशेऽत्र मालां सीता दधात्वियम् ॥१०९॥ नो भवत्वद्य नेत्राणां साफल्यं दर्शनेनहि । सीतया रामचंद्रस्य वेदिकायां स्थितस्य हि ॥११०॥ एतस्मिन्नन्तरे सीता रामं दृष्ट्वा सभागणे । दिव्यप्रासादसंरूढा सखीभिः परिवेष्टिता ॥१११॥ प्रोन्चलत्लासनाद्वेगादानन्दस्वेदसंप्लुता । सख्यास्तुलस्याः कण्ठे स्त्री दोर्लतां क्षिप्य सादरम् ॥११२॥ अब्रवीन्मधुरं वाक्यं रत्नालंकारमण्डिता । किंपणोऽत्र कृतः पित्रा मम शत्रुरूपिणा ॥११३॥ क्व रामः सुकुमाराङ्गः क्वेवेदं चापं नगोपमम् । हा विधे किं कृतोपद्य कियत्स्यंतर्गतं तव ॥११४॥ रामादिनान्यं पुरुषं मनसाऽहं न रोचये । यदि तातो बलादन्यं मां दास्यति तदा ह्यहम् ॥११५॥ त्यजामि जीवितं त्वद्य प्रासादात्पतनादिना । हे शम्भो हे विधे दुर्गे हे सावित्रि सरस्वति ॥११६॥ हे गायत्रि रवरे मान्नो मघवन्पम वोयप । हे कुवेरानल रमे हे विष्णो खगनायक ॥११७॥ हे फणीन्द्र निशानाथ हे सर्वे निर्जरादयः । युष्माकं प्रार्थयाम्यद्य प्रसार्य करपल्लवम् ॥११८॥ सर्वै रेतन्महच्चापं करणीयं तु पुष्पवत् । प्रवेशनीर्थं युष्माभिः श्रीरामभुजदण्डयोः ॥११९॥ धनुर्भङ्गं यन्मगपि मुनिवृत्त्याऽनुवर्तिनी । विशामि रने चाहं धनुः सज्जं करोत्वयम् ॥१२०॥


पन्ना, लाल, पुखराज, मुक्ता तथा हरे-नीले अनेक रत्नका पुष्पमालाओंसे मनोहर, पीताम्बर आदि सुन्दर वस्त्रोंको पहिन हुए, शङ्ख चक्र गदा पद्म आदि शुभ चिह्नोंसे चिह्नित करकमलवाले, सभामण्डपके बीच खड़े, दोनों कन्धोंपर धनुष और तूणीरको बाँधे तथा शिवधनुषके सामने मुख किये हुए रामको देख-कर उन्हें साक्षात् नारायण न समझती हुई वे महिलाय आकाशमे स्थित शिव, विष्णु और ब्रह्माको देख उनसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं-॥ १०४-१०७ ॥ हे शंभो ! हे रमाकान्त ! हे ब्रह्मन् हमारे पूर्वोपाजित व्रत-दानजन्य पुण्योंसे यह बालक धनुष चढ़ानेमे समर्थ हो । १०८। आप लोग हमारे पुण्यप्रतापसे इस धनुषको फूलके समान हल्का बना दें। जिससे हमारी सीता आज इनके गलेमे वरमाला डाले ॥ १०९ ॥ हमलोग सीतासहित रामचन्द्रका विदाहकी वेदीपर बैठे देखकर अपने नेत्रोंको सफल करें ॥ ११० ॥ उसी समय बच्ची हवा अलङ्कारोंसे सुशोभित सखियोंके साथ दिव्य भवनकी छतपर बैठी हुई सीता रामको सभाके बीच खड़े देख आनन्दके स्वेदसे परिप्लुत होकर शीघ्र आसनसे उठ खडी हुई । अपनी प्रिय सखी तुलसीके गलेमे हाथ डाल तथा तनिक अगाडी बढ़कर आदरपूर्वक यह मधुर वाक्य बोलीं-शत्रुस्वरूप मेरे पिताने यह कैसो प्रतिज्ञा की है ? कहाँ ये कमल अङ्गवाले बालक राम और कहाँ यह पर्वतके समान भारी तथा कठिन धनुष । यह इनमें कैसे चढ़ सकेगा ? हा ईश्वर ! तुमने यह क्या किया और क्या करनेका विचार है ? चाहे जो हो, मै रामको छोडकर दूसरे किसीको नहीं वरूँगी । यदि मेरे पिता मुझे दूसरे किसीको देंगे तो मै महाश्वरसे गिरकर अथवा विष आदिके द्वारा शीघ्र प्राण त्याग दूंगी। हे शम्भो ! हे विधे ! हे दुर्गे ! हे सरस्वतो ! हे सावित्री ! हे रवरे ! हे सूर्य ! हे इन्द्र ! हे जलपति वरुण ! हे कुबेर ! हे अग्ने ! हे रमे ! हे विष्णो ! हे गरुड ! हे फणीन्द्र ! हे चन्द्र ! हे समस्त देवताओं ! मै आंचल फैलाकर प्रार्थना करतो हूँ कि आप सब इस धनुषको फूलके समान हल्का बना दें और रामचन्द्रके भुजदण्डमें प्रवेश करके उन्हें बल प्रदान करें । जिससे राम धनुष चढ़ानेमें समर्थ हों और मुनिवृत्ति धारण करके रामकी

१८आनन्दरामायणे

एवं नानाविधैर्वाक्यैः सीता देवानतोषयत् । एवं प्रासादसंस्थायाः सीताया विविधानि च ॥ १२१ ॥ तथा ड्रामा हि नारीणां नृपाणां जनकस्य च । वाक्यानि शृण्वन् श्रीरामः किञ्चित्कृत्वा स्मिताननम् ॥ १२२ ॥ ययौ चापं नमस्कृत्य कृत्वा तं च प्रदक्षिणम् । पुनर्नत्वा शिवं ध्यात्वा गुरुं दशरथं नृपम् ॥ १२३ ॥ कौसल्यां च गुरुं ध्यात्वा वामहस्तेन तद्दधौ । सव्यहस्तेन चापस्य गुणं धृत्वा ऽसृजत्तपः ॥ १२४ ॥ वामहस्तेन नम्रं तच्चकार सदसि क्षणात् । तदा निनेदुर्वाद्वानि तुष्टुवुर्बन्दिमागधाः ॥ १२५ ॥ एतस्मिन्नन्तरे चापो वामहस्तचलाद्गतुः । मध्येऽभजन्त्रिखण्डं सञ्जातं प्राचीनमुत्तमम् ॥ १२६ ॥ चापभङ्गान्महाशब्दस्तदाऽभूद्गगनांगणं चकम्पे धरणी त्वं चालिङ्ग्यन्मां भयाद्द्रुतम् ॥ १२७ ॥ चुक्षुभुः सागराः सर्वे निनेदुरन्ता दिशो दश । तारा निपेतुर्धरणीं शिरः शेषोऽप्यचालयत् ॥ १२८ ॥ ववुर्वाताः सुगन्धाश्च देवास्ते गगने स्थिताः । वादयामासुर्वाद्यानि वर्षन्तः कुसुमौघिनम् ॥ १२९ ॥ स्वर्गस्त्रीभिर्ननृतुः सा हि देवास्तवोत्सवं परेदिरे । तदा निनेदुः सदसि भेर्यो दमध्यो वराः ॥ १३० ॥ नववाद्यध्वनाः सर्वे बभूवुर्जयनिःस्वनाः । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्मागधादयः ॥ १३१ ॥ स्त्रियो गवाक्षसंबद्धा रामं पुष्पैरवाकिरन् तदा स रावणस्तूष्णीं लज्जयाऽधोनतमस्तकः ॥ १३२ ॥ मुकुटैरपि हीनश्च मुक्तकच्छोऽतिविह्वलः । सभायां न क्षणं तस्थौ तूर्णं लङ्कापुरीं ययौ ॥ १३३ ॥ रामेण सह तच्चापं दृष्ट्वा नार्यो मुदान्विताः । चक्रुर्जयास्यनेधोपान्करैश्च करतालिकाः ॥ १३४ ॥ सीताऽपि मुदिता जाता हर्षरोमांचनिर्भरम् । अनिमेष कंजनेत्रा राममुत्कण्ठिताऽभूत् ॥ १३५ ॥ एतस्मिन्नन्तरे राजा जनकः प्राह मन्त्रिणः । करिणास्थायाग्र सीतामानयध्वं समन्ततः ॥ १३६ ॥

अनुगामिनी बनकर उनके साथ चौदह वर्ष तक वनम भ्रमण करूं ॥ १२१-१२२ ॥ इस प्रकार विविध वाक्य से सीता देवताओंको मनाने लगीं । प्रासादपर स्थित सीताके, उन स्त्रियोंके, राजा जनकके तथा अन्यान्य राजाओंके ऐसे-ऐसे वाक्योको सुनकर मुसकान हुए श्रीराम धनुषके पास गये । वहां जाकर उन्होंने धनुषको नमस्कार किया, प्रदक्षिणा की और शिवजीका मन ही मन ध्यान करके प्रणाम किया बादमे राजाधिराज श्री दशरथ राजा दशरथ माता कौशल्या तथा गुरु वसिष्ठका मन ही मन ध्यान करके प्रणाम किया । फिर बायें हाथसे धनुष और दाहिने हाथसे उनको डोरी पकड़कर क्षणभरम सभाके सामने बांये हाथसे धनुषको झुकाकर तांत चढ़ा दी उस समय बाजे बजने लगे, पुष्पवृष्टि होने लगी और चारणगण रामका यश गान लगे। इतनेम रामके बायें बाहुबलसे उस उत्तम तथा पुरातन शिवधनुषके बीचसे तीन टुकड हो गये ॥ १२३-१२६ ॥ धनुषके टूटनेसे बडा घोर शब्द हुआ । जिसमे समस्त गगनमण्डल गूँज उठा । धरती काप उठी । हे पार्वती ! तुम भी उस समय मारे डरके हमसे लिपट गयी थी । सब समुद्र चलायमान हो गये दिशाये क्षुभित हो गयीं । तारे टूट-टूटकर पृथ्वीपर गिरने लगे । शेषनागका सिर घूमने लगा । सुगन्धयुक्त वायु वहन लगी । देवता आकाशसे फूल बरसाने और बाजे बजाने लगे । स्वर्गकी स्त्रियां आकाशमे नृत्य करन लगी और देवता आनन्द मनाने लगे । उस समय सभामण्डपमे भी उत्तम ढोल तथा नगारे बजने लगे ॥ १२७-१३० ॥ नये-नये बजने तथा जयजयकारका घोष होने लगा । वाराङ्गनाएं नाचने लगीं । भांट आदि स्तुति करने लगे । झरोखोंसे स्त्रियें रामपर फूल बरसाने लगीं । तब रावण चुपचाप लज्जासे सिर नीचा किये हुए बिना सींग वाले मुकुटरहित हो घबराहटके साथ शीघ्र मिथिलापुरीसे निकलकर लङ्काको भाग गया । वहाँ वह क्षणभर भी नहीं ठहरा ॥ १३१-१३३ ॥ रामने धनुषको तोड़ डाला, यह देखकर स्त्रियें हर्षातिरेकसे जयजयकार करने और तालियां बजाने लगी ॥ १३४ ॥ सीताके तो शरीरमे मारे आनन्दके रोमांच हो आया । उत्कण्ठापूर्वक निमेषरहित होकर कमलसदृश नयनोंसे वे रामको निहारने लगी ॥ १३५ ॥ तभी राजा जनकने

सर्गः ३] सारकाण्डम् १९

रक्षणाय निजंः संम्प्रेवेक्षयित्वा मपन्नतन् । तथेति ते मन्त्रिणश्च ययुर्वेगेन जानकीम् ॥१३७॥ प्रोच्चुस्ते मधुरं वाक्यं प्रयद्धस्तम्पुटाः । हे सीते कञ्जनयने धन्याऽसि मजगामनि ॥१३८॥ रविगोत्रोद्भवेनाथ दशरथसुतेन च । रामेण भर्त्रा सदसि चापमुत्सृष्ट भग्नतः ॥१३९॥ करिणीगृहमारुह्य राम्रं त्वं गन्तुमर्हसि । रामकण्ठोपवेश्याय रत्नमालां मुदान्विता ॥१४०॥ हन्मन्त्रिणां वचः श्रुत्वा सीता नत्वा स्वमातरम् । ससखीभिः काञ्चीपुटं संस्थितासीन्मुदान्वित ॥१४१॥ तदग्रे नद्यवाद्यानि निनेदुर्मधुरानि वै । निनेदुः पृष्ठभागेऽपि नानावाद्यानि वै मुहुः ॥१४२॥ चित्रार्णपट्टः कञ्चकिनः शतशो वेत्रपाणयः । संनिवारयिष्याञ्चाग्रे ते वृद्धबुद्धीपैर्निःस्वनाः । १४३। राशयन् जनसंमर्द सीतां द्रष्टुं जनैः कृतम् । ननृतुर्वागनायैश्च बभूवुस्तंत्रनिःस्वनाः । १४४॥ तुष्टुवुर्मगधाश्चाश्च नटा गानं प्रचक्रिरे । करिणीं वेष्टयामासुः सीतादास्र्यः सहस्रशः ॥१४५॥ अश्वाहरूढामशार्दि बिभ्रन्त्यो रूपशोभिताः । ततोऽश्वसंस्थाः शतशस्ना ययुश्चोपमावराः ॥१४६॥ जग्मुः शस्त्रधारिण्यः वृद्धवेत्रसंयुक्ताः । ततः पुरुषवेषधारिन्यस्त्वन्यः प्रमदोत्तमाः । १४७। ययुस्तञ्चल्यः शतशः शस्त्रहस्ताः सुभूषिताः । गोपित्तमुख्याः कञ्चकिन्यस्तुरगादिषु संस्थिताः ॥१४८। ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे न जावहनसंस्थिताः । स्वयं पर्यवेष्टयामासुः सीतायाः करिणीं मुदा ॥१४९। चामरं न्यर्जनैः सव्ये मुहुः मानामवीतयन् । स्त्रियो गवाक्षरण्ध्रेभ्यो सीता पुष्पैर्वाकिरन् ॥१५०। एवं नानाममुत्साहैः शनैः सीता तडिद्रभा । नवरत्नमयीं मालां बिभ्रती दक्षिणे करे ॥१५१॥ राभं नेत्रकटाक्षैश्च पश्यन्ती मुदितानना । समापं राघव गत्वा करिपथादवरुह्य च ॥१५२। शनैः पद्धयां ययौ राम्र तद्ग्रावापा सुलज्जिता । मुमोच निजबाहुभ्या रत्नमाला मुदान्विता ॥१५३। चकार नमनं राम्रं पादयोः स्थाप्य वै शिरः । तस्याश्चाङ्गुष्ठमी माता सभायामर्तिलज्जिता ॥१५४॥


अपने मान्यवानां आज्ञा दी कि सुन्दर हस्तिनपर बैठकर हेनाया दशनरथम आाग हुइ सब सीतावायन माता ॥ १३७ ॥ 'बहुत अच्छा कहकर मन्त्रगण तुरन्त जनकजाके पास गयेया । हाथ जोडकर इस प्रकार मधुर वाणीमें बहुत गीत बजाताभना और कमलनयना माता तुम धन्य हो ॥ १३८ ॥ सूर्यवंश दशरथपुत्र रामने सभामे धनुष तोड डाला । अभी उठकर अभी ही आजाओ ॥ १३९ ॥ हस्तिनीपर चढ़कर अभी रामके पास चलना है। वहां चलकर आनन्दपूर्वक उनके गलेमें यह रत्नमाला आदरपूर्वक पहनाना ॥ १४० ॥ सीताने मन्त्रियोंका इस वाक्यको सुनकर मानाके चरणोमें नमस्कार किया और सहेली सुखियोंके साथ हस्तिनीका पाहुपर सवार हो गयीं ॥ १४१ ॥ इनके आगे तथा पीछे नाना प्रकारक मनोहर बाजे बजने लगे ॥ १४२ ॥ रङ्ग-बिरङ्गा पगड़ीया बाँध और हाथमें बंत लिये अन्तःपुरके संकटां दरबान हस्तिनीके अग्रे आगे आगे खिझलाते हुए चलने लगे ॥ १४३ ॥ व सम्भ्रम सीताको देखनेके लिये खड़ा भीड़को हटा रहे थे। वेश्याये नाचने लगीं । विविध वाद्यके निनाद होने लगे, भाट स्तुति करने और नट गान लगे। सीताकी हजारो दासियान उन्हें घेर लिया ॥ १४४ । १४५ ॥ उनके पीछे अश्वपर सवार तथा सुवर्णभूषित वस्त्र आदि लिये हुए बहुतसी स्त्रियां तथा उनके पश्चात् सर्वोत्कृष्ट उपमाताओ ( धाइयों ) चली ॥ १४६ ॥ उनके पीछे अस्त्रधारिणी तथा हाथमें छड़ियाँ लिये हुए सैकड़ो वृद्धा स्त्रियां चलीं ॥ उनके बाद जवान स्त्रियें पुरुषका वेष बनाये और हाथमें शस्त्र लिये हुए चलीं । उनके बाद उषा वेषमें मुख ढांके और कुरता पहिने हुए, घोड़ेपर सवार होकर शस्त्र लिये हुए वृद्ध सुन्दरी स्त्रियें चलीं ॥ १४७॥ १४८ ॥ सबके पीछे विविध वाहनांपर सवार मन्त्रिगण अपनी-अपनी सेनाके द्वारा सीताकी हथिनीको घेरे हुए चले ॥ १४९ ॥ सखाराम पंवर तथा पंख सीताजीपर डुलाने लगे। नगरकी स्त्रियां गवाक्षमार्गसे उनपर फूल बरसाने लगीं ॥ १५० ॥ इस तरह अनेक प्रकारके सज्जधजकर धीरे-धीरे बिजलीके सदृश दीप्तिवाली तथा दाहिने हाथमें नवरत्नोंका हार लिये हुए अपने नेत्रकटाक्षोंसे रामको देखती हुई सीता सभाखण्डके पास आ तथा हथिनीसे उतरकर धीरे धीरे रामके पास गयी और लज्जापूर्वक अपने हाथोंसे उनके गलेमें वह रत्नोंकी माला डाल दी ॥ १५१-१५३ ॥

२०आनन्दरामायणं[ सर्गः ३

ददर्श सीतां रामोऽपि हासशोभितहृत्स्थलाम् । जहर्ष नोच्चैर्नितरां ननाम गाधिनं प्रभुः ॥१५५॥
तदा रामं समालिङ्ग्य विश्वामित्रो मुनीश्वरः । निवेशयाञ्चाङ्के तं प्रेम्णाऽऽघ्राय मस्तके ॥१५६॥
तदा स जनकः सीतां गाधिजाङ्के न्यवेशयत् । सीतया रघुनाथेन शुशुभे स मुनिस्तदा ॥१५७॥
मानयामास स मुनिर्जन्मसाफल्यतां हृदि । ततः सभायां जनको विश्वामित्रं वचोऽब्रवीत् ॥१५८॥
प्रसादात्तव रामस्य लाभो जातोऽद्य मे मुने । धन्योऽस्म्यहं कुलं धन्यं धन्यौ तौ पितरौ मम ॥१५९॥
योऽहं श्रीरामश्वशुरश्चेति लोके प्रथां गतः । इत्युक्त्वा गाधिनं नत्वा प्रजगाम रघूत्तमम् । १६०॥
तदा ते पार्थिवाः सीतां दृष्ट्वा नयनडिण्डिमाम् । बिम्बोष्ठीं चन्द्रवदनां नक्षत्रैर्जगताऽऽवृताः । १६१॥
बभूवुर्विकलास्तत्र दुर्देवं मेनिरे निजम् । केचिन्मूर्च्छा पपुस्तत्र तान्समाश्वास्य मैथिलः । १६२॥
प्रार्थयामास नृपतीन्निषण्णान् सदसि स्थितान् । बद्धाञ्जलीन्म्लानवदनान् लज्जया नतकन्धरान् । १६३॥
युष्माभिर्मेऽद्य कन्याया विवाहं विनिवर्त्य च । गन्तव्यं स्वपुराण्येव करणीया कृपा मयि ॥ १६४॥
तदा ते पार्थिवाः सर्वे मंत्रांचक्रुः परस्परम् । यदि युद्धे विजेतव्यः श्रीरामोऽद्य रणांगणे । १६५॥
तदास्मिन् समये दुष्टे जयो नो न भविष्यति । कुमुहूर्ते वय यातास्तूष्णीं गत्वा पुराणि हि ॥ १६६॥
मुहूर्ते पुनर्यातुं यास्यामः सकला बलैः । भविष्यति तदाऽस्माकं जयो युद्धे विनिश्चयात् ॥ १६७॥
यदा रामं बाणभिन्नं पश्यामः पतितं रणे । भविष्यामः कृतकृत्यास्तदा सर्वे वयं नृपाः ॥ १६८॥
तदैतस्योपमानस्य दुःखं मर्मस्थलं गतम् । त्यजामः पार्थिवाः सर्वे जेष्यामो राघवं यदा १६९।
किमर्थमधुना वैरं दर्शनीयं वृथाय वै । इति संमंत्र्य ते सर्वे तथेत्युक्त्वा नृपोत्तमम् ॥ १७०॥
कृत्वा सीताविवाहं च गच्छामः स्वस्थलानि हि । तदा तान् सकलं वस्तु गृह्णन्वै जनको मुदा १७१॥


...पश्चात् रामके चरणोंपर अपना सिर रखा तथा नमस्कार करके सभाके लज्जावश कुछ नीचा मुख किये हुए खड़ी हो गयी ॥ १५४॥ उस हास्य सुशोभितहृदय रामने भी सीताकी ओर देखा और अत्यन्त सन्तुष्ट होकर उन्होंने विश्वामित्रजीको प्रणाम किया ॥ १५५ ॥ मुनियोंके ईश्वर विश्वामित्रने रामको आलिङ्गन करके प्रेमसे गोदमें बिठाया और उनका सिर सूँघा ॥ १५६ ॥ तब राजा जनकने सीताको भी ले जाकर विश्वामित्रजीकी गोदमें बैठा दिया। उस समय सीता तथा रामके सहित विश्वामित्रजी बड़ी ही शोभाको प्राप्त हुए ॥ १५७ ॥ वे मन ही मन अपने जन्मको सफल समझने लगे। तदनन्तर राजा जनकने सभामें विश्वामित्रसे कहा- ॥ १५८ ॥ हे मुनिराज ! आपकी कृपासे आज मुझे रामचन्द्र जैसा दामाद प्राप्त हुआ है। मैं धन्यहो, अपने माता पिताका तथा अपने कुलको धन्य समझता हूँ ॥ १५९ ॥ क्योंकि मैं रामचन्द्रके श्वशुरनामसे संसारमें विख्यात हुआ। ऐसा कहकर उन्होंने विश्वामित्रको तथा रघुकुलशिरोमणि रामचन्द्रको प्रणाम किया ॥ १६० ॥ उस समय वहाँ एकत्रित अन्यान्य राजगणोंके समान चमकनेवाले विरह अर्थात् पके हुए कुंदरूफलके सदृश ओष्ठ और चन्द्रमाके सदृश मुखवाली सीताको देखते ही उनके नेत्ररूपी बाणसे घायल होकर व्याकुल हो गये और अपना दुर्भाग्य समझने लगे। कुछ वहीँ मूर्च्छित हो गये। तब मिथिलाके अधिपति राजा जनकने वहाँ जाकर उन कान्ति नष्ट हो जानेसे म्लानमुख, दुःखी, लज्जासे नीची गरदन करके सभामें बैठे हुए राजाओंसे प्रार्थना की- ॥ १६१-१६३ ॥ कृपा करके मेरी कन्याके विवाहका उत्सव समाप्त करके ही आपलोग अपने-अपने नगरोंको जाइयेगा ॥ १६४ ॥ तब वे राजे विचार करने लगे कि यदि रामको युद्धमें जीतना ही हो तो भी इस कुसमयमें हमलोगोंको विजय लाभ नहीं होगा । क्योंकि हमलोग कुमुहूर्तमें आये हैं। अतएव अभी यहाँसे चुपचाप अपने-अपने स्थानोंको जाकर फिर किसी अच्छे मुहूर्तमें दलबलके सहित आयेंगे। उस समय रामको रणभूमिमें घायलकर और विजय प्राप्त करके हम सब कृतकृत्य होंगे तथा अपमानजनित हृदयगत दुःखको शान्त करेंगे। इसलिए इस समय राजा जनकसे वैर करना अच्छा नहीं है। सीताके विवाहको करवाकर ही चलेंगे। ऐसा विचार करके सब राजाओंने राजा जनकसे 'बहुत अच्छा' ऐसा कहा ॥ १६५-१७० ॥ इधर राजा जनकने सहर्ष रघुत्तम

सर्गः १] सारकाण्डम् ३५

सर्गः १] सारकाण्डम् ३५

कल्पयामास विधिवन्मुनींश्चापि सपूरुषम् । गतो गाधिसमादेशेन दिशेह प्रेष्य मन्त्रिणः ॥१७२॥ समानेतुं दशरथं सप्रतीक्षां चकार सः । तेऽपि गत्वा म.ऽशश्व दृष्ट्वा दशरथं नृपम् ॥१७३॥ वृत्तं निवेद्य सकलं तं नत्वा सम्पुरःस्थिताः । वृत्तं दशरथः श्रुत्वा तुतोष नितरां तदा ॥१७४॥ सैन्येन नागरैः सर्वैः स्रिविजनैर्दलैः सह । मिथिलायामथोत्थाय तदा दशरथो नृपः ॥१७५॥ तदा महोत्सवनेनैव नृपं दशरथं पुरम् । नेतुं गजं पुरस्कृत्य जनकराः साश्विरंययौ ॥१७६॥ तदा दशरथाग्रे तौ दृष्ट्वा कैकेय्यासुतौ । श्रीरामलक्ष्मणावरजौ जनः प्राप्तौ व्यचिन्तयत् ॥१७७॥ तावद्रामलक्ष्मणाभ्यां युक्तं तं गाधिजं मुनिम् । स्वसेनायां नृपो दृष्ट्वा विस्मयं प्राप संस्थितः ॥१७८॥ ततो दशरथं नत्वा वसिष्ठं प्रणिपत्य च । गाधिजं जनकः प्राह कावेतौ रामरूपिणौ ॥१७९॥ ततस्त्वं गाधिजः प्राह रामौङ्गाद्भरतस्त्वयम् । लक्ष्मणाङ्गाच्च शत्रुघ्नः कैकेय्या नन्दनाविनौ ॥१८०॥ तच्छ्रुत्वा जनकः प्राह राजानं गाधिजं गुरुम् । सीतां रामाय दास्यामि लब्धां भूमवयोनिजाम् १८१॥ दैवज्ञोर्मिलानाम्नीं लक्ष्मणायार्पयान्यहम् । कुशध्वजस्य मे बन्धोः श्रुतकीर्तिश्च मांडवी १८२। वर्तेते बालिके रम्ये रूपयौवनमण्डिते । सीतोर्मिलाभ्यामपि ये मया नित्यं प्रसाधिते ॥१८३॥ दास्याम्यहं भरताय मांडवीं मंडनान्विताम् । शत्रुघ्नाय श्रुतकीर्तिमर्पयान्यकमादरात् ॥१८४॥ एवं स्नुषाश्चतस्रश्च सर्वमङ्गलक पावित् । तथेति जनकं प्राह राजा दशरथो मुदा ॥१८५॥ ततो दशरथः प्राह शतानन्दं पुरोहितम् । अहल्याजठरोद्भूतं मैथिलाग्रे स्थितं मुनिम् ॥१८६॥ कथं लब्धा भुवः सीता वृत्तमेवं वक्तुमर्हसि । शतानंदस्त्वथैवंयुक्तोऽब्रवीद्दशरथं नृपम् १८७॥ शतानन्द उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया राजन् शृणुष्वैकाग्रमानसः । आसीन्नृप नृपः कश्चित्पद्माक्ष इति विश्रुतः ॥१८८॥

रामके लिये, मुनियोंके लिये तथा सब लोगके लिए सब प्रकारकी वस्तुओका यथोचित प्रबन्ध कर दिया ॥१७२॥ तदनन्तर विश्वामित्रके कहनेपर राजा जनकने अवधेश महाराज दशरथको बुलानेका निश्चय करके मन्त्रियोंको अयोध्या भेजा । तद न्पार वे राजा दशरथके पास गये और सब वृत्त.न्त निवेदन करके बाद नमस्कार करके सामने खड़े हो गए । इस वृत्तान्तको सुनकर राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए ॥१७३-१७४॥ फिर राजा दशरथ स्त्रियोंको लेनाके, नगर तथा देशके सब लोगोको साथ लेकर आनन्द-पूर्वक साथ मिथिलापुरीको चल परे ॥१७५॥ उधर राजा जनक बड़े समारोहपूर्वक बाजेगाजेके साथ एक हाथीको सजाकर सब राजाओक संग उनकी अगवानीके लिए सामने आये ॥१७६॥ महाराज दशरथके आगे कैकेयीके पुत्र भरत तथा शत्रुघ्नको देखकर राजा जनक विचारने लगे कि वे राम-लक्ष्मण यहाँ कहाँसे आ गये। तावत् जब विश्वामित्रके साथ राम-लक्ष्मणको अपनी सेनामे देखा तो आश्चर्यचकित होकर राजा जनकने महाराज दशरथ और मुनि वसिष्ठको प्रणाम करके विश्वामित्रसे पूछा कि ये दोनों राम-लक्ष्मण-के समान रूपवाले दूसरे बालक कौन हैं ? ॥१७७-१७९॥ विश्वामित्रजीने उत्तर दिया कि रामके अङ्गस्वरूप भरत तथा लक्ष्मणके अंश शत्रुघ्न ये दोनों कैकयीके पुत्र हैं ॥१८०॥ यह सुनकर राजा जनक गुरु विश्वामित्र तथा राजा दशरथसे कहने लगे कि अयोनिजा (योनिसे नहीं उत्पन्न) तथा पृथ्वीसे प्राप्त सीताको मैं रामके लिए देता हूँ तथा शरीरसे उत्पन्न उर्मिलाको लक्ष्मणके लिए दे रहा हूँ। उसे आप ग्रहण करें। मेरे भाई कुशध्वजकी श्रुतकीर्ति तथा माण्डवी नामकी सुन्दर तथा रूपयौवनसे सम्पन्न दो कन्याएँ हैं। जिनको कि सीता तथा उर्मिलाके साथ-साथ बालकर मैनें बड़ी की है ॥१८१-१८३॥ उत्तम भूषणोसे भूषित मांडवीको भरतके लिए तथा श्रुतकीर्तिको शत्रुघ्नके लिए देता हूँ, हे पार्थिव ! आप इन चारो-शुभ-वधुओको स्वीकार करें। तब राजा दशरथने सहर्ष 'तथास्तु' कहा ॥१८४॥१८५॥ तदनन्तर राजा दशरथने राजा जनकके सामने खड़े अहल्याकी कोखसे उत्पन्न पुरोहित मुनि शतानन्दसे पूछा कि सीता धरणीरस कैसे प्राप्त हुई। सो सब वृत्तान्त आप कहें। शतानन्दने 'बहुत अच्छा' कहकर बताना आरम्भ किया ॥१८६॥१८७॥

२२आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

स दृष्ट्वा सकलाँल्लोकान् लक्ष्मीकार्मुकतत्परान् । चिंतयामास मनसि लक्ष्मीं कन्यां करोम्यहम् ॥१८९॥
वयमेव निजांके तां लालयामि निरंतरम् । इति निश्चित्य स नृपस्तप्तवांस्तीव्रं महत्तपः ॥१९०॥
दृष्ट्वा प्रसन्नतामग्र तु लक्ष्मीं वचनमब्रवीत् । दुहिता मे भव त्वं हि सा प्राह नृपतिं प्रति । १९१॥
परतन्त्राऽस्म्यहं राजन् विष्णुं त्वं प्रार्थयाधुना । स चेद्दास्यति मां ते हि तर्ह्यहं दुहिता तव ॥१९२॥
भविष्यामि न संदेहोऽथैवं प्रकथ्य नृपः पुनः । तप्त्वा तीव्रं तपो विष्णुं चकार परमोन्मुखम् । १९३॥
लब्ध्वा तं नृपतिः प्राह देहि कन्यां रमां मम । तद्राजवचनं श्रुत्वा मातुलुङ्गफलं हरिः ॥१९४॥
पद्माक्षाय ददौ श्रेष्ठं स्वयमन्तर्दधे विभुः । तद्भित्त्वा नृपतिः कन्यां ददर्श कनकप्रभाम् ॥१९५॥
तां दृष्ट्वा चाभिलाषः स कन्यां मेने निजां शुभाम् । पद्माक्षनृपतेः कन्यां पद्मा लोका वदंति च । १९६॥
आह्लादयन्तीमुत्तमां रम्यां नवतिर्नर्तकं जनान् । शकले मातुलुङ्गस्य भूत्वैकत्र फलं पुनः ॥१९७॥
जातं दृष्ट्वा दधावथ स्वहस्ते नृपतेः सुता । सा व्यवर्धत नृपतेरङ्के चंद्रकला यथा ॥१९८॥
शुक्लपक्षे च तां दृष्ट्वा वयःसन्धिवितन्वतीम् । कस्मै देया मया कन्या कस्यै योग्यो वरोऽत्र कः १९९॥
ततः समंत्र्य नृपतिः स्वयंवरमथाऽग्रभीत् । स्वयंवरेऽथ पद्माया यज्ञारम्भं चकार सः ॥२००॥
स्वयंवराय यद्वाथ पत्रिकांकारयन्नृपान् । तेऽपि शृङ्गारयुक्ताश्च ययुः पद्मास्वयंवरम् ॥२०१॥
पद्मास्वयंवरं श्रुत्वा ययुस्तत्र मुनीश्वराः । ययुर्देवाः सगंधर्वा दानवा मानवाः खगाः । २०२॥
नगा नद्यः समुद्राश्च भूरुहाः कामरूपिणः । ययुर्यक्षाः किन्नराश्च राक्षसा रावणादयः ॥२०३॥
सर्वान् समागतान् दृष्ट्वा पद्माक्षः प्राह तान् प्रति । आकाशनीलवर्णेन यः स्वांगं परिलेपयेत् । २०४
ददामि तस्मै पद्मेयं सत्यं ज्ञेयं वचो मम । तद्राजवचनं श्रुत्वा दुर्घटं नृपसत्तमाः । २०५॥


शतानन्द बोले हे राजन् आपने जो वृतान्त पूछा सो बहुत अच्छा किया । मैं कहता हूँ आप ध्यानसे सुन । पूर्वकालमें पद्माक्ष नामका एक प्रसिद्ध राजा था ॥ १८८ ॥ उसने सब लोगोंको लक्ष्मीकी कामनामें तत्पर देखकर मनमें सोचा कि मैं साक्षात् लक्ष्मीको पुत्री बनाऊं और अपनी गोदमें लाडप्यार करके बड़ी करूँ । ऐसा निश्चय करके उसने लक्ष्मीको प्राप्त करनेके लिए बड़ा कठोर तप किया ॥ १८६ ॥ १९० ॥ जब प्रसन्न होकर लक्ष्मी सम्मन आ खड़ी हुईं तो उसने कहा कि तुम मेरी पुत्री बनो । यह सुनकर लक्ष्मीने राजासे कहा ॥ १६१ ॥ हे राजन् ! मैं तो विष्णुभगवानके अधीन हूँ—स्वतन्त्र नहीं हूँ । इसलिए तुम विष्णुकी प्रार्थना करो । वे यदि मुझे तुम्हें दे देंगें तो मैं तुम्हारी पुत्री होऊँगी । इसमें सन्देह नहीं है 'अच्छी बात है' कहकर राजा पद्माक्षने तीव्र तप करके विष्णुभगवान्को प्रसन्न किया । १६२ ॥ १६३ ॥ विष्णुने उसे एक श्रेष्ठ मातुलुङ्गफल (बिजोरा नीबू अथवा नारङ्गीका फल) दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये । राजा पद्माक्षने उस फलको फाड़ा तो उसमें सुवर्णके समान जगमगाती कन्याको विद्यमान देखा ॥१९४॥१९५॥ कन्याभिलाषी राजाने बालिकाको देखकर उसे अपनी कन्या ही माना । सबरू चित्तको आनन्द देनेवाली उस रमणीय कन्याको देखकर वहाँके सब लोग भी सहर्ष 'यह राजा पद्माक्षका कन्या लक्ष्मी है' ऐसा कहने लगे । तभी उस विजोरेके टुकड़ोंका मिलकर फिर समूचा फल बन गया । यह देखकर राजाकी पुत्रीने उसे अपने हाथोंमें ले लिया । वह बालिका राजाके अंक (गोद) में शुक्लपक्षकी चन्द्रकलाकी भांति बढ़ने लगी । उसे देखकर राजाके मनमें चिन्ता हुई कि 'यह कन्या मैं किसको दूँ, इसके योग्य वर कौन है' ॥ १९६–१९९ ॥ तदनन्तर राजाने विचार करके उसका स्वयंम्बर रचाया । उसी स्वयंम्बरमें उन्होंने यज्ञ भी आरम्भ कर दिया ॥ २०० ॥ स्वयंम्बर तथा यज्ञके लिए निमन्त्रणपत्र भेजकर पद्माक्षने राजाओंको बुलाया । वे लोग शृङ्गार करके बड़े ठाठ-बाटसे पद्माके स्वयंम्बरमें आकर सम्मिलित हुए । स्वयंम्बरका समाचार सुनकर बड़े-बड़े मुनीश्वर, देवता, गन्धर्व, दानव, मानव, पक्षी और वैसा रूप धारण करनेवाले नग, पर्वत, नदी, समुद्र, यक्ष, किन्नर और रावणादि राक्षस भी वहीं आ पहुंचे ॥ २०१–२०३ ॥ उन सबको आया हुआ देखकर राजाने उनसे कहा कि जो

सर्गः १] सारकाण्डम् २३


रूपसौन्दर्यसंभ्रान्तांस्तां हर्तुं ते समुद्यताः । तान् कन्याहरणोद्युक्तान्नृपान् दृष्ट्वा सनिर्जरान् ॥२०६॥ चकार संगरं तैः स पद्माक्षो लोमहर्षणम् । सङ्ग्रामपीडिता देवा दानवा विमुखा रणे ॥२०७॥ बभूवुस्तत्र दैत्यैश्च पद्माक्षो निहतो रणे । ततस्ते मिलिताः सर्वे तां धर्तुं द्रुतमन्वयुः ॥२०८॥ सा दृष्ट्वा धर्तुमुद्युक्तान् हुताशाग्नौ कलेवरम् । तामदृष्ट्वा नृपाद्यास्ते विचिन्वन्नगरे तदा ॥२०९॥ समभञ्जन्गेहानि भूमिं खनन्नितस्ततः । श्मशानतुल्यं नगरं जातं वै क्षणमात्रतः ॥२१०॥ पद्माक्षनृपतेर्लक्ष्मीसङ्गाज्जातेदृशी दशा । तस्मान्न मुनयो लक्ष्मीं कामयन्ति कदाचन ॥२११॥ लक्ष्माश्रितस्य चाञ्चल्यं भयशोकाद्वधोऽपि च । भवत्येव महद्दुःखं तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥२१२॥ पद्माक्षे निहते युद्धे नृपपत्न्यः सहस्रशः । भर्त्रा सहैव गमनं चक्रुस्ता भयनिर्गताः ॥२१३॥ ततस्ते दैत्यवर्याद्या ययुः स्वं स्वं स्थलं प्रति । एकदा वह्निकुण्डात्सा पद्मा शक्तिः स्थिरा हरेः ॥२१४॥ बहिर्निर्गत्य कुण्डस्य समीपे समुपार्विशत् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र पुष्पकस्थो दशाननः ॥२१५॥ विचरन् जगतीं जेतुमाकाशवर्त्मना ययौ । सारणाख्यो ददर्शाय वह्निकुण्डे बहिः स्थिताम् ॥२१६॥ सारणो दर्शयामास रावणाय वचोऽब्रवीत् । पुरा सुरमृगाक्षाद्य यां धर्तुं समुपास्थिताः ॥२१७॥ सेयं पद्माक्षनृपतेः कन्या पद्माऽग्निसन्निभा । मन्दारणवचः श्रुत्वा तां दृष्ट्वा काममोहितः ॥२१८॥ यानाज्जवाद्दूध्र्वपात्तां धर्तु माऽनलेऽक्षिपत् । तामग्नौ प्रप्रविष्टां स दृष्ट्वा हान्वाऽथ तन्स्थलम् ॥२१९॥ गतं प्राह दशग्रीवः क्व गता देवा सुरादयः । कृत्वाऽग्नौ वसतिं पूर्व भ्रमग्रन्थाः कृताः पुरा ॥२२०॥ तदद्य वासस्थानं ते मया ज्ञातं मनोरमे । पश्येऽद्यनाऽहं त्वां धर्तुं शोधयत्यनलस्थलम् ॥२२१॥


कोई अपने शरीरको आकाशके नीले रंगसे रंग लेगा अर्थात् जो ऐसा कर सकेगा) उसे ही यह अपनी पद्मा नामकी कन्या दूँगा। यह मेरी दृढ़ प्रतिज्ञा है। राजाके इस दुर्घट वचनको सुनकर वे नृपश्रेष्ठ पद्माके सौंदर्यपर मोहित होते हुए उसका हरण करनेके लिए उद्यत हो गये। देवताओ सहित उन राजाओंको कन्याहरणके लिए उद्यत देखकर राजा पद्माक्ष उनके साथ लोमहर्षण अर्थात् रोंगटे खड़े करनेवाला युद्ध किया। उनके बाणोंसे पीड़ित होकर सुर तथा दानव रणसे भागने लगे। परन्तु अन्तमें दैत्योंके द्वारा राजा पद्माक्ष रणमें मारा गया। तदनन्तर वे सब मिलकर पद्माको पकड़नेके लिए बड़े वेगसे दौड़े। उनको पकड़नेके लिए आते देखकर पद्मा अग्निमें कूद पड़ी। उसको न देखकर राजाओंने उस सारे नगरमें ढूँढ़ना आरम्भ किया। राजमहल तोड़कर गिरा दिया और बहुत-सी इधर उधरकी जमीन खोद डाली। क्षणभरमें सारा नगर श्मशान बन गया ॥२०४-२१०॥ लक्ष्मीके सम्पर्कसे राजा पद्माक्षकी ऐसी दशा हुई। इसलिये मुनि लोग लक्ष्मीको कभी नहीं चाहते ॥२११॥ लक्ष्मीसे चित्तकी चंचलता बढ़ती है भय बढ़ता है शोक बढ़ता है, मनुष्य मारा जाता है और बड़ा भारी दुःख पाता है। इस वास्ते लक्ष्मीसे दूर रहना चाहिये ॥२१२॥ युद्धमें राजा पद्माक्षके मारे जानेपर राजाकी हजारों स्त्रिये भयभीत होकर राजाके साथ ही सती हो गयी ॥२१३॥ बादमें वे सब दैत्य भी अपने अपने स्थानको चले गये। एक समय श्रीहरिकी स्थिरशक्तिरूपा लक्ष्मी अग्निकुण्डसे बाहर निकलकर कुण्डके समीप बैठी थी। इतनेमें रावण पुष्पक विमानपर बैठकर विचरता हुआ जगत्को जीतनेके लिए आकाशमार्गसे उधर ही निकला। उस रावणका मंत्री सारण पद्माको अग्निकुण्डके बाहर बैठी देख रावणको दिखलाकर कहने लगा कि पूर्वकालमें जिस राजा पद्माक्षकी कन्याके लिए देवताओं और असुरोंका राजाके साथ युद्ध करना पड़ा था, वही कन्या अग्निकुण्डके पास बैठी है। सारणके इस वचनको सुन तथा पद्माको देख कामसे मोहित होकर रावण ज्यों ही वेगसे उसको पकड़नेके लिए नीचे कूदा, त्यों ही वह फिर अग्निमें प्रवेश कर गयी। उसको अग्निमें प्रवेश करती गया उस स्थानको देखकर रावण कहने लगा-॥२१४-२१९॥ हे पद्मे ! तुमने पहिले भी अग्निमें प्रवेश करके राजाओं तथा देवताओंको बड़ा भारी दुःख दिया है। हे मनोरमे ! तुम्हारा निवास-स्थान आज मैंने देख लिया है। अब मैं तुमको खोजनेके लिये सारा अग्निकुण्ड छान डालूँगा

२४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३


इत्युक्त्वा जलकुम्भेऽथ विषेणाग्निं दशाननः । यावत्प्रक्षिप्यति कस्यायां तावत्तत्र ददर्श ह ॥२२२॥
पञ्च रत्नानि दिव्यानि गृहान्त्रा तानि रावणः । करण्डिकायां संस्थाप्य विमानेन ययौ पुरीम् ॥२२३॥
करण्डिकां देवगेहे संस्थाप्य रावणस्तदा । रात्रौ मंदोदरीं प्राह मंचकस्थां रहःस्थितः । २२४॥
हे मंदोदरि रत्नानि मया स्वल्पोपदानि हि । समानीतानि यत्नेन त्वदर्थं सुसमानि ॥२२५॥
करण्डिकायां वर्तन्ते गच्छ गृहाण तानि हि । तद्रहस्यवचः श्रुत्वा सा ययौ देवमन्दिरम् ॥२२६॥
करण्डिकां तत्र दृष्ट्वा तां नेतुं यत्नमन्वितं । यावदुच्चालयामास न चचाल तदा भुवः ॥२२७॥
तदा सा लज्जिता गत्वा रावणाय न्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वा स प्रहस्याथ स्वयं नेतुं ययौ तदा ॥२२८॥
तां माऽप्युच्चालयामास न चचाल करण्डिका । यदा त्रिंशद्भुजैर्भूभ्यां न चचाल करण्डिका ॥२२९॥
तदा स विस्मयाविष्टो भयं मेने दशाननः । तत्रैवोद्घाटयामास रावणस्तां करण्डिकाम् ॥२३०॥
तावद्ददर्श तस्यां स कन्यां सूर्यप्रभोपमाम् । तत्तेजोहतनेत्रस्त्वन्यामश्वत्पि रखायाम् ॥२३१॥
तां द्रष्टुं बालिकामस्या ययुः सुहृद्गणादयः । तदा मंदोदरीं प्राह तस्या वृत्तं रणोद्भवम् ॥२३२॥
पद्मवाक्कुञ्जतात्यादि सर्वं वृत्तं दशाननः । क्रोधान्मन्दोदरी प्राह भयभीता दशाननम् ॥२३३॥
इयं कुन्था प्रविष्टा च कुलविध्वंसकारिणी । लंकां किमर्थमानीता दृष्ट्वा ज्ञात्वाऽपि चेष्टितम् ॥२३४॥
दृष्टा स्ववशपाताय श्मशाने मन्दरे वने बाल्येऽपीदृशी गुर्वी तारुण्ये किं करिष्यति । २३५॥
वधोऽस्यास्तव जानेऽहं मृत्युश्चैव भविष्यति । स्थापनीया न लङ्कायामियमग्रेऽथ रावण । २३६॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा सत्यं मेने दशाननः । मन्त्रिभिश्चाथ सम्मन्त्र्य दूतानाज्ञापयत्तदा । २३७
करण्डिकेयं नीत्वाऽद्य विमाने स्थाप्य यत्नतः । त्यक्तव्या मय वाक्यात्तु वने गच्छत वेगतः ॥२३८॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे सम्भूय पुष्पकेऽथ ताम् । करण्डिकां तु संस्थाप्य निर्ययुराकाशवर्त्मना । २३९


॥ २२२-२२३ ॥ ऐसा कहकर दशानन ने उस घटमें अग्निको बुझा दिया और ज्यों ही उसमें देखने लगा, त्यों ही उसमें उस दिव्य पाँच रत्न दिखाया दिया। २२२॥ रावणने उन पाँचों रत्नोंको उठा लिया और उस मन्थन रस तथा विमानपर चढ़कर अपनी नगरीको चला गया ॥२२३॥ वहाँ जाकर रावणने उस सन्दूकको देवगृहमें रखकर रात्रिके समय एकान्तमें पलंगपर बैठी हुई मन्दोदरी से कहा - ॥ २२४॥ हे मन्दोदरि ! जिन्हें देखकर तुम सन्तुष्ट हो जाओगी, ऐसे कुछ रत्न मैं बड़े परिश्रमसे तुम्हारे लिये ले आया हूँ। वे देवालयमें सन्दूकके भीतर रक्खे हैं, जाकर ले आओ। रावणका वचन सुनकर वह देवालयमें गयी ॥ २२५॥ २२६॥ सन्दूकको देख उसे पतिगृहके पास ले जानेके लिये उठाया तो वह जमीनसे तनिक भी नहीं उठी, तब उसने लज्जित होकर रावणसे सब हाल कहा। यह सुनता हुआ हँसकर रावण स्वयं उसे लानेके लिये गया और उसे उठाया, किन्तु वह टससे मस नहीं हुआ ॥ २२८॥ २२९॥ इससे रावण बड़ा विस्मित हुआ और डर गया। फिर उसने वहीं उस सन्दूकको खोला ॥२३० तब उस समय सूर्यके समान कान्तिवाली एक कन्या दिखायी दी। उसके तेजसे अन्धा होकर सहसा आँख बंद करने लगा । २३१॥ उस मनोहर बालिकाको देखनेके लिये उसके मित्र तथा गुरु आदि आने लगे। उस समय रावणने मन्दोदरीको युद्धका तथा जैसे वह राजा पद्माक्षके कुञ्जमें उत्पन्न हुई थी, वह सब वृत्तान्त कह सुनाया। मन्दोदरी भयभीत होकर क्रोधपूर्वक दशाननसे कहने लगी- ॥२३२ । २३३ । इस कुमथना, कुलविध्वंसकारिणी तथा प्रचण्डाके कर्मोंको जानते हुए भी तुम इसको लंकामें क्यों ले आय ? ॥ २३४॥ यह दुष्टा तुम्हारे कुलका नाश करनेवाली है। इसको शीघ्र वनमें छुड़वा दो । बचपनमें ही यह इतनी भारी है तो जवानीमें न जाने क्या करेगी ॥ २३५॥ इससे तुम्हारी मृत्यु होगी। ऐसा मुझे जान पड़ता है। इसको लंकामें घड़ी भर भी नहीं रखना चाहिये । २३६ । रावणने मन्दोदरीकी बात सत्य समझा तथा मन्त्रियोंसे मन्त्रणा करके दूतोंको आज्ञा दी—॥२३७॥ इस सन्दूकको यत्नपूर्वक शीघ्र विमानमें रखकर आज ही मेरे कथनानुसार वनमें छोड़ आओ। २३८॥ पश्चात् वे सब राक्षस इकट्ठे हो तथा उस संन्दूकको विमानमें रखकर आकाशमार्गसे चले ॥ २३९॥ उस समय

सर्गः ३ ] सारकाण्डम् ९५

सर्गः ३ ] सारकाण्डम् ९५

दशास्यपत्नी तानाह कार्या भूमिगता त्वियम् । स्थापनीया बहिर्नेयं दर्शनाद्वंशकारिणी ॥ २४०॥ गृहस्थाश्रमयुक्तो यस्तथा च विजितेंद्रियः । वृद्धिमेष्यति तद्गेहे कुमारीयं शुभानना ॥ २४१॥ चराचरेषु सर्वत्र आत्मरूपेण यः स्थितः । तस्य गेहे चिरं कालं स्थास्यतीयं न संशयः ॥ २४२॥ इति मंदोदरीवाक्यं श्रुत्वा दूताः सविस्तराम् यात्रार्थे गंतुमुद्युक्तास्तावत्कन्या वचोऽब्रवीत् ॥ २४३॥ यास्याम्यहं पुनर्लङ्कां राक्षसानां वधाय च निधनाय दशास्यस्य सपुत्रस्य समंत्रिणः ॥ २४४॥ अथ तृतीयवेलायामागमिष्याहं पुनस्त्विह निकुम्भजं पौंड्रकं तं शतशीर्षं च रावणम् ॥ २४५ हनिष्यामि पुनर्गत्वा पुनर्यास्याम्यहं त्वत्पुर्याम् अह चतुर्थवेलायामद्भुतं मूलकासुरम् । २४६ । कुम्भकर्णसुतं शूरं संहनिष्याम्यहं पुनः सत्यस्या वचनं श्रुत्वा हृदि विद्धो दशाननः ॥ २४७॥ जातास्ते राक्षसाः सर्वे भयभीताः शवोपमाः। रावणश्चिन्तयामास हन्तव्याऽयं बालिका ॥ २४८॥ तीक्ष्णं खड्गं करे धृत्वा पपां दुद्राव रावणः। हन्तुकामं पतिं दृष्ट्वा मयकन्या न्यवारयत् ॥ २४९॥ साहसं कुरु माऽद्यैव सत्यायुषि दशानन । भविष्यति वधस्त्वद्य तत्र नास्या वचो मृषा ॥ २५०॥ यद्भविव्यति भवतु तदग्रे त्यज कानने । कालान्तरेण यो मृत्युस्तन्मद्य त्वं किमिच्छसि ॥ २५१॥ इति भार्यावचः श्रुत्वा तूष्णीमास दशाननः। ततः सा पेटिका दूतैर्नीता यानेन वै जवात् ॥ २५२॥ पश्यन्द्भर्वानि सर्वाणि परिपार्थे मैथिलस्य च कृता भूमिगता दूतैस्तदा सर्वैः करण्डिका ॥ २५३॥ तता ययुः पुनर्लङ्कां दूतास्ते रावणस्य च । न्यवेदयन् रावणाय सर्वं वृत्तं यथाश्रुतम् ॥ २५४॥ सा भूमिः सूर्यग्रहणे विदेहेन समर्पिता। ब्राह्मणाय द्विजश्चापि तां कर्षयितुमुद्यतः ॥ २५५ । पश्यन्मुहूर्त्तं प्रियः स प्रत्यब्दं वै पुनः पुनः। चिरकालेन दृष्टाऽथ बृहतीं परमोदयम् ॥ २५६ ।

मन्दोदरी ने उनसे कहा कि दर्शनमात्रसे वंश करनेवाली इस यतिनीको बाहर खुली न रखना, बल्कि अण्डामे गाड आना ॥ २४० ॥ गृहस्थाश्रममे होते हुए भी जो जितेन्द्रिय होगा, उसके घरमे यह शुभानना कुमारी वृद्धिको प्राप्त होगी ॥ २४१ ॥ सब चराचरके साथ अपनी आत्माके समान बर्ताव करनेवाला जो होगा, उसके घरमे यह चिरकाल स्थित रहेगी। इसमे सन्देह नहीं है (अर्थात् समदर्शी तथा जितेन्द्रियके घरमे ही लक्ष्मी स्थिरकारक रहती है-दूसरेके यहाँ नही) ॥ २४२ ॥ इस प्रकार मन्दोदरीकी बात सुनकर ज्यों ही दूत लोग चलनेको उद्यत हुए, त्यों ही कन्या कहने लगी- ॥ २४३ ॥ मै फिर राक्षसों तथा मन्त्री और पुत्रसहित रावणका वध करनेके लिए लंकामे आऊँगी ॥ २४४ । पुनः तीसरी बार यहाँ आकर निकुम्भपुत्र पौण्ड्रकको तथा सौ सिरवाले रावणको मारूँगी; फिर बादमे पुनः चौथी बार आकर शूरवीर कुम्भकर्ण सुत मूलकासुरको मारूँगी इसके बचनको सुनकर दशाननका हृदय बिद्ध हो गया ॥ २४५-२४७॥ वे सब राक्षस भी भयभीत होकर मृतक सदृश हो गये। रावणने सोचा कि इस बालिकाको अभी मार डालना चाहिये यह विचार तथा तीक्ष्ण तलवार हाथमे लेकर वह पपाकी तरफ दौड़ा। पतिको इस प्रकार कन्याको मारनेके लिये उद्यत देखकर मयदानवकी कन्या मन्दोदरीने कहा- ॥ २४८ ॥ २४९ ॥ हे दशानन ! आयु शेष रहनेपर भी आज ही तुम यह साहस मत करो। इससे तुम्हारी मृत्यु हो जायगी। इनका वचन झूठा न होगा ॥ २५० ॥ आगे जो होनेवाला होगा सो होगा। अभी तो तुम इसे वनमे छुटवा दो । कालान्तरमे होनेवाली मृत्युको आज ही क्यो बुलाते हो ? ॥ २५१ ॥ भार्याके इस वचनको सुनकर दशानन चुप हो गया। पश्चात् दूत उस सन्दूकचीको शीघ्र विमानमे रखकर ले गये ॥ २५२ ॥ सीताके प्रिय मिथिला नगरके वनोंको देखते हुए उसीपर सब दूतोंने उस करण्डिकाको भूमिमे गाड दिया ॥ २५३ ॥ तदनन्तर वे लङ्का लौट गये और जो किया था, सो सब वृत्तान्त रावणसे निवेदन कर दिया ॥ २५४ ॥ राजा विदेहने वह जमीन सूर्यग्रहणके अवसरपर एक ब्राह्मणको दान दे दी थी। ब्राह्मणने उस जमीनका जुतवानेका विचार किया ॥ २५५ ॥ प्रतिवर्ष शुभ मुहूर्त देखते-देखते बहुत वर्षों बाद

२६आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

शूद्रेण कर्षयामास भूमिं कृष्यर्थमादरात् । तदा हलमुखाग्रेण निर्गता सा करंडिका ॥२५७॥ तां गृहीत्वा स शूद्रोऽपि ययौ भूमिपतिं द्विजम् । स मत्वा तन्निधानं तु ह्युत्प्रेक्षाप्राप्तद्विजोत्तमम् ॥२५८॥ श्रेष्ठस्त्वं मुहूर्तोऽय महाभाग्यं तव द्विज । इमं हलाग्रसंभूतां गृहाण त्वं करंडिकाम् । २५९॥ निधानपूरितां गुर्वी मया यत्नेन बाहिताम् । ततः स द्विजवर्यस्तु तां जगाद करंडिकाम् । २६० । तामानीय विदेहाय सभामध्ये ददौ मुदा नृशंसं प्राह वृतं तद्विप्रः श्रुत्वा नृपोऽपि सः ॥२६१। उवाच ब्राह्मण भक्त्या मया भूमिः समर्पिता तस्यां लब्धा त्वया चेयं त्वमेवास्तु करंडिका ।२६२। विदेहवृपतेर्वाक्यं श्रुत्वोवाच द्विजः पुनः । मद्यं समर्पिता पूर्वं भूमिरंव मया नृप । २६३॥ नैषा करंडिका रम्या वसुपूर्णा समर्पिता । यद्भूभौ वर्तते वित्तं तन्नृपस्य न संशयः ॥२६४ मा मामधर्मः युङ्क्त गृहाणेषां करंडिकाम् एवं नृपस्य विप्रेण कलहोऽभूत्सुदारुणः ॥२६५ । तदा सभासदाः सर्वे नृपतिं वाक्यमब्रुवन् । मा काशः करंडो राजन् पश्यास्यां किं नु वर्तते । २६६॥ ता तदोद्घाटयामास दूतैर्नृपतिसत्तमः । तस्यां दृष्ट्वा बालिकां तु विस्मयं प्राप पार्थिवः । २६७॥ द्विजस्त्यक्त्वा ययौ गेह पालयामास तां नृपः । तदा खेचव्यचांगानि नेदुः कुसुमवृष्टिभि ॥२६८ ववृषुः सुरसंघाश्च तां कन्या जनकं नृपम् । गंधर्वा गायनं चक्रुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः । २६९ । तदा मेने निजा कन्यां जनकोऽतोषमाप सः । जातकं कारयामास विप्रैस्तस्याः सविस्तरम् ॥ २७० । ददौ दानानि विप्रेभ्यो ननृतुर्वारयोषितः । मातुलुङ्गाभिर्गता या मातुलुङ्गीति सा स्मृता ॥२७१ । अग्निशालाद्विनिर्गतां तथा रत्नावलीति च । स्वर्नान्तर्गतत्वाच्च प्रोच्यते जगतीतले ॥२७२॥ धरण्या निर्गता यस्मान्नाम्नाद्धरणितीति च । जनकेनापिता यस्माज्जानकीति प्रकीर्त्यते । २७३॥

उसका सब काम सदयको बतलाया प्रसन्न होकर ॥ २५६ ॥ उस ब्राह्मण आदरपूर्वक शूद्रस उस उपायमय मकार लिए हल चलवाया । उसी समय इसके फलसे यह सबब विचित्र आयो । २५७ ।। उसको देखकर वह शूद्र जमीनके मालिकके पास गया और उसको दृढ खजाना समझकर महर्षि ब्राह्मणके कहने लगा हे द्विज ! आप बड़े भाग्यशाली है आपने अच्छा मुहूर्तमें काम आरम्भ करवाया। यह हलके अग्रभागसे (अर्थात् फारका जिसका मन्त्रतन्त्र खींचा करते है) बहुत (प्रान्त) सन्तुष्टको लिये । मै लगनसे भरी हुई बड़ा भारी इस पिटारीको बड़ी कठिनता उठाके लाया हूँ। उस द्विजने उसको ले लिया । २५८-२६० । उसक ले जाकर ब्राह्मणने सभाके सामने राजा विदेहको दिया और सब समाचार कह सुनाया। राजा भी यह सुनकर ब्राह्मण कहने लगे कि मैने तो भक्तिस भूमि आपकी समर्पण कर दी है। तवं उसमन मिली हुई यह पिटारी भी आप ही की है ॥ २६१ ॥ २६२ ॥ राजा विदेहके वचनको सुनकर ब्राह्मण उनसे कहने लगा- हे नृप आपने मुझे भूमि ही दी है॥ २६३ यह धनपूर्ण सुन्दर संदूक नही दी थी। इसलिए जो भूमिमें धन है वह निर्विवाद राजाका ही होता है। २६४ ! मुझे अधर्ममें न डाल और इस पिटारीको आप ही बहण कर। इस प्रकार राज' तथा ब्राह्मणमे बडा झगड़ा होने लगा। तब सब सभासदोन राजासे कहा-हे राजन् ! बक्सूको छोड़ें और देख कि इसमे क्या है ? ॥ २६५ । २६६ । तव नृपतिश्रेष्ठ श्रेष्ठ नृपति विदेहने दूतोंप संदूक खुलवायी । उसमें बालिकाको देखकर राजा बडे विस्मित हुए। ब्राह्मण उसे देवी छोड़कर घर चला गया। तब राजाने हो उस कन्याको पाल लिया। तब देवताओंक बाजे बजे और उन्होने उस कन्या तथा राजाके ऊपर पुष्पवृष्टि की । गन्धर्व गाने लगे । अप्सराये नृत्य करन लगीं ॥ २६७-२६९ ॥ तब राजा जनकने प्रसन्न होकर उसको अपनी पुत्री माना। ब्राह्मणोके द्वारा विस्तारपूर्वक उसका जातकर्मसंस्कार ( सन्तानके उत्पन्न होनेपर करनेका संस्कार ) करवाया ॥ २७० ॥ विप्रोको बहुतसे दान दिये और वेश्याओंका गायन करवाया गया । बगीचेमें वह कन्या मातुलुङ्कफलसे निकलनेके कारण मातुलुङ्गी, अग्निमे वास करनेसे अग्निगर्भा तथा रत्नोंमें निवास करनेसे रत्नावली कही जाने लगी ॥ २७१ ॥ २७२, धरणीसे निकलने-

सर्गः ३ ]

सर्गः ३ ] सारकाण्डम् २७

संसर्गात्सितेता यस्यासीत्तेनैषा प्रगीयते । पद्माभूत्स्वैः कन्या तस्मान्पद्मेति सा स्मृता ॥२७३॥ एवं नामान्यनेकानि सीतायाः संति भो नृप । आकाशनीलवर्णाभवपुषाऽनेन जानकी ॥२७४॥ लब्धा रामेण पद्माक्षप्रतिज्ञा सफलीकृता । एवं मया यथा दृष्टं तथा स्वां विनिवेदितम् ॥२७५। अतस्त्वं स्नुषास्त्वत्र कर्तुमर्हसि भो नृप । श्रीशिव उवाच एतस्मिन्नंतरे तत्र पूर्वं दशरथेन च ॥ २७७ ॥ महासुहृद् ययुः पैत्र्यैः स्त्रीपुत्रैः ससुताश्च ते । कोशलो मगधेशश्च कैकयश्च युधाजितः ॥२७८॥ मानयामास तान् राजा जनकोऽपि मुदान्वितः । ततो दशरथं पूज्य श्रीरामं लक्ष्मणं तथा ॥२७९॥ भरतं चापि शत्रुघ्नं संपूज्याभरणादिभिः । निनाय जनकस्तुष्टः स्वपुरीं परमोत्सवः ।२८०॥ तदा रामो नृपं नत्वा राज्ञा चालिङ्गितो मुहुः । वसिष्ठं गाधिनं नत्वा कौसल्यादि प्रणम्य च ।२८१॥ राज्ञो दशरथस्याग्रे संस्त्रीभिर्बन्धुभिः सह । गजारूढौ ययावग्रे तेऽप्यभूवन् गजस्थिताः ।२८२॥ नदत्सु वाद्यसंघेषु नृत्यत्सु मागधादिषु स्तौत्सु नागरस्त्रीषु विवेश नगरीं प्रभुः ॥२८३॥ तदाऽऽत्तासंभ्रमः पौरस्त्रीणां श्रीरामदर्शने । विसृज्य स्वायकृत्यानि ददृशुर्द्वारादिषु ॥२८४॥ कट्यां निधाय बालांश्च ददृशु रघुनंदनम् । राजमार्गतं रामं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ।२८५॥ एवं महोत्सवं गत्वाऽस्थात् दशरथः सुतः । यथा वस्त्रान्नतोयाद्यैः परिपूर्ण मनोरमम् ॥२८६। कृत्वा ज्योतिर्विदां लग्नाद्दिनमस्य विनिश्चयम् । मंडपैश्च तोरणानि पताकाश्च ध्वजांस्तथा ।२८७। रोपयमासु सर्वत्र मातृगो मिथिलां पुरीम् । भागाश्चंदनलिप्ताश्च पुष्पैरच्छादिता आप ॥२८८। गलाभिभारणः भूपैर्घोषाद्यस्त चकारयत् । ततो मुहूर्त्तसमये शुभांऽछां निर्गता शुभास् ॥२८९।

के कारण ... जानक कहा। पालित होनेसे जानकी सीता (फाल) के अग्रभागसे प्रकट होनेके कारण सीता और राजा पद्माक्षकी कन्या होनेसे वह पद्मा कहलायी ॥ २७३ ॥ २७४ । हे महाराज दशरथ इस प्रकार सीताके अनेक नाम हैं। आकाशके समान नीलवर्णरूपवाले रामने सीताको प्राप्त करके राजा पद्माक्षकी प्रतिज्ञा पूर्ण कर दी। इस प्रकार जो आपने पूछा सो मैंने निवेदन कर दिया। अब आपका उस सीताको स्नुषावधूं स्वीकार करना चाहिये। शिवजी बोले—इतनेमें पहिलेसे राजा दशरथके द्वारा बुलाये गये उनके बन्धुवर कोशलराज तथा मगधराज युधाजित् नामक कैकयराज अपनी स्त्री और प्रजाके साथ लश्कर वहाँ आ पहुँचे । राजा जनकने भी उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया । पश्चात् राजा दशरथका वस्त्र भूषण आदिसे और राम लक्ष्मण भरत तथा शत्रुघ्नकी पूजा करके राजा जनक महान् उत्सवके साथ अपने नगरमें ले गये ॥ २७५-२८० ॥ तदनन्तर रामने राजा दशरथको प्रणाम किया । राजाने उन्हें हृदयसे लगाया । फिर रामने गुरु वसिष्ठजी तथा गाधिसुत आदि माताओंको प्रणाम करके राजा दशरथके आगे उन स्त्रियोंका तथा बन्धुओंसहित हाथियोंपर चढ़कर आगे-आगे चले। उनके पीछे और सब लोग गजारूढ़ होकर चल पड़े। इस प्रकार वाद्यसमूहके शब्दका सुनते, चारणोंकी स्तुतियोंका श्रवण करते तथा वेश्याओंके नाचको देखते हुए प्रभु रामने नगरमें प्रवेश किया । उस समय रामके दर्शनके लिये नगरकी स्त्रियें व्याकुल हो उठीं। अपन-अपन गृहकार्योंको छोड़ सबके सब बालकोंको गोदमें लिये नगरके दरवाजे आदिपर आकर रघुनन्दन रामका दर्शन करने लगीं। राम जब सड़कपर आ गये, तब उन्होंने उनपर पुष्पवृष्टि की ॥ २८१-२८५ ॥ इस तरह महोत्सवके साथ राजा दशरथ राम आदिको लेकर अन्न (भोजनका सामान), वस्त्र (ओढ़ने-बिछानेका सामान) तथा जल (नहाने-धोने तथा पीने का पानी) आदिसे परिपूर्ण मनोहर वासस्थानपर (बरके ठहरनेके स्थानपर) गये ॥ २८६ ॥ मन्त्रियोंने ज्योतिषीके द्वारा लग्नका दिन निश्चय कराकर समस्त मिथिलापुरीको मण्डपोंसे, तोरणोंसे, पताकाओंसे तथा रंग-बिरङ्गी ध्वजाओंसे सजवा दिया। बड़े-बड़े रास्तोंको चन्दनसे सिपवाया गया। उनपर भाँति-

९८ आनन्दरामायणे [सर्गः ३

सुमङ्गल्याः स्त्रियः सर्वाः कौसल्याद्यास्तु मातरः । रामादीन् पांगुलम्पादी नीराजनपुरःसरम् ॥२९०॥ कम्भुंभांस्तोयपूर्णान्वितुदिक्षु महीपरन् । सम्वत्स्य स्नापयामासुर्महावाद्यपुरःसरम् ॥२९१॥ तटाभ्यंगं स्वयं वापि कृत्वा मन्तुश्च मातरः । रामादीन् पूज्तः कृत्वा वस्त्रालंकारभूषिताः ॥२९२॥ अभ्यङ्गपूर्वकं पत्नी राजा दशरथोऽपि सः । समाहूय नृपस्त्रीश्च समाज्ञा म्वालिके गुरुः ॥२९३॥ मुक्ताविनिर्मिते राज्ञः पार्श्वे वामे न्यवेशयत् । अग्रे गर्भादिकांश्च ताः स्त्रियोऽवन्सननाः ॥२९४॥ हरिद्राकुंकुमालिप्तचरणा रेजिरेऽद्रुते । वसिष्ठो ब्राह्मणैर्युक्तो राजा गर्भादिभिर्मुदा ॥२९५॥ कृत्वा गणपतेः पूजां पुण्याह्यादितयं क्रमात् । कारयामास विधिवत्प्रतिष्ठां देवतस्य च ॥२९६॥ ग्रामाचारं कुलाचारं वृद्धाचारं तथा पुनः । देशाचारं च प्रमदाचारादीनकरोन्नृपः ॥२९७॥ तोयकुम्भं मंडपादिकानां पूजनमाचरत् । कौसल्याद्याः स्त्रियः सर्वा हरिपीतारुणैर्वरैः ॥२९८॥ हेमन्तन्तुर्वितैर्वस्त्रैर्दिशेजर्मंडपांगण । जनकश्च नृपैर्युक्तो महावाद्यपुरःसरम् ॥२९९॥ रामादीन् निजं गेहं नेतुकामः समाययौ । मंडपे पूजयामास रामादीन् जनकस्तदा ॥३००॥ हेम्नतन्तुद्रवैर्र्दव्यैर्वस्त्रैराभरणादिभिः । तदा विरेजुस्ते बालः सर्वे प्रमुदिताननाः ॥३०१॥ तानग्रे वारणेंद्रस्था दिव्यचामरवीजिताः । शृण्वन्तो वाद्यघोषांश्च दंपतः पुष्पवृष्टिभिः ॥३०२॥ हरिद्रांकितधान्यैश्च माङ्गल्यैर्मौक्तिकादिभिः । मातृभिश्चारुणेक्षांषु वर्षिताभिश्चहुर्मुहुः । ३०३॥ एव ते राघवाश्चाश्च पुरस्त्रीभिनिरीक्षिताः । प्रासादोपरि संस्थाभिलाजाभिर्वर्षिता मुहुः ॥३०४॥ ददृशुर्नर्तनान्यग्रे वारस्त्रीणां स्मिताननाः । वाटिकाः पुष्पवृक्षाणां वरमुक्ताप्रनिर्मिताः ॥३०५॥

भांति के पुष्प विखर दिये और साफ खास स्थानोंमें गलत्था तथा तारा बनवा दिये, पुष्पलताओ और मार्जारिक पाषा द्वारा उस समय वह नगरी गोद की दिव्य मा ३स गहन लगो । तदनन्तर शुभ मुहूर्तमे जिस रामका माताके शरीरम स्त्रियाके द्वारा तेल हुल्दा आदि मन, गया । उस समय कौमल्या आदि माताओने आंगन लेप तथा रामका पानी छिड़ककर जम्पूर्ण हंसक सहित चार सुन्दर घड़ोको चारो दिशाअम स्थापित करके राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्नको वाद्यत्कृतिक मध्य मङ्गलमय स्नान कराया ॥२९०-२९१॥ फिर तेल आदि मलकर अपन आप भी सब माताओन स्नान किया। पहिल नया आदिको वस्त्र तथा भूषणोसे भूषित करके तदनन्तर आरिका शरीरम अभ्यङ्ग करक मन्दकर) राजा दशरथने भी स्नान किया। पश्चात् गुरु वशिष्ठत नजाक सब नियोको समाद्रूपरम बुलाकर राजाके बामभागम मुक्तानिर्मित स्तम्भिक महित ( वरी या आसन, पर बैठाया। उस समय मबके आसनमे स्थिति राम आदि बालकोक समान बैठाकर भिन्न चुन किया तथा रूपी और तेल चरणाम लगाये अत्यन्त सुशो- भित होत हथी । बाह्मणके महित धषिष्ठजीन राग दशरथ साथ गभादिके द्वारा गणपतिपूजन तथा पुण्याहवाचन ये दोनों कर्म प्रमुख करवाये और तीसरा कर्म विधिनत् दस्ताकी प्रतिष्ठा करवायी । राजा दशरयन भा बादमे प्रसन्नतापूर्व ग्रामाचार कुलाचार, वृद्धाचार देशाचार तथा प्रमदाचार आदि किया ॥२९२-२९६ ॥ तदनन्तर अहपूर्ण कुम्भ तथा मण्डप आदिकी पूजा का। मण्डपके आँगनम हरी लाल, पीली तथा जरादार साड़ियोको पहनकर कौसल्या आदि स्त्रिय बड़ी सुन्दर दीसन लगा। बड़े बड़े बाजोनको बजवान हुए अन्य राजाओक सहित राजा जनक श्री राम आदिको अपने भवनमें लिवा ले जानके लिये वहाँ आये। मण्डपम जाकर राजा जनकन राम आदिका पूजन किया ॥ ३०० ॥ उस समय प्रसन्न मुखवाले वे सब बालक जर्रोदार दिव्य वस्त्रो तथा आभरणोका पहने हुए बड़े मुन्दर लगते लगे । ३०१॥ बादम वे सब जं कि उत्तम हाथियोपर बैठे हुए थे, जिनपर सुन्दर चैवर दुल रहे थे । हाथियोपर बैठा हुई माताएं चारो तरफम बारम्बार जिनपर मोतियो, माङ्गलक हरदामिश्रित चानलो तथा पुष्पोकी बौछार कर रही थीं । जिनके आ नगरकी स्त्रिय बड़े चावसे देख रही थी तथा भवनोंपरसे बालका लावा बरसा रहा थी । अनिन्तर मुझासे वहाँके रास्तेमे वेश्याओके नृत्य

मर्गः ३ ] बालकाण्डम् २९

तथा कृत्रिमवृक्षांश्च पताकाश्च प्रजांस्तथा । वह्निप्रद्योतदीर्घाणां पुष्पवृक्षविनिर्मिताम् ॥३०६॥ तडिन्प्रभोषमांश्चापि गगनान्तर्विगर्जिनन् । वह्निप्रद्योतधाम्न्याः प्राकारान् विविधान् वरान् ॥३०७॥ चंद्रज्योत्स्नाकृत्रिमांश्च दीपवृक्षांन् सहस्रशः । हारमालाश्च व्याघ्रादीन्कृत्रिमान् रशमींस्तथान् ॥३०८॥ औषधीभिः पूरितांश्च केकोचकोपमादिकान् । ददृशुस्तंगणेंद्रव्या एवं ते राघवादयः ॥३०९॥ तदा देवा विमानस्था ददृशुः कौतुकं मुदा । एव नानोत्सवैरैतान् पपुर्जनकमंदिरम् ॥३१०॥ अवरुह्य गजेन्द्रेभ्यस्तस्थुस्ते मंडपांगणे । मधुपर्कविधानानि विष्टरादीन् च क्रमात् ॥३११॥ तयोर्गुरू चक्रतुस्तां वसिष्ठगौतमत्मजौ । वाल्मीक्यादिमुनिगणैर्वेष्टितौ तुष्टमानसौ ॥३१२॥ ततः पूजां वधूनां च पुत्रा दशरथो नृपः । चकार गुरुणा युक्तस्तदा स मंडपाङ्गणे ॥३१३॥ ततो लग्नमुहूर्ते तान् वशंमिश्र पुरस्कृतन् । वेदिकासु स्थितान् कृत्वा दम्पत्योरंतरे पटान् ॥३१४॥ कृत्वा मंगलघोषांश्च मुनिभिश्चकृतुर्गुरुः । तदा तूष्णीं सभायां ते शुश्रुवुःसकला जनाः ॥ दूर्वाद्यैः क्षीरधान्यैश्च वधूपुत्रन्वतीन् स्त्रियः ॥ ३१५ ॥ ओंडैवातपयो शिवः सुखकरो मित्रः शशा रूपनः सर्वं ते मुनयश्चना दद्यु दिशः सर्वा मृगेंद्राः खगाः । नद्यःपुण्यसरोवरोर्गण दितिजास्तीर्थानि कंजामनश्चेंद्रा वह्नमरा नटी जलधयः कुर्वंतु वो मंगलम् ३१६॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चंद्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव कार्यः पतैर्यत्स्मरणं विधेयम् ३१७ एवं मंगलाशब्दैश्च महावाद्यपुरःसरम् । तेषांमतःपटान्मुक्त्वा ॐपुण्योऽस्त्वन्वतूर्गुरू ॥३१८॥ तासां ते पाणिग्रहणविधानं विधिपूर्वकम् । लाजाहोमादिकं सर्वं चक्रुर्मंगलपूर्वकम् ॥३१९॥ तदा महावाद्यघोषा निनेदुर्मंडपांगजे । ननृतुर्वारनार्यश्च जगुर्मागधवन्दिनः ॥३२०॥

मनोहर गिट्टी आदिके बने हुए गमलों, वृक्षों तथा फूल पत्तियोंसे बनी हुई वाटिकाओंको, कृत्रिम वृक्षोंको, पताकाओंको, ध्वजाओंको, बधिक समान जलवान, तडितके समान शभानबल और आकाशमें गरजनेवाले नाना प्रकारके आतिशवाजात सब पुष्पवृक्षतया वाटिका, हजारों चन्द्रमाओकी चान्दनीके कृत्रिम दीपवृक्षोंका, रश्मीमात्राओंका, रशामेरख हुए बनावटी व्याघ्रादिमृग वाटिका, ओषधिसं भरे हुए मोर तथा पक्षी आदिको देखने लगे ॥३०६-३०९॥ सब देवता भी आनन्दसे उस कौतुकको देख रहे थे। इस प्रकार विविध उत्सवों सहित वे राम आदि बालक राजा जनकके भवनको गये । ३१०॥ वहाँ जा तथा हाथियोंस उतरकर वे मण्डपके आँगनम खड हा गय। वाल्मीकि आदि मुनियांस घिर हुए दोनो वधक गुरु वशिष्ठ तथा श्रीमद्गुरु शतानन्दने प्रसन्नतास मधुपर्क (मधुमिश्रित दधि) का विधान और आसन आदिका विधान सम्पन्न करवाया । ३११॥३१२॥ पश्चात् राजा दशरथने गुरु वशिष्ठका साथ लेकर महर्षि बांधी पुत्रवधुओंकी पूजा की। फिर शुभ मुहूर्त तथा शुभलग्न मुनियो तथा गुरुतन उन-उन वधुओं ओर उन उन चार बालकोंको पृथक् पृथक् वेदियोपर बैठाकर उन दम्पत्याक बाचम बन्धक बहकर गङ्गलमय श्लोकोंका उच्चारण किया। सभाके सभ मनुष्य चुप होकर उसे सुनत लगे। दुवाय कलशम् गङ्गोपान चावल तथा फूल वरवधूके ऊपर बरसने लगे ॥ ३१३-३१५॥ तरुदाता दयालय गणपति, सुखकारक शिव, सूर्य, ग्रह राहु, सब मुनि, चल-अचल जीव, दशा दिशाय, सर्प, मृगन्द्र, खग, नदी, पवित्र सरोवर, दत्य, तीथ, ब्रह्मा, इन्द्र, अग्निसहिता तथा नदी-समुद्र आदि तुम लोगांका कल्याण करें ॥ ३१६॥ कोटिपाति आदिनाथका सत्यतल्या स्मरण ही तुम्हार लिए सुन्दर लग्न, शुभ दिन, ग्रहबल, विद्यावल तथा दैवबल बन जाय ॥ ३१७॥ इस मांगलिक शब्दो और मांगलिक बाजाके ध्यान हान लगा। उसके बाद बीचमें धरे हुए बस्त्रोंको हटा दिया गया और दानों बारके गुरुओने "ॐपुण्योऽस्तु" ऐसा कहा ॥ ३१८ ॥ इस प्रकार उन लोगोंने मिलकर विधिपूर्वक उनका विवाहकार्य तथा लाजाका हवन आदि सभी कृत्य मङ्गलपूर्वक संपादित कर दिया ॥ ३१९॥ तब मण्डपकी डंगराडम बडे-बडे बाजोका विनाद होने लगा, वेश्यायें नाचने लगी, भांट और बन्दीजन यशगान करने लगे ॥ ३२० ॥

३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

नटा मङ्गलगीतानि तुष्टुवुस्ते महारथैः। तदा दानान्यनेकानि चक्रतुस्तौ नृपोत्तमौ ॥३२१॥ अथ ते बालकाः सर्वे वधूः स्थाप्य करीन्द्रषु । राघवेण दिवानिद्राभिषेकेऽभून्मे भोजनमुत्सवात् ॥३२२॥ भद्रास्त्रांसिंचनं चक्रुः संपूज्य शर्व स स्मर । ते रामादिकाः सर्वे स्वस्वपत्न्या पृथक्सुखाः ॥३२३॥ चक्रुस्ते भोजनं हृष्टाः स्त्रीभिः सर्वत्र वांञ्छिता । गजा दत्त्वाभ्रश्वांश्च सुहृद्भिश्च नृपोत्तमैः ॥३२४॥ पौरैर्जानपदैस्तृष्टैर्मुनिभिः परिवेष्टितैः। जनकस्य गृहं गत्वा चकार भोजनं मुदा ॥३२५॥ कौसल्य द्य, स्त्रियः प्रीतिश्चक्रुर्भोजनमुत्तमम् सुमेधया प्रार्थितास्ता वदित्यथ मुहुर्मुहुः ॥३२६॥ एव मुत्सवेऽभून्मासत्रयं जनको मुदा। अथ ते बालकाः सर्वं स्वैर्वाक्यान्यामन्त्रयद्विधौ ॥३२७॥ स्वस्वपत्न्याः पादयोः स्वारोग्यभिनन्दन मुहुः। चक्रुःप्रष्ट्वेदमस्ते तस्मा नेमुः पृथक् पृथक् । कुङ्कुमालिम्पदाथ तैरुमकेषु ता ददुः । ३२८॥ श्रीरामः समवाप्य भूमिसन तन्मात्रा जगज्जानकी महाभागा वराङ्गेन्दुवदनः कारुण्यपूर्णेक्षणः ॥ विद्युद्वर्णरजोमनोहरतरश्चामीकराङ्गोत्तरो जामाताऽभवदावेड्यतनुपेमा मुक्ताविराजद्रलः ॥३२९॥ चतुर्थे दिवसे रात्री वस्त्रपात्रादिराजितेः । दीपैर्नैर्गजिनाः सर्वे विरेजू राघवादयः ॥३३०॥ रामादीनां परिवर्हान् ददौ स जनकस्तदा । नियुतान् वारणेंद्रांश्च शिविकाश्चापि तन्मिताः । ३३१। तुरगान् दशलक्षांश्च नियुतान् स्यन्दनान ददौ नानालंकारवासांसि गोदासीसेवकदिकान् ॥३३२। ददौ स राघवादिभ्यो येषां संख्या न विद्यते । एवं सम्मानितास्तेन ते बाला जनकेन हि ॥३३३। पूर्वेवद्रुमथ श्रेष्ठ स्वस्वपत्न्या समन्विताः । गजारूढ़ा सुसङ्गीतैर्नात्वायैः स्वमंडप ययुः । ३३४ ततो राजा मासमेकं निनाय नृपनायकतः । ततः सैन्येन स्वपुरीं गन्तुं पुराद्वहिर्ययौ ॥३३५॥ साताद्या निर्ययुर्मुग्धाः साश्रुनेत्राः सुविह्वलाः । सुमेधाभ्या समाश्लिप्य सांत्वयित्वा न्यसर्जयत् ॥३३६।

नट आदि ने अनेक मङ्गलगीतोंका गान किया और दोनों भूपने अनेक दान दिये । ३२१ ॥ तदनन्तर वे सब बालक अपनी अपनी बहुओं को हाथीपर चढ़ाकर चले । वे दिनमें जाके साथ भोजनालयमें गये । ३२२ ॥ हे पार्वती ! वहाँ आचमन करके सुहृद्गण तथा गौरीशंकर (शिव-पार्वतीकी) पूजा करनेके बाद सब अपने अपने परिजनोंके साथ आदरपूर्वक भोजन किया और सब स्त्रियाँ उन्हें देखकर संतुष्ट हो गयीं। राजा दशरथ भी अपने राजाओंके, बन्धुओंके, नगर तथा देशके लोगोंकी और मुनियोंकी साथ में तथा जनकके घरपर जाकर महोत्सव में भोजन किया ॥ ३२३-३२५॥ सुमेधासे बार-बार प्रार्थित तथा वन्दित कौशल्या आदि स्त्रियोंने भी जाकर प्रेमपूर्वक भोजन किया तथा राजा जनकको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ । फिर उन बालकोने प्रसन्न होके स्त्रियोंके कहनेसे माताओंके सम्मुख अपने अपनी स्त्रियोंके पैरोंपर अपना अपना सिर रखकर नमस्कार किया। पश्चात् उन स्त्रियोंने भी उनको अलग-अलग नमस्कार करके उनका गालोंपर कुङ्कुमसे तिलक किया ॥ ३२६॥ ३२७॥ ३२८॥ समस्त संसारके जनक सुन्दर चन्द्रके समान मुखवाले तथा करुणापूर्ण नेत्रोंवाले, विद्युत्के समान वर्णवाले, पीत वस्त्रोंको धारण किये हुए, विलक्षण वेशवाले, अनुपमेय कान्तिवाले, अनुपम शोभाको प्राप्त हुए जानकी आदि आदि स्त्रियॉं, और भूमिसतया शोभाको प्राप्त कर लिया ऐसा जान पड़ता था ॥ ३२९॥ चौथे दिन रात्रिमें वस्त्रोंसे सुसज्जित होकर दीपकोंसे शोभित तथा पूजित राम आदि चारों भाई बड़े ही शोभायमान होने लगे ॥ ३३० ॥ राजा जनकने राम आदिको जो दहेज़ दिया दस लाख हाथी, दस लाख पालकियाँ दस लाख घोड़े तथा दस लाख रथ अगणित अलंकार, पोशाक, गौएँ तथा दास-दासिएँ दीं। इस प्रकार राजा जनकके द्वारा सम्मानित वे बालक ॥ ३३१-३३३॥ अपनी अपनी स्त्रियोंको साथ लेके तथा हाथियोंपर सवार होकर नृत्यगान तथा बाजेके साथ अपने मण्डपको लौट आये । ३३४॥ पश्चात् राजा दशरथ राजा जनकके साथ एक महीना वहाँ व्यतीत करके अपने पुरको जानेके लिये सेनाके साथ उस पुरोस बाहर आये । ३३५ । सीता आदि अश्रुपूर्ण नेत्रोंमें बहुत विह्वल होकर चलीं। सुमेधाने उनको

[सर्गः ३] सारकाण्डम् ३१

अथ राजा दशरथो जनकं विन्यवर्तयत् । तदा दशरथं प्राह जनकः साश्रुलोचनः ॥३२७॥
समालिङ्ग्याथ ताः कन्या विरहाद्गद्गदाक्षरः । एतावत्कालपर्यन्तं सीताद्याः पालिता मया ॥३२८॥
अधुना त्वन्मयाप्यग्रे लाल्याश्च कृतेक्षणैः । इत्युक्त्वा नृपतिं नत्वा मिथिलां जनको ययौ ॥३२९॥
ततो दशरथोऽपि स्नुषासंनयनादिभिः । भूपैः सैन्येन स्वपुरीं ययौ मार्गे शनैः शनैः ॥३३०॥
अथ गच्छति श्रीरामे मैथिलाद्योजनत्रयम् । निमित्तान्यतिघोराणि ददर्श नृपसत्तमः ॥३३१॥
नत्वा वसिष्ठं पप्रच्छ किमिदं मुनिपुङ्गव । निमित्तानीह दृश्यन्ते विषमाणि समन्ततः ॥३३२॥
वानप्रस्थमथो प्राह भयमात्राणि सूच्यते । पुनरेषां प्रभावेऽद्य शीघ्रमेव भविष्यति ॥३३३॥
मृगाः प्रदक्षिणीयान्ति त्वां पश्य शुभसूचकाः । एवं वै वदतस्तस्य ववौ घोरतरोऽनिलः ॥३३४॥
मुष्णंश्चक्षूंषि सर्वेषां पांसुवृष्टिभिरर्हयन् । ततो ददर्श परमं जामदग्न्यं महाप्रभम् ॥३३५॥
नीलमेघनिभं प्रांशुं जटामण्डलखण्डितम् । धनुः शृङ्गरस्तं च साक्षात्कालमिव स्थितम् ॥३३६॥
कार्त्तवीर्यान्तकं रामं दृप्तक्षत्रियमर्द्दनम् । प्राप्तं दशरथस्याग्रे रक्तास्यं रक्तलोचनम् ॥३३७॥
तं दृष्ट्वा भयसंत्रस्तो राजा दशरथस्तदा । पर्णादिपूजां विस्मृत्य त्राहि त्राहीति चाब्रवीत् ॥३३८॥
दण्डवत्प्रणिपत्याह पुत्रप्राणान्प्रयच्छ मे । इति ब्रुवन्तं राजानमनादृत्य रघूत्तमम् ॥३३९॥
उवाच निष्ठुरं वाक्यं क्रोधात्प्रज्वलितेन्द्रियः । त्वं राम इति नाम्नाऽत्र चरसि क्षत्रियाधम ॥३४०॥
द्वन्द्वयुद्धं प्रयच्छाशु यदि त्वं क्षत्रियोऽसि मे । पुराणं जर्जरं चापं भङ्क्त्वा त्वं कत्थसे मुधा ॥३४१॥
इदं तु वैष्णवं चापमारोपयसि चेद्गुणम् । तर्हि युद्धं त्वया सार्द्धं न करोमि नृपात्मज ॥३४२॥
नो चेत्सर्वान्हनिष्यामि क्षत्रियान्तकरस्त्वहम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥३४३॥


छातीसे लगाया तथा आश्वासन देकर विदा किया ॥ ३२६ ॥ तब राजा दशरथने राजा जनकको लौटनेके लिये कहा । राजा जनक आँखोंमें आँसू भरकर कन्याओंको छातीसे लगाये हुए पुत्रियोंके वियोगसे गद्गदस्वर होकर राजा दशरथसे कहने लगे कि आज तक मैंने सीता आदिका लालन-पालन किया और अब आजसे आप अपनी कृपादृष्टिसे इनका पालन-पोषण करें। ऐसा कह और राजाको नमस्कार करके राजा जनक मिथिलाको लौट गये ॥ ३२७-३२९ ॥ राजा दशरथ भी पुत्रों, स्नुषाओं (बहू), राजाओं तथा सेनाके साथ लेकर धीरे-धीरे अपनी नगरीको चले ॥ ३३० ॥ जब श्रीरघुवीर मिथिला देशसे केवल चार कोस आगे बढ़े। तब राजा दशरथको अतिघोर अशकुन दिखाई दिये ॥ ३३१ । तब वे नमस्कार करके वसिष्ठजीसे कहने लगे—हे मुनिपुंगव ! यह क्या कारण है कि चारो तरफ ये अशकुन दिखाई दे रहे हैं ? ॥ ३३२ । वसिष्ठजीने कहा कि ये भयके मात्र सूचक हैं। परन्तु शीघ्र ही आपका भय निवृत्त हो जायगा ॥ ३३३ ॥ देखिये, शुभसूचक हिरण दाहिनी ओर जा रहे हैं। इतना कहना ही था कि घोरतर वायु बहने लगी ॥ ३३४ ॥ पवनसे सबकी आँख भर गई। दारुण बड़े तेजस्वी, नीले मेघके समान लंबे-तगड़े ऊंची जटाओंके मंडलवाले, कंधेपर धनुष बाण धारण किये, साक्षात् कालके समान लाल मुँह किये हुए कार्त्तवीर्यार्जुनके महाशत्रु तथा उद्धत मदोन्मत्त घमण्डी क्षत्रियोंका नाश करनेवाले परशुरामजी दशरथके आगे खड़े हो गये ॥ ३३५-३३७ । राजा दशरथ उनको देखकर भयसे विह्वल हो सत्कार पूजा भूलकर त्राहि-त्राहि करने लगे ॥ ३३८ ॥ उन्होंने दण्डवत् प्रणाम करके कहा कि आप मेरे पुत्र रामके प्राण बचायें । परन्तु परशुरामजीने क्रोधातुर होकर राजाका अनादर करके रघूत्तम रामसे इस प्रकार निष्ठुर वचन कहा—अरे क्षत्रियाधम राम ! तू मेरे नामके समान इस मण्डलमें प्रसिद्ध हुआ फिरता है ? ॥ ३३९ ॥ ३४० ॥ यदि तू सच्चा क्षत्रिय हो तो मेरे साथ युद्ध कर । पुराना सड़ा हुआ धनुष तोड़कर क्या अपनी बड़ाईकी झूठी डींग हाँक रहा है ? ॥ ३४१ ॥ ओ नृपपुंगवज ! यदि तू इस विष्णुके धनुषपर डोरी चढ़ा दे तो मैं तेरे साथ युद्ध न करूँगा ॥ ३४२ ॥ नहीं तो मैं तुम सबको मार डालूँगा । क्योंकि क्षत्रियोंका नाश करना ही मेरा काम है । परशुरामका यह वचन सुनकर रामने कहा—॥ ३४३ ॥

३२आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

वयमेकगुणाः स्वामिंस्त्वं चैव गुणाधिकः। गोविप्रदेवतादींषु शस्त्रा नामन्त्रयास्ततः ॥३५५॥ मयैतच्च जीवितानि तव पादार्पितानि हि। यथेच्छं यात्तथास्माकं विधेर्युद्धं करोमि न ॥३५६॥ इति ब्रुवति रामे वै चचाल वसुधा भृशम् । क्रुद्धं दृष्ट्वा जामदग्न्यं क्षत्रियौघसमुद्यतम् ॥३५७॥ अन्धकारो बभूवाथ क्षुभितः सप्त सागराः । रामो दाशरथिर्वीरो वीक्ष्य तं भार्गवं रुषा ॥३५८॥ धनुर्गच्छंस्तद्धस्ताद्रोप्य शुनमजयत्। तूणीगद्वाणमादाय संधायाकृष्य वीर्यवान् ॥३५८॥ उवाच भार्गवं रामः शृणु ब्रह्मन् वचो मम। लक्ष्यं दर्शय बाणस्य ह्यमोघो गमनायकः ॥३५९॥ लोकान् पादयुगं वापि वद शीघ्रं समाज्ञया। एतन्वदति श्रीरामे भार्गवो विगताननः ॥३६०॥ संस्मरन् पूर्ववृत्तान्तमिदं वचनमब्रवीत्। राम राम महाबाहो जाने त्वां परमेश्वरम् ॥३६१॥ पुराणपुरुषं विष्णुं जगन्मङ्गलमोद्धवम् । बाल्येऽहं तपसा विष्णुमाराधयितुमंजसा ॥३६२॥ गत्वा हि तीर्थे गोमन्दारूपस्य सोप्य शार्ङ्गिणः। अहर्निशं महात्मानं नारायणमकल्पयीः ॥३६३॥ यस्यांशेन मया भूम्यामवतारो गृहीतोऽस्ति हि भूभारहरणार्थाय कार्त्तवीर्यवधैप्सया ॥३६४॥ ततः प्रसन्नो देवेशः शंखचक्रगदाधरः उवाच मां नृगुश्रेष्ठं प्रसन्नमुखपंकजः ॥३६५॥

श्रीभगवानुवाच

उत्तिष्ठ तपसो ब्रह्मन् विदितं ते तपो महत् मद्विचद्रेन युक्तस्त्व जहि हैहयपुंगवम् ॥३६६॥ कार्त्तवीर्यं पितृऋणं एदर्थं तपसा श्रमः। ततस्त्रिःसप्तकृत्वस्त्वं हन्ता क्षत्रियमण्डलम् ॥३६७॥ कृत्स्नां भूमिं कश्यपाय दत्त्वाऽशान्तिमवाप्स्यह। त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा रामोऽहमव्ययः ॥३६८॥ वन्दत्स्ये परया भक्त्या तदा द्रक्ष्यसि मां पुनः। मनेजः पुनरादास्ये मयि दत्तं मया कृतम् ॥३६९॥ तदा तपश्चरँल्लोके तिष्ठ त्वं ब्रह्मणो दिनम्। इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे देवस्तथा सर्वं मया कृतम् ॥३७०॥ स एव विष्णुरूपस्त्वं राम जातोऽसि ब्रह्मणाऽर्थितः। मयि स्थितं तु त्वत्तेजस्त्वयैव पुनर्गृह्यताम् ॥३७१॥

हे स्वामिन् ! हम एक गुणवाले तथा आप अनेक गुणवाले हैं रघुवंशियों, ब्राह्मण, देवता तथा स्त्रीपर बास्त्र नहीं उठता ॥ ३५४॥ मैंने और इन सबने आपके चरणोंमें आत्म अर्पण कर दिया है। आप जैसा चाहें वैसा करें। यदि चाहें तो मार डालें परन्तु मैं ब्राह्मणके साथ युद्ध कदापि नहीं करूंगा ॥ ३५५॥ रामके ऐसा कहनेपर क्षत्रियोंके नाशका उद्योग जामदग्न्य (परशुराम) को देख डरकर पृथ्वी कांपने लगी। चारों ओर अन्धकार छा गया तथा सातों समुद्र क्षुभित हो उठे। तब दशरथपुत्र वीर रामने श्री परशुरामको प्रत्यक्ष देखकर उनके हाथसे धनुष लाग लिया और दोनों चढ़ा तथा भाथेमेंसे बाण निकाल और उसपर चढ़ा तथा बलपूर्वक खींचकर भार्गव परशुरामसे कहने लगे हे ब्रह्मन् ! मेरी बात सुनिए और मुझे लक्ष्य बताइए। मेरा बाण खाली नहीं जा सकता ॥ ३५६-३५६ ॥ शीघ्र ही मुझ वा सो लोकोंको बिद्ध करनेकी आज्ञा दीजिए अथवा अपने दी चरणोंको। रामके इस वचनको सुनकर विकृतमुख होते हुए परशुरामन पूर्व वृत्तान्तको स्मरण करते हुए कहा-हे राम हे राम ! हे महाबाहो! मैं आपको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलयके कारणस्वरूप पुराणपुरुष साक्षात् परमेश्वर विष्णु समझता हूँ। बचपनमें मैन गोमतीतीर्थमें जाकर शार्ङ्गधनुर्धारी विष्णुभगवान्‌को जिनके एक अंशसे मैन संसारका भूभार हरण करने तथा कार्तवीर्यको मारनेके लिए अवतार लिया है, उन्हें अपने रूपसे प्रसन्न किया। तब प्रसन्नमुख होकर शंखचक्रगदापद्मधारी उन देवाने मुझसे कहा ॥ ३६०-३६५ ॥ श्री भगवान् बोले- हे ब्रह्मन् ! तप करना छोड़कर तू उठ खड़ा हो। मैंने तेरे तपोबलको जान लिया है। मेरे चिदंशस युक्त होकर तू हैहयश्रेष्ठ तथा अपने पिताको मारनेवाले कार्तवीर्यको मार। जिसके लिए तूने तपका परिश्रम किया है। बादमें इक्कीस बार क्षत्रियसमुदायका नाश करके समस्त पृथिवी कश्यपको दान देकर शान्त हो। पश्चात् त्रेतायुगमें मैं अविनाशी दाशरथी राम होकर उत्पन्न होऊँगा। तब तू परम भक्तिसे मुझे देखेगा। उस समय मैं तुझे दिया हुआ अपना तेज लौटा लूँगा ॥ ३६६-३६६ ॥ तदनन्तर ब्रह्माने एक दिन तक तू तप करता हुआ संसारमें