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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

‘ये पाण्डुपुत्र धनंजय अद्वितीय वीर, महान् तेजस्वी, धर्मात्मा तथा मेरे पिता थे। इनका वध करके मैंने महान् पाप किया है। अब मेरा उद्धार कैसे हो सकता है?’ ।। ३९ ।। इत्येवमुक्त्वा नृपते धनंजयसुतो नृपः । उपस्पृश्याभवत् तूष्णीं प्रायोपेतो महामतिः ॥ ४० ॥ नरेश्वर! ऐसा कहकर धनंजयकुमार परम बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन पुनः आचमन करके आमरण उपवासका व्रत लेकर चुपचाप बैठ गया ।। ४० ।। वैशम्पायन उवाच प्रायोपविष्टे नृपतौ मणिपूरेश्वरे तदा । पितृशोकसमाविष्टे सह मात्रा परंतप ।। ४१ ।। उलूपी चिन्तयामास तदा संजीवनं मणिम् । स चोपातिष्ठत तदा पन्नगानां परायणम् ।। ४२ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! पिताके शोकसे संतप्त हुआ मणिपुरनरेश बभ्रुवाहन जब माताके साथ आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठ गया, तब उलूपीने संजीवनमणिका स्मरण किया। नागोंके जीवनकी आधारभूत वह मणि उसके स्मरण करते ही वहाँ आ गयी ।। ४१-४२ ।। तं गृहीत्वा तु कौरव्य नागराजपतेः सुता । मनःप्रह्लादनीं वाचं सैनिकानामथाब्रवीत् ।। ४३ ।। कुरुनन्दन! उस मणिको लेकर नागराजकुमारी उलूपी सैनिकोंके मनको आह्लाद प्रदान करनेवाली बात बोली— ।। ४३ ।। उत्तिष्ठ मा शुचः पुत्र नैव विष्णुस्त्वया जितः । अजेयः पुरुषैरेष तथा देवैः सवासवैः ।। ४४ ।। ‘बेटा बभ्रुवाहन! उठो, शोक न करो! ये अर्जुन तुम्हारे द्वारा परास्त नहीं हुए हैं। ये तो सभी मनुष्यों और इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अजेय हैं ।। ४४ ।। मया तु मोहनी नाम मायैषा सम्प्रदर्शिता । प्रियार्थं पुरुषेन्द्रस्य पितुस्तेऽद्य यशस्विनः ।। ४५ ।। ‘यह तो मैंने आज तुम्हारे यशस्वी पिता पुरुषप्रवर धनंजयका प्रिय करनेके लिये मोहनी माया दिखलायी है ।। ४५ ।। जिज्ञासुर्ह्येष पुत्रस्य बलस्य तव कौरवः । संग्रामे युद्धयतो राजन्नागतः परवीरहा ।। ४६ ।। तस्मादसि मया पुत्र युद्धाय परिचोदितः । मा पापमात्मनः पुत्र शङ्केथा ह्यण्वपि प्रभो ।। ४७ ।।

‘राजन्! तुम इनके पुत्र हो। ये शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुरुकुलतिलक अर्जुन संग्राममें जूझते हुए तुम-जैसे बेटेका बल-पराक्रम जानना चाहते थे। वत्स! इसीलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये प्रेरित किया है। सामर्थ्यशाली पुत्र! तुम अपनेमें अणुमात्र पापकी भी आशंका न करो ।। ४६-४७ ।। ऋषिरेष महानात्मा पुराणः शाश्वतोऽक्षरः । नैनं शक्तो हि संग्रामे जेतुं शक्रोऽपि पुत्रक ।। ४८ ।। ‘ये महात्मा नर पुरातन ऋषि, सनातन एवं अविनाशी हैं। बेटा! युद्धमें इन्हें इन्द्र भी नहीं जीत सकते ।। ४८ ।। अयं तु मे मणिर्दिव्यः समानीतो विशाम्पते । मृतान् मृतान् पन्नगेन्द्रान् यो जीवयति नित्यदा ।। ४९ ।। एनमस्योरसि त्वं च स्थापयस्व पितुः प्रभो । संजीवितं तदा पार्थं स त्वं द्रष्टासि पाण्डवम् ।। ५० ।। ‘प्रजानाथ! मैं यह दिव्यमणि ले आयी हूँ। यह सदा युद्धमें मरे हुए नागराजोंको जीवित किया करती है। प्रभो! तुम इसे लेकर अपने पिताकी छातीपर रख दो। फिर तुम पाण्डुपुत्र कुन्तीकुमार अर्जुनको जीवित हुआ देखोगे’ ।। ४९-५० ।। इत्युक्तः स्थापयामास तस्योरसि मणिं तदा । पार्थस्यामिततेजाः स पितुः स्नेहादपापकृत् ।। ५१ ।। उलूपीके ऐसा कहनेपर निष्पाप कर्म करनेवाले अमित तेजस्वी बभ्रुवाहनने अपने पिता पार्थकी छातीपर स्नेहपूर्वक वह मणि रख दी ।। ५१ ।। तस्मिन् न्यस्ते मणौ वीरो जिष्णुरुज्जीवितः प्रभुः । चिरसुप्त इवोत्तस्थौ मृष्टलोहितलोचनः ।। ५२ ।। उस मणिके रखते ही शक्तिशाली वीर अर्जुन देरतक सोकर जगे हुए मनुष्यकी भाँति अपनी लाल आँखें मलते हुए पुनः जीवित हो उठे ।। ५२ ।। तमुत्थितं महात्मानं लब्धसंज्ञं मनस्विनम् । समीक्ष्य पितरं स्वस्थं ववन्दे बभ्रुवाहनः ।। ५३ ।। अपने मनस्वी पिता महात्मा अर्जुनको सचेत एवं स्वस्थ होकर उठा हुआ देख बभ्रुवाहनने उनके चरणोंमें प्रणाम किया ।। ५३ ।। उत्थिते पुरुषव्याघ्रे पुनर्लक्ष्मीवति प्रभो । दिव्याः सुमनसः पुण्या ववृषे पाकशासनः ।। ५४ ।। प्रभो! पुरुषसिंह श्रीमान् अर्जुनके पुनः उठ जानेपर पाकशासन इन्द्रने उनके ऊपर दिव्य एवं पवित्र फूलोंकी वर्षा की ।। ५४ ।। अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्मेघनिःस्वनाः । साधु साध्विति चाकाशे बभूव सुमहान् स्वनः ।। ५५ ।।

मेघके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाली देव-दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही बज उठीं और आकाशमें साधुवादकी महान् ध्वनि गूँजने लगी ॥ ५५ ॥ उत्थाय च महाबाहुः पर्याश्वस्तो धनंजयः । बभ्रुवाहनमालिङ्ग्य समाजिघ्रत मूर्धनि ॥ ५६ ॥ महाबाहु अर्जुन भलीभाँति स्वस्थ होकर उठे और बभ्रुवाहनको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघने लगे ॥ ५६ ॥ ददर्श चापि दूरेऽस्य मातरं शोककर्शिताम् । उलूप्या सह तिष्ठन्तीं ततोऽपृच्छद् धनंजयः ॥ ५७ ॥ उससे थोड़ी ही दूरपर बभ्रुवाहनकी शोकाकुल माता चित्रांगदा उलूपीके साथ खड़ी थी। अर्जुनने जब उसे देखा, तब बभ्रुवाहनसे पूछा— ॥ ५७ ॥ किमिदं लक्ष्यते सर्वं शोकविस्मयहर्षवत् । रणाजिरममित्रघ्न यदि जानासि शंस मे ॥ ५८ ॥ 'शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर पुत्र! यह सारा समरांगण शोक, विस्मय और हर्षसे युक्त क्यों दिखायी देता है? यदि जानते हो तो मुझे बताओ ॥ ५८ ॥ जननी च किमर्थं ते रणभूमिमुपागता । नागेन्द्रदुहिता चेयमूलूपी किमिहागता ॥ ५९ ॥ 'तुम्हारी माता किसलिये रणभूमिमें आयी है? तथा इस नागराजकन्या उलूपीका आगमन भी यहाँ किसलिये हुआ है? ॥ ५९ ॥ जानाम्यहमिदं युद्धं त्वया मद्वचनात् कृतम् । स्त्रीणामागमने हेतुमहमिच्छामि वेदितुम् ॥ ६० ॥ 'मैं तो इतना ही जानता हूँ कि तुमने मेरे कहनेसे यह युद्ध किया है; परंतु यहाँ स्त्रियोंके आनेका क्या कारण है? यह मैं जानना चाहता हूँ' ॥ ६० ॥ तमुवाच तथा पृष्टो मणिपूरपतिस्तदा । प्रसाद्य शिरसा विद्वानुलूपी पृच्छ्यतामियम् ॥ ६१ ॥ पिताके इस प्रकार पूछनेपर विद्वान् मणिपुरनरेशने पिताके चरणोंमें सिर रखकर उन्हें प्रसन्न किया और कहा— 'पिताजी! यह वृत्तान्त आप माता उलूपीसे पूछिये' ॥ ६१ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे अर्जुनप्रत्युज्जीवने अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वानुसरणके प्रसंगमें अर्जुनका पुनर्जीवनविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥

एकाशीतितमोऽध्यायः उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुनः अश्वके पीछे जाना अर्जुन उवाच किमागमनकृत्यं ते कौरव्यकुलनन्दिनि । मणिपुरपतेर्मातुस्तथैव च रणाजिरे ॥ १ ॥ अर्जुन बोले—कौरव्य नामके कुलको आनन्दित करनेवाली उलूपी! इस रणभूमिमें तुम्हारे और मणिपुरनरेश बभ्रुवाहनकी माता चित्रांगदाके आनेका क्या कारण है? ॥ १ ॥ कच्चित् कुशलकामासि राज्ञोऽस्य भुजगात्मजे । मम वा चपलापाङ्गि कच्चित् त्वं शुभमिच्छसि ॥ २ ॥ नागकुमारी! तुम इस राजा बभ्रुवाहनका कुशल-मंगल तो चाहती हो न? चंचल कटाक्षवाली सुन्दरी! तुम मेरे कल्याणकी भी इच्छा रखती हो न? ॥ २ ॥ कच्चित् ते पृथुलश्रोणि नाप्रियं प्रियदर्शने । अकार्षमहमज्ञानादयं वा बभ्रुवाहनः ॥ ३ ॥ स्थूल नितम्बवाली प्रियदर्शने! मैंने या इस बभ्रुवाहनने अनजानमें तुम्हारा कोई अप्रिय तो नहीं किया है? ॥ ३ ॥ कच्चिन्नु राजपुत्री ते सपत्नी चैत्रवाहनी । चित्राङ्गदा वरारोहा नापराध्यति किंचन ॥ ४ ॥ तुम्हारी सौत चित्रवाहनकुमारी वरारोहा राजपुत्री चित्रांगदाने तो तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है? ॥ ४ ॥ तमुवाचोरगपतेर्दुहिता प्रहसन्निव । न मे त्वमपराद्धोऽसि न हि मे बभ्रुवाहनः ॥ ५ ॥ न जनित्री तथास्येयं मम या प्रेष्यवत् स्थिता । श्रूयतां यद् यथा चेदं मया सर्वं विचेष्टितम् ॥ ६ ॥ अर्जुनका यह प्रश्न सुनकर नागराजकन्या उलूपी हँसती हुई-सी बोली—‘प्राणवल्लभ! आपने या बभ्रुवाहनने मेरा कोई अपराध नहीं किया है। बभ्रुवाहनकी माताने भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा है। यह तो सदा दासीकी भाँति मेरी आज्ञाके अधीन रहती है। यहाँ आकर मैंने जो-जो जिस प्रकार काम किया है, वह बतलाती हूँ; सुनिये ॥ ५-६ ॥ न मे कोपस्त्वया कार्यः शिरसा त्वां प्रसादये ।

५. त्रिगुण-विवेक, प्रकृति-पुरुष सम्बन्ध व मोक्ष-धर्म उपसंहार

त्वत्प्रियार्थं हि कौरव्य कृतमेतन्मया विभो ॥ ७ ॥ 'प्रभो! कुरुनन्दन! पहले तो मैं आपके चरणोंमें सिर रखकर आपको प्रसन्न करना चाहती हूँ। यदि मुझसे कोई दोष बन गया हो तो भी उसके लिये आप मुझपर क्रोध न करें; क्योंकि मैंने जो कुछ किया है, वह आपकी प्रसन्नताके लिये ही किया है ।। ७ ।। यत्तच्छृणु महाबाहो निखिलेन धनंजय । महाभारतयुद्धे यत् त्वया शान्तनवो नृपः ॥ ८ ॥ अधर्मेण हतः पार्थ तस्यैषा निष्कृतिः कृता । 'महाबाहु धनंजय! आप मेरी कही हुई सारी बातें ध्यान देकर सुनिये। पार्थ! महाभारत- युद्धमें आपने जो शान्तनुकुमार महाराज भीष्मको अधर्मपूर्वक मारा है, उस पापका यह प्रायश्चित्त कर दिया गया ।। ८ १/२ ।। न हि भीष्मस्त्वया वीर युध्यमानो हि पातितः ॥ ९ ॥ शिखण्डिना तु संयुक्तस्तमाश्रित्य हतस्त्वया । 'वीर! आपने अपने साथ जूझते हुए भीष्मजीको नहीं मारा है, वे शिखण्डीके साथ उलझे हुए थे। उस दशामें शिखण्डीकी आड़ लेकर आपने उनका वध किया था ।। ९ १/२ ।। तस्य शान्तिमकृत्वा त्वं त्यजेथा यदि जीवितम् ॥ १० ॥ कर्मणा तेन पापेन पतेथा निरये ध्रुवम् । 'उसकी शान्ति किये बिना ही यदि आप प्राणोंका परित्याग करते तो उस पापकर्मके प्रभावसे निश्चय ही नरकमें पड़ते ।। १० १/२ ।। एषा तु विहिता शान्तिः पुत्राद् यां प्राप्तवानसि । वसुभिर्वसुधापाल गङ्गया च महामते ॥ ११ ॥ 'महामते! पृथ्वीपाल! पूर्वकालमें वसुओं तथा गंगाजीने इसी रूपमें उस पापकी शान्ति निश्चित की थी; जिसे आपने अपने पुत्रसे पराजयके रूपमें प्राप्त किया है ।। ११ ।। पुरा हि श्रुतमेतत् ते वसुभिः कथितं मया । गङ्गायास्तीरमाश्रित्य हते शान्तनवे नृप ॥ १२ ॥ 'पहलेकी बात है, एक दिन मैं गंगाजीके तटपर गयी थी। नरेश्वर! वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्मजीके मारे जानेके बाद वसुओंने गंगातटपर आकर आपके सम्बन्धमें जो यह बात कही थी, उसे मैंने अपने कानों सुना था ।। १२ ।। आप्लुत्य देवा वसवः समेत्य च महानदीम् । इदमूचुर्वचो घोरं भागीरथ्या मते तदा ॥ १३ ॥ 'वसु नामक देवता महानदी गंगाके तटपर एकत्र हो स्नान करके भागीरथीकी सम्मतिसे यह भयानक वचन बोले— ।। १३ ।। एष शान्तनवो भीष्मो निहतः सव्यसाचिना । अयुध्यमानः संग्रामे संसक्तोऽन्येन भाविनि ।

तदनेनानुषङ्गेण वयमद्य धनंजयम् ॥ १४ ॥ शापेन योजयामेति तथास्त्विति च साब्रवीत् । “भाविनि! ये शान्तनुनन्दन भीष्म संग्राममें दूसरेके साथ उलझे हुए थे। अर्जुनके साथ युद्ध नहीं कर रहे थे तो भी सव्यसाची अर्जुनने इनका वध किया है। इस अपराधके कारण हमलोग आज अर्जुनको शाप देना चाहते हैं।” यह सुनकर गंगाजीने कहा—‘हाँ, ऐसा ही होना चाहिये’ ।। तदहं पितुरावेद्य प्रविश्य व्यथितेन्द्रिया ॥ १५ ॥ अभवं स च तच्छ्रुत्वा विषादमगमत् परम् ।

अर्जुन अपने पुत्र बभ्रुवाहनको छातीसे लगा रहे हैं

'उनकी बातें सुनकर मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं और पातालमें प्रवेश करके मैंने अपने पितासे यह सारा समाचार कह सुनाया। यह सुनकर पिताजीको भी बड़ा खेद हुआ॥ १५ १/२ ॥ पिता तु मे वसून् गत्वा त्वदर्थे समयाचत ॥ १६ ॥ पुनः पुनः प्रसाद्यैतांस्त एनमिदमब्रुवन् । 'वे तत्काल वसुओंके पास जाकर उन्हें बारंबार प्रसन्न करके आपके लिये उनसे बारंबार क्षमा-याचना करने लगे। तब वसुगण उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १६ १/२ ॥ पुत्रस्तस्य महाभाग मणिपूरेश्वरो युवा ॥ १७ ॥ स एनं रणमध्यस्थः शरैः पातयिता भुवि । एवं कृते स नागेन्द्र मुक्तशापो भविष्यति ॥ १८ ॥ “महाभाग नागराज! मणिपुरका नवयुवक राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका पुत्र है। वह युद्ध- भूमिमें खड़ा होकर अपने बाणोंद्वारा जब उन्हें पृथ्वीपर गिरा देगा, तब अर्जुन हमारे शापसे मुक्त हो जायेंगे ॥ १७-१८ ॥ गच्छेति वसुभिश्चोक्तो मम चेदं शशंस सः । तच्छ्रुत्वा त्वं मया तस्माच्छापादसि विमोक्षितः ॥ १९ ॥ "अच्छा अब जाओ' वसुओंके ऐसा कहनेपर मेरे पिताने आकर मुझसे यह बात बतायी। इसे सुनकर मैंने इसीके अनुसार चेष्टा की है और आपको उस शापसे छुटकारा दिलाया है ॥ १९ ॥ न हि त्वां देवराजोऽपि समरेषु पराजयेत् । आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात् तेनेहासि पराजितः ॥ २० ॥ 'प्राणनाथ! देवराज इन्द्र भी आपको युद्धमें परास्त नहीं कर सकते, पुत्र तो अपना आत्मा ही है, इसीलिये इसके हाथसे यहाँ आपकी पराजय हुई है ॥ २० ॥ न हि दोषो मम मतः कथं वा मन्यसे विभो । इत्येवमुक्तो विजयः प्रसन्नात्माब्रवीदिदम् ॥ २१ ॥ 'प्रभो! मैं समझती हूँ कि इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। अथवा आपकी क्या धारणा है? क्या यह युद्ध कराकर मैंने कोई अपराध किया है?' उलूपीके ऐसा कहनेपर अर्जुनका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने कहा— ॥ २१ ॥ सर्वं मे सुप्रियं देवि यदेतत् कृतवत्यसि । इत्युक्त्वा सोऽब्रवीत् पुत्रं मणिपूरपतिं जयः ॥ २२ ॥ चित्राङ्गदायाः शृण्वत्याः कौरव्यदुहितुस्तदा । 'देवि! तुमने जो यह कार्य किया है, यह सब मुझे अत्यन्त प्रिय है।' यों कहकर अर्जुनने चित्रांगदा तथा उलूपीके सुनते हुए अपने पुत्र मणिपूरनरेश बभ्रुवाहनसे कहा— ॥ २२ १/२ ॥ युधिष्ठिरस्याश्वमेधः परिचैत्रीं भविष्यति ॥ २३ ॥

तत्रागच्छेः सहामात्यो मातृभ्यां सहितो नृप ॥ २४ ॥ 'नरेश्वर! आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको महाराज युधिष्ठिरके यज्ञका आरम्भ होगा। उसमें तुम अपनी इन दोनों माताओं और मन्त्रियोंके साथ अवश्य आना' ॥ इत्येवमुक्तः पार्थेन स राजा बभ्रुवाहनः । उवाच पितरं धीमानिदमस्राविलेक्षणः ॥ २५ ॥ अर्जुनके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहनने नेत्रोंमें आँसू भरकर पितासे इस प्रकार कहा— ॥ २५ ॥ उपयास्यामि धर्मज्ञ भवतः शासनादहम् । अश्वमेधे महायज्ञे द्विजातिपरिवेषकः ॥ २६ ॥ 'धर्मज्ञ! आपकी आज्ञासे मैं अश्वमेध महायज्ञमें अवश्य उपस्थित होऊँगा और ब्राह्मणोंको भोजन परोसनेका काम करूँगा ॥ २६ ॥ मम त्वनुग्रहार्थाय प्रविशस्व पुरं स्वकम् । भार्याभ्यां सह धर्मज्ञ मा भूत् तेऽत्र विचारणा ॥ २७ ॥ 'इस समय आपसे एक प्रार्थना है—धर्मज्ञ! आज मुझपर कृपा करनेके लिये अपनी इन दोनों धर्मपत्नियोंके साथ इस नगरमें प्रवेश कीजिये। इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ २७ ॥ उषित्वेह निशामेकां सुखं स्वभवने प्रभो । पुनरश्वानुगमनं कर्तासि जयतां वर ॥ २८ ॥ 'प्रभो! विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ! यहाँ भी आपका ही घर है। अपने उस घरमें एक रात सुखपूर्वक निवास करके कल सबेरे फिर घोड़ेके पीछे-पीछे जाइयेगा' ॥ २८ ॥ इत्युक्तः स तु पुत्रेण तदा वानरकेतनः । स्मयन् प्रोवाच कौन्तेयस्तदा चित्राङ्गदासुतम् ॥ २९ ॥ पुत्रके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन कपिध्वज अर्जुनने मुसकराते हुए चित्राङ्गदाकुमारसे कहा— ॥ २९ ॥ विदितं ते महाबाहो यथा दीक्षां चराम्यहम् । न स तावत् प्रवेक्ष्यामि पुरं ते पृथुलोचन ॥ ३० ॥ 'महाबाहो! यह तो तुम जानते ही हो कि मैं दीक्षा ग्रहण करके विशेष नियमोंके पालनपूर्वक विचर रहा हूँ। अतः विशाललोचन! जबतक यह दीक्षा पूर्ण नहीं हो जाती तबतक मैं तुम्हारे नगरमें प्रवेश नहीं करूँगा ॥ ३० ॥ यथाकामं व्रजत्येष यज्ञियाश्वो नरर्षभ । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि न स्थानं विद्यते मम ॥ ३१ ॥ 'नरश्रेष्ठ! यह यज्ञका घोड़ा अपनी इच्छाके अनुसार चलता है (इसे कहीं भी रोकनेका नियम नहीं है); अतः तुम्हारा कल्याण हो। मैं अब जाऊँगा। इस समय मेरे ठहरनेके लिये

कोई स्थान नहीं है' ।। ३१ ।। स तत्र विधिवत् तेन पूजितः पाकशासनिः । भार्याभ्यामभ्यनुज्ञातः प्रायाद् भरतसत्तमः ।। ३२ ।। तदनन्तर वहाँ बभ्रुवाहनने भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुष इन्द्रकुमार अर्जुनकी विधिवत् पूजा की और वे अपनी दोनों भार्याओंकी अनुमति लेकर वहाँसे चल दिये ।। ३२ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वका अनुसरणविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८१ ।।

द्व्यशीतितमोऽध्यायः मगधराज मेघसन्धिकी पराजय वैशम्पायन उवाच स तु वाजी समुद्रान्तां पर्यत्य वसुधामिमाम् । निवृत्तोऽभिमुखो राजन् येन वारणसाह्वयम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इसके बाद वह घोड़ा समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके उस दिशाकी ओर मुँह करके लौटा, जिस ओर हस्तिनापुर था ॥ १ ॥ अनुगच्छंश्च तुरगं निवृत्तोऽथ किरीटभृत् । यदृच्छया समापेदे पुरं राजगृहं तदा ॥ २ ॥ किरीटधारी अर्जुन भी घोड़ेका अनुसरण करते हुए लौट पड़े और दैवेच्छासे राजगृह नामक नगरमें आ पहुँचे ॥ २ ॥ तमभ्याशगतं दृष्ट्वा सहदेवात्मजः प्रभो । क्षत्रधर्मे स्थितो वीरः समरायाजुहाव ह ॥ ३ ॥ प्रभो! अर्जुनको अपने नगरके निकट आया देख क्षत्रिय-धर्ममें स्थित हुए वीर सहदेवकुमार राजा मेघसन्धिने उन्हें युद्धके लिये आमन्त्रित किया ॥ ३ ॥ ततः पुरात् स निष्क्रम्य रथी धन्वी शरी तली । मेघसन्धिः पदातिं तं धनंजयमुपाद्रवत् ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् स्वयं भी धनुष-बाण और दस्तानेसे सुसज्जित हो रथपर बैठकर नगरसे बाहर निकला। मेघसन्धिने पैदल आते हुए धनंजयपर धावा किया ॥ ४ ॥ आसाद्य च महातेजा मेघसन्धिर्धनंजयम् । बालभावान्महाराज प्रोवाचेदं न कौशलात् ॥ ५ ॥ महाराज! धनंजयके पास पहुँचकर महातेजस्वी मेघसन्धिने बुद्धिमानीके कारण नहीं, मूर्खतावश निम्नांकित बात कही— ॥ ५ ॥ किमयं चार्यते वाजी स्त्रीमध्य इव भारत । हयमेनं हरिष्यामि प्रयतस्व विमोक्षणे ॥ ६ ॥ 'भरतनन्दन! इस घोड़ेके पीछे क्यों फिर रहे हो! यह तो ऐसा जान पड़ता है, मानो स्त्रियोंके बीच चल रहा हो। मैं इसका अपहरण कर रहा हूँ। तुम इसे छुड़ानेका प्रयत्न करो ॥ ६ ॥ अदत्तानुनयो युद्धे यदि त्वं पितृभिर्मम । करिष्यामि तवातिथ्यं प्रहर प्रहरामि च ॥ ७ ॥

‘यदि युद्धमें मेरे पिता आदि पूर्वजोंने कभी तुम्हारा स्वागत-सत्कार नहीं किया है तो आज मैं इस कमीको पूर्ण करूँगा। युद्धके मैदानमें तुम्हारा यथोचित आतिथ्य-सत्कार करूँगा। पहले मुझपर प्रहार करो, फिर मैं तुमपर प्रहार करूँगा’ ॥ ७ ॥ इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं प्रहसन्निव पाण्डवः । विघ्नकर्ता मया वार्य इति मे व्रतमाहितम् ॥ ८ ॥ भ्रात्रा ज्येष्ठेन नृपते तवापि विदितं ध्रुवम् । प्रहरस्व यथाशक्ति न मन्युर्विद्यते मम ॥ ९ ॥ उसके ऐसा कहनेपर पाण्डुपुत्र अर्जुनने उसे हँसते हुए-से इस प्रकार उत्तर दिया —‘नरेश्वर! मेरे बड़े भाईने मेरे लिये इस व्रतकी दीक्षा दिलायी है कि जो मेरे मार्गमें विघ्न डालनेको उद्यत हो, उसे रोको। निश्चय ही यह बात तुम्हें भी विदित है। अतः तुम अपनी शक्तिके अनुसार मुझपर प्रहार करो। मेरे मनमें तुमपर कोई रोष नहीं है’ ॥ ८-९ ॥ इत्युक्तः प्राहरत् पूर्वं पाण्डवं मगधेश्वरः । किरन् शरसहस्राणि वर्षाणीव सहस्रदृक् ॥ १० ॥ अर्जुनके ऐसा कहनेपर मगधनरेशने पहले उनपर प्रहार किया। जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार मेघसन्धि अर्जुनपर सहस्रों बाणोंकी झड़ी लगाने लगा ॥ १० ॥ ततो गाण्डीवभृच्छूरो गाण्डीवप्रहितैः शरैः । चकार मोघांस्तान् बाणान् सयत्नान् भरतर्षभ ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! तब गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा मेघसन्धिके प्रयत्नपूर्वक चलाये गये उन सभी बाणोंको व्यर्थ कर दिया ॥ ११ ॥ स मोघं तस्य बाणौघं कृत्वा वानरकेतनः । शरान् मुमोच ज्वलितान् दीप्तास्यानिव पन्नगान् ॥ १२ ॥ शत्रुके बाणसमूहको निष्फल करके कपिध्वज अर्जुनने प्रज्वलित बाणका प्रहार किया। वे बाण मुखसे आग उगलनेवाले सर्पोंके समान जान पड़ते थे ॥ १२ ॥ ध्वजे पताकादण्डेषु रथे यन्त्रे हयेषु च । अन्येषु च रथाङ्गेषु न शरीरे न सारथौ ॥ १३ ॥ उन्होंने मेघसन्धिकी ध्वजा, पताका, दण्ड, रथ, यन्त्र, अश्व तथा अन्य रथांगोंपर बाण मारे; परंतु उसके शरीर और सारथिपर प्रहार नहीं किया ॥ १३ ॥ संरक्ष्यमाणः पार्थेन शरीरे सव्यसाचिना । मन्यमानः स्ववीर्यं तन्मागधः प्राहिणोच्छरान् ॥ १४ ॥ यद्यपि सव्यसाची अर्जुनने जान-बूझकर उसके शरीरकी रक्षा की तथापि वह मगधराज इसे अपना पराक्रम समझने लगा और अर्जुनपर लगातार बाणोंका प्रहार करता रहा ॥ १४ ॥

ततो गाण्डीवधन्वा तु मागधेन भृशाहतः । बभौ वसन्तसमये पलाशः पुष्पितो यथा ॥ १५ ॥ मगधराजके बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर गाण्डीवधारी अर्जुन रक्तसे नहा उठे। उस समय वे वसन्त-ऋतुमें फूले हुए पलाश-वृक्षकी भाँति सुशोभित हो रहे थे ॥ १५ ॥ अवध्यमानः सोऽभ्यघ्नन्मागधः पाण्डवर्षभम् । तेन तस्थौ स कौरव्य लोकवीरस्य दर्शने ॥ १६ ॥ कुरुनन्दन! अर्जुन तो उसे मार नहीं रहे थे, परंतु वह उन पाण्डवशिरोमणिपर बारंबार चोट कर रहा था। इसीलिये विश्वविख्यात वीर अर्जुनकी दृष्टिमें वह तबतक ठहर सका ॥ १६ ॥ सव्यसाची तु संक्रुद्धो विकृष्य बलवद् धनुः । हयांश्चकार निर्जीवान् सारथेश्च शिरोऽहरत् ॥ १७ ॥ अब सव्यसाची अर्जुनका क्रोध बढ़ गया। उन्होंने अपने धनुषको जोरसे खींचा और मेघसन्धिके घोड़ोंको प्राणहीन करके उसके सारथिका भी सिर उड़ा दिया ॥ १७ ॥ धनुश्चास्य महच्चित्रं क्षुरेण प्रचकर्त ह । हस्तावापं पताकां च ध्वजं चास्य न्यपातयत् ॥ १८ ॥ फिर उसके विशाल एवं विचित्र धनुषको क्षुरसे काट डाला और उसके दस्ताने, पताका तथा ध्वजाको भी धरतीपर काट गिराया ॥ १८ ॥ स राजा व्यथितो व्यश्वो विधनुर्हतसारथिः । गदामादाय कौन्तेयमभिदुद्राव वेगवान् ॥ १९ ॥ घोड़े, धनुष और सारथिके नष्ट हो जानेपर मेघसन्धिको बड़ा दुःख हुआ। वह गदा हाथमें लेकर कुन्तीनन्दन अर्जुनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा ॥ १९ ॥ तस्यापतत एवाशु गदां हेमपरिष्कृताम् । शरैश्चकर्त बहुधा बहुभिर्गृध्रवाजितैः ॥ २० ॥ उसके आते ही अर्जुनने गृध्रपंखयुक्त बहुसंख्यक बाणोंद्वारा उसकी सुवर्णभूषित गदाके शीघ्र ही अनेक टुकड़े कर डाले ॥ २० ॥ सा गदा शकलीभूता विशीर्णमणिबन्धना । व्याली विमुच्यमानेव पपात धरणीतले ॥ २१ ॥ उस गदाकी मूठ टूट गयी और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उस दशामें वह हाथसे छूटी हुई सर्पिणीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २१ ॥ विरथं विधनुष्कं च गदया परिवर्जितम् । सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमब्रवीत् कपिकेतनः ॥ २२ ॥ जब मेघसन्धि रथ, धनुष और गदासे भी वंचित हो गया, तब कपिध्वज अर्जुनने उसे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥

पर्याप्तः क्षत्रधर्मोऽयं दर्शितः पुत्र गम्यताम् । बह्वेतत् समरे कर्म तव बालस्य पार्थिव ॥ २३ ॥ ‘बेटा! तुमने क्षत्रियधर्मका पूरा-पूरा प्रदर्शन कर लिया। अब अपने घर जाओ। भूपाल! तुम अभी बालक हो। इस समरांगणमें तुमने जो पराक्रम किया है, यही तुम्हारे लिये बहुत है ॥ २३ ॥ युधिष्ठिरस्य संदेशो न हन्तव्या नृपा इति । तेन जीवसि राजंस्त्वमपराद्धोऽपि मे रणे ॥ २४ ॥ ‘राजन्! महाराज युधिष्ठिरका यह आदेश है कि ‘तुम युद्धमें राजाओंका वध न करना।' इसीलिये तुम मेरा अपराध करनेपर भी अबतक जीवित हो' ॥ २४ ॥ इति मत्वा तदात्मानं प्रत्यादिष्टं स्म मागधः । तथ्यमित्यभिगम्यैनं प्राञ्जलिः प्रत्यपूजयत् ॥ २५ ॥ अर्जुनकी यह बात सुनकर मेघसन्धिका यह विश्वास हो गया कि अब इन्होंने मेरी जान छोड़ दी है। तब वह अर्जुनके पास गया और हाथ जोड़ उनका समादर करते हुए कहने लगा— ॥ २५ ॥ पराजितोऽस्मि भद्रं ते नाहं योद्धुमिहोत्सहे । यद् यत् कृत्यं मया तेऽद्य तद् ब्रूहि कृतमेव तु ॥ २६ ॥ ‘वीरवर! आपका कल्याण हो। मैं आपसे परास्त हो गया। अब मैं युद्ध करनेका उत्साह नहीं रखता। अब आपको मुझसे जो-जो सेवा लेनी हो, वह बताइये और उसे पूर्ण की हुई ही समझिये' ॥ २६ ॥ तमर्जुनः समाश्वास्य पुनरेवेदमब्रवीत् । आगन्तव्यं परां चैत्रीमश्वमेधे नृपस्य नः ॥ २७ ॥ तब अर्जुनने उसे धैर्य देते हुए पुनः इस प्रकार कहा—‘राजन्! तुम आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको हमारे महाराजके अश्वमेधयज्ञमें अवश्य आना' ॥ २७ ॥ इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा पूजयामास तं हयम् । फाल्गुनं च युधि श्रेष्ठं विधिवत् सहदेवजः ॥ २८ ॥ उनके ऐसा कहनेपर सहदेवपुत्रने ‘बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और उस घोड़े तथा युद्धस्थलके श्रेष्ठ वीर अर्जुनका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ २८ ॥ ततो यथेष्टमगमत् पुनरेव स केसरी । ततः समुद्रतीरेण वङ्गान् पुण्ड्रान् सकोसलान् ॥ २९ ॥ तदनन्तर वह घोड़ा पुनः अपनी इच्छाके अनुसार आगे चला। वह समुद्रके किनारे- किनारे होता हुआ वङ्ग, पुण्ड्र और कोसल आदि देशोंमें गया ॥ २९ ॥ तत्र तत्र च भूरीणि म्लेच्छसैन्यान्यनेकंशः । विजिग्ये धनुषा राजन् गाण्डीवेन धनंजयः ॥ ३० ॥

राजन्! उन देशोंमें अर्जुनने केवल गाण्डीव धनुषकी सहायतासे म्लेच्छोंकी अनेक सेनाओंको परास्त किया ॥ ३० ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे मागधपराजयो द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें मगधराजकी पराजयविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥

त्र्यशीतितमोऽध्यायः दक्षिण और पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें होते हुए अश्वका द्वारका, पञ्चनद एवं गान्धार देशमें प्रवेश वैशम्पायन उवाच मागधेनार्चितो राजन् पाण्डवः श्वेतवाहनः । दक्षिणां दिशमास्थाय चारयामास तं हयम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मगधराजसे पूजित हो पाण्डुपुत्र श्वेतवाहन अर्जुनने दक्षिण दिशाका आश्रय ले उस घोड़ेको घुमाना आरम्भ किया ॥ १ ॥ ततः स पुनरावर्त्य हयः कामचरो बली । आससाद पुरीं रम्यां चेदीनां शुक्तिसाह्वयाम् ॥ २ ॥ वह इच्छानुसार विचरनेवाला अश्व पुनः उधरसे लौटकर चेदियोंकी रमणीय राजधानीमें जो शुक्तिपुरी (या माहिष्मतीपुरी)-के नामसे विख्यात थी, आया ॥ २ ॥ शरभेणार्चितस्तत्र शिशुपालसुतेन सः । युद्धपूर्वं तदा तेन पूजया च महाबलः ॥ ३ ॥ वहाँ शिशुपालके पुत्र शरभने पहले तो युद्ध किया और फिर स्वागत-सत्कारके द्वारा उस महाबली अश्वका पूजन किया ॥ ३ ॥ ततोऽर्चितो ययौ राजंस्तदा स तुरगोत्तमः । काशीनगान् कोसलांश्च किरातानथ तङ्गणान् ॥ ४ ॥ राजन्! शरभसे पूजित हो वह उत्तम अश्व काशी, कोसल, किरात और तङ्गण आदि जनपदोंमें गया ॥ ४ ॥ पूजां तत्र यथान्यायं प्रतिगृह्य धनंजयः । पुनरावृत्य कौन्तेयो दशार्णानगमत् तदा ॥ ५ ॥ उन सभी राज्योंमें यथोचित पूजा ग्रहण करके कुन्तीनन्दन अर्जुन पुनः लौटकर दशार्ण देशमें आये ॥ ५ ॥ तत्र चित्राङ्गदी नाम बलवानरिमर्दनः । तेन युद्धमभूत् तस्य विजयस्यातिभैरवम् ॥ ६ ॥ वहाँ उस समय महाबली शत्रुमर्दन चित्रांगद नामक नरेश राज्य करते थे। उनके साथ अर्जुनका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ ६ ॥ तं चापि वशमानीय किरीटी पुरुषर्षभः । निषादराज्ञो विषयमेकलव्यस्य जग्मिवान् ॥ ७ ॥

पुरुषप्रवर किरीटधारी अर्जुन दशार्णराज चित्रांगदको भी वशमें करके निषादराज एकलव्यके राज्यमें गये ॥ ७ ॥ एकलव्यसुतश्चैनं युद्धेन जगृहे तदा । तत्र चक्रे निषादैः स संग्रामं लोमहर्षणम् ॥ ८ ॥ वहाँ एकलव्यके पुत्रने युद्धके द्वारा उनका स्वागत किया। अर्जुनने निषादोंके साथ रोमांचकारी संग्राम किया ॥ ८ ॥ ततस्तमपि कौन्तेयः समरेष्वपराजितः । जिगाय युधि दुर्धर्षो यज्ञविघ्नार्थमागतम् ॥ ९ ॥ युद्धमें किसीसे परास्त न होनेवाले दुर्धर्ष वीर पार्थने यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये आये हुए एकलव्य-कुमारको भी परास्त कर दिया ॥ ९ ॥ स तं जित्वा महाराज नैषादिं पाकशासनिः । अर्चितः प्रययौ भूयो दक्षिणं सलिलार्णवम् ॥ १० ॥ महाराज! एकलव्यके पुत्रको पराजित करके उसके द्वारा पूजित हुए इन्द्रकुमार अर्जुन फिर दक्षिण समुद्रके तटपर गये ॥ १० ॥ तत्रापि द्रविडैरान्ध्रै रौद्रैर्माहिषकैरपि । तथा कोल्लगिरेयैश्च युद्धमासीत् किरीटिनः ॥ ११ ॥ वहाँ भी द्रविड़, आन्ध्र, रौद्र, माहिषक और कोलाचलके प्रान्तोंमें रहनेवाले वीरोंके साथ किरीटधारी अर्जुनका खूब युद्ध हुआ ॥ ११ ॥ तांश्चापि विजयो जित्वा नातितीव्रेण कर्मणा । तुरङ्गमवशेनार्थ सुराष्ट्रानभितो ययौ ॥ १२ ॥ गोकर्णमथ चासाद्य प्रभासमपि जग्मिवान् । उन सबको मृदुल पराक्रमसे ही जीतकर वे घोड़ेकी इच्छानुसार उसके पीछे चलनेमें विवश हुए सौराष्ट्र, गोकर्ण और प्रभासक्षेत्रोंमें गये ॥ १२ १/२ ॥ ततो द्वारवतीं रम्यां वृष्णिवीराभिपालिताम् ॥ १३ ॥ आससाद हयः श्रीमान् कुरुराजस्य यज्ञियः । तत्पश्चात् कुरुराज युधिष्ठिरका वह यज्ञसम्बन्धी कान्तिमान् अश्व वृष्णिवीरोंद्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें जा पहुँचा ॥ १३ १/२ ॥ तमुन्मथ्य हयश्रेष्ठं यादवानां कुमारकाः ॥ १४ ॥ प्रयुयुत्सुंस्तदा राजन्नुग्रसेनो न्यवारयत् । राजन्! वहाँ यदुवंशी वीरोंके बालकोंने उस उत्तम अश्वको बलपूर्वक पकड़कर युद्धके लिये उद्योग किया; परंतु महाराज उग्रसेनने उन्हें रोक दिया ॥ १४ १/२ ॥ ततः पुराद् विनिष्क्रम्य वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा ॥ १५ ॥ सहितो वसुदेवेन मातुलेन किरीटिनः ।

तौ समेत्य कुरुश्रेष्ठं विधिवत् प्रीतिपूर्वकम् ।। १६ ।। परया भारतश्रेष्ठं पूजया समवस्थितौ । ततस्ताभ्यामनुज्ञातो ययौ येन हयो गतः ।। १७ ।। तदनन्तर अर्जुनके मामा वसुदेवको साथ ले वृष्णि और अन्धककुलके राजा उग्रसेन नगरसे बाहर निकले। वे दोनों बड़ी प्रसन्नताके साथ कुरुश्रेष्ठ अर्जुनसे विधिपूर्वक मिले। उन्होंने भरतकुलके उस श्रेष्ठ वीरका बड़ा आदर-सत्कार किया। फिर उन दोनोंकी आज्ञा ले अर्जुन उसी ओर चल दिये, जिधर वह अश्व गया था ।। ततः स पश्चिमं देशं समुद्रस्य तदा हयः । क्रमेण व्यचरत् स्फीतं ततः पञ्चनदं ययौ ।। १८ ।। वहाँसे पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें विचरता हुआ वह घोड़ा क्रमशः आगे बढ़ने लगा और समृद्धिशाली पञ्चनद प्रदेशमें जा पहुँचा ।। १८ ।। तस्मादपि स कौरव्य गन्धारविषयं हयः । विचचार यथाकामं कौन्तेयानुगतस्तदा ।। १९ ।। कुरुनन्दन! वहाँसे भी वह घोड़ा गान्धारदेशमें जाकर इच्छानुसार विचरने लगा। कुन्तीनन्दन अर्जुन भी उसके पीछे-पीछे वहीं जा पहुँचे ।। १९ ।। ततो गान्धारराजेन युद्धमासीत् किरीटिनः ।

घोरं शकुनिपुत्रेण पूर्ववैरानुसारिणा ॥ २० ॥ फिर तो पूर्व वैरका अनुसरण करनेवाले गान्धारराज शकुनिपुत्रके साथ किरीटधारी अर्जुनका घोर युद्ध हुआ ॥ २० ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥ इस प्रकार महाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें यज्ञसम्बन्धी अश्वका अनुसरणविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥

चतुरशीतितमोऽध्यायः

शकुनिपुत्रकी पराजय

वैशम्पायन उवाच शकुनेस्तनयो वीरो गान्धाराणां महारथः । प्रत्युद्ययौ गुडाकेशं सैन्येन महता वृतः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शकुनिका पुत्र गान्धारोंमें सबसे बड़ा वीर और महारथी था। वह विशाल सेनासे घिरकर निद्राविजयी अर्जुनका सामना करनेके लिये चला ॥ १ ॥ हस्त्यश्वरथयुक्तेन पताकाध्वजमालिना । अमृष्यमाणास्ते योधा नृपस्य शकुनेर्वधम् ॥ २ ॥ अभ्ययुः सहिताः पार्थं प्रगृहीतशरासनाः । उसकी सेनामें हाथी, घोड़े और रथ सभी सम्मिलित थे। वह सेना ध्वजा-पताकाओंकी मालासे मण्डित थी। गान्धारदेशके योद्धा राजा शकुनिके वधका समाचार सुनकर अमर्षमें भरे हुए थे; अतः हाथमें धनुष-बाण ले उन्होंने एक साथ होकर अर्जुनपर धावा बोल दिया ॥ २ १/२ ॥ स तानुवाच धर्मात्मा बीभत्सुरपराजितः ॥ ३ ॥ युधिष्ठिरस्य वचनं न च ते जगृहुर्हितम् । किसीसे परास्त न होनेवाले धर्मात्मा अर्जुनने उन्हें राजा युधिष्ठिरकी बात सुनायी; परंतु उस हितकर वचनको भी वे ग्रहण न कर सके ॥ ३ १/२ ॥ वार्यमाणाऽपि पार्थेन सान्त्वपूर्वममर्षिताः ॥ ४ ॥ परिवार्य हयं जग्मुस्ततश्चुक्रोध पाण्डवः । यद्यपि पार्थने सान्त्वनापूर्वक समझा-बुझाकर उन सबको युद्धसे रोका, तथापि वे अमर्षशील योद्धा उस घोड़ेको चारों ओरसे घेरकर उसे पकड़नेके लिये आगे बढ़े। यह देख पाण्डुपुत्र अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ ॥ ४ १/२ ॥ ततः शिरांसि दीप्ताग्रैस्तेषां चिच्छेद पाण्डवः ॥ ५ ॥ क्षुरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैर्नातियत्नादिचार्जुनः । वे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए तेज धारवाले धुरोंसे बिना परिश्रमके ही उनके मस्तक काटने लगे ॥ ५ १/२ ॥ ते वध्यमानाः पार्थेन हयमुत्सृज्य सम्भ्रमात् ॥ ६ ॥ न्यवर्तन्त महाराज शरवर्षार्जिता भृशम् ।