अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
कोई स्थान नहीं है' ।। ३१ ।। स तत्र विधिवत् तेन पूजितः पाकशासनिः । भार्याभ्यामभ्यनुज्ञातः प्रायाद् भरतसत्तमः ।। ३२ ।। तदनन्तर वहाँ बभ्रुवाहनने भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुष इन्द्रकुमार अर्जुनकी विधिवत् पूजा की और वे अपनी दोनों भार्याओंकी अनुमति लेकर वहाँसे चल दिये ।। ३२ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वका अनुसरणविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८१ ।।
द्व्यशीतितमोऽध्यायः मगधराज मेघसन्धिकी पराजय वैशम्पायन उवाच स तु वाजी समुद्रान्तां पर्यत्य वसुधामिमाम् । निवृत्तोऽभिमुखो राजन् येन वारणसाह्वयम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इसके बाद वह घोड़ा समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके उस दिशाकी ओर मुँह करके लौटा, जिस ओर हस्तिनापुर था ॥ १ ॥ अनुगच्छंश्च तुरगं निवृत्तोऽथ किरीटभृत् । यदृच्छया समापेदे पुरं राजगृहं तदा ॥ २ ॥ किरीटधारी अर्जुन भी घोड़ेका अनुसरण करते हुए लौट पड़े और दैवेच्छासे राजगृह नामक नगरमें आ पहुँचे ॥ २ ॥ तमभ्याशगतं दृष्ट्वा सहदेवात्मजः प्रभो । क्षत्रधर्मे स्थितो वीरः समरायाजुहाव ह ॥ ३ ॥ प्रभो! अर्जुनको अपने नगरके निकट आया देख क्षत्रिय-धर्ममें स्थित हुए वीर सहदेवकुमार राजा मेघसन्धिने उन्हें युद्धके लिये आमन्त्रित किया ॥ ३ ॥ ततः पुरात् स निष्क्रम्य रथी धन्वी शरी तली । मेघसन्धिः पदातिं तं धनंजयमुपाद्रवत् ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् स्वयं भी धनुष-बाण और दस्तानेसे सुसज्जित हो रथपर बैठकर नगरसे बाहर निकला। मेघसन्धिने पैदल आते हुए धनंजयपर धावा किया ॥ ४ ॥ आसाद्य च महातेजा मेघसन्धिर्धनंजयम् । बालभावान्महाराज प्रोवाचेदं न कौशलात् ॥ ५ ॥ महाराज! धनंजयके पास पहुँचकर महातेजस्वी मेघसन्धिने बुद्धिमानीके कारण नहीं, मूर्खतावश निम्नांकित बात कही— ॥ ५ ॥ किमयं चार्यते वाजी स्त्रीमध्य इव भारत । हयमेनं हरिष्यामि प्रयतस्व विमोक्षणे ॥ ६ ॥ 'भरतनन्दन! इस घोड़ेके पीछे क्यों फिर रहे हो! यह तो ऐसा जान पड़ता है, मानो स्त्रियोंके बीच चल रहा हो। मैं इसका अपहरण कर रहा हूँ। तुम इसे छुड़ानेका प्रयत्न करो ॥ ६ ॥ अदत्तानुनयो युद्धे यदि त्वं पितृभिर्मम । करिष्यामि तवातिथ्यं प्रहर प्रहरामि च ॥ ७ ॥
‘यदि युद्धमें मेरे पिता आदि पूर्वजोंने कभी तुम्हारा स्वागत-सत्कार नहीं किया है तो आज मैं इस कमीको पूर्ण करूँगा। युद्धके मैदानमें तुम्हारा यथोचित आतिथ्य-सत्कार करूँगा। पहले मुझपर प्रहार करो, फिर मैं तुमपर प्रहार करूँगा’ ॥ ७ ॥ इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं प्रहसन्निव पाण्डवः । विघ्नकर्ता मया वार्य इति मे व्रतमाहितम् ॥ ८ ॥ भ्रात्रा ज्येष्ठेन नृपते तवापि विदितं ध्रुवम् । प्रहरस्व यथाशक्ति न मन्युर्विद्यते मम ॥ ९ ॥ उसके ऐसा कहनेपर पाण्डुपुत्र अर्जुनने उसे हँसते हुए-से इस प्रकार उत्तर दिया —‘नरेश्वर! मेरे बड़े भाईने मेरे लिये इस व्रतकी दीक्षा दिलायी है कि जो मेरे मार्गमें विघ्न डालनेको उद्यत हो, उसे रोको। निश्चय ही यह बात तुम्हें भी विदित है। अतः तुम अपनी शक्तिके अनुसार मुझपर प्रहार करो। मेरे मनमें तुमपर कोई रोष नहीं है’ ॥ ८-९ ॥ इत्युक्तः प्राहरत् पूर्वं पाण्डवं मगधेश्वरः । किरन् शरसहस्राणि वर्षाणीव सहस्रदृक् ॥ १० ॥ अर्जुनके ऐसा कहनेपर मगधनरेशने पहले उनपर प्रहार किया। जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार मेघसन्धि अर्जुनपर सहस्रों बाणोंकी झड़ी लगाने लगा ॥ १० ॥ ततो गाण्डीवभृच्छूरो गाण्डीवप्रहितैः शरैः । चकार मोघांस्तान् बाणान् सयत्नान् भरतर्षभ ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! तब गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा मेघसन्धिके प्रयत्नपूर्वक चलाये गये उन सभी बाणोंको व्यर्थ कर दिया ॥ ११ ॥ स मोघं तस्य बाणौघं कृत्वा वानरकेतनः । शरान् मुमोच ज्वलितान् दीप्तास्यानिव पन्नगान् ॥ १२ ॥ शत्रुके बाणसमूहको निष्फल करके कपिध्वज अर्जुनने प्रज्वलित बाणका प्रहार किया। वे बाण मुखसे आग उगलनेवाले सर्पोंके समान जान पड़ते थे ॥ १२ ॥ ध्वजे पताकादण्डेषु रथे यन्त्रे हयेषु च । अन्येषु च रथाङ्गेषु न शरीरे न सारथौ ॥ १३ ॥ उन्होंने मेघसन्धिकी ध्वजा, पताका, दण्ड, रथ, यन्त्र, अश्व तथा अन्य रथांगोंपर बाण मारे; परंतु उसके शरीर और सारथिपर प्रहार नहीं किया ॥ १३ ॥ संरक्ष्यमाणः पार्थेन शरीरे सव्यसाचिना । मन्यमानः स्ववीर्यं तन्मागधः प्राहिणोच्छरान् ॥ १४ ॥ यद्यपि सव्यसाची अर्जुनने जान-बूझकर उसके शरीरकी रक्षा की तथापि वह मगधराज इसे अपना पराक्रम समझने लगा और अर्जुनपर लगातार बाणोंका प्रहार करता रहा ॥ १४ ॥
ततो गाण्डीवधन्वा तु मागधेन भृशाहतः । बभौ वसन्तसमये पलाशः पुष्पितो यथा ॥ १५ ॥ मगधराजके बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर गाण्डीवधारी अर्जुन रक्तसे नहा उठे। उस समय वे वसन्त-ऋतुमें फूले हुए पलाश-वृक्षकी भाँति सुशोभित हो रहे थे ॥ १५ ॥ अवध्यमानः सोऽभ्यघ्नन्मागधः पाण्डवर्षभम् । तेन तस्थौ स कौरव्य लोकवीरस्य दर्शने ॥ १६ ॥ कुरुनन्दन! अर्जुन तो उसे मार नहीं रहे थे, परंतु वह उन पाण्डवशिरोमणिपर बारंबार चोट कर रहा था। इसीलिये विश्वविख्यात वीर अर्जुनकी दृष्टिमें वह तबतक ठहर सका ॥ १६ ॥ सव्यसाची तु संक्रुद्धो विकृष्य बलवद् धनुः । हयांश्चकार निर्जीवान् सारथेश्च शिरोऽहरत् ॥ १७ ॥ अब सव्यसाची अर्जुनका क्रोध बढ़ गया। उन्होंने अपने धनुषको जोरसे खींचा और मेघसन्धिके घोड़ोंको प्राणहीन करके उसके सारथिका भी सिर उड़ा दिया ॥ १७ ॥ धनुश्चास्य महच्चित्रं क्षुरेण प्रचकर्त ह । हस्तावापं पताकां च ध्वजं चास्य न्यपातयत् ॥ १८ ॥ फिर उसके विशाल एवं विचित्र धनुषको क्षुरसे काट डाला और उसके दस्ताने, पताका तथा ध्वजाको भी धरतीपर काट गिराया ॥ १८ ॥ स राजा व्यथितो व्यश्वो विधनुर्हतसारथिः । गदामादाय कौन्तेयमभिदुद्राव वेगवान् ॥ १९ ॥ घोड़े, धनुष और सारथिके नष्ट हो जानेपर मेघसन्धिको बड़ा दुःख हुआ। वह गदा हाथमें लेकर कुन्तीनन्दन अर्जुनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा ॥ १९ ॥ तस्यापतत एवाशु गदां हेमपरिष्कृताम् । शरैश्चकर्त बहुधा बहुभिर्गृध्रवाजितैः ॥ २० ॥ उसके आते ही अर्जुनने गृध्रपंखयुक्त बहुसंख्यक बाणोंद्वारा उसकी सुवर्णभूषित गदाके शीघ्र ही अनेक टुकड़े कर डाले ॥ २० ॥ सा गदा शकलीभूता विशीर्णमणिबन्धना । व्याली विमुच्यमानेव पपात धरणीतले ॥ २१ ॥ उस गदाकी मूठ टूट गयी और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उस दशामें वह हाथसे छूटी हुई सर्पिणीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २१ ॥ विरथं विधनुष्कं च गदया परिवर्जितम् । सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमब्रवीत् कपिकेतनः ॥ २२ ॥ जब मेघसन्धि रथ, धनुष और गदासे भी वंचित हो गया, तब कपिध्वज अर्जुनने उसे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥
पर्याप्तः क्षत्रधर्मोऽयं दर्शितः पुत्र गम्यताम् । बह्वेतत् समरे कर्म तव बालस्य पार्थिव ॥ २३ ॥ ‘बेटा! तुमने क्षत्रियधर्मका पूरा-पूरा प्रदर्शन कर लिया। अब अपने घर जाओ। भूपाल! तुम अभी बालक हो। इस समरांगणमें तुमने जो पराक्रम किया है, यही तुम्हारे लिये बहुत है ॥ २३ ॥ युधिष्ठिरस्य संदेशो न हन्तव्या नृपा इति । तेन जीवसि राजंस्त्वमपराद्धोऽपि मे रणे ॥ २४ ॥ ‘राजन्! महाराज युधिष्ठिरका यह आदेश है कि ‘तुम युद्धमें राजाओंका वध न करना।' इसीलिये तुम मेरा अपराध करनेपर भी अबतक जीवित हो' ॥ २४ ॥ इति मत्वा तदात्मानं प्रत्यादिष्टं स्म मागधः । तथ्यमित्यभिगम्यैनं प्राञ्जलिः प्रत्यपूजयत् ॥ २५ ॥ अर्जुनकी यह बात सुनकर मेघसन्धिका यह विश्वास हो गया कि अब इन्होंने मेरी जान छोड़ दी है। तब वह अर्जुनके पास गया और हाथ जोड़ उनका समादर करते हुए कहने लगा— ॥ २५ ॥ पराजितोऽस्मि भद्रं ते नाहं योद्धुमिहोत्सहे । यद् यत् कृत्यं मया तेऽद्य तद् ब्रूहि कृतमेव तु ॥ २६ ॥ ‘वीरवर! आपका कल्याण हो। मैं आपसे परास्त हो गया। अब मैं युद्ध करनेका उत्साह नहीं रखता। अब आपको मुझसे जो-जो सेवा लेनी हो, वह बताइये और उसे पूर्ण की हुई ही समझिये' ॥ २६ ॥ तमर्जुनः समाश्वास्य पुनरेवेदमब्रवीत् । आगन्तव्यं परां चैत्रीमश्वमेधे नृपस्य नः ॥ २७ ॥ तब अर्जुनने उसे धैर्य देते हुए पुनः इस प्रकार कहा—‘राजन्! तुम आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको हमारे महाराजके अश्वमेधयज्ञमें अवश्य आना' ॥ २७ ॥ इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा पूजयामास तं हयम् । फाल्गुनं च युधि श्रेष्ठं विधिवत् सहदेवजः ॥ २८ ॥ उनके ऐसा कहनेपर सहदेवपुत्रने ‘बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और उस घोड़े तथा युद्धस्थलके श्रेष्ठ वीर अर्जुनका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ २८ ॥ ततो यथेष्टमगमत् पुनरेव स केसरी । ततः समुद्रतीरेण वङ्गान् पुण्ड्रान् सकोसलान् ॥ २९ ॥ तदनन्तर वह घोड़ा पुनः अपनी इच्छाके अनुसार आगे चला। वह समुद्रके किनारे- किनारे होता हुआ वङ्ग, पुण्ड्र और कोसल आदि देशोंमें गया ॥ २९ ॥ तत्र तत्र च भूरीणि म्लेच्छसैन्यान्यनेकंशः । विजिग्ये धनुषा राजन् गाण्डीवेन धनंजयः ॥ ३० ॥
राजन्! उन देशोंमें अर्जुनने केवल गाण्डीव धनुषकी सहायतासे म्लेच्छोंकी अनेक सेनाओंको परास्त किया ॥ ३० ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे मागधपराजयो द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें मगधराजकी पराजयविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
त्र्यशीतितमोऽध्यायः दक्षिण और पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें होते हुए अश्वका द्वारका, पञ्चनद एवं गान्धार देशमें प्रवेश वैशम्पायन उवाच मागधेनार्चितो राजन् पाण्डवः श्वेतवाहनः । दक्षिणां दिशमास्थाय चारयामास तं हयम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मगधराजसे पूजित हो पाण्डुपुत्र श्वेतवाहन अर्जुनने दक्षिण दिशाका आश्रय ले उस घोड़ेको घुमाना आरम्भ किया ॥ १ ॥ ततः स पुनरावर्त्य हयः कामचरो बली । आससाद पुरीं रम्यां चेदीनां शुक्तिसाह्वयाम् ॥ २ ॥ वह इच्छानुसार विचरनेवाला अश्व पुनः उधरसे लौटकर चेदियोंकी रमणीय राजधानीमें जो शुक्तिपुरी (या माहिष्मतीपुरी)-के नामसे विख्यात थी, आया ॥ २ ॥ शरभेणार्चितस्तत्र शिशुपालसुतेन सः । युद्धपूर्वं तदा तेन पूजया च महाबलः ॥ ३ ॥ वहाँ शिशुपालके पुत्र शरभने पहले तो युद्ध किया और फिर स्वागत-सत्कारके द्वारा उस महाबली अश्वका पूजन किया ॥ ३ ॥ ततोऽर्चितो ययौ राजंस्तदा स तुरगोत्तमः । काशीनगान् कोसलांश्च किरातानथ तङ्गणान् ॥ ४ ॥ राजन्! शरभसे पूजित हो वह उत्तम अश्व काशी, कोसल, किरात और तङ्गण आदि जनपदोंमें गया ॥ ४ ॥ पूजां तत्र यथान्यायं प्रतिगृह्य धनंजयः । पुनरावृत्य कौन्तेयो दशार्णानगमत् तदा ॥ ५ ॥ उन सभी राज्योंमें यथोचित पूजा ग्रहण करके कुन्तीनन्दन अर्जुन पुनः लौटकर दशार्ण देशमें आये ॥ ५ ॥ तत्र चित्राङ्गदी नाम बलवानरिमर्दनः । तेन युद्धमभूत् तस्य विजयस्यातिभैरवम् ॥ ६ ॥ वहाँ उस समय महाबली शत्रुमर्दन चित्रांगद नामक नरेश राज्य करते थे। उनके साथ अर्जुनका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ ६ ॥ तं चापि वशमानीय किरीटी पुरुषर्षभः । निषादराज्ञो विषयमेकलव्यस्य जग्मिवान् ॥ ७ ॥
पुरुषप्रवर किरीटधारी अर्जुन दशार्णराज चित्रांगदको भी वशमें करके निषादराज एकलव्यके राज्यमें गये ॥ ७ ॥ एकलव्यसुतश्चैनं युद्धेन जगृहे तदा । तत्र चक्रे निषादैः स संग्रामं लोमहर्षणम् ॥ ८ ॥ वहाँ एकलव्यके पुत्रने युद्धके द्वारा उनका स्वागत किया। अर्जुनने निषादोंके साथ रोमांचकारी संग्राम किया ॥ ८ ॥ ततस्तमपि कौन्तेयः समरेष्वपराजितः । जिगाय युधि दुर्धर्षो यज्ञविघ्नार्थमागतम् ॥ ९ ॥ युद्धमें किसीसे परास्त न होनेवाले दुर्धर्ष वीर पार्थने यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये आये हुए एकलव्य-कुमारको भी परास्त कर दिया ॥ ९ ॥ स तं जित्वा महाराज नैषादिं पाकशासनिः । अर्चितः प्रययौ भूयो दक्षिणं सलिलार्णवम् ॥ १० ॥ महाराज! एकलव्यके पुत्रको पराजित करके उसके द्वारा पूजित हुए इन्द्रकुमार अर्जुन फिर दक्षिण समुद्रके तटपर गये ॥ १० ॥ तत्रापि द्रविडैरान्ध्रै रौद्रैर्माहिषकैरपि । तथा कोल्लगिरेयैश्च युद्धमासीत् किरीटिनः ॥ ११ ॥ वहाँ भी द्रविड़, आन्ध्र, रौद्र, माहिषक और कोलाचलके प्रान्तोंमें रहनेवाले वीरोंके साथ किरीटधारी अर्जुनका खूब युद्ध हुआ ॥ ११ ॥ तांश्चापि विजयो जित्वा नातितीव्रेण कर्मणा । तुरङ्गमवशेनार्थ सुराष्ट्रानभितो ययौ ॥ १२ ॥ गोकर्णमथ चासाद्य प्रभासमपि जग्मिवान् । उन सबको मृदुल पराक्रमसे ही जीतकर वे घोड़ेकी इच्छानुसार उसके पीछे चलनेमें विवश हुए सौराष्ट्र, गोकर्ण और प्रभासक्षेत्रोंमें गये ॥ १२ १/२ ॥ ततो द्वारवतीं रम्यां वृष्णिवीराभिपालिताम् ॥ १३ ॥ आससाद हयः श्रीमान् कुरुराजस्य यज्ञियः । तत्पश्चात् कुरुराज युधिष्ठिरका वह यज्ञसम्बन्धी कान्तिमान् अश्व वृष्णिवीरोंद्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें जा पहुँचा ॥ १३ १/२ ॥ तमुन्मथ्य हयश्रेष्ठं यादवानां कुमारकाः ॥ १४ ॥ प्रयुयुत्सुंस्तदा राजन्नुग्रसेनो न्यवारयत् । राजन्! वहाँ यदुवंशी वीरोंके बालकोंने उस उत्तम अश्वको बलपूर्वक पकड़कर युद्धके लिये उद्योग किया; परंतु महाराज उग्रसेनने उन्हें रोक दिया ॥ १४ १/२ ॥ ततः पुराद् विनिष्क्रम्य वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा ॥ १५ ॥ सहितो वसुदेवेन मातुलेन किरीटिनः ।
तौ समेत्य कुरुश्रेष्ठं विधिवत् प्रीतिपूर्वकम् ।। १६ ।। परया भारतश्रेष्ठं पूजया समवस्थितौ । ततस्ताभ्यामनुज्ञातो ययौ येन हयो गतः ।। १७ ।। तदनन्तर अर्जुनके मामा वसुदेवको साथ ले वृष्णि और अन्धककुलके राजा उग्रसेन नगरसे बाहर निकले। वे दोनों बड़ी प्रसन्नताके साथ कुरुश्रेष्ठ अर्जुनसे विधिपूर्वक मिले। उन्होंने भरतकुलके उस श्रेष्ठ वीरका बड़ा आदर-सत्कार किया। फिर उन दोनोंकी आज्ञा ले अर्जुन उसी ओर चल दिये, जिधर वह अश्व गया था ।। ततः स पश्चिमं देशं समुद्रस्य तदा हयः । क्रमेण व्यचरत् स्फीतं ततः पञ्चनदं ययौ ।। १८ ।। वहाँसे पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें विचरता हुआ वह घोड़ा क्रमशः आगे बढ़ने लगा और समृद्धिशाली पञ्चनद प्रदेशमें जा पहुँचा ।। १८ ।। तस्मादपि स कौरव्य गन्धारविषयं हयः । विचचार यथाकामं कौन्तेयानुगतस्तदा ।। १९ ।। कुरुनन्दन! वहाँसे भी वह घोड़ा गान्धारदेशमें जाकर इच्छानुसार विचरने लगा। कुन्तीनन्दन अर्जुन भी उसके पीछे-पीछे वहीं जा पहुँचे ।। १९ ।। ततो गान्धारराजेन युद्धमासीत् किरीटिनः ।
घोरं शकुनिपुत्रेण पूर्ववैरानुसारिणा ॥ २० ॥ फिर तो पूर्व वैरका अनुसरण करनेवाले गान्धारराज शकुनिपुत्रके साथ किरीटधारी अर्जुनका घोर युद्ध हुआ ॥ २० ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥ इस प्रकार महाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें यज्ञसम्बन्धी अश्वका अनुसरणविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥
चतुरशीतितमोऽध्यायः
शकुनिपुत्रकी पराजय
वैशम्पायन उवाच शकुनेस्तनयो वीरो गान्धाराणां महारथः । प्रत्युद्ययौ गुडाकेशं सैन्येन महता वृतः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शकुनिका पुत्र गान्धारोंमें सबसे बड़ा वीर और महारथी था। वह विशाल सेनासे घिरकर निद्राविजयी अर्जुनका सामना करनेके लिये चला ॥ १ ॥ हस्त्यश्वरथयुक्तेन पताकाध्वजमालिना । अमृष्यमाणास्ते योधा नृपस्य शकुनेर्वधम् ॥ २ ॥ अभ्ययुः सहिताः पार्थं प्रगृहीतशरासनाः । उसकी सेनामें हाथी, घोड़े और रथ सभी सम्मिलित थे। वह सेना ध्वजा-पताकाओंकी मालासे मण्डित थी। गान्धारदेशके योद्धा राजा शकुनिके वधका समाचार सुनकर अमर्षमें भरे हुए थे; अतः हाथमें धनुष-बाण ले उन्होंने एक साथ होकर अर्जुनपर धावा बोल दिया ॥ २ १/२ ॥ स तानुवाच धर्मात्मा बीभत्सुरपराजितः ॥ ३ ॥ युधिष्ठिरस्य वचनं न च ते जगृहुर्हितम् । किसीसे परास्त न होनेवाले धर्मात्मा अर्जुनने उन्हें राजा युधिष्ठिरकी बात सुनायी; परंतु उस हितकर वचनको भी वे ग्रहण न कर सके ॥ ३ १/२ ॥ वार्यमाणाऽपि पार्थेन सान्त्वपूर्वममर्षिताः ॥ ४ ॥ परिवार्य हयं जग्मुस्ततश्चुक्रोध पाण्डवः । यद्यपि पार्थने सान्त्वनापूर्वक समझा-बुझाकर उन सबको युद्धसे रोका, तथापि वे अमर्षशील योद्धा उस घोड़ेको चारों ओरसे घेरकर उसे पकड़नेके लिये आगे बढ़े। यह देख पाण्डुपुत्र अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ ॥ ४ १/२ ॥ ततः शिरांसि दीप्ताग्रैस्तेषां चिच्छेद पाण्डवः ॥ ५ ॥ क्षुरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैर्नातियत्नादिचार्जुनः । वे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए तेज धारवाले धुरोंसे बिना परिश्रमके ही उनके मस्तक काटने लगे ॥ ५ १/२ ॥ ते वध्यमानाः पार्थेन हयमुत्सृज्य सम्भ्रमात् ॥ ६ ॥ न्यवर्तन्त महाराज शरवर्षार्जिता भृशम् ।
महाराज! अर्जुनकी मार खाकर उनके बाणोंकी वर्षासे पीड़ित हुए गान्धार सैनिक उस घोड़ेको छोड़कर बड़े वेगसे पीछे लौट गये ॥ ६ १/२ ॥ निरुध्यमानस्तैश्चापि गान्धारैः पाण्डुनन्दनः ॥ ७ ॥ आदिश्यादिश्य तेजस्वी शिरांस्येषां नपातयत् । गान्धारोंके द्वारा रोके जानेपर भी तेजस्वी वीर पाण्डुनन्दन अर्जुन उनके नाम ले-लेकर मस्तक काटने और गिराने लगे ॥ ७ १/२ ॥ वध्यमानेषु तेष्वाजौ गान्धारेषु समन्ततः ॥ ८ ॥ स राजा शकुनेः पुत्रः पाण्डवं प्रत्यवारयत् । जब चारों ओर युद्धमें गान्धारोंका संहार आरम्भ हो गया, तब राजा शकुनि-पुत्रने पाण्डुकुमार अर्जुनको रोका ॥ ८ १/२ ॥ तं युध्यमानं राजानं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् ॥ ९ ॥ पार्थोऽब्रवीन्न मे वध्या राजानो राजशासनात् । अलं युद्धेन ते वीर न तेऽस्त्वद्य पराजयः ॥ १० ॥ क्षत्रियधर्ममें स्थित होकर युद्ध करनेवाले उस राजासे अर्जुनने इस प्रकार कहा—‘वीर! तुम्हें युद्ध करनेसे कोई लाभ नहीं है। महाराज युधिष्ठिरकी यह आज्ञा है कि मैं राजाओंका वध न करूँ। अतः तुम युद्धसे निवृत्त हो जाओ जिससे आज तुम्हारी पराजय न हो’ ॥ ९-१० ॥ इत्युक्तस्तदनादृत्य वाक्यमज्ञानमोहितः । स शक्रसमकर्माणं समवाकिरदाशुगैः ॥ ११ ॥ उनके ऐसा कहनेपर भी वह अज्ञानसे मोहित होनेके कारण उनकी बातकी अवहेलना करके इन्द्रके समान पराक्रमी अर्जुनपर शीघ्रगामी बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ११ ॥ तस्य पार्थः शिरस्त्राणमर्धचन्द्रेण पत्रिणा । अपाहरदमेयात्मा जयद्रथशिरो यथा ॥ १२ ॥ तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न अर्जुनने जिस प्रकार जयद्रथका सिर उड़ाया था, उसी प्रकार शकुनि-पुत्रके शिरस्त्राण (टोप)-को एक अर्धचन्द्राकार बाणसे काट गिराया ॥ १२ ॥ तं दृष्ट्वा विस्मयं जग्मुर्गान्धाराः सर्व एव ते । इच्छता तेन न हतो राजेत्यसि च तं विदुः ॥ १३ ॥ यह देखकर समस्त गान्धारोंको बड़ा विस्मय हुआ और वे सब-के-सब यह समझ गये कि अर्जुनने जान-बूझकर गान्धारराजको जीवित छोड़ दिया ॥ १३ ॥ गान्धारराजपुत्रस्तु पलायनकृतक्षणः । ययौ तैरेव सहितस्त्रस्तैः क्षुद्रमृगैरिव ॥ १४ ॥
उस समय गान्धारराज शकुनिका पुत्र भागनेका अवसर देखने लगा। जैसे सिंहसे डरे हुए छोटे-छोटे मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार अर्जुनसे भयभीत हुए सैनिकोंके साथ वह स्वयं भी भाग निकला ।। १४ ।। तेषां तु तरसा पार्थस्तत्रैव परिधावताम् । प्रजहारोत्तमाङ्गानि भल्लैः संनतपर्वभिः ।। १५ ।। वहीं चक्कर काटनेवाले बहुत-से सैनिकोंके मस्तक अर्जुनने झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा वेगपूर्वक काट लिया ।। १५ ।। उच्छ्रितांस्तु भुजान् केचिन्नाबुध्यन्त शरैर्हतान् । शरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैः पृथुभिः पार्थचोदितैः ।। १६ ।। अर्जुनद्वारा चलाये और गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंसे कितने ही योद्धाओंकी ऊँची उठी हुई भुजाएँ कटकर गिर गयीं और उन्हें इस बातका पतातक न लगा ।। १६ ।। सम्भ्रान्तनरनागाश्वमपतद् विद्रुतं बलम् । हतविध्वस्तभूयिष्ठमावर्तत मुहुर्मुहुः ।। १७ ।। सम्पूर्ण सेनाके मनुष्य, हाथी और घोड़े घबराकर इधर-उधर भटकने लगे। सारी सेना गिरती-पड़ती भागने लगी। उनके अधिकांश सिपाही युद्धमें मारे गये या नष्ट हो गये और वह बार-बार युद्धभूमिमें ही चक्कर काटने लगी ।। नाभ्यदृश्यन्त वीरस्य केचिदग्रेऽग्रयकर्मणः । रिपवः पात्यमाना वै ये सहेयुर्धनंजयम् ।। १८ ।। श्रेष्ठ कर्म करनेवाले वीर अर्जुनके सामने कोई भी शत्रु खड़े नहीं दिखायी देते थे, जो अर्जुनकी मार पड़नेपर उनका वेग सहन कर सके ।। १८ ।। ततो गान्धारराजस्य मन्त्रिवृद्धपुरःसरा । जननी निर्ययौ भीता पुरस्कृत्यार्घ्यमुत्तमम् ।। १९ ।। तदनन्तर गान्धारराजकी माता अत्यन्त भयभीत होकर बूढ़े मन्त्रियोंको आगे करके उत्तम अर्घ्य ले नगरसे बाहर निकली और रणभूमिमें उपस्थित हुई ।। १९ ।। सा निवारयदव्यग्रं तं पुत्रं युद्धदुर्मदम् । प्रसादयामास च तं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् ।। २० ।। आते ही उसने अपने व्यग्रतारहित एवं रणोन्मत्त पुत्रको युद्ध करनेसे रोका और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले विजयशील अर्जुनको प्रिय वचनोंद्वारा प्रसन्न किया ।। २० ।। तां पूजयित्वा बीभत्सुः प्रसादमकरोत् प्रभुः । शकुनेश्चापि तनयं सान्त्वयन्निदमब्रवीत् ।। २१ ।।
सामर्थ्यशाली अर्जुनने भी मामीका सम्मान करके उन्हें प्रसन्न किया और स्वयं उनपर कृपादृष्टि की। फिर शकुनिके पुत्रको भी सान्त्वना प्रदान करते हुए वे इस प्रकार बोले — ॥ २१ ॥ न मे प्रियं महाबाहो यत्ते बुद्धिरियं कृता । प्रतियोद्धुममित्रघ्न भ्रातैव त्वं ममानघ ॥ २२ ॥ 'शत्रुसूदन! महाबाहु वीर! तुमने जो मुझसे युद्ध करनेका विचार किया, यह मुझे प्रिय नहीं लगा; क्योंकि अनघ। तुम तो मेरे भाई ही हो ॥ २२ ॥ गान्धारीं मातरं स्मृत्वा धृतराष्ट्रकृतेन च । तेन जीवसि राजंस्त्वं निहतास्त्वनुगास्तव ॥ २३ ॥ 'राजन्! मैंने माता गान्धारीको याद करके पिता धृतराष्ट्रके सम्बन्धसे युद्धमें तुम्हारी उपेक्षा की है; इसीलिये तुम अभीतक जीवित हो। केवल तुम्हारे अनुगामी सैनिक ही मारे गये हैं ॥ २३ ॥ मैवं भूः शाम्यतां वैरं मा ते भूद् बुद्धिरीदृशी । गच्छेथास्त्वं परां चैत्रीमश्वमेधे नृपस्य नः ॥ २४ ॥ 'अब हमलोगोंमें ऐसा बर्ताव नहीं होना चाहिये। आपसका वैर शान्त हो जाय। अब तुम कभी इस प्रकार हमलोगोंके विरुद्ध युद्ध ठाननेका विचार न करना। 'आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको महाराज युधिष्ठिरका अश्वमेध यज्ञ होनेवाला है। उसमें तुम अवश्य आना' ॥ २४ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे शकुनिपुत्रपराजये चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वानुसरणके प्रसंगमें शकुनिपुत्रकी पराजयविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः यज्ञभूमिकी तैयारी, नाना देशोंसे आये हुए राजाओंका यज्ञकी सजावट और आयोजन देखना वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वानुययौ पार्थो हयं कामविहारिणम् । न्यवर्तत ततो वाजी येन नागाह्वयं पुरम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! गान्धारराजसे यों कहकर अर्जुन इच्छानुसार विचरनेवाले घोड़ेके पीछे चल दिये। अब वह घोड़ा लौटकर हस्तिनापुरकी ओर चला ॥ १ ॥ तं निवृत्तं तु शुश्राव चारेणैव युधिष्ठिरः । श्रुत्वार्जुनं कुशलिनं स च हृष्टमनाऽभवत् ॥ २ ॥ इसी समय राजा युधिष्ठिरको एक जासूसके द्वारा यह समाचार मिला कि घोड़ा हस्तिनापुरको लौट रहा है और अर्जुन भी सकुशल आ रहे हैं। यह सुनकर उनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २ ॥ विजयस्य च तत् कर्म गान्धारविषये तदा । श्रुत्वा चान्येषु देशेषु स सुप्रीतोऽभवत् तदा ॥ ३ ॥ अर्जुनने गान्धारराज्यमें तथा अन्यान्य देशोंमें जो अद्भुत पराक्रम किया था, वह सब सुनकर युधिष्ठिरके हर्षकी सीमा न रही ॥ ३ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु द्वादशीं माघमासिकीम् । इष्टं गृहीत्वा नक्षत्रं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥ समानीय महातेजाः सर्वान् भ्रातॄन् महीपतिः । भीमं च नकुलं चैव सहदेवं च कौरव ॥ ५ ॥ प्रोवाचेदं वचः काले तदा धर्मभृतां वरः । आमन्त्र्य वदतां श्रेष्ठो भीमं प्रहरतां वरम् ॥ ६ ॥ कुरुनन्दन! उस दिन माघ महीनेकी शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि थी। उसमें पुष्य- नक्षत्रका योग पाकर महातेजस्वी पृथिवीपति धर्मराज युधिष्ठिरने अपने समस्त भाइयों— भीमसेन, नकुल और सहदेवको बुलवाया और प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ भीमसेनको सम्बोधित करके वक्ताओं तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने यह समयोचित बात कही — ॥ ४—६ ॥ आयाति भीमसेनासौ सहाश्वेन तवानुजः ।
यथा मे पुरुषाः प्राहुर्र्ये धनंजयसारिणः ॥ ७ ॥ 'भीमसेन! तुम्हारे छोटे भाई अर्जुन घोड़ेके साथ आ रहे हैं, जैसा कि उनका समाचार लानेके लिये गये जासूसोंने मुझे बताया है ॥ ७ ॥ उपस्थितश्च कालोऽयमभितो वर्तते हयः । माघी च पौर्णमासीयं मासः शेषो वृकोदर ॥ ८ ॥ 'वृकोदर! इधर यज्ञ आरम्भ करनेका समय भी निकट आ गया है। घोड़ा भी पास ही है। यह माघ-मासकी पूर्णिमा आ रही है, अब बीचमें केवल फाल्गुनका एक मास शेष है ॥ ८ ॥ प्रस्थाप्यन्तां हि विद्वांसो ब्राह्मणा वेदपारगाः । वाजिमेधार्थसिद्धयर्थं देशं पश्यन्तु यज्ञियम् ॥ ९ ॥ 'अतः वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको भेजना चाहिये कि वे अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धिके लिये उपयुक्त स्थान देखें' ॥ ९ ॥ इत्युक्तः स तु तच्चक्रे भीमो नृपतिशासनम् । हृष्टः श्रुत्वा गुडाकेशमायान्तं पुरुषर्षभम् ॥ १० ॥ यह सुनकर भीमसेनने राजाकी आज्ञाका तुरंत पालन किया। वे पुरुषप्रवर अर्जुनका आगमन सुनकर बहुत प्रसन्न थे ॥ १० ॥ ततो ययौ भीमसेनः प्राज्ञैः स्थपतिभिः सह । ब्राह्मणाग्रतः कृत्वा कुशलान् यज्ञकर्मणि ॥ ११ ॥ तत्पश्चात् भीमसेन यज्ञकर्ममें कुशल ब्राह्मणोंको आगे करके शिल्पकर्मके जानकार कारीगरोंके साथ नगरसे बाहर गये ॥ ११ ॥ तं स शालचयं श्रीमत् सप्रतोलीसुघट्टितम् । मापयामास कौरव्यो यज्ञवाटं यथाविधि ॥ १२ ॥ उन्होंने शालवृक्षोंसे भरे हुए सुन्दर स्थान पसंद करके उसे चारों ओरसे नपवाया। तत्पश्चात् कुरुनन्दन भीमने वहाँ उत्तम मार्गोंसे सुशोभित यज्ञभूमिका विधिपूर्वक निर्माण कराया ॥ १२ ॥ प्रासादशतसम्बाधं मणिप्रवरकुट्टिमम् । कारयामास विधिवद्धेमरत्नविभूषितम् ॥ १३ ॥ उस भूमिमें सैकड़ों महल बनवाये गये, जिसके फर्शमें अच्छे-अच्छे रत्न जड़े हुए थे। वह यज्ञशाला सोने और रत्नोंसे सजायी गयी थी और उसका निर्माण शास्त्रीय विधिके अनुसार कराया गया था ॥ १३ ॥ स्तम्भान् कनकचित्रांश्च तोरणानि बृहन्ति च । यज्ञायतनदेशेषु दत्त्वा शुद्धं च काननम् ॥ १४ ॥ अन्तःपुराणां राज्ञां च नानादेशसमीयुषाम् ।
कारयामास धर्मात्मा तत्र तत्र यथाविधि ॥ १५ ॥ ब्राह्मणानां च वेश्मानि नानादेशसमीयुषाम् । कारयामास कौन्तेयो विधिवत् तान्यनेकशः ॥ १६ ॥ वहाँ सुवर्णमय विचित्र खम्भे और बड़े-बड़े तोरण (फाटक) बने हुए थे। धर्मात्मा भीमने यज्ञमण्डपके सभी स्थानोंमें शुद्ध सुवर्णका उपयोग किया था। उन्होंने अन्तःपुरकी स्त्रियों, विभिन्न देशोंसे आये हुए राजाओं, तथा नाना स्थानोंसे पधारे हुए ब्राह्मणोंके रहनेके लिये भी अनेकानेक उत्तम भवन बनवाये। उन सबका निर्माण कुन्तीकुमार भीमने शिल्पशास्त्रकी विधिके अनुसार कराया था ॥ १४—१६ ॥ तथा सम्प्रेषयामास दूतान् नृपतिशासनात् । भीमसेनो महाबाहो राज्ञामक्लिष्टकर्मणाम् ॥ १७ ॥ महाबाहो! यह सब काम हो जानेपर भीमसेनने महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे अनायास ही महान् पराक्रम कर दिखानेवाले विभिन्न राजाओंको निमन्त्रण देनेके लिये बहुत-से दूत भेजे ॥ १७ ॥ ते प्रियार्थं कुरुपतेराययुर्नृपसत्तम । रत्नान्यनेकान्यादाय स्त्रियोऽश्वानायुधानि च ॥ १८ ॥ नृपश्रेष्ठ! निमन्त्रण पाकर वे सभी नरेश कुरुराज युधिष्ठिरका प्रिय करनेके लिये अनेकानेक रत्न, स्त्रियाँ, घोड़े और भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र लेकर वहाँ उपस्थित हुए ॥ १८ ॥ तेषां निविशतां तेषु शिबिरेषु महात्मनाम् । नर्दतः सागरस्येव दिवस्पृगभवत् स्वनः ॥ १९ ॥ वहाँ बने हुए विभिन्न शिविरोंमें प्रवेश करनेवाले महामनस्वी नरेशोंका जो कोलाहल सुनायी पड़ता था, वह समुद्र की गम्भीर गर्जनाके समान सम्पूर्ण आकाशमें व्याप्त हो रहा था ॥ १९ ॥ तेषामभ्यागतानां च स राजा कुरुवर्धनः । व्यादिदेशान्नपानानि शय्याश्चाप्यतिमानुषाः ॥ २० ॥ कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले राजा युधिष्ठिरने इन नवागत अतिथियोंका सत्कार करनेके लिये अन्न-पान और अलौकिक शय्याओंका प्रबन्ध किया ॥ २० ॥ वाहनानां च विविधाः शालाः शालीक्षुगोरसैः । उपेता भरतश्रेष्ठो व्यादिदेश च धर्मराट् ॥ २१ ॥ भरतभूषण! धर्मराज युधिष्ठिरने उन राजाओंकी सवारियोंके लिये भी धान, ऊँख और गोरससे भरे-पूरे घर दिये ॥ २१ ॥ तथा तस्मिन् महायज्ञे धर्मराजस्य धीमतः । समाजग्मुर्मुनिगणा बहवो ब्रह्मवादिनः ॥ २२ ॥
बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें बहुत-से वेदवेत्ता मुनिगण भी पधारे थे ॥ २२ ॥ ये च द्विजातिप्रवरास्तत्रासन् पृथिवीपते । समाजग्मुः सशिष्यास्तान् प्रतिजग्राह कौरवः ॥ २३ ॥ पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणोंमें जो श्रेष्ठ पुरुष थे, वे सब अपने शिष्योंको साथ लेकर वहाँ आये। कुरुराज युधिष्ठिरने उन सबको स्वागतपूर्वक अपनाया ॥ २३ ॥ सर्वांश्च ताननुययौ यावदावसथान् प्रति । स्वयमेव महातेजा दम्भं त्यक्त्वा युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥ वहाँ महातेजस्वी महाराज युधिष्ठिर दम्भ छोड़कर स्वयं ही उन सबका विधिवत् सत्कार करते और जबतक उनके लिये योग्य स्थानका प्रबन्ध न हो जाता, तबतक उनके साथ-साथ रहते थे ॥ २४ ॥ ततः कृत्वा स्थपतयः शिल्पिनोऽन्ये च ये तदा । कृत्स्नं यज्ञविधिं राज्ञो धर्मज्ञाय न्यवेदयन् ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् थवइयों और अन्यान्य शिल्पियों (कारीगरों) ने आकर राजा युधिष्ठिरको यह सूचना दी कि यज्ञमण्डपका सारा कार्य पूरा हो गया ॥ २५ ॥ तच्छ्रुत्वा धर्मराजस्तु कृतं सर्वमतन्द्रितः । हृष्टरूपोऽभवद् राजा सह भ्रातृभिरादृतः ॥ २६ ॥ सब कार्य पूरा हो गया। यह सुनकर आलस्य-रहित धर्मराज राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ बहुत प्रसन्न हुए ॥ २६ ॥ वैशम्पायन उवाच तस्मिन् यज्ञे प्रवृत्ते तु वाग्मिनो हेतुवादिनः । हेतुवादान् बहूनाहुः परस्परजिगीषवः ॥ २७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वह यज्ञ आरम्भ होनेपर बहुत-से प्रवचनकुशल और युक्तिवादी विद्वान्, जो एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखते थे, वहाँ अनेक प्रकारसे तर्ककी बातें करने लगे ॥ २७ ॥ ददृशुस्तं नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम् । देवेन्द्रस्येव विहितं भीमसेनेन भारत ॥ २८ ॥ भारत! यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आये हुए राजा लोग घूम-घूमकर भीमसेनके द्वारा तैयार कराये हुए उस यज्ञमण्डपकी उत्तम निर्माण कला एवं सुन्दर सजावट देखने लगे। वह मण्डप देवराज इन्द्रकी यज्ञशालाके समान जान पड़ता था ॥ २८ ॥ ददृशुस्तोरणान्यत्र शातकुम्भमयानि ते । शय्यासनविहारांश्च सुबहून् रत्नसंचयान् ॥ २९ ॥
उन्होंने वहाँ सुवर्णके बने हुए तोरण, शय्या, आसन, विहारस्थान तथा बहुत-से रत्नोंके ढेर देखे ।। २९ ।। घटान् पात्री: कटाहानि कलशान् वर्धमानकान् । न हि किञ्चिदसौवर्णमपश्यन् वसुधाधिपा: ।। ३० ।। घड़े, बर्तन, कड़ाहे, कलश और बहुत-से कटोरे भी उनकी दृष्टिमें पड़े। उन पृथ्वीपतियोंने वहाँ कोई भी ऐसा सामान नहीं देखा, जो सोनेका बना हुआ न हो ।। ३० ।। यूपांश्च शास्त्रपठितान् दारवान् हेमभूषितान् । उपक्लृप्तान् यथाकालं विधिवद् भूरिवर्चस: ।। ३१ ।। शास्त्रोक्त विधिके अनुसार जो काष्ठके यूप बने हुए थे, उनमें भी सोना जड़ा हुआ था। वे सभी यूप यथासमय विधिपूर्वक बनाये गये थे जो देखनेमें अत्यन्त तेजोमय जान पड़ते थे ।। ३१ ।। स्थलजा जलजा ये च पशव: केचन प्रभो । सर्वानैव समानीतानपश्यंस्तत्र ते नृपा: ।। ३२ ।। प्रभो! संसारके भीतर स्थल और जलमें उत्पन्न होनेवाले जो कोई पशु देखे या सुने गये थे, उन सबको वहाँ राजाओंने उपस्थित देखा ।। ३२ ।। गाश्चैव महिषीश्चैव तथा वृद्धस्त्रियोऽपि च । औदकानि च सत्त्वानि श्वापदानि वयांसि च ।। ३३ ।। जरायुजाण्डजातानि स्वेदजान्युद्धिजानि च । पर्वतानूपजातानि भूतानि ददृशुश्च ते ।। ३४ ।। गायें, भैंसें, बूढ़ी स्त्रियाँ, जल-जन्तु, हिंसक जन्तु, पक्षी, जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज, पर्वतीय तथा सागरतटपर उत्पन्न होनेवाले प्राणी—ये सभी वहाँ दृष्टिगोचर हुए ।। ३३-३४ ।। एवं प्रमुदितं सर्वं पशुगोधनधान्यतः । यज्ञवाटं नृपा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता: ।। ३५ ।। इस प्रकार वह यज्ञशाला पशु, गौ, धन और धान्य सभी दृष्टियोंसे सम्पन्न एवं आनन्द बढ़ानेवाली थी। उसे देखकर समस्त राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ ।। ३५ ।। ब्राह्मणानां विशां चैव बहुमृष्टान्नमुद्धिमत् । पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां तत्र भुञ्जताम् ।। ३६ ।। दुन्दुभिर्मेघनिर्घोषो मुहुर्मुहुरताडयत् । विननादासकृच्चापि दिवसे दिवसे गते ।। ३७ ।। ब्राह्मणों और वैश्योंके लिये वहाँ परम स्वादिष्ट अन्नका भण्डार भरा हुआ था। प्रतिदिन एक लाख ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर वहाँ मेघ-गर्जनाके समान शब्द करनेवाला डंका बार-बार पीटा जाता था। इस प्रकारके डंके वहाँ दिनमें कई बार पीटे जाते थे ।।
एवं स ववृते यज्ञो धर्मराजस्य धीमतः । अन्नस्य सुबहून् राजन्नुत्सर्गान् पर्वतोपमान् ॥ ३८ ॥ दधिकुल्याश्च ददृशुः सर्पिषश्च ह्रदान् जनाः । जम्बूद्वीपो हि सकलो नानाजनपदायतः ॥ ३९ ॥ राजन्नदृश्यतैकस्थो राज्ञस्तस्य महामखे । राजन्! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरका वह यज्ञ रोज-रोज इसी रूपमें चालू रहा। उस स्थानपर अन्नके बहुत-से पहाड़ों जैसे ढेर लगे रहते थे। दहीकी नहरें बनी हुई थीं और घीके बहुत-से तालाब भरे हुए थे। राजा युधिष्ठिरके उस महान् यज्ञमें अनेक देशोंके लोग जुटे हुए थे। राजन्! सारा जम्बूद्वीप ही वहाँ एक स्थानमें स्थित दिखायी देता था ॥ ३८-३९ १/२ ॥ तत्र जातिसहस्राणि पुरुषाणां ततस्ततः ॥ ४० ॥ गृहीत्वा भाजनान् जग्मुर्बहूनि भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! वहाँ हजारों प्रकारकी जातियोंके लोग बहुत-से पात्र लेकर उपस्थित होते थे ॥ ४० १/२ ॥ स्रग्विणश्चापि ते सर्वे सुमृष्टमणिकुण्डलाः ॥ ४१ ॥ पर्यवेषन् द्विजातींस्तान् शतशोऽथ सहस्रशः । विविधान्यन्नपानानि पुरुषा येऽनुयायिनः । ते वै नृपोपभोज्यानि ब्राह्मणानां ददुश्च ह ॥ ४२ ॥ सैकड़ों और हजारों मनुष्य वहाँ ब्राह्मणोंको तरह-तरहके भोजन परोसते थे। वे सब- के-सब सोनेके हार और विशुद्ध मणिमय कुण्डलोंसे अलंकृत होते थे। राजाके अनुयायी पुरुष वहाँ ब्राह्मणोंको तरह-तरहके अन्न-पान एवं राजोचित भोजन अर्पित करते थे ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका आरम्भविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥