अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
जल हमारे पाप को हमसे दूर करे. पाप हमे अलग हों. (१०)
प्रास्मदेनो वहन्तु प्र दुःष्वप्न्यं वहन्तु.. (११)
यह जल हमारे पाप और बुरे स्वप्न को बहा कर ले जाए. (११)
शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवया तन्वोप स्पृशत त्वचं मे.. (१२)
हे जल! तुम मुझे कृपा की दृष्टि से देखो और अपने कल्याणकारक भाग से मेरी त्वचा
का स्पर्श करो. (१२)
शिवानग्नीनप्सुषदो हवामहे मयि क्षत्रं वर्च आ धत्त देवी:.. (१३)
हम जल में व्याप्त और मंगलकारिणी अग्नियों को बुलाते हैं. यह जल मुझे क्षमाबल
वाली शक्ति से संपन्न करे. (१३)
सूक्त-२ देवता—प्रजापति
निर्दुर्मण्य ऊर्जा मधुमती वाक्.. (१)
मैं दूषित चर्मरोग से मुक्त रहूं. मेरी वाणी शक्तिशालिनी तथा मधुयुक्त हो. (१)
मधुमती स्थ मधुमतीं वाचमुदेयम्.. (२)
हे ओषधियो! तुम मधुरस से पूर्ण रहो. मेरी वाणी भी मधुररस से पूर्ण हो. (२)
उपहूतो मे गोपा उपहूतो गोपीथ:.. (३)
मेरे कान कल्याण करने वाली बातें सुनें. मैं मंगलपूर्ण एवं प्रशंसाभरी बातें सुनूं. (३)
सुश्रुतौ कर्णौ भद्रश्रुतौ कर्णौ भद्रं श्लोकं श्रूयासम्.. (४)
मेरे कान भलीभांति तथा निकट से सुनना कभी न छोड़ें. मेरे नेत्र गरुड़ के समान हों
तथा सदैव देखने की शक्ति से सम्पन्न रहें. (४)
सुश्रुतिश्च मोपश्रुतिश्च मा हासिष्टां सौपर्णं चक्षुरजस्रं ज्योति:.. (५)
मेरे कान ठीक से सुनना और पास से सुनना न छोड़ें. मेरी आंखें गरुड़ की देखने की
शक्ति से पूर्ण रहें. (५)
ऋषीणां प्रस्तरो ऽ सि नमो ऽ स्तु दैवाय प्रस्तराय.. (६)
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सूक्त-३ देवता—आदित्य
तू ऋषियों का पाषाण है. तुझ देवरूप पाषाण को मैं नमस्कार करता हूं. (६)
सूक्त-३ देवता—आदित्य
मूर्धाहं रयीणां मूर्धा समानानां भूयासम्.. (१)
मैं धनों का शीर्ष रूप रहूं. जो व्यक्ति मेरे समान हैं, उन में मैं मस्तक के समान उच्च रहूं.
(१)
रुजश्च मा वेनश्च मा हासिष्टां मूर्धा च मा विधर्मा च मा हासिष्टाम्.. (२)
रज, यज्ञ, मूर्धा अर्थात् शीश और विशेष धर्म मेरा त्याग न करें. (२)
उर्वश्च मा चमसश्च मा हासिष्टां धर्ता च मा धरुणश्च मा हासिष्टाम्.. (३)
उर्व अर्थात् पकाने वाला पात्र, चमस अर्थात् चमचा धारण करने वाले और आधार मुझ
से अलग न हों. (३)
विमोकश्च मार्द्रपविश्च मा हासिष्टामार्द्रदानुश्च मा मातरिश्वा च मा
हासिष्टाम्.. (४)
मुक्त करने वाला तथा गीला आयुध, आर्द्रदानु और मातरिश्वा अर्थात् पवन मुझ से
अलग न हो. (४)
बृहस्पतिर्म आत्मा नृमणा नाम हृद्यः.. (५)
हर्ष देने वाले, अनुग्रह करने वाले तथा मन को लगाने वाले बृहस्पति मेरी आत्मा हैं. (५)
असंतापं मे हृदयमुत्रीं गव्यूतिः समुद्रो अस्मि विधर्मणा.. (६)
दो कोस तक की भूमि मेरे अधिकार में हो. मेरा हृदय कभी संतप्त न रहे. मैं धारण
करने की शक्ति के द्वारा सागर के समान गंभीर बनूं. (६)
सूक्त-४ देवता—आदित्य
नाभिरहं रयीणां नाभिः समानानां भूयासम्.. (१)
मैं धनों की नाभि के समान बनूं. जो पुरुष मेरे समान हैं, उन में भी मैं नाभि रूप बनूं.
(१)
स्वासदसि सूषा अमृतो मर्त्येष्विा.. (२)
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श्रेष्ठ उषा मरण धर्मा मनुष्यों में अमृत से युक्त है तथा सुंदरता के साथ प्रतिष्ठित होती है.
(२)
मा मां प्राणो हासीन्मो अपानो ऽ वहाय परा गात्.. (३)
प्राण वायु मेरा त्याग न करे. अपान वायु भी मुझे छोड़ कर न जाए. (३)
सूर्यो माह्नः पात्वग्निः पृथिव्या वायुरन्तरिक्षाद् यमो मनुष्येभ्यः सरस्वती
पार्थिवेभ्यः.. (४)
सूर्य दिन में मेरी रक्षा करें. अग्नि पृथ्वी पर मेरी रक्षा करे. वायु अंतरिक्ष में, यम मनुष्यों
से तथा सरस्वती पार्थिव पदार्थों से मेरी रक्षा करने वाली हैं. (४)
प्राणापानौ मा मा हासिष्टं मा जने प्र मेषि.. (५)
प्राण और अपान वायु मेरा त्याग न करें. मैं सदा प्रसन्न रहूं. (५)
स्वस्त्य १ द्योषसो दोषसश्च सर्व आपः सर्वगणो अशीय. (६)
उषा काल और रात्रि के द्वारा मंगल हो. मैं सभी गणों और जलों का उपयोग करने वाला
बनूं. (६)
शक्वरी स्थ पशवो मोप स्थेषुर्मित्रावरुणौ मे प्राणापानावग्निर्मे दक्षं
दधातु.. (७)
हे पशुओ! तुम भुजाओं वाले बनो तथा मेरे पास स्थित रहो. वरुण देव मेरी प्राण और
अपान वायु को पोषित करें. अग्नि देव मेरे बल को दृढ़ करें. (७)
सूक्त-५ देवता—दुःस्वप्ननाशन
विद्म ते स्वप्न जनित्रं ग्राह्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.. (१)
हे स्वप्न! तू ग्राह्य पिशाचों से उत्पन्न हुआ है तथा यम को प्राप्त करने वाला है. मैं तेरी
उत्पत्ति जानता हूं. (१)
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि.. (२)
हे स्वप्न! तू जीवन का अंत करने वाली मृत्यु है. (२)
तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्षप्न्यात् पाहि.. (३)
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हे प्रश्न! हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्नों से बचाओ. (३)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं निर्ऋत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (४)
हे स्वप्न! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम निर्ऋति अर्थात् पाप देवता के पुत्र हो तथा
यम देव के साधन हो. तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. हम तुम्हारे इस रूप को
जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्न से बचाओ. (४)
विद्म ते स्वप्न जनित्रमभूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (५)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम मृत्यु और अभूति अर्थात् दरिद्रता के पुत्र
हो. हे स्वप्न! हम तुम्हें भलिभांति जानते हैं. तुम हमारी बुरे स्वप्नों से रक्षा करो. (५)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं निर्भूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (६)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम निर्भूति अर्थात् निर्धनता के पुत्र और
यमराज के साधन हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं, इसलिए तुम हमें बुरे स्वप्न से बचाओ.
(६)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं पराभूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (७)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम पराभूति अर्थात् पराजय के पुत्र और
यमराज के साधन हो. तुम यमराज के साधन और मृत्यु हो. हम तुम्हारे स्वरूप को भलीभांति
जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्नों से बचाओ. (७)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं देवजामीनां पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.. (८)
हे स्वप्न! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम इंद्रिय विकारों के पुत्र और यम के साधन
हो. तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्न
से बचाओ. (८)
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि.. (९)
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सूक्त-६ देवता—दुःस्वप्ननाशन
हे स्वप्न! तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. (९)
तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात् पाहि.. (१०)
हे स्वप्न! मैं तुम्हें भलीभांति जानता हूं. तुम मुझे बुरे स्वप्नों से बचाओ. (१०)
सूक्त-६ देवता—दुःस्वप्ननाशन
अजैष्माद्यासनामाग्याभूमानागसो वयम्.. (१)
हम आज विजय प्राप्त करें. हम आज खाद्य पदार्थ प्राप्त करें. आज हम पाप रहित हो
जाएं. (१)
उषो यस्माद् दुष्ष्वप्न्याद्भैष्माप तदुच्छतु.. (२)
हे उषा देवी! जिस बुरे स्वप्न से हम डरते हैं, वह बुरा स्वप्न समाप्त हो जाए. (२)
द्विषते तत् परा वह शपते तत् परा वह.. (३)
हे देव! आप उसे भय को प्राप्त कराएं जो हमसे द्वेष करता है तथा हमारी निन्दा करता
है. (३)
यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तस्मा एनद् गमयामः.. (४)
हम जिससे द्वेष करते हैं और जो हमसे द्वेष करता है, हम इस भय को उस के पास
भेजते हैं. (४)
उषा देवी वाचा संविदाना वाग् देव्यु १ षसा संविदाना.. (५)
उषा देवी वाणी के साथ और वाणी की देवी उषा के साथ एकमत स्थापित करें. (५)
उषस्पतिर्वाचस्पतिना संविदानो वाचस्पतिरुषस्पतिना संविदानः.. (६)
उषा के पति वाचस्पति अर्थात् वाणी के स्वामी के साथ तथा वाचस्पति उषा देवी के
पति के साथ एकमत स्थापित करें. (६)
ते ३ मुष्मै परा वहन्त्वरायान् दुर्नाम्नः सदान्वाः.. (७)
कुम्भीका दूषीकाः पीयकान्.. (८)
वे इस दुष्ट शत्रु के लिए दूषित नाम वाले दुःखों को, आपत्तियों को घड़े के समान बढ़ने
वाले उदर रोगों को, शरीर के दूषित रोगों को तथा प्राणघातक रोगों को प्राप्त कराएं. (७-८)
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जाग्रद्दुःष्वप्न्यं स्वप्नेदुःष्वप्न्यम्.. (९)
अनागमिषमतो वरानवित्तेः संकल्पान्मुच्या द्रुहः पाशान्.. (१०)
हम जाग्रत अवस्था में जो दुःस्वप्न देखते हैं और सोते हुए जो दुःस्वप्न देखते हैं, उनके बुरे
फलों से तथा धनहीनता के अतीतकाल के संकल्पों से, न प्राप्त होने वाले उत्तम पदार्थों से
और न छूटने वाले द्रोहजनित पाशों से मुक्त हों. (९-१०)
तदमुष्मा अग्ने देवाः परा वहन्तु वध्रिर्यथासद विथुरो न साधुः.. (११)
हे अग्नि देव! सभी देव सभी प्रकार की उन आपत्तियों को हमारे शत्रुओं की ओर ले
जाएं, जिनके कारण हमारे शत्रु पौरुषहीन व्याधि और सज्जनों को प्राप्त होने वाले यज्ञ को न
पाकर अपयश भोगें. (११)
सूक्त-७ देवता—दुःस्वप्ननाशन
तेनैनं विध्याम्यभूत्यैनं विध्यामि निर्भूत्यैनं विध्यामि पराभूत्यैनं
विध्यामि ग्राह्यैनं विध्यामि तमसैनं विध्यामि.. (१)
मैं इस अर्थात् बुरे स्वप्न को अभिचार कर्म अर्थात् जादू Node/टोने से, दुर्गति से, दरिद्रता से
तथा रोग से विद्ध करता हूं. (१)
देवानामैनं घोरैः क्रूरैः प्रैषैरभिप्रेष्यामि.. (२)
मैं इस बुरे स्वप्न को देवताओं की भयंकर आज्ञाओं के सामने उपस्थित करता हूं. (२)
वैश्वानरस्यैनं दंष्ट्रयोरपि दधामि.. (३)
मैं इस बुरे स्वप्न को वैश्वानर अर्थात् अग्नि की दाढ़ों में डालता हूं. (३)
एवानेवाव सा गरत्.. (४)
वैश्वानर इस बुरे स्वप्न को निगल जाएं. (४)
यो ३ स्मान् द्वेष्टि तमात्मा द्वेष्टु यं वयं द्विष्मः स आत्मानं द्वेष्टु.. (५)
जो हम से द्वेष करता हो, उस से आत्मा द्वेष करे. जिस से हम द्वेष करते हैं, वह आत्मा
से द्वेष करे. (५)
निर्द्विषन्तं दिवो निः पृथिव्या निरन्तरिक्षाद् भजाम.. (६)
जो हम से द्वेष करता है, उसे हम आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष से दूर भगाते हैं. (६)
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सुयामंश्वाक्षुष.. (७)
इदमह मामुष्यायणे ३ मुष्याः पुत्रे दुष्षप्न्यं मृजे.. (८)
हे उत्तम नियामक और निरीक्षक! मैं बुरे स्वप्न से होने वाले फल को अमुक गोत्र वाले
तथा अमुक स्त्री के पुत्र के पास भेजता हूं. (७-८)
यददो अदो अभ्यगच्छन् यद् दोषा यत् पूर्वा रात्रिम्.. (९)
यज्जाग्रद यत् सुप्तो यद् दिवा यन्नक्तम्.. (१०)
यदहरहरभिगच्छामि तस्मादेनमव दये.. (११)
मैं पहली रात में अमुकअमुक कर्म कर चुका हूं. जाग्रतावस्था में, सुषुप्तावस्था में, दिन
में अथवा रात्रि में मैं नित्यप्रति जिस पाप और दोष को प्राप्त करता हूं, उन्हीं के द्वारा मैं उस
बुरे स्वप्न को नष्ट करता हूं. (९-११)
तं जहि तेन मन्दस्व तस्य पृष्टीरपि शृणीहि.. (१२)
हे देव! उस शत्रु की हिंसा करो, उस के साथ चलो तथा उस की पसलियों को तोड़ दो.
(१२)
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (१३)
वह प्राणहीन हो जाए, वह जीवित न रहे. (१३)
सूक्त-८ देवता—बुरे स्वप्न का नाश
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.. (१)
हमारा उदय हो. हम सत्य को प्राप्त करें, हमारा तेज बढ़े. हमारा ज्ञान बढ़े तथा हमारे
उत्तम प्रकाश में वृद्धि हो. हमारे यज्ञ सफल हों, हमारे अधिकार में पशु हों, हमारी संतान की
वृद्धि हो. हमारे लोग वीर हों. (१)
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.. (२)
इस अपराध के कारण हम शत्रु पर आक्रमण करते हैं. इस गोत्र वाला तथा इस का पुत्र
हमारा शत्रु है. (२)
स ग्राह्याः पाशान्मा मोचि.. (३)
वह रोग के पाशों से न छूट सके. (३)
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तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (४)
उस के तेज, बल, प्राण और आयु को मैं घेरता हूं. मैं इसे नीचे गिराता हूं. (४)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स निर्र्ऋत्याः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (५)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह दुर्गति के
पाशों से न छूट सके. (५)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
सो ऽ भूत्याः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (६)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह दरिद्रता के
पाशों से न छूटने पाए. (६)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स निर्भूत्याः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (७)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह बुरी अवस्था
के पाशों से न छूट सके. (७)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः
स पराभूत्याः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्वं पादयामि.. (८)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह पराजय के
पाशों से न छूटने पाए. (८)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं
निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स देवजामीनां पाशान्मा
मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्वं पादयामि.. (९)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह इंद्रिय संबंधी
दोषों से छूटने न पाए. (९)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स बृहस्पतेः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्वं पादयामि.. (१०)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम
इस लोक से दूर करते हैं. वह बृहस्पति के बंधन से मुक्त न हो. मैं उस के तेज, वर्च, प्राण और
आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराता हूं. (१०)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स प्रजापतेः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (११)
शत्रुओं को मार कर और जीत कर लाए हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को हम
इस लोक से दूर करते हैं, वह प्रजापति के बंधन से मुक्त न हो. मैं उस के तेज, वर्च, प्राण और
आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराता हूं. (११)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवोऽस्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स ऋषीणां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१२)
शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए तथा जीते हुए सब पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
पशु, प्रजा तथा सब वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को हम इस लोक
से दूर करते हैं. वह ऋषियों के बंधन से मुक्त न हो. मैं उस के तेज, वर्च, प्राण और आयु को
लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराना चाहता हूं. (१२)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स आर्षेयाणां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१३)
शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक स्त्री के पुत्र
को इस लोक से दूर भेजते हैं. वह ऋषियों से उत्पन्न पाशों से कभी छूटने न पाए. मैं उस के
तेज, वर्च, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराता हूं. (१३)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
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यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
सो ऽ ङ्गिरसां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१४)
शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. हम अमुक गोत्र
वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह अंगिराओं के बंधन
से मुक्त न हो. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं.
(१४)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स आङ्गिरसानां पाशान्मामोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१५)
शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाला तथा अमुक नाम वाली स्त्री
के पुत्र को हम इस लोक से दूर करते हैं. वह आंगिरसों अर्थात् अंगिरा गोत्र वालों के बंधन से
मुक्त न हो. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह डालते हैं.
(१५)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
सो ऽ थर्वणां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१६)
शत्रुओं का वध कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली
स्त्री के पुत्र को लोक से दूर करते हैं. वह अथर्वा गोत्र वालों के बंधन से मुक्त न हो. हम उस के
तेज, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (१६)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
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तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स आथर्वणानां पाशान्मामोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१७)
शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए और जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम
वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह अथर्वणों के बंधन से न छूटे. हम उस के
तेज, ब्रह्म, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (१७)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स वनस्पतीनां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१८)
शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम
वाली स्त्री के पुत्र को हम इस लोक से दूर करते हैं. वह वनस्पतियों के बंधन से मुक्त न हो.
हम उस के तेज, बल, प्राण तथा आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (१८)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स वनस्पत्यानां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१९)
शत्रुओं का वध कर के लाए गए और जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. हम सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर पुरुषों के अधिकारी हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा
अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह वनस्पतियों के पाश से मुक्त न
हो. हम उस के तेज, बल, स्वर्ग, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (१९)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स ऋतूनां पाशान्मा मोचि.
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तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२०)
शत्रुओं का वध कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, संतान, स्त्री तथा वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली
स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह ऋतुओं के बंधन से मुक्त न होने पाए. हम उस
के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२०)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स आर्तवानां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२१)
शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए तथा जीत कर लाए हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर पुरुष हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम
वाली स्त्री के पुत्र को हम इस लोक से दूर करते हैं. वह ऋतुओं के पदार्थों के बंधन से मुक्त न
हो. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२१)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स मासानां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२२)
शत्रुओं का वध कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीत कर लाए हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य,
तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक
नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह मासों के पाश से न छूटने पाए. हम
उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२२)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
सो ऽ र्धमासानां पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यायीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२३)
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शत्रुओं को मार कर लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली
स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह अर्धमास के बंधन से मुक्त न होने पाए. हम उस
के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२३)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
सो ऽ होरात्रयोः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२४)
शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए पदार्थ और जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम
वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह दिन और रात्रियों के पाश से मुक्त न होने
पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२४)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
सो ऽ ह्नोः संयतोः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२५)
शत्रुओं को नष्ट कर के लाए हुए पदार्थ और जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली
स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह रातदिन के संयत पाशों से मुक्त न होने पाए. हम
उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२५)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स द्यावापृथिव्योः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२६)
शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, प्रजा और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम
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वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह द्यावा पृथ्वी के पाश से छूट न सके. हम
उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२६)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजोऽस्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स इन्द्राग्न्योः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२७)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म,
पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री
के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह इंद्र और अग्नि के बंधन से मुक्त न होने पाए. हम
उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२७)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स मित्रावरुणयोः पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२८)
शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए पदार्थ और जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सब वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम
वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह मित्र और वरुण के बंधन से छूटने न पाए.
हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२८)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.
स राज्ञो वरुणस्य पाशान्मा मोचि.
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि. (२९)
शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सब वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले और अमुक नाम
वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से मुक्त करते हैं. वह राजा वरुण के पाश से मुक्त न होने पाए.
हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२९)
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जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं
स्वरस्माकं
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.. (३०)
शत्रुओं को मार कर लाए हुए पदार्थ और जीत कर लाए हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज,
ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सब वीर पुरुष हमारे हैं. (३०)
तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.. (३१)
हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं.
(३१)
स मृत्योः पड्वीशात् पाशान्मा मोचि.. (३२)
वह मृत्यु के पाशों से कभी मुक्त न हो. (३२)
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्चं पादयामि.. (३३)
हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (३३)
सूक्त-९ देवता—प्रजापति
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमभ्यष्ठां विश्वाः पृतना अरातीः.. (१)
शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. हम शत्रुओं की
सेना पर अधिकार करें. (१)
तदग्निराह तदु सोम आह पूषा मा धात् सुकृतस्य लोके.. (२)
अग्नि और सोम इसी बात को कह रहे हैं. पूषा देव हमें पुण्य लोक में प्रतिष्ठित करें. (२)
अगन्म स्व १: स्वरगन्म सं सूर्यस्य ज्योतिषागन्म.. (३)
हमें स्वर्ग प्राप्त है, जो लोक सूर्य की ज्योति से उत्तम बना है, हम उसे प्राप्त करें. (३)
वस्योभूयाय वसुमान् यज्ञो वसु वंशिषीय वसुमान् भूयासं वसु मयि धेहि..
(४)
मैं सत्कार पाने के योग्य हूं. मैं परमधनी बनने के लिए धन पर अधिकार कर सकूं. हे
देव! मेरे धन को पुष्ट करो. (४)
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सूक्त-१ देवता—आदित्य
सत्रहवां कांड
सूक्त-१ देवता—आदित्य
विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्.
सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्.
ईड्यं नाम ह्व इन्द्रमायुष्मान् भूयासम्. (१)
सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले,
स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त
करने वाले इंद्र रूप सूर्य को मैं प्रातः, मध्याह्न तक संध्या के कर्मों के द्वारा बुलाता हूं. उन इंद्र
रूप सूर्य की कृपा से मैं अधिक आयु वाला बनूं. (१)
विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्.
सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्.
ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियो देवानां भूयासम् (२)
सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले,
स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त
करने वाले इंद्र रूप सूर्य को बुलाता हूं. उन इंद्र की कृपा से मैं संतान आदि का प्रिय बनूं. (२)
विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्.
सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्.
ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः प्रजानां भूयासम् (३)
मैं सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने
वाले, स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय
प्राप्त करने वाले इंद्र रूप सूर्य को मैं बुलाता हूं. उन इंद्र रूप सूर्य की कृपा से मैं प्रजाओं का
प्रिय बनूं. (३)
विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्.
सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्.
ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः पशूनां भूयासम् (४)
सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले,
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स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त
करने वाले इंद्र रूप सूर्य का मैं प्रातः, सायं तथा मध्याह्न के कर्मों के द्वारा आह्वान करता हूं.
उन की कृपा से मैं गाय, भैंस आदि पशुओं का प्रिय बनूं. (४)
विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्.
सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्.
ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः समानानां भूयासम् (५)
सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले,
स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त
करने वाले सूर्य को मैं प्रातः, मध्याह्न और संध्या के कर्मों के द्वारा बुलाता हूं. उन इंद्र रूप सूर्य
की कृपा से मैं अपने समान लोगों का प्रिय बनूं. (५)
उदिह्युदिहि सूर्य वर्चसा माभ्युदिहि.
द्विषंश्च मह्यं रध्यतु मा चाहं द्विषते रधं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि.
त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (६)
हे सूर्य देव! आप उदित हैं और उदित हो कर अपने तेज से मुझे प्रकाशित करें. जो लोग
मुझ से द्वेष करते हैं. वे मेरे वश में हो जाएं. मैं किसी भी प्रकार उन के वशीभूत न बनूं. हे
व्यापनशील सूर्य देव! आप का पराक्रम सीमारहित है आप मुझे अमुक रूपों वाले अर्थात्
गाय, घोड़ा, भैंस आदि पशुओं से पूर्ण करं तथा परमव्योम में जो अमृत है, उस में मुझे
स्थापित करें. (६)
उदिह्युदिहि सूर्य वर्चसा माभ्युदिहि.
याश्चं पश्यामि याश्चं न तेषु मा सुमतिं कृधि तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि.
त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (७)
हे सूर्य देव! तुम उदय होओ. हे अपने तेज से दूसरों को दबाने वाले सूर्य देव! तुम उदय
होओ. मैं जिन को देख रहा हूं और जिन्हें नहीं देख रहा हूं, उन के विषय में मुझे शोभन बुद्धि
वाला बनाओ. हे व्यापनशील सूर्य! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अंतहीन हैं. तुम मुझे अनेक
रूपों वाले अर्थात् गाय, अश्व, भैंस आदि पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो अमृत है
उस में मुझे स्थापित करो. (७)
मा त्वा दभन्त्सलिले अप्स्व १ न्तर्ये पाशिन उपतिष्ठन्त्यत्र.
हित्वाशस्तिं दिवमारुक्ष एतां स नो मृड सुमतौ ते स्याम तवेद् विष्णो
बहुधा वीर्याणि.
त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (८)
हे पाशों को धारण करने वाले सूर्य! राक्षस तुम्हें जलों में प्रवेश करने से न रोकें. तुम उस
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निंदा को त्याग कर आकाश में आरोहण करो. तुम मुझ पर कृपा करो. हम तुम्हारी शोभन
बुद्धि में रहें. हे व्याप्त होने वाले सूर्य! यहां तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक हैं. तुम गाय,
अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से हमें पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में
हमें स्थापित करो. (८)
त्वं न इन्द्र महते सौभागायादब्धेभिः परि पाह्यक्तुभिस्तवैद् विष्णो बहुधा
वीर्याणि.
त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (९)
हे परम ऐश्वर्य संपन्न सूर्य! ऐश्वर्य को प्राप्त करने के हेतु तुम बहुत से पराक्रम करते हो.
तुम व्याधि, चोर, भूत, राक्षस, अग्निदाह आदि की हिंसा से रहित दिवसों के द्वारा हमारी रक्षा
करो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम गाय, अश्व आदि
अनेक रूपों वाले पशुओं से मुझे पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में मुझे
स्थापित करो. (९)
त्वं न इन्द्रोतिभिः शिवाभिः शांतमो भव.
आरोहंस्त्रिदिवं दिवो गृणानः
सोमपीतये प्रियधामा स्वस्तये तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि.
त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१०)
हे इंद्र! तुम अपनी मंगलमयी रक्षाओं के द्वारा हमारे लिए अधिक सुखकारी बनो. तुम
अंतरिक्ष संबंधी स्वर्ग पर चढ़ते हुए सोम याग में सोमरस पीने के लिए आओ. हे प्रिय निवास
स्थानों वाले इंद्र! तुम हमारे कल्याण के निमित्त पधारो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात्
शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो और परम
व्योम में जो सुधा है. उस में हमें स्थापित करो. (१०)
त्वमिन्द्रासि विश्वजित् सर्ववित् पुरुहूतस्त्वमिन्द्र.
त्वमिन्द्रेमं सुहवं स्तोममेरयस्व स नो मृड सुमतौ ते स्याम तवेद् विष्णो
बहुधा वीर्याणि.
त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (११)
हे इंद्र! तुम विश्वविजयी एवं सभी को जीतने वाले हो. हे इंद्र! तुम बहुतों के द्वारा यज्ञों में
बुलाए जाने वाले हो. हे इंद्र! तुम इस समय की जाती हुई शोभन ज्ञान की साधन स्तुतियों के
लिए हमें प्रेरित करो. तुम हमारी रक्षा करो. हम तुम्हारी उत्तम बुद्ध में रहें अर्थात् हमारे प्रति
तुम्हारी श्रेष्ठ भावना हो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम
हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा हमें परम व्योम में स्थित
सुधा में स्थापित करो. (११)
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