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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

स्त्रियश्च सर्वाः स्वापय शुनश्चेन्द्रसखा चरन्.. (२) भूमि पर वायु अधिक न चले अर्थात् तेज हवा के कारण लोगों की नींद न टूटे. सोए हुए व्यक्तियों में से कोई भी दूसरों को न देख सके. हे इंद्र के मित्र वायु! तुम प्राण वायु के रूप में शरीर में वर्तमान रह कर सभी समीपवर्ती स्त्रियों और कुत्तों को सुला दो. (२) प्रोष्ठेशयास्तल्पेशया नारीर्या वह्यशीवरीः. स्त्रियो याः पुण्यगन्धयस्ताः सर्वाः स्वापयामसि.. (३) जो स्त्रियां आंगन में अथवा पलंग पर सो रही हैं अथवा जो स्त्रियां झूले आदि में सोने की अभ्यस्त हैं और उत्तम गंध वाली हैं, उन सब को मैं सुलाता हूं. (३) एजदेजदजग्रभं चक्षुः प्राणमजग्रभम्. अङ्गान्यजग्रभं सर्वा रात्रीणामतिशर्वरे.. (४) सभी गतिशील प्राणियों को मैं ने सुला दिया. उन के नेत्र और नासिका निद्रा द्वारा गृहीत हैं. उन के हस्त, चरण आदि को भी मैं ने निद्रा मग्न करा दिया है. यह सब मध्य रात्रि के समय किया है, जब अंधकार की अधिकता होती है. (४) य आस्ते यश्चरति यश्च तिष्ठन् विपश्यति. तेषां सं दध्मो अक्षीणि यथेदं हर्म्यं तथा.. (५) हमारे संचरण के समय जो मार्ग में बैठा है तथा जो ठहर कर देख रहा है, मैं उन सब की आंखें इस प्रकार बंद करता हूं, जिस प्रकार दिखाई देने वाला यह भवन देखने में असमर्थ है. (५) स्वप्तु माता स्वप्तु पिता स्वप्तु श्वा स्वप्तु विशपतिः. स्वपन्त्वस्यै ज्ञातयः स्वप्त्वयमभितो जनः.. (६) जिस स्त्री को निद्रित कर के हम वश में करने के इच्छुक हैं, उस की माता सब से पहले सो जाए. इस के पश्चात उस का पिता, घर की रक्षा करने वाला कुत्ता और घर का स्वामी उस का पति भी सो जाए. उस के बंधुबांधव एवं उस के घर की रक्षा के लिए नियुक्त चारों ओर स्थित जन भी सो जाएं. (६) स्वप्न स्वप्नाभिकरणेन सर्वं नि ष्वापया जनम्. ओत्सूर्यमन्यान्त्स्वापायाव्युषं जागृतादहमिन्द्र इवारिष्टो अक्षितः.. (७) हे स्वप्न के देव! शय्या आदि पर सोने वाले इन जनों को तथा अन्य व्यक्तियों को सूर्योदय तक निद्रा मग्न रखो. सब के सो जाने पर हिंसा और क्षय से रहित हो कर इंद्र के समान मैं भोग में संलग्न रहूं एवं जागरण करूं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-६ देवता—ब्राह्मण आदि ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः. स सोमं प्रथमः पपौ स चकारारसं विषम्.. (१) सर्पों में सब से पहले तक्षक उत्पन्न हुआ, जो मनुष्यों में ब्राह्मण के समान सर्पों में पूज्य था. उस के दस शीश और दस मुख थे. क्षत्रिय आदि जातियों वाले सर्पों से पहले उत्पन्न होने के कारण तक्षक ने सब से पहले स्वर्गलोक में स्थित अमृत पिया. सोम अर्थात् अमृत पीने वाला ब्राह्मण तक्षक कंद मूल आदि से उत्पन्न रस को विष के प्रभाव से हीन बनाए. (१) यावती द्यावापृथिवी वरिम्णा यावत् सप्त सिन्धवो वितष्ठिरे. वाचं विषस्य दूषणीं तामितो निरवादिषम्.. (२) धरती और आकाश का जितना विस्तार है तथा सागर जितने परिमाण में स्थित है, मैं इन दोनों स्थानों में स्थित कंद, मूल, फल से उत्पन्न विष को नष्ट करने वाले मंत्रों से युक्त वाणी का उच्चारण करता हूं. (२) सुपर्णस्त्वा गरुत्मान् विष प्रथममावयत्. नामीमदो नारूरुप उतास्मा अभवः पितुः.. (३) हे विष! सब से पहले सुंदर पंखों वाले गरुड़ ने तुम्हें खाया था. इस कारण तू इस पुरुष को मतवाला मत बना एवं विमूढ़ मत कर. हे विष! तू इस के लिए अन्न बन जा. (३) यस्त आस्यत् पञ्चाङ्गुरिर्वक्राच्चिदधि धन्वनः. अपस्कम्भस्य शल्यान्निरवोचमहं विषम्.. (४) पांच अंगुलियों वाले जिस हाथ ने डोरी चढ़े हुए होने के कारण झुके हुए धनुष के द्वारा पुरुष के शरीर में विष को पहुंचाया है, उस हाथ को मैं सुपारी वृक्ष के टुकड़े से मंत्रों की सहायता से प्रभावहीन करता हूं. (४) शल्याद् विषं निरवोचं प्राञ्जनादुत पर्णधेः. अपाष्ठाच्छृङ्गात् कुल्मलान्निरवोचमहं विषम्.. (५) बाणों में लगे फल से जिस विष ने शरीर में प्रवेश किया, उसे मैं मंत्र बल से बाहर निकालता हूं. विषैले पत्तों वाले वृक्ष से, लेप से, पत्तों से, पशु के सींग से एवं मल से जो विष उत्पन्न हुआ है, उसे मैं अपने मंत्र बल से शरीर से अलग करता हूं. (५) अरसस्त इषो शल्यो ऽ थो ते अरसं विषम्. उतारसस्य वृक्षस्य धनुष्टे अरसारसम्.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

हे बाण! तेरा विष बुझा हुआ फल विष रहित हो जाए. इस के बाद तेरा विष प्रभावहीन हो जाए. सारहीन वृक्ष से बना हुआ और तुझ से संबंधित धनुष भी प्रभावहीन हो जाए. (६) ये अपीषन् ये अदिहन् य आस्यन् ये अवासृजन्. सर्वे ते वध्रयः कृता वध्रिर्विषगिरिः कृतः.. (७) जो लोग विषपूर्ण जड़ीबूटियों को पीस कर खिलाते हैं, जो लोग लेप के रूप में विष का प्रयोग करते हैं, जो विष को दूर से फेंकते हैं तथा जो समीप रह कर अन्न, फल आदि में विष मिला देते हैं, मैं ने अपने मंत्र के प्रभाव से इन सब को शक्तिहीन बना दिया है. जिन पर्वतों पर कंद मूल के रूप में विष उत्पन्न होता था, उन्हें भी मैं ने शक्तिहीन कर दिया है. (७) वध्रयस्ते खनितारो वध्रिस्त्वमस्योषधे. वध्रिः स पर्वतो गिर्यतो जातमिदं विषम्.. (८) हे विषयुक्त जड़ीबूटी! तुझे खोदने वाले शक्तिहीन हो जाएं तथा मेरे मंत्र के प्रभाव से तू भी प्रभावहीन हो जा. जिन पर्वतों पर विषैले कंदमूल उत्पन्न होते हैं, वे भी शक्तिहीन हो जाएं. (८) सूक्त-७ देवता—वनस्पति वारिदं वारयातै वरणावत्यामधि. तत्रामृतस्यासिक्तं तेना ते वारये विषम्.. (१) वारण वृक्ष जहां उत्पन्न होते हैं, उस वारणावती का विषहारी जल हम मनुष्यों के विष को दूर करता है. उस जल में स्वर्ग स्थित अमृत का विषनाशक प्रभाव विद्यमान है. इस कारण मैं उस अमृतमय जल से तेरे कंद, मूल आदि से उत्पन्न विष को दूर करता हूं. (१) अरसं प्राच्यं विषमरसं यदुदीच्यम्. अथेदमशराच्यं करम्भेण वि कल्पते.. (२) मेरी मंत्र शक्ति से पूर्व दिशा और उत्तर दिशा में उत्पन्न होने वाला विष प्रभावहीन हो जाए. दक्षिण, पश्चिम तथा नीचे की दिशा में उत्पन्न होने वाले विष करंभ (भात) से सामर्थ्यहीन हो जाए. (२) करम्भं कृत्वा तिर्यं पीबस्पाकममुदारथिम्. क्षुधा किल त्वा दुष्टनो जक्षिवान्त्स न रूरुपः.. (३) हे दुष्ट शरीर वाले विष! बिना जाने हुए खाया हुआ तू चरबी को जलाने वाला और उदर संबंधी रोगों का जनक है. इस पुरुष ने तुझे करंभ (भात) समझ कर खाया था. तू इस पुरुष को मूर्च्छित मत बना. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

वि ते मदं मदावति शरमिव पातयामसि. प्र त्वा चरुमिव येषन्तं वचसा स्थापयामसि.. (४) हे मूर्च्छित करने वाली जड़ीबूटी! तेरे मूर्च्छा लाने वाले विष को मैं शरीर से इस प्रकार दूर करता हूं, जिस प्रकार धनुष से छूटा हुआ बाण दूर गिरता है. हे विष! तू गुप्त रूप से जाने वाले दूत के समान शरीर के अंगों में व्याप्त हो जाता है. मैं अपनी मंत्र शक्ति से तुझे शरीर से निकाल कर दूर करता हूं. (४) परि ग्राममिवाचितं वचसा स्थापयामसि. तिष्ठा वृक्ष इव स्थामन्यभिखाते न रूरुप:.. (५) हे खोदने से प्राप्त होने वाली जड़ीबूटी! जनसमूह के समान प्रभावशाली तेरे विष को भी हम अपनी मंत्र शक्ति के द्वारा शरीर से निकाल कर दूर स्थापित करते हैं. तू अपने स्थान पर वृक्ष के समान निश्चल रह तथा इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (५) पवस्तैस्त्वा पर्यक्रीणन् दूर्शीभिरजिनैरुत. प्रक्रीरसि त्वमोधे ऽ भ्रिखाते न रूरुप:.. (६) हे विषमूलक जड़ीबूटी! महर्षियों ने तुझे झाड़ू के तिनकों के बदले खरीदा है. तू हरिण आदि पशुओं के चर्म के बदले क्रय की गई है. तू बड़े परिश्रम से खरीदी गई है, इसलिए यहां से दूर हो जा और इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (६) अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे. वीरान् नो अत्र मा दभन् तद् व एतत् पुरो दधे.. (७) हे पुरुषो! तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करने वाले शत्रुओं ने पहले जो यज्ञ आदि कर्म किए हैं, उन कर्मों के द्वारा वे हमारे पुत्र, पौत्र आदि को इस स्थान पर हिंसित न करें. किया जाता हुआ यह चिकित्सा कर्म मैं उन की रक्षा के लिए तुम्हारे सामने उपस्थित करता हूं. (७) सूक्त-८ देवता—जल भूतो भूतेषु पय आ दधाति स भूतानामधिपतिर्बभूव. तस्य मृत्युश्चरति राजसूयं स राजा राज्यमनु मन्यतामिदम्.. (१) अभिषेक द्वारा ऐश्वर्य प्राप्त करने वाला राजा ही समृद्ध जनपदों में भोज्य सामग्री पहुंचाता है. इस प्रकार वह प्राणियों का स्वामी हुआ. मृत्यु के देव यमराज दुष्टों को दंड दिलाने और सज्जनों का पालन करने के लिए ही राजा का राजसूय यज्ञ कराते हैं. वह राजा इस राज्य को तथा दुष्ट निग्रह और सज्जन परिपालन के कर्म को स्वीकार करे. (१) अभि प्रेहि माप वेन उग्रश्चेत्ता सपत्नहा. ebook converter DEMO Watermarks*

आ तिष्ठ मित्रवर्धन तुभ्यं देवा अधि ब्रुवन्.. (२) हे राजा! तुम सिंहासन तथा हाथी, रथ, घोड़ा आदि सवारियों के प्रति अनिच्छा मत करो. तुम शक्तिशाली एवं कार्य अकार्य का ज्ञान रखने वाले हो. तुम शत्रु हंता हो, राजसिंहासन पर बैठ कर तुम मित्रों का कल्याण करो. इंद्र आदि देव तुम्हें अपना कहें. (२) आतिष्ठन्तं परि विश्वे अभूषञ्छ्रियं वसानश्चरति स्वरोचिः. महत् तद् वृष्णो असुरस्य नामा विश्वरूपो अमृतानि तस्थौ.. (३) सिंहासन पर बैठे हुए राजा की सब लोग सेवा करें. राजा भी सिंहासन पर बैठ कर राज्यलक्ष्मी को धारण करे, तेजस्वी बने तथा प्रजा पालन में तत्पर हो. अभिषेक से उत्पन्न राज्यतेज दसों दिशाओं में फैल जाए. शत्रुओं को दूर भगाने वाले राजा के नाममात्र से शत्रु भयभीत होने लगें. यह राजा शत्रु, मित्र, पत्नी आदि के प्रति विविध प्रकार का व्यवहार करता हुआ दंड, युद्ध, अध्ययन आदि कर्म करे. (३) व्याघ्रो अधि वैयाघ्रे वि क्रमस्व दिशो महीः. विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्त्वापो दिव्याः पयस्वतीः.. (४) हे राजा! तुम व्याघ्रचर्म पर बैठ कर और बाघ के समान अपराजेय हो कर पूर्व आदि विशाल दिशाओं को जीतो. तेजस्वी होने के कारण सारी प्रजाएं तुम्हारी कामना करें तथा दिव्य जल तुम्हारे राज्य को प्राप्त हो, जिस से तुम्हारे राज्य में अकाल न पड़े. (४) या आपो दिव्याः पयसा मदन्त्यन्तरिक्ष उत वा पृथिव्याम्. तासां त्वा सर्वासामपामभि षिञ्चामि वर्चसा.. (५) हे राजा! आकाश से बरसने वाले जो जल अपने रस से, प्राणियों को तृप्त करते हैं, अंतरिक्ष और पृथ्वी पर जो जल स्थित हैं, मैं तीनों लोकों में स्थित इन जलों से तुम्हारा अभिषेक करता हूं. (५) अभि त्वा वर्चसासिचन्नापो दिव्याः पयस्वतीः. यथासो मित्रवर्धनस्तथा त्वा सविता करत्.. (६) हे राजा! दिव्य जल अपने तेज से तुम्हें सींचे, जिस से तुम मित्रों के बढ़ाने वाले बनो. सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव तुम्हें सामर्थ्य दें. (६) एना व्याघ्रं परिषस्वजानाः सिंहं हिन्वन्ति महते सौभगाय. समुद्रं न सुभुवस्तस्थिवांसं मर्मृज्यन्ते द्वीपिनमप्स्व १ न्तः.. (७) नदी के रूप में जल जिस प्रकार सागर को प्रसन्न करते हैं, उसी प्रकार दिव्य जल राजा को शक्तिशाली बनाएं. जिस प्रकार माता पुत्र का आलिंगन करती है, उसी प्रकार महान ebook converter DEMO Watermarks*

एहि जीवं त्रायमाणं पर्वतस्यास्यक्ष्यम्.

सौभाग्य प्राप्त करने के लिए जल राजा को शक्तिपूर्ण बनाते हैं. जल में वर्तमान गैंडे के समान अपराजेय राजा को सेवक जन अभिषेक के द्वारा और वस्त्राभूषणों से अलंकृत करें. (७) सूक्त-९ देवता—त्रैककुदांजन एहि जीवं त्रायमाणं पर्वतस्यास्यक्ष्यम्. विश्वेभिर्देवैर्दत्तं परिधिर्जीवनाय कम्.. (१) हे अंजन मणि! तू त्रिककुद नामक पर्वत से जीवित प्राणियों की रक्षा के लिए आ. तू त्रिककुद पर्वत की आंख है. इंद्र आदि सभी देवों ने रोग रहित रहने के लिए तुझे चहारदीवारी के रूप में प्रदान किया है. (१) परिपाणं पुरुषाणां परिपाणं गवामसि. अश्वानामर्वतां परिपाणाय तस्थिषे.. (२) हे त्रिककुद् पर्वत पर उत्पन्न अंजन मणि! तू पुरुषों, गायों, घोड़ों और घोड़ियों की रक्षा के लिए स्थित है. (२) उतासि परिपाणं यातुजम्भनमाञ्जन. उतामृतस्य त्वं वेत्थाथो असि जीवभोजनमथो हरितभेषजम्.. (३) हे अंजन! तू राक्षस, पिशाच आदि से उत्पन्न पीड़ा का नाश करने वाला है. तू अमृत का सार जानता है. तू अनिष्ट निवारण करने के कारण जीवों का पालक है. तू पांडु रोग से उत्पन्न कालेपन को दूर करने वाला है. (३) यस्याञ्जन प्रसर्पस्यङ्गमङ्गं परुष्परुः. ततो यक्ष्मं वि बाधस उग्रो मध्यमशीरिव.. (४) हे अंजन! तू जिस पुरुष के शरीर के सभी अंगों और अंगों की संधियों में प्रवेश कर के व्याप्त होता है, उस के शरीर से तू यक्ष्मा रोग को इस प्रकार दूर करता है, जिस प्रकार शक्तिशाली वायु मेघों के जल को क्षणमात्र में दूर ले जाती है. (४) नैनं प्राप्नोति शपथो न कृत्या नाभिशोचनम्. नैनं विष्कन्धमश्नुते यस्त्वा बिभर्त्याञ्जन.. (५) हे अंजन! जो पुरुष तुझे धारण करता है, उस तक दूसरे के द्वारा प्राप्त किया हुआ पाप नहीं पहुंचता तथा दूसरे व्यक्तियों द्वारा किए गए अभिचार से उत्पन्न कृत्या नाम की राक्षसी भी उस तक न पहुंचे. कृत्या से उत्पन्न शोक भी तुझे प्राप्त न हो तथा विघ्न भी उस तक न पहुंचे. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

असन्मन्त्राद् दुष्ष्वप्न्याद् दुष्कृताच्छमलादुत. दुर्हर्दश्चक्षुषो घोरात् तस्मान्नः पाह्याञ्जन.. (६) हे अंजन मणि! अभिचार संबंधी बुरे मंत्रों से उत्पन्न दुःख से, बुरे स्वप्नों से प्राप्त दुःख से, पूर्वजन्म में किए हुए पाप से, दूसरे के द्वारा किए हुए पाप से, दूषित मन से तथा दूसरों के क्रूर नेत्र से हमारी रक्षा करो. (६) इदं विद्वानाञ्जन सत्यं वक्ष्यामि नानृतम्. सनेयमश्वं गामहमात्मानं तव पूरुष.. (७) हे अंजन! तेरी महिमा को जानता हुआ मैं यथार्थ ही कहूंगा, असत्य नहीं बोलूंगा. तुम्हारा दास बन कर मैं घोड़ा, गाय एवं जीवन को प्राप्त करूं. (७) त्रयो दासा आञ्जनस्य तक्मा बलास आदहिः. वर्षिष्ठः पर्वतानां त्रिककुन्नाम ते पिता.. (८) कठिनता से जीवित रखने वाला ज्वर, सन्निपात और सर्प का विष—ये तीन दास के समान अंजन मणि के वश में हैं. अर्थात् अंजनमणि इन के विकार को दूर कर देती है. पर्वतों में सब से प्राचीन त्रिककुद तुम्हारा पिता है. (८) यदाञ्जनं त्रैककुदं जातं हिमवतस्परि. यातूंश्च सर्वाञ्जम्भयत् सर्वाश्च यातुधान्यः.. (९) हिमालय पर्वत के ऊपर के भाग में त्रिककुद नाम का पर्वत है. वहां उत्पन्न अंजन वृक्ष सभी राक्षसों और सभी राक्षसियों को नष्ट करे. (९) यदि वासि त्रैककुदं यदि यामुनमुच्यसे. उभे ते भद्रे नाम्नी ताभ्यां नः पाह्याञ्जन.. (१०) हे अंजन! तू मनुष्यों द्वारा चाहे त्रिककुद पर्वत से संबंधित कहा जाता है अथवा यमुना से संबंधित. तेरे त्रैककुद और यामुन दोनों ही नाम कल्याणकारी हैं. तू अपने दोनों नामों के द्वारा हमारी रक्षा कर. (१०) सूक्त-१० देवता—शंखमणि, तृशन वाताज्जातो अन्तरिक्षाद् विद्युतो ज्योतिषस्परि. स नो हिरण्यजाः शङ्खः कृशनः पात्वंहसः.. (१) वायु से उत्पन्न, अंतरिक्ष से उत्पन्न, बिजली से उत्पन्न, ज्योति मंडल के ऊपर के स्थान से उत्पन्न तथा स्वर्ग से उत्पन्न शंख पाप से हमारी रक्षा करे. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

यो अग्रतो रोचनानां समुद्रादधि जज्ञिषे. शङ्खेन हत्वा रक्षांस्यत्रिणो वि षहामहे.. (२) हे शंख! तू प्रकाशित होने वाले नक्षत्रों के आगे वर्तमान होता है तथा सागर के ऊपर वाले भाग पर जन्म लेता है. हम तेरे द्वारा राक्षसों और पिशाचों को पराजित करते हैं. (२) शङ्खेनामीवाममतिं शङ्खेन्रोत सदान्वा:. शङ्खो नो विश्वभेषज: कृशन: पात्वंहस:.. (३) हम मणि के रूप में प्राप्त शंख से रोग और सभी अनर्थों के मूल अज्ञान के साथसाथ दरिद्रता को भी पराजित करते हैं. सभी उपद्रवों का विनाशक और स्वर्ण से उत्पन्न शंख पाप से हमारी रक्षा करे. (३) दिवि जातः समुद्रजः सिन्धुतस्पर्याभृतः. स नो हिरण्यजा: शङ्ख आयुष्यतरणो मणि:.. (४) शंख पहले स्वर्गलोक में और उस के बाद समुद्र में उत्पन्न हुआ. नदी के उद्गम स्थान से लाया हुआ तथा स्वर्ण निर्मित शंख और शंख से निर्मित मणि हमारी आयु वृद्धि करने वाली हो. (४) समुद्राज्जातो मणिवृ॑त्राज्जातो दिवाकर:. सो अस्मान्त्सर्वतः पातु हेत्या देवासुरेभ्य:.. (५) समुद्र अथवा आकाश से उत्पन्न मणि शंख का उपादान है अर्थात् मणि से ही शंख का निर्माण होता है. यह मणि निर्मित शंख बादलों से बाहर निकले सूर्य के समान चमकता है. शंख से निर्मित यह मणि हमें देवों और असुरों के भय से बचाए. (५) हिरण्यानामेको ऽ सि सोमात् त्वमधि जज्ञिषे. रथे त्वमसि दर्शत इषधौ रोचनस्त्वं प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६) हे शंख! तू स्वर्ण, रजत आदि भास्वर द्रव्यों में प्रमुख है, क्योंकि तू अमृतमय चंद्रमंडल से उत्पन्न हुआ है. युद्धों में तू रथों पर दिखाई देने योग्य है. तरकश में भरा हुआ तू दीप्त दिखाई देता है. इस प्रकार का शंख अथवा शंख से निर्मित मणि हमारी आयु को बढ़ाए. (६) देवानामस्थि कृशनं बभूव तदात्मन्वच्चरत्यप्स्व १ न्तः. तत् ते बध्नाम्यायुषे वर्च॑से बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय कार्शनस्त्वाभि रक्षतु.. (७) इंद्र आदि देवों का जो रक्षक था, वह स्वर्ण शंख का कारण हुआ अर्थात् स्वर्ण से शंख का निर्माण हुआ. वह स्वर्ण शंख के रूप में शरीर धारण कर के जलों के भीतर विद्यमान ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-११ देवता—इंद्र के रूप में

रहता है. हे यज्ञोपवीतधारी ब्रह्मचारी! मैं इस प्रकार से शंख के रूप में स्थित स्वर्ण को तेरे शरीर में चिरकाल जीवन के लिए बांधता हूं. यह स्वर्ण संबंधी मणि तुझे शक्ति, तेज एवं दीर्घ आयु प्रदान करने के साथसाथ सौ वर्ष तक तेरी रक्षा करे. (७) सूक्त-११ देवता—इंद्र के रूप में अनड्वान् अनड्वान् दाधार पृथिवीमुत द्यामनड्वान् दाधारोर्व १ न्तरिक्षम्. अनड्वान् दाधार प्रदिशः षडुर्वीरनड्वान् विश्वं भुवनमा विवेश.. (१) गाड़ी ढोने में समर्थ बैल हल जोतने आदि के कारण पृथ्वि का पोषक है. वही बैल चरु, पुरोडाश आदि की उत्पत्ति में सहायक होने के कारण आकाश और अंतरिक्ष को भी धारण करता है. पूर्व आदि महा दिशाओं का पोषण कर्ता भी यही धर्म रूपी बैल है. इस प्रकार ब्रह्मा द्वारा बनाया गया यह बैल पृथ्वि आदि सभी लोकों की रक्षा के लिए उन में प्रवेश कर के स्थित रहता है. (१) अनड्वानिन्द्रः स पशुभ्यो वि चष्टे त्र्याञ्छक्रो वि मिमीते अध्वनः. भूतं भविष्यद् भुवना दुहानः सर्वा देवानां चरति व्रतानि.. (२) यह बैल इंद्र है. इसलिए सभी पशुओं की अपेक्षा अधिक तेजस्वी है. जिस प्रकार बैल अविच्छिन्न रूप से संतान उत्पन्न करता है, इंद्र उसी प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमान वस्तुओं को उत्पन्न करता हुआ अन्य देवों के कार्य करता है. (२) इन्द्रो जातो मनुष्येष्वन्तर्घर्मस्तप्तश्चरति शोशुचानः. सुप्रजाः सन्तस उदारे न सर्षद् यो नाश्नीयादनडुहो विजानन्.. (३) मनुष्यों में वह बैल इंद्र के समान है. वह बैल धर्म है. वह सूर्य के रूप में सारे जगत् को ऊर्जा एवं प्रकाश देता हुआ विचरण करता है. जो हमारे द्वारा बैल को दिया गया महत्त्व विशेष रूप से जानता है, वह सभी सुखों को भोगता है और शोभन संतान युक्त हो कर देह त्याग करने के बाद संसार में नहीं आता. (३) अनड्वान् दुहे सुकृतस्य लोक ऐनं प्याययति पवमानः पुरस्तात्. पर्जन्यो धारा मरुत ऊधो अस्य यज्ञः पयो दक्षिणा दोहो अस्य.. (४) इंद्र देव रूपी यह बैल यज्ञ आदि पुण्य से प्राप्त लोकों में अधिक फल देता है. यज्ञ के आरंभ में शोधन किया गया यह अमृतमय सोम इस बैल को रस से भर देता है. वृष्टि प्रेरकदेव दुग्ध की धारा है. उनचास पवन ऐन हैं, सभी प्रकार का यज्ञ इस का दूध है और यज्ञ में दी गई दक्षिणा ही दुहने की क्रिया है. इस प्रकार इस इंद्र और धर्म रूपी बैल का दोहन अक्षय होता है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

यस्य नेशे यज्ञपतिर्न यज्ञो नास्य दातेशे न प्रतिग्रहीता. यो विश्वजिद् विश्वभृद् विश्वकर्मा घर्मं नो ब्रूत यतमश्चतुष्पात्.. (५) यजमान इस देवता रूप बैल का स्वामी नहीं है. यज्ञ, दान देने वाला और दान ग्रहण करने वाला भी इस का स्वामी नहीं है. यह विश्व को जीतने वाला तथा विश्व का भरणपोषण करने वाला है. समस्त विश्व इसी का कार्य है. चार चरणों वाला यह वृषभ हमें तेजस्वी सूर्य का स्वरूप बताता है. (५) येन देवाः स्वरारुरुहुर्हित्वा शरीरममृतस्य नाभिम्. तेन गेष्म सुकृतस्य लोकं घर्मस्य व्रतेन तपसा यशस्यवः.. (६) इस वृषभ रूप धर्म की सहायता से देवगण शरीर त्याग कर स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं. वह स्वर्ग अमृत की नाभि है. इस वृषभ की सहायता से हम पुण्य के फल के रूप में प्राप्त भूलोक पर विजय करते हैं. दीप्ति वाले सूर्य से संबंधित वृत्त के द्वारा हम आदित्य के सुख की इच्छा करते हैं. (६) इन्द्रो रूपेणाग्निर्वहेन प्रजापतिः परमेष्ठी विराट्. विश्वानरे अक्रमत वैश्वानरे अक्रमतानडुह्यक्रमत. सो ऽ दृंहयत सो ऽ धारयत.. (७) यह वृषभ आकृति से इंद्र तथा अपने कंधे से अग्नि के समान है. इस प्रकार यह वृषभ प्रजापति रूप है. (७) मध्यमेतदनडुहो यत्रैष वह आहितः. एतावदस्य प्राचीनं यावान् प्रत्यङ् समाहितः.. (८) इस वृषभ के शरीर में प्रजापति ब्रह्म प्रविष्ट हैं. उन्होंने इस के शरीर के मध्य भाग को भार वहन करने योग्य बनाया है. इस के मध्य भाग में भार रखा है. इस के अगले और पिछले दोनों भाग समान हैं. (८) यो वेदानडुहो दोहान्त्सप्तानुपदस्वतः. प्रजां च लोकं चाप्नोति तथा सप्तऋषयो विदुः.. (९) जो पुरुष इस बैल के क्षय रहित जौ आदि रूप सात दोहनों को जानता है, वह पुत्र, पौत्र आदि संतान तथा स्वर्ग आदि लोकों को प्राप्त करता है. इस बात को सप्त ऋषि जानते हैं. (९) पद्भिः सेदिमवक्रामन्निरां जङ्घाभिरुत्खिदन्. श्रमेणानड्वान् कीलालं कीनाशश्चाभि गच्छतः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

यह प्रजापति रूप वृषभ निराशा उत्पन्न करने वाली दरिद्रता को अपने चारों चरणों से औंधे मुंह गिरा कर अपनी जंघाओं से धरती को खोदता है. यह बैल अपने श्रम से किसान को अन्न देता है. (१०) द्वादश वा एता रात्रीर्व्रत्या आहुः प्रजापतेः. तत्रोप ब्रह्म यो वेद तद् वा अनडुहो व्रतम्.. (११) इस वृषभ में व्याप्त यज्ञात्मक प्रजापति के व्रत के योग्य बारह रात्रियों को विद्यमान बताते हैं. उन रात्रियों में प्रजापति रूपी वृषभ को जो जानता है, वही इस व्रत का अधिकारी है. (११) दुहे सायं दुहे प्रातर्दुहे मध्यन्दिनं परि. दोहा ये अस्य संयन्ति तान् विद्वांनुपदस्वतः.. (१२) ऊपर बताए गए लक्षणों वाले वृषभ को मैं सायंकाल, प्रातःकाल और दोपहर के समय दुहता हूं. मैं सभी यज्ञों के अनुष्ठान के फलों को भी दुहता हूं. इस वृषभ के जो दोहन फल प्रदान करते हैं, उन्हें मैं जानता हूं. (१२) सूक्त-१२ देवता—रोहिणी वनस्पति रोहण्यसि रोहण्यस्थ्नश्छिन्नस्य रोहिणी. रोहयेदमरुन्धति.. (१) हे लाल रंग वाली लाख! तू घाव को भरने वाली है, इसलिए तू तलवार की धार से कटे हुए इस अंग से बहते रक्त को उसी स्थान पर रोक दे. हे अरुंधती देवी! तू इस रक्त निकले हुए अंग को रक्त युक्त एवं बिना घाव वाला बना. (१) यत् ते रिष्टं यत् ते द्युत्तमस्ति पेष्ट्रं त आत्मनि. धाता तद् भद्रया पुनः सं दधत् परुषा परुः.. (२) हे शस्त्र से घायल पुरुष! तेरा जो अंग घायल और शस्त्र प्रहार की वेदना से जल रहा है तथा तेरा जो अंग मुगदर आदि के प्रहार से भग्न हो गया है, विधाता तेरे उन अंगों को लाख के द्वारा जोड़ दे. (२) सं ते मज्जा मज्ज्ञा भवतु समु ते परुषा परुः. सं ते मांसस्य विस्रस्तं समस्थ्यपि रोहतु.. (३) हे घायल पुरुष! तेरे शरीर की जो चरबी चोट से विभक्त हो गई है, वह जुड़ जाए और तू सुख का अनुभव करे. तेरे शरीर की टूटी हुई हड्डी भी जुड़ जाए. प्रहार के घाव से कटा हुआ मांस सुखपूर्वक उत्पन्न हो जाए तथा तेरे शरीर की टूटी हुई हड्डी सुख से जुड़ जाए. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

मज्जा मज्ज्ञा सं धीयतां चर्मणा चर्म रोहतु. असृक् ते अस्थि रोहतु मांसं मांसेन रोहतु.. (४) तेरी चरबी से चरबी मिल जाए. चमड़ा चमड़े से मिल जाए और तेरे शरीर से टपकता हुआ रक्त मंत्र और ओषधि के प्रभाव से पुनः हड्डी को प्राप्त हो. तेरा मांस मांस से मिल जाए. (४) लोम लोम्ना सं कल्पया त्वचा सं कल्पया त्वचम्. असृक् ते अस्थि रोहतु च्छिन्नं सं धेह्योषधे.. (५) हे लाख नाम की ओषधि! तू प्रहार के कारण शरीर से पृथक् त्वचा को त्वचा से मिला दे. हे घायल पुरुष! तेरी हड्डियों पर रक्त दौड़ने लगे. हे ओषधि! शरीर का जो भी कटा हुआ भाग है, उसे जोड़ कर दैनिक गतिविधियों में सक्षम बना. (५) स उत् तिष्ठ प्रेहि प्र द्रव रथः सुचक्रः सुपविः सुनाभिः. प्रति तिष्ठोर्ध्वः.. (६) हे शस्त्र के प्रहार से घायल पुरुष! मंत्र और ओषधि की शक्ति से तेरा घायल अंग स्वस्थ हो गया है. तू चारपाई से उठ कर उसी प्रकार तेजी से दौड़, जिस प्रकार रथ उत्तम पहियों और दृढ़ धुरों से युक्त हो कर तेजी से चलता है. (६) यदि कर्तं पतित्वा संशश्रे यदि वाश्मा प्रहृतो जघान. ऋभू रथस्येवाङ्गानि सं दधत् परुषा परुः.. (७) हे पुरुष! यदि काटने वाला आयुध तेरे शरीर पर गिर कर उस को काट रहा है अथवा दूसरों के द्वारा फेंका हुआ पत्थर तुझे चोट पहुंचा रहा है, तेरे शरीर के उन अंगों को मंत्र और ओषधि का प्रभाव उसी प्रकार स्वस्थ बनाए, जिस प्रकार बढ़ई रथ के भिन्न अंगों को जोड़ कर एक कर देता है. (७) सूक्त-१३ देवता—विश्वे देव उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः. उतागश्चक्रुषं देवा देवा जीवयथा पुनः.. (१) हे देवो! यज्ञोपवीत संस्कार वाले इस बालक को धर्म पालन के विषय में सावधान करो. इसे अध्ययन से उत्पन्न ज्ञान आदि फल प्राप्त कराओ. हे देवो! इस ने अनुष्ठान न करने के रूप में जो पाप किया है, उस से इस की रक्षा करो. तुम इसे सौ वर्ष तक जीवित रखो. (१) द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावतः. दक्षं ते अन्य आवातु व्य १ न्यो वातु यद् रपः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

सागर और उस से भी दूर देश से आने वाली दोनों प्रकार की हवाएं चलें. प्राण और अपान वायु इस के शरीर में गति करें. हे उपनयन संस्कार वाले पुरुष! प्राण वायु तुझे बल प्रदान करे तथा अपान वायु तेरे पापों को दूर करे. (२) आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद् रपः. त्वं हि विश्वभेषज देवानां दूत ईयसे.. (३) हे वायु! सभी रोगों का विनाश करने वाली जड़ीबूटी लाओ तथा रोग उत्पन्न करने वाले पाप का विनाश करो. हे वायु! तुम सभी व्याधियों को दूर करने वाली हो, इसीलिए तुम्हें इंद्र आदि देवों का दूत कहा जाता है. (३) त्रायन्तामिमं देवास्त्रायन्तां मरुतां गणाः. त्रायन्तां विश्वा भूतानि यथायमरपा असत्.. (४) इंद्र आदि देव इस उपनयन संस्कार वाले ब्रह्मचारी की रक्षा करें. उनचास मरुत् इस की रक्षा करें. सभी प्राणी इस की इस प्रकार रक्षा करें, जिस से यह पाप रहित हो सके. (४) आ त्वागमं शन्तातिभिरथो अरिष्टातिभिः. दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते.. (५) हे उपनयन संस्कार वाले ब्रह्मचारी! मैं सुख देने वाले मंत्रों और कल्याणकारी कर्मों के साथ तेरे पास आया हूं. मैं तेरे लिए उग्र एवं समृद्धि देने वाला बल लाया हूं. मैं यक्ष्मा रोग को तुझ से दूर भगाता हूं. (५) अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तरः. अयं मे विश्वभेषजो ऽ यं शिवाभिमर्शनः.. (६) मुझ ऋषि का यह हाथ भाग्य वाला एवं भाग्यवालियों से भी अधिक उत्तम है. मेरा यह हाथ सभी रोगों को दूर करने वाली ओषधि है. इस का स्पर्श सुख देने वाला हो. (६) हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिह्वा वाचः पुरोगवी. अनामयित्नुभ्यां हस्ताभ्यां ताभ्यां त्वाभि मृशामसि.. (७) हे उपनयन संस्कार वाले बालक! प्रजापति के दस उंगलियों वाले हाथों के द्वारा निर्मित जीभ शब्दों के आगेआगे चलती है. सरस्वती का उस में अधिष्ठान है. प्रजापति के उन्हीं रोगनाशक हाथों से मैं तेरा स्पर्श करता हूं. (७) सूक्त-१४ देवता—अग्नि, आज्य अजो ह्य१ग्नेरजनिष्ट शोकात् सो अपश्यज्जनितारमग्रे. ebook converter DEMO Watermarks*

तेन देवा देवतामग्र आयन् तेन रोहान् रुरुहुर्मेध्यासः. (१) बकरा अग्नि के ताप से उत्पन्न हुआ था. उस ने सभी पशुओं की सृष्टि करने वाले प्रजापति को सब से पहले देखा. सृष्टि के आदि में इंद्र आदि देव उसी बकरे के कारण देवत्व को प्राप्त हुए. उसी बकरे को साधन बना कर अन्य ऋषि भी स्वर्ग आदि लोकों में पहुंचे. (१) क्रमध्वमग्निना नाकमुख्यान् हस्तेषु बिभ्रतः. दिवस्पृष्ठं स्वर्गत्वा मिश्रा देवेभिराध्वम्.. (२) हे मनुष्यो! तुम यज्ञ के निमित्त प्रज्वलित अग्नि के द्वारा दुःख रहित स्वर्ग में पहुंचो. अंतरिक्ष की पीठ के समान स्वर्ग में पहुंच कर तुम देवों के समान ऐश्वर्य प्राप्त करो तथा वहीं निवास करो. (२) पृष्ठात् पृथिव्या अहमन्तरिक्षमारुहमन्तरिक्षाद् दिवमारुहम्. दिवो नाकस्य पृष्ठात् स्व १ ज्योतिरगामहम्.. (३) मैं पृथ्वि की पीठ अर्थात् भूलोक से अंतरिक्षलोक पर और अंतरिक्ष से स्वर्गलोक पर चढ़ता हूं. दुःख रहित स्वर्ग की पीठ से मैं सूर्यमंडल में स्थित हिरण्यगर्भ रूपी ज्योति को प्राप्त करता हूं. (३) स्व १ र्यन्तो नापेक्षन्त आ द्यां रोहन्ति रोदसी. यज्ञं ये विश्वतोधारं सुविद्वांसो वितेनिरे.. (४) यज्ञ के फल से प्राप्त होने वाले स्वर्ग को जाने वाले लोग पुत्र, पशु आदि संबंधी सुख की इच्छा नहीं करते हैं. जो यजमान विश्व को धारण करने वाले यज्ञ को भलीभांति जानते हुए उस का विस्तार करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं. (४) अग्ने प्रेहि प्रथमो देवतानां चक्षुर्देवानामुत मानुषाणाम्. इयक्षमाणा भृगुभिः सजोषाः स्वर्येन्तु यजमानाः स्वस्ति.. (५) हे अग्नि देव! तुम देवों में मुख्य होने के कारण यज्ञ करने योग्य स्थान पर पहुंचो. अग्नि देव हवि पहुंचाने के कारण इंद्र आदि देवों को नेत्र के समान प्रिय हैं तथा मनुष्यों को यज्ञ के द्वारा पुण्यलोक का दर्शन कराते हैं. अग्नि के प्रकाश में यज्ञ करने के इच्छुक एवं यज्ञ करने वाले भृगुवंशी महर्षियों के साथ समान प्रीति वाले बन कर यज्ञ के फल के रूप में स्वर्ग प्राप्त करें. (५) अजमनज्मि पयसा घृतेन दिव्यं सुपर्णं पयसं बृहन्तम्. तेन गेष्म सुकृतस्य लोकं स्वरारोहन्तो अभि नाकमृत्तमम्.. (६) द्युलोक के योग्य एवं यजमान को स्वर्ग में पहुंचाने वाले बकरे को मैं रसयुक्त घी से ebook converter DEMO Watermarks*

चुपड़ता हूं. इस प्रकार के बकरे की सहायता से पुण्य के फल के रूप में मिलने वाले स्वर्गलोक को जाएं तथा दुःख के स्पर्श से शून्य हो कर उत्तम सूर्य ज्योति को प्राप्त करें. (६) पञ्चौदनं पञ्चभिरङ्गुलिभिर्दर्व्योद्धर पञ्चधैतमोदनम्. प्राच्यां दिशि शिरो अजस्य धेहि दक्षिणायां दिशि दक्षिणं धेहि पार्श्वम्.. (७) हे पाचक! पांच भागों में कटे हुए इस बकरे को अपनी पांच उंगलियों की सहायता से पकड़ी हुई कलछी के सहारे बटलोई से निकाल कर कुशों पर रखो. पांच भागों में विभाजित इस बकरे के पके हुए सिर को पूर्व दिशा में रखो तथा इस के शरीर के दाएं भाग को दक्षिण दिशा में स्थापित करो. (७) प्रतीच्यां दिशि भसदमस्य धेह्युत्तरस्यां दिश्युत्तरं धेहि पार्श्वम्. ऊर्ध्वायां दिश्य१जस्यानूकं धेहि दिशि ध्रुवायां धेहि पाजस्यमन्तरिक्षे मध्यतो मध्यमस्य.. (८) इस बकरे की कमर के पके हुए मांस को पश्चिम दिशा में तथा इस के बाएं भाग के मांस को उत्तर दिशा में रखो. इस की पीठ के मांस को ऊपर की दिशा में तथा पेट के मांस को नीचे की दिशा में रखो. इस के शरीर के मध्यवर्ती मांस को आकाश में स्थापित करो. (८) शृतमजं शृतया प्रोर्णुहि त्वचा सर्वैरङ्गैः सम्भृतं विश्वरूपम्. स उत् तिष्ठेतो अभि नाकमृत्तमं पद्भिश्चतुर्भिः प्रति तिष्ठ दिक्षु.. (९) अपने सभी अंगों से पूर्ण बने बकरे को सभी दिशाओं में व्याप्त करो. हे बकरे! तुम इस लीक से चारों पैरों के द्वारा स्वर्गलोक में चढ़ते हुए चारों दिशाओं को व्याप्त करो. (९) सूक्त-१५ देवता—दिशाएं समुत्पतन्तु प्रदिशो नभस्वतीः समभ्राणि वातजूतानि यन्तु. महऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु.. (१) पूर्व आदि दिशाएं वायु एवं मेघों से युक्त हो कर उदय हों. जल से भरे हुए मेघ वायु से प्रेरित हो कर परस्पर मिल जाएं. सांड के समान गर्जन करते हुए एवं वायु से प्रेरित मेघ द्वारा बरसाए गए जल धरती को तृप्त करें. (१) समीक्ष्यन्तु तविषाः सुदानवो ऽ पां रसा ओषधीभिः सचन्ताम्. वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिं पृथग् जायन्तामोषधयो विश्वरूपाः.. (२) महान् एवं शोभन गान वाले मरुद्गण वर्षा के द्वारा हम पर अनुग्रह करें. जलों के रस धरती में बोए गेहूं, जौ आदि के बीजों से मिल जाएं. वर्षा के जल की धाराएं धरती की पूजा ebook converter DEMO Watermarks*

करें. वर्षा द्वारा सिंचित भूमि से नाना प्रकार की जौ, गेहूं आदि फसलें जाति भेद से अलगअलग उत्पन्न हों. (२) समीक्ष्यस्व गायतो नभांस्यपां वेगासः पृथगुद् विजन्ताम्. वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिं पृथग् जायन्तां वीरुधो विश्वरूपाः.. (३) हे मरुद्गण! तुम स्तुति करते हुए हम लोगों को मेघों के दर्शन कराओ. वेग युक्त जल धाराएं इधरउधर बहें. वर्षा के जल की धाराएं धरती की पूजा करें. वर्षा द्वारा सिंचित भूमि से नाना प्रकार की जौ, गेहूं आदि फसलें जाति भेद से अलगअलग उत्पन्न हों. (३) गणास्त्वोप गायन्तु मारुताः पर्जन्य घोषिणः पृथक्. सर्गा वर्षस्य वर्षतो वर्षन्तु पृथिवीमनु.. (४) हे पर्जन्य अर्थात् वर्षा के देव! गर्जन करते हुए मरुतों का समूह तुम्हारी स्तुति करे. वर्षा के जल की बूंदें अनेक रूप धारण कर के पृथ्वी को गीला करें. (४) उदीरयत मरुतः समुद्रतस्त्वेषो अर्को नभ उत् पातयाथ. महर्ऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु.. (५) हे मरुतो! समुद्र से वर्षा का जल ऊपर उठाओ. दीप्तिशाली एवं जलयुक्त आकाश बादल को ऊपर उठाएं. सांड के समान गर्जन करते हुए एवं वायु से प्रेरित मेघ द्वारा बरसाए गए जल धरती को तृप्त करें. (५) अभि क्रन्द स्तनयार्दयोदधिं भूमिं पर्जन्य पयसा समङ्धि. त्वया सृष्टं बहुलमैतु वर्षमाशारैषी कृशगुरेत्वस्तम्.. (६) हे पर्जन्य! चारों ओर गर्जन करो एवं मेघों में प्रवेश कर के शब्द करो. तुम बरसे हुए जल से धरती को सींचो. तुम्हारे द्वारा प्रेरित गाढ़ा एवं वर्षा करने में समर्थ बादल आए. जल की धाराओं का इच्छुक एवं कृश किरणों वाला सूर्य छिप जाए. (६) सं वो ऽ वन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत. मरुद्भिः प्रच्युता मेघा वर्षन्तु पृथिवीमनु.. (७) हे मनुष्यो! शोभन दान वाले मरुत् तुम्हें तृप्त करें. अजगर से भी मोटी जल धाराएं उत्पन्न हों. वायु के द्वारा प्रेरित मेघ पृथ्वी पर वर्षा करें. (७) आशामाशां वि द्योततां वाता वान्तु दिशोदिशः. मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः सं यन्तु पृथिवीमनु.. (८) प्रत्येक दिशा में बिजली चमके और बादलों को लाने वाली हवाएं चलें. वायु के द्वारा ebook converter DEMO Watermarks*

प्रेरित मेघ पृथ्वी पर वर्षा करें. (८) आपो विद्युदभ्रं वर्षं सं वो ऽ वन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत. मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः प्रावन्तु पृथिवीमनु.. (९) हे शोभन दान वाले मरुतो! तुम से संबंधित मेघों का जल, बिजली, जल से भरे हुए मेघ तथा अजगर के समान मोटी जल धाराएं पृथ्वी पर प्रवाहित हों. (९) अपामग्निस्तनूभिः संविदानो य ओषधीनामधिपा बभूव. स नो वर्षं वनुतां जातवेदाः प्राणं प्रजाभ्यो अमृतं दिवस्परि.. (१०) बादलों में स्थित जलों के शरीर से मिली हुई बिजली रूपी अग्नि पैदा होने वाली जड़ीबूटियों की स्वामिनी है. उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता अग्नि देव प्रजाओं को जीवन देने वाली तथा स्वर्ग का अमृत प्राप्त कराने वाली वर्षा हमें प्रदान करें. (१०) प्रजापतिः सलिलादा समुद्रादाप ईरयन्नुदधिमर्दयाति. प्र प्यायतां वृष्णो अश्वस्य रेतो ऽ वर्डैतेन स्तनयित्नुनेहि.. (११) प्रजाओं के पालक सूर्य व्यापक सागर से जलों को वर्षा के निमित्त प्रेरित करते हुए पीड़ित करें. व्यापक एवं घोड़े के समान वेग वाले मेघ का वर्षा जल रूपी वीर्य वृद्धि को प्राप्त हो. हे पर्जन्य! तुम इस शक्तिशाली मेघ के द्वारा हमारे सामने आओ. (११) अपो निष्षिञ्चन्नसुरः पिता नः श्वसन्तु गर्गरा अपां वरुणाव नीचीरपः सृज. वदन्तु पृश्निबाहवो मण्डूका इरिणानु.. (१२) मेघों के जन्मदाता एवं वर्षा के जल के द्वारा सब के रक्षक सूर्य हमारे पिता हैं. वे वर्षा के जलों को नीचे गिराएं. इस के पश्चात गड़गड़ शब्द करती हुई जल धाराएं बहें. हे वरुण! तुम भी पृथ्वी को सींचने वाले जल मेघों से नीचे गिराओ. श्वेत भुजाओं वाले मेढक तृण रहित भूमि पर चेतना प्राप्त कर के शब्द करें. (१२) संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः. वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्र मण्डूका अवादिषुः.. (१३) एक वर्ष तक सोए रहने वाले मेढक वर्ष के अंत में वर्षा के जल से जागृत हो कर व्रतचारी ब्राह्मणों के समान पर्जन्य को प्रसन्न करने वाली वाणी बोलते हैं. (१३) उपप्रवद मण्डूकि वर्षमा वद तादुरि. मध्ये हृदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः.. (१४) हे मेढकी! तू प्रसन्नता को प्राप्त कर के टर्रटर्र शब्द कर. हे दर्दुरी! तू ऐसा शब्द कर कि

तेरे घोष से वर्षा होने लगे. वर्षा के जल से भरे हुए सरोवर के मध्य में तू अपने चारों पैरों को उछलने के अनुसार फैला कर छलांग लगा. (१४) खण्वखा ३ इ खैमखा ३ इ मध्ये तदुरि. वर्ष वनुध्वं पितरो मरुतां मन इच्छत.. (१५) हे खंडख, हे खेमख और हे तादुरी नामक मेढकियो! तुम तालाब के मध्य में रह कर अपने घोष से हमें वर्षा प्रदान करो. हे हमारे पालनकर्ता मंडूको! तुम अपने घोष से वायु का मन वश में कर लो. (१५) महान्तं कोशमुदचाभि षिञ्च सविद्युतं भवतु वातु वातः. तन्वतां यज्ञं बहुधा विसृष्टा आनन्दिनीरोषधयो भवन्तु.. (१६) हे पर्जन्य! तुम सागर से विशाल मेघ का उद्धार करो तथा मेघ की वर्षा से सारी धरती को सींचो. तुम उस मेघ को बिजली वाला बनाओ. हवा वर्षा के अनुकूल चले तथा हवा वर्षा के अनुकूल हो. वर्षा के द्वारा अनेक प्रकार से प्रेरित जल यज्ञ का विस्तार करे. जौ, गेहूं आदि फसलें वर्षा के जल से हर्षित हों. (१६) सूक्त-१६ देवता—वरुण बृहन्नेषामधिष्ठाता अन्तिकादिव पश्यति. यस्तायन्मन्यते चरन्त्सर्वं देवा इदं विदुः.. (१) महान वरुण इन शत्रुओं का नियंत्रण करते हुए इन के सभी अन्यायी जनों को समीप से देखते हैं. वरुण जगत् की स्थावर एवं जंगम सभी वस्तुओं को जानते हैं. अतींद्रिय ज्ञान के कारण देवगण स्थिर और नश्वर सभी तत्त्वों को जानते हैं. (१) यस्तिष्ठति चरति यश्च वञ्चति यो निलायं चरति यः प्रतङ्कम्. द्वौ संनिषद्य यन्मन्त्रयेते राजा तद् वेद वरुणस्तृतीयः.. (२) जो शत्रु सामने खड़ा होता है, जो चलता है, जो कुटिलतापूर्वक ठगता है, जो छिप कर प्रतिकूल आचरण करता है तथा जो शत्रु कष्टमय जीवन पा कर विरोध करता है, महान वरुण इन सभी शत्रुओं को समय से देखते हैं. दो व्यक्ति एकांत में बैठ कर जो गुप्त मंत्रणा करते हैं, उसे राजा वरुण तीसरे के रूप में जानते हैं. (२) उतेयं भूमिर्ररुणस्य राज्ञ उतासौ द्यौर्बृहती दूरेअन्ता. उतो समुद्रौ वरुणस्य कुक्षी उतास्मिन्नल्प उदके निलीनः.. (३) यह भूमि भी दुष्टों का निग्रह करने वाले स्वामी वरुण के वश में रहती है. समीप और दूर तक फैली हुई धरती भी उन्हीं के अधिकार में है. पूर्व और पश्चिम में वर्तमान सागर वरुण की ebook converter DEMO Watermarks*

कोख में है. इस प्रकार स्वल्प जल में भी सारा जगत् छिपा हुआ है. (३) उत यो द्यामतिसर्पात् परस्तान्न स मुच्यातै वरुणस्य राज्ञः. दिव स्पशः प्र चरन्तीदमस्य सहस्राक्षा अति पश्यन्ति भूमिम्.. (४) जो अनर्थकारी शत्रु पुण्य कर्मों से प्राप्त होने वाले स्वर्ग का अतिक्रमण कर के कुमार्ग पर चलता है, वह राजा वरुण के पाशों से न छूटे. स्वर्गलोक से निकलने वाले वरुण के गुप्तचर पृथ्वी पर घूमते हैं. वे हजार आंखों वाले होने के कारण भूलोक के सारे वृत्तांत को देखते हैं. (४) सर्वं तद् राजा वरुणो वि चष्टे यदन्तरा रोदसी यत् परस्तात्. संख्याता अस्य निमिषो जनानामक्षानिव श्वघ्नी नि मिनोति तानि.. (५) धरती और आकाश के मध्य में तथा राजा वरुण के सामने जो प्राणी रहते हैं, उन्हें वे विशेष रूप से देखते हैं. उन के भलेबुरे कर्मों की गणना करने वाले वरुण उन के कर्मों के अनुसार ऐसा दंड निश्चित करते हैं, जिस प्रकार जुआरी अपनी विजय के लिए पासे फेंकता है. (५) ये ते पाशा वरुण सप्तसप्त त्रेधा तिष्ठन्ति विषिता रुशन्तः. छिनन्तु सर्वे अनृतं वदन्तं यः सत्यवाद्यति तं सृजन्तु.. (६) हे वरुण! तुम्हारे उत्तम, मध्यम एवं अधम श्रेणी के सातसात पापियों के निग्रह के निमित्त जहांत्हां बंधे हुए हैं. वे पाश पापियों की हिंसा करते हुए स्थित हैं, वे पाश असत्य भाषण करने वाले हमारे शत्रु को काट दें और जो सत्यवादी है, उसे छोड़ दें. (६) शतेन पाशैरभि धेहि वरुणैनं मा ते मोच्यनृतवाङ् नृचक्षः. आस्तां जाल्म उदरं श्रंशयित्वा कोश इवाबन्धः परिकृत्यमानः.. (७) हे वरुण! अपने सौ पाशों से इस असत्यवादी को बांधो. हे मनुष्यों के भलेबुरे कर्मों को देखने वाले! असत्य बोलने वाला तुम से छूटने न पाए. बिना विचारे काम करने वाला अपने उदर को जलोदर रोग से दूषित पा कर तलवार की म्यान के समान झूलता रहे. (७) यः समाम्यो ३ वरुणो यो व्योम्यो ३ यः संदेश्यो ३ वरुणो यो विदेश्यः. यो दैवो वरुणो यश्च मानुषः.. (८) वरुण के सामान्य पाश समान रूप से एवं विशेष पाश विधि रूप से मनुष्यों को रोगी बनाते हैं. वरुण का जो पाश समान देश में तथा जो विदेश में बांधने वाला है, जो पाश देवों से संबंधित और जो मनुष्यों से संबंधित है, मैं उन सब पाशों से तुझे बांधता हूं. (८) तैस्त्वा सर्वैरभि ष्यामि पाशैरसावामुष्यायणामुष्याः पुत्र. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१७ देवता—अपामार्ग, वनस्पति

तानु ते सर्वाननुसंदिशामि.. (९) हे अमुक शत्रु, अमुक गोत्र वाले एवं अमुक के पुत्र, मैं तुझे वरुण के इन सभी पाशों से बांधता हूं. (९) सूक्त-१७ देवता—अपामार्ग, वनस्पति ईशानां त्वा भेषजानामुज्जेष आरभामहे. चक्रे सहस्रवीर्य सर्वस्मा ओषधे त्वा.. (१) हे सहदेवी! तू जड़ीबूटियों की स्वामिनी है. मैं शत्रु द्वारा किए गए अभिचार के दोष को शांत करने के लिए तेरा स्पर्श करता हूं. मैं अभिचार से उत्पन्न दोषों को दूर करने के लिए तुझे सामर्थ्य वाली बनाता हूं. (१) सत्यजितं शपथयावनीं सहमानां पुनःसराम्. सर्वाः समह्व्योषधीरिरतो नः पारयादिति.. (२) वास्तव में अभिचार आदि दोषों को दूर करने वाली सत्यजित, दूसरे के आक्रोश को मिटाने वाली शपथ योगिनी, सब को पराजित करने वाली सहमाना, बारबार व्याधि का विनाश करने वाली पुनःसरा नामक जड़ीबूटी को अन्य जड़ीबूटियां अभिचार दोष का नाश करने के लिए प्राप्त होती हैं. (२) या शशाप शपनेन याघं मूरमादधे. या रसस्य हरणाय जातमारेभे तोकमत्तु सा.. (३) जिस पिशाची ने आक्रोश में भर कर हमें शाप दिया है, जिस ने मूर्च्छा प्रदान करने वाला पाप हमारी ओर भेजा है और जो शरीर के रक्त आदि का हरण करने के लिए मेरे पुत्र आदि का आलिंगन करती है, वह मेरे ऊपर अभिचार करने वाले शत्रु के पुत्र को खा जाए. (३) यां ते चक्रुराम पात्रे यां चक्रुर्नीललोहिते. आमे मांसे कृत्यां यां चक्रुस्तया कृत्याकृतो जहि.. (४) हे कृत्या नाम की राक्षसी! अभिचार करने वालों ने तुझे मिट्टी के बिना पके पात्र में धुआं उगलती हुई नीली और लाल ज्वालाओं वाली अग्नियों में तथा बिना पके मांस में अभिमंत्रित किया है, तू उन का विनाश कर. (४) दौष्वप्न्यं दौर्जीवित्यं रक्षो अभ्वमराय्यः. दुर्णीम्नीः सर्वा दुर्वाचस्ता अस्मन्नाशयामसि.. (५) हम अभिचार द्वारा सताए हुए इस पुरुष से बुरे स्वप्न संबंधी भय को, दुष्ट जीवन वाले ebook converter DEMO Watermarks*