अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
वैश्वानरो नो अधिपा वसिष्ठ उदिन्नयाति सुकृतस्य लोकम्.. (१) हे अग्नि देव! व्यवहार करने में अशक्त हो कर मैं ने जो ऋण लिया और उसे नहीं चुका पाया; मैं उसे देने की प्रतिज्ञा करता हूं. सभी प्राणियों के हितैषी, पालन कर्ता एवं वश में करने वाले अग्नि हमें पुण्य कर्मों के फल के रूप में मिलने वाला लोक प्रदान करें. (१) वैश्वानराय प्रति वेदयामि यदृणं संगरो देवतासु. स एतान् पाशान् विचृतं वेद सर्वानथ पक्वेन सह सं भवेम.. (२) मुझ पर जो लौकिक ऋण एवं देवों के प्रति की गई प्रतिज्ञा पूर्ण न करने का ऋण है, उन सब को मैं अग्नि देव को बताता हूं. अग्नि देव इन लौकिक और दैविक ऋण रूपी पाशों को ढीला करना जानते हैं. (२) वैश्वानरः पविता मा पुनातु यत् संगरमभिधावाम्याशाम्. अनाजानन् मनसा याचमानो यत् तत्रैनो अप तत् सुवामि.. (३) सभी भावों को पवित्र करने वाले अग्नि मुझे पवित्र करें. मैं ने ऋण चुकाने एवं यज्ञ करने का जो वचन दिया है तथा मैं देवों में जो आशा उत्पन्न करता हूं, उन के ऋण को चुकाता नहीं हूं. मैं अपने मन से लौकिक सुखों की याचना करता हूं. इस प्रकार के असत्य भाषण में जो पाप है, उसे मैं दूर करता हूं. (३) सूक्त-१२० देवता—अंतरिक्ष आदि यदन्तरिक्षं पृथिवीमुत द्यां यन्मातरं पितरं वा जिहिंसिम. अयं तस्माद् गार्हपत्यो नो अग्निरुदिन्नयाति सुकृतस्य लोकम्.. (१) मैं ने अंतरिक्ष में रहने वाले, पृथ्वी पर रहने वाले तथा स्वर्गलोक में रहने वाले जनों की हिंसा के रूप में जो पाप किया है, मैं ने अपने मातापिता के प्रतिकूल आचरण कर के जो हिंसा रूपी पाप किया है, गृहस्थों द्वारा सेवित यह अग्नि मुझे उन पापों से छुड़ा कर उन लोकों को प्राप्त कराएं जो पुण्य कर्म करने वालों को प्राप्त होते हैं. (१) भूमिर्मातादितिर्नो जनित्रं भ्राता ऽ न्तरिक्षमभिशस्त्या नः. द्यौर्नः पिता पित्र्याच्छं भवाति जामिमृत्वा माव पत्सि लोकात्.. (२) पृथ्वी हमारी माता है और देवमाता अदिति हमारे जन्म का कारण है. अंतरिक्ष हमारा भाई है. यह मुझे मिथ्या भाषण रूपी पाप से बचाए. आकाश हमारा पिता है. वह पिता से आए दोष से हमें बचाए एवं हमें सुखी बनाए. मैं व्यर्थ ही प्राण त्याग कर के तथा यज्ञ आदि न कर के स्वर्गलोक से अधोगति प्राप्त न करूं. (२) यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोगं तन्व १: स्वायाः.
सूक्त-१२१ देवता—अग्नि आदि
अश्लोणा अङ्गैर्ह्रुताः स्वर्गे तत्र पश्येम पितरौ च पुत्रान्.. (३) यज्ञ आदि करने वाले सहृदय जन अपने शरीर के ज्वर आदि रोगों को त्याग कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रसन्न होते हैं. हम भी कुष्ठ आदि रोगों से हीन अंगों के द्वारा सरल गति से चलते हुए स्वर्गलोक में अपने पिता, माता और पुत्रों से मिलें. (३) सूक्त-१२१ देवता—अग्नि आदि विषाण पाशान् वि ष्या ऽ ध्यस्मद् य उत्तमा अधमा वारुणा ये. दुष्ष्वप्न्यं दुरितं निः ष्वास्मदथ गच्छेम सुकृतस्य लोकम्.. (१) हे बंधन की देवी निर्ऋति! हमारे शरीर के मार्गों को बांधने वाले फंदे की रस्सियों को हम से छुड़ाती हुई हमें मुक्त करो. जो पाश उत्तम, अधम और वरुण से संबंधित हैं, उन्हें हम से अलग करो. बुरे स्वप्न से उत्पन्न पाप के फंदों को भी हम से अलग करो. इन फंदों से छूट कर हम पुण्य के फल के रूप में मिलने वाले लोकों को प्राप्त करें. (१) यद् दारुणि बध्यसे यच्च रज्जवां यद् भूम्यां बध्यसे यच्च वाचा. अयं तस्माद् गार्हपत्यो नो अग्निरुद्निन्याति सुकृतस्य लोकम्.. (२) हे पुरुष! तुम काठ के बंधन में, रस्सी में अथवा धरती के गड्ढे में राजा की आज्ञा से बांधे गए हो. यह गार्हपत्य अग्नि तुम्हें उन बंधनों से छुड़ा कर वह लोक प्राप्त कराएं, जो उत्तम कर्म करने के फल के रूप में मिलता है. (२) उदगातां भगवती विचृतौ नाम तारके. प्रेहामृतस्य यच्छतां प्रैतु बद्धकमोचनम्.. (३) विचृत अर्थात् मूल नक्षत्र में उदय या उत्पन्न होने वाली विचृत नाम की तारिकाएं इस बंधे हुए पुरुष को मरने से बचाएं तथा साथ ही बंधन से मुक्त करें. (३) वि जिहीष्व लोकं कृणु बन्धान्मुञ्चासि बद्धकम्. योन्या इव प्रच्युतो गर्भः पथः सर्वा अनु क्षिय.. (४) हे बंधन से संबंधित देवता! तुम अनेक प्रकार से आओ और इस स्थान पर बंधे हुए पुरुष को उसके बंधन से छुड़ाओ. हे पुरुष! जिस प्रकार माता के गर्भ से बच्चा बाहर निकल आता है, उसी प्रकार तू बंधन से छूट कर स्वच्छंद रूप से सभी मार्गों पर चल. (४) सूक्त-१२२ देवता—विश्वकर्मा एतं भागं परि ददामि विद्वान् विश्वकर्मन् प्रथमजा ऋतस्य. अस्माभिर्दत्तं चरसः परस्तादच्छिन्नं तन्तुमनु सं तरेम.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे विश्वकर्मा! तुम ब्राह्मण से पहले उत्पन्न हुए हो. तुम्हारे इस महत्त्व को जानता हुआ मैं अपनी रक्षा के लिए तुम्हें हवि प्रदान करता हूं. मेरे द्वारा तुम्हें दिया हुआ यह हवि मुझे वृद्धावस्था तक दीर्घ जीवन प्रदान करे और मैं अपनी संतान के मध्य जीवन व्यतीत करूं. (१) ततं तन्तुमन्वेके तरन्ति येषां दत्तं पित्र्यमायनेन. अबन्ध्वेके ददतः प्रयच्छन्तो दातुं चेच्छिक्षान्तस स्वर्ग एव.. (२) कुछ ऋणी जन देह त्याग के पश्चात पुत्र, पौत्र आदि द्वारा पितर संबंधी ऋण चुकाने के कारण ऋण से छूट गए. पुत्र, पौत्र आदि संतान से रहित लोग धनी को धन धान्य का ऋण चुका कर उस स्वर्ग को प्राप्त करते हैं, जिसे ऋण चुकाने के इच्छुक प्राप्त करते हैं. (२) अन्वारभेथामनुसंरभेथामेतं लोकं श्रद्दधानाः सचन्ते. यद् वां पक्वं परिविष्टमग्नौ तस्य गुप्तये दंपती सं श्रयेथाम्.. (३) हे पतिपत्नी! परलोक में हित करने वाला कर्म आरंभ करो तथा इस के पश्चात संयुक्त हो जाओ. कर्मफल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्ग आदि लोकों में श्रद्धा रखते हुए तुम दोनों सेवा करो. (३) यज्ञं यन्तं मनसा बृहन्तमन्वारोहामि तपसा सयोनिः. उपहूता अग्ने जरसः परस्तात् तृतीये नाके सधमादं मदेम.. (४) अनशन आदि दीक्षा नियमों के द्वारा दिव्य देह पाने का पात्र बना हुआ मैं अपने द्वारा किए गए महान यज्ञ का विचार कर के उसी में स्थित रहता हूं. हे अग्नि! तुम्हारी अनुमति पा कर मैं वृद्धावस्था से भी अधिक आयु पा कर दुःख रहित स्वर्गलोक में पुत्र, पौत्र आदि सहित हर्षित बनूं. (४) शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा ब्रह्मणों हस्तेषु प्रपृथक् सादयामि. यत्काम इदमभिषिञ्चामि वो ऽ हमिन्द्रो मरुत्वान्तस ददातु तन्मे.. (५) शुद्ध, पवित्र और यज्ञ के योग्य उन जलों को मैं ऋत्विज् ब्राह्मणों के हाथ धोने के लिए अलग रखता हूं. हे जलो! जिस अभिलाषा से मैं तुम्हें छिड़कता हूं, मरुद्गणों के सहित इंद्र मेरी वह अभिलाषा पूर्ण करें. (५) सूक्त-१२३ देवता—विश्वे देव एतं सधस्थाः परि वो ददामि यं शेवधिमावहाज्जातवेदाः. अन्वागन्ता यजमानः स्वस्ति तं स्म जानीत परमे व्योमन्.. (१) हे स्वर्ग में यजमान के साथ बैठने वाले देवो! मैं यह हवि भाग तुम्हें देता हूं. यह विधि ebook converter DEMO Watermarks*
रूपी भाग अग्नि तुम सब को प्राप्त कराते हैं. यह यजमान उस हवि रूपी विधि का अनुगमन करता हुआ आएगा. इस यजमान को तुम स्वर्गलोक में जानना. (१) जानीत स्मैनं परमे व्योमन् देवाः सधस्था विद लोकमत्र. अन्वागन्ता यजमानः स्वस्तीष्टापूर्तं स्म कृणुताविरस्मै.. (२) हे यजमान के साथ स्वर्ग में बैठने वाले देवो! उस स्वर्ग में इस यजमान को जानना. यह यजमान उस हवि रूपी विधि का अनुगमन करता हुआ आएगा. इस यजमान को तुम स्वर्गलोक में पहचान लेना. (२) देवाः पितरः पितरो देवाः. यो अस्मि सो अस्मि.. (३) वसु, रुद्र आदि जो देव हैं, वे हमारे पितर हैं. जो पिता, पितामह आदि हमारे पितर हैं, वे ही देव हैं. उन सब का मैं जो हूं, सो हूं. (३) स पचामि स ददामि स यजे स दत्तान्मा यूषम्.. (४) उन्हीं देवों और पितरों की संतान मैं पाक यज्ञ करता हूं और दान देता हूं. वही मैं यज्ञ करता हूं. अनुष्ठान के फल के कारण मैं पुत्र, पौत्र आदि से रहित न बनूं. (४) नाके राजन् प्रति तिष्ठ तत्रैतत् प्रति तिष्ठतु. विद्धि पूर्तस्य नो राजन्त्स देव सुमना भव.. (५) हे स्वामी सोम! तुम स्वर्गलोक में सुखपूर्वक स्थित रहो, हमारे अनुष्ठान भी स्वर्ग में स्थित रहें. तुम अपने मन में यह निश्चय कर लो कि तुम को मुझे इस अनुष्ठान का फल देना है. हे देव! इस प्रकार के तुम शोभन मन वाले बनो. (५) सूक्त-१२४ देवता—दिव्यजल दिवो नु मां बृहतो अन्तरिक्षादपां स्तोको अभ्यपप्तद् रसेन. समिन्द्रियेण पयसा ऽ हमग्ने छन्दोभिर्यज्ञैः सुकृतां कृतेन.. (१) द्युलोक से अथवा विशाल मेघ रहित आकाश से जल की बूंद मेरे ऊपर गिरी. हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इंद्र देव के चिह्न जल से संयुक्त बनूं. मैं वेदमंत्रों और यज्ञों के माध्यम से पुण्यवान जनों द्वारा किए गए कर्म की सहायता से उत्तम फल प्राप्त करूं. (१) यदि वृक्षादभ्यपप्तत् फलं तद् यद्यन्तरिक्षात् स उ वायुरेव. यत्रास्पृक्षत् तन्वो ३ यच्च वासस आपो नुदन्तु निर्ऋतिं पराचैः.. (२) वृक्ष से पानी की जो बूंद मेरे ऊपर गिरी, वह उस वृक्ष का फल ही है. मेघ रहित आकाश ebook converter DEMO Watermarks*
से जो बूंद मेरे ऊपर गिरी, वह वायु भी है. वर्षा की वे बूंदें मेरे शरीर का स्पर्श करती हैं अथवा मेरे वस्त्रों को भिगोती हैं. वे बूंदें पाप देवता निर्ऋति का प्रक्षालन करने में समर्थ होने के कारण मेरे पापों को दूर करें. (२) अभ्यञ्जनं सुरभि सा समृद्धिर्हिरण्यं वर्चस्तदु पूत्रिममेव. सर्वा पवित्रा वितताध्यस्मत् तन्मा तारीन्निर्ऋतिर्मो अरातिः.. (३) मेरे शरीर पर गिरी हुई वर्षा की बूंद सुगंधित तेल और उबटन मुझे पवित्र करने वाले ही हैं. पवित्रता के सभी कहे गए और न कहे गए साधन मेरे ऊपर फैले हैं. पवित्रता के साधनों से ढके हुए मेरे शरीर को पाप देवता निर्ऋति एवं कोई शत्रु अतिक्रमण न करे. (३) सूक्त-१२५ देवता—वनस्पति वनस्पते वीद्वङ्गो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः. गोभिः संनद्धो असि वीडयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि.. (१) हे वृक्ष से बने हुए रस! तेरे अंग दृढ़ हों. तू हमारा सखा, शत्रुओं से हमें पार करने वाला और शोभन वीरों से युक्त है. तू गाय के चर्म से बनी हुई रस्सियों से बंधे होने के कारण दृढ़ हो. तुझ पर बैठा हुआ पुरुष शत्रुओं को जीतने वाला हो. (१) दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्भतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः. अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज.. (२) हे रस! तेरा बल आकाश के पास से प्राप्त हुआ है. सार वाले वृक्षों से प्राप्त बल ही यह रथ है. जलों का बल एवं गाय के चर्म से बनी रस्सियों से ढका हुआ यह रथ इंद्र के वज्र के समान गति वाला हो. हे होता! इस प्रकार के रथ का हव्य से यजन करो. (२) इन्द्रस्यौजौ मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः. स इमां नो हव्यदातिं जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय.. (३) हे दिव्य गुणों से युक्त रथ! तुम इंद्र के बल, मरुतों की सेना, मित्र अर्थात् सूर्य के गर्भ और वरुण की नाभि हो. इस प्रकार के तुम हमारी यज्ञ क्रिया की सेवा करते हुए हवि को ग्रहण करो. (३) सूक्त-१२६ देवता—दुंदुभि उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरुत्रा ते वन्वतां विष्ठितं जगत्. स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद् दवीयो अप सेध शत्रून्.. (१) हे दुंदुभि! तू अपने घोष से पृथ्वी और आकाश को भर दे. अनेक प्रकार से स्थित प्राणी ebook converter DEMO Watermarks*
अनेक देशों में तेरा जय घोष सुनें. इस प्रकार का तू संग्राम के देव इंद्र और उन के अनुचर मरुतों के द्वारा हमारे शत्रुओं को दूर से भी दूर स्थान पर भगा दे. (१) आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा अभि ष्टन दुरिता बाधमानः. अप सेध दुन्दुभे दुच्छुनामित इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीडयस्व.. (२) हे दुंदुभि! तू अपने शब्द से शत्रु की सेना अर्थात् रथ, घोड़े हाथी और पैदल सैनिकों को पराजित कर के हमारे बल को बढ़ा. तू पराजय के कारणों और शत्रुओं द्वारा दिए हुए दुःखों को दूर करता हुआ ऐसा श्रवण कटु शब्द कर, जिस से शत्रुओं के हृदय फट जाएं. तू इस युद्ध स्थल से शत्रुओं की सेना को भगा दे. तू इंद्र देव की मुट्ठी के समान शत्रु नाशकारी है, इसलिए तू दृढ़ हो. (२) प्रामूं जयाभी ३ मे जयन्तु केतुमद् दुन्दुभिर्वावदीतु. समश्वपर्णाः पतन्तु नो नरो ऽ स्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु.. (३) हे इंद्र! तुम दूर दिखाई देने वाली शत्रु सेना को इस प्रकार पराजित करो कि वह दोबारा हम पर आक्रमण न कर सके. हमारे योद्धा शत्रु सेना पर विजय प्राप्त करें तथा विजय सूचक दुंदुभि बजाएं. हमारे सेनानायक घोड़ों पर सवार हो कर युद्ध भूमि में जाएं तथा हमारे अमात्य और राजा विजयी हों. (३) सूक्त-१२७ देवता—वनस्पति विद्रधस्य बलासस्य लोहितस्य वनस्पते. विसल्पकस्योषधे मोच्छिषः पिशितं चन.. (१) हे पलाश वृक्ष एवं हे विसर्प व्याधि की ओषधि! खांसी और सांस से रक्त बहाने वाले विसर्पक रोग से संबंधित मांस, रक्त आदि को हम से दूर करो. (१) यौ ते बलास तिष्ठतः कक्षे मुष्कावपश्रितौ. वेदाहं तस्य भेषजं चीपुद्रुरभिचक्षणम्.. (२) हे खांसी और सांस रोग! तेरे विसर्पक आदि रूप कांख अर्थात् बगल में विदध्रि नाम के विशेष घाव के रूप में स्थित रहते हैं तथा अंडकोषों में आश्रय लेते हैं. मैं उन की ओषधि जानता हूं, चीपुद्र नाम का विशेष वृक्ष इसे मिटाने वाली ओषधि है. (२) यो अङ्ग्यो यः कण्र्यो यो अक्ष्योर्विसल्पकः. वि वृहामो विसल्पकं विद्रधं हृदयामयम्. परा तमज्ञातं यक्ष्ममधराञ्चं सुवामसि.. (३) हमारे हाथ, पैर आदि अंगों में, कानों में और आंखों में जो विसर्पक हैं, उन्हें मैं जड़ से
उखाड़ता हूं. मैं विद्रधि को, हृदय रोग को तथा अज्ञात स्वरूप वाले यक्ष्मा रोग को भी नीचे की ओर विमुख करता हूं. (३) सूक्त-१२८ देवता—शकधूम, सोम शकधूमं नक्षत्राणि यद् राजानमकुर्वत. भद्राहमस्मै प्रायच्छन्निदं राष्ट्रमसादिति.. (१) प्राचीन काल में शकधूम नाम के ब्राह्मण को तारों ने चंद्रमा के समान राजा बनाया. मुझ भद्रा ने इस शकधूम ब्राह्मण को प्राचीन काल में कल्याणकारी समय इसलिए दिया था कि उसे नक्षत्र मंडल का स्वामित्व प्राप्त हो. (१) भद्राहं नो मध्यन्दिने भद्राहं सायमस्तु नः. भद्राहं नो अह्नां प्राता रात्री भद्राहमस्तु नः.. (२) हमारे लिए दोपहर और सायंकाल पुण्यकारक हों. इस के अतिरिक्त प्रातःकाल और पूरी रात्रि भी हमारे लिए शुभ हो. (२) अहोरात्राभ्यां नक्षत्रेभ्यः सूर्याचन्द्रमसाभ्याम्. भद्राहमस्मभ्यं राजञ्छकधूम त्वं कृधि.. (३) हे शकधूम ब्राह्मण तथा हे नक्षत्रों के राजा चंद्रमा! रातदिन, नक्षत्रों, सूर्य और चंद्रमा के पास हमारे लिए पुण्य वाला दिन लाओ. (३) यो नो भद्राहमकरः सायं नक्तमथो दिवा. तस्मै ते नक्षत्रराज शकधूम सदा नमः.. (४) हे शकधूम ब्राह्मण और हे तारों के स्वामी चंद्रमा! तुम ने जो सायंकाल में, रात में और दिन में हमारा कल्याण किया, उसे तुम्हारे लिए नमस्कार है. (४) सूक्त-१२९ देवता—भग भगेन मा शांशपेन साकमिन्द्रेण मेदिना. कृणोमि भगिनं माप द्रान्त्वरातयः.. (१) मैं गाय एवं भैंस के खुरों की आकृति वाले देव के द्वारा अपनेआप को सौभाग्यशाली बनाता हूं. मैं अपनी सेवा से संतुष्ट इंद्र के द्वारा अपने को सौभाग्यशाली बनाता हूं. हमारे शत्रु हमारे समीप से दूर चले जाएं और बुरी दशा को प्राप्त हों. (१) येन वृक्षाँ अभ्यभवो भगेन वर्चसा सह. ebook converter DEMO Watermarks*
तेन मा भगिनं कृण्वप द्रान्त्वरातयः.. (२) हे ओषधि! तुम जिस सौभाग्य प्रदान करने वाले देव से तेज प्राप्त कर के समीपवर्ती वृक्षों का तिरस्कार करती हो, उसी सौभाग्य से मुझे सौभाग्यशाली बनाओ. हमारे शत्रु हम से दूर चले जाएं और बुरी गति को प्राप्त हों. (२) यो अन्धो यः पुनःसरो भगो वृक्षेष्वाहितः. तेन मा भगिनं कृण्वप द्रान्त्वरातयः.. (३) जो भग नामक देव, अंधे होने के कारण आगे चलने में असमर्थ हैं और मार्ग में स्थित वृक्षों को नहीं छोड़ते हैं, हे ओषधि! मुझे उस भाग्य से भाग्यशाली बनाओ. हमारे शत्रु हम से दूर चले जाएं और बुरी दशा को प्राप्त हों. (३) सूक्त-१३० देवता—स्मर रथजितां रथजितेयीनामप्सरसामयं स्मरः. देवाः प्र हिणुत स्मरमसो मामनु शोचतु.. (१) हे रथजिता अर्थात् माष नाम की जड़ीबूटी! अपने वाहन रथ से विश्व को जीतने वाली एवं विशेष वैराग्य उत्पन्न करने वाली अप्सराओं से संबंधित स्मर अर्थात् कामदेव को दूर करो. हे देव! उस कामदेव को इस नारी के समीप भेजो. मुझ से विमुख यह स्त्री कामदेव से पीड़ित हो कर मेरी याद कर के दुःखी हो. (१) असौ मे स्मरतादिति प्रियो मे स्मरतादिति. देवाः प्र हिणुत स्मरमसो मामनु शोचतु.. (२) यह पुरुष मेरा स्मरण करे तथा मेरे प्रति अनुराग पूर्ण हो कर मेरा स्मरण करे. हे देव! इस के प्रति कामदेव को भेजो, जिस से यह मेरा स्मरण करे और मेरे स्मरण के कारण दुःखी हो. (२) यथा मम स्मरादसौ नामुष्याहं कदा चन. देवाः प्र हिणुत स्मरमसो मामनु शोचतु.. (३) जिस प्रकार यह दुष्टा स्त्री मेरा स्मरण करती है, उस प्रकार आर्त हो कर मैं कभी भी इस स्त्री का स्मरण नहीं करता हूं. हे देवो! कामदेव को इस की ओर भेजो, जिस से यह मेरा स्मरण करे और मेरे स्मरण के कारण दुख का अनुभव करे. (३) उन्मादयत मरुत उदन्तरिक्ष मादय. अग्न उन्मादया त्वमसौ मामनु शोचतु.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे मरुद्गण! इस स्त्री को मतवाली बनाओ. हे आकाश! तुम भी इसे मतवाली बना कर मेरे वश में करो. हे अग्नि देव! तुम इसे मतवाली बनाओ, जिस से यह अपनेआप को भूल कर मेरा चिंतन करे. (४) सूक्त-१३१ देवता—स्मर नि शीर्षतो नि पत्तत आध्यो ३ नि तिरामि ते. देवाः प्र हिणुत स्मरमसो मामनु शोचतु.. (१) हे पत्नी! मैं तेरे सिर से ले कर सारे शरीर में चिंताओं का प्रवेश कराता हूं! देवगण तेरे प्रति कामदेव को भेजें, जिस से दुःखी हो कर तू मेरा चिंतन करे. (१) अनुमते ऽ न्विदं मन्यस्वाकूते समिदं नमः. देवाः प्र हिणुत स्मरमसौ मामनु शोचतु.. (२) हे सब कर्मों की अनुमति देने वाली देव पत्नी! मुझ पर कृपा करो. हे संकल्प की देवी आकूति! तुम मेरे इस नमस्कार को स्वीकार करो. हे देवो! इस के प्रति कामदेव को भेजो, जिस से दुःखी हो कर यह मेरा स्मरण करे. (२) यद् धावसि त्रियोजनं पञ्चयोजनमाश्विनम्. ततस्त्वं पुनरायसि पुत्राणां नो असः पिता.. (३) हे पुरुष! यदि तू यहां से भाग कर तीन योजन दूर चला जाता है, पांच योजन दूर चला जाता है अथवा उतनी दूर चला जाता है, जितनी दूर घोड़ा दिनभर में पहुंच सकता है, तू वहां से भी मेरे पास आ जा और मेरे पुत्रों का पिता बन. (३) सूक्त-१३२ देवता—स्मर यं देवाः स्मरमसिञ्चन्नप्स्व १ न्तः शोशुचानं सहाध्या. तं ते तपामि वरुणस्य धर्मणा.. (१) सभी देवों ने कामदेव को उस की पत्नी, आधि अर्थात् चिंता के साथ जल में डुबो दिया, क्योंकि वह उस के वियोग में संतप्त था. हे नारी! मैं तेरे लिए उस कामदेव को जल के स्वामी वरुण की धारण शक्ति से संतप्त करता हूं. (१) यं विश्वे देवाः स्मरमसिञ्चन्नप्स्व १ न्तः शोशुचानं सहाध्या. तं ते तपामि वरुणस्य धर्मणा.. (२) विश्वे देव नामक देवों ने कामदेव को उस की पत्नी आधि अर्थात् चिंता के साथ जल में डुबो दिया, क्योंकि वह उस के वियोग में संतप्त था. हे नारी! मैं तेरे लिए उस कामदेव को ebook converter DEMO Watermarks*
जल के स्वामी वरुण की धारण शक्ति से संतप्त करता हूं. (२) यमिन्द्राणी स्मरमसिञ्चदप्स्व १ न्तः शोशुचानं सहाध्या. तं ते तपामि वरुणस्य धर्मणा.. (३) इंद्र पत्नी ने कामदेव को उस की पत्नी आधि अर्थात् चिंता के साथ जल में डुबो दिया, क्योंकि वह उस के वियोग में संतप्त था. हे नारी! मैं तेरे लिए उस कामदेव को जल के स्वामी वरुण की धारण शक्ति से संतप्त करता हूं. (३) यमिन्द्राग्नी स्मरमसिञ्चतामप्स्व १ न्तः शोशुचानं सहाध्या. तं ते तपामि वरुणस्य धर्मणा.. (४) इंद्र और अग्नि देवों ने कामदेव को उस की पत्नी आधि अर्थात् चिंता के साथ जल में डुबो दिया, क्योंकि वह उस के वियोग में संतप्त था. हे नारी! मैं तेरे लिए उस कामदेव को जल के स्वामी वरुण की धारण शक्ति से संतप्त करता हूं. (४) यं मित्रावरुणौ स्मरमसिञ्चतामप्स्व १ न्तः शोशुचानं सहाध्या. तं ते तपामि वरुणस्य धर्मणा.. (५) मित्र और वरुण देवों ने कामदेव को उस की पत्नी आधि अर्थात् चिंता के साथ जल में डुबो दिया, क्योंकि वह उस के वियोग में संतप्त था. हे नारी! मैं तेरे लिए उस कामदेव को जल के स्वामी वरुण की धारण शक्ति से संतप्त करता हूं. (५) सूक्त-१३३ देवता—मेखला य इमां देवो मेखलामाबाबन्ध यः संननाह य उ नो युयोज. यस्य देवस्य प्रशिषा चरामः स पारमिच्छात् स उ नो वि मुञ्चात्.. (१) शत्रुओं को मारने में कुशल देव ने अपने शत्रु को मारने के लिए यह मेखला बांधी है, जो इस समय भी दूसरों की मेखला को बांधता है, जिस ने मेखला के द्वारा हमें अभिचार कर्म में लगाया है तथा जिस देव की आज्ञा से हम चलतेफिरते हैं, वह हमारे द्वारा प्रारंभ किए गए अभिचार की समाप्ति की इच्छा करे. वही हमें शत्रुओं से छुड़ाए. (१) आहुतास्यभिहुत ऋषीणामस्यायुधम्. पूर्वा व्रतस्य प्राश्नती वीरघ्नी भव मेखले.. (२) हे मेखला! तुम आहुतियों के द्वारा संस्कार की गई तथा बंधन हेतु बुलाई गई हो, जिस से वे शत्रुओं का बंधन करते थे. तुम प्रारंभ किए गए कर्म से पहले होने वाली तथा शत्रुओं के वीरों का विनाश करने वाली हो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
मृत्योरहं ब्रह्मचारी यदस्मि निर्वाचन् भूतात् पुरुषं यमाय. तमहं ब्रह्मणा तपसा श्रमेणानयैनं मेखलया सिनामि.. (३) मैं ब्रह्मचारी होने के कारण सूर्य के पुत्र यमराज का सेवक हूं. इसी कारण मैं प्राणियों में से अपने शत्रु के विनाश हेतु यमराज से प्रार्थना करता हूं. मारने योग्य उस शत्रु को मैं मंत्र, तप, शारीरिक दंड एवं मेखला के द्वारा बांधता हूं. (३) श्रद्धाया दुहिता तपसो ऽ धि जाता स्वस ऋषीणां भूतकृतां बभूव. सा नो मेखले मतिमा धेहि मेधामथो नो धेहि तप इन्द्रियं च.. (४) श्रद्धा की पुत्री सृष्टि के आदि में ब्रह्म के तप से उत्पन्न हुई. प्राणियों को जन्म देने वाले मरीचि आदि ऋषियों की जो यह मेखला है, वह इसी प्रकार उत्पन्न हुई है. हे मेखला! तू हमें क्रांतदर्शिनी बुद्धि प्रदान कर तथा हमें मेधा दे. इस के अतिरिक्त तू मुझे ताप तथा वीर्य प्रदान कर. (४) यां त्वा पूर्वे भूतकृत ऋषयः परिबेधिरे. सा त्वं परि ष्वजस्व मां दीर्घायुत्वाय मेखले.. (५) हे मेखला! पृथ्वी आदि तत्त्वों की रचना करने वाले प्राचीन ऋषियों ने तुझे बांधा था. दीर्घ आयु प्रदान करने के लिए तू मेरा भी आलिंगन कर. (५) सूक्त-१३४ देवता—वज्र अयं वज्रस्तर्पयतामृतस्यावास्य राष्ट्रमप हन्तु जीवितम्. शृणातु ग्रीवाः प्र शृणातूष्णिहा वृत्रस्येव शचीपतिः.. (१) मेरे द्वारा धारण किया गया, यह दंड इंद्र के वज्र के समान सत्य और यज्ञ के सामर्थ्य से तृप्त हो. यह वज्र हमारे द्वेषी राजा के राष्ट्र का विनाश करे तथा उस की गले की हड्डियां काट दे. यह गले की धमनियों को भी उसी प्रकार काट दे, जिस प्रकार शचीपति इंद्र ने वृत्र के गले की धमनियां काटी थी. (१) अधरो ऽ धर उत्तरेभ्यो गूढः पृथिव्या मोत्सृपत्. वज्रेणावहतः शयाम्.. (२) अधिक ऊंचों की अपेक्षा, अतिशय अधोगति वाला एवं धरती में छिपा हुआ धरती से बाहर न निकले, वह इस वज्र के द्वारा घायल हो कर सोता रहे. (२) यो जिनाति तमन्विच्छ यो जिनाति तमिज्जहि. जिनतो वज्र त्वं सीमन्तमन्वञ्चमनु पातय.. (३)
सूक्त-१३५ देवता—वज्र
हे वज्र! जो शत्रु हमें हानि पहुंचाता है, उसी के समीप जा. जो हमें हानि पहुंचाता है, उसी को मार. जो शत्रु हमें हानि पहुंचाता है, तू उस के शरीर के भागों को विदीर्ण कर. (३) सूक्त-१३५ देवता—वज्र यदश्नामि बलं कुर्व इत्थं वज्रमा ददे. स्कन्धानमुष्य शातयन् वृत्रस्येव शचीपतिः.. (१) मैं जो भोजन करता हूं, उस से मुझे बल प्राप्त होता है. उस बल से मैं वज्र पकड़ता हूं. हे वज्र! इंद्र ने जिस प्रकार राक्षस के शरीर के अवयवों को काट डाला था, उसी प्रकार तू मेरे शत्रु के शरीर को काट डाल. (१) यत् पिबामि सं पिबामि समुद्र इव संपिबः. प्राणानमुष्य संपाय सं पिबामो अमुं वयम्.. (२) मैं जो जल पीता हूं, उस के द्वारा मानव शत्रु को पकड़ कर उस का रस पीता हूं. जिस प्रकार सागर नदी मुख से पूरा जल ग्रहण कर के पी जाता है, उसी प्रकार मैं शत्रु का रस पीता हूं. मैं पहले इस शत्रु के प्राणों को रस बना कर पीता हूं और बाद में इस पूरे शत्रु का विनाश कर देता हूं. (२) यद् गिरामि सं गिरामि समुद्र इव संगिरः. प्राणानमुष्य संगीर्य सं गिरामो अमुं वयम्.. (३) मैं जो कुछ निगलता हूं, उस के द्वारा अपने मानव शत्रु को ही निगल जाता हूं. जिस प्रकार सागर नदी के जल को निगल जाता है, उसी प्रकार मैं शत्रु के अंगों को निगलता हूं. मैं पहले इस शत्रु के अंगों को निगलता हूं और बाद में इसे समाप्त कर देता हूं. (३) सूक्त-१३६ देवता—वनस्पति देवी देव्यामधि जाता पृथिव्यामस्योषधे. तां त्वा नितत्नि केशेभ्यो दृंहणाय खनामसि.. (१) हे प्रकाश करती हुई, कालमाची नामक जड़ीबूटी! तू दिव्य पृथ्वी में उत्पन्न हुई है. हे नीचे की ओर जाने वाली जड़ीबूटी! मैं तुझे अपने केशों को दृढ़ करने के लिए खोदता हूं. (१) दृंह प्रत्नानज्जनयाजातान्जातानु वर्षीयसस्कृधि.. (२) हे जड़ीबूटी! तू मेरे केशों को दृढ़ बना तथा मेरे जो केश उत्पन्न नहीं हुए, उन्हें उत्पन्न कर. मेरे जो केश उत्पन्न हो गए हैं, उन्हें तू अधिक विशाल बना दे. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१३७ देवता—वनस्पति
यस्ते केशो ऽ वपद्यते समूलो यश्च वृश्चते. इदं तं विश्वभेषज्या ऽ भि षिञ्चामि वीरुधा.. (३) हे केशों को दृढ़ करने के इच्छुक पुरुष! तेरा जो केश धरती पर गिरता है तथा जो जड़ रहित काटा जाता है, मैं तेरे उन सभी केशों को, केश संबंधी रोगों का विनाश करने वाली ओषधि से गीला करता हूं. (३) सूक्त-१३७ देवता—वनस्पति यां जमदग्निरखनद् दुहित्रे केशवर्धनीम्. तां वीतहव्य आभरदसितस्य गृहेभ्यः.. (१) जमदग्नि ऋषि ने अपनी पुत्री के केशों को बढ़ाने वाली जिस ओषधि को खोदा था, उसे वीतहव्य महर्षि ने अपने केश बढ़ाने के लिए असित केश नामक मुनि के घर से जिसे चुराया था. (१) अभीशुना मेया आसन् व्यामेनानुमेयाः. केशा नडा इव वर्धन्तां शीर्ष्णस्ते असिताः परि.. (२) हे केशों को बढ़ाने के इच्छुक पुरुष! पहले तेरे केश अंगुलों में (दो अंगुल, चार अंगुल आदि रूप में) नापने योग्य थे. इस के पश्चात वे दोनों हाथ फैला कर नापने योग्य हो गए. हे पुरुष! तेरे शीश के चारों ओर केश नड नामक घास के समान बढ़ें. (२) दृंह मूलमाग्रं यच्छ वि मध्यं यामयौषधे. केशा नडा इव वर्धन्ता शीर्ष्णस्ते असिताः परि.. (३) हे ओषधि, मेरे बालों की जड़ों को दृढ़ बना तथा उन के ऊपरी भाग को लंबा बना. इस के अतिरिक्त तू मेरे केशों के मध्य भाग को दृढ़ बना. हे पुरुष! तेरे शीश के चारों ओर केश नई घास के समान बढ़ें. (३) सूक्त-१३८ देवता—वनस्पति त्वं वीरुधां श्रेष्ठतमा ऽ भिश्रुता ऽ स्योषधे. इमं मे अद्य पूरुषं क्लीबमॉपशिनं कृधि.. (१) हे शक्तिहीन करने वाली जड़ीबूटी! तू सभी लताओं में श्रेष्ठ एवं सभी ओर प्रसिद्ध है. आज मेरे इस शत्रु पुरुष को नपुंसक तथा स्त्री के समान बना दे. (१) क्लीबं कृध्योपशिनमथो कुरीरिणं कृधि. अथास्येन्द्रो ग्रावभ्यामुभे भिनत्त्वाण्ड्यौ.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे जड़ीबूटी! मेरे शत्रु को नपुंसक तथा स्त्री के समान बना दे. तू इसे स्त्री के समान बड़ेबड़े केशों वाला बना दे. इस के पश्चात इंद्र इस के दोनों अंडकोषों को पत्थरों से फोड़ डालें. (२) क्लीब क्लीबं त्वा ऽ करं वध्रे वध्रिं त्वा ऽ करमरसारसं त्वा ऽ करम्. कुरीरमस्य शीर्षणि कुम्बं चाधिनिदध्मसि.. (३) हे नपुंसक! मैं ने तुझे इस अनुष्ठान के द्वारा नपुंसक बना दिया है. हे षंढ अर्थात् जन्मजात नपुंसक! मैं ने तुझे षंढ बना दिया है. हे वीर्यहीन! मैं ने तुझे वीर्य रहित बना दिया है. मैं नपुंसक बने हुए इस पुरुष के शीश पर नारियों के शृंगार बने हुए केश समूह को उत्पन्न करता हूं. (३) ये ते नाड्यौ देवकृते ययोस्तिष्ठति वृष्ण्यम्. ते ते भिनद्मि शम्यया ऽ मुष्या अधि मुष्कयो:.. (४) तेरी ये नाड़ियां विधाता द्वारा बनाई गई हैं, जिन में वीर्य आश्रय लेता है. मैं अंडकोषों पर स्थित तेरी उन वीर्यवाहिनी नाड़ियों को पत्थर पर रख कर डंडे से तोड़ता हूं. (४) यथा नडं कशिपुने स्त्रियो भिन्दन्त्यश्मना. एवा भिनद्मि ते शेपोऽमुष्या अधि मुष्कयो:.. (५) स्त्रियां चटाई बनाने के लिए जिस प्रकार नड नामक घास को पत्थर से कूटती हैं, हे शत्रु! मैं तेरे अंडकोषों को उसी प्रकार पत्थर के ऊपर रख कर दूसरे पत्थर से फोड़ता हूं. (५) सूक्त-१३८ देवता—वनस्पति न्यस्तिका रुरोहिथ सुभगंकरणी मम. शतं तव प्रतानास्त्रयस्त्रिंशन्निताना:. तया सहस्रपर्ण्या हृदयं शोषयामि ते.. (१) हे शंखपुष्पी! तू दुर्भाग्य के लक्षण को पूरी तरह निगलती हुई उत्पन्न होती है. तू मेरे सौभाग्य का निर्माण करती है. हे जड़ीबूटी! तेरी सौ शाखाएं तथा तैंतीस जड़ें हैं. हे नारी! इस हज़ार पत्तों वाली शंखपुष्पी के द्वारा मैं तेरे हृदय को कामाग्नि से संतप्त करता हूं. (१) शुष्यतु मयि ते हृदयमथो शुष्यत्वास्यम्. अथो नि शुष्य मां कामेनाथो शुष्कास्या चर.. (२) हे कामिनी! मेरे विषय में तेरा हृदय संतप्त हो. तेरा मुख भी सूख जाए इस के अतिरिक्त तू मेरे प्रति अभिलाषा करती हुई अत्यधिक संतप्त हो. तू सूखे मुंह वाली बन कर मेरे समीप आ. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
संवननीं समुष्पला बभ्रु कल्याणि सं नुद. अमूं च मां च सं नुद समानं हृदयं कृधि.. (३) हे पीले पत्तों वाली एवं कल्याण करने वाली जड़ीबूटी! तू वशीकरण करने वाली है. तू फलों से युक्त हो कर उस नारी को मेरे समीप आने की प्रेरणा दे. इस के पश्चात मुझ कामुक और कामिनी को मिला दे. (३) यथोदकमपपुषो ऽ पशुष्यत्यास्यम्. एवा नि शुष्य मां कामेनाथो शुष्कास्या चर.. (४) हे कामिनी! जिस प्रकार जल न पीने वालों का मुंह सूख जाता है, उसी प्रकार तू मेरे प्रति काम भावना से संतप्त हो. तू सूखे मुंह वाली बन कर मेरे समीप आ. (४) यथा नकुलो विच्छिद्य संदधात्यहिं पुनः. एवा कामस्य विच्छिन्नं सं धेहि वीर्यावति.. (५) हे अतिशय वीर्यवर्धक जड़ीबूटी! नेवला जिस प्रकार सांप के टुकड़े कर के पुनः उन्हें जोड़ता है, उसी प्रकार स्त्री के विमुख होने के कारण जो मुझ में कामविकार आ गया है उसे दूर कर के मुझे मेरी पत्नी से पुनः मिला दें. (५) सूक्त-१४० देवता—ब्रह्मणस्पति यौ व्याघ्राववरूढौ जिघत्सतः पितरं मातरं च. यौ दन्तौ ब्रह्मणस्पते शिवौ कृणु जातवेदः.. (१) हे ब्रह्मणस्पति और हे जातवेद अग्नि! बाघ के समान जो दो दांत ऊपर की पंक्ति में अतिरिक्त रूप से नीचे की ओर मुंह कर के स्थित हैं, वे मातापिता को खाना चाहते हैं. वे दांत मातापिता का कल्याण करने वाले हों. (१) व्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम्. एष वां भागो निहितो रत्नधेयाय दन्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च.. (२) हे पहले निकले हुए, ऊपर वाले दो दांतो! तुम गेहूं, जौ, उरद और तिल खाओ. तुम्हारे रमणीय फल के लिए ही गेहूं, जौ आदि का भाग रखा गया है. तुम माता और पिता की हिंसा मत करो. (२) उपहूतौ सयुजौ स्योनौ दन्तौ सुमङ्गलौ. अन्यत्र वां घोरं तन्व १: परैतु दन्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च.. (३) दोनों ऊपर वाले दांत देव के द्वारा अनुमति प्राप्त, मित्र बने हुए, सुखकारक एवं शोभन ebook converter DEMO Watermarks*
हों. हे दोनों दांतो! नरमादा का संकेत करने वाला चिह्न बनाओ. वह चिह्न पुत्र, पौत्र आदि के रूप में समृद्धि करने वाला हो. (३) सूक्त-१४१ देवता—अश्विनीकुमार वायुरेनाः समाकरत् त्वष्टा पोषाय ध्रियताम्. इन्द्र आभ्यो अधि ब्रवद् रुद्रो भूम्ने चिकित्सतु.. (१) वायु देव हमारी इन गायों को एकत्र करें, त्वष्टा देव इन्हें पोषण के लिए धारण करें, इंद्र इन के प्रति प्रेम भरी बातें कहें तथा रुद्र देव इन की संख्या वृद्धि के लिए इन की चिकित्सा करें. (१) लोहितेन स्वधितिना मिथुनं कर्णयोः कृधि. अकर्तामश्विना लक्ष्म तदस्तु प्रजया बहु.. (२) हे गोपाल! तांबे के बने हुए लाल रंग के शस्त्र से गाय के बछड़ों और बछियों के कानों में नर और मादा होने का चिह्न बनाओ. अश्विनीकुमार भी इन के कानों में इसी प्रकार का चिह्न बनाएं. यह चिह्न पूजा के रूप में संख्या में अधिकता प्राप्त करे. (२) यथा चक्रुर्देवासुरा यथा मनुष्या उत. एवा सहस्रपोषाय कृणुतं लक्ष्माश्विना.. (३) देवों और असुरों ने पशुओं के कानों में शस्त्र से जिस प्रकार का नरमादा होने का चिह्न बनाया, मनुष्यों ने भी इसी प्रकार चिह्न बनाया. अश्विनीकुमार गायों की असीमित वृद्धि के लिए इसी प्रकार का चिह्न बनाएं. (३) सूक्त-१४२ देवता—वायु उच्छ्रयस्व बहुर्भव स्वेन महसा यव. मृणीहि विश्वा पात्राणि मा त्वा दिव्याशनिर्वधीत्.. (१) हे जौ अन्न! तू उगता हुआ ऊंचा हो तथा अनेक प्रकार का बन. तू अपने तेज से कुसूल, कोष्ठ आदि सभी पात्रों को भर दे. आकाश से गिरने वाला वज्र तेरी हिंसा न करे. (१) आशृण्वन्तं यवं देवं यत्र त्वाच्छा ऽ वदामसि. तदुच्छ्रयस्वद्यौरिव समुद्र इवैध्यक्षितः.. (२) सामने हो कर हमारी बात सुनते हुए जौ नामक देव की मैं इस भूमि में प्रार्थना करता हूं. तू धरती पर आकाश के समान ऊंचा हो तथा सागर के समान क्षय रहित हो कर बढ़. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अक्षितास्त उपसदो ऽ क्षिताः सन्तु राशयः. पृणन्तो अक्षिताः सन्वत्तारः सन्वक्षिताः.. (३) हे जौ! तुझ से संबंधित कर्म करने वाले विनाश रहित हों. तेरे ढेर नाश रहित हों. तुझे घर में रखने को ले जाने वाले लोग विनाश रहित हों. तुझे खाने वाले लोग भी विनाश रहित हों. (३)
सातवां कांड सूक्त-१ देवता—आत्मा धीती वा ये अनयन् वाचो अग्रं मनसा वा ये ऽ वदन्नृतानि. तृतीयेन ब्रह्मणा वावृधानास्तुरीयेणामन्वत नाम धेनोः.. (१) प्रजापति अथवा इंद्र और अग्नि की स्तुति करने वालों ने वाणी व्यवहार के समस्त अर्थ का ध्यान किया. जिन कहने के इच्छुकों ने देवता वाचक शब्दों के रूप में सत्य बोला, उन्होंने तृतीय ब्रह्म अर्थात् मध्यमा नामक भाषा शक्ति के द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हुए चौथी अर्थात् वैखरी वाणी से प्रसन्न होने वाले प्रजापति का नाम उच्चारण किया. (१) स वेद पुत्रः पितरं स मातरं स सूनुर्भुवत् स भुवत् पुनर्मघः. स द्यामौर्णोदन्तरिक्षं स्व १: स इदं विश्वमभवत् स आभवत्.. (२) भलीभांति जानने वाले पुत्रों को अनर्थ से बचाने वाला प्रजापति द्युलोक तथा पृथ्वी को जानता है. वह प्रजापति संसार के लोगों को अपनेअपने कर्म करने की प्रेरणा देता है. वह आकाश तथा पृथ्वी को अपनी महिमा से व्याप्त करता है. वह प्रजापति ही यह दिखाई देता हुआ विश्व बन गया है. (२) सूक्त-२ देवता—आत्मा अथर्वाणं पितरं देवबन्धुं मातुर्गर्भं पितुरसुं युवानम्. य इमं यज्ञं मनसा चिकेत प्र णो वोचस्तमिहेह ब्रवः.. (१) प्रजाओं के पालक देवों की सृष्टि करने वाले, माता के गर्भ से जन्म लेने वाले बालक को युवा बनाने वाले एवं गर्भ के जनक को प्राण युक्त करने वाले प्रजापति से मैं अपनी अभिलाषा की सिद्धि के लिए याचना करता हूं. उस ने इस ज्योतिहोम आदि यज्ञ को मन से जाना है. हे ब्रह्म! उस प्रजापति को मुझे बताओ. इस बात की अभिलाषा पूर्ण करने वाले यज्ञ कर्म में बताओ. (१) सूक्त-३ देवता—आत्मा अया विष्ठा जनयन् कर्वराणि स हि घृणिरुरुर्वराय गातुः. स प्रत्युदैद् धरुणं मध्वो अग्रं स्वया तन्वा तन्वमैरयत.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-४ देवता—वायु
इस माया के द्वारा विश्व आत्मा के रूप में स्थित यह प्रजापति यज्ञ आदि कर्मों को उत्पन्न करता है. वह दीप्तिशाली उत्तम कर्म फल के लिए महान मार्ग है. वह स्थायी एवं चिरकाल तक रहने वाले मधुर जल को उत्पन्न करता है. उस ने अपने विराट् शरीर के द्वारा सभी प्राणियों के शरीरों को प्रेरित किया है. (१) सूक्त-४ देवता—वायु एकया च दशभिश्चा सुहुते द्वाभ्यामिष्टये विंशत्या च. तिसृभिश्च वहसे त्रिंशता च वियुग्भिर्वाय इह ता वि मुञ्च.. (१) हे शोभन आह्वान वाले वायु देव! सब के प्रेरक प्रजापति अपने रथ में जुड़े हुए ग्यारह घोड़ों के सहारे हमारे यज्ञ में आएं. तुम बाईस तथा तैंतीस अश्वों के द्वारा वहन किए जाते हो. हे वायु! हमारे यज्ञ में आ कर अपने घोड़ों को यहीं रोके रहो अर्थात् हमारे यज्ञ से दूसरी जगह मत जाओ. (१) सूक्त-५ देवता—आत्मा यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्. ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः.. (१) देवत्व को प्राप्त यजमानों ने अग्नि के द्वारा यज्ञ पूर्ण किया. अग्नि के कर्म उन के प्रमुख कर्म थे. वे महत्त्व युक्त देव स्वर्ग को प्राप्त हुए. वहां प्राण के अभिमानी प्राचीन देव निवास करते हैं. (१) यज्ञो बभूव स आ बभूव स प्र जज्ञे स उ वावृधे पुनः. स देवानामधपतिर्बभूव सो अस्मासु द्रविणमा दधातु.. (२) यज्ञ रूप प्रजापति, विश्व आत्मा के रूप में प्रसिद्ध एवं सब के कारण हुए. वे प्रसिद्ध हुए तथा वे आज भी जगत् की आत्मा के रूप में बारबार बढ़ते हैं. वे इंद्र आदि देवों में प्रमुख हुए. यह यज्ञ हम सेवकों को अधिक धन प्रदान करे. (२) यद् देवा देवान् हविषा ऽ यजन्तामर्त्यान् मनसा ऽ मर्त्येन. मदेम तत्र परमे व्योमन् पश्येम तदुदितौ सूर्यस्य.. (३) कर्म से देवत्व को प्राप्त जनों ने न मरने वाले इंद्र आदि देवों के हेतु देव विषयक मन से चरु, पुरोडाश आदि के द्वारा यज्ञ किया. हम यजमान उस विशाल स्वर्ग में प्रसन्न हों एवं जब तक सूर्य का प्रकाश रहे, तब तक इस यज्ञ का फल रहे. (३) यत् पुरुषेण हविषा यज्ञं देवा अतन्वत. ebook converter DEMO Watermarks*
अस्ति नु तस्मादोजीयो यद्विहव्येनेजिरे.. (४) यजमानों ने पुरुष रूप हवि से पुरुषमेध नामक यज्ञ का विस्तार किया. उस में जो ओजस्वी एवं सारवान है, उसे हवि के रूप में देखा. (४) मुग्धा देवा उत शुना ऽ यजन्तोत गोरङ्गैः पुरुधा ऽ यजन्त. य इमं यज्ञं मनसा चिकेत प्र णो वोचस्तमिहेह ब्रवः.. (५) कार्य और अकार्य के विवेक से हीन यजमानों ने कुत्ते के द्वारा यज्ञ किया तथा गाय के अंगों के द्वारा भी अनेक बार यज्ञ किया. जो इस यज्ञ करने योग्य परमात्मा को मन से जानता है, वह गुरु हमें बताओ. उसे यहीं और इसी समय परमात्मा का स्वरूप बताओ. (५) सूक्त-६ देवता—अदिति अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः. विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्.. (१) खंड न होने योग्य जो पृथ्वी एवं देवमाता है, वही स्वर्ग और अंतरिक्ष है. वही संसार की निर्मात्री माता और उत्पन्न करने वाला पिता है. वही माता और पिता से उत्पन्न पुत्र है. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं निषाद—ये पांच जातियों वाले जन भी अदिति हैं. प्रजाओं की उत्पत्ति और जन्म का अधिकरण भी अदिति है. (१) महीमू षु मातरं सुव्रतानामृतस्य पत्नीमवसे हवामहे. तुविक्षत्रामजरन्तीमुरूचीं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्.. (२) महती एवं शोभन कर्मों वाली माता को सत्य और यज्ञ का पालन करने वाली माता के उद्देश्य से हम अपनी रक्षा के लिए यज्ञ करते हैं. अधिक बल एवं शक्ति संपन्न, विनाश रहित, अति दूर तक जाने वाली, शोभन सुख वाली एवं उत्तम कर्मों से प्रसन्न होने वाली देव माता अदिति को हम अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. (२) सूक्त-७ देवता—अदिति सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्. दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. (१) भलीभांति रक्षा करती हुई, विस्तीर्ण, पहुंचने योग्य, पाप रहित, सुख वाली सुखमय कर्मों की प्रेरणा एवं अखंडनीय दैवी नाव में हम सवार हों. उस शोभन डांडों वाली एवं छिद्र रहित दैवी नाव पर अपराध न करने वाले हम कल्याण प्राप्त करने के लिए सवार हों. (१) वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे. ebook converter DEMO Watermarks*