अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पूषा त्वेतश्च्यावयतु प्र विद्वाननष्टपशुर्भुवनस्य गोपाः. स त्वैतेभ्यः परि ददत् पितृभ्योऽग्निर्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः.. (५४) हे प्रेत! पशुओं की हिंसा न करने वाले पशुपालक पूषा तुझे यहां से उस स्थानों से ले जाएं. प्राणियों की रक्षा करने वाले ये दोनों तुझे पितरों को अर्पण करें. अग्नि देव तुझे ऐश्वर्य वाले देवताओं को सौंपें. (५४) आयुर्विश्वायुः परि पातु त्वा पूषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात्. यत्रासते सुकृतो यत्र त ईयुस्तत्र त्वा देवाः सविता दधातु.. (५५) जीवन का अभिमानी देवता आयु तेरा रक्षक हो. पूषा देव तेरे उस मार्ग की रक्षा करें जो पूर्व की ओर जाता हो. हे प्रेत! पुण्य आत्माओं के निवास रूप स्वर्ग में सविता देव तुझे पहुंचाएं. (५५) इमौ युनज्मि ते वह्नी असुनीताय वोढवे. ताभ्यां यमस्य सादनं समितींश्चाव गच्छतात्.. (५६) हे मृतक! भार ढोने वाले इन बैलों को मैं तेरे लिए छोड़ रहा हूं. मैं इन्हें प्राणों का वहन करने के लिए बैलगाड़ी में जोड़ता हूं. बैलों से युक्त इस गाड़ी के द्वारा तू यम के घर को प्राप्त हो. (५६) एतत् त्वा वासः प्रथमं न्वागन्नपैतदूह यदिहाबिभः पुरा. इष्टापूर्तमनुसंक्राम विद्वान् यत्र ते दत्तं बहुधा विबन्धुषु.. (५७) हे मृतक! तू अपने पहने हुए मुख्य वस्त्र को त्याग. जिन इच्छाओं की पूर्ति के लिए तूने अपने बांधवों को धन दिया था, उस इष्ट कर्म के फल के रूप बावड़ी, कुआं, तालाब आदि को प्राप्त हो. (५७) अग्नेर्वर्म परि गोभिर्व्ययस्व सं प्रोर्णुष्व मेदसा पीवसा च. नेत् त्वा धृष्णुर्हरसा जर्हृषाणो दधृग् विधक्षन् परीङ्खयातै.. (५८) हे प्रेत! इंद्रियों संबंधी अवयवों से तू अग्नि का पाप निवारक कवच पहन. अपने भीतर विद्यमान स्थूल चरबी से ये अग्नि तुझे अधिक भस्म करने की इच्छा रखते हुए इधरउधर न गिराएं. (५८) दण्डं हस्तादाददानो गतासोः सह श्रोत्रेण वर्चसा बलेन. अत्रैव त्वमिह वयं सुवीरा विश्वा मृधो अभिमातीर्जयेम.. (५९) ब्राह्मण के हाथ से बांस के दंड को ग्रहण करता हुआ मैं कानों के तेज तथा उस से प्राप्त बल से युक्त रहूं. हे प्रेत! तू इस चिता में ही रह. हम इस पृथ्वी पर सुख से रहते हुए अपने
सूक्त-३ देवता—यम
शत्रुओं तथा उन के उपद्रवों को दबाएं. (५९) धनुर्हस्तादाददानो मृतस्य सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन. समागृभाय वसु भूरि पुष्टमर्वाङ् त्वमेह्युप जीवलोकम्.. (६०) मृतक क्षत्रिय के हाथ से धनुष ग्रहण करता हुआ मैं तेज और बल से युक्त होऊं. हे धनुष! तू इस जीवित लोक में ही हमारे सामने आ तथा हमें देने के लिए धन ला. (६०) सूक्त-३ देवता—यम इयं नारी पतिलोकं वृणाना नि पद्यत उप त्वा मर्त्य प्रेतम्. धर्मं पुराणमनुपालयन्ती तस्यै प्रजां द्रविणं चेह धेहि.. (१) यह स्त्री धर्म का पालन करने के लिए तेरे दान आदि की इच्छा करती हुई तेरे समीप आती है. इस प्रकार तेरा अनुकरण करने वाली इस स्त्री को तू अगले जन्म में भी संतान वाली बनाना. (१) उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि. हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ.. (२) हे नारी! तू इस प्राणहीन पति के पास बैठी है. अब तू इस के पास से उठ. तू अपने पति से उत्पन्न हुए पुत्र, पौत्र आदि को प्राप्त हो गई है. (२) अपश्यं युवतिं नीयमानां जीवां मृतेभ्यः परिणीयमानाम्. अन्धेन यत् तमसा प्रावृतासीत् प्राक्तो अपाचीमनयं तदेनाम्.. (३) मैं तरुण अवस्था वाली जीवित गौ को मृतक के समीप ले जाई जाती हुई देखता हूं. यह भी अज्ञान से ढकी हुई है, इसलिए मैं इसे शव के पास से हटा कर अपने सामने लाता हूं. (३) प्रजानत्यघ्न्ये जीवलोकं देवानां पन्थामनुसंचरन्ती. अयं ते गोपतिस्तं जुषस्व स्वर्गं लोकमधि रोहयैनम्.. (४) हे गौ! तू पृथ्वीलोक को भलीभांति जानती तथा यज्ञ मार्ग को देखती है. तू दूध, दही आदि से युक्त हो कर जा. तू अपने उस स्वामी का सेवन कर जो गायों का स्वामी है. तू इस मृतक को स्वर्ग की प्राप्ति करा. (४) उप द्यामुप वेतसमवत्तरो नदीनाम्. अग्ने पित्तमपामसि.. (५) जल में उगी हुई काई और बेंत में जल का सार अंश है जो उन का रक्षक है. हे अग्नि! तू जल संबधी पित्त है. इसलिए मैं तुझे बेंत की शाखा, नदी के फेन और दूब आदि से शांत ebook converter DEMO Watermarks*
करता हूं. (५) यं त्वमग्ने समदहस्तमु निर्वापया पुनः. क्याम्बूरत्र रोहतु शाण्डदूर्वा व्यल्कशा.. (६) हे अग्नि! जिस पुरुष को तुम ने भस्म किया है, उसे सुखी करो. इस स्थान पर दुःखनाशक दूब घास उग सके, उस के लिए यहां कितना जल डालना चाहिए? (६) इदं त एकं पर ऊ त एकं तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व. संवेशने तन्वा ३ चारुरेधि प्रियो देवानां परमे सधस्थे.. (७) हे प्रेत! यह गार्हपत्य अग्नि तुझे परलोक पहुंचाने वाली ज्योति है. न रुकने वाली पवन दूसरी तथा आहवनीय अग्नि तीसरी ज्योति है. तू आहवनीय अग्नि से मिल तथा अग्नि में प्रवेश करने के कारण देव शरीर को प्राप्त कर के बढ़. इस के बाद तू इंद्र आदि देवताओं का प्रिय पात्र होगा. (७) उत्तिष्ठ प्रेहि प्र द्रवौकः कृणुष्व सलिले सधस्थे. तत्र त्वं पितृभिः संविदानः सं सोमेन मदस्व सं स्वधाभिः.. (८) हे प्रेत! तू इस स्थान से उठ और चल. शीघ्रता से चलता हुआ तू अंतरिक्ष को अपना निवास स्थान बना तथा पितरों से मिल कर सोमरस का पान करता हुआ हर्षित हो. (८) प्र च्यवस्व तन्वं १ सं भरस्व मा ते गात्रा वि हायि मो शरीरम्. मनो निविष्टमनुसंविशस्व यत्र भूमेर्जुषसे तत्र गच्छ.. (९) हे प्रेत! तू अपने शरीर के सब अंगों को एकत्र कर. तेरा कोई भी अंग यहां न छूट जाए. तेरा मन जिन स्वर्ग आदि स्थानों में रमा है, तू वहां प्रवेश कर. तू जिस भूमि से प्रेम करता है, उसी भूमि को प्राप्त हो. (९) वर्चसा मां पितरः सोम्यासो अञ्जन्तु देवा मधुना घृतेन. चक्षुषे मा प्रतरं तारयन्तो जरसे मा जरदृष्टिं वर्धन्तु.. (१०) सोमरस पीने के अधिकारी पितर मुझे तेजस्वी बनाएं. विश्वे देव मुझे मधुर घृत से युक्त करें. मैं दीर्घकाल तक देखता रहूं, इसलिए तू मुझे रोगों से मुक्त करते हुए बढ़. (१०) वर्चसा मां समनक्त्वग्निर्मेधां मे विष्णुर्न्य नक्त्वासन्. रयिं मे विश्वे नि यच्छन्तु देवाः स्योना मापः पवनैः पुनन्तु.. (११) अग्नि देव मुझे तेजस्वी बनाएं तथा विष्णु मेरे मुख में बुद्धि को भलीभांति स्थापित करें. विश्वे देव मुझे सुख देने वाले धन का स्वामी बनाएं. जल अपने शुद्ध साधन वायु के द्वारा मुझे ebook converter DEMO Watermarks*
पवित्र करें. (११) मित्रावरुणा परि मामधातामादित्या मा स्वरवो वर्धयन्तु. वर्चो म इन्द्रो न्यनक्तु हस्तयोरूर्जरदष्टिं मा सविता कृणोतु.. (१२) दिवस के अभिमानी देवता मित्र अर्थात् सूर्य तथा रात्रि के अभिमानी देव वरुण मुझे वस्त्र आदि प्रदान करें. आदित्य देव हम सब की वृद्धि करते हुए हमारे शत्रुओं को संतप्त बनाएं. इंद्र मुझे भुजाओं का बल दें तथा सविता मुझे दीर्घ आयु वाला बनाएं. (१२) यो ममार प्रथमो मर्त्यानां यः प्रेयाय प्रथमो लोकमेतम्. वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविषा सपर्यत.. (१३) यम मरणधर्मा मनुष्यों में उत्पन्न हुए थे. सब से पहले उन्हीं की मृत्यु हुई थी. इस के पश्चात ये दूसरे लोक में पहुंचे. यम सूर्य के पुत्र हैं. सभी प्राणी मृत्यु के पश्चात इन्हीं के पास जाते हैं. हे ऋत्विजो! इन यम का पूजन करो जो सब को पाप और पुण्य के अनुसार फल देते हैं. (१३) परा यात पितर आ च यातायं वो यज्ञो मधुना समक्तः. दत्तो अस्मभ्यं द्रविणेह भद्रं रयिं च नः सर्ववीरं दधात.. (१४) हे पितरो! तुम हमारे पितृयाग नामक कर्म से संतुष्ट हो कर अपने स्थान की ओर जाओ. हम जब तुम्हारा पुनः आह्वान करें, तब आना. हम ने तुम्हें मधु और घृत से युक्त यज्ञ दिया है. तुम इस यज्ञ को स्वीकार कर के हमारे घर में मंगलमय ऐश्वर्य तथा पुत्रों, पौत्रों, पशुओं आदि को स्थापित करो. (१४) कण्वः कक्षीवान् पुरुमीढो अगस्त्यः श्यावाश्वः सोभर्यर्चननाः. विश्वामित्रो ऽ यं जमदग्निरत्रिरवन्तु नः कश्यपो वामदेवः.. (१५) पूजा के योग्य कण्व, कक्षीवान, पुरुमीढ, अगस्त्य, श्यावाश्व, सौभरि, विश्वामित्र, जमदग्नि, अग्नि, कश्यप तथा वामदेव नाम वाले अनेक ऋषि हमारे रक्षक हैं. (१५) विश्वामित्र जमदग्ने वसिष्ठ भरद्वाज गोतम वामदेव. शर्द्दिनों अत्रिरग्रभीन्नमोभिः सुसंशासः पितरो मृडता नः.. (१६) हे विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ, भारद्वाज, गौतम, वामदेव नामक महर्षियो! तुम हमें सुख प्रदान करो. महर्षि अत्रि ने हमारे घर रक्षा करना स्वीकार कर लिया है. हे पितरो! तुम हमारे नमस्कार आदि के द्वारा पूजने के योग्य हो. तुम भी हमें सुख प्रदान करो. (१६) कस्ये मृजाना अति यन्ति रिप्रमायुर्दधानाः प्रतरं नवीयः. आप्यायमानाः प्रजया धनेनाध स्याम सुरभयो गृहेषु.. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*
हम श्मशान में अपने बांधव की मृत्यु के दुःख का त्याग करते हुए तथा शव के स्पर्श के पाप से मुक्त होते हुए अपने घर जाते हैं. इस प्रकार हम दुःख से छूट गए हैं. इस कारण हम पुत्र, पौत्र, पशु, सुवर्ण, धन, सुंदर गंध और वायु से संपन्न रहें. (१७) अञ्जते व्यञ्जते समज्जते क्रतुं रिहन्ति मधुनाभ्यञ्जते. सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षणं हिरण्यपावाः पशुमासु गृह्णते.. (१८) ऋत्विज् सोमयाग के आरंभ में यजमान की आंखों में अंजन लगाते हैं. सागर की वृद्धि के समय उदय होने वाले, रश्मियों द्वारा देखने वाले तथा प्रकाशमय चंद्रमा की रक्षा करने वाले सोम के रूप में स्थापित करते हुए हम चार थालियों में उस का शोधन करते हैं. (१८) यद् वो मुद्रं पितरः सोम्यं च तेनो सचध्वं स्वयशसो हि भूत. ते अर्वणः कवय आ शृणोत सुविदत्रा विदथे हूयमानाः.. (१९) हे पितरो! तुम अपने सोमरूपी धन के सहित हम से मिलो, क्योंकि तुम अपने यज्ञ के कारण यशस्वी हो. तुम हमें हमारा अभीष्ट प्रदान करो और बुलाए जाने पर हमारे आह्वान को सुनो. (१९) ये अत्रयो अङ्गिरसो नवग्वा इष्टावन्तो रातिषाचो दधानाः. दक्षिणावन्तः सुकृतो य उ स्थासद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम्.. (२०) हे पितरो! तुम अत्रि और अंगिरा गोत्र वाले हो. तुम नौ महीने तक सत्र याग करने के कारण स्वर्ग में आरोहण करने वाले होता हो. तुम दस मास वाला याग पूर्ण करने पर दक्षिणा देने वाले पुण्य आत्मा हो. इस कारण इस विस्तृत कुश पर बैठ कर हमारी हवि से तृप्ति करो. (२०) अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऋतमाशशानाः. शुचीदयन् दीध्यत उक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन्.. (२१) हे अग्नि! जिस प्रकार हमारे श्रेष्ठ पितर स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं, उसी प्रकार उक्थों का गान करने वाले पितर रात्रि के अंधकार को अपने तेज से दूर कर के उषाओं को प्रकाशित करते हैं. (२१) सुकर्माणः सुरुचो देवयन्तो अयो न देवा जनिमा धमन्तः. शुचन्तो अग्निं वावृधन्त इन्द्रमुर्वीं गव्यां परिषदं नो अक्रन्.. (२२) सुंदर कर्म तथा सुंदर तेज वाले देव काम्य तप से अपने जन्म का शोधन करने वाले देवत्व को प्राप्त हुए. गार्हपत्य अग्नि को प्रदीप्त करते हुए तथा अपनी स्तुतियों से इंद्र को प्रबुद्ध बनाते हुए वे पितर गायों को हमारे यहां निवास करने वाली बनाएं. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*
आ यूथेव क्ष्मति पश्वो अख्यद् देवानां जनिमान्त्युग्रः. मर्तासश्चिदुर्वशीरकृप्रन् वृधे चिदर्य उपरस्यायोः.. (२३) हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा भस्म किया जाता हुआ यह यजमान देवताओं के प्रादुर्भाव को देखे. मरणधर्मा मनुष्य तुम्हारी कृपा से उर्वशी आदि अप्सराओं को भोगने वाले होते हैं. तुम्हारी कृपा से देवत्व को प्राप्त मनुष्य भी गर्भाशय में स्थित जीवन की वृद्धि वाला होता है. (२३) अकर्म ते स्वपसो अभूम ऋतमवसन्न्ुषसो विभातीः. विश्वं तद् भद्रं यदवन्ति देवा बृहद् वदेम विदथे सुवीराः.. (२४) हे अग्नि! हम तुम्हारे सेवक हैं और तुम हमारा पालन करने वाले हो. इस कारण हम शोभन कर्म करने वाले बनें. उषा काल हमारे कर्मों को सत्य बनाए. देवताओं द्वारा रक्षित कर्म हमारे लिए कल्याणकारी हो. हम भी सुंदर पुत्र आदि से युक्त रहते हुए यज्ञ में विस्तृत स्तोत्रों का उच्चारण करें. (२४) इन्द्रो मा मरुत्वान् प्राच्या दिशः पातु बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२५) मरुतों के स्वामी इंद्र पूर्व दिशा से मेरी रक्षा करें. बाहुओं में प्राप्त पृथ्वी जिस प्रकार ऊपर स्थित स्वर्ग की रक्षा करती है, उसी प्रकार लोकों तथा मार्गों के निर्माताओं की पूजा हम यज्ञ द्वारा करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२५) धाता मा निर्ऋत्या दक्षिणाया दिशः पातु बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२६) दक्षिण के धाता देव पाप की देवी निर्ऋति के भय से मेरी रक्षा करें. दाता के द्वारा दी गई पृथ्वी जिस प्रकार स्वर्ग के उपभोक्ता की रक्षा करती है, उसी प्रकार मेरी रक्षा करने वाली हो. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों को हम हवि के द्वारा पूजते हैं. हे देवगण! इस यज्ञ में तुम भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२६) अदितिर्मादित्यैः प्रतीच्या दिशः पातु बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२७) देव माता अदिति पश्चिम दिशा के भय से मेरी रक्षा करें. दाता के द्वारा दी गई पृथ्वी जिस प्रकार दाता और दान ग्रहण करने वाले के स्वर्ग संबंधी उपभोग की रक्षा करती है, उसी प्रकार मेरी रक्षा करने वाली बने. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों को हम हवि के द्वारा पूजते हैं. हे देवगण! इस यज्ञ में तुम भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२७) सोमो मा विश्वैर्देवैरुदीच्या दिशः पातु बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२८) सभी देवों के साथ सोम उत्तर दिशा में स्थित राक्षस आदि से मेरी रक्षा करें. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग में मार्ग का प्रवर्तन करने वालों की हम हवि के द्वारा पूजा करते हैं. हे देवगण! इस यज्ञ में तुम भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२८) धर्ता ह त्वा धरुणो धारयाता ऊर्ध्वं भानुं सविता द्यामिवोपरि. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२९) हे प्रेत! संपूर्ण जगत् को धारण करने वाले तथा ऊपर की दिशा का स्वामी धाता देव ऊपर के लोक को जाने के लिए इच्छुक तेरी उसी प्रकार रक्षा करें, जिस प्रकार सब के प्रेरक सूर्य दीप्त आकाश को धारण करते हैं. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों को हम हवि के द्वारा पूजते हैं. हे देवगण! तुम हमारे इस यज्ञ में भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२९) प्राच्यां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३०) हे प्रेत! दहन के स्थान से पूर्व दिशा में कंबल से लिपटा हुआ मैं शरीर वाला रहा हूं, उस दिशा में मैं तुझे पितरों की तृप्ति करने वाली स्वधा नाम की देवी पर स्थापित करता हूं. दाताओं द्वारा ब्राह्मणों को दान की गई पृथ्वी जिस प्रकार ऊपर की दिशा में स्थित स्वर्ग का पालन करती है, हम हवि के द्वारा तुम्हारा स्वागत करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३०) दक्षिणायां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३१) हे प्रेत! हम दहन के स्थान से दक्षिण दिशा में पहले से स्थित तथा कंबल से ढकी हुई स्वधा नाम की पितृ देवता में तुझे स्थापित करते हैं. दाताओं द्वारा ब्राह्मणों को दान की गई पृथ्वी जिस प्रकार ऊपर की दिशा में स्वर्ग का पालन करती है, उसी प्रकार स्वधा नाम की पितृ देवता तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों की पूजा हम हवि द्वारा करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३१) प्रतीच्यां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे प्रेत! हम दहन के स्थान से पश्चिम दिशा में पहले से स्थित तथा कंबल से ढकी हुई स्वधा नाम की पितृदेवता में तुझे स्थापित करते हैं. दाताओं द्वारा ब्राह्मणों को दान में दी गई पृथ्वी जिस प्रकार ऊपर की दिशा में स्वर्ग का पालन करती है, उसी प्रकार स्वधा नाम की पितृदेवता तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों की पूजा हम हवि के द्वारा करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३२) उदीच्यां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३३) हे प्रेत! हम दहन के स्थान से उत्तर दिशा में पहले से स्थित तथा कंबल से ढकी हुई स्वधा नाम की पितृ देवता में तुझे स्थापित करते हैं. दाताओं द्वारा ब्राह्मणों को दान की गई पृथ्वी जिस प्रकार ऊपर की दिशा में स्वर्ग का पालन करती है उसी प्रकार स्वधा नाम की पितृदेवता तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल में रूप में स्वर्ग का प्रवर्तन करने वालों की पूजा हम हवि के द्वारा करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३३) ध्रुवायां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३४) हे प्रेत! स्थिर रहने वाली नीचे की दिशा में हम तुझे पहले से स्थित तथा कंबल से ढकी हुई स्वधा नाम की पितृ देवता में स्थापित करते हैं. जिस प्रकार दाताओं द्वारा ब्राह्मणों के लिए दान की गई पृथ्वी ऊपर की दिशा में स्वर्ग की रक्षा करती है, उसी प्रकार स्वधा नाम की पितृ देवता तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों की पूजा हम हवि के द्वारा करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३४) ऊर्ध्वायां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३५) हे प्रेत! मैं तुझे ऊपर की दिशा में स्थित स्वधा नाम की पितृ देवता में स्थापित करता हूं. मैं पहले से ही कंबल से ढका हुआ हूं. जिस प्रकार पुण्य करने वालों द्वारा ब्राह्मणों को दान की हुई पृथ्वी ऊपर की दिशा में स्थित स्वर्ग का पालन करती है, उसी प्रकार स्वधा देवी तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों की पूजा मैं हवि के द्वारा करता हूं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३५) धर्तासि धरुणो ऽ सि वंसगो ऽ सि.. (३६) हे अग्नि! तुम सब के धारणकर्ता एवं धरुण हो. (३६) ebook converter DEMO Watermarks*
उदपूरसि मधुपूरसि वातपूरसि.. (३७) हे अग्नि! तुम उदक को पूर्ण करने वाले, मधु को पूर्ण करने एवं प्राण वायु को पूर्ण करने वाले हो. (३७) इतश्च मामुतश्चावतां यमे इव यतमाने यदैतम्. प्र वां भरन् मानुषा देवयन्तो आ सीदतां स्वमु लोकं विदाने.. (३८) हे पुरुष! जिन से हविर्धान होता है अर्थात् हवि दी जाती है, ऐसे द्यावा पृथ्वी, भूलोक और स्वर्गलोक से होने वाले भय से तेरी रक्षा करें. हे द्यावा पृथ्वी! तुम जुड़वां संतानों के समान सर्वत्र व्याप्त होने वाले हो, इसलिए तुम जगत् के पोषण के लिए आओ. स्तुतियों का समूह तुम्हें इस प्रकार प्राप्त होता है. तुम जुड़वां संतान के समक्ष जगत् के पोषण हेतु प्रयत्न करो. देवों की कृपा प्राप्त करने वाले पुरुष जब तुम्हें हवि प्रदान करें, तब तुम उस स्थान को जानती हुई, वहां प्रतिष्ठित हो जाओ. (३८) स्वासस्थे भवतमिन्दवे नो युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिः. वि श्लोक एति पथ्येव सूरिः शृण्वन्तु विश्वे अमृतास एतत्.. (३९) हे हविर्धान! तुम हमारे सोम के लिए सुख के आसन पर बैठी हुई एवं स्थिर होओ. तुम से पूर्व काल में उत्पन्न नमकारात्मक मंत्रों का समूह तुम्हें विशेष रूप से प्राप्त हो. धर्म पथ पर चलने वाला विद्वान् जिस प्रकार इच्छित फल प्राप्त करता है, उसी प्रकार मैं स्तोत्रों के सहित तुम्हें नमस्कार करता हूं. ये स्तोत्र तुम्हें प्राप्त होते हैं. तुम हमारे सोम के लिए स्थिर बनो. हमारे इस स्तोत्र को मरण रहित सभी देव सुनें. (३९) त्रीणी पदानि रुपो अन्वरोहच्चतुष्पदीमन्वैतद् व्रतेन. अक्षरेण प्रति मिमीते अर्कमृतस्य नाभावधि सं पुनाति.. (४०) मृत पुरुष स्वर्ग में स्थित तीन सीढ़ियों को क्रम से चढ़ गया था. वह इस अनुत्तरणी गौ को ध्यान में रखता हुआ द्युलोक के तीनों स्थानों में पहुंचा. तुम अपने द्वारा अर्जित विनाश रहित पुण्य से सूर्यलोक को प्राप्त करो. इस प्रकार व्यक्ति सूर्य के समान हो जाता है. सूर्य में फल सभी ओर से पूर्ण है. (४०) देवेभ्यः कमवृणीत मृत्युं प्रजायै किममृतं नावॄणीत. बृहस्पतिर्यज्ञमतनुत ऋषिः प्रियां यमस्तन्व १ मा रिरेच.. (४१) सृष्टि के आरंभ में विधाता ने इंद्र आदि देवों के निमित्त किस प्रकार की मृत्यु की व्यवस्था की थी? इस के बाद सूर्य पुत्र यम ने बृहस्पति के कृपा पात्र मनुष्यों की देह को सभी ओर से खींच कर प्राण हीन किया. (४१) त्वमग्न ईडितो जातवेदो ऽ वाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वा. ebook converter DEMO Watermarks*
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषी.. (४२) हे अग्नि! तुम उत्पन्न होने वाले मनुष्यों को जानने वाले हो. हमारे द्वारा स्तुति किए गए तुम हमारे सुगंधित एवं रस युक्त चरु, पुरोडाश आदि को देवों के लिए वहन करो. तुम ने पितृ देवताओं के लिए स्वधा शब्द के साथ काव्य नामक इंद्रियों को दिया है. उन पितरों ने तुम्हारे द्वारा दी हुई हवियों का उपभोग किया है. हे प्रकाश युक्त अग्नि! तुम हमारे द्वारा अधिक मात्रा में दी हुई हवियों का भक्षण करो. (४२) आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय. पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात.. (४३) हे पितरो! लाल रंग की माताओं की गोद में बैठे हुए एवं हवि का दान करने वाले मरणधर्मा यजमान के लिए धन प्रदान करो. वह प्रसिद्ध धन हम पुत्रों को प्रदान करो. हे पितरो! तुम इस भूलोक में हमारे लिए बलकारक अन्न धारण करो. (४३) अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः. अत्तो हवींषि प्रयतानि बर्हिषि रयिं च नः सर्ववीरं दधात.. (४४) पितर दो प्रकार के होते हैं. बर्हिषद एवं अग्निष्वात्त. इस मंत्र में अग्निष्वात्त पितरों को संबोधित किया गया है. हे अग्निष्वात्त पितरो! इस यज्ञ में आओ. हम ने पिता, पितामह और प्रपितामह आदि के लिए जो स्थान निश्चित किया है, उसे प्राप्त करो. कुशाओं पर जो हवियां शुद्ध की गई हैं, उन चरु, पुरोडाश आदि हवियों का भक्षण करो. हवि भक्षण से संतुष्ट तुम हमारे लिए सभी वीरों से युक्त धन प्रदान करो. (४४) उपहूता नः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु. त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु ते ऽ वन्त्वस्मान्.. (४५) हमारे द्वारा बुलाए गए पितर सोमरस पान के अधिकारी हैं. वे अपनी हवियों के रखे होने पर आएं एवं हमारे इस यज्ञ में हमारे स्तोत्र सुनें, हमारे प्रति पक्षपात पूर्ण वचन करें एवं हमारी रक्षा करें. (४५) ये नः पितुः पितरो ये पितामहा अनूजहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः. तेभिर्यमः संरणणो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु.. (४६) हमारे पिता के जो पितर हैं, उन को जन्म देने वाले अर्थात् हमारे बाबा अधिक धन वाले थे और क्रम से सोम पान करते थे. उन पितरों के साथ रमण करते हुए यम कामना करते हुए उन पितरों को हमारे द्वारा दिए हुए चरु, पुरोडाश आदि का भक्षण करें. (४६) ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविद स्तोमतष्टासो अर्कैः. आग्ने याहि सहस्रं देववन्दैः सत्यैः कविभिर्ऋषिभिर्घर्मसद्भिः.. (४७) ebook converter DEMO Watermarks*
देवों में व्याप्त होने वाले, सात परिक्रमा करने वालों के द्वारा किए हुए यज्ञों को जानते हुए, अर्चनीय स्तुति करने वाले जो पितर प्यासे हैं, देवों को प्रणाम करने वाले, उन देवों के साथ तथा सत्य फल एवं क्रांतदर्शी ऋषियों के साथ सोमयाग में बैठने वाले हे अग्नि! हमारे लिए अपरिमित धन ले कर आओ. (४७) ये सत्यासो हविर्दो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं तुरेण. आग्ने याहि सुविद्वत्रेभिरर्वाङ् परैः पूर्वैर्ऋषिभिर्घर्मसद्भिः.. (४८) जो पितर सत्य का भाषण करने वाले, चरु, पुरोडाश आदि हवियों का भक्षण करने वाले, सोमरस का पान करने वाले इंद्र तथा अन्य देवों के साथ एक रथ पर बैठे हुए हैं. उन शोभन धनों वाले एवं उत्कृष्ट पूर्व पुरुषों के साथ यज्ञ में बैठने वाले हे अग्नि! तुम शीघ्र हमारे सामने आओ. (४८) उप सर्प मातरं भूमिमेतामुरुव्यचसं पृथिवीं सुशेवाम्. ऊर्णम्रदाः पृथिवी दक्षिणावत एषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात्.. (४९) हे प्रेत! विस्तीर्ण व्याप्ति वाली, सुख देने वाली माता भूमि के समीप आओ. यह पृथ्वी यज्ञ संबंधी बहुत सी दक्षिणाओं से युक्त तुम्हारे लिए ऊनों से बने हुए कंबल प्रदान करने वाली एवं सुखकारी हो कर पूर्व दिशा के निमित्त मार्गों में तुम्हारी रक्षा करे. (४९) उच्छ्वञ्चस्व पृथिवि मा नि बाधथाः सूपायनास्मै भव सूपसर्पणा. माता पुत्रं यथा सिचाभ्येनं भूम ऊर्णुहि.. (५०) हे भू देवता! तुम पुलकित हो जाओ और अपने समीप आए हुए पुरुष को बाधा मत दो. अपितु इस पुरुष के सुख से प्राप्त होने वाली बनो. माता जिस प्रकार अपने पुत्र को आंचल से ढकती है, उसी प्रकार अपने पास आए इस पुरुष को चारों ओर से ढक लो. इस से इसे शीत, उष्ण आदि दुःख नहीं होंगे. (५०) उच्छ्वञ्चमाना पृथिवी सु तिष्ठतु सहस्रं मित उप हि श्रयन्ताम्. ते गृहासो घृतश्चुतः स्योना विश्वाहास्मै शरणाः सन्वत्र.. (५१) पुलिकत पृथ्वी सुखपूर्वक स्थिर रहे. श्मशान में उगी हुई हजारों ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियां तुम्हारे आश्रित हों, तुम्हारे लिए ही टपकाने वाली हों. इस मृत पुरुष के लिए सभी दान सुख देने वाली पृथ्वी को गृह निर्माण के लिए धारण करते हैं. वे श्मशान देश में रक्षक बनें. (५१) उत्ते स्तभ्नामि पृथिवीं त्वत् परीमं लोगं निदधन्मो अहं रिषम्. एतां स्थूणां पितरो धारयन्ति ते तत्र यमः सादना ते कृणोतु.. (५२) हे मृत पुरुष! तेरे लिए मैं इस पृथ्वी को ऊंची बनाता हूं. तेरे चारों ओर सभी प्राणियों से ebook converter DEMO Watermarks*
युक्त इस भूलोक को धारण करता हुआ मैं हिंसा का आधार न बनूं. पितृ देवता उस प्रसिद्ध यूनी को तुम्हारे घर का निर्णायक करने के लिए स्थापित करते हैं. (५२) इममग्ने चमसं मा वि जिह्वरः प्रियो देवानामुत सोम्यानाम्. अयं यश्चमसो देवपानस्तस्मिन् देवा अमृता मादयन्ताम्.. (५३) हे अग्नि! खाने के इस साधन को टेढ़ा मत करो. यह चमचा देवों तथा मनुष्यों और सोमरस के पात्र देवों को प्रसन्न करने वाला है. देवता इस चमस के द्वारा अमृत पीते हैं. इस चमचे से मृत्यु रहित इंद्र आदि सभी देव प्रसन्न हैं. अथवा ऋषि के द्वारा बनाए हुए इस चम्मच में स्थिति स्वादिष्ट स्वाद होने के कारण सभी देव प्रसन्न हैं. (५३) अथर्वा पूर्ण चमसं यमिन्द्रायोबिभर्वाजिनीवते. तस्मिन् कृणोति सुकृतस्य भक्षं तस्मिन्निन्दुः पवते विश्वदानीम्.. (५४) अथर्वा नाम के ऋषि ने यज्ञ क्रिया वाले इंद्र को प्रसन्न करने के लिए सोमरस पीने का साधन यह चमस भरा है. ऋत्विजों का समूह इस चमस से हवन से बची हुई हवि का भक्षण करता है. अथर्वा ऋषि द्वारा बनाए हुए इस चम्मच के लिए चंद्रमा सदा सोमरस टपकाता है. (५४) यत् ते कृष्णः शकुन आतुतोद पिपीलः सर्प उत वा श्वापदः. अग्निष्टद् विश्वादगदं कृणोतु सोमश्च यो ब्राह्मणां आविdefault/वेश.. (५५) हे पुरुष! तेरे जिस अंग को काले रंग के पक्षी कौवे ने काट लिया है तथा विषैले दांतों वाली विशेष चींटियों ने, सांप ने अथवा बाघ ने काट लिया है, तेरे उस अंग को सर्वभक्षक अग्नि रोग रहित बनाएं. जिस सोम ने रस के रूप में ऋषियों में प्रवेश किया है, वह सोम तुझे रोग रहित बनाए. (५५) पयस्वतीरोषधयः पयस्वन्मामकं पयः. अपां पयसो यत् पयस्तेन मा सह शुम्भतु.. (५६) फल पकने पर समाप्त होने वाली ओषधियां हमारे लिए सार वाली हों. मेरे शरीर में स्थित जो बल है, वह भी सार वाला बने. जलों से संबंधित दूध का जो सार अंश है, वह फसलों और जड़ीबूटियों में स्थित सार अंश के साथ मुझे शोभन बनाए. जल के अधिकारी देव वरुण स्नान से मुझे शुद्ध करें. (५६) इमा नारीरविधवाः सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सं स्पृशन्ताम्. अनश्रवो अनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे.. (५७) प्रेत के कुल में उत्पन्न ये नारियां वैधव्य से हीन श्रेष्ठ पतियों वाली होती हुई घृत से मिले हुए अंजन से स्पर्श प्राप्त करें. ये आंसू न बहाने वाली, रोगरहित और शोभन आभरणों वाली ebook converter DEMO Watermarks*
हो कर संतान को जन्म देने के लिए स्वस्थ हों. (५७) सं गच्छस्व पितृभिः सं यमेनेष्टापूर्तेन परमे व्योमन्. हित्त्वावद्यं पुनरस्तमेहि सं गच्छतां तन्वा सुवर्चाः.. (५८) हे मृत पुरुष! तुम पिता, पितामह और प्रपितामह अर्थात् बाबा के साथ सपिंडी विधि के द्वारा मिल जाओ. अर्थात् तुम पितरों के मध्य स्थान प्राप्त करो. पितरों के राजा जो यम हैं, तुम उन के साथ भी हो जाओ. पितृलोक से भी श्रेष्ठ एवं आकाश में स्थित द्युलोक अर्थात स्वर्ग में इष्ट अर्थात् वेदों द्वारा स्पष्ट कहे गए यज्ञ, होम आदि, पूर्त अर्थात् स्मृति, पुराण एवं शास्त्रों द्वारा प्रेरित बावड़ी, कुआं, तालाब, देवमंदिर निर्माण आदि दोनों प्रकार के कर्मों से मिलो. तात्पर्य यह है कि स्वर्ग में उन दोनों प्रकार के कर्मों के फल का उपभोग करो. तुम पाप का त्याग कर के स्वर्गलोक में बने हुए उत्तम घर को प्राप्त करो. शोभन दीप्ति वाली तुम्हारी आत्मा स्वर्गलोक का सुख भोगने में समर्थ शरीर से मिल जाए. (५८) ये नः पितुः पितरो ये पितामहा य आविविशुरुर्व १ न्तरिक्षम्. तेभ्यः स्वराडसुनीतिर्नो अद्य यथावशं तन्वः कल्पयाति.. (५९) हमारे पिता के जो पितर अर्थात् पितामह आदि तथा हमारे गोत्र में उत्पन्न पितर विस्तीर्ण अंतरिक्ष में प्रविष्ट हैं, उन के शरीरों का आज राजा यम अपनेआप हमारी इच्छा के अनुसार निर्माण करें. (५९) शं ते नीहारो भवतु शं ते पृष्वाव शीत्याम्. शीतिके शीतिकावति ह्लादिके ह्लादिकावति. मण्डूक्य १ प्सु शं भुव इमं स्व १ ग्निं शमय.. (६०) हे प्रेत पुरुष! पाला तेरे लिए सुखकारी हो तथा जल तुझे सुखी करता हुआ वर्षा करे. हे शीतकारिणी जड़ीबूटियों से व्याप्त पृथ्वी तथा हे सुख उत्पन्न करने वाली मंडूकपर्णी ओषधि! तू इस दग्ध पुरुष को सुख प्रदान कर तथा जलाने वाली अग्नि को शांत कर. (६०) विवस्वान् नो अभयं कृणोतु यः सुत्रामा जीरदानुः सुदानुः. इहेमे वीरा बहवो भवन्तु गोमदश्ववन्मय्यस्तु पुष्टम्.. (६१) विवस्वान अर्थात् सूर्य हमें मृत्यु संबंधी भय से रहित करें. जीवन के कर्ता एवं शोभनदान वाले सुत्रामा नामक देव भी हमें मृत्यु के भय से मुक्त करें. इस लोक में हमारे पुत्र, पौत्र आदि अनेक वीर पुरुष हों. इस के अतिरिक्त बहुत-सी गायों वाला एवं बहुत से अश्वों वाला पोषक मेरे पास हो. (६१) विवस्वान् नो अमृतत्वे दधातु परैतु मृत्युरमृतं न ऐतु. इमान् रक्षतु पुरुषान जरिम्णो मो ष्वे षामसवो यमं गुः.. (६२) ebook converter DEMO Watermarks*
विवस्वान् अर्थात् सूर्य हमें अमृतत्व में धारण करें अर्थात् हमें मृत्यु रहित बनाएं. उस के प्रभाव से मृत्यु मुझ से विमुख हो जाए. हम को मरणहीनता प्राप्त हो. सूर्य देव हमारे पुत्रों और पौत्रों का वृद्धावस्था तक पालन करें. इन पुरुषों के पुत्र विवस्वान के पुत्र यम के पास न जाएं. (६२) यो दध्रे अन्तरिक्षे न मह्ना पितॄणां कविः प्रमतिर्मतीनाम्. तमर्चत विश्वमित्रा हविर्भिः स नो यमः प्रतरं जीवसे धात्.. (६३) क्रांतदर्शी एवं उत्तम बुद्धि वाले यम अपनी महिमा से स्तोताओं और पितरों को अंतरिक्ष में धारण करते हैं. हे ब्राह्मणो! तुम सभी प्राणियों के मित्र हो. तुम हवि आदि से यम की पूजा करो. वे यम हमारा जीवन पुष्ट बनाएं. (६३) आ रोहत दिवमुत्तमामृषयो मा बिभीतन. सोमपाः सोमपायिन इदं वः क्रियते हविरगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (६४) हे मंत्रदर्शी मनुष्यो! तुम उत्तम स्वर्ग को प्राप्त करो. तुम भय मत करो. मंत्र दर्शी ऋषियों ने स्वयं सोमरस को पिया है तथा दूसरों को सोमरस का पान कराया है. स्वर्ग में आरूढ़ तुम्हारे निमित्त यह हवि संपन्न की गई है. इस से तुम चिरकाल का जीवन प्राप्त करो. (६४) प्र केतुना बृहता भात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति. दिवश्चिदन्तादुपमामुदानडपामुपस्थे महिषो ववर्ध.. (६५) यह अग्नि देव धूम रूपी महान अंडे के द्वारा बहुत दीप्त होते हैं. स्वर्ग और पृथ्वीवासियों की कामनाओं की वर्षा करने वाले अग्नि महान शब्द करते हैं. ये अग्नि आकाश से भी ऊपर व्याप्त होते हैं. उस के बाद जलों के प्रदेश में महान हो कर वृद्धि प्राप्त करते हैं. (६५) नाके सुपर्णमुप यत् पतन्तं हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा. हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरुण्युम्.. (६६) हे प्रेत! हम जब तुम्हें उत्तम गति से स्वर्ग की ओर जाता हुआ देखते हैं, तब तुम्हें स्वर्णिम पंखों वाले वरुण के दूत यमराज के घर में पक्षी के समान तथा भरण करने वाले के रूप में देखते हैं. (६६) इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा. शिक्षा णो अस्मिन् पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि.. (६७) हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव! हमें सोमयाग लक्षण कर्म अथवा उस से संबंधित ज्ञान इस प्रकार प्रदान करो, जिस प्रकार पिता पुत्रों के लिए उन के मनचाहे फल लाता है. हे पुरुहूत! हमें संसार गमन की शिक्षा दो अथवा हमें मनचाहा फल प्रदान करो. हम तुम्हारी कृपा से चिरकाल के जीवन से युक्त हों और इस लोक के सुख का अनुभव करें. (६७) ebook converter DEMO Watermarks*
अपूपापिहितान् कुम्भान् यांस्ते देवा अधारयन्. ते ते सन्तु स्वधावन्तो मधुमन्तो घृतश्चुतः.. (६८) हे प्रेत! तेरे लिए देवों ने पूओं से ढके हुए तथा घी से भरे हुए घड़ों को धारण किया था, वे घड़े तेरे लिए घी टपकाने वाले हों. (६८) यास्ते धाना अनुकिरामि तिलमिश्रा स्वधावती:. तास्ते सन्तु विभी: प्रभ्वीस्तास्ते यामो राजानु मन्यताम्.. (६९) हे प्रेत! मैं तेरे लिए जो तिल से युक्त स्वधान वाले भुने जौ दे रहा हूं. वे तेरे लिए तृप्ति करने वाले हों. यमराज तुझे इन तिलों के उपयोग का आदेश प्रदान करें. (६९) पुनर्देहि वनस्पते य एष निहितस्त्वयि. यथा यमस्य सादन आसातै विदथा वदन्.. (७०) हे वनस्पति! तुझ में जो अस्थि रूप पुरुष अर्थात् पुरुष की हड्डियों का ढांचा छिपा हुआ है, उसे हमें प्रदान करो. जिस से वह यमराज के घर में यज्ञ संबंधी कार्य करता हुआ स्थित हो सके. (७०) आ रभस्व जातवेदस्तेजस्वद्धरो अस्तु ते. शरीरमस्य सं दहाथैनं धेहि सुकृतामु लोके.. (७१) हे अग्नि! तुम्हारी ज्वालाएं दहनशील अर्थात् जलाने वाली हैं. उन में रस का हरण करने वाली शक्ति आ जाए. तुम इस मृतक के शरीर को पूरी तरह से जलाओ. शरीर दहन के पश्चात इस पुरुष को पुण्य करने वालों के लोक स्वर्ग पहुंचाओ. (७१) ये ते पूर्वे परागता अपरे पितरश्च ये. तेभ्यो घृतस्य कुल्यै तु शतधारा व्युन्दती.. (७२) जो पहले उत्पन्न ज्येष्ठ पितर हम से मुंह मोड़ कर चले गए. उन के पश्चात जो उत्पन्न हुए, उन सभी पितरों के लिए घृत पूर्ण प्रवाह प्राप्त हो. वह धारा सौ संख्याओं वाली हो. इसलिए सभी को भिगोती हुई बहे. (७२) एतदा रोह वय उन्मृजानः स्वा इह बृहदु दीदयन्ते. अभि प्रेहि मध्यतो माप हास्थाः पितॄणां लोकं प्रथमो यो अत्र.. (७३) हे मृत पुरुष! तू इस दिखाई देने वाले अंतरिक्ष अर्थात् आकाश में आरूढ़ हो. तू आत्मा के उत्क्रमण से शरीर को शुद्ध करता हुआ अंतरिक्ष में आरूढ़ हो. तू अपने बंधुजनों के मध्य से लोकांतर को गमन कर. तेरे बंधु इस लोक में अधिक दीप्त हों. द्युलोक अर्थात् स्वर्ग पितरों से संबंधित मृत्युलोक है. तू उस लोक का त्याग मत कर अर्थात् वहां बहुत दिनों तक निवास ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-४ देवता—अग्नि
कर. (७३) सूक्त-४ देवता—अग्नि आ रोहत जनित्रीं जातवेदसः पितृयाणैः सं व आ रोहयामि. अवाड्ढव्येषितो हव्यवाह ईजानं युक्ताः सुकृतां धत्त लोके.. (१) हे अग्नियो! तुम अपनी उत्पन्न करने वाली के पास पहुंचो. मैं तुम्हें पितृयान मार्गों से वहां भलीभांति पहुंचाता हूं. हव्यों के वाहक अग्नि हव्यों को वहन करते हैं. हे अग्नियो! तुम मिल कर यज्ञकर्ताओं को श्रेष्ठ कर्म करने वालों के लोकों में पहुंचाओ. (१) देवा यज्ञमृतवः कल्पयन्ति हविः पुरोडाशं सुचो यज्ञायुधानि. तेभिर्याहि पथिभिर्देवयानैर्यरीजानाः स्वर्गं यन्ति लोकम्.. (२) देवगण और वसंत आदि ऋतुएं अनेक प्रकार के यज्ञों की रचना करते हैं. इस यज्ञ में डालने के लिए घृत आदि से बनाए हुए पदार्थों को अग्नि में डालने के लिए चमचे की आकृति के अनेक पात्र बनाते हैं. हे मनुष्य! उन देवयान मार्गों अर्थात् यज्ञ करने की विधियों से तू नित्य प्रति यज्ञ कर. इन देवयान मार्गों से यज्ञ करने वाले जन स्वर्गलोक जाते हैं. (२) ऋतस्य पन्थामनु पश्य साध्वङ्गिरसः सुकृतो येन यन्ति. तेभिर्याहि पथिभिः स्वर्गं यत्रादित्या मधु भक्षयन्ति तृतीये नाके अधि वि श्रयस्व.. (३) हे प्रेत! तू सत्य के कारण रूप मार्गों को भलीभांति जानता हुआ महर्षि अंगिरस आदि के स्वर्ग को जा, जिस मार्ग में अदिति के पुत्र देवगण अमृत का सेवन करते हैं. तू उस तीसरे स्वर्ग में निवास कर. (३) त्रयः सुपर्णा उपरस्य मायू नाकस्य पृष्ठे अधि विष्टपि श्रिताः. स्वर्गा लोका अमृतेन विष्ठा इषमूर्जं यजमानाय दुहाम्.. (४) अग्नि, वायु और सूर्य उत्तम विधि से गमन करने वाले हैं. वायु तथा पर्जन्य मेघ के समान शब्द करते हैं. ये सभी स्वर्गलोक से ऊपर विष्टप में निवास करते हैं. अपने कर्मों से प्राप्त होने वाला यह स्वर्गलोक अमृत से संपन्न है. यह स्वर्ग यज्ञ कर्म का अनुष्ठान करने वाले प्रेत को मनचाहा अन्न तथा रस देने वाला है. (४) जुहूर्दाधार द्यामुपभृदन्तरिक्षं ध्रुवा दाधार पृथिवीं प्रतिष्ठाम्. प्रतीमां लोका घृतपृष्ठाः स्वर्गाः कामंकामं यजमानाय दुहाम्.. (५) होम के पात्र जुहू ने आकाश को पुष्ट किया, उपभूत नाम के यज्ञपात ने अंतरिक्ष को धारण किया तथा स्रुवा नाम के यज्ञ पात्र ने पृथ्वी का पालन किया. यह स्रुवा पात्र पृथ्वी का ebook converter DEMO Watermarks*
ध्यान करते हुए ऊपर स्थित स्वर्गलोक में यजमान को मनचाहा फल प्रदान करे. (५) ध्रुव आ रोह पृथिवीं विश्वभोजसमन्तरिक्षमुपभृदा क्रमस्व. जुहु द्यां गच्छ यजमानेन साकं स्रुवेण वत्सेन दिशः प्रपीनाः सर्वा धुक्ष्वाह्णीयमानः.. (६) हे स्रुवा नामक चम्मच! तू पृथ्वी पर आरोहण कर और यजमान भी पृथ्वी पर प्रतिष्ठित रहे. हे उपभृत नाम के पात्र! तू अंतरिक्ष पर आरोहण कर. हे जुहू नामक पात्र! तू यजमान के साथ द्युलोक अर्थात् स्वर्ग को गमन कर तथा सभी दिशाओं से मनचाहे फलों का दोहन कर. (६) तीर्थैस्तरन्ति प्रवतो महीरिति यज्ञकृतः सुकृतो येन यन्ति. अत्रादधुर्यजमानाय लोकं दिशो भूतानि यदकल्पयन्त.. (७) लोग तीर्थों तथा यज्ञादि कर्मों के द्वारा बड़ीबड़ी विपत्तियों से पार हो जाते हैं. इस प्रकार विचार करने वाले तथा यज्ञ कर्म करते हुए पुरुष जिस मार्ग से स्वर्ग को जाते हैं, उस मार्ग को खोजते हुए यज्ञ कर्ता इस यजमान के लिए वह मार्ग खोलें. (७) अङ्गिरसामयनं पूर्वो अग्निरादित्यानामयनं गार्हपत्यो दक्षिणानामयनं दक्षिणाग्निः. महिमानमग्नेर्विहितस्य ब्रह्मणा समङ्गः सर्व उप याहि शग्मः.. (८) आंगिरसों का मार्ग पूर्व के नाम की अग्नि है. आदित्यों का मार्ग गार्हपत्य अग्नि है. यज्ञ कार्य में दक्ष जनों का मार्ग दक्षिणा अग्नि है. वेदमंत्रों के द्वारा यज्ञ में स्थापित की गई अग्नि की महिमा को दृढ़ अंगों तथा पूर्ण शरीर वाला तू प्राप्त कर. (८) पूर्वो अग्निष्ट्वा तपतु शं पुरस्ताच्छं पश्चात् तपतु गार्हपत्यः. दक्षिणाग्निष्टे तपतु शर्म वर्मोत्तरतो मध्यतो अन्तरिक्षाद् दिशोदिशो अग्ने परि पाहि घोरात्.. (९) हे भस्म होते हुए प्रेत! पूर्व की अग्नि तुझे आगे से सुखपूर्वक संतप्त करे. गार्हपत्य अग्नि तुझे पीछे से सुखपूर्वक तपाए. दक्षिणाग्नि तेरे लिए सुख रूप हो तथा तेरा कवच बन कर तुझे तपाए. हे अग्नि! तू उत्तर दिशा से, दिशाओं के बीच से, अंतरिक्ष से तथा प्रत्येक दिशा से आने वाले हिंसक से हमारी ठीक से रक्षा करे. (९) यूयमग्ने शांतमाभिस्तनूभिरीजानमभि लोकं स्वर्गम्. अश्वा भूत्वा पृष्टिवाहो वहाथ यत्र देवैः सधमादं मदन्ति.. (१०) हे गार्हपत्य आदि अग्नियो! तुम पीठ से वहन करने वाले घोड़ों के समान बन कर अपने ebook converter DEMO Watermarks*
सुखकारी शरीरों से यज्ञ करने वाले को स्वर्गलोक की ओर ले जाओ. यज्ञ करने वाले लोग उस स्वर्ग में देवों के साथ आनंद का भोग करते हुए तृप्त होते हैं. (१०) शमग्ने पश्चात् तप शं पुरस्ताच्छमुत्तराच्छमधरात् तपैसम्. एकस्त्रेधा विहितो जातवेदः सम्यगेनं धेहि सुकृतामु लोके.. (११) हे अग्नि! तुम पश्चिम, पूर्व, उत्तर, दक्षिण आदि दिशाओं से इस मृतक को सुखपूर्व भस्म करो. तुम एक हो, पर यजमान ने तुम्हें तीन रूपों में स्थापित किया था. तुम इस यजमान को श्रेष्ठ जनों के लोक में भलीभांति स्थापित करो. (११) शमग्नयः समिद्धा आ रभन्तां प्राजापत्यं मेध्यं जातवेदसः. शृतं कृण्वन्त इह माव चिक्षिपन्.. (१२) विधिपूर्वक प्रकाशित की गई अग्नियां तथा उत्पन्न पदार्थों में वर्तमान अग्नियां प्रजापति को देवता मानने वाले इस पवित्र यजमान को सुखपूर्वक यज्ञ कार्य के हेतु उत्सुक बनाएं. इस लोक में वे अग्नियां यजमान को पूर्ण बनाएं तथा उसे यज्ञ कार्य से विमुख न होने दें. (१२) यज्ञ एति विततः कल्पमान ईजानमभि लोकं स्वर्गम. तमग्नयः सर्वहुतं जुषन्तां प्राजापत्यं मेध्यं जातवेदसः. शृतं कृण्वन्त इह माव चिक्षिपन्.. (१३) विस्तृत यज्ञ समर्थ हो कर यज्ञकर्ता को स्वर्गलोक में पहुंचाता है. सर्वस्व होम करने वाले यज्ञकर्ता को अग्नियां संतुष्ट करें. इस लोक में वे अग्नियां यजमान को पूर्ण बनाएं. अग्नियां यजमान को इस यज्ञ कार्य से विमुख न होने दें. (१३) ईजानश्चितमारुक्षदग्निं नाकस्य पृष्ठाद् दिवमुत्पतिष्यन्. तस्मै प्र भाति नभसो ज्योतिषीमान्त्स्वर्गः पन्थाः सुकृते देवयानः.. (१४) स्वर्ग के ऊपर स्थित द्युलोक जाने की इच्छा करता हुआ यज्ञकर्ता पुरुष चयन की हुई अग्नि को प्रकट करता है. अर्थात् प्रज्वलित करता है. उस उत्तम कर्म करने वाले यजमान के लिए आकाश को प्रकाशित करने वाले जिस मार्ग से जाते हैं, उसी प्रकार का सुख देने वाला मार्ग प्रकाशित होता है. (१४) अग्निर्होताध्वर्युष्टे बृहस्पतिरिन्द्रो ब्रह्मा दक्षिणतस्ते अस्तु. हुतो ऽ यं संस्थितो यज्ञ एति यत्र पूर्वमयनं हुतानाम्.. (१५) हे प्रेत! तेरे पितृमेध यज्ञ में अग्नि होता बने, बृहस्पति अध्वर्यु का कार्य करे और इंद्र ब्रह्मा हो. इस प्रकार पूर्ण किया हुआ यह यज्ञ पहले किए गए अनेक यज्ञों का स्थान प्राप्त करता है. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*
अपूपवान् क्षीरवांश्चरुरेह सीदतु. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (१६) पिसे हुए गेहूँ में दूध मिला कर तैयार किया हुआ ओदन रूप चरु इस कर्म में अस्थियों के समीप पश्चिम दिशा में रखा रहे. इस संस्कार को प्राप्त हुए प्रेत के लिए स्वर्ग के निर्माता इंद्र आदि देवों में से इस हवि के अधिकारी यहां वर्तमान देवों को मैं प्रसन्न करता हूं. (१६) अपूपवान् दधिवांश्चरुरेह सीदतु. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (१७) पिसे हुए गेहूं तथा दही मिले हुए ओदन रूप चरु इस कर्म में अस्थियों के समीप पश्चिम दिशा में स्थित रहे. इस संस्कार को प्राप्त हुए प्रेत के लिए स्वर्ग का निर्माण करने वाले इंद्र आदि देवताओं में से इस हवि के अधिकारी यहां वर्तमान देवताओं को हम प्रसन्न करते रहें. (१७) अपूपवान् द्रप्सवांश्चरुरेह सीदतु. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (१८) पिसे हुए गेहूं और गाय का घी मिले हुए चरु से जिस प्रेत का संस्कार किया गया है, उस के लिए स्वर्ग के निर्माता इंद्र आदि देवताओं में से इस हवि का अधिकारी जो देवता यहां वर्तमान हो, उसे हम प्रसन्न करते हैं. (१८) अपूपवान् घृतवांश्चरुरेह सीदतु. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (१९) मालपूए आदि से युक्त तथा मुग्ध करने वाले अन्य द्रव्यों से युक्त चरु इस यज्ञ में स्थित हो. लोकों और मार्गों का निर्माण करने वाले तथा यहां उपस्थित इंद्र आदि देवों के मध्य जिन के लिए यज्ञ भाग दिया गया है, उन्हें हम प्रसन्न करते हैं. (१९) अपूपवान् मांसवांश्चरुरेह सीदतु. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२०) मालपूए तथा मांस से युक्त यह चरु यहां इस यज्ञ में स्थित हो. हम लोकों और मार्गों का निर्माण करने वाले इंद्र आदि देवों के लिए यज्ञ करते हैं. यज्ञ के भाग का उपभोग करने वाले यहां स्थित रहें. (२०) अपूपवानन्नवांश्चरुरेह सीदतु. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२१) पिसे हुए गेहूं के पूओं से युक्त, अन्न से मिश्रित पवन का ओदन रस यह चरु इस यज्ञ ebook converter DEMO Watermarks*
कार्य में पश्चिम दिशा में स्थित रहे. जिस प्रेत का संस्कार किया जा रहा है, उस के लिए स्वर्ग का निर्माण करने वाले इंद्र आदि देवताओं में से इस हवि के जो देवता यहां वर्तमान हैं, हम उन्हें प्रसन्न करते हैं. (२१) अपूपवान् मधुमांश्चरुरेह सीदतु. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२२) पिसे हुए गेहूं के पूओं से युक्त और शहद मिले हुए कुंभी पक्व भात रूप चरु इस कार्य में अस्थियों के पश्चिम भाग में रखा रहे. जिस का संस्कार किया जा रहा है उस प्रेत के लिए स्वर्ग का निर्माण करने वाले इंद्र आदि देवताओं में से इस हवि के अधिकारी जो देवता यहां विद्यमान हैं, हम उन का स्वागत करते हैं. (२२) अपूपवान् रसवांश्चरुरेह सीदतु. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२३) जिस गेहूं तथा छह रसों से युक्त मालपूए से युक्त कुंभी पक्व ओदन रूप चरु इस कार्य में अस्थियों के पश्चिम भाग में स्थित रहे. यह संस्कार जिस प्रेत के लिए किया जा रहा है, उस के लिए स्वर्ग का निर्माण करने वाले इंद्र आदि देवताओं में से इस हवि के अधिकारी यहां वर्तमान देवों को हम प्रसन्न करते हैं. (२३) अपूपवानपवांश्चरुरेह सीदतु. लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२४) जिस गेहूं तथा अन्य प्रकार के पूओं से युक्त कुंभी पक्व ओदन रूप चरु इस कार्य में अस्थियों के पश्चिम भाग में रहे. यह संस्कार जिस प्रेत के लिए किया जा रहा है, उस के लिए स्वर्ग का निर्माण करने वाले इंद्र आदि देवताओं में से हवि के अधिकारी यहां वर्तमान देवताओं को हम प्रसन्न करते हैं. (२४) अपूपापिहितान् कुम्भान् यांस्ते देवा अधारयन्. ते ते सन्तु स्वधावन्तो मधुमन्तो घृतश्रुतः.. (२५) हे प्रेत! हवि के अधिकारी जिन देवताओं ने चरु से पूर्ण कलशों को अपने भाग के रूप में ग्रहण किया है, वे चरु तुझे परलोक में स्वधा से युक्त करें. (२५) यास्ते धाना अनुकिरामि तिलमिश्राः स्वधावतीः. तास्ते सन्तूद्ध्वीः प्रध्वीस्तास्ते यमो राजानु मन्यताम्.. (२६) अक्षितिं भूयसीम्.. (२७) हे प्रेत! तेरे लिए मैं जिन काले तिलों से युक्त जौ की खीलों को बिखेरता हूं, वे तुझे परलोक में प्रचुर परिमाण में प्राप्त हों तथा उन्हें खाने के लिए यमराज तुझे आज्ञा दें. ebook converter DEMO Watermarks*