अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१० देवता—इंद्र
येना समुद्रमसृजो महीरपस्तदिन्द्र वृष्णि ते शवः. सद्यः सो अस्य महिमा न संनशे यं क्षोणीरनुचक्रदे.. (४) हे इंद्र! जिस बल से तुम ने सागर को भरने वाले प्रभूत जलों का निर्माण किया था, तुम्हारा वह बल सब को अभीष्ट फल देता है. हम भूलोकवासी तुम्हारी जिस महिमा का गान करते हैं, उसे दूसरे अर्थात् शत्रु भलीभांति नहीं जान सकते. (४) सूक्त—१० देवता—इंद्र उदु त्ये मधुमत्तमा गिर स्तोमास ईरते. सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव.. (१) जो स्तुतियां प्रकट हो रही हैं, वे गाए जाने वाले मंत्रों से साध्य और न गाए जाने वाले मंत्रों से असाध्य हैं. ये स्तुतियां अन्न प्रदान करती हैं और रक्षा करने में समर्थ हैं. जैसे रथ रथारोही के अभिप्राय के अनुसार गमन करता है, उसी प्रकार ये स्तुतियां इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गमन करती हैं. (१) कण्वा इव भृगवः सूर्या इव विश्वमिद् धीतमानशुः. इन्द्रं स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियेमेधासो अस्वरन्.. (२) मनुष्य स्तोत्रों के द्वारा इंद्र को उसी प्रकार प्राप्त होते हैं, जिस प्रकार कण्व गोत्रीय ऋषि तीनों लोकों के स्वामी एवं फल की कामना करने वालों के द्वारा पूजित इंद्र को स्तुतियों के कारण प्राप्त हुए थे. जिस प्रकार सूर्य अपने नियंता इंद्र को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार भृगुवंश के ऋषि इंद्र को प्राप्त होते हैं. (२) सूक्त—११ देवता—इंद्र इन्द्रः पूर्भिदातिरद् दासमर्कैर्विद्वद्वसुर्दयमानो वि शत्रून्. ब्रह्मजूतस्तन्वा वावृधानो भूरिदात्र आपृणद् रोदसी उभे.. (१) इंद्र देव ने शत्रुओं के नगरों को अपने पूजनीय बल से नष्ट कर दिया है और शत्रुओं की पूर्ण रूप से हिंसा कर दी है. इंद्र ने किरणों के द्वारा अंधकार का नाश करने वाले दिन को बढ़ाया है. इंद्र ने शत्रुओं का धन प्राप्त किया है तथा उन के पुत्र आदि की विशेष रूप से हिंसा की है. पर्याप्त स्तोत्रों के कारण वृद्धि को प्राप्त शरीर द्वारा धन संपन्न इंद्र ने धरती और आकाश दोनों को व्याप्त किया है. (१) मखस्य ते तविषस्य प्र जूतिमियर्मि वाचममृताय भूषन्. इन्द्र क्षितीनामसि मानुषीणां विशां दैवीनामुत पूर्वयावा. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! मैं तुम्हारे प्रशंसनीय बल को बढ़ाने वाली स्तुतिरूपी वाणी को प्रेरित करता हूं. मैं अन्न प्राप्ति के लिए तुम्हें अलंकृत करता हूं. हे इंद्र! तुम मनुष्य संबंधी और देव संबंधी प्रजाओं के आगे चलने वाले हो. (२) इन्द्रो वृत्रमवृणोच्छर्धनीतिः प्र मायिनाममिनाद् वर्पणीतिः अहन् व्यं समुशधग् वनेष्वाविर्धेना अकृणोद् रम्याणाम्.. (३) अपने हिंसक बल का शत्रु पर प्रयोग करने वाले इंद्र देव ने सभी ओर से व्याप्त करने वाले वृत्र को रोका और अपने शस्त्र से मायावी शत्रु का विनाश किया. इंद्र ने वृत्र असुर को भुजाओं से हीन कर के मारा. इस के बाद उस के रमण के साधनों — पत्नी अथवा गौ आदि को अपने अधिकार में किया. (३) इन्द्रः स्वर्षा जनयन्नहानि जिगायोशिग्भिः पृतना अभिष्टिः. प्रारोचयन्मनवे केतुमह्नामविन्दज्ज्योतिर्बृहते रणाय.. (४) इंद्र स्वर्ग प्राप्त कराने वाले तथा शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं. इंद्र अंधकार का विनाश कर के दिनों को जन्म देते हैं. इंद्र ने असुरों के साथ युद्ध कर के उन की सेनाओं को जीता है. इंद्र ने यजमानों के अधिक सुख के लिए दिन के स्वामी सूर्य को आकाश में दीप्त किया और उस से महान तेज प्राप्त किया है. (४) इन्द्रस्तुजो बर्हणा आ विवेश नृवद् दधानो नर्या पुरूणि. अचेतयद् धिय इमा जरित्रे प्रेमं वर्णमतिरच्छुक्रमासाम्.. (५) जैसे युद्ध का इच्छुक वीर शत्रु सेना में प्रवेश करता है, उसी प्रकार इंद्र भी यजमानों के हित के लिए असुरों की विशाल सेनाओं में प्रवेश करते हैं तथा स्तुति करने वालों के लिए उषाओं का उदय करते हैं. इंद्र ही उषाओं के श्वेत रंग को बढ़ाते हैं. (५) महो महानि पनयन्त्यस्येन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरूणि. वृजनेन वृजिनान्त्सं पिपेष मायाभिर्दस्यूँरभिभूत्योजाः.. (६) इंद्र ने जो अनेक प्रशंसनीय कार्य किए हैं, श्रोता उन की प्रशंसा करते हैं. शत्रुओं को वश में करने वाले इंद्र ने पापी राक्षसों को अपने अस्त्रों से नष्ट कर दिया है तथा शक्तिशाली असुरों का विनाश कर दिया. (६) युधेन्द्रो मह्ना वरिवश्चकार देवेभ्यः सत्पतिश्चर्षणिप्राः. विवस्वतः सदने अस्य तानि विप्रा उक्थेभिः कवयो गृणन्ति.. (७) किसी की सहायता न ले कर इंद्र ने अकेले ही अपने स्तुतिकर्ताओं को धन प्राप्त कराया. इंद्र यजमानों की सदा रक्षा करते हैं और मनुष्यों को इच्छित फल देते हैं. यज्ञ आदि कर्म करने वाले मनुष्य इंद्र का वरण करते हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
सत्रासाहं वरेण्यं सहोदां ससवांसं स्वरपश्च देवीः. ससान यः पृथिवीं द्यामुतेमामिन्द्रं मदन्त्यनु धीरणासः.. (८) बल प्रदान करने वाले, शत्रु सेना को पराजित करने वाले एवं स्वर्गीय जलों के सेवनकर्ता इंद्र ने मनुष्यों को धरती तथा आकाश दिए हैं. उन इंद्र की स्तुति करने वाले और यज्ञ कर्ता यजमान हवि दे कर उन्हें प्रसन्न करते हैं. (८) ससानात्याँ उत सूर्यं ससानेन्द्रः ससान पुरुभोजसं गाम्. हिरण्ययमुत भोगं ससान हत्वी दस्यून् प्रार्यं वर्णमावत्.. (९) इंद्र ने मनुष्यों के उपभोग के लिए घोड़े, हाथी और ऊंट दिए हैं. गायों, भैंसों तथा सोने के आभूषणों को भी इंद्र ने ही दिया है. इंद्र ने सूर्य को प्रकाशित किया है तथा राक्षसों का विनाश कर के सभी वर्णों का पालन किया है. (९) इन्द्र ओषधीरसनोदहानि वनस्पतीँरसनोदन्तरिक्षम्. बिभेद वलं नुनुदे विवाचो ऽ थाभवद् दमिताभिक्रतूनाम्.. (१०) इंद्र ने प्राणियों के उपभोग के लिए जौ, गेहूं आदि की रचना की है. इंद्र ने ही वनस्पतियों एवं दिवसों की रचना की है. उन्हीं ने सब के उपकारकर्ता अंतरिक्ष की रक्षा की है. इंद्र ने बल नाम के असुर को चीर डाला तथा विरोधियों का अनुष्ठान करने वालों का मर्दन किया. (१०) शुंन हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन् भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमूग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संजितं धनानाम्.. (११) हम धन और ऐश्वर्य वाले तथा सुखदाता इंद्र को इस संग्राम में बुलाते हैं. जिस युद्ध से अन्न प्राप्त होता है, हम उस में अपनी रक्षा के लिए इंद्र का आह्वान करते हैं. शत्रुओं का नाश करने वाले और धनों के विजेता इंद्र का हम आह्वान करते हैं. (११) सूक्त—१२ देवता—इंद्र उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्येन्द्रं समर्ये महया वसिष्ठ. आ यो विश्वानि शवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचांसि.. (१) हे ऋत्विजो! तुम अन्न प्राप्ति की इच्छा से स्तोत्रों का उच्चारण करो. हे यजमान वसिष्ठ! अपने ऋत्विजों के साथ हवि आदि साधनों से इष्टदेव की पूजा करो. जिस इंद्र ने अपने बल से सभी प्राणियों का विस्तार किया है, वे इंद्र परिचर्या करते हुए मुझ वसिष्ठ के वचनों को यहां आ कर सुने. (१) अयामि घोष इन्द्र देवजामिरिरज्यन्त यच्छुरुधो विवाचि. नहि स्वमायुश्चिकिते जनेषु तानींदहांस्यति पर्ष्यस्मान्.. (२)
हे इंद्र! मैं उस स्तोत्र का उच्चारण करता हूं जो देवों को बंधु के समान प्रिय है. इस स्तोत्र के द्वारा उस सोम की वृद्धि होती है जो यजमान को स्वर्ग का फल देने वाला है. मनुष्यों के मध्य रहने वाला यह यजमान अपनी आयु नहीं जानता है. हमें इतनी दीर्घ आयु प्रदान करो, जिस से यह तुम्हारे लिए यज्ञ आदि का अनुष्ठान कर सके. आयु का नाश करने वाले जो पाप हैं, उन्हें इस से दूर रखो. (२) युजे रथं गवेषणं हरिभ्यामुप ब्रह्माणि जुजुषाणमस्थुः. वि बाधिष्ट स्य रोदसी महित्वेन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघन्वान्.. (३) इंद्र गौओं को प्राप्त कराने वाले अपने रथ में हरि नाम के अश्वों को जोड़ते हैं. हमारे स्तोत्र सभी के द्वारा सेवा किए जाते हुए इंद्र को प्राप्त होते हैं. इंद्र ने अपनी महिमा से धरती और आकाश को आक्रांत किया है. इंद्र ने अपने शत्रुओं अर्थात् वृत्र आदि राक्षसों को इस प्रकार मारा है कि वे शेष नहीं रहे हैं. (३) आपश्चित् पिप्यु स्तर्यो ३ न गावो नक्षन्नृतं जरितारस्त इन्द्र. याहि वायुर्न नियुतो नो अच्छा त्वं हि धीभिर्दायसे वि वाजान्.. (४) हे इंद्र! यह निचोड़ा गया सोमरस गायों के समान वृद्धि को प्राप्त हो रहा है. हे इंद्र! तुम्हारी स्तुति करने वाले ऋत्विज् यज्ञमंडप में पहुंच चुके हैं, इसलिए तुम हमारे स्तोत्र को सुनने के लिए आओ. वायु देव यज्ञस्थलों में जाने के लिए जिस प्रकार अपने अश्वों की ओर जाते हैं, तुम भी उसी प्रकार संतुष्ट हो कर हमें अन्न देने के लिए आओ. (४) ते त्वा मदा इन्द्र मादयन्तु शुष्मिणं तुविराधसं जरित्रे. एको देवत्रा दयसे हि मर्तानस्मिञ्छूर सवने मादयस्व.. (५) हे इंद्र! संस्कार किए गए सोम तुम्हें मदयुक्त करें. तुम बलशाली और स्तोताओं को अधिक धन देने वाले हो. देवों के मध्य अकेले तुम्हीं ऐसे हो जो मनुष्यों पर दया करते हो. हे इंद्र! इस यज्ञ में मनचाहा फल दे कर हमें प्रसन्न करो. (५) एवेदिन्द्रं वृषणं वज्रबाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः. स न स्तुतो वीरवद् धातु गोमद् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६) वसिष्ठ कुल के ऋषि कामनाओं की वर्षा करने वाले और हाथ में वज्र धारण करने वाले इंद्र की पूजा स्तोत्रों से करते हैं. वे इंद्र हमारे स्तोत्रों के द्वारा पूजित हो कर हमें पुत्रों एवं गायों से युक्त धन प्रदान करें. हे देवो! आप भी इंद्र का अनुकरण करते हुए क्षेमों से सदा हमारी रक्षा करें. (६) ऋजीषी वज्री वृषभस्तुराषाट्छुष्मी राजा वृत्रहा सोमपावा. युक्त्वा हरिभ्यामुप यासदर्वाङ् माध्यंदिने सवने मत्सदिन्द्रः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१३ देवता—इंद्र
सोमरस के प्रेमी, वज्रधारी, कामनाओं की वर्षा करने वाले, शत्रुओं को पराजित करने वाले, शत्रु पराभवकारी बदल से संपन्न, सभी देवों के स्वामी, वृत्र असुर का विनाश करने वाले एवं नियम से सोमरस का पान करने वाले इंद्र अपने हरि नाम के घोड़ों को रथ में जोड़ कर हमारे यज्ञ में आएं और इस माध्यंदिन यज्ञ में सोमपान कर के प्रसन्न हों. (७) सूक्त—१३ देवता—इंद्र इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पते ऽस्मिन् यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू. आ वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुवो ऽस्मे रयिं सर्ववीरं नि यच्छतम्.. (१) हे बृहस्पति देव! तुम और इंद्र इस यज्ञ में प्रसन्न होने वाले तथा धनों की वर्षा करने वाले हो. तुम दोनों सोमरस का पान करो. उत्तम सोमरस ने तुम दोनों के शरीर में प्रवेश किया है. तुम हमें सभी पुत्रों से युक्त धन प्रदान करो. (१) आ वो वहन्तु सप्तयो रघुष्यदो रघुप्रत्वानः प्र जिगात बाहुभिः. सीदता बर्हिरुरु वः सदस्कृतं मादयध्वं मरुतो मध्वो अन्धसः.. (२) हे मरुतो! मंद गति वाले अश्व तुम्हें यज्ञशाला में लाएं. तुम भी शीघ्र गमन के साधनों द्वारा यहां आओ. हम ने तुम्हारे बैठने के लिए यज्ञवेदी के रूप में विशाल स्थान बनाया है. उस पर हम ने कुश बिछाए हैं. तुम उन कुशों पर बैठो. वहां बैठ कर तुम सोमरस पियो और प्रसन्न होओ. (२) इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया. भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (३) रथकार जिस प्रकार रथ बनाता है, उसी प्रकार हम पूज्य अग्नि के लिए अपनी तीव्र बुद्धि से बनाए गए स्तोत्र से अग्नि देव की पूजा करते हैं. अग्नि के निवास स्थान अर्थात् यज्ञशालाओं में हमारी उत्तम बुद्धि कल्याणकारिणी हो. हे अग्नि देव! तुम्हारे बंधुभाव को प्राप्त कर के हम किसी के द्वारा पराजित न हों. (३) ऐभिरग्ने सरथं याह्यर्वाङ् नानारथं वा विभवो ह्यश्वाः. पत्नीवतस्त्रिंशतं त्रींश्च देवाननुष्वधमा वह मादयस्व.. (४) हे अग्नि! तुम तैंतीस देवताओं के साथ एक रथ पर बैठ कर हमारे यज्ञ में आओ. तुम चाहो तो अनेक रथों में बैठ कर आओ. तुम्हारे अश्व अत्यधिक शक्तिशाली हैं. इसलिए तुम जबजब सोमरस पान के लिए बुलाए जाओ, तबतब उन देवों को पत्नियों सहित यहां लाओ और सोमपान से उन्हें आनंदित करो. (४) सूक्त—१४ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*
वयमु त्वामपूर्व स्थूरं न कच्चिद् भरन्तो ऽ वस्यवः. वाजे चित्रं हवामहे.. (१) हे सदा नवीन रहने वाले इंद्र! तुम पूज्य हो और अपने उपासकों का पोषण करने वाले हो. हम रक्षा की कामना करते हुए तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमारे किसी विरोधी के पास मत जाओ. हम तुम्हें उसी प्रकार बुलाते हैं, जैसे किसी अत्यधिक शक्तिशाली राजा को विजय के हेतु बुलाया जाता है. (१) उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो घृषत्. त्वामिद्धिावितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्.. (२) हे इंद्र! हम युद्ध प्रारंभ होने पर रक्षा के लिए तुम्हारे समीप जाते हैं. जो इंद्र नित्य युवा और शत्रुओं को पराजित करने वाले तथा अत्यधिक शक्तिशाली हैं, वे हमारी रक्षा के लिए आएं. हे इंद्र! हम तुम्हें अपना सखा मानते हैं, इसलिए हम अपनी रक्षा के हेतु तुम्हारी ही इच्छा करते हैं. (२) यो न इदमिदं पुरा प्र वस्य आनिनाय तमु व स्तुषे. सखाय इन्द्रमूतये.. (३) हे मित्र बने हुए यजमान! मैं तुम्हारी रक्षा के लिए इंद्र की स्तुति करता हूं. जिस इंद्र ने पहले हमें निर्देश कर के गाय आदि धन दिया था, हम उसी इंद्र की स्तुति करते हैं. (३) हर्यश्वं सत्पतिं चर्षणीसहं स हि ष्मा यो अमन्दत. आ तु नः स वयति गव्यमश्व्यं स्तोतृभ्यो मघवा शतम्.. (४) इन मनुष्यों के रक्षक इंद्र के अश्व हरे रंग के हैं. जो इंद्र मनुष्यों पर नियंत्रण रखते हैं तथा स्तुतियां सुन कर प्रसन्न होते हैं, मैं उन्हीं इंद्र की स्तुति करता हूं. वे इंद्र हम स्तोताओं को सौ गाएं तथा सौ घोड़े प्रदान करें. (४) सूक्त—१५ देवता—इंद्र प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये सत्यशुष्माय तवसे मतिं भरे. अपामिव प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावृतम्.. (१) मैं अतिशय महान, गुणों में बढ़े हुए, अत्यधिक धन वाले एवं सच्ची सामर्थ्य वाले इंद्र की स्तुति बल प्राप्त करने के लिए करता हूं. उन इंद्र का धन सभी मनुष्यों का पोषण करने में समर्थ है. जिस प्रकार जल नीचे की ओर जाता है, उसी प्रकार इंद्र का धन बल प्रदान करने के लिए प्रवृत्त होता है. (१) अध ते विश्वमनु हासदिष्टय आपो निम्नेव सवना हविष्मतः. ebook converter DEMO Watermarks*
यत् पर्वते न समशीत हर्यत इन्द्रस्य वज्रः श्रथिता हिरण्ययः.. (२) हे इंद्र! जिस प्रकार जल नीचे की ओर जाता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् तुम्हारे यज्ञ का स्थान है. यजमान के तीनों सवन तुम्हें प्राप्त होते हैं. इंद्र का सुंदर, शत्रुओं की हिंसा करने वाला और स्वर्ण से विभूषित वज्र पर्वत को विदीर्ण करने में समर्थ हुआ. (२) अस्मै भीमाय नमसा समध्वर उषो न शुभ्र आ भरा पनीयसे. यस्य धाम श्रवसे नामेन्द्रियं ज्योतिरकारि हरितो नायसे.. (३) हे दीप्त उषा देवता! शत्रुओं के लिए भयंकर एवं स्तुति के अधिक योग्य इंद्र को अन्न सहित हमारे यज्ञ में लाओ. जिन इंद्र का जल अन्न की समृद्धि करता है तथा जो इंद्र दिशाओं को प्रकाशित करते हैं, उन्हें हमारी यज्ञशाला में लाओ. (३) इमे त इन्द्र ते वयं पुरुष्टुत ये त्वारभ्य चरामसि प्रभूवसो. नहि त्वदन्यो गिर्वणो गिरः सघत् क्षोणीरिव प्रति नो हर्य तद् वचः.. (४) हे इंद्र! तुम महान धन से संपन्न और स्तुतियों के पात्र हो. हम तुम्हारे ही आश्रित हैं. हे इंद्र! तुम्हारी महिमा बहुत अधिक है तथा हमारी स्तुतियां बहुत कम हैं. इस कारण तुम्हें हमारी स्तुति सुननी चाहिए. जिस प्रकार राजा प्रजा की बात सुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी प्रार्थना सुनो. (४) भूरि त इन्द्र वीर्यं १ तव स्मस्यस्य स्तोतुर्मघवन् काममा पृण. अनु ते द्यौर्बृहती वीर्यं मम इयं च ते पृथिवी नेम ओजसे.. (५) हे इंद्र! तुम्हारा वृत्र वध का वीरतापूर्ण कार्य महान है. इसी को ध्यान में रख कर हम तुम्हारे उपासक बने हैं. हे धन के स्वामी इंद्र! स्तुति करते हुए इस यजमान की अभिलाषा पूर्ण करो. हे इंद्र! तुम्हारा बल महान आकाश को नापता है. यह पृथ्वी तुम्हारे बल के कारण झुकती है. (५) त्वं तमिन्द्र पर्वतं महामुरुं वज्रेण वज्रिन् पर्वशश्चकर्तिथ. अवासृजो निवृताः सर्तवा अपः सत्रा विश्वं दधिषे केवलं सहः.. (६) हे वज्रधारी इंद्र! तुम ने प्रसिद्ध, महान और विशाल पर्वतों के पंख आदि को अपने वज्र से काटा था. इस के बाद तुम ने पर्वत द्वारा रोके गए जलों को नदी के रूप में बहने के लिए छोड़ दिया था. केवल तुम ही इस प्रकार का असाधारण बल धारण करते हो. (६) सूक्त—१६ देवता—बृहस्पति उदप्रुतो न वयो रक्षमाणा वावदतो अभियस्येव घोषाः. गिरिभ्रजो नोर्मयो मदन्तो बृहस्पतिमभ्य १ र्का अनावन्.. (१)
जिस प्रकार जलों में गमन करते हुए तथा व्याध आदि से अपनी रक्षा करते हुए पक्षी उच्च ध्वनि करते हैं, जिस प्रकार मेघ समूह गर्जन करता है तथा जिस प्रकार मेघों से बरसने वाला जल फसलों आदि को तृप्त करता है, उसी प्रकार स्तोता अपनी स्तुतियों से बृहस्पति देव की प्रशंसा करते हैं. (१) सं गोभिराङ्गिरसो नक्षमाणो भग इवेदर्यमणं निनाय. जने मित्रो न दम्पती अनक्ति बृहस्पते वाजयाशूँरिवाजौ.. (२) महर्षि अंगिरस जिस प्रकार भगदेव के समान विवाह के समय पतिपत्नी को गोघृत आदि सहित अर्यमा देव की शरण प्राप्त कराते हैं, उसी प्रकार अंगिरस ऋषि इस पतिपत्नी को अर्यमा देव की शरण प्राप्त कराएं. सूर्य जिस प्रकार प्रकाश के निमित्त अपनी किरणों को एकत्र करते हैं, उसी प्रकार अंगिरस ऋषि इन पतिपत्नी को एकत्र करें. (२) साध्वर्या अतिथिनिरिशिरा स्पार्हा: सुवर्णा अनवद्यरूपा:. बृहस्पतिः पर्वतेभ्यो वितूर्या निर्गा ऊपे यवमिव स्थिविभ्यः.. (३) जिस प्रकार कोठियों से अन्न निकालते हैं, उसी प्रकार सज्जन पुरुषों को प्राप्त होने वाले, अतिथियों को तृप्त करने वाले, सब के द्वारा चाहे गए, सुंदर रंगों वाले एवं प्रशंसनीय रूप वाले बृहस्पति देव पर्वतों से निकाल कर गाएं स्तुति करने वालों को प्रदान करते हैं. (३) आपुषायन् मधुन ऋतस्य योनिमवक्षिपन्नर्क उल्कामिव द्योः. बृहस्पतिरुद्धरन्नश्मनो गा भूम्या उदनेव वि त्वचं बिभेद.. (४) बृहस्पति देव ने जल से धरती को सभी ओर से सींचते हुए जल के समूह मेघ को आकाश से उसी प्रकार नीचे गिराया, जिस प्रकार सूर्य आकाश से उल्का गिराते हैं. जिस प्रकार जल धरती को कोमल बना देते हैं, उसी प्रकार बृहस्पति देव पणियों के द्वारा चुरा कर पर्वतों में रखी गई गायों को बाहर निकाल कर उन के खुरों से धरती को खुदवाते हैं. (४) अप ज्योतिषा तमो अन्तरिक्षादुद्नः शीपालमिव वात आजत्. बृहस्पतिरनुमृश्या वलस्याभ्रमिव वात आ चक्र आ गाः.. (५) वायु जिस प्रकार जल से काई को अलग कर देते हैं, उसी प्रकार बृहस्पति ने अपने प्रकाश से पर्वत की गुफाओं के उस अंधकार का विनाश कर दिया था जो गायों को छिपाए हुए था. वायु जिस प्रकार बादलों को सभी ओर बिखरा देती है, बृहस्पति देव ने उसी प्रकार बल नामक असुर द्वारा चुरा कर पर्वत की गुफा में रखी गई गायों को निकाल कर सभी ओर फैला दिया था. (५) यदा वलस्य पीयतो जसुं भेद बृहस्पतिरग्नितपोभिरर्कैः. दद्भ्रिं जिह्व परिविष्टमाददाविर्निधीँरकृणोदुस्रियाणाम्.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
बृहस्पति देव ने जिस समय बल नामक असुर के हिंसा के साधन आयुध को अग्नि के समान ताप वाले अपने मंत्रों से तोड़ दिया था, उस समय उन्होंने बल असुर के द्वारा छिपाई गई दुधारू गायों को उसी प्रकार प्रकट कर दिया था, जिस प्रकार चबाए हुए अन्न को जीभ भक्षण करती है. जब बृहस्पति देव ने पर्वत की गुफा में छिपी हुई गायों को उन के रंभाने के स्वर से जान लिया, तब पर्वत का भेदन कर के उन्होंने गायों को इस प्रकार बाहर निकाल लिया, जिस प्रकार मोर आदि के अंडे को तोड़ कर उस के भीतर से बच्चा निकाला जाता है. (६) बृहस्पतिरमत हि त्यदासां नाम स्वरीणां सदने गुहा यत्. आण्डेव भित्त्वा शकुनस्य गर्भमुदुस्रियाः पर्वतस्य त्मनाजत्.. (७) बृहस्पति देव ने पर्वत में छिपाई हुई गायों को शिला हटा कर उसी प्रकार देख लिया, जिस प्रकार जल कम हो जाने पर मनुष्य उस में रहने वाली मछलियों को देख लेते हैं. जिस प्रकार वृक्ष से चमस बाहर निकाला जाता है, उसी प्रकार बृहस्पति देव ने गायों को छिपाने वाले बल असुर को मार कर गायों को बाहर निकाला था. (७) अश्रापिनद्धं मधु पर्यपश्यन्मत्स्यं न दीन उदनि क्षियन्तम्. निष्टज्जभार चमसं न वृक्षाद् बृहस्पतिर्विर्वेणा विकृत्य.. (८) बृहस्पति देव ने पर्वत में छिपाई हुए गायों को उसी प्रकार देख लिया, जिस प्रकार जल कम हो जाने पर मनुष्य उस में रहने वाली मछलियों को देख लेते हैं. जिस प्रकार वृक्ष से चमस बाहर निकाला जाता है उसी प्रकार बृहस्पति देव ने गायों को छिपाने वाले असुर को मार कर गायों को बाहर निकाला था. (८) सोषामविन्दत् स स्व १: सो अग्निं सो अर्केण वि बबाधे तमांसि. बृहस्पतिर्गोवपुषो वलस्य निर्मज्जानं न पर्वणो जभार.. (९) बृहस्पति देव ने पर्वत की गुफा में अंधकार से छिपी हुई गायों को देखने के लिए उषा देवी को प्राप्त किया. बृहस्पति देव ने प्रकाश करने के लिए सूर्य एवं अग्नि को प्राप्त किया. इन्हें प्राप्त कर के बृहस्पति देव ने प्रकाश से अंधकार को नष्ट कर दिया. बृहस्पति देव ने गौ रूपधारी असुर का हनन कर के गायों को इस प्रकार बाहर निकाला, जिस प्रकार हड्डियों से मज्जा अर्थात् चरबी बाहर निकाली जाती है. (९) हिमेव पर्णा मुषिता वनानि बृहस्पतिनाकृपयद् वलो गाः. अनानुकृत्यमपुनश्चकार यात् सूर्यामासा मिथ उच्चरातः.. (१०) जिस प्रकार हिमपात सारहीन पत्तों को ग्रहण करता है, उसी प्रकार बृहस्पति देव ने बल असुर के द्वारा चुराई गई गायों को प्राप्त किया. बल असुर ने भी गाएं बृहस्पति देव को प्रदान कीं. बृहस्पति द्वारा ही सूर्य दिन को और चंद्रमा रात्रि को प्रकट करता हुआ घूमता है. ebook converter DEMO Watermarks*
बृहस्पति देव का यह कर्म ऐसा है, जिसे कोई दूसरा नहीं कर सकता और उसे दोबारा नहीं किया जा सकता. (१०) अभि श्यावं न कृशनेभिरश्वं नक्षत्रेभिः पितरो द्यामपिंशन्. रात्र्यां तमो अदधुर्ज्योतिरह्नन् बृहस्पतिर्भिन्ददद्रिं विदद् गाः.. (११) बृहस्पति देव ने जब गायों को छिपाने वाले पर्वत को विदीर्ण कर के गायों को प्राप्त किया, तब इंद्र आदि देवों ने आकाश को नक्षत्रों से उसी प्रकार अलंकृत किया, जिस प्रकार घोड़े को सजाते हैं. इस प्रकार उन्होंने रात्रि में अंधकार को तथा दिन में प्रकाश को स्थापित किया. (११) इदमकर्म नमो अभियाय यः पूर्वीरन्वानोनवीति. बृहस्पतिः स हि गोभिः सो अश्वैः स वीरेभिः स नृभिर्नो वयो धात्.. (१२) मेघ को विदीर्ण कर के जल प्रदान करने वाले बृहस्पति देव को हम यह हवि प्रदान करते हैं. बृहस्पति देव ने हमारी ऋचाओं की प्रशंसा की है. वे हमें गायों, घोड़ों, पुत्रों तथा सेवकों सहित अन्न प्रदान करें. (१२) सूक्त—१७ देवता—इंद्र अच्छा म इन्द्रं मतयः स्वर्विदः सध्रीचीर्विश्वा उशतीरनूषत. परि ष्वजन्ते जमयो यथा पतिं मर्यं न शुन्ध्युं मघवानमूतये.. (१) मैं सुंदर हाथ और वाणी वाला हूं. मेरी स्तुतियां इंद्र देव की प्रशंसा करती हैं. ये स्तुतियां स्वर्ग प्राप्त करने में सहायक एवं परस्पर मिली हुई हैं. इंद्र की कामना करती हुई ये स्तुतियां इस प्रकार आपस में लिपटी हुई हैं, जिस प्रकार पुत्र की कामना करने वाली स्त्रियां पति से लिपटती हैं. जिस प्रकार पिता आदि को आता हुआ देख कर पुत्र अपनी रक्षा के लिए उन से लिपट जाते हैं, उसी प्रकार मेरी स्तुतियां इंद्र से लिपटती हैं. (१) न घा त्वद्रिगप वेति मे मनस्त्वे इत् कामं पुरुहूत शिश्रय. राजेव दस्म नि षदो ऽ धि बर्हिष्यस्मिन्त्सु सोमेवपानमस्तु ते.. (२) हे इंद्र! मेरा मन कभी तुम से अलग नहीं होता और सदा तुम्हारी ही कामना करता रहता है. हे शत्रुओं का विनाश करने वाले इंद्र देव! जिस प्रकार राजा सिंहासन पर बैठता है, उसी प्रकार तुम इन कुशों पर बैठो तथा भलीभांति संस्कार किए गए इस सोम धारा में सोमरस का पान करो. (२) विषूवृदिन्द्रो अमतेरुत क्षुधः स इन्द्रायो मघवा वस्व ईशते. तस्यैदिमे प्रवणे सप्त सिन्धवो वयो वर्धन्ति वृषभस्य शुष्मिणः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र देव हमारी दरिद्रता, बुद्धिहीनता तथा भूख का नाश करें. इंद्र देव ही देने योग्य धन के स्वामी हैं. वर्षा करने वाले इंद्र की ही गंगा आदि सात नदियां निचले स्थानों में अन्न को बढ़ाती है. (३) वयो न वृक्षं सुपलाशमासदन्त्सोमास इन्द्रं मन्दिनश्चमूषदः. प्रैषामनीकं शवसा दविद्युतद् विदत् स्व १ र्मनवे ज्योतिरार्यम्.. (४) जिस प्रकार पक्षी वृक्ष पर बैठते हैं, उसी प्रकार प्रसन्नता देने वाले सोम इंद्र का आश्रय लेते हैं. इन सोमों का मुख तेज से दीप्त होता है. इन्हीं सोमों ने मनुष्यों को प्रकाश प्राप्त करने के लिए सूर्य के रूप में ज्योति प्रदान की है. (४) कृतं न श्वघ्नी वि चिनोति देवने संवर्गं यन्मघवा सूर्य जयत्. न तत् ते अन्यो अनु वीर्यं शकन्न पुराणो मघवन् नोत नूतनः.. (५) जुआरी जिस प्रकार पासों को पकड़ता है, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां इंद्र को ग्रहण करती है. धन के स्वामी इंद्र ने अंधकार का विनाश करने वाले सूर्य देव को आकाश में स्थापित किया है. हे इंद्र! तुम्हारे इस कार्य का अनुकरण प्राचीन अथवा आधुनिक कोई अन्य नहीं कर सकता है. (५) विशंविशं मघवा पर्यशायत जनानां धेना अवचाकशद् वृषा. यस्याह शक्रः सवनेषु रण्यति स तीव्रैः सोमैः सहते पृतन्यतः.. (६) कामनाओं को पूर्ण करने वाले इंद्र अपने सभी उपासकों के पास एक साथ पहुंच जाते हैं तथा सब की स्तुतियां एक ही समय में सुन लेते हैं. इस प्रकार के इंद्र जिस यजमान के तीनों सपनों में प्रतिष्ठित होते हैं, वह अत्यधिक मादकता प्रदान करने वाले सोमों के प्रभाव से युद्ध के इच्छुक शत्रुओं को पराजित करता है. (६) आपो न सिन्धुमभि यत् समक्षरन्त्सोमास इन्द्रं कुल्या इव हृदम्. वर्धन्ति विप्रा महो अस्य सादने यवं न वृष्टिर्दिव्येन दानुना.. (७) जिस प्रकार जल सागर में जाता है और छोटी नदियां सरोवरों को प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार सोमरस इंद्र देव की ओर जाते हैं. स्तोता अपनी स्तुतियों से इंद्र देव की महिमा को उसी प्रकार बढ़ाते हैं, जिस प्रकार जल देते हुए मेघ अन्न को बढ़ाते हैं. (७) वृषा न क्रुद्धः पतयद् रजःस्वा यो अर्यपत्नीरकणोदिमा अपः. स सुन्वते मघवा जीरदानवे ऽ विन्दज्ज्योतिर्मनवे हविष्मते.. (८) जो इंद्र सूर्य के द्वारा रक्षित जलों को पृथ्वी पर गिराते हैं, वे क्रोधित बैल के समान मेघ को छिन्नभिन्न कर देते हैं. इस के पश्चात धन के स्वामी इंद्र सोमरस निचोड़ने वाले एवं शीघ्र हवि प्रदान करने वाले यजमान को प्रकाश युक्त तेज प्रदान करते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
उज्जायतां परशुर्ज्योतिषा सह भूया ऋतस्य सुदुघा पुराणवत्. वि रोचतामरुषो भानुना शुचिः स्य १ र्ण शुक्रं शुशुचीत सत्पतिः.. (९) मेघ को विदीर्ण करने के लिए इंद्र का वज्र अपने तेज के साथ प्रकट हो तथा जल का दोहन करने वाली मध्यमा वाणी पहले के समान प्रकट हो तथा अपने तेज से प्रकाश वाली हो. सूर्य देव जिस प्रकार अपने ही तेज से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार सज्जनों का पालन करने वाले इंद्र अत्यधिक दीप्त हों. (९) गोभिष्टरेमामतिं दुरेवां यवेन क्षुधं पुरुहूत विश्वाम्. वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम.. (१०) हे बहुतों के द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! तुम्हारी कृपा को प्राप्त करते हुए हम यजमान तुम्हारे द्वारा दी गई गायों के कारण दरिद्रता को पार करें. तुम्हारे द्वारा दिए हुए अन्न से हम अपने लोगों की भूख दूर करें. तुम्हारी कृपा से हम अपने समान जनों में श्रेष्ठ हों तथा राजा से धन प्राप्त कर के अपने शत्रुओं को पराजित करें. (१०) बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः. इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरिवः कृणोतु.. (११) बृहस्पति देव पश्चिम दिशा से, ऊपर से एवं नीचे से अपने वाले हिंसक पापियों से हमारी रक्षा करें. इंद्र देव सामने से तथा मध्य भाग से आते हुए हिंसक से हमारी रक्षा करें. इस प्रकार चारों ओर से हमारी रक्षा करते हुए सखा रूप इंद्र हमें धन प्रदान करें. (११) बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य. धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिदृयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१२) हे बृहस्पति एवं इंद्र! तुम दोनों आकाश और धरती संबंधी धन के स्वामी हो. इसलिए मुझ स्तोता को धन प्रदान करते हुए सदा रक्षा करो. (१२) सूक्त—१८ देवता—इंद्र वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः. कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते.. (१) हे इंद्र! हम कण्व गोत्र वाले महर्षि सखा के समान तुम्हारी कामना करते हुए तुम से संबंधित स्तोत्र से तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१) न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्ठौ. तवेदु स्तोमं चिकेत.. (२) हे वज्रधारी इंद्र! यज्ञरूपी नवीन कर्म की इच्छा पर हम इस समय तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य देव की स्तुति नहीं करते हैं. हम केवल तुम्हारी स्तुति को जानते हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति. यन्ति प्रमादमतन्द्राः.. (३) इंद्र आदि देव सोमरस निचोड़ने वाले यजमान की कामना करते हैं. वे उदासीनता नहीं करते हैं. वे अत्यंत मदकारी सोम रस के लिए आलस्य रहित हो कर जाते हैं. (३) वयमिन्द्र त्वायवो ऽभि प्र णोनुमो वृषन्. विद्धि त्व १ स्य नो वसो.. (४) हे कामनाओं को पूर्ण करने वाले इंद्र! तुम्हारी इच्छा करते हुए हम तुम्हारे सामने तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम भी हमारे स्तोत्र की कामना करो. (४) मा नो निदे च वक्तवे ऽ र्यों रन्धीरराव्णे. त्वे अपि क्रतुर्मम.. (५) हे स्वामी इंद्र! तुम हमें निंदक के वश में मत करो. हमें कठोर वचन बोलने वालों तथा दान न करने वाले शत्रुओं के अधीन मत करो. (५) त्वं वर्मासि सप्रथः पुरोयोधश्च वृत्रहन्. त्वया प्रति ब्रुवे युजा.. (६) हे वृत्र का हनन करने वाले और सब से महान इंद्र! तुम आगे रह कर युद्ध करते हो. तुम मेरे कवच हो. मैं तुम्हारी सहायता से शत्रुओं को भयभीत करता हूं. (६) सूक्त—१९ देवता—इंद्र वार्त्रहत्याय शवसे पृतनाषाह्याय च. इन्द्र त्वा वर्तयामसि.. (१) हे इंद्र! हम वृत्र हनन के समान बल प्रदर्शन और शत्रु सेनाओं को अपमानित करने जैसे कर्मों के निमित्त तुम्हें अपने सामने बुलाते हैं. (१) अर्वाचीनं सु ते मन उत चक्षुः शतक्रतो. इन्द्र कृण्वन्तु वाघतः.. (२) हे अनेक कर्म करने वाले इंद्र! यज्ञ कर्म का निर्वाह करने वाले ऋत्विज् तुम्हें हमारे सामने लाएं. वे तुम्हारी दृष्टि को भी हमारे सामने करें. (२) नामानि ते शतक्रतो विश्वाभिर्गीर्भिरीमहे. इन्द्राभिमातिषाह्यो.. (३) हे शतक्रतु इंद्र! हम पाप का विनाश करने वाले यज्ञ कर्म में तुम्हारी सभी स्तुतियों की कामना करते हैं. हे इंद्र! तुम संग्राम में शत्रुओं का विनाश करने वाले हो. (३) पुरुष्टुतस्य धामभिः शतेन महयामसि. इन्द्रस्य चर्षणीधृतः.. (४) सैकड़ों स्तोताओं द्वारा पूजा के योग्य, मनुष्यों के रक्षक एवं सैकड़ों प्रकार के तेजों से युक्त इंद्र की हम पूजा करते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रं वृत्राय हन्तवे पुरुहूतमुप ब्रुवे. भरेषु वाजसातये.. (५) युद्धभूमि में अनेक योद्धाओं द्वारा विजय पाने के लिए बुलाए गए एवं यजमानों द्वारा अन्न प्राप्ति के लिए बुलाए गए इंद्र की मैं स्तुति करता हूं. (५) वाजेषु सासहिर्भव त्वामीमहे शतक्रतो. इन्द्र वृत्राय हन्तवे.. (६) हे शतक्रतु इंद्र! तुम संग्रामों में शत्रुओं को पराजित करने वाले हो. मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं. मैं वृत्र अर्थात् पाप के नाश के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. (६) द्युम्नेषु पृतनाज्ये पृत्सुतूर्षु श्रवःसु च. इन्द्र साक्ष्वाभिमातिषु.. (७) हे इंद्र! धन प्राप्ति के लिए युद्ध उपस्थित होने पर, अन्न की प्राप्ति के अवसर पर, पापों और शत्रुओं का नाश करने के निमित्त तुम हमारा सहयोग करो. (७) सूक्त—२० देवता—इंद्र शुष्मिन्तमं न ऊतये द्युम्निन पाहि जागृविम्. इन्द्र सोमं शतक्रतो.. (१) हे इंद्र! तुम हमारी रक्षा के निमित्त अतिशय बल कारक, बुरे स्वप्न का नाश करने वाले तथा तेज से दमकते हुए सोमरस का पान करो. (१) इन्द्रियाणि शतक्रतो या ते जनेषु पञ्चसु. इन्द्र तानि त आ वृणे.. (२) हे इंद्र! तुम्हारा जो बल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद—पांच वर्णों में है, हम उसी बल की याचना करते हैं. (२) अगन्निन्द्र श्रवो बृहद् द्युम्नं दधिष्व दुष्टरम्. उत् ते शुष्मं तिरामसि.. (३) हे इंद्र! तुम्हारा अधिक अन्न हमें प्राप्त हो. तुम शत्रुओं के द्वारा प्राप्त न करने योग्य यश अथवा धन को हमें प्राप्त कराओ. हम सोमरस अथवा स्तोत्र के द्वारा तुम्हारा बल बढ़ाते हैं. (३) अर्वावतो न आ गह्यथो शक्र परावतः. उ लोको यस्ते अद्रिव इन्द्रेह तत आ गहि.. (४) हे शतक्रतु इंद्र! तुम समीप और दूर देश से हमारे समीप आओ. हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारा जो भी लोक है, वहां से इस देव कर्म अर्थात् यज्ञ में सोमरस पीने के लिए आओ. (४) इन्द्रो अङ्ग महद् भयमभी षदप चुच्यवत्. स हि स्थिरो विचर्षणिः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र देव हमारे उस भय का विनाश करते हैं, जिसे दूसरे दूर नहीं कर सकते. वे इंद्र किसी अन्य के द्वारा अस्थिर होने वाले नहीं हैं. वे सभी को देखने वाले हैं. (५) इन्द्रश्च मृडयाति नो न नः पश्चादघं नशत्. भद्रं भवाति नः पुरः.. (६) हम जिस की शरण में जाते हैं, वे इंद्र देव यदि सब प्राणियों के रक्षक हैं तो हमें भी सुखी बनाएं. हमारे सामने सदा मंगल उपस्थित हो. (६) इन्द्र आशाभ्यस्परि सर्वाभ्यो अभयं करत्. जेता शत्रून् विचर्षणिः.. (७) इंद्र चारों दिशाओं, दिशाओं के चारों कोणों तथा ऊपर नीचे से हमें अभय प्रदान करें. इंद्र हम से द्वेष रखने वाले शत्रुओं को जीतने वाले और द्वेष करने वाले हैं. (७) सूक्त—२१ देवता—इंद्र न्यू ३ षु वाचं प्र महे भरामहे गिर इन्द्राय सदने विवस्वतः. नू चिद्धि रत्नं ससतामिवाविदन्न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते.. (१) हम इन इंद्र के लिए शोभन स्तुतियां प्रदान करते हैं. उपासना करने वाले यजमान के यज्ञमंडप में इंद्र के लिए स्तुतियां की जा रही हैं. जिस प्रकार चोर सोते हुए लोगों का धन शीघ्र प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार इंद्र असुरों का धन प्राप्त करते हैं. धन देने वाले पुरुषों के प्रति बुरी स्तुति प्रयोग नहीं की जाती. (१) दुरो अश्वस्य दुर इन्द्र गोरसि दुरो यवस्य वसुन इनस्पतिः. शिक्षानरः प्रदिवो अकामकर्शनः सखा सखिभ्यस्तमिदं गृणीमसि.. (२) हे इंद्र! तुम अश्व, गज आदि वाहनों, गाय, भैंस आदि पशुओं तथा जौ, गेहूं आदि अन्नों के देने वाले हो. तुम स्वर्ण, मणि, मोती आदि धनों के स्वामी एवं रक्षक हो. तुम दान के नेता, अपने सेवकों की इच्छा बढ़ाने वाले तथा अपने ऋत्विजों के मित्र हो, इसलिए तुम्हारे प्रति हम इस स्तुति का उच्चारण करते हैं. (२) शचीव इन्द्र पुरुकृद् द्युमत्तम तवेदिदमभितश्चेकिते वसु. अतः संगृभ्याभिभूत आ भर मा त्वायतो जरितुः काममूनयीः.. (३) हे इंद्र! तुम बुद्धिमान, परम ऐश्वर्य युक्त तथा बहुत से कर्म करने वाले हो. सर्वत्र विद्यमान धन के तुम्हीं स्वामी हो. हे शत्रुओं को बारबार पराजित करने वाले इंद्र! इसलिए तुम पूरे धन का संग्रह कर के मुझे प्रदान करो. मैं तुम्हारी कामना करता हुआ तुम्हारी स्तुति करता हूं. मुझे तुम अपूर्ण मत रहने दो. (३) एभिर्द्युभिः सुमना एभिरिन्दुभिर्निरुन्धानो अमतिं गोभिरश्विना. ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रेण दस्युं दरयन्त इन्दुभिर्युतद्वेषसः समिषा रभेमहि.. (४) हे इंद्र! हमारी अधिक हवि और सोमरस से प्रसन्न होते हुए तुम गाय और अश्व आदि धन दे कर हमारी दरिद्रता समाप्त करो. हे शोभन मन वाले इंद्र! हमारे द्वारा दिए हुए सोमरसों से प्रसन्न हो कर तुम शत्रुओं की हिंसा करते हुए हमें शत्रुविहीन बनाओ. हम इंद्र के द्वारा दिए हुए अन्न से संपन्न हों. (४) समिन्द्र राया समिषा रभेमहि सं वाजेभिः पुरुश्चन्द्रैरभिद्युभिः. सं देव्या प्रमत्या वीरशुष्मया गोअग्रया ऽ श्वावत्या रभेमहि.. (५) हे इंद्र! हम सब के द्वारा चाहे गए धन से संपन्न हों. हम प्रजाओं को प्रसन्न करने वाले बल से युक्त हों. हमें तुम्हारी कृपामयी बुद्धि प्राप्त हो. वह बुद्धि हमें गायों को देने वाली तथा हमारे क्लेशों का निवारण करने वाली हो. (५) ते त्वा मदा अमदन् तानि वृष्ण्या ते सोमासो वृत्रहत्येषु सत्पते. यत् कारवे दश वृत्राण्यप्रति बर्हिष्मते नि सहस्राणि बर्हयः.. (६) हे सज्जनों के रक्षक इंद्र! शत्रुओं के हनन कर्म में प्रसिद्ध एवं मादक आज्य, पुरोडाश आदि तुम्हें प्रसन्न करें. हमारे प्रसिद्ध स्तोत्र भी प्रसन्नता के साधन होने के कारण तुम्हें हर्षित करें. प्रसिद्ध सोमरस भी तुम्हें प्रसन्न करें. स्तुति करते हुए यजमान के दस सहस्र पापों को तुम समाप्त करो. (६) युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा. नम्या यदिन्द्र सख्या परावति निबर्हयो नमुचिं नाम मायिनम्.. (७) हे इंद्र! तुम अपने प्रहार के साधन वज्र के द्वारा शत्रुओं के आयुधों पर आक्रमण करते हो. तुम शत्रुओं के नगरों में निवास करने वाले वीरों को अपने मरुद्गण आदि वीरों के द्वारा नष्ट कराते हो. तुम ने मायावी नमुचि का संहार किया था, इसलिए हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (७) त्वं करञ्जमुत पर्णयं वधीस्तेजिष्ठया तिथिग्वस्य वर्तनी. त्वं शता वङ्गॄदस्याभिनत् पुरो ऽ नानुदः परिषूता ऋजिश्वना.. (८) हे इंद्र! तुम ने अपनी अतिशय तेज युक्त वर्तनी नाम की शक्ति से अतिथि अतिथिग्व के राजा के शत्रुओं करंज एवं पर्णय असुरों का वध किया था. तुम ने ऋजिश्व राजा के शत्रु वंगृदासुर के सौ नगरों का भी विध्वंस किया था. (८) त्वमेतां जनराज्ञो द्विर्दशाबन्धुना सुश्रवसोपजग्मुषः. षष्टिं सहस्रा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक्.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम ने सहायक विहीन सुश्रवा राजा को घेरने वाले साठ हजार निन्यानवे सेनापतियों को अपने उस चक्र से नष्ट कर दिया जो रक्षा के योग्य था और जिसे शत्रु प्राप्त नहीं कर सकते थे. (९) त्वांमाविथ सुश्रवसं तवोतिभिस्तव त्रामभिरिन्द्र तूर्वयाणम्. त्वमस्मै कुत्समतिथिग्वमायुं महे राज्ञे यूने अरन्धनायः.. (१०) हे इंद्र! तुम ने सहायक विहीन राजा सुश्रवा की अपने रक्षा साधनों से रक्षा की. तुम ने तूर्वयाण नाम के राजा का पालन किया. तुम ने युवराज बने हुए कुत्स, अतिथिग्व और आयु का आश्रय सुश्रवा को प्राप्त कराया. (१०) य उद्दीचीन्द्र देवगोपाः सखायस्ते शिवतमा असाम. त्वां स्तोषाम त्वया सुवीरा द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः.. (११) हे इंद्र! इस यज्ञ की समाप्ति पर हमें तुम्हारी रक्षा प्राप्त हो. सखा के समान तुम्हारे अत्यंत प्रिय होते हुए हम इस यज्ञ के बाद भी अतिशय कल्याणों को प्राप्त करें. इस यज्ञ की समाप्ति के उत्तरकाल में भी हम तुम्हारी स्तुति करें. तुम्हारी स्तुतियां करते हुए हम शोभन पुत्रों को तथा दीर्घ आयु को प्राप्त करें. (११) सूक्त—२२ देवता—इंद्र अभि त्वा वृषभा सुते सुतं सृजामि पातये. तृम्पा व्य श्नुही मदम्.. (१) हे वर्षा करने वाले इंद्र! सोम के निचोड़ लिए जाने पर एवं शुद्ध हो जाने पर हम उसे पीने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. उस हर्षदायक सोम को पी कर तुम तृप्त बनो. तुम उस प्रसन्न करने वाले सोम रस को विशेष रूप से प्राप्त करो. (१) मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दभन्. माकीं ब्रह्मद्विषो वनः.. (२) हे इंद्र! तुम्हारी कृपा से हम अपने पालन की इच्छा करते हैं. अपनी रक्षा का उपाय न जानते हुए मूर्ख तुम्हारी हिंसा न करें. जो ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले हैं, तुम उन की सेवा को स्वीकार मत करो. (२) इह त्वा गोपरीणसा महे मन्दन्तु राधसे. सरो गौरो यथा पिब.. (३) हे इंद्र! ऋत्विज् धन प्राप्ति के लिए तुम्हें गाय के दूध से मिश्रित सोमरस दे कर प्रसन्न करें. गौर मृग अत्यधिक प्यासा होने पर जिस प्रकार जल पीता है, तुम उसी प्रकार सोमरस को पियो. (३) अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे. सूनुं सत्यस्य सत्पतिम्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे स्तोता! तुम इंद्र की पूजा उस प्रकार करो, जिस से वे हमें अपना मान लें. इंद्र सत्य के पुत्र और सत्य की रक्षा करने वाले हैं. (४) आ हरयः ससृजिरेऽरुषीरधि बर्हिषि. यत्राभि संनवामहे.. (५) इंद्र के सुंदर अश्व उन के रथ को हमारे यज्ञ में बिछे हुए कुशों के समीप लाएं. (५) इन्द्राय गाव आशिरं दुदुह्रे वज्रिणे मधु. यत् सीमुपह्वरे विदत्.. (६) वज्रधारी इंद्र के लिए गाएं उस समय मधुर दूध दुहाती हैं जिस समय पास में रखे हुए मधुर एवं स्वादिष्ट सोमरस को इंद्र पीते हैं. (६) सूक्त—२३ देवता—इंद्र आ तू न इन्द्र मद्र्य घ्गुवानः सोमपीतये. हरिभ्यां याह्यद्रिवः.. (१) हे वज्रधारी इंद्र! हमारे द्वारा आह्वान करने पर तुम सोमरस का पान करने के लिए अपने अश्वों द्वारा हमारे यज्ञ में आओ. (१) संत्तो होता न ऋत्वियस्तिस्तिरे बर्हिरानुषक्. अयुञ्जन् प्रातरद्रयः.. (२) हे इंद्र! हमारे यज्ञ में होता नाम का ऋत्विज् समय पर उपस्थित हो कर बैठे. हमारे यज्ञ में कुश एकदूसरे से मिले हुए बिछें. सोमरस कूटने के लिए प्रातः स्वप्न में पत्थर एकदूसरे से मिलें. (२) इमा ब्रह्म ब्रह्मवाहः क्रियन्त आ बर्हिः सीद. वीहि शूर पुरोळाशम्.. (३) हे इंद्र! हम तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं. तुम इन कुशाओं पर बैठो. हे वीर! कुशाओं पर बैठ कर तुम हमारे द्वारा दिए गए पुरोडाश का भक्षण करो. (३) रारन्धि सवनेषु ण एषु स्तोमेषु वृत्रहन्. उक्थेष्विन्द्र गिर्वणः.. (४) हे स्तुतियों द्वारा सेवा करने योग्य तथा वृत्रासुर का वध करने वाले इंद्र! हमारे तीनों सवनो में की जाती हुई स्तुतियों से प्रसन्न बनो. (४) मतयः सोमपामुरुं रिहन्ति शवसस्पतिम्. इन्द्रं वत्सं न मातरः.. (५) हमारी स्तुतियां महान सोमरस का पान करने वाले तथा बल के स्वामी इंद्र को उसी प्रकार प्राप्त होती हैं, जिस प्रकार गाय अपने बछड़े को चाटती है. (५) स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे. न स्तोतारं निदे करः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम अपने शरीर में बल प्राप्त करने के लिए सोमरस पी कर प्रसन्न बनो. मुझे अधिक धन देने के लिए तुम हर्षित होओ. मैं तुम्हारा स्तोता हूं. मुझे दूसरे का निंदक मत बनाओ. (६) वयमिन्द्र त्वायवो हविष्मन्तो जरामहे. उत त्वमस्मयुर्वसो.. (७) हे इंद्र! हम सोम रूप हवि से युक्त हो कर तुम्हारी कामना करते हैं. हे सब को वास देने वाले इंद्र! तुम हमें मनचाहा फल देने के लिए प्रसन्न बनो. (७) मारे अस्मद् वि मुमुचो हरिप्रियार्वाङ् याहि. इन्द्र स्वधावो मत्स्वेह.. (८) हे इंद्र! तुम अश्वों को प्रेम करने वाले हो. अपने अश्वों को तुम हम से दूर रथ से अलग मत करो. तुम अश्व युक्त रथ पर चढ़े हुए ही हमारे यज्ञ में आओ. यहां आ कर तुम सोमरस पियो और हर्ष पूर्ण बनो. (८) अर्वाञ्चं त्वा सुखे रथे वहतामिन्द्र केशिना. घृतस्नू बर्हिरासदे.. (९) हे इंद्र! श्रम की बूंदों के कारण भीगे हुए घोड़े तुम्हें सुख देने वाले रथ पर बैठा कर बिछी हुई कुशाओं पर विराजमान करने के लिए हमारे सामने लाएं. (९) सूक्त—२४ देवता—इंद्र उप नः सुतमा गहि सोममिन्द्र गवाशिरम्. हरिभ्यां यस्ते अस्मयुः.. (१) हे इंद्र! हमारा सोम गाय के दूध से युक्त है. तुम उसे पीने के लिए हमारे पास आओ. तुम्हारे जिन रथों में घोड़ों को जोड़ दिया गया है, वे रथ हमारे यज्ञ में आना चाहते हैं. (१) तमिन्द्र मदमा गहि बर्हिष्ठां ग्रावभिः सुतम्. कुविन्व् स्य तृष्णवः.. (२) हे इंद्र! यह सोम कुशाओं पर रखा है. तुम इस की ओर आओ तथा इसे पी कर तृप्त बनो. (२) इन्द्रमित्था गिरो ममाच्छागुरिषिता इतः. आवृते सोमपीतये.. (३) हमारी स्तुति रूपी वाणियां इंद्र को हमारे यज्ञ में लाने के लिए उन के पास जाती हैं. (३) इन्द्रं सोमस्य पीतये स्तोमैरिह हवामहे. उक्थेभिः कुविदागमत्.. (४) हम अपनी स्तुतियों के द्वारा इंद्र को सोम पान के लिए बुलाते हैं. इंद्र हमारे यज्ञ में अनेक बार आएं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्र सोमाः सुता इमे तान् दधिष्व शतक्रतो. जठरे वाजिनीवसो.. (५) हे इंद्र! ये सोम, चमस आदि तुम्हारे हेतु एकत्र किए गए हैं. तुम इस सोम को उदरस्थ करो. (५) विद्मा हि त्वा धनंजयं वाजेषु दधृषं कवे. अधा ते सुम्नमीमहे.. (६) हे इंद्र! हम जानते हैं कि तुम युद्ध के अवसर पर शत्रुओं को अपने वश में करते हो तथा धनों के विजेता हो. (६) इममिन्द्र गवाशिरं यवाशिरं च नः पिब. आगत्या वृषभिः सुतम्.. (७) हे इंद्र! यहां आ कर पत्थरों से कूट कर तैयार किए गए और गाय का दूध मिले हुए सोम का पान करो. (७) तुभ्येदिन्द्र स्व ओक्ये ३ सोमं चोदामि पीतये. एषा रारन्तु ते हृदि.. (८) हे इंद्र! मैं इस सोम को पी कर अपने उदर में भर लेने के लिए तुम्हें प्रेरित करता हूं. यह सोम पीने के बाद तुम्हारे हृदय में रमा रहेगा. (८) त्वां सुतस्य पीतये प्रत्नमिन्द्र हवामहे. कुशिकासो अवस्यवः.. (९) हे इंद्र! हम कौशिक गोत्री ऋषि तुम से रक्षा की कामना करते हुए तैयार किए हुए सोम रस पीने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. (९) सूक्त—२५ देवता—इंद्र अश्वावति प्रथमो गोषु गच्छति सुप्रावीरिन्द्र मर्त्यस्तवोतिभिः. तमित् पृणक्षि वसुना भवीयसा सिन्धमापो यथाभितो विचेतसः... (१) हे इंद्र! जो पुरुष तुम्हारे द्वारा रक्षित होता है, वह बहुसंख्यक अश्वों वाले युद्धों में तथा अश्वारोहियों में प्रमुख बन जाता है. वह गायों वाले पुरुषों में भी श्रेष्ठ होता है. जिस प्रकार जल सब ओर से सागर को भरते हैं, उसी प्रकार तुम भी उसे अनेक प्रकार से प्राप्त होने वाले धन से पूर्ण करते हो. (१) आपो न देवीरुप यन्ति होत्रियमवः पश्यन्ति विततं यथा रजः. प्राचैर्देवासः प्र णयन्ति देवयुं ब्रह्मप्रियं जोषयन्ते वरा इव.. (२) हे इंद्र! जिस प्रकार जल नीचे की ओर बहता हुआ सागर में जाता है, उसी प्रकार स्तुतियां तुम से जा कर मिल जाती हैं. जिस प्रकार मनुष्य सूर्य के प्रकाश की चकाचौंध के ebook converter DEMO Watermarks*