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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

कांकायन का प्रजापतिवाद

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यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि प्रजापति, जिस तरह वायु, अग्नि, सोम संज्ञक धर्मों में अतिरिक्त हुआ उस तरह वह असंख्य प्रजा (पशुपुरुष, मूर्ति, भूतात्मा अथवा जीवात्मा) ओं में भी अतिरिक्त हुआ। धर्मों का आपस में यज्ञ होकर 'भूमि' अर्थात् सप्त आवरण, (सत्य, तप, जन, मह, स्वर, भुव, भू) आकाशादि धातु, सूर्यादि लोक, ऋतु इ० अचेतन सृष्टि पैदा हुई। और तत्पश्चात् शरीर (पुरः) अर्थात् सचेतन सृष्टि पैदा हुई। सचेतन सृष्टि की पैदाइश के समय धर्मों ने यज्ञसाधनभूत 'पुरुषपशु' (जीवात्मा) का 'बहिः' (इसका अर्थ सायणाचार्य ने 'मानस यज्ञ' किया है। किंतु सृष्टिविज्ञान की भाषा में यह उस स्थिति विशेष का बोधक मालूम होता है जिसमें कि अचेतन, सचेतन में परिणत होता है) में प्रोक्षण किया। इस प्रोक्षण के समय वसंत, घी हुआ; ग्रीष्म, समिद हुआ और शरद, हविर्द्रव्य हुआ। इस तरह पशुपुरुष को ७ परिधियों और २१ समिधाओं से बांध दिया गया ! अस्तु। अब वायु, अग्नि, सोम इन प्राथमिक धर्मों के विषय में कुछ अधिक विचार करना आवश्यक है।

वायुः—इसके विषय में निम्न लिखित मंत्र मननीय हैं।

प्राणमाहुर्मातरिश्चानं वातो ह प्राणभुज्यते । प्राणो ह भूतं भज्यं च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

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उक्त मंत्रों पर से यह भी ज्ञात होता है कि यह प्राण संज्ञक महती शक्ति ही 'मातरिश्वा' और 'वात' संज्ञक दो प्रकारों में विभक्त है। तहां 'अग्निविसर्जिका' अथवा विसर्जिका शक्ति को मातरिश्वा कहते हैं जैसाकि 'आगे कहा गया है। वात शब्द गत्यर्थक है। भिक्षु आत्रेय, जिस गति को 'काल' शब्द से संबोधित करते हैं वह ही यहां वात शब्द से

१ इस महती शक्ति के विषय में पाश्चात्य वैज्ञानिकों का कथन है कि द्रव्य, शक्ति, संवेदन इस त्रयी में शक्ति से इनऑर्गनिक और ऑर्गनिक सृष्टि अलग २ पैदा होती है। इन आर्गनिक विभाग में प्रथम ईयर, ईयर से विद्युत्परमाणु, विद्युत्परमाणुओं से ८२ मूल द्रव्यों के परमाणु और उनसे सूर्य, पृथ्वी, मिट्टी, पाषाण, क्षार, स्फटिक इत्यादि पैदा होते हैं। आर्गनिक विभाग में प्रथम वह आद्य जीव अथवा आद्य-जीवोत्पादक द्रव्य पैदा हुआ जिससे कि विकास परंपरा के अनुसार समस्त प्राणियों की सृष्टि हुई। यह शक्ति, अविनाशिनी, परिवर्तनशीला और अनेकरूपिणी है। जड़ सृष्टि के कुल चमत्कार इस शक्ति के रूपांतर से ही साध्य हुए हैं। अबतक इसके दो रूप उपलब्ध हुए हैं; 'विसर्जन' और 'प्रेरणा'। प्रत्येक पदार्थ में जो विसर्जन का व्यापार हो रहा है वह इस शक्ति का ही एक प्रकार है। व्यवहार में जिनको उष्णता, (अग्नि) नाद, (वाणी) प्रकाश (तेज) विद्युत् (इंद्र, 'क' इंद्रस्तद्विद्युदिति' शतपथ ब्रा.) और सुंवक्त्व कहते हैं वे गति के क्रमशः कंपन, लहरी, लघुलहरी, तनाव और आवर्त हैं और यह गति भी प्रेरणा का एक प्रकार है। प्रेरणा के कई विशिष्ट प्रकार ऑर्गनिक द्रव्यों में भी रहते हैं।

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आयुर्वेद-दर्शन

अभिप्रेत है। इसके उपलक्ष में ही यह विधान किया है कि यह जब ऋतुओं में परिणत होता है तब सचेतन जगत् पैदा होता है।

प्राण से ही सूर्य व चन्द्र पैदा होते हैं। सूर्य-चन्द्र शब्द अग्नीपोम वाचक भी हैं। अग्नि और सूर्य की उत्पत्ति के विषय में ऋग्वेद में कहा गया है कि “परम आकाश में स्थित वह अग्नि, मातरिश्वा से पैदा हुआ। कुशलता और बल से सिलगे हुए इस अग्नि के तेज से वावापृथिवी प्रकाशमान हुई” (ऋ. १,१४३,२) और अन्यत्र यह भी कहा गया है कि “वायु से अग्नि और अग्नि से सूर्य पैदा हुआ।” (ऐतरेय ब्राह्मण। ८,२०) सोमोत्पत्ति के विषय में यजुर्वेद का “अपांसरस्य यो रसः” (यजु. अ. ९ मं. ३) यह मंत्र मननीय है। इसमें यह कहा गया है कि “उदकों का रस (सार अथवा मूल) सोम है और सोम का भी रस वायु है”। सारांश प्राण अथवा वायु संज्ञक महती शक्ति ही अग्नि व सोम संज्ञक धर्मों में परिणित हुई है।

वार्योविद् ने इस प्राण संज्ञक शक्ति को ही ‘वायु’ शब्द से संबोधित किया है और उसके लोकगत तथा देहगत दोनों कार्यों का विवेचन (इसका मूल अंश हम पहिले त्रिधातु सिद्धांत पर विचार करते हुए उद्धृत कर चुके हैं) किया है। वे कहते हैं कि:—

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लोक में संचार करने वाले वायु के स्वाभाविक कार्य थे हैं:- धरणी को धारण करना, ( आकृष्टि ) अग्नि को प्रज्वलित करना, ( मातरिश्वा ) सूर्य, चंद्र, ग्रह गणों को पैदा ( तेजोमेघ से लोकमाला की उत्पत्ति ) करना, व उनके परिभ्रमणगतियों का विधान करना, ( काल ) वर्षाजल को पैदा करना, औद्भिज ( अक्षयओषधयः ) सष्टि को उगाना, ऋतुओं के प्रविभाग करना ( काल ) धातुओं ( आकाशादि द्रव्यों ) के प्रविभाग करना, उनके परिमाण और लक्षणों ( अप्रतीघातकत्व चलत्व उष्णत्वादि ) को व्यक्त करना, बीजों पर अकुरोत्पत्त्यनुकूल संस्कार करना, शस्य की वृद्धि करना, सड़ने न देना, शोषण करना, तथा अविकृत विकारों ( संयुक्त द्रव्यों ) को पैदा करना इत्यादि ।

क्षीरीरगत अकुपित वायु, अवयवों ( यंत्रों ) को और अवयवगत व्यापारों ( तंत्रों ) को धारण करता है । प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान ये उसके ( करणवृत्तिरूप ) प्रकार हैं । यह ऊर्ध्वाधो चेष्टाओं का ( चेष्टावहा नाडियों के ' वृत्ति ' यों अथवा ' वेगों ' Impulses का ) प्रवर्चक है; समस्त ज्ञानकर्मीन्द्रियों का ( अंतःस्थ ) उद्योजक है; इंद्रियार्थों का ( संज्ञावहा नाडियों के ' वृत्ति ' यों द्वारा ) अभिवाहक है तथा मन का ( चित्त की वृत्ति यों का ) उत्पादक ( कथों-कि कथोंविद् सत्त्व तथा चेतना को स्वतःसिद्ध नहीं मानते )

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आयुवेद-दर्शन

व नियामक है। यह शरीरगत समस्त धातुओं में संगठन (बल) करता है; सब संधियों को जोड़ता है और वाणी का प्रवर्तक है। शब्द (नाद लहरी) व स्पर्श (मृदु, कठिन, उष्ण, शीत) की यह प्रकृति (क्यों कि लहरी कंपन इत्यादि गति विशेष, इसी के विकार हैं) है। अतः यह स्पर्शनेन्द्रिय व श्रवणेन्द्रिय का मूल है। यह हर्ष (मानसिक प्रसन्नता और पादहर्ष या झुनझुनी सट्टश प्रतिक्रिया भी) और उत्साह (कर्म में प्रवृत्ति) का जनक है। यह, अग्नि (तत्संज्ञक धर्म व अग्निमंडलगत पित्त) को प्रवलयित करता है; दोषों (अन्नरसगत गुणप्रसादात्म्य धातुओं) का (महास्रोत की दीवाल के द्वारा धातुरस में) शोषण करता है और मलों का (शुद्धांत्रस्थ 'मलविवेक' संज्ञक व्यापार के द्वारा) विश्लेषण करता है। यह मोटे व बारीक स्त्रोतों को (गर्भ में) बनाता है और गर्भ की आकृति को पैदा करता है। जीवन व्यापार इसी तंत्र यंत्र धर 'वायु' का परिचय है। ६० ”

वायु के उक्त सब अक्षिपत कार्यो का 'विश्लेष' इस एक ही शब्द में समन्वय किया गया है। क्योंकि अन्यक्त को व्यक्त करना ही उसका प्रधान कार्य है। इस संबंध में वायोवेद का 'भावाभावकर' शब्द भी मननीय है। अस्तु.

अभिः—ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि अभि, 'मातरिश्व' से अर्थात् वायु से पैदा हुआ। और यह भी

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विज्ञान सम्मत है कि शक्ति का कोई भी रूपान्तर क्यों न हो उसमें उष्णता पैदा करने की प्रवृत्ति सर्वदा रहती है। इस अग्नि धर्म के चार रूप माने गये हैं। वेदों में इन रूपों के विषय में यह कहा गया है कि 'हे अग्ने, हे तेजस्वी नृपते तुम प्रकाश में ( व्यक्तावस्था में ) आने के हेतु आकाश में, (तेजो-सेव, सूर्य, नक्षत्र आदि रूपों में ) उदकों में, ( 'विद्युदग्नि' के रूप में ) पाषाणों और वनों में ( वर्षणजन्य 'अरणाग्नि' के रूप में ) तथा ओषधियों में ( देहाग्नि के रूप में ) प्रगट होते हो। ( ऋ० २-१-१ )

अग्नि की धार्मिकता और सर्वधर्म व्यापकता के विषय में यह कहा गया है कि 'हे अग्ने, पहिले की चक्की जिस तरह आरों को वेष्टित करती है उस तरह तुम देवों को वेष्टित करते हो'। ( ऋ० ५-१३-६ ) एक धर्म का दूसरे धर्म में रूपान्तर होने के समय उष्णता का पैदा होना उसकी सर्व धर्म व्यापकता का परिचय है।

सूर्य रूप अग्नि के विषय में यह कहा गया है कि " हे ( सूर्यरूप ) अग्ने, तम ऋतुओं को जानते हो; ( सर्व निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि ) अतः हे ऋतुपते तुम यहाँ (पृथ्वी पर) यज्ञ (अपने 'आदान' धर्म के द्वारा लृष्ट्युत्पादन) करो। ( ऋ० १०-२-१ )

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आयुर्वेद-दर्शन

षड्धातुवादी, अभि को चेतनाधातु का 'गुण' कहते हैं। अभि के विषय में यहाँ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है।

सोमः—वैदिक सृष्टिविज्ञान के अथवा प्रजापतिवाद के अनुसार सोम की उत्पत्ति वायु से होती है जैसा कि ऊपर 'अपां रसस्य यो रसः' इस श्रुति पर से बतलाया गया है। सोम धर्म के अलग अस्तित्व के विषय में यह कहा गया है कि "हे सोम, तुम्हारा धार्मिक महान स्वरूप दैवीप्यमान है"। "यह महान् शुक्र (सूर्य) और यह सोम (चन्द्र) दोनों ही सोम (धर्म) के पुरोगामी हैं"। (यजु० अ० ८ मं० ४९) सारांश सोम, इनसे भी परे (चौं में) रहता है।

सोम से पैदा होनेवाली सृष्टि के विषय में यह कहा गया है कि "त्वमिमा ओषधीः सोमं विश्वास्त्वमपोऽअजनय-स्त्वंगाः"। (यजु० ३४—२२) अर्थात् हे सोम, तुम ही जलों को, पृथ्वी को, और ओषधियों को (क्रमशः) पैदा करते हो।

जलोत्पत्ति के विषय में यह कहा गया है कि "सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो भित्रो अभिः"। (यजु० ७-१४) अर्थात् हे सोम, तुम्हारी विश्वरूपधारिणी वह संस्कृति (जलोत्पादन रूपा) पहिली है जिसमें भित्र, वरुण और अभि तुम्हारे भृत्य थे। रसवाद का विवेचन करते हुए यह

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कहा गया है कि वैदिक ऋषि यह भली भांति जानते थे कि सचेतन स्तुति को पैदा करने के लिये आरंभिक जलों की अत्यन्त आवश्यकता है। इन जलों को सोम ( रस ) पैदा करता है अर्थात् सोम, जलों का प्रधान घटक है। किन्तु सोम, अकेला जलों को पैदा नहीं करता तो उसके साथ मित्र, वरुण और अग्नि भी रहते हैं अर्थात् सोम के अतिरिक्त ये भी जलों के घटक हैं।

जलोत्पादन के विषय में अन्यत्र यह कहा गया है कि “मित्रं हुवे पूतदृक्षं वरुणं च ऋषादसम् । धियं घृतार्ची साधता ” ॥ ( यजु० ३३-५७ ) अर्थात् पावित्र्यवर्धक तथा पापक्षयकारक मित्रावरुणों को ( हम ) इस बुद्धि से आवाहन करते हैं कि वे शुद्ध जल का साधन करें। किन्तु यह साधन तबतक नहीं हो सकता जबतक सोम के द्वारा इनको अभिप्रेत न किया जाय। अतः यह कहा गया कि “अयं वा मित्रा वरुणा सुतः सोम ऋतावृधः” ( यजु० ७-९ ) अर्थात् हे यज्ञ वर्धन मित्रावरुण, तुमको सोम ने ‘अभिप्रेत’ किया। मित्र और वरुण के इस अभिषेक के समय अर्थात् ही जलोत्पादन के समय ( अयं वेनश्रोदयत्वृश्रिगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । यजु० ७-१६ ) सोम, विद्युत् से आवृत हो कर झुलेकस्थ ( मित्रावरुणाभिषवरूप ) जलों को पृथ्वी पर प्रेरित करता है।

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आयुर्वेद-दर्शन

सोम की व्यापकता के विषय में यह कहा गया है कि “हे सोम, तुम ध्रुव में, मनुष्यों में, मन में, जल में, वृत्त में, न्योम में, पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, द्यौ में और स्वर्ग में रहते हो”। (यजु० ९-२) “तुम जहां रहते हो वहां वृद्धि (बल प्रयुक्त विसर्ग) होता है और यज्ञ पूर्ण होता है”। (यजु० ३६-३७) सचेतन सृष्टि को पैदा करना सोम का प्रधान कार्य है। अतः यह कहा गया है कि “सोम, ओषधि और अन्न के लिये संचार करता है”। (यजु० ९-३६)

वैदिक विज्ञान का अभ्यास करने वाले यह भलीभांति जानते हैं कि यह सोम धर्म, विश्वव्यापी महान् ‘शैत्य’ है। यह तो स्पष्ट ही है कि वैदिक ऋषि इसको आग्ने के सहस्र अलग धर्म मानते थे। किन्तु कुछ समय से विचारियों को यह सिखाया जाता है कि शैत्य, स्वतंत्र धर्म नहीं है बल्कि उष्णता का अभाव है! किन्तु इस महाशैत्य के विषय में पश्चात् वैज्ञानिकों के द्वारा अभी २ जो अन्वेषण हुआ है उसपर से वैज्ञानिक जगत् में इतना अवश्य ही स्वीकार कर लिया गया है कि “अणुओं की एक ऐसी स्थिति सम्भव है जिसमें कि अणु, कंपन और स्थलांतरगति रहित एवं निश्चल रहते हैं। यह कंपनविहीन अवस्था शतमान उष्णता के २७३ अंश नीचे रहती है। इस उष्णताविहीन अवस्था का (अर्थात् सोम का) आकाश में निसर्गतः रहना सम्भव है”। इस समय

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द्रव्याणुओं को शून्यांश उष्णता के नीचे की स्थिति में अर्थात् उष्णताविहीन स्थितिमें रखकर उसके विद्युच्चुंबकत्व आदि धर्मों की स्थिति को जांचने का यत्न हो रहा है। इस जांच पर से अबतक दो बातें निश्चित सी हो गई हैं। पहिली यह कि “किसी द्रव्य को उष्णताविहीन अवस्था में अर्थात् शैत्यावस्था में रक्खा जाय तो उसके अणुओं में ‘संसक्त्याकर्षण’ (Cohesion) और घनता (Density) की वृद्धि होती है”। दूसरी यह कि “उसकी ‘रासायनिक संयोजन शक्ति’ (Chemical Attraction) नष्ट होती है”। सारांश इस महाशैत्य के अर्थात् सोम के स्वतंत्र अस्तित्व पर नव्य वैज्ञानिकों का भी विश्वास धीरे २ बढ़ता जा रहा है। अस्तु।

त्रिधातुसिद्धान्तवादिओं का यह कथन था ही कि “अन्नगत, देहगत, और वंशांकुरगत वातापितक्षेपमा, तत्त्वतः इन वायुअग्निसोमसंज्ञक धर्मों के ही रूपान्तर अथवा विकास हैं। और उनका यह कथन प्रजापतिवाद का पोषक ही है। किन्तु त्रिधातु सिद्धान्तवादी इस बात पर विचार नहीं करते थे कि इन धर्मों का बिना किसी आश्रय के रहना संभव है या नहीं। क्योंकि उनकी दृष्टि से सत्त्व और चेतना दोनों


१ आयुर्वेदांतर्गत ‘बल’ शब्द, संसक्त्याकर्षण और घनता दोनों का वाचक है।

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आयुर्वेद-दर्शन

ही इन त्रिधातुओं का अथवा रस का परिणाम होने के कारण वे आत्मा, प्रजापति, ईश्वर इनमें से किसी का भी स्वतःसिद्ध अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे। त्रिधातुवादियों के उक्त शिरो बिहीन सिद्धान्त का वैदिक ऋषि, घोर विरोध करते थे और उनको यज्ञों में निर्मात्र नहीं करते थे। अन्त में जब अश्विनीकुमारों ने प्रजापति का अस्तित्व स्वीकार किया अर्थात् त्रिधातुसिद्धान्त को 'सशिरः' बनाया तब कहीं वे यज्ञों में निर्मात्र किये जाने लगे। यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि इस ऐतिहासिक घटना का उल्लेख सुश्रुत संहिता के अतिरिक्त शतपथ ब्राह्मण में भी किया है अर्थात् यह घटना वैदिक काल में हुई है।

प्रजापतिवादानुसार समस्त जगत् की परिणति या व्यक्ति में यद्यपि उक्त धर्मत्रय प्रधान कारण हैं तथापि उनके साथ प्रजापति की अभिन्न कल्पकता का साहचर्य भी आवश्यक है। प्रजापति का यह संकल्प, त्रिधातुओं की सृष्टि नहीं है। वह प्रजापति का 'ज्ञातृत्व' है। वेदों में इसको 'आजानदेव' कहते हैं। वैदिक-सृष्टि-विज्ञान के अनुसार यह संकल्प भी कल्पांत में 'असूतत्व' में उसकी महिमा होकर रहने वाला और कल्प के आदि में वहाँ से व्यक्त होने वाला धर्म है। इसकी व्यक्ति, त्रिधातुओं के पहिले भले ही हुई हो पर इस संकल्प का त्रिधातुओं में परिणत होना प्रजापतिवादियों को सम्मत

कांकायन का प्रजापतिवाद

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नहीं है जिस तरह षड्धातुवादियों की दृष्टि से चेतनाधातु का ज्ञातृत्व, सत्वरूप होकर कर्तृत्व, अप्रतीघातकत्वादि पंचगुण रूप है उस तरह प्रजापतिवादियों की दृष्टि से प्रजापति का ज्ञातृत्व, संकल्प रूप होकर कर्तृत्व त्रिव्योति रूप है। दोनों के मत से ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में जन्यजनक सम्बन्ध नहीं है किन्तु ‘अन्योन्यानुविधायित्व’ अवश्य है।

यह मालूम नहीं हुआ कि आकाश के विषय में प्रजापति-वादियों का क्या कथन है। अर्थात यह विषय भविष्य में विचारणीय है।

प्रजापतिवाद में गुर्वादि गुणों को प्रधान माना जाता है। क्योंकि कांकायन, वातकलाकलीयपरिषद् में उपस्थित थे और वहाँ उन्होंने ‘प्रकोपन विपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारणम्’ इस वक्तव्य के द्वारा गुर्वादिगुणप्रयुक्त प्रकोपनप्रशमन का समर्थन किया है।

कांकायन, रस परिषद् में भी उपस्थित थे। उनका रस विषयक मत उनके “अपरिसंख्येया रसा इति कांकायनो बाल्हीकभिषक् आश्रय गुण कर्म संस्वाद विश्लेषाणामपरि संख्येयत्वात्” इस वक्तव्य पर से व्यक्त होता है।

भिष्म आत्रेय का कालवाद

भिष्म आत्रेयः—कांकायन के प्रति भिष्म आत्रेय ने यह कहा किः—

तन्नेति भिक्षुरात्रेयो न क्षपत्यं प्रजापतिः । प्रजाहिर्तैषी सततं दुःखैर्युज्यादासाधुवत् ॥

अर्थात् प्रजापति को पुरुषरोगोत्पादक कहना अनुचित है । क्योंकि जो प्रजा का हितचिंतक है वह असत् पुरुष की तरह अपने ही अपत्यों को सर्वदा दुःख में नहीं डाल सकता।

उक्त निषेध में उतनी ही रोचकता है जितनी कि सत्वबादी शरलोमा के ‘दुःख द्वेष्टी आत्मा खद को दुःख में नहीं डाल सकता’ इस विधान में है। अस्तु, अब स्वमत कहते हैं किः—

कालजस्त्वेव पुरुषः कालजास्तस्य चामयाः । जगत् कालवशं सर्वं कालः सर्वत्र कारणम् ॥

अर्थात् पुरुष, काल से ही पैदा होता है, उसके रोग भी काल से पैदा होते हैं, समस्त जगत् कालाधीन होकर काल सर्वत्र कारण है।

भिक्षु आत्रेय का कालवाद

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ऋतुओं का और उनके शीत, उष्ण, वर्ष लक्षणों का जब अधिक अभ्यास होने लगा तब यह मालूम हुआ कि उद्विज स्वेदज, अंडज, जरागुज आदि सभी प्राणिजातियाँ प्रायः किसी खास ऋतु में पैदा होती हैं, निश्चित समय तक रहती हैं, और निश्चित ऋतु या अवस्था में नष्ट हो जाती हैं। इनमें उगाई, बहार, पतझड़, चय, प्रकोप, प्रशम, आदि जो प्रत्यक्ष परिवर्तन हुआ करते हैं वे ऋतुओं के मुख्यतः उष्ण, शीत, वर्ष लक्षणों के अनुसार होते हैं। जनपदो-ध्वंसक कारणों की उत्पत्ति में भी ऋतुओं का अथवा शीतोष्ण-वर्ष लक्षणों का विपर्यय ही कारण है। उक्त लक्षणों का अधिक अभ्यास करने पर यह भी ज्ञात हुआ कि शैत्य के कारण सृष्टि में मुख्यतः बलौत्पत्ति अर्थात् संगठन होता है, उष्णता के कारण बल का अपहरण होता है और वर्षा के कारण वायु प्रकृपित होकर फेंकने की क्रिया होती है। इन व्यापारों को संक्षेप में विसर्ग, आदान और विश्लेष इन नामों से संबोधित किया जाने लगा। इसके अतिरिक्त यह घटना नित्य के परिचय की थी कि—शीतांतुः क्रेदयत्यूर्वा विवस्वान् शोषयत्यपि। तातुभावापि संश्रित्य वायुः पालयति प्रजाः। ( सु० सं० ) इ०।

उस समय अयनगति के आधार पर संवत्सरात्मक काल के दो विभाग किये जाते थे; उदगयन और दक्षिणायन।

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आर्यवेद-दर्शन

भारतवर्ष की दैशिक स्थिति के अनुसार साधारणतः उदगयन में आदान, दक्षिणायन में विसर्ग और इनकी संधि में वर्षा होती है। अतः तत्कालीन समाज ने उदगयन में शिक्षित वसंत प्रीष्म और दक्षिणायन में वर्षा शरद् हेमंत इस प्रकार ऋतु विभाग किये। उक्त समस्त काल विभागों का भी सूर्य सोम वायुओं के परिभ्रमणों के साथ प्रत्यक्ष ही संबंध प्रतीत हो रहा था।

इस तरह एक समय यह सर्व समत था कि “ चंद्र, सूर्य, वायु इन जागतिक विभूतियों के स्वभावों तथा परिभ्रमण मार्गों के कारण ही संवत्सरात्मक काल, विसर्गदानविशेषात्मक अथवा शीतोष्णवर्षलक्षण ( शीतोष्णवर्षलक्षणः कालः ) होकर कलाकाष्ठादि, अहोरात्र, पक्ष, ऋतु, अयन इन विभागों में विभक्त है। सारांश काल, चंद्रसूर्यवायु इनका ‘ परिणाम ’ ( कालः पुनः परिणामः ) है ”

षड्खंडादी कहते थे कि ये सोमसूर्यवायु ही अपने स्वभावों तथा मार्गों के कारण संवत्सर, ऋतु, रस, दोष, देह, बल इन को क्रमशः पैदा करते हैं। और किसी समय इनकी देहगत दोषों के साथ तुलना व एकता प्रदर्शित करने के हेतु से यह भी कहा जाता था कि:—

लोकं वायवर्कसोमानां दुर्विज्ञेया यथा गतिः । तथा शरीरे वातस्य पित्तस्य च क्रफस्य च ॥

भिखु आत्रेय का कालवाद

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और:—

‘विसर्गादानविश्वेषैः सोमसूर्यानिला यथा ।

धारयति जगदेहं कफपित्तानिला तथा ॥ ३०

किंतु जब इन सब वदनाओं का तात्विक दृष्टि से विचार होने लगा तब इस विषय में भिन्न २ मत प्रकट किये जाने लगे ।

धातुपंचकवादियों का कहना था कि जब कि सोमसूर्य-वायु, तत्त्वतः धातुपंचक से आविरिक्त नहीं हैं तब संवत्सरात्मक काल भी धातुपंचक का ही परिणाम है ।


१ त्रिधातुसिद्धांत या प्रजापतिवाद के अनुसार यहाँ अनिल, सूर्य, सोम शब्दों से घर्मत्रयी का भी ग्रहण किया जा सकता है । पर उस अवस्था में विशेष का अर्थ ‘व्यक्तीभवन’ होगा । क्योंकि भिखु आत्रेय ने काल को और उक्त दोनों संप्रदायोंने वायु को ‘जगद्व्यक्ति कर’ अथवा ‘भावकर’ ही सिद्ध किया है । अन्यत्र भी विशेष का अर्थ ‘सूक्ष्म का स्थूल में अथवा एक का अनेक में परिणत होना’ ही किया गया है । जैसा कि ‘द्वे रूपे निश्चिते पूर्वे मायायाः कूलनंदन । विशेषावरणे तत्र प्रथमं कल्पयेज्जगत् ॥ लिंगाद्य ब्रह्म-पर्यंतं सूक्ष्म स्थूल विभेदतः । अपरं त्वखिलं ज्ञानरूपमाहृत्य तिष्ठति ॥ इस पर से व्यक्त होता है । ‘विसर्ग’ और ‘आदान’ शब्दों से ‘संस्कत्याकर्षण’ तथा ‘घनता’ के अर्थात ही बल के दृष्टि-क्षयों को स्वीकार करना उचित है ।

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आयुर्वेद-दर्शन

षड्धातुवादियों का भी यही कथन था पर वे धातु-पंचक को अप्रतीघातकत्वादि गुण मात्र मानते थे। अतः उनकी दृष्टि से संवत्सरात्मककाल गुणों का परिणाम सिद्ध होता था।

अग्नीषोमवादियों की दृष्टि मुख्यतः अग्नीषोम संज्ञक धर्म द्रव्य पर थी। वे काल को इन धर्मों का ही परिणाम समझते थे। धातुपंचकवादियों के प्रति उनका यह कथन था कि “धातुपंचक में प्रतीत होने वाले गुर्वादिगुण जब कि उष्ण व शीत इन दो प्रधान वीर्यों के विविध संयुक्त परिणाम हैं और उक्त जागतिक विभूतियों में भी इनका ही अस्तित्व प्रतीत होता है तब उक्त विभूतियाँ और पंचधातु तत्त्वतः अग्नीषोमात्मक हैं। उसी तरह संवत्सरात्मक काल में भी जब कि उष्ण शीत प्रयुक्त आदानविसर्गात्मक दो ही प्रधान विभाग दिखाई देते हैं तब काल भी अग्नीषोम का ही परिणाम है। अग्नीषोम-वादियों के इस वक्तव्य को अष्टांगसंग्रह में “अन्ये तु गुर्वा-दीनांमग्नीषोमात्मकत्वात् आदानविसर्गविभागेन कालस्य च उष्णशीतात्मकत्वात् द्विविधमेवामनंति।” (अ. सं. सू. अ. १७) इस तरह उद्धृत किया है।

यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि उक्त सब संप्रदाय, काल विषयक अपना मत स्थिर करने के समय

भिक्षु आत्रेय का कालवाद

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मुख्यतः शीतोष्णवर्षलक्षणों अथवा स्वभावों पर ही ध्यान रखते थे। परिभ्रमण गतियों पर उनका समुचित लक्ष्य नहीं था।

किंतु भिक्षु आत्रेय का ध्यान इन परिभ्रमण गतियों पर था। वे एक ऐसी विश्वव्यापिनी गति या शक्ति का अनुभव करते थे जो कि उक्त स्वभाव तथा मार्गों की जनयित्री है। अन्वेषण से उनको यह भली-भांति ज्ञात हुआ कि समस्त जगत् में जो कुछ भी हलचल ( कलयति ) या संगठन ( कालयति ) है वह इसके ही कारण है। यह एक कला भी स्थिर या तिरोहित ( कलां न लीयते ) नहीं होती। और वह उत्पत्तिविनाश रहित ( अनादि निधनः ) है। वे इसको ' काल ' शब्द से संबोधित करते थे। और यह प्रतिपादन करते थे किः—

तावेतावर्कवायू सोमश्च कालस्वभावमार्ग परिगृहीताः; काल, ऋतु, रस, दोष, देह, बल, निर्वृत्ति प्रत्ययभूताः समुप- दिश्यते । ( च. सू. अ. ६ )

अर्थात् ये सूर्यवायुसोम, उस काल संज्ञक शक्ति के स्वभावों और मार्गों से परिगृहीत ( व्याप्त ) हैं अर्थात् इनमें जिन उष्णत्वादि स्वभावों और परिभ्रमण मार्गों की प्रतीति होती है वे तत्त्वतः उस काल संज्ञक गति के प्रकार हैं। और

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आयुर्वेद-दर्शन

इसीसे ये संवत्सर, ऋतु, रस, दोष, देह, बल इनकी उत्पत्ति में कारण कहे जाते हैं ।

भिन्न आत्रेय की इस घोषणा पर से यह भी ज्ञात होगा कि वे धातुपंचक, गुणपंचक और अग्नीषोम धर्म इनका सबका समन्वय काल में करते थे । क्योंकि वे सर्वत्र काल को ही कारण मानते थे, समस्त जगत् को कालवश समझते थे और इसी हेतु काल को पुरुष रोगोत्पादक कहते थे ।

यह हम पहिले बतला चुके हैं कि इस काल का समन्वय वायु में और उस वायु का भी समन्वय प्रजापति में किस कदर किया गया ।

पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक

सिद्धांत

पुनर्वसु आत्रेयः—‘तथ्यार्थिणां विवादतामुवाचैवं पुनर्वसुः’ अर्थात् इस तरह विवाद करते हुए ऋषियों के प्रति पुनर्वसु आत्रेय ने कहा कि:—

मैवं बोचत तत्त्वं हि दुष्प्रापं पक्षसंश्रयात् ॥

वादान् स प्रतिवादान् हि वदन्तो निश्चितानिव ।

पक्षान्तं नैव गच्छन्ति तिलपीडकवद् गतो ॥

मुक्तवैवं वादसंघट्टमध्यात्मभतुचित्यताम् ।

नाविभूततमस्कंधे ज्ञेये ज्ञानं प्रवर्तते ॥

येषामेव हि भावानां संपत्सजनयेन्नरम् ।

तेषामेव विपद व्याधीन्निविधान्समुदीरयेत् ॥

अर्थात् आप लोग इस तरह विवाद करना छोड़ दें । क्योंकि किसी एक ही पक्ष को स्वीकार करने से सत्य तत्व दुर्लभ हो जाता है । जिस तरह तेही अपनी घानी को ही चक्कर लगाता रहता है उस तरह यदि आप अपने ही पक्ष को ठीक समझकर खदतभेदन करते रहेंगे तो सर्व सम्मत निर्णय पर नहीं पहुँच सकेंगे । अतः इस वाद संघर्ष को छोड़ कर ‘अध्यात्म’ का चिंतन कीजिये । जबतक पक्षराग-