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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

कांकायन का प्रजापतिवाद

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कहा गया है कि वैदिक ऋषि यह भली भांति जानते थे कि सचेतन स्तुति को पैदा करने के लिये आरंभिक जलों की अत्यन्त आवश्यकता है। इन जलों को सोम ( रस ) पैदा करता है अर्थात् सोम, जलों का प्रधान घटक है। किन्तु सोम, अकेला जलों को पैदा नहीं करता तो उसके साथ मित्र, वरुण और अग्नि भी रहते हैं अर्थात् सोम के अतिरिक्त ये भी जलों के घटक हैं।

जलोत्पादन के विषय में अन्यत्र यह कहा गया है कि “मित्रं हुवे पूतदृक्षं वरुणं च ऋषादसम् । धियं घृतार्ची साधता ” ॥ ( यजु० ३३-५७ ) अर्थात् पावित्र्यवर्धक तथा पापक्षयकारक मित्रावरुणों को ( हम ) इस बुद्धि से आवाहन करते हैं कि वे शुद्ध जल का साधन करें। किन्तु यह साधन तबतक नहीं हो सकता जबतक सोम के द्वारा इनको अभिप्रेत न किया जाय। अतः यह कहा गया कि “अयं वा मित्रा वरुणा सुतः सोम ऋतावृधः” ( यजु० ७-९ ) अर्थात् हे यज्ञ वर्धन मित्रावरुण, तुमको सोम ने ‘अभिप्रेत’ किया। मित्र और वरुण के इस अभिषेक के समय अर्थात् ही जलोत्पादन के समय ( अयं वेनश्रोदयत्वृश्रिगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । यजु० ७-१६ ) सोम, विद्युत् से आवृत हो कर झुलेकस्थ ( मित्रावरुणाभिषवरूप ) जलों को पृथ्वी पर प्रेरित करता है।

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आयुर्वेद-दर्शन

सोम की व्यापकता के विषय में यह कहा गया है कि “हे सोम, तुम ध्रुव में, मनुष्यों में, मन में, जल में, वृत्त में, न्योम में, पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, द्यौ में और स्वर्ग में रहते हो”। (यजु० ९-२) “तुम जहां रहते हो वहां वृद्धि (बल प्रयुक्त विसर्ग) होता है और यज्ञ पूर्ण होता है”। (यजु० ३६-३७) सचेतन सृष्टि को पैदा करना सोम का प्रधान कार्य है। अतः यह कहा गया है कि “सोम, ओषधि और अन्न के लिये संचार करता है”। (यजु० ९-३६)

वैदिक विज्ञान का अभ्यास करने वाले यह भलीभांति जानते हैं कि यह सोम धर्म, विश्वव्यापी महान् ‘शैत्य’ है। यह तो स्पष्ट ही है कि वैदिक ऋषि इसको आग्ने के सहस्र अलग धर्म मानते थे। किन्तु कुछ समय से विचारियों को यह सिखाया जाता है कि शैत्य, स्वतंत्र धर्म नहीं है बल्कि उष्णता का अभाव है! किन्तु इस महाशैत्य के विषय में पश्चात् वैज्ञानिकों के द्वारा अभी २ जो अन्वेषण हुआ है उसपर से वैज्ञानिक जगत् में इतना अवश्य ही स्वीकार कर लिया गया है कि “अणुओं की एक ऐसी स्थिति सम्भव है जिसमें कि अणु, कंपन और स्थलांतरगति रहित एवं निश्चल रहते हैं। यह कंपनविहीन अवस्था शतमान उष्णता के २७३ अंश नीचे रहती है। इस उष्णताविहीन अवस्था का (अर्थात् सोम का) आकाश में निसर्गतः रहना सम्भव है”। इस समय

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द्रव्याणुओं को शून्यांश उष्णता के नीचे की स्थिति में अर्थात् उष्णताविहीन स्थितिमें रखकर उसके विद्युच्चुंबकत्व आदि धर्मों की स्थिति को जांचने का यत्न हो रहा है। इस जांच पर से अबतक दो बातें निश्चित सी हो गई हैं। पहिली यह कि “किसी द्रव्य को उष्णताविहीन अवस्था में अर्थात् शैत्यावस्था में रक्खा जाय तो उसके अणुओं में ‘संसक्त्याकर्षण’ (Cohesion) और घनता (Density) की वृद्धि होती है”। दूसरी यह कि “उसकी ‘रासायनिक संयोजन शक्ति’ (Chemical Attraction) नष्ट होती है”। सारांश इस महाशैत्य के अर्थात् सोम के स्वतंत्र अस्तित्व पर नव्य वैज्ञानिकों का भी विश्वास धीरे २ बढ़ता जा रहा है। अस्तु।

त्रिधातुसिद्धान्तवादिओं का यह कथन था ही कि “अन्नगत, देहगत, और वंशांकुरगत वातापितक्षेपमा, तत्त्वतः इन वायुअग्निसोमसंज्ञक धर्मों के ही रूपान्तर अथवा विकास हैं। और उनका यह कथन प्रजापतिवाद का पोषक ही है। किन्तु त्रिधातु सिद्धान्तवादी इस बात पर विचार नहीं करते थे कि इन धर्मों का बिना किसी आश्रय के रहना संभव है या नहीं। क्योंकि उनकी दृष्टि से सत्त्व और चेतना दोनों


१ आयुर्वेदांतर्गत ‘बल’ शब्द, संसक्त्याकर्षण और घनता दोनों का वाचक है।

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आयुर्वेद-दर्शन

ही इन त्रिधातुओं का अथवा रस का परिणाम होने के कारण वे आत्मा, प्रजापति, ईश्वर इनमें से किसी का भी स्वतःसिद्ध अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे। त्रिधातुवादियों के उक्त शिरो बिहीन सिद्धान्त का वैदिक ऋषि, घोर विरोध करते थे और उनको यज्ञों में निर्मात्र नहीं करते थे। अन्त में जब अश्विनीकुमारों ने प्रजापति का अस्तित्व स्वीकार किया अर्थात् त्रिधातुसिद्धान्त को 'सशिरः' बनाया तब कहीं वे यज्ञों में निर्मात्र किये जाने लगे। यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि इस ऐतिहासिक घटना का उल्लेख सुश्रुत संहिता के अतिरिक्त शतपथ ब्राह्मण में भी किया है अर्थात् यह घटना वैदिक काल में हुई है।

प्रजापतिवादानुसार समस्त जगत् की परिणति या व्यक्ति में यद्यपि उक्त धर्मत्रय प्रधान कारण हैं तथापि उनके साथ प्रजापति की अभिन्न कल्पकता का साहचर्य भी आवश्यक है। प्रजापति का यह संकल्प, त्रिधातुओं की सृष्टि नहीं है। वह प्रजापति का 'ज्ञातृत्व' है। वेदों में इसको 'आजानदेव' कहते हैं। वैदिक-सृष्टि-विज्ञान के अनुसार यह संकल्प भी कल्पांत में 'असूतत्व' में उसकी महिमा होकर रहने वाला और कल्प के आदि में वहाँ से व्यक्त होने वाला धर्म है। इसकी व्यक्ति, त्रिधातुओं के पहिले भले ही हुई हो पर इस संकल्प का त्रिधातुओं में परिणत होना प्रजापतिवादियों को सम्मत

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नहीं है जिस तरह षड्धातुवादियों की दृष्टि से चेतनाधातु का ज्ञातृत्व, सत्वरूप होकर कर्तृत्व, अप्रतीघातकत्वादि पंचगुण रूप है उस तरह प्रजापतिवादियों की दृष्टि से प्रजापति का ज्ञातृत्व, संकल्प रूप होकर कर्तृत्व त्रिव्योति रूप है। दोनों के मत से ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में जन्यजनक सम्बन्ध नहीं है किन्तु ‘अन्योन्यानुविधायित्व’ अवश्य है।

यह मालूम नहीं हुआ कि आकाश के विषय में प्रजापति-वादियों का क्या कथन है। अर्थात यह विषय भविष्य में विचारणीय है।

प्रजापतिवाद में गुर्वादि गुणों को प्रधान माना जाता है। क्योंकि कांकायन, वातकलाकलीयपरिषद् में उपस्थित थे और वहाँ उन्होंने ‘प्रकोपन विपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारणम्’ इस वक्तव्य के द्वारा गुर्वादिगुणप्रयुक्त प्रकोपनप्रशमन का समर्थन किया है।

कांकायन, रस परिषद् में भी उपस्थित थे। उनका रस विषयक मत उनके “अपरिसंख्येया रसा इति कांकायनो बाल्हीकभिषक् आश्रय गुण कर्म संस्वाद विश्लेषाणामपरि संख्येयत्वात्” इस वक्तव्य पर से व्यक्त होता है।

भिष्म आत्रेय का कालवाद

भिष्म आत्रेयः—कांकायन के प्रति भिष्म आत्रेय ने यह कहा किः—

तन्नेति भिक्षुरात्रेयो न क्षपत्यं प्रजापतिः । प्रजाहिर्तैषी सततं दुःखैर्युज्यादासाधुवत् ॥

अर्थात् प्रजापति को पुरुषरोगोत्पादक कहना अनुचित है । क्योंकि जो प्रजा का हितचिंतक है वह असत् पुरुष की तरह अपने ही अपत्यों को सर्वदा दुःख में नहीं डाल सकता।

उक्त निषेध में उतनी ही रोचकता है जितनी कि सत्वबादी शरलोमा के ‘दुःख द्वेष्टी आत्मा खद को दुःख में नहीं डाल सकता’ इस विधान में है। अस्तु, अब स्वमत कहते हैं किः—

कालजस्त्वेव पुरुषः कालजास्तस्य चामयाः । जगत् कालवशं सर्वं कालः सर्वत्र कारणम् ॥

अर्थात् पुरुष, काल से ही पैदा होता है, उसके रोग भी काल से पैदा होते हैं, समस्त जगत् कालाधीन होकर काल सर्वत्र कारण है।

भिक्षु आत्रेय का कालवाद

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ऋतुओं का और उनके शीत, उष्ण, वर्ष लक्षणों का जब अधिक अभ्यास होने लगा तब यह मालूम हुआ कि उद्विज स्वेदज, अंडज, जरागुज आदि सभी प्राणिजातियाँ प्रायः किसी खास ऋतु में पैदा होती हैं, निश्चित समय तक रहती हैं, और निश्चित ऋतु या अवस्था में नष्ट हो जाती हैं। इनमें उगाई, बहार, पतझड़, चय, प्रकोप, प्रशम, आदि जो प्रत्यक्ष परिवर्तन हुआ करते हैं वे ऋतुओं के मुख्यतः उष्ण, शीत, वर्ष लक्षणों के अनुसार होते हैं। जनपदो-ध्वंसक कारणों की उत्पत्ति में भी ऋतुओं का अथवा शीतोष्ण-वर्ष लक्षणों का विपर्यय ही कारण है। उक्त लक्षणों का अधिक अभ्यास करने पर यह भी ज्ञात हुआ कि शैत्य के कारण सृष्टि में मुख्यतः बलौत्पत्ति अर्थात् संगठन होता है, उष्णता के कारण बल का अपहरण होता है और वर्षा के कारण वायु प्रकृपित होकर फेंकने की क्रिया होती है। इन व्यापारों को संक्षेप में विसर्ग, आदान और विश्लेष इन नामों से संबोधित किया जाने लगा। इसके अतिरिक्त यह घटना नित्य के परिचय की थी कि—शीतांतुः क्रेदयत्यूर्वा विवस्वान् शोषयत्यपि। तातुभावापि संश्रित्य वायुः पालयति प्रजाः। ( सु० सं० ) इ०।

उस समय अयनगति के आधार पर संवत्सरात्मक काल के दो विभाग किये जाते थे; उदगयन और दक्षिणायन।

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आर्यवेद-दर्शन

भारतवर्ष की दैशिक स्थिति के अनुसार साधारणतः उदगयन में आदान, दक्षिणायन में विसर्ग और इनकी संधि में वर्षा होती है। अतः तत्कालीन समाज ने उदगयन में शिक्षित वसंत प्रीष्म और दक्षिणायन में वर्षा शरद् हेमंत इस प्रकार ऋतु विभाग किये। उक्त समस्त काल विभागों का भी सूर्य सोम वायुओं के परिभ्रमणों के साथ प्रत्यक्ष ही संबंध प्रतीत हो रहा था।

इस तरह एक समय यह सर्व समत था कि “ चंद्र, सूर्य, वायु इन जागतिक विभूतियों के स्वभावों तथा परिभ्रमण मार्गों के कारण ही संवत्सरात्मक काल, विसर्गदानविशेषात्मक अथवा शीतोष्णवर्षलक्षण ( शीतोष्णवर्षलक्षणः कालः ) होकर कलाकाष्ठादि, अहोरात्र, पक्ष, ऋतु, अयन इन विभागों में विभक्त है। सारांश काल, चंद्रसूर्यवायु इनका ‘ परिणाम ’ ( कालः पुनः परिणामः ) है ”

षड्खंडादी कहते थे कि ये सोमसूर्यवायु ही अपने स्वभावों तथा मार्गों के कारण संवत्सर, ऋतु, रस, दोष, देह, बल इन को क्रमशः पैदा करते हैं। और किसी समय इनकी देहगत दोषों के साथ तुलना व एकता प्रदर्शित करने के हेतु से यह भी कहा जाता था कि:—

लोकं वायवर्कसोमानां दुर्विज्ञेया यथा गतिः । तथा शरीरे वातस्य पित्तस्य च क्रफस्य च ॥

भिखु आत्रेय का कालवाद

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और:—

‘विसर्गादानविश्वेषैः सोमसूर्यानिला यथा ।

धारयति जगदेहं कफपित्तानिला तथा ॥ ३०

किंतु जब इन सब वदनाओं का तात्विक दृष्टि से विचार होने लगा तब इस विषय में भिन्न २ मत प्रकट किये जाने लगे ।

धातुपंचकवादियों का कहना था कि जब कि सोमसूर्य-वायु, तत्त्वतः धातुपंचक से आविरिक्त नहीं हैं तब संवत्सरात्मक काल भी धातुपंचक का ही परिणाम है ।


१ त्रिधातुसिद्धांत या प्रजापतिवाद के अनुसार यहाँ अनिल, सूर्य, सोम शब्दों से घर्मत्रयी का भी ग्रहण किया जा सकता है । पर उस अवस्था में विशेष का अर्थ ‘व्यक्तीभवन’ होगा । क्योंकि भिखु आत्रेय ने काल को और उक्त दोनों संप्रदायोंने वायु को ‘जगद्व्यक्ति कर’ अथवा ‘भावकर’ ही सिद्ध किया है । अन्यत्र भी विशेष का अर्थ ‘सूक्ष्म का स्थूल में अथवा एक का अनेक में परिणत होना’ ही किया गया है । जैसा कि ‘द्वे रूपे निश्चिते पूर्वे मायायाः कूलनंदन । विशेषावरणे तत्र प्रथमं कल्पयेज्जगत् ॥ लिंगाद्य ब्रह्म-पर्यंतं सूक्ष्म स्थूल विभेदतः । अपरं त्वखिलं ज्ञानरूपमाहृत्य तिष्ठति ॥ इस पर से व्यक्त होता है । ‘विसर्ग’ और ‘आदान’ शब्दों से ‘संस्कत्याकर्षण’ तथा ‘घनता’ के अर्थात ही बल के दृष्टि-क्षयों को स्वीकार करना उचित है ।

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आयुर्वेद-दर्शन

षड्धातुवादियों का भी यही कथन था पर वे धातु-पंचक को अप्रतीघातकत्वादि गुण मात्र मानते थे। अतः उनकी दृष्टि से संवत्सरात्मककाल गुणों का परिणाम सिद्ध होता था।

अग्नीषोमवादियों की दृष्टि मुख्यतः अग्नीषोम संज्ञक धर्म द्रव्य पर थी। वे काल को इन धर्मों का ही परिणाम समझते थे। धातुपंचकवादियों के प्रति उनका यह कथन था कि “धातुपंचक में प्रतीत होने वाले गुर्वादिगुण जब कि उष्ण व शीत इन दो प्रधान वीर्यों के विविध संयुक्त परिणाम हैं और उक्त जागतिक विभूतियों में भी इनका ही अस्तित्व प्रतीत होता है तब उक्त विभूतियाँ और पंचधातु तत्त्वतः अग्नीषोमात्मक हैं। उसी तरह संवत्सरात्मक काल में भी जब कि उष्ण शीत प्रयुक्त आदानविसर्गात्मक दो ही प्रधान विभाग दिखाई देते हैं तब काल भी अग्नीषोम का ही परिणाम है। अग्नीषोम-वादियों के इस वक्तव्य को अष्टांगसंग्रह में “अन्ये तु गुर्वा-दीनांमग्नीषोमात्मकत्वात् आदानविसर्गविभागेन कालस्य च उष्णशीतात्मकत्वात् द्विविधमेवामनंति।” (अ. सं. सू. अ. १७) इस तरह उद्धृत किया है।

यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि उक्त सब संप्रदाय, काल विषयक अपना मत स्थिर करने के समय

भिक्षु आत्रेय का कालवाद

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मुख्यतः शीतोष्णवर्षलक्षणों अथवा स्वभावों पर ही ध्यान रखते थे। परिभ्रमण गतियों पर उनका समुचित लक्ष्य नहीं था।

किंतु भिक्षु आत्रेय का ध्यान इन परिभ्रमण गतियों पर था। वे एक ऐसी विश्वव्यापिनी गति या शक्ति का अनुभव करते थे जो कि उक्त स्वभाव तथा मार्गों की जनयित्री है। अन्वेषण से उनको यह भली-भांति ज्ञात हुआ कि समस्त जगत् में जो कुछ भी हलचल ( कलयति ) या संगठन ( कालयति ) है वह इसके ही कारण है। यह एक कला भी स्थिर या तिरोहित ( कलां न लीयते ) नहीं होती। और वह उत्पत्तिविनाश रहित ( अनादि निधनः ) है। वे इसको ' काल ' शब्द से संबोधित करते थे। और यह प्रतिपादन करते थे किः—

तावेतावर्कवायू सोमश्च कालस्वभावमार्ग परिगृहीताः; काल, ऋतु, रस, दोष, देह, बल, निर्वृत्ति प्रत्ययभूताः समुप- दिश्यते । ( च. सू. अ. ६ )

अर्थात् ये सूर्यवायुसोम, उस काल संज्ञक शक्ति के स्वभावों और मार्गों से परिगृहीत ( व्याप्त ) हैं अर्थात् इनमें जिन उष्णत्वादि स्वभावों और परिभ्रमण मार्गों की प्रतीति होती है वे तत्त्वतः उस काल संज्ञक गति के प्रकार हैं। और

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आयुर्वेद-दर्शन

इसीसे ये संवत्सर, ऋतु, रस, दोष, देह, बल इनकी उत्पत्ति में कारण कहे जाते हैं ।

भिन्न आत्रेय की इस घोषणा पर से यह भी ज्ञात होगा कि वे धातुपंचक, गुणपंचक और अग्नीषोम धर्म इनका सबका समन्वय काल में करते थे । क्योंकि वे सर्वत्र काल को ही कारण मानते थे, समस्त जगत् को कालवश समझते थे और इसी हेतु काल को पुरुष रोगोत्पादक कहते थे ।

यह हम पहिले बतला चुके हैं कि इस काल का समन्वय वायु में और उस वायु का भी समन्वय प्रजापति में किस कदर किया गया ।

पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक

सिद्धांत

पुनर्वसु आत्रेयः—‘तथ्यार्थिणां विवादतामुवाचैवं पुनर्वसुः’ अर्थात् इस तरह विवाद करते हुए ऋषियों के प्रति पुनर्वसु आत्रेय ने कहा कि:—

मैवं बोचत तत्त्वं हि दुष्प्रापं पक्षसंश्रयात् ॥

वादान् स प्रतिवादान् हि वदन्तो निश्चितानिव ।

पक्षान्तं नैव गच्छन्ति तिलपीडकवद् गतो ॥

मुक्तवैवं वादसंघट्टमध्यात्मभतुचित्यताम् ।

नाविभूततमस्कंधे ज्ञेये ज्ञानं प्रवर्तते ॥

येषामेव हि भावानां संपत्सजनयेन्नरम् ।

तेषामेव विपद व्याधीन्निविधान्समुदीरयेत् ॥

अर्थात् आप लोग इस तरह विवाद करना छोड़ दें । क्योंकि किसी एक ही पक्ष को स्वीकार करने से सत्य तत्व दुर्लभ हो जाता है । जिस तरह तेही अपनी घानी को ही चक्कर लगाता रहता है उस तरह यदि आप अपने ही पक्ष को ठीक समझकर खदतभेदन करते रहेंगे तो सर्व सम्मत निर्णय पर नहीं पहुँच सकेंगे । अतः इस वाद संघर्ष को छोड़ कर ‘अध्यात्म’ का चिंतन कीजिये । जबतक पक्षराग-

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आयुवेद-द शीन

रूप मल धुल नहीं जाता तबतक जिज्ञास्य विषय में बुद्धि प्रवेश नहीं करती। वास्तविक सिद्धांत यह है कि ‘जिन भावों’ की ‘संपदा’ से पुरुष पैदा होता है उनकी ‘विपदा’ से व्याधियाँ पैदा होती हैं”।

काशीपति वामक का मुख्य सवाल यह था कि ‘जिन कारणों से पुरुष पैदा होता है उन कारणों से उसको रोग होते हैं या नहीं’। इसका उत्तर सभी ऋषियों ने यह दिया कि ‘जिन कारणों से पुरुष पैदा होता है उन्हीं से उसको रोग भी होते हैं’। पुनर्वसु आत्रेय ने उसी का कुछ संशोधन करके यह निर्णय दिया कि “पुरुषरोगोत्पत्ति में क्रमशः भावों की ‘संपदा’ और ‘विपदा’ कारण हैं”।

किंतु काशीपति के दूसरे सवाल के विषय में अर्थात् ‘पुरुष, किन कारणों से पैदा होता है’ इसके विषय में ऋषियों में गहरा मतभेद था। अतः अब यह देखना आवश्यक है कि इस विषय में पुनर्वसु आत्रेय का अंतिम निर्णय क्या है।

इस पर विचार करने के पहिले यह ध्यान में रखना चाहिये कि यज्ञःपुरुषीय परिषद् में जितने भी ऋषि अथवा संप्रदाय उपस्थित थे उनमें आत्मा को स्वतःसिद्ध न मानने वाले चार संप्रदाय थे। इनमें दो अग्नीषोम लोकपक्षीय

पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागाल्मक सिद्धांत

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और दो पंचाल्मक लोकपक्षीय थे। तहां अग्नीषोम लोक-पक्षीयों का विरोध अधिक प्रबल नहीं था। क्योंकि प्रजा-पतिवाद का उनपर काफी प्रभाव पड़ चुका था। किंतु पंचाल्मकलोकपक्षीयों में भारद्वाज एक ऐसे प्रभावशाली पुरुष थे कि जिनको षड्धातुवादी, आत्मवादी, कर्मवादी और सत्त्ववादी मिलकर भी समझा न सके। पुनर्वसु आत्रेय ने भी षड्धातुवाद का पक्ष लेकर (क्योंकि भारद्वाज, पंचाल्मकलोकपक्षीय थे अतः उनको पंचाल्मकलोकपक्ष के सिद्धान्तों के द्वारा समझाना ही युक्तियुक्त और सरल था) इनको समझाने का यत्न किया। इस प्रकार के एक प्रसंग को हम यहां उद्धृत करते हैं।

‘गर्भावकांति’ पर विचार करते हुए पुनर्वसु आत्रेय ने यह कहा था कि ‘मातृजन्मार्थं गर्भः, पितृजन्म आत्म-जन्म सात्त्व्यजन्म रसजन्म; अस्ति च खलु सत्वमौपपादुकम्’ (च. शा. अ. ३) अर्थात् माता, पिता, आत्मा, सात्त्व्य, इन सब कारणों से गर्भ पैदा होता है और सत्व, इनका सबका संबंध विधायक है। किंतु भारद्वाज ने इनका सबका अलग २ खंडन किया। भारद्वाज के उस वक्तव्यको हम स्वभाववाद के विवेचन में उद्धृत कर चुके हैं। पुनर्वसु आत्रेय ने षड्धातुवादानुसार इसका जो उत्तर दिया वह निम्न लिखित है। जैसा कि:—

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आयुर्वेद-दर्शन

“ नेति भगवान् आत्रेयः, सर्वेभ्य एभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भोऽभिनिर्वर्तते । मातृजन्त्राय गर्भः, न हि मातुर्विना गर्भोत्पत्तिः स्यात् न च जन्म जरायुजानाम् । पितृजन्त्राय गर्भः, न हि पितृकृते गर्भोत्पत्तिः स्यात् न च जन्म जरायुजानाम् । यानि खल्वस्य गर्भस्य मातापितृजानि मातापितृतः संभवतः संभवति, तान्यनुन्याख्यास्यामः । तद्यथा त्वक् च लोहितं च मांसं च मेदश्च नाभिश्च हृदयं च क्रोमं च यकृश्च प्रीहा च वृक्कौ च वस्तिश्च पुरीपाधानं च आमाशयश्च पक्षाशयश्च उत्तरगुदं च अघरगुदं च शुद्धात्रां च स्थूलात्रं च वपां च वपावहनं चेति मातृजानि । केशरमश्रुनखलोमदंतास्थि-सिरास्त्रायुधमन्यः शुक्रमिति पितृजानि ।

आत्मजन्त्राय गर्भो, गर्भात्मा हि अंतरात्मा यः, तं ‘जीव’ इत्याचक्षते । शाश्वतमरुजमजरममरमक्षरमभेद्यमच्छेद्यमलोढ्यं विश्वरूपं विश्वकर्माण्म अन्व्यक्तमनादिमानिधनमक्षरमपि स गर्भाशयमनुग्रविश्य शुक्रशोणिताभ्यां संयोगमेत्य गर्भत्वेन जनयत्यात्मानम् । आत्म संज्ञा हि गर्भे, तस्य पुनरात्मनो जन्म अनादित्वात्रोपपद्यते । तस्माद् जात एव गर्भं जनयति, अजातो हि अयम् अजातं गर्भं जनयति, स चैव गर्भः कालांतरणे बालयुवस्थविरतां प्राप्नोति, स यस्यां यस्यामवस्थायां वर्तते, तस्यां तस्यां जातो भवति । या त्वस्य पुरस्कृता, तस्यां जनित्यमाणश्च । तस्मात् स एव जातश्च अजातश्च युगपद्-

पुनर्वसु आश्रय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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भवति । यस्मिन्नेतदुभयं संभवति जातत्वं जनित्यमाणं च स जातो जन्यते स चैव अनागतेष्ववस्थांतरेषु अजातो जनयत्यात्मानम् । सतो हि अवस्थांतरगमनमात्रमेव हि 'जन्म' चोच्यते तत्र तत्र वयसि तस्यां तस्यां अवस्थायाम् । यथा सतामेव हि शुक्रशोणितजीवानां प्राक्संयोगात् गर्भत्वं न भवति, तच्च संयोगात् भवति, यथा सतस्तस्यैव पुरुषस्य प्रागपत्यात् पितृत्वं न भवति, तच्च अपत्यात् भवति तथा सतस्तस्यैव गर्भस्य तस्यां तस्यां अवस्थायाम् जातत्वं अजातत्वं चोच्यते ।

न खलु गर्भस्य मातुर्नपितुर्नात्मनः सर्वभावेषु यथेष्टकारित्वमस्ति । ते किंचित् स्ववशात् कुर्वति, किंचित् कर्मवशात् क्वचिच्छैषां करणशक्तेर्भवति क्वचिन्न भवति । यत्र सत्त्वादि करणसंपत् तत्र यथाबलमेव यथेष्टकारित्वम्; अतोऽन्यथा विपर्ययः । न च करणदोषात् अकारणमात्मा संभवति गर्भजनने, दृष्टं च इष्टयोनिरैर्यथैः मोक्षश्च आत्मविद्भिः आत्मान्यत्म् । न हि अन्यः सुखदुःखयोः कर्ता, नच अन्यतो गर्भो जायते जायमानः, न च अकुरोत्यतिरबीजात् ।

यानि तु खलु अस्य गर्भस्य आत्मजानि यानि चास्य आत्मतः संभवतः संभवति तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा तासु तासु योनिषु उत्पत्तिः, आयुः, आत्मज्ञानं, मनः, इंद्रियाणि, प्राणापानौ, श्रेरणं, धारणम्, आकृतिस्वरवरणविशेषाः, सुखदुःखे, इच्छाद्वेषौ, चेतना, धृतिर्बुद्धिः, स्थितिर्हंकारः प्रयत्नश्चैत्यात्मजानि ।

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आयुर्वेद-दर्शन

सात्त्व्यजज्ञायं गर्भः न ह्यसात्त्व्यसेवित्वमंतरेण स्त्रीपुरुष- योर्यन्ध्यत्वमस्ति गर्भेषु वाप्यनिष्टो भावः, यावत् खलु असात्त्व्य सेविनां स्त्रीपुरुषाणां त्रयो दोषाः प्रकृपिताः शरीरमुप- सर्पते न शुक्लशोणितगर्भाशयोपघातायोपपद्यते, तावत् समर्था गर्भजननाय भवति । सात्त्व्यसेविनां पुनः स्त्री- पुरुषाणाम् अनुपहत शुक्लशोणितगर्भाशयानाम् ऋतुकाले सन्नि- पतितानां जीवस्य अन्वक्रमणात् गर्भा न प्रादुर्भवति । नहि केवलं सात्त्व्यज एवायं गर्भः, समुदायोऽत्र कारणमुच्यते । यानि खल्वस्य गर्भस्य सात्त्व्यजानि, यानि चास्य सात्त्व्यतः संभवतः संभवति तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा-आरोग्य- मनालस्यमलोलुपत्त्वमिन्द्रियप्रसादः स्वरवर्णबीजसंपत्प्रहरि भूयस्त्वं चेति सात्त्व्यजानि ।

रसजज्ञायं गर्भः न हि रसादृते मातुः प्राणयात्रापि स्यात् किं पुनर्गर्भं जन्म । न चैवम् असम्यगुपयुज्यमाना रसा गर्भ- मभिनिर्वर्तयति । न च केवलं सम्यगुपयोगादेव रसानां गर्भाभि- निर्वृत्तिर्भवति । समुदायोऽप्यत्र कारणमुच्यते । यानि तु खल्वस्य गर्भस्य रसजानि, यानि चास्य रसतः संभवतः संभवति तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा शरीरस्याभिनिर्वृत्तिः अभिवृद्धिः प्राणानुबंधः तृप्तिः पुष्टिरुत्साहश्चेति रसजानि ।

अस्ति खल्वपि सत्त्वं उपपादुकम्, यत् जीवं 'स्पृक्- शरीरेण' अभिसंबध्नाति, यस्मिन् अपगमनपुरस्कृते शीलमस्य

पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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व्यावर्तते भक्तिर्विपर्यस्यते सर्वेन्द्रियाण्युपतप्यंते बलं हीयते व्याधय आप्यायंते, यस्माद्धीनः प्राणान् जहति यत् इन्द्रियाणामभिप्राहकं च 'मन' इत्यभिधीयते, तत् त्रिविधमारुहायते शुद्धे राजसे तामसमिति । येनास्य खलु प्रयतो भूयिष्ठम्, तेन द्वितीयायां वा जातौ संप्रयोगो भवति, यदा तु तेनैव शुद्धेन संयुज्यते तदा जातेरतिक्ताताया अपि स्मरति । स्मार्तं हि ज्ञानम् आत्मनस्तस्यैव मनसोऽनुबन्धादनुवर्तते, यस्यानुवृत्तिं पुरस्कृत्य पुरुषो 'जातिस्मर' इत्युच्यते इति सत्वमुक्तम् यानि खल्वस्य गर्भस्य सत्वजानि यान्यस्य सत्वतः संभवतः संभवति तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा भक्तिः शीलं शौचं द्वेषः स्मृतिर्भेदहत्यागो मात्सर्यं शौर्यं भयं क्रोधस्तद्व्रोत्साहस्तैरुण्यं मार्दवं गांभीर्यम् अनवस्थितत्वम् इत्येवमादयश्चान्ये, ते सत्ववि-काराः तान् उत्तरकालं सत्वभेदमाधिकृत्य उपदेक्ष्याम इति सत्वजानि । नानाविधानि खलु सत्वानि, तानि एकपुरुषे भवन्ति, न च भवत्येककालम्, एकं तु प्रायो 'वृत्त्या' आह ।

एवमयम् नानाविधानाम् एषां गर्भकराणां भावानां समु-दयात् अभिनिर्वर्तते गर्भो यथा कूटागारं नाना द्रव्यसमुदायात् यथा वा रथो नाना रथांगसमुदायात् । तस्मादेतद्वैचाम 'मातृजन्मार्थं गर्भः पितृजन्म आत्मजन्म सात्स्यजन्म रसजन्म अस्ति च सत्वं उपपादुकम्' इति होवाच भगवानात्रेयः॥

पुरस्तादेतत् प्रतिज्ञातं 'सत्वं' जीवं स्मृक्क्षरीरेणाभि-संबन्धाति इति । यस्मात् समुदायप्रभवः सन् स गर्भो मनुष्य-

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आनुवंद-दर्शन

विग्रहेण जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव उच्यते तद्वक्ष्यामः । भूतानां चतुर्विधा योनिभेवति, जराण्वेदस्वेदोद्भूतः । तासां खलु चतसृणामपि योनिनामैकैका योनिरपरिसंख्येयभेदा भवति, भूतानामाकृतिविशेषापारिसंख्येयत्वात् । तत्र जरायुजानामेह जानां प्राणिनामेते यां गर्भकरा भावा योनिमापद्यते, तस्यांतस्यां योनी तथा तथा रूपा भवति, तद्यथा कनकरजतताप्रत्रपुसीसकानि तेषु तेषु मधुरिच्छु विग्रहेषु । ते यदा मनुष्यविंबमापद्यते तदा मनुष्यविग्रहेण जायते, तस्मात् समुदायात्मकः सन् गर्भो मनुष्य विग्रहेण जायते, मनुष्यश्च मनुष्यप्रभव उच्यते; तद्योनित्वात् । यच्छोक्तं 'यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभवः, कस्माज्ज जडादिभ्यो जाताः पितसदृशरूपा भवन्तीति' तत्रोच्यते यस्य यस्यावयवस्य बीजे बीज भाग उपततो भवति, तस्य तस्यावयवस्य विकृतिरुपजायते नोपजायते चानुपतापात्, तस्मा- दुभयोपपत्तिरप्यत्र । सर्वस्य च आत्मजानि इंद्रियाणि । तेषां भावाभावहेतुद्वैवम् । तस्मान्नैकान्ततो जडादिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा भवन्ति ।

न च आत्मा, सत्सु इंद्रियेषु असत्सु वा भवति अन्नः । न हि असत्तः कदाचिदात्मा । सत्त्वविशेषासोपलभ्यते ज्ञानविशेष इति । भवतिचात्रः—

न कर्तुर्निद्रियाभावात् कार्यज्ञानं प्रवर्तते । या क्रिया वर्तते भावैः सा विना तैर्न वर्तते ॥