आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
वाचोविद् का रसवाद और त्रिधातुसिद्धांत
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अवयवों के सुसंबद्ध रहने से शरीर में बल रहता है और जब यह संबंध शिथिल होता है तब शरीर दुर्बल होता है। और यह दोनों बातें ओज के अस्तित्व और अभाव पर अवलंबित हैं। इसी हेतु से यह कहा गया है कि:—
देहस्यावयवस्तेन व्याप्तो भवति देहिनाम् ।
तदभावाच्च शीर्यते शरीराणि शरीरिणाम् ॥ (सु. सं.)
ओज के कारण देह के समस्त अवयव आपस में सुसंबद्ध हैं किंतु जब वह क्षीण होता है तब शरीरावयव असंबद्ध फलतः शिथिल रहते हैं। ओज की विलंसन, व्यापद् और क्षय संज्ञक अवस्थाओं में भी संधिविश्लेषण को प्रधान लक्षण माना जाता है।
ओजगत इस धर्म को आयुर्वेद में 'बल' कहते हैं। बल-संज्ञक इस धर्म को आरंभ में ओज से अभिन्न माना जाता था। अतः कुछ संप्रदाय ओज को ही 'तत्त्वल्लोजस्त-देव बलमुच्यते' (सु. सं.) इस तरह बल शब्द से संबोधित करते थे। किंतु जो संप्रदाय बल के तत्त्वतः पृथक् अस्तित्व का अनुभव करने लगे थे वे इस का अलग ही विवेचन करते थे। उनका कहना था कि 'बलेन स्थिरोपचित मांसता सर्वे चेषास्वप्रतीघातः स्वरवर्णप्रसादो बाह्यानामाभ्यंतर्णा च करणानामात्मकार्ये प्रतिपत्तिर्भवति'। इसी तरह वे बल के
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आयुर्वेद-दर्शन
व्यापद् विस्मसन और क्षय लक्षणों का भी पृथक् ही विवेचन करते थे । चरक-संहितांतर्गत बल-लक्षण भी यहां ध्यान में रखना चाहिये । जैसा कि:—
त्रिविधं बलमिति । सहजं, कालजं, युक्तिक्तं च । सहजं यत् शरीर सत्वयोः प्राकृतम् । कालकृतं, ऋतुविभागजं वयः कृतं च । युक्तिक्तं, पुनस्तद्यदाहारचेष्टा योगजम् ।
[ च. सू. अ. ११ ]
ऊष्मा को भी पहिले वर्गीकरण के समय मल-संज्ञक पित्त से पृथक् माना जाता था । क्योंकि पहिले वर्गीकरण में 'ऊष्मा' को अन्न के विविध अंशों तथा शारीरधातुओं में रहनेवाला और अंतराग्नि से संशुद्धित होकर अपने २ अंशों तथा धातुओं का पाचन करनेवाला 'पदार्थ विशेष' सिद्ध किया गया है । इस तरह उस समय इस पदार्थ को अग्नि-संशुद्धित व पाचन-कर्ता स्वीकार करते हुए भी अग्नि और मलसंज्ञक पित्त दोनों से अलग ही रक्खा जाता था ।
कुछ संप्रदाय 'ऊष्मा' शब्द का 'ताप' के अर्थ में प्रयोग करते थे जैसा कि 'मात्रामात्रात्त्वमूष्मणः' (च. सू. अ. १२) इसमें किया गया है । अतः इस पदार्थ को 'तेज' शब्द से भी संबोधित किया जाने लगा । जैसा कि 'ओजस्तेजोऽप्ययः प्राणा श्रोत्रा देहाग्नि हेतुकाः' (च.चि.अ. १९) इसमें कहा गया है । सुश्रुत-संहिता
ब्रायोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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में इस को 'तेज' शब्द से ही संबोधित किया है और उसका ओज व बल के सहस्र विवेचन किया है। यथा:-
तेजोऽप्योभ्रयं क्रमशः पञ्चमानानां धातूनाम भिनिर्वृत्तामंत- रस्थं स्नेहजातं वसाल्यं क्षीणां विशेषतो भवति। तेन मार्दव सौकुमार्यं श्रुद्धरपोभतोत्साहदृष्टिस्थितिपात्तिकीतिद्वितीयो भवति। (सु. सू. अ. १५)
अर्थात् तेज भी क्रमशः परिपाचित होनेवाले धातुओं से निकलनेवाला 'वसा'ल्य स्नेह समुदाय है। यह अग्नि-गुणात्मक होकर स्त्रियों में विशेष (विशिष्ट प्रकार का) रहता है। इस से तनुमार्दव, सुकुमारपन, रोम में मृदुता व अल्पता, उत्साह, दृष्टिस्थिति, पाचन, कांति इ. रहते हैं।
शरीरगत स्नेहजात को पाश्चात्य Fats अथवा Lipoids कहते हैं। इसी का एक उत्तम प्रकार Lecithin है। यह रक्त के श्वेत कणों में, अंडे में और भिन्न २ शरीररसों में विशेषतः अणुअवयवों के जीवनरस में रहता है। आयुर्वेदांतर्गत उक्त वसाल्य तेज भी इस से अतिरिक्त वस्तु नहीं है। नव्य-विज्ञान-दृष्ट्या भी यह अग्निगुणात्मक है। क्योंकि प्राणवायु, के संबंध से इसका व्यवहन होना और उससे ऊष्मा या ताप की वृद्धि होना विज्ञान सम्मत है। स्त्रियों में अर्थात् स्त्रियों के 'फल' में यह विशेष प्रकार का होता है। गर्भांकुर में
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परओज का जितना महत्त्व है उतना ही फलगत तेज का है । यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि शुक्रमलसंज्ञक ओज, जिस तरह पुरुष के शुक्र संबंधी अवयवों से अंतःस्रुत होता है उसी तरह स्त्रियों के फल संबंधी अवयवों ( अंतःफल Ovary अथवा फलकोष Graafian follicles ) से भी एक प्रकार के स्निग्ध द्रव्य का अंतःस्रुत होना संभवनीय माना जाता है । दृष्टि-स्थिति-विधायक तेज, तेजोजल [ इसका 'तेजोजलाश्रितवाहाम्' सु. अ. उ. १ इस तरह उल्लेख है । इसको पाश्चात्य Aqueous Humours कहते हैं ] में रहता है । दीप्तिकांतिकर तेज, मांसधरात्त्वक के केश-गृहों के नीचे वाले पिंडों में रहता है ।
इस तेज के भी व्यापद् विस्मसन-क्षयसंज्ञक विकारों का अलग विवेचन उपलब्ध होता है ।
धातु-प्रसाद को पहिले वर्गीकरण में पंचेंद्रियों का द्रव्य कहा गया है और उसके अनेक होने का भी स्वीकार किया गया है । वर्तमान समय के वैज्ञानिकों को इसके श्वेत और धूसर दो प्रकार उपलब्ध हुए हैं । इंद्रियव्यापकस्पर्श-नेंद्रिय अथवा नाडीसंस्था Nervous system इन्हीं की बनी हुई है । पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय, अर्तीन्द्रिय, बुद्धीन्द्रिय इनकी रचना इन्हीं द्रव्यों की है । इस तरह यह धातुप्रसाद, ज्ञान
वार्योविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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व चेष्टा दोनों का वाहक है। पहिले वर्गीकरण में इसका उल्लेख शारीर प्रसादधातु में किया है।
यह मानी हुई बात है कि ओज, ऊष्मा [ तेज ] और धातुप्रसाद इनके विषय का इतना ज्ञान बहुत समय के अन्वेषण का फल है। अतः पहिले वर्गीकरण वालों को इन के विषय में कितना ज्ञान था यह तो तर्क से ही जानना उचित है। किंतु यह तो स्पष्ट ही है कि वे इनको जानते थे और इनको वातपित्तश्लेष्माओं से अलग रखते थे। पर जो संप्रदाय इनका वात्पित्तश्लेष्माओं में समन्वय करना चाहते थे और इनकी सिर्फ कृपित अवस्था को ही 'मल' वर्ग में रखना चाहते थे उनके विधानोंपर अब विचार करना चाहिये।
ओज तेज ऊष्माओं का श्लेष्मपित्तवातों में समन्वय
षड् रसवादी, मधुरप्रपाकजन्य और रसविकृतिरूप उदक को पिच्छिल कहते ही थे। सचेतन द्रव्यों को गुर्वादि संज्ञाओं से संबोधित करनेवाले संप्रदायों की दृष्टि में यह पैच्छिल्य एक सचेतन द्रव्य प्रतीत हुआ। इसका वे समस्त शरीर में विविधरूप में अनुभव करते थे। और इसीके द्वारा अवयवों का जुड़े हुए या लिपटे हुए रहना प्रमाणित करते थे। क्योंकि प्रत्येक संधि में इसका किसी न किसी रूप में अस्तित्व प्रतीत होगा था। और इसकी
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आयुर्वेद-दर्शन
विकृत अवस्था में संधि शैथिल्य का होना भी पाया गया था। इनकी दृष्टि इस द्रव्य के श्लेषण धर्म पर अधिक थी। इस श्लेषणधर्म को ये 'बल' कहते थे और उनको इस बल का ओजगत बल के साथ अभिन्नत्व प्रतीत हो गया था। परिणाम यह हुआ कि वे इस द्रव्य में और ओज में भी अभिन्नत्व प्रस्थापित करने लगे। जैसा कि:—
प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते ।
स चैवोजः स्मृतः काये सचपाप्मोप दिश्यते ॥
( सु. सू. अ. १७ )
इस पर से व्यक्त होता है। इसमें प्रकृत अवस्थापन्न पिच्छिल-गुण श्लेष्मा को बलोत्पादक (अथवा बल) और उसकी विकृतावस्था को मल (अथवा मलवर्गीय) कहा गया है। सिवाय श्लेष्मा को ओज कहकर यह व्यक्त किया है कि ओज, श्लेष्मा का ही प्रकार है। सारांश पहिले वर्गीकरण के समय जिस ओज को श्लेष्मा से भिन्न माना जाता था उसका तदुत्तर काल में श्लेष्म शब्द में ही समावेश किया जाने लगा। अब जब कि ओज का घटक श्लेष्मा ही सिद्ध हुआ तब ओजगत बल को भी श्लेष्मा का धर्म मानना तर्कसंगत था। किंतु इस बल के विषय में हम आगे चलकर देखेंगे कि तदुत्तर काल में इस बल को वायु का प्रकार कहने लग गये थे।
बायोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त
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वर्तमान वैज्ञानिकों के मत से 'मुट्रुश्लेष्म' Mucin और कफकल्प Mucoids ओज के प्रकार माने जाते हैं। तदनुसार 'अणुश्लेष्म' Inter Cellular material 'कल्ल-श्लेष्म,' Jelly Like Tissue (जिसको कि आयुर्वेद में भी 'खेटभूतः' च. शा. अ. ४ अर्थात् श्लेष्मा कहा गया है, ) 'धातु श्लेष्म,' Areolar Tissus 'संधिश्लेष्म' Synovia आदि पदार्थों को ओज के प्रकार कहते हैं। किंतु उक्त आयुर्वेदिक संप्रदायों की दृष्टि में श्लेष्मा ही मूल-भूत 'गुण' है और उसीके प्रकार कफकल्प और ओजस् द्रव्य हैं।
ऊष्मा अथवा तेज संज्ञक वसाख्य द्रव्य का भी 'पित्त' शब्द में अंतर्भाव किया गया। जैसा कि:—
पित्तादेवोष्मणः पक्तिर्नराणासुपजायते।
तच्च पित्तं प्रकुपितं विकारान्कुस्तेवहन् ॥
(च. सू. अ. १७)
इस पर से व्यक्त होता है। यहां प्रकरणानुरोध से 'पित्तादेवोष्मणः' का अर्थ 'पित्तसंज्ञकवसाख्यद्रव्य' है। क्योंकि पहिले श्लोक में जिस कदर ओज संज्ञक सचेतन द्रव्य को श्लेष्मा में समन्वित करने का यत्न किया गया है उसी तरह इस श्लोक में वसाख्य सचेतन द्रव्य को पित्त में समन्वित करने
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आयुर्वेद-दर्शन
का यत्न हुआ है। पहिले वर्गीकरण में इस तेजसंज्ञक वसा को ही ‘अंतराग्नि से संयुक्त होनेवाला ऊष्मा’ कहा गया। और उसको अम्लप्रपाकजन्य पित्त से अलग रक्खा। किंतु तदुत्तर काल में ऐसा कि उक्त श्लोक पर से विदित होता है; पित्त शब्द को अधिक व्यापक बनाया गया और उसमें ऊष्मा या तेज संज्ञक वसा का भी समन्वय किया गया।
इस वसाख्य पित्त का प्राणवायु के संबंध से प्रवचन होकर ताप की वृद्धि होना विज्ञानसम्मत है। संभव है कि यह बात भी ऋषियों के ध्यान में आ चुकी हो और तदनुसार वे ऊष्मा शब्द से ‘ताप’ को संबोधित कर के उसका पित्त शब्द में ही अंतर्भाव करने लगे हों। क्योंकि ‘पित्तादेवोष्मणः’ का उक्तानार्थ ‘पित्तसंज्ञक ताप’ होता है और वह भी अभिप्रेत है।
शरीरगत ऊष्मा चाहे तेजसंज्ञक वसा हो अथवा ताप हो पहिले वर्गीकरण के अनुसार अन्न में (यहां मूल में ‘यथास्वम्’ इतना ही कहा है। प्रत्येक संप्रदाय इसका अर्थ अपने २ वर्गीकरण के अनुसार कर सकता है। उदाहरणार्थ षड्दरसवादी अन्न को षडास्वादों में विभक्त करते थे तदनुसार अन्नगत ऊष्मा षड्विध होगा किंतु कुछ संप्रदाय अन्न का पृथिव्यादि धातुपंचक या भतपंचक में विश्लेषण करते थे तदनुसार ऊष्मा भी भौम-आप्य इत्यादि प्रकारों से पंचविध होगा।)
वायोंविद् का रसवाद और विधातु सिद्धांत
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व रसरत्नादि धातुओं में ( अर्थात् समविध ) रहता है और वह अंतरम्नि द्वारा संधुक्षित एवं बलवान् होकर निरंतर समस्त-धातुओं का पाक करता है । पहिले वर्गीकरण वालों की दृष्टि में इस पाचक ऊष्मा का अस्तित्व अम्लप्रपाकजन्य मलसंज्ञक पाचक रस में होना ही चाहिये । फिर भी वे इस ऊष्मा को और तज्जनक अग्नि को मलसंज्ञक पित्र से अलग ही रखते थे । किंतु जो संप्रदाय ऊष्मा को पित्र शब्द से संबोधित करने लग गये थे अथवा ऊष्मा ( ताप ) व अग्नि शब्द समानार्थक मानने लग गये थे वे अंतरम्नि को भी पित्र शब्द से ही संबोधित करना चाहते थे ।
अंतरम्नि के स्वरूप के विषय में भी भिन्न-भिन्न मत दिखाई देते हैं । उदा० भारद्वाजीय धातुपंचकवादानुसार यह अग्निसंज्ञकधातु नित्य अचेतन द्रव्य है, षड्धातुवादानुसार उष्णत्व लक्षण गुण है, शब्दादि गुण प्रधानतावादियों के अनुसार रूपगुणक महाभूत है तो अग्निषोम लोकपक्ष के अनुसार धर्म है । कुछ संप्रदाय इसके ऊष्मा के सहस ही भौतिकान्न और धात्वग्निनों के रूप में प्रभेद करते थे । कुछ संप्रदाय इसका प्रधान स्थान नाभि भाग में तत्रत्य सोम-मंडलांतर्गत सूर्य मंडलों में मानते थे । कुछ संप्रदाय इसका पित्र से अलग अस्तित्व ही नहीं मानते थे । इनके मत से सूर्य मंडलगत अग्नि, प्रदीपवत् नहीं अपितु अवयव विशेष है ।
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आयुर्वेद-दर्शन
जिस तरह ओज का स्नेष्म शब्द में और ऊष्मा का पित्त शब्द में सप्तन्वय किया गया उसी तरह धातुप्रसाद का विशेषतः तद्गत 'करणवृत्ति' संज्ञक व्यापारों का वायु शब्द में अतर्भाव किया गया। जैसा कि:—
सर्वा हि चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृतः । तेनेव रोगा जायन्ते तेन चैवोपरुध्यते ॥
(च. सू. अ. १७)
इस विधान पर से ज्ञात होता है। किंतु यह घटना यका-यक नहीं हुई। अतः उस पर विचार करना आवश्यक है।
षड्ऋसवादी, अन्न के कटु प्रपाक से शरीर में वायु का प्रादुर्भाव मानते थे। यह वायु अधवा वायवीय द्रव्य उनकी दृष्टि से स्नेष्मा व पित्त के सहस्र 'मल' ही था। वे इसको अन्नकिट् का अर्थात् कटुप्रपाक के बाद अन्नरस का पिंडीभूत जो शेष अंश रहता है उसका मल कहते थे। इस वायु को वे शरीरगत समस्त चेष्टाओं का प्रवर्तक समझते थे। क्योंकि उस समय धातुप्रसाद को सिर्फ पंचैन्द्रिय द्रव्य अर्थात् ज्ञानवाहक ही माना जाता था और इस पहिले वर्गीकरण में उसका अलग ही उल्लेख किया जाता था।
इसमें संदेह नहीं कि महास्रोत में अन्नके मधुर अम्ल और कटु ये तीन प्रपाक क्रमशः होते हैं और उनके द्वारा अन्न का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विश्लेषण हो जाता है। कटुप्रपाक
वायोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त
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जन्य वायु, अन्न के विश्लेषण का अंतिम सूक्ष्मतर शेष अर्थात् ही अन्न का सूक्ष्मतर घटक है। आगे यह भी मालूम हुआ होगा कि इस प्रकार का वायु अनशन व्यायाम आदि के कारण भी पैदा होता है अर्थात् यह शारीर धातुओं का भी सूक्ष्मतर घटक है। इन प्रपाकजन्य वायुओं के अतिरिक्त श्वसनेंद्रिय के द्वारा प्रविष्ट होनेवाले और निकलने वाले वायु का भी ज्ञान था ही। संभव है कि किसी समय इन वायवीय द्रव्यों में किसी प्रकार का भेद न किया जाता हो किंतु जब श्वसनेंद्रिय द्वारा प्रविष्ट होने वाले और उच्छ्वासन द्वारा बाहर निकलने वाले वायुओं के नैसर्गिक आवश्यकता और अनावश्यकताओं पर ध्यान आकृष्ट हुआ तब प्रपाकजन्य वायुओं की अपेक्षा उसको अधिक महत्वपूर्ण एवं शारीरधातुघटक माना गया जो श्वास के द्वारा समस्त शरीर में संचार करता है। आगे इसको 'प्राण' शब्द से और प्रपाकजन्यों को 'उदान' व 'अपान' शब्दों से संबोधित किया जाने लगा। यद्यपि इस विषय में अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता तथापि यह निश्चय है कि आरंभ में कटु प्रपाक जन्य वायु को ही समस्त शारीर धातुओं का प्रधान घटक माना जाता था किंतु अंत में श्वसनेंद्रिय संचारी प्राण को ही प्रधान माना गया और शेष वायुओं को अपान न्यान उदान समान संज्ञाओं से संबोधित किया जाने लगा।
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आयुर्वेद-दर्शन
इसी तरह धातुप्रसाद विषयक ज्ञान में भी प्रगति हुई। धातुप्रसाद को आरंभ में केवल ज्ञानवाहक पंचोद्विगद्रव्य कहते थे किंतु बाद में 'चेष्टावाहक' भी कहा जाने लगा। अब जब कि समस्त शारीर धातुओं का प्रधान घटक प्राणद्रव्य है तब धातुप्रसाद का भी प्रधान घटक प्राण ही होना चाहिये और शरीर गत समस्त चेष्टाएँ भी प्राण के कारण ही होना चाहिये। अतः धातुपंचकवादियों ने धातुप्रसाद का वायु में समन्वय करने के हेतु से उक्त 'सर्वाहिचेष्टावातेन' इत्यादि विधान किया।
इस तरह ओज ऊष्मा व धातुप्रसाद जैसे द्रव्यों का श्लेष्मपित्तवातों में अंतर्भाव किये जाने पर उनको (श्लेष्मपित्तवातों को) मलवर्ग में रखना अनुचित प्रतीत होने लगा और ओज ऊष्मा व धातुप्रसाद का पृथक् उल्लेख करने की आवश्यकता भी नहीं रही। सिवाय इस समय गुणप्रसादाख्यवर्ग के विषय में भी समुचित ज्ञान हो चुका था बल्कि यूं कहना चाहिये कि औजस् और तैजस् समस्त द्रव्य, गुणप्रसादाख्य वर्ग के ही रूपांतर प्रतीत होने लग गये थे। ( विज्ञान दृष्ट्या भी औजस् तैजस् द्रव्य, गुणप्रसादाख्य वर्ग के ही दो प्रधान रूप हैं; इन रूपों में ही इस वर्ग की उपलब्धि होती है। ) इन सब कारणों से शारीरधातुओं का दूसरी बार वर्गीकरण हुआ।
जैसा कि:—
वायोविद का रसवाद आर त्रिधातु सिद्धांत
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दूसरा वर्गीकरण.
शारीरधातवस्त्वेवं (अथवा शारीरधातुगुणाः) द्विविधाः संप्रहेण मलभूताः प्रसाद-भताश्च । तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्य बाधकराः स्युः । तद्यथा-शरीरच्छिद्रेषूपदेहाः पृथक्जनमानो बहिर्मुखः परिपकाश्चधातवः प्रकुपिताश्च वातपित्तश्लेष्माणां ये चान्येऽपिकेचित् शरीरे तिष्ठतो भावाः शरीरस्योपघातायोपतिष्ठन्ते सर्वास्तान् मले प्रचक्षमहे । इतरास्तु प्रसादे, गुर्वादींश्चद्रव-तान् 'गुण' भेदेन, रसादींश्च शुक्तांन् 'द्रव्य' भेदेन ।
( च. शा. अ. ६ )
इसमें बाधकर और अबाधकर की दृष्टि से मल व प्रसाद संज्ञक दो प्रधान वर्ग किये गये हैं और तदनुसार 'मल' वर्ग में केवल प्रकुपित अर्थात् बाधकर वातपित्त श्लेष्माओं का उल्लेख किया है; अकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का नहीं । प्रसाद वर्ग में गुणप्रसादाख्य और द्रव्य प्रसादाख्य इस तरह दो वर्ग किये हैं । तहां गुण प्रसादाख्य वर्ग के प्रकारांतर ही ओज, तेज व धातुप्रसाद हैं और समस्त द्रव्य-प्रसादाख्य वर्ग इनका ही बना हुआ है । चूंकि जब कि इस वर्गीकरण के 'मल' वर्ग में प्रकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का स्पष्ट उल्लेख है तब अकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का 'प्रसाद' वर्ग में स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये था । पर सचेतन द्रव्यों के इस वर्गीकरण में गुण प्रसादाख्य वर्ग का उल्लेख करना ही वचित
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आयुर्वेद-दर्शन
प्रतीत होता है। यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि उस समय श्लेष्म, पित्त और वात इन शब्दों में ओज तेज व धातुप्रसाद जैसे सचेतन द्रव्यों का समावेश किये जाने के साथ २ उदक, अभि और वयवीय द्रव्य (प्राण) जैसे अचेतन द्रव्यों का भी संग्रह हो गया था। अर्थात् वातपित्तश्लेष्म शब्दों से शरीरगत सचेतन व अचेतन दोनों प्रकार के मूलभूत द्रव्यों को संबोधित किया जाता था।
वातपित्तश्लेष्माओं की प्राकृत वैकृत अवस्थाएँ
इस तरह वातपित्तश्लेष्म शब्द अधिक व्यापक हो जाने के कारण उनकी सामन्यतः दो अवस्थाएँ स्वीकार की गईं। एक प्राकृत अथवा अकुपित और दूसरी वैकृत अथवा कुपित। और तदनुसार उनके कार्यों का भी निर्णय किया गया। जैसा कि:—
नित्याः प्राणभूतां देहे वातपित्तकफा क्षयः । विकृताः प्रकृतिस्था वा तान् बुध्दत्सेथ पंडितः ॥ उत्साहोच्छ्वास निःश्वास चैष्टा धातुगतिः समाः । समो मोक्षो गतिमतां वायोः कर्माविकारजम् ॥ दर्शनं पाकिरूष्मा च क्षुत्तुष्णा देहमार्दवम् । प्रभा प्रसादो मेधा च पित्तकर्माविकारजम् ॥ स्नेहो बंधः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलम् । शुमा धृतिरलोमश्च कफकर्माविकारजम् ॥
ज्ञानोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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वाते पित्ते कफे चैव क्षीणे लक्षणमुच्यते ।
कर्मणः प्राकृताद्वाग्निर्द्वेष्टि वापि विरोधिनाम् ॥
दोष प्रकृति वैशेष्यं नियतं वृद्धि लक्षणम् ।
दोषाणां प्रकृतिर्हानिर्द्वेष्टिश्चैवं परीक्ष्यते ॥
( च. सू. अ. १८ )
यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि इन अंशों में प्राकृत वैकृत शब्द सामान्यतः अकुपित कुपित के समानार्थक हैं और प्राकृत कार्यों में मुख्यतः उन कार्यों का उल्लेख किया गया है जिनकी भित्ति पर तदुत्तर काल में वातपित्तक्षेपमाओं के पांच २ प्रकार किये गये ।
इसके बाद जब ऋषियों का ध्यान भिन्न २ मनुष्यों की भिन्न २ ' प्रकृतियों ' पर और उनके कारणों पर आकृष्ट हुआ तब प्राकृत वैकृत शब्दों की व्याख्या भी बदल गई ।
प्रकृति के विषय में यद्यपि सामान्यतः यह स्वीकार कर लिया गया था कि " प्रकृति में जाति, कुल, देश, काल, वय और आत्मा ( निज ) के भावविशेष शामिल रहते हैं और तदनुसार वह जातिप्रसक्ता, कुलप्रसक्ता, देशानुपातिनी, कालानुपातिनी, वयोनुपातिनी तथा प्रत्यात्मनियता होती है " ( च. इ. अ. १ ) तथापि इनकी सबकी वह में वे मुख्यतः प्रत्यात्मनियता को ही देखते थे ।
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आयुर्वेद-दर्शन
इस प्रत्यात्मनियता को आरंभ में ( क्योंकि बाद में इसके भी दो भेद किये गये और उनको क्रमशः दोषप्रकृति और महाप्रकृति कहा गया ) 'दोषप्रकृति' कहते थे । क्योंकि गर्भावकृतिदृष्ट्या वातपित्तश्लेष्माओं का वंशांकुर गत न्यूनाधिक्य ही इसका कारण सिद्ध हुआ । इस विषय में सर्वप्रथम निम्नलिखित अंश मननीय हैं ।
तद्यथा-शुक्रशोणितप्रकृतिं, कालगर्भाक्षयप्रकृतिं, आतुराहारविहारप्रकृतिं, महाभूतविकारप्रकृतिं च गर्भशरीरमपेक्षते । एतानि हि येन येन दोषेण अधिकतमेन एकेन अनेकेन वा समनुबध्यते तेन तेन दोषेण गर्भोऽनुबध्यते । ततः सा सा दोषप्रकृति रुच्यते मनुष्याणां गर्भदिग्भृत्वा । तस्मात् वातलाः प्रकृत्या केचित् पित्तलाः केचित् रलेष्मलाः । ( च. वि. अ. ८ )
इसमें यद्यपि शुक्रशोणित, गर्भाक्षय, काल, सगर्भा के आहारविहारों की भिन्न २ प्रकृतियों का जोकि तत्तद्वत वातपित्तश्लेष्माओं के विभिन्न सापेक्ष मान से ही बनो हुई होती हैं और गर्भ पर अपना २ संस्कार करती हैं; गर्भ में मिश्रण होकर वात पित्त श्लेष्माओंका जो एक सापेक्ष मान बनता है और जन्म से लेकर मृत्यु तक साधारण बना रहता है उसको गर्भदिग्भृत्वा दोषप्रकृति कहा गया है । तथापि इनका लक्ष्य मुख्यतः शुक्र शोणित प्रकृति पर था । क्योंकि वह
वायोंविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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सर्व प्रथम पैदा होती है; गर्भांकुर उसी से बनता है और अन्य प्रकृतियाँ इस पर ही आगे संस्कार करती हैं। प्रायः इसी हेतु से कुछ संप्रदाय उसीका प्रधानतया उल्लेख करते हैं। जैसा कि:—
शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्वैष उत्कटः।
प्रकृति जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु। (सु.सं.)
गर्भावक्रांतिदृष्ट्या शुक्र शोणित शब्दों से बीज व फल संज्ञक अणु अवयव [अणुभूत, भूताणु, जीवाणु,] अभिप्रेत हैं। उक्त दोनों प्रकार के अथवा सभी प्रकार के अणु अवयवों
१ अणु अवयवों के विषय में यह कहा गया कि है ‘शरीरान्वयास्तु परमाणु भेदेन अपरिसंख्येया भवेति; अति बहुव्यात्, अतिसौक्ष्म्यात् अर्तीन्द्रियत्वाच्च’ (च. शा. अ. ७) इन अगणित, अति सूक्ष्म, अर्तीन्द्रिय और सचेतन परमाणुओं का प्राश्नात्य वैज्ञानिकों ने ‘अणुवीक्षण’ शब्द द्वारा ज्ञान प्राप्त किया है। इन जीवाणुओं के आकार-प्रकार भिन्न २ धातुओं के तथा अवयवों के अनुसार भिन्न २ होते हैं। इनकी सूक्ष्मता ३००००० अंश अंगुल के बराबर है। सामन्यतः इनके दो प्रकार हैं; सावरण और निरावरण उद्भिदों में सावरण रहते हैं और मनुष्यों में निरावरण। इनका शरीर सुरन्ध्रे के सदृश बिलकुल मुलायम होता है। यह जीवनस (Protoplasma) नामक द्रव्य का बना हुआ है। जीवनस के बीज में मीठी के सदृश एक भाग है जिसको कि ‘जीवनायतन (Nucleus)’ कहते हैं। सिवाय एक ‘आकर्षक केंद्र (Attraction Sphere)’ नामक भाग है जो कि जीवनायतन अधीरा रहता है। इस तरह जीवाणु के तीन प्रधान अंग हैं। जीवनस, जीवनायतन और आकर्षक केंद्र।
आयुर्वेद-दर्शन
में सूक्ष्म घटकों के रूप में बात [ धातुप्रसाद, तथा वायवीय द्रव्य ] पित्त [ तेज, व अग्नि ] श्लेष्मा [ ओज व उदक ] ओंका अस्तित्व रहता है ।
जीवनरस में एक जाली है जिसको ' जीवनकोष ' ( Spongioplasm ) कहते हैं । इसमें ' जीवन तरल ' [ Hyalo Plasm ] भरा रहता है । जीवनरस इन दो पदार्थों का बना हुआ है ।
जीवनायतन पर एक आवरण है; इस आवरण के भीतर भी जालीदार कोष है और इस ' जीवनायतन कोष ' ( Chromoplasm ) नामक तरल है । जीवनायतन के बीच में एक ग्रंथि सदृश भाग है; उसको ' जीवन-ग्रंथि ' ( Nucleoli ) कहते हैं ।
आकर्षक केंद्र के मध्य में ' आकर्षक बिंदु ' ( Centriole ) नामक भाग है उसके आसमतात् आरों की सी रचना है ।
इन जीवाणुओं में ग्रहण, विसर्जन, प्रजनन, गमन आदि चेतना व्यंजक व्यापार होते हैं । उक्त व्यापारों का जीवनायतन के साथ घनिष्ठ संबंध है । एक अणु अवयव से दूसरे अणु अवयव का प्रजनन ' औद्भिज पद्धति ' से होता है । प्रजनन के समय प्रथम आकर्षकबिंदु विभाजित होता है । इस प्रकार को ' प्रत्यक्ष प्रजनन ' कहते हैं । कहीं २ प्रथम जीवनग्रंथि ही खुलती है और उसके जालीदार भाग के तंतु बनते हैं । इन तंतुओं को ' जीवनायतनमूलतंतु ' ( Chromosomes ) कहते हैं । इन तंतुओं के द्वारा होनेवाले प्रजनन को ' अप्रत्यक्षप्रजनन ' कहते हैं ।
चूंकि जबकि बीज, फल और वंशांकुर भी विशिष्ट प्रकार के 'अणु-अवयव' ही हैं तब उनमें उक्त सामान्य बातों का रहना स्वाभाविक है ।
बार्शोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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वर्तमान वैज्ञानिकों द्वारा अणुअवयवों का रासायनिक पृथक्करण करके यह देखा गया है कि उसके जीवनरस में:-
बीज, लंबे व पूंछदार होते हैं। इनके शिर, ग्रीवा, घड, पूँछ, व पुच्छकेसर इतने अवयव रहते हैं। शिर, त्रिकोण, नुकीला और अन्य अंगों से मोटा रहता है। इसी में उसका जीवनायतन रहता है। ग्रीवा सक्डी रहती है और इसी में इसका आकर्षककेंद्र रहता है। फल की अपेक्षा बीज बहुत सूक्ष्म रहता है यह अपनी पूँछ की हलचल से स्थानांतर करता है और नुकीले मुख से फल में प्रवेश करता है।
फल का आकार चपटा और गोल है। इसपर एक पारदर्शक कवच है; उसको ' फलधवलकवच ' ( Zona Pellucida ) कहते हैं। फल में भी जीवनायतन, जीवनायतन ग्रंथि और आकर्षक केंद्र रहते हैं। इसके जीवनरस में वंशांश ( तेज ) अधिक रहता है।
धानवंतरो का कथन है कि ' शुक्र और आर्तव में अणु विशिष्ट भूतों का भी अस्तित्व रहता है '। ये अणु विशिष्ट भूत, बीज व फल ही हैं। और यह भी कथन है कि 'इन भूतों के परस्पर अनुग्रह, अनु-प्रवेश और उपकार से पैदा होने वाला गर्भ, ( अर्थात् वंशांकुर ) गर्भाशय में प्रविष्ट होता है। ( सु. शा. अ. ३ ग. १-२ ) इन अनु-ग्रहादि व्यापारों के वास्तविक रूप के विषय में यह ध्यान में रखना चाहिये कि बीज, अपनी पूँछ की हलचल से फल को पकड़ने ( ग्रह ) का यत्न करता है। उसके लिये वह गर्भाशय में, फलवाहिनीयों में और अंतःफल में भी प्रवास करता है। इस तरह फलग्रह हो जाने पर वह अपने नुकीले मुख से फल में अनुप्रवेश करता है। बाद में
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आयुर्वेद-दर्शन
(१) जल ३ भाग रहता है। (२) इसमें जो पोषक द्रव्य (औजस) रहता है वह बहुत महत्व का है। यह अन्य द्रव्यों की अपेक्षा इसमें अधिक भी रहता है। यह मूल में अंगार, (Carbon) उज्जन, (Hydrogen) मरुत, (nitrogen) मित्र (Oxygen) स्फुर (phosphorus) और गंधक इन वायवीय द्रव्यों से बनाहुआ है। (३) इसमें तेज या तैजस्द्रव्य (Lecithin) संज्ञक वसा रहती है। यहाँ की इस वसा में स्फुर वायु भी रहता है। (४) इसके अतिरिक्त इसमें क्षार भी रहते हैं।
उक्त ओज और तेज संज्ञक द्रव्य अन्यत्र भी रहते हैं पर उनमें स्फुरवायु नहीं रहता। किंतु जीवनरसगत इन द्रव्यों
उसका अनुप्रविष्ट भाग ( शिर, ग्रीवा व धड का कुछ अंश ) फलगत द्रव्य में घुलकर उस से ‘बैजिक-जीवनायतनमूल,’ और आकर्षकबिंदु सहित एक आकर्षक केंद्र बनता है। उक्त बैजिक जीवनायतनमूल, फलजीवनायतनमूल के पास जाता है और दोनों आपस में मिलकर घुल जाते हैं। इस घोल से एक जीवनायतन बनता है। इस संस्कार को ‘उपकार’ कहते हैं। यह नूतन जीवनायतन, बीज व फल के आधरे किंतु समान ‘जीवनायतनमूलतंतुओं से युक्त रहता है और इसके साथ आकर्षकबिंदु सहित दो आकर्षककेंद्र रहते हैं। इसी को ‘वंशांकुर’ कहते हैं। आगे इस वंशांकुर का औद्भिज प्रत्यक्ष प्रज्ञानन होकर उसको क्रमशः वंशांकुरगुच्छ, कल्ल, पाकप्रक्रिया-द्वारा संतानिका, कला, खोत, गर्भ आदि अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं।