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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १०१


ज्वरविच्छेदकाले च सितया सह योजयेत् ।
द्वित्रगोलीप्रयोगेण ज्वरशान्तिर्न संशयः ॥ ८२ ॥

सीसेकी भस्म, रससिन्दूर हरताल और शुद्ध वत्सनाभ इन सबको समान भाग लेकर जलके साथ एकत्र खरल करके सरसोंके बराबर गोलियाँ बनालेवे. ज्वरके उतरजानेपर एक दिनमें दो तीन गोलियाँ मिश्रीके साथ देनेसे ज्वर शमन होता है ॥ ८१ ॥ ८२ ॥

रत्नगिरिरस ।

शुद्धसूतं समं गन्धंमृतताम्राभ्रहाटकम् ।
प्रत्येकं सूततुल्यं स्यात्सूताद्धं मृतलोहकम् ॥ ८३ ॥
लौहार्द्धं मृतवैक्रान्तं मर्दयेद्भृङ्गजद्रवैः ।
पर्पटीरसवत् पाच्यं चूर्णितं भावयेत्पृथक् ॥ ८४ ॥
शिग्रूवासकनिर्गुण्डीवचाग्निभृङ्गमुण्डिकैः।
क्षुद्रामृताजयन्तीभिर्मुनिब्राह्मीसुतिक्तकैः ॥ ८५ ॥
कन्यायाश्च द्रवैर्भाव्यं प्रतिवारं त्रिधा त्रिधा ।
रुद्ध्वा लघुपुटे पाच्यं वालुकायन्त्रमध्यगम् ॥ ८६ ॥
यन्त्रं निरुध्य यत्नेन स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ।
चूर्णं नवज्वरे देयं माषमात्रं रसस्य वै ॥ ८७ ॥
कृष्णाधान्यसमायुक्तं मुहूर्तान्नाशयेज्ज्वरम् ।
अयं रत्नगिरिर्नाम रसो योगस्य वाहकः ॥ ८८ ॥

शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धककी कजली दो दो तोले, ताम्रभस्म, अभ्रकभस्म और स्वर्णभस्म ये प्रत्येक एक एक तोला, लोहभस्म ६ माशे और वैक्रान्त मणिकी भस्म ३ माशे लेवे । सबको एकत्र भाँगरेके रसमें खरल करके पर्पटीके समान पाक करे । फिर उसका चूर्ण करके उसको सहिंजना, अडूसा, निर्गुण्डी, वच, चीता, भाँगरा, गोरखमुण्डी, कटेरी, गिलोय, अरणी, अगस्तियाके फूल, ब्राह्मी, चिरायता और घीकुँवार इन प्रत्येकके रसमें क्रमसे पृथक् २ तीन तीन बार भावना देवे, पश्चात् एक उत्तम मूषामें बन्द करके वालुकायन्त्रमें रखकर लघुपुटमें पकावे, स्वांगशीतल होनेपर मूषामेंसे औषधिको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे, इस रसको नवीनज्वरमें एक माशा परिमाण दिनमें तीनबार पीपल तथा धनियेके क्वाथके अनुपानके साथ सेवन करावे । यह रस ज्वरको क्षणभरमें नष्ट करदेता है और योगवाही होनेसे भिन्नभिन्न

१०२ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-

अनुपानोंके साथ सेवन करनेसे सम्पूर्ण रोगोंमें हितकारी है ॥ ८३-८८ ॥

प्रतापमार्त्तण्डरस ।

विषहिङ्गुलजैपालटङ्कणं क्रमवर्द्धितम् ।
रसः प्रतापमार्त्तण्डः सद्यो ज्वरविनाशनः ॥ ८९ ॥

शुद्ध वत्सनाभ १ भाग, सिंगरफ २ भाग, जमाल गोटा ३ भाग और सुहागा ४ भाग इन चारोंको जलके साथ एकत्र मर्दन करके दो-दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इसको सेवन करनेसे ज्वर शीघ्र दूर होता है ॥ ८९ ॥

चण्डेश्वररस ।

रसं गन्धं विषं ताम्रं मर्दयेदेकयामकम् ।
आर्द्रकस्वरसेनैव मदयेत्सप्तवारकम् ॥ ९० ॥
निर्गुण्ड्याः स्वरसे पश्चान्मर्दयेत्सप्तवारकम् ।
गुञ्जैकार्द्ररसेनैव दत्तो हन्ति ज्वरं क्षणात् ॥ ९१ ॥
वातजं पित्तजं श्लैष्मं द्विदोषजमपि क्षणात् ।
सुशीतलजले स्नान तृषार्त्ते क्षीरभोजनम् ॥ ९२ ॥
आम्रं च पनसं चैव चन्दनागुरुलेपनम् ।
एतत्समो रसो नास्ति वैद्यानां हृदयङ्गमः ॥
एष चण्डेश्वरो नाम सर्वज्वरकुलान्तकृत् ॥ ९३ ॥

शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, शुद्ध मीठा तेलिया और ताम्रभस्म सबको समान भाग लेकर प्रथम पारे और गन्धककी कज्जली करलेवे, फिर उसमें अन्य औषधियोंको मिलाकर एक प्रहरतक खरल करे । पश्चात् अदरखके स्वरसमें सातवार और फिर निर्गुण्डीके रसमें सातवार भावना देकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक एक गोली अदरखके रस और मधुके साथ देनेसे वातज, पित्तज, श्लैष्मिक और द्विदोषजनितज्वर तत्काल नष्ट होता है । इसके सेवन करनेपर यदि गरमी अधिक मालूम हो तो शितिल जलसे स्नान करना चाहिये और रोगीके क्षुधा और तृषासे व्याकुल हानपर दूध भात, शीतलजल, आम, कटहल आदि पदार्थ सेवन कराने चाहिये तथा चन्दन, अगर आदिका शरीरपर लेप करना चाहिये । वैद्योंको इस रसके समान अन्य कोई रस प्रिय नहीं है । यह चण्डेश्वरनामक रस सब प्रकारके ज्वरोंको समूल नष्ट करता है ॥ ९०-९३ ॥

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १०३


उदकमञ्जरीरस ।

सूतो गन्धष्टङ्कणः सोषणः स्या-
देतैस्तुल्या शर्करा३ मत्स्यपित्तैः ।
भूयोभूयो भावयेच्च त्रिरात्रं
वल्लो देयः शृङ्गवेरस्य वारि ॥ ९४ ॥
सम्यक् तापे वारि भक्तं सतक्रं
वृन्ताकाढ्यं पथ्यमत्र प्रदिष्टम् ।
अह्ना चोग्रं हन्ति सामं प्रभावात्
पित्ताधिक्ये मूर्ध्नि वारिप्रयोगः ॥ ९५ ॥

पारा और गन्धककी कज्जली, सुहागा और मिरच ये सब समान भाग और सबके बराबर शुद्ध मीठा तेलिया लेकर समस्त औषधियोंको एकत्र पीसकर रोहू-मछलीके पित्तमें तीन दिनतक बारबार भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे इसकी एक एक गोली अदरखके रस और मधुके अनुपानसे सेवन करानी चाहिये। यदि औषधि सेवन करनेपर रोगीको अधिक गरमी मालूम हो तो तक्रके साथ भातका माँड और बैंगनोंके शाकका पथ्य देवे। पित्तकी अधिकता होनेपर सिरपर शीतल जलकी धारा छोडे। इस प्रकारं इस रसको सेवन करनेसे आमयुक्त उग्रज्वर एक दिनमें ही नष्ट होजाताहै ॥ ९४ ॥ ९५ ॥

अचिन्त्यशक्तिरस

रसगन्धकयोर्ग्राह्यं प्रत्येकं माषकद्वयम् ।
भृङ्गकेशारख्यनिर्गुण्डी मण्डूकीपत्रसुन्दरः ॥
श्वेतापराजितामूलं शालिं च कणमारिषम् ॥ ९६ ॥
सूर्यावर्त्तः सितश्चैषां चतुर्माषकसम्मितैः ।
प्रत्येकं स्वरसैः खल्ले शिलायामवधानतः ॥
स्वर्णमाक्षिकमाषं च दत्त्वा मरिचमाषकम् ॥ ९७ ॥
नेपालताम्रदण्डेन घृष्ट्वा तत्कज्जलद्युति ।
वटी मुद्गोपमा कार्या छायाशुष्का तु रक्षिता ॥ ९८ ॥


३ शर्करा-अत्र विषम् ।

प्रथमे वटिकास्तिस्रः कृत्वा नवशरावके ।

१०४भैषज्यरत्नावली ।[ रस-

पारा और गन्धक प्रत्येक दो दो माशे लेकर कज्जली करलेवे । उस कज्जलीको भाँगरा, कुकुरभाँगरा, सिह्नाळु, ब्राह्मी, ग्रीष्मसुन्दर, हुरहुर, श्वेत अपराजिताकी जड, शान्तिशाक, चौलाईका शाक और श्वेत हुलहुल इन प्रत्येकके चार चार माशे स्वरसके साथ पत्थरके खरलमें उत्तम प्रकारसे घोटे फिर उसमें सोनामाखी १ माशा और काली मिरचोंका चूर्ण १ माशा मिलाकर ताँबेके पात्रमें डालकर ताँबेकी मूसलीसे खूब अच्छे प्रकारसे खरल करे, जब औषधि घुटकर कज्जलके समान कान्तियुक्त होजाय तब मूँगके बराबर गोलियाँ बनाकर और छायामें सुखाकर शीशीमें भरकर रखदेवे ॥ ९६-९८ ॥

प्रथमे वटिकास्तिस्रः कृत्वा नवशरावके ।
ततः खसर्पणं सूर्य्यं पूजयित्वा प्रणम्य च ॥
वारिणा गोलयित्वा तु पातुं देयं च रोगिणे ॥ ९९ ॥
स्वेदोपवासचरिते क्लान्ते चाल्पबले तथा ।
द्वितीयेऽह्नि वटीयुग्मं वटीमेकां तृतीयके ।
यावन्त्यो वटिका देयास्तावज्जलशरावकम् ॥ १०० ॥
तृषायां च रसं दद्याज्जाङ्गलानां जलं तृषि ।
लुलायदधिसंयुक्तं भक्तं योज्यं यथेप्सितम् ॥ १ ॥
लावपक्षिरसो देयः संस्कृतः सैन्धवादिभिः ।
पथ्यमग्निबलं वीक्ष्य वारिभक्तरसं तथा ॥
शिरश्चलनशूलादौ तल नारायणादि च ॥ २ ॥

इनमेंसे पहले दिन तीन गोलियोंको एक नये सकोरेमें रखकर आकाशमें भ्रमण करनेवाले सूर्यदेवका पूजन और प्रणाम करके गोलियोंको शीतल जलमें घोलकर रोगीको पान करनेके लिये देवे । अत्यन्त स्वेद निकलने और उपवास करनेसे क्लान्त और बलहीन होनेपर रोगीको दूसरे दिन दो गोली और तीसरे दिन एक गोली उक्त विधिसे सेवन करावे,रोगीको जितनी गोलियाँ सेवन करावे उतने ही सकोरे शीतलजल पिलावे और तृषा लगनेपर जाङ्गलजीवोंका मांसरस और शीतलजल पान करावे । इसपर भैंसके ताजे दहीके साथ भातका आहार यथेच्छरूपसे देवे और सैंधानमक आदि मसालोंके द्वारा संस्कार कियाहुआ लावापक्षीका मांसरस तथा भातका माँड जठराग्निके बलाबलको विचारकर पथ्यरूपसे देवे । शिरःकम्प और शिरःशूल आदि उपद्रवोंके होनेपर शिरपर नारायणतेल आदिकी मालिश करावे ॥ ९८-१०२ ॥

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १०५

सन्निपातादिज्वरोंमें—

मोहान्धसूर्यरस ।

गन्धेशौ लशुनाम्भोभिर्मर्दयेद्याममात्रकम् ।
तस्योदकेन संयुक्तं नस्यं तत्प्रतिबोधयेत् ॥
मरिचेन समायुक्तं हन्ति तन्द्राप्रलापकम् ॥ १०३ ॥

गन्धक और पारा दोनोंको समान भाग लेकर लहसुनके रसमें एक प्रहरतक घोटे उसको लहसुनके रसमें मिलाकर नस्य (देवे) तो सन्निपातज्वरमें चैतन्यलाभ होता है और इसको मिरचोंके चूर्णके साथ मिलाकर नस्य देनेसे तन्द्रा तथा प्रलाप दूर होता है ॥ १०३ ॥

कुलवधूवटी ।

शुद्धसूतं मृत नागं मृतं ताम्रं मनःशिलाम् ।
तुत्थकं तुल्यतुल्यांशं दिनमेकं विमर्दयेत् ॥ १०४ ॥
रसैश्चोत्तरवारुण्याश्चणमात्रा वटी कृता ।
सन्निपातं निहन्त्याशु नस्यमात्रेण दारुणम् ॥
एषा कुलवधूर्नाम जले घृष्ट्वा प्रदापयेत् ॥ १०५ ॥

शुद्ध पारा, सीसेकी भस्म, ताम्रभस्म, मैनसिल और तूतिया सबको समान भाग लेकर इन्द्रायनके रसमें एक दिनतक खरल करके चनेके बराबर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको जलमें घिसकर नस्य देनेसे दारुण सन्निपातज्वर शीघ्र दूर होता है । इसको कुलवधूवटी कहते हैं ॥ १०४ ॥ १०५ ॥

नस्यभैरव ।

मृतसूतार्कतीक्ष्णाग्नि टङ्कणं खर्परं समम् ।
सव्योषमर्कदुग्धेन दिनं सम्मर्दयेद् दृढम् ॥
अर्कक्षीरयुतं नस्यं सन्निपातहरं परम् ॥ १०६ ॥

रससिन्दूर, ताम्रभस्म, लोहभस्म, चीता, सुहागा, खपरिया, सोंठ, मिरच और पीपल इन सबको समान भाग लेकर एक दिनतक आकके दूधमें उत्तम प्रकारसे खरल करके और आकके दूधमें मिलाकर इसकी नस्य देवे तो सन्निपातज्वर दूर होता है ॥ १०६ ॥

१०६ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

उन्मत्तरस ।

रसं गन्धं च तुल्यांशं धुस्तूरफलजैर्द्रवैः ।
मर्दयेद्दिनमेकं तु तुल्यं त्रिकटुकं क्षिपेत् ॥
उन्मत्ताख्यो रसो नाम नस्ये स्यात्सन्निपातजित् १०७॥

पारे और गन्धकको समान भाग लेकर कज्जली करके धतूरेके फलोंके रसमें एक दिनतक घोटे फिर उसमें समान भाग त्रिकुटेका चूर्ण मिलालेवे। यह उन्मत्तरस नस्यके द्वारा प्रयोग करनेपर सन्निपातज्वरको दूर करता है ॥ १०७ ॥


अञ्जनभैरव ।

सूततीक्ष्णकणागन्धमेकांशं जयपालकम् ।
सर्वैस्त्रिगुणितं जम्भवारीणा च सुपेषितम् ॥
नेत्राञ्जनेन हन्त्याशु सर्वोपद्रवमुद्धतम् ॥ १०८ ॥

पारा, लोहा, पीपल और गन्धक ये प्रत्येक एक एक भाग और जमाल गोटा ३ भाग लेकर सबको जम्बीरीनींबुके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके नेत्रोंमें आँजनेसे सर्वप्रकारके उपद्रवोंसहित सन्निपातज्वर शीघ्र निवृत्त होता है ॥ १०८ ॥


सौभाग्यवटी ।

सौभाग्यामृतजीरपञ्चलवणव्योषाभयाक्षामला-
निश्चन्द्राभ्रकशुद्धगन्धकरसानेकीकृतान् भावयेत् ।
निर्गुण्डीयुगभृङ्गराजकववृषापामार्गपत्रोल्लसत्-
प्रत्येकस्वरसेन सिद्धवटिका हन्ति त्रिदोषोदयम् ॥ ९ ॥

सुहागा, शुद्ध वत्सनाभ, जीरा, सेंधानमक, कालानमक, समुद्रनमक, साँभरनमक, विडनमक, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला और चन्द्रिकारहित अभ्रककी भस्म ये प्रत्येक औषधि एक एक भाग और पारे, गन्धककी कज्जली दो भाग लेकर सबको एकत्र खरल करके निर्गुण्डी, भाँगरा, कुकुरभाँगरा, अडूसा और चिरचिटा इन प्रत्येकके पत्तोंके स्वरसमें क्रमसे भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ १०९ ॥

येषां शीतमतीव देहमखिलं स्वेदद्रवार्द्रीकृतं
निद्रा घोरतरा समस्तकरणव्यामोहमूढं मनः ।
शूलश्वासबलासकाससहितं मूर्छारुचिस्तृड्ज्वरं
तेषां वै परिहृत्य जीवितमसौ गृह्णाति मृत्योर्मुखात् ॥१०॥

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १०७

जिन मनुष्योंका समस्त शरीर अत्यन्त शीतल हो और जिसको अधिक पसीना आनेसे देह अत्यन्त आर्द्र होजाताहो घोर निद्रा हो और सम्पूर्ण इन्द्रियोंसहित मन विमुग्ध होगया हो, ऐसे मनुष्योंको इस औषधिकी एक एक गोली उपयुक्त अनुपानके साथ सेवन करावे । यह सौभाग्यवटी शूल, श्वास, कफ, खाँसी, मूर्च्छा, अरुचि, तृषा आदि उपद्रवोंसहित सन्निपात ज्वरको दूर करके रोगीको मृत्युके मुखसे बचाकर नवजीवन प्रदान करती है ॥ ११० ॥

श्रीवेतालरस ।

रसं गन्धं विषं चैव मरिचालं समांशकम् ।
मर्दयेच्छ्लया तावद्यावज्जायेत कज्जलम् ॥ ११ ॥
गुञ्जामात्राप्रमाणेन हरेद् द्वादशसंज्ञकम् ।
साध्यासाध्यं निहन्त्याशु सन्निपातं सुदारुणम् ॥ १२ ॥
म्लानेषु लिप्तदेहेषु मोहग्रस्तेषु देहिषु ।
दातुमर्हति वेतालो यमदूतनिवारकः ॥ १३ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मीठा तेलिया, मिरच और हरताल ये सब औषधियाँ समान भाग लेकर प्रथम पारे और गन्धककी कज्जली करले, फिर सबको एकत्र मिलाकर पत्थरके खरलमें जलके साथ इतना घोटे कि, घुटते २ औषधि काजलके समान काली और चिकनी होजाय । फिर उसकी एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे साध्य व असाध्य बारह प्रकारका दारुण सन्निपात शीघ्र नष्ट होता है । रोगीके शरीरमें अधिक ग्लानि होनेपर तथा पसीनेके आनेसे आर्द्रता होनेपर और अत्यन्त मोह बेहोशीके होनेपर भी यह रस देना चाहिये यह वेतालरस यमदूतको भी निवारण करनेवाला है ॥ ११-१३ ॥

चक्री ।

रसं गन्ध विषं चैव धत्तूरं मरिचं तथा ।
शोधितं च तथा तालं माक्षिकं च समांशकम् ॥ १४ ॥
दन्तीक्वाथेन सम्भाव्य गुञ्जामात्रा तु चक्रिका ।
साध्यासाध्यान्त्रिहन्त्याशु सन्निपाताँस्त्रयोदश ॥ १५ ॥

पारे और गन्धककी कज्जली, शुद्ध वत्सनाभ, धतूरेके बीज, मिरच, शुद्ध हरताल और सोनामाखी सबको समान भाग ले दन्तीके काढेमें खरल करके एकएक रत्तीकी

१०८ . | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-

गोलियाँ बनालेवे । ये गोलियाँ साध्य और असाध्य तेरहों प्रकारके सन्निपातज्वरोंको शीघ्र नष्ट करती हैं ॥ १४ ॥ १५ ॥

द्वितीय चक्री ।

शम्भोः कण्ठविभूषणं समरिचं तालं तथा पारदं
देवीबीजयुतं सुशोधितमितं जैपालबीजोत्तमम् ।
दन्तीमूलयुतं समागधिफलं सर्वं समांशं नयेत्
तत्सर्वं परिमर्द्य चार्द्रकरसैर्गुञ्जाप्रमाणं रसम् ॥ १६ ॥
दद्याद् घोरतरे त्रयोदशविधे दोषे च चक्रयाह्वयं
तन्द्रादाहसमन्विते च तृषया सम्पीड़िते मानवे ॥१७॥

शुद्ध वत्सनाभ विष, मिरच, हरताल, पारा और गन्धककी कज्जली, शुद्ध जमाल-गोटे, दन्तीकी जड और पीपल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर अदरखके रसमें खरलकरके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । अत्यन्त उग्र तेरहोंप्रकारके सन्निपातज्वर, दोषोंकी उल्बणता, तन्द्रा, दाह और तृषायुक्त ज्वरमें भी यह रस रोगीको सेवन कराना चाहिये । इसके सेवनसे उक्त सब विकार शान्त होतेहैं ॥ १६ ॥ १७ ॥


ब्रह्मरन्ध्ररस ।

रसाभ्रगन्धकं तालं हिङ्गुलं मरिचं तथा ।
टङ्कणं सैन्धवोपेतं सर्वांशममृतं तथा ॥ १८ ॥
सर्वपादसमोपेतं महिषीपित्तमर्दितम् ।
ब्रह्मरन्ध्रे प्रयोक्तव्यं संन्यासज्ञानसंगमे ॥ १९ ॥
सहस्रकलशैः स्नानं लेपनं चन्दनादिभिः ।
इक्षुमुद्गरसं भोज्यं तक्रभक्तं यथेप्सितम् ॥ १२० ॥

पारा और गन्धककी कज्जली दो भाग, अभ्रक, हरताल, सिंगरफ, मिरच, सुहागा और सेंधानमक ये प्रत्येक औषधि एक एक भाग और शुद्ध वत्सनाभ सबके बराबर भाग लेवे । इन समस्त ओषधियोंसे चौथाई भाग भैंसका पित्त लेकर उसमें इन सबको खूब अच्छेप्रकारसे खरल करके सन्निपातज्वरकी अज्ञानावस्थामें रोगीके ठीक ब्रह्मरन्ध्रकी जगह मस्तकमें अस्त्रद्वारा बडी सावधानीसे किंचित् क्षत करके उसमें इस रसको भरदेवे । इसके पश्चात् रोगीको शीतल जलसे हजार कलशोंसे स्नान करावे और उसके शरीरपर चन्दन आदिका लेप करे और इसपर ईखका रस, मूंगका

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १०९

यूष, तक्र और भातका यथेच्छरूपसे पथ्य देवे ॥ १८-१२० ॥ आनन्दभैरवीवटी । विषं त्रिकटुकं गन्धं टङ्कणं मृतशुल्बकम् । धत्तूरस्य च बीजानि हिङ्गुलं नवमं स्मृतम् ॥ २१ ॥ एतानि समभागानि दिनैकं विजयारसैः । मर्दयेच्चणकाभा तु वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ २२ ॥ भक्षयित्वा पिबेच्चानु रविमूलकषायकम् । सव्योषं हन्ति नो चित्रं सन्निपातं सुदारुणम् ॥ २३ ॥

शुद्ध वत्सनाभ, सोंठ, मिरच, पीपल, गन्धक, सुहागा, तांबेकी भस्म, धतूरेके बीज और सिंगरफ इन सबको समान भाग लेकर एक दिनतक भांगके रसमें घोटकर चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इनको आनन्दभैरवीवटी कहतेंहैं। इनमेंसे एक गोली खाकर ऊपरसे त्रिकुटेका चूर्ण मिलाकर आककी जडका काढा पीवे तो दारुण सन्निपातज्वर दूर होताहै ॥ २१-२३ ॥

त्रैलोक्यसुन्दररस रसगन्धकयोर्माषौ प्रत्येकं कज्जलीकृतौ । शक्रं च मुसली चैव धत्तूरः केशराजकम् ॥ २४ ॥ देवदाली जयन्ती च तथा मण्डूकपर्णिका । एषां पत्ररसैः शाणैः शिलायां खल्लयेत्पुनः ॥ २५ ॥ शोषयित्वा वटी कार्या त्वनेका राजिकोपमा । त्रिदोषजं ज्वरं हन्ति तथा प्रबलकोष्ठकम् ॥ २६ ॥ तप्त तु नारिकेलस्य जलं देयं प्रयत्नतः । त्रैलोक्यसुन्दरो नाम सन्निपातहरो रसः ॥ २७ ॥

पारा और गंधक प्रत्येक दो दो माशे लेकर कज्जली करलेवे। फिर उसको कुडेकी छाल, मुसली धत्तूरा, कुकुरभांगरा, बंदाल, अरणी और मण्डूकपर्णी इन औषधियोंके पत्तोंके चार चार माशे रसके साथ पत्थरके खरलमें खूब खरल करके सरसोंके बराबर गोलियाँ बनाकर सुखालेवे. यह त्रैलोक्यसुन्दररस सेवन करनेसें कोष्ठगत त्रिदोषज्वर और सब प्रकारके सन्निपातज्वर दूर होते हैं। इसके सेवन करनेसे यदि रोगीको गरमी मालूम होवे तो नारियलका जल पीनेको देना चाहिये ॥ २४-२७ ॥

११० भेषज्यरत्नावली । [ रस-

मृतोत्थापनरस ।

शुद्धसूतं द्विधा गन्धं शिला च विषहिङ्गुलम् ।
मृतकान्ताभ्रताम्रायस्तालकं माक्षिकं समम् ॥ २८ ॥
अम्लवेतसजम्बीरचाङ्गेरीणां रसेन च ।
निर्गुण्डीहस्तिशुण्डयोश्च द्रवैर्मर्द्यं दिनत्रयम् ॥ २९ ॥
रुद्ध्वा तु भूधरे पाच्यं दिनान्ते तत्समुद्धरेत् ।
चित्रकस्य कषायेण मर्दयेत्प्रहरद्वयम् ॥ ३० ॥
माषमात्रं प्रदातव्यं हिङ्गुव्योषार्द्रकद्रवैः ।
सकर्पूरानुपानं स्यान्मृतस्योत्थापने रसे ॥ ३१ ॥
पीडितं सन्निपातेन गतं वापि यमालयम् ।
तत्क्षणाज्जीवयत्येष पथ्यं क्षीरैः प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥

शुद्ध पारा एकभाग, शुद्ध गन्धक दो भाग एवं मैनसिल, शोधित वत्सनाभ, सिंगरफ, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, लोहभस्म, हरताल और स्वर्णमाक्षिककी भस्म इन सब औषधियोंको एकएक भाग लेकर सबको एकत्र मिश्रित करके अम्लवेंत जम्बीरीनिंबू, चूका, निर्गुण्डी और हाथीशुण्डी इन प्रत्येकके रसमें क्रमसे तीन तीन दिनतक खरल करके घडिय़ामें रखकर फिर एकदिनतक भूधरयन्त्रमें पकावे, उत्तम प्रकारसे पकजानेपर औषधिको निकालकर चीतेकी जडके काढेमें दो प्रहरतक खरल करे इसकी मात्रा एक उडदके बराबर देनी चाहिये और इस तरह ऊपरसे हींग सोंठ, मिरच, पीपल, अदरखका रस और कपूरका जल इनका अनुपान करना चाहिये । यह रस सन्निपातज्वरसे पीडित और मृतप्राय व्यक्तिको भी तत्काल जीवित करता है । इसपर दूधका पथ्य देवे ॥ २८-३२ ॥

मृतसंजीवनरस ।

शुद्धसूतं द्विधा गन्धं खल्ले तत्कज्जलीकृतम् ।
अभ्रलौहकयोर्भस्म ताम्रभस्म समं समम् ॥ ३३ ॥
विषतालवराटी च शिलाहिङ्गुलचित्रकम् ।
हस्तिशुण्डी चातिविषा त्र्यूषणं हेममाक्षिकम् ॥ ३४ ॥
चूर्णं विमर्दयेद्रावैराद्रकस्य दिनत्रयम् ।
निर्गुण्डीविजयाद्रावैस्त्रिदिनं मर्दयेत्पुनः ॥ ३५ ॥

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १११


काचकूप्यां निवेश्याथ वालुकायन्त्रके पचेत् ।
द्वियामान्ते समुद्धृत्य मर्दयेदार्द्रकद्रवैः ॥ ३६ ॥
मृतसंजीवनो नाम रसोऽयं शंकरोदितः ।
मृतोऽपि सन्निपातार्तो जीवत्येव न संशयः ॥ ३७ ॥
नातः परतरः कश्चित् सन्निपातहरो रसः ।
अघोरंमन्त्रमुच्चार्य पूजां रक्षां च कारयेत् ॥ ३८ ॥

पारा एकभाग और गन्धक दोभाग दोनोंको एकत्र खरल करके कजली करलेवे एवं अभ्रकभस्म, लोहभस्म, ताम्रभस्म, वत्सनाभ, हरताल, कौडीकी भस्म, मैनसिल, सिंगरफ, सोनामाखी चीतेकी जड़, हाथीशुण्डीकी जड़, अतीस, सोंठ, मिरच और पीपल ये प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेकर सबको एकत्र बारीक खरलकर अदरखके रसमें तीन दिनतक और निर्गुण्डी और भाँगके रसमें क्रमसे तीन तीन दिनतक खरल करके काँचकी आतसी शीशीमें भरकर वालुकायन्त्रमें पकावे । दो प्रहरके पश्चात् स्वांगशितल होनेपर औषधिको निकालकरके अदरखके रसमें खरल करके सुखालेवे । यह श्रीशंकरमहाराजका कहा हुआ मृतसंजीवननामक रस है । इसके सेवन करनेसे मृतप्राय सन्निपातरोगी भी जीवित होजाताहै । सन्निपातको नष्ट करनेवाला इससे उत्तम और कोई रस नहीं है । इस रसको सेवन करानेसे प्रथम अघोर मंत्रके द्वारा शिवजीका पूजन और रसको अभिमंत्रित करके सुरक्षित करलेना चाहिये ॥ ३३-३८ ॥

सन्निपातभैरव रस ।

हिङ्गुलस्य विशुद्धस्य सार्द्धतोलचतुष्टयम् ।
गन्धकस्य विषस्यापि प्रत्येकं तोलकद्वयम् ॥ ३९ ॥
समाषकद्वयं चैव कनकात्तोलकत्रयम् ।
माषैकाधिकतोलैकं टङ्कणस्य तथैव च ॥ ४० ॥
सम्मर्द्य जम्बीररसैर्वटीं छायाविशोषिताम् ।
गुञ्जैकापरिमाणां तु कारयेत्कुशलो भिषक् ॥ ४१ ॥
एकां तु भक्षयेत्तासां गोलयित्वाऽऽर्द्रकद्रवैः ।
घोरे त्रिदोषे दातव्यः सन्निपातकभैरवः ॥ ४२ ॥


“ ॐ अघोरभ्यश्च घोरेभ्यश्च घोरघोरतरेभ्यश्च सर्वतः । सर्वेभ्यो नमोस्तु रुद्ररूपेभ्यः । ” इति मन्त्रेण रक्षणं पूजनं च । अघोरमन्त्रेण अन्यत्रापि रसकार्यमन्यथा दोषोऽस्ति ॥

११२ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-

शुद्ध सिंगरफ साढेचार तोले, शुद्ध गन्धक दो तोले दो मासे, शुद्ध वत्सनाभ २ तोले २ मासे, धतूरेके बीज ३ तोले और सुहागा एक तोला एक माशा इन सबको जम्बीरीनींबूके रसमें खरलकरके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे । इनमेंसे घोर सन्निपातज्वरमें एक एक गोली अदरखके रसमें मिलाकर रोगीको सेवन कराना चाहिये । यह रस सन्निपातज्वरको नष्ट करनेके लिये विशेष उपयोगी है ॥ ३९-१४२ ॥

सूचिकाभरणरस ।

रसगन्धकनागं च विषं स्थावरजङ्गमम् ।
मात्स्यवाराहमायूरच्छागपित्तैश्च भावयेत् ॥ ४३ ॥
सूचिकाभरणो नाम भैरवेण प्रकीर्त्तितः ।
सूचिकाग्रेण दातव्यः सन्निपातकुलान्तकः ।
“सर्षपमात्रया आर्द्रकस्वरसेन खादेत्” ॥ ४४ ॥

पारे गन्धककी कज्जली २ भाग, एवं सीसेकी भस्म, शुद्ध मीठा तेलिया और काले साँपका विष ये प्रत्येक एकएक भाग लेकर सबको रोहू मछली, सूअर, मोर और बकरे इनके पित्तमें क्रमसे एकएक दिनतक खरल करे तो सूचिकाभरणरस तैयार होता है । इसको सुईके अग्रभागसे लेकर १ सरसोंतककी मात्राको अदरखके रस और मधुके अनुपानसे सेवन करावे । यह रस सब प्रकारके सन्निपातज्वरोंको नष्ट करदेता है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥

पुनः सूचिकाभरणरस ।

अमृतं गरलं दारु सर्वतुल्यं च हिङ्गुलम् ।
पञ्चपित्तेन संमर्द्य सर्षपाभां वटीं चरेत् ॥ ४५ ॥
वटिका सूचिकाग्रेण सन्निपातकुलान्तकृत् ।
शैत्यार्थं तिलतैलं च भोजनं दधिभक्तकम् ॥ ४६ ॥

शुद्ध मीठा तेलिया, काले साँपका विष और सोमल विष ये प्रत्येक एक एक भाग और सिंगरफ तीन भाग लेकर सबको एकत्र पञ्चपित्तों (रोहू मछली, सूअर भैंसा, बकरा, और मोर इन पाँचोके पित्तों) में क्रमसे एकएक दिनतक खरल करके सरसोंकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । उनमेंसे एक एक गोली सुईके अग्रभागसे उठाकर नारियलके जलके साथ सेवन करावे । सेवनके पश्चात् रोगीके शरीरपर तिलके तेलकी मालिश करावे और दही, भातका पथ्य देवे । यह रस भी सम्पूर्ण सन्निपातज्वरको नष्ट करता है ॥ ४५ ॥ ४६ ॥

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ११३

बृहत्सूचिकाभरणरस ।

रसगन्धकनागाभ्रं विषं स्थावरजङ्गमम् ।
मात्स्यमाहिषमायूरच्छागपित्तैर्विभावयेत् ॥ ४७ ॥
सूचिकाभरणो नाम भैरवेण प्रकीर्त्तितः ।
दातव्यः सूचिकाग्रेण पयःपेटीरसेन च ॥ ४८ ॥
त्रयोदशसन्निपाते विषूच्यामतिसारके ।
त्रिदोषजे तथा कासे दापयेत्कुशलो भिषक् ॥ ४९ ॥
पयःपेटीशतं दद्यात् भोजनं दधिभक्तकम् ।
तथा सुभर्जितं मांसं लेपनं तिलचन्दनैः ॥
रोगिणो यत्प्रियं द्रव्यं तस्मै तच्च प्रदापयेत् ॥ १५० ॥

पारा और गन्धककी कज्जली, सीसा, अभ्रक, स्थावरविष और जंगम ( कृष्ण सर्पका ) विष प्रत्येक समान भाग लेकर रोहू मछली, भैंसा, मोर और बकरेके पित्तमें क्रमसे एक एक दिनतक भावना देक सरसोंकी समान गोलियां बनाकर सुईकी नोकसे उठाकर इसको नारियलके जलके साथ सेवन करावे । इस रसको तेरह प्रकारके सन्निपातज्वर, विषूचिका, अतिसार और त्रिदोषजनित कासरोग आदिमें सेवन कराना चाहिये. इसपर १०० नारियलोंका जल, दहीभात और घृतमें भुना हुआ मांस तथा जो वस्तु रोगीको प्रिय लगे वह उसको सेवन करनेके लिये दे और रोगीके शरीरपर तिलके तेल और चन्दनादिका प्रलेप करना चाहिये ॥१४७-१५०॥

पानीयवटिका ।

रसमाषकचत्वारि इष्टकागुण्डके ग्रहः ।
शोषयित्वा ततः शोध्य तीक्ष्णपर्णे तथाऽऽर्द्रके ॥ ५१ ॥
स्वर्णधुस्तूरसत्त्वे च वृद्धदारद्रवे तथा ।
कन्यकानिजसत्त्वे च रसशोधनमुत्तमम् ॥ ५२ ॥
गन्धकं रसतुल्यं तु प्रक्षाल्य तण्डुलाम्बुना ।
कृत्वा तैलसमं दार्व्यां निर्वाप्य चित्रकद्रवे ॥ ५३ ॥
द्वाभ्यां कज्जलिकां कृत्वा लौहचूर्णस्य माषकम् ।
सुवर्णमाक्षिकं चापि तत्र लौहसमं ददेत् ॥ ५४ ॥

११४ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

कृत्वा कण्टकवेध्यं तु ताम्रं कज्जललेपितम् । मुहूर्तमध्यतस्ताम्रं द्रुतं चूर्णत्वमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥ एकीकृत्य तु तत्सर्वं ततः प्रस्तरभाजने । मर्दयेत्ताम्रदण्डेन दत्त्वा चैषां निजद्रवम् ॥ ५६ ॥

पारा ४ माशे लेकर ईंटके चूर्णके साथ मिलाकर खूब घोटे, फिर उस समस्त चूर्णको निकालकर और उसमेंसे पारेको अलग करके कमरख, अदरख, काले धतूरेके पत्ते, विधारेकी जड और घीग्वार इन प्रत्येकके स्वरसमें क्रमसे मर्दन करके सुखाताजाय; पारेको शुद्ध करनेकी यह क्रिया सर्वोत्तम है। इसके पश्चात् ४ माश गन्धक लेकर प्रथम चावलोंके जलमें धोवे, फिर उसको लोहेकी करछीमें रखकर अग्निपर तपावे, जब वह पिघलकर तेलकी समान पतली हो जाय तब उसे चीतेके काढेमें छोडदेवे। इस प्रकार शुद्ध कियेहुए पारे और गन्धकको लेकर दोनोंकी एकत्र कज्जली करलेवे। फिर शुद्ध ताँबेके कण्टकवेधी सूक्ष्मपत्रोंपर उस कज्जलीका लेप करके उन पत्रोंको हाँडीमें बन्दकर चूल्हेपर रखकर अग्नि देवे। इस प्रकारसे मुहूर्त्त-भरमें ही ताँबेकी उत्तम भस्म हो जाती है। उक्त विधिसे तैयार की हुई ताम्रभस्म १ माशा, लोहभस्म १ माशा और स्वर्णमाक्षिकभस्म १ माशा लेकर तीनोंको पत्थरके खरलमें डालकर निम्नलिखित ओषधियोंके रसके साथ ताँबेकी मुसलीसे खरल करे ॥ १५१-१५६ ॥

प्रथमे केशराजश्च द्वितीये ग्रीष्मसुन्दरः । तृतीये भृङ्गराजश्च चतुर्थे भेकपर्णिका ॥ ५७ ॥ पञ्चमे च निसुन्दारःषष्ठे च रसपूर्तिका । सप्तमे पारिभद्रश्च अष्टमे रक्तचित्रकः ॥ ५८ ॥ शक्रासनं च नवमे दशमे काकमाचिका । एकादशे तथा नीला द्वादशे हस्तिशुण्डिका ॥ ५९ ॥ अमीषामोषधीनां तु प्रत्येकं तु पलद्रवम् । मर्दयेत्तु प्रयत्नेन द्वादशाहेन साधकः ॥ १६० ॥

पहले दिन कुकुरभाँगरेके रसमें, दूसरे दिन ग्रीष्मसुन्दर ( शालिशाक ), तीसरे दिन भाँगरा, चौथे दिन मण्डूकपर्णी, पाँचवें दिन सिंहाळ्ह, छठे दिन मालकाँगनी, सातवें दिन फरहद, आठवें दिन' लालचीता, नववें दिन भाँग, दसवें दिन मकोय, ग्यारहवें दिन नीलीवृक्ष और बारहवें दिन हाथीशुण्डी इन ओषधियोंका चार चार

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता। ११५

तोले रस डालकर इस प्रकार बारह दिनतक उत्तम प्रकारसे खरल करे॥५७-१६०॥

ततः पारदमानं तु दत्त्वा त्रिकटुगुण्डकम् । वटिकां राजिकातुल्यां छायाशुष्कां समाचरेत् ॥ ६१ ॥ ततः शम्बुकजे पात्रे कर्त्तव्यावटिका त्वियम् । शरावे शङ्खपात्रे वा कृत्वा सलिलगोलितम् ॥ ६२ ॥ अत्यन्तदोषदुष्टाय ज्ञानशून्याय रोगिणे । ऊर्ध्वयोनिं समभ्यर्च्य प्रदद्याद्वटिकाद्वयम् ॥ ६३ ॥ ढक्कयेत्तं ततः पश्चाद्नरं स्थूलपटादिभिः । मलमूत्रागमात्सद्यः स साध्यो भवति द्रुतम् ॥ ६४ ॥

फिर उसमें चार माशे त्रिकुटका चूर्ण मिलाकर राईकी बराबर गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे। इन गोलियोंमेंसे दो दो गोली लेकर घोंघा, शंख, सीप या शराव (सकोरा) में रखकर, जलमें घोलकर और ब्रह्माका यथाविधि पूजन करके रोगीको सेवन करावे। जिस सन्निपातज्वरमें रोगीके वातादि दोष अत्यन्य दुष्ट होगये हों और जो बिलकुल ज्ञानशून्य हो ऐसे रोगीको यह औषध सेवन कराकर तत्काल मोटा और गरम कपडा उढाकर ढकदेवे। इसके पश्चात् यदि रोगी शीघ्रही मलमूत्रका त्याग करे तो उसको साध्य समझना चाहिये ॥ ६१-६४ ॥

दध्यन्नं तु ततो दद्यात्पिबेद्वारि यथेच्छया । दद्याद्वातहरं तैलमभ्यङ्गाय सदैव हि ॥ चिरज्वरे पिबेद्वारि पञ्चमूलीप्रसाधितम् ॥ ६५ ॥ ग्रहण्यां रक्तपाते च पिबेदतिविषां गदी । पिबेत् पर्पटजं वारि घोरे कम्पज्वरे तथा ॥ तथा ज्वरातिसारे च जीरकस्य जलं पिबेत् ॥ ६६ ॥ मन्दाग्नौ कामलायां च संग्रहग्रहणीगदे । कासे श्वासे सदा कार्या पानीयवटिका त्वियम् ॥ ६७ ॥

तदनन्तर रोगीको दहीभातका भोजन और यथेच्छ जलपान करावे। तथा वातनाशक महानारायणादि तेलोंकी शरीरपर मालिश करावे। इसपर पुराने

११६ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

ज्वरमें पंचमूलके काढ़ेका, संग्रहणी और रक्तातिसाररोगमें अतीसके क्वाथ, घोर कम्पज्वरमें पित्तपापडेके क्वाथ और ज्वरातिसार, मन्दाग्नि, कामला, संग्रहणी, खाँसी, श्वास आदि रोगोंमें जीरेके क्वाथका अनुपान करना चाहिये । इस रसको पानीयवटिका कहते हैं ॥ ६५-१६७ ॥

सिद्धफलापानीयवटिका ।

अनाथनाथो जगदेकनाथस्त्रिलोकनाथः प्रथमं प्रसन्नः । जगाद पानीयवटीं सुपद्वीं तामेव वक्ष्यामि गुरुप्रसादात्॥६८ जयार्कस्वरसं चैव निर्गुण्डीवासकं तथा । वाट्यालकं करञ्जं च सूर्यावर्त्तकचित्रकौ ॥ ६९ ॥ ब्राह्मीं वनं सर्षपं च भृङ्गराजं विनिक्षिपेत् । दन्ती च त्रिवृता चैव तथाऽऽरग्वधपत्रकम् ॥ ७० ॥ सहदेवामरं भण्डी तथा त्रिपुरभण्डिका । मण्डूकपर्णी पिप्पल्यौ द्रोणपुष्पकवायसी ॥ ७१ ॥ गुञ्जाकिनी केशराजस्तथा योजनमल्लिका । आसारणेति विख्यातो धुस्तूरः कनकस्तथा ॥ ७२ ॥ त्रैलोक्यविजया चैव तथा श्वेताऽपराजिता । प्रत्येकं कार्षिकं चैव रसमाकृष्य भाजने ॥ ७३ ॥ एकैकं च रसं दत्त्वा मर्दयेल्लौहदण्डतः । चण्डातपे च संशोष्य क्षीरं तत्र पुनः क्षिपेत् ॥ ७४ ॥ स्नुहीक्षीरं चार्कदुग्धं वटदुग्धं तथैव च । प्रत्येकं कार्षिकं दत्त्वा मर्दयेच्च पुनः पुनः ॥ ७५ ॥ सुमर्द्दितं च तं ज्ञात्वा यदा पिण्डत्वमागतम् । द्रव्याण्येतानि संचूर्ण्य वस्त्रपूतानि कारयेत् ॥ ७६ ॥

अनाथोंके नाथ, जगत्पति, त्रिलोकीनाथ भगवान्ने प्रसन्न होकर पूर्वकालमें जिस सर्वरोगापहारिणी और सर्वसिद्धिप्रदायिनी पानीयवटीको वर्णन किया है, उसीको मैं श्रीगुरुमहाराजके चरणोंकी कृपासे वर्णन करताहूँ—अरणी, आक, सिंहालू, अडूसा, खिरैंटी, छोटीकरंज, हुलहुल, चीता, ब्राह्मी, वनसरसों, भाँगरा, दन्ती, निसोत, अमलतासके पत्ते, सहदेई, अमरकन्द, मजीठ, त्रिपुर-

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ११७


भाण्डिका ( वङ्गदेशप्रसिद्ध बडभाँट ), मण्डूकपर्णी, पीपल, गजपीपल, गूमा, मकोय, घुँघुची, कुकुरभाँगरा, मदनमाली ( एक प्रकारका सुगन्धितपुष्प ), आसारण, स्वर्णधतूरा, भाँग और श्वेत अपराजिता इन समस्त औषधियोंके रसको एक एक कर्ष परिमाण लेकर प्रत्येकके रसको क्रमसे पत्थरके खरलमें डालकर लोहेकी मूसलीसे खरल करे । फिर सबको प्रचण्ड धूपमें सुखाकर उसमें थूहरका दूध, आकका दूध, और बड़का दूध प्रत्येक एक एक कर्ष डालकर अच्छेप्रकारसे मर्दन करके गोलासा बनालेवे । इसके पश्चात् उसमें निम्नलिखित औषधियोंको खूब बारीक पीसकर कपड़छान करके डाले ॥ ६८–७६ ॥

दग्धहीरं चातिविषां कोचिलामभ्रकं तथा ।
पारदं शोधितं चैव गन्धकं विषमाधुरम् ॥ ७७ ॥
हरितालं विषं चैव माक्षिकं च मनःशिला ।
प्रत्येकं च चतुर्माषं सर्वं चूर्णीकृतं च तत् ॥ ७८ ॥
प्रक्षिप्य मर्दयेत्सर्वं शोषयित्वा पुनः पुनः ।
सुमर्द्दितं च तद् दृष्ट्वा चाङ्गेरीस्वरसेन च ॥ ७९ ॥
उत्थाप्य भेषजं दृष्ट्वा यदा पिण्डत्वमागतम् ।
तिलप्रमाणा गुटिकाः कारयेन्मतिमान् भिषक् ॥ १८० ॥

हीरेकी भस्म, अतीस, कुचला, अभ्रकभस्म, शुद्ध पारे और शुद्ध गन्धककी कज्जली, शुद्ध मीठातेलिया, हरताल, सर्पविष, सोनामाखी और मैनसिल, इन सबको चार चार माशे परिमाण मिलाकर बारम्बार खरलकरे और धूपमें सुखावे । जब औषधि उत्तमप्रकारसे घुटकर तैयार होजाय तब उसको चूका शाकके रसमें घोटे । घुटते २ जब उसका गोलासा बनजाय तब उसकी तिलकी बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ ७७–१८० ॥

त्रिदोषजनितो वैद्यमुक्तोऽपि बहुसम्मतः ।
लंघनैर्वालुकास्वेदैः प्रक्रान्तो दीनदर्शनः ॥ ८१ ॥
सम्पूज्य करुणाधारं प्रणम्य च खसर्पणम् ।
शरावे वारिणा घृष्ट्वाऽऽविंशतिं वटिकां पिबेत् ॥ ८२ ॥
पीतं तद्भेषजं पश्चाद्वस्त्रैराच्छादयेन्नरम् ॥
रसलग्नं वपुर्ज्ञात्वा दद्याद्वारि सुशीतलम् ॥ ८३ ॥

११८ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-..


शरावप्रमितं वारि पातव्यं च पुनः पुनः ।
सन्निपातज्वरं चैव दाहं चैव सुदारुणम् ॥ ८४ ॥
कासं श्वासं च हिक्कां च विड्ग्रहं चाश्मरीं जयेत् ।
मूत्ररोगविबन्धे तु दातव्यं क्षीरसंयुक्तम् ॥ ८५ ॥
पञ्चतृणकृतं क्वाथं दातव्यं च पुनः पुनः ।
पानीयवटिका ह्येषा लोकनाथेन निर्मिता ॥
लोकानामुपकाराय सर्वसिद्धिप्रदायिनी ॥ ८६ ॥

जो रोगी घोर सन्निपातज्वरमें बेहोश पडा हो, जिसको वैद्यों ने असाध्य जानकर त्याग दिया हो, जिसको लंघन वालुकास्वेद आदि उपचारोंके द्वारा भी कुछ लाभ न हुआ हो और जो अत्यन्त दीन दशामें हो ऐसे रोगीको प्रथम करुणानिधान शंकर भगवान्का पूजन और सूर्यदेवको प्रणाम करके फिर इस रसकी दो या तीन गोलियाँ सकोरेमें पानीके साथ घिसकर सेवन करावे । यदि रोगकी अधिक प्रबलता प्रतीत हो तो २० गोलीतक इसी विधिसे सेवन करानी चाहिये और रोगीको औषध सेवन कराकर तत्काल गरम व मोटे वस्त्रसे ढकदेना चाहिये । जब औषधि रोगीके शरीरमें व्याप्त होजाय तब उसको थोडी २ देर पीछे एक एक सकोरा शीतलजल पान करावे । यह रस इस प्रकार सेवन करनेपर घोर सन्निपातज्वर, अत्यन्त प्रबलदाह खाँसी, श्वास, हिचकी, मलका, अवरोध और अश्मरी (पथरी) इन सब रोगोंको नष्ट करता है । मूत्रकृच्छ्ररोगमें इस रसको दूधके साथ सेवन कराकर पञ्चतृणमूल (कुश, काँस, रामसर, कालीईख और शालिधान इन औषधियों) का क्वाथ बारम्बार पान कराना चाहिये । सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करानेवाली इस पानीयवटीको जगत्का उपकार करनेके निमित्त श्रीशंकरभगवान्ने निर्माण किया है ॥ १८४-१८६ ॥

चिन्तामणिरस ।

सूतं गन्धकमभ्रकं सुविमलं सूताद्धभागं विषं
तत्र्यंशं जयपालमम्लमृदितं तद्गोलकं वेष्टितम् ।
पत्रैर्मञ्जुभुजङ्गवह्निजनितैर्न्निक्षिप्य खाते पुटं
दत्त्वा कुक्कुटसंज्ञकं सह दलैः संचूर्ण्य तत्र क्षिपेत् ॥ ८७ ॥
भागार्थं जयपालबीजममृतं तत्तुल्यमेकीकृतं
गुञ्जा त्र्यूषणसिन्धुचित्रकयुता सर्वाञ्ज्वरान्नाशयेत् ।

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ११९

शूलं संग्रहणीगदं सजठरं दध्यन्नसंसेविनां
तापे सेचनकारिणां गदवतां सूतस्य चिन्तामणेः ॥
“अयमेव रसो देयो मृतकल्पे गदातुरे” ॥ ८८ ॥

पारा, गन्धक दोनोंकी कज्जली और अभ्रकभस्म प्रत्येक एक एक तोला, शुद्धमीठा तेलिया ६ माशे और जमाल गोटा डेढ तोला सबको जम्भीरी नींबूके रसमें उत्तम प्रकारसे खरल करके गोलासा बनालेवे । उस गोलेको नागरबेलके तीन पानोंमें लपेटकर और मिट्टीकी मूषामें रखकर कपडौटी कर देवे । पश्चात भूमिमें गढ्ढा खोदकर उसमें संपुटको रखकर कुक्कुटपुट देवे । स्वाँगशीतल होनेपर औषधिको निकालकर पानोंसहित चूर्ण करलेवे । फिर उसमें जमाल गोटे ६ माशे और शुद्ध वत्सनाभ ६ माशे डालकर अदरखके रसके साथ खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक एक गोली सोंठ, मिरच, पीपल, सैंधानमक और चीतेके समानभाग चूर्णके साथ अदरखके रसमें मिलाकर सेवन करे । यह रस सर्वप्रकारके ज्वर, शूल, संग्रहणी और समस्त उदररोगोंको नष्ट करताहै । इस रसपर दही और भातका पथ्य सेवन करे और शरीरमें अधिक ताप होनेपर जलसेचन आदि शीतल उपचार करे । यह रस मृतप्राय रोगीको भी दिया जा सकताहै ॥ ८७ ॥ ८८ ॥

द्वितीय चिन्तामणिरस ।

रसविषगन्धकटङ्कणताम्रयवक्षारं व्योषम् ।
जयपालस्य बीजं च क्षौद्रं दत्त्वा शतं वारान् ॥ ८९ ॥
सम्मर्द्य रक्तिकमिता वटिकाः कुर्याद्भिषक् प्राज्ञः ।
शुण्ठीपिष्टेन सममेका द्वे वाऽथवा तिस्रः ॥ १९० ॥
संप्राश्य नारिकेलीजलमनुपेयं प्रयुञ्जीत ।
भेदानन्तरमेव प्रक्षालितभक्तं तक्रमुपयोज्यम् ॥ ९१ ॥
शेषात्सैन्धवजीरं तक्रं भक्तं प्रयोक्तव्यम् ।
प्रशमयति सन्निपातज्वरं तथाऽजीर्णं विषमं च ॥ ९२ ॥
प्लीहानं चाध्मानं कासं श्वासं च वह्निमान्द्यं च ।
चिन्तामणी रसोऽयं किल नियतं भैरवेण निर्दिष्टः ॥ ९३ ॥

शुद्ध वत्सनाभ, सुहागा, ताम्रभस्म, जवाखार, पारे और गन्धककी कज्जली दो भाग, सोंठ, मिरच, पीपल और जमाल गोटा प्रत्येक ओषधि एक एक भाग

१२० भैषज्यरत्नावली । [ रस-

इन सबको एकत्र मधुके साथ सौबार खरल करके एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे एक या दो अथवा तीन गोली सोंठके चूर्ण और मधुके साथ रोगीको सेवन कराकर नारियलके जलका अनुपान करावे। औषध सेवनके पश्चात् विरेचन होजानेपर रोगीको तक्रके साथ भातका माँड सेवन करावे। फिर सैंधानमक और जीरेका चूर्ण डालकर तक्रके साथ भातका भोजन करावे। इस प्रकार इस रसको सेवन करनेसे सन्निपातज्वर, अजीर्ण, विषमज्वर, प्लीहा, अफारा, खाँसी, श्वास, मन्दाग्नि आदि समस्त व्याधियाँ शीघ्र शमन होती हैं। इस चिन्तामणिरसको श्रीभैरवजीने निर्दिष्ट किया है ॥ ८९-१९३ ॥

रसराजेन्द्र ।

पलं शुद्धस्य सूतस्य पलं ताम्रमयोरजः ।
अभ्रं नागं पलं वङ्गं पलं गन्धकतालकम् ॥ ९४ ॥
पलं शुद्धविषं चूर्णं सर्वमेकत्र कारयेत् ।
मर्दयेत काकमाच्याश्च तत्र साररसेन च ॥ ९५ ॥
मात्स्यवाराहमायूरच्छागमाहिषपित्तकैः ।
मर्दयेद्दिनमित्रैश्च त्रिकटोरम्बुभिस्तथा ॥ ९६ ॥
आर्द्रकस्वरसैः पश्चात् शतवारान्मुहुर्मुहुः ।
सिद्धोऽयं रसराजेन्द्रो धन्वन्तरिप्रकाशितः ॥ ९७ ॥
गुञ्जामात्रां रसं दद्यात् सुरसारससंयुतम् ।
मेघधाराप्रवाहेण धारितं वारि मस्तके ॥ ९८ ॥
अनिवार्यो यदा दाहस्तदा देया च शर्करा ।
भोजन दधिसंयुक्तं वास्तूकं तु दापयेत् ॥ ९९ ॥
ईश्वरेण हतः कामः केशवेन च दानवाः ।
पावकेन हतं शीतं सन्निपातं रसस्तथा ॥ २०० ॥

शुद्ध पारा एक पल, ताम्रभस्म, लोहभस्म, अभ्रक, सीसा, वङ्ग, हरताल, शुद्धगन्धक और शुद्ध वत्सनाभ ये प्रत्येक ओषधि एकएक पल लेकर प्रथम पारे और गन्धककी कज्जली करले, फिर सबको कज्जलीसहित एकत्र खरल करके मकौयके स्वरसमें घोटे, पश्चात् रोहू मछली, सूकर, मोर, बकरा और भैंसा इन पाँचोंके पित्तमें पृथक् पृथक् क्रमसे मर्दन करके त्रिकुटेके क्वाथमें खरल करे। फिर अदरखके स्वरसमें सौबार घोटे तो यह रस सिद्ध होता है। इसको