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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

. प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १६३

प्रत्येकं सप्त सप्ताथ शुष्कं गुञ्जाचतुष्टयम् । ज्वरघ्नेन घृतेनाद्यात् त्र्याहिकज्वरशान्तये ॥ ५३ ॥

पारा, गन्धक और शङ्खभस्म ये प्रत्येक एक एक तोला और तूतिया सबका चौथाई भाग लेकर सब औषधियोंको गोजिया (गोभी), अरणी और चौलाईका शाक इन प्रत्येकके रसमें क्रमसे सात सात बार भावना देकर चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनाकर सुखालेवे । इस रसकी एक एक गोली किसी ज्वरघ्न घृतके साथ सेवन करनी चाहिये । यह रस तृतीयक (तिजारी) ज्वरको शमन करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥

चातुर्थकारिरस ।

हरितालं शिला तुत्थं शङ्खचूर्णं च गन्धकम् । समांशं मर्दयेत्खल्ले कुमारीरससंयुतम् ॥ ५४ ॥ शरावसम्पुटे कृत्वा दत्त्वा गजपुटं पचेत् । कुमारिकारसेनैव वल्लमात्रा वटी कृता ॥ ५५ ॥ दत्ता शीतज्वरं हन्ति चातुर्थिकं विशेषतः । मरिचैर्घृतयोगेन तक्रं पीत्वा चरेद्वटीम् ॥ एतया वमनं भूत्वा ज्वरस्तस्माद्विनश्यति ॥ ५६ ॥

हरताल, मैनसिल, तूतिया, शंखभस्म और गन्धक इन सबको समान भाग लेकर एकत्र खरल करके घीग्वारके रसमें घोटकर गोलासा बनालेवे । उसको शरावसम्पुटमें बन्द करके गजपुटमें पकावे । स्वाङ्गशीतल होनेपर गोलेको निकालकर फिर घीग्वारके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । प्रथम रोगीको तक्र पान कराकर फिर इस रसकी गोलीको मिरचोंके चूर्ण और घृतके साथ सेवन करावे । इससे रोगीको वमन होकर शीतज्वर और विशेषकर चातुर्थिकज्वर (चौथियाज्वर) शीघ्र नष्ट होता है ॥ ५४-५६ ॥

विश्वेश्वररस ।

दरदं पारदं गन्धं तुल्यांशं मर्दयेद्रसे । अश्वत्थेजे त्र्यहं पश्चाद्रसे कोलकमूलजे ॥ ५७ ॥ निदिग्धिकारसे काकमाचिकाया रसे तथा । द्विगुञ्जं वा त्रिगुञ्जं वा गोक्षीरेण प्रदापयेत् ॥ रात्रिञ्चरं निहन्त्याशु नाम्ना विश्वेश्वरो रसः ॥ ५८ ॥

१६४ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

सिंगरफ, पारा, गन्धक तीनोंको समान भाग लेकर पीपलवृक्षकी जड, बेरीकी जड, कटेरी और मकोयके क्वाथमें तीन तीन दिनतक भावना देकर दो या तीन रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । उनमेंसे एकएक गोली रोगीको गायके दूधके साथ सेवन करावे । यह विश्वेश्वर रस रात्रिमें आनेवाले ज्वरको शीघ्र नष्ट करता है ॥५७॥५८॥

विक्रमकेसरीरस ।

शुल्बमेकं द्विधा तारं मर्दयेद्विधिवद्भिषक् ।
पश्चाद्द्विषं रसं गन्धं मेलयित्वा तु भावयेत् ॥ ५९ ॥
एकविंशतिवारांश्च लिम्पाकवल्कलद्रवैः ।
रसः सिद्धः प्रदातव्यो गुञ्जामात्रो ज्वरान्तकृत् ॥
सर्वज्वरहरः ख्यातो रसो विक्रमकेसरी ॥ ४६० ॥

ताम्रभस्म १ तोला और रौप्यभस्म २ तोले लेकर दोनोंको एकत्र खूब बारीक खरल करे । फिर उसमें शुद्ध वत्सनाभ, पारा और गन्धक ये प्रत्येक एकएक तोला मिलाकर कन्नानींबूके वृक्षकी छालके काढेमें २१ बार भावना देकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह रस सर्वप्रकारके ज्वरोंको नष्ट करनेके लिये प्रसिद्ध है ॥ ५९ ॥ ४६० ॥

ज्वरकालकेतुरस ।

रसं विषं गन्धकताम्रकंच मनःशिलारुष्करतालकं च ।
विमर्द्य वज्रीपयसा समांशं गजाह्वयं तत्र पुटं विदध्यात् ६१ ॥
द्विगुञ्जमस्यैव मधुप्रयुक्तं ज्वरं निहन्यष्टविधं महोग्रम् ।
पुरा भवान्यै कथितो भवेन नृणां हिताय ज्वरकालकेतुः ॥६२

पारा, विष, गन्धक, ताम्रभस्म, मैनासिल, भिलावे और हरताल इनको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके गजपुटमें पकावे । इस रसको दो दो रत्तीपरिमाण शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे अत्यन्त उग्र आठोंप्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं । इस रसको पूर्वकालमें मनुष्योंके हितके लिये शिवजी महाराजने पार्वतीजीसे कहा था ॥ ६१ ॥ ६२ ॥

त्रिपुरारिरस ।

हुताशमुखमंशुद्धं रसं ताम्रं च गन्धकम् ।
लौहमभ्रं विषं चैव सर्वं कुर्यात्समांशकम् ॥ ६३ ॥
रसाद्धं मृतरूप्यं च शृङ्गवेराम्बुमर्द्दितम् ।
द्विगुञ्जं मधुना देयं सितयाऽऽर्द्ररसेन वा ॥ ६४ ॥

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १६५

ज्वरमष्टविधं हन्ति वारिदोषभवं तथा ॥ प्लीहानमुदरं शोथमतीसारं विनाशयेत् ॥ रोगानेतान्निहन्त्याशु शङ्करस्त्रिपुरं यथा ॥ ६५ ॥ सिंगरफसे निकालाहुआ शुद्ध पारा, ताम्रभस्म, गन्धक, लोहा, अभ्रक और शुद्ध मीठा तेलिया ये सब एक एक तोला और चाँदीकी भस्म ६ माशे लेकर सबको अदरखके रसमें घोटकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको शहद और अदरखके रसके साथ अथवा मिश्रीमें मिलाकर सेवन करना चाहिये । इसके सेवनसे आठों प्रकारका ज्वर, जलदोषसे उत्पन्न हुआ ज्वर, प्लीहा, उदररोग, शोथ, अतिसार आदि सब रोग दूर होते हैं ॥ ६३–६५ ॥

मेघनादरस ।

तारं कांस्यं मृतं ताम्रं त्रिभिस्तुल्यं च गन्धकम् । क्वाथेन मेघनादस्य पिष्ट्वा रुद्ध्वा पुटे पचेत् ॥ ६६ ॥ षड्भिः पुटैर्भवेत्सिद्धो मेघनादो ज्वरापहः । भक्षयेत्पर्णखण्डेन विषमज्वरनाशनः ॥ ६७ ॥ अस्य मात्रा द्विगुंजा स्यात्पथ्यं दुग्धौदनं हितम् । नागरातिविषामुस्ताभूनिम्बामृतवत्सकैः ॥ ६८ ॥ सर्वज्वरातिसारघ्नं क्वाथमस्यानुपाययेत् । तरुणं वा ज्वरं जीर्णं तृष्णां दाहं च नाशयेत् ॥ ६९ ॥ चाँदी काँसा ताँबा इन तीनोंकी भस्म एक एक तोला और गन्धक ३ तोले लेकर सबको एकत्र खरल करके चौलाईके शाकके रसमें बारम्बार खरल करके ६ बार गजपुटमें पकावे । इस प्रकारसे जब यह रस उत्तम प्रकारसे सिद्ध होजाय तब बारीक खरल करलेवे । इसको दो दो रत्तीकी मात्रासे पानके रस और मधुमें मिलाकर सेवन करे । यह विषमज्वरको नष्ट करता है । इसपर दूधभातका पथ्य हितकारी है । यह नवीनज्वर, जीर्णज्वर, तृष्णा और दाहको शान्त करता है । इस रसको सोंठ, अतीस, नागरमोथा, चिरायता, गिलोय और कुडेकी छाल इन ओषधियोंका क्वाथ अनुपानके साथ सेवन करानेसे सब प्रकारका ज्वरातिसाररोग दूर होता है ॥ ६६–६९ ॥

शीतारिरस ।

तालकं दरदोद्भूतं पारदं गन्धकं शिला । क्रमाद्भागाङ्घिरहितं कारवेल्लाम्बुमर्दितम् ॥ ४७० ॥

:१६६ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

इदमस्य प्रमाणेन ताम्रपात्रं विलेपयेत् । अधोमुखं दृढे भाण्डे तं निरुध्याथ पूरयेत् ॥ ७१ ॥ चुल्ल्यां वालुकया घस्रमेकं प्रज्वालयेद्दृढम् । शीते संचूर्ण्य गुञ्जाऽस्य नागवल्लीदले स्थिता ॥ ७२ ॥ भक्षिता मरिचैः सार्द्धं समस्तान् विषमज्वरान् । दाहशीतादिकं हन्यात्पथ्यं शाल्योदनं पयः ॥ ७३ ॥

हरताल ४ तोले, सिंगरफसे निकालाहुआ पारा दो तोले, गन्धक १ तोला और मैनसिल ६ माशे लेकर सबको करेलेके पत्तोंके रसमें खरल करे, फिर ७॥ तोले परिमाण तांबेके बनवाये हुए खरलके भीतर उक्त ओषधिका लेप करके उसको नीचा मुँह करके एक हाँडीमें रक्खे । हाँडीके मुँहपर सकोरा ढककर सन्धिसथानोंको कपरौटीद्वारा बन्द करदेवे । पश्चात् उस हाँडीको एक वालूसे भरीहुई हाँडीमें गाडकर उसपर मुद्रा करदेवे और उसको चूल्हेपर चढाकर एक दिनपर्यन्त तीक्ष्ण अग्नि देवे । दूसरे दिन स्वांगशीतल होजानेपर । अन्य सब वस्तुओंको त्यागकर केवल ताम्र-पात्रको निकालकर खरल करलेवे । इस रसको एक एक रत्तीकी मात्रासे पानमें रखकर या पानके रस और मिरचोंके चूर्णमें मिलाकर सेवन करावे और शालि-चावलोंके भात तथा दूधका पथ्य देवे । यह रस सब प्रकारके विषमज्वर, दाह और शीत आदिको नष्ट करता है ॥ ४७०-७३ ॥

स्वच्छन्दभैरव रस ।

समभागांश्च संगृह्य पारदामृतगन्धकान् । जातीफलस्य भागार्द्धं दत्त्वा कुर्याच्च कज्जलीम् ॥ ७४ ॥ सर्वार्द्धं पिप्पलीचूर्णं खल्लयित्वा निधापयेत् । गुञ्जैकं वा द्विगुञ्जं वा नागवल्लीदलैः सह ॥ ७५ ॥ आर्द्रकस्य रसेनापि द्रोणपुष्पीरसेन च । शीतज्वरे सन्निपाते विषूच्यां विषमज्वरे ॥ ७६ ॥ पीनसे च प्रतिश्याये ज्वरेऽजीर्णे तथैव च । मन्देऽग्नौ वमने चैव शिरोरोगे च दारुणे ॥ ७७ ॥ प्रयोज्यो भिषजा सम्यक् रसः स्वच्छन्दभैरवः । पथ्यं दध्योदनं दद्याद्वीक्ष्य दोषबलाबलम् ॥ ७८ ॥

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १६७

पारा, वत्सनाभ और गन्धक ये प्रत्येक एक एक तोला और जायफल ६ माशे लेकर प्रथम पारे, गन्धककी कज्जली करलेवे, फिर सब ओषधियोंसे आधाभाग पीपलका चूर्ण मिलाकर सबको पानीके साथ एकत्र खरल करके एक या दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । वैद्योंको यह रस शीतज्वर, सन्निपातज्वर, विषूचिका, विषमज्वर, पीनस, प्रतिश्याय, जीर्णज्वर, मन्दाग्नि, वमन और दारुण शिरोरोग आदिमें पानके रस या अदरखके रस अथवा द्रोणपुष्पीके पत्तोंके रसके साथ सेवन कराना चाहिये । इसपर दोषोंके बलाबलाको विचारकर दहीभात आदिका पथ्य देना चाहिये ॥ ७४-७८॥

ज्वरारिरस ।

दरदबलिरसानां शुल्बनागाभ्रकाणां
सुभगविटशिलानां सर्वमेकत्र योज्यम् ।
विपिननृपद्लोत्थैर्भावयेच्छोषयेत्तं
दशदिवससमाप्तौ रक्तिकैकां च कुर्यात् ॥ ७९ ॥

सिंगरफ, गन्धक, पारा, ताम्रभस्म, सीसेकी भस्म, अभ्रकभस्म, सुहागा, विरिया-संचर नमक और मैनसिल इन सबको समान भाग लेकर एकत्र खरल करके अमलतासके पत्तोंके रसमें दस दिनतक भावना देकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे और धूपमें सुखालेवे ॥ ७९ ॥

एकैकां भक्षयेदस्य चार्द्रकस्य रसैर्युताम् ।
दत्तमात्रो ज्वरं हन्ति ज्वरारिः स निगद्यते ॥
सर्वशूलविनाशी च कफपित्तविनाशनः ॥ ४८० ॥

इस रसकी एकएक गोली अदरखके रसमें मिलाकर सेवन करावे । यह रस देतेही ज्वरको नष्ट करता है, इसलिये इसको ज्वरारि कहते हैं। यह सब प्रकारक शूल और कफ पित्तके रोगोंको शमन करता है ॥ ४८० ॥

ज्वराशनिरस ।

रसं गन्धं सैन्धवं च विषं ताम्रं समं भवेत् ।
सर्वचूर्णसमं लौहं तत्समं चूर्णमभ्रकम् ॥ ८१ ॥
लौहे च लौहदण्डेन निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च ।
मर्दयेद्यत्नतः पश्चान्मरिचं सूततुल्यकम् ॥
पर्णेन सह दातव्यो रसो रक्तिकसम्मितः ॥ ८२ ॥

१६८ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस-

कासं श्वासं महाघोरं विषमाख्यं ज्वरं वमिम् । धातुस्थं प्रबलं दाहं ज्वरदोषं चिरोद्भवम् ॥ यकृद्गुल्मोदरप्लीहश्वयथुं च विनाशयेत् ॥ ८३ ॥

पारा, गन्धक, सैंधानमक, मीठातेलिया और ताम्रभस्म ये सब समभाग और सबके बराबर लोहभस्म और लोहेके बराबर अभ्रकभस्म लेवे। पश्चात् समस्त ओषधियोंको लोहेके खरलमें डालकर लोहेकी मुसलीसे निर्गुण्डीके रसके साथ अच्छेप्रकारसे खरल करे। फिर उसमें पारेके बराबर मिरचोंका चूर्ण मिलाकर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। उनमेंसे एकएक गोली पानमें रखकर देनी चाहिये। यह रस खाँसी, श्वास, घोर विषमज्वर, वमन, धातुगतज्वर, प्रबलदाह और ज्वरदोषके कारण चिरकालसे उत्पन्नहुए यकृतविकार, गुल्मरोग, उदररोग, प्लीहा, शोथ आदि रोगोंको नष्ट करता है ॥ ८१-८३ ॥

ज्वरान्तकरस ।

भास्करो गन्धकः सर्वो देवी विहगतीक्ष्णकम् । शोणितं गगनं चैव पुष्पकं च महेश्वरम् ॥ ८४ ॥ भूनिम्बादिगणैर्भाव्यं मधुना गुटिका दृढा । चातुर्थिकं तृतीयं च ज्वरं सन्ततकं तथा । आमज्वरं भूतकृतं सर्वज्वरमपोहति ॥ ८५ ॥

ताम्रभस्म, गन्धक, पारा, गोपीचन्दन, सोनामाखी, लोहा, सिंगरफ, अभ्रक, रसौंत और सुवर्ण इन सबको समानभाग लेकर एकत्र खरल करके भूनिम्बादिगणकी १८ ओषधियोंको (समानभाग लेकर उनके अष्टावशेष क्वाथमें उक्त औषधिको तीनदिनतक खरलकर सुखायके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर एक एक गोली) मधुके साथ सेवन करे। यह रस चौथिया, तिजारीज्वर, सन्ततज्वर, आमयुक्तज्वर और भूतबाधाजनितज्वर आदि सम्पूर्ण ज्वरोंको शीघ्र दूर करता है ॥ ८४ ॥ ८५ ॥

वातपित्तान्तकरस ।

मृतसूताभ्रमुस्तार्कतीक्ष्णमाक्षिकतालकम् । गन्धकं मर्दयेत्तुल्यं यष्टिद्राक्षामृतारसैः ॥ ८६ ॥


* भूनिम्बाद्यष्टादशद्रव्याणि सर्वद्रव्यतुल्यानि, अष्टांशावशिष्टं क्वाथं कृत्वा तेन दिनत्रयं विभाव्य विशोष्य मधुना विमर्द्य अनुरूपं विदधेत् ।

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १६९


धात्रीशतावरीद्रावैर्द्रवैः क्षीरविदारिजैः ।
दिनंदिनं विभाव्याथ सिताक्षौद्रयुता वटी ॥ ८७ ॥
माषमात्रा निहन्त्याशु वातपित्तज्वरं क्षयम् ।
दाहं तृष्णां भ्रमं शोषं वातपित्तान्तको रसः ।
सिताक्षीरं पिबेच्चानु यष्टिक्वाथसितायुतम् ॥ ८८ ॥

पारेकी भस्म, अभ्रकभस्म, नागरमोथा, ताँवा, लोहा, सोनामाखी, हरताल इनकी भस्म और गन्धक सबको समान भाग लेकर मुलहठी, दाख, गिलोय, आमले, शतावर और विदारीकन्द इन ओषधियोंके रस या क्वाथमें एकएक दिनतक क्रमसे भावना देकर एकएक माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इसकी एक एक गोली मिश्री और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे वातपित्तजनितज्वर, क्षय, दाह, तृषा, भ्रम और शोष आदि विकार शमन होते हैं । इसके सेवन करनेपर मिश्री मिलाहुआ दूध अथवा मुलहठीका क्वाथ मिश्री मिलाकर पान करना चाहिये ॥ ८६-८८ ॥

श्रीजयमङ्गलरस ।

हिंगूलसम्भवं सूतं गन्धकं टङ्कणं तथा ।
ताम्रं वङ्गं माक्षिकं च सैन्धवं मरिचं तथा ॥ ८९ ॥
समं सर्वं समाहृत्य द्विगुणं स्वर्णभस्मकम् ।
तदर्द्धं कान्तलौहं च रौप्यभस्मापि तत्समम् ॥ ४९० ॥
एतत्सर्वं विचूर्ण्याथ भावयेत्कनकद्रवैः ।
शेफालीदलजैश्चापि दशमूलरसेन च ॥ ९१ ॥
किराततिक्तकक्वाथैस्त्रिवारं भावयेत्सुधीः ।
भावयित्वा ततः कार्या गुञ्जाद्वयमिता वटी ॥
अनुपानं प्रयोक्तव्यं जीरकं मधुसंयुक्तम् ॥ ९२ ॥

सिंगरफसे निकालाहुआ पारा, गन्धक, सुहागा, ताम्रभस्म, वङ्गभस्म, सोना-माखीकी भस्म, सैंधानमक और मिरच ये प्रत्येक एक एक तोला, स्वर्णभस्म दो तोले, कान्तलोहभस्म १ तोला और रौप्यभस्म भी एक तोला लेवे । सबको एकत्र खरल करके धतूरेके पत्तोंके रस, हारसिंगारके पत्तोंके रस, दशमूलके क्वाथ और चिरायतेके क्वाथमें क्रमसे तीन तीन भावना देवे । फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । ये गोलियाँ जीरेके चूर्ण और मधुके अनुपानके साथ प्रयोग करनी चाहिये ॥ ८९-४९२ ॥

१७० भैषज्यरत्नावली । [ रस-

जीर्णज्वरं महाघोरं चिरकालसमुद्भवम् । ज्वरमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ॥ ९३ ॥ पृथग्दोषांश्च विविधान् समस्तान् विषमज्वरान् । मेदोगतं मांसगतमस्थिमज्जागतं तथा ॥ ९४ ॥ अन्तर्गतं महाघोरं बहिस्थं च विशेषतः । नानादोषोद्भवं चैव ज्वरं शुक्रगतं तथा ॥ ९५ ॥ निखिलं ज्वरनामानं हन्ति श्रीशिवशासनात् । जयमङ्गलनामाऽयं रसः श्रीशिवनिर्मितः॥ बलपुष्टिकरश्चैव सर्वरोगनिबर्हणः ॥ ९६ ॥

यह रस चिरकालजनित और अत्यन्त घोर जीर्णज्वर, तथा साध्य व असाध्य आठों प्रकारके ज्वर अथवा भिन्नभिन्न दोषोंसे होनेवाले सब प्रकारके विषमज्वर, एवं मेदोगत, मांसगत, अस्थिगत-मज्जागतज्वर, अत्यन्त उग्र आन्तरिकज्वर, विशेषकर बाह्यज्वर, तथा विविधप्रकारके दोषोंसे होनेवाले शुक्रगत ज्वर आदि सब प्रकारके ज्वरोंको श्रीशंकर भगवान्‌की कृपासे शीघ्र नष्ट करता है । यह जयमङ्गल नामक रस अत्यन्त बल और पुष्टिकारक तथा संपूर्ण रोगोंको नष्ट करनेवाला है; इसको श्रीशिवजीमहाराजने निर्माण किया है ॥ ९३-९६ ॥

ज्वरकुञ्जरपारिन्द्ररस ।

मूर्च्छितं रसकर्षैकं तदर्द्धं जारिताभ्रकम् । तारं ताप्यं च रसजं रसकं ताम्रकं तथा ॥ ९७ ॥ मौक्तिकं विद्रुमं लौहं गिरिजं गैरिकं शिला । गन्धकं हेमसारं च पलार्द्धं च पृथक् पृथक् ॥ ९८ ॥ क्षीरावी सुरवल्ली च शोथघ्नी गणकारिका । झाटचामला ज्योत्स्निका च सतिक्ता तु सुदर्शना ९९ ॥ अग्निजिह्वा पूतितैला शूर्पपर्णी प्रसारिणी । प्रत्येकं स्वरसं दत्त्वा मर्दयेत्त्रिदिनावधि ॥ १०० ॥ भक्षयेत्पर्णखण्डेन चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः ॥ १ ॥

मूर्च्छित पारा १ तोला, अभ्रकभस्म आधा तोला तथा चाँदी, सोनामाखी, रसौत, खपरिया, ताँबा, मोती, मूँगा, लोहा, शिलाजीत, गेरू, मैनसिल, गन्धक और सुवर्णपत्र ये प्रत्येक दो दो तोले लेकर सबको एकत्र खरल करके

प्रकरणम्] भाषाटीकासहिता । ५७१


दुद्धीघास, तुलसी, पुनर्नवा, अरणी, भुईंआमला, तोरई, चिरायता, कन्दगिलोय, कलिहारी, मालकाँगनी, मुगवन और गन्धप्रसारणी इन प्रत्येकके स्वरस अथवा क्वाथमें क्रमसे तीन तीन दिनतक घोटकर चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । एकएक गोली पानके साथ सेवन करे ॥ ९७–५०१ ॥

महाग्निकारको रोगसंकरघ्नः प्रयोगराट् ।
सन्ततं सततमन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् ॥ २ ॥
ज्वरान्सर्वान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ।
श्वासं कासं प्रमेहं च सशोथं पाण्डुकामलाम् ॥ ३ ॥
ग्रहणीं क्षयरोगं च सर्वोपद्रवसंयुक्तम् ।
ज्वरकुञ्जरपारीन्द्रः प्रथितः पृथिवीतले ॥ ४ ॥

यह प्रयोगराज अग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाला और रोगसमूहको नष्ट करनेवाला है । इसके सेवनसे सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक, चातुर्थिक ( चौथिया ) आदि सब प्रकारके ज्वर तथा श्वास, खाँसी, प्रमेह, शोथ, पाण्डु, कामला, संग्रहणी और समस्त उपद्रवौंसहित क्षय आदि सम्पूर्ण रोगोंके समूह इस प्रकार शीघ्र नष्ट होजाते हैं, जैसे सूर्यसे अन्धकार । यह रस पृथ्वीपर अत्यन्त प्रसिद्ध है ॥ ५०२–५०४ ॥

विद्यावल्लभरस ।

रसम्लेच्छशिलातालाश्चन्द्रद्व्यग्न्यर्कभागिकाः ।
पिष्ट्वा तान् सुषवीतोयैस्ताम्रपात्रोदरे क्षिपेत् ॥ ५ ॥
न्यस्तं शरावे संरुध्य बालुकायन्त्रगं पचेत् ।
स्फुटन्ति व्रीहयो यावत्तच्छिरःस्थाः शनैः शनैः ॥ ६ ॥
संचूर्ण्य शर्करायुक्तं द्विवल्लं भक्षयेत्ततः ।
विषमाख्यान् ज्वरान् हन्ति तैलाम्लादि विवर्जयेत् ॥ ७ ॥

पारा १ भाग, ताम्रभस्म २ भाग, मैनासिल ३ भाग और हरताल १२ भाग लेकर सबको करेलेके पत्तोंके रसमें खरल करे, फिर उसको ताँबेके पात्रके भीतर लेप करके और उसको शरावसम्पुटमें बन्दकरके बालुकायन्त्रमें रखकर पकावे और उसके ऊपर धानोंके कुछ दाने रखदेवे । जब उसपर रखेहुए धान धीरे धीरे फूटने लगें तब उसको सिद्धहुआ जानकर अग्निपरसे उतारलेवे । स्वांगशीतल होनेपर ओषधिको निकालकर बारीक चूर्ण कर लेवे । यह रस दो दो रत्ती परिमाण लेकर

१७२ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

मिश्री या खाँडमें मिलाकर सेवन करे। और इसपर तेल, खटाई आदि पदार्थोंको त्याग करादे । यह रस विषमज्वर आदि सब प्रकारके ज्वरोंको दूर करता है ॥ ५०६-५०७ ॥

शीतारिरस ।

कूष्माण्डक्षारचूर्णोदकतिलजपृथक् पाचितं शुद्धतालं
तुल्यं सूतेन पिष्ट्वा त्रिदिवसमसकृत् कारवेल्लद्रवेण ।
क्षित्त्वा तत्खर्परान्तर्द्दिनपतिपिहितं रन्ध्रमप्यन्धयेत्तं
नीरन्ध्रं चूर्णपथ्यागुडलवणखटीमृद्भिरप्यन्तरालम् ॥ ८ ॥

तद्वालुकापूर्णघटे विदध्याच्छनैः पचेत्तावदुपर्य्यमुष्य ।
व्रीहिर्विवर्णत्वमुपैति यावत् ततस्तु शीतं विदधीत चूर्णम् ॥ ९॥

सिद्धं तच्च समाददीत तुलसीतोयेन वल्लोन्मितं
पश्चात् क्षौद्रकणासिताज्यपयसा कृत्वाऽनुपानं गदी ।
भुञ्जीताथ पयोऽन्नमुद्गरसहितं साज्यं च हन्यान्नृणां
तापं कालवशेन संचितगदं शीतारिनामा रसः ॥ ५१० ॥

पेठेका खार, चुनेका पानी और तिलोंका खार इन तीनों चीजोंके साथ पृथक् पृथक् हरतालको पकाकर शुद्ध करे । फिर हरतालके बराबर भाग पारेको उसमें मिलाकर करेलेके रसमें तीन दिनतक खरल करके एक सकोरेमें रक्खे । उस सकोरेके ऊपर ताँबेका कटोरा ढककर उसके सन्धिसथानोंको हरडके चूर्ण, गुड, नमक, खडिया-मिट्टी और चिकनी मिट्टी इन सब चीजोंके कल्कद्वारा बन्दकर देवे और उसके ऊपर कुछ धानोंके दाने रखदेवे । फिर उस सम्पुटको वालुकायन्त्रमें रखकर शनैः शनैः अग्नि देवे । जब धान खिलने लगे तब उत्तम प्रकारसे पाक हुआ जानकर स्वांगशीतल होनेपर ओषधिको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस रसको दो दो रत्तीकी मात्रासे तुलसीपत्रके रस, मधु, पीपलका चूर्ण, मिश्री, घृत और दूध इन अनुपानोंके साथ सेवन करावे । इसपर दूध, भात, मूँगका यूष और घृत आदि पदार्थोंका भोजन हितकर है । यह शीतारिरस चिरकालसे संचित ज्वरको अत्यन्त शीघ्र नष्ट करता है ॥ ८-५१० ॥

ज्वरशूलहररस ।

रसगन्धकयोः कृत्वा कज्जलीं भाण्डमध्यगाम् ।
तत्राधोवदनां ताम्रपात्रीं संरुध्य शोषयेत् ॥ ११ ॥

पादाङ्गुष्ठप्रमाणेन चुल्ल्यां ज्वालेन तां दहेत् ।

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १७३


पादाङ्गुष्ठप्रमाणेन चुल्ल्यां ज्वालेन तां दहेत् ।
यामद्वयं ततस्तत्स्थं रसपात्रं समाहरेत् ॥ १२ ॥
चूर्णयेद्रक्तियुगलं त्रितयं वा विचक्षणः ।
ताम्बूलीदलयोगेन दद्यात्सर्वज्वरेष्वमुम् ॥ १३ ॥
जीरसैन्धवसंल्लितवक्त्राय ज्वरिणे हितम् ।
स्वेदोद्गमो भवत्येव देवि सर्वेषु पाप्मसु ॥ १४ ॥
चातुर्थिकादीन्विषमान् नवमागामिनं ज्वरम् ।
साधारणं सन्निपातं जयत्येव न संशयः ॥ १५ ॥

पारे और गन्धकको समान भाग लेकर उनकी कजली करके उसको एक मिट्टीके बरतनमें रखे और उसके ऊपर एक ताँबेका कटोरा ढककर कपरोटी करके सुखालेवे । फिर उसको चूल्हेपर चढाकर पैरके अँगूठेके समान पतली २ लकडियोंकी अग्निसे दो प्रहरतक पकावे । पश्चात् स्वांगशीतल होनेपर औषधिको निकाल कर बारीक चूर्ण करके रखलेवे । प्रथम रोगीको जीरा और सैन्धानमक चबाकर फिर इस रसको दो या तीन रत्ती परिमाण पानमें रखकर सेवन करावे इससे पसीना आकर ज्वर शीघ्र दूर हो जाता है । यह चातुर्थिक आदि समस्त विषमज्वर, नवीनज्वर और साधारण सन्निपात ज्वरको निस्सन्देह नष्ट करता है ॥ ११-१५ ॥

षडाननरस ।

आरं कांस्यं मृतं ताम्रं दरदं पिप्पलीविषम् ।
तुल्यांशं मर्दयेत्खल्ले यामं च गुडुचीरसैः ॥ १६ ॥
गुञ्जामात्रं रसं देयं गुञ्जामात्रां लिहेत्सदा ।
ज्वरे मन्दानले चैव वातपित्तज्वरेषु च ॥ १७ ॥
ज्वरे वैषम्यतरुणे ज्वरे जीर्णे विशेषतः ।
मुद्गान्नं मुद्गयूषं वा तक्रभक्तं च केवलम् ॥ १८ ॥
नारिके लोदकं देयं मुद्गपथ्यं विशेषतः ।
षडाननो रसो नाम सर्वज्वरकुलान्तकृत् ॥ १९ ॥

पीपल, काँसा, ताँबा इनकी भस्म, शुद्ध सिंगरफ, पीपल और शुद्ध मीठा तेलिया इन सबको समान भाग लेकर गिलोयके स्वरसमें एक प्रहरतक खरल करे

१७४भैषज्यरत्नावली ।[ रस-

फिर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । उनमेंसे एकएक गोली गिलोयके रस और मधुमें मिलाकर सेवन करे । यह रस-ज्वर, मन्दाग्नि, वातपित्तज्वर, विषमज्वर, तरुणज्वर और जीर्णज्वरमें विशेष हितकारी है । इसपर मूँगभात अथवा मूँगका यूष या केवल छाछ (मट्ठा) और भातका भोजन करे । विशेष कर इसपर मूँगका यूष और नारियलके जलका पथ्य देना अधिक हितकारी है । यह षडानन रस सब प्रकारके ज्वरोंको, समस्त उपद्रवोंसहित दूर करता है ॥ १६–१९ ॥

कल्पतरुरस ।

रसं गन्धं विषं ताम्रं समभागं विचूर्णयेत् ।
भावयेत्पंचभिः पित्तैः क्रमशः पंचवासरम् ॥ ५२० ॥
निर्गुण्डीस्वरसेनैव मर्दयेत्सप्तवासरम् ।
आर्द्रकस्य रसेनैव भावयेच्च त्रिधा पुनः ॥ २१ ॥
सर्षपाभा वटी कार्या च्छायया परिशोषिता ।
ततः सप्तवटी योज्या यावन्न त्रिगुणा भवेत् ॥ २२ ॥
वयोऽग्निदोषकं बुद्ध्वा प्रयोज्या भिषजां वरैः ।
अनुपानं चोष्णजलं कज्जलीपिप्पलीयुतम् ॥ २३ ॥

पारा, गन्धक, वत्सनाभ और ताम्रभस्म इनको समान भाग लेकर एकत्र खरल करके पूर्वोक्त पाँचों पित्तोंमें क्रमसे एक-एक दिनतक भावना देवे । फिर निर्गुण्डीके पत्तोंके रसमें सात दिन और अदरखक रसमें ३ दिन खरल करके सरसोंकी बराबर गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे वैद्यको रोगीकी अवस्था, जठराग्नि और दोषोंके बलाबलको विचारकर प्रतिदिन एक-एक गोली क्रमसे बढाकर २१ दिनतक २१ गोलियाँ सेवन करानी चाहिये । इसपर कज्जली पीपलका चूर्ण और मन्दोष्ण जलका अनुपान करना चाहिये ॥ ५२०–२३ ॥

पानावशेषे प्रस्वाप्य वस्त्रैराच्छादयेन्नरम् ।
घर्माभ्यागमनं यावत्ततो रोगात्प्रमुच्यते ॥ २४ ॥
रोगिणं स्नापयित्वा तु भोजयेत्ससितं दधि ।
एष कल्पतरुर्नाम रसः परमदुर्लभः ॥ २५ ॥
असाध्यं चिरकालोत्थं जीर्णं च विषमज्वरम् ।
हन्ति ज्वरातिसारौ च ग्रहणीं पाण्डुकामलाम् ॥ २६ ॥

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १७६


न देयः श्वासकासे च शूलयुक्तनरे तथा ।
गोपनीयः प्रयत्नेन न देयो यस्य कस्यचित् ॥ २७ ॥

इस औषधिको सेवन कराकर रोगीको आरामसे सुलाकर उसके: देहको गरम कपडेसे अच्छीतरह ढक देवे । इससे पसीना आतेही रोगी रोगमुक्त होजाता है । जागनेके पश्चात् रोगीको स्नान कराकर मिश्री मिलाहुआ दही भोजन करावे । यह कल्पतरु रस अत्यन्त दुर्लभ है । इसके सेवनसे असाध्य और चिरकालसे उत्पन्नहुआ जीर्णज्वर, विषमज्वर, ज्वरातिसार, संग्रहणी, पाण्डु और कामलारोग नष्ट होते हैं । इस रसको श्वास, कास और शूलरोगमें कदापि नहीं देना चाहिये ।; यह अत्यन्त गोपनीय है, इसलिये जिस तिसको नहीं देना चाहिय ॥ २४-२७ ॥

तालाङ्करस ।

तालकस्य च भागौ द्वौ भागं तुत्थस्य शुक्तिका ।
चूर्णकानां चतुर्भागं मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ २८ ॥
यामैकेन ततः पश्चाद्रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ।
अस्य गुञ्जाद्वयं हन्ति वातिकं पैत्तिकं तथा ।
शीतज्वरं विशेषेण तृतीयकचतुर्थकौ ॥ २९ ॥

हरताल २ भाग, तूतिया १ भाग और सीपीकी भस्म ४ भाग लेकर सबको घीग्वारके रसमें एक प्रहरतक खरल करके गोलासा बनाकर उसको शरावसम्पुटमें बन्द करके गजपुटमें पकावे । इस रसको दो दो रत्ती परिमाण सेवन करनेसे वातज, पित्तजज्वर, शीतज्वर और विशेषकर तृतीयक (तिजारी), चातुर्थिक (चौथिया) ज्वर दूर होता है ॥ २८-२९ ॥

पर्पटीरस ।

शुद्धसूतं द्विधा गन्धं मर्द्यं भृङ्गरसेन च ।
मृत ताम्रं लौहभस्म पादांशेन तयोः क्षिपेत् ॥ ५३० ॥
लौहपात्रे च विपचेच्चालयेल्लौहचाटुना ।
तत्क्षिपेत्कदलीपत्रे गोमयोपरि संस्थिते ॥ ३१ ॥
पश्चाच्च चूर्णयेत्खल्ले निर्गुण्ड्या भावयेद्दिनम् ।
जयन्तीत्रिफलाकन्यावासाभाङ्गींकटुत्रिकैः ॥ ३२ ॥

१७६भैषज्यरत्नावली ।[ रस-

भृङ्गाग्निमूलमुण्डीभिर्भावयेद्दिनसप्तकम् ।
अङ्गारैः स्वेदयेत्किञ्चित् पर्पटाख्यो महारसः ॥ ३३ ॥
चतुर्गुञ्जामितो भक्ष्यः सम्यक् श्लेष्मज्वरं जयेत् ।
पथ्याशुण्ठ्यमृताक्वाथमनुपानं प्रयोजयेत् ॥ ३४ ॥

शोधित पारा १ भाग और शुद्ध गन्धक २ भाग लेकर दोनोंकी एकत्र कज्जली करके भाँगरेके रसमें खरल करे । फिर उसमें ताम्रभस्म और लोहभस्म कज्जलीसे चौथाई भाग मिलाकर लोहेके पात्रमें पकावे और लोहेकी करछीसे चलाताजावे । जब वह पिघलकर पतली होजाय तब गोबरके ऊपर एक केलेका पत्ता रखकर उसके ऊपर कज्जलीको ढाल देवे । जब वह पपड़ीकी समान जमजाय तब उसको खरलमें डालकर निर्गुण्डीके रसमें एक दिनतक भावना देवे । पश्चात् अरणी, त्रिफला, घीग्वार, अडूसा, भारंगी, त्रिकुटा, भाँगरा, चीतेकी जड और मुण्डी इन प्रत्येकके रस अथवा क्वाथमें सातदिनतक भावना देवे । फिर अँगारोंकी अग्निसे कुछ सेककर शीशीमें भरकर रखलेवे । इसको चार चार रत्ती परिमाण सेवन करना चाहिये और ऊपरसे हरड, साँठ, गिलोय इनके क्वाथका अनुपान करना चाहिये । यह पर्पटीरस श्लैष्मिकज्वरको नष्ट करनेके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ५३०-३४ ॥

त्रैलोक्यचिन्तामणिरस ।

भागत्रयं स्वर्णभस्म द्विभागं तारमभ्रकम् ।
लौहात्पंच प्रवालं च मौक्तिकं त्रयसम्मितम् ॥ ३५ ॥
भस्मसूतं सप्तकं च सर्वं मर्द्यं तु कन्यया ।
छायाशुष्का वटी कार्या च्छागीदुग्धानुपानतः ॥ ३६ ॥
क्षयं हन्ति तथा कासं गुल्मं चापि प्रमेहनुत् ।
जीर्णज्वरहरश्चायमुन्मादस्य निकृन्तनः ॥
सर्वरोगहरश्चापि वारिदोषनिवारणः ॥ ३७ ॥

सुवर्णभस्म ३ तोले, चाँदीकी भस्म २ तोले, अभ्रकभस्म २ तोले, लोहभस्म ५ तोले, प्रवालभस्म ३ तोले, मोतीका भस्म ३ तोले और रससिंदूर ७ तोले लेकर सबको एकत्र खरल करले फिर घीग्वारके रसमें एकदिनतक घोटकर छायामें सुखा करके एकएक रत्तीकी गालियाँ बनालेवे । फिर एकएक वटी नित्य बकरीके दूधके साथ सेवन करे । यह रस क्षयरोग, खाँसी, वातगुल्म, प्रमेह, जीर्णज्वर, उन्मादरोग

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १७७

और जलदोषजनितरोग आदि सम्पूर्ण व्याधियोंको दूर करताहै ॥ ३५-३७ ॥

महाराजवटी ।

रसगन्धकमभ्रं च प्रत्येकं कर्षसम्मितम् । वृद्धदारकवङ्गं च लौहं कर्षार्द्धकं क्षिपेत् ॥ ३८ ॥ स्वर्णं ताम्रं च कर्पूरं प्रत्येकं कर्षपादिकम् । शक्राशनं वरी चैव श्वेतसर्ज्वलवङ्गकम् ॥ ३९ ॥ कोकिलाक्षं विदारी च मुसली शूकशिम्बिकम् । जातीफलं तथा कोषं बला नागबला तथा ॥ ४० ॥ माषद्वयमितं भागं तालमूल्या रसेन च । पिष्ट्वा च वटिका कार्य्या चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः ॥ ४१ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और अभ्रक ये प्रत्येक एकएक कर्ष एवं शोधित विधारेके बीज, वङ्ग और लोहभस्म ये प्रत्येक आधा २ कर्ष, सोना, ताँबा और कपूर चौथाई कर्ष, भाँग, शतावर, सफेदराल, लौंग, तालमखाना, विदारीकन्द, मुसली, कौंचके बीज, जायफल, जावित्री, खिरेंटी और गंगेरन इन औषधियोंको दो दो माशे परिमाण लेवे । सबको एकत्र मुसलीके क्वाथके साथ खरल करके चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ३८-४१ ॥

मधुना भक्षयेत्प्रातर्विषमज्वरशान्तये । धातुस्थाँश्च ज्वरान्सर्वान् हन्यादेव न संशयः ॥ ४२ ॥ वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् । ज्वरं नानाविधं हन्ति कासं श्वासं क्षयं तथा ॥ ४३ ॥ बलपुष्टिकरं नित्यं कामिनीं रमयेत्सदा । न च शुक्रक्षयं याति न बलं ह्रासतां व्रजेत् ॥ ४४ ॥ ऊर्ध्वगं श्लेष्मजं हन्ति सन्निपातं सुदारुणम् । कामलां पाण्डुरोगं च प्रमेहं रक्तपित्तकम् ॥ महाराजवटी ख्याता राजयोग्या च सर्वदा ॥ ४५ ॥

इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एकएक गोली शहदके साथ सेवन करनेसे शान्त होता है । ये गोलियाँ धातुगतज्वर सब प्रकारके वातज, पित्तज, श्लैष्मिक

१२

१७८ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

सान्निपातिक ज्वर एवं अन्यान्य अनेक प्रकारके ज्वर खाँसी, श्वास और क्षय प्रभृति रोगोंको शीघ्र नष्ट करती हैं, बल तथा पुष्टि उत्पन्न करती हैं। इनको सेवन करने-वाला मनुष्य यदि प्रतिदिन सुन्दरस्त्रियोंके साथ रमण करे तो भी वीर्य क्षय नहीं होता और न बल नष्ट होता है। इससे ऊर्ध्वगत कफके विकार, दारुण सन्निपात, कामला, पाण्डु, प्रमेह, रक्तपित्तादिःदुस्तर व्याधियाँ दूर होती हैं। इसको महाराजवटी कहते हैं। ये गोलियाँ राजाओंके सदैव सेवन करने योग्य हैं ॥ ४२-४५ -

सर्वतोभद्ररस।

विशुद्धं गगनं ग्राह्यं द्विकर्षं शुद्धगन्धकम् ।
तोलकं तोलकार्द्धं च हिङ्गुलोत्थरसं तथा ॥ ४६ ॥
कर्पूरं केशरं मांसी तेजपत्रं लवङ्गकम् ।
जातीकोषफलं चैव सूक्ष्मैला करिपिप्पली ॥ ४७ ॥
कुष्ठं तालीशपत्रं च धातकी चोचमुस्तकम् ।
हरीतकी च मरिचं शृङ्गवेरविभीतकम् ॥ ४८ ॥
पिप्पल्यामलकं चैव शाणभागं विचूर्णितम् ।
सर्वमेकीकृतं पिष्ट्वा वटीं कुर्याद् द्विगुञ्जिकाम् ॥ ४९ ॥

शुद्ध अभ्रक २ कर्ष, शुद्ध गन्धक १ तोला, सिंगरफसे निकाला हुआ पारा ६ मासे, एवं कपूर, केशर, जटामांसी, तेजपात, लौंग, जावित्री, जायफल, छोटी इलायची, गजपीपल, कूठ, तालीशपत्र, धायके फूल, दारचीनी, नागरमोथा, हरड, मिरच, सोंठ, बहेडा, पीपल और आमले ये प्रत्येक चार चार माशे लेवे। सबको जलके साथ एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ४३-४९ ॥

भक्षयेत्पर्णखण्डेन मधुना सितयाऽपि वा ।
रोगं ज्ञात्वाऽनुपानं च प्रातः कुर्याद्विचक्षणः ॥ ५० ॥
हन्ति मन्दानलान्सर्वानामदोषं विषूचिकाम् ।
पित्तश्लेष्मभवं रोगं वातश्लेष्मभवं तथा ॥ ५१ ॥
आनाहं मूत्रकृच्छ्रं च संग्रहग्रहणीं वमिम् ।
अम्लपित्तं शीतपित्तं रक्तपित्तं विशेषतः ॥ ५२ ॥

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १७९


चिरज्वरं पित्तभवं धातुस्थं विषमज्वरम् ।
कासं पञ्चविधं हन्ति कामलां पाण्डुमेव च ॥ ५३ ॥
सर्वलोकहितार्थाय शिवेन कथितः पुरा ।
सर्वतोभद्रनामाऽयं रसः साक्षान्महेश्वरः ॥ ५४ ॥

वैद्य इसकी एकएक गोली प्रतिदिन प्रातःकाल पानके रस, शहद अथवा मिश्रीके साथ सेवन करावे और रोगके अनुसार अनुपान देवे। यह रस मन्दाग्नि, सर्वप्रकारके आमदोष, विषूचिका, पित्त-कफजन्य तथा वात-कफजनित रोग, अफारा, मूत्रकृच्छ्र, संग्रहणी, वमन, अम्लपित्त, शीतपित्त, विशेषकर रक्तपित्त, जीर्णज्वर, पित्तज्वर, धातुस्थ विषमज्वर, पाँचोंप्रकारकी खाँसी, कामला और पाण्डुरोग इन समस्त व्याधियोंको नष्ट करता है। पूर्वकालमें संसारके कल्याणके लिये इस सर्वतोभद्रनामक रसको शिवजीने कहा है। यह साक्षात् महेश्वर है ॥ ५०-५४ ॥

ज्वरारि-अभ्रक ।

अभ्रं ताम्रं रसं गन्धं विषं चेति समं समम् ।
द्विगुणं धूर्त्तबीजं च व्योषं पञ्चगुणं मतम् ॥ ५५ ॥
जलेन वटिकां कुर्याद्यथादोषानुपानतः ।
अभ्रं ज्वरारिनामेदं सर्वज्वरविनाशनम् ॥ ५६ ॥
वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ।
विषमाख्यान्द्वन्द्वजांश्च धातुस्थान्विषमज्वरान् ॥ ५७ ॥
प्लीहानं यकृतं गुल्ममग्रमांसं सशोथकम् ।
हिक्कां श्वासं च कासं च मन्दानलमरोचकम् ॥
नाशयेन्नात्र सन्देहो वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ५८ ॥

अभ्रक, ताँबा, पारा, गन्धक और शुद्धवत्सनाभ ये प्रत्येक एक एक भाग धतूरेके बीज २ भाग और त्रिकुटा ५ भाग इन सब ओषधियोंको एकत्र जलके साथ उत्तमप्रकारसे खरलकरके एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। नित्यप्रति एकएक गोली यथादोषानुसार अनुपानके साथ सेवन करे। यह ज्वरारि अभ्रक सम्पूर्ण ज्वरोंको दूर करता है। जैसे—वातज, पित्तज, श्लेष्मज, सान्निपातिक, विषम, द्वन्द्वज और धातुगत विषमज्वर एवं तिल्ली और जिगरके विकार, गुल्म, अग्रमांस, शोथ

१८० भैषज्यरत्नावली । [ रस-


हिचकी, श्वास, खाँसी, मन्दाग्नि, अरुचि आदि रोगोंको इस प्रकार शीघ्र नष्ट करता है जैसे-वज्र वृक्षोंको ॥ ५५-५८ ॥

जीवनानन्दाभ्र ।

वज्राभ्रं मारितं कृत्वा कर्षयुग्मं विचूर्णितम् ।
जीरं कनकबीजं च कर्षं वासारसेन च ॥ ५९ ॥
कण्टकारीरसेनैव धात्रीमुस्तरसेन च ।
गुडूच्याः स्वरसेनैव पलाशेन पृथक् पृथक् ॥ ६० ॥
मर्दयित्वा वटी कार्या गुञ्जामात्रा प्रयोजिता ।
विषमाख्याञ्जवरान्सर्वान्प्लीहानं यकृतं वमिम् ॥ ६१ ॥
रक्तपित्तं वातरक्तं ग्रहणीं श्वासकासकौ ।
अरुचिं शूलहृल्लासावर्शांसि च विनाशयेत् ॥ ६२ ॥
जीवनानन्दनामेदमभ्रं वृष्यं बलप्रदम् ।
रसायनमिदं श्रेष्ठमग्निसन्दीपनं परम् ॥ ६३ ॥

अभ्रककी भस्म २ कर्ष, जीरा और धतूरेके बीज एक एक कर्ष लेकर सबको एकत्र चूर्ण करके अडूसा, कटेरी, आमले, नागरमोथा और गिलोय इन प्रत्येकके चार चार तोले स्वरसमें क्रमसे अलग २ खरल करे । फिर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर एकएक गोली यथादोषानुसार उचित अनुपानके साथ प्रयोग करे । यह रस सम्पूर्ण विषमज्वर, प्लीहा, यकृत, वमन, रक्तपित्त, वातरक्त, संग्रहणी, श्वास, खाँसी, अरुचि, शूल, हल्लास ( उबकाई ) और अर्शदोगको नष्ट करता है। यह जीवनानन्द नामक अभ्रक-अत्यन्त वृष्य, बलदायक, उत्तम रसायन और अग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाला है ॥ ५९-६३ ॥

चन्दनादिलोह ।

रक्तचन्दनह्रीबेरपाठोशीर कणाशिवाः ।
नागरोत्पलधात्रीभिस्त्रिमदेन समन्वितम् ॥
लौहं निहन्ति विविधान् समस्तान्विषमज्वरान् ॥ ६४ ॥

लालचन्दन, सुगन्धवाला, पाठ, खस, पीपल, हरड, सोंठ, कमोदिनीकी जड, बबूल, आमले, नागरमोथा, चीता और वायविडङ्ग ये सब ओषधियाँ


^१ त्रिमदं चात्र—मुस्तकचित्रकविडङ्गम् । द्वादशद्रव्यसमं लोहं रक्तिद्वयं मधुना लिहेत् ॥

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १८१


समान भाग और लोहभस्म सबके बराबर भाग लेकर एकत्र करके जलके द्वारा उत्तमप्रकारसे खरलकरके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इस लोहको शहदके साथ खानेसे सब प्रकारक विषमज्वर और अन्य नानाप्रकारके ज्वर दूर होते हैं ॥ ६४ ॥

विषमज्वरान्तकलोह ।

पारदं गन्धकं तुल्यं सूताद्धं जीर्णताम्रकम् ।
ताम्रतुल्यं माक्षिकं च लौहं सर्वसमं नयेत् ॥ ६५ ॥
जयन्त्याः स्वरसेनैव कोकिलाक्षरसेन च ।
वासकार्द्रपर्णरसैः पंचधा च विमर्दयेत् ॥ ६६ ॥
पृथक् कलायमानां तु वटिकां कारयेद्भिषक् ।
विषमज्वरान्तनामाऽयं विषमज्वरनाशनः ॥ ६७ ॥
वह्निदीप्तिकरो हृद्यः प्लीहगुल्मविनाशनः ।
चक्षुष्यो बृंहणो वृष्यः श्रेष्ठः सर्वरुजापहः ॥ ६८ ॥

शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको समानभाग लेकर एकत्र खरल करके कजली बनाले। फिर उसमें ताम्रभस्म १ तोला, सोनामाखीकी भस्म १ तोला और लोहभस्म सबके बराबर भाग लेवे। इन सबको एकत्र खरल करके अरणी, तालमखाना, अडूसा, अदरख और पान इन पाँचोंके रसमें पृथक् पृथक् पाँच बार खरल करके मटरकी समान गोलियाँ बनालेवे। यह विषमज्वरान्तकलोह सर्वप्रकारके विषमज्वर, प्लीहा, गुल्म आदिरोगोंको नष्ट करता है एवं अग्निको दीपन करनेवाला हृदयके और नेत्रोंके लिये हितकारी, कामोत्तेजक एवं वीर्यवर्द्धक है और समस्त व्याधियोंकी उत्तम औषध है ॥ ६५-६८ ॥

बृहद्विषमज्वरान्तकलोह ।

शुद्धसूतं तथा गन्धं कारयेत्कज्जलीं शुभाम् ।
मृतसूतं हेम तारं लौहमभ्रं च ताम्रकम् ॥ ६९ ॥
तालसत्त्वं वङ्गभस्म मौक्तिकं सप्रवालकम् ।
सुवर्णमाक्षिकं चापि चूर्णयित्वा विभावयेत् ॥ ७० ॥
निर्गुण्डी नागवल्ली च काकमाची सपर्पटी ।
त्रिफला कारवेल्लं च दशमूली पुनर्नवा ॥ ७१ ॥

१८२भैषज्यरत्नावली ।[ रस-

गुड़ूची वृषकश्चापि सभृङ्गं केशराजकः ।
एतेषां च रसेनैव भावयेत्रिदिनं पृथक् ॥ ७२ ॥
गुञ्जामानां वटीं कुर्याच्छास्त्रवित्कुशलो भिषक् ।
पिप्पलीगुडकेनैव लिहेच्च वटिकां शुभाम् ॥ ७३ ॥

शुद्धपारा, शुद्धगन्धक दोनोंकी बनायीहुई उत्तम कज्जली, रससिन्दूर, सोना, चाँदी, लोहा, अभ्रक, ताँबा, हरतालभस्म, वङ्गभस्म, मोती, मूँगा और सोनामाखी इन सबको समानभाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर उसको निर्गुण्डी, पान, मकोय, पित्तपापडा, त्रिफला, करेला, दशमूल, पुनर्नवा, गिलोय, अडूसा, भाँगरा और कुकुरभाँगरा इन प्रत्येक ओषधियोंके रसमें अलग २ तीनतीन दिनतक भावना देकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ तैयार करलेवे। इनमेंसे एकएक गोली पिपलके चूर्ण और पुराने गुडके साथ सेवन करे ॥ ६९-७३ ॥

ज्वरमष्टविधं हन्ति निरामं साममेव च ।
सप्तधातुगतं चापि नानादोषोद्भवं तथा ॥ ७४ ॥
सततादिज्वरं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ।
अभिघाताभिचारोत्थं जीर्णज्वरं विशेषतः ॥ ७५ ॥

इससे आठों प्रकारके ज्वर आमरहित और आमसहित ज्वर, सातों धातुओंमें स्थित तथा अनेक दोषोंसे उत्पन्न हुए ज्वर सततादिज्वर साध्य अथवा असाध्य अभिघातज्वर, अभिचारजन्यज्वर और विशेष कर जीर्णज्वर तत्काल नष्ट होते हैं ॥ ७४ ॥ ७५ ॥

पुटपक्व-विषमज्वरान्तकलोह ।

हिंगूलसम्भव सूतं गन्धकेन सुकज्जलम् ।
पर्पटीरसवत्पाच्यं सूतादङ्घ्रिहेमभस्मकम् ॥ ७६ ॥
लौहं ताम्रमभ्रकं च रसस्य द्विगुणं तथा ।
वङ्गकं गैरिकं चैव प्रवालं च रसार्द्धकम् ॥ ७७ ॥
मुक्ताशंखशुक्तिभस्म प्रदेयं रसपादिकम् ।
मुक्तागृहे च संस्थाप्य पुटपाकेन साधयेत् ॥ ७८ ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय द्विगुञ्जाफलमानतः ।
अनुपानं प्रयोक्तव्यं कणा हिङ्गु ससैन्धवम् ॥ ७९ ॥