भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
२ भोजप्रबन्धः लोभः प्रतिष्ठा पापस्य प्रसूतिर्लोभ एव च । द्वेषक्रोधादिजनको लोभः पापस्य कारणम् ॥ १ ॥ लोभ पाप का मूल है और लोभ ही पाप का जनक है। द्वेष, क्रोध आदि को उत्पन्न करनेवाला लोभ पाप का कारण होता है ॥ १ ॥ लोभात् क्रोधः (१) प्रभवति क्रोधाद् द्रोहः प्रवर्तते । द्रोहेण नरकं याति शास्त्रज्ञोऽपि विचक्षणः ॥ २ ॥ लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से द्रोह का प्रवर्तन होता है। शास्त्रों का ज्ञाता विद्वान् भी द्रोह के कारण नरकगामी बनता है ॥ २ ॥ मातरं पितरं पुत्रं भ्रातरं वा सुहृत्तमम् । लोभाविष्टो नरो हन्ति स्वामिनं वा सहोदरम् ॥ ३ ॥ लोभ से आविष्ट मनुष्य माता-पिता, पुत्र, भाई, घनिष्ठ मित्र, स्वामी और सगे भाई की भी हत्या कर डालता है ॥ ३ ॥ इति विचार्य राज्यं मुञ्जाय दत्त्वा तदुत्सङ्गे भोजमात्मजं मुमोच । ततः क्रमाद्राजनि दिवं गते सम्प्राप्तराज्यसम्पत्तिर्मुञ्जो मुख्यामात्यं बुद्धिसागरनामानं व्यापारमुद्रया दूरीकृत्य तत्पदेऽन्यं नियोजयामास । ततो गुरुभ्यः क्षितिपालपुत्रं वाचयति । ऐसा विचार करके उसने राज्य मुंज को दे दिया और भोज को उसकी छत्रच्छाया में छोड़ दिया । कुछ दिनों बाद (सिंधुल) राजा के दिवंगत होने पर राज्य-संपदा प्राप्त करके मुंज ने बुद्धिसागर नामक मुख्य मंत्री को मंत्रिपद से हटा दिया और उसके स्थान पर अन्य की नियुक्त कर दी। राजकुमार (भोज) को गुरुजनों से शिक्षा दिलाने लगा । ततः क्रमेण सभायां ज्योतिः शास्त्रपारङ्गतः सकलविद्याचातुर्य- वान् ब्राह्मणः समागम्य राज्ञे 'स्वस्ति' इत्युक्त्वोपविष्टः । स चाह--'देव, लोकोऽयं मां सर्वज्ञं तत्किमपि पृच्छ । कण्ठस्था या भवेद्विद्या सा प्रकाश्या सदा बुधैः । या गुरौ पुस्तके विद्या तया मूढः प्रतार्यते' ॥ ४ ॥ इति राजानं प्राह । ( १ ) वर्धत इति मावः ।
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भोजप्रबन्धः ३ तदनंतर कुछ दिनों पश्चात् राजसभा में ज्योतिःशास्त्र में पारंगत, समस्त विद्याओं के कौशल से संपन्न एक ब्राह्मण आया और राजा के प्रति कल्याण-वचन कहके बैठ गया तथा राजा से बोला—‘देव, यह संसार मुझे सर्वज्ञ कहता है, सो ( आप भी इच्छानुसार ) कुछ पूछिए :— जो विद्या कंठस्थ हो, बुद्धिमानों को सदा उसे प्रकाशित करना उचित होता है; जो विद्या गुरु अथवा पुस्तक में ही स्थित है, उससे मूर्ख को ही ठगा जा सकता है । ( अथवा पुस्तकस्थ या गुरुस्थित विद्या से विद्वत्ता का अभिमानी बना मनुष्य मूर्ख होता है और धोखा खाता है । ) ततो राजापि विप्रस्याहम्भावमुद्रया चमत्कृतां तद्वार्तां श्रुत्वा ‘अस्माकं जन्मारभ्यैतत्क्षणपर्यन्तं यद्यन्मयाचरितं यद्यत्कृतं तत्तत्सर्वं वदसि यदि, भवान्सर्वज्ञ एव’ इत्युवाच । ततो ब्राह्मणोऽपि राज्ञा यद्यत्कृतं तत्तत्सर्वमुवाच । गूढव्यापारमपि । ततो राजापि सर्वाण्यप्यभिज्ञानानि ज्ञात्वा तुतोष । पुनश्च पञ्चषट्पदानि गत्वा पादयोः पतित्वेन्द्रनील- पुष्परागमरकतवैडूर्यखचितसिंहासन उपवेश्य राजा प्राह— ‘मातेव रक्षति पितेव हिते नियुङ्क्ते कान्तेव चाभिरमयत्यपनीय खेदम् । कीर्तिं च दिक्षु विमलां वितनोति लक्ष्मीं किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या’ ॥ ५ ॥ ततो विप्रवराय दशाश्वान् (?) जानेयान् ददौ । तत्पश्चात् ब्राह्मण की अहंकार युक्त मुद्रा से चमत्कारमयी उस वाणी को सुनकर राजा ने भी कहा—“जन्म से लेकर इस क्षण तक जो-जो आचरण और जो-जो कार्य मेरे द्वारा हुए हैं, वे सब यदि आप बता देंगे तो मैं भी आपको सर्वज्ञ समझूँगा ।” तब राजा ने जो-जो किया था, वह सब—यहाँ तक कि गुप्त रूप से किया कार्यभी—ब्राह्मण ने बता दिया । राजा भी समस्त श्रेय बातों को जान कर संतुष्ट हुआ और फिर पाँच-छः डग आगे बढ़ ब्राह्मण के चरणों में प्रणिपात करके नीलम, पुखराज, पन्ना और वैडूर्य ( १ ) ये कुलीनाः प्रशस्तजातिभवा अश्वास्ते आजानेयाः । आजेन क्षेपणीयाः प्रापणीया इति विग्रहः ।
[Page 4] [Heading] भोजप्रबन्धः
मणियों से जड़े सिंहासन पर ( उसे ) बैठाकर बोला- "माता के सदृश रक्षा करती है, पिता के समान कल्याण करने वाले कार्यों में नियुक्त करती है और प्रिय पत्नी के तुल्य खिन्नतां को दूर कर प्रसन्न करती है। चारों दिशाओं में विमल कीर्ति और लक्ष्मी का विस्तार करती है-कल्पलता के समान विद्या क्या-क्या सिद्ध नहीं कर देती?" और विप्रवर को दस उत्तम जाति के घोड़े दिये। ततः सभायामासीनो बुद्धिसागरः प्राह राजानम्—'देव, भोजस्य जन्मपत्रिकां ब्राह्मणं पृच्छ' इति । ततो मुञ्जः प्राह - 'भोजस्य जन्म- पत्रिकां विधेहि' इति । ततोऽसौ ब्राह्मण उवाच - 'अध्ययनशालाया भोज आनेतव्यः' इति । मुञ्जोऽपि ततः कौतुकादध्ययनशालामलङ्कुर्वाणं भोजं भटैरानयामास । ततः साक्षात्पितरमिव राजानमानम्य सविनयं तस्थौ । तदनंतर सभा में बैठा बुद्धिसागर राजा से बोला- 'देव, भोज की जन्मपत्रिका ब्राह्मण से विचारवाइए ।' तब मुंज ने कहा- 'भोज की जन्मपत्री विचारिए ।' तब ब्राह्मण बोला- 'पाठशाला से भोज को बुलवाइए ।' कौतुक के कारण मुंज ने भी पाठशाला में सुशोभित भोज को भटों द्वारा बुलवा लिया । साक्षात् पिता के समान राजा को प्रणाम करके विनय पूर्वक भोज बैठ गया । ततस्तद्रूपलावण्यमोहिते राजकुमारमण्डले प्रभूतसौभाग्यं महीमण्ड- लमागतं महेन्द्रमिव, साकारं मन्मथमिव, मूर्तिमत्सौभाग्यमिव, भोजं निरूप्य राजानं प्राह दैवज्ञः- 'राजन्, भोजस्य भाग्योदयं वक्तुं विरि- ञ्चिरपि नालम्, कोऽहमुदरम्भरिर्ब्राह्मणः । किञ्चित्तथापि वदामि स्व- मत्यनुसारेण । भोजमितोऽध्ययनशालायां प्रेषय ।' ततो राजाज्ञया भोजे ह्यध्ययनशालां गते विप्रः प्राह- 'पञ्चाशत्पञ्चवर्षाणि सप्तमासदिनत्रयम् । भोजराजेन भोक्तव्यः सगौडो दक्षिणापथः' ॥ ६ ॥ इति । तत्तदाकर्ण्य राजा चातुर्याद्दर्पंहसन्निव सुमुखोऽपि
भोजप्रबन्धः ५ वि (१) च्छायवदनोऽभूत् । तदनंतर उस (भोज) के रूप और सौंदर्य पर मुग्ध, राजकुमारों के मध्य महान् सौभाग्यशाली, धरती पर उतरे महेंद्र के समान, साकार कामदेव के सदृश, मूर्तिमान् सौभाग्य के तुल्य भोज को देख कर ज्योतिषी ने राजा से कहा—'राजन् भोज के भाग्य का वर्णन तो ब्रह्मा भी करने में पर्याप्त नहीं है, मैं पेटपालू ब्राह्मण किस गिनती में हूँ ? तो भी अपनी बुद्धि के अनुसार कुछ कहता हूँ । आप भोज को यहाँ से विद्यालय भेज दीजिए ।' तत्पश्चात् राजा की आज्ञा से भोज के विद्यालय चले जाने पर ब्राह्मण ने कहा—'पचपन वर्ष, सात मास और तीन दिन राजा भोज बंगाल सहित दक्षिणा पथ का राज्य भोगेंगे ।' तब यह सुन कर चतुरतापूर्वक विरूपता से हँसता हुआ सुमुख भी राजा मलिनमुख हो गया । ततो राजा ब्राह्मणं प्रेषयित्वा निशीथे शयनमासाद्यै काकी सन् व्य- चिन्तयत्--'यदि राज्यलक्ष्मीर्भोजकुमारं गमिष्यति, तदाऽहं जीव- न्नपि मृतः । इसके उपरांत ब्राह्मण को भेजकर राजा रात में शैय्या पर बैठकर अकेला विचार करने लगा—"यदि राजलक्ष्मी राजकुमार भोज को मिल जायेगी तो मैं तो जीते जी मरा । तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव । अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षणेन सोऽप्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत् ॥ ७ ॥ वे ही अविकल इंद्रियाँ रहती हैं, वही नाम रहता है; अकुंठित बुद्धि भी वही रहती है और वचन भी वही। किंतु कैसी अनोखी बात है कि केवल धन की ऊष्मा (गर्मी) से वियुक्त वही मनुष्य क्षण भर में दूसरा ही हो जाता है । (१) विगता छाया विच्छायम्, "कुगतिप्रादयः" इत्यनेन समासः। "विभाषा सेनासुराच्छाया०" इत्यनेन नपुंसकत्वम् । तादृक् वदनं यस्य स इति यावत् ।
६ भोजप्रबन्धः किञ्च -- शरीरनिरपेक्षस्य दक्षस्य व्यवसायिनः । बुद्धिप्रारब्धकार्यस्य नास्ति किञ्चन दुष्करम् ॥ ८ ॥ असू (१) यया हतेनैव पूर्वोपायोद्यमैरपि । कर्तॄणां गृह्यते सम्पत्सुहृद्भिर्मन्त्रिभिस्तथा ॥ ६ ॥ किंतु शरीर की चिंता न करनेवाले, चतुर, अध्यवसायी और बुद्धि से कार्य करनेवाले मनुष्य के लिए कुछ भी कर डालना कठिन नहीं है । गुणों में दोष का आविष्कार करने की प्रवृत्ति के कारण पहिले से ही युक्ति और उद्योग पूर्वक करनेवाले पुरुषों का कार्य मित्रों और मंत्रियों द्वारा मान्य ही होता है । तत्रोद्यमे किं दुःसाध्यम् । अतिदाक्षिण्ययुक्तानां शङ्कितानां पदे पदे । परापवादभीरूणां दूरतो यान्ति सम्पदः ॥ १० ॥ सो उद्योग करने पर कठिन क्या है ? अत्यंत चतुर किंतु पग-पग पर शंका करनेवाले और दूसरों के द्वारा की गई निंदा से डरनेवाले मनुष्यों की संपदाएँ दूर से ही चली जाती हैं । किञ्च -- आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः । क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति सम्पदः ॥ ११ ॥ अवमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा च पृष्ठतः । स्वार्थं समुद्धरेत्प्राज्ञः स्वार्थभ्रंशो हि मूर्खता ॥ १२ ॥ न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः। एतदेवातिपाण्डित्यं यत्स्वल्पाद्भूरिरक्षणम् ॥ १३ ॥ जातमात्रं न यः शत्रुं व्याधिं वा प्रशमं नयेत् । अतिपुष्टाङ्गयुक्तोऽपि स पश्चात्तेन हन्यते ॥ १४ ॥ प्रज्ञागुप्तशरीरस्य किं करिष्यन्ति संहताः । हस्तन्यस्तातपत्रस्य वारिधारा इवारयः ॥ १५ ॥ अफलानि दुरन्तानि समव्ययफलानि च । अशक्यानि च वस्तूनि नारभेत विचक्षणः ॥ १६ ॥ ( १ ) असूया-गुणेषु दोषाविष्करणम् ।
भोजप्रबन्धः ७ अधिक क्या—लेने और देने के तथा करने योग्य कार्य को शीघ्रता पूर्वक न करनेवाले मनुष्य की संपत्ति को काल नष्ट कर डालता है। बुद्धिमान् मनुष्य अवमानना का ग्रहण कर तथा मान की चिंता न करके स्वार्थ-सिद्धि करे; क्योंकि स्वार्थ में चूकना मूर्खता है। बुद्धिमान् थोड़े के लिए अधिक को न गँवा दे। थोड़े के मूल्य पर अधिक की रक्षा करलेना ही बड़ी पंडिताई है। जो मनुष्य शत्रु अथवा रोग को उत्पन्न होते ही नष्ट नहीं कर देता, वह अत्यंत पुष्ट अंगों वाला होकर भी बाद में शत्रु अथवा रोग से मारा जाता है। जिस प्रकार हाथ में छाता धारण करनेवाले मनुष्य का जलधाराएँ कुछ नहीं कर सकतीं, उसी प्रकार बुद्धि द्वारा शरीर-रक्षा करनेवाले मनुष्य का संगठित शत्रु भी कुछ नहीं कर सकते। निष्फल, कष्टसाध्य, जिनमें हानि-लाभ समान हो और जो न हो सके, ऐसे कार्य का आरंभ बुद्धिमान् को नहीं करना चाहिए। ततश्चैवं विचिन्तयन्नभुक्त एव दिनस्य तृतीये यामे एक एव मन्त्र- यित्वा वङ्गदेशाधीश्वरस्य महाबलस्य वत्सराजस्या(१) कारणाय स्वमङ्ग- रक्षकं प्राहिणोत्। स चाङ्गरक्षको वत्सराजमुपेत्य प्राह - 'राजा त्वामा- कारयति' इति। ततः स रथमारुह्य परिवारेण परिवृतः समागतो रथोदवतीर्य राजानमवलोक्य प्रणिपत्योपविष्टः। फिर इसी प्रकार सोचते हुए बिना कुछ खाये-पिये राजा ने अकेले ही मंत्रणा करके दिन के तीसरे पहर में वंगदेश के अधीश्वर महाबली वत्सराज को बुलाने के लिए अपने अंग रक्षक को भेजा। वत्सराज के निकट पहुँच कर वह अंगरक्षक बोला—'राजा आपको बुलाता है।' सो वह परिवार सहित रथ पर चढ़ कर आ पहुँचा और रथ से उतर राजा को देख प्रणिपात करके बैठ गया। राजा च सौधं निर्जनं (२) विधाय वत्सराजं प्राह— 'राजा तुष्टोऽपि भृत्यानां मानमात्रं प्रयच्छति। ते तु सम्मानितास्तस्य प्राणैरप्युपकुर्वते ॥ १७ ॥ ततस्त्वया भोजो भुवनेश्वरीविपिने हन्तव्यः प्रथमयामे निशायाः। ( १ ) आह्वानायेति यावत्। ( २ ) जनरहितम्।
८ भोजप्रबन्धः शिरश्चान्ते पुरमानेतव्यम्' इति । राजा महल को निर्जन करा के वत्सराज से बोला—'प्रसन्न होकर भी राजा अपने सेवकों को केवल मान देता है, किंतु सम्मानित सेवक तो अपने प्राण देकर भी उसका उपकार करते हैं। सो तुम्हें उचित है कि तुम भोज को रात के पहिले पहर में भुवनेश्वरी वन में मार डालो और उसका सिर अंतःपुर में ले आओ।' स चोत्थाय नृपं नत्वाऽऽह—'देवादेशः प्रमाणम् । तथापि सबला- लनात्किमपि वक्तुकामोऽस्मि । ततः सापराधमपि मे वचः क्षन्तव्यम् । भोजे द्रव्यं न सेना वा परिवारो बलान्वितः । परं पोत इवास्तेऽद्य स हन्तव्यः कथं प्रभो ॥ १८ ॥ पारम्पर्य इवासक्तस्त्वत्पाद उदरम्भरिः । तद्वधे कारणं नैव पश्यामि नृपपुङ्गव' ॥ १६ ॥ उसने खड़े होकर राजा के संमुख विनत होकर कहा—'महाराज की आज्ञा शिरोधार्य है, तो भी आपके लाड़-प्यार के आधार पर कुछ निवेदन करने की इच्छा करता हूँ। सो अपराध युक्त होने पर भी मेरे निवेदन को क्षमा करें। भोज के पास न धन है, न सेना है, न बलयुक्त परिवार है। वह तो आपका बिलकुल बालक जैसा है। सो हे स्वामी, उसका मारा जाना क्यों उचित है? वह तो अशक्त जैसा है और आपके चरणों में आसक्त रहकर अपना पेट पालता है। सो हे नृपश्रेष्ठ, उसके वध में कोई कारण तो नहीं दीखता। ततो राजा सर्वं प्रातः सभायां प्रवृत्तं वृत्तमकथयत् । स च श्रुत्वा हसन्नाह— त्रैलोक्यनाथो रामोऽस्ति वसिष्ठो ब्रह्मपुत्रकः । तेन राज्याभिषेके तु मुहूर्तः कथितोऽभवत् ॥ २० ॥ तन्मुहूर्तेन रामोऽपि वनं नीतोऽवनीं विना । सीतापहारोऽप्यभवद्वै रित्विवचनं वृथा ॥ २१ ॥ जातः कोऽयं नृपश्रेष्ठ किञ्चिज्ज्ञ उदरम्भरिः । यदुक्त्या मन्मथाकारं कुमारं हन्तुमिच्छसि ॥ २२ ॥ तब राजाने प्रातःकाल सभा में घटित सब वृत्तांतों को कह सुनाया। सुन कर हँसता हुआ वह (वंगराज) कहने लगा—
भोजप्रबन्धः ६ राम तीनों लोकों के राजा थे और वसिष्ठ ब्रह्मपुत्र । उन्होंने राम-राज्या- भिषेक के अवसर पर मुहूर्त तो बताया ही था । उस मुहूर्त-शोधन के फलस्वरूप राम को अपनी धरती से रहित हो वन पहुँचे, सीता का अपहरण हुआ और विरंचि ( ब्रह्मा ) के पुत्र का वचन व्यर्थ हुआ । हे राजश्रेष्ठ, यह कौन न कुछ जाननेवाला, पेटपालू उत्पन्न हो गया, जिसके कहने से कामदेव के समान कुमार को आप मार डालना चाहते हैं ? किञ्च—किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वतः । इति सञ्चिन्त्य मनसा प्राज्ञः कुर्वीत वा न वा ॥ २३ ॥ उचितमनुचितं वा कुर्वता कार्यजातं परिणतिरवधार्या यत्नतः पण्डितेन । अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्ते— र्भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः ॥ २४ ॥ अधिक क्या कहूँ—यह करके मेरा क्या होगा और न करके क्या होगा, यह भली भाँति विचार करके बुद्धिमान् नर को करना अथवा न करना उचित है । उचित अथवा अनुचित किसी कार्य को करते समय पंडित मनुष्य को प्रयत्न पूर्वक उसके परिणाम का विचार कर लेना चाहिए । जो कार्य अत्यंत शीघ्रता में कर लिये जाते हैं, उनका फल विपत्तियों से परिपूर्ण और बाण के समान हृदय में गड़ कर दाह उत्पन्न करनेवाला होता है । किञ्च—येन सहासितमशितं हसितं कथितं च रहसि विश्रब्धम् । तं प्रति कथमसतामपि निवर्तते चित्तमाममरणात् ॥ २५ ॥ और क्या कहूँ—जिसके साथ बैठे, खाया-पिया, हँसी-दिल्लगी की, एकांत में विश्वासपूर्वक कहा-सुना, उससे तो दुष्टों का भी मन मरण पर्यंत किसी दशा में नहीं हट पाता । किञ्च—अस्मिन् हते वृद्धस्य राज्ञः सिन्धुलस्य परमप्रीतिपात्राणि महावीरास्तवैवानुमते स्थिताः, ते त्वन्नगरमुल्लोलकल्लोलाः पयोधरा इव प्लावयिष्यन्ति । चिराद्बद्धमूलेऽपि त्वयि प्रायः पौरा भोजं भुवो भर्तारं भावयन्ति । किञ्च—सत्यपि च सुकृतकर्मणि दुर्नीतिश्चेच्छ्रियं हरत्येव ।
१० भोजप्रबन्धः तैलैः सदोपयुक्तां दीपशिखां विद्लयति हि (१) वातालिः ॥२६॥ देव, पुत्रवधः क्वापि न हिताय।' और भी है कि इसके मारे जाने पर बूढ़े राजा सिंधुल के अत्यंत प्रेमपात्र वे महान् वीरगण, जो इस समय आपके आज्ञापालक हैं, आपके नगर का वैसे ही नाश कर देंगे, जैसे कि ऊँची-ऊँची तरङ्गोवाले समुद्र नगर को डुबा डालते हैं। बहुत समय से आपकी जड़ जम जाने पर भी नगरवासियों का अधिकांश भोज को ही राजा मानता है। इसके अतिरिक्त पुण्यकर्म होने पर भी अन्याय संपत्ति का हरण करता ही है; तेल से पूर्ण दिए की लौ को प्रबल वायु बुझा देती है। महाराज, पुत्र का वध किसी के लिए भला नहीं होता।' इत्युक्तं वत्सराजवचनमाकर्ण्य राजा कुपितः प्राह--'त्वमेव राज्या- धिपतिः, न तु सेवकः । स्वाम्युक्ते यो न यतते स भृत्यो (२) भृत्यपाशकः । तज्जीवनमपि व्यर्थमजागलकुचाविव' ॥ २७ ॥ इति। ततो वत्सराजः 'कालोचितमालोचनीयम्' इति मत्वा तूष्णीं बभूव । वत्सराज के इन वचनों को सुनकर क्रुद्ध होकर राजा बोला- ' तू राज्य का स्वामी ही है, सेवक नहीं। जो स्वामी का कहा नहीं करता, वह सेवक नीच सेवक है। बकरी के गले के स्तनों की भाँति उसका जीवन भी व्यर्थ है।'" 'समय के अनुसार ही कार्य करना चाहिए,' यह विचार कर वत्सराज चुप होगया। अथ लम्बमाने दिवाकरे उत्तुङ्गसौधोत्सङ्गादवतरन्तं कुपितमिव कृतान्तं वत्सराजं वीक्ष्य समेता अपि विविधेन मिषेण स्वभवनानि प्र पुर्भीताः सभासदः। ततः स्वसेवकान् स्वागारपरित्राणार्थं प्रेषयित्वा रथं भुवनेश्वरी- भवनाभिमुखं विधाय भोजकुमारोपाध्यायाकारणाय प्राहिणोदेकं वत्स- राजः। स चाह पण्डितम्- 'तात' त्वामाकारयति वत्सराज.' इति। सोऽपि तदाकर्ण्य वज्राहत इव, भूताविष्ट इव, ग्रहग्रस्त इव, तेन सेवकेन (१) पवनसमुदायः। (२) कुत्सितभृत्य इत्यर्थः।
भोजप्रबन्धः ११
करेण धृत्वानीतः पण्डितः । इसके उपरांत सूर्य के अस्तमित होने पर ऊँचे महल से उतरते क्रुद्ध यमराज की भांति वत्सराज को देखकर डरे हुए सभी सभासद अनेक प्रकार के बहाने बनाकर अपने-अपने घरों को चले गये। फिर अपने सेवकों को अपने आवास की रक्षा के लिए भेजकर, रथ को भुवनेश्वरी के मंदिर की ओर करके कुमार भोज के उपाध्याय को बुलाने के निमित्त एक सेवक को वत्सराज ने भेजा । वह पंडित से बोला— 'तात, आपको वत्सराज बुलाते हैं।' यह सुनकर वज्र से मारे हुए जैसे, भूत से ग्रस्त जैसे, ग्रहगृहीत जैसे उस पंडित को सेवक हाथ पकड़ कर ले आया । तं च बुद्धिमान् वत्सराजः सप्रणाममित्याह--'पण्डित, तात, उपविश । राजकुमारं जयन्तमध्ययनशालाया आनय' इति । आयान्तं जयन्तं कुमारं किमप्यधीतं पृष्ट्वानिपैत् । पुनः प्राह पण्डितम्—'विप्र, भोजकुमारमानय' इति । ततो विदितवृत्तान्तो भोजः कुपितो ज्वलन्निव शोणितेक्षणः समेत्याह-- 'आः पाप, राज्ञो मुख्यकुमारमेकाकिनं मां राजभवनाद् वहिर्रानेतुं तव का नाम शक्तिः' इति वामचरणपादुकामादाय भोजेन तालुदेशे हतो वत्सराजः । ततो वत्सराजः प्राह- 'भोज, वयं, राजादेशकारिणः ।' इति बालं रथे निवेश्य खड्गमपकोशं कृत्वा जगामाशु महामायाभवनम् । बुद्धिमान् वत्सराज प्रणाम करके उससे बोला—'पंडितजी महाराज, विराजिए । राजकुमार जयंत को पाठशाला से ले आइए।' उसने आये कुमार जयंत से कुछ पढ़ा-लिखा पूछ कर उसे वापस भेज दिया। फिर पंडित से कहा—'हे ब्राह्मण, भोजकुमार को लाओ।' तत्पश्चात् समाचार जान कर क्रोध से जलता हुआ, लाल-लाल आंखे किये भोज आकर बोला—'अरे पापी, मुझ राज के मुख्य कुमार को अकेले राजभवन से बाहर ले जाने की तेरी क्या शक्ति है ?' ऐसा कह बायें पैर से खड़ाऊँ निकाल कर भोज ने वत्सराज के तालुभाग पर प्रहार किया । तब वत्सराज ने कहा--भोज ! हम तो राजाज्ञा के पालक हैं।' ऐसा कह बालक (भोज) को रथ में बैठा कर तलवार म्यान से बाहर निकाले शीघ्रतापूर्वक महामाया के मंदिर की ओर चल पड़ा ।
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ देवनागरी में पंक्तिबद्ध रूप में प्रस्तुत है:
१२ भोजप्रबन्धः ततो गृहीते भोजे लोकाः कोलाहलं चक्रुः । हुम्भावश्च प्रवृत्तः । 'किं किम्' इति ब्रुवाणा भटा विक्रोशन्त आगत्य सहसा भोजं वधाय नीतं ज्ञात्वा हस्तिशालामुष्ट्रशालां वाजिशालां रथशालां प्रविश्य सर्वाञ्जघ्नुः। ततः प्रतोलीषु राजभवनप्राकारवेदिकासु बहिर्द्वारविटङ्केषु पुरसमीपेषु भेरीपटहमुरजमड्डुकडिण्डिमाननडाडम्बरं विडम्बितमभूत् । केचिद्विम- लासिना केचिद्विषेण केचित्कुन्तेन केचित्पाशेन केचिद्वह्निना केचित्परशुना केचिद्गलेन केचित्तोमरेण केचित्प्रासेन केचिदम्भसा केचिद्धारायां ब्राह्मणा योषितो राजपुत्रा राजसेवका राजानः पौराश्च प्राणपरित्यागं दधुः । तदनंतर भोज के पकड़ कर ले जाये जाने पर लोग कोलाहल करने लगे । हुङ्कार होने लगा । 'क्या हुआ, क्या हुआ' ऐसा कहते चिल्लाते हुए योद्धाओं ने आकर, अकस्मात् भोज को वध के निमित्त लेजाया गया जानकर, हस्तिशाला, उष्ट्रशाला, अश्वशाला, रथशाला में घुस कर सब को मार डाला । तत्पश्चात् गलियों में, राजमहल के प्राचीर की वेदियों पर, बाहरी द्वारों के चबूतरों पर, नगर के निकट स्थानों पर नगाड़ों, ढोलकियों, मृदङ्गों, डोलों और दौड़ियों के तीव्र घोष से आकाश गूँज उठा । ब्राह्मणों की स्त्रियों, राजपुत्रों, राजसेवकों, राजाओं और पुरजनों ने—कुछ ने चमकती तलवार से, कुछ ने विष के द्वारा, कुछ ने भाले से, कुछ ने रस्सी में फाँसी लगा, कुछ ने आग में जल, कुछ ने फरसे द्वारा, कुछ ने बरछी से, कुछ ने तोमर द्वारा, कुछ ने खाँड़े से, कुछ ने कुएँ और कुछ ने नदी में डूबकर—प्राणों का त्याग कर दिया । ततः सावित्रीसंज्ञा भोजस्य जननी विश्वजननीव स्थिता दासीमुखा- त्स्वपुत्रस्थितिमाकर्ण्य कराभ्यां नेत्रे पिधाय रुदती प्राह—'पुत्र, पितृव्येन कां दशां गमितोऽसि । ये मया नियमा उपवासाश्च त्वत्कृते कृताः, तेऽद्य मे विफला जाताः । दशापि दिशामुखानि शून्यानि । पुत्र, देवेन सर्वज्ञेन सर्वशक्तिनासृष्टाः श्रियः । पुत्र, एतं दासीवर्गं सहसा विच्छिन्नशिरसं पश्य' इत्युक्त्वा भूमावपतत् । तदनंतर संसार की माता के समान स्थित सावित्री नाम की भोज की माता दासी के मुख से अपने पुत्र की दशा सुनकर हाथों से नेत्रों को ढक कर रोती हुई कहने लगी—'पुत्र, चाचा ने तुम्हें किस दशा को पहुँचा दिया ।
१. राजा भोज जन्म, बाल्यकाल व मुंज से विपत्ति
तुम्हारे निमित्त जो नियम और उपवास मैंने किये, वे सब निष्फल हो गये । दसों दिशामुख सूने हैं। पुत्र, सब जानने वाले, सर्वशक्तिमान् ईश्वर ने सब संपत्ति नष्ट कर दी । बेटे' सहसा सिर कटे हुए इस दासियों के समूह को देखो,'—ऐसा कह कर वह धरती पर गिर पड़ी । ततः प्रदीप्ते वैश्वानरे समुद्भूतधूमस्तोमेनेव मलीमसे नभसि पाप- त्रासादिव पश्चिमपयोनिधौ मग्ने मार्तण्डमण्डले महामायाभवनमासाद्य प्राह भोजं वत्सराजः—'कुमार, भृत्यानां दैवत, ज्योतिषशास्त्रविशारदेन केनचिद् ब्राह्मणेन तव राज्यप्राप्तावुदीरितायां राज्ञा भवद्वधो व्या (१) दिष्टः' इति । तत्पश्चात् आग जलने से उत्पन्न धुएँ की धुंध से आकाश के मलिन हो जाने पर, पाप के डर से जैसे सूर्यमंडल के पश्चिम समुद्र में डूब जाने पर महामाया के मंदिर में पहुँच कर वत्सराज भोज से बोला—'कुमार, सेवकों के देवता, ज्योतिष विद्या में निपुण किसी ब्राह्मण के द्वारा आपकी राज्य- प्राप्ति की घोषणा की जाने पर राजाने आपके वध की आज्ञा दी है।' भोजः प्राह— 'रामे प्रव्रजनं बलेर्नियमनं पाण्डोः सुतानां वनं वृष्णीनां निधनं नलस्य नृपते राज्यात्परिभ्रंशनम् । कारागारनिषेवणं च वरणं सञ्चिन्त्य लङ्केश्वरे सर्वः कालवशेन नश्यति नरः को वा परित्रायते ॥ २८ ॥ भोज ने कहा—राम का देश से निर्वासन, वलि का बंधन, पांडुपुत्रों का वनवास, यादवों की मृत्यु, राजा नल का राज्य से हट जाना, बंदीगृह में निवास ( 'कारागार' के स्थान में 'पाकागार' भी प्राप्त होता है—अर्थ, रसोइये का कार्य करना ) और पुनः स्वयंवर में दमयंती की प्राप्ति, ( 'वरणं' के स्थान में 'मरणं' भी है—अर्थ मृत्यु अर्थात् लंका के राजा रावण की मृत्यु) और लंकाधीश रावण की मृत्यु विचार कर निश्चय होता है कि प्रत्येक मनुष्य काल के वश होकर नाश को प्राप्त होता है, कौन त्राण पाता है ? ( १ ) उक्त इत्यर्थः ।
१४ भोजप्रबन्धः लक्ष्मीकौस्तुभपारिजातसहजः सूनुः सुधाम्भोनिधे- दैवेन प्रणयप्रसादविधिना मूर्ध्ना धृतः शम्भुना । अद्याप्युज्झति नैव दैवविहितं क्षैण्यं (१) क्षपावल्लभः केनान्येन विलङ्घ्यते विधिगतिः पाषाणरेखासखी ॥ २९ ॥ लक्ष्मी, कौस्तुभमणि और कल्पवृक्ष के साथ उत्पन्न, अमृत-समुद्र का पुत्र, महादेव शिव के द्वारा प्रेम और प्रसन्नता प्रकट करने की रीति से मस्तक पर स्थापित, रात्रि का प्रियतम चंद्रमा भाग्य के द्वारा निर्दिष्ट क्षीण होने की क्रिया को आज भी नहीं छोड़ पाता । पत्थर पर खिची लकीर के समान अमिट विधाता की गति का उल्लंघन और किसके द्वारा हो सकता है ? विकटोर्व्यामप्यटनं शैलारोहणमपान्निधेस्तरणम् । निगडं गुहाप्रवेशो विधिपरिपाकः कथं नु सन्तार्यः ॥ ३० ॥ विधाता के द्वारा निर्दिष्ट होने पर विकट भूमि पर मारे-मारे फिरना, पर्वत पर चढ़ना, समुद्र में तैरना, बेड़ी में जकड़ा जाना, गुफा में रहना— इन सब से कैसे निस्तार पाया जा सकता है ? अम्भोधिः स्थलतां स्थलं जलधितां धूलीलवः शैलतां मेरुर्मत्कुणतां तृणं कुलिशतां वज्रं तृणप्रायताम् । वह्निः शीतलतां हिमं दहनतामायाति यस्येच्छया लीलादुर्ललिताद्भुतव्यसनिने देवाय तस्मै नमः ॥ ३१ ॥ जिस देव की इच्छा से समुद्र सूखी धरती, स्थली समुद्र, धूलिकण पर्वत, सुमेरु मिट्टी का कण, तिनका वज्र और वज्र तिनका बन जाता है; आग शीतल हो जाती है और बर्फ आग बन जाता है, लीला मात्र से दुष्कर किंतु सुंदर और अद्भुत कर्म करने के व्यसनी उस देवता को नमस्कार है । ततो वटवृक्षस्य पत्रं आदायैकं पुटीकृत्य जङ्घां छुरिकया छित्त्वा तत्र पुटके रक्तमारोप्य तृणेनैकस्मिन्पत्रे कञ्चन श्लोकं लिखित्वा वत्सं प्राह—'महाभाग, एतत्पत्रं नृपाय दातव्यम् । त्वमपि राजाज्ञां विधेहि' इति । यह कहने के पश्चात् भोज ने वटवृक्ष के दो पत्ते लेकर एक का दोना ( १ ) चन्द्रमाः इति यावत् ।
भोजप्रबन्धः १५
बनाया और जंघा में छुरी से काट कर रक्त निकाला और, उस दोनों में रखा और तिनके से दूसरे पत्ते पर रक्त से एक श्लोक लिख कर वत्स से कहा— ‘महाभाग, इस पत्र को राजा को दे देना। और राजाज्ञा का पालन करो। ततो वत्सराजस्यानुजो भ्राता भोजस्य प्राणपरित्यागसमये दीप्य- मानमुखश्रियसमवलोक्य प्राह— ‘एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यत्तु गच्छति ॥ ३२॥ न ततो हि सहायार्थे माता भार्या च तिष्ठति । न पुत्रमित्रौ न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः ॥ ३३ ॥ बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः । श्रुतवानपि मूर्खश्च यो धर्मविमुखो जनः ॥ ३४ ॥ इहैव नरकव्याधेश्चिकित्सां न करोति यः । गत्वा निरौषधस्थानं स रोगी किं करिष्यति ॥ ३५ ॥ जरां मृत्युं भयं व्याधिं यो जानाति स पण्डितः । स्वस्थस्तिष्ठेन्निषीदेद्वा स्वपेद्वा केनचिद्धसेत् ॥ ३६ ॥ तुल्यजातिवयोरूपान् हतान् पश्यति मृत्युनां । नहि तत्रास्ति ते त्रासो वज्रवद्धृदयं तव’ ॥ ३७ ॥ इति । इसके बाद प्राणत्यागने का समय उपस्थित होने पर भोज के देदीप्यमान मुख की शोभा को देखकर वत्सराज का छोटा भाई बोला— धर्म ही एक मित्र है, जो मरजाने पर भी अनुगमन करता है; और सब तो शरीर के विनाश के साथ ही नाश को प्राप्त हो जाता है। उस समय सहायता के निमित्त न माता ठहरती है, न पत्नी, न पुत्र, न मित्र; न कोई नातेदार; केवल धर्म ही ठहरता है। जो मनुष्य धर्म से विमुख है, वह बलवान् होने पर भी शक्तिहीन है; धनी होने पर भी निर्धन है और शास्त्रज्ञ होने पर भी मूर्ख है। जो इस लोक में ही नरक के रोग (पाप) की चिकित्सा नहीं करता, औषधहीन स्थान (परलोक) में पहुँच कर वह रोगी क्या करेगा ? जो बुढ़ापा, मृत्यु, भय और रोग को जानता है, वह पंडित है। वह
१६ भोजप्रबन्धः चाहे स्वस्थ रहे, चाहे पड़ा रहे, चाहे सोता रहे, चाहे किसी के साथ हँसी करता रहे। (हे भाई, ) तुम जाति, आयु और रूप में अपने समान व्यक्तियों को मृत्यु द्वारा अपहृत होते देखते हो और तुम को डर नहीं लगता। तो तुम्हारा हृदय तो वज्र तुल्य है। ततो वैराग्यमापन्नो वत्सराजो भोजं 'क्षमस्व' इत्युक्त्वा प्रणम्य तं च रथे निवेश्य नगराद् बहिर्घने तमसि गृहभा गमय्य भूमिगृहान्तरे निक्षिप्य भोजं ररक्ष। स्वयमेव कृत्रिमविद्याविद्भिः सुकुण्डलं स्फुरद्वक्त्रं निमीलितनेत्रं भोजकुमारमस्तकं कारयित्वा तच्चादाय कनिष्ठो राजभवनं गत्वा राजानं नत्वा प्राह - 'श्रीमन्ता यदादिष्टं तत्साधितम्' इति। तदनंतर वैराग्य को प्राप्त हुए वत्सराज ने 'क्षमा करो - ऐसा भोज से कहा और उसे प्रणाम करके रथ में बैठाया और नगर से बाहर घोर अंधकार में (बने) घर में लेजाकर भूमि के नीचे बने स्थान (तहखाना) में छिपाकर रखा और भोज की रक्षा की। स्वयं ही उसने नकली कृत्रिम वस्तु बनाने की विद्या को जानने वाले लोगों से सुंदर कुंडलों को धारण किये, कांतिपूर्ण मुख से युक्त, बंद आँखों वाले भोज कुमार के मस्तक को बनवाया और उसका छोटा भाई उसे राजमहल में लेजाकर राजा से प्रणाम करके बोला - 'श्रीमन् ने जो आज्ञा दी थी, उसका पालन हो गया।' ततो राजा च पुत्रवधं ज्ञात्वा तमाह - 'वत्सराज, खड्गप्रहारसमये तेन पुत्रेण किमुक्तम्' इति । वत्सस्तत्पत्रमदात्। राजा स्वभाक्षौकरेण दीपमानीय तानि पत्राक्षराणि वाचयति - 'मान्धाता च महीपतिः कृतयुगालङ्कारभूतो गतः सेतुर्येन महोदधौ विरचितः क्वासौ दशास्यान्तकः । अन्ये चापि युधिष्ठिरप्रभृतयो याता दिवं भूपते नैकेनापि समं गता वसुमती मुञ्ज त्वया यास्यति' ॥ ५८ ॥ राजा च तदर्थं ज्ञात्वा शय्यातो भूमौ पपात । तब कुमार का वध हुआ जानकर राजा ने उससे कहा- 'वत्सराज, खड्ग-प्रहार के समय उस पुत्र ने कुछ कहा?' वत्स ने वह पत्र दे दिया।
भोजप्रबन्धः १७ राजा अपनी पत्नी के हाथ से दीपक लेकर पत्र में लिखे उन अक्षरों को बाँचने लगा—सत्युग का अलंकारस्वरूप धरती का स्वामी मांधाता चला गया; जिसने महान् समुद्र पर पुल बना दिया, वह दशानन रावण का अंत करनेवाला (राम) भी कहाँ है? हे धरती के मालिक, अन्य जो युधिष्ठिर आदि थे, वे भी द्युलोक गये; यह धनधान्यपूर्ण वसुंधरा धरती किसी के साथ न गयी; हे मुंज, तेरे साथ जायगी । राजा उसके अर्थ को समझकर शय्या से धरती पर गिर पड़ा । ततश्च देवीकरकमलचालितचेलाञ्चलानिलेन ससंज्ञो भूत्वा 'देवि, मा मां स्पृश हा हा पुत्र घातिनम्' इति विलपन्कुरर इव द्वारपालानानाय्य 'ब्राह्मणाननयत' इत्याह। ततः स्वाज्ञया समागतान् ब्राह्मणान्नत्वा मया 'पुत्रो हतः, तस्य प्रायश्चित्तं वदध्वम्' इति वदन्तं ते तमूचुः- 'राजन्, सहसा वह्निमाविश' इति । तत्पश्चात् महारानी के कर कमलों द्वारा डुलाये जाते साड़ी के आँचल से उत्पन्न वायु से चैतन्य पाकर राजाने 'देवि, मुझ पुत्र के हत्यारे का स्पर्श मत करो'—इस प्रकार कुरर पक्षी की भाँति विलाप करते हुए द्वारपालों को बुलवा कर कहा कि ब्राह्मणों को ले आओ । तत्पश्चात् अपनी आज्ञा से आये ब्राह्मणों को प्रणाम करके बोला कि मैंने पुत्र की हत्या की है, उसका प्रायश्चित्त बताओ । ऐसा कहते उससे ब्राह्मण बोले—'राजन्, तुरंत आग में प्रवेश करो ।' ततः समेत्य बुद्धिसागरः प्राह—'यथा त्वं राजाधमः, तथैवामात्या- धमो वत्सराजः। तव किल राज्यं दत्त्वा सिन्धुलनृपेण तेन त्वदुत्सङ्गे भोजः स्थापितः। तच्च त्वया पितृव्येणान्यत्कृतम् । कतिपयदिवासस्थायिनि मदकारिणि यौवने दुरात्मानः । विदधति तथापराधं जन्मैव यथा वृथा भवति ॥ ३९ ॥ सन्तस्तृणोत्सारणमुत्तमाङ्गात्सुवर्णकोट्यर्पणमामनन्ति । प्राणव्ययेनापि कृतोपकाराः खलाः परे वैरमिवोद्वहन्ति ॥४०॥ उपकारश्चापकारो यस्य व्रजति विस्मृतिम् । पाषाणहृदयस्यास्य जीवतीत्यभिधा मुधा ॥ ४१ ॥ २ भोज०
१८ भोजप्रबन्धः यथाङ्कुरः सुसूक्ष्मोऽपि प्रयत्नेनाभिरक्षितः । फलप्रदो भवेत्काले तथा लोकः सुरक्षितः ॥ ४२ ॥ हिरण्यधान्यरत्नानि धनानि विविधानि च । तथान्यदपि यत्किञ्चित्प्रजाभ्यः स्युर्महीभृताम् ॥ ४३॥ राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापपराः सदा । राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः' ॥ ४४ ॥ तब बुद्धि सागर आकर बोला—'जैसा तू नीच राजा है, वैसा ही नीच मंत्री वत्सराज है। तुझे राज्य देकर उस सिधुल राजा ने भोज को तेरी गोद में स्थापित किया था और तुझ चाचा ने उसका उलटा कर दिया । दुरात्मा व्यक्ति थोड़े से दिन ठहरनेवाली, मद उत्पन्न करनेवाली जवानी में ऐसा अपराध कर बैठते हैं कि उससे जन्म ही व्यर्थ हो जाता हैं । सज्जन सिर से तिनका हटा देने को भी सोने की मुहरों का अर्पण मानते है और दुर्जन प्राण देकर उपकार करनेवाले के साथ भी वैर ही निबाहते हैं । जो उपकार अथवा अपकार को भूल जाता है, उस पत्थर जैसे कठोर व्यक्ति को यह प्रतीति कि 'वह जी रहा है,' व्यर्थ है । जैसे प्रयत्नपूर्वक रखाया गया अत्यंत छोटा अंकुर भी—यथा समय फल देनेवाला हो जाता है, वैसे ही सुरक्षित व्यक्ति भी । स्वर्ण, अन्न, रत्न और भाँति-भाँति के धन तथा और जो कुछ भी है, वह सब राजाओं को प्रजा से ही प्राप्त होता है । ( प्रजाजन ) राजा के धर्मात्मा होने पर धर्मात्मा तथा पापी होने पर पापी होते हैं; प्रजा राजा का ही अनुकरण करती है । जैसा राजा, वैसी प्रजा ।' ततो रात्रावेव वह्निप्रवेशनं निश्चिते राज्ञि सर्वे (१) सामन्ताः पौराश्च मिलिताः । 'पुत्रं हत्वा पापभयाद्भीतो नृपतिर्वह्निं प्रविशति' इति (२) किंवदन्ती सर्वत्राजनि । ततो बुद्धिसागरो द्वारपालमाहूय 'न केनापि भूपालभवनं प्रवेष्टव्यम्' इत्युक्त्वा नृपमन्तःपुरे निवेश्य सभायामेकाकी सन्नुपविष्टः । ततो राजमरणवार्तां श्रुत्वा वत्सराजः सभागृहमागत्य बुद्धिसागरं नत्वा शनैः प्राह—'तात, मया भोजराजो (१) समन्ताद्भूवाः सामन्ताः । (२) लोकप्रवादः ।
[Header] भोजप्रबन्धः १६ रक्षितः' इति। बुद्धिसागरश्च कर्णे तस्य किमप्यकथयत्। तच्छ्रुत्वा वत्सराजश्च निष्क्रान्तः। तत्पश्चात् रात में ही राजा का अग्नि प्रवेश निश्चित हो जाने पर सब सरदार और नगरवासी एकत्र हो गये। 'पुत्र की हत्या करके पाप से डरा राजा अग्नि में प्रवेश कर रहा है,'--यह अफवाह सब जगह फैल गयी। तब बुद्धिसागर ने द्वारपाल को बुलाकर कहा कि 'कोई राजभवन में न घुसपाये,' और यह कह कर राजा को रनिवास में प्रविष्ट कराके स्वयम् अकेला सभागृह में आ बैठा। तदनंतर राजा की मृत्यु से संवद्ध समाचार सुनकर वत्सराज. सभागृह में पहुँच कर बुद्धिसागर को प्रणाम करके धीरे से बोला--'तात, मैंने भोजराज को बचा लिया है।' बुद्धिसागर ने उसके कान में कुछ कहा। वह सुनकर वत्सराज चला गया। ततो मुहूर्तेन कोऽपि करकलितदन्तीन्द्रदन्तदण्डो विरचितप्रत्यग्र- जटाकलापः कर्पूरकरम्बितभसितोद्धूलितसकलतनुर्मूर्तिमान्मन्मथ इव स्फटिककुण्डलमण्डितकर्णयुगलः कौशेयकौपीनो मूर्तिमांश्चन्द्रचूड इव सभां कापालिकः समागतः। तं वीक्ष्य बुद्धिसागरः प्राह—'योगीन्द्र, कुत आगम्यते। कुत्र ते निवेशश्च। कापालिके त्वयि यच्चमत्कारकारी कला- विशेष औषधविशेषोऽप्यस्ति।' तदनंतर दो घड़ी बाद गजराज के दांत के दण्ड से हाथ को सुशोभित किये, सामने जटाओं का जूड़ा बाँधे, संपूर्ण देह पर कपूर मिली भस्म रमाये साक्षात् कामदेव के समान प्रतीत होता, स्फटिक के कुंडलों से कान अलंकृत किये, रेशमी कौपीन बाँधे, चूड़ा में चंद्रधारण करनेवाले साक्षात् महादेव के समान एक कापालिक योगी सभा में आया। उसे देखकर बुद्धिसागर ने पूछा--'योगिराज, कहाँ से आना हुआ है और आपका निवासस्थान कहाँ है? कपाली योगी आपके पास कोई चमत्कारी विशेष कला अथवा कोई विशेष औषध भी है?' योगी प्राह— देशे देशे भवनं भवने भवने तथैव भिक्षान्नम् । सरसि च नद्यां सलिलं शिव शिव तत्त्वार्थयोगिनां पुंसाम् ॥४५॥
२० भोजप्रबन्धः
ग्रामे ग्रामे कुटी रम्या निर्झरे निर्झरे जलम् । भिक्षायां सुलभं त्वान्नं विभवैः किं प्रयोजनम् ॥ ४६ ॥ देव, अस्माकं नैको देशः । सकलभूमण्डलं भ्रमामः । गुरूपदेशे तिष्ठामः । निखिलं भुवनतलं करतलामलकवत्पश्यामः । सर्पदष्टं विष- व्याकुलं रोगग्रस्तं शस्त्राभिपन्नशिरस्कं कालशिथिलितं तात, तत्क्षणादेव विगतसकलव्याधिसञ्चयं कुर्मः इति ।
योगी ने कहा-शिव के कल्याणकारीतत्त्वार्थ को जानने वाले योगी पुरुषों का प्रत्येक देश में घर है और प्रत्येक घर में ही भिक्षा का अन्न है और सरोवर और नदी में जल हैं । गांव-गांव में रमणीय कुटी है, प्रत्येक झरने में जल है, भिक्षा में अन्न सरलता से प्राप्य है; उन्हें ऐश्वर्यों से क्या प्रयोजन ! देव, हमारा एक देश नहीं है। समस्त भूमंडल में भ्रमण करते हैं। गुरु के उपदेश पर विश्वास करते हैं। संपूर्ण भुवनमंडल को हथेली पर धरे आँवले के समान देखते हैं। साँप के काटे, विष से छटपटाते, रोगी, शस्त्र द्वारा कटे सिर वाले, मौत से ठंडे पड़े को हे तात, हम क्षण भर में संपूर्ण रोगों से रहित कर देते हैं।
राजापि कुड्यन्तर्हित एव श्रुतसकलवृत्तान्तः सभामागतः कापा- लिकं दण्डवत्प्रणम्य, योगीन्द्र, रुद्रकल्प, परोपकारपरायण, महापा- पिना मया हतस्य पुत्रस्य प्राणदानेन मां रक्ष' इत्याह । अथ कापालिकोऽपि 'राजन्, मा भैषीः । पुत्रस्ते न मरिष्यति । शिवप्रसादेन गृहमेष्यति । परं श्मशानभूमौ बुद्धिसागरेण सह होमद्रव्याणि प्रेषय' इत्यवोचत् । ततो राजा 'कापालिकेन यदुक्तं तत्सर्वं तथा कुरु' इति बुद्धिसागरः प्रेषितः ।
ओट में खड़ा राजा भी समस्त वृत्तांत सुन कर सभा में आ गया और कापालिक को दंडवत् प्रणाम करके बोला- 'रुद्र के समान, परोपकार में लग्न योगिराज, मुझ महापापी द्वारा मार डाले गये पुत्र की रक्षा उसे प्राण देकर कीजिए।' कापालिक ने भी कहा- 'राजन्, मत डर । तेरा पुत्र नहीं मरेगा। शिव के प्रसाद से घर आयेगा। परंतु श्मशान भूमि में बुद्धिसागर के
.भोजप्रबन्धः २१
साथ होम की सामग्री भेज ।' सो राजाने यह कह कर बुद्धिसागर को भेज दिया कि कापालिक ने जो कहा है, वैसा ही सब करो । ततो रात्रौ गूढरूपेण भोजोऽपि तत्र नदीपुलिने नीतः । 'योगिना भोजो जीवितः' इति प्रथा च समभूत् । ततो गजेन्द्रारूढो वन्दिभिः स्तूयमानो भेरीमृदङ्गादिघोषैर्जगद्बधिरीकुर्वन्पौरामात्यपरिवृतो भोज- राजो राजभवनमगात् । राजा च तमालिङ्ग्य रोदिति । भोजोऽपि रुदन्तं मुञ्जं निवार्यस्तौषीत् । तदनंतर रात में गुप्त रूप से भोज भी नदी तट पर ले जाया गया । 'योगी द्वारा भोज जिला दिया गया है,' ऐसी प्रसिद्धि हो गयी । तत्पश्चात् गजराज पर चढ़ा, वंदियों द्वारा प्रशंसित होता, नगाड़े और मृदंग आदि के घोषों से संसार को बहिरा करता, नगरवासियों और मंत्रियों से घिरा भोज राज राजमहल में पहुँचा । राजा उसका आलिंगन करके रोने लगा । भोजने भी रोते हुए मुंज को चुपकार उसकी स्तुति की । ततः सन्तुष्टो राजा निजसिंहासने तस्मिन्निवेशयित्वा छत्रचामराभ्यां भूषयित्वा तस्मै राज्यं ददौ । निजपुत्रेभ्यः प्रत्येकमेकैकं ग्रामं दत्त्वा परमप्रेमास्पदं जयन्तं भोजानिकाशे निवेशयामास । ततः परलोकपरि- त्राणो मुञ्जोऽपि निजपट्टराज्ञीभिः सह तपोवनभूमिं गत्वा परं तपस्तेपे । ततो भोजभूपालश्च देवब्राह्मणप्रसादाद्राज्यं पालयामास । इति भोजराज्य राज्यप्राप्तिप्रबन्धः । तत्पश्चात् संतुष्ट हुए राजा ने अपने उस सिंहासन पर बैठा कर और छत्र- चामर (आदि राज चिह्नों) से सुशोभित कर उसे (भोज को) राज्य दे दिया । अपने प्रत्येक पुत्र को एक-एक गाँव देकर अपने सबसे प्रिय जयंत कुमार को राज भोज के निकट रख दिया । तदनंतर परलोक सुधारने की इच्छा करता मुंज भी अपनी पटरानियों सहित तपोवन भूमि में जाकर परम तप करने लगा । उसके बाद देवताओं और ब्राह्मणों के प्रसाद से राजा भोज राज्य का पालन करने लगा । राजा भोज को राज्य मिलने की कथा समाप्त । —:०:—