भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
७८ भोजप्रबन्धः ११- विदुषां सत्कारः-कतिपयकथा कियत्यपि कालेऽतिक्रान्ते राजा कदाचित्सन्ध्यामालोक्य प्राह- 'परिपतति पयोनिधौ पतङ्गः' ततो बाणः प्राह- 'सरसिरुहामुदरेषु मत्तभृङ्गः।' ततो महेश्वरकविः-- 'उपवनतरुकोटरे विहङ्गः' ततः कालिदासः प्राह-- 'युवतिजनेषु शनैःशनै (१) रनङ्गः' ॥ १६१ ॥ तुष्टो राजा लक्षं लक्षं ददौ। चतुर्थचरणस्य लक्षद्वयं ददौ। कुछ समय व्यतीत हो जाने पर कभी राजा ने संध्याकाल को देखकर कहा- 'गिरता हैं जल निधि में पतंग (सूर्य)।' तब बाण ने कहा-'सरसिज-उदरों में मत्तभृंग।' इस पर महेश्वर कवि बोला-'उपवन-तरु-कोटर में विहंग।' अन्त में कालिदास ने कहा-'तरुणी जन में क्रम-क्रम अनंग।' संतुष्ट राजा ने लाख-लाख मुद्राएँ दीं, चौथे चरण पर दो लाख दिये कदाचिद्राजा बहिरुद्यानमध्ये मार्गे प्रत्यागच्छन्तं कमपि विप्रं ददर्श । तस्य करे चर्ममयं कमण्डलुं वीक्ष्य तं चातिदरिद्रं ज्ञात्वा मुखश्रिया विराजमानं चावलोक्य तुरङ्गं तदग्रे निधायाह- विप्र, चर्मपात्रं किमर्थं पाणौ वहसि' इति। स च विप्रो नूनं मुखशोभया मृदूक्त्या च भोज इति विचार्याह-- 'देव, वदान्यशिरोमणौ भोजे पृथ्वीं शासति लोहताम्राभावः समजति । तेन चर्ममयं पात्रं वहामि, इति। राजा-- 'भोजे शासति लोहताम्राभावे को हेतुः।' तदा विप्रः पठति-- अस्य श्रीभोजरोजस्य द्वयमेव सुदुर्लभम्। शत्रूणां शृङ्खलैर्लोहं ताम्रं शासनपत्रकैः' ॥ १६२ ॥ ततस्तुष्टो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। (१) मन्मथः ।
भोजप्रबन्धः ७६ कभी राजा ने बाहरी उद्यान के मार्ग की ओर आते किसी विप्र को देखा। उसके हाथ में चमड़े का कमंडलु देख उसे अत्यन्त दरिद्र समझा किंतु उसके मुख की शोभा युक्त देख घोड़ा उसके आगे खड़ा करके कहा- 'ब्राह्मण, चमड़े का पात्र क्यों लिये हो ?' मुख की शोभा और कथन की मृदुता के कारण यह समझ कर कि निश्चय ही यह राजा भोज है, उस ब्राह्मण ने कहा- 'महाराज, दाता शिरोमणि भोज के धरती का शासन करते लोहे और ताँबे का अभाव हो गया है, इससे चमड़े का पात्र रखे हुए हूँ।' राजा- 'भोज के शासन में लोहे और ताँवे का अभाव किस कारण से हुआ ? तो ब्राह्मण ने पढ़ा- 'दो पदार्थ अति दुर्लभ हैं श्री भोजराज के शासन में, लोहा शत्रु-निमित्त बेड़ियों, ताम्र दान पत्रों के कारण ।' तब संतुष्ट राजा ने प्रत्येक अक्षर पर लाख-लाख मुद्राएँ दीं। कदाचिद् द्वारपालः प्राह- 'धारेन्द्र, दूरदेशादागतः कश्चिद्विद्वान्- द्वारि तिष्ठति, तत्पत्नी च। तत्पुत्रः सपत्नीकः अतोऽतिपवित्रं विद्वत्कुटुम्बं द्वारि तिष्ठति' इति । राजा- 'अहो गरीयसी शारदाप्रसादपद्धतिः ।' तस्मिन्नवसरे गजेन्द्रपाल आगत्य राजानं प्रणम्य प्राह- 'भोजेन्द्र, सिंह- लदेशाधीश्वरेण सपादशतं गजेन्द्राः प्रेषिताः षोडश महामणयश्च ।' ततो वाणः प्राह- 'स्थितिः कविनामिव कुञ्जराणां स्वमन्दिरे वा नृप-मन्दिरे वा। गृहे गृहे किं मशका इवैते भवन्ति भूपालविभूषिताङ्गाः ॥१६३॥ तभी आकर द्वार पाल बोला- 'हे धारा के स्वामी, दूर देश से आया कोई विद्वान् उसकी पत्नी और पत्नी सहित उसका पुत्र द्वार पर उपस्थित हैं।' राजा ने विचारा- 'अहो, शारदा देवी अत्यन्त प्रसन्न हैं।' उसी अवसर पर गजराजों के पालक ने आकर प्रणाम करके कहा- 'महाराज भोज, सिंहल देश के अधिराज ने सवा सौ हाथी और सोलह महामणियाँ भेजी है।' तो वाण ने कहा- हाथियों की भाँति ही कवियों की स्थिति होती है- अपने घर में रहें अथवा राज मन्दिर में। परंतु हे धरती के पालक, ये अपने अंगों को सजा कर मच्छरों की भाँति घर-घर डोलते हैं।
ततो राजा गजानवलोकनाय बहिरगात् । ततस्तद्विद्वत्कुटुम्बं वीक्ष्य चोलपण्डितो राज्ञः प्रियोऽहमिति गर्वं दधार । यन्मया राजभवनमध्यं गम्यते । विद्वत्कुटुम्बं तु द्वारपालज्ञापितमपि बहिरास्ते । तदा राजा तच्चेतसि गर्वं विदित्वा चोलपण्डितं सौधाङ्गनान्निःसारितवान्। तब राजा हाथियों का निरीक्षण करने के लिए बाहर गया । तो उस विद्वान् के कुटुम्ब को देख चोल पंडित को यह अभिमान हुआ कि मैं राजा का प्यारा हूँ कि मैं राज भवन के मध्य हूँ और विद्वान् का कुटुम्ब तो द्वार पाल के द्वारा सूचित किया जाने पर भी बाहर ही है । तब राजा ने उसके चित्त में गर्व उत्पन्न हुआ जान चोल पंडित को प्रासाद के आँगन से निकलवा दिया । काशीदेशवासी कोऽपि तण्डुलदेवनामा राज्ञे 'स्वस्ति' इत्युक्त्वाति- ष्ठत् । राजा च तं पप्रच्छ-‘सुमते, कुत्र निवासः ।' तण्डुलदेवः— वर्तते यत्र सा वाणी कृपाणीरिक्तशाखिनः । श्रीमन्मालवभूपाल तत्र देशे वसाम्यहम्' ॥ १६४ ॥ तुष्टो राजा तस्मै गजेन्द्रसप्तकं ददौ । काशी देश का रहने वाला एक तंडुल देवनाम का कवि राजा के प्रति 'स्वस्ति' कह कर उपस्थित हुआ । राजा ने उससे पूछा-‘हे सुबुद्धि, तुम्हारा निवास कहाँ है ? तंडुल देव-‘हे मालव धरणी के पालक, मैं उस देश की वासी हूँ, जहाँ कृपाण के द्वारा शाखाओं का उन्मूलन होने पर भी वाणी विद्यमान रहती है। संतुष्ट हो राजा ने उसे सात हाथी दिये । ततः कोऽपि विद्वानागत्य प्राह— 'तपसः सम्पदः प्राप्यास्तत्तपोऽपि न विद्यते । येन त्वं भोज कल्पद्रुग्दृग्गोचरमुपैष्यसि' ॥ १६५ ॥ तस्मै राजा दशगजेन्द्रान्ददौ । तदनन्तर एक विद्वान् ने आकर कहा— 'तप से संपत्तियाँ प्राप्त होती है, किन्तु मेरे पास वह तप भी नहीं है, जिससे कि कल्पवृक्ष के समान भोजराज, आप दृष्टि गोचर हों ।' राजा ने उसे दस हाथी दे दिये । ततः कश्चिद्वृद्धब्राह्मणपुत्रो भूम्भारवं कुर्वाणोऽभ्येति । ततः सर्वे सम्भ्रा- न्ताः 'कथं भूम्भारवं करोषि' इति। राज्ञा स्वदृग्गोचरमानीतः पृष्टः । स प्राह-
भोजप्रबन्धः ८१ः 'देव (१) त्वद्दानपाथोधौ दारिद्र्यस्य निमज्जतः । न कोऽपि हि करालम्बं दत्ते मत्तेभदायक ॥ १६६ ॥ ततस्तुष्टो राजा तस्मै त्रिंशद्गजेन्द्रान्प्रादात् । तत्पश्चात् एक ब्राह्मण का बेटा फुक्का-फाड़ रोता आया । सभी लोग आश्चर्य में पड़ गये कि यह क्यों फुक्का-फाड़ रो रहा है ? राजा ने अपने संमुख बुलाया और पूछा । वह बोला— 'हे मतवाले हाथियों के दाता महाराज, आपके दान रूपी जलनिधि में डूबते हुए दारिद्र्य को कोई हाथ का सहारा भी नहीं दे रहा है ।' तो प्रसन्न हुए राजा ने उसे तीस गजराज दे डाले । ततः प्रविशति पत्नीसहितः कोऽपि विलोचना विद्वान् 'स्वस्ति' इत्यु- क्त्वा प्राह— 'निजानपि गजान्भोजं ददानं प्रेक्ष्य पार्वती । गजेन्द्रवदनं(२)पुत्रं रक्षत्यद्य पुनः पुनः' ॥ १६७ ॥ ततो राजा सप्त गजांस्तस्मै ददौ । तदनंतर कोई नेत्र हीन पंडित पत्नी सहित आया और 'स्वस्ति' कहकर बोला— 'अपने हाथियों को भी दे डालने के इच्छुक भोज को देखकर पार्वती आज अपने गजराज के मुखवाले पुत्र की रक्षा बार-बार कर रही है ।' तो राजा ने सात हाथी उसे दे दिये । ततो राजा विद्वत्कुटुम्बं तदैव पुरतः स्थितं वीक्ष्य ब्राह्मणं प्राह— 'क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ।' तब राजा ने विद्वान् के कुटुम्ब को पूर्वोक्त रूप में ही सम्मुख खड़ा देख कहा—'बड़े जनों की क्रिया सिद्धि पौरुष से होती है, न कि साधन से ।' वृद्धद्विजः प्राह— 'घटो जन्मस्थानं मृगपरिजनों भूर्जवसनो वने वासः कन्दान्दिकमशनमेवंविधगुणाः । अगस्त्यः पाथोधिं यदकृत कराम्भोजकुहरे क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे' ॥ (१) त्वद्दानसमुद्रे । (२) गजाननमिति यावत् । ६ भोज०
८२ भोजप्रबन्धः ततो राजा बहुमूल्यानपि षोडशमणींस्तस्मै ददौ । जन्म स्थान है घड़ा, परिजन मृग, भोज पत्र के वस्त्र, वास कानन में, कंद मूल भोजन है—ऐसे साधन वाले मुनि अगस्त्य ने करसरोज के संपुट में रखकर जलनिधि को पी डाला । बड़े जनों की क्रिया सिद्धि पौरुष से होती है न कि साधन से । तो राजा ने बहुमूल्य सोलह मणियाँ भी उसे दे दीं । ततस्तत्पत्नीं प्राह राजा—'अम्ब, त्वमपि पठ ।' देवी— 'रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः सप्त तुरगा निरालम्बो मार्गश्चरणविकलः सारथिरपि । रविर्यात्येवान्तं प्रतिदिनमपारस्य नभसः क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे' ॥ १६६ ॥ राजा तुष्टः सप्तदश गजान्सप्त रथांश्च तस्यै ददौ । तत्पश्चात् राजा ने उसकी पत्नी से कहा—'माँ तुम भी पढ़ो ।' उस देवी ने पढ़ा— रथ का चक्का एक, सांप की रस्सी में बँधे सात घोड़े, निराधार है पंथ चरणहीन है सारथि-रथ चालक, सूरज प्रतिदिन ही जाता है अन्त-भाग तक विस्तृत नभ के । बड़े जनों की क्रिया सिद्धि पौरुष से होती है, न कि साधन से । संतुष्ट राजा ने सत्रह हाथी और सात रथ उसे दिये । ततो विप्रपुत्रं प्राह राजा —'विप्रसुत, त्वमपि पठ' । विप्रसुतः— 'विजेतव्या लङ्का चरणतरणीयो जलनिधि- र्विपक्षः पौलस्त्य रणभुवि सहायाश्च कपयः । पदातिर्मर्त्योऽसौ सकलमवधीद्राक्षसकुलं क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥ १७० ॥ तुष्टो राजा विप्रसुतायाष्टादश गजेन्द्रान्प्रादात् । तब राजा ने ब्राह्मण पुत्र से कहा—'हे विप्रसुत, तुम भी पढ़ो। ब्राह्मण के बेटे ने पढ़ा— लंका नगरी जेय थी, पयोनिधि चरणों से तिरना था, प्रति पक्षी पुलस्त्य का बेटा रावण था, संग्राम भूमि में सहायक थे बंदर, पैदल मानव राम, उन्होंने संहारा सारा राक्षस कुल, बड़े जनों की क्रियासिद्धि पौरुष से होती है; न कि साधन से । राजा संतुष्ट होकर ब्राह्मण पुत्र को अठारह गजराज दिये ।
भोजप्रबन्धः ८३ ततः सुकुमारमनोझनिखिलाङ्गावयवालङ्कृतां शृङ्गाररसोपजातमूर्ति- मेव चम्पकलतामिव लावण्यगात्रयष्टिं विप्रस्नुषां वीक्ष्य 'नूनं भारत्याः काऽपि लीलाकृतिरियम्' इति चेतसि नमस्कृत्य राजा प्राह—'मातः त्व- मप्याशिषं वद । विप्रस्नुषा—'देव, शृणु । धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी चञ्चलदृशां दृशां कोणो बाणः सुहृदपि जडात्मा हिमकरः । स्वयं चैकोऽ(१)नङ्गः सकलभुवनं व्याकुलयति क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥ १७१ ॥ चमत्कृतो राजा लीलादेवीभूषणानि सर्वाण्यादाय तस्यै ददौ । अन- व्यांश्च सुवर्णमौक्तिकवैदूर्यप्रवालांश्च प्रददौ । तदनन्तर सुकुमार और मनोहर समस्त अंगों से सुशोभित, मानो शृंगार रस की उपजात मूर्ति के सदृश चंपक की लता के समान सुन्दर देह- यष्टि धारिणी ब्राह्मण की पुत्र वधू को देख कर और 'निश्चय ही यह वाग्देवी की कोई लीलामयी रचना हैं' ऐसा मान मन ही मन नमस्कार करकेउससे राजा ने कहा—'माँ, तुम भी कुछ आशीर्वचन स्वरूप कहो ।' ब्राह्मण-पुत्र-वधू ने कहा— 'महाराज, सुनिए— फूलों का धनु, प्रत्यंचा मधुकर श्रेणी की, चपल नयनिओं के कटाक्ष के बाण, जडात्मा चंद्र मित्र है, स्वयम् अकेला अंगहीन यह काम सकल भुवन को है व्याकुल कर देता, बड़े जनों की क्रिय! सिद्धि होती पौरुष से, न कि साधन से । चमकृत राजा ने लीला देवी के सब आभूषण लेकर उसे दे डाले और तदनन्तर सोना, मोती, वैदूर्य ( लहसुनिया ) और मूँगे भी दिये । ततः कदाचित्सीमन्तनामा कविः प्राह— 'पन्थाः संहर दीर्घतां त्यज निजं तेजः कठोरं रवे श्रीमन्विन्ध्यगिरे प्रसीद सदयं सद्यः समीपे भव । इत्थं दूरपलायनश्रमवतीं दृष्ट्वा निजप्रेयसीं श्रीमन्भोज तव द्विषः प्रतिदिनं जल्पन्ति मूर्च्छन्ति च ॥ १७२ ॥ ( १ ) देहरहित इति यावत् ।
८४ भोजप्रबन्धः तत्पश्चात् कभी सीमंत नामक कवि ने कहा— 'हे मार्ग, तुम लम्बाई को त्याग दो, हे सूर्य, तुम अपने कठोर तेज को छोड़ दो, हे श्रीमान् विन्ध्याचल, तुम प्रसन्न होकर दयापूर्वक शीघ्र ही निकट हो जाओ'—हे राजा भोज, आपके शत्रु (डर कर) दूर भागने के कारण थकी अपनी प्रेयसी को देखकर प्रतिदिन ऐसी बकवास करते हैं और मूर्च्छित हो जाते हैं।' तस्मिन्नेव क्षणे कश्चित्सुवर्णकारः प्रान्तेषु पद्मरागमणिमण्डितं सुवर्णभाजनमादाय राज्ञः पुरो मुमोच। ततो राजा सीमन्तकविं प्राह— 'सुकवे, इदं भाजनं कामपि श्रियं दर्शयति।' ततः कविराह— 'धारेश त्वत्प्रतापेन पराभूत(१)स्त्विषांपतिः। सुवर्णपात्रव्याजेन देव त्वामेव सेवते' ॥ १७३॥ ततस्तुष्टो राजा तदेव पात्रं मुक्ताफलैरापूर्य प्रादात्। उसी क्षण एक सुनार ने चारों ओर पद्म राग मणि-जड़ा सोने का एक पात्र लाकर राजा के सम्मुख रखा। तब राजा ने सीमन्त कवि से कहा— 'हे सुकवे, देखो यह वरतन कितना सुन्दर है।' तो कवि ने कहा— 'हे धारा के स्वामी, आपके प्रताप के सम्मुख हारा सूर्य सुवर्ण पात्र के मिस हे देव, आपकी सेवा कर रहा है।' तो संतुष्ट होकर राजा ने उसी पात्र को मोतियों से भर कर उसे दे दिया। कदाचिद्राजा मृगया रसेन पुरः पलायमानं वराहं दृष्ट्वा स्वयमेका- कितया दूरं वनान्तमासादितवान्। तत्र कञ्चन द्विजवरमवलोक्य प्राह— 'द्विज, कुत्र गन्तासि।' द्विजः—'धारानगरम्।' भोजः—'किमर्थम्।' द्विजः—'भोजं द्रष्टुं द्रविणेच्छया। स पण्डिताय दत्ते। अहमपि मूर्खं न याचे। भोजः—विप्र, तर्हि त्वं विद्वान कविर्वा। द्विजः—महाभाग, कविरहम्। (१) सूर्यः।
भोजप्रबन्धः ८५ भोजः-तर्हि किमपि पठ । द्विजः--भोजं विना मत्पदसरणिं न कोऽपि जानाति । भोजः--ममाप्यमरवाणीपरिज्ञानमस्ति । राजा च मयि स्निह्यति । त्वद्- गुणं च श्रावयिष्यामि । किमपि कलाकौशलं दर्शय । विप्रः-किं वर्णयामि । राजा--कलमानेतान्वर्णय । विप्रः-'कलमाः पाकविनम्रा मूलतलाघ्रातसुरभिकह्लाराः । पवनाकम्पितशिरसः प्रायः कुर्वन्ति परिमलश्लाघाम्' ॥ १७४ ॥ राजा तस्मै सर्वाभरणान्युत्तार्य ददौ । एक बार आखेट-रस में मग्न राजा भागते सूअर को देख कर स्वयम् अकेला ( उसका पीछा करता ) दूर वन में जा पहुँचा । वहाँ एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को देख कर बोला-- द्विज, कहाँ जा रहे हो ? द्विज--धारानगर । राजा-किसलिए ? द्विज-धन पाने की इच्छा से भोज के दर्शनार्थ । वह पंडित को देता है और मैं भी मूर्ख से याचना नहीं करता । भोज-ब्राह्मण, तो तुम विद्वान् हो अथवा कवि हो । द्विज-हे महाभाग, मैं कवि हूँ । भोज-तो कुछ पढ़ो । द्विज-भोज के अतिरिक्त मेरी कविता का अर्थ कोई नहीं समझ सकता । राजा-मुझे भी देववाणी का ज्ञान है और मुझसे राजा स्नेह करता है । मैं तुम्हारे गुण उसे सुनाऊँगा । कुछ अपनी कला का कौशल दिखाओ । द्विज--क्या वर्णन करूँ । राजा-इन धानों का वर्णन करो । द्विज--पकजाने से झुके हुए धानों की जड़ में शुष्क कमल दल की सुगंध है । करते हैं श्लाघा परिमल की मंद पवन में झूम-झूम कर । राजा ने उसे सब आभूषण उतार कर दे दिये ।
८६ भोजप्रबन्धः ततः कदाचित्कुम्भकारवधू राजगृहमेंत्य द्वारपालं प्राह--द्वारपाल, राजा द्रष्टव्यः।' स आह--'किं ते राज्ञा कार्यम् । सा चाह--'न तेऽभि- धास्यामि। नृपाय एव कथयामि।' स सभायामागत्यप्राह--'देव, कुम्भ- कारप्रिया काचिद्राज्ञो दर्शनाकाङ्क्षिणी न वक्ति मत्पुरः कार्यम्। भव- त्पुरतः कथयिष्यति।' राजा--'प्रवेशय।' सा चागत्य नमस्कृत्य वक्ति-- 'देव मृत्खननाद्दृष्टं निधानं वल्लभेन मे। स पश्यन्नेव तत्रास्ते त्वां ज्ञापयितुमभ्यगाम्' । १७५॥ तदनंतर कभी कुम्हार की पत्नी राज भवन पहुँचकर द्वारपाल से बोली- 'द्वारपाल, राजा के दर्शन करना चाहती हूँ।' उसने पूछा-'राजा से तेरा क्या काम है?' वह बोली-'तुझसे नहीं कहूँगी। राजा के संमुख ही कहूँगी।' वह सभा में आकर बोला-'महाराज, आप के दर्शन की कांक्षिणी एक कुम्हारिन मुझे अपना कार्य नहीं बताती, आपके संमुख ही कहेगी। राजा ने कहा-'प्रवेश कराओ।' वह आकर और नमस्कार करके बोली- 'महाराज, मेरे प्रियतम ने मिट्टी खोदने पर धन देखा है, वे उसकी देख- रेख करते वहीं हैं, मैं आप से निवेदन करने आयी हूँ।' राजा च चमत्कृतो निधानकलशमानयामास। तद्द्वारमुद्घाट्य याव त्पश्यति राजा तावत्तदन्तर्वर्तिद्रव्यमणिप्रभामण्डलमालोक्य कुम्भकारं पृच्छति--'किमेतत्कुम्भकार।' स चाह-- 'राजचन्द्रं समालोक्य त्वां तु भूतलमागतम्। (१) रत्नश्रेणिमिषान्मन्ये नक्षत्राण्यभ्युपागमन्' ॥ १७६ ॥ राजा कुम्भकारमुखाच्छ्लोकं लोकोत्तरमाकर्ण्य चमत्कृतस्तस्मै सर्वं ददौ। आश्र्चर्यान्वित राजा ने धन का कलसा मँगवाया और उसका मुँह खोल कर जैसे ही उसे देखा, वैसे ही उसके भीतर रखे धन और मणियों के प्रभा- मंडल को देखकर कुम्भकार से पूछा--'हे कुंभकार, यह क्या है?' वह बोला- 'धरणी तल पर आये आप राजा रूपी चन्द्रमा को देखकर रत्नों के रूप से मानो नक्षत्र आ गये हैं।' ( १ ) रत्नपङ्क्तिव्याजेनेत्यर्थः ।
राजा ने कुम्हार के मुँह से लोकोत्तर श्लोक सुनकर चमत्कृत हो उसे वह सब धन दे दिया । —:०:— ( १२ ) भोजस्य विक्रमादित्यसमं दानम् । ततः कदाचिद्राजा रात्रावेकाकी सर्वतो नगरचेष्टितं पश्यन्पौरगिर- माकर्णयंश्चचार । तदा क्वचिद्वैश्यगृहे वैश्यः स्वप्रियां प्राह—'प्रिये, राजा स्वल्पदानरतोऽप्युज्जयिनीनगराधिपतेर्विक्रमार्कस्य दानप्रतिष्ठां काङ्क्षते । सा किं भोजेन प्राप्यते । कैश्चित्स्तोत्रपरायणैर्मयूरादिकवि- भिर्महिमानं प्रापितो भोजः । परन्तु भोजो भोज एव । प्रिये, शृणु । आबद्धकृत्रिमसटाजटिलांसभित्तिरारोपितो यदि पदं मृगवैरिणः श्वा । मत्तेभकुम्भतटपाटनलम्पटस्य नादं करिष्यति कथं (१)हरिणाधिपस्य'॥७७ फिर कभी राजा रात में अकेला सब ओर नगर व्यापार देखता, पुर- वासियों की बातचीत सुनता विचरण कर रहा था । तभी एक वैश्य के घर में वैश्य अपनी प्रिया से बोला—'प्रिये, थोड़ा दान करके भी राजा उज्जयिनी नगर के अधिपति विक्रमादित्य को प्राप्त दान-प्रतिष्ठा की आकांक्षा करता है । क्या वह भोज को मिल सकी है ? कुछ स्तुति परायण मयूरादि कवियों ने भोज को महिमा प्राप्त करा दी है, परंतु भोज भोज ही है। प्रिये, सुनो— बनावटी सटाओं से परिपूर्ण खाल उड़ा कर यदि कुत्ता मृगों के शत्रु सिंह के पद पर आरोपित कर दिया जाय तो वह क्या मदमत्त हाथियों की कुम्भ स्थली का विदारण करने के व्यसनी मृगराज का नाद कर सकेगा ? राजा श्रुत्वा विचारितवान्—'असौ सत्यमेव वदति ।' ततः पुनः पुनर्वदन्तं शृणोति— राजा ने सुनकर विचारा—'यह ठीक ही कहता है।' तब फिर उसे पुनः कहते हुए सुनने लगा— 'आपन्न एव पात्रं देहीत्युच्चारणं न वैदुष्यम् । उपपन्नमेव देयं त्यागस्ते विक्रमार्क किमु वर्ण्यः ॥ १७८ ॥ ( १ ) सिंहस्येत्यर्थः ।
८८ : भोजप्रबन्धः विक्रमार्क त्वया दत्तं श्रीमन्ग्रामशताष्टकम् । अर्थिने द्विजपुत्राय भोजे त्वन्महिमा कुतः ॥ १७९ ॥ प्राप्नोति कुम्भकारो महिमानं प्रजापतेः । यदि भोजोऽप्यवाप्नोऽति प्रतिष्ठां तव विक्रम' ॥ १८० ॥ 'हे विक्रमादित्य, तुम्हारे त्याग का वर्णन कैसे हो ?' तुम इसे उचित नहीं समझते थे कि कोई अभागा 'बरतन दो'-- ऐसा आकर भी बोले, इतना पर्याप्त देना उचित समझते थे कि मँगता भविष्य में मँगता रह ही न जाय। 'श्रीमन् विक्रमादित्य, तुमने याचक ब्राह्मण पुत्र को एक सौ आठ गाँव दे दिये थे, भोज को आप जैसी महिमा कहाँ से प्राप्त हो ? हे विक्रमादित्य, यदि कुम्हार भी प्रजापति ब्रह्मा की महिमा प्राप्त कर सकता है, तो भोज भी आपके समान प्रतिष्ठा पा सकता है।' राजा--'लोके सर्वोऽपि जनः स्वगृहे निःशङ्कं सत्यं वदति । मयि वान्येन वा सर्वथा विक्रमार्कप्रतिष्ठा न शक्या प्राप्तुम्' । राजा ने सोचा-संसार में सभी लोग अपने घर में निःशंक हो सत्य कहते हैं। मैं अथवा अन्य कोई विक्रमादित्य की प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त कर सकता। ततः कदाचित्कश्चित्कवी राजद्वारं समागत्याह-'राजा द्रष्टव्यः इति । ततः प्रवेशितो राजानं 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञयोपविष्टः पठति- 'कविषु वादिषु भोगिषु देहिषु द्रविणवत्सु सतामुपकारिषु । धनिषु धन्विषु धर्मधनेष्वपि क्षितितले नहि भोजसमो नृपः ॥१८१॥ राजा तस्मै लक्षं प्रादात् । सर्वाभरणान्युत्तार्य तं च तुरगं ददौ । फिर कभी एक कवि राजद्वार में आकर बोला-'राजा का दर्शन चाहता हूँ ।' तदनन्तर प्रविष्ट किये जाने पर राजा को 'स्वस्ति' यह कह कर उसकी आज्ञा से बैठकर उसने पढ़ा-- भूतल पर कवियों, वक्ताओं, भोगियों, शरीरधारियों, पैसे वालों, सज्जनों के उपकारियों, धनियों, धनुर्धारियों और धार्मिकों में भोज के समान नरपाल नहीं है । राजा ने उसे लाख मुद्राएँ दी और उतार कर समस्त आभूषण और घोड़ा दिया ।
ततः कदाचिद्राजा क्रीडोद्यानं प्रस्थितो मध्ये मार्गं कामपि मलिनां- शुवसनां(१) तीक्ष्णतरतपनकरविदग्धमुखारविन्दां सुलोचनां लोचना- भ्यामालोक्य पप्रच्छ— 'का त्वं पुत्रि' इति । सा च तं श्रीभोजभूपालं मुखश्रिया विदित्वा तुष्टा प्राह-- 'नरेन्द्र, लुब्धकवधूः' हर्षसम्भृतो राजा तस्याः पदुबन्धानुबन्धेनाह— 'हस्ते किमेतत्' सा चाह—'पलम्' राजाह—'क्षामं किम्' सा चाह—'सहजं ब्रवीमि नृपते यद्यादराच्छ्रू यते । गायन्ति त्वदरिप्रियाश्रुतटिनीतीरेषु सिद्धाङ्गना । गीतान्धा न तृणं चरन्ति हरिणास्तेनामिषं दुर्बलम्' ॥१८२॥ राजा तस्यै प्रत्यक्षरं लक्षं प्रादात् । तदनंतर कभी राजा ने क्रीडा वाटिका को जाते हुए बीच रास्ते में किसी मलिन वस्त्र धारिणी, तीव्र सूर्य किरणों से झुलसे मुख कमल वाली, सुनयना को अपनी आँखों से देख कर पूछा— 'बेटी, तुम कौन हो ?' मुख की कांति से उसे श्रीमान् राजा भोज समझ कर संतुष्ट हो वह बोलीं— 'राजन्, मैं हूँ व्याध पत्नी ।' उसकी सुन्दर पद-योजना से प्रसन्नता में भर कर राजा ने कहा— 'क्या है यह हाथ में ?' वह बोली—'मांस है ।' राजा ने कहा—'सूखा है क्यों ?' वह बोली—'कहती हूँ स्पष्ट, यदि आदर से सुनें आप— गाती हैं, सुरांगनाएँ आपके वैरियों की प्रियाओं के आँसू से बनीं नदियों के तीर पर-- (१) सूर्योष्णकिरणदग्धामित्यर्थः ।
६० भोजप्रबन्धः
गीतों पर अंधे बने मृग न घास चरते हैं, उनका ही मांस है यह--दुर्बल, सूखा हुआ । राजा ने उसे प्रति अक्षर लाख मुद्राएँ दीं । ततो गृहमागत्य गवाक्ष उपविष्टः । तत्र चासीनं भोजं दृष्ट्वा राज- वर्त्मनि स्थित्वा कश्चिदाह--'देव, सकलमहीपाल, आकर्णय । इतश्चेतश्चाद्भिर्विघटिततटः सेतुरुदरे धरित्री दुर्लङ्घ्या बहुलहिमपङ्को गिरिरयम् । इदानीं निर्वृत्ते करितुरगनीराजनविधौ न जाने यातारस्तव च रिपवः केन च पथा' ॥१८३॥ तुष्टो भोजो वर्त्मनि स्थितायैव तस्मै वंश्यान्पञ्च गजान्ददौ । तदनंतर घर, आकर राजा झरोखे में बैठ गया । वहाँ बैठे भोज को देखकर मार्ग में खड़े होकर किसी ने कहा--'देव, संपूर्ण धरती के पालन- कर्ता, सुनिए- 'इतस्ततः जल के कारण सेतु ( पुल ) के तट बीच में से टूट गये हैं, धरती दुर्लंघ्य है और यह पर्वत भी बहुत हिमपात से पंकिल हो गया है । इस समय हाथी-घोड़ों ( के सैन्य ) के तैयार हो जाने पर आपके वैरी न जाने किस मार्ग से भाग पायेंगे ?' संतुष्ट भोज ने मार्ग में ही खड़े उस व्यक्ति को श्रेष्ठ पाँच हाथी दिये । कदाचिद्राजा मृगयारसपराधीनो हयमारुह्य प्रतस्थे । ततो नदीं समुत्तीर्णं शिरस्यारोपितेन्धनम् । वेषेण ब्राह्मणं ज्ञात्वा राजा पप्रच्छ सत्वरम् ॥ १८४ ॥ कभी राजा आखेट रस के अधीन हो घोड़े पर चढ़े जा रहे थे तब नदी पार करते सिर पर ईंधन रखे एक व्यक्ति को वेष से उसे ब्राह्मण जान कर राजा ने तुरंत उससे पूछा । राजा--कियन्मानं जलं विप्र । स आह—'जानुदघ्नं नराधिप ।' चमत्कृतो राजाह—'ईदृशी किमवस्था ते' स आह--'नहि सर्वे भवादृशाः' ॥ १८५ ॥
भोजप्रबन्धः ६१ राजा—हे विप्र; जल कितना गहरा है ? ( जल कितना मान है ? ) वह बोला—हे राजन्, घुटनों तक है। ( जानुदघ्न महाराज । ) अचरज में भर राजा—तुम्हारी यह अवस्था कैसी है ? ( ऐसी तेरी दशा क्यों ? ) वह बोला--सब आप जैसे नहीं हैं। ( तेरे जैसे सब नहीं । ) राजा प्राह कुतूहलात्—‘विद्वन्, याचस्व कोषाधिकारिणम् । लक्षं दास्यति मद्वचसा ।' ततो विद्वान्काष्ठं भूमौ निक्षिप्य कोषाधिकारिणं गत्वा प्राह—‘महाराजेन प्रेषितोऽहम् । लक्षं मे दीयताम् ।' ततः स हस- न्नाह--‘विप्र, भवन्मूर्तिर्लक्षं नार्हति ।' राजा ने कुतूहल से पूर्ण हो कहा—'हे पंडित, कोषाधिकारी से मांगो। मेरी आज्ञा से लाख मुद्राएँ देगा ।' सो विद्वान् लकड़ियां धरती पर डाल कर कोषाधिकारी से जाकर बोला--'मुझे महाराज ने भेजा है। मुझे लाख मुद्राएँ दो ।' वह हँसता हुआ बोला--'ब्राह्मण, आपका स्वरूप लाख पाने योग्य नहीं प्रतीत होता ।' ततो विषादी स राजानमेत्याह--'स पुनर्हसति देव, नार्पयति ।' राजा कुतूहलादाह-‘लक्षद्वयं प्रार्थय । दास्यति ।' पुनरागत्य विप्रः ‘लक्ष- द्वयं देयमिति राज्ञोक्तम्' इत्याह । स पुनर्हसति । तो विषाद पूर्ण हो वह जाकर राजा से बोला—'महाराज, वह तो हँसता है, देता नहीं ।' राजा कुतूहल से बोला—'दो लाख माँगो, देगा ।' ब्राह्मण पहुँच कर फिर बोला--'राजा ने कहा है कि दो लाख देना है ।' वह फिर हँसने लगा । विप्रः पुनरपि भोजं प्राप्याह—‘स पापिष्ठो मां हसति नार्पयति ।’ ततः कौतूहली लीलानिधिर्महीं शासच्छ्रीभोजराजः प्राह-‘विप्र, लक्षत्रयं याचस्व । अवश्यं स दास्यति ।' स पुनरेत्य प्राह—‘राजा मे लक्षत्रयं दापयति ।' स पुनर्हसति । ब्राह्मण ने फिर भोज के पास पहुँच कर कहा—'वह पापी मुझ पर हँसता है, देता नहीं ।' तब कौतुकी और लीला के आगार, पृथ्वी के शासक श्री भोजराज ने कहा—'विप्र, तीन लाख माँगो, वह अवश्य देगा ।' वह फिर
पहुँच कर बोला--'राजा ने मुझे तीन लाख देने को कहा है।' वह फिर हँसने लगा। ततः क्रुद्धो विप्रः पुनरेत्याह—'देव, स नार्पयत्येव। राजन्कनकधाराभिस्त्वयि सर्वत्र वर्षति। अभाग्यच्छत्रसंछन्ने मयि नायान्ति बिन्दवः॥ १८६॥ त्वयि वर्षति पर्जन्ये सर्वे पल्लविता द्रुमा। अस्माकमर्कवृक्षाणां पूर्वपत्रेषु संशयः॥ १८७॥ एकमस्य परमेकमुद्यमं निष्त्रपत्वमपरस्य वस्तुनः। नित्यमुष्णमहसा निरस्यते नित्यमन्धतमसं प्रधावति'॥ १८८॥ तब कुछ क्रुद्ध ब्राह्मण फिर राजा के पास जाकर बोला—'महाराज, वह देता ही नहीं। राजन्, आप सर्वत्र स्वर्ण धाराओं की वर्षा कर रहे हैं, परन्तु अभाग्य के छाते से ढके मुझपर बूँदें गिरती ही नहीं। तुझ मेघ के बरसने पर सब वृक्षों पर नये पत्ते आगए पर हमारे मदार के पुराने पत्ते ही संदेहास्पद हो गये। एक ही—बस एक ही परम उद्योग है, दूसरे के प्रति निर्लज्जता धारण कर लेना। प्रतिदिन सूर्य द्वारा भगा दिया जाता है, परन्तु घोर अंधकार प्रतिदिन ही फिर दौड़ा आता है।' ततो राजा प्राह— 'क्रोधं मा कुरु मद्वाक्याद्गत्वा कोषाधिकारिणम्। लक्षत्रयं गजेन्द्रांश्च दश ग्राह्यास्त्वया द्विज'॥ १८६॥ ततस्त्वङ्गरक्षकं प्रेषयति। ततः कोषाधिकारी धर्मपत्रे लिखति— 'लक्षं लक्षं पुनर्लक्षं मत्ताश्च दश दन्तिनः। दत्ता भोजेन तुष्टेन जानुदघ्नप्रभाषणात्'॥ १६०॥ तब राजा ने कहा— 'हे ब्राह्मण, क्रोध मत करो, कोषाधिकारी के पास जाकर मेरी आज्ञा से तीन लाख मुद्राएँ और दस हाथी ले लो।' और अंगरक्षक को (ब्राह्मण के साथ) भेज दिया। तब धर्म पत्र पर कोषाधिकारी ने लिखा—
भोजप्रबन्धः ६३ 'जानुदघ्न' कहने पर संतुष्ट हुए भोजराज ने लाख, लाख और फिर लाख मुद्राएँ और दस मदमत्त हाथी दिये।' ततः सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजनृपतौ द्वारपाल आगत्य प्राह- 'राजन् कोऽपि शुकदेवनामा कश्चिद्दारिद्र्यविडम्बितो द्वारि वर्तते' । राजा बाणं प्राह- 'पण्डितवर, सुकवे, तत्त्वं विजानासि ।' बाणः- 'देव, शुकदेवपरिज्ञानासामर्थ्याभिज्ञः कालिदास एव, नान्यः।' राजा- 'सुकवे, सखे कालिदास, किं विजानासि शुकदेवकविम् ।' इत्याह- एक बार नरपति श्री भोजराज सिंहासन को सुशोभित कर रहे थे कि द्वारपाल आकर बोला- 'महाराज, दरिद्रता की विडंबना में पड़ा कोई शुकदेव नाम का पंडित द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने बाण से कहा- 'पंडितवर, सुकवे, तुम शुकदेव की विद्वत्ता जानते हो?' बाण ने कहा- 'देव, शुकदेव को पूर्णतया जानने वाला कालिदास ही है, अन्य नहीं।' राजा ने पूछा- 'सुकवि मित्र कालिदास, तुम शुकदेव कवि को जानते हो ?' कालिदासः- 'देव, सुकविद्वितयं जाने निखिलेऽपि महीतले । भवभूतिः शुकश्चायं वाल्मीकिस्त्रितयोऽनयोः' ॥ १६१ ॥ कालिदास ने कहा- 'देव, संपूर्ण भूतल पर मैं सुकवियों की जोड़ी ( दुगड्डा-जोड़ी ) जानता हूँ- एक भवभूति और यह शुक । इन दोनों का वाल्मीकि के साथ त्रितय ( तिकड़ी ) बनता है।' ततो विद्वद्वृन्दवन्दिता सीता प्राह- 'काकाः किं किं न कुर्वन्ति क्रोङ्कारं यत्र तत्र वा । शुक एव परं वक्ति (१) नृपहस्तो पला लितः' ॥ १६२ ॥ तदनंतर विद्वज्जनों द्वारा पूजित सीता ने कहा - 'जहाँ-तहाँ कौए कितनी काँव-काँव नहीं किया करते ? परन्तु, बोलता राजा के हाथों लाड पाने वाला शुक ही है।' ततो मयूरः प्राह- ( १. ) नृपस्य हस्तेनोपलालितः ।
३. कालिदास, बाण व विद्वन्मण्डल संवाद
६४ भोजप्रबन्धः 'अपृष्टस्तु नरः किञ्चिद्यो ब्रूते राजसंसदि । न केवलमसम्मानं लभते च विडम्बनाम् ॥ १६३ ॥ तब मयूर ने कहा-- 'जो राजसभा में बिना पूछे जाने पर बोलता है, वह केवल असम्मान ही नहीं पाता, उपहसित भी होता है। देव, तथाप्युच्यते-- का सभा किं कविज्ञानं रसिकाः कवयश्च के । भोज किं नाम ते दानं शुकस्तुष्यति येन सः ॥ १६४ ॥ तथापि भवनद्वारमागतः शुकदेवः सभायामानेतव्य एव ।' महाराज, तथापि कहता हूँ- भोजराज, क्या तो आपकी सभा है और क्या कविज्ञान है और रसिक कवि ही क्या हैं ? आपका दान भी क्या है, जिससे वह शुक संतुष्ट होगा ? तो भी महल के द्वार पर आये शुकदेव को सभा में लाना ही चाहिए। तदा राजा विचारयति शुकदेवसामर्थ्यं श्रुत्वा हर्षविषादयोः पात्र- मासीत् । महाकविरवलोकित इति हर्षः । अस्मै सत्कविकोटिसुकुटमणये किं नाम देयमिति च विषादः । 'भवतु । द्वारपाल, प्रवेशय ।' तो राजा ने सोचा, शुकदेव के सामर्थ्य को सुनकर प्रसन्नता और दुःख- दोनों का अनुभव हुआ । महाकवि को देखा-इसकी प्रसन्नता और श्रेष्ठकवि मंडल के मुकुट मणि स्वरूप इसे दिया क्या जायगा-इसका दुःख । जो हो । द्वारपाल, कवि को भीतर लाओ, ( राजा ने आज्ञा दी ) । तत आयान्तं शुकदेवं दृष्ट्वा राजा सिंहासनादुदतिष्ठत् । सर्वे पण्डितास्तं शुकदेवं प्रणम्य सविनयमुपवेशयन्ति । स च राजा तं सिंहा- सन उपवेश्य स्वयं तदाज्ञयोपविष्टः । फिर शुकदेव को आता देख राजा सिंहासन से उठ खड़ा हुआ । सब पंडित उस शुकदेव को प्रणाम करके विनय पूर्वक आसन देने लगे । राजा उसे सिंहासन पर बैठा कर स्वयम् उसकी आज्ञा से बैठा । ततः शुकदेवः प्राह- 'देव, धाराराथ, श्रीविक्रमनरेन्द्रस्य या दान- लक्ष्मीस्त्वामेव सेवते । देव, मालवेन्द्र एव धन्यः नान्ये नभुजः, यस्य ते
भोजप्रबन्धः ६५ कालिदासाद्यो महाकवयः सूत्रबद्धाः पक्षिण एव निवसन्ति।' ततः पठति-- 'प्रतापभीत्या भोजस्य तपनो मित्रतामगात् । और्वो वाडवतां धत्ते तडिङ्क्षणिकतां गता' ॥ १६५ ॥ तदनंतर शुकदेव ने कहा--'महाराज, धारा के अधिपति, श्रीविक्रम महाराज की जो दान लक्ष्मी है वह आपकी ही सेवा कर रही है। देव, धन्य केवल आप मालवाधिपति ही हैं, जिन आपके यहाँ कालिदास आदि महाकवि डोरी में बँधे पक्षियों की भाँति निवास करते हैं--अन्य धरती को भोगने वाले राजा नहीं। फिर पढ़ा-- भोज के प्रताप से डरकर तपनशील सूर्य 'मित्र' (सूर्य का अपर पर्याय तथा सखा) बन गया, 'और्व' (च्यवन-पौत्र अर्चिःस्वरूप तेजस्वी भृगुकृषि जिन्होंने कालांतर में सगर को अग्नेयास्त्र दिया-तथा सागर में रहने वाली वडवाग्नि) ने वडवाग्नि का रूप लिया और बिजली क्षणभर चमकने वाली बन गयी (चंचला)। राजा--'तिष्ठ सुकवे, नापरः श्लोकः पठनीयः।' 'सुवर्णकलशं प्रादाद्दिव्यमाणिक्यसम्भृतम् । भोजः शुकाय सन्तुष्टो दन्तिनश्च चतुःशतम्' ॥ १६६ ॥ इति पुण्यपत्रे लिखित्वा सर्वं दत्त्वा कोषाधिकारी शुकं प्रस्थापयामास। राजा स्वदेशं प्रतिगतं शुकं ज्ञात्वा तुतोष। सा च परिषद्सन्तुष्टा। राजा ने कहा--'हे सुकवि, रुकिये, दूसरा श्लोक न पढ़िए।' 'संतुष्ट भोज ने अलौकिक मणियों से परिपूर्ण स्वर्ण कलश और चार सौ दंती हाथी शुक को दिये।'--यह पुण्यपत्र पर लिख कर और सब कुछ देकर कोषाधिकारी ने शुक को विदा किया। शुक अपने देश चला गया-यह जानकर राजा को तुष्टि हुई। --:०:-- १३-भोजस्य काव्यानुरागः कतिपयकथा अन्यथा वर्षाकाले वासुदेवो नाम कविः कश्चिदागत्य राजानं दृष्ट- वान्। राजाह--'सुकवे, पर्जन्यं पठ।' अतः कविराह- (१) धुरि साधुः धौरेयः।
६६ भोजप्रबन्धः 'नो चिन्तामणिभिर्न कल्पतरुभिर्नो कामधेन्वादिभि- र्नो देवैश्च परोपकारनिरतैः स्थूलैर्न सूक्ष्मैरपि । अम्भोदेह निरन्तरं जलभरैस्तामुर्वरां सिञ्चतां (१)धौरेयेण धुरं त्वयाद्य बहता मन्ये जगज्जीवति ॥१६७॥ राजा लक्षं ददौ। दूसरी बार वर्षा ऋतु में एक वासुदेव नामक कवि ने आकर राजा का दर्शन किया। राजा ने कहा-'हे सुकवि, मेघ पर पढ़ो।' तो कवि ने कहा- आज यह जगत् न तो चिंतामणियों, न कल्पवृक्षों और न कामधेनु आदि के कारण जीवित है और न परोपकार में संलग्न बड़े-छोटे अन्य देवों के कारण, हे जलदाता यह जीवित है निरंतर जल धाराओं में इस धरती को सींचकर उर्वरा बनाते धुराधारी तेरे धुरा को धारण करने के कारण। राजा ने लाख मुद्राएँ दीं। कदाचिद्राजानं निरन्तरं दीयमानमालोक्य मुख्यमात्यो वक्तुम- शक्तो राज्ञः शयनभवनभित्तौ व्यक्तान्यक्षराणि लिखितवान्- 'आपदर्थं धनं रक्षेत्' राजा शयनादुत्थितो गच्छन्भित्तौ तान्यक्षराणि वीक्ष्य स्वयं द्वितीय- चरणं लिलेख-श्रीमन्तामापदः कुतः। अपरेद्यु रमात्यो द्वितीय चरणं लिखितं दृष्ट्वा स्वयं तृतीयं लिलेख- 'सा चेदपगता लक्ष्मीः' परेद्यु राजा चतुर्थं चरणं लिखति-'सञ्चितार्थो विनश्यति' ॥ १६८॥ ततो मुख्यमात्यो राज्ञः पादयोः पतति--'देव, क्षन्तव्योऽयं ममा- पराधः। एक बार राजा को निरन्तर दान करते देख कुछ मुँह से कहने में असमर्थ मुख्य मंत्री ने राजा के शयन गृह की दीवार पर स्पष्ट अक्षरों में लिख दिया- 'आपत्काल निमित्त उचित है धन की रक्षा।' सोकर जागे सजा ने जाते हुए दीवार पर उन अक्षरों को देखकर स्वयं दूसरा चरण लिखा-'श्रीमन्तों पर भला कहाँ आपत् आती है?'
भोजप्रबन्धः ६७ दूसरे दिन दूसरा चरण लिखा देख मन्त्री ने स्वयं तीसरा चरण लिख दिया- 'यदि वह लक्ष्मी चली जाय तो फिर क्या होगा ?' अगले दिन राजा ने चौथा चरण लिख दिया---'उसके संग ही चला जायगा सब संचित धन ।' तो मुख्य मंत्री राजा के चरणों में गिर गया और बोला---'महाराज, मेरा यह अपराध क्षमा करें ।' अन्यदा धाराधीश्वरमुपरि सौधभूमौ शयानं मत्वा कश्चिद्द्विजचोरः खातपातपूर्व राज्ञः कोशगृहं प्रविश्य बहूनि विविधरत्नानि वैडूर्यादीनि हृत्वा तानि परलोकऋणानि मत्वा तत्रैव वैराग्यमापन्नो विचारयामास- 'यद्व्यङ्गाः कुष्ठिनश्चान्धाः पङ्गवश्च दरिद्रिणः । पूर्वोपार्जितपापस्य फलमश्नन्ति देहिनः' ॥ १९९ ॥ और एकवार धाराविपति को ऊपर प्रासाद में सोया जान कोई ब्राह्मण चोर सेंध लगा कर राजा के खजाने में घुस गया और बहुत से अनेक प्रकार के रत्न लहसुनिया आदि चुराकर और यह समझ कर कि यह सब परलोक में चुकाया जाने के निमित्त ऋण उसपर चढ़ गया, वैराग्य को प्राप्त हो विचारने लगा - अंगहीन, कोढ़ी, अंधे, लंगड़े और दरिद्री देहधारी प्राणी संचित पाप का फल भोगा करते हैं । ततो राजा निद्राक्षये दिव्यशयनस्थितो विविधमणिकङ्कणालङ्कृतं दयितवर्गं दर्शनीयमालोक्य गजतुरगरथपदातिसामग्रीं च चिन्तयन् राज्यसुखसन्तुष्टः प्रमोद्भरादाह- 'चेतोहरा युवतयः सुहृदोऽनुकूलाः सद्बान्धवाः प्रणयगर्भगिरश्च भृत्याः । वल्गन्ति दन्तिनिवहास्तरलास्तुरङ्गाः' इति चरणत्रयं राज्ञोक्तम् । चतुर्थचरणं राज्ञो मुखान्न निःसरति तदा चोरेण श्रुत्वा पूरितम्- 'सम्मीलने नयनयोर्नहि किञ्चिदस्ति' ॥ २०० ॥ तदनंतर नींद टूटने पर दिव्य शैया पर बैठा, अनेक विध मणि जटित कंकणों से सुसज्जित अपनी प्रिया मंडली और हाथी, घोड़े, रथ और पैदल ७ भोज०