बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
- ३१ -
जाय। इसी बीच बारात राजद्वार पर आती है। राजा बीसलदेव तोरण के नीचे सूर्य के समान उदित होता है और सजी-धजी स्त्रियाँ उसकी आरती उता- रती हैं। शुभ मुहूर्त में राजा बीसलदेव और कुमारी राजमती का पाणिग्रहण सम्पन्न होता है। विवाह-मण्डप में बीसलदेव और राजमती कृष्ण और रुक्मिणी की तरह सुशोभित होते हैं। मालवा देश में बड़े उत्सव मनाये जाते हैं। भांवर के समय पहले फेरे के पायण में बीसलदेव को राजा भोज आलोसर (स्थान विशेष) तथा मालवेश (स्थान विशेष) देता है। दूसरे फेरे पर राजकुमारी की माता भानुमती अपने दामाद को अर्थ, द्रव्य का भण्डार, सपादलक्ष देश, तोड़ा, टउक, बूँदी और कुडालदेश देती है। तीसरे फेरे पर राजा भोज राजमती के साथ ताजी और केकाण (घोड़े) मंडोवर का देश तथा समुद्र के साथ सोरठ और समस्त गुजरात देता है।¹ पाणिग्रहण सानन्द समाप्त होता है। बीसलदेव अपनी सास को नमस्कार करने के लिये जाता है और रानी भानुमती 'अजमेर' में अविचल राज्य करने का आशीर्वाद उसको देती हैं। पहिरावनी (वस्त्र भूषणादि पहनाने का रस्म) होती है। सुहावनी धार नगरी को छोड़कर धार का दीपक (राजमती) अजमेर गढ़ को प्रदीप्त करने चढ़ता है।² बारात के लौटने पर अजमेर गढ़ में बड़ा हर्ष मनाया जाता है और राजा अपने मन्त्री से कहता है कि "या तो मुझसे सृष्टिकर्त्ता प्रसन्न हुआ या मैंने विधि का लिखा प्राप्त किया, जो मैं राजा भोज की चौरी पर चढ़ा अर्थात् राजा भोज की कन्या का पाणिग्रहण किया।"³ १-नोट—रूपान्तर न० २ में फेरों के समय पायण स्वरूप दिये हुए स्थानों के नाम में अन्तर है। इस रूपान्तर के अनुसार प्रथम फेरे में 'आलीसर' और कुडाल देश देने का, दूसरे फेरे में घोड़े, धन, मढोवर, सौराष्ट्र और गुजरात देने का, तीसरे फेरे में सांभर, तोड़ा, और टोंक देने का तथा चौथे फेरे में चित्तौड़ देने का वर्णन है। रूपान्तर न० १ में चौथे फेरे का कोई वर्णन ही नहीं है। २—रूपान्तर न० २ में विवाह के पश्चात् अजमेर लौटते समय रास्ते में 'अनासागर' मिलने का उल्लेख है। लेकिन ऐसा कोई उल्लेख रूपान्तर न० १ में नहीं है। ३—नोट—रूपान्तर न० २ में प्रथम खण्ड की कथा यहीं समाप्त होती है और द्वितीय खण्ड की कथा कवि पुनः गणेश की वंदना करके आरम्भ करता है।
- ६२ -
एक दिन राज्य सभा धन सम्पत्ति के सम्बन्ध में रानी राजमती तथा बीसलदेव में वाद् विवाद चल पड़ता है। राजा गर्वपूर्वक कहता है कि उसके समान दूसरा भूपाल नहीं है। रानी इस गर्वोक्ति को सुनकर कहती है कि उसका यह गर्व व्यर्थ है, क्योंकि उससे विशेष धनी तो उड़ीसा का राजा है जिसके राज्य में हीरे ही हीरे खानों से निकलते हैं। उड़ीसा देश की यह वार्ता सुनकर राजा रानी से कहता है कि उसका (रानी का) जन्म तो जैसलमेर में हुआ और विवाह अजमेर में, अतएव वह उड़ीसा देश के सम्बन्ध में उपर्युक्त बातें क्योंकर जानती है। इस विषय में जब तक वह नहीं बतलायेगी तबतक वह (राजा) अन्न-पानी नहीं ग्रहण करेगा। राजा के इस आग्रह पर रानी अपने पूर्व जन्म की कथा बतलाती है कि कैसे वह पूर्व जन्म में हरिणी के रूप में उड़ीसा में रहती थी और कैसे एक बहेरी द्वारा मारे जाने पर उसने उड़ीसा में फिर जन्म न देने की दैव से प्रार्थना की थी तथा उसका धार नगरी में जन्म हुआ था। रानी की यह बात सुनकर राजा कहता है कि "हे गौरी तूने उपर्युक्त बातें कहकर मेरी निंदा की। अतः अब मैं तुझे छोड़कर बारह वर्षों तक प्रवास करूँगा। ताकि मैं भी हीरे की खान अपने घर ला सकूँ। राजा के इन वचनों को सुनकर रानी बड़ी दुःखी होती है और कवि इस स्थान पर ऐसी परिस्थितियों के उपस्थित होने पर नारी द्वारा अपने पति को प्रवास से रोकने के हेतु अपनाये गये सभी उपायों का वयान रानी राजमती से करवाता है। लेकिन राजा उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं देता और प्रवास के लिये हठ धरता है। अन्त में राजमती की भावज भी राजा को अनेक प्रकार से समझा बुझा कर और कुछ कटुवी बातें कहकर उसे परदेश गमन से रोकने की चेष्टा करती है। फिर भी राजा परदेश गमन का हठ नहीं त्यागता। राजा ज्योतिषी को बुलाकर यात्रा के लिये शुभ दिन और मुहूर्त पूछता है। लेकिन रानी ज्योतिषी से इसके पहले ही राजा की यात्रा का मुहूर्त चार महीने पश्चात् बतलाने का आग्रह कर चुकी थी क्योंकि उसे पूर्ण विश्वास था कि इन चार महीनों के अन्दर वह अपने पति को परदेश जाने से रोक सकने में समर्थ हो सकेगी। ज्योतिषी रानी के आग्रानानुसार ही राजा को चार महीने पश्चात् का यात्रा का मुहूर्त बतलाता है। कात्तिक मास में ज्योतिषी द्वारा बताये गये शुभ मुहूर्त में राजा परदेश गमन करता है। भीगे हुए नेत्रों से रानी राजा को विदा करती है और नीति की शिक्षा देती है। राजा को विदा करके रानी की अवस्था बड़ी दुःखद हो जाती
- ६३ - है। राजा के विरह में उसे अपने तन-मन का भी स्मरण नहीं रहता। सखियाँ उसे बहुत समझाती हैं लेकिन उसकी विरह वेदना किसी प्रकार कम नहीं होती।१ कवि इसके पश्चात् बारह महीनों का वर्णन करते हुए प्रत्येक महीने में रानी के विरह वेदना की विभिन्न परिस्थितियों का मर्मस्पर्शी वर्णन करता है। रानी की दशा तो राजा के विरह में इधर खराब होती है उधर राजा को रास्ते में शुभ शकुन होते हैं और वह अपनी यात्रा निर्विघ्न समाप्त करता चलता है। क्रमशः समय व्यतीत होता रहता है लेकिन रानी की व्यथा बढ़ती ही जाती है। उसके यौवन की दावाग्नि विरहाग्नि को द्विगुणित कर देती है। अन्त में वह राजा के पास एक दूत भेजती है। दूत को अपने पति की पहचान बताती है और एक मर्मस्पर्शी पत्र राजा को देने के लिये उसे देती है। उपालंभ और दुःख से यह पत्र परिपूर्ण है। दूत पत्र लेकर राजमती को वचन देता है कि वह दुःख न करे क्योंकि वह उसके स्वामी को अवश्य लेकर लौटेगा। रानी उसे शकुन की सामग्री देती और विदा करती है। सातवें महीने दूत उड़ीसा पहुँचता है। राजा को रानी का पत्र देता है और कहता है कि "रानी राजमती ने यह संदेश भेजा है कि हे स्वामी ! तुम घर आओ। क्योंकि पुनः इस जीवन में यौवन लाभ कहाँ करोगे ?" पुनः दूत कहता है कि "हे राजा, यदि तुम आज नहीं चलते हो तो उस स्त्री का हृदय फट जायगा और वह (राजमती) मर जायगी।" राजा पंडित के इन शब्दों को सुनकर व्याकुल हो जाता है और उड़ीसा के राजा से घर लौटने की अनुमति चाहता है। उड़ीसा का राजा अपनी रानी को बुलाकर बीसलदेव के स्वदेश गमन की बात कहता है। रानी अनेक प्रकार से बीसलदेव को घर जाने से रोकती है। लेकिन बीसलदेव किसी प्रकार भी अब रहने को तैयार नहीं होता। तब उड़ीसा का राजा बीसलदेव से कहता है कि उसके नगर में एक ऐसा अपूर्व योगी है जो बहुत शीघ्र सांभर जा सकता है। बीसलदेव इस समाचार को सुनकर एक दिन के लिए उड़ीसा में रुक जाता है और उस योगी के हाथ राजमती के पास अपने आने का समाचार भेजता है। योगी राजा बीसलदेव का पत्र लेकर उड़ीसा से रवाना होता है और राज- मती की बायीं बाँह तथा आँख फड़क-फड़क कर इस बात की सूचना देती हैं कि या तो उसके स्वामी मिलेंगे या उनका कोई प्रेमपूर्ण पत्र ही प्राप्त होगा। योगी- १ नोट — रूपान्तर नं० २ में द्वितीय खण्ड की कथा यहीं समाप्त होती है।
– १४ – राजमती के शुभ शकुनों को सत्य प्रमाणित करता हुआ अजमेर पहुँच जाता है और राजमती को राजा का पत्र देता है। पत्र को राजमती गले से लगा लेती है और योगी को अच्छे भोजन आदि कराकर अपने प्रियतम की बातें पूछती है। योगी रानी को आज के तीसरे दिन राजा के अजमेर पहुँचने का शुभ समाचार देता है और अनेक प्रकार से रानी द्वारा पुरस्कृत होकर अपने स्थान को लौटता है। योगी के कथनानुसार राजा बीसलदेव तीसरे दिन अजमेर लौटता है। अजमेर में उस दिन बड़ी खुशियाँ मनायी जाती हैं। रानी राजमती के हर्ष की कोई सीमा नहीं रहती और वह यह सोचकर अपने मन में और भी हर्षित होती है कि पति के प्रवास की इस लम्बी अवधि में उसे कोई कलंक नहीं लगा जो कि इस यौवन और बढ़ती हुई विरह ज्वाला में लगना बहुत सहज और स्वाभा- विक था। कवि इसके पश्चात् कुछ पंक्तियों में प्रेम और प्रेमिका की उन दशाओं तथा बातों का वर्णन बड़े स्वाभाविक रूप से करता है जो प्रायः लम्बी अवधि के प्रवास के पश्चात् प्रेमी और प्रेमिका में होती हैं। अन्तिम पंक्तियों में कवि यह शुभकामना प्रकट करते हुए कि जिस प्रकार रानी राजा से मिली उसी प्रकार संसार में सभी मिलें ग्रन्थ समाप्त करता है। प्रथम रूपान्तर की कथा उपर्युक्त स्थान पर शेष हो जाती है। लेकिन द्वितीय रूपान्तर में इसके पश्चात् चतुर्थ खण्ड की कथा प्रारम्भ होती है। इस खण्ड में कवि हनुमान की वन्दना करके धार नगरी से राजा भोज का आना वर्णन करता है। बीसलदेव के अजमेर पहुँचने पर उसका भतीजा राजा बीसलदेव का स्वागत करता है। राजा उसे युवराज के पद पर स्थापित कर चित्तौड़ में उसे रहने का स्थान देता है। फिर राजा भोज को अजमेर आने के लिये पुरोहित के हाथ निमन्त्रण भेजता है। राजा भोज बीसलदेव के निमन्त्रण पर अजमेर आता है। दोनों राजा मिलकर अतीव प्रसन्न होते हैं। अजमेर में भी आनन्द मनाया जाता है। राजा भोज कुछ दिनों तक अजमेर में रहकर अपनी राजधानी को लौट जाता है, और राजमती को अपने साथ ले जाता है। तीन महीने पश्चात् फिर रानी राजमती को लेने बीसलदेव धार जाता है और रानी को लेकर वापस लौटता है। चतुर्थ खण्ड की कथा कवि यहीं पर यह आशीर्वाद देकर समाप्त करता है कि "जब तक पृथ्वी पर सूर्य उदय होते रहें, जब तक गंगा में जल प्रवाहित होता रहे, जबतक पृथ्वी पर जगन्नाथ रहें, तबतक राजा तुम अजमेर पर अविच्छन्न राज्य करते रहो।"
५ — ६५ — बीसलदेव रासो का रचयिता बीसलदेव रासो के रचना काल की गुत्थी को सुलझाना जितना जटिल है उससे कम जटिल उसके प्रणेता के प्रादुर्भाव काल नाम और जाति की गुत्थी का सुलझाना नहीं । बीसलदेव रासो की यद्यपि अनेक हस्तलिखित प्रतियाँ प्राप्य हैं लेकिन उनमें से किसी भी प्रति में कवि के प्रादुर्भाव-काल का ऐसा संकेत नहीं मिलता जिसके आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सके कि कवि का जन्म अमुक तिथि को हुआ था । इन हस्तलिखित प्रतियों में ग्रन्थ का रचना-काल } अवश्य दिया हुआ है जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि ग्रन्थों के रचयिता ने भी उसी काल में जन्म ग्रहण किया होगा; लेकिन इस बात को स्वीकार करने में सबसे बड़ी समस्या हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त रचना-काल की वे विधियाँ हैं जो विभिन्न प्रतियों में विभिन्न रूपों में पायी जाती है । समस्त हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त रचना विधि के आधार पर मुख्यतः प्रतियों के दो विभिन्न भाग किये जा सकते हैं—प्रथम भाग में वे सभी प्रतियाँ आ जायेंगी जिनमें रचना-काल का उल्लेख ११वीं शती है, और दूसरे भाग में अन्य वे सभी प्रतियाँ आयेंगी जिनका रचना-काल १३वीं शती ठहरता है । जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है । अस्तु ऐसी परिस्थिति में कवि का जन्म काल ११वीं और १३वीं शती दोनों मानना पड़ेगा, जिसे स्वीकार करना सम्भव नहीं । तब यदि रचना- तिथि का निर्णय कर लिया जाय तो कवि के जन्म काल का भी निर्णय करना सहज हो जायगा । रचना-तिथि का निर्णय ग्रन्थ में प्राप्त ऐतिहासिक तत्त्वों और भाषा के आधार पर किया गया है, तथा इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि इसकी भाषा ११००-१२०० वि० सं० की है और इसका नायक बीसलदेव तृतीय है । लेकिन इस निष्कर्ष पर पहुँच कर भी कवि के जन्म तिथि की समस्या ज्यों की त्यों रह जाती है क्योंकि गणना के अनुसार हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त रचना-तिथियों में से सर्वाधिक प्रामाणिक तिथि वि० सं० १२१२ ठहरती है । इसी समस्या को सुलझाने के लिए सम्भवतः श्री सत्य जीवन जी वर्मा ने ग्रन्थकार को बीसलदेव चतुर्थ विग्रहराज चतुर्थ का, जिनका समय वि० सं० १२१०-१२२० माना जाता है, समकालीन माना है । प्रकट किये गये अपने इस मत के प्रमाण में श्री वर्मा जी ने दो तर्क उपस्थित किये हैं—पहला तो ग्रन्थ में प्रायः सर्वत्र वर्तमानकालिक क्रिया का प्रयोग किया जाना और दूसरा रचना-तिथि के सम्बन्ध में आयी
~ ६६ ~
हुई कि 'बारह सौ बहोत्तर' का अर्थ १२१२ लगाया¹ । लेकिन उनके इन दोनों तर्कों में से प्रथम तर्क का खण्डन निम्नलिखित विद्वानों ने इस प्रकार किया है । प्रसिद्ध विद्वान श्री गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने इसका खण्डन करते हुए कहा है कि भाषा का प्रयोग कवि की रुचि पर निर्भर है । जैनों के धर्मग्रन्थ प्राकृत भाषा में होने के कारण जैन लेखक अपने काव्यों में प्राकृत शब्दों की भरमार करते रहे हैं। जिससे उनकी भाषा दुरूह हो गयी है । चारण, भाट आदि प्राकृत से अधिक परिचित न होने के कारण अपनी रचनाएँ प्रचलित भाषा में करते थे, जिससे इन दोनों प्रकार के लेखकों की पुस्तकों की भाषा में अन्तर होना स्वाभा- विक ही है । भाषा की कसौटी सदियाँ नहीं है । एक ही समय में कोई सरल भाषा में अपनी रचना करता है तो कोई कठिन भाषा का प्रयोग करता है² । डा० उदयनारायण तिवारी ने भी ओझा जी के मत को पुष्ट किया है³ और यह भी कहा है कि जहाँ तक क्रियाओं का सम्बन्ध है अनेक ग्रन्थ ऐसे मिलते हैं जिनमें समकालीन न होने पर भी वर्तमानकालिक क्रियाओं का प्रयोग मिलता है । प्रायः घटनाओं को सत्य का रूप देने के लिये ही कवियों ने ऐसा किया है । श्री वर्मा जी का दूसरा तर्क जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है कुछ हद तक ठीक है क्योंकि वि० सं० १२१२ की गणना करने पर जेठ बदी नवमी को बुधवार पड़ता है । लेकिन इस तिथि और संवत् का ठीक मानने का यह अर्थ नहीं कि इस रासो के रचयिता ने बीसलदेव चतुर्थ के समय-ध में कहा है और ग्रन्थ का नायक विग्रहराज चतुर्थ है क्योंकि ग्रन्थ से पायी गयी कथा इस बीसल- देव से सम्बन्धित नहीं है वरन् ऐतिहासिक आधार पर कथा का सम्बन्ध तृतीय बीसलदेव से है । अस्तु, उपर्युक्त सभी प्रमाणों द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि इस ग्रन्थ के रचयिता का प्रादुर्भाव-काल १३वीं शती का पूर्वार्द्ध था । उसकी भाषा प्राचीन थी अर्थात् ११००-१२०० वि० सं० की थी तथा उसके ग्रन्थ के नायक थे बीसलदेव । तृतीय अन्त साक्ष्य के अभाव में जहाँ कवि के प्रादुर्भाव-काल का निर्णय करना जटिल है वहीं उसकी रचना में यत्र तत्र उसके नाम के उल्लेख के कारण यह सिद्ध होता है कि इस रासो की रचना करने वाला कोई नरपति १—बीसलदेव रासो—पृ० ७ । २—नागरीप्रचारिणी पत्रिका—स० १८६५ पृ० १०१ । ३—वीर काव्य पृ० २०० ।
- ६७ - नामक कवि था। लेकिन इस नाम के सम्बन्ध में भी डॉ० उदयनारायणजी तिवारी तथा श्री सत्यजीवन जी वर्मा जैसे विद्वानों का मत है कि नरपति कवि का मुख्य नाम तथा नाल्ह कौटुम्बिक नाम प्रतीत होता है।¹ इसी प्रकार रासो की निम्न दो पंक्तियों को उद्धृत कर यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि नरपति और नाल्ह दो विभिन्न व्यक्ति थे और नरपति द्वारा गाई गई इस रासो को नाल्ह ने फिर से गाया। कर जोडि नरपति कहई । नाल्ह कहई जिण आवई रोड़ि ॥ कवि के नाम के सम्बन्ध में ये भ्रम सं० १६६९ में लिखी गई प्रति तथा इससे मिलती जुलती अन्य प्रतियों में कवि के दोनों नामों के उल्लेख के कारण उत्पन्न हो गये हैं लेकिन ऐसी प्रतियों में चूँकि बीसलदेव तृतीय और रानी राज- मती की प्रेमगाथा चार खण्डों में गायी गयी है इसलिये इनकी प्रामाणिकता में सन्देह उत्पन्न होता है। और, तब इन प्रतियों के आधार पर नरपति और नाल्ह को दो विभिन्न कवि मानना उपयुक्त न होगा। उपर्युक्त दोनों पंक्तियाँ भी सं० १६६९ में लिखी गई प्रति से उद्धृत की गई हैं। इन पंक्तियों का अर्थ साधारण रूप से एक ही व्यक्ति के नाम का बोधक है; खींच तान कर इसका अर्थ दो विभिन्न व्यक्तियों के लिये लगा भले ही लिया जाय । फिर १६६९ वाली प्रति से अधिक प्रामाणिक और प्राचीन प्रति १६३३ वाली प्रति के, जो अबतक की प्राप्त प्रतियों में प्राचीनतम है, आधार पर यही कहा जा सकता है कि नरपति और नाल्ह दोनों एक ही व्यक्ति थे। इस प्रति में कवि का नाम 'नरपति' पहले पद के अतिरिक्त और कहीं नहीं आता।² इसी प्रकार नाल्ह भी इसकी पद्य-संख्या ४,२ और इसके अतिरिक्त कहीं नहीं मिलता³ जिसके द्वारा यही सिद्ध होता है कि कवि का प्रचलित नाम नाल्ह था। १—वीरकाव्य पृ० १६०। २—करि जोडि नरपति भणई। जाणि करि रोहणी निमि तणउ सूरि ॥१॥ ३—तइ तूठी अक्खर जुड़इ। नाल्ह रसायण रस भरी गाइ । तुष्टी कई सारदा त्रिभुवन माय ॥५॥ संवत् सहस सत्तिहत्तरइ जाणि। नाल्ह कवीसरि कही अमृत वाणि ॥२४॥
- ६८ - क्योंकि प्रचलित होने के कारण ही इस नाम का उपयोग एक स्थान से अधिक स्थानों में किया गया है और नरपति कवि का उपनाम इसलिये प्रतीत होता है कि इसका प्रयोग केवल एक स्थान पर हुआ है और वह भी हुआ केवल तुक के मेल के लिये ही । कवि का नरपति नाम 'उपनाम' कतिपय विद्वानों में यह भ्रम उत्पन्न किये हुए है कि कवि कोई राजा था ।¹ ऐसे भ्रम का कारण केवल एक यही हो सकता है कि नरपति का शाब्दिक अर्थ राजा होता है । लेकिन जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि इस शब्द का प्रयोग प्राप्त प्रतियों में प्राचीनतम प्रति में केवल एक स्थान पर हुआ है और उस स्थान पर इसका अर्थ कदापि राजा नहीं हो सकता, इसलिये इस शब्द का अर्थ राजा लगाकर नाल्ह और नरपति को दो विभिन्न व्यक्ति मानना उचित न होगा । लेकिन यदि किसी कारणवश नरपति का अर्थ राजा लगाना ही, विद्वानों द्वारा उचित समझा जाय तब भी श्रेयस्कर यही होगा कि नाल्ह और नरपति को दो विभिन्न व्यक्ति न मानकर नरपति को नाल्ह की उपाधि समझी जाय, जो बहुत कुछ सम्भव है कि उसे प्राप्त हुई होगी उसके गुणों के कारण । और यों भी कवि नरपुंगव तो होते ही हैं । कवि की जाति कवि के नाम की तरह कवि की जाति के सम्बन्ध में भी विद्वानों के विभिन्न मत हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मतानुसार कवि भाट जाति का था ।² श्रीसत्य- जीवन वर्मा जी भी इसी मत की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि नरपति साधारण भाट था जो इधर उधर तुकबन्दियाँ करके गाता फिरता था । और अपने इस मत की पुष्टि में वे डा० गौरीशंकर हीराचन्द जी ओझा द्वारा प्राप्त एक पत्र का उल्लेख करते हैं जिसमें डा० ओझा ने उन्हें लिखा है कि राजपूतों में अभी तक नरपति, महीपति आदि नाम मिलते हैं, जिन्हें सब नापा, महपा कहते हैं³ किन्तु इस १—सिलेक्शन्स फ्रॉम हिन्दी लिटरेचर—लाला सीताराम बी० ए०— पृ० ३८-३९ । २—हिन्दी साहित्य का इतिहास—पृ० २७-२८ । ३—बीसलदेव रासो—सं० सत्यजीवन वर्मा—पृ० ४५ भूमिका ।
मत का खण्डन श्री अगरचन्द जी नाहटा¹ तथा डा० उदयनारायण जी तिवारी² ने यह कह कर दिया है कि ग्रन्थ में उसे व्यास या जोइसी लिखा गया है। राजपूताने में ये दोनों जातियाँ ब्राह्मण वर्ग के अन्तर्गत हैं। हमें नाहड़ ब्राह्मण ही जान पड़ता है। ग्रन्थ की प्राप्य प्राचीनतम प्रति सं० १६३३ में इसो शब्द का उल्लेख पद्य संख्या ५१, २४५ आदि कई पदों में है।³ यह शब्द संस्कृत शब्द 'ज्योति' का अपभ्रंश है । ज्योतिषी किस जाति के होते थे इस सम्बन्ध में सर एथेल्स्टन बेन्स का मत है कि "ज्योतिषी चूँकि ब्राह्मण जाति के ही होते हैं इस- लिये जनगणना के समय इनकी पृथक् गणना नहीं होती है। ये राजाओं और महा- राजाओं द्वारा सर्वदा सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं तथा इनके जीवन-यापन का प्रबन्ध भी इन्हीं राजाओं और महारानाओं द्वारा राज्य की ओर से होता है । इनका कार्य जन्मपत्री बनाना और गार्हस्थ्य जीवन-सम्बन्धी प्रत्येक कार्य के लिये शुभ मुहूर्त आदि बताना होता है। इनके अतिरिक्त ज्योतिषियों का एक वर्ग और होता है जो 'जोशी' कहलाता है। ये अपना जीवननिर्वाह हाथरेखा और भाग्यरेखा की गणना, दुष्ट ग्रहों के लिये प्राप्त दान तथा ग्रहण आदि के अवसर पर प्राप्त दान से करते हैं। गणना के समय इनका पृथक् उल्लेख यही सिद्ध करता है कि ये किसी जातिविशेष के नहीं होते हैं। इस वर्ग का निर्माण कई जातियों के मिश्रण के फलस्वरूप हुआ है। सर बेन्स द्वारा दी गयी ज्योतिषियों की जाति की उपर्युक्त कसौटी पर यदि नाहड़ की जाति को कसा जाय तो यह स्पष्ट सिद्ध होगा कि वह ब्राह्मण था। जोइसी शब्द के उल्लेख से तो उसका ब्राह्मण होना स्पष्ट है ही इसके अतिरिक्त भी उसके काव्य में आयी हुई निम्न पंक्तियाँ यही सिद्ध करती हैं कि वह ज्योतिष विद्या का ज्ञाता था। काव्य प्रारम्भ करते ही वह कहता है कि आणि करि रोहणी जिमि तपइ सुरि । अवग नइ घेपउरे रथि तपइ ॥१॥ १—राजस्थानी—भाग ३, अंक २—पृ० ११ । २—वीर काव्य—पृ० १८० । ३—रोहनी नक्षत्र सोहामयउ । सो दिन गिखि जोइसी जोडइ रास ॥ "सुदिन देई म्हाका जोइसी । फाड़ि पतइउ अरू बोलिमइ साची।”
- ७० - और इस प्रकार वह अपने ज्योतिष ज्ञान को प्रकट करने हुए उस नेत्रात्मक रोहिणी नक्षत्र की ओर संकेत करता है जो क्रान्ति वृत्त का ही एक भाग है और जिसका स्पर्शात्मक संबंध सूर्य्यके साथ प्रतिवर्ष एक बार होता ही रहता है और जिसका फल शास्त्रों में प्रायः शुभ माना गया है। इस प्रकार जहाँ कवि ने अपने ज्योतिष-ज्ञान को प्रकट किया है, वहीं उसने गणपति की वन्दना के साथ सौन्दर्य, आकर्षण और शुभ के प्रतीक रोहिणी नक्षत्र का यश के प्रतीक सूर्य से सम्बन्ध बताकर इस ओर भी संकेत किया है कि उसका यह काव्य सुन्दर, आकर्षक, मगलमय तथा यश का देने वाला है। एक दूसरे पद्य में राजा' बीसलदेव के विदेश गमन के लिये शुभ तिथि को बताते हुये कवि ने फिर अपने ज्योतिषी होने का प्रमाण दिया है। परन्तु, इन प्रमाणों के रहते हुए कवि को ज्योतिषी स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं उठायी जा सकती और तब कवि को ब्राह्मण मानना ही ठीक होगा। यहाँ यह कहना असंगत न होगा कि इस रासो में ऐसे अनेक स्थल आये हैं जहाँ यदि कवि 'जोसी' वर्ग का होता तो दानादि द्वारा दुष्ट ग्रहों की शान्ति की बात करता। लेकिन ऐसा उसने किया नहीं है। इसलिये वह 'जोसी' वर्ग का नहीं था यह सिद्ध है। सं० १६३३ वाली प्रति में जिस प्रकार नाह्मण जोइसी आदि शब्द कवि क साथ युक्त हैं उसी प्रकार स० १६६९ वाली प्रति में व्यास शब्द युक्त है कवि के साथ। व्यास शब्द पुल्लिंग है और बना हुआ है वि + अस् + घञ् के संयोग से जिसका अर्थ होता है पाठक प्रवक्ता। 'शब्दकल्पद्रुम' में भविष्य पुराण के एक पद को उद्धृत करके व्यास के लक्षणों को बतलाया गया है। विस्पष्टमद्रुत शान्त स्पष्टाक्षर पदं तथा। कलस्वरसमायुक्तं रसभावसमन्वितम् ॥
१- मास च्यार राजा दिन नहीं। तिथि तेइस अरु मगलवार ॥ इग्यारउ चन्द्र थारा घोडलाजोग ॥ नाँका लाभइ नहीं। पूपि नक्षत्र अरु कातिक मास ॥ तिण दिन राजा के गम करउ ॥ वउ आग्लउ राठ पूरइ थारी आस ॥५॥
- ७१ - बुद्ध्यमान : सदर्थे वै ग्रन्थार्थं कृतशो नृप । ब्राह्मणादिषु सर्वेषु ग्रन्थार्थं धारयेन्नृप ॥ यः एव वाचयेद् ब्रह्मन् स विप्रो व्यास उच्यते । अर्थात् अन्य अनेक लक्षणों के साथ-साथ व्यास का ब्राह्मण होना भी आवश्यक है। मोनियर-विलियम्स ने भी अपने द्वारा सम्पादित शब्दकोष Sanskrit English Dictionary में लिखा है कि "Vyas— Masc = A Brahmin who recites or expounds the Pur- anas etc. in public. हिन्दी शब्द सागर में भी उपयुक्त अर्थ की पुष्टि की गयी है। इसमें कहा गया है कि व्यास वह ब्राह्मण है जो रामायण, महा- भारत या पुराणों आदि की कथा लोगों को सुनाता हो । अस्तु, कवि को चाहे 'जोइसी' 'जोहसो' कहा जाय अथवा व्यास, इसमें सन्देह नहीं कि यह वयसुचीन ब्राह्मण था । काव्य-सौष्ठव बीसलदेव रासो हिन्दी जगत् की वह अमूल्य निधि है जो हमें आज से शताब्दियों पूर्व के भारत की अवस्था का दिग्दर्शन कराने में समर्थ है। जहाँ इसमें कोलाहलपूर्ण ऐतिहासिक वाद-विवादों की सृष्टि होती है, ताम्रपत्रों, वंशावलियों तथा शिलालेखों के जाँच की आवश्यकता पड़ती है वहीं काव्यगत रस, अलंकार, छन्द तथा वस्तु वर्णन आदि की अभिव्यञ्जना का समावेश भी है। खेद है कि कुछ विद्वानों ने इस ग्रन्थ को काव्य की कसौटी पर भलीभाँति न कस कर इसका साहित्यिक मूल्य न्यून समझा है।१ अस्तु, इसके साहित्यिक मूल्यांकन के लिए आवश्यक यह है कि समूचे ग्रन्थ को काव्य की कसौटी पर कसा जाय । १. क—यह कोई काव्य ग्रंथ नहीं केवल गाने के लिए रचा गया था । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल—हि० सा० इ०-पृ० ३० । ख—इसका विशेष साहित्यिक मूल्य नहीं है।—श्री सत्यजीवनवर्मा—बीसलदेव रासो पृ० ४३ । ग—न तो इसमें किसी प्रकार का साहित्यिक सौष्ठव है और न वर्णनों में किसी प्रकार की रोचकता मिलती है ।—डॉ० उदयनारायण तिवारी— वीर काव्य—पृ० १४६ ।
- ७२ - वस्तु-वर्णन काव्यों में प्रायः ऐसा देखा जाता है कि विवरण के लिये कवि या तो स्वयं वस्तुओं का वर्णन करता है अथवा पात्रों द्वारा उनका वर्णन करवाता है । वस्तु-वर्णन की कुशलता काव्य में जीवन डालकर उसे सरस बनाने में समर्थ होती है । बीसलदेव रासो में फुटकर वर्णनों का ताँता तो नहीं है लेकिन दो चार स्थल ऐसे अवश्य हैं जहाँ कवि ने स्वयं वस्तुओं का वर्णन किया है अथवा पात्रों द्वारा उनका वर्णन करवाया है । देखिये :- विवाह वर्णन—रासो में राजमती और बीसलदेव के विवाह का वर्णन हमें विस्तारपूर्वक मिलता है। हिन्दू-जाति की परम्पराओं के अनुसार कन्या के बढ़ते ही उसके घरवालों को कन्या के विवाह की व्यग्रता (विशेष कर उसकी माता को) से प्रारम्भ कर वर की खोज, ब्राह्मण द्वारा लग्न भेजना, तिलक, बारात की तैयारी तथा यात्रा, अगवानी, कन्यादान, भांवरी, दान, दहेज और वधू की विदाई आदि के वर्णन पढ़ने को मिलते हैं। विवाह का वर्णन कवि ने तत्कालीन भारत के दो प्रमुख शासकों विग्रहराज और भोज की मर्यादा के अनुकूल किया है । इसलिए इस वर्णन में हमें राजसी ठाट बाट का चित्र मिलता है। सांभर नरेश की बारात का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि— "पूजियो गणपवि चालीधर जान । छहइ चउरासीय हुण जी मान ॥ असी सहस घोड़ा घड़ा । साठ सहस पालकी अपारि ॥ गूजर गहड़ चाल्या घणा । रायराण तण अंत न पार ॥" विवाह वर्णन में जहाँ कवि ने राजसी ठाट बाट का दृश्य उपस्थित किया है वहाँ प्रथम, द्वितीय, तथा तृतीय भांवर के समय राजा भोज द्वारा सांभर नरेश को दहेज स्वरूप देशों को दिखाते समय यह भूल गया कि वह जिन देशों का दहेज दिला रहा है वे राजा भोज के अधिकार में थे भी या नहीं। षड् ऋतु—बारह मास वर्णन—राजा बीसलदेव के प्रवास-काल के पश्चात् रानी राजमती के विरह का वर्णन करते समय कवि ने षड्ऋतुओं का वर्णन, उनमें प्राकृतिक उद्दीपन होने के कारण, रानी के विरह की व्यथा को प्रभावोत्पादक बनाने के लिये किया है। विरहाग्नि राजमती को प्रत्येक मास में सताती है ।
An exact line-by-line transcription of the text from the image:
- ७३ - विरह में राजमती का शरीर क्षीण हो गया है, और उसे माघ मास में तुषार- पात के कारण दग्ध वनखण्ड को देखकर संसार दग्ध हुआ दिखाई पड़ता है। देखिये, यह कहती है :- "माह मास इसीय पड़इ ठंडार । दाधा छइ वनषण्ड कीधा हो छार । आप दहंती जग दहाउ । म्हा की चोली य मांहि थी दाधउ छइ गात्र । घणीय विहुणी गण तांकिजइ । तूँ तउ छयड्ढाउ रे भाविउयो करह पलाणी जोवन छत्र उमाहियउ । म्हाकी कनक काया माहे फेरथी आण ।" रानी राजमती को माघ की तरह वर्ष का प्रत्येक मास पीड़ा पहुँचाता है और वह विरहाग्नि में जल जल कर छटपटाती है। अन्त में वह ईश्वर से मर्म भरी प्रार्थना करती है। वह 'उलगणा की नारी' (प्रवासी की पत्नी) को छोड़कर और जिसका भी चाहे सृजन करें। देखिये कसक, व्यथा और दर्द भरा उसका उलाहना- "अजी जनम काइ दीयउ रे महेस । अवर जनम थारइ घणा रे नरेस । वनिन सिरजी रोझणी । घणहन सिरजी धवलीय गाइ । वनिहन सिरजी कोइली । हस बइमती आघा नइ चम्पा की डाल । भंपती दाप बिजोरणी । सइतउ काइ सिरजो उलगाणा की नारि ॥" कवि नल्ह का प्रस्तुत षड्ऋतु-वर्णन न तो कवि जायसी के पद्मावत के 'षड्ऋतु-वर्णन और नागमती वियोग खण्ड' के लम्बे-चौड़े वर्णन के समान ईश्वर से मिलन और उनके वियोग के मिस है, न भक्तप्रवर तुलसी के मानस के किष्किन्धा काण्ड के पावस और शरद् के वर्णन की भाँति नीति और भक्ति का उपदेशक, और न रीतिकालीन कवियों की तरह शब्दालंकारो तथा अर्थालंकारों के घटाटोप में मन और बुद्धि को कुछ क्षणों के लिए आच्छादित करने वाला, वरन्
- ७४ - है अपने ढंग का आकर्षक, मुख्य कथा से जुड़ा हुआ स्वाभाविक और प्रासंगिक, तथा हृदय पर गहरा प्रभाव डालने वाला । यहाँ इस कथन में भी अतिशयोक्ति न होगी कि षड्ऋतु-वर्णन की परम्परा का प्रारम्भ करने का श्रेय हिन्दी साहित्य में सर्वप्रथम कवि नरह को ही है; यदि हम बीसलदेव रासो को हिन्दी साहित्य का प्राचीनतम ग्रंथ मानते हैं, जिसे ऐसा मानने में हमें तब तक कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए जब तक इसे खण्डित करने के लिए कोई पुष्ट प्रमाण न मिल जाय । चरित्र-चित्रण दृश्य काव्यों में महाकाव्य के अतिरिक्त अन्य काव्यों में समग्र रूप से किसी चरित्र का चित्रण सम्भव नहीं होता । चरित्र-चित्रण के दो प्रकार होते हैं एक 'आदर्श' और दूसरा 'यथार्थ' । 'आदर्श' चरित्र-चित्रण में कवि अपनी भावना के अनुसार अपने काव्य के नायक अथवा नायिका के चरित्र में किसी प्रकार का दोष अथवा कोई त्रुटि नहीं आने देता । लेकिन 'यथार्थ' चरित्र के चित्रण के लिये कवि को अपने काव्य के लिये ऐसे नायक या ऐसी नायिका को चुनना पड़ता है जिसका सम्बन्ध संसार में नित्य प्रति देखे जाने वाले चरित्र के यथातथ्य रूप से होता है । 'आदर्श' चरित्र के भी दो प्रकार हैं-एक तो जातीय, राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक विचारों का अधिक से अधिक पूर्ण रूप से समन्वय करने वाला 'लोकादर्श चरित्र' जैसे रामचरित मानस के राम का और दूसरा उस ढंग के समन्वय या लौकिक औचित्य की भावना को गौण करके कोई एक भाव पराकाष्ठा तक पहुँचाने वाला 'ऐकान्तिक आदर्श चरित्र' ।¹ ऐसे ऐकान्तिक चरित्र धर्म और अधर्म दोनों के आदर्श हो सकते हैं जैसे धर्म के आदर्श सीता, भरत, हनुमान आदि एवं अधर्म का आदर्श रावण । बीसलदेव रासो के नायक और उसकी नायिका का चरित्र-चित्रण 'यथार्थ' की कोटि में आता है । इस रासो के नायक राजा बीसलदेव एक ऐतिहासिक पुरुष हैं । ग्रंथ की रचना-तिथि पर विचार करते हुए विशद रूप से इस बात पर भी विचार किया गया है कि ग्रन्थ के नायक कौन से बीसलदेव हो सकते हैं, तथा इस निष्कर्ष पर भी पहुँचना पड़ा है कि इस रासो के नायक बीसलदेव तृतीय हैं । यहाँ १. रेवातट — पृथ्वीराजरासो—सं० डा० विपिनबिहारी त्रिवेदी—भूमिका पृ० ४२ ।
- ७५ -
उन ऐतिहासिक तथ्यों की पुनरुक्ति न होगी यदि यह कहा जाय कि इतिहास में बीसलदेव चतुर्थ का जो चरित्र हमें प्राप्त होता है उसका कोई वर्णन इस रासो में नहीं है। इतिहास के अनुसार बीसलदेव चतुर्थ बड़ा वीर और प्रतापी राजा था। उसने मुसलमानों से कई लड़ाइयाँ लड़ी थीं और उत्तर पश्चिम भारत में पुनः एक बार हिन्दू राज्य की स्थापना की थी। शिब्जी और हाँसी प्रदेश भी इसने अपने राज्य में मिलाया था। २ इसके घोर चरित्र का बहुत कुछ वर्णन इसके राजकवि सोमदेव रचित 'ललित विग्रहराज नाटक' (संस्कृत) में है। ३ ऐसे पराक्रमी राजा के वीर चरित्रों के चित्रण का चूँकि इस रासो में अभाव है इसलिए ऊपर इस बात की सम्भावना प्रगट की गयी है कि इस रासो का सम्बन्ध बीसलदेव चतुर्थ से नहीं है। बीसलदेव तृतीय का चरित्र इतिहास में बीसलदेव चतुर्थ के समान म्लेच्छों से आर्यावर्त का उद्धार करने वाला अथवा विन्ध्य से लेकर हिमालय तक अपना राज्य स्थापित करने वाला नहीं चित्रित किया गया है। अस्तु, बहुत कुछ सम्भव है कि इसी कारण प्रस्तुत रासोकार ने इस खंडकाव्य की रचना करते समय बीसलदेव तृतीय के गुजरात आक्रमण के समय चालुक्यवंशीय राजा कर्ण से युद्ध को गौण रखकर उसके जीवन की एक स्वतः पूर्ण घटना परमारवंशीय राजा भोज की कन्या के साथ विवाह को प्रधानता दी। बीसलदेव के चरित्र का विकास इस रासो में रानी राजमती के विवाह के पश्चात् से आरम्भ होता है। विवाह के पश्चात् रानी द्वारा सिर्फ इतना ही कहने पर कि बीसलदेव के समान और इनसे बढ़कर भी इस भू-खण्ड पर और अन्य नृप हैं, राजा प्रण करता है कि वह अवश्य उन राजाओं को जीतेगा और अपने राज्य को हर प्रकार से समृद्ध बनायेगा। अपने इस प्रण की रक्षा के हेतु वह जिस रानी को ब्याह कर वह कुछ मास पूर्व ही लाया है और जो अनन्य सुन्दरी है उसके रूप और यौवन की कुछ परवाह नहीं करता और बारह वर्षों का उड़ीसा प्रवास धीरे २. आर्यावर्तं यथार्थं पुनरपि कृतवा म्लेच्छविच्छेदनाभि- र्देवः शाकम्भरीन्द्रो जयति विजयते वीसलः क्षोणिपालः ॥ मूते सम्प्रति चाहुवाणतिलकः शाकम्भरीभूपति श्रीमान्विग्रहराज एष विजयी सन्तानगानात्मनः । -- फीरोजशाह की लाट (दिल्ली) पर वि० सं० १२२० वैशाख शुक्ला १५ का लेख ३. Indian Antiquary vol. XX P. 201—D. Keilhorn
- ७९ - की खान को प्राप्त करने के लिए करता है। उड़ीसा पहुँच कर राजा बीसलदेव को अपने कार्य में सिद्धि बिना किसी लड़ाई के ही प्राप्त हो जाती है और वह उड़ीसा के प्रधान के यहाँ एक अति सम्मानित अतिथि के समान रहता है। कुछ समय पश्चात् रानी राजमती का यह समाचार दूत के हाथ प्राप्त होने पर कि अब रानी राजमती का जीवित रहना राजा के विरह में असम्भव है राजा उड़ीसा से लौटने की तैयारी करता है। उड़ीसा के राजा तथा रानी उसको रोकना चाहते हैं। रानी तो बीसलदेव से यहाँ तक कहती है कि वह अब साँभर लौटकर न जाय और उड़ीसा में ही उसके विवाह का प्रबन्ध सुन्दरी से सुन्दरी कन्या के साथ होने का कर दिया जायगा। लेकिन राजा बीसलदेव उड़ीसा प्रवास के समय रानी राजमती को दिये गये अपने वचन की दृढ़तापूर्वक रक्षा करता है और उड़ीसा की रानी द्वारा किये गये प्रस्ताव को अस्वीकार कर असंख्य धन लेकर अजमेर लौट आता है। इतिहास में कहीं भी बीसलदेव तृतीय के उड़ीसागमन की कथा नहीं मिलती। ऐसा ज्ञात होता है कि कवि ने राजा बीसलदेव के के चरित्र के विकास के हेतु ही इस कथा का सृजन कल्पना के आधार पर किया है। कल्पना की सहायता भले ही कवि ने बीसलदेव के चरित्र चित्रण में ली हो लेकिन इसे तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि बीसलदेव तृतीय के जीवन-चरित्र का यह अंश अधूरा ही रह जाता यदि कवि ने इस ग्रन्थ की रचना न की होती। साहित्य की रक्षा इसीलिए किसी देश अथवा जाति के लिए (इतिहास का भी साहित्य के अन्तर्गत ही मैं मानता हूँ) स्वतन्त्रता से बढ़कर होती है। रानी राजमती के चरित्र को कवि ने स्त्री-सुलभ गुणों से पूर्ण चित्रित किया है। राजमती की प्रगल्भता से ही इस रासो का प्रारम्भ होता है। वह राजा बीसलदेव के गर्वयुक्त कथनों को नहीं सह सकती और ऐसा चुभता हुआ प्रत्युत्तर १ उन्हें देती है कि राजा को अपना राज्य छोड़ कर विदेश गमन करना पड़ता है। लेकिन जहाँ उसमें इतनी प्रगल्भता है वहीं उसका हृदय स्त्रियोचित १—गरब न कीजइ धणी संभरि धाणि। तुहू समा छह घणारि भूवाल। ऐक उडीसा कउ धणी। वचइ माफा मानि न मानि। नउ थारइ साभरिउ महइ। तिन्हठवा घरि उमहइ हीरा की पाणि ॥ ४१ ॥
- ७७ -
कोमल भावनाओं से भी पूर्ण है। यह राजा के विरह को सहन करने के लिए तैयार नहीं है, और इसीलिए कहती है कि— "म्हे विर। स्या बोलियड दोस। पग की पाणिही संकिसउ रोस। कीडी उपरि कटकी किसी। म्हे हरया थे फेरि जाणोयड साथ। उमी मेलिह ऊलग घडउ। जल विहुणीय किम जीवइ मछ ॥ ४३ ॥” लेकिन उसकी यह चातुरीपूर्ण बातें उसे राजा के विरह से वंचित करने में असमर्थ होती हैं। अतः वह अपने उस अस्त्र का प्रयोग करती है जिस पर प्रत्येक स्त्री को ऐकांतिक भरोसा होता है लेकिन उसका यह शस्त्र भी चूक जाता है जिसे वह अपनी सहेलियों से राजा के विछोह के पश्चात् स्वीकार करती है— सुणउ सहेलीय म्हारीय वात। कंचूउ पोलि दिपाया गात्त। त्रिय चरित्र मइ लप किया। म्हरिय राउ न जाणए घात।… अपने इस शस्त्र के चूक जाने के पश्चात् भी यह राजा के उड़ीसा प्रवास को रोकने का प्रयत्न जारी रखती है। राजज्योतिषी से प्रवास के लिये चार मास पश्चात् की तिथि देने के उसके आग्रह में उसके चरित्र का प्रगाढ़ पति-प्रेम एव पतिव्रता हिन्दू पत्नी का पति द्वारा अनादर होने पर भी पति के प्रति शुभ कामना सन्निहित है। चार मास के बाद निश्चित तिथि पर जब राजा उड़ीसा गमन के लिये तैयार होता है, रानी अपने विरह के समय आने वाले दुखों को भूलकर अपने नीतिपूर्ण उदात्त चरित्र का परिचय देते हुए राजा को शिक्षा देती है कि— "उलग जाण की धरीय अगीस। राज चालण की ऐहछइ सीष। इणि विधि राज माहे संचरे। बइठा राजा सभा परधान। विणि सं मीठा बोलिथ्यो। नाई साहणी दूणउ मान।
- ७४ - बाह्रिय सरिसउ मति इसउ । बठइ राइ भोलाइसी भीतर गोठि । राजमती करि बोलिज्यो । फाक नरङ्गा अरु नीची दिठि । ८८॥" राजा के उड़ीसा गमन के पश्चात् रानी राजमती राजा के विरह में व्याकुल हो जाती है। वर्ष की किसी ऋतु में उसे शान्ति नहीं मिलती। वह पूर्णयौवना है और युवावस्था में पति का वियोग कितना दुःखदायी होता है यह तो एक विरहिणी नारी ही बता सकती है। ऐसी परिस्थिति में प्राय देखा जाता है कि नारियाँ पातिव्रत धर्म को ताक पर रखकर स्वैराचार की ओर प्रेरित हो जाती हैं। लेकिन राजमती एक आदर्श पतिव्रता हिन्दू नारी की भाँति इन विकट परिस्थितियों का सामना करती है और कुटनी द्वारा भ्रष्ट आचरण के प्रस्ताव को ठुकरा देती है।¹ अन्त में रानी राजमती के सुख के दिन लौटते हैं। बीसलदेव उड़ीसा से अगाध द्रव्य लेकर लौटते हैं। रानी को उन निर्जीव द्रव्यों को तो नहीं पर अपने सजीव द्रव्य को पाकर अत्यन्त खुशी होती है। कवि नाल्ह मुखरा, प्रगल्भा नीति निपुणा, तथा पतिव्रतपरायणा राजमती के चरित्र चित्रण में प्रत्येक दृष्टि से सफल हुआ है। इस रासो में उपर्युक्त दोनों चरित्रों को छोड़कर अन्य चरित्रों का विकास नहीं हुआ है। रस हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने रासो काव्य को 'वीरगाथा' काल की संज्ञा दी है। निस्सन्देह यदि 'पृथ्वीराज रासो' को इस काल का प्रतीक ग्रन्थ १—असीय वरस की बुढडइ वेसि । दंत पडूया सिरि पाहुरा केस । आइ आवीसइ सघरी । गलि लागइ अरू रूदन करति । किमदिन काढइ भाखिणी । राति दिवस भामइ घारोय चीत । जेवइ आवइ साभर धणी । तेवइ चञ्चल पाठव करउ ये मीत ॥१३७॥
- ७९ -
स्वीकार कर लिया जाय तो इतिहासकारों द्वारा दिया गया उपर्युक्त नाम सार्थक सिद्ध हो सकता है। लेकिन 'बीसलदेवरासो' जिसे इस काल का प्राचीनतम ग्रन्थ मानने में दो मत नहीं हो सकते, एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें वीर रस का तो सर्वथा अभाव है और है शृंगार रस की प्रधानता। अतएव प्राचीनतम ग्रन्थ होने के नाते यदि यह काव्य रासो काल का प्रतीक ग्रन्थ माना जाय तब तो इस काल को वीरगाथा काल कहना कहाँ तक सार्थक होगा यह विवादग्रस्त प्रश्न हो जाता है। 'बीसलदेवरासो' चूँकि शृंगार रस प्रधान काव्य है इसलिए इसमें शृंगार रस खोजने का प्रयास नहीं करना पड़ता। संयोग और वियोग शृंगार से सारा ग्रन्थ परिपूर्ण है। संयोग शृंगार का तो कम लेकिन वियोग शृंगार का अभाव ग्रन्थ में परिलक्षित नहीं होता। कहा तो यह भी जा सकता है कि वियोग शृंगार की ही प्रधानता है। वियोग शृंगार का चित्र इस खण्ड काव्य में हमें बीसलदेव के रानी राजमती के विवाह के पश्चात् उड़ीसा गमन पर मिलता है। रानी राजमती का विवाह राजा के साथ उसकी बारह बरस की अवस्था में होता है। विवाह के तुरन्त पश्चात् ही राजा के परदेश गमन से राजमती को विरह का सामना करना पड़ता है। प्रोषितपतिका नायिका राजमती के विरह को षड्ऋतु में घटने वाली प्राकृतिक घटनायें उद्दीप्त करती हैं। सावन का सुन्दर महीना है। वर्षा-ऋतु आरम्भ हो गयी है। पानी की छोटी-छोटी बूँदें पड़ रही हैं। युवतियाँ कजली गा रही हैं। पपीहा 'पी कहाँ-पी कहाँ' की रट लगाये हुए है। लेकिन ये सारे सुन्दर दृश्य विरहिणी राजमती के हृदय में शूल पैदा करते हैं। वह कहती है- सावण वरसइँ छइ छोटिय धार । प्रीयविण जीविजइ किसइ आधारि । छह को खेलइ काजली । तठइ चोतीय कमठीय पड़िया झाल । पापीहा पीव पीव करइ । मोनई अणप छायइ सावण मास ॥ २९ ॥ विप्रलम्भ शृङ्गार के प्रवासहेतुक वियोग के भविष्यत् प्रवास का चित्र अंकित करते हुए कवि बीसलदेव के भविष्यत् प्रवास से व्याकुल राजमती के मुख से कहवाता है-
- ५० - हिव छंडी स्वामी थारूरी आस। जोगणि होई सेवं बनवास। कहूं तप तपूं बनर बसी। कहू सरीर संपउं देसि फेडारि। कहिहि, हिमालइ माहि गिलउ। स्वामी घण मरिसी गंग नई बारि ॥ ७० ॥ संताप, निद्रा भंग, कृशता, प्रलापादि विप्रलम्भ शृंगार के अनुभाव के कारण प्रवात्स्यत्पतिका नायिका की कृशता के चित्र अनेक लक्षण और लक्ष्य ग्रन्थों के रचयिता आचार्यों तथा रीतिकालीन कवियों द्वारा उपस्थित किए गये हैं। रासो का नायक भी यद्यपि न तो लक्षण या लक्ष्य ग्रंथ की रचना कर रहा था और न उसका उद्देश्य नायिकाभेद की रचना करना था, फिर भी रानी राजमती की कृशता का चित्र जो उसने चित्रित किया है वह रीतिकालीन कवियों अथवा उर्दू के शायरों के ऐसे चित्रित किये गये चित्र से किसी रूप में कम नहीं है। रानी राजमती राजा के विरह में इतनी कृशगात हो गयी है कि उसकी अँगुली की अँगूठी उसकी बांह में आ जाती है।¹ देखिये कवि कहता है कि— गोरही घइली छइ बंभणक जाइ। करि जोड़ी थारइ लागू पाइ। राजमती करइ बीनती। पंड्या कहिज्यो धण का नांह नई जाइ। आँगुली थारूी मुद्रड़ी। ढलिकन आवइ हो धणकीय बाह ॥ १४२ ॥ रसराज शृंगार का जो निखरा सौन्दर्य हमें वियोग में देखने को मिलता है १—सुनहु स्याम ब्रज में लगी दसन दसा की ज्योति। जहँ मुंदरी अंगुरीन की बाह में ढीली होति ॥ × × × तुम पूछत कहि मुद्रिके, मौन होत यहि नाम। कंकन की पदवी दई तुम बिन या कहँ राम ॥—केशव × × × जीवन की अब हे कवि आस न मोहि। कनुगुरिया की मुंदरी कंकन मोहि ॥—तुलसीदास