संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
लिये दैव अथवा तीर्थ ही आश्रय या शरण हैं।' पौत्रकी यह बात सुनकर पुलस्त्यने कहा—'बेटा! तुम गौतमी गङ्गामें जाकर भगवान् शंकरकी स्तुति करो। वहाँ गङ्गाके जलमें रावणका प्रवेश नहीं हो सकता। अतः मेरे साथ वहीं चलकर कल्याणमयी सिद्धि प्राप्त करो।'
कुबेरने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और पत्नी, पिता, माता तथा वृद्ध महर्षि पुलस्त्यके साथ गौतमी गङ्गाके तटपर गये। वहाँ गङ्गामें स्नान करके पवित्र हो कुबेर भोग-मोक्षके दाता देवदेवेश्वर भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे—"शम्भो! आप ही इस चराचर जगत्के स्वामी हैं, दूसरा कोई नहीं। जो लोग आपकी भी अवहेलना करके मोहवश धृष्टता करते हैं, वे शोकके ही योग्य हैं। आप अपनी आठ मूर्तियोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्का भरण-पोषण करते हैं। आपकी आज्ञासे ही सब लोग चेष्टा करते हैं, तथापि विद्वान् पुरुष ही आपकी महिमाको कुछ-कुछ जान पाते हैं। अज्ञानी पुरुष आप पुरातन प्रभुको कभी नहीं जान सकता। एक दिन जगदम्बा पार्वतीने अपने शरीरके मैलसे एक पुतला बनाकर रख दिया और परिहासमें आपसे कहा—'देव! यह आपका शूरवीर पुत्र है।' उसपर आपकी कृपादृष्टि हुई और वह विघ्नोंका राजा गणेश बन गया। अहो, महेश्वरकी दृष्टिका कितना अद्भुत प्रभाव है! जब कामदेव भस्म हो गया और रति उसके लिये विलाप करने लगी, तब दयामयी माता पार्वतीने आँसू बहाते हुए आपकी ओर देखकर कहा—'भगवन्! इन बेचारोंका दाम्पत्य-सुख छिन गया।' तब आपने उसपर भी कृपा की। कामदेव मनोभव हो गया—वह रतिकी मनोभूमिमें प्रकट हो गया। इस प्रकार उमासहित महादेवजीकी कृपासे रतिने पूर्ण सौभाग्य प्राप्त किया।"
इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकर कुबेरके सामने प्रकट हुए। उन्होंने वर माँगनेके लिये कहा, किंतु हर्षातिरेकके कारण कुबेरके मुखसे कोई बात नहीं निकली। इसी समय आकाशवाणी हुई। उसने मानो पुलस्त्य, विश्रवा और कुबेरके हार्दिक अभिप्रायको जानकर यह कल्याणमय वचन कहा—'भगवन्! ये लोग धनका प्रभुत्व प्राप्त करना चाहते हैं। इनके लिये भविष्य भूत-सा बन जाय। जिस वस्तुको ये किसीके लिये देना चाहें, वह दी हुईके समान हो जाय तथा जो वस्तु ये स्वयं प्राप्त करना चाहें, वह पहले ही इनके सामने प्रस्तुत हो जाय। ये भगवान् शंकरकी आराधना करके इस बातकी अभिलाषा रखते हैं कि हमारे शत्रु परास्त हों, दुःख दूर हो जाय, दिक्पालका पद प्राप्त हो, धनका प्रभुत्व मिले, अपरिमित दान-शक्ति हो। साथ ही स्त्री और पुत्रका सुख भी बना रहे।'
कुबेरने वह आकाशवाणी सुनकर त्रिशूलधारी भगवान् शंकरसे कहा—'देव! ऐसा ही हो।' 'तथास्तु' कहकर शिवने उस दैवी वाणीका अनुमोदन किया। इस प्रकार पुलस्त्य, विश्रवा और कुबेरका वरदानसे अभिनन्दन करके भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तबसे उस तीर्थके तीन नाम पड़े—पौलस्त्यतीर्थ, धनदतीर्थ और वैश्रवणतीर्थ। वह समस्त कामनाओंको देनेवाला शुभ तीर्थ है। वहाँ स्नान आदि जो कुछ भी पुण्यकर्म किया जाता है, वह अधिक पुण्यदायक होता है।
पौलस्त्यतीर्थके बाद अग्नितीर्थ है। वह सब यज्ञोंका फल देनेवाला और समस्त विघ्नोंको शान्त करनेवाला है। उस तीर्थका फल सुनो। अग्निके भाई जातवेदा हैं, जो देवताओंके पास हविष्य पहुँचाया करते हैं। एक दिनकी बात है—गोदावरीके तटपर ऋषियोंके यज्ञमण्डपमें यज्ञ हो
- पौलस्त्य, अग्नि और ऋणमोचन नामक तीर्थोंका माहात्म्य * १७९
रहा था। अग्निके प्रिय भाई जातवेदा देवताओंके हविष्यका वहन कर रहे थे। उसी समय दितिके बलवान् पुत्र मधुने प्रधान-प्रधान ऋषियों और देवताओंके देखते-देखते जातवेदाको मार डाला। उनके मरनेपर देवताओंको हविष्य मिलना बंद हो गया। इधर अपने प्रिय भाई जातवेदाके मारे जानेसे अग्निको बड़ा क्रोध हुआ। वे गौतमी गङ्गाके जलमें समा गये। अग्निके जलमें प्रवेश करनेपर देवता और मनुष्य जीवनका त्याग करने लगे, क्योंकि अग्नि ही उनका जीवन है। अग्निदेव जहाँ जलमें प्रविष्ट हुए थे, उस स्थानपर सम्पूर्ण देवता, ऋषि और पितर आये और यह सोचकर कि बिना अग्निके हम जीवित नहीं रह सकते, उनकी स्तुति करने लगे। इतनेमें ही जलके भीतर उन्हें अग्निका दर्शन हुआ। उन्हें देखकर देवता बोले—'अग्ने! आप हविष्यके द्वारा देवताओंको, कव्य (श्राद्ध)-से पितरोंको तथा अन्नको पचाने और बीजको गलाने आदिके द्वारा मनुष्योंको जीवित कीजिये।'
अग्निने उत्तर दिया—'मेरा छोटा भाई, जो इस कार्यमें समर्थ था, चला गया। आपलोगोंका काम करनेमें जातवेदाकी जो गति हुई है, वह मेरी भी हो सकती है। अतः मुझे आपलोगोंके कार्य-साधनमें उत्साह नहीं है।' तब देवताओं और ऋषियोंने सब प्रकारसे अग्निकी प्रार्थना करते हुए कहा—'हव्यवाहन! हमलोग आपको आयु, कर्म करनेमें उत्साह और सर्वत्र व्यापक होनेकी शक्ति देते हैं। साथ ही प्रयाज और अनुयाज भी देंगे। देवताओंके आप ही श्रेष्ठ मुख होंगे। पहली आहुतियाँ आपको ही मिलेंगी। आप जो द्रव्य हमें देंगे, वही हम भोजन करेंगे।'
इस आश्वासनसे अग्निदेव प्रसन्न हुए। उन्हें इस लोक और परलोकमें व्यापक रहनेकी शक्ति प्राप्त हुई। वे सर्वत्र निर्भय हो गये। जातवेदा, बृहद्भानु, सप्तार्चि, नीललोहित, जलगर्भ, शमीगर्भ और यज्ञगर्भ—इन नामोंसे उन्हींका बोध होने लगा। देवताओंने अग्निको जलसे निकाला और जातवेदा तथा अग्नि दोनोंके पदपर उनका अभिषेक किया। कार्य सिद्ध होनेपर देवता भी अपने-अपने स्थानको चले गये। तभीसे वह स्थान 'वह्नितीर्थ' कहलाता है। वहाँ सात सौ उत्तम तीर्थोंका निवास है। जो जितात्मा पुरुष उन तीर्थोंमें स्नान और दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका पूरा फल प्राप्त होता है। वहीं देवतीर्थ, अग्नितीर्थ और जातवेदस्तीर्थ भी हैं। अग्निद्वारा स्थापित अनेक वर्णोंके शिवलिङ्गोंका भी वहाँ दर्शन होता है। उसके दर्शनसे सब यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।
उसके बाद 'ऋणमोचन' नामक तीर्थ है। जिसके महत्त्वको वेदवेत्ता पुरुष जानते हैं। नारद! मैं उसके स्वरूपको बतलाता हूँ, मन लगाकर सुनो। कक्षीवान्का ज्येष्ठ पुत्र पृथुश्रवा था। वह वैराग्यके कारण न तो विवाह करता था और न अग्निहोत्र ही। कक्षीवान्का कनिष्ठ पुत्र भी विवाहके योग्य हो गया था तो भी उसने परिवित्ति* होनेके भयसे विवाह और अग्निहोत्र नहीं किये। तब पितरोंने कक्षीवान्के दोनों पुत्रोंसे पृथक्-पृथक् कहा—'तुम देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋणसे मुक्त होनेके लिये विवाह करो।' ज्येष्ठ पुत्रने कहा, 'नहीं, कैसा ऋण और कौन उससे मुक्त होता है।' छोटे पुत्रने उत्तर दिया, 'बड़े भाईके अविवाहित रहते मेरा विवाह करना उचित नहीं है। अन्यथा परिवित्ति होनेका भय है।' तब
- बड़े भाईकी अविवाहित अवस्थामें विवाह कर लेनेवाला छोटा भाई परिवित्ति कहलाता है। इसे शास्त्रोंमें दोष माना गया है।
४७- सुपर्णा-संगम, पुरूरवस्तीर्थ, पञ्चतीर्थ, शमीतीर्थ, सोम आदि तीर्थ तथा वृद्धा-संगम-तीर्थकी महिमा
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पितरोंने उन दोनोंसे कहा—'तुमलोग गौतमी गङ्गामें जाकर स्नान करो। गौतमीका स्नान सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। गौतमी गङ्गा तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली हैं। उनके जलमें श्रद्धापूर्वक स्नान और तर्पण करो। गौतमीका दर्शन, वन्दन और ध्यान करनेसे वे समस्त कामनाएँ पूर्ण करती हैं। वहाँ स्नान करनेके लिये कोई देश, काल और जाति आदिका नियम नहीं है। गौतमीमें स्नान करनेसे बड़े भाईपर कोई ऋण नहीं रहता और छोटा भाई परिवित्ति नहीं होता।'
पितरोंके आदेशसे कक्षीवान्का ज्येष्ठ पुत्र पृथुश्रवा गौतमीमें स्नान और तर्पण करके तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया। तबसे वह तीर्थ 'ऋणमोचन' कहलाता है। वहाँ स्नान और दान करनेसे ऋणवान् मनुष्य श्रौत-स्मार्त तथा अन्य ऋणोंसे भी मुक्त होकर सुखी होता है।
सुपर्णा-संगम, पुरूरवस्तीर्थ, पञ्चतीर्थ, शमीतीर्थ, सोम आदि तीर्थ तथा वृद्धा-संगम-तीर्थकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं— इसके बाद सुपर्णा-संगम तथा काद्रवा-संगम नामक तीर्थ हैं, जहाँ भगवान् महेश्वर गङ्गाके तटपर स्थित हैं। वहीं अग्निकुण्ड, रुद्रकुण्ड, विष्णुकुण्ड, सूर्यकुण्ड, सोमकुण्ड, ब्रह्मकुण्ड, कुमारकुण्ड तथा वरुणकुण्ड भी हैं। उस स्थानपर अप्सरा नामकी नदी गौतमी गङ्गामें मिली है। उस तीर्थके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। वह सब पापोंका निवारण करनेवाला है।
उससे आगे पुरूरवस् नामक तीर्थ है। उसके दर्शनकी तो बात ही क्या, स्मरणमात्रसे ही पापोंका नाश हो जाता है। एक समय राजा पुरूरवा ब्रह्माजीकी सभामें गये। वहाँ देवनदी सरस्वती ब्रह्माजीके पास बैठी हँस रही थीं। उस रूपवती देवीको देखकर राजाने उर्वशीसे पूछा— 'ब्रह्माजीके पास यह रूपवती साध्वी स्त्री कौन है ? यह तो सबसे सुन्दरी युवती है और अपने सौन्दर्यके प्रकाशसे इस सभाको उद्दीप्त कर रही है।' उर्वशीने कहा—'ये कल्याणमयी ब्रह्मकुमारी देवनदी सरस्वती हैं। ये प्रतिदिन आती-जाती रहती हैं।' यह सुनकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने उर्वशीसे कहा—'इसको मेरे पास बुला लाओ।' उर्वशीने जाकर राजाका संदेश सुना दिया। सरस्वतीने स्वीकार कर लिया तथा अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार वह पुरूरवाके पास आयी। राजाने सरस्वती नदीके तटपर उसके साथ अनेक वर्षोंतक विहार किया। यह देख मैंने सरस्वतीको शाप दे दिया। मेरे शापके कारण वह मृत्युलोकमें कहीं लुप्त हो गयी है और कहीं दिखायी देती है। जहाँ सरस्वती नदी गङ्गामें मिली है, वहाँ पहुँचकर राजा पुरूरवाने तपस्या की और महादेवजीकी आराधना करके गङ्गाजीके प्रसादसे सम्पूर्ण अभीष्ट प्राप्त कर लिया। तबसे उस स्थानका नाम पुरूरवस्तीर्थ, सरस्वती-संगम और ब्रह्मतीर्थ पड़ गया। वहाँ सिद्धेश्वर नामसे प्रसिद्ध महादेवजी रहते हैं। वह तीर्थ समस्त कामनाओंको देनेवाला है।
उसके सिवा सावित्री, गायत्री, श्रद्धा, मेधा और सरस्वती—ये पाँच पुण्य तीर्थ हैं। वहाँ स्नान और जलपान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। ये पाँचों मेरी कन्याएँ हैं, जो नदीरूपमें परिणत हो गयी हैं। जहाँ वे भगवती गङ्गासे मिली हैं, वहीं पाँच तीर्थ हैं। वे पाँच नदियाँ और सरस्वती पवित्र तीर्थ हैं। मनुष्य उनमें स्नान, दान
* सुपर्णा-संगम, पुरूरवस्तीर्थ, पञ्चतीर्थ, शमीतीर्थ, सोम आदि तीर्थोंकी महिमा * १८१
आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अभिलषित वस्तुओंको देनेवाला तथा नैष्कर्म्यसे भी बढ़कर मोक्षका साधक माना गया है।
शमीतीर्थके नामसे जिसकी प्रसिद्धि है, वह भी सब पापोंकी शान्ति करनेवाला है। नारद! उस तीर्थकी कथा सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनो। पूर्वकालमें प्रियव्रत नामसे प्रसिद्ध क्षत्रिय राजा हो गये हैं। उन्होंने गोदावरीके दक्षिण- तटपर अश्वमेध-यज्ञकी दीक्षा ली। उस यज्ञके पुरोहित हुए वसिष्ठजी। एक दिन उस यज्ञमें हिरण्यक नामका दानव आया। महर्षि वसिष्ठने अपने ब्रह्मदण्डसे सब दैत्योंको मार भगाया। तदनन्तर पुनः यज्ञ आरम्भ हुआ। दैत्य अपनी सेनाके साथ भाग खड़ा हुआ। वहाँ निम्नाङ्कित तीर्थोंने अश्वमेध-यज्ञके फल दिये—शमीतीर्थ, विष्णुतीर्थ, अर्कतीर्थ, शिवतीर्थ, सोमतीर्थ और वसिष्ठतीर्थ। यज्ञ समाप्त होनेपर देवताओं और ऋषियोंने वसिष्ठ और प्रियव्रतसे कहा—इन तीर्थोंने अश्वमेध-यज्ञका फल दिया है; अतः इनमें स्नान- दान करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका पुण्य-फल प्राप्त करेगा—इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है।
मुने! गौतमीमें एक स्थानपर अनेक नद- नदियाँ मिली हैं। उन सबके नामपर पृथक्-पृथक् तीर्थ हैं। उन तीर्थोंके नाम ये हैं—सोमतीर्थ, गन्धर्वतीर्थ, देवतीर्थ, पूर्णातीर्थ, शालतीर्थ, श्रीपर्णा- संगम, स्वागता-संगम, कुसुमा-संगम, पुष्टि-संगम, कर्णिका-संगम, वैणवी-संगम, कृशरा-संगम, वासवी- संगम, शिवशर्मा, शिखी, कुसुम्भिका, उपारथ्या, शान्तिजा, देवजा, अज, वृद्ध, सुर और भद्र आदि। ये तथा और भी बहुत-से नद-नदीगण गौतमीमें मिले हैं। पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी देवगिरिपर गये थे। फिर वे ही क्रमशः गङ्गामें आ मिले। कोई नदीरूपमें था और कोई नदरूपमें। किसीका रूप सरोवरके आकारमें था और किसीका स्रोतके आकारमें। वे ही सब तीर्थ पृथक्-पृथक् विख्यात हुए। उन सबमें किया हुआ स्नान, जप, होम, पितृ-तर्पण आदि कर्म समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला और मुक्तिदायक माना गया है। जो इनके नामोंका पाठ अथवा स्मरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।
वृद्धा-संगम नामक एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ वृद्धेश्वर नामक शिवका निवास है। उस तीर्थकी कथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। पूर्वकालमें एक महातपस्वी मुनि थे। उनका नाम वृद्धगौतम था। वे जब बालक थे, तब किसी तरह पिताने उनका यज्ञोपवीतमात्र कर दिया। इसके बाद वे बाहर भ्रमण करनेको चले गये। उन्हें केवल गायत्री-मन्त्र याद था। वे वेदोंका अध्ययन और शास्त्रोंका अभ्यास नहीं कर सके। केवल गायत्रीका जप और अग्निहोत्र नियमपूर्वक कर लेते थे। इतनेसे ही उनका ब्राह्मणत्व सुरक्षित था। विधिपूर्वक अग्निकी उपासना और गायत्री-जप करनेसे उनकी आयु बहुत बढ़ गयी। यों भी उनकी अवस्था अधिक हो चुकी थी। किंतु विवाह न हो सका, कोई उन्हें कन्या देनेवाला नहीं मिला।
गौतम भिन्न-भिन्न तीर्थों, वनों और पवित्र आश्रमोंमें भ्रमण करते रहे। घूमते-घूमते शीत- गिरिपर चले गये और वहीं रहने लगे। वहाँ उन्होंने एक रमणीय गुफा देखी, जो लताओं और वृक्षोंसे घिरी हुई थी। उसमें एक अत्यन्त दुर्बल वृद्धा तपस्विनी रहती थी, उसके सब अङ्ग शिथिल हो गये थे। वह वीतरागा ब्रह्मचारिणी थी और एकान्तमें रहा करती थी। उसे देख मुनिश्रेष्ठ गौतम नमस्कारके लिये खड़े हो गये।
वृद्धाने कहा—आप मेरे गुरु होंगे, अतः
६८- वृद्धा तपस्विनीका गौतमको अपना परिचय देना
१८२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
मुझे प्रणाम न करें। जिसे गुरु नमस्कार करता है, उसकी आयु, विद्या, धन, कीर्ति, धर्म और स्वर्ग आदि सब नष्ट हो जाते हैं।
यह सुनकर गौतम बड़े आश्चर्यमें पड़े। वे हाथ जोड़कर बोले—'तुम वृद्धा तपस्विनी हो, गुणोंमें भी मुझसे बढ़ी-चढ़ी हो। मैं बहुत कम पढ़ा-लिखा और अवस्थामें भी छोटा हूँ, फिर तुम्हारा गुरु कैसे हो सकता हूँ।'
वृद्धाने कहा—आर्ष्टिषेणके प्रिय पुत्र ऋतध्वज थे; वे बड़े गुणवान्, बुद्धिमान्, शूरवीर तथा क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहनेवाले थे। एक दिन वे शिकार खेलनेके लिये वनमें आये और इसी गुफामें आकर विश्राम करने लगे। यहाँ उनपर एक सुन्दरी अप्सराकी दृष्टि पड़ी, उसका नाम सुश्यामा था। वह गन्धर्वराजकी कन्या थी। राजाने भी उसे देखा। दोनोंके मनमें एक-दूसरेसे मिलनेकी इच्छा हुई। ऋतध्वजने सुश्यामाके साथ विहार किया। भोगेच्छा निवृत्त होनेपर राजा उसकी अनुमति ले अपने घर चले गये। तदनन्तर सुश्यामाके गर्भसे मेरा जन्म हुआ। जब माता यहाँसे जाने लगी, तब बोली--'कल्याणी ! जो पुरुष इस गुफामें पहले आ जाय, वही तुम्हारा पति होगा।' तबसे आजतक तुम्हीं यहाँ आये हो। दूसरा कोई पुरुष कभी यहाँ नहीं आया। ब्रह्मन्! और किसीने मेरा वरण नहीं किया है। न मेरी माता है, न पिता। मैं आप ही अपनी मालिक हूँ। अबतक ब्रह्मचर्य-व्रतमें रही। अब पुरुषकी इच्छा रखती हूँ, आप मुझे स्वीकार करें।
गौतम बोले—भद्रे ! मेरी अवस्था तो अभी एक हजार वर्षकी ही है और तुम नब्बे हजार वर्षकी हो गयी हो। मैं बालक और तुम वृद्धा; यह सम्बन्ध योग्य नहीं जान पड़ता।
वृद्धाने कहा—पूर्वकालमें ही आप मेरे पति नियत कर दिये गये हैं। अब दूसरा कोई मेरा पति नहीं हो सकता, विधाताने आपको मुझे दिया है; अतः अब आप मुझे अस्वीकार न करें। मुझमें कोई दोष नहीं है। मैं आपमें भक्ति रखती हूँ; तब भी यदि आप मुझे ग्रहण करना नहीं चाहते तो आपके देखते-देखते अभी अपने प्राण त्याग दूँगी। यदि अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति न हो तो प्राणियोंके लिये मर जाना ही अच्छा है। प्रेमीजनके परित्यागसे जो पातक लगता है, उसका अन्त नहीं है।
वृद्धाकी बात सुनकर गौतमने कहा—'मुझमें न तपस्या है न विद्या। मैं कुरूप और निर्धन हूँ, अतः तुम्हारे लिये योग्य वर नहीं हो सकता। पहले सुन्दर रूप और उत्तम विद्याकी प्राप्ति करके मुझे तुम्हारी बात माननी चाहिये।'
वृद्धाने कहा—ब्रह्मन्! मैंने अपनी तपस्यासे सरस्वतीदेवीको संतुष्ट किया है, साथ ही रूप देनेवाले अग्नि भी मुझपर प्रसन्न हैं; अतः
- सुपर्णा-संगम, पुरूरवस्तीर्थ, पञ्चतीर्थ, शमीतीर्थ, सोम आदि तीर्थोंकी महिमा * १८३
वागीश्वरी देवी आपको विद्या देंगी और रूपवान् अग्निदेव रूप प्रदान करेंगे।
यों कहकर वृद्धाने सरस्वती और अग्निकी प्रार्थना करके गौतमको विद्वान् और सुरूपवान् बना दिया। तब उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ वृद्धाको अपनी पत्नी बनाया और कितने ही वर्षोंतक उसके साथ विहार किया। एक दिन वसिष्ठ और वामदेव आदि महर्षि पुण्यतीर्थोंमें भ्रमण करते हुए उस गुफामें आये। गौतम और उनकी पत्नीने वहाँ आये हुए ऋषि-मुनियोंका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया। उनमेंसे कुछ लोगोंने गौतमका उपहास करते हुए पूछा—'बूढ़ी माँ! यह तो बताओ, ये गौतम तुम्हारे पुत्र लगते हैं या पोते? कल्याणी! सच-सच बताना। वृद्ध पुरुषके लिये युवती स्त्री विषके समान है और वृद्धा स्त्रीके लिये युवा पुरुष अमृतके समान। प्रिय और अप्रियका संयोग हमने दीर्घकालके पश्चात् यहीं देखा है।' गौतम और उनकी पत्नी दोनों इस परिहासको सुनकर चुप रह गये। आतिथ्य ग्रहण करके सब महर्षि चले गये। उनकी बातोंको याद करके ये दोनों दम्पति बहुत दुःखी हुए। एक दिन स्त्रीसहित गौतमने मुनिवर अगस्त्यजीसे पूछा—'महर्षे ! कौन-सा देश या तीर्थ ऐसा है, जहाँ जानेसे कल्याणकी प्राप्ति होती है?'
अगस्त्यने कहा—ब्रह्मन् ! मैंने मुनियोंके मुखसे सुना है, गोदावरी नदीमें स्नान करनेसे सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
अगस्त्यकी यह बात सुनकर गौतम उस वृद्धाके साथ गौतमी-तटपर गये और कठोर तपस्या करने लगे। उन्होंने भगवान् शंकर और विष्णुका स्तवन किया तथा पत्नीके लिये गङ्गाजीको भी संतुष्ट किया।
गौतम बोले—शिव ! जिनका हृदय व्यथित है, ऐसे पुरुषोंके लिये संसारमें पार्वतीसहित आप ही शरण हैं—ठीक वैसे ही, जिस प्रकार मरुभूमिके पथिकोंके लिये वृक्ष ही आश्रय होता है। भगवान् श्रीकृष्ण! आप ही छोटे-बड़े सब भूतोंके पापोंका सर्वथा निवारण करनेवाले हैं, जैसे सूखती हुई खेतीको मेघ ही सींचकर हरा-भरा करता है। सुधामयी तरङ्गोंसे सुशोभित गौतमी! तुम वैकुण्ठरूपी दुर्गमें पहुँचनेके लिये सीढ़ी हो। हम अधोगतिमें पड़कर संतप्त हो रहे हैं, माता! तुम हमारे लिये शरण हो जाओ।
सबको शरण देनेवाली गौतमी गङ्गा गौतमके स्तोत्रसे प्रसन्न होकर बोलीं—'ब्रह्मन् ! तुम मन्त्र पढ़ते हुए मेरे जलसे अपनी पत्नीका अभिषेक करो। इससे यह रूपवती हो जायगी। इसके सभी अङ्ग मनोहर होंगे। नेत्रोंमें भी सुन्दरता आ जायगी तथा यह सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे शोभा पाने लगेगी।'
गङ्गाजीके आदेशसे दोनोंने ऐसा ही किया, अतः उनकी कृपासे दोनों पति-पत्नी सुन्दर रूपवाले हो गये। उनके अभिषेकका जो जल था, वह नदीरूपमें परिणत हो गया। वृद्धा नामसे ही उस नदीकी ख्याति हुई। गौतमने जो शिवलिङ्गकी स्थापना की, वह भी वृद्धाके ही नामपर 'वृद्धेश्वर' कहलाया। वहीं मुनिश्रेष्ठ गौतमने वृद्धाके साथ पूर्ण आनन्द प्राप्त किया। तबसे उस तीर्थका नाम 'वृद्धा-संगम' हो गया। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है।
४८- इलातीर्थके आविर्भावकी कथा
१८४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
इलातीर्थके आविर्भावकी कथा
ब्रह्माजी कहते हैं—इलातीर्थके नामसे जिस तीर्थकी प्रसिद्धि है, वह मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला, ब्रह्महत्या आदि पापोंको दूर करनेवाला तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। वैवस्वत मनुके वंशमें इल नामक एक राजा हो गये हैं। वे बहुत बड़ी सेना साथ लेकर शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ उनकी बुद्धिमें कुछ दूसरा ही निश्चय हुआ। उन्होंने अमात्योंसे कहा—'आप सब लोग मेरे पुत्रद्वारा पालित नगरमें चले जायें। देश, कोश, बल, राज्य तथा मेरे पुत्रकी भी रक्षा करें। महर्षि वसिष्ठ भी हमारे लिये पिताके समान हैं। वे भी अग्निहोत्रकी अग्नियोंको लेकर मेरी पत्नियोंके साथ लौट जायें। मैं अभी इस वनमें ही निवास करूँगा।' 'बहुत अच्छा' कहकर सब लोग चले गये और राजा धीरे-धीरे रत्नमय हिमालय पर्वतपर जाकर वहीं निवास करने लगे। एक दिन उन्होंने उस पर्वतपर एक गुफा देखी, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे विचित्र शोभा पा रही थी। उस गुफामें यक्षोंका राजा समन्यु रहता था। उसके साथ उसकी पतिव्रता पत्नी समा भी रहा करती थी। उस समय वह यक्ष मृगरूप धारण करके अपनी पत्नीके साथ विचर रहा था। भाँति-भाँतिके रत्नोंसे चित्रित, उसका वह विशाल गृह सूना पड़ा था। अतः राजा अपनी भारी सेनाके साथ वहीं ठहर गये। वह यक्ष अधर्मके कोपसे पत्नीके साथ मृगरूप धारण करके रहता था। उसने सोचा—'इस राजाने मेरा घर छीन लिया। मैं इसे जीत सकता नहीं और यह माँगनेपर देगा नहीं। अब क्या करूँ?' इसी चिन्तामें पड़कर वह मृगीरूपधारिणी अपनी पत्नीसे बोला—'कान्ते! इस राजाका मन मृगयाके व्यसनमें आसक्त है। यह कैसे विपत्तिमें फँसे—इसके लिये कोई उपाय सोचो। मेरा विचार है कि तुम मनोहर मृगीका रूप धारण करके इसके सामनेसे निकलो और इसे अपनी ओर आकृष्ट करके किसी तरह अम्बिका-वनमें पहुँचा दो। उसके भीतर प्रवेश करते ही यह राजा स्त्री हो जायगा। भद्रे! यह काम तुम्हीं कर सकती हो। मेरे लिये यह उचित न होगा।'
यक्षिणीने पूछा—नाथ! अम्बिका-वन तो बड़ा सुन्दर है। तुम उसमें क्यों नहीं जा सकते? यदि तुम भी चले जाओ तो क्या दोष होगा? यह हमें ठीक-ठीक बताओ।
यक्षने कहा—एक समय पार्वतीने एकान्तमें बैठे हुए भगवान् शंकरसे कहा—'देवेश्वर! स्त्रियोंकी यह स्वाभाविक इच्छा होती है कि उनकी रतिक्रीड़ा सदा गुप्त रहे। इसलिये मुझे ऐसा नियत स्थान दीजिये, जो आपकी आज्ञासे सुरक्षित हो। मैं स्थान वही चाहती हूँ, जो उमावनके नामसे प्रसिद्ध है। उसमें आप, गणेश, कार्तिकेय और नन्दीके सिवा जो कोई भी प्रवेश करे, वह स्त्री हो जाय।' शंकरजीने प्रसन्न होकर कहा—'ऐसा ही हो।' इसलिये उमाके उस वनमें मुझे नहीं जाना चाहिये।
अपने स्वामीका यह वचन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली वह यक्षिणी विशाल नेत्रोंवाली मृगी बनकर राजाके सामने आयी। यक्ष वहीं ठहर गया। राजाने मृगीको देखा। मृगयामें तो उनकी आसक्ति थी ही। मृगीपर दृष्टि पड़ते ही वे अकेले घोड़ेपर जा बैठे और उसका पीछा करने लगे। वह धीरे-धीरे राजाको अम्बिका-वनतक खींच ले गयी। जब घोड़ेपर बैठे-ही-बैठे उमावनमें प्रविष्ट हो गये, तब यक्षिणीने मृगीका
- इलातीर्थके आविर्भावकी कथा * १८५
रूप छोड़कर दिव्य रूप धारण कर लिया और अशोक वृक्षके नीचे खड़ी हो राजाको देखकर हँसने लगी। पतिकी कही हुई बातोंको याद करके वह राजासे बोली—'सुन्दरी इला! तुम अकेली अबला घोड़ेपर चढ़कर पुरुषके वेषमें कहाँ जाती हो, किसके पास जाओगी?' उसके मुखसे 'इला' शब्द सुनकर राजा क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे और यक्षिणीको डाँटकर मृगीका पता पूछने लगे। यक्षिणीने पुनः कहा—'इले! इले! अपने-आपको अच्छी तरह देख तो लो, फिर मुझे मिथ्यावादिनी या सत्यवादिनी कहना।' तब राजाने देखा—उनकी छातीमें दो ऊँचे-ऊँचे स्तन उभर आये थे। 'यह मुझे क्या हो गया' यह कहते हुए राजा चकित हो गये। उन्होंने यक्षिणीसे पूछा—'सुव्रते! यह मुझे क्या हो गया—इस बातको आप ठीक-ठीक जानती हैं। अतः बताइये। आप कौन हैं? इसका भी परिचय दीजिये।'
**यक्षिणी बोली—**हिमालयकी श्रेष्ठ गुफामें मेरे पति यक्षराज समन्यु निवास करते हैं। मैं उन्हींकी पत्नी हूँ। जिस शीतल कन्दरामें आप ठहरे हुए हैं, वह हमारा ही घर है। मैं ही मृगी बनकर आपको यहाँतक ले आयी हूँ। यह उमावन है। यहाँके लिये पूर्वकालमें महादेवजी यह वर दे चुके हैं कि जो पुरुष इसमें प्रवेश करेगा, वह स्त्री हो जायगा। अतः आप भी स्त्री हो गये, इससे आपको दुःखी नहीं होना चाहिये। कोई कितना ही प्रौढ़ क्यों न हो, भवितव्यताको कोई नहीं जानता।
इस प्रकार इलाको आश्वासन दे वह सुन्दरी यक्षिणी अन्तर्धान हो गयी। उसने पतिसे सारा हाल कह सुनाया। यक्ष भी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। इधर इला गाती और नृत्य करती हुई उमावनमें ही रहने लगी। वह कर्मकी गतिका स्मरण करती हुई स्त्रीस्वभावके अनुसार ही चेष्टा करती थी। एक दिन जब इला नृत्य कर रही थी, बुधने उसे देखा। वे अपने पिताको नमस्कार करनेके लिये जा रहे थे। इलापर दृष्टि पड़ते ही उन्होंने यात्रा स्थगित कर दी और उसके पास आकर कहा—'देवि! तू स्वर्गमें रहकर मेरी प्रिया भार्या हो जा।' इलाने भक्तिपूर्वक बुधकी आज्ञाका अभिनन्दन करके उसे स्वीकार कर लिया। बुध अपने उत्तम स्थानपर ले जाकर इलाके साथ प्रेमपूर्वक विहार करने लगे। उसने भी सब प्रकारकी सेवाओंसे पतिको संतुष्ट किया। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो जानेपर बुधने प्रसन्न हो अपनी प्रियासे कहा—'कल्याणी! मैं तुझे क्या दूँ? तेरे मनमें जो प्रिय वस्तु हो, उसे माँग ले।' इला सहसा बोल उठी—'पुत्र दीजिये।'
**बुधने कहा—**यह मेरा वीर्य अमोघ तथा प्रेमसे प्रकट हुआ है। अतः तेरे गर्भसे विश्वविख्यात क्षत्रिय-पुत्र उत्पन्न होगा। उससे चन्द्रवंशकी वृद्धि होगी। वह तेजमें सूर्य, बुद्धिमें बृहस्पति, क्षमामें पृथ्वी, युद्धसम्बन्धी पराक्रममें भगवान् विष्णु तथा क्रोधमें अग्निके समान होगा।
समय आनेपर महात्मा बुधका पुत्र उत्पन्न हुआ। उस समय देवलोकमें सब ओर जय-जयकारका शब्द गूँज उठा। उसके जन्मोत्सवमें सभी प्रधान-प्रधान देवता आये। मैं भी बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें सम्मिलित हुआ। वह बालक जन्म लेते ही उच्च स्वरसे रोया था। अतः वहाँ एकत्रित हुए देवताओं तथा ऋषियोंने एक-दूसरेसे कहा—'इस बालकने पुरु (अत्यन्त उच्च स्वरसे) रव (शब्द) किया है, अतः इसका नाम पुरूरवा होना चाहिये।' सबने संतुष्ट होकर यही नाम रखा। तदनन्तर बुधने अपने पुत्रको क्षत्रियोचित विद्या पढ़ायी और प्रयोगसहित धनुर्वेदका ज्ञान
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कराया। पुरूरवा शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति शीघ्र ही बढ़कर बड़ा हो गया। उसने अपनी माताको दुःखी देख विनीत भावसे नमस्कार करके कहा—'माताजी! बुध मेरे पिता और आपके प्रियतम पति हैं। मुझ-जैसा कर्मठ पुरुष आपका पुत्र है। फिर आपके मनमें चिन्ता किस बातकी है?'
इला बोली—बेटा! ठीक कहते हो। बुध मेरे स्वामी हैं और तुम मेरे गुणाकर पुत्र हो। अतः मुझे पति और पुत्रके लिये कभी चिन्ता नहीं होती। तथापि मेरे मनमें पहलेका ही कुछ दुःख है, जिसका बारंबार स्मरण हो आनेसे मैं चिन्तामें डूब जाती हूँ।
पुरूरवाने कहा—माँ! पहले मुझे अपना वही दुःख बताओ।
तब इलाने पुरूरवाको इक्ष्वाकुवंशका परिचय देते हुए अपने जन्म, नाम, राज्यप्राप्ति, पुत्रजन्म, पुरोहित वसिष्ठ, प्रिय पत्नी, वनमें आगमन, हिमालयकी कन्दरामें निवास, उमावनमें प्रवेश, स्त्रीत्वकी प्राप्ति, बुधसे समागम, प्रेम तथा पुनः पुत्रजन्म आदिसे सम्बन्ध रखनेवाली सब बातें कह सुनायीं। सुनकर पुरूरवाने मातासे पूछा—'मैं क्या करूँ? क्या करनेसे शुभ परिणाम होगा?'
इला बोली—बेटा! तुम्हारे अनुग्रहसे मैं पुरुषत्वकी प्राप्ति, उत्तम राज्य, तुम्हारा तथा अन्य पुत्रोंका अभिषेक, दान देना, यज्ञ करना तथा मुक्तिके मार्गका अवलोकन करना आदि सब कुछ चाहती हूँ। तुम अपने पिता बुधके पास जाकर सब बातें यथार्थरूपसे पूछो। वे सब जानते हैं। तुम्हारे लिये हितकर उपदेश देंगे।
माताके कहनेसे पुरूरवा अपने पिताके पास गये और उन्हें प्रणाम करके उन्होंने अपनी माताका तथा अपना कर्तव्य पूछा।
बुधने कहा—'महामते! मैं राजा इलको जानता हूँ। उनके इला होनेका वृत्तान्त भी मुझसे छिपा नहीं है। उमाके वनमें आना और उस वनके विषयमें भगवान् शंकरकी आज्ञाका हाल भी मुझे मालूम है। बेटा! भगवान् शिव और माता पार्वतीके प्रसादसे इलका शाप दूर हो सकता है। उन दोनोंकी आराधनाके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है। तुम गोदावरी नदीके तटपर जाओ। वहाँ भगवान् शिव पार्वतीजीके साथ सदा विराजमान रहते हैं। वे ही वरदान देकर शापका नाश करेंगे।
पिताकी बात सुनकर पुरूरवा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने माताको पुरुषत्व प्राप्त होनेकी इच्छासे हिमालय पर्वत, माता, पिता तथा गुरुको मस्तक झुकाया और तपस्या करनेके लिये तुरंत ही त्रिभुवनपावनी गौतमी गङ्गाकी ओर प्रस्थान किया। पुत्रके पीछे-पीछे इला और बुध भी गये। वे सब लोग गौतमीके तटपर पहुँचे और वहाँ स्नान करके तपस्या करते हुए भगवान्की स्तुति करने लगे। पहले बुधने, फिर इलाने, तत्पश्चात् पुरूरवाने देवी पार्वती तथा भगवान् शंकरका स्तवन किया।
बुध बोले—जो अपने शरीरकी केसरसे स्वभावतः सुवर्णके सदृश कान्तिमान् एवं सुन्दर दिखायी देते हैं, कार्तिकेय और गणेशजीके द्वारा जिनकी सदा अर्चना होती रहती है, वे शरणागतवत्सल उमा-महेश्वर मुझे शरण दें।'
इला बोली—संसारके त्रिविध तापरूपी दावानलसे दग्ध होनेवाले देहधारी जिनका चिन्तन करनेसे तत्काल परम शान्तिको प्राप्त होते हैं, वे कल्याणकारी उमा-महेश्वर मुझे शरण दें। देव ! मैं आर्त हूँ। मेरे हृदयमें बड़ी पीड़ा है। क्लेश आदिसे मेरी रक्षा करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। शरणागतकी रक्षा करनेवाले आपके जो दोनों परम पवित्र चरण हैं, वे मुझे शरण दें।
पुरूरवा बोले—जिनसे इस जगत्की उत्पत्ति
४९- चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि, उनकी पत्नी गभस्तिनी तथा उनके पुत्र पिप्पलादके त्यागकी अद्भुत कथा
- चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि तथा उनके पुत्रकी कथा * १८७
होती है तथा प्रलयकालमें यह सब जिनके ही भीतर लयको प्राप्त होता है, वे संसारको शरण देनेवाले जगदात्मा उमा-महेश्वर मुझे शरण दें। देवताओंके समुदायमें एक महान् उत्सवके अवसरपर गिरिराजकुमारी पार्वतीेने महादेवजीसे कहा था— 'ईश! आप मेरे दोनों चरण पकड़ें।' इसपर शिवजीने अत्यन्त प्रीतिवश पार्वतीके जिन दोनों शरणागतपालक चरणोंको ग्रहण किया था, वे मुझे शरण दें।
यह स्तुति सुनकर उमावर महेश्वर प्रकट हो गये। भगवती उमाने कहा— 'तुमलोगोंका मनोरथ क्या है? बताओ, मैं उसे पूर्ण करूँगी। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग कृतार्थ हो गये। जो वस्तु देवताओंके लिये भी दुर्लभ हो, वह भी मैं तुम्हें दूँगी।'
पुरूरवा बोले— 'जगदम्बिके! राजा इल अज्ञानवश आपके वनमें घुस गये थे। देवेश्वरि! आप उनके उस अपराधको क्षमा करें और पुनः उन्हें पुरुषत्व दें।
पार्वतीने भगवान् शंकरकी सम्मतिके अनुसार 'तथास्तु' कहकर उन सबकी प्रार्थना स्वीकार की। इसके बाद शिवजीने कहा— 'राजा इल गौतमी गङ्गामें स्नान करनेमात्रसे पुरुष हो जायेंगे।' तब बुधकी पत्नी इलाने गङ्गामें स्नान किया। स्नानके पश्चात् इलाके शरीरसे जो जल चू रहा था, उसके साथ उसके नारीजनोचित सौन्दर्य, नृत्य और संगीत भी गङ्गाकी धारामें मिल गये। वे ही नृत्या, गीता और सौभाग्या नामकी नदियोंके रूपमें परिणत हुए। वे नदियाँ भी गङ्गामें आ मिलीं। इससे वहाँ तीन पवित्र संगम हो गये। उनमें किया हुआ स्नान और दान इन्द्रपदकी प्राप्ति करानेवाला है। शिव और पार्वतीके प्रसादसे पुरुषत्व प्राप्त करनेके पश्चात् राजा इलने महान् अभ्युदयकी सिद्धिके लिये वहाँ अश्वमेध-यज्ञ किया। पुरोहित वसिष्ठ, अपनी पत्नी, पुत्र, अमात्य, सेना और कोशको भी लाकर उन्होंने वह यज्ञ सम्पन्न किया। दण्डक वनमें इलने चतुरङ्गिणी सेनासहित राज्यकी स्थापना की। वहाँ इलके नामसे विख्यात उनका नगर भी है। सूर्यवंशकी परम्परामें जो उन्होंने पहले पुत्र उत्पन्न किये थे, उनको राज्यपर अभिषिक्त करके पीछे स्नेहवश पुरूरवाका भी अभिषेक किया। ये राजा पुरूरवा ही चन्द्रवंशके प्रवर्तक हुए। जहाँ राजाको पुरुषत्वकी प्राप्ति हुई, वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर सोलह हजार तीर्थोंका निवास है। वहाँ इलेश्वर नामक भगवान् शंकरकी भी स्थापना हुई है। उन तीर्थोंमें स्नान और दान करनेसे सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।
चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि, उनकी पत्नी गभस्तिनी तथा उनके पुत्र पिप्पलादके त्यागकी अद्भुत कथा
ब्रह्माजी कहते हैं— चक्रतीर्थ ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ भगवान् शंकर चक्रेश्वरके नामसे निवास करते हैं। उन्हींसे भगवान् विष्णुको चक्र प्राप्त हुआ था। श्रीविष्णुने वहाँ रहकर चक्रके लिये भगवान् शंकरकी आराधना की थी। इसीलिये उसे चक्रतीर्थ कहते हैं। उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। चक्रतीर्थके बाद पिप्पलतीर्थ है। उसकी महिमाका वर्णन करनेमें शेषनाग भी समर्थ नहीं हैं। नारद! चक्रेश्वर ही पिप्पलेश्वर हैं। उनके नामका कारण
६९- देवताओंका दधीचि मुनिके आश्रमपर जाना और मुनिके द्वारा उनका सत्कार
१८८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
सुनो। दधीचि नामसे विख्यात एक मुनि थे। वे सभी उत्तम गुणोंसे सुशोभित थे। उनकी पत्नी श्रेष्ठ वंशकी कन्या और पतिव्रता थीं। उनका नाम गभस्तिनी था। वे लोपामुद्राकी बहिन थीं। दधीचिकी पत्नी सदा भारी तपस्यामें लगी रहती थीं। दधीचि प्रतिदिन अग्निकी उपासना करते और गृहस्थ-धर्मके पालनमें तत्पर रहते थे। उनका आश्रम गङ्गाके तटपर था। वे देवता और अतिथियोंकी सेवा करते, अपनी ही पत्नीमें अनुराग रखते और शान्तभावसे रहते थे। उनके प्रभावसे उस देशमें शत्रुओं और दैत्य-दानवोंका आक्रमण नहीं होता था।
एक दिनकी बात है—दधीचि मुनिके आश्रमपर रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, इन्द्र, विष्णु, यम और अग्नि पधारे। वे दैत्योंको परास्त करके वहाँ आये थे और उस विजयके कारण उनके हृदयमें हर्षकी हिलोरें उठ रही थीं। मुनिवर दधीचिको देखकर सब देवताओंने प्रणाम किया।
दधीचि भी देवताओंको देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सबका पृथक्-पृथक् पूजन किया, फिर पत्नीके साथ देवताओंके लिये गृहस्थोचित स्वागत-सत्कारका प्रबन्ध किया। इसके बाद उन्होंने देवताओंसे कुशल पूछी और देवता भी उनसे वार्तालाप करने लगे।
देवता बोले—मुने! आप इस पृथ्वीके कल्पवृक्ष हैं। आप-जैसा महर्षि जब हमलोगोंपर इतनी कृपा रखता है, तब अब हमारे लिये संसारमें कौन-सी वस्तु दुर्लभ होगी। मुनिश्रेष्ठ! जीवित पुरुषोंके जीवनका इतना ही फल है कि वे तीर्थोंमें स्नान, समस्त प्राणियोंपर दया और आप-जैसे महात्माओंका दर्शन करें।* मुने! इस समय स्नेहवश हम आपसे जो कुछ कहते हैं, उसे ध्यान देकर सुनें। हम बड़े-बड़े राक्षसों और दैत्योंको जीतकर यहाँ आये हैं। इससे हम बहुत सुखी हैं। विशेषतः आपका दर्शन करके हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। अब हमें अस्त्र-शस्त्रोंके रखनेसे कोई लाभ नहीं दिखायी देता। हम उन अस्त्रोंका बोझ ढो भी नहीं सकते। हम स्वर्गमें जब इन अस्त्रोंको रखते हैं, तब हमारे शत्रु इनका पता लगाकर वहाँसे हड़प ले जाते हैं। इसलिये हम आपके पवित्र आश्रमपर इन सब अस्त्रोंको रख देते हैं। ब्रह्मन्! यहाँ दानवों और राक्षसोंसे तनिक भी भय नहीं है। आपकी आज्ञासे यह सारा प्रदेश पवित्र और सुरक्षित हो गया है। तपस्याद्वारा आपकी समानता करनेवाला दूसरा कोई है ही नहीं। अब हम कृतार्थ होकर इन्द्रके साथ अपने-अपने स्थानको चले जाते हैं। अब इन आयुधोंकी रक्षा आपके अधीन है।
देवताओंकी यह बात सुनकर दधीचिने कहा—'एवमस्तु'। उस समय उनकी प्यारी पत्नीने उन्हें
* एतदेव फलं पुंसां जीवतां मुनिसत्तम। तीर्थाप्लुतिर्भूतदया दर्शनं च भवादृशाम्॥ (११०। १६)
* चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि तथा उनके पुत्रकी कथा * १८९
रोका—'मुने! यह देवताओंका कार्य विरोध उत्पन्न करनेवाला है। अतः इसमें आपको पड़नेकी क्या आवश्यकता है? जो शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके परमार्थ-तत्त्वमें स्थित हो चुके हैं, संसारके कार्योंमें जिनकी कोई आसक्ति नहीं है, उन्हें दूसरोंके लिये ऐसा संकट मोल लेनेसे क्या लाभ, जिससे न इस लोकमें सुख है और न परलोकमें। विप्रवर! मेरी बातें ध्यान देकर सुनो। यदि आपने इन आयुधोंको स्थान दे दिया तो इन देवताओंके शत्रु आपसे भी द्वेष करेंगे। यदि इनमेंसे कोई अस्त्र नष्ट हुआ या चोरी चला गया तो ये देवता भी कुपित होकर हमारे शत्रु बन जायेंगे। अतः मुनीश्वर! आप वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपके लिये इस पराये द्रव्यमें ममत्व जोड़ना ठीक नहीं। यदि धन देनेकी शक्ति हो तो याचकको देना ही चाहिये—उसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। यदि धन देनेकी शक्ति न हो तो साधु पुरुष केवल मन, वाणी तथा शारीरिक क्रियाओंद्वारा दूसरोंका कार्य-साधन करते हैं। प्राणनाथ! पराये धनको अपने यहाँ धरोहरके रूपमें रखना साधु पुरुषोंने कभी स्वीकार नहीं किया है। इसका उन्होंने सदा बहिष्कार ही किया है। अतः आप यह कार्य न कीजिये।'*
अपनी प्यारी पत्नीकी यह बात सुनकर ब्राह्मणने कहा—‘'भद्रे! मैं देवताओंकी प्रार्थनापर पहले ही 'हाँ' कह चुका हूँ। अब 'नहीं' कर दूँ तो मुझे सुख नहीं मिलेगा।' पतिका कथन सुनकर ब्राह्मणी यह सोचकर चुप हो गयी कि दैवके सिवा और किसीका किसीपर वश नहीं चल सकता। देवतालोग अपने अत्यन्त तेजस्वी अस्त्र आश्रमपर रखकर मुनीश्वरको नमस्कार करके कृतार्थ हो अपने-अपने लोकमें चले गये। देवताओंके चले जानेपर मुनि अपनी पत्नीके साथ धर्ममें तत्पर हो प्रसन्नतापूर्वक वहाँ रहने लगे। इस प्रकार एक हजार दिव्य वर्ष बीत गये। तब दधीचिने अपनी पत्नीसे कहा—'देवि ! देवता यहाँसे अस्त्र ले जाना नहीं चाहते और दैत्य मुझसे द्वेष करते हैं। अब तुम्हीं बताओ—क्या करना चाहिये?' पत्नीने विनयपूर्वक कहा—'नाथ ! मैंने तो पहले ही निवेदन किया था। अब आप ही जानें और जो उचित हो, सो करें। दैत्योंमें जो बड़े-बड़े वीर, तपस्वी और बलवान् हैं, वे इन अस्त्र-शस्त्रोंको निश्चय ही हड़प लेंगे।' तब दधीचिने उन अस्त्रोंकी रक्षाके लिये एक काम किया—उन्होंने पवित्र जलसे मन्त्र पढ़ते हुए अस्त्रोंको नहलाया। फिर वह सर्वास्त्रमय परम पवित्र और तेजयुक्त जल स्वयं पी लिया। तेज निकल जानेसे वे सभी अस्त्र-शस्त्र शक्तिहीन हो गये, अतः क्रमशः समयानुसार नष्ट हो गये। तदनन्तर देवताओंने आकर दधीचिसे कहा—'मुनिवर ! हमारे ऊपर शत्रुओंका महान् भय आ पहुँचा है। अतः हमने जो अस्त्र आपके यहाँ रख दिये थे, उन्हें इस समय दे दीजिये।' दधीचिने कहा—'आपलोग बहुत दिनोंतक उन्हें लेने नहीं आये। अतः दैत्योंके भयसे हमने उन अस्त्रोंको पी लिया है। अब वे हमारे शरीरमें स्थित हैं। इसलिये जो उचित हो, वह कहें।' यह सुनकर देवताओंने विनीत भावसे कहा—'मुनीश्वर! इस समय तो हम इतना ही कह सकते हैं कि अस्त्र दे दीजिये।' ब्राह्मणने कहा—'सब अस्त्र मेरी
* चेदस्ति शक्तिर्द्रव्यदाने ततस्ते दातव्यमेवार्थिने किं विचार्यम्। नो चेत् सन्तः परकार्याणि कुर्युर्वाग्भिर्मनोभिः कृतिभिस्तथैव ॥
परस्वसंधारणमेतदेव सद्भिर्नि रस्तं त्यज कान्त सद्यः ॥
(११०। २९-३०)
७०- दधीचिका योगद्वारा प्राण-त्याग
१९० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
हड्डियोंमें मिल गये हैं। अतः उन हड्डियोंको ही ले जाओ।' उस समय प्रिय वचन बोलनेवाली दधीचिकी पत्नी प्रातिथेयी उनके पास नहीं थीं। देवता उनसे बहुत डरते थे। उन्हें न देखकर दधीचिसे बोले—'विप्रवर! जो कुछ करना हो, शीघ्र करें।' दधीचिने अपने दुस्त्यज प्राणोंका परित्याग करते हुए कहा—'देवताओ! तुम सुखपूर्वक मेरा शरीर ले लो। मेरी हड्डियोंसे प्रसन्नता प्राप्त करो। मुझे इस देहसे क्या काम है।'
यों कहकर दधीचि पद्मासन बाँधकर बैठ गये। उनकी दृष्टि नासिकाके अग्रभागपर स्थिर हो गयी। मुखपर प्रकाश और प्रसन्नता विराज रही थी। उन्होंने हृदयाकाशमें स्थित अग्निसहित वायुको धीरे-धीरे ऊपरकी ओर उठाकर अप्रमेय परम पद ब्रह्मके स्वरूपमें स्थापित कर दिया। इस प्रकार महात्मा दधीचिने ब्रह्मसायुज्य प्राप्त किया। उनका शरीर निष्प्राण हो गया। यह देख
देवताओंने विश्वकर्मासे उतावलीपूर्वक कहा—'अब आप अभी बहुत-से अस्त्र-शस्त्र बना डालिये।' विश्वकर्माने कहा—'देवताओ! यह ब्राह्मणका शरीर है। मैं इसका उपयोग कैसे करूँ। जब केवल इनकी हड्डियाँ रह जायेंगी, तभी उनका अस्त्रनिर्माण करूँगा।' तब देवताओंने गौओंसे कहा—'हम तुम्हारा मुख वज्रके समान किये देते हैं। तुम हमारे हितके लिये अस्त्र-शस्त्र निर्माण करनेके उद्देश्यसे दधीचिके शरीरको क्षणभरमें विदीर्ण कर डालो और शुद्ध हड्डियाँ निकालकर दे दो।' देवताओंके आदेशसे गौओंने वैसा ही किया। उन्होंने दधीचिके शरीरको चाट-चाटकर हड्डियाँ निकाल लीं और देवताओंको दे दीं। देवता उत्साहके साथ अपने लोकमें चले गये और गौएँ भी अपने स्थानको लौट गयीं।
तदनन्तर बहुत देरके बाद दधीचिकी सुशीला पत्नी हाथमें जलसे भरा हुआ कलश ले फल और फूलोंसे पार्वती देवीकी अर्चना और वन्दना करके अग्नि, पति तथा आश्रमके दर्शनकी उत्सुकतासे शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाती हुई आयीं। उस समय उनके गर्भमें बालक आ गया था। आश्रमपर पहुँचनेपर जब उन्होंने अपने स्वामीको नहीं देखा, तब बड़े विस्मयमें पड़कर अग्निसे पूछा—'मेरे पतिदेव कहाँ चले गये?' अग्निने जो कुछ हुआ था, सब सुना दिया। पतिकी मृत्युका दुःखद समाचार सुनकर वे दुःख और उद्वेगसे पृथ्वीपर गिर पड़ीं। उस समय अग्निदेवने ही उन्हें धीरे-धीरे आश्वासन दिया।
प्रातिथेयी बोलीं—मैं देवताओंको शाप देनेमें समर्थ नहीं हूँ, अतः स्वयं ही अग्निमें प्रवेश करूँगी। अब जीवन रखकर क्या होगा। संसारमें जो वस्तु उत्पन्न होती है, वह सब नश्वर है; अतः उसके लिये शोक नहीं होना चाहिये। परंतु मनुष्योंमें वे ही पुण्यके भागी होते हैं जो गौ, ब्राह्मण तथा देवताओंके लिये अपने प्यारे प्राणोंका
- चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि तथा उनके पुत्रकी कथा * १९१
उत्सर्ग कर देते हैं।^१ इस परिवर्तनशील संसार-चक्रमें धर्मपरायण तथा शक्तिशाली शरीर पाकर जो प्राणी देवताओं तथा ब्राह्मणोंके लिये अपने प्यारे प्राणोंका त्याग करते हैं, वे ही धन्य हैं। जिसने देह धारण किया है, उसके प्राण एक-न-एक दिन अवश्य जायँगे—यह जानकर जो ब्राह्मण, गौ, देवता तथा दीन आदिके लिये इन प्राणोंका उत्सर्ग करते हैं, वे ईश्वर हैं।^२
यों कहकर उन्होंने अग्नियोंका यथावत् पूजन किया और अपना पेट चीरकर गर्भके बालकको हाथसे निकाल दिया; फिर गङ्गा, पृथ्वी, आश्रम तथा आश्रमके वनस्पतियों और अन्न आदि ओषधियोंको प्रणाम करके पतिकी त्वचा और लोम आदिके साथ चितामें प्रवेश करनेका विचार किया। उस समय वे बोलीं—'मेरे गर्भका यह बालक पिता-मातासे हीन है, इसके कोई सगोत्र बन्धु भी नहीं हैं; अतः सम्पूर्ण भूतगण, ओषधियाँ तथा लोकपाल इसकी रक्षा करें। जो लोग माता-पितासे हीन बालकको अपने औरस पुत्रोंके समान देखते और उसी भावसे रक्षा करते हैं, वे निश्चय ही ब्रह्मा आदि देवताओंके भी वन्दनीय हैं।'^३
यों कहकर दधीचिकी पत्नीने बालकको पीपलके समीप रख दिया और स्वामीमें चित्त लगाकर अग्निको प्रणाम किया; फिर अग्निकी परिक्रमा करके यज्ञपात्रोंके साथ ही चितामें प्रवेश किया और पतिसहित दिव्यलोकको चली गयीं।
उस समय आश्रमके वनवासी वृक्ष भी रोने लगे। प्रातिथेयी और दधीचिने उनका अपने पुत्रोंकी भाँति पालन किया था। मृग, पक्षी तथा वृक्ष सब रो-रोकर एक-दूसरेसे कहने लगे—'हम पिता दधीचि और माता प्रातिथेयीके बिना जीवित नहीं रह सकते। जो लोग स्वर्गवासी माता-पिताकी संतानोंपर निरन्तर स्वाभाविक स्नेह रखते हैं, वे ही पुण्यात्मा और कृतार्थ हैं।^४ दधीचि और प्रातिथेयी हमें जिस स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा करते थे, वैसे सगे माता-पिता भी नहीं देखते। हमें धिक्कार है। हम पापी हैं, जो उनके दर्शनसे वञ्चित हो गये। आजसे हम सब लोगोंका यही निश्चय होना चाहिये कि यह बालक ही हमलोगोंके लिये दधीचि और प्रातिथेयी है तथा यह बालक ही हमारा सनातन धर्म है।'
यों कहकर वनस्पतियों और ओषधियोंने अपने राजा सोमके पास जाकर उत्तम अमृतकी याचना की। सोमने उन्हें बहुत उत्तम अमृत दिया और वनस्पतियोंने वह लाकर बालकको दे दिया। अमृतसे तृप्त हुआ बालक शुक्लपक्षके चन्द्रमाके समान बढ़ने लगा। पीपलके वृक्षोंने उसका पालन किया था, इसलिये वह पिप्पलादके नामसे प्रसिद्ध हुआ। बड़ा होनेपर पिप्पलादने पीपलके वृक्षोंसे अत्यन्त विस्मित होकर कहा—'लोकमें यह देखा जाता है कि मनुष्योंसे मनुष्य, पक्षियोंसे पक्षी तथा वनस्पतियोंसे वनस्पति उत्पन्न होते हैं; इसमें
१. उत्पद्यते यत्तु विनाशि सर्वं न शोच्यमस्तीति मनुष्यलोके। गोविप्रदेवार्थमिह त्यजन्ति प्राणान् प्रियान् पुण्यभाजो मनुष्याः॥ (११०।६३)
२. प्राणाः सर्वेऽस्यापि देहान्वितस्य यातारो वै नात्र संदेहलेशः। एवं ज्ञात्वा विप्रगोदेवदीनार्थं चैनानुत्सृजन्तीश्वरास्ते॥ (११०।६५)
३. ये बालकं मातृपितृप्रहीणं सनिर्विशेषं स्वतनूत्प्ररूढैः। पश्यन्ति रक्षन्ति त एव नूनं ब्रह्मादिकानामपि वन्दनीयाः॥ (११०।७०)
४. स्वर्गमासेदुषोः पित्रोस्तदपत्येष्वकृत्रिमम्। ये कुर्वन्त्यनिशं स्नेहं त एव कृतिनो नराः॥ (११०।७५)
७१- भगवान् शिवका कुपित पिप्पलादको समझाना
१९२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
कहीं विषमता नहीं दिखायी देती। परंतु मैं वृक्षका पुत्र होकर हाथ-पैर आदिसे विशिष्ट जीव कैसे हो गया!' उनकी बात सुनकर वृक्षोंने क्रमशः उनके पिता दधीचिकी मृत्यु और पतिव्रता माताके अग्निप्रवेशका सब समाचार कह सुनाया। सुनते ही वे दुःखसे व्याप्त होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। उस समय वृक्षोंने धर्म और अर्थयुक्त वचन कहकर उन्हें सान्त्वना दी। आश्वस्त होनेपर उन्होंने ओषधियों और वनस्पतियोंसे कहा— 'जिन्होंने मेरे पिताकी हत्या की है, उनका मैं भी वध करूँगा, अन्यथा जीवित नहीं रह सकता। जो पिताके मित्र और शत्रु होते हैं, उनके साथ पुत्र भी वैसा ही बर्ताव करता है। जो ऐसा करता है, वही पुत्र है। जो इसके विपरीत आचरण करता है, वह पुत्रके रूपमें शत्रु माना गया है।'
वृक्षोंने कहा—महाद्युते! तुम्हारी माताने परलोकमें जाते समय यह उद्गार प्रकट किया था—'जो दूसरोंके द्रोहमें लगे रहते हैं, जो अपने कल्याणकी बातें भूल जाते हैं तथा जो भ्रान्तचित्त होकर इधर-उधर भटकते हैं, वे नरकके गड्ढेमें गिरते हैं।' माताकी कही हुई वह बात सुनकर पिप्पलाद कुपित होकर बोले—'जिसके अन्तःकरणमें अपमानकी आग प्रज्वलित हो रही हो, उसके सामने साधुताकी बातें व्यर्थ हैं।' फिर उन्होंने भगवान् चक्रेश्वर महादेवके स्थानपर जाकर उनसे कहा—'मुझे तो शत्रुओंका नाश करनेके लिये कोई शक्ति दीजिये।' पिप्पलादके इतना कहते ही भगवान् शंकरके नेत्रोंसे भयंकर कृत्या प्रकट हुई। उसकी आकृति बड़वा (घोड़ी)-के समान थी। सम्पूर्ण जीवोंका विनाश करनेके लिये उसने अपने गर्भमें भयंकर अग्नि छिपा रखी थी। मृत्युकी लपलपाती हुई जीभके समान वह महारौद्ररूपा भीषण कृत्या पिप्पलादसे बोली— 'बताओ, मुझे क्या करना है?' पिप्पलादने कहा—'देवता मेरे शत्रु हैं। उन्हें खा जा।' फिर तो उस बड़वाके गर्भसे महाभयंकर अग्नि प्रकट हुई, जो समस्त लोकोंका प्रलय करनेमें समर्थ थी। देवता उसे देखते ही थर्रा उठे और पिप्पलादद्वारा आराधित पिप्पलेश नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिवकी शरणमें आये। उन्होंने भयभीत होकर शिवजीकी स्तुति करते हुए कहा—'शम्भो! आप हमारी रक्षा करें। कृत्या और उससे प्रकट हुई आग हमें बड़ा कष्ट दे रही है। सर्वेश्वर! आप भयभीत मनुष्योंको अभय देनेवाले हैं। शिव! जो सब ओरसे सताये हुए, पीड़ित तथा श्रान्तचित्त प्राणी हैं, उन सबकी आप ही शरण हैं। जगन्मय! आप पिप्पलादको शान्त कीजिये।'
'बहुत अच्छा' कहकर जगदीश्वर शिवने पिप्पलादके पास आकर उससे कहा—'बेटा! देवताओंका नाश कर दिया जाय तो भी तुम्हारे पिता लौटकर नहीं आयेंगे। उन्होंने देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये अपने प्राण दिये हैं। संसारमें
- चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि तथा उनके पुत्रकी कथा * १९३
उनके समान दीन-दुःखियोंका दयामय बन्धु कौन होगा ! तुम्हारी पतिव्रता माता भी उन्हींके साथ दिव्यलोकमें चली गयीं। यहाँ उनकी समता करनेवाली कौन स्त्री है। क्या लोपामुद्रा और अरुन्धती भी उनकी बराबरी कर सकती हैं? जिनकी हड्डियोंसे सम्पूर्ण देवता सदा विजयी और सुखी बने रहते हैं, वे तुम्हारे पिता कितने शक्तिशाली थे ! उन्होंने जिस उज्ज्वल सुयश-राशिका उपार्जन किया है, उसे तुम्हारी माताने अपने दिव्य त्यागसे अक्षय बना दिया है। तुम उन्हींके पुत्र हो। उनसे बढ़कर तुमने अभीतक कुछ नहीं किया। तुम्हारे प्रताप और भयसे आज देवता स्वर्गसे भ्रष्ट हो चुके हैं। वे सोच नहीं पाते कि हम किस दिशाको भागकर जायँ। तुम उन्हें बचाओ। अमरोंकी रक्षा करो। आर्त्त प्राणियोंकी रक्षासे बढ़कर पुण्य कहीं भी नहीं है। मनुष्यलोकमें जबतक मनोहर यश फैला रहता है, तबतक एक-एक दिनके बदले एक-एक वर्षके क्रमसे दीर्घकालतक स्वर्गलोकमें मनुष्य निर्विकार चित्तसे निवास करते हैं। इस जगत्में वे ही मुर्देके समान हैं, जिन्होंने यशका उपार्जन नहीं किया; वे ही अंधे हैं, जिन्होंने शास्त्र नहीं पढ़े। वे ही नपुंसक हैं, जो सदा दान नहीं देते तथा वे ही शोकके योग्य हैं, जो सदा धर्मपालनमें संलग्न नहीं रहते।*
देवाधिदेव महादेवजीका यह वचन सुनकर पिप्पलाद मुनि शान्त हो गये। उन्होंने भगवान् शिवको नमस्कार किया और हाथ जोड़कर कहा—'जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा मेरे हितमें संलग्न रहकर मेरा उपकार करते रहते हैं, उनका तथा अन्य लोगोंका हित करनेके लिये मैं देवता आदिके पूजनीय उमासहित भगवान् शंकरको प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने मेरी रक्षा की, हमें पाल-पोसकर बड़ा किया, अपना सगोत्र और सहधर्मी बनाया, भगवान् शिव उनके मनोरथ पूर्ण करें। मैं बाल-चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले महादेवजीको नित्य प्रणाम करता हूँ। प्रभो! जिन्होंने माता-पिताकी भाँति मेरा भरण-पोषण किया है, उनके नामसे तीनों लोकोंके लिये यह तीर्थ हो। इससे उनका यश होगा और मैं उनके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। पृथ्वीपर देवताओंके जो-जो क्षेत्र और तीर्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा इस तीर्थका अधिक माहात्म्य हो। इस बातका यदि देवतालोग अनुमोदन करें तो मैं उनके अपराध क्षमा कर सकता हूँ।'
पिप्पलादने यह बात इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके सामने कही और सबने आदरपूर्वक इसका समर्थन किया। बालक पिप्पलादकी बुद्धि, विनय, विद्या, शौर्य, बल, साहस, सत्यभाषण, माता-पिताके प्रति भक्ति तथा भाव-शुद्धिको जानकर शंकरजीने उनसे कहा—'बेटा! जो तुम्हारा अभीष्ट हो, उसे बताओ। वह तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। तुम अपने मनमें अन्यथा विचार न करना।'
पिप्पलाद बोले—महेश्वर! जो धर्मनिष्ठ पुरुष गङ्गाजीमें स्नान करके आपके चरणकमलोंका दर्शन करते हैं, उन्हें समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त हों और शरीरका अन्त होनेपर वे शिवके धाममें जायँ। नाथ! मेरे पिता और माता आपके चरणोंमें पड़े थे। ये पीपल और देवता भी आपके स्थानमें आकर सुखी हुए हैं। ये सब लोग सदा आपका दर्शन करें और आपके ही धाम जायँ।
पिप्पलादकी यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उनके भयसे मुक्त हो इस
* मृतास्त एवात्र यशो न येषामन्धास्त एव श्रुतवर्जिता ये। ये दानशीला न नपुंसकास्ते ये धर्मशीला न त एव शोच्याः ॥
(११० । १५६)
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प्रकार बोले—'ब्रह्मन्! तुमने वही किया है, जो देवताओंको अभीष्ट था। देवाधिदेव भगवान् शिवकी आज्ञाका भी पालन किया और पहले वरदान भी दूसरोंके ही लिये माँगा, अपने लिये नहीं; इसलिये हम भी संतुष्ट होकर तुम्हें कुछ देना चाहते हैं। तुम हमसे कोई वर माँगो।'
पिप्पलादने कहा—देवताओ ! मैं अपने माता-पिताको देखना चाहता हूँ। मैंने केवल उनका नाम सुना है। संसारमें वे ही प्राणी धन्य हैं, जो माता-पिताके अधीन रहकर उनकी सेवा-शुश्रूषा करते हैं। अपनी इन्द्रियोंको, शरीरको, कुल, शक्ति और बुद्धिको माता-पिताके कार्यमें लगाकर पुत्र कृतकृत्य हो जाता है। यदि मैं उनका दर्शन भी पा जाऊँ तो मेरे मन, वचन, शरीर और क्रियाओंका फल प्राप्त हो जायगा।
पिप्पलाद मुनिका यह कथन सुनकर देवताओंने परस्पर सलाह करके कहा—'ब्रह्मन् ! तुम्हारे माता-पिता दिव्य विमानपर आरूढ़ हो तुम्हें देखनेके लिये आते हैं। तुम भी निश्चय ही उन्हें देखोगे। विषाद छोड़कर अपने मनको शान्त करो। देखो, देखो, वे श्रेष्ठ विमानपर बैठे आ रहे हैं। उनके दिव्य शरीरपर स्वर्गीय आभूषण शोभा पाते हैं।' पिप्पलादने भगवान् शिवके समीप अपने माता-पिताको देखकर प्रणाम किया। उस समय उनके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भर आये थे। वे किसी तरह गद्गद कण्ठसे बोले—'अन्य कुलीन पुत्र अपने माता-पिताको तारते हैं; किंतु मैं ऐसा भाग्यहीन हूँ, जो अपनी माताके उदरको विदीर्ण करनेमें कारण बना।'
उस समय उसके माता-पिताने कहा—'पुत्र ! तुम धन्य हो, जिसकी कीर्ति स्वर्गलोकतक फैली है। तुमने भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन किया और देवताओंको सान्त्वना दी। तुम-जैसे पुत्रसे पितरोंके उत्तम लोक कभी क्षीण नहीं होते।' इसी समय पिप्पलादके मस्तकपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। देवताओंने जय-जयकार किया। पत्नीसहित दधीचिने भी पुत्रको आशीर्वाद दिया और शंकर, गङ्गा तथा देवताओंको नमस्कार करके पिप्पलादसे कहा—'बेटा ! विवाह करके भगवान् शिवकी भक्ति और गङ्गाजीका सेवन करो। पुत्रोंकी उत्पत्ति करके विधिपूर्वक दक्षिणासहित यज्ञोंका अनुष्ठान करो और सब प्रकारसे कृतार्थ हो दीर्घकालके लिये दिव्यलोकमें स्थान प्राप्त करो।'
पिप्पलादने कहा—पिताजी ! मैं ऐसा ही करूँगा।
तदनन्तर पत्नीसहित दधीचि पुत्रको बारंबार सान्त्वना दे देवताओंकी आज्ञा ले पुनः दिव्यलोकमें चले गये। इसके बाद देवताओंने भगवान् शिवसे कहा—'जगदीश्वर ! अब दधीचिकी हड्डियोंकी, हमारी तथा इन गौओंकी पवित्रताके लिये कोई उपाय बताइये।' शिवने कहा—'गङ्गाजीमें स्नान करके सम्पूर्ण देवता और गौएँ पापमुक्त हो सकती हैं। इसी प्रकार दधीचिके शरीरकी हड्डियाँ भी गङ्गाजीके जलमें धोनेसे पवित्र हो जायँगी।' शिवजीकी आज्ञाके अनुसार देवता स्नान करके शुद्ध हो गये और हड्डियाँ धोनेमात्रसे पवित्र हो गयीं। जहाँ देवता पापमुक्त हुए, वह 'पापनाशन' तीर्थ कहलाता है। वहाँका स्नान और दान ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला है। जहाँ गौएँ पवित्र हुईं, उस स्थानका नाम 'गोतीर्थ' हुआ। जहाँ दधीचिकी हड्डियाँ पवित्र की गयीं, उसे 'पितृतीर्थ' जानना चाहिये। वह पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। जिस किसी प्राणीके, वह कितना ही पापी क्यों न हो, शरीरकी राख, हड्डी, नख और रोएँ उस तीर्थमें पड़ जाते हैं, वह तबतक स्वर्गलोकमें निवास करता है जबतक कि चन्द्रमा, सूर्य और
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तारोंका अस्तित्व बना रहता है। इस प्रकार उस तीर्थसे तीन तीर्थ प्रकट हुए। उस समय देवताओं और गौओंने पवित्र होकर भगवान् शंकरसे कहा—'हमलोग अपने-अपने स्थानको जायेंगे। यहाँ सूर्यदेवकी प्रतिष्ठा की गयी है। इनके प्रतिष्ठित होनेसे सब देवता प्रतिष्ठित हो जायेंगे। इसलिये आप हमें आज्ञा दें। सनातन सूर्यदेव स्थावर-जङ्गमरूप जगत्के आत्मा हैं। जहाँ जगज्जननी गङ्गा और साक्षात् भगवान् त्र्यम्बक विराज रहे हैं, वहाँ प्रतिष्ठान नामक तीर्थ भी हो।'
यों कहकर देवताओंने पिप्पलादसे भी अनुमति ली और अपने-अपने निवासस्थानको चले गये। वहाँ जितने पीपल थे, कालान्तरमें अक्षय स्वर्गको प्राप्त हुए। प्रतापी पिप्पलादने उस क्षेत्रके अधिष्ठाता देवताके रूपमें भगवान् शंकरकी स्थापना करके उनका पूजन किया। फिर गौतमकी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके कई पुत्र उत्पन्न किये, लक्ष्मी और यज्ञका उपार्जन किया तथा अन्तमें वे सुहृज्जनोंके साथ स्वर्गलोकको चले गये। तबसे वह क्षेत्र पिप्पलेश्वरतीर्थ कहलाने लगा। वह सब यज्ञोंका फल देनेवाला पवित्र तीर्थ है। उसके स्मरणमात्रसे पापोंका नाश हो जाता है। फिर स्नान, दान और सूर्यके दर्शनसे जो लाभ होता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। वहाँ देवाधिदेव महादेवजीके दो नाम हैं—चक्रेश्वर और पिप्पलेश्वर। इस रहस्यको जानकर मनुष्य सब अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। देवमन्दिरमें सूर्यकी प्रतिष्ठा होनेसे वह क्षेत्र प्रतिष्ठान कहलाया, जो देवताओंको भी बहुत प्रिय है। यह उपाख्यान अत्यन्त पवित्र है। जो मनुष्य इसका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह दीर्घजीवी, धनवान् और धर्मात्मा होता है तथा अन्तमें भगवान् शंकरका स्मरण करके उन्हींको प्राप्त कर लेता है।
नागतीर्थकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं— नागतीर्थके नामसे जो प्रसिद्ध क्षेत्र है, वह सब अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला तथा मङ्गलमय है। वहाँ भगवान् नागेश्वर निवास करते हैं। उनके माहात्म्यकी विस्तृत कथा भी सुनो। प्रतिष्ठानपुरमें चन्द्रवंशी राजा शूरसेन राज्य करते थे। वे समस्त गुणोंके सागर और बुद्धिमान् थे। उन्होंने अपनी पत्नीके साथ पुत्र उत्पन्न होनेके लिये बड़े-बड़े यत्न किये। दीर्घकालके पश्चात् उन्हें एक पुत्र हुआ, किन्तु वह भयानक आकारवाला सर्प था। राजाने उस पुत्रको बहुत छिपाकर रखा। किसीको इस बातका पता न लगा कि राजाका पुत्र सर्प है। अन्तःपुर अथवा बाहरका मनुष्य भी इस भेदसे परिचित न हो सका। माता-पिताके सिवा धाय, अमात्य और पुरोहित भी यह बात नहीं जानते थे। उस भयंकर सर्पको देखकर पत्नीसहित राजाको प्रतिदिन बड़ा संताप होता था। वे सोचते, सर्परूप पुत्रकी अपेक्षा तो पुत्रहीन रहना ही अच्छा है। वह था तो बहुत बड़ा सर्प, किंतु बातें मनुष्योंकी-सी करता था। उसने पितासे कहा—'मेरे चूड़ाकरण, उपनयन तथा वेदाध्ययन-संस्कार कराइये। द्विज जबतक वेदका अध्ययन नहीं करता, तबतक शूद्रके समान रहता है।'
पुत्रकी यह बात सुनकर शूरसेन बहुत दुःखी हुए। उन्होंने किसी ब्राह्मणको बुलाकर उसके संस्कार आदि कराये। वेदाध्ययन समाप्त करके सर्पने अपने पितासे कहा—'नृपश्रेष्ठ! मेरा विवाह कर दीजिये। मुझे स्त्री प्राप्त करनेकी इच्छा हो रही है। मेरा विश्वास है, ऐसा किये बिना आपका
१९६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
कोई भी कार्य सिद्ध न हो सकेगा। पुत्रका यह निश्चय जानकर राजाने अमात्योंको बुलाया और उसके विवाहके लिये इस प्रकार कहा—'मेरा पुत्र युवराज नागेश्वर सब गुणोंकी खान है। वह बुद्धिमान, शूर, दुर्जय तथा शत्रुओंको संताप देनेवाला है। उसका विवाह करना है। मैं बूढ़ा हुआ। अब पुत्रको राज्यका भार सौंपकर निश्चिन्त होना चाहता हूँ। आपलोग मेरे हित-साधनमें तत्पर हो उसके विवाहके लिय प्रयत्न करें।'
राजाकी बात सुनकर अमात्यगण हाथ जोड़कर बोले—'महाराज ! आपके पुत्र सब गुणोंमें श्रेष्ठ हैं और आप भी सर्वत्र विख्यात हैं। फिर आपके पुत्रका विवाह करनेके लिये क्या मन्त्रणा करनी है और किस बातकी चिन्ता।' अमात्योंके यों कहनेपर नृपश्रेष्ठ शूरसेन कुछ गम्भीर हो गये। वे उन अमात्योंको यह बताना नहीं चाहते थे कि मेरा बेटा सर्प है; तथा वे भी इस बातसे अपरिचित ही रहे। राजाने फिर कहा—'कौन कन्या गुणोंमें सबसे अधिक है तथा कौन राजा ऊँचे कुलमें उत्पन्न, श्रीमान् और उत्तम गुणोंके आश्रय हैं?' राजाका यह कथन सुनकर अमात्योंमेंसे एक परम बुद्धिमान् पुरुष, जो महाराजके संकेतको समझनेवाले थे, उनका विचार जानकर बोले—'महाराज! पूर्वदेशमें विजय नामके एक राजा हैं। उनके पास घोड़े, हाथी और रत्नोंकी गिनती नहीं है। महाराज विजयके आठ पुत्र हैं, जो बड़े धनुर्धर हैं। उनकी बहिन भोगवती साक्षात् लक्ष्मीके समान है। राजन्! वह आपके पुत्रके लिये सुयोग्य पत्नी होगी।'
बूढ़े अमात्यकी बात सुनकर राजाने उत्तर दिया—'राजा विजयकी वह कन्या मेरे पुत्रके लिये कैसे प्राप्त हो सकती है, बताओ।'
बूढ़े अमात्यने कहा—'महाराज! आपके मनमें जो बात है, मैं उसे समझ गया। अब आप मुझे कार्य-सिद्धिके लिये जानेकी आज्ञा दें।' महाराज शूरसेनने भूषण, वस्त्र तथा मधुर वाणीसे बूढ़े मन्त्रीका सत्कार करके उन्हें बहुत बड़ी सेनाके साथ भेजा। वे पूर्वदेशमें जाकर महाराज विजयसे मिले और नाना प्रकारके वचनों तथा नीतिजनित उपायोंसे राजाको संतुष्ट किया। मन्त्रीने राजकुमारी भोगवती और युवराज नागका विवाह तय करा दिया। राजा विजयने कन्या देना स्वीकार कर लिया। बूढ़े मन्त्री लौट आये और शूरसेनसे उन्होंने विवाह निश्चित होनेका सब वृत्तान्त सुना दिया। तदनन्तर बहुत समय व्यतीत हो जानेपर वृद्ध मन्त्री अन्य सब सचिवोंको साथ लेकर सहसा राजा विजयके वहाँ पहुँचे और इस प्रकार बोले—'राजन्! महाराज शूरसेनके राजकुमार नाग बड़े ही बुद्धिमान् और गुणोंके समुद्र हैं। वे स्वयं यहाँ आना नहीं चाहते। क्षत्रियोंके विवाह अनेक प्रकारसे होते हैं। अतः यह विवाह शस्त्रों द्वारा हो जाय तो अच्छा है।'
वृद्ध मन्त्रीकी बात सुनकर राजा विजयने उसे सत्य ही माना और भोगवतीका विवाह शस्त्रके साथ ही शास्त्र-विधिके अनुसार सम्पन्न हुआ। विवाहके पश्चात् महाराजने बड़े हर्षके साथ बहुत-सी गौएँ, सुवर्ण और अश्व आदि सामग्री दहेजमें देकर कन्याको विदा किया। साथ ही अपने अमात्योंको भी भेजा। बूढ़े मन्त्री आदि सचिवोंने प्रतिष्ठानमें आकर महाराज शूरसेनको उनकी पुत्रवधू समर्पित कर दी। राजा विजयने जो विनयपूर्ण वचन कहे थे, उनको भी सुनाया और उनकी दी हुई दहेजकी सामग्री—विचित्र आभूषण, दासियाँ तथा वस्त्र आदि निवेदन किये। इन सब कार्योंका सम्पादन करके वे लोग कृतकृत्य हो गये। राजकुमारी भोगवतीके साथ
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जो विजयके अमात्य पधारे थे, उनका महाराज शूरसेनने बड़े सम्मानके साथ स्वागत-सत्कार किया। जिसे सुनकर राजा विजयको प्रसन्नता हो, ऐसा बर्ताव करके सबको विदा किया। राजा विजयकी कन्या रूपवती थी। वह सुन्दरी सदा अपने सास-ससुरकी सेवामें संलग्न रहती थी। भोगवतीका पति अत्यन्त भीषण महानाग रत्नोंसे सुशोभित एकान्त गृहमें सुगन्धित पुष्पोंसे बिछी हुई सुखद शय्यापर आराम करता था। उसने अपने माता-पितासे बार-बार कहा—‘मेरी पत्नी राजकुमारी मेरे समीप क्यों नहीं आती?’ पुत्रकी यह बात सुनकर उसकी माताने धायसे कहा—‘तुम भोगवतीसे जाकर कहो, ‘तुम्हारा पति एक सर्प है। देखो, इसपर क्या कहती है।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर धाय भोगवतीके पास गयी और एकान्तमें विनीत भावसे बोली—‘कल्याणी! मैं तुम्हारे पतिको जानती हूँ। वे देवता हैं। किंतु यह बात किसीपर प्रकट न करना—वे मनुष्य नहीं, सर्पके रूपमें हैं।’ धायकी बात सुनकर भोगवतीने कहा—‘मनुष्य-कन्याको सामान्यतः मनुष्य ही पति मिला करता है; यदि देवजातिका पुरुष पतिरूपमें प्राप्त हो, तब तो क्या कहना। वह तो बड़े पुण्यसे मिलता है।’ धायने भोगवतीकी बात सर्पसे, उसकी मातासे और महाराज शूरसेनसे भी कही। भोगवतीने भी धायको बुलाकर कहा—‘तुम्हारा कल्याण हो, मुझे मेरे स्वामीका दर्शन तो कराओ।’
तब धायने उसे ले जाकर अत्यन्त भयानक सर्पका दर्शन कराया। वह सुगन्धित फूलोंसे आच्छादित पलंगपर विराजमान था। एकान्त गृहमें रत्नोंसे विभूषित भयानक सर्पके आकारमें बैठे हुए अपने स्वामीको देखकर भोगवतीने हाथ जोड़कर कहा—‘मैं धन्य और अनुगृहीत हूँ, जिसके पति देवता हैं। पति ही स्त्रीकी गति है।’ यह सुनकर नागको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने हँसकर कहा—‘सुन्दरी! मैं तुम्हारी भक्तिसे संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हें क्या अभीष्ट वरदान दूँ ? तुम्हारे अनुग्रहसे मेरी सम्पूर्ण स्मरणशक्ति जाग उठी है। मुझे पिनाकधारी देवाधिदेव भगवान् शंकरने शाप दिया है। शेषनागका पुत्र महाबलवान् नाग जो भगवान् शंकरके हाथका कङ्कण बना रहता है, वही मैं तुम्हारा पति हूँ और तुम भी वही पूर्वजन्मकी मेरी पत्नी भोगवती हो। एक दिन भगवान् शंकर एकान्तमें पार्वतीजीके साथ बैठे थे। वहाँ पार्वतीजीने एक बात कही, जिसे सुनकर भगवान् शिव ठठाकर हँस पड़े। उस समय मुझे भी हँसी आ गयी। इससे कुपित होकर भगवान्ने मुझे यह शाप दिया—‘तू मनुष्य-योनिमें सर्परूपसे जन्म लेकर ज्ञानी होगा।’ कल्याणी! यह शाप सुनकर तुमने और मैंने भी भगवान्को प्रसन्न करनेकी चेष्टा की। तब उन्होंने कहा—‘जब तुम गौतमीके तटपर मेरा पूजन करोगे और मैं तुम्हारे अन्तःकरणमें ज्ञानका आधान करूँगा, उस समय तुम भोगवतीके प्रसादसे शापमुक्त हो जाओगे’ इसीलिये मुझपर यह संकट आया है। तुम मुझे गौतमीके तटपर ले चलो और मेरे साथ ही भगवान्की पूजा करो। इससे मेरा शाप छूट जायगा और हम दोनों पुनः भगवान् शिवका सांनिध्य प्राप्त करेंगे। कष्टमें पड़े हुए समस्त प्राणियोंके लिये सदा भगवान् शिव ही परम गति हैं।’ पति की यह बात सुनकर भोगवती उन्हें साथ ले गौतमी-तटपर गयी और वहाँ गौतमीमें स्नान करके उसने शिवका पूजन किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान्ने उस सर्पको दिव्य रूप प्रदान किया। तब वह अपने माता-पितासे पूछकर