संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* सूर्यकी महिमा तथा अदितिके गर्भसे उनके अवतारका वर्णन * ७३
भगवान् सूर्यका इस स्तोत्रके द्वारा स्तवन करें।
मुनियोंने पूछा— भगवन्! आपने भगवान् सूर्यको निर्गुण एवं सनातन देवता बतलाया है; फिर आपके ही मुँहसे हमने यह भी सुना है कि वे बारह स्वरूपोंमें प्रकट हुए। वे तेजकी राशि और महान् तेजस्वी होकर किसी स्त्रीके गर्भमें कैसे प्रकट हुए, इस विषयमें हमें बड़ा संदेह है।
ब्रह्माजी बोले— प्रजापति दक्षके साठ कन्याएँ हुईं, जो श्रेष्ठ और सुन्दरी थीं। उनके नाम अदिति, दिति, दनु और विनता आदि थे। उनमेंसे तेरह कन्याओंका विवाह दक्षने कश्यपजीसे किया था। अदितिने तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंको जन्म दिया। दितिसे दैत्य और दनुसे बलाभिमानी भयंकर दानव उत्पन्न हुए। विनता आदि अन्य स्त्रियोंने भी स्थावर-जङ्गम भूतोंको जन्म दिया। इन दक्षसुताओंके पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदिके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया। कश्यपके पुत्रोंमें देवता प्रधान हैं, वे सात्त्विक हैं; इनके अतिरिक्त दैत्य आदि राजस और तामस हैं। देवताओंको यज्ञका भागी बनाया गया है। परंतु दैत्य और दानव उनसे शत्रुता रखते थे, अतः वे मिलकर उन्हें कष्ट पहुँचाने लगे। माता अदितिने देखा, दैत्यों और दानवोंने मेरे पुत्रोंको अपने स्थानसे हटा दिया और सारी त्रिलोकी नष्टप्राय कर दी। तब उन्होंने भगवान् सूर्यकी आराधनाके लिये महान् प्रयत्न किया। वे नियमित आहार करके कठोर नियमका पालन करती हुई एकाग्रचित्त हो आकाशमें स्थित तेजोराशि भगवान् भास्करका स्तवन करने लगीं।
अदिति बोलीं— भगवन्! आप अत्यन्त सूक्ष्म, परम पवित्र और अनुपम तेज धारण करते हैं। तेजस्वियोंके ईश्वर, तेजके आधार तथा सनातन देवता हैं। आपको नमस्कार है। गोपते! जगत्का उपकार करनेके लिये मैं आपकी स्तुति—आपसे प्रार्थना करती हूँ। प्रचण्ड रूप धारण करते समय आपकी जैसी आकृति होती है, उसको मैं प्रणाम करती हूँ। क्रमशः आठ मासतक पृथ्वीके जलरूप रसको ग्रहण करनेके लिये आप जिस अत्यन्त तीव्र रूपको धारण करते हैं, उसे मैं प्रणाम करती हूँ। आपका वह स्वरूप अग्नि और सोमसे संयुक्त होता है। आप गुणात्माको नमस्कार है। विभावसो! आपका जो रूप ऋक्, यजुष् और सामकी एकतासे त्रयीसंज्ञक इस विश्वके रूपमें तपता है उसको नमस्कार है। सनातन! उससे भी परे जो ‘ॐ’ नामसे प्रतिपादित स्थूल एवं सूक्ष्मरूप निर्मल स्वरूप है, उसको मेरा प्रणाम है।*
ब्रह्माजी कहते हैं— इस प्रकार बहुत दिनोंतक आराधना करनेपर भगवान् सूर्यने दक्षकन्या अदितिको अपने तेजोमय स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराया।
अदिति बोलीं— जगत्के आदि कारण भगवान् सूर्य! आप मुझपर प्रसन्न हों। गोपते! मैं आपको भलीभाँति देख नहीं पाती। दिवाकर! आप ऐसी
* नमस्तुभ्यं परं सूक्ष्मं सुपुण्यं बिभ्रतेऽतुलम्। धाम धामवतामीशं धामाधारं च शाश्वतम्॥
जगतामुपकाराय त्वामहं स्तौमि गोपते। आदानस्य यद्रूपं तीव्रं तस्मै नमाम्यहम्॥
ग्रहीतुमष्टमासेन कालेनाम्बुमयं रसम्। बिभ्रतस्तव यद्रूपमतितीव्रं नतास्मि तत्॥
समेतमग्निसोमाभ्यां नमस्तस्मै गुणात्मने। यद्रूपमृग्यजुःसाम्नामैक्येन तपते तव॥
विश्वमेतत्त्रयीसंज्ञं नमस्तस्मै विभावसो। यत्तु तस्मात्परं रूपमोमित्युक्त्वाभिसंहितम्।
अस्थूलं स्थूलममलं नमस्तस्मै सनातन॥
(३२। १२—१६)
३३- अदितिको भगवान् सूर्यका वरदान
७४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
कृपा करें, जिससे मुझे आपके रूपका भलीभाँति दर्शन हो सके। भक्तोंपर दया करनेवाले प्रभो! मेरे पुत्र आपके भक्त हैं। आप उनपर कृपा करें।'
तब भगवान् भास्करने अपने सामने पड़ी हुई देवीको स्पष्ट दर्शन देकर कहा—'देवि! आपकी जो इच्छा हो, उसके अनुसार मुझसे कोई एक वर माँग लें।'
अदिति बोलीं—देव! आप प्रसन्न हों। अधिक बलवान् दैत्यों और दानवोंने मेरे पुत्रोंके हाथसे त्रिलोकीका राज्य और यज्ञभाग छीन लिये हैं। गोपते! उन्हींके लिये आप मेरे ऊपर कृपा करें। अपने अंशसे मेरे पुत्रोंके भाई होकर आप उनके शत्रुओंका नाश करें।
भगवान् सूर्यने कहा—देवि! मैं अपने हजारवें अंशसे तुम्हारे गर्भका बालक होकर प्रकट होऊँगा और तुम्हारे पुत्रके शत्रुओंका नाश करूँगा।
यों कहकर भगवान् भास्कर अन्तर्धान हो गये और देवी अदिति भी अपना समस्त मनोरथ सिद्ध हो जानेके कारण तपस्यासे निवृत्त हो गयीं। तत्पश्चात् वर्षके अन्तमें देवमाता अदितिकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये भगवान् सविताने उनके गर्भमें निवास किया। उस समय देवी अदिति यह सोचकर कि मैं पवित्रतापूर्वक ही इस दिव्य गर्भको धारण करूँगी, एकाग्रचित्त होकर कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि व्रतोंका पालन करने लगीं। उनका यह कठोर नियम देखकर कश्यपजीने कुछ कुपित होकर कहा—'तू नित्य उपवास करके गर्भके बच्चेको क्यों मारे डालती है।' तब वे भी रुष्ट होकर बोलीं—'देखिये, यह रहा गर्भका बच्चा। मैंने इसे नहीं मारा है, यही अपने शत्रुओंका मारनेवाला होगा।' यों कहकर देवमाताने उसी समय उस गर्भका प्रसव किया। वह उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी अण्डाकार गर्भ सहसा प्रकाशित हो उठा। उसे देखकर कश्यपजीने वैदिक वाणीके द्वारा आदरपूर्वक उसका स्तवन किया। स्तुति करनेपर उस गर्भसे बालक प्रकट हो गया। उसके श्रीअङ्गोंकी आभा पद्मपत्रके समान श्याम थी। उसका तेज सम्पूर्ण दिशाओंमें व्यास हो गया। इसी समय अन्तरिक्षसे कश्यपमुनिको सम्बोधित करके सजल मेघके समान गम्भीर स्वरमें आकाशवाणी हुई—'मुने! तुमने अदितिसे कहा था—'त्वया मारितम् अण्डम्' (तूने गर्भके बच्चेको मार डाला), इसलिये तुम्हारा यह पुत्र मार्तण्डके नामसे विख्यात होगा और यज्ञभागका अपहरण करनेवाले अपने शत्रुभूत असुरोंका संहार करेगा।' यह आकाशवाणी सुनकर देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ और दानव हतोत्साह हो गये। तत्पश्चात् देवताओंसहित इन्द्रने दैत्योंको युद्धके लिये ललकारा। दानवोंने भी आकर उनका सामना किया। उस समय देवताओं और
१९- श्रीसूर्यदेवकी स्तुति तथा उनके अष्टोत्तरशत नामोंका वर्णन
* श्रीसूर्यदेवकी स्तुति तथा उनके अष्टोत्तरशत नामोंका वर्णन * ७५
असुरोंमें बड़ा भयानक युद्ध हुआ। उस युद्धमें भगवान् मार्तण्डने दैत्योंकी ओर देखा, अतः वे सभी महान् असुर उनके तेजसे जलकर भस्म हो गये। फिर तो देवताओंके हर्षकी सीमा नहीं रही। उन्होंने अदिति और मार्तण्डका स्तवन किया। तदनन्तर देवताओंको पूर्ववत् अपने-अपने अधिकार और यज्ञभाग प्राप्त हो गये। भगवान् मार्तण्ड भी अपने अधिकारका पालन करने लगे। ऊपर और नीचे सब ओर किरणें फैली होनेसे भगवान् सूर्य कदम्बपुष्पकी भाँति शोभा पाते थे। वे आगमें तपाये हुए गोलेके सदृश दिखायी देते थे। उनका विग्रह अधिक स्पष्ट नहीं जान पड़ता था।
श्रीसूर्यदेवकी स्तुति तथा उनके अष्टोत्तरशत नामोंका वर्णन
मुनियोंने कहा— भगवन्! आप पुनः हमें सूर्यदेवसे सम्बन्ध रखनेवाली कथा सुनाइये।
ब्रह्माजी बोले— स्थावर-जङ्गम समस्त प्राणियोंके नष्ट हो जानेपर जब समस्त लोक अन्धकारमें विलीन हो गये थे, उस समय सबसे पहले प्रकृतिसे गुणोंकी हेतुभूत समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व)-का आविर्भाव हुआ। उस बुद्धिसे पञ्चमहाभूतोंका प्रवर्तक अहंकार प्रकट हुआ। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये पाँच महाभूत हुए। तदनन्तर एक अण्ड उत्पन्न हुआ। उसमें ये सातों लोक प्रतिष्ठित थे। सातों द्वीपों और समुद्रोंसहित पृथ्वी भी उसमें थी। उसीमें मैं, विष्णु और महादेवजी भी थे। वहाँ सब लोग तमोगुणसे अभिभूत एवं विमूढ़ थे और परमेश्वरका ध्यान करते थे। तदनन्तर अन्धकारको दूर करनेवाले एक महातेजस्वी देवता प्रकट हुए। उस समय हमलोगोंने ध्यानके द्वारा जाना कि ये भगवान् सूर्य हैं। उन परमात्माको जानकर हमने दिव्य स्तुतियोंके द्वारा उनका स्तवन आरम्भ किया—'भगवन्! तुम आदिदेव हो। ऐश्वर्यसे सम्पन्न होनेके कारण तुम देवताओंके ईश्वर हो। सम्पूर्ण भूतोंके आदिकर्ता भी तुम्हीं हो। तुम्हीं देवाधिदेव दिवाकर हो। सम्पूर्ण भूतों, देवताओं, गन्धर्वों, राक्षसों, मुनियों, किन्नरों, सिद्धों, नागों तथा पक्षियोंका जीवन तुमसे ही चलता है। तुम्हीं ब्रह्मा, तुम्हीं महादेव, तुम्हीं विष्णु, तुम्हीं प्रजापति तथा तुम्हीं वायु, इन्द्र, सोम, विवस्वान् एवं वरुण हो। तुम्हीं काल हो। सृष्टिके कर्ता, धर्ता, संहर्ता और प्रभु भी तुम्हीं हो। नदी, समुद्र, पर्वत, बिजली, इन्द्र-धनुष, प्रलय, सृष्टि, व्यक्त, अव्यक्त एवं सनातन पुरुष भी तुम्हीं हो। साक्षात् परमेश्वर तुम्हीं हो। तुम्हारे हाथ और पैर सब ओर हैं। नेत्र, मस्तक और मुख भी सब ओर हैं। तुम्हारे सहस्रों किरणें, सहस्रों मुख, सहस्रों चरण और सहस्रों
७६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
नेत्र हैं। तुम सम्पूर्ण भूतोंके आदिकारण हो। भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य—ये सब तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हारा जो स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी, सबका प्रकाशक, दिव्य, सम्पूर्ण लोकोंमें प्रकाश बिखेरनेवाला और देवेश्वरोंके द्वारा भी कठिनतासे देखे जाने योग्य है, उसको हमारा नमस्कार है। देवता और सिद्ध जिसका सेवन करते हैं, भृगु, अत्रि और पुलह आदि महर्षि जिसकी स्तुतिमें संलग्न रहते हैं तथा जो अत्यन्त अव्यक्त है, तुम्हारे उस स्वरूपको हमारा प्रणाम है। सम्पूर्ण देवताओंमें उत्कृष्ट तुम्हारा जो रूप वेदवेत्ता पुरुषोंके द्वारा जानने योग्य, नित्य और सर्वज्ञानसम्पन्न है, उसको हमारा नमस्कार है। तुम्हारा जो स्वरूप इस विश्वकी सृष्टि करनेवाला, विश्वमय, अग्नि एवं देवताओंद्वारा पूजित, सम्पूर्ण विश्वमें व्यापक और अचिन्त्य है, उसे हमारा प्रणाम है। तुम्हारा जो रूप यज्ञ, वेद, लोक तथा द्युलोकसे भी परे परमात्मा नामसे विख्यात है, उसको हमारा नमस्कार है। जो अविज्ञेय, अलक्ष्य, अचिन्त्य, अव्यय, अनादि और अनन्त है, आपके उस स्वरूपको हमारा प्रणाम है। प्रभो! तुम कारणके भी कारण हो, तुमको बारम्बार नमस्कार है। पापोंसे मुक्त करनेवाले तुम्हें प्रणाम है, प्रणाम है। तुम दैत्योंको पीड़ा देनेवाले और रोगोंसे छुटकारा दिलानेवाले हो। तुम्हें अनेकानेक नमस्कार हैं। तुम सबको वर, सुख, धन और उत्तम बुद्धि प्रदान करनेवाले हो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है।*
इस प्रकार स्तुति करनेपर तेजोमय रूप धारण करनेवाले भगवान् भास्करने कल्याणमयी वाणीमें कहा—'आपलोगोंको कौन-सा वर प्रदान किया जाय?'
देवताओंने कहा—प्रभो! आपका रूप अत्यन्त तेजोमय है, इसका ताप कोई सह नहीं सकता। अतः जगत्के हितके लिये यह सबके सहने योग्य हो जाय।
तब 'एवमस्तु' कहकर आदिकर्ता भगवान् सूर्य सम्पूर्ण लोकोंके कार्य सिद्ध करनेके लिये
* आदिदेवोऽसि देवानामैश्वर्याच्च त्वमीश्वरः। आदिकर्तासि भूतानां देवदेवो दिवाकरः॥
जीवनः सर्वभूतानां देवगन्धर्वरक्षसाम्। मुनिकिन्नरसिद्धानां तथैवोरगपक्षिणाम्॥
त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः। वायुरिन्द्रश्च सोमश्च विवस्वान् वरुणस्तथा॥
त्वं कालः सृष्टिकर्ता च हर्ता भर्ता तथा प्रभुः। सरितः सागराः शैला विद्युदिन्द्रधनूंषि च॥
प्रलयः प्रभवश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः। ईश्वरात्परतो विद्या विद्यायाः परतः शिवः॥
शिवात्परतरो देवस्त्वमेव परमेश्वरः। सर्वतःपाणिपादान्तः सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः॥
सहस्रांशुः सहस्रास्यः सहस्रचरणेक्षणः। भूतादिर्भूर्भुवः स्वश्च महः सत्यं तपो जनः॥
प्रदीप्तं दीपनं दिव्यं सर्वलोकप्रकाशकम्। दुर्निरीक्ष्यं सुरेन्द्राणां यद्रूपं तस्य ते नमः॥
सुरसिद्धगणैर्जुष्टं भृग्वत्रिपुलहादिभिः। स्तुतं परममव्यक्तं यद्रूपं तस्य ते नमः॥
वेद्यं वेदविदां नित्यं सर्वज्ञानसमन्वितम्। सर्वदेवादिदेवस्य यद्रूपं तस्य ते नमः॥
विश्वकृद्विश्वभूतं च वैश्वानरसुरार्चितम्। विश्वस्थितमचिन्त्यं च यद्रूपं तस्य ते नमः॥
परं यज्ञात्परं वेदात्परं लोकात्परं दिवः। परमात्मेत्यभिख्यातं यद्रूपं तस्य ते नमः॥
अविज्ञेयमनलक्ष्यमध्यानगतमव्ययम् । अनादिनिधनं चैव यद्रूपं तस्य ते नमः॥
नमो नमः कारणकारणाय नमो नमः पापविमोचनाय। नमो नमस्ते दितिजार्दनाय नमो नमो रोगविमोचनाय॥
नमो नमः सर्ववरप्रदाय नमो नमः सर्वसुखप्रदाय। नमो नमः सर्वधनप्रदाय नमो नमः सर्वमतिप्रदाय॥
(३३। ९—२३)
- श्रीसूर्यदेवकी स्तुति तथा उनके अष्टोत्तरशत नामोंका वर्णन * ७७
समय-समयपर गर्मी, सर्दी और वर्षा करने लगे। तदनन्तर ज्ञानी, योगी, ध्यानी तथा अन्यान्य मोक्षाभिलाषी पुरुष अपने हृदय-मन्दिरमें स्थित भगवान् सूर्यका ध्यान करने लगे। समस्त शुभ लक्षणोंसे हीन अथवा सम्पूर्ण पातकोंसे युक्त ही क्यों न हो, भगवान् सूर्यकी शरण लेनेसे मनुष्य सब पापोंसे तर जाता है। अग्निहोत्र, वेद तथा अधिक दक्षिणावाले यज्ञ भगवान् सूर्यकी भक्ति एवं नमस्कारकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते। भगवान् सूर्य तीर्थोंमें सर्वोत्तम तीर्थ, मङ्गलोंमें परम मङ्गलमय और पवित्रोंमें परम पवित्र हैं। अतः विद्वान् पुरुष उनकी शरण लेते हैं। जो इन्द्र आदिके द्वारा प्रशंसित सूर्यदेवको नमस्कार करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोकमें जाते हैं।
मुनियोंने कहा— ब्रह्मन्! हमारे मनमें चिरकालसे यह इच्छा हो रही है कि भगवान् सूर्यके एक सौ आठ नामोंका वर्णन सुनें। आप उन्हें बतानेकी कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले— ब्राह्मणो! भगवान् भास्करके परम गोपनीय एक सौ आठ नाम, जो स्वर्ग और मोक्ष देनेवाले हैं, बतलाता हूँ; सुनो। ॐ सूर्य, अर्यमा, भग, त्वष्टा, पूषा (पोषक), अर्क, सविता, रवि, गभस्तिमान् (किरणोंवाले), अज (अजन्मा), काल, मृत्यु, धाता (धारण करनेवाले), प्रभाकर (प्रकाशका खजाना), पृथ्वी, आप (जल), तेज, ख (आकाश), वायु, परायण (शरण देनेवाले), सोम, बृहस्पति, शुक्र, बुध, अङ्गारक (मङ्गल), इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु (प्रज्वलित किरणोंवाले), शुचि (पवित्र), सौरि (सूर्यपुत्र मनु), शनैश्चर, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, स्कन्द (कार्तिकेय), वैश्रवण (कुबेर), यम, वैद्युत (बिजलीमें रहनेवाली) अग्नि, जाठराग्नि, ऐन्धन (ईंधनमें रहनेवाली) अग्नि, तेजःपति, धर्मध्वज, वेदकर्ता, वेदाङ्ग, वेदवाहन, कृत (सत्ययुग), त्रेता, द्वापर, कलि, सर्वामराश्रय, कला, काष्ठा, मुहूर्त, क्षपा (रात्रि), याम (पहर), क्षण, संवत्सरकर, अश्वत्थ, कालचक्र, विभावसु (अग्नि), पुरुष, शाश्वत, योगी, व्यक्ताव्यक्त, सनातन, कालाध्यक्ष, प्रजाध्यक्ष, विश्वकर्मा, तमोनुद (अन्धकारको भगानेवाले ), वरुण, सागर, अंश, जीमूत (मेघ), जीवन, अरिहा (शत्रुओंका नाश करनेवाले), भूताश्रय, भूतपति, सर्वलोकनमस्कृत, स्रष्टा, संवर्तक (प्रलयकालीन) अग्नि, सर्वादि, अलोलुप (निर्लोभ), अनन्त, कपिल, भानु, कामद (कामनाओंको पूर्ण करनेवाले), सर्वतोमुख (सब ओर मुखवाले), जय, विशाल, वरद, सर्वभूतनिषेवित, मन, सुपर्ण (गरुड़), भूतादि, शीघ्रग (शीघ्र चलनेवाले), प्राणधारण, धन्वन्तरि, धूमकेतु, आदिदेव, अदितिपुत्र, द्वादशात्मा (बारह स्वरूपोंवाले), रवि, दक्ष, पिता, माता, पितामह, स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, मोक्षद्वार, त्रिविष्टप (स्वर्ग), देहकर्ता, प्रशान्तात्मा, विश्वात्मा, विश्वतोमुख, चराचरात्मा, सूक्ष्मात्मा, मैत्रेय तथा करुणान्वित (दयालु)*—ये अमित तेजस्वी एवं कीर्तन करने
* ॐ सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः। गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः॥
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्। सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च॥
इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः सौरिः शनैश्चरः। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः॥
वैद्युतो जाठराग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः। धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः॥
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वामराश्रयः। कलाकाष्ठामुहूर्ताश्च क्षपा यामास्तथा क्षणाः॥
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः। पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः॥
२०- पार्वतीदेवीकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा उनके द्वारा ग्राहके मुखसे ब्राह्मण-बालकका उद्धार
| ७८ | * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण * |
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योग्य भगवान् सूर्यके एक सौ आठ सुन्दर नाम मैंने बताये हैं। जो मनुष्य देवश्रेष्ठ भगवान् सूर्यके इस स्तोत्रका शुद्ध एवं एकाग्र चित्तसे कीर्तन करता है, वह शोकरूपी दावानलके समुद्रसे मुक्त हो जाता और मनोवाञ्छित भोगोंको प्राप्त कर लेता है।
पार्वतीदेवीकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा उनके द्वारा ग्राहके मुखसे ब्राह्मण-बालकका उद्धार
**मुनियोंने पूछा—**प्रभो! दक्षकन्या सतीने क्रोधवश पूर्वशरीरका परित्याग करके फिर गिरिराज हिमालयके घरमें कैसे जन्म लिया? महादेवजीके साथ उनका संयोग कैसे हुआ? तथा उस दम्पतिमें वार्तालाप किस प्रकार हुआ?
**ब्रह्माजी बोले—**मुनिवरो! पार्वती और महादेवजीकी पवित्र कथा पापोंका नाश करनेवाली और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली है; उसे कहता हूँ, सुनो। एक समयकी बात है, महर्षि कश्यप हिमवान्के घरपर पधारे। उस समय हिमवान्ने पूछा—'मुने! किस उपायसे मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे, मेरी अधिक प्रसिद्धि होगी और सत्पुरुषोंमें मैं पूजनीय समझा जाऊँगा?'
**कश्यपने कहा—**महाबाहो! उत्तम संतान होनेसे यह सब कुछ प्राप्त हो जाता है। ब्रह्मा और ऋषियोंसहित मेरी प्रसिद्धि तो केवल संतानके ही कारण है। अतः गिरिराज! तुम घोर तपस्या करके गुणवान् संतान—श्रेष्ठ कन्या उत्पन्न करो।
**ब्रह्माजी कहते हैं—**कश्यपजीके यों कहनेपर गिरिराज हिमालयने नियममें स्थित होकर ऐसी तपस्या की, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। उस तपस्यासे मुझे बड़ा संतोष हुआ। तब मैंने उनके पास जाकर कहा—'उत्तम व्रतके पालन करनेवाले गिरिराज! अब मैं तुम्हारी इस तपस्यासे संतुष्ट हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो।'
**हिमालयने कहा—**भगवन्! मैं सब गुणोंसे सुशोभित संतान चाहता हूँ। यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं तो ऐसा ही वर दीजिये।
गिरिराजकी यह बात सुनकर मैंने उन्हें मनोवाञ्छित वर देते हुए कहा—'शैलेन्द्र! इस तपस्याके प्रभावसे तुम्हारे कन्या उत्पन्न होगी, जिससे तुम सर्वत्र उत्तम कीर्ति प्राप्त करोगे। तुम्हारे यहाँ कोटि-कोटि तीर्थ वास करेंगे। तुम सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित होगे तथा अपने पुण्यसे देवताओंको भी पावन बनाओगे। तदनन्तर गिरिराजने समयानुसार अपनी पत्नी मैनाके गर्भसे अपर्णा नामकी एक कन्या उत्पन्न की। अपर्णा बहुत समयतक निराहार रही, उसे उपवाससे रोकते हुए माताने कहा—'बेटी! 'उमा' (ऐसा मत करो)।' उस समय वे मातृस्नेहसे दुःखित हो रही थीं।
कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः। वरुणः सागरोंऽशश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा॥
भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः। स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः॥
अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः। जयो विशालो वरदः सर्वभूतनिषेवितः॥
मनः सुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारणः। धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः॥
द्वादशात्मा रविर्दक्षः पिता माता पितामहः। स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥
देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः। चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः॥
(३३। ३४—४५)
३५- तपस्विनी पार्वतीको ब्रह्माजीका वरदान
* पार्वतीदेवीकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा उनके द्वारा ग्राहके मुखसे ब्राह्मण-बालकका उद्धार * ७९
माताके यों कहनेपर कठोर तपस्या करनेवाली पार्वतीदेवी उमा नामसे ही संसारमें प्रसिद्ध हुईं। पार्वतीकी तपस्यासे तीनों लोक संतप्त हो उठे। तब मैंने उससे कहा—'देवि! क्यों इस कठोर तपस्यासे तुम सम्पूर्ण लोकोंको संताप दे रही हो? कल्याणि! तुम्हींने इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है। स्वयं ही इसे रचकर अब इसका विनाश न करो। जगन्माता! तुम अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको धारण करती हो; फिर कौन ऐसी वस्तु है, जिसे तुम इस समय तपस्याद्वारा प्राप्त करना चाहती हो? वह हमें बतलाओ।'
देवीने कहा—पितामह! मैं जिसके लिये यह तपस्या करती हूँ, उसे आप भलीभाँति जानते हैं। फिर मुझसे क्यों पूछते हैं?
तब मैंने पार्वतीसे कहा—'शुभे! तुम जिनके लिये तप करती हो, वे स्वयं ही तुम्हारा वरण करेंगे। भगवान् शङ्कर ही सर्वश्रेष्ठ पति हैं। वे सम्पूर्ण लोकेश्वरोंके भी ईश्वर हैं। हम सदा ही उनके अधीन रहनेवाले किङ्कर हैं। देवि! वे देवताओंके भी देवता, परमेश्वर और स्वयम्भू हैं। उनका स्वरूप बहुत ही उदार है। उनकी समानता करनेवाला कहीं कोई भी नहीं है।'
तत्पश्चात् देवताओंने आकर परम सुन्दरी पार्वतीसे कहा—'देवि! भगवान् शङ्कर थोड़े ही दिनोंमें आपके स्वामी होंगे। अब इसके लिये तपस्या न कीजिये।' यों कहकर देवताओंने गिरिराजकुमारीकी प्रदक्षिणा की और वहाँसे अन्तर्धान हो गये। पार्वती भी तपस्यासे निवृत्त हो गयीं, किंतु अपने आश्रममें ही रहने लगीं। एक दिन जब वे अपने आश्रमपर उगे हुए अशोक-वृक्षका सहारा लेकर खड़ी थीं, देवताओंकी पीड़ा दूर करनेवाले भगवान् शङ्कर पधारे। उनके ललाटमें चन्द्राकार तिलक लगा था, वे बाँहके बराबर नाटा एवं विकृत रूप धारण करके आये थे। उनकी नाक कटी हुई थी, कूबड़ निकला हुआ था और केशोंका अन्तिम भाग पीला पड़ गया था। उनके मुखकी आकृति भी बिगड़ी हुई थी। उन्होंने पार्वतीसे कहा—'देवि! मैं तुम्हारा वरण करता हूँ।' उमा योगसिद्ध हो गयी थीं। आन्तरिक भावकी शुद्धिसे उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया था। वे समझ गयीं कि साक्षात् भगवान् शङ्कर पधारे हैं। तब उनकी कृपा प्राप्त करनेकी इच्छासे पार्वतीने अर्घ्य, पाद्य और मधुपर्कके द्वारा उनका पूजन करके कहा—'भगवन्! मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। घरमें मेरे पिता मालिक हैं। वे ही मुझे देनेमें समर्थ हैं। मैं तो उनकी कन्या हूँ।' यह सुनकर देवाधिदेव भगवान् शङ्करने उस विकृत रूपमें ही गिरिराज हिमालयके पास जाकर कहा—'शैलेन्द्र! मुझे अपनी कन्या दीजिये।' उस विकृत वेषमें अविनाशी रुद्रको ही आया जान गिरिराजको शापसे भय हुआ। उन्होंने उदास होकर कहा—'भगवन्! ब्राह्मण इस पृथ्वीके देवता हैं,
८० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
मैं उनका अनादर नहीं करता; किंतु मेरे मनमें पहलेसे जो कामना है, उसे सुनिये। मेरी पुत्रीका स्वयंवर होगा। उसमें वह जिसको वरण करेगी, वही उसका पति होगा।' हिमालयकी यह बात सुनकर भगवान् शङ्करने देवीके पास आकर कहा—'तुम्हारे पिताने स्वयंवर होनेकी बात कही है। उसमें तुम जिसका वरण करोगी, वही तुम्हारा पति होगा। उस समय किसी रूपवान्को छोड़कर तुम मुझ-जैसे अयोग्यका वरण कैसे करोगी?'
उनके यों कहनेपर पार्वतीने उनकी बातोंपर विचार करते हुए कहा—'महाभाग! आपको अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मैं आपका ही वरण करूँगी। इसमें कोई अनोखी बात नहीं है। अथवा यदि आपको मुझपर संदेह है तो मैं यहीं आपका वरण करती हूँ।' यों कहकर पार्वतीने अपने हाथोंसे अशोकका गुच्छा लेकर भगवान् शङ्करके कंधेपर रखा और कहा—'देव! मैंने आपका वरण कर लिया।' भगवती पार्वतीके इस प्रकार वरण करनेपर भगवान् शङ्करने उस अशोक-वृक्षको अपनी वाणीसे सजीव करते हुए-से कहा—'अशोक! तुम्हारे परम पवित्र गुच्छेसे मेरा वरण हुआ है, इसलिये तुम जरावस्थासे रहित एवं अमर रहोगे। तुम जैसा चाहोगे, वैसा रूप धारण कर सकोगे। तुममें इच्छानुसार फूल लगेंगे। तुम सब कामनाओंको देनेवाले, सब प्रकारके आभूषणरूप फूल और फलोंसे सम्पन्न एवं मेरे अत्यन्त प्रिय होगे। तुममें सब प्रकारकी सुगन्ध होगी तथा तुम देवताओंके अधिक प्रिय बने रहोगे।'
यों कहकर जगत्की सृष्टि और सम्पूर्ण भूतोंका पालन करनेवाले भगवान् शङ्कर हिमालयकुमारी उमासे विदा ले वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर पार्वतीदेवी भी उन्हींकी ओर मन लगाये एक शिलापर बैठ गयीं, इसी समय देवाधिदेव शिव स्वयं लीला करनेके लिये ब्राह्मण-बालकका रूप धारणकर निकटवर्ती सरोवरमें प्रकट हुए। उस समय उन्हें ग्राहने पकड़ रखा था। वे बोले—'हाय! ग्राहसे पकड़े जानेके कारण मैं अचेत हो रहा हूँ। कोई हो तो मुझे आकर बचाये।' पीड़ित ब्राह्मणकी वह पुकार सुनकर कल्याणमयी देवी पार्वती सहसा उठ खड़ी हुईं और उस स्थानपर गयीं, जहाँ वह ब्राह्मण-बालक खड़ा था। वहाँ पहुँचकर चन्द्रमुखी देवीने देखा, एक बहुत सुन्दर बालक ग्राहके मुखमें पड़ा थरथर काँप रहा है। ग्राहके खींचनेपर वह तेजस्वी बालक बड़ा आर्तनाद करता था। उस ग्राहग्रस्त बालकको देखकर देवी उमा दुःखसे आतुर हो उठीं और बोलीं—'ग्राहराज! यह अपने पिता-माताका एक ही बालक है, इसे शीघ्र छोड़ दो।'
**ग्राहने कहा—**देवि! छठे दिनपर जो सबसे पहले मेरे पास आ जाता है, उसीको विधाताने मेरा आहार निश्चित किया है। महाभागे! यह बालक आज छठे दिन ब्रह्माजीसे प्रेरित होकर ही मेरे पास आया है, अतः मैं इसे किसी प्रकार न छोड़ूँगा।
**देवी बोलीं—**ग्राहराज! मैंने हिमालयके शिखरपर जो उत्तम तपस्या की है, उसका पुण्य लेकर इस बालकको छोड़ दो। मैं तुम्हें नमस्कार करती हूँ।
**ग्राहने कहा—**देवि! आपने थोड़ी या उत्तम जो कुछ भी तपस्या की है, वह सब मुझे दे दें तो शीघ्र ही यह छुटकारा पा जायगा।
**देवी बोलीं—**महाग्राह! मैंने जन्मसे लेकर अबतक जो पुण्य किया है, वह सब तुम्हें समर्पित है। इस बालकको छोड़ दो।
देवीके इतना कहते ही उनकी तपस्यासे विभूषित हो वह ग्राह दोपहरके सूर्यकी भाँति तेजसे प्रज्वलित हो उठा। उस समय उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था। ग्राहने संतुष्ट होकर
२१- पार्वतीजीका स्वयंवर और महादेवजीके साथ उनका विवाह
| * पार्वतीजीका स्वयंवर और महादेवजीके साथ उनका विवाह * | ८१ |
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विश्वको धारण करनेवाली देवीसे कहा—‘महाव्रते! तुमने यह क्या किया? भलीभाँति सोचकर देखो तो सही। तपस्याका उपार्जन बड़े कष्टसे होता है, अतः उसका परित्याग अच्छा नहीं माना गया है। तुम अपनी तपस्या ले लो। साथ ही इस बालकको भी मैं छोड़े देता हूँ।’
देवीने कहा—ग्राह! मुझे अपना शरीर देकर भी यत्नपूर्वक ब्राह्मणकी रक्षा करनी चाहिये। तपस्या तो मैं फिर भी कर सकती हूँ; किंतु यह ब्राह्मण पुनः नहीं मिल सकता। महाग्राह! मैंने भलीभाँति सोचकर तपस्याके द्वारा बालकको छुड़ाया है। तपस्या ब्राह्मणोंसे श्रेष्ठ नहीं है। मैं ब्राह्मणोंको ही श्रेष्ठ मानती हूँ। ग्राहराज! मैं तपस्या देकर फिर नहीं लूँगी। कोई मनुष्य भी अपनी दी हुई वस्तुको वापस नहीं लेता। अतः यह तपस्या तुममें ही सुशोभित हो। इस बालकको छोड़ दो।
पार्वतीके यों कहनेपर सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले ग्राहने उनकी प्रशंसा की, उस बालकको छोड़ दिया और देवीको नमस्कार करके वहीं अन्तर्धान हो गया। अपनी तपस्याकी हानि समझकर पार्वती ने पुनः नियमपूर्वक तपका आरम्भ किया। उन्हें पुनः तपस्या करनेके लिये उत्सुक जान साक्षात् भगवान् शङ्करने प्रकट होकर कहा—‘देवि! अब तपस्या न करो। तुमने अपना तप मुझे ही समर्पित किया है। अतः वही सहस्रगुना होकर तुम्हारे लिये अक्षय हो जायगा।’
इस प्रकार तपस्याके अक्षय होनेका उत्तम वरदान पाकर उमादेवीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे स्वयंवरकी प्रतीक्षा करने लगीं।
पार्वतीजीका स्वयंवर और महादेवजीके साथ उनका विवाह
**ब्रह्माजी कहते हैं—**तदनन्तर समयानुसार हिमालयके विशाल पृष्ठभागपर पार्वतीका स्वयंवर रचाया गया। उस समय वह स्थान सैकड़ों विमानोंसे घिर रहा था। गिरिराज हिमवान् किसी बातको सोचने-विचारनेमें बड़े निपुण थे। पुत्रीने देवाधिदेव महादेवजीके साथ जो मन्त्रणा की थी, वह उन्हें ज्ञात हो गयी थी; अतः उन्होंने सोचा, यदि मेरी कन्या सम्पूर्ण लोकोंमें निवास करनेवाले देवता, दानव तथा सिद्धोंके समक्ष महादेवजीका वरण करे तो वही वाञ्छनीय पुण्य होगा। उसीमें मेरा अभ्युदय निहित है। यों विचारकर शैलराजने मन-ही-मन महेश्वरका स्मरण करके रत्नोंसे मण्डित प्रदेशमें स्वयंवर रचाया। गिरिराजकुमारीके स्वयंवरकी घोषणा होते ही सम्पूर्ण लोकोंमें निवास करनेवाले देवता आदि सुन्दर वेश-भूषा धारण करके वहाँ आने लगे। हिमवान्की सूचना पाकर मैं भी
८२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
देवताओंके साथ वहाँ उपस्थित हुआ। मेरे साथ सिद्ध और योगी भी थे। इन्द्र, विवस्वान्, भग, कृतान्त (यम), वायु, अग्नि, कुबेर, चन्द्रमा, दोनों अश्विनीकुमार तथा अन्यान्य देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग और किन्नर भी मनोहर वेष बनाये वहाँ आये थे। शचीपति इन्द्र उस समाजमें अधिक दर्शनीय जान पड़ते थे। वे अप्रतिहत आज्ञा, बल और ऐश्वर्यके कारण हर्षमग्न हो स्वयंवरकी शोभा बढ़ा रहे थे।
जो तीनों लोकोंकी उत्पत्तिमें कारण, जगत्को जन्म देनेवाली तथा देवता और असुरोंकी माता हैं, जो परम बुद्धिमान् आदिपुरुष भगवान् शिवकी पत्नी मानी गयी हैं तथा पुराणोंमें परा प्रकृति बतायी गयी हैं, वे ही भगवती सती दक्षपर कुपित हो देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये हिमवान्के घरमें अवतीर्ण हुई थीं। वे जिस विमानपर बैठी थीं, उसमें सुवर्ण और रत्न जड़े हुए थे। उनके दोनों ओर चँवर डुलाये जा रहे थे। वे सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले सुगन्धित पुष्पोंकी माला हाथमें लिये स्वयंवर-सभामें जानेको प्रस्थित हुईं।
इन्द्र आदि देवताओंसे स्वयंवर-मण्डप भरा हुआ था। भगवती उमा माला हाथमें लिये देव-समाजमें खड़ी थीं। इसी समय देवीकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शङ्कर पाँच शिखावाले शिशु बनकर सहसा उनकी गोदमें आकर सो गये। देवीने उस पञ्चशिख बालकको देखा और ध्यानके द्वारा उसके स्वरूपको जानकर बड़े प्रेमके साथ उसे अङ्कमें ले लिया। पार्वतीका संकल्प शुद्ध था। वे अपना मनोवाञ्छित पति पा गयीं, अतः भगवान् शङ्करको हृदयमें रखकर स्वयंवरसे लौट पड़ीं। देवीके अङ्कमें सोये हुए उस शिशुको देखकर देवता आपसमें सलाह करने लगे कि यह कौन है। कुछ पता न लगनेसे अत्यन्त मोहमें पड़कर वे बहुत कोलाहल करने लगे और वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्रने अपनी एक बाँह ऊँचे उठाकर उस बालकपर वज्रका प्रहार करनेकी चेष्टा की; किंतु शिशुरूपधारी देवाधिदेव शङ्करने उन्हें स्तम्भित कर दिया। अब वे न तो वज्र चला सके और न हिल-डुल सके। तब भग नामवाले बलवान् आदित्यने एक तेजस्वी शस्त्र चलाना चाहा, किंतु भगवान्ने उनकी बाँहको भी जडवत् बना दिया। साथ ही उनका बल, तेज और योगशक्ति भी व्यर्थ हो गयी। उस समय मैंने परमेश्वर शिवको पहचाना और शीघ्र उठकर उनके चरणोंमें आदरपूर्वक मस्तक झुकाया। इसके बाद मैंने उनकी स्तुति करते हुए कहा—'भगवन्! आप अजन्मा और अजर देवता हैं; आप ही जगत्के स्रष्टा, सर्वव्यापक, परावरस्वरूप, प्रकृति-पुरुष तथा ध्यान करनेयोग्य अविनाशी हैं। अमृत, परमात्मा, ईश्वर, महान् कारण, मेरे भी उत्पादक, प्रकृतिके स्रष्टा, सबके रचयिता और प्रकृतिसे भी परे हैं। ये देवी पार्वती भी प्रकृतिरूपा हैं, जो सदा ही आपके सृष्टिकार्यमें सहायक होती हैं। ये प्रकृतिदेवी पत्नीरूपमें प्रकट होकर जगत्के कारणभूत आप परमेश्वरको प्राप्त हुई हैं। महादेव! देवी पार्वतीके साथ आपको नमस्कार है। देवेश्वर! आपके ही प्रसाद और आदेशसे मैंने इन देवता आदि प्रजाओंकी सृष्टि की है। ये देवगण आपकी योगमायासे मोहित हो रहे हैं। आप इनपर कृपा कीजिये, जिससे ये पहले-जैसे हो जायँ।'
तदनन्तर मैंने सम्पूर्ण देवताओंसे कहा—'अरे! तुम सब लोग कितने मूढ़ हो! इन्हें नहीं जानते? ये साक्षात् भगवान् शङ्कर हैं। अब शीघ्र इन्हींकी शरणमें जाओ।' तब वे सब जडवत् बने हुए देवता शुद्धचित्तसे मन-ही-मन महादेवजीको प्रणाम करने लगे। इससे देवाधिदेव महेश्वरने
३७- पार्वतीजीका स्वयंवरमें महादेवजीके चरणोंमें माला अर्पण करना
* पार्वतीजीका स्वयंवर और महादेवजीके साथ उनका विवाह * ८३
प्रसन्न होकर उनका शरीर पहले-जैसा कर दिया। तत्पश्चात् देवेश्वर शिवने परम अद्भुत त्रिनेत्रधारी विग्रह धारण किया। उस समय उनके तेजसे तिरस्कृत हो सम्पूर्ण देवताओंने नेत्र बंद कर लिये। तब उन्होंने देवताओंको दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे वे उनके स्वरूपको देख सकते थे। वह दृष्टि पाकर देवताओंने परम देवेश्वर भगवान् शिवका दर्शन किया। उस समय पार्वतीदेवीने अत्यन्त प्रसन्न हो समस्त देवताओंके देखते-देखते अपने हाथकी माला भगवान्के चरणोंमें चढ़ा दी।
यह देख सब देवता साधु-साधु कहने लगे। फिर उन लोगोंने पृथ्वीपर मस्तक टेककर देवीसहित महादेवजीको प्रणाम किया। इसके बाद देवताओंसहित मैंने हिमवान्से कहा—'शैलराज! तुम सबके लिये स्पृहणीय, पूजनीय, वन्दनीय तथा महान् हो; क्योंकि साक्षात् महादेवजीके साथ तुम्हारा सम्बन्ध हो रहा है। यह तुम्हारे लिये महान् अभ्युदयकी बात है। अब शीघ्र ही कन्याका विवाह करो, विलम्ब क्यों करते हो?'
मेरी बात सुनकर हिमवान्ने नमस्कारपूर्वक मुझसे कहा—'देव! मेरे सब प्रकारके अभ्युदयमें आप ही कारण हैं। पितामह! जब जिस विधिसे विवाह करना उचित हो, वह सब आप ही करायें।' तब मैंने भगवान् शिवसे कहा—'देव! अब उमाके साथ विवाह करें।' उन्होंने उत्तर दिया—'जैसी आपकी इच्छा।' फिर तो हमलोगोंने महादेवजीके विवाहके लिये तुरंत ही एक मण्डप तैयार किया, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था। बहुत-से रत्न चित्र-विचित्र मणियाँ, सुवर्ण और मोती आदि द्रव्य स्वयं ही मूर्तिमान् होकर उस मण्डपको सजाने लगे। मरकतमणिका बना हुआ फर्श विचित्र दिखायी देने लगा। सोनेके खम्भोंसे उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। स्फटिकमणिकी बनी हुई दीवार चमक रही थी। द्वारपर मोतियोंकी झालरें लटक रही थीं। चन्द्रकान्त और सूर्यकान्तमणि सूर्य और चन्द्रमाके प्रकाश पाकर पिघल रहे थे। वायु मनोहर सुगन्ध लेकर भगवान् शिवके प्रति अपनी भक्तिका परिचय देती हुई मन्द गतिसे बहने लगी। उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था। चारों समुद्र, इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता, देवनदियाँ, महानदियाँ, सिद्ध, मुनि, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, यक्ष, राक्षस, जलचर, खेचर, किन्नर तथा चारणगण भी उस विवाहोत्सवमें (मूर्तिमान् होकर) सम्मिलित हुए थे। तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि सामगान करनेवाले गन्धर्व मनोहर बाजे लेकर उस विशाल मण्डपमें आये थे। ऋषि कथाएँ कहते, तपस्वी वेद पढ़ते तथा मन-ही-मन प्रसन्न होकर वे पवित्र वैवाहिक मन्त्रोंका जप करते थे। सम्पूर्ण जगन्माताएँ और देवकन्याएँ हर्षमग्न हो मङ्गलगान कर रही थीं। भगवान् शङ्करका विवाह हो रहा है, यह जानकर भाँति-भाँतिकी सुगन्ध और सुखका विस्तार
२२- देवताओंद्वारा महादेवजीकी स्तुति, कामदेवका दाह तथा महादेवजीका मेरुपर्वतपर गमन
८४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
करनेवाली छहों ऋतुएँ वहाँ साकार होकर उपस्थित थीं।
इस प्रकार जब सम्पूर्ण भूत वहाँ एकत्रित हुए और नाना प्रकारके बाजे बजने लगे, उस समय मैं पार्वतीको योग्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कराकर स्वयं ही मण्डपमें ले आया। फिर मैंने भगवान् शङ्करसे कहा—‘देव! मैं आपका आचार्य बनकर अग्निमें हवन करूँगा। यदि आप मुझे आज्ञा दें तो विधिपूर्वक इस कार्यका अनुष्ठान आरम्भ हो।’ तब देवाधिदेव शङ्करने मुझसे इस प्रकार कहा—‘ब्रह्मन्! जो भी शास्त्रोक्त विधान हो, उसे इच्छानुसार कीजिये; मैं आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगा।’ यह सुनकर मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और मैंने तुरंत ही कुश हाथमें लेकर महादेवजी तथा पार्वतीदेवीके हाथोंको योगबन्धसे युक्त कर दिया। उस समय वहाँ अग्निदेव स्वयं ही हाथ जोड़कर उपस्थित हो गये। श्रुतियोंके गीत और महामन्त्र भी मूर्तिमान् होकर आ गये थे। मैंने शास्त्रीय विधिसे अमृतस्वरूप घृतका होम किया और उस दिव्य दम्पतिके द्वारा अग्निकी प्रदक्षिणा करायी। उसके बाद उनके हाथोंको योगबन्धसे मुक्त किया। इस प्रकार क्रमशः वैवाहिक विधि पूर्ण की गयी। इस कार्यमें सम्पूर्ण देवताओं, मेरे मानस पुत्रों तथा सिद्धोंका भी सहयोग था। विवाह समाप्त होनेपर मैंने भगवान् शङ्करको प्रणाम किया। योगशक्तिसे ही पार्वती और परमेश्वरका उत्तम विवाह सम्पन्न हुआ। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुम सब लोगोंसे पार्वतीजीके स्वयंवर और महादेवजीके उत्तम विवाहकी कथा कह सुनायी।
देवताओंद्वारा महादेवजीकी स्तुति, कामदेवका दाह तथा महादेवजीका मेरुपर्वतपर गमन
**ब्रह्माजी कहते हैं—**अमित तेजस्वी महादेवजीका विवाह हो जानेपर इन्द्र आदि देवताओंके हर्षकी सीमा न रही। उन्होंने भगवान् शङ्करको प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति आरम्भ की।
**देवता बोले—**पर्वत जिनका लिङ्गमय स्वरूप है, जो पर्वतोंके स्वामी हैं, जिनका वेग पवनके समान है, जो विकृत रूप धारण करनेवाले तथा अपराजित हैं, जो क्लेशोंका नाश करके शुभ सम्पत्ति प्रदान करते हैं, उन भगवान् शङ्करको नमस्कार है। नीले रंगकी चोटी धारण करनेवाले अम्बिकापतिको नमस्कार है; वायु जिनका स्वरूप है और जो सैकड़ों रूप धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको प्रणाम है। दैत्योंके योगका नाश करनेवाले तथा योगियोंके गुरु महादेवजीको प्रणाम
- देवताओंद्वारा महादेवजीकी स्तुति, कामदेवका दाह तथा महादेवजीका मेरुपर्वतपर गमन * ८५
है। सूर्य और चन्द्रमा जिनके नेत्र हैं तथा जो ललाटमें भी नेत्र धारण करते हैं, उन भगवान् शङ्करको नमस्कार है। जो श्मशानमें क्रीड़ा करते और वर देते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, उन देवेश्वर शिवको प्रणाम है। जो गृहस्थ होते हुए भी साधु हैं, नित्य जटा एवं ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् शङ्करको नमस्कार है। जो जलमें तपस्या करते, योगजनित ऐश्वर्य देते, मनको शान्त रखते, इन्द्रियोंका दमन करते तथा प्रलय और सृष्टिके कर्ता हैं, उन महादेवजीको प्रणाम है। अनुग्रह करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। पालन करनेवाले शिवको प्रणाम है। रुद्र, वसु, आदित्य और अश्विनीकुमारोंके रूपमें वर्तमान भगवान् शङ्करको नमस्कार है। जो सबके पिता, सांख्यवर्णित पुरुष, विश्वेदेव, शर्व, उग्र, शिव, वरद, भीम, सेनानी, पशुपति, शुचि, वैरिहन्ता, सद्योजात, महादेव, चित्र, विचित्र, प्रधान, अप्रमेय, कार्य और कारण नामसे प्रतिपादित होते हैं, उन भगवान् शिवको प्रणाम है। भगवन्! पुरुषरूपमें आपको नमस्कार है। पुरुषमें इच्छा उत्पन्न करनेवाले आपको प्रणाम है। आप ही पुरुषका प्रकृतिके साथ संयोग कराते हैं और आप ही प्रकृतिमें गुणोंका आधान करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप प्रकृति और पुरुषके प्रवर्तक, कार्य और कारणके विधायक तथा कर्मफलोंकी प्राप्ति करानेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप कालके ज्ञाता, सबके नियन्ता, गुणोंकी विषमताके उत्पादक तथा प्रजावर्गको जीविका प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! आपको प्रणाम है। भूतभावन! आपको नमस्कार है। कल्याणमय प्रभो! आप हमें दर्शन देनेके लिये प्रसन्नमुख एवं सौम्य हो जायँ।
इस प्रकार देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति होनेपर सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् उमापतिने कहा—'देवताओ! मैं तुम्हें दर्शन देनेको सदा ही प्रसन्नमुख और सौम्य हूँ। तुम शीघ्र कोई वर माँगो। मैं निश्चय ही उसे दूँगा।'
देवता बोले—भगवन्! यह वर आपके ही हाथमें रहे। जब आवश्यकता होगी, तब हम माँग लेंगे। उस समय आप हमें मनोवाञ्छित वर दीजियेगा।
'एवमस्तु' कहकर महादेवजीने देवताओं तथा अन्य लोगोंको विदा किया और स्वयं प्रमथगणोंके साथ अपने धामको चले गये। ब्राह्मणो! जो इस स्तोत्रका श्रवण या पाठ करता है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें जानेकी शक्ति प्राप्त करता और देवराज इन्द्रकी भाँति देवताओंद्वारा पूजित होता है।
महादेवजी अपने धाममें प्रवेश करके जब सुन्दर आसनपर विराजमान हुए, तब वक्र स्वभाववाले क्रूर कामदेवने उन्हें अपने बाणोंसे बींधनेका विचार किया। वह अनाचारी, दुरात्मा और कुलाधम काम सब लोकोंको पीड़ित करनेवाला है। वह नियम तथा व्रतोंका पालन करनेवाले ऋषियोंके कार्यमें विघ्न डाला करता है। उस दिन चक्रवाकका रूप धारण करके अपनी पत्नी रतिके साथ उसका आगमन हुआ था। देवताओंके स्वामी भगवान् शङ्करने अपनेको बींधनेकी इच्छा रखनेवाले आततायी कामदेवको तीसरे नेत्रसे अवहेलनापूर्वक देखा। फिर तो उनके नेत्रसे प्रकट हुई आग सहस्रों लपटोंके साथ प्रज्वलित हो उठी और रतिके स्वामी मदनको उसके साज-शृङ्गारके साथ सहसा दग्ध करने लगी। उस समय जलता हुआ कामदेव बड़े करुण स्वरमें आर्तनाद करने लगा और भगवान् शिवको प्रसन्न करनेके लिये धरतीपर गिर पड़ा। इतनेमें उसके सब अङ्गोंमें आग फैल गयी और सब लोकोंको ताप देनेवाला काम स्वयं ही पृथ्वीपर गिरकर क्षणभरमें मूर्च्छित हो गया। उसकी पत्नी
३९- पार्वतीका महादेवजीसे हिमालय छोड़कर अन्यत्र चलनेका अनुरोध
८६
- संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
रति अत्यन्त दुःखित हो करुणामय विलाप करने लगी। उस दुःखिनीने महादेवजी तथा पार्वतीदेवीसे अपने पतिके लिये याचना की। उसके दुःखको जानकर दयालु दम्पतिने उसे सान्त्वना देते हुए कहा—'कल्याणी! कामदेव तो अब निश्चय ही दग्ध हो गया, अब यहाँ इसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; परंतु शरीररहित होते हुए भी यह तुम्हारे सब कार्य सिद्ध करता रहेगा। शुभे! जब भगवान् विष्णु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके रूपमें इस पृथ्वीपर अवतार लेंगे, उस समय उन्हींके पुत्ररूपमें तुम्हारे पतिका जन्म होगा। इस प्रकार वरदान पाकर कामपत्नी रति खेदरहित एवं प्रसन्न हो अपने अभीष्ट स्थानको चली गयी। इधर भगवान् शङ्कर कामदेवको दग्ध करनेके पश्चात् भगवती उमाके साथ हिमालयपर प्रसन्नतापूर्वक रमण करने लगे।
पार्वतीजीने कहा—भगवान्! देवदेवेश्वर! अब मैं इस पर्वतपर नहीं रहूँगी। अब मेरे लिये दूसरा कोई निवासस्थान बनाइये।
महादेवजी बोले—देवि! मैं तो सदा तुमसे अन्यत्र रहनेको कहता था, किंतु तुम्हें कभी अन्य किसी स्थानका निवास पसन्द नहीं आया। आज स्वयं ही तुम अन्यत्र रहनेकी इच्छा क्यों करती हो? इसका कारण बताओ।
देवीने कहा—देवेश्वर! आज मैं अपने महात्मा पिताके घर गयी थी। वहाँ माताने मुझे एकान्त स्थानमें देख उत्तम आसन आदिके द्वारा मेरा सत्कार किया और कहा—'उमे! तुम्हारे स्वामी दरिद्र हैं, इसलिये सदा खिलौनोंसे खेला करते हैं। देवताओंकी क्रीड़ा ऐसी नहीं होती।' महादेव! आप जो नाना प्रकारके गणोंके साथ विहार करते हैं, यह मेरी माताको पसन्द नहीं है।
यह सुनकर महादेवजी हँस पड़े और देवीको हँसाते हुए बोले—'प्रिये! बात तो ऐसी ही है, इसके लिये तुम्हें दुःख क्यों हुआ? मैं कभी हाथीके चमड़े लपेटता, कभी दिगम्बर बना रहता, श्मशानभूमिमें निवास करता, बिना घर-द्वारका होकर जंगलोंमें और पर्वतकी कन्दराओंमें रहता तथा अपने गणोंके साथ घूमता-फिरता हूँ। इसके लिये तुम्हें मातापर क्रोध नहीं करना चाहिये। तुम्हारी माताने सब ठीक ही कहा है। इस पृथ्वीपर प्राणियोंका माताके समान हितकारी कोई बन्धु-बान्धव नहीं है।'
देवीने कहा—सुरेश्वर! मुझे अपने बन्धु-बान्धवोंसे कोई प्रयोजन नहीं है। आप वही करें, जिससे मुझे सुख हो।
देवीका यह वचन सुनकर देवेश्वर महादेवजीने उन्हें प्रसन्न करनेके लिये उस पर्वतको छोड़ दिया और पत्नी तथा पार्षदोंको साथ ले देवताओं और सिद्धोंसे सेवित सुमेरुपर्वतके लिये प्रस्थान किया।
२३- दक्ष-यज्ञ-विध्वंस
* दक्ष-यज्ञ-विध्वंस * ८७
दक्ष-यज्ञ-विध्वंस
ऋषियोंने कहा— ब्रह्मन्! वैवस्वत मन्वन्तरमें प्रचेताओेंके पुत्र प्रजापति दक्षका अश्वमेध-यज्ञ कैसे नष्ट हुआ?
ब्रह्माजी बोले— ब्राह्मणो! महादेवजीने सती-देवीका प्रिय करनेकी इच्छासे जिस प्रकार दक्षके यज्ञका विध्वंस किया था, उसका वर्णन करता हूँ। पूर्वकालकी बात है, महादेवजी मेरुगिरिके ज्योतिःस्थल नामक शिखरपर, जो सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित और पलंगकी भाँति फैला हुआ था, विराजमान थे। गिरिराजकुमारी पार्वती सदा उनके पार्श्वभागमें बैठी रहती थीं। आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, गुह्यकोंसहित कुबेर, महामुनि शुक्राचार्य तथा सनत्कुमार आदि महर्षि उनकी सेवामें उपस्थित रहते थे। अत्यन्त भयंकर राक्षस एवं महाबली पिशाच, जो अनेक रूप धारण करनेवाले तथा नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थे, भगवान् शिवके समीप रहा करते थे। भगवान्के पार्षद भी वहाँ मौजूद थे। वे सब अग्निके समान तेजस्वी जान पड़ते थे। महादेवजीकी इच्छासे भगवान् नन्दीश्वर भी वहाँ खड़े रहते थे। नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गाजी मूर्तिमती होकर उनकी सेवामें संलग्न रहती थीं। इस प्रकार परम सौभाग्यशाली देवर्षियों और देवताओंसे पूजित होकर भगवान् शङ्कर वहाँ सदा निवास करने लगे। कुछ कालके बाद प्रजापति दक्षने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार यज्ञ करनेकी तैयारी की। उनके उस यज्ञमें इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता स्वर्गसे आकर एकत्रित होने लगे। वे अग्निके समान तेजस्वी देवता दक्षके अनुरोधसे प्रकाशमान विमानोंपर बैठकर गङ्गाद्वारको गये। पृथ्वी, आकाश तथा स्वर्गलोकमें रहनेवाले सभी देवता प्रजापतिके पास हाथ जोड़कर उपस्थित हुए। आदित्य,वसु, रुद्र, साध्य तथा मरुद्गण—ये सब यज्ञमें भाग लेनेके लिये भगवान् विष्णुके साथ वहाँ पधारे थे। ऊष्मप, धूमप, आज्यप तथा सोमप नामवाले देवता भी अश्विनीकुमारोंके साथ वहाँ उपस्थित थे। ये तथा और भी अनेक भूत-प्राणियोंका समुदाय वहाँ एकत्रित हुआ था। जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज भी उस यज्ञमें सम्मिलित थे। देवतालोग अपनी स्त्रियों तथा महर्षियोंके साथ वहाँ पधारे थे।
देवताओंको वहाँ जाते देख गिरिराजकुमारी पार्वतीने भगवान् शङ्करसे पूछा—‘भगवन्! ये इन्द्र आदि देवता कहाँ जाते हैं?’
महादेवजी बोले— महाभागे! प्रजापति दक्ष अश्वमेध-यज्ञ करते हैं। उसीमें सब देवता जा रहे हैं।
देवीने पूछा— महाभाग! आप इस यज्ञमें क्यों नहीं जाते? ऐसी कौन-सी रुकावट है, जिससे आपका वहाँ जाना नहीं होता?
४१- भगवान् शङ्करका वीरभद्रको दक्ष-यज्ञ-विध्वंसके लिये आदेश
८८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
महादेवजी बोले— महाभागे! देवताओंने ही यह सब किया है। उन्होंने किसी भी यज्ञमें मेरा भाग नहीं रखा है। पहलेसे जो मार्ग चला आता है, उसीसे अपनेको भी चलना चाहिये।
उमाने कहा— भगवन्! आप सब देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपके गुण और प्रभाव सबसे अधिक हैं। आप अपने तेज, यश और श्रीके द्वारा अजेय एवं अधृष्य हैं। महाभाग! यज्ञमें आपके भागका जो यह निषेध है, इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ है। मेरे शरीरमें कम्प छा गया है।
महादेवजी बोले— देवि! क्या तुम मुझे नहीं जानतीं! आज तुम्हें जो मोह हुआ है, उससे इन्द्र आदि देवताओंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकी नष्ट हो सकती है। मैं ही यज्ञका स्वामी हूँ। मेरी ही सब लोग निरन्तर स्तुति करते हैं। मेरे ही संतोषके लिये सब लोग रथन्तर सामका गान करते हैं। ब्राह्मण वेदमन्त्रोंसे मेरा ही यजन करते हैं तथा अध्वर्यु लोग यज्ञमें मेरे ही लिये भागोंकी कल्पना करते हैं।
प्राणोंके समान प्रियतमा पत्नीसे यों कहकर भगवान् शङ्करने अपने मुखसे क्रोधाग्निजनित एक महाभूतकी सृष्टि की। फिर उससे कहा—'तुम मेरी आज्ञासे दक्षके यज्ञमें जाओ और उसका शीघ्र विनाश करो।' तब उसने रुद्रकी आज्ञासे सिंहका वेष धारण करके दक्षके यज्ञका विनाश कर डाला। उसने अपने कर्मका साक्षी बनानेके लिये अत्यन्त भयंकर भद्रकालीको भी साथ ले लिया था। भगवान्का वह क्रोध वीरभद्रके नामसे विख्यात हुआ, जो श्मशानभूमिमें निवास करता है। उसने पार्वतीदेवीके खेदका निवारण किया था। वीरभद्रने अपने रोमकूपोंसे अनेक रुद्रगण उत्पन्न किये, जो रुद्रके समान ही वीर्यवान् और पराक्रमी थे। वे सब सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें झुंड बनाकर उस यज्ञमण्डपमें गये। उनकी किलकिलाहटसे समस्त आकाश गूँज उठा। अग्नि और सूर्यका प्रकाश मन्द पड़ गया। चारों ओर अन्धकार छा गया। उस समय वे समस्त रुद्रगण यज्ञमण्डपमें आग लगाने लगे; किसीने यूपोंको तोड़ डाला, किसीने उन्हें उखाड़ दिया, कोई सिंहनाद करता और कोई वहाँकी सब वस्तुओंको तहस-नहस कर डालता था। कितने ही वायुके समान वेगसे इधर-उधर दौड़ लगाने लगे। यज्ञपात्र चूर-चूर हो गये। वहाँके मण्डप ढह गये। ऐसा जान पड़ता था, आकाशसे तारे टूटकर गिर रहे हैं। कोई यज्ञमें रखे हुए भोज्य पदार्थोंको खाते और सब ओर लोगोंको डराते फिरते थे। कितने ही पर्वताकार भूत देवाङ्गनाओंको उठाकर फेंक देते थे। ऐसे गणोंके साथ प्रतापी वीरभद्रने पहुँचकर देवताओंद्वारा सुरक्षित यज्ञको भद्रकालीके सामने ही भस्म कर डाला। अन्य रुद्रगण सबको भय उपजानेवाली गर्जना करने लगे। कुछ लोगोंने यज्ञका मस्तक काटकर भयंकर नाद किया। तब इन्द्र आदि देवताओं और प्रजापति दक्षने हाथ जोड़कर
२४- दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
* दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति * ८९
पूछा—'बताइये, आप कौन हैं?'
वीरभद्रने कहा—मैं न देवता हूँ, न दैत्य हूँ। न इस यज्ञमें भोजन करने आया हूँ और न कौतूहलवश इसे देखनेको ही मेरा आना हुआ है। मैं इस यज्ञका विध्वंस करनेके लिये आया हूँ। मेरा नाम वीरभद्र है। मैं रुद्रके कोपसे प्रकट हुआ हूँ। ये भद्रकाली हैं। इनका प्रादुर्भाव पार्वतीदेवीके क्रोधसे हुआ है। ये देवाधिदेव महादेवजीके भेजनेसे यज्ञके समीप आयी हैं। राजेन्द्र! तुम देवदेव भगवान् उमापतिकी शरणमें जाओ। उनका क्रोध भी वरदानके ही तुल्य है।
तब प्रजापति दक्ष मन-ही-मन भगवान् शङ्करकी शरणमें गये। उन्होंने प्राण और अपानको हृदयमें रोककर यत्नपूर्वक उनका ध्यान किया। तब भगवान् शिव प्रकट हुए और उन्होंने मुसकराकर पूछा—'कहो, तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?' तब दक्षने हाथ जोड़कर कहा—'भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं अथवा यदि मैं आपका प्रिय एवं कृपापात्र हूँ तो मुझे यह वरदान दें—'जो भी भोजन-सामग्री यहाँ खा-पी ली गयी, नष्ट कर दी गयी, यज्ञका जो सामान चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब बहुत दिनोंसे यत्न करके संचित किया गया था। महेश्वर! आपकी कृपासे यह व्यर्थ न जाय।'
ब्रह्माजीने कहा—भगवान् शङ्करने 'तथास्तु' कहकर दक्षकी कामना पूर्ण की। प्रजापति दक्षने भगवान्से वरदान पाकर पृथ्वीपर घुटने टेक दिये और भगवान् शिवका स्तवन आरम्भ किया।
दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
दक्ष बोले—देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। अन्धकासुरको मारनेवाले रुद्र! आपको प्रणाम है। देवेन्द्र! आप बलमें श्रेष्ठ और देवता तथा दानवोंद्वारा पूजित हैं।* आप सहस्राक्ष^१, विरूपाक्ष^२ और त्र्यक्ष^३ कहलाते हैं। यक्षराज कुबेरके आप इष्टदेव हैं। आपके हाथ और पैर सब ओर हैं। नेत्र, मस्तक और मुख भी सब ओर हैं। आपके सब ओर कान हैं। आप संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। शङ्कुकर्ण^४, महाकर्ण^५, कुम्भकर्ण^६, अर्णवालय^७, गजेन्द्रकर्ण^८, गोकर्ण^९, शतकर्ण^{१०}, शतोदर^{११}, शतावर्त^{१२}, शतजिह्व^{१३},
* दक्ष उवाच—नमस्ते देवदेवेश नमस्तेऽन्धकसूदन। देवेन्द्र त्वं बलश्रेष्ठ देवदानवपूजित॥
१. सहस्रों नेत्रोंवाले, २. विकराल नेत्रोंवाले, ३. तीन नेत्रोंवाले, ४. कीलके समान नुकीले कानोंवाले, ५. बड़े-बड़े कानोंवाले, ६. घड़ेके समान कानोंवाले, ७. समुद्र जिनका निवासस्थान है वे, ८. हाथीके समान कानोंवाले, ९. गायके समान कानोंवाले, १०. सैकड़ों कानोंवाले, ११. सैकड़ों उदरवाले, १२. सैकड़ों भँवरवाले, १३. सैकड़ों जिह्वावाले।
९० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
और सनातन हैं। आपको नमस्कार है। गायत्रीके उपासक आपका ही गान करते हैं। सूर्यके भक्त आपकी ही सूर्यरूपसे अर्चना करते हैं। आप देवता और दानवोंके रक्षक, ब्रह्मा तथा इन्द्र हैं। आप मूर्तिमान्, महामूर्ति और जलके भंडाररूप समुद्र हैं। जैसे गोशालामें गौएँ रहती हैं, उसी प्रकार आपमें सम्पूर्ण देवता निवास करते हैं। आपके शरीरमें मैं चन्द्रमा, अग्नि, वरुण, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा तथा बृहस्पतिको देखता हूँ। क्रिया, करण, कार्य, कर्ता, कारण, असत्, सदसत्, उत्पत्ति तथा प्रलय भी आप ही हैं। भव (सृष्टिकर्ता), शर्व, रुद्र (रुलानेवाले), वरद, पशुपति, अन्धकासुरघाती, त्रिजट, त्रिशीर्ष, त्रिशूलधारी, त्र्यम्बक, त्रिनेत्र और त्रिपुरनाशक आप भगवान् शिवको नमस्कार है।
आप चण्ड (अत्यन्त क्रोधी), मुण्ड (सिर मुँड़ाये हुए), प्रचण्ड विश्वको धारण करनेवाले, दण्डी, शङ्कुकर्ण तथा दण्डिदण्ड (दण्डधारियोंको भी दण्ड देनेवाले) हैं। आपको नमस्कार है। आप अर्धचण्डिकेश (अर्द्धनारीश्वर), शुष्क, विकृत, विलोहित, धूम्र और नीलग्रीव हैं। आपको नमस्कार है। आप अप्रतिरूप हैं—आपके समान दूसरा कोई नहीं है। आपको नमस्कार है। आप विरूप (विकराल रूपवाले) होते हुए भी शिव (कल्याणमय) हैं। आप ही सूर्य और उनके स्वामी हैं। आपकी ध्वजा और पताकामें सूर्यके चिह्न हैं। आपको नमस्कार है। प्रमथगणोंके स्वामी आपको नमस्कार है। आपके कंधे वृषभके कंधेके समान मांसल हैं। आपको नमस्कार है। आप हिरण्यगर्भ एवं हिरण्यकवच हैं। आपको नमस्कार है। आप हिरण्य (सुवर्ण)-की चूड़ा धारण करनेवाले और हिरण्यपति हैं। आपको नमस्कार है। आप शत्रुओंके घातक, अत्यन्त क्रोधी तथा पत्तोंके समूहपर शयन करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपकी स्तुति की गयी है, इस समय भी आपकी स्तुति की जाती है तथा आप ही स्तुतिस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप सर्वस्वरूप, सर्वभक्षी एवं सब भूतोंके अन्तरात्मा हैं। आपको नमस्कार है।*
आप ही होम और मन्त्र हैं। आपकी ध्वजा-पताका श्वेत रंगकी है, आपको नमस्कार है। आप
* सहस्राक्ष विरूपाक्ष त्र्यक्ष यक्षाधिपप्रिय। सर्वतःपाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ॥
सर्वतः श्रुतिमॉल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि। शङ्कुकर्णो महाकर्णः कुम्भकर्णोऽर्णवालयः ॥
गजेन्द्रकर्णो गोकर्णः शतकर्णो नमोऽस्तु ते। शतोदरः शतावर्तः शतजिह्वः सनातनः ॥
गायन्ति त्वां गायत्रिणो अर्चयन्त्यर्कमर्किणः। देवदानवगोप्ता च ब्रह्मा च त्वं शतक्रतुः ॥
मूर्तिमांस्त्वं महामूर्तिः समुद्रः सरसां निधिः। त्वयि सर्वा देवता हि गावो गोष्ठ इवासते ॥
त्वतः शरीरे पश्यामि सोममग्निजलेश्वरम्। आदित्यमथ विष्णुं च ब्रह्माणं सबृहस्पतिम् ॥
क्रिया करणकार्यं च कर्ता कारणमेव च। असच्च सदसच्चैव तथैव प्रभवाप्ययौ ॥
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च। पशूनां पतये चैव नमोऽस्त्वन्धकघातिने ॥
त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलवरधारिणे। त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्नाय वै नमः ॥
नमश्चण्डाय मुण्डाय विश्वचण्डधराय च। दण्डिने शङ्कुकर्णाय दण्डिदण्डाय वै नमः ॥
नमोऽर्धचण्डिकेशाय शुष्काय विकृताय च। विलोहिताय धूम्राय नीलग्रीवाय वै नमः ॥
नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च। सूर्याय सूर्यपतये सूर्यध्वजपताकिने ॥
नमः प्रमथनाशाय वृषस्कन्धाय वै नमः। नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यकवचाय च ॥
हिरण्यकृतचूडाय हिरण्यपतये नमः। शत्रुघाताय चण्डाय पर्णसङ्घशयाय च ॥
नमः स्तुताय स्तुतये स्तूयमानाय वै नमः। सर्व्याय सर्वभक्षाय सर्वभूतान्तरात्मने ॥
* दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति * ९१
ही अनम्य और आप ही नमन करनेके योग्य हैं। आप हर्षमग्न होकर किलकारियाँ भरनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। सोते हुए, सोये हुए, सोकर उठे हुए, खड़े हुए और दौड़ते हुए आपको नमस्कार है। कुबड़े और कुटिलरूपमें आपको नमस्कार है। आप सदा ताण्डव नृत्य करनेवाले और मुखसे बाजा बजानेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप बाधा निवारण करनेवाले, लुब्ध एवं गाना-बजाना करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। ज्येष्ठ और श्रेष्ठरूपमें आपको नमस्कार है। बलका मन्थन करनेवाले आपको नमस्कार है। उग्र रूपवाले आपको सदा नमस्कार है। दस भुजाओंवाले आपको नित्य प्रणाम है। हाथमें कपाल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। श्वेत भस्म आपको अधिक प्रिय है। आप भयभीत करनेवाले, भयंकर एवं कठोर व्रत धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है।
आपका मुख नाना प्रकारसे विकृत है, जिह्वा तलवारके समान है और दाँत बड़े भयंकर हैं। पक्ष, मास और लवार्ध आदि कालके भेद आपके ही स्वरूप हैं। आपको तूँबी और वीणा बहुत ही प्रिय है। आपको नमस्कार है। आपका रूप घोर और अघोर दोनों ही है। आप घोर और अघोरतर हैं; ऐसे होते हुए भी आप शिव, शान्त तथा अत्यन्त शान्त हैं। आपको नमस्कार है। शुद्ध बुद्धिरूप आपको नमस्कार है। सबको बाँटना आप अधिक पसन्द करते हैं। आप पवन, सूर्य एवं सांख्यपरायण हैं। आप एक प्रचण्ड घण्टा धारण करनेवाले और घण्टा-ध्वनिके समान बोलनेवाले हैं। आपके पास बराबर घण्टा रहा करता है। आप लाखों घण्टेवाले हैं। घण्टोंकी माला आपको अधिक प्रिय है। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप प्राणोंको दण्ड देनेवाले, नित्य एवं लोहितरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप हूं-हूं करनेवाले, रुद्र एवं भगाकारप्रिय हैं। आपको नमस्कार है। आपका कहीं पार नहीं है। आप सदा पर्वतीय वृक्षोंको अधिक पसन्द करते हैं। आपको नमस्कार है। यज्ञोंके अधिपतिरूपमें आपको नमस्कार है। आप भूत एवं प्रस्तुत (वर्तमान)-रूप हैं। आपको नमस्कार है। आप यज्ञवाहक, जितेन्द्रिय, सत्यस्वरूप, भग, तट, तटपर होने योग्य तथा तटिनीपति (समुद्र) हैं। आपको नमस्कार है। आप अन्नदाता, अन्नपति और अन्नके भोगी हैं। आपको नमस्कार है। आपके सहस्रों मस्तक और सहस्रों चरण हैं। आप सहस्रों शूल उठाये रहनेवाले और सहस्रों नेत्रोंवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपका वर्ण उदयकालीन सूर्यके समान लाल है। आप बालकरूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप बालसूर्यस्वरूप हैं और काल आपका खिलौना है। आपको नमस्कार है। आप शुद्ध, बुद्ध, क्षोभण तथा क्षयरूप हैं। आपको नमस्कार है।*
* नमो होमाय मन्त्राय शुक्लध्वजपताकिने। नमोऽनम्याय नम्याय नमः किलकिलाय च॥
नमस्त्वां शयमानाय शयितायोत्थिताय च। स्थिताय धावमानाय कुब्जाय कुटिलाय च॥
नमो नर्तनशीलाय मुखवादित्रकारिणे। बाधापहाय लुब्धाय गीतवादित्रकारिणे॥
नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलप्रमथनाय च। उग्राय च नमो नित्यं नमश्च दशबाहवे॥
नमः कपालहस्ताय सितभस्मप्रियाय च। विभीषणाय भीमाय भीष्मव्रतधराय च॥
नानाविकृतवक्त्राय खड्गजिह्वोग्रदंष्ट्रिणे। पक्षमासलवार्धाय तुम्बीवीणाप्रियाय च॥
अघोरघोररूपाय घोराघोरतराय च। नमः शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च॥
नमो बुद्धाय शुद्धाय संविभागप्रियाय च। पवनाय पतङ्गाय नमः सांख्यपराय च॥
नमश्चण्डैकघण्टाय घण्टाजल्पाय घण्टिने। सहस्रशतघण्टाय घण्टामालाप्रियाय च॥
९२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
आपके केश गङ्गाजीकी तरङ्गोंसे अङ्कित रहते हैं। आप अपने मस्तकके बाल खुले रखते हैं। आप [संध्यादि] छः कर्मोंमें निष्ठा रखनेवाले हैं तथा [सृष्टि आदि] तीन कर्मोंका निरन्तर पालन करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप वर्णों और आश्रमोंके पृथक्-पृथक् धर्मकी विधिपूर्वक प्रवृत्ति करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप श्रेष्ठ, ज्येष्ठ तथा पक्षियोंके समान कलकल शब्द करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपके नेत्र श्वेत, पीले, काले और लाल रंगवाले हैं। आप धर्म, काम, अर्थ, मोक्ष, क्रथ (संहार), क्रथन (संहारकर्ता), सांख्य, सांख्यप्रधान और योगके अधिपति हैं। आपको नमस्कार है। आप रथ-संचारयोग्य सड़कसे रथपर बैठकर चलते हैं। चौराहा आपका मार्ग है। आपको नमस्कार है। आप काला मृगचर्म ओढ़ते और सर्पका यज्ञोपवीत पहनते हैं। ईशान! आप रुद्रसमुदायस्वरूप हैं। हरिकेश (पीले केशवाले)! आपको नमस्कार है। व्यक्ताव्यक्तस्वरूप अम्बिकानाथ! आप त्रिनेत्रधारीको नमस्कार है। काल और कामदेवके मदको इच्छानुसार चूर्ण करनेवाले तथा दुष्टों और उद्दण्डोंका नाश करनेवाले महेश्वर! आपको नमस्कार है। सबके द्वारा निन्दित और सबके संहारक सद्योजात! आपको नमस्कार है। दूसरोंको उन्मत्त बनानेवाले सैकड़ों आवर्तोंसे युक्त शिव! आपके मस्तकके बाल गङ्गाजीके जलसे भीगे रहते हैं। आपको नमस्कार है। चन्द्रार्धसंयुगावर्त और मेघावर्त नामसे पुकारे जानेवाले! आपको नमस्कार है। आप अन्न-दान करनेवाले, अन्नदाताओंके प्रभु, अन्नभोक्ता और रक्षक हैं। आपको नमस्कार है। आप ही प्रलयकालीन अग्नि हैं। देवदेवेश्वर! आप ही जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके जीव हैं। चराचर जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाले भी आप ही हैं।
विश्वेश्वर! आप ही ब्रह्मा हैं। जलमें स्थित जो ब्रह्म है, उसे आपका ही स्वरूप बतलाते हैं। आप ही सबकी परम योनि हैं। चन्द्रमा और ज्योतिके भंडार भी आप ही हैं। ब्रह्मवादी महर्षि आपको ही ऋक्, साम तथा ॐकार कहते हैं। सामगान करनेवाले ब्रह्मवेत्ता तथा श्रेष्ठ देवता ‘हायि हायि हरे हायि हुवा हाव’ आदि साम-ऋचाओंका निरन्तर उच्चारण करते हुए आपका ही यशोगान करते हैं। आप ही यजुर्वेद, ऋग्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेदमय हैं। ब्रह्मवेत्ता कल्प और उपनिषदादिके समूहोंसे आपके ही स्वरूपका अध्ययन करते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जो-जो वर्ण और आश्रम हैं, वह सब आप ही हैं। बिजलीकी चमक, मेघकी गर्जना, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, कला, काष्ठा, निमेष, नक्षत्र और युग—सब आपके ही स्वरूप हैं। बैलोंके ककुद (थूहे) और पर्वतोंके शिखर भी आप ही हैं।* आप मृगोंमें मृगराज सिंह, सर्पोंमें तक्षक और शेषनाग,
प्राणदण्डाय नित्याय नमस्ते लोहिताय च। हूंहूंकाराय रुद्राय भगाकारप्रियाय च॥
नमोऽपार्वते नित्यं गिरिवृक्षप्रियाय च। नमो यज्ञाधिपतये भूताय प्रस्तुताय च॥
यज्ञवाहाय दान्ताय तथ्याय च भगाय च। नमस्तटाय तद्याय तटिनीपतये नमः॥
अन्नदायान्नपतये नमस्त्वन्नभुजाय च। नमः सहस्रशीर्षाय सहस्रचरणाय च॥
सहस्रोद्यतशूलाय सहस्रनयनाय च। नमो बालार्कवर्णाय बालरूपधराय च॥
नमो बालार्करूपाय कालक्रीडनकाय च। नमः शुद्धाय बुद्धाय क्षोभणाय क्षयाय च॥
* तरङ्गाङ्कितकेशाय मुक्तकेशाय वै नमः। नमः षट्कर्मनिष्ठाय त्रिकर्मनियताय च॥
वर्णाश्रमाणां विधिवत्पृथग्धर्मप्रवर्तिने। नमः श्रेष्ठाय ज्येष्ठाय नमः कलकलाय च॥