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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ·· ६३१

सबको आया देख राजाने प्रणाम किया और आदरपूर्वक कहा।

**नहुष बोला—**आप लोग ब्रह्माजीके पुत्र हैं, ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होते हैं और सदा ब्रह्माजीके समान ही भक्तवत्सल हैं। निरन्तर भगवान् नारायणकी उपासनामें लगे रहते हैं। शुद्ध सत्त्व ही आपका स्वरूप है। आप मोह और मात्सर्यसे रहित हैं। दर्प और अहंकार आपको छू नहीं सके हैं। आप सब लोग सदा भगवान् नारायणके समान तेजस्वी और यशस्वी हैं। गुण, कृपा, प्रेम और वरदान सभी दृष्टियोंसे निश्चय ही आप श्रीहरिके तुल्य हैं।

ऐसा कहकर राजा उनके चरणोंमें प्रणाम और स्तुति करने लगा। राजाको कातर हुआ देख वे परम हितैषी ऋषि उससे बोले।

**ऋषियोंने कहा—**बेटा! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो; हम सब कुछ देनेमें समर्थ हैं। हमारे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। इन्द्रपद, मनुका पद, दीर्घायु, सातों द्वीपोंका प्रभुत्व, चिरकालतक बना रहनेवाला अतिशय सुख, सम्पूर्ण सिद्धियाँ, परम दुर्लभ समस्त ऐश्वर्य तथा जो तपस्यासे भी नहीं मिल सकती, वह हरिभक्ति अथवा मुक्ति भी हम तुम्हें दे सकते हैं। वत्स! बोलो, इस समय तुम्हें किस वस्तुकी इच्छा है? वह सब तुम्हें देकर ही हम तपस्याके लिये जायँगे। जो क्षण श्रीकृष्णकी आराधनाके बिना व्यतीत होता है, वह लाख युगोंके समान है अर्थात् श्रीकृष्ण-भजनके बिना यदि एक क्षण भी व्यर्थ बीता तो समझना चाहिये कि हमारे एक लाख युग व्यर्थ बीत गये। जो दिन श्रीहरिके ध्यान और सेवनसे शून्य रह गया, वही सबसे बड़ा दुर्दिन है। जो मनुष्य श्रीहरिकी सेवा छोड़कर किसी दूसरे विषयको पानेकी इच्छा रखता है, वह मनोवाञ्छित अमृतको त्यागकर अपने ही विनाशके लिये मानो विष खाता है*। ब्रह्मा, शिव, धर्म, विष्णु, महाविष्णु (महानारायण), गणेश, सूर्य, शेष और सनकादि मुनि—ये दिन-रात प्रसन्नतापूर्वक जिनके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं, उन जन्म, मृत्यु और जरारूप व्याधिको हर लेनेवाले श्रीकृष्णमें हमलोग सदा अनुरक्त रहते हैं।

सप्तर्षियोंकी यह बात सुनकर राजेश्वर नहुष लज्जित हो गया। उसका सिर झुक गया, तथापि मायासे मोहितचित्त होनेके कारण वह बोला।

**नहुषने कहा—**महर्षियो! आपलोग भक्तवत्सल हैं और सब कुछ देनेकी शक्ति रखते हैं। इस समय मैं शचीको पाना चाहता हूँ; अतः शीघ्र ही मुझे शचीका दान दीजिये। महासती शची ऐसे पतिको पाना चाहती है, जिसके वाहन सप्तर्षि हों। यही मेरा वर है। आपलोग शीघ्र ही मेरे अभीष्ट कार्यको सम्पन्न करें।

नारद! नहुषकी बात सुनकर सब मुनि कौतूहलवश एक-दूसरेको देखते हुए जोर-जोरसे हँसने लगे। राजाको भगवान् विष्णुकी मायासे वेष्टित एवं मोहित मानकर उन दीनवत्सल सप्तर्षियोंने कृपापूर्वक राजाका वाहन बननेकी प्रतिज्ञा कर ली। उसकी शिविका मुक्ता और माणिक्यसे सुशोभित थी। ऋषियोंने उसे कंधेपर उठा लिया और राजा नहुष सुन्दर वेष एवं रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो उस शिविकासे चला। उस वाहनद्वारा अभीष्ट स्थानपर पहुँचनेमें अधिक विलम्ब होता देख राजा सप्तर्षियोंको डाँटने-


* युगलक्षसमं यच्च क्षणं कृष्णार्त्तनं विना। तद्दिनं दुर्दिनं यत्तद्ध्यानसेवनवर्जितम्॥
विना तत्सेवनं यो हि विषयान्यं च वाञ्छति। विषमत्ति प्रणाशाय विहायामृतमीप्सितम्॥
(६०। ३२-३३)

९७- कंसका अक्रूरसे नन्द-व्रजमें जानेके लिये कहना

६४० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


फटकारने लगा। शिविकाके उस मार्गपर सबसे आगे चलते थे दुर्वासा। उन्हें राजाकी फटकारपर क्रोध आ गया और वे शाप देते हुए बोले—

'मूढ़चित्त महाराज! तुम महान् अजगर होकर नीचे गिर पड़ो। धर्मपुत्र युधिष्ठिरके दर्शन होनेसे तुम अजगरकी योनिसे छूट जाओगे। तत्पश्चात् रत्नमय विमानसे वैकुण्ठमें जाकर भगवान् विष्णुका सेवन करोगे। किया हुआ कर्म कभी निष्फल नहीं होता। तुमने श्रीहरिकी आराधना की है; अतः शापसे छूटनेपर तुम्हें उसका फल अवश्य मिलेगा।'

महामुने! यों कहकर वे सब श्रेष्ठ मुनि हँसते हुए चले गये और राजा उनके शापसे सर्प होकर गिर पड़ा। वह समाचार सुनकर शची गुरुदेवको नमस्कार करके अमरावतीमें चली गयी और बृहस्पतिजी शीघ्र उस स्थानपर गये, जहाँ इन्द्र कमल-नालमें निवास करते थे। सरोवरके निकट जाकर कृपानिधान गुरुने अत्यन्त प्रसन्नवदन हो कृपापूर्वक देवराजको पुकारा।

बृहस्पति बोले— वत्स! आओ। मेरे रहते तुम्हें क्या भय हो सकता है? भय छोड़ो और यहाँ आओ। मैं तुम्हारा गुरु बृहस्पति हूँ।

अपने गुरुका स्वर सुनकर महेन्द्रका मन प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सूक्ष्मरूपको छोड़कर अपने ही रूपसे उनके निकट आये। उन्होंने भक्तिभावसे गुरुके चरणोंमें दण्डकी भाँति पड़कर सिरसे उन्हें प्रणाम किया और रोने लगे। उस समय महाभयभीत एवं रोते हुए इन्द्रको गुरुने सानन्द हृदयसे लगा लिया। फिर उनसे प्रायश्चित्तके लिये सोमयाग करवाकर उन्हें रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया और पहलेसे चौगुना उत्तम ऐश्वर्य प्रदान किया। तदनन्तर सब देवता आकर उनकी सेवा करने लगे। शचीने पुनः अपने पति देवराज इन्द्रको प्राप्त कर लिया और निवासमन्दिरमें फूलोंकी सेजपर वह उनके साथ आनन्दपूर्वक सुखका अनुभव करने लगी। वत्स! इस प्रकार मैंने इन्द्रके दर्पके भञ्जन तथा शचीके सतीत्वकी रक्षाका प्रसङ्ग कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

तदनन्तर नारदके पूछनेपर श्रीनारायणने इन्द्रदर्प-भङ्गके ही प्रसङ्गमें गौतमके द्वारा इन्द्रको शाप प्राप्त होनेकी बात बतायी। साथ ही यह भी कहा कि अहल्या पतिके शापसे पाषाण-शिला हो गयी। गौतमने शाप देकर अहल्यासे कहा— 'जाओ, जाओ। तुम विशाल वनमें पाषाणरूपिणी हो जाओ। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी अंगुलिका स्पर्श पाकर तत्काल पवित्र हो जाओगी। उसी पुण्यसे फिर मुझे पाओगी और मेरे पास चली आओगी। प्रिये! इस समय तो विशाल वनमें ही जाओ।' ऐसा कहकर वे मुनि तपस्याके लिये चले गये।

(अध्याय ६०-६१)

४९- भगवद्दर्शनकी सम्भावनासे अक्रूरके हर्षाल्लास एवं प्रेमावेशका वर्णन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६४१ अहल्याके उद्धार एवं श्रीराम-चरित्रका संक्षेपसे वर्णन नारदजीने पूछा—ब्रह्मन्! दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने किस युगमें और किस प्रकार गौतमपत्नी अहल्याको शापसे मुक्त किया ? महाभाग ! आप रामावतारकी मनोहर एवं सुखदायिनी कथा संक्षेपसे कहिये; मेरे मनमें उसे सुननेके लिये उत्कण्ठा हो रही है। श्रीनारायणने कहा—नारद! त्रेतायुगमें ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे साक्षात् भगवान् विष्णुने दशरथसे उनकी पत्नी कौसल्याके गर्भसे सानन्द जन्म ग्रहण किया। कैकेयीसे भरत हुए, जो रामके समान ही गुणवान् थे और सुमित्राके गर्भसे लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नका जन्म हुआ। वे दोनों ही गुणोंके सागर थे। पिताद्वारा विश्वामित्रके साथ भेजे गये लक्ष्मणसहित श्रीराम सीताको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे रमणीया मिथिलापुरीमें गये। उसी मार्गमें पाषाणमयी स्त्रीको देखकर जगदीश्वर श्रीरामने विश्वामित्रसे उसके शिला होनेका कारण पूछा। श्रीरामका प्रश्न सुनकर महातपस्वी धर्मात्मा मुनि विश्वामित्रने वहाँ सारा रहस्य उन्हें बताया। उनके मुँहसे अहल्याके शिला होनेका कारण सुनकर अखिल भुवन-पावन श्रीरामने अपने चरणकी एक अंगुलिसे उस शिलाका स्पर्श किया। उनका स्पर्श पाते ही अहल्या पद्मगन्धा सुन्दरी नारीके रूपमें परिणत हो गयी और श्रीरामको आशीर्वाद देकर वह पतिके घरमें चली गयी। पत्नीको पाकर गौतमने भी श्रीरामचन्द्रजीको शुभाशीर्वाद प्रदान किया। तदनन्तर श्रीरामने मिथिलामें जाकर शिवका धनुष तोड़ा और सीताका पाणिग्रहण किया। सीतासे विवाह करके राजेन्द्र श्रीरामने परशुरामजीका दर्प चूर्ण किया और क्रीड़ा-कौतुक एवं मङ्गलाचारपूर्वक रमणीय अयोध्यापुरीको प्रस्थान किया। राजा दशरथने आदरपूर्वक सात तीर्थोंका जल मँगवाया और तत्काल ही मुनीश्वरोंको बुलाकर अपने पुत्र श्रीरामको राजा बनानेकी इच्छा की। श्रीराम सम्पूर्ण मङ्गलाचारसे सम्पन्न हो जब अधिवास- कर्म पूर्ण कर चुके, तब भरतकी माता कैकेयी ईर्ष्याजनित शोकसे विह्वल हो गयी। उसने राजा दशरथसे दो वर माँगे, जिन्हें देनेके लिये वे पहले प्रतिज्ञा कर चुके थे। उसने एक वरसे रामका वनवास माँगा और दूसरेके द्वारा भरतका राज्याभिषेक। महाराज दशरथ प्रेमसे मोहित होनेके कारण वर देना नहीं चाहते थे। यह देख श्रेष्ठ बुद्धिवाले श्रीराम धर्म और सत्यके भङ्ग होनेके भयसे महाराजसे बोले। श्रीरामने कहा—तात! सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और झूठसे बड़ा कोई पातक नहीं है। गङ्गाके समान दूसरा तीर्थ नहीं है; श्रीकेशवसे बढ़कर कोई देवता नहीं है; धर्मसे श्रेष्ठ बन्धु नहीं है और धर्मसे बढ़कर धन नहीं है। धर्मसे अधिक प्रिय और उत्तम कौन है? अतः आप यत्नपूर्वक अपने धर्मकी रक्षा कीजिये। स्वधर्मकी रक्षा करनेपर सदा और सर्वत्र मङ्गल होता है।

५०- श्रीराधाका श्रीकृष्णको अपने दुःस्वप्न सुनाना और उनके बिना अपनी दयनीय स्थितिका चित्रण करना, श्रीकृष्णका उन्हें सान्त्वना देना और आध्यात्मिक योगका श्रवण कराना

६४२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण यश, प्रतिष्ठा, प्रताप और परम आदरकी प्राप्ति होती है *। मैं चौदह वर्षोंतक गृह-सुखका परित्याग करके धर्मपूर्वक विचरता हुआ आपके सत्यकी रक्षाके लिये वनमें वास करूँगा। जो इच्छा या अनिच्छासे सत्य प्रतिज्ञा करके उसका पालन नहीं करता, वह अशौचका भागी होता है और वह अशौच उसके शरीरके भस्म होनेतक बना रहता है। जबतक चन्द्रमा और सूर्य रहते हैं, तबतक वह कुम्भीपाक नरकमें यातना भोगता है। तदनन्तर मानव-योनिमें उत्पन्न हो वह सात जन्मोंतक गूँगा और कोढ़ी होता है। ऐसा कहकर श्रीराम वल्कल और जटा धारण करके सीता और लक्ष्मणके साथ विशाल वनमें चले गये। मुने ! इधर महाराज दशरथने पुत्रशोकसे अपने शरीरको त्याग दिया। श्रीरामचन्द्रजी पिताके सत्यकी रक्षाके लिये वन-वनमें भ्रमण करने लगे। कालान्तरमें उस विशाल एवं घोर वनमें घूमती हुई रावणकी बहिन शूर्पणखा उधर आ निकली। उसने बड़े कौतूहलसे श्रीरामको देखा। उन्हें देखते ही वह कुलटा राक्षसी काम- वेदनासे पीड़ित हो गयी। उसके सारे अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया और वह मूर्च्छित हो गयी। फिर वह श्रीरामके पास गयी। शूर्पणखा सदा बने रहनेवाले यौवनसे युक्त, अत्यन्त प्रौढ़ और कामोन्मत्त थी। वह मनमें कामभाव ले श्रीरामसे मुस्कराती हुई बोली। शूर्पणखाने कहा- हे राम ! हे घनश्याम ! हे रूपधाम ! हे गुणसागर ! मेरा हृदय आपमें अनुरक्त हो गया है। आप एकान्त स्थानमें मुझे स्वीकार कीजिये। तदनन्तर श्रीराम तथा लक्ष्मणसे शूर्पणखाकी बातचीत हुई। अन्तमें लक्ष्मणने तीक्ष्ण धारवाले अर्धचन्द्राकार बाणसे उसकी नाक काट ली। उसका भाई खर-दूषण बड़ा बलवान् था। उसने आकर युद्ध किया और लक्ष्मणके अस्त्रसे सेनासहित मारा जाकर यमलोकको चला गया। चौदह हजार राक्षसों तथा खर-दूषणको मारा गया देख शूर्पणखाने रावणको फटकारा और सारा समाचार बताकर वह तत्काल पुष्करतीर्थमें चली गयी। वहाँ दुष्कर तपस्या करके उसने ब्रह्माजीसे वर प्राप्त किया। उस निराहार-तपस्विनी राक्षसीको दर्शन देकर सर्वज्ञ कृपासिन्धु ब्रह्माजीने उसके मनकी बात जान ली और इस प्रकार कहा। ब्रह्माजी बोले - वरानने ! श्रीराम दुर्लभ हैं। उन्हें तुम प्राप्त नहीं कर सकी हो। इसीलिये यह दुष्कर तपस्या कर रही हो। इसी तरह जितेन्द्रियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा लक्ष्मणको भी प्राप्त करनेमें तुम्हें सफलता नहीं मिली है; अतः उधरसे निराश होकर तुम तपस्यामें लगी हो। तुम्हारी इस तपस्याका फल तुम्हें दूसरे जन्ममें मिलेगा। जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके भी ईश्वर तथा प्रकृतिसे भी परे हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको तुम पतिरूपमें प्राप्त करोगी। ऐसा कहकर ब्रह्माजी सानन्द अपने धामको चले गये और शूर्पणखाने अपने शरीरको अग्निमें विसर्जित कर दिया। वही दूसरे जन्ममें कुब्जा हुई। शूर्पणखाके उकसानेसे मायावी राक्षसराज रावण क्रोधसे काँपने लगा। उसने मायाद्वारा सीताको हर लिया। सीताको आश्रममें न देख श्रीराम मूर्च्छित हो गये। तब उनके भाई लक्ष्मणने आध्यात्मिक ज्ञानकी चर्चा करके उन्हें सचेत किया। मुने ! तत्पश्चात् वे

  • न हि सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम्। न हि गङ्गासमं तीर्थं न देवः केशवात् परः ॥ नास्ति धर्मात् परो बन्धुर्नास्ति धर्मात् परं धनम्। धर्मात् प्रियः परः को वा स्वधर्मं रक्ष यत्नतः ॥ स्वधर्मे रक्षते तात शश्वत् सर्वत्र मङ्गलम्। यशस्यं सुप्रतिष्ठा च प्रतापः पूजनं परम् ॥ (६२। २१-२३)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

६४३

जानकीकी खोजके लिये दिन-रात शोकार्त हो गहन वन, पर्वत, कन्दरा, नद, नदी और मुनियोंके आश्रमोंमें घूमने लगे। सुदीर्घ कालतक अन्वेषण करनेपर भी जब उन्हें जानकीका पता न चला, तब भगवान् श्रीरामने स्वयं ही जाकर वानरराज सुग्रीवके साथ मित्रता की और वालीको बाणोंसे मारकर उनका राज्य सुग्रीवको दे दिया। यह सब उन्होंने अपने मित्रके प्रति की गयी प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये किया था। वानरराजने सीताका पता लगानेके लिये समस्त दिशाओंमें दूत भेजे और लक्ष्मणसहित श्रीराम सुग्रीवके यहाँ रहने लगे। श्रीरामने हनुमान्‌जीको प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर उन्हें अपनी परम दुर्लभ पदधूलि प्रदान की और सीताके लिये पहचानके रूपमें श्रेष्ठ एवं सुन्दर रत्नमयी मुद्रिका उनके हाथमें देकर अपना शुभ संदेश भी प्रदान किया, जो सीताकी जीवन-रक्षाका कारण बना। यह सब करनेके पश्चात् उन्होंने हनुमान्‌जीको उत्तम दक्षिण दिशामें भेजा। हनुमान्‌जी रुद्रकी कलासे प्रकट हुए थे। वे श्रीरामका संदेश ले सीताकी खोजके लिये लंकाको गये। वहाँ उन्होंने अशोकवाटिकामें सीताजीको देखा, जो शोकसे अत्यन्त कृश दिखायी देती थीं। अमावास्याको अत्यन्त क्षीण हुई चन्द्रकलाके समान वे उपवासके कारण बहुत ही दुबली-पतली हो गयी थीं और निरन्तर भक्तिपूर्वक 'राम-राम' का जप कर रही थीं। उनके सिरके बाल जटाओंका बोझ बन गये थे। अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति दमक रही थी। वे दिन-रात श्रीरामके चरणकमलोंका ध्यान किया करती थीं। शुद्ध भूमिपर सोती थीं। शुद्ध आचार-विचार तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पतिव्रता थीं। उनमें महालक्ष्मीके चिह्न विद्यमान थे। वे अपने तेजसे प्रकाशमान थीं। सम्पूर्ण तीर्थोंको पुण्य प्रदान करनेवाली थीं। उनमें दृष्टिमात्रसे समस्त भुवनोंको पवित्र करनेकी क्षमता थी। उस समय रोती हुई माता जानकीको देखकर पवननन्दन हनुमान्‌ने प्रसन्नतापूर्वक उनके हाथमें वह रत्नमयी मुद्रिका दे दी। धर्मात्मा वायुपुत्र सीताकी दशा देखकर उनके चरणकमलोंको पकड़कर रोने लगे। उन्होंने श्रीरामका वह संदेश सुनाया, जो सीताजीके जीवनकी रक्षा करनेवाला था।

हनुमान्‌जी बोले—मातः ! समुद्रके उस पार श्रीराम और लक्ष्मण इस राक्षसपुरीपर चढ़ाई करनेके लिये तैयार खड़े हैं। बलवान् वानरराज सुग्रीव श्रीरामके मित्र हो गये हैं। श्रीरामने वालीका वध करके अपने मित्र सुग्रीवको निष्कण्टक राज्य दिया है। साथ ही उन्हें उनकी पत्नी भी प्राप्त करा दी है, जिसे पहले वालीने हर लिया था। सुग्रीवने भी धर्मतः तुम्हारे उद्धारकी प्रतिज्ञा की है। उनके समस्त वानर तुम्हें खोजनेके लिये सब ओर गये हैं। मुझसे तुम्हारा मङ्गलमय समाचार पा कमलनयन श्रीराम गहरे सागरपर सेतु बाँधकर शीघ्र यहाँ आ पहुँचेंगे और पापी रावणको उसके पुत्र तथा बान्धवोंसहित मारकर अविलम्ब तुम्हारा उद्धार करेंगे। आज तुम्हारे प्रसादसे इस रत्नमयी लंकाको मैं बेखटके जलाकर भस्म कर दूँगा। तुम मुस्कराती हुई मेरे इस पराक्रमको देखो। सुव्रते ! मैं लंकाको वानरीके बच्चेकी भाँति समझता हूँ। समुद्रको मूत्रके समान और भूतलको पर्ईकी भाँति देखता हूँ। सेनासहित रावण मेरी दृष्टिमें चींटियोंके समूह-जैसा है। मैं आधे मुहूर्तमें अनायास ही उसका संहार कर सकता हूँ; परंतु इस समय श्रीरामकी प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये उसे नहीं मारूँगा। महाभागे ! तुम स्वस्थ एवं निश्चिन्त हो जाओ। मेरी स्वामिनि ! भयको त्याग दो।

वानरकी बात सुनकर सीता बारंबार फूट-फूटकर रोने लगीं। रामकी उन पतिव्रता पत्नीने भयभीत-सी होकर पूछा।

६४४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण सीता बोलीं—वत्स! क्या मेरे दारुण शोकसागरसे पीड़ित श्रीराम अभी जीवित हैं? मेरे प्राणनाथ कौसल्यानन्दन सकुशल हैं? जानकीके जीवनबन्धु इस समय शोकसे कृशकाय होकर कैसे हो गये हैं? मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतम कैसे आहार करते हैं? वे क्या खाते हैं? क्या सचमुच समुद्रके उस पार स्वयं सीतापति विद्यमान हैं? मेरे प्रभु शोकसे नष्ट न होकर क्या सचमुच लंकापर चढ़ाईके लिये तैयार खड़े हैं? जो स्वामीके लिये सदा दुःखरूप ही रही है, उसी मुझ पापिनी सीताको क्या वे स्मरण करते हैं? मेरे स्वामीने मेरे लिये कितना दुःख सहन किया है? जो पहले मिलनमें व्यवधान मानकर अपने कण्ठमें हार नहीं धारण करते थे, वे ही श्रीराम आज इतने दूर हैं! इस समय हम दोनोंके बीचमें सौ योजन विशाल समुद्र व्यवधान बनकर खड़ा है। क्या मैं कभी धर्म-कर्ममें संलग्न, धर्मिष्ठ, नितान्त शान्त करुणासागर प्रियतम भगवान् श्रीरामको देखूँगी? क्या पुनः प्रभुके चरणकमलोंकी सेवा कर सकूँगी? जो मूढ़ नारी पति-सेवासे वञ्चित है, उसका जीवन व्यर्थ है। जो मेरे धर्मपुत्र हैं और मेरे बिना शोकसागरमें मग्न हैं, मेरा अपहरण होनेसे जिनके अभिमानको गहरा आघात पहुँचा है, जो वीरोंमें श्रेष्ठ, धर्मात्मा और देवताके समान हैं; वे मेरे स्वामीके छोटे भाई देवर लक्ष्मण क्या सचमुच जीवित हैं? क्या यह सच है कि वे सदा मेरे उद्धारके लिये संनद्ध रहते हैं? क्या सचमुच प्राणोंसे भी अधिक प्रिय, धर्मात्मा, पुण्यात्मा तथा धन्यातिधन्य वत्स लक्ष्मणको मैं पुनः देखूँगी? मुने! सीताका यह वचन सुन उन्हें शुभ प्रत्युत्तर दे हनुमान्ने खेल-खेलमें ही लंकाको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर वायुपुत्र कपिवर हनुमान् पुनः जनकनन्दिनीको धीरज दे वेगपूर्वक बिना किसी परिश्रमके उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी विराजमान थे। वहाँ उन्होंने माता मिथिलेशकुमारीका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। सीताका मङ्गलमय समाचार सुनकर श्रीरामचन्द्रजी रो पड़े। लक्ष्मण और सुग्रीव भी फूट-फूटकर रोने लगे। नारद! उस समय महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न समस्त वानर भी रोदन करने लगे। देवर्षे! तदनन्तर समुद्रमें सेतु बाँधकर छोटे भाई और वानर-सेनासहित रघुकुलनन्दन श्रीरामने शीघ्र ही युद्धके लिये तैयार हो लंकापर चढ़ाई कर दी। ब्रह्मन्! वहाँ युद्ध करके श्रीरामने बन्धु-बान्धवोंसहित रावणको मार डाला और शुभ वेलामें सीताका वहाँसे उद्धार किया। फिर सत्यपरायणा सीताको पुष्पक विमानपर बिठाकर वे क्रीड़ाकौतुक एवं मङ्गलाचारके साथ शीघ्रतापूर्वक अयोध्याकी ओर प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर भगवान् रामने सीताको हृदयसे लगा क्रीड़ा की। फिर सीता और रामने तत्काल विरह-ज्वालाको त्याग दिया। भूमण्डलपर श्रीराम सातों द्वीपोंके स्वामी हुए। उनके शासनकालमें सारी पृथ्वी आधि-व्याधिसे रहित हो गयी। श्रीरामके दो धर्मात्मा पुत्र हुए— कुश और लव। उन दोनोंके पुत्रों और पौत्रोंसे सूर्यवंशी क्षत्रियोंका विस्तार हुआ। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने तुमसे मङ्गलमय श्रीरामचरित्रका वर्णन किया है। यह सुख देनेवाला, मोक्ष प्रदान करनेवाला, सारतत्त्व तथा भवसागरसे पार होनेके लिये जहाज है। (अध्याय ६२)

२- गोलोककी ब्रह्मज्योतिमें स्थित श्यामसुन्दर २६

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६४५ कंसके द्वारा रातमें देखे हुए दुःस्वप्नोंका वर्णन और उससे अनिष्टकी आशङ्का, पुरोहित सत्यकका अरिष्ट-शान्तिके लिये धनुर्यज्ञका अनुष्ठान बताना, कंसका नन्दनन्दनको शत्रु बताना और उन्हें व्रजसे बुलानेके लिये वसुदेवजीको प्रेरित करना, वसुदेवजीके अस्वीकार करनेपर अक्रूरको वहाँ जानेकी आज्ञा देना, ऋषिगण तथा राजाओंका आगमन भगवान् नारायण कहते हैं- नारद! इधर मथुरामें राजा कंस बुरे सपने देख विशेष चिन्तामें पड़कर अत्यन्त भयभीत हो उद्विग्न हो उठा। उसकी खाने-पीनेकी रुचि जाती रही। उसके मनमें किसी प्रकारकी उत्सुकता नहीं रह गयी। वह अत्यन्त दुःखी हो पुत्र, मित्र, बन्धु-बान्धव तथा पुरोहितको सभामें बुलाकर उनसे इस प्रकार बोला। कंसने कहा- मैंने आधी रातके समय जो बुरा सपना देखा है, वह बड़ा भयदायक है; इस सभामें बैठे हुए समस्त विद्वान्, बन्धु-बान्धव और पुरोहित उसे सुनें। मेरे नगरमें एक अत्यन्त वृद्धा और काले शरीरवाली स्त्री नाच कर रही है। वह लाल फूलोंकी माला पहने, लाल चन्दन लगाये तथा लाल वस्त्र धारण किये स्वभावतः अट्टहास कर रही है। उसके एक हाथमें तीखी तलवार है और दूसरेमें भयानक खप्पर। वह जीभ लपलपाती हुई बड़ी भयंकर दिखायी देती है। इसी तरह एक दूसरी काली स्त्री है, जो काले कपड़े पहने हुई है। देखनेमें महाशूद्री विधवा जान पड़ती है। उसके केश खुले हैं और नाक कटी हुई है। वह मेरा आलिङ्गन करना चाहती है। उसने मलिन वस्त्रखण्ड, रूखे केश तथा चूर्ण तिलक धारण कर रखे हैं। पुरोहित सत्यकजी! मैंने देखा है कि मेरे कपाल और छातीपर ताड़के पके हुए काले रंगके छिन्न-भिन्न फल बड़ी भारी आवाजके साथ गिर रहे हैं। एक मैला-कुचैला विकृत आकार तथा रूखे केशवाला म्लेच्छ मुझे आभूषण बनानेके निमित्त टूटी-फूटी कौड़ियाँ दे रहा है। एक पति-पुत्रवाली दिव्य सती स्त्रीने अत्यन्त रोषसे भरकर बारंबार अभिशाप दे भरे हुए घड़ेको फोड़ डाला है। यह भी देखा कि महान् रोषसे भरा हुआ एक ब्राह्मण अत्यन्त शाप दे मुझे अपनी पहनी हुई माला, जो कुम्हलाई नहीं थी और रक्त चन्दनसे चर्चित थी, दे रहा है। यह भी देखनेमें आया कि मेरे नगरमें एक- एक क्षण अङ्गार, भस्म तथा रक्तकी वर्षा हो रही है। मुझे दिखायी दिया कि वानर, कौए, कुत्ते, भालू, सूअर और गदहे विकट आकारमें भयानक शब्द कर रहे हैं। सूखे काष्ठोंकी राशि जमा है, जिसकी कालिमा मिटी नहीं है। अरुणोदयकी बेलामें मुझे बंदर और कटे हुए नख दृष्टिगोचर हुए। मेरे महलसे एक सती स्त्री निकली, जो पीताम्बर धारण किये, श्वेत चन्दनका अङ्गराग लगाये, मालतीकी माला धारण किये रत्नमय

५१- श्रीकृष्णको व्रजमें जाते देख राधाका विलाप एवं मूर्च्छा, श्रीहरिका उन्हें समझाना, श्रीराधाके सो जानेपर ब्रह्मा आदि देवताओंका आना और स्तुति करके श्रीकृष्णको मथुरा जानेके लिये प्रेरित करना, श्रीकृष्णका जाना, श्रीराधाका उठना और प्रियतमके लिये विलाप करके मूर्च्छित होना, श्रीकृष्णका लौटकर आना, रत्नमालाका श्रीकृष्णको राधाकी अवस्था बताना, श्रीकृष्णका राधाके लिये स्वप्नमें मिलनेका वरदान देकर व्रजमें जाना

६४६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके हाथमें क्रीड़ा-कमल शोभा पा रहा था और भालदेश सिन्दूर-बिन्दुसे सुशोभित था। वह रुष्ट हो मुझे शाप देकर चली गयी। मुझे अपने नगरमें कुछ ऐसे पुरुष प्रवेश करते दिखायी दिये, जिनके हाथोंमें फंदा था। उनके केश खुले हुए थे। वे अत्यन्त रूखे और भयंकर जान पड़ते थे। घर-घरमें एक नंगी स्त्री मन्द मुसकानके साथ नाचती दिखायी देती है, जिसके केश खुले हैं और आकार बड़ा विकट है। एक नंगी विधवा महाशूद्री, जिसकी नाक कटी हुई है और जो अत्यन्त भयंकर है, मेरे अङ्गोंमें तेल लगा रही है। अतिशय प्रातःकालमें मैंने कुछ ऐसी विचित्र स्त्रियाँ देखीं, जो बुझे हुए अङ्गार (कोयले) लिये हुए थीं। उनके शरीरपर कोई वस्त्र नहीं था तथा वे सम्पूर्ण अङ्गोंमें भस्म लगाये हुए मुस्करा रही थीं। सपनेमें मुझे नृत्य-गीतसे मनोहर लगनेवाला विवाहोत्सव दिखायी दिया। कुछ ऐसे पुरुष भी दृष्टिगोचर हुए, जिनके कपड़े और केश भी लाल थे। एक नंगा पुरुष दीखा, जो देखनेमें भयंकर था, जो कभी रक्त-वमन करता, कभी नाचता, कभी दौड़ता और कभी सो जाता था। उसके मुखपर सदा मुस्कराहट दिखायी देती थी। बन्धुओ! एक ही समय आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके मण्डलपर सर्वग्रास ग्रहण लगा दृष्टिगोचर हुआ है। पुरोहितजी! मैंने स्वप्नमें उल्कापात, धूमकेतु, भूकम्प, राष्ट्र-विप्लव, झंझावात और महान् उत्पात देखा है। वायुके वेगसे वृक्ष झोंके खा रहे थे। उनकी डालियाँ टूट-टूटकर गिर रही थीं। पर्वत भी भूमिपर ढहे दिखायी देते थे। घर-घरमें ऊँचे कदका एक नंगा पुरुष नाच रहा था, जिसका सिर कटा हुआ था। उस भयानक पुरुषके हाथमें नरमुण्डोंकी माला दिखायी देती थी। सारे आश्रम जलकर अङ्गारके भस्मसे भर गये थे और सब लोग चारों ओर हाहाकार करते दिखायी देते थे।

नारद! यों कहकर राजा कंस सभामें चुप हो गया। वह स्वप्न सुनकर सब भाई-बन्धु सिर नीचा किये लंबी साँस खींचने लगे। अपने यजमान कंसके शीघ्र होनेवाले विनाशको जानकर पुरोहित सत्यक तत्काल अचेत-से हो गये। राजभवनकी स्त्रियाँ तथा कंसके माता-पिता शोकसे रोने लगे। सबको यह विश्वास हो गया कि अब शीघ्र ही कंसका विनाशकाल स्वयं उपस्थित होनेवाला है।

**श्रीनारायण कहते हैं—**मुने! बुद्धिमान् पुरोहित सत्यक शुक्राचार्यके शिष्य थे। उन्होंने सब बातोंपर विचार करके कंसके लिये हितकी बात बतायी।

**सत्यक बोले—**महाभाग! भय छोड़ो। मेरे रहते तुम्हें भय किस बातका है? महेश्वरका यज्ञ करो, जो समस्त अरिष्टोंका विनाश करनेवाला है। इस महेश्वर-यागका नाम है—धनुर्यज्ञ, जिसमें बहुत-सा अन्न खर्च होता है और बहुत दक्षिणा बाँटी जाती है। वह यज्ञ दुःस्वप्नोंका विनाश तथा शत्रुभयका निवारण करनेवाला है। उस यज्ञसे आध्यात्मिक, आधिदैविक और उत्कट आधिभौतिक—इन तीन तरहके उत्पातोंका खण्डन होता है। साथ ही वह ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाला है। यज्ञ समाप्त होनेपर समस्त सम्पदाओंके दाता भगवान् शंकर प्रत्यक्ष दर्शन देते और ऐसा वर प्रदान करते हैं, जिससे जरा और मृत्युका निवारण हो जाता है। पूर्वकालमें महाबली बाण, नन्दी, परशुराम तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ भल्लने इस यज्ञका अनुष्ठान किया था। पहले भगवान् शिवने इस यज्ञसे संतुष्ट होकर यह दिव्य धनुष नन्दीश्वरको दिया था। धर्मात्मा नन्दीश्वरने बाणासुरको दिया। फिर यज्ञ करके महासिद्ध हुए बाणासुरने पुष्करतीर्थमें यह धनुष परशुरामजीको अर्पित कर दिया। कृपानिधान परशुरामजीने कृपापूर्वक अब तुमको यह धनुष दे दिया है। नरेश्वर! यह धनुष

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६४७

बड़ा ही कठोर (मजबूत) है। इसकी लंबाई एक सहस्र हाथकी है। खींचनेपर यह दस हाथतक फैलता है। इसका भगवान् शंकरकी इच्छासे निर्माण हुआ है। पशुपतिका यह पाशुपत धनुष जुते हुए रथके द्वारा भी कठिनाईसे ही ढोया जाता है। भगवान् नारायणदेवको छोड़कर अन्य सब लोग कभी इसे तोड़ नहीं सकते। भगवान् शंकरके इस कल्याणकारी यज्ञमें तुम शीघ्र ही इस धनुषकी पूजा करो और शुभ कर्ममें भेजनेयोग्य निमन्त्रण सबके पास भेज दो। नरेश्वर! इस यज्ञमें यदि धनुष टूट जायगा तो यजमानका नाश होगा, इसमें संशय नहीं है। धनुष टूटनेपर निश्चय ही यज्ञ भी भङ्ग हो जाता है। जब यज्ञ-कर्म सम्पन्न ही नहीं होगा तो उसका फल कौन देगा? महामते! इस धनुषके मूलभागमें ब्रह्मा, मध्यभागमें स्वयं नारायण और अग्रभागमें उग्र प्रतापशाली महादेवजी प्रतिष्ठित हैं। इस धनुषमें तीन विकार हैं तथा यह श्रेष्ठ रत्नोंद्वारा जटिल है। ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक प्रचण्ड मार्तण्डकी प्रभाको यह धनुष अपनी दिव्य दीप्तिसे दबा देता है। राजन्! महाबली अनन्त, सूर्य तथा कार्तिकेय भी इस धनुषको झुकानेमें समर्थ नहीं हैं; फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है? पूर्वकालमें त्रिपुरारि शिवने इसीके द्वारा त्रिपुरासुरका वध किया था। तुम इस महोत्सवके लिये बिना किसी भयके स्वेच्छापूर्वक माङ्गलिक कार्य आरम्भ करो।

सत्यककी यह बात सुनकर चन्द्रवंशकी वृद्धि करनेवाले कंसने सभी कार्योंमें सदा यजमानका हित चाहनेवाले पुरोहितजीसे कहा।

**कंस बोला—**पुरोहितजी! वसुदेवके घरमें मेरा वध करनेवाला एक कुलनाशक पुत्र उत्पन्न हुआ है, जो नन्दके भवनमें नन्दनन्दन होकर स्वच्छन्दतापूर्वक पालित-पोषित हो रहा है। उस बलवान् बालकने मेरे बुद्धिमान् मन्त्रियों, शूरवीर बान्धवों तथा पवित्र बहिन पूतनाको मार डाला है। वह इच्छानुसार अपने बलको बढ़ा लेता है। उसने गोवर्द्धन पर्वतको एक हाथपर ही धारण कर लिया था और शूरवीर महेन्द्रको भी पराजित कर दिया था। उसने ब्रह्माजीको समस्त चराचर जगत्‌का ब्रह्मरूपमें दर्शन कराया था तथा बालकों और बछड़ोंके कृत्रिम समुदायकी रचना कर ली थी। सत्यकजी! उस बलवान् बालकका वध करनेके लिये ही कोई सलाह दीजिये। निश्चय ही इस भूतलपर, स्वर्ग और पातालमें एवं तीनों लोकोंमें उसके सिवा दूसरा कोई मेरा शत्रु नहीं है। सर्वत्र जो श्रेष्ठ राजा हैं, वे मेरे प्रति बान्धवभाव रखते हैं। ब्रह्माजी और भगवान् शंकर तो तपस्वी हैं। उन्हें तपस्यासे ही छुट्टी नहीं है। रह गये सनातन भगवान् विष्णु; परंतु वे भी सबके आत्मा हैं और सबपर समान दृष्टि रखते हैं। यदि नन्दपुत्रको मार डालूँ तो तीनों लोकोंमें मेरा सम्मान बढ़ जायगा। मैं सार्वभौम सम्राट् एवं सातों द्वीपोंका महाराज हो जाऊँगा। स्वर्गमें जो इन्द्र हैं, वे भी दैत्योंसे परास्त होनेके कारण दुर्बल ही रहते हैं; अतः उनका वध करके मैं महेन्द्र हो जाऊँगा। इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होकर मैं सूर्यको, राजयक्ष्मासे ग्रस्त हुए अपने ही पूर्वपुरुष चन्द्रमाको तथा वायु, कुबेर और यमको भी निश्चय ही जीत लूँगा; अतः आप शीघ्र ही नन्द-व्रजमें जाइये और नन्द, नन्दनन्दन श्रीकृष्ण तथा उसके बलवान् भाई बलरामको भी अभी बुला लाइये।

कंसकी बात सुनकर सत्यकने हितकर, सत्य, नीतिका सारभूत, उत्तम एवं समयोचित वचन कहा।

**सत्यक बोले—**महाभाग! तुम नन्द-व्रजके अभीष्ट स्थानमें अक्रूर, उद्धव अथवा वसुदेवजीको भेजो।

सत्यककी बात सुनकर उसी सभामें स्वर्णसिंहासनपर बैठे हुए वसुदेवजीसे उसने कहा।

**राजेन्द्र कंस बोला—**मेरे प्रिय बन्धु

६४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण वसुदेवजी ! आप नीतिशास्त्रके तत्त्वज्ञ और उपाय ढूँढ़ निकालनेमें चतुर हैं; अतः नन्द-व्रजमें अपने पुत्रके घर आप ही जाइये। वृषभानु, नन्दराय, बलराम, नन्दनन्दन श्रीकृष्ण तथा समस्त गोकुल- वासियोंको यज्ञमें यहाँ शीघ्र बुला लाइये। मेरे दूत समस्त राजाओं तथा मुनियोंको इसकी सूचना देनेके लिये चिट्ठी लेकर चारों दिशाओंमें जायँ। ब्रह्मन् ! राजाकी बात सुनकर वसुदेवजीके ओठ, तालु और कण्ठ सूख गये; वे व्यथित- हृदयसे बोले। वसुदेवजीने कहा-राजेन्द्र ! इस कार्यके लिये इस समय नन्द-व्रजमें मेरा जाना उचित नहीं होगा। मुझ वसुदेवके पुत्र अथवा नन्दनन्दनको इस यज्ञका समाचार मैं दूँ और अपने साथ बुलाकर लाऊँ-यह किसी दृष्टिसे उचित नहीं कहा जा सकता। यदि तुम्हारे यज्ञ-महोत्सवमें नन्दपुत्रका आगमन हुआ तो अवश्य ही तुम्हारे साथ उसका विरोध होगा; अतः मैं उस बालकको बुलाकर यहाँ युद्ध करवाऊँ - यह मेरी दृष्टिमें श्रेयस्कर नहीं है। इसमें उस बालककी और तुम्हारी भी हानि हो सकती है। यदि वह बालक मारा गया तो सब लोग यही कहेंगे कि पिताने ही साथ ले जाकर कृष्णको मरवा दिया और यदि तुम्हें कुछ हो गया, तब लोग कहने लगेंगे कि वसुदेवने अपने पुत्रके द्वारा राजाको ही मौतके घाट उतार दिया। दोमेंसे एककी तत्काल मृत्यु होगी; यह निश्चित है। इसके सिवा और भी बहुत-से शूरवीर धराशायी होंगे; क्योंकि युद्ध कभी निरापद नहीं होता। मुने ! वसुदेवजीकी यह बात सुनकर राजेन्द्र कंसके नेत्र रोषसे लाल हो गये। वह तलवार लेकर उन्हें मार डालनेके लिये आगे बढ़ा। यह देख अत्यन्त बलवान् उग्रसेनने 'हाय! हाय!' करके अपने पुत्र महाराज कंसको तत्काल रोक दिया। रोषसे भरे हुए वसुदेव अपने आसनसे उठकर घरको चले गये। तब राजा कंसने अक्रूरको नन्द-व्रजमें जानेके लिये कहा और शीघ्र ही प्रत्येक दिशामें दूत भेजे। कंसका निमन्त्रण पाकर समस्त मुनि और नरेश आवश्यक सामानोंके साथ वहाँ आये। समस्त दिक्पाल, देवता, तपस्वी ब्राह्मण, सनकादि मुनि, पुलस्त्य, भृगु, प्रचेता, जाबालि और मार्कण्डेय आदि बहुत-से महान् ऋषिगण अपने शिष्योंसहित पधारे। हम दोनों भाई (नर और नारायण) भी वहाँ पहुँचे थे। राजाओंमें जरासंध, दन्तवक्र, द्रविड़-नरेश दाम्भिक, शिशुपाल, भीष्मक, भगदत्त, मुद्गल, धृतराष्ट्र, धूमकेश, धूमकेतु, शंबर, शल्य, सत्राजित, शंकु तथा अन्यान्य महाबली नरेश आये थे। इनके सिवा भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, महाबली अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, शाल्व, कैकेय तथा कौशल भी पधारे थे। महाराज कंसने सबके साथ यथोचित सम्भाषण किया और पुरोहित सत्यकने यज्ञके दिन शुभ कृत्यका सम्पादन किया। (अध्याय ६३-६४)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६४९ भगवद्दर्शनकी सम्भावनासे अक्रूरके हर्षोल्लास एवं प्रेमावेशका वर्णन श्रीनारायण कहते हैं - नारद ! कंसकी बात सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ शान्तस्वरूप अक्रूरके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे शान्तस्वभाव उद्धवसे बोले । अक्रूरने कहा- उद्धव ! आजकी रातका बड़ा सुन्दर प्रभात हुआ। आज मेरे लिये शुभ दिन प्राप्त हुआ है। निश्चय ही देवता, ब्राह्मण और गुरु मुझपर संतुष्ट हैं। करोड़ों जन्मोंके पुण्य आज स्वयं मुझे फल देनेको उपस्थित हैं। मेरा जो-जो शुभाशुभ कर्म था, वह सब मेरे लिये सुखद हो गया। कर्मसे बँधे हुए मुझ अक्रूरका बन्धन आज कर्मने ही काट दिया। मैं संसाररूपी कारागारसे मुक्त होकर श्रीहरिके धामको जा रहा हूँ। विद्वान् कंसने आज रोषवश मुझे मित्रार्थी बना दिया। इस नरदेवका क्रोध मेरे लिये वरदान-तुल्य हो गया। इस समय व्रजराजको लानेके लिये मैं व्रजमें जाऊँगा और वहाँ भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले परमपूज्य परमात्मा श्रीकृष्णके दर्शन करूँगा। नूतन जलधरके समान श्यामकान्ति, नीलकमलके सदृश नेत्र तथा कटिप्रदेशमें पीताम्बर धारण करनेवाले वे भगवान् या तो व्रजकी धूलिसे धूसरित होंगे या चन्दनसे चर्चित होंगे अथवा उनके अङ्गोंमें नवनीत लगा होगा और वे मुस्करा रहे होंगे। इस झाँकीमें मैं उनके दर्शन करूँगा। विनोदके लिये मुरली बजाते अथवा इधर-उधर झुंड-की-झुंड गौएँ चराते हुए या कहीं बैठे, चलते-फिरते अथवा सोते हुए उन मनोहर नन्दनन्दनको मैं देखूँगा; यह पूर्णतः निश्चित है। शुभ बेलामें आज भगवान्का भलीभाँति दर्शन करके जो सुख मिलेगा, उसके सामने राजाका आदेश क्या महत्त्व रखता है? ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि जिनके चरणकमलोंका निरन्तर ध्यान करते हैं तथा अनन्तविग्रह भगवान् अनन्त भी जिनका अन्त नहीं जानते हैं, देवता और संत भी जिनके प्रभावको सदा नहीं समझ पाते हैं, जिनकी स्तुति करनेमें देवी सरस्वती भी भयभीत एवं जडवत् हो जाती हैं, जिनकी सेवाके लिये महालक्ष्मी भी दासी नियुक्त की गयी हैं तथा जिनके चरणकमलोंसे उन सत्त्वरूपिणी गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है, जो तीनों लोकोंसे उत्कृष्ट, जन्म-मृत्यु एवं जरारूप व्याधिको हर लेनेवाली और दर्शन एवं स्पर्शमात्रसे मनुष्योंके समस्त पातकोंको नष्ट कर देनेवाली हैं, त्रैलोक्यजननी, मूलप्रकृति ईश्वरी दुर्गतिनाशिनी देवी दुर्गा भी जिनके चरणकमलोंका ध्यान करती हैं, जिन स्थूलसे भी स्थूलतर महाविष्णुके रोमकूपोंमें असंख्य विचित्र ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं, वे भी जिन सर्वेश्वरके सोलहवें अंशरूप हैं, उन माया- मानवरूपधारी श्रीकृष्णको देखनेके लिये मैं व्रजमें जाता हूँ। बन्धु उद्धव! वे नन्दनन्दन सर्वरूप, सबके अन्तरात्मा, सर्वज्ञ, प्रकृतिसे परे, ब्रह्मज्योतिःस्वरूप, भक्तजनोंपर अनुग्रहके लिये दिव्य विग्रह धारण करनेवाले, निर्गुण, निरीह, निरानन्द, सानन्द, निराश्रय एवं परम परमानन्दस्वरूप हैं। उन्हीं स्वेच्छामय, सबसे परे विराजमान, सबके सनातन बीजरूप बालमुकुन्दका योगीजन नित्य-निरन्तर अहर्निश ध्यान करते रहते हैं। पहले पाद्मकल्पमें कमलजन्मा ब्रह्माजीने कमलपर बैठकर एक सहस्र मन्वन्तरोंतक श्रीकृष्ण- दर्शनके लिये तपस्या की थी। उन दिनों सर्वथा उपवासके कारण उनका पेट पीठमें सट गया था। सहस्र मन्वन्तर पूर्ण होनेपर उन्हें आदेश मिला कि 'फिर तपस्या करो, तब मुझे देखोगे।' उन्हें एक बार यह शब्दमात्र सुनायी दिया। इतनी बड़ी तपस्या करनेपर भी वे भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन न पा सके। तब उन्होंने पुनः उतने ही समयतक तपस्या करके श्रीहरिका दर्शन और वरदान पाया। उद्धव ! ऐसे परमेश्वरको

६५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मैं आज अपनी आँखोंसे देखूँगा। पूर्वकालमें भगवान् शंकरने ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त तप किया। तब ज्योतिर्मण्डलके बीच गोलोकमें परमात्मा श्रीकृष्णके उन्हें दर्शन हुए। वे श्रीकृष्ण सर्वतत्त्व- स्वरूप और सम्पूर्ण सिद्धियोंसे सम्पन्न हैं। वे सबके अपने तथा सर्वश्रेष्ठ परमतत्त्व हैं। भगवान् शिवने उनके चरणारविन्दोंकी परम निर्मल भक्ति पायी। उद्धव! जिन भक्तवत्सलने अपने भक्त शिवको अपने समान ही बना दिया, ऐसे प्रभावशाली उन परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा। जितने समयमें सहस्र इन्द्रोंका पतन हो जाता है, उतने कालतक निराहार रहकर कृशोदर हुए भगवान् अनन्तने उन परमात्माकी प्रसन्नताके लिये भक्तिभावसे तपस्या की। तब उन्होंने उन अनन्त देवको अपने समान ज्ञान प्रदान किया। उद्धव ! उन्हीं परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा। उद्धवजी ! अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माजीका एक दिन-रात होता है। इसी क्रमसे तीस दिनोंका मास और बारह मासोंका वर्ष मानकर सौ वर्ष पूर्ण होनेपर ब्रह्माजीकी आयु पूरी होती है। अहो ! ऐसे ब्रह्माका पतन जिनके एक निमेषमें हो जाता है, उन परमात्माको आज मैं प्रत्यक्ष देखूँगा। भाई उद्धव! जैसे भूतलके धूलि-कणोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी प्रकार ब्रह्माओं तथा ब्रह्माण्डोंकी गणना भी असम्भव है। उन अखिल ब्रह्माण्डोंके आधार हैं महाविराट्, जो श्रीकृष्णके षोडशांशमात्र हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, मुनि, मनु, सिद्ध तथा मानव आदि चराचर प्राणी वास करते हैं। ब्रह्माण्डोंके आधारभूत वे महाविराट् भी, जिनका सोलहवाँ अंश हैं और जिनकी लीलामात्रसे आविर्भूत एवं तिरोभूत होते हैं; ऐसे सर्वशासक परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा। ऐसा कहकर अक्रूरजी प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गये। उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा और वे नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए भगवच्चरणारविन्दोंका ध्यान करने लगे। उनका हृदय भक्तिसे भर गया। वे परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलका स्मरण करते हुए भावनासे ही उनकी परिक्रमा करने लगे। उद्धवने अक्रूरको हृदयसे लगा लिया और बारंबार उनकी प्रशंसा की। तत्पश्चात् अक्रूरजी भी शीघ्र ही अपने घरको चले गये। (अध्याय ६५) श्रीराधाका श्रीकृष्णको अपने दुःस्वप्न सुनाना और उनके बिना अपनी दयनीय स्थितिका चित्रण करना, श्रीकृष्णका उन्हें सान्त्वना देना और आध्यात्मिक योगका श्रवण कराना श्रीनारायण कहते हैं- उसी दिन राधाने रात्रिमें बड़े बुरे सपने देखे। उन्होंने उठकर श्रीकृष्णसे कहा। राधिका बोलीं- प्रभो ! मैं रत्नसिंहासनपर रत्नमय छत्र धारण किये बैठी थी। उसी समय रोषसे भरे हुए एक ब्राह्मणने आकर मेरा वह छत्र ले लिया और मुझ अबलाको ही महाघोर कज्जलाकार दुस्तर गम्भीर सागरमें फेंक दिया। मैं शोकसे पीड़ित हो वहाँ जलके प्रवाहमें बारंबार चक्कर काटने लगी। घड़ियालोंसे भरे उस समुद्रमें बड़ी- बड़ी लहरोंके वेगसे टकराकर मैं व्याकुल हो गयी और बारंबार तुम्हें पुकारने लगी- 'हे नाथ ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।' तुम्हें न देखकर मैं महान् भयमें पड़ गयी और देवतासे प्रार्थना करने लगी। श्रीकृष्ण ! समुद्रमें डूबती हुई मैंने देखा, चन्द्रमण्डलके सैकड़ों टुकड़े हो गये हैं और वह आकाशसे भूतलपर गिर रहा है। दूसरे ही क्षण मुझे दिखायी दिया कि सूर्यमण्डल भी आकाशसे पृथ्वीपर गिर

वृन्दावनका दर्शन करते हुए नन्दभवनमें जाना, नन्दद्वारा उनका स्वागत-सत्कार, उन्हें श्रीकृष्णके विविध रूपोंमें दर्शन, उनके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णको मथुरा चलनेकी सलाह देना, गोपियोंद्वारा अक्रूरका विरोध और उनके रथका भञ्जन, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और आकाशसे दिव्य रथका आगमन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६५१ पड़ा और उसके चार टुकड़े हो गये। फिर एक ही समयमें आकाशके भीतर चन्द्रमा और सूर्यके मण्डलको मैंने पूर्णतः राहुसे ग्रस्त और अत्यन्त काला देखा। एक ही क्षणके बाद देखती हूँ कि एक तेजस्वी ब्राह्मणने रोषपूर्वक आकर मेरी गोदमें रखे हुए अमृत-कलशको फोड़ डाला। क्षणभर बाद यह दिखायी दिया कि वह महारुष्ट ब्राह्मण मेरे नेत्रगत पुरुषको पकड़कर लिये जा रहा है। प्रभो! मेरे हाथसे क्रीड़ा-कमल-दण्ड सहसा गिर पड़ा और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उत्तम रत्नोंके सारभागसे बना हुआ दर्पण भी सहसा हाथसे गिरकर टूक-टूक हो गया। जो पहले निर्मल था, वह पीछे काला दिखायी देने लगा था। मेरा रत्नसारनिर्मित हार और कमल छिन्न-भिन्न हो वक्षःस्थलसे खिसककर पृथ्वीपर गिर पड़ा। कमल अत्यन्त मलिन पड़ गया था। मेरी अट्टालिकामें जो पुतलियाँ बनी हैं, वे सब- की-सब क्षण-क्षणमें नाचती, हँसती, ताल ठोकती, गाती और रोती दिखायी दीं। आकाशमें काले रंगका एक विशाल चक्र बारंबार घूमता दिखायी दिया, जो बड़ा भयंकर था। वह कभी नीचेको गिरता और फिर ऊपरको उठ जाता था। मेरे प्राणोंका अधिष्ठाता देवता पुरुषरूपमें भीतरसे बाहर निकला और मुझसे बोला- 'राधे! बिदा होकर अब मैं यहाँसे जा रहा हूँ।' काले वस्त्र पहने हुए एक काली प्रतिमा दिखायी दी, जो मेरा आलिङ्गन और चुम्बन करने लगी। प्राणवल्लभ ! यह विपरीत लक्षण देखकर मेरे दायें अङ्ग फड़क रहे हैं और प्राण आन्दोलित हो रहे हैं। वे शोकसे रोते और क्षीण होते हैं। मेरा चित्त उद्विग्न हो उठा है। नाथ! तुम वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हो। बताओ, यह सब क्या है? क्या है? यों कहकर राधिकादेवी शोकसे विह्वल और भयभीत हो श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें गिर पड़ीं। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। भगवान् श्रीकृष्णने राधाको उठाकर सान्त्वना दी और उनके प्रति अपना महान् स्नेह प्रकट किया। तब राधा बोलीं- श्यामसुन्दर ! जब मैं आपके साथ रहती हूँ, तब हर्षसे खिल उठती हूँ और आपके बिना मलिन हो मृतक-तुल्य हो जाती हूँ। आपके साथ रहनेपर मैं उसी प्रकार चमक उठती हूँ, जैसे प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर विशिष्ट ओषधियाँ तथा रजनीमें दीपशिखा। आपके बिना मैं दिन- दिन उसी तरह क्षीण होने लगती हूँ, जैसे कृष्णपक्षमें चन्द्रमाकी कला। आपके वक्षमें विराजमान होनेपर मेरी दीप्ति पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभाके समान प्रकाशित होती है और जब आप मुझे त्यागकर अन्यत्र चले जाते हैं, तब मैं तत्काल ऐसी हो जाती हूँ, मानो मर गयी। मैं अमावास्याके चन्द्रमाकी कलाके समान विलीन-सी हो जाती हूँ। घीकी आहुति पाकर जैसे अग्निशिखा प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार आपका साथ पाकर मैं दीप्तिसे दमक उठती हूँ और आपके बिना शिशिर-ऋतुमें कमलिनीकी भाँति बुझ-सी जाती हूँ। जब मेरे पाससे तुम चले जाते हो, तब मैं चिन्तारूपी ज्वर या जरासे ग्रस्त हो जाती हूँ। जैसे सूर्य और चन्द्रमाके अस्त होनेपर सारी भूमि अन्धकारसे आच्छन्न हो जाती है, उसी तरह जब तुम दृष्टिसे ओझल होते हो, तब मैं शोक और दुःखमें डूब जाती हूँ। तुम्हीं सबके आत्मा हो; विशेषतः मेरे प्राणनाथ हो। जैसे जीवात्माके त्याग देनेपर शरीर मुर्दा हो जाता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारे बिना मरी- सी हो जाती हूँ। तुम मेरे पाँचों प्राण हो। तुम्हारे बिना मैं मृतक हूँ, ठीक उसी तरह जैसे नेत्रगोलक आँखकी पुतलीके बिना अंधे होते हैं। जैसे चित्रोंसे युक्त स्थानकी शोभा बढ़ जाती है, उसी तरह तुम्हारे साथ मेरी शोभा अधिक हो जाती है और जब तुम मेरे साथ नहीं रहते हो तब मैं तिनकोंसे आच्छादित और झाड़-बुहार या सजावटसे रहित भूमिकी भाँति शोभाहीन हो जाती

६५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण हूँ। श्रीकृष्ण ! तुम्हारे साथ मैं चित्रयुक्त मिट्टीकी प्रतिमाकी भाँति सुशोभित होती हूँ और तुम्हारे बिना जलसे धोयी हुई मिट्टीकी मूर्तिकी तरह कुरूप दिखायी देती हूँ। तुम रासेश्वर हो। तुमसे ही गोपाङ्गनाओंकी शोभा होती है, जैसे सोनेकी माला श्वेत मणिका संयोग पाकर अधिक सुशोभित होने लगती है। व्रजराज ! तुम्हारे साथ राजाओंकी श्रेणियाँ उसी तरह शोभा पाती हैं, जैसे आकाशमें चन्द्रमाके साथ तारावलियाँ। नन्दनन्दन ! जैसे शाखा, फल और तनोंसे वृक्षावलियाँ सुशोभित होती हैं, उसी प्रकार तुमसे नन्द और यशोदाकी शोभा है। गोकुलेश्वर ! जैसे समस्त लोकोंकी श्रेणियाँ राजेन्द्रसे सुशोभित होती हैं, उसी प्रकार समस्त गोकुलवासियोंकी शोभा तुम्हारे साथ रहनेसे ही है। रासेश्वर ! जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्रसे ही अमरावतीपुरी शोभित होती है, उसी प्रकार रासमण्डलको भी तुमसे ही मनोहर शोभा प्राप्त होती है। जैसे बलवान् सिंह अन्यान्य वनोंकी शोभा, स्वामी और सहारा है, उसी प्रकार तुम्हीं वृन्दावनके वृक्षोंकी शोभा, संरक्षक और आश्रयदाता हो। जैसे गाय अपने बछड़ेको न पाकर व्याकुल हो डकराने लगती है, उसी प्रकार माता यशोदा तुम्हारे बिना शोकसागरमें निमग्न हो जाती हैं। जैसे तपे हुए पात्रमें धान्यराशि जल जाती है, उसी प्रकार तुम्हारे बिना नन्दजीका हृदय दग्ध होने लगता है और प्राण आन्दोलित हो उठते हैं। यों कहकर अत्यन्त प्रेमके कारण राधा श्रीहरिके चरणोंमें गिर पड़ीं। श्रीहरिने पुनः अध्यात्म-ज्ञानकी बातें कहकर उन्हें समझाया- बुझाया। नारद ! आध्यात्मिक महायोग उसी तरह मोहके उच्छेदका कारण कहा गया है, जैसे तीखी धारवाला कुठार वृक्षोंके काटनेमें हेतु होता है। नारदने कहा- वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन् ! लोकोंके शोकका उच्छेद करनेवाले आध्यात्मिक महायोगका वर्णन कीजिये। मेरे मनमें उसे सुननेके लिये उत्कण्ठा है। श्रीनारायणने कहा-आध्यात्मिक महायोग योगियोंकी भी समझमें नहीं आता। उसके अनेक प्रकार हैं। उन सबको सम्यक्-रूपसे स्वयं श्रीहरि ही जानते हैं। रमणीय क्रीड़ासरोवरके तटपर कृपानिधान श्रीकृष्णने शोकाकुल राधिकाको जो आध्यात्मिक योग सुनाया था, उसीका वर्णन करता हूँ, सुनो। श्रीकृष्ण बोले- प्रिये ! तुम्हें तो पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण है। अपने-आपको याद करो। क्यों भूली जा रही हो ? गोलोकका सारा वृत्तान्त और सुदामाका शाप क्या तुम्हें याद नहीं है ? महाभागे ! उस शापके कारण कुछ दिनोंतक मुझसे तुम्हारा वियोग रहेगा। शापकी अवधि समाप्त होनेपर फिर हम दोनोंका मिलन होगा। फिर मैं गोलोकवासी गोपों और गोपाङ्गनाओंके साथ अपने परमधाम गोलोकको चलूँगा। इस समय मैं तुमसे कुछ आध्यात्मिक ज्ञानकी बातें कहता हूँ, सुनो। यह सारभूत ज्ञान शोकका नाशक, आनन्दवर्धक तथा मनको सुख देनेवाला है। मैं सबका अन्तरात्मा और समस्त कर्मोंसे निर्लिप्त हूँ। सबमें सर्वत्र विद्यमान रहकर भी कभी किसीके दृष्टिपथमें नहीं आता हूँ। जैसे वायु सर्वत्र सभी वस्तुओंमें विचरती है, किंतु किसीसे लिप्त नहीं होती; उसी प्रकार मैं समस्त कर्मोंका साक्षी हूँ। उन कर्मोंसे लिप्त नहीं होता हूँ। सर्वत्र समस्त जीवधारियोंमें जो जीवात्मा हैं, वे सब मेरे ही प्रतिबिम्ब हैं। जीवात्मा सदा समस्त कर्मोंका कर्ता और उनके शुभाशुभ फलोंका भोक्ता है। जैसे जलके घड़ोंमें चन्द्रमा और सूर्यके मण्डलका पृथक्-पृथक् प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, किंतु उन घड़ोंके फूट जानेपर वे सारे प्रतिबिम्ब चन्द्रमा और सूर्यमें ही विलीन हो जाते हैं; उसी प्रकार अन्तःकरणरूपी उपाधिके मिट जानेपर समस्त चित् प्रतिबिम्ब-जीव मुझमें ही अन्तर्हित हो जाते हैं। प्रिये ! समयानुसार

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६५३ समस्त जीवधारियोंकी मृत्यु हो जानेपर जीव मुझसे ही संयुक्त होता है। हम दोनों सदा समस्त जन्तुओंमें विद्यमान हैं। सम्पूर्ण जगत् आधेय है और मैं इसका आधार हूँ। आधारके बिना आधेय उसी तरह नहीं रह सकता, जैसे कारणके बिना कार्य। सुन्दरि ! संसारके समस्त द्रव्य नश्वर हैं। कहीं किन्हीं पदार्थोंका आविर्भाव अधिक होता है और कहीं कम। कुछ देवता मेरे अंश हैं, कुछ कला हैं, कुछ कलाकी कलाके भी अंश हैं और कुछ उस अंशके भी अंशांश हैं। मेरी अंशस्वरूपा प्रकृति सूक्ष्मरूपिणी है। उसकी पाँच मूर्तियाँ हैं- सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, तुम (राधा) और वेदजननी सावित्री। जितने भी मूर्तिधारी देवता हैं, वे सब प्राकृतिक हैं। मैं सबका आत्मा हूँ और भक्तोंके ध्यानके लिये नित्य देह धारण करके स्थित हूँ। राधे ! जो-जो प्राकृतिक देहधारी हैं, वे प्राकृत प्रलयमें नष्ट हो जाते हैं। सबसे पहले मैं ही था और सबके अन्तमें भी मैं ही रहूँगा। जैसा मैं हूँ, वैसी ही तुम भी हो। जैसे दूध और उसकी धवलतामें कभी भेद नहीं होता, उसी प्रकार निश्चय ही हम दोनोंमें भेद नहीं है। प्रारम्भिक सृष्टिमें मैं ही वह महान् विराट् हूँ, जिसकी रोमावलियोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं। वह महाविराट् मेरा अंश है और तुम अपने अंशसे उसकी पत्नी हो। बादकी सृष्टिमें मैं ही वह क्षुद्र विराट् हूँ, जिसके नाभिकमलसे इस विश्व- ब्रह्माण्डका प्राकट्य हुआ है। विष्णुके रोमकूपमें मेरा आंशिक निवास है। तुम्हीं अपने अंशसे उस विष्णुकी सुन्दरी स्त्री हो। उसके प्रत्येक विश्वमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता विद्यमान हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा अन्य ब्रह्माण्डोंके ब्रह्मा आदि देवता भी मेरी ही कलाएँ हैं। देवि ! समस्त चराचर प्राणी मेरी कलाकी अंशांशकलासे प्रकट हुए हैं। तुम वैकुण्ठमें महालक्ष्मी हो और मैं वहाँ चतुर्भुज नारायण हूँ। वैकुण्ठ भी उसी तरह विश्वब्रह्माण्डसे बाहर है, जैसे गोलोक। सत्यलोकमें तुम्हीं सरस्वती तथा ब्रह्मप्रिया सावित्री हो। शिवलोकमें जो मूलप्रकृति ईश्वरी शिवा हैं, वे भी तुमसे भिन्न नहीं हैं, वे दुर्गम संकटका नाश करनेके कारण सर्वदुर्गतिनाशिनी 'दुर्गा' कहलाती हैं। वे ही दक्षकन्या सती हैं और वे ही हैं गिरिराजकुमारी पार्वती। कैलासमें सौभाग्यशालिनी पार्वती शिवके वक्षःस्थलपर विराजमान होती हैं। तुम्हीं अपने अंशसे सिन्धुकन्या होकर क्षीरसागरमें श्रीविष्णुके वक्षःस्थलपर विराजमान होती हो। सृष्टिकालमें मैं ही अपने अंशसे ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप धारण करता हूँ तथा तुम लक्ष्मी, शिवा, धात्री एवं सावित्री आदि पृथक् पृथक् रूप धारण करती हो। गोलोकके रासमण्डलमें तुम स्वयं ही सदा रासेश्वरीके पदपर प्रतिष्ठित हो। रमणीय वृन्दावनमें वृन्दा तथा विरजा-तटपर विरजाके रूपमें तुम्हीं शोभा पाती हो। वही तुम इस समय सुदामाके शापसे पुण्यभूमि भारतवर्षमें आयी हो। सुन्दरि ! भारतवर्ष और वृन्दावनको पवित्र करना ही तुम्हारे शुभागमनका उद्देश्य है। समस्त लोकोंमें जो सम्पूर्ण स्त्रियाँ हैं, वे तुम्हारी ही कलांश-कलासे प्रकट हुई हैं। जो स्त्री है, वह तुम हो; जो पुरुष है, वह मैं हूँ। मैं ही अपनी कलासे अग्निरूपमें प्रकट हुआ हूँ और तुम अग्निकी दाहिका शक्ति एवं प्रियपत्नी स्वाहा हो। तुम्हारे साथ रहनेपर ही मैं जलानेमें समर्थ हूँ, तुम्हारे बिना नहीं। मैं दीप्तिमानोंमें सूर्य हूँ और तुम्हीं अपनी कलासे संज्ञा होकर प्रभाका विस्तार करती हो। तुम्हारे सहयोगसे ही मैं प्रकाशित होता हूँ। तुम्हारे बिना मैं दीप्तिमान् नहीं हो सकता। मैं कलासे चन्द्रमा हूँ और तुम शोभा तथा रोहिणी हो। तुम्हारे साथ रहकर ही मैं मनोहर बना हूँ; तुम्हारे न होनेपर तो मुझमें कोई सौन्दर्य नहीं है। मैं ही अपनी कलासे इन्द्र हुआ हूँ और तुम्हीं स्वर्गकी मूर्तिमती लक्ष्मी शची हो। तुम्हारे साथ

६५४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

होनेसे ही मैं देवताओंका राजा इन्द्र हूँ; तुम्हारे बिना तो मैं श्रीहीन हो जाऊँगा। मैं ही अपनी कलासे धर्म हूँ और तुम धर्मकी पत्नी मूर्ति हो। यदि धर्म-क्रियारूपिणी तुम साथ न दो तो मैं धर्मकृत्यके सम्पादनमें असमर्थ हो जाऊँ। मैं ही कलासे यज्ञरूप हूँ और तुम अपने अंशसे दक्षिणा हो। तुम्हारे साथ ही मैं यज्ञफलका दाता हूँ; तुम न हो तो मैं फल देनेमें कदापि समर्थ न होऊँ। मैं ही अपनी कलासे पितृलोक हूँ और तुम अपने अंशसे सती स्वधा हो। तुम्हारे सहयोगसे ही मैं कव्य (श्राद्ध)-दानमें समर्थ होता हूँ; तुम न हो तो मैं उसमें कदापि समर्थ न हो सकूँगा। मैं पुरुष हूँ और तुम प्रकृति हो; तुम्हारे बिना मैं सृष्टि नहीं कर सकता। ठीक वैसे ही, जैसे कुम्हार मिट्टीके बिना घड़ा नहीं बना सकता। तुम सम्पत्तिरूपिणी हो और मैं तुम्हारे साथ उस सम्पत्तिका ईश्वर हूँ। लक्ष्मीस्वरूपा तुमसे संयुक्त होकर ही मैं लक्ष्मीवान् बना हूँ; तुम्हारे न होनेसे तो मैं सर्वथा लक्ष्मीहीन ही हूँ। मैं कलासे शेषनाग हुआ हूँ और तुम अपने अंशसे वसुधा हो। सुन्दरि! शस्य तथा रत्नोंकी आधारभूता तुमको मैं अपने मस्तकपर धारण करता हूँ। तुम कान्ति, शान्ति, मूर्तिमती, सद्द्भूति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, परा, दया, निद्रा, शुद्धा, तन्द्रा, मूर्च्छा, संनति और क्रिया हो। मूर्ति और भक्ति तुम्हारी ही स्वरूपभूता हैं। तुम्हीं देहधारियोंकी देह हो; सदा मेरी आधारभूता हो और मैं तुम्हारा आत्मा हूँ। इस प्रकार हम दोनों एक-दूसरेके शरीर और आत्मा हैं। जैसी तुम, वैसा मैं; दोनों सम—प्रकृति-पुरुषरूप हैं। देवि! हममेंसे एकके बिना भी सृष्टि नहीं हो सकती।

नारद! इस प्रकार परमप्रसन्न परमात्मा श्रीकृष्णने प्राणाधिका प्रिया श्रीराधाको हृदयसे लगाकर बहुत समझाया-बुझाया। फिर वे पुष्प-शय्यापर सो गये।

(अध्याय ६६-६७)

श्रीकृष्णको ब्रजमें जाते देख राधाका विलाप एवं मूर्च्छा, श्रीहरिका उन्हें समझाना, श्रीराधाके सो जानेपर ब्रह्मा आदि देवताओंका आना और स्तुति करके श्रीकृष्णको मथुरा जानेके लिये प्रेरित करना, श्रीकृष्णका जाना, श्रीराधाका उठना और प्रियतमके लिये विलाप करके मूर्च्छित होना, श्रीकृष्णका लौटकर आना, रत्नमालाका श्रीकृष्णको राधाकी अवस्था बताना, श्रीकृष्णका राधाके लिये स्वप्नमें मिलनेका वरदान देकर ब्रजमें जाना

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! पुरातन परमेश्वर श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने पुष्पशय्यासे उठकर निद्रामें निमग्न हुई अपनी प्राणोपमा प्रियतमा श्रीराधाको तत्काल ही जगाया। वस्त्रके अञ्चलसे उनके मुँहको पोंछ निर्मल करके मधुसूदनने मधुर एवं शान्त वाणीमें उनसे कहा।

**श्रीकृष्ण बोले—**पवित्र मुस्कानवाली रासेश्वरि! व्रजस्वामिनि! क्षणभर रासमण्डलमें ही ठहरो अथवा वृन्दावनमें घूमो या गोष्ठमें ही चली जाओ। अथवा तुम रासकी अधिष्ठात्री देवी हो; इसलिये क्षणभर इस रासमण्डलमें ही रासरसका आस्वादन करो। जैसे ग्राम-ग्राममें सर्वत्र ग्रामदेवता रहते हैं, उसी तरह रासेश्वरीको रासमें सदा रहना चाहिये। अथवा सुन्दरि! तुम अपनी प्यारी सखियोंके साथ क्षणभरके लिये चन्दनवन या चम्पकवनमें घूम आओ, या यहीं रहो; मैं कुछ क्षणके लिये घरको जाऊँगा, वहाँ मुझे एक विशेष कार्य करना है; अतः प्राणवल्लभे! थोड़ी देरके लिये प्रसन्नतापूर्वक

५३- शुभ लग्नमें यात्रासम्बन्धी मङ्गलकृत्य करके श्रीकृष्णका मथुरापुरीको प्रस्थान, पुरीकी शोभाका वर्णन, कुब्जापर कृपा, मालीको वरदान, धोबीका उद्धार, कुब्जाका गोलोकगमन, कंसका दुःस्वप्न, रङ्गभूमिमें कंसका पधारना, धनुर्भङ्ग, हाथीका वध, कंसका उद्धार, उग्रसेनको राज्यदान, माता-पिताके बन्धन काटना, वसुदेवजीद्वारा नन्द आदिका सत्कार और ब्राह्मणोंको दान

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६५५ मुझको छुट्टी दे दो। तुम मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हो। तुममें ही मेरे प्राण बसते हैं। प्रिये ! प्राणी अपने प्राणोंको छोड़कर कहाँ ठहर सकता है ? तुममें ही सदा मेरा मन लगा रहता है, तुमसे बढ़कर प्यारी मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है। केवल तुम्हीं मुझे शंकरसे अधिक प्रिय हो। यह सत्य है शंकर मेरे प्राण हैं; परंतु सती राधे ! तुम तो प्राणोंसे भी बढ़कर हो। यों कहकर भगवान् वहाँसे जानेको उद्यत हुए। वे सर्वज्ञ और सब कुछ सिद्ध करनेवाले हैं। सबके आत्मा, पालक और उपकारक हैं। उन्होंने अक्रूरका आगमन जानकर ब्रजमें जानेका विचार किया। श्रीकृष्णका मन बँट गया है; वे अन्यत्र जानेको उत्सुक हैं; यह देख राधिका देवी व्यथित-हृदयसे बोलीं। राधिकाने कहा- हे नाथ ! हे रमणश्रेष्ठ ! प्रिय लगनेवाले मेरे समस्त सम्बन्धियोंमें तुम्हीं श्रेष्ठ हो। प्राणनाथ ! मैं देखती हूँ, इस समय तुम्हारा मन बँटा हुआ है। तुम्हारे चले जानेपर मेरा प्रेम और सौभाग्य सब कुछ लुट जायगा। मुझे शोकके गहरे समुद्रमें डालकर तुम कहाँ चले जा रहे हो ? मैं विरहसे व्याकुल हूँ, दीन हूँ और तुम्हारी ही शरणमें आयी हूँ। अब मैं फिर घरको नहीं लौटूँगी; दूसरे वनमें चली जाऊँगी और दिन-रात 'कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !' का गान करती रहूँगी अथवा किसी वनमें भी नहीं जाऊँगी, प्रेमके समुद्रमें प्रवेश करूँगी और मनमें केवल तुम्हारी कामना लेकर शरीरको त्याग दूँगी। जैसे आकाश, आत्मा, चन्द्रमा और सूर्य सदा साथ रहते हैं; उसी तरह तुम मेरे आँचलमें बँधकर सदा पास ही रहते और साथ-साथ घूमते हो; किंतु दीनवत्सल ! इस समय तुम मुझे निराश करके जा रहे हो ! मुझ दीन एवं शरणागत अबलाको त्याग देना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवता जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते हैं; वे परमात्मा तुम हो। तुमने मायासे गोपवेष धारण कर रखा है। मैं ईर्ष्यालु नारी तुम्हें कैसे जान सकती हूँ? देव ! मैंने तुम्हें पति समझकर अथवा अभिमानके कारण तुम्हारे प्रति जो दुर्नीतिपूर्ण बर्ताव तथा सहस्रों अपराध किये हैं; उन्हें क्षमा कर दो। मेरा गर्व चूर्ण हो गया और मेरे सारे मनसूबे दूर चले गये। अपने सौभाग्यको आज मैं अच्छी तरह समझ चुकी हूँ। नाथ ! इसके सिवा, तुमसे और क्या कह सकती हूँ? गर्गके मुखसे तुम्हारे विषयमें सुनकर, जानकर भी मैं तुम्हारी मायासे मोहित हो गयी। इस समय प्रेमातिरेक अथवा भक्तिपाशसे बँधकर मैं तुमसे कुछ कह नहीं सकती। प्राणवल्लभ ! प्रभो ! तुम्हारे बिना मुझे एक-एक क्षण सौ युगोंके समान जान पड़ता है; फिर सौ वर्षोंतक मैं किस तरह जीवन धारण कर सकूँगी ? मुने ! ऐसा कहकर राधिका भूमिपर गिर पड़ीं और सहसा मूर्च्छित हो चेतना खो बैठीं। उन्हें मूर्च्छित देख कृपानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक सचेत किया और हृदयसे लगा लिया। फिर शोकहारी योगोंद्वारा उन्हें अनेक प्रकारसे समझाया तथापि शुचिस्मिता श्रीराधा शोकको त्याग न सकीं। सामान्य वस्तुका बिछोह भी मनुष्योंके लिये शोकप्रद हो जाता है, फिर जहाँ देह और आत्माका बिछोह होता हो, वहाँ सुख कैसे हो सकता है? उस दिन व्रजराज श्यामसुन्दर ब्रजमें नहीं लौट सके। श्रीराधाके साथ क्रीड़ा-सरोवरके तटपर गये। वहाँ उनके साथ भगवान्ने पुनः रास-क्रीड़ा की। तदनन्तर आनन्दमग्ना राधिकाजी सो गयीं। इसी समय लोकपितामह ब्रह्माजी शिव, शेष आदि देवताओं तथा मुनीन्द्रोंके साथ वहाँ आये। आकर उन्होंने धरतीपर माथा टेक प्रणाम किया और हाथ जोड़ वे उन परिपूर्णतम परमेश्वरका सामवेदोक्त स्तोत्रसे स्तवन करने लगे।

६५६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

**ब्रह्माजी बोले—**जगदीश्वर ! आपकी जय हो, जय हो। आपके चरणोंकी सभी वन्दना करते हैं। आप निर्गुण, निराकार और स्वेच्छामय हैं। सदा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं और वह श्रीविग्रह नित्य है। मायासे गोपवेष धारण करनेवाले मायापते ! आपकी वेश-भूषा तथा शील-स्वभाव सभी सुन्दर एवं मनोहर हैं। आप शान्त तथा सबके प्राणवल्लभ हैं। स्वभावतः इन्द्रिय-संयम और मनोनिग्रहसे सम्पन्न हैं। नितान्त ज्ञानानन्दस्वरूप, परात्परतर, प्रकृतिसे परे, सबके अन्तरात्मा, निर्लिप्त, साक्षिस्वरूप, व्यक्ताव्यक्तरूप, निरञ्जन, भूतलका भार उतारनेवाले, करुणासागर, शोक-संतापनाशन, जरा-मृत्यु और भय आदिको हर लेनेवाले, शरणागतरक्षक, भक्तोंपर दया करनेके लिये व्याकुल रहनेवाले, भक्तवत्सल, भक्तोंके संचित धन तथा सच्चिदानन्दस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। सबके अधिष्ठाता देवता तथा प्रीति प्रदान करनेवाले प्रभुको सादर नमस्कार है।

इस तरह बारंबार कहते हुए ब्रह्माजी प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गये। जो ब्रह्माजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रको एकाग्रचित्त होकर सुनता है, उसके सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थोंकी सिद्धि होती है; इसमें संशय नहीं है।

इस प्रकार स्तुति और बारंबार प्रणाम करके जगद्विधाता ब्रह्माजी सचेत हो धीरे-धीरे उठे और पुनः भक्तिभावसे बोले।

**ब्रह्माजीने कहा—**देवदेवेश्वर ! उठिये। परमानन्दकारण ! सानन्द, नित्यानन्दमय नन्दनन्दन ! आपको नमस्कार है। नाथ ! नन्दभवनमें पधारिये और वृन्दावनको छोड़िये। सौ वर्षोंके लिये जो सुदामका शाप प्राप्त हुआ है, उसको स्मरण कीजिये। भक्तके शापको सफल बनानेके लिये प्रियाजीको उतने समयके लिये त्याग दीजिये। फिर इन्हें पाकर आप गोलोकमें पधारियेगा। देव ! आप पिताके घर जाकर वहाँ आये हुए अक्रूरजीसे मिलिये। वे आपके पितृव्य (चाचा), माननीय अतिथि तथा धन्यवादके योग्य सर्वसमर्थ वैष्णव हैं। भगवन् ! अब उनके साथ मधुपुरीकी यात्रा कीजिये। हरे ! वहाँ शिवके धनुषको तोड़िये और शत्रुगणोंको हतोत्साह कीजिये—मार भगाइये। दुरात्मा कंसका वध कीजिये और पिता-माताको सान्त्वना दीजिये। द्वारकापुरीका निर्माण कीजिये, भूतलका भार उतारिये, भगवान् शंकरकी वाराणसीपुरीको दग्ध कीजिये और इन्द्रके भवनपर भी धावा बोलिये। युद्धमें शिवजीको जृम्भास्त्रसे जृम्भित करके बाणासुरकी भुजाओंको काटिये। नाथ! इससे पहले आपको रुक्मिणीका हरण, नरकासुरका वध तथा सोलह हजार राजकुमारियोंका पाणिग्रहण करना है। व्रजेश्वर ! अब इन प्राणतुल्या प्रियतमाको छोड़िये और व्रजमें चलिये। उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो। जबतक राधाकी नींद नहीं टूटती है; तभीतक चल दीजिये।

इतना कहकर ब्रह्माजी इन्द्र आदि देवताओंके साथ ब्रह्मलोकको चले गये। साथ ही शेषनाग तथा शंकरजी भी अपने स्थानको पधारे। देवताओंने श्रीकृष्णके ऊपर प्रेम और भक्तिसे पुष्प और चन्दनकी वर्षा की। फिर आकाशवाणी हुई—‘प्रभो ! कंस वधके योग्य है; अतः उसका वध कीजिये; अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाइये और पृथ्वीके भारका निवारण कीजिये।’ नारद ! इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर भूतभावन भगवान् श्रीकृष्ण भगवती राधाको छोड़कर धीरे-धीरे वहाँसे उठे। बारंबार पीछेकी ओर देखते हुए श्रीहरि कुछ दूरतक गये; फिर चन्दनवनमें वासस्थानके पास ही थोड़ी देरके लिये ठहर गये। उधर राधा निद्रा त्यागकर अपनी शय्यासे उठ बैठीं और शान्त, कान्त, प्राणवल्लभ श्रीहरिको वहाँ न देख विलाप करती हुई बोलीं—‘हा नाथ! हा रमणश्रेष्ठ ! हा प्राणेश्वर !

९८- श्रीकृष्णकी दृष्टि पड़ते ही कुब्जाका सहसा अनुपम शोभा और रूप-यौवनसे लक्ष्मीके समान रमणीय हो जाना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

६५७


हा प्राणवल्लभ! हे प्राणचोर प्रियतम! तुम कहाँ गये?' फिर एक क्षणतक अन्वेषण करती हुई वे मालतीवनमें घूमती फिरीं। कभी क्षणभरके लिये बैठ जातीं, कभी उठ जातीं और कभी भूतलपर सो जाती थीं। कुछ क्षणोंतक अत्यन्त उच्चस्वरसे बारंबार रोदन और विलाप करती रहीं। 'हे नाथ! आओ-आओ' ऐसा बारंबार कहकर वे संतापसे मूर्च्छित हो गयीं। विरहानलसे संतप्त हो घास-फूससे ढके हुए भूतलपर इस तरह गिरीं, मानो प्राणान्त हो गया हो।

ब्रह्मन्! उस समय वहाँ अगणित गोपियाँ आ पहुँचीं। किन्हींके हाथोंमें चँवर थे और कोई चन्दनका अनुलेपन लिये आयी थीं। उन सबके बीच जो प्रियाली (प्यारी सखी) थी, उसने श्रीराधाको अपनी छातीसे लगा लिया। वह प्रियाजीको मरणासन्न-सी देख प्रेमसे विह्वल हो रोने लगी। उसने पङ्कके ऊपर सजल कमलदल बिछाकर उसपर श्रीराधाको सुलाया। वे चेष्टाहीन और मृतक-सी जान पड़ती थीं। गोपियाँ सुन्दर श्वेत चँवर डुलाती हुई उनकी सेवामें लग गयीं। उनके अङ्गोंमें चन्दनका लेप किया। उस अवस्थामें सती राधाके वस्त्र गीले हो गये थे। इतनेमें ही श्रीकृष्ण वहाँ लौट आये और अपनी उन प्राणवल्लभाको पूर्वोक्त अवस्थामें देखा। नारद! जब वे पास आने लगे तो बलवती गोपियोंने उन्हें रोक दिया और उन्हें इस तरह पकड़कर ले आयीं, जैसे राजभय आदिसे प्रेरित हो किसी दण्डनीय अपराधीको बाँधकर लाया गया हो। निकट आकर कृपानिधान श्रीकृष्णने राधाको गोदमें बिठा लिया, उन्हें सचेत किया और प्रबोधक वचनोंद्वारा समझाया। होशमें आकर देवी राधाने जब प्राणवल्लभको देखा, तब वे सुस्थिर हो गयीं और उन्होंने विरह-ज्वरको त्याग दिया। उस समय राधाकी चतुर सखी रत्नमालाने जो सबके द्वारा सम्मानित थी, श्रीकृष्णसे नीतिका सारभूत परम उत्तम मधुर वचन कहा।

रत्नमाला बोली—श्रीकृष्ण! सुनो। मैं ऐसी बात बताती हूँ, जो परिणाममें सुख देनेवाली, हितकारक, सत्य, नीतिका सारभूत तथा पति-पत्नीमें प्रीति बढ़ानेवाली है। वह नीतिसम्मत, वेदों और पुराणोंद्वारा अनुमोदित, लोक-व्यवहारमें प्रशंसनीय तथा उत्तम यशकी प्राप्ति करानेवाली है। नारियोंको जैसे माता प्यारी होती है, उसी तरह बन्धुजनोंमें भाई प्रिय होता है। भाईसे प्रिय पुत्र और पुत्रसे प्रिय पति होता है। साध्वी स्त्रियोंके लिये सत्पुरुषोंद्वारा समादृत स्वामी सौ पुत्रोंसे भी अधिक प्रिय होता है। रसिका और चतुरा स्त्रियोंके लिये पतिसे बढ़कर प्यारा दूसरा कोई नहीं है। इस मिथ्या संसारमें पति-पत्नीकी परस्पर प्रीति, समता तथा प्रेम-सौभाग्य परम अभीष्ट है। जिस-जिस घरमें पति-पत्नी एक-दूसरेके प्रति समभाव नहीं रखते, वहीं दरिद्रताका निवास है। वहाँ उन दोनोंका जीवन निष्फल है*। स्त्रीके लिये स्वामीसे मतभेद या फूट होना महान् दुःखकी बात है। वैसा जीवन शोक और संतापका बीज तथा मरणसे भी अधिक कष्टदायक है। सोते और जागते समय भी स्त्रियोंके प्राण पतिमें ही बसते हैं। पति ही इहलोक और परलोकमें स्त्रीका गुरु है। नाथ! ज्यों ही आप यहाँसे गये त्यों ही राधाको मूर्च्छा आ गयी। ये सहसा घाससे ढकी हुई भूमिपर गिर पड़ीं। उस समय मैंने इनके मुँहपर उत्तम शीतल जलका छींटा दिया, तब इनकी साँस चलने लगी और कुछ-कुछ चेतना आयी। मेरी सखी क्षण-क्षणमें पुकार उठती


*दम्पत्योः समता नास्ति यत्र यत्र हि मन्दिरे। अलक्ष्मीस्तत्र तत्रैव विफलं जीवनं तयोः॥
(६९।६४)

९९- मथुरामें मालीको श्रीकृष्णका दास्यभावका वरदान देना

६५८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


थीं—'हे नाथ! हे कृष्ण!' फिर दूसरे ही क्षण संतप्त हो रोने लगतीं और तत्काल मूर्च्छित हो जाती थीं। राधिकाका शरीर विरहाग्निसे संतप्त हो तपायी हुई लोहेकी छड़ीके समान अग्नितुल्य हो गया था; इसे छूआ नहीं जाता था। राधाके लिये सोने और जागनेमें, दिन और रातमें, घर और वनमें, जल, थल और आकाशमें तथा चन्द्रोदय और सूर्योदयमें कोई भेद नहीं रह गया है। इनकी आकृति मृतकतुल्य एवं जडवत् हो गयी है। ये एक ही स्थानपर रहकर सदा सम्पूर्ण जगत्‌को विष्णुमय देखती हैं। चिकने पङ्कपर कमलोंके सजल पत्र बिछाकर जो शय्या तैयार की गयी थी; उसपर ये आपके लिये विरहातुर होकर सोयी थीं। प्यारी सखियाँ निरन्तर श्वेत चँवर डुलाकर सेवा करने लगीं। इनके अङ्गोंपर चन्दनमिश्रित जल छिड़का गया। इनके सारे वस्त्र गीले हो गये, तथापि राधाके अङ्गोंका स्पर्श होनेमात्रसे वहाँका सारा पङ्क सूख गया। स्निग्ध कमलदल तत्क्षण जलकर भस्म हो गये। चन्दन सूख गया। राधाका चम्पाके समान कान्तिमान् सुनहरा वर्ण केशके रंगकी भाँति काला पड़ गया। सिन्दूरके सुन्दर बिन्दु तत्काल श्याम हो गये। वेश-भूषा, विलास, लीला एवं क्रीड़ा छूट गयी। कमलाकान्त कृष्ण! यदि आप शीघ्र लौटकर नहीं आयेंगे तो आपके वियोगमें मेरी सखी निश्चय ही अपने प्राणोंका परित्याग कर देगी। अतः नीतिविशारद श्रीकृष्ण! आप मन-ही-मन विचारकर जो उचित हो वह करें, जिससे आपके प्रति अनुरक्त अबलाकी हत्या न हो।

रत्नमालाकी यह बात सुनकर माधव हँस पड़े और हितकर, सत्य, नीतिसार एवं परिणाममें सुखद वचन बोले।

श्रीभगवान्‌ने कहा— प्रिये रत्ने! यद्यपि मैं ईश्वर हूँ और मिलनमें बाधा डालनेवाले शापका खण्डन कर सकता हूँ, तथापि ऐसा करना मेरे लिये उचित नहीं है। मैं नियतिके नियमको बदला नहीं करता हूँ। समस्त ब्रह्माण्डोंमें मैंने जो मर्यादा स्थापित की है, उसीका सहारा लेकर देवता, मुनि और मनुष्य कर्म करते हैं (फिर उसको मैं ही कैसे तोड़ दूँ)। सुन्दरि! सुदामके शापसे हम दोनों दम्पतिको परस्पर जो कुछ समयके लिये वियोग प्राप्त होनेवाला है, वह यद्यपि हमें अभीष्ट नहीं है, तथापि होकर ही रहेगा। सुमध्यमे! मैं राधाको वर देता हूँ। उस वरके अनुसार जाग्रत्-अवस्थामें ही इन्हें मुझसे वियोगका अनुभव होगा; परंतु स्वप्नमें राधाको निरन्तर मेरा आलिङ्गन प्राप्त होता रहेगा। मैंने प्रियाजीको आध्यात्मकी बुद्धि प्रदान की है। उससे इनका शोक मिट जायगा। रत्नमाले! तुम्हारा कल्याण हो। तुम राधाको समझाओ। अब मैं नन्दभवनको जा रहा हूँ।

नारद! यों कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण नन्दभवनकी ओर चल दिये और सखियाँ राधाको समझाने लगीं। घर जाकर श्यामसुन्दरने माता-पिताको प्रणाम किया। माताने उन्हें गोदमें बिठा लिया और तुरंतका तैयार किया हुआ माखन खिलाया। फिर शीतल जल पीकर उन्होंने माताका दिया हुआ पान खाया और वहीं माँके समीप बैठे रहे। समस्त गोपसमूह श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगे। उन्होंने भी श्यामसुन्दरको प्रसन्नतापूर्वक हार, चन्दन और ताम्बूल दिये।

\hfill (अध्याय ६८-६९)