भारतकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

ब्रह्मखण्ड ४३


साथ उसकी पत्नी भी थी। वह श्रीमान् एवं सुन्दर युवक था। क्षत्रियोंका बीजस्वरूप था। उसका नाम था स्वायम्भुव मनु। जो स्त्री थी, उसका नाम शतरूपा था। वह बड़ी रूपवती थी और लक्ष्मीकी कलास्वरूपा थी। पत्नीसहित मनु विधाताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये उद्यत रहते थे। स्वयं विधाताने हर्षभरे पुत्रोंसे, जो बड़े भगवद्भक्त थे, सृष्टि करनेके लिये कहा। परंतु वे श्रीकृष्णपरायण होनेके कारण 'नहीं' करके तपस्या करनेके लिये चले गये। इससे जगत्पति विधाताको बड़ा क्रोध हुआ। कोपासक्त ब्रह्मा ब्रह्मतेजसे जलने लगे। प्रभो ! इसी समय उनके ललाटसे ग्यारह रुद्र प्रकट हुए। उन्हींमेंसे एकको संहारकारी 'कालाग्नि रुद्र' कहा गया है। समस्त लोकोंमें केवल वे ही तामस या तमोगुणी माने गये हैं। स्वयं ब्रह्मा राजस हैं और शिव तथा विष्णु सात्त्विक कहे गये हैं। गोलोकनाथ श्रीकृष्ण निर्गुण हैं; क्योंकि वे प्रकृतिसे परे हैं। जो परम अज्ञानी और मूर्ख हैं, वे ही शिवको तामस (तमोगुणी) कहते हैं। वे शुद्ध, सत्त्वस्वरूप, निर्मल तथा वैष्णवोंमें अग्रगण्य हैं। अब रुद्रोंके वेदोक्त नाम सुनो—महान्, महात्मा, मतिमान्, भीषण, भयंकर, ऋतुध्वज, ऊर्ध्वकेश, पिङ्गलाक्ष, रुचि, शुचि तथा कालाग्नि रुद्र। ब्रह्माजीके दायें कानसे पुलस्त्य, बायें कानसे पुलह, दाहिने नेत्रसे अत्रि, वामनेत्रसे क्रतु, नासिकाछिद्रसे अरणि, मुखसे अङ्गिरा एवं रुचि, वामपार्श्वसे भृगु, दक्षिणपार्श्वसे दक्ष, छायासे कर्दम, नाभिसे पञ्चशिख, वक्षःस्थलसे वोढु, कण्ठदेशसे नारद, स्कन्धदेशसे मरीचि, गलेसे अपान्तरतमा, रसनासे वसिष्ठ, अधरोष्ठसे प्रचेता, वामकुक्षिसे हंस और दक्षिणकुक्षिसे यति प्रकट हुए। विधाताने अपने इन पुत्रोंको सृष्टि करनेकी आज्ञा दी। पिताकी बात सुनकर नारदने उनसे कहा।

नारद बोले— जगत्पते ! पितामह ! पहले सनक, सनन्दन आदि ज्येष्ठ पुत्रोंको बुलाइये और उनका विवाह कीजिये। तत्पश्चात् हमलोगोंसे ऐसा करनेके लिये कहिये। जब पिताजी ! आपने उन्हें तपस्यामें लगाया है, तब हमें ही क्यों संसार-बन्धनमें डाल रहे हैं? अहो! कितने खेदकी बात है कि प्रभुकी बुद्धि विपरीत भावको प्राप्त हो रही है। भगवन् ! आपने किसी पुत्रको तो अमृतसे भी बढ़कर तपस्याका कार्य दिया है और किसीको आप विषसे भी अधिक विषम विषयभोग दे रहे हैं। पिताजी! जो अत्यन्त निम्न कोटिके भयानक भवसागरमें गिरता है, उसका करोड़ों कल्प बीतनेपर भी उद्धार नहीं होता। भगवान् पुरुषोत्तम ही सबके आदिकारण तथा निस्तारके बीज हैं। वे ही सब कुछ देनेवाले, भक्ति प्रदान करनेवाले, दास्यसुख देनेवाले, सत्य तथा कृपामय हैं। वे ही भक्तोंको एकमात्र शरण देनेवाले, भक्तवत्सल और स्वच्छ हैं। भक्तोंके प्रिय, रक्षक और उनपर अनुग्रह करनेवाले भी वे ही हैं। भक्तोंके आराध्य तथा प्राप्य उन परमेश्वर श्रीकृष्णको छोड़कर कौन मूढ विनाशकारी विषयमें मन लगायेगा ? अमृतसे भी अधिक प्रिय श्रीकृष्णसेवा छोड़कर कौन मूर्ख विषय नामक विषम विषका भक्षण (आस्वादन) करेगा ? विषय तो स्वप्नके समान नश्वर, तुच्छ, मिथ्या तथा विनाशकारी है।*

तात ! जैसे दीपशिखाका अग्रभाग पतङ्गोंको


* निस्तारबीजं सर्वेषां बीजं च पुरुषोत्तमम्। सर्वदं भक्तिदं दास्यप्रदं सत्यं कृपामयम्॥
भक्तैकशरणं भक्तवत्सलं स्वच्छमेव च। भक्तप्रियं भक्तनाथं भक्तानुग्रहकारकम्॥
भक्ताराध्यं भक्तसाध्यं विहाय परमेश्वरम्। मनो दधाति को मूढो विषये नाशकारणे॥
विहाय कृष्णसेवां च पीयूषादधिकां प्रियाम्। को मूढो विषमश्नाति विषमं विषयाभिधम्॥
स्वप्नवन्नश्वरं तुच्छमसत्यं नाशकारणम्। (ब्रह्मखण्ड ८। ३३-३६ १/२)

४४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बड़ा मनोहर प्रतीत होता है, जैसे बंसीमें गुंथा हुआ मांस मछलियोंको आपाततः सुखद जान पड़ता है, उसी प्रकार विषयी पुरुषोंको विषयमें सुखकी प्रतीति होती है; परंतु वास्तवमें वह मृत्युका कारण है।*

ब्रह्माजीके सामने वहाँ ऐसी बात कहकर नारदजी चुप हो गये। वे अग्निशिखाके समान तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। पिताको प्रणाम करके चुपचाप खड़े रहे। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजी रोषसे आगबबूला हो उठे। उनका मुँह लाल हो गया। ओठ फड़कने लगे और सारा अङ्ग थर-थर काँपने लगा। ब्रह्मन्! वे पुत्रको शाप देते हुए बोले।

ब्रह्माजीने कहा—नारद! मेरे शापसे तुम्हारे ज्ञानका लोप हो जायगा। तुम कामिनियोंके क्रीडामृग बन जाओगे। उनके वशीभूत होओगे, तुम पचास कामिनियोंके पति बनो। शृङ्गार-शास्त्रके ज्ञाता, शृङ्गार-रसास्वादनके लिये अत्यन्त लोलुप तथा नाना प्रकारके शृङ्गारमें निपुण लोगोंके गुरुके भी गुरु हो जाओगे। गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ पुरुष होओगे। सुमधुरस्वरसे युक्त उत्तम गायक बनोगे। वीणा-वादन-संदर्भमें पारंगत तथा सुस्थिर यौवनसे युक्त होओगे। विद्वान्, मधुरभाषी, शान्त, सुशील, सुन्दर और सुबुद्धि होओगे, इसमें संशय नहीं है। उस समय ‘उपबर्हण’ नामसे तुम्हारी प्रसिद्धि होगी। उन कामिनियोंके साथ युगोंतक निर्जन वनमें विहार करके फिर मेरे शापसे दासीपुत्र होओगे। बेटा! तदनन्तर वैष्णवोंके संसर्गसे और उनकी जूठन खानेसे तुम पुनः श्रीकृष्णकी कृपा प्राप्त करके मेरे पुत्ररूपमें प्रतिष्ठित हो जाओगे। उस समय मैं पुनः तुम्हें दिव्य एवं पुरातन ज्ञान प्रदान करूँगा। इस समय मेरी आँखसे ओझल हो जाओ और अवश्य ही नीचे गिरो।

ब्रह्मन्! पुत्रसे ऐसा कहकर जगत्पति ब्रह्मा चुप हो गये और नारदजी रोने लगे। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर पितासे कहा।

नारद बोले—तात! तात! जगद्गुरो! आप अपने क्रोधको रोकिये। आप स्रष्टा हैं। तपस्वियोंके स्वामी हैं। अहो! मुझपर आपका यह क्रोध अकारण ही हुआ है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह कुमार्गगामी पुत्रको शाप दे अथवा उसका त्याग कर दे। आप पण्डित होकर अपने तपस्वी पुत्रको शाप देना कैसे उचित मानते हैं? ब्रह्मन्! जिन-जिन योनियोंमें मेरा जन्म हो भगवान्‌की भक्ति मुझे कदापि न छोड़े, ऐसा वर प्रदान कीजिये। जगत्स्रष्टाका ही पुत्र क्यों न हो, यदि भगवान् श्रीहरिके चरणोंमें उसकी भक्ति नहीं है तो वह भारतभूमिमें सूअरसे भी बढ़कर अधम


* यथा दीपशिखाग्रं च कीटानां सुमनोहरम्॥
यथा वडिशमांसं च मत्स्यापातसुखप्रदम् । तथा विषयाणां तात विषयं मृत्युकारणम् ॥
(ब्रह्मखण्ड ८। ३७-३८)

ब्रह्मखण्ड ४५

है। जो अपने पूर्वजन्मका स्मरण रखते हुए श्रीहरिकी भक्तिसे युक्त होता है, वह सूअरकी योनियोंमें जन्म ले तो भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उस भजनरूपी कर्मसे वह गोलोकमें चला जाता है। जो गोविन्दके चरणारविन्दोंकी भक्तिरूप मनोवाञ्छित मकरन्दका पान करते रहते हैं, उन वैष्णव आदिके स्पर्शसे सारी पृथ्वी पवित्र हो जाती है। पितामह ! पापी लोग स्नान करके तीर्थोंको जो पाप दे देते हैं, अपने उन पापोंका भी प्रक्षालन करनेके लिये सब तीर्थ वैष्णव महात्माओंका स्पर्श प्राप्त करना चाहते हैं।*

अहो ! भारतवर्षमें श्रीहरिके मन्त्रका उपदेश देने और लेनेमात्रसे कितने ही मनुष्य अपने करोड़ों पूर्वजोंके साथ मुक्त हो गये हैं। मन्त्र ग्रहण करनेमात्रसे मनुष्य करोड़ों जन्मोंके पापसे मुक्त एवं शुद्ध हो जाते हैं और पहलेके कर्मको समूल नष्ट कर देते हैं। जो गुरुपुत्रों, पत्नियों, शिष्यों, सेवकों और भाई-बन्धुओंको उपदेश दे उन्हें सन्मार्गका दर्शन कराता है, उसे निश्चय ही उत्तम गति प्राप्त होती है। परंतु जो गुरु शिष्योंका विश्वासपात्र होकर उन्हें असन्मार्गका दर्शन कराता है—कुमार्गपर चलनेके लिये प्रेरित करता है, वह तबतक कुम्भीपाक नरकमें निवास करता है, जबतक सूर्य और चन्द्रमाका अस्तित्व रहता है। वह कैसा गुरु, कैसा पिता, कैसा स्वामी और कैसा पुत्र है, जो भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी भक्ति देनेमें समर्थ न हो।† चतुरानन ! आपने बिना किसी अपराधके ही मुझे शाप दे दिया है। अतः बदलेमें मैं भी शाप दूँ तो अनुचित न होगा; मेरे शापसे सम्पूर्ण लोकोंमें कवच, स्तोत्र और पूजासहित आपके मन्त्रका निश्चय ही लोप हो जाय। पिताजी ! जबतक तीन कल्प न बीत जायँ, तबतक तीनों लोकोंमें आप अपूज्य बने रहें। तीन कल्प बीत जानेपर आप पूजनीयोंके भी पूजनीय होंगे। सुव्रत ! इस समय आपका यज्ञभाग बंद हो जाय। व्रत आदिमें भी आपका पूजन न हो। केवल एक ही बात रहे—आप देवता आदिके वन्दनीय बने रहें।

पिताके सामने ऐसा कहकर नारदजी चुप हो गये और ब्रह्माजी संतप्त-हृदयसे सभामें सुस्थिर भावसे बैठे रहे। शौनकजी ! पिताके दिये हुए उस शापके ही कारण नारदजी उपबर्हण नामक गन्धर्व तथा दासीपुत्र हुए। तदनन्तर पितासे ज्ञान प्राप्त करके वे फिर महर्षि नारद हो गये। इस प्रसंगका अभी मैं आगे चलकर वर्णन करूँगा।

(अध्याय ८)


* जातिस्मरो हरेर्भक्तियुक्तः शूकरयोनिषु । जनिंर्लभेत स प्रसवी गोलोकं याति कर्मणा ॥
गोविन्दचरणाम्भोजभक्तिमाध्वीकमीप्सितम् । पिबतां वैष्णवादीनां स्पर्शपूता वसुन्धरा ॥
तीर्थानि स्पर्शमिच्छन्ति वैष्णवानां पितामह । पापानां पापिदत्तानां क्षालनायात्मनामपि ॥
(ब्रह्मखण्ड ८ । ५४–५६)

† स किं गुरुः स किं तातः स किं स्वामी स किं सुतः । यः श्रीकृष्णपदाम्भोजे भक्तिं दातुमनीश्वरः ॥
(ब्रह्मखण्ड ८ । ६१)

४६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मरीचि आदि ब्रह्मकुमारों तथा दक्षकन्याओंकी संततिका वर्णन, दक्षके शापसे पीड़ित चन्द्रमाका भगवान् शिवकी शरणमें जाना, अपनी कन्याओंके अनुरोधपर दक्षका चन्द्रमाको लौटा लानेके लिये जाना, शिवकी शरणागतवत्सलता तथा विष्णुकी कृपासे दक्षको चन्द्रमाकी प्राप्ति

सौति कहते हैं—विप्रवर शौनक! तदनन्तर ब्रह्माजीने अपने पुत्रोंको सृष्टि करनेकी आज्ञा दी। नारदको छोड़कर शेष सभी पुत्र सृष्टिके कार्यमें संलग्न हो गये। मरीचिके मनसे प्रजापति कश्यपका प्रादुर्भाव हुआ। अत्रिके नेत्रमलसे क्षीरसागरमें चन्द्रमा प्रकट हुए। प्रचेताके मनसे भी गौतमका प्राकट्य हुआ। मैत्रावरुण पुलस्त्यके मानस पुत्र हैं। मनुसे शतरूपाके गर्भसे तीन कन्याओंका जन्म हुआ—आकूति, देवहूति और प्रसूति। वे तीनों ही पतिव्रता थीं। मनु-शतरूपासे दो मनोहर पुत्र भी हुए, जिनके नाम थे—प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपादके पुत्र ध्रुव हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे। मनुने अपनी पुत्री आकूतिका विवाह प्रजापति रुचिके साथ तथा प्रसूतिका विवाह दक्षके साथ कर दिया। इसी तरह देवहूतिका विवाह-सम्बन्ध उन्होंने कर्दममुनिके साथ किया, जिनके पुत्र साक्षात् भगवान् कपिल हैं। दक्षके वीर्य और प्रसूतिके गर्भसे साठ कन्याओंका जन्म हुआ। उनमेंसे आठ कन्याओंका विवाह दक्षने धर्मके साथ किया, ग्यारह कन्याओंको ग्यारह रुद्रोंके हाथमें दे दिया। एक कन्या सती भगवान् शिवको सौंप दी। तेरह कन्याएँ कश्यपको दे दीं तथा सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको अर्पित कर दीं।

विप्रवर! अब मुझसे धर्मकी पत्नियोंके नाम सुनिये—शान्ति, पुष्टि, धृति, तुष्टि, क्षमा, श्रद्धा, मति और स्मृति। शान्तिका पुत्र संतोष और पुष्टिका पुत्र महान् हुआ। धृतिसे धैर्यका जन्म हुआ। तुष्टिसे दो पुत्र हुए—हर्ष और दर्प। क्षमाका पुत्र सहिष्णु था और श्रद्धाका पुत्र धार्मिक। मतिसे ज्ञान नामक पुत्र हुआ और स्मृतिसे महान् जातिस्मरका जन्म हुआ। धर्मकी जो पहली पत्नी मूर्ति थी, उससे नर-नारायण नामक दो ऋषि उत्पन्न हुए। शौनकजी! धर्मके ये सभी पुत्र बड़े धर्मात्मा हुए।

अब आप सावधान होकर रुद्रपत्नियोंके नाम सुनिये। कला, कलावती, काष्ठा, कालिका, कलहप्रिया, कन्दली, भीषणा, रास्ना, प्रमोचा, भूषणा और शुकी। इन सबके बहुत-से पुत्र हुए, जो भगवान् शिवके पार्षद हैं। दक्षपुत्री सतीने यज्ञमें अपने स्वामीकी निन्दा होनेपर शरीरको त्याग दिया और पुनः हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें अवतीर्ण हो भगवान् शंकरको ही पतिरूपमें प्राप्त किया। धर्मात्मन्! अब कश्यपकी पत्नियोंके नाम सुनिये। देवमाता अदिति, दैत्यमाता दिति, सर्पमाता कद्रू, पक्षियोंकी जननी विनता, गौओं और भैंसोंकी माता सुरभि, सारमेय (कुत्ते) आदि जन्तुओंकी माता सरमा, दानवजननी दनु तथा अन्य पत्नियाँ भी इसी तरह अन्यान्य संतानोंकी जननी हैं। मुने! इन्द्र आदि बारह आदित्य तथा उपेन्द्र (वामन) आदि देवता अदितिके पुत्र कहे गये हैं, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं। ब्रह्मन्! इन्द्रका पुत्र जयन्त हुआ, जिसका जन्म शचीके गर्भसे हुआ था। आदित्य (सूर्य)-की पत्नी तथा विश्वकर्माकी पुत्री सवर्णाके गर्भसे शनैश्चर और यम नामक दो पुत्र तथा कालिन्दी नामवाली एक कन्या हुई। उपेन्द्रके वीर्य और पृथ्वीके गर्भसे मङ्गल नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

तदनन्तर भगवान् उपेन्द्रके अंश और धरणीके गर्भसे मङ्गलके जन्मका प्रसंग सुनाकर सौति बोले—मङ्गलकी पत्नी मेधा हुई, जिसके पुत्र महान् घंटेश्वर तथा विष्णुतुल्य तेजस्वी

ब्रह्मखण्ड ४७


व्रणदाता हुए। दितिसे महाबली हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक पुत्र तथा सिंहिका नामवाली कन्याका जन्म हुआ। सैंहिकेय (राहु) सिंहिकाका ही पुत्र है। सिंहिकाका दूसरा नाम निर्ऋति भी था। इसीलिये राहुको नैर्ऋत कहते हैं। हिरण्याक्षको कोई संतान नहीं थी। वह युवावस्थामें ही भगवान् वाराहके हाथों मारा गया। हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लाद हुए, जो वैष्णवोंमें अग्रगण्य माने गये हैं। उनके पुत्र विरोचन हुए और विरोचनके पुत्र साक्षात् राजा बलि। बलिका पुत्र बाणासुर हुआ, जो महान् योगी, ज्ञानी तथा भगवान् शंकरका सेवक था। यहाँतक दितिका वंश बताया गया। अब कद्रूके वंशका परिचय सुनिये। अनन्त, वासुकि, कालिय, धनञ्जय, कर्कोटक, तक्षक, पद्म, ऐरावत, महापद्म, शंकु, शंख, संवरण, धृतराष्ट्र, दुर्धर्ष, दुर्जय, दुर्मुख, बल, गोक्ष, गोकामुख तथा विरूप आदिको कद्रूने जन्म दिया था। शौनकजी! जितनी सर्प-जातियाँ हैं, उन सबमें प्रधान ये ही हैं। लक्ष्मीके अंशसे प्रकट हुई मनसादेवी कद्रूकी कन्या हैं। ये तपस्विनी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ, कल्याणस्वरूपा और महातेजस्विनी हैं। इन्हींका दूसरा नाम जरत्कारु है। इन्हींके पति मुनिवर जरत्कारु थे, जो नारायणकी कलासे प्रकट हुए थे। विष्णुसुल्य तेजस्वी आस्तीक इन्हीं मनसादेवीके पुत्र हैं। इन सबके नाममात्रसे मनुष्योंका नागोंसे भय दूर हो जाता है। यहाँतक कद्रूके वंशका परिचय दिया गया। अब विनताके वंशका वर्णन सुनिये।

विनताके दो पुत्र हुए—अरुण और गरुड। दोनों ही विष्णु-तुल्य पराक्रमी थे। उन्हीं दोनोंसे क्रमशः सारी पक्षी-जातियाँ प्रकट हुईं। गाय, बैल और भैंसे—ये सुरभिकी श्रेष्ठ संतानें हैं। समस्त सारमेय (कुत्ते) सरमाके वंशज हैं। दनुके वंशमें दानव हुए तथा अन्य स्त्रियोंके वंशज अन्यान्य जातियाँ। यहाँतक कश्यप-वंशका वर्णन किया गया। अब चन्द्रमाका आख्यान सुनिये।

पहले चन्द्रमाकी पत्नियोंके नामोंपर ध्यान दीजिये। फिर पुराणोंमें जो उनका अत्यन्त अपूर्व पुरातन चरित्र है, उसको श्रवण कीजिये। अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पूजनीया साध्वी पुनर्वसु, पुष्या, आश्लेषा, मघा, पूर्वफाल्गुनी, उत्तरफाल्गुनी, हस्ता, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूला, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, श्रवणा, धनिष्ठा, शुभा शतभिषा, पूर्वभाद्रपदा, उत्तरभाद्रपदा तथा रेवती—ये सत्ताईस चन्द्रमाकी पत्नियाँ हैं। इनमें रोहिणीके प्रति चन्द्रमाका विशेष आकर्षण होनेके कारण चन्द्रमाने अन्य सब पत्नियोंकी बड़ी अवहेलना की। तब उन सबने जाकर पिता दक्षको अपना दुःख सुनाया। दक्षने चन्द्रमाको क्षय-रोगसे ग्रस्त होनेका शाप दे दिया। चन्द्रमाने दुःखी होकर भगवान् शंकरकी शरण ली और शंकरने उन्हें आश्रय देकर अपने मस्तकमें स्थान दिया। तबसे उनका नाम 'चन्द्रशेखर' हो गया। देवताओं तथा अन्य लोगोंमें शिवसे बढ़कर शरणागतपालक दूसरा कोई नहीं है।

अपने पतिके रोगमुक्त और शिवके मस्तकमें स्थित होनेकी बात सुनकर दक्षकन्याएँ बारंबार रोने लगीं और तेजस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ पिता दक्षकी शरणमें आयीं। वहाँ जाकर अपने अङ्गोंको बारंबार पीटती हुई वे उच्चस्वरसे रोने लगीं तथा दीनानाथ ब्रह्मपुत्र दक्षसे दीनतापूर्वक कातर वाणीमें बोलीं।

**दक्षकन्याओंने कहा—**पिताजी! हमें स्वामीका सौभाग्य प्राप्त हो, इसी उद्देश्यको लेकर हमने आपसे अपना दुःख निवेदन किया था। परंतु सौभाग्य तो दूर रहे, हमारे सद्गुणशाली स्वामी ही हमें छोड़कर चल दिये। तात! नेत्रोंके रहते हुए भी हमें सारा जगत् अन्धकारपूर्ण दिखायी देता है। आज यह बात समझमें आयी है कि स्त्रियोंका नेत्र वास्तवमें उनका पति ही है। पति ही स्त्रियोंकी गति है, पति ही प्राण तथा सम्पत्ति

४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिका हेतु तथा भवसागरका सेतु भी पति ही है। पति ही स्त्रियोंका नारायण है, पति ही उनका व्रत और सनातन धर्म है। जो पतिसे विमुख हैं, उन स्त्रियोंका सारा कर्म व्यर्थ है। समस्त तीर्थोंमें स्नान, सम्पूर्ण यज्ञोंमें दक्षिणा-वितरण, सम्पूर्ण दान, पुण्यमय व्रत एवं नियम, देवार्चन, उपवास और समस्त तप—ये पतिकी चरण-सेवाजनित पुण्यकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। स्त्रियोंके लिये समस्त बन्धु-बान्धवोंमें अपना पुत्र ही प्रिय होता है; क्योंकि वही स्वामीका अंश है। पति सौ पुत्रोंसे भी बढ़कर है। जो नीच कुलमें उत्पन्न हुई है, वही स्त्री सदा अपने स्वामीसे द्वेष रखती है। जिसका चित्त चञ्चल और दुष्ट है, वही सदा परपुरुषमें आसक्त होती है। पति रोगी, दुष्ट, पतित, निर्धन, गुणहीन, नवयुवक अथवा वृद्ध ही क्यों न हो, साध्वी स्त्रीको सदा उसीकी सेवा करनी चाहिये। कभी भी उसे त्यागना नहीं चाहिये। जो नारी गुणवान् या गुणहीन पतिसे द्वेष रखती या उसे त्याग देती है, वह तबतक कालसूत्र नरकमें पकायी जाती है, जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता रहती है। वहाँ पक्षीके समान कीड़े रात-दिन उसे खाते रहते हैं। वह भूख लगनेपर मुर्देका मांस और मज्जा खाती है तथा प्यास लगनेपर मूत्रका पान करती है। तदनन्तर कोटि-सहस्र जन्मोंतक गीध, सौ जन्मोंतक सूअर, फिर सौ जन्मोंतक शिकारी जीव और उसके बाद बन्धु-हत्यारिन होती है। तत्पश्चात् पहलेके सत्कर्मके प्रभावसे यदि कभी मनुष्य-जन्म पाती है तो निश्चय ही विधवा, धनहीन और रोगिणी होती है। ब्रह्मकुमार! आप हमें पतिदान दीजिये; क्योंकि वह सम्पूर्ण कामनाओंका पूरक होता है। आप ब्रह्माजीके समान फिरसे जगत्‌की सृष्टि करनेमें समर्थ हैं।

कन्याओंका यह वचन सुनकर प्रजापति दक्ष भगवान् शंकरके समीप गये। शंकरजीने उन्हें देखते ही उठकर प्रणाम किया। शिवको प्रणाम करते देख दक्षने दुर्धर्ष क्रोधको त्याग दिया और आशीर्वाद देकर कृपानिधान शंकरसे कहा—आप चन्द्रमाको लौटा दें। शिवने शरणागत चन्द्रमाको त्याग देना स्वीकार नहीं किया, तब दक्ष उन्हें शाप देनेको तैयार हो गये। यह देख शिवने भगवान् विष्णुका स्मरण किया। विष्णु वृद्ध ब्राह्मणके वेषमें आये और शिवसे बोले—'सुरेश्वर! आप चन्द्रमाको लौटा दें और दक्षके शापसे अपनी रक्षा करें।'

शिवने कहा— प्रभो! मैं अपने तप, तेज, सम्पूर्ण सिद्धि, सम्पदा तथा प्राणोंको भी दे दूँगा, परंतु शरणागतका त्याग करनेमें असमर्थ हूँ। जो भयसे ही शरणागतको त्याग देता है, उसे भी धर्म त्याग देता है और अत्यन्त कठोर शाप देकर चला जाता है। जगदीश्वर! मैं सब कुछ त्याग देनेमें समर्थ हूँ, परंतु स्वधर्मका त्याग नहीं कर सकता। जो स्वधर्मसे हीन है, वह सबसे बहिष्कृत है। जो सदा धर्मकी रक्षा करता है, धर्म भी उसकी रक्षा करता है। भगवन्! आप तो धर्मको जानते हैं; फिर क्यों अपनी मायासे मोहित करते हुए मुझसे ऐसी बात कहते हैं। आप सबके स्रष्टा, पालक और अन्ततोगत्वा संहारक हैं। जिसकी आपमें सुदृढ़ भक्ति है, उसे किससे भय हो सकता है।

शंकरजीकी यह बात सुनकर सबके भावको जाननेवाले भगवान् श्रीहरिने चन्द्रमासे चन्द्रमाको खींचकर दक्षको दे दिया। आधे चन्द्रमा भगवान् शिवके मस्तकपर चले गये और वहाँ रोगमुक्त होकर रहने लगे। दूसरे चन्द्रमाको प्रजापति दक्षने ग्रहण किया, जिसे भगवान् विष्णुने दिया था। उस चन्द्रमाको राज-यक्ष्मा रोगसे ग्रस्त देख दक्षने माधवका स्तवन किया। तब श्रीहरिने स्वयं यह

ब्रह्मखण्ड ४९

व्यवस्था की कि एक पक्षमें चन्द्रमा क्रमशः क्षीण होंगे और दूसरे पक्षमें क्रमशः पुष्ट होते हुए परिपूर्ण हो जायँगे। ब्रह्मन्! उन सबको वर देकर श्रीहरि अपने धामको चले गये और दक्षने चन्द्रमाको लेकर उन्हें अपनी कन्याओंको सौंप दिया। चन्द्रमा उन सबको पाकर दिन-रात उनके साथ विहार करने लगे और उसी दिनसे उनको समभावसे देखने लगे। मुने! इस प्रकार मैंने यहाँ सम्पूर्ण सृष्टि-क्रमका कुछ वर्णन किया है। इस प्रसङ्गको पुष्कर-तीर्थमें मुनियोंकी मण्डलीके बीच गुरुजीके मुखसे मैंने सुना था। (अध्याय ९)


जाति और सम्बन्धका निर्णय

तदनन्तर सौतिने मुनिश्रेष्ठ बालखिल्यादि, बृहस्पति, उतथ्य, पराशर, विश्रवा, कुबेर, रावण, कुम्भकर्ण, महात्मा विभीषण, वात्स्य, शाण्डिल्य, सावर्णि, कश्यप तथा भरद्वाज आदिकी; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अनेकानेक वर्णसंकर जातियोंकी उत्पत्तिके प्रसंग सुनाकर कहा—अश्विनीकुमारके द्वारा एक ब्राह्मणीके गर्भसे पुत्रकी उत्पत्ति हुई। इससे उस ब्राह्मणीके पतिने पुत्रसहित पत्नीका त्याग कर दिया। ब्राह्मणी दुःखित हो योगके द्वारा देह त्यागकर गोदावरी नामकी नदी हो गयी। सूर्यनन्दन अश्विनीकुमारने स्वयं उस पुत्रको यत्नपूर्वक चिकित्सा-शास्त्र, नाना प्रकारके शिल्प तथा मन्त्र पढ़ाये। किंतु वह ब्राह्मण निरन्तर नक्षत्रोंकी गणना करने और वेतन लेनेसे वैदिक धर्मसे भ्रष्ट हो इस भूतलपर गणक हो गया। उस लोभी ब्राह्मणने ग्रहणके समय तथा मृतकोंके दान लेनेके समय शूद्रोंसे भी अग्रदान ग्रहण किया था; इसलिये 'अग्रदानी' हुआ। एक पुरुष किसी ब्राह्मणके यज्ञमें यज्ञकुण्डसे प्रकट हुआ। वह धर्मवक्ता 'सूत' कहलाया। वही हम लोगोंका पूर्वपुरुष माना गया है। कृपानिधान ब्रह्माजीने उसे पुराण पढ़ाया। इस प्रकार यज्ञकुण्डसे उत्पन्न सूत पुराणोंका वक्ता हुआ। सूतके वीर्य और वैश्याके गर्भसे एक पुरुषकी उत्पत्ति हुई, जो अत्यन्त वक्ता था। लोकमें उसकी भट्ट (भाट) संज्ञा हुई। वह सभीके लिये स्तुतिपाठ करता है।

यह मैंने भूतलपर जो जातियाँ हैं, उनके निर्णयके विषयमें कुछ बातें बतायी हैं। वर्णसंकर-दोषसे और भी बहुत-सी जातियाँ हो गयी हैं। सभी जातियोंमें जिनका जिनके साथ सर्वथा सम्बन्ध है, उनके विषयमें मैं वेदोक्त तत्त्वका वर्णन करता हूँ—जैसा कि पूर्वकालमें ब्रह्माजीने कहा था। पिता, तात और जनक—ये शब्द जन्मदाताके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। अम्बा, माता, जननी और प्रसू—इनका प्रयोग गर्भधारिणीके अर्थमें होता है। पिताके पिताको पितामह कहते हैं और पितामहके पिताको प्रपितामह। इनसे ऊपरके जो कुटुम्बीजन हैं, उन्हें सगोत्र कहा गया है। माताके पिताको मातामह कहते हैं, मातामहके पिताकी संज्ञा प्रमातामह है और प्रमातामहके पिताको वृद्धप्रमातामह कहा गया है। पिताकी माताको पितामही और पितामहीकी सासको प्रपितामही कहते हैं। प्रपितामहीकी सासको वृद्धप्रपितामही जानना चाहिये। माताकी माता मातामही कही गयी है। वह माताके समान ही पूजित होती है। प्रमातामहकी पत्नीको प्रमातामही समझना चाहिये। प्रमातामहके पिताकी स्त्री वृद्धप्रमातामही जानने योग्य है। पिताके भाईको पितृव्य (ताऊ, चाचा) और माताके भाईको मातुल (मामा) कहते हैं। पिताकी बहिन पितृष्वसा (फुआ) कही गयी है और माताकी बहिन मासुरी (मातृष्वसा या मौसी)। सूनु, तनय, पुत्र, दायाद

५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


और आत्मज—ये बेटेके अर्थमें परस्पर पर्यायवाची शब्द हैं। अपनेसे उत्पन्न हुए पुरुष (पुत्र)-के अर्थमें धनभाक् और वीर्यज शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। उत्पन्न की गयी पुत्रीके अर्थमें दुहिता, कन्या और आत्मजा शब्द प्रचलित हैं। पुत्रकी पत्नीको वधू (बहू) जानना चाहिये और पुत्रीके पतिको जामाता (दामाद)। प्रियतम पतिके अर्थमें पति, प्रिय, भर्ता और स्वामी आदि शब्द प्रयुक्त होते हैं। पतिके भाईको देवर कहा गया है और पतिकी बहिनको ननान्दा (ननद), पतिके पिताको श्वशुर और पतिकी माताको श्वश्रू (सास) कहते हैं। भार्या, जाया, प्रिया, कान्ता और स्त्री—ये पत्नीके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। पत्नीके भाईको श्यालक (साला) और पत्नीकी बहिनको श्यालिका (साली) कहते हैं। पत्नीकी माताको श्वश्रू (सास) तथा पत्नीके पिताको श्वशुर कहा गया है। सगे भाईको सोदर और सगी बहिनको सोदरा या सहोदरा कहते हैं। बहिनके बेटेको भागिनेय (भगिना या भानजा) कहते हैं और भाईके बेटेको भ्रातृज (भतीजा)। बहनोईके अर्थमें आबुत्त (भगिनीकान्त और भगिनीपति) आदि शब्दोंका प्रयोग होता है। सालीका पति (साढू) भी अपना भाई ही है; क्योंकि दोनोंके ससुर एक हैं। मुने! श्वशुरको भी पिता जानना चाहिये। वह जन्मदाता पिताके ही तुल्य है। अन्नदाता, भयसे रक्षा करनेवाला, पत्नीका पिता, विद्यादाता और जन्मदाता—ये पाँच मनुष्योंके पिता हैं। अन्नदाताकी पत्नी, बहिन, गुरु-पत्नी, माता, सौतेली माँ, बेटी, बहू, नानी, दादी, सास, माताकी बहिन, पिताकी बहिन, चाची और मामी—ये चौदह माताएँ हैं। पुत्रके पुत्रके अर्थमें पौत्र शब्दका प्रयोग होता है तथा उसके भी पुत्रके अर्थमें प्रपौत्र शब्दका। प्रपौत्रके भी जो पुत्र आदि हैं, वे वंशज तथा कुलज कहे गये हैं। कन्याके पुत्रको दौहित्र कहते हैं और उसके जो पुत्र आदि हैं, वे बान्धव कहे गये हैं। भानजेके जो पुत्र आदि पुरुष हैं, उनकी भी बान्धव संज्ञा है। भतीजेके जो पुत्र आदि हैं, वे ज्ञाति माने गये हैं। गुरुपुत्र तथा भाई—इन्हें पोष्य एवं परम बान्धव कहा गया है। मुने! गुरुपुत्री और बहिनको भी पोष्या तथा मातृतुल्या माना गया है। पुत्रके गुरुको भी भ्राता मानना चाहिये। वह पोष्य तथा सुस्निग्ध बान्धव कहा गया है। पुत्रके श्वशुरको भी भाई समझना चाहिये। वह वैवाहिक बन्धु माना गया है। बेटीके श्वशुरके साथ भी यही सम्बन्ध बताया गया है। कन्याका गुरु भी अपना भाई ही है। वह सुस्निग्ध बान्धव माना गया है। गुरु और श्वशुरके भाइयोंका भी सम्बन्ध गुरुतुल्य ही कहा गया है। जिसके साथ बन्धुत्व (भाईका-सा व्यवहार) हो, उसे मित्र कहते हैं। जो सुख देनेवाला है, उसे मित्र जानना चाहिये और जो दुःख देनेवाला है, वह शत्रु कहलाता है। दैववश कभी बान्धव भी दुःख देनेवाला हो जाता है और जिससे कोई भी सम्बन्ध नहीं है, वह सुखदायक बन जाता है। विप्रवर! इस भूतलपर मनुष्योंके विद्याजनित, योनिजनित और प्रीतिजनित—ये तीन प्रकारके सम्बन्ध कहे गये हैं। मित्रताके सम्बन्धको प्रीतिजनित सम्बन्ध जानना चाहिये। वह सम्बन्ध परम दुर्लभ है। मित्रकी माता और मित्रकी पत्नी—ये माताके तुल्य हैं, इसमें संशय नहीं है। मित्रके भाई और पिता मनुष्योंके लिये चाचा, ताऊके समान आदरणीय हैं। (अध्याय १०)

ब्रह्मखण्ड ५१ सूर्यके अनुरोधसे सुतपाका अश्विनीकुमारोंको शापमुक्त करना तथा संध्यानिरत वैष्णव ब्राह्मणकी प्रशंसा शौनकजीने पूछा—महाभाग सूतनन्दन ! उस ब्राह्मणने अपनी पत्नीका त्याग करके शेष जीवनमें कौन-सा कार्य किया ? अश्विनीकुमारोंके नाम क्या हैं ? वे दोनों किसके वंशज हैं ? सौति बोले— ब्रह्मन् ! उन ब्राह्मणदेवताका नाम सुतपा था। वे भरद्वाजकुलमें उत्पन्न बहुत बड़े मुनि थे। उन्होंने पहले हिमालयपर रहकर भगवान् श्रीकृष्ण (विष्णु)-की प्रसन्नताके लिये दीर्घकालतक तपस्या की थी। उस समय वे महातपस्वी और तेजस्वी मुनि ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान दिखायी देते थे। एक दिन उन्हें सहसा आकाशमें क्षणभरके लिये श्रीकृष्ण-ज्योतिका दर्शन हुआ। उस बेलामें उन्होंने भगवान्‌से यह वर माँगा—'प्रभो! मैं आत्मनिष्ठ हो प्रकृतिसे परे सर्वथा निर्लिप्त रहूँ।' उन्होंने मोक्ष नहीं माँगा, भगवान्‌से उनकी अविचल दास्य-भक्तिके लिये याचना की। तब आकाशवाणी हुई—'ब्रह्मन् ! पहले स्त्री-परिग्रह (विवाह) करो। उसके बाद भोग-सम्बन्धी प्रारब्धके क्षीण हो जानेपर मैं तुम्हें अपनी दास्य-भक्ति दूँगा।' तदनन्तर स्वयं ब्रह्माजीने उन्हें पितरोंकी मानसी कन्या प्रदान की। मुनिप्रवर शौनक ! उसके गर्भसे 'कल्याणमित्र' नामक पुत्रका जन्म हुआ। उस बालकके स्मरणमात्रसे किसीको अपने ऊपर वज्र या बिजली गिरनेका भय नहीं रहता। इतना ही नहीं, कल्याणमित्रके स्मरणसे निश्चय ही उन बन्धुजनोंकी भी प्राप्ति हो जाती है, जिनका दर्शन असम्भव होता है। तदनन्तर महामुनि सुतपाने किसी कारणवश कल्याणमित्रकी माताका परित्याग करके उसी समय सहसा पूर्वापराधका स्मरण हो आनेसे सूर्यपुत्र अश्विनीकुमारको भी शाप दिया—'देवाधम ! तू अपने भाईके साथ यज्ञभागसे वञ्चित और अपूज्य हो जा। तेरा अङ्ग व्याधिग्रस्त और जड हो जाय। तू अकीर्तिमान् (कलंकयुक्त) हो जा।' यों कहकर सुतपा अपने पुत्र कल्याणमित्रके साथ घर चले गये। तब सूर्यदेवता दोनों अश्विनीकुमारोंके साथ उनके निकट गये। शौनक ! त्रिलोकीनाथ सूर्यने अपने रोगग्रस्त पुत्रोंके साथ मुनिवर सुतपाका दर्शन करके उनकी स्तुति करते हुए कहा। सूर्य बोले— भगवन् ! युग-युगमें प्रकट होनेवाले विष्णुस्वरूप ब्राह्मणदेवता ! मुनीश्वर भारद्वाज ! आप मेरे पुत्रोंका अपराध क्षमा करें। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर आदि सब देवता सदा ब्राह्मणके ही दिये हुए फल, फूल और जल आदिका उपभोग करते हैं। ब्राह्मणोंद्वारा ही आवाहित हुए देवता सदा सब लोकोंमें पूजित होते हैं। ब्राह्मणसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् श्रीहरि ही प्रकट होते हैं। ब्राह्मणके संतुष्ट होनेपर साक्षात् नारायणदेव संतुष्ट होते हैं तथा नारायणदेवके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं। गङ्गाजीके समान कोई तीर्थ नहीं है। भगवान् श्रीकृष्ण (विष्णु)- से बढ़कर कोई देवता नहीं है। शंकरजीसे बड़ा वैष्णव नहीं है और पृथ्वीसे बढ़कर कोई सहनशील नहीं है। सत्यसे बड़ा कोई धर्म नहीं है। पार्वतीजीसे बढ़कर सती-साध्वी स्त्री नहीं है। दैवसे बड़ा कोई बलवान् नहीं है तथा पुत्रसे अधिक दूसरा कोई प्रिय नहीं है। रोगके समान शत्रु, गुरुसे बढ़कर पूजनीय, माताके तुल्य बन्धु तथा पितासे बढ़कर दूसरा कोई मित्र नहीं है। सूर्यका यह वचन सुनकर भारद्वाज सुतपा मुनिने उनको प्रणाम किया और अपनी तपस्याके फलसे उनके दोनों पुत्रोंको रोगमुक्त कर दिया। फिर कहा—'देवेश्वर ! आगे चलकर आपके दोनों पुत्र यज्ञभागके अधिकारी होंगे।' यों कह सुतपा-

५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मुनिने भगवान् सूर्यको प्रणाम किया और तपस्याके क्षीण होनेके भयसे भयभीत हो श्रीहरिकी सेवामें मन लगाकर गङ्गातटको प्रस्थान किया। तत्पश्चात् भगवान् सूर्य दोनों पुत्रोंके साथ अपने धामको चले गये। विद्वान् हो या विद्याहीन, जो ब्राह्मण प्रतिदिन संध्यावन्दन करके पवित्र होता है, वही भगवान् विष्णुके समान वन्दनीय है। यदि वह भगवान्‌से विमुख हो तो आदरका पात्र नहीं है। जो एकादशीको भोजन नहीं करता और प्रतिदिन श्रीकृष्णकी आराधना करता है, उस ब्राह्मणका चरणोदक पाकर कोई भी स्थान निश्चय ही तीर्थ बन जाता है। जो नित्यप्रति भगवान्‌को भोग लगाकर उनका उच्छिष्ट भोजन करता है तथा उनके नैवेद्यको मुखमें ग्रहण करता है, वह इस भूतलपर परम पवित्र एवं जीवन्मुक्त है। कुलीन द्विजोंका जो अन्न-जल भगवान् विष्णुको अर्पित नहीं किया गया, वह मल-मूत्रके समान है- ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। ब्रह्माजी तथा उनके पुत्र सनकादि-सभी विष्णुपरायण हैं; फिर उन्हींके कुलमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण श्रीहरिसे विमुख कैसे हो सकता है? माता-पिता, नाना आदि अथवा गुरुके संसर्ग-दोषसे भी जो ब्राह्मण श्रीहरिसे विमुख हो जाते हैं, वे जीते-जी ही मुर्देके समान हैं। वह कैसा गुरु, कैसा पिता, कैसा पुत्र, कैसा मित्र, कैसा राजा तथा कैसा बन्धु है, जो श्रीहरिके भजनकी बुद्धि (सलाह) नहीं देता ? विप्रवर ! अवैष्णव ब्राह्मणसे वैष्णव चाण्डाल श्रेष्ठ है; क्योंकि वह वैष्णव चाण्डाल अपने बन्धुगणोंसहित संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है और वह अवैष्णव ब्राह्मण नरकमें पड़ता है*। ब्रह्मन् ! जो प्रतिदिन संध्या-वन्दन नहीं करता अथवा भगवान् विष्णुसे विमुख रहता है, वह सदा अपवित्र माना गया है। जैसे विषहीन सर्पको सर्पाभासमात्र कहा गया है, उसी तरह संध्याकर्म तथा भगवद्भक्तिसे हीन ब्राह्मण ब्राह्मणाभासमात्र है। वैष्णव पुरुष अपने कुलकी करोड़ों और नाना आदिकी सैकड़ों पीढ़ियोंके साथ भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। वैष्णवजन सदा गोविन्दके चरणारविन्दोंका ध्यान करते हैं और भगवान् गोविन्द सदा उन वैष्णवोंके निकट रहकर उन्हींका ध्यान किया करते हैं।† भक्तोंकी रक्षाके लिये सुदर्शनचक्रको नियुक्त करके भी श्रीहरि निश्चिन्त नहीं होते हैं; इसलिये स्वयं भी उनके पास मौजूद रहते हैं। (अध्याय ११) ब्रह्माजीकी अपूज्यताका कारण, गन्धर्वराजकी तपस्यासे संतुष्ट हुए भगवान् शंकरका उन्हें अभीष्ट वर देना तथा नारदजीका उनके पुत्ररूपसे उत्पन्न हो उपबर्हण नामसे प्रसिद्ध होना तदनन्तर शौनकजीके पूछनेपर सौतिने कहा- ब्रह्मन् ! हंस, यति, अरणि, वोढु, पञ्चशिख, अपान्तरतमा तथा सनक आदि-इन सबको छोड़कर अन्य सभी ब्रह्मकुमार, जिनकी संख्या बहुत अधिक थी, सदा सांसारिक कार्योंमें संलग्न हो प्रजाकी सृष्टि करके गुरुजनों (पिता आदि)-

  • स किं गुरुः स किं तातः स किं पुत्रः स किं सखा। स किं राजा स किं बन्धुर्न दद्याद् यो हरौ मतिम् ॥ अवैष्णवाद् द्विजाद् विप्र चण्डालो वैष्णवो वरः । सगणः श्वपचो मुक्तो ब्राह्मणो नरकं व्रजेत् ॥ (ब्रह्मखण्ड ११। ३८-३९) † ध्यायन्ते वैष्णवाः शश्वद्गोविन्दपादपङ्कजम् । ध्यायते तांश्च गोविन्दः शश्वत् तेषां च संनिधौ ॥ (ब्रह्मखण्ड ११। ४४)

१५- ब्राह्मणद्वारा अपनी शक्तिका परिचय, मृतकको जीवित करनेका आश्वासन, मालावतीका पतिके महत्त्वको बताना और काल, यम, मृत्युकन्या आदिको ब्राह्मणद्वारा बुलवाकर उनसे बात करना, यम आदिका अपनेको ईश्वरकी आज्ञाका पालक बताना और उसे ‘श्रीकृष्णचिन्तन’के लिये प्रेरित करना

ब्रह्मखण्ड ५३


की आज्ञाका पालन करने लगे। स्वयं प्रजापति ब्रह्मा अपने पुत्र नारदके शापसे अपूज्य हो गये। इसीलिये विद्वान् पुरुष ब्रह्माजीके मन्त्रकी उपासना नहीं करते। नारदजी अपने पिताके शापसे उपबर्हण नामक गन्धर्व हो गये। उनके वृत्तान्तका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ; सुनिये।

इन दिनों जो गन्धर्वराज थे, वे सब गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ और महान् थे, उच्चकोटिके ऐश्वर्यसे सम्पन्न थे, परंतु किसी कर्मवश पुत्र-सुखसे वञ्चित थे। एक समय गुरुकी आज्ञा लेकर वे पुष्करतीर्थमें गये और वहाँ उत्तम समाधि लगाकर (अथवा अत्यन्त एकाग्रतापूर्वक) भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये तप करने लगे। उस समय उनके मनमें बड़ी दीनता थी, वे दयनीय हो रहे थे। कृपानिधान वसिष्ठ मुनिने गन्धर्वराजको शिवके कवच, स्तोत्र तथा द्वादशाक्षर-मन्त्रका उपदेश दिया। दीर्घकालतक निराहार रहकर उपासना एवं जप-तप करनेपर भगवान् शिवने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये। नित्य तेजःस्वरूप सनातन भगवान् शिव ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान हो दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले वे भगवान् तपोरूप हैं, तपस्याके बीज हैं, तपका फल देनेवाले हैं और स्वयं ही तपस्याके फल हैं। शरणमें आये हुए भक्तको वे समस्त सम्पत्तियाँ प्रदान करते हैं। उस समय वे दिगम्बर-वेषमें वृषभपर आरूढ थे, उन्होंने हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश ले रखे थे। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल थी। उनके तीन नेत्र थे और उन्होंने मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट धारण कर रखा था। उनका जटाजूट तपाये हुए सुवर्णकी प्रभाको छीने लेता था। कण्ठमें नील चिह्न और कंधेपर नागका यज्ञोपवीत शोभा दे रहा था। सर्वज्ञ शिव सबके संहारक हैं। वे ही काल और मृत्युञ्जय हैं। वे परमेश्वर ग्रीष्म-ऋतुकी दोपहरिके करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी थे। शान्तस्वरूप शिव तत्त्वज्ञान, मोक्ष तथा हरिभक्ति प्रदान करनेवाले हैं।

उन्हें देखते ही गन्धर्वने सहसा दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर प्रणाम किया और वसिष्ठजीके दिये हुए स्तोत्रसे उन परमेश्वरका स्तवन किया। तब कृपानिधान शिव उससे बोले—'गन्धर्वराज! तुम कोई वर माँगो।' तब गन्धर्वने उनसे भगवान् श्रीहरिकी भक्ति तथा परम वैष्णव पुत्रकी प्राप्तिका वर माँगा। गन्धर्वकी बात सुनकर दीनोंके स्वामी दीनबन्धु सनातन भगवान् चन्द्रशेखर हँसे और उस दीन सेवकसे बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा— गन्धर्वराज! तुमने जो एक वर (हरिभक्ति)-को माँगा है, उसीसे तुम कृतार्थ होओगे। दूसरा वर तो चबाये हुएको चबानामात्र है। वत्स! जिसकी श्रीहरिमें सुदृढ़ एवं सर्वमङ्गलमयी भक्ति है, वह खेल-खेलमें ही सब कुछ करनेमें समर्थ है। भगवद्भक्त पुरुष अपने कुलकी और नानाके कुलकी असंख्य पीढ़ियोंका उद्धार करके निश्चय ही गोलोकमें जाता है। करोड़ों जन्मोंमें उपार्जित त्रिविध

५४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

पापोंका नाश करके वह अवश्य ही पुण्यभोग तथा श्रीहरिकी सेवाका सौभाग्य पाता है। मनुष्योंको तभीतक पत्नीकी इच्छा होती है, तभीतक पुत्र प्यारा लगता है, तभीतक ऐश्वर्यकी प्राप्ति अभीष्ट होती है और तभीतक सुख-दुःख होते हैं, जबतक कि उनका मन श्रीकृष्णमें नहीं लगता। श्रीकृष्णमें मन लगते ही भक्तिरूपी दुर्लङ्घ्य खड्ग मानवोंके कर्ममय वृक्षोंका मूलोच्छेद कर डालता है। जिन पुण्यात्माओंके पुत्र परम वैष्णव होते हैं, उनके वे पुत्र लीलापूर्वक कुलकी बहुसंख्यक पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं। अहो! एक वरसे ही कृतार्थ हुआ पुरुष यदि दूसरा वर चाहता है तो मुझे आश्चर्य होता है। दूसरे वरकी क्या आवश्यकता है? लोगोंको मङ्गलकी प्राप्तिसे तृप्ति नहीं होती है। हमारे पास वैष्णवोंके लिये परम दुर्लभ धन संचित है। श्रीकृष्णकी भक्ति एवं दास्य-सुख हमलोग दूसरोंको देनेके लिये उत्सुक नहीं होते। वत्स! जो तुम्हारे मनमें अभीष्ट हो, ऐसा कोई दूसरा वर माँगो अथवा इन्द्रत्व, अमरत्व या दुर्लभ ब्रह्मपद प्राप्त करो। मैं तुम्हें सम्पूर्ण सिद्धियाँ, महान् योग और मृत्युञ्जय आदि ज्ञान यह सब कुछ सुखपूर्वक दे दूँगा, किंतु यहाँ श्रीहरिका दासत्व माँगनेका आग्रह छोड़ दो, क्षमा करो।

भगवान् शंकरकी यह बात सुनकर गन्धर्वके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये। वह अत्यन्त दीनभावसे सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता दीनेश्वर शिवसे बोला।

**गन्धर्वने कहा—**प्रभो! जिसका ब्रह्माजीकी दृष्टि पड़ते ही पतन हो जाता है, वह ब्रह्मपद स्वप्नके समान मिथ्या एवं क्षणभङ्गुर है। श्रीकृष्णभक्त उसे नहीं पाना चाहता। शिव! इन्द्रत्व, अमरत्व, सिद्धियोग आदि अथवा मृत्युञ्जय आदि ज्ञानकी प्राप्ति भी श्रीकृष्णभक्तको अभीष्ट नहीं है। श्रीहरिके सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य और सायुज्यको तथा निर्वाणमोक्षको भी वैष्णवजन नहीं लेना चाहते।* भगवान्‌की अविचल भक्ति तथा उनका परम दुर्लभ दास्य प्राप्त हो—यही सोते, जागते हर समय भक्तोंकी इच्छा रहती है। अतः यही हमारे लिये श्रेष्ठ वर है। प्रभो! आप याचकोंके लिये कल्पवृक्ष हैं; अतः मुझे वरके रूपमें श्रीहरिका दास्य-सुख तथा वैष्णव पुत्र प्रदान कीजिये। आपको संतुष्ट पाकर जो दूसरा कोई वर माँगता है, वह बर्बर है। शम्भो! यदि आप मुझे दुष्कर्मी मानकर यह उपर्युक्त वर नहीं देंगे तो मैं अपना मस्तक काटकर अग्निमें होम दूँगा।

गन्धर्वकी यह बात सुनकर भक्तोंके स्वामी तथा भक्तपर अनुग्रह करनेवाले कृपानिधान भगवान् शंकर उस दीन भक्तसे इस प्रकार बोले।

**भगवान् शंकरने कहा—**गन्धर्वराज! भगवान् विष्णुकी भक्ति, उनके दास्य-सुख तथा परम वैष्णव पुत्रकी प्राप्ति—इस श्रेष्ठ वरको उपलब्ध करो, खिन्न न होओ। तुम्हारा पुत्र वैष्णव होनेके साथ ही दीर्घायु, सद्गुणशाली, नित्य सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न, ज्ञानी, परम सुन्दर, गुरुभक्त तथा जितेन्द्रिय होगा।

मुने! ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहाँसे अपने धामको चले गये और गन्धर्वराज संतुष्ट होकर अपने घरको लौटे। अपने कर्ममें सफलता प्राप्त होनेपर सभी मानवोंके मानस-पङ्कज खिल उठते हैं। उस गन्धर्वराजकी पत्नीके गर्भसे भारतवर्षमें नारदजीने ही जन्म लिया। उस वृद्धा गन्धर्वपत्नीने गन्धमादन पर्वतपर अपने पुत्रका प्रसव किया था। उस समय गुरुदेव भगवान् वसिष्ठने यथोचित रीतिसे बालकका नामकरण-संस्कार किया। उस बालकका वह मङ्गलमय


* सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसायुज्यं श्रीहरेरपि। तत्र निर्वाणमोक्षं च न हि वाञ्छन्ति वैष्णवाः॥
(ब्रह्मखण्ड १२। ३५)

१६- मालावतीके पूछनेपर ब्राह्मणद्वारा वैद्यक-संहिताका वर्णन, आयुर्वेदकी आचार्यपरम्परा, उसके सोलह प्रमुख विद्वानों तथा उनके द्वारा रचित तन्त्रोंका नाम-निर्देश, ज्वर आदि चौंसठ रोग, उनके हेतुभूत वात, पित्त, कफकी उत्पत्तिके कारण और उनके निवारणके उपायोंका विवेचन

ब्रह्मखण्ड ५५

संस्कार मङ्गलके दिन सम्पन्न हुआ। 'उप' शब्द अधिक अर्थका बोधक है और पुँल्लिङ्ग 'बर्हण' शब्द पूज्य-अर्थमें प्रयुक्त होता है। यह बालक पूज्य पुरुषोंमें सबसे अधिक है; इसलिये इसका नाम 'उपबर्हण' होगा—ऐसा वसिष्ठजीने कहा।
(अध्याय १२)


ब्रह्माजीके शापसे उपबर्हणका योगधारणाद्वारा अपने शरीरको त्याग देना, मालावतीका विलाप एवं प्रार्थना करना, देवताओंको शाप देनेके लिये उद्यत होना, आकाशवाणीद्वारा भगवान्‌का आश्वासन पाकर देवताओंका कौशिकीके तटपर मालावतीके दर्शन करना

सौति कहते हैं—शौनक! अपने यहाँ पुत्र-जन्मके उत्सवमें गन्धर्वराजने बड़ी प्रसन्नताके साथ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न और धन दिये। समयानुसार बड़े होनेपर उपबर्हणने वसिष्ठजीके द्वारा परम दुर्लभ हरि-मन्त्रकी दीक्षा पाकर दुष्कर तपस्या प्रारम्भ की। एक समयकी बात है, वे गण्डकीके तटपर विराजमान थे। उन्हें युवावस्था प्राप्त हो चुकी थी। उस समय पचास गन्धर्वकन्याओंने उन्हें देखा। देखते ही वे सब-की-सब मोहित हो गयीं। उन सबने उपबर्हणको पतिरूपमें प्राप्त करनेका संकल्प ले योगशक्तिसे प्राणोंको त्याग दिया और चित्ररथ गन्धर्वके घर जन्म लेकर पिताकी आज्ञासे उनके साथ विवाह कर लिया। उपबर्हणने दीर्घकालतक उन सबके साथ विहार किया। चिरकालतक निरन्तर उनके साथ राज्य करके एक दिन वे ब्रह्माजीके स्थानपर गये और वहाँ श्रीहरिका यशोगान करने लगे। वहीं रम्भाको नृत्य करते देख उपबर्हणके मनमें वासना जाग उठी और उनका वीर्य स्खलित हो गया। इससे उनकी बड़ी हँसी हुई और ब्रह्माजीने उन्हें शाप देते हुए कहा—'तुम गन्धर्व-शरीरको त्याग दो और शूद्रयोनिको प्राप्त हो जाओ। फिर समयानुसार वैष्णवोंका संसर्ग प्राप्त कर तुम पुनः मेरे पुत्रके रूपमें प्रतिष्ठित हो जाओगे। बेटा! विपत्तिका सामना किये बिना पुरुषोंकी महत्ता प्रकट नहीं होती। संसारमें सभीको बारी-बारीसे सुख और दुःख प्राप्त होते हैं।'

ऐसा कहकर ब्रह्माजी पुष्करसे अपने धामको चले गये और उपबर्हण गन्धर्वने तत्काल उस शरीरको इस प्रकारसे त्याग दिया—मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा नामवाले छः चक्रोंका क्रमशः भेदन करके उन्होंने इडा आदि नाड़ियोंका भेदन आरम्भ किया। इडा, सुषुम्णा, मेधा, पिङ्गला, प्राणहारिणी, सर्वज्ञानप्रदा, मनःसंयमनी, विशुद्धा, निरुद्धा, वायुसंचारिणी, तेजः-शुष्ककरी, बलपुष्टिकरी, बुद्धिसंचारिणी, ज्ञानजृम्भन-कारिणी, सर्वप्राणहरा तथा पुनर्जीवनकारिणी—इन सोलह नाड़ियोंका भेदन करके मनसहित जीवात्माको ब्रह्मरन्ध्रमें लाकर वे योगासनसे बैठ गये और दो घड़ीतक उन्होंने आत्माको आत्मामें ही लगाया। तत्पश्चात् वे जातिस्मर (पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाले) योगिराज उपबर्हण ब्रह्मभावको प्राप्त हो गये। तीन तारवाली दुर्लभ वीणाको बायें कंधेपर रखकर दाहिने हाथमें शुद्ध स्फटिककी माला लिये वे वेदके सारतत्त्व तथा उद्धारके उत्तम बीजरूप परात्पर परब्रह्ममय (कृष्ण) इन दो अक्षरोंका जप करने लगे। उन्होंने कुशकी चटाईपर पूर्वकी ओर सिरहाना करके पश्चिम दिशाकी ओर दोनों चरण फैला दिये और इस तरह सो गये, मानो कोई पुरुष सो रहा हो।

उनके पिता गन्धर्वराजने उन्हें इस प्रकार देहत्याग करते देख स्वयं भी अपनी पत्नीके साथ

५६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मन-ही-मन श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए योगधारणाद्वारा प्राण त्याग दिये और परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लिया। उस समय उपबर्हणके सभी भाई-बन्धु और पत्नियाँ बारंबार विलाप करते हुए जोर-जोरसे रोने लगे। विष्णुकी मायासे मोहित होनेके कारण शोकसे पीड़ित हो वे उनके शरीरके पास गये। उपबर्हणकी पचास पत्नियोंमें जो उनकी परम प्रेयसी तथा प्रधान पटरानी थी, वह सती साध्वी मालावती अपने प्रियतमको छातीसे लगाकर अत्यन्त उच्च-स्वरसे रोदन करने लगी।

भाँति-भाँतिसे करुण विलाप करके मालावती बोली— कमलोद्भव ब्रह्माजीका यह कथन है कि मुझ सती-साध्वी, कुलीन नारियोंके लिये उसके पतिके सिवा दूसरा कोई विशिष्ट बान्धव नहीं दिखायी देता। अतः हे दिशाओंके स्वामी दिक्पालो! हे धर्म! हे प्रजापते! हे गिरीश शंकर! तथा हे कमलाकान्त नारायण! आपलोग मुझे पति-दान दीजिये।

ऐसा कहकर विरहसे आतुर हुई चित्ररथकी कन्या मालावती वहीं उस दुर्गम गहन वनमें मूर्च्छित हो गयी। प्रियतमको अपने वक्षःस्थलसे लगाकर पूरे एक दिन और एक रात वह अचेत-अवस्थामें वहाँ पड़ी रही। उस समय सम्पूर्ण देवताओंने उसकी रक्षा की। प्रातःकाल फिर होशमें आनेपर वह पुनः जोर-जोरसे विलाप करने लगी। उस सतीने श्रीहरिको सम्बोधित करके पुनः वहाँ इस प्रकार कहा।

मालावती बोली— हे श्रीकृष्ण! आप सम्पूर्ण जगत्के नाथ (स्वामी तथा संरक्षक) हैं। नाथ! मैं जगत्से बाहर नहीं हूँ। प्रभो! आप ही जगत्के पालक हैं। फिर मेरा पालन क्यों नहीं कर रहे हैं! ‘यह पति है और मैं इसकी स्त्री हूँ’। इस प्रकार जो ‘इदम्’ और ‘मम’ का भाव उत्पन्न होता है, वह आपकी मायाकी ही करामात है। आप ही सबके स्वामी हैं और ऐसा होना ही अधिक सम्भव है; क्योंकि आप ही सबके कारण हैं। कर्मके फलसे गन्धर्व उपबर्हण मेरे प्रियतम पति हुए और कर्मवश ही मैं उनकी प्रियतमा पत्नी हुई। अब कर्मभोगके अन्तमें वे मुझ प्रियाको किस स्थानमें रखकर कहाँ चले गये? अथवा प्रभो! कौन किसका पति या पुत्र है? तथा कौन किसकी प्रिया है? विधाता ही कर्मके अनुसार प्राणियोंको एक-दूसरेसे संयुक्त और वियुक्त करता रहता है। संयोगमें परम आनन्द मिलता है और वियोगमें प्राणोंपर संकट उपस्थित हो जाता है। संसारमें सदा मूर्ख और अज्ञानीके ही जीवनमें ऐसी बात देखी जाती है। आत्माराम महात्माके हृदयपर निश्चय ही संयोग-वियोगका वैसा प्रभाव नहीं पड़ता। विषय नाशवान् हैं, यह बात सर्वथा सत्य है, तथापि भूतलपर विषयभोग ही बान्धव बना हुआ है। यदि विषयभोगको स्वयं त्याग दिया जाय तो वह सुखका ही कारण होता है। परंतु जब दूसरे लोग बलपूर्वक उसका त्याग करवाते हैं, तब वह दुःखदायी जान पड़ता है। इसीलिये साधु पुरुष महान्-से-महान् मनोवाञ्छित ऐश्वर्यको स्वयं त्यागकर भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका, जहाँ आपत्ति या विपत्तिकी पहुँच नहीं है, सदा चिन्तन करते हैं। ज्ञानवान् संत पुरुष तो सर्वत्र हैं, परंतु भूतलपर ज्ञानवती स्त्री कौन है? अतः मुझ मूढ़ अबलाको आप मनोवाञ्छित पति प्रदान करें। मैं अमरत्व नहीं चाहती, इन्द्रपदकी इच्छा नहीं रखती और मोक्षके मार्गमें भी मेरी रुचि नहीं है; अतः आप मेरे इन श्रेष्ठ प्राणवल्लभको ही मुझे लौटा दें; क्योंकि ये मेरे लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाले श्रेष्ठ देवता हैं।

ब्रह्मखण्ड ५७


जगदीश्वर ! पृथ्वीपर जितनी भी स्त्री-जातियाँ हैं, उनमेंसे किसीको भी विधाताने इन गन्धर्वकुमारके समान गुणवान् पति नहीं दिया है।

इसके अनन्तर मालावती अपने स्वामीके गुणोंका बखान करने लगी और अन्तमें सहसा कुपित हो नारायण, ब्रह्मा, महादेव तथा धर्म आदि समस्त देवताओंको सम्बोधित करके उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गयी। तब ब्रह्मा आदि देवताओंने क्षीरसागरके तटपर जाकर भगवान् विष्णुकी शरण ली और मालावतीके भीषण शापसे बचानेकी उनसे प्रार्थना की। देवताओंके प्रार्थना कर चुकनेपर आकाशवाणी हुई—'देवताओ! अब तुमलोग जाओ। यज्ञके मूल हैं भगवान् विष्णु, वे ही ब्राह्मणका रूप धारण करके मालावतीको शान्त करने तथा तुमलोगोंको शापके संकटसे बचानेके लिये जायेंगे।'

आकाशवाणीका यह कथन सुनकर सब देवताओंका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सब-के-सब उत्कण्ठित हो कौशिकीके तटपर मालावतीके स्थानमें गये। वहाँ पहुँचकर देवताओंने उस सती मालावती देवीको देखा। वह रत्नोंके सारभूत इन्द्रनील आदि मणियोंके आभूषणोंसे उद्दीप्त हो भगवती लक्ष्मीकी कला-सी जान पड़ती थी। उसके अङ्गोंको अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई सुनहरी साड़ी सुशोभित कर रही थी। भालदेशमें सिन्दूरकी बेंदी शोभा दे रही थी। वह शरत्कालके चन्द्रमाकी शान्त प्रभा-सी प्रकाशित होती और अपनी दीप्तिसे सम्पूर्ण दिशाओंको उद्भासित करती थी। पतिसेवारूप महान् धर्मका अनुष्ठान करके चिरकालसे संचित किये हुए तेजसे अग्निकी उत्तम एवं प्रज्वलित शिखा-सी उद्दीप्त हो रही थी। पतिके शवको छातीसे लगाकर योगासन लगाये बैठी थी और स्वामीकी सुरम्य वीणाको दाहिने हाथमें लिये हुए थी।

प्राणवल्लभके प्रति भक्ति तथा स्नेहके कारण योगमुद्रापूर्वक तर्जनी और अङ्गुष्ठ अंगुलियोंके अग्रभागसे शुद्ध स्फटिक मणिकी माला धारण किये थी। मनोहर चम्पाकी-सी अङ्ग-कान्ति, बिम्बफलके सदृश अरुण ओष्ठ और गलेमें रत्नोंकी माला शोभा पाती थी। वह सुन्दरी सोलह वर्षकी-सी अवस्थासे युक्त तथा नित्य सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न थी। वह सती अपने स्वामीके शवको बारंबार शुभदृष्टिसे देख रही थी।

इस रूपमें मालावतीको देखकर उन सब देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। वे सभी धर्मात्मा और धर्मभीरु थे; अतः क्षणभर वहाँ अपनेको छिपाये खड़े रहे।

(अध्याय १३)

५८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण ब्राह्मण-बालकरूपधारी विष्णुका मालावतीके साथ संवाद, ब्राह्मणके पूछनेपर मालावतीका अपने दुःख और इच्छाको व्यक्त करना तथा ब्राह्मणका कर्मफलके विवेचनपूर्वक विभिन्न देवताओंकी आराधनासे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन करना, श्रीकृष्ण एवं उनके भजनकी महिमा बताना सौति कहते हैं—मुने ! क्षणभर वहाँ खड़े रहकर परम मङ्गलदायक ब्रह्मा और शिव आदि देवता मालावतीके निकट गये। देवताओंको आया देख पतिव्रता मालावतीने अपने प्राणवल्लभको उनके समीप रखकर उन सबको प्रणाम किया। तत्पश्चात् वह फूट-फूटकर रोने लगी। इसी बीचमें वहाँ उस देवसमाजके भीतर कोई ब्राह्मण-बालक आया। उसकी आकृति बड़ी मनोहर थी। दण्ड, छत्र, श्वेत वस्त्र और उज्ज्वल तिलक धारण किये तथा हाथमें एक बड़ी-सी पुस्तक लिये वह ब्राह्मण-कुमार अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। उसके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वह परम शान्त जान पड़ता था और मन्द-मन्द मुस्करा रहा था। विष्णुकी मायासे विस्मित हुए देवताओंकी अनुमति ले वह वहीं देवसभाके मध्यभागमें बैठ गया और तारामण्डलके बीचमें प्रकाशित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगा। वह ब्राह्मण- बालक समस्त देवताओं तथा मालती (मालावती)- से इस प्रकार बोला। ब्राह्मणने कहा—यहाँ ब्रह्मा और शिव आदि सम्पूर्ण देवता किसलिये पधारे हैं? जगत्‌की सृष्टि करनेवाले साक्षात् विधाता यहाँ किस कार्यसे आये हैं? समस्त ब्रह्माण्डोंका संहार करनेवाले स्वयं सर्वव्यापी शम्भु भी यहाँ विराज रहे हैं। इसका क्या कारण है? तीनों लोकोंके समस्त कर्मोंके साक्षी धर्म भी यहाँ उपस्थित हैं, यह महान् आश्चर्य है। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, काल, मृत्युकन्या तथा यम आदिका समागम ही यहाँ किसलिये सम्भव हुआ है? हे मालावति ! तुम्हारी गोदमें अत्यन्त सूखा हुआ शव कौन है? जीती- जागती स्त्रीके पास मरा हुआ पुरुष क्यों है? उस सभामें देवताओं तथा मालावतीसे ऐसा प्रश्न करके वे ब्राह्मण देवता जब चुप हो गये, तब मालावती उन विद्वान् ब्राह्मणको प्रणाम करके यों बोली। मालावतीने कहा—मैं ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णुको प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करती हूँ, जिनके दिये हुए जल और पुष्पमात्रसे सम्पूर्ण देवता तथा श्रीहरि भी संतुष्ट होते हैं। प्रभो ! मैं शोकसे आतुर हूँ। आप मेरे इस निवेदनपर ध्यान दीजिये; क्योंकि योग्य और अयोग्यपर भी कृपा करनेवाले संत- महात्माओंका अनुग्रह सदा सबपर समानरूपसे प्रकट होता है। विप्रवर ! मैं उपबर्हणकी पत्नी तथा चित्ररथकी कन्या हूँ। मुझे सब लोग मालावती कहते हैं। मैंने लक्ष दिव्य वर्षोंतक अपने इन स्वामीके साथ प्रत्येक सुरम्य तथा मनोहर स्थानपर स्वच्छन्द क्रीडा की है। द्विजेन्द्र ! आप विद्वान् हैं। साध्वी युवतियोंका अपने प्रियतमके प्रति जितना स्नेह होता है, वह सब आपको शास्त्रके अनुसार विदित है। मेरे पतिने अकस्मात् ब्रह्माजीका शाप प्राप्त होनेसे अपने प्राणोंको त्याग दिया है। अतः मैं देवताओंसे यह उद्देश्य रखकर विलाप करती हूँ कि मेरे पति जीवित हो जायँ। पृथ्वीपर सब लोग अपने-अपने कार्यकी सिद्धिके लिये व्यग्र रहते हैं। वे लाभ-हानिको नहीं जानते। केवल स्वार्थ-साधनमें तत्पर रहते हैं। सुख, दुःख, भय, शोक, संताप, ऐश्वर्य, परमानन्द, जन्म, मृत्यु और मोक्ष—ये सब मनुष्योंको अपने कर्म एवं प्रयत्नके अनुसार प्राप्त होते हैं। देवता सबके जनक हैं। वे ही कर्मोंका फल देते हैं। साथ ही वे लीलापूर्वक

ब्रह्मखण्ड ५९

कर्मरूपी वृक्षोंका मूलोच्छेद करनेमें भी समर्थ होते हैं। देवतासे बढ़कर कोई बन्धु नहीं है। देवतासे बढ़कर कोई बलवान् नहीं है। देवतासे बढ़कर दयालु और दाता भी दूसरा कोई नहीं है। मैं समस्त देवताओंसे याचना करती हूँ कि वे मुझे पतिदान दें। यही मुझे अभीष्ट है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके फल देनेवाले देवता कल्पवृक्षरूप हैं। इसलिये मैं इनसे याचना करती हूँ, ये मेरा मनोरथ सफल करें। यदि देवतालोग मुझे अभीष्ट पतिदान देंगे, तब तो इनका भला है; अन्यथा मैं इन सबको निश्चय ही स्त्रीके वधका पाप दूँगी। इतना ही नहीं, मैं इन सबको दारुण एवं दुर्निवार शाप भी दे सकती हूँ। सतीके शापको टालना बहुत कठिन होता है। किस तपस्यासे उसका निवारण किया जायगा?

शौनक! ऐसा कहकर शोकातुर पतिव्रता मालावती उस देवसभामें चुप हो गयी। तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने उससे कहा।

ब्राह्मण बोले—मालावती! इसमें संदेह नहीं कि देवतालोग कर्मोंका फल देनेवाले हैं; परंतु वह फल तत्काल नहीं, देरसे मिलता है। ठीक वैसे ही, जैसे किसान बोये हुए अनाजका फल तुरंत नहीं, देरसे पाता है। पतिव्रते! गृहस्थ पुरुष हलवाहेके द्वारा अपने खेतमें जो अनाज बोता है, उसका समयानुसार अङ्कुर प्रकट होता है। फिर समय आनेपर वह वृक्ष होता और फलता भी है। तत्पश्चात् अन्य समयमें वह पकता है और अन्य समयमें गृहस्थ पुरुष उसके फलको पाता है। इसी प्रकार सबके विषयमें समझ लेना चाहिये। प्रत्येक कर्मका फल देरसे ही मिलता है। संसारमें गृहस्थ पुरुष जो बीज बोता है, वही भगवान् विष्णुकी मायासे समयानुसार अङ्कुर और वृक्ष होता है और यथासमय गृहस्थ पुरुषको उसके फलकी उपलब्धि होती है। पुण्यात्मा पुरुष पुण्यभूमिमें चिरकालतक जो तप करता है, उसका फल देनेवाले सचमुच देवता ही हैं; इसमें संशय नहीं है। ब्राह्मणोंके मुखमें तथा ऊसर भूमिसे रहित उत्तम खेतमें मनुष्य भक्तिभावसे जो आहुति डालता है, उसका फल उसे निश्चय ही प्राप्त होता है। बल, सौन्दर्य, ऐश्वर्य, धन, पुत्र, स्त्री और उत्तम पति—कोई भी पदार्थ तपस्याके बिना नहीं मिलता। अतः तपके बिना क्या हो सकता है? जो भक्तिभावसे प्रकृति (दुर्गादेवी)-का सेवन करता है, वह प्रत्येक जन्ममें विनयशील सद्गुणवती तथा सुन्दरी प्राणवल्लभा पत्नीको प्राप्त करता है। प्रकृतिके ही वरसे भक्त पुरुष लीलापूर्वक अविचल लक्ष्मी, पुत्र-पौत्र, भूमि, धन और संततिको पाता है। भगवान् शिव कल्याणस्वरूप, कल्याणदाता और कल्याणप्राप्तिके कारण हैं। वे ज्ञानानन्दस्वरूप, महात्मा, परमेश्वर एवं मृत्युञ्जय हैं। जो भक्तिभावसे उन महेश्वरका सेवन करता है, वह पुरुष प्रत्येक जन्ममें सुन्दरी पत्नी पाता है और उनकी आराधना करनेवाली स्त्री प्रत्येक जन्ममें उत्तम पति पाती है। भगवान् हरके वरसे मनुष्यको विद्या, ज्ञान, उत्तम कविता, पुत्र-पौत्र, उत्कृष्ट लक्ष्मी, धन, बल और पराक्रमकी प्राप्ति होती है। जो मानव ब्रह्माजीका भजन करता है, वह भी संतान और लक्ष्मीको पाता है। ब्रह्माजीके वरदानसे मनुष्यको विद्या, ऐश्वर्य और आनन्दकी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य भक्तिभावसे दीनानाथ, दिनेश्वर सूर्यकी आराधना करता है, वह निश्चय ही यहाँ विद्या, आरोग्य, आनन्द, धन और पुत्र पाता है। जो सबसे प्रथम पूजने योग्य, सर्वेश्वर, सनातन, देवाधिदेव गणेशजीकी भक्तिभावसे पूजा करता है, उसके जन्म-जन्ममें समस्त विघ्नोंका नाश होता है। वह सोते-जागते हर समय परम आनन्दका अनुभव करता है। गणेशजीके वरदानसे उसको ऐश्वर्य, पुत्र, पौत्र, धन, प्रजा, ज्ञान, विद्या और उत्तम कवित्वकी प्राप्ति होती है। जो देवताओंके स्वामी लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका भजन करता है, वह यदि वर पानेका इच्छुक

१७- ब्राह्मण-बालकके साथ क्रमशः ब्रह्मा, महादेवजी तथा धर्मकी बातचीत, देवताओं-द्वारा श्रीविष्णुकी तथा ब्राह्मणद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी उत्कृष्ट महत्ताका प्रतिपादन

६० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

हो तो उसे वह सम्पूर्ण वर प्राप्त हो जाता है। अन्यथा अवश्य ही उसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। शान्तस्वरूप जगत्पालक श्रीविष्णुकी सेवा करके सचमुच ही मनुष्य समस्त तप, सम्पूर्ण धर्म तथा परम उत्तम यश एवं कीर्तिको प्राप्त कर लेता है। जो मूढ़ सर्वेश्वर विष्णुका सेवन करके उसके बदलेमें कोई वर लेना चाहता है, उसे विधाताने ठग लिया और विष्णुकी मायाने मोहमें डाल दिया। नारायणकी माया सब कुछ करनेमें समर्थ, सबकी कारणभूता और परमेश्वरी है। वह जिसपर कृपा करती है, उसे विष्णु-मन्त्र देती है।

जो धर्मात्मा मनुष्य धर्मका भजन करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण धर्मका फल पाता है और इहलोकमें सुख भोगकर परलोकमें विष्णुके परमपदको प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य जिस देवताकी भक्तिभावसे आराधना करता है, वह पहले उसीको पाता है, फिर समयानुसार उस देवताके साथ ही वह उत्तम विष्णुधाममें चला जाता है।

भगवान् श्रीकृष्ण प्रकृतिसे परे तथा तीनों गुणोंसे अतीत—निर्गुण हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके सेव्य, उनके आदिकारण, परात्पर अविनाशी परब्रह्म एवं सनातन भगवान् हैं। साकार, निराकार, ज्योतिःस्वरूप, स्वेच्छामय, सर्वव्यापी, सर्वाधार, सर्वेश्वर, परमानन्दमय, ईश्वर, निर्लिप्त तथा साक्षिरूप हैं। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं। जो उनकी आराधना करता है, वह सचमुच ही जीवन्मुक्त है। वह बुद्धिमान् पुरुष कोई वर नहीं ग्रहण करता। सालोक्य आदि चारों प्रकारकी मुक्तियोंको भी वह तुच्छ समझने लगता है। ब्रह्मत्व, अमरत्व और मोक्ष भी उसके लिये तुच्छ-सा हो जाता है। ऐश्वर्यको वह मिट्टीके ढेलेके समान नश्वर मानता है। इन्द्रत्व, मनुत्व और चिरजीवित्वको भी पानीके बुलबुलेके समान क्षणभङ्गुर समझकर अत्यन्त तुच्छ गिनने लगता है। सोते-जागते हर समय श्रीकृष्णकी सेवा ही चाहता है। उनकी दासताके सिवा दूसरा कोई पद नहीं मानता। श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें निरन्तर एवं अविचल भक्ति पाकर वह पूर्णकाम हो जाता है। श्रीकृष्णका भक्त उन परिपूर्णतम ब्रह्मका सेवन करके सदा सुस्थिर रहता है। वह अपने कुलकी करोड़ों, नानाके कुलकी सैकड़ों तथा श्वशुरके कुलकी सैकड़ों पूर्व पीढ़ियोंका लीलापूर्वक उद्धार करके दास, दासी, माता और पत्नीका तथा पुत्रके बादकी भी सैकड़ों पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है और स्वयं निश्चय ही गोलोकमें जाता है। मनुष्य तभीतक कामासक्त होकर गर्भमें निवास करता है, तभीतक यमयातना भोगता है और गृहस्थ पुरुष तभीतक भोगोंकी इच्छा रखता है, जबतक कि श्रीकृष्णका सेवन नहीं करता। यमराज उस भक्तके कर्मसम्बन्धी लेखको तत्काल भयके मारे दूर कर देता है। ब्रह्माजी पहलेसे ही उसके स्वागतके लिये मधुपर्क आदि तैयार करके रखते हैं और सोचते हैं कि अहो! वह मेरे लोकको लाँघकर इसी मार्गसे यात्रा करेगा। कोटिशत कल्पोंमें भी उसका वहाँसे निष्कासन नहीं होगा। जैसे सर्प गरुड़को देखते ही भाग जाते हैं, उसी तरह करोड़ों जन्मोंके किये हुए पाप भी श्रीकृष्ण-भक्तसे भयभीत हो उसे छोड़कर पलायन कर जाते हैं। श्रीकृष्ण-भक्त मानव-शरीरको छोड़नेके बाद निर्भय हो गोलोकमें जाता है। वहाँ जानेपर दिव्य शरीर धारण करके सदा श्रीकृष्णकी सेवा करता है। श्रीकृष्ण जबतक गोलोकमें निवास करते हैं, तबतक भक्त पुरुष निरन्तर वहाँ उनकी सेवामें रहता है। श्रीकृष्णका दास ब्रह्माकी नश्वर आयुको एक निमेषभरका मानता है।

(अध्याय १४)

ब्रह्मखण्ड ६१

ब्राह्मणद्वारा अपनी शक्तिका परिचय, मृतकको जीवित करनेका आश्वासन, मालावतीका पतिके महत्त्वको बताना और काल, यम, मृत्युकन्या आदिको ब्राह्मणद्वारा बुलवाकर उनसे बात करना, यम आदिका अपनेको ईश्वरकी आज्ञाका पालक बताना और उसे 'श्रीकृष्णचिन्तन' के लिये प्रेरित करना

ब्राह्मण बोले— पतिव्रते ! इस समय तुम्हारे प्रियतम किस रोगसे मरे हैं ? मैं चिकित्सक भी हूँ। अतः समस्त रोगोंकी चिकित्सा भी जानता हूँ। सती मालावति ! कोई रोगसे मृतकतुल्य हो गया हो अथवा मर गया हो, किंतु यदि एक सप्ताहके भीतरकी ही घटना हो तो मैं उस जीवको चिकित्सा-सम्बन्धी महान् ज्ञानके द्वारा चुटकी बजाते हुए जीवित कर सकता हूँ। जैसे व्याध पशुको बाँधकर सामने ला देता है, उसी प्रकार मैं जरा, मृत्यु, यम, काल तथा व्याधियोंको बाँधकर तुम्हारे सामने लाने और तुम्हें सौंप देनेकी शक्ति रखता हूँ। सुन्दरि ! जिस उपायसे रोग देहधारियोंके शरीरोंमें न फैले, वह तथा रोगोंका जो-जो कारण है, वह सब मैं अच्छी तरह जानता हूँ। मैं शास्त्रके तत्त्वज्ञानके अनुसार उस उपायको भी जानता हूँ, जिससे व्याधियोंका दुष्ट एवं अमङ्गलकारी बीज अङ्कुरित ही न हो। जो योगसे अथवा रोगजनित कष्टसे देह-त्याग करता है, उसके जीवित होनेका उपाय क्या है ? इसे भी मैं योगधर्मके प्रभावसे जानता हूँ।

ब्राह्मणकी यह बात सुनकर सती मालावतीके मनमें उत्साह हुआ। वह मुस्करायी। उसके चित्तमें स्नेह उमड़ आया और वह हर्षसे भरकर बोली।

मालावतीने कहा— अहो ! इस बालकके मुखसे कैसी आश्चर्यजनक बात सुनी गयी है ? यह अवस्थामें तो बहुत छोटा दिखायी देता है; परंतु इसका ज्ञान योगवेत्ताओंके समान उच्च कोटिका है। ब्रह्मन् ! आपने मेरे प्रियतम पतिको जीवित कर देनेकी प्रतिज्ञा की है। सत्पुरुषोंका वचन कभी मिथ्या नहीं होता। अतः उसी क्षण मुझे विश्वास हो गया कि मेरे पति जीवित हो गये। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण ! आप मेरे प्राणवल्लभको पीछे जिलाइयेगा। पहले मैं संदेहवश जो-जो पूछती हूँ, उसी-उसी बातको आप बतानेकी कृपा करें। इस सभामें जब मेरे प्राणनाथ जीवित हो जायँगे और जीवित होकर यहाँ मौजूद रहेंगे, तब मैं उनके निकट आपसे कोई बात पूछ नहीं सकूँगी; क्योंकि उनका स्वभाव बड़ा तीखा है। इस सभामें ये ब्रह्मा आदि देवता विद्यमान हैं। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आप भी यहाँ उपस्थित हैं। परंतु आप सब लोगोंमेंसे कोई भी मेरा स्वामी नहीं है। यदि स्वामी अपनी पत्नीकी रक्षा करता है तो कोई भी उसका खण्डन नहीं कर सकता तथा यदि वह उसका शासन करता या उसे दण्ड देता है तो इस भूतलपर दूसरा कोई स्वामीसे उसकी रक्षा करनेवाला नहीं है। इसी प्रकार देवताओंमें, इन्द्रमें अथवा ब्रह्मा और रुद्रमें भी ऐसी शक्ति नहीं है। स्वामी और स्त्रीमें पति-पत्नीभाव-सम्बन्ध जानना चाहिये।

स्वामी ही स्त्रियोंका कर्ता, हर्ता, शासक, पोषक, रक्षक, इष्टदेव तथा पूज्य है। नारीके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई गुरु नहीं है। जो उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई कन्या है, वह सदा अपने प्राणवल्लभके वशमें रहती है। जो स्वतन्त्र होती है वह स्वभावसे ही दुष्टा है। उसे निश्चय ही 'कुलटा' कहा गया है। जो दुष्टा है, मनुष्योंमें अधम है तथा पर-पुरुषका सेवन करती है, वही सदा अपने पतिकी निन्दा करती है। अवश्य ही वह किसी नीच कुलकी कन्या होती है। ब्रह्मन् ! मैं उपबर्हणकी पत्नी, चित्ररथकी पुत्री और गन्धर्वराजकी पुत्रवधू हूँ। मैंने सदा अपने प्रियतम पतिमें भक्ति-भाव रखा है। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण ! आप सबको

६२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


यहाँ बुलानेमें समर्थ हैं, अतः काल, यम तथा मृत्युकन्याको मेरे पास ले आइये।

मालावतीकी यह बात सुनकर वेदवेत्ताओंमें उत्तम ब्राह्मणने उस सभामें उन सबको बुलाकर प्रत्यक्ष खड़ा कर दिया। सती मालावतीने सबसे पहले मृत्युकन्याको देखा। उसका रूप-रंग काला था, वह देखनेमें भयंकर थी। उसने लाल रंगके कपड़े पहन रखे थे। वह मन्द-मन्द मुसकरा रही थी। उसके छः भुजाएँ थीं। वह शान्त, दयालु और महासती थी तथा अपने स्वामी कालके वाम-भागमें चौंसठ पुत्रोंके साथ खड़ी थी। तत्पश्चात् सती मालावतीने नारायणके अंशभूत कालको भी सामने खड़ा देखा। उसका रूप बड़ा ही उग्र, विकट तथा ग्रीष्म-ऋतुके सूर्यकी भाँति प्रचण्ड तेजसे युक्त था। उसके छः मुख, सोलह भुजाएँ और चौबीस नेत्र थे। पैरोंकी संख्या भी छः ही थी। शरीरका रंग काला था। उसने भी लाल वस्त्र पहन रखे थे। वह देवताओंका भी देवता है। उसकी विकराल आकृति है। वह सर्वसंहाररूपी, कालका अधिदेवता, सर्वेश्वर एवं सनातन भगवान् है। उसके मुखपर मन्द मुस्कान-जनित प्रसन्नता दृष्टिगोचर होती थी, उसने हाथमें अक्षमाला धारण कर रखी थी और वह अपने स्वामी तथा आत्मा परम ब्रह्म श्रीकृष्णका नाम जप रहा था।

इसके बाद सतीने अपने सामने अत्यन्त दुर्जय व्याधिसमूहोंको देखा, जो अवस्थामें अत्यन्त बड़े-बूढ़े होनेपर भी अपनी माताके निकट दूध पीते बच्चोंके समान दिखायी देते थे। तदनन्तर उसने यमको सामने देखा, जो धर्माधर्मके विचारको जाननेवाले परम धर्मस्वरूप तथा पापियोंके भी शासक हैं। उनके पैर स्थूल थे। शरीरकी कान्ति श्याम थी। धर्मनिष्ठ सूर्यनन्दन यम परब्रह्मस्वरूप सनातन भगवान् श्रीकृष्णका मन्त्र जप रहे थे। उन सबको देख महासाध्वी मालावतीके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। उसने निःशंक होकर पहले यमसे पूछा।

मालावती बोली—धर्मशास्त्रविशारद! धर्मनिष्ठ धर्मराज! प्रभो! आप समयका उल्लङ्घन करके मेरे प्राणनाथको कैसे लिये जाते हैं?

यमराजने कहा—पतिव्रते! समय पूरा हुए बिना तथा ईश्वरकी आज्ञा मिले बिना इस भूतलपर किसीकी मृत्यु नहीं होती। जो मरा नहीं है, ऐसे पुरुषको मैं नहीं ले जाता। मैं, काल, मृत्युकन्या तथा अत्यन्त दुर्जय व्याधिसमूह—ये आयु पूर्ण होनेपर, जिसके मरणका समय आ पहुँचता है, उसीको ईश्वरकी आज्ञासे ले जाते हैं। मृत्युकन्या विचारशील है। यह आयु निःशेष होनेपर जिसको प्राप्त होती है, उसीको मैं ले जाता हूँ। तुम उसीसे पूछो। वह किस कारणसे जीवको प्राप्त होती है?

मालावती बोली—मृत्युकन्ये! स्वामीके वियोगसे होनेवाली वेदनाको जानती हो। अतः प्यारी सखी! बताओ, मेरे जीते-जी तुम मेरे प्राणवल्लभको क्यों हर ले जाती हो?

मृत्युकन्या बोली—पूर्वकालमें विश्वस्रष्टा ब्रह्माजीने इस कर्मके लिये मेरी ही सृष्टि की। पतिव्रते! मैं बड़ी भारी तपस्या करके भी इस कार्यको त्यागनेमें असमर्थ हूँ। सुन्दरि! इस संसारमें यदि कोई सतियोंमें सबसे श्रेष्ठ और तेजस्विनी सती हो तथा वह मुझे ही अपने तेजसे भस्म कर डालनेमें समर्थ हो जाय, तब तो यहाँ सारी ही आपत्तियोंकी शान्ति हो जायगी। फिर मेरे पुत्रों और स्वामीकी जो दशा होनी होगी सो हो जायगी। कालसे प्रेरित होकर ही मैं और मेरे पुत्र व्याधिगण किसी प्राणीका स्पर्श करते हैं। अतः इसमें मेरा तथा मेरे पुत्रोंका कोई दोष नहीं है। अब तुम मेरा निश्चित विचार सुनो। भद्रे! धर्मसभामें बैठनेवाले जो धर्मज्ञ महात्मा काल हैं, उनसे इस विषयमें पूछो। फिर जो उचित हो वह अवश्य करना।