ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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मन-ही-मन बड़े हर्षका अनुभव कर रहे थे। उनके सिरपर जटा थी। उन्होंने दण्ड और छत्र भी ले रखे थे। श्वेत वस्त्र, श्वेत यज्ञोपवीत, श्वेत कमलके बीजोंकी माला एवं श्वेत तिलक धारण किये वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। निर्जन स्थानमें उस बालकको देखकर पार्वतीके हृदयमें स्नेह उमड़ आया। उसके तेजसे अत्यन्त आच्छादित हो उन्होंने स्वयं तप छोड़ दिया और सामने खड़े हुए शिशुसे पूछा—'तुम कौन हो?' शिवा बड़े आदरके साथ उसे हृदयसे लगा लेना चाहती थी। शैलकुमारीका प्रश्न सुनकर परमेश्वर शिव हँसे और ईश्वरीके कानोंमें अमृत उँड़ेलते हुए-से मधुर वाणीमें बोले।
शंकरने कहा—मैं इच्छानुसार विचरनेवाला ब्रह्मचारी एवं तपस्वी ब्राह्मण-बालक हूँ; परंतु सुन्दरि! तुम कौन हो, जो परम कान्तिमती होकर भी इस दुर्गम वनमें तप कर रही हो? बताओ, किसके कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ है? तुम किसकी कन्या हो और तुम्हारा नाम क्या है? तुम तो तपस्याका फल देनेवाली हो; फिर स्वयं किसलिये तपस्या करती हो? कमललोचने! तुम तपस्याकी मूर्तिमती राशि हो। अवश्य ही तुम्हारा यह तप लोकशिक्षाके लिये है। तुम मूलप्रकृति ईश्वरी, लक्ष्मी, सावित्री और सरस्वती—इन देवियोंमेंसे कौन हो? इसका अनुमान करनेमें मैं असमर्थ हूँ। कल्याणि! तुम जो भी हो, मुझपर प्रसन्न हो जाओ; क्योंकि तुम्हारे प्रसन्न होनेपर परमेश्वर प्रसन्न होंगे। पतिव्रता स्त्रीके संतुष्ट होनेपर स्वयं नारायण संतुष्ट होते हैं और नारायणदेवके संतुष्ट होनेपर सदा तीनों लोक संतोषका अनुभव करते हैं; ठीक उसी तरह जैसे वृक्षकी जड़ सींच देनेपर उसकी शाखाएँ स्वतः सिंच जाती हैं।
शिशुकी यह बात सुनकर परमेश्वरी शिवा हँसने लगी और कानोंमें अमृतकी वर्षा करती हुई मनोहर वाणी बोली।
पार्वतीने कहा—ब्रह्मन्! न तो मैं वेदजननी सावित्री हूँ, न लक्ष्मी हूँ और न वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती ही हूँ। मेरा जन्म भारतवर्षमें हुआ है। मैं इस समय गिरिराज हिमवान्की पुत्री हूँ। इससे पहले मेरा जन्म प्रजापति दक्षके घरमें हुआ था। उस समय मैं शंकर-पत्नी सतीके नामसे प्रसिद्ध थी। एक बार पिताने पतिकी निन्दा की। इसलिये मैंने योगके द्वारा अपने शरीरको त्याग दिया। इस जन्ममें भी पुण्यके प्रभावसे भगवान् शंकर मुझे मिल गये थे; परंतु दुर्भाग्यवश वे मुझे छोड़कर और कामदेवको भस्म करके चले गये। शंकरजीके चले जानेपर मैं मानसिक संताप और लज्जासे विवश हो पिताके घरसे तपस्याके लिये निकल पड़ी। अब मेरा मन इस गङ्गाजीके तटपर ही लगता है। दीर्घकालतक कठोर तप करके भी मैं अपने प्राणवल्लभको न पा सकी। इसलिये अग्निमें प्रवेश करने जा रही थी। किंतु तुम्हें देखकर क्षणभरके लिये रुक गयी। अब तुम जाओ। मैं प्रलयाग्निकी शिखाके समान प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश करूँगी। ब्रह्मन्! महादेवजीकी प्राप्तिका संकल्प मनमें
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लेकर शरीरका त्याग करूँगी और जहाँ-जहाँ भी जन्म लूँगी, परमेश्वर शिवको ही पतिके रूपमें प्राप्त करूँगी। प्रत्येक जन्ममें भगवान् शिव ही मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतम पति होंगे। सब स्त्रियाँ अपने प्रियतमको ही पानेके लिये मनोवाञ्छित जन्म ग्रहण करती हैं। उन सबका वह जन्म अपने अभीष्ट पतिकी उपलब्धिके लिये ही होता है, ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। पूर्वजन्मका जो पति है, वही स्त्रियोंके प्रत्येक जन्ममें पति होता है। जो स्त्री जिनकी पत्नी नियत है, वही उन्हें प्रत्येक जन्ममें प्राप्त होती है; अतः इस जन्ममें घोरतर तपके पश्चात् भी पतिको न पाकर मैं यहाँ इस शरीरको अग्निकुण्डमें होम दूँगी। मेरा यह कार्य पतिकी कामनाको लेकर होगा; इसलिये परलोकमें मैं उन्हें अवश्य प्राप्त करूँगी।
यों कहकर पार्वती वहाँ ब्राह्मणके बार-बार मना करनेपर भी उसके सामने ही अग्निकुण्डमें समा गयी। परमेश्वरी राधे! पार्वतीके अग्नि-प्रवेश करते ही उसकी तपस्याके प्रभावसे वह अग्नि तत्काल चन्दनके समान शीतल हो गयी। वृन्दावनविनोदिनि! एक क्षणतक अग्निकुण्डमें रहकर जब शिवा ऊपर आने लगी, तब शिवने पुनः सहसा उससे पूछा।
श्रीमहादेवजी बोले—भद्रे! तुम्हारी तपस्या क्या है? (सफल है या असफल?) यह कुछ भी मेरी समझमें नहीं आया। जिस तपके प्रभावसे अग्निने तुम्हारा शरीर नहीं जलाया, उसीसे तुम्हारी मनोवाञ्छित कामना पूर्ण नहीं हुई; यह आश्चर्यकी बात है। तुम कल्याणस्वरूप शिवको पति बनाना चाहती हो; परंतु वे तो निराकार हैं! निराकारको पति बनाकर तुम्हारा कौन-सा मनोरथ सिद्ध होगा? शुचिस्मिते! यदि संहारकर्ता हरको स्वामी बनानेकी इच्छा है तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि कौन ऐसी स्त्री है जो सर्वसंहारकारीको अपना कान्त (प्राणवल्लभ) बनानेकी इच्छा करेगी?
देवि! यदि उन्हें अपना स्वामी बनाकर तुम मोक्ष लेना चाहती हो तो इसके लिये तुम्हारी तपस्या व्यर्थ है; क्योंकि सबको मुक्ति प्रदान करनेवाली तो तुम स्वयं ही हो! ‘शिव’ का अर्थ है—मङ्गल (कल्याण), मोक्ष और संहारकर्ता। इसके अतिरिक्त अन्य अर्थमें इस शब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता। शिव शब्दका दूसरा कोई अर्थ वेदमें नहीं निरूपित हुआ है। सुन्दरि! यदि तुम संहारकर्ता शिवको चाहती हो, तब तो सर्वलोकभयंकर रुद्रको अपने प्रति अनुरक्त पाओगी। न तो तुम्हारा मोक्ष होगा और न अपने अभीष्ट देवताकी सेवा ही उपलब्ध होगी। भगवान् श्रीहरिका स्मरण अमोघ है, वह सदा सब प्रकारसे सम्पूर्ण मङ्गलोंका दाता है। अब तुम शीघ्र ही अपने पिताके घर जाओ। वहाँ मेरे आशीर्वादसे और अपने तपके फलसे तुम्हें परम दुर्लभ शिवके दर्शन प्राप्त होंगे।
ऐसा कहकर ब्राह्मण वहीं अन्तर्धान हो गया। दुर्गा ‘महादेव! महादेव!’ का उच्चारण करती हुई पिताके घरकी ओर चल दी। पार्वतीका आगमन सुनकर मेना और हिमालय दिव्य यानको आगे करके हर्षविह्वल हो अगवानीके लिये चले। सारा नगर सजाया गया। मार्गोंपर चन्दन, कस्तूरी आदिका छिड़काव हुआ। बाजे बजने लगे। शङ्खध्वनि गूँज उठी। सड़कोंपर सिन्दूर तथा चन्दनके जलसे कीच मच गयी। नगरमें प्रवेश करके दुर्गाने माता-पिताके दर्शन किये। वे दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो दौड़ते हुए सामने आये। उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भरे थे और अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो रहा था। देवी शिवाके मुखपर भी प्रसन्नता थी। उसने सखियोंसहित निकट जा माता-पिताको प्रणाम किया। तब उन दोनोंने आशीर्वाद देकर पुत्रीको हृदयसे लगा लिया और ‘ओ मेरी बच्ची!’ कहकर प्रेमसे विह्वल हो रोने लगे। उस समय दुर्गाको रथपर बिठाकर वे दोनों अपने घर गये। स्त्रियोंने निर्मञ्छन किया और
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ब्राह्मणोंने आशीर्वाद दिया। पर्वतराजने ब्राह्मणों और बन्दीजनोंको धन दिया। उनसे वेद-पाठ और मङ्गल-पाठ करवाये। इस प्रकार वे दोनों अपनी पुत्रीके साथ सुखसे घरमें रहने लगे। शिवाके आ जानेसे उनके मनमें बड़ा हर्ष था।
एक दिन हिमवान् तप करनेके लिये गङ्गाजीके तटपर गये। मेना अपनी पुत्रीके साथ प्रसन्नतापूर्वक घरके आँगनमें बैठी थीं। इसी समय एक नाचने-गानेवाला भिक्षुक सहसा मेनाके पास आया। उसके बायें हाथमें सींगका बाजा और दायें हाथमें डमरू था। बहुत ही वृद्ध और जरासे अत्यन्त जर्जर हो चुका था। उसने सारे शरीरमें विभूति लगा रखी थी। पीठपर गुदड़ी लिये और लाल वस्त्र पहने वह भिक्षुक बड़ा मनोहर जान पड़ता था। उसका कण्ठ बड़ा ही मधुर था। वह मनोहर नृत्य करते हुए मेरे गुणोंका गान करने लगा। कभी शृङ्ग बजाता और कभी डमरू। उसके बाजेकी आवाज सुनकर बहुत-से नागरिक हर्षविह्वल हो वहाँ आ गये। दर्शकोंमें बालक, बालिका, वृद्ध, युवक, युवतियाँ तथा वृद्धाएँ भी थीं। मधुर तान और स्वरसे युक्त उस सुन्दर गीतको सुनकर सहसा सब लोग मोहित एवं मूर्च्छित हो गये। दुर्गाको भी मूर्च्छा आ गयी। उसने अपने हृदयमें भगवान् शंकरको देखा। वे त्रिशूल, पट्टिश और व्याघ्रचर्म धारण किये सम्पूर्ण अङ्गोंमें विभूतिसे विभूषित थे। बड़ा ही रम्य रूप था। गलेमें अत्यन्त निर्मल अस्थियोंकी माला शोभा देती थी। प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। उनकी आकृतिसे आन्तरिक उल्लास सूचित होता था। पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पाते थे। हाथमें माला, कंधेपर नागोंका यज्ञोपवीत और मस्तकपर चन्द्राकार मुकुट—बड़ी सुन्दर झाँकी थी। वे पार्वतीसे कह रहे थे कि वर माँगो। हृदयस्थित हरको देखकर पार्वतीने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया और वर माँगा, ‘आप हमारे पति हो जाइये।’ ‘एवमस्तु’ कहकर शिव अन्तर्धान हो गये। हृदयमें शिवको न देखकर दुर्गाकी मूर्च्छा भङ्ग हुई। उसने आँख खोलकर देखा, सामने वही भिक्षुक गा रहा है।
भिक्षुके नृत्य और संगीतसे संतुष्ट हो मेना सोनेके पात्रमें बहुत-से रत्न ले उसे देनेके लिये गयीं; परंतु भिक्षुने भिक्षामें दुर्गाको ही माँगा; दूसरी कोई वस्तु नहीं ली। वह कौतुकवश पुनः नृत्य करनेको उद्यत हुआ; परंतु मेना उसकी बात सुनकर कुपित हो उठी थीं। उन्हें आश्चर्य भी हुआ था। उन्होंने भिक्षुकको बहुत डाँटा तथा उसे घरसे बाहर निकाल देनेकी आज्ञा दी। इसी बीचमें अपना तप पूरा करके हिमवान् घरपर आये। वहाँ उन्हें आँगनमें खड़ा हुआ एक भिक्षु दिखायी दिया, जो बड़ा मनोहर था। उसके विषयमें मेनाके मुखसे सब बातें सुनकर हिमवान् हँसे और रुष्ट भी हुए। उन्होंने अपने सेवकको आज्ञा दी—‘इस भिक्षुकको बाहर निकाल दो।’ परंतु वह कोई साधारण भिक्षुक नहीं था। आकाशकी भाँति उसका स्पर्श करना भी कठिन था। वह अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था। उसे कोई बाहर न कर सका। उसके निकट जानेकी भी किसीमें क्षमता नहीं थी। हिमवान्ने एक ही क्षणमें देखा—उस भिक्षुकके सुन्दर चार भुजाएँ हैं; मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल तथा शरीरपर पीताम्बर शोभा पाता है; श्याम-सुन्दर रुचिर वेष मनको मोहे लेता है; मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है। सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं तथा वे श्रीहरि (रूपधारी शिव) भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते हैं।
हिमवान् श्रीहरिके उपासक थे। उन्होंने पूजाकालमें भगवान् गदाधरको जो-जो फूल चढ़ाये थे, वे सब भिक्षुकके अङ्गमें और
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मस्तकपर देखे। उनके द्वारा जो धूप-दीप दिये गये थे अथवा जो मनोरम नैवेद्य निवेदित हुआ था, वह भी भिक्षुकके सामने प्रस्तुत दिखायी दिया। दूसरे ही क्षणमें वह भिक्षुक द्विभुज-रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। अब उसके हाथमें विनोदकी साधनभूता मुरली थी। गोपवेष, किशोर-अवस्था, श्यामसुन्दर वर्ण, मुस्कराता हुआ मुख, मस्तकपर मोरपंखका मुकुट, श्रीअङ्गोंमें रत्नमय आभूषण, चन्दनके अङ्गराग तथा गलेमें वनमाला—मानो साक्षात् श्रीकृष्ण दर्शन दे रहे हों। फिर क्षणभरमें वह उज्ज्वल-कान्ति चन्द्रशेखर शिवके रूपमें दिखायी दिया। उसके हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे। वस्त्रकी जगह सुन्दर बाघम्बर था। सम्पूर्ण अङ्गोंमें विभूति लगी थी। धवल वर्ण था। गलेमें अस्थियोंकी माला थी, जो आभूषणका काम देती थी। कंधेपर सर्पमय यज्ञोपवीत तथा सिरपर तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली जटा थी। हाथोंमें शृङ्ग और डमरू थे। सुप्रशस्त एवं मनोहर रूप चित्तको आकृष्ट कर लेता था। भगवान् शिव श्वेत कमलोंके बीजकी मालासे हरिनामका जप करते थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्दहासकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर दिखायी देते थे। अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। फिर दूसरे ही क्षणमें वह भिक्षुक 'जगत्स्रष्टा' चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। ब्रह्माजी स्फटिककी माला लेकर हरिनामका जप कर रहे थे।
हिमवान्ने देखा, क्षणभरमें वह त्रिगुणात्मक सूर्यस्वरूप हो गया। अत्यन्त दुःसह प्रकाशसे युक्त सूर्यदेव ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान थे। फिर एक क्षणतक वह अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित अग्निके रूपमें विद्यमान रहा। तत्पश्चात् क्षणभर आह्लादजनक चन्द्रमाके रूपमें शोभा पाता रहा। तदनन्तर एक ही क्षणमें तेजःस्वरूप, निराकार, निरञ्जन, निर्लिप्त, निरीह परमात्मस्वरूपमें स्थित हो गया। इस प्रकार स्वेच्छामय नाना रूप धारण करनेवाले परमेश्वरका दर्शनकर शैलराजके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो गया। उन्होंने साष्टाङ्ग दण्डवत्-प्रणाम किया और भक्तिभावसे परिक्रमा करके बारंबार मस्तक झुकाया। फिर हर्षसे उछलकर हिमवान्ने जब पुनः देखा तो वही भिक्षुक सामने था। वास्तवमें वह भिक्षुक ही है—ऐसा उन्हें दिखायी दिया। भगवान् विष्णुकी मायासे शैलराज उसके नाना रूप-धारण-सम्बन्धी सब बातोंको भूल गये। भिक्षुक उनसे भीख माँगने लगा। उसके पास भिक्षाका पात्र था। उसने रक्त वस्त्र धारण किया था। हाथोंमें शृङ्ग और विचित्र डमरूके बाजे थे। वह भिक्षामें केवल दुर्गाको ग्रहण करनेके लिये उत्सुक था, दूसरी किसी वस्तुको नहीं, परंतु विष्णु-मायासे मोहित हुए शैलराजने उसकी याचना स्वीकार नहीं की। भिक्षुने भी और कुछ नहीं लिया। वह वहीं अन्तर्धान हो गया। प्रिये! उस समय मेना और गिरिराजको ज्ञान हुआ। वे बोले—'अहो! हमने विश्वनाथको दिनमें स्वप्नकी भाँति देखा है। भगवान् शिव हम दोनोंको वञ्चित करके अपने स्थानको चले गये।'
उन दोनों पति-पत्नीकी भगवान् शिवमें भक्ति बढ़ रही है—यह देख सब देवताओंको चिन्ता हो गयी। इन्द्र आदि देवता भारसे सुमेरुकी रक्षाके लिये युक्ति करने लगे। वे आपसमें कहने लगे—'यदि हिमवान् अनन्य भक्तिसे भारतमें भगवान् शिवको कन्यादान करेंगे तो निश्चय ही निर्वाण-मोक्षको प्राप्त होंगे। अनन्त रत्नोंका आधार हिमालय यदि पृथ्वीको छोड़कर चला जायगा तो इसका 'रत्नगर्भा' नाम अवश्य ही मिथ्या हो जायगा। शूलपाणि शिवको अपनी कन्या दे स्थावरत्वका परित्याग और दिव्य रूप धारण
३६- अनरण्यकी पुत्री पद्माकी धर्मद्वारा परीक्षा, सती पद्माका उनको शाप देना तथा उस शापसे उनकी रक्षाकी भी व्यवस्था करना, वसिष्ठजीका हिमवान्को संक्षेपसे सतीके देह-त्यागका प्रसङ्ग सुनाना
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करके वे विष्णुलोकको चले जायँगे। फिर तो अनायास ही उन्हें नारायणका सारूप्य प्राप्त हो जायगा। वे भगवान्के पार्षदभावको पाकर हरिदास हो जायँगे।' यह सब सोचकर देवताओंने आपसमें सलाह की और वे गुरु बृहस्पतिको हिमालयके घर भेजनेके लिये गये। उन सबने गुरुको प्रणाम करके निवेदन किया—'गुरुदेव! आप हिमालयके यहाँ जाकर उनके समक्ष भगवान् शिवकी निन्दा कीजिये। यह तो निश्चय है कि दुर्गा शिवके सिवा दूसरे किसी वरका वरण नहीं करेगी। उस दशामें हिमवान् अनिच्छासे ही अपनी पुत्री शिवको देंगे। ऐसा करनेसे कन्यादानका फल कम हो जायगा। कालान्तरमें गिरिराज भले ही मुक्त हो जायँ; परंतु इस समय तो इन्हें पृथ्वीपर रहना ही चाहिये। भगवन्! आप ही अनन्त रत्नोंके आधारभूत हिमालयको भारतवर्षमें रखिये। (इन्हें यहाँसे जाने न दीजिये।)
देवताओंका वचन सुनकर गुरु बृहस्पतिजीने दोनों हाथ कानोंमें लगा लिये और 'नारायण!' 'नारायण!' का स्मरण करते हुए उनकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी। वेद-वेदान्तके विद्वान् बृहस्पति हरि और हरके महान् भक्त थे। उन्होंने देवताओंको बारंबार फटकारकर कहा।
बृहस्पति बोले—स्वार्थ-साधनमें तत्पर रहनेवाले देवताओ! मेरी सच्ची बात सुनो। मेरा यह वचन नीतिका सारतत्त्व, वेदोंद्वारा प्रतिपादित तथा परिणाममें सुख देनेवाला है। जो पापी शिव और विष्णुके भक्तकी, भूदेवता ब्राह्मणोंकी, गुरु और पतिव्रताकी, पति, भिक्षु, ब्रह्मचारी तथा सृष्टिके बीजभूत देवताओंकी निन्दा करते हैं; वे चन्द्रमा और सूर्यके रहनेतक कालसूत्र नामक नरकमें पकाये जाते हैं। उन्हें कफ तथा मल-मूत्रमें दिन-रात सोना पड़ता है। उन्हें कीड़े खाते हैं और वे कातर वाणीमें आर्तनाद करते हैं। जो सृष्टिकर्ता जगद्गुरु ब्रह्माकी निन्दा करते हैं; जो सुरश्रेष्ठ शिव, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, गीता, तुलसी, गङ्गा, वेद, वेदमाता सावित्री, व्रत, तपस्या, पूजा, मन्त्र तथा मन्त्रदाता गुरुमें दोष बताते हैं; वे अन्धकूप नामक नरकमें यातना भोगते हैं और वहाँ उन्हें ब्रह्माकी आधी आयुतक रहना पड़ता है तथा वे सर्प-समूहोंसे भक्षित हो सदा चीखते-चिल्लाते रहते हैं। जो दूसरे देवताओंके साथ तुलना करके भगवान् हृषीकेशकी निन्दा करते हैं; विष्णुभक्ति प्रदान करनेवाले पुराणमें, जो श्रुतिसे भी उत्कृष्ट है, दोष निकालते हैं; राधा तथा उनकी कायव्यूहरूपा गोपियोंकी और सदा पूजित होनेवाले ब्राह्मणोंकी भी निन्दा करते हैं; वे देवता ही क्यों न हों, ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त नरकके गड्ढेमें पकाये जाते हैं। उनके मुँह नीचे लटकाये जाते हैं और उनकी जाँघें ऊपरकी ओर होती हैं। विकृताकार सर्पसमूह तथा सर्पकी-सी आकृतिवाले कीट उनके सारे अङ्गोंमें लिपटकर काटते रहते हैं और वे अत्यन्त कातर तथा भयभीत हो सदा आर्तनाद किया करते हैं। निश्चय ही वहाँ उन्हें क्षोभपूर्वक कफ एवं मल-मूत्र खाने पड़ते हैं। रोषसे भरे हुए यमराजके किङ्कर उनके मुँहमें जलती हुई लुआठी डाल देते हैं। तीनों संध्याओंके समय उन्हें डाँट बताते हुए डंडोंसे पीटते हैं। डंडोंके प्रहारसे जब उन्हें प्यास लगती है, तब वे उन यमदूतोंके भयसे मूत्र-पान करते हैं। जब दूसरा कल्प आरम्भ होता है और पहले-पहल सृष्टिका आयोजन किया जाता है, उस समय उन पापियोंके पापोंका निवारण होता है—ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। निश्चय ही शिवकी निन्दा करनेवाले देवता नरकमें पड़ेंगे। मेरे बच्चो! क्या तुमलोग मेरा यही उपकार करना चाहते हो? ब्रह्माजीकी आज्ञासे दक्ष प्रजापतिने शूलपाणि शंकरको अपनी पुत्री दी। उसीके पुण्यसे शिवकी निन्दा करनेपर भी उन्हें पाप नहीं लगा; अपितु परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई। उन्होंने अनिच्छासे ही
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भगवान् शंकरको कन्यादान किया था। इसलिये उन्हें चौथाई पुण्यकी ही प्राप्ति हुई। अतएव वे सारूप्य मोक्षको न पाकर तुच्छ सृष्टिका ही अधिकार प्राप्त कर सके। देवताओ! तुम्हीं लोगोंमेंसे कोई हिमवान्के घर जाकर अपने मतके अनुसार कार्य करे और प्रयत्नपूर्वक शैलराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न करे। अनिच्छासे कन्यादान करके गिरिराज हिमवान् सुखपूर्वक भारतवर्षमें स्थित रहें। भक्तिपूर्वक शिवको पुत्री देकर तो वे निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेंगे। अश्रद्धा उत्पन्न होनेके बाद अरुन्धतीको साथ ले सब सप्तर्षि अवश्य ही गिरिराजके घर जाकर उन्हें समझायेंगे। दुर्गा शिवके सिवा दूसरे किसी वरका वरण नहीं करेगी। उस दशामें पुत्रीके आग्रहसे वे अनिच्छापूर्वक शिवको अपनी कन्या देंगे। इस प्रकार मैंने अपना सारा विचार व्यक्त कर दिया। अब देवतालोग अपने-अपने घरको पधारें।
यों कहकर बृहस्पतिजी शीघ्र ही तपस्याके लिये आकाशगङ्गाके तटपर चले गये।
(अध्याय ४०)
ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका शिवजीसे शैलराजके घर जानेका अनुरोध करना, शिवका ब्राह्मण-वेषमें जाकर अपनी ही निन्दा करके शैलराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न करना, मेनाका पुत्रीको साथ ले कोप-भवनमें प्रवेश और शिवको कन्या न देनेके लिये दृढ़ निश्चय, सप्तर्षियों और अरुन्धतीका आगमन तथा शैलराज एवं मेनाको समझाना, वसिष्ठ और हिमवान्की बातचीत, शिवकी महत्ता तथा देवताओंकी प्रबलताका प्रतिपादन, प्रसङ्गवश राजा अनरण्य, उनकी पुत्री पद्मा तथा पिप्पलादमुनिकी कथा
श्रीकृष्ण कहते हैं— तब देवतालोग आपसमें विचार करके ब्रह्माजीके निकट गये। वहाँ उन्होंने उन लोकनाथ ब्रह्मासे अपना अभिप्राय निवेदन किया।
देवता बोले— संसारकी सृष्टि करनेवाले पितामह! आपकी सृष्टिमें हिमालय सब रत्नोंका आधार है। वह यदि मोक्षको प्राप्त हो जायगा तो पृथ्वी रत्नगर्भा कैसे कहलायेगी? शूलपाणि शंकरको भक्तिपूर्वक अपनी पुत्री देकर शैलराज स्वयं नारायणका सारूप्य प्राप्त कर लेंगे—इसमें संशय नहीं है। अतः आप शिवकी निन्दा करके गिरिराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न कीजिये। प्रभो! आपके सिवा दूसरा कोई यह कार्य करनेमें समर्थ नहीं है। इसलिये आप उनके घर जाइये।
देवताओंकी यह बात सुनकर स्वयं ब्रह्माजी उनसे कानोंको अमृतके समान मधुर प्रतीत होनेवाला तथा नीतिका सारभूत उत्तम वचन बोले।
ब्रह्माजीने कहा— बच्चो! मैं शिवकी निन्दा करनेमें समर्थ नहीं हूँ। यह अत्यन्त दुष्कर कार्य है। शिवकी निन्दा सम्पत्तिका नाश करनेवाली और विपत्तिका बीज है। तुमलोग भूतनाथ शिवको ही वहाँ भेजो। वे स्वयं अपनी निन्दा करें। परायी निन्दा विनाशका और अपनी निन्दा यशका कारण होती है*।
प्रिये! ब्रह्माजीका वचन सुनकर उन्हें प्रणाम
* परनिन्दा विनाशाय स्वनिन्दा यशसे परम्। (४१।७)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५९७
करके देवतालोग शीघ्र ही कैलास पर्वतको गये और वहाँ पहुँचकर भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे। स्तुति करके उन सबने करुणानिधान शंकरको अपना अभिप्राय बताया। उनकी बात सुनकर भगवान् शंकर हँसे और उन्हें आश्वासन दे स्वयं शैलराजके पास गये; फिर तो सब देवता शीघ्र ही अपने घर लौटकर आनन्दका अनुभव करने लगे। क्यों न हो, इष्टसिद्धि आनन्द देनेवाली और अभीष्ट वस्तुकी असिद्धि सदा दुःख बढ़ानेवाली होती है।
उधर शैलराज अपनी सभामें बन्धुवर्गसे घिरे हुए प्रसन्नतापूर्वक बैठे थे। उनके साथ पार्वती भी थीं। इसी बीच स्वयं भगवान् शिव ब्राह्मणका रूप धारण करके सहसा वहाँ आ पहुँचे। उनके मुख और नेत्रोंसे प्रसन्नता प्रकट हो रही थी। ब्राह्मणके हाथमें दण्ड और छत्र था। उनका वस्त्र लंबा था। उन्होंने ललाटमें उत्तम तिलक लगा रखा था। उनके एक हाथमें स्फटिकमणिकी माला थी और उन्होंने गलेमें भगवान् शालग्रामको धारण कर रखा था। उन्हें देखते ही हिमवान् अपने सेवकगणोंसहित उठकर खड़े हो गये। उन्होंने भूमिपर दण्डकी भाँति पड़कर भक्तिभावसे उस अपूर्व अतिथिको प्रणाम किया। पार्वतीने भी विप्ररूपधारी प्राणेश्वरको भक्तिपूर्वक मस्तक झुकाया। फिर ब्राह्मणने सबको प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद दिये। गिरिराजके दिये हुए आसनपर वे शीघ्रतापूर्वक बैठे और आतिथ्यमें मधुपर्क आदि जो कुछ भी मिला, वह सब उन्होंने प्रेमपूर्वक ग्रहण किया। शैलराजने ब्राह्मणका कुशल-समाचार पूछते हुए कहा—'विप्रवर! आपका परिचय क्या है?' तब उन द्विजराजने गिरिराजको आदरपूर्वक सब कुछ बताया।
ब्राह्मण बोले—गिरिराज! मैं घटक¹-वृत्तिका आश्रय लेकर भूमण्डलमें घूमता रहता हूँ। मेरी मनके समान तीव्र गति है। गुरुदेवके वरदानसे मैं सर्वत्र पहुँचनेमें समर्थ एवं सर्वज्ञ हूँ। मुझे ज्ञात हुआ है कि तुम अपनी इस लक्ष्मी-सरीखी दिव्य कन्याको शंकरके हाथमें देना चाहते हो, जिसके शील और कुलका कुछ भी पता नहीं है। शंकर निराश्रय हैं—उनका कहीं भी ठौर-ठिकाना नहीं है। वे असङ्ग—सदा अकेले रहनेवाले हैं। उनके न रूप है, न गुण। वे श्मशानमें विचरनेवाले, सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति तथा योगी हैं। शरीरपर वस्त्रतक नहीं है। सदा दिगम्बर—नंग-धड़ंग रहते हैं। उनके शरीरमें सर्पोंका वास है। अङ्गरागके स्थानमें राख—भभूत ही उनके अंगोंको विभूषित करती है। उनका स्वरूप ही व्यालग्राही (दुष्टों अथवा सर्पोंको ग्रहण करनेवाला) है। वे कालका व्यापादन (नाश या अपव्यय) करनेवाले हैं। अज्ञात²मृत्यु, ज्ञ³ अथवा अज्ञ, अनाथ⁴ और अबन्धु⁵ हैं। भव (संसारकी उत्पत्तिके कारण) अथवा अभव (जन्मरहित) हैं। वे सिरपर तपाये हुए सुवर्णकी- सी कान्तिवाली जटाओंका बोझ धारण करनेवाले (विरक्त) तथा निर्धन हैं। उनकी अवस्था कितनी
१- जो वरके लिये योग्य कन्या और कन्याके लिये योग्य वरका पता देकर उन दोनोंमें सगाई या वैवाहिक सम्बन्ध पक्का कराते हैं, उन्हें 'घटक' कहते हैं। उनकी वृत्ति ही घटक या घाटिका-वृत्ति है।
२- निन्दापक्षमें अज्ञातमृत्युका अर्थ है, जिसकी मृत्युका किसीको ज्ञान नहीं है अर्थात् जन्मकुण्डली आदि न होनेसे जिनकी आयुका पता लगाना असम्भव है। कन्या उसको दी जाती है, जिसके दीर्घायु होनेका निश्चय कर लिया गया हो। स्तुतिपक्षमें—जिन्हें मृत्युका कभी अनुभव नहीं हुआ अर्थात् जो अमर एवं मृत्युञ्जय है।
३- निन्दापक्षमें 'अज्ञ' पदच्छेद है और स्तुतिपक्षमें 'ज्ञ'।
४- निन्दापक्षमें अनाथका अर्थ असहाय है और स्तुतिपक्षमें जो नाथरहित है—स्वयं ही सबके नाथ हैं।
५- अबन्धु—बन्धुहीन, बेसहारा अथवा अद्वितीय।
५९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
है, इसका ज्ञान किसीको नहीं है। वे अत्यन्त वृद्ध हैं। विकारशून्य हैं। सबके आश्रय हैं अथवा सभी उनके आश्रय हैं। व्यर्थ घूमते रहते हैं। सर्पोंका हार धारण किये भीख माँगते हैं। (यही उनका परिचय है, जिन्हें तुम अपनी पुत्री देने जा रहे हो।) भगवान् नारायण ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा कुलीन हैं। (अथवा समस्त कुलोंकी उत्पत्तिके स्थान हैं।) तुम उनके महत्त्वको समझो। पार्वतीका दान करनेके निमित्त वे ही तुम्हारे लिये योग्य पात्र हैं। पार्वतीका विवाह शंकरसे हो रहा है, यह सुनते ही बड़े-बड़े लोगोंके मुखपर उपहाससूचक मुस्कराहट दौड़ जायगी। एक तुम हो, जो लाखों पर्वतोंके राजाधिराज हो और एक शिव हैं, जिनके एक भी भाई-बन्धु नहीं है। तुम अपने बन्धु-बान्धवोंसे तथा धर्मपत्नी मेनासे भी शीघ्र ही पूछो और इन सबकी सम्मति जाननेका प्रयत्न करो। भैया! और सबसे तो यत्नपूर्वक पूछना, किंतु पार्वतीसे इस विषयमें न पूछना; क्योंकि उसे शंकरके अनुरागका रोग लगा हुआ है। रोगीको दवा नहीं अच्छी लगती। उसे सदा कुपथ्य ही रुचिकर जान पड़ता है।
वृन्दावनविनोदिनी राधे! यों कह शान्त स्वभाववाले ब्राह्मणने शीघ्र ही स्नान और भोजन करके प्रसन्नतापूर्वक अपने घरका रास्ता लिया। ब्राह्मणकी पूर्वोक्त बात सुनकर मेना शोकयुक्त हो नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं। उनका हृदय व्यथित हो उठा। वे हिमालयसे बोलीं।
मेनाने कहा—शैलराज! मेरी बात सुनिये, जो परिणाममें सुख देनेवाली है। आप इन श्रेष्ठ पर्वतोंसे पूछिये, इनकी क्या राय है। मैं तो अपनी बेटीको शंकरके हाथमें नहीं दूँगी। देखिये, मैं सारे विषयोंको त्याग दूँगी, विष खा लूँगी और पार्वतीके गलेमें फाँसी लगाकर भयानक वनमें चली जाऊँगी।
ऐसा कह मेना रोषपूर्वक पार्वतीका हाथ पकड़कर कोपभवनमें चली गयीं। खाना-पीना छोड़कर रोने लगीं और भूमिपर ही सो गयीं। इसी समय भाइयोंसहित वसिष्ठ वहाँ आये। उन सबके साथ अरुन्धती भी थीं। शैलराजने उन सब महर्षियोंको प्रणाम करके बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन दिया और सोलह उपचार अर्पित करके भक्तिभावसे उनका पूजन किया। ऋषिलोग सभाके बीच उस सुखद सिंहासनपर बैठे और अरुन्धतीदेवी तत्काल वहाँ चली गयीं, जहाँ मेना और पार्वती थीं। जाकर उन्होंने देखा, मेना शोकसे अचेत हो पृथ्वीपर सो रही हैं। तब उन साध्वी देवीने मधुर वाणीमें कहा।
अरुन्धती बोलीं—पतिव्रते मेनके! उठो। मैं अरुन्धती तुम्हारे घर आयी हूँ। मुझे पितरोंकी मानसी कन्या तथा ब्रह्माजीकी पुत्रवधू समझो।
अरुन्धतीका स्वर सुनकर मेना शीघ्र ही उठकर खड़ी हो गयीं। उन्होंने लक्ष्मीके समान तेजस्विनी देवी अरुन्धतीके चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।
मेना बोलीं—अहो! हमारा जन्म बड़ा ही पुण्यमय है। हमलोगोंका यह कौन-सा पुण्य आज फलित हुआ है, जिससे ब्रह्माजीकी पुत्रवधू तथा वसिष्ठजीकी धर्मपत्नीने मेरे घरमें पदार्पण किया है। देवि! मैं आपकी किङ्करी हूँ। यह घर आपका है। हमारे बड़े पुण्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है।
सम्भ्रमपूर्वक इतना ही कहकर मेनाने सती अरुन्धतीको सोनेकी चौकीपर बिठाया और उनके चरण पखारकर उन्हें मिष्टान्न भोजन कराया। फिर स्वयं भी पुत्रीके साथ भोजन किया। तदनन्तर अरुन्धतीने मेनाको शिवके लिये नीतिकी बातें समझायीं और प्रसङ्गवश उनके साथ सम्बन्ध जोड़नेवाले वचन भी कहे। इधर उन महर्षियोंने भी शैलराजको उत्तम वाणीमें नीतिका सारतत्त्व समझाया और प्रसङ्गवश ऐसी बातें कहीं, जो
३७- शिवका सतीके शवको लेकर शोकवश समस्त लोकोंमें भ्रमण, भगवान् विष्णुका उन्हें समझाना और प्रकृतिकी स्तुतिके लिये कहना, शिवद्वारा की हुई स्तुतिसे संतुष्ट हुई प्रकृतिरूपिणी सतीका शिवको दर्शन एवं सान्त्वना देना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५९९
शिव और पार्वतीके सम्बन्धको जोड़नेवाली थीं।
ऋषि बोले—शैलराज! हमारी बात सुनो। यह तुम्हारे लिये शुभकारक है। तुम पार्वतीका विवाह शिवके साथ कर दो और उन लोकसंहारक महादेवके श्वशुर बनो। देवेश्वर शिव तुमसे याचना नहीं करेंगे। तुम यत्नपूर्वक शीघ्र ही उन्हें समझाओ—विवाहके लिये तैयार करो। तुम्हारी शंकाका निवारण करनेके लिये ब्रह्माजी स्वयं विवाह स्थिर करानेके निमित्त प्रयत्न करें। योगियोंमें श्रेष्ठ शंकर कभी विवाहके लिये इच्छुक नहीं हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे ही वे तुम्हारी पुत्रीको ग्रहण करेंगे। उसे ग्रहण करनेका दूसरा कारण यह है कि तुम्हारी कन्याकी तपस्याके अन्तमें उन्होंने उसे अपनानेकी प्रतिज्ञा कर ली है। इन दो कारणोंसे ही योगिराज शिव विवाह करेंगे।
ऋषियोंकी यह बात सुनकर हिमवान् हँसे और कुछ भयभीत हो अत्यन्त विनयपूर्वक बोले।
हिमालयने कहा—मैं शिवके पास कोई राजोचित सामग्री नहीं देखता। न रहनेके लिये कोई घर है, न ऐश्वर्य। यहाँतक कि उनके कोई स्वजन-बान्धव भी नहीं हैं। जो अत्यन्त निर्लिप्त योगी हो, उसके हाथ कन्या देना उचित नहीं है। आपलोग ब्रह्माजीके पुत्र हैं। अतः अपना सत्य एवं निश्चित मत प्रकट कीजिये। यदि पिता कामना, लोभ, भय अथवा मोहके वशीभूत हो सुयोग्य पात्रके हाथमें अपनी कन्या नहीं देता है तो सौ वर्षोंतक नरकमें पड़ा रहता है;* अतः मैं स्वेच्छासे शूलपाणिको अपनी कन्या नहीं दूँगा। ऋषियो! इस विषयमें जो उचित कार्य हो; वह आप कीजिये।
हिमवान्की बात सुनकर वेद-वेदाङ्गोंके विद्वान् ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ वेदोक्त मत प्रकट करनेके लिये उद्यत हुए।
वसिष्ठजीने कहा—शैलराज! लोक और वेदमें तीन प्रकारके वचन कहे गये हैं। शास्त्रज्ञ पुरुष अपनी निर्मल ज्ञानदृष्टिसे उन सभी वचनोंको जानता है। पहला वचन वह है, जो वर्तमान कालमें कानोंको सुन्दर लगे और जल्दी समझमें आ जाय; किंतु पीछे असत्य और अहितकर सिद्ध हो। ऐसी बात केवल शत्रु कहता है। उससे कदापि हित नहीं होता। दूसरे प्रकारका वचन वह है, जो आरम्भमें सहसा दुःखजनक जान पड़े; परंतु परिणाममें सुख देनेवाला हो। ऐसा वचन दयालु और धर्मशील पुरुष ही अपने भाई-बन्धुओंको समझानेके लिये कहता है। तीसरी उत्कृष्ट श्रेणीका वचन वह है जो कानोंमें पड़ते ही अमृतके समान मधुर प्रतीत हो तथा सर्वदा सुखकी प्राप्ति करानेवाला हो। उसमें सारतत्त्व सत्य होता है और उसमें सबका हित होता है। ऐसा वचन सर्वश्रेष्ठ तथा सभीको अभीष्ट होता है। गिरिराज! इस प्रकार नीतिशास्त्रमें तीन प्रकारके वचनोंका निरूपण किया गया है। अब तुम्हीं कहो इन तीनोंमेंसे कौन-सा वचन तुमसे कहूँ? तुम्हें कैसी बात सुननेकी इच्छा है? देवेश्वर शंकर वास्तवमें बाह्य धन-सम्पत्तिसे रहित हैं; क्योंकि उनका मन एकमात्र तत्त्वज्ञानके समुद्रमें निमग्न रहता है। बाह्य धन-सम्पत्ति आपाततः रमणीय जान पड़ती है; परंतु वह बिजलीकी चमककी भाँति शीघ्र ही नष्ट हो जानेवाली है। नित्यानन्दस्वरूप स्वात्माराम परमेश्वरको इस तरहकी सम्पत्तिके लिये क्या इच्छा होगी? गृहस्थ मनुष्य ऐसे पुरुषको अपनी पुत्री देता है, जो राज्य-वैभवसे सम्पन्न हो। जिसके मनमें स्त्रीसे द्वेष हो, ऐसे वरको कन्या देनेवाला पिता कन्याघाती होता है; परंतु कौन कह सकता है कि भगवान् शंकर दुःखी हैं? क्योंकि धनाध्यक्ष कुबेर भी उनके किङ्कर हैं।
* नानुरूपाय पात्राय पिता कन्यां ददाति चेत्। कामाल्लोभाद्भयान्मोहाच्छताब्दं नरकं व्रजेत्॥
(४१।५०)
६०० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जो भगवान् भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे सृष्टिका निर्माण एवं संहार करनेमें समर्थ हैं; जो ईश प्रकृतिसे परे, निर्गुण, परमात्मा एवं सर्वेश्वर हैं; जो समस्त जन्तुओंसे निर्लिप्त और उनमें लिप्त भी हैं; जो अकेले ही समस्त सृष्टिके संहारकर्म तथा सृष्टिकर्ममें भी समर्थ हैं एवं सर्वरूप हैं; निराकार, साकार, सर्वव्यापी और स्वेच्छामय हैं; जो ईश्वर स्वयं सृष्टिकार्यका सम्पादन करनेके लिये तीन रूप धारण करते हैं तथा सृष्टिकर्ता 'ब्रह्मा', पालनकर्ता 'विष्णु' एवं संहारकर्ता 'शिव'-नामसे प्रसिद्ध होते हैं; जो 'ब्रह्मा'-रूपसे ब्रह्मलोकमें, 'विष्णु'-रूपसे क्षीरसागरमें तथा 'शिव'-रूपसे कैलासमें वास करते हैं; वे परब्रह्म परमेश्वर ही 'श्रीकृष्ण' कहे गये हैं। ब्रह्मा आदि सब रूप उन्हींकी विभूतियाँ हैं। श्रीकृष्णके दो रूप हैं— द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुज-रूपसे तो वे वैकुण्ठमें निवास करते हैं और स्वयं द्विभुज-रूपसे गोलोकमें विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर उन भगवान् श्रीकृष्णके अंश हैं। कोई देवता उनकी कला है और कोई कलांश। श्रीकृष्णने सृष्टिके लिये उन्मुख होकर स्वयं अपनी प्रकृति (शक्तिस्वरूपा श्रीराधा)-को प्रकट किया और उनमें अपने तेजोमय वीर्यकी स्थापना की। उस गर्भसे एक डिम्बका प्रादुर्भाव हुआ, जिसके भीतरसे महाविराट् (नारायण) प्रकट हुए। उन्हींको महाविष्णु जानना चाहिये। वे श्रीकृष्णके सोलहवें अंश हैं। वे ही जब एकार्णवके जलमें शयन करते थे, उस समय उनके नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव हुआ। सृष्टिकर्ता ब्रह्माके भाल-देशसे चन्द्रशेखर शंकर प्रकट हुए हैं। महाविष्णुके वामपार्श्वसे विष्णु (लघु विराट्)-का प्राकट्य हुआ। शैलराज! इस प्रकार प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि प्राकृतिक कहे गये हैं।
श्रीकृष्णसे प्रकट हुई प्रकृतिने मुख्यतः चार प्रकारकी मूर्ति धारण की। इसके सिवा सृष्टि-संचालनके लिये लीलापूर्वक अपने अंश और कलाद्वारा उन्होंने और भी बहुतसे रूप धारण किये। श्रीकृष्णके वामाङ्गसे प्रकट हुई प्रकृतिदेवी स्वयं तो रासेश्वरी राधाके रूपमें प्रतिष्ठित हैं। वे ही स्वयं श्रीकृष्णके मुखसे प्रकट हो वाणी सरस्वती कहलायीं, जो राग-रागिनियोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। श्रीकृष्णके वक्षःस्थलसे प्रकट हुई वे सर्वसम्पत्स्वरूपिणी लक्ष्मीके नामसे प्रसिद्ध हुईं तथा सम्पूर्ण देवताओंके तेजमें उन्होंने अपने-आपको ही शिवारूपसे अभिव्यक्त किया और समस्त दानवोंका वध करके उन्होंने देवताओंको राज्यलक्ष्मी प्रदान की। तत्पश्चात् कल्पान्तरमें दक्षपत्नीके गर्भसे जन्म ले वे ही सती नामसे प्रसिद्ध हुईं और शिवकी पत्नी बनीं। दक्षने स्वयं ही सतीको शिवके हाथमें दिया; परंतु पिताके यज्ञमें पतिकी निन्दा सुनकर सतीने योगसे अपने शरीरको त्याग दिया। पितरोंकी मानसी कन्या मेनका तुम्हारी पत्नी हैं। उनके गर्भसे उन्हीं जगदम्बिका सतीने जन्म ग्रहण किया है। शैलराज ! यह शिवा जन्म-जन्ममें और कल्प-कल्पमें शिवकी पत्नी रही हैं। यह पराशक्ति जगदम्बा ज्ञानियोंकी बुद्धिरूपा है। इसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण बना रहता है। यह सर्वज्ञा, सिद्धिदायिनी और सिद्धिरूपिणी है। इसकी अस्थि और चिताभस्मको भगवान् शिव स्वयं भक्तिपूर्वक धारण करते हैं। कल्याणस्वरूप गिरिराज ! तुम स्वेच्छासे अपनी कन्या शिवको दे दो, दे दो। नहीं तो, वह स्वयं अपने प्राणवल्लभके स्थानको चली जायगी और तुम देखते रह जाओगे। पूर्वजन्मसे जो जिसकी पत्नी है, दूसरे जन्ममें वह अपने उस प्रियतमको अवश्य पाती है। प्रजापतिके इस नियमका कोई भी खण्डन नहीं कर सकता। भगवान् शिव स्वात्माराम और तत्त्वज्ञ हैं; अतः विवाहके लिये उत्सुक नहीं हैं। तारकासुरसे
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०१
पीड़ित हुए समस्त देवताओंने इसके लिये उनका स्तवन किया है। देवताओंकी पीड़ा देखकर ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर कृपालु भगवान् शिवने कृपापूर्वक उनके इस अनुरोधको स्वीकार किया है। विवाहकी प्रतिज्ञा करके योगीन्द्र शिवने जब शिवाको असंख्य क्लेश उठाते देखा, तब तुम्हारी पुत्रीकी तपस्याके स्थानमें वे स्वयं ब्राह्मणका रूप धारण करके आये और उसे आश्वासन तथा वर देकर पुनः अपने स्थानको लौट गये।
गिरिराज! इस समाचारको सुनकर ही इन्द्र आदि सब देवता प्रसन्नतापूर्वक यहाँ आये थे। भगवान् नारायण, ब्रह्मा, धर्म, ऋषि-मुनि, गन्धर्व, यक्ष और राक्षस सब इस समय एक स्थानपर मिले और इस विषयपर सबने अच्छी तरह विचार किया। उन्हीं लोगोंने हमें शीघ्र यहाँ भेजा है। देवी अरुन्धती अपने कर्तव्यका पालन करके उऋण हो चुकी हैं। तुम्हें समझानेमें हमें सदा ही अधिक प्रसन्नता होती है; तुम्हारे सामने शिवाके विवाहका शुभ कार्य प्राप्त है, जो सब कालमें सुख देनेवाला है। शैलेन्द्र! यदि स्वेच्छापूर्वक शिवाका विवाह शिवके साथ नहीं करोगे तो भी वह होकर ही रहेगा; क्योंकि भवितव्यता प्रबल होती है। वे महादेवजी रत्नसारनिर्मित रथपर योगीन्द्रोंमें श्रेष्ठ, ज्ञानियोंके गुरुके भी गुरु, आदि-मध्य और अन्तसे रहित, निर्विकार एवं अजन्मा परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णको बिठाकर यहाँ विवाहके लिये पधारेंगे। नारायणको साथ ले तपस्याके स्थानमें शिवने शिवाको वर दिया है। ईश्वरकी दुर्लभ प्रतिज्ञा कभी विफल नहीं हो सकती। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सारा जगत् नश्वर और अस्थिर है; परंतु साधु पुरुषोंकी प्रतिज्ञा दुर्लङ्घ्य और अमिट होती है।
हिमालय! एक ही इन्द्रने लीलापूर्वक समस्त पर्वतोंके पंख काट डाले। पवनदेवने खेल-खेलमें ही मेरु पर्वतके एक शिखरको भंग कर दिया। अतः तुम्हीं बताओ पर्वतोंमें कौन-से ऐसे हैं, जो देवताओंसे युद्ध कर सकें। पवनसे प्रेरित हो समस्त पर्वत एक ही क्षणमें समुद्रोंके भीतर जा गिरेंगे। शैलेन्द्र! यदि एकके लिये सारी सम्पत्तिका विनाश हो रहा हो तो उस एकको देकर शेष सबकी रक्षा कर लेनी चाहिये; परंतु यह नियम शरणागतके लिये लागू नहीं है। शरणागतकी रक्षाके लिये तो अपने प्राणोंका परित्याग कर देना भी उचित है। फिर स्त्री, पुत्र, धन आदि अन्य सब वस्तुओंकी तो बात ही क्या है? ऐसा नीतिवेत्ताओंका मत है। महाराज अनरण्य ब्राह्मणको अपनी पुत्री देकर शापसे मुक्त हुए और अपनी समस्त सम्पदाओंकी रक्षा कर सके। अनरण्य ब्राह्मणोंके हितकारी थे; परंतु उन्हींके शापमें डूबकर अत्यन्त कातर हो गये थे। उस समय नीतिशास्त्रके विद्वानोंने उन्हें शीघ्र ही कर्तव्यका बोध कराया और उसको पालन करके वे संकटसे मुक्त हुए। शैलेन्द्र! तुम भी शिवको अपनी पुत्री देकर समस्त बन्धुजनोंकी रक्षा करो और देवताओंको भी अधीन बना लो।
वसिष्ठजीकी बात सुनकर पर्वतेश्वर हँसे; उन्होंने व्यथित हृदयसे राजा अनरण्यका वृत्तान्त पूछा।
**हिमालय बोले—**ब्रह्मन्! राजाधिराज अनरण्य किस कुलमें उत्पन्न हुए थे और उन्होंने किस प्रकार अपनी पुत्री देकर समस्त सम्पदाओंकी रक्षा की थी?
**वसिष्ठजीने कहा—**शैलराज! नृपेश्वर अनरण्य मनुवंशी राजा थे। वे चिरंजीवी, धर्मात्मा, वैष्णव तथा जितेन्द्रिय थे। पहले मनुका नाम स्वायम्भुव है, जो ब्रह्माजीके पुत्र और अत्यन्त धर्मात्मा थे। उन्होंने इकहत्तर चतुर्युगतक धर्मपूर्वक राज्य किया था। तदनन्तर वे शतरूपाके साथ वैकुण्ठधाममें चले गये और श्रीहरिका दास्य एवं सामीप्य पाकर उनके दास हो गये। तत्पश्चात् स्वारोचिष मनु हुए,
९२- शिवद्वारा की हुई स्तुतिसे संतुष्ट होकर प्रकृतिरूपिणी सतीका प्रकट होना और उन्हें सान्त्वना देना
६०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण जो एक महान् पुरुष थे। उनका काल व्यतीत थे। नृपश्रेष्ठ मङ्गलारण्यके कोई पुत्र नहीं था; अतः हो जानेपर उत्तम मनुका राज्य आया। उत्तमके वे तपस्याके लिये पुष्करमें गये। वहाँ दीर्घकालतक भी चले जानेपर धर्मात्मा तामस मनुके पदपर तप करके महेश्वरसे वर पाकर वे घर आये। वहाँ प्रतिष्ठित हुए। उनके बाद ज्ञानिशिरोमणि रैवतका उन्हें अनरण्य नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जो भगवान् मन्वन्तर आया। तत्पश्चात् छठे चाक्षुष मनु और विष्णुका भक्त और जितेन्द्रिय था। उस पुत्रको सातवें श्राद्धदेव मनु उस पदके अधिकारी हुए राज्य देकर मङ्गलारण्य तपस्याके लिये वनमें चले हैं। आठवें मनुका नाम सावर्णि समझना चाहिये, गये। नृपश्रेष्ठ अनरण्य सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका जो सूर्यके ज्येष्ठ पुत्र हैं। वे ही पूर्वजन्ममें भूतलपर पालन करने लगे; उन्होंने भृगुजीको पुरोहित चैत्रवंशी राजा सुरथके नामसे प्रसिद्ध थे। नवें बनाकर सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया; परंतु इन्द्रपदको मनुका नाम दक्षसावर्णि और दसवेंका ब्रह्मसावर्णि नश्वर और अत्यन्त तुच्छ मानकर उन्होंने उसे ग्रहण है। ग्यारहवें श्रेष्ठ मनुको धर्मसावर्णि कहते हैं। नहीं किया। उन शुद्धबुद्धिवाले नरेशने अपने तत्पश्चात् रुद्रसावर्णिका मन्वन्तर आता है। रुद्रसावर्णि प्रज्वलित तेजसे इन्द्र, बलि तथा समस्त दानवेन्द्रोंको भगवान् शिवके भक्त और जितेन्द्रिय थे। उनके लीलापूर्वक जीत लिया। बाद क्रमशः देवसावर्णि और इन्द्रसावर्णि तेरहवें हिमालय ! उन महाराजके सौ पुत्र और एक तथा चौदहवें मन्वन्तरोंके अधिकारी हुए हैं। सुन्दरी कन्या हुई, जो लक्ष्मीके समान लावण्यमयी भैया ! इस प्रकार मैंने तुम्हें चौदह मनुओंका थी। उसका नाम पद्मा रखा गया था। वह पिताके परिचय दिया। इन सबके व्यतीत हो जानेपर घरमें रहकर धीरे-धीरे युवावस्थामें प्रविष्ट हुई। ब्रह्माजीका एक दिन पूरा होता है। अब तुम तब महाराजने वरकी खोजके लिये दूत भेजा। इन्द्रसावर्णिका सारा वृत्तान्त मुझसे सुनो। एक दिन अपने आश्रमको जानेके लिये उत्सुक इन्द्रसावर्णि सब मनुओंमें श्रेष्ठ, धर्मात्मा तथा हुए पिप्पलाद मुनिने तपस्याके निर्जन स्थानमें एक गदाधारी भगवान् विष्णुके अनन्य भक्त थे। उन्होंने गन्धर्वको देखा, जो स्त्रियोंसे घिरा था। उसका इकहत्तर युगोंतक धर्मपूर्वक राज्य किया। इसके चित्त शृङ्गाररसके समुद्रमें डूबा हुआ था। कामसे बाद वे अपने पुत्र सुरेन्द्रको राज्य देकर तपस्याके अत्यन्त मतवाले हुए उस गन्धर्वको दिन-रातका लिये वनमें चले गये। सुरेन्द्रका पुत्र महाबली भान नहीं होता था। उसे देखकर मुनिवर श्रीमान् श्रीनिकेत हुआ। उसका पुत्र महायोगी पिप्पलादके मनमें कामभावका उदय हुआ। पुरीषतरु और उसका पुत्र अत्यन्त तेजस्वी उनका चित्त तपस्यासे विचलित हो गया और वे गोकामुख हुआ। गोकामुखके वृद्धश्रवा, वृद्धश्रवाके पत्नी-प्राप्तिका उपाय सोचने लगे। एक दिन भानु, भानुके पुण्डरीक, पुण्डरीकके जिह्वल, पुष्पभद्रा नदीमें स्नानके लिये जाते हुए मुनीश्वर जिह्वलके शृङ्गी, शृङ्गीके भीम और भीमके पुत्र पिप्पलादने युवती पद्माको देखा, जो पद्मा यशश्चन्द्र हुए; जिन्होंने अपने यशसे चन्द्रमाको (लक्ष्मी)-के समान मनोरम जान पड़ती थी। जीत लिया था। संतपुरुष तथा देवतालोग सदा ही मुनिने आसपास खड़े हुए लोगोंसे पूछा - 'यह उनकी निर्मल कीर्तिका गान करते हैं। उनका पुत्र कन्या कौन है?' लोगोंने बताया - 'ये महाराज वरेण्य और वरेण्यका पुत्र पुरारण्य हुआ। पुरारण्यके अनरण्यकी पुत्री हैं।' मुनिने स्नान करके अपने धार्मिक पुत्रका नाम धरारण्य था। धरारण्यके पुत्र इष्टदेव राधावल्लभका पूजन किया और कामनापूर्वक मङ्गलारण्य हुए, जो ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और तपस्वी भिक्षा माँगनेके लिये वे अनरण्यकी सभामें गये।
आगमन, वरके अलौकिक रूप-सौन्दर्यको देख मेनाका प्रसन्न होना, स्त्रियोंद्वारा दुर्गाके सौभाग्यकी सराहना, दुर्गाका रूप, दम्पतिका एक-दूसरेकी ओर देखना, गिरिराजद्वारा दहेजके साथ शिवके हाथमें कन्याका दान तथा शिवका स्तवन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०३ मुनिको आया देख राजाने शीघ्र ही उनके चरणोंमें प्रणाम किया और भयसे व्याकुल हो मधुपर्क आदि देकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की। वह सब कुछ ग्रहण करके मुनिने कामनापूर्वक राजकन्याको माँगा। उनकी याचना सुनकर राजा चुप हो गये। उनसे कुछ भी उत्तर देते नहीं बना। मुनिने फिर याचना की। नरेश्वर! अपनी कन्या मुझे दीजिये; अन्यथा मैं एक ही क्षणमें सबको भस्म कर डालूँगा। मुनिके तेजसे राजाके समस्त सेवक आच्छन्न हो गये। मुनिको वृद्ध और जरा- जीर्ण हुआ देख भृत्यगणोंसहित राजा रोने लगे। सब रानियाँ भी रोदन करने लगीं। इस समय क्या करना चाहिये, इसका निर्णय करनेकी शक्ति किसीमें नहीं रह गयी। कन्याकी माता महारानी शोकसे व्याकुल हो मूर्च्छित हो गयीं। तब नीतिशास्त्रके ज्ञाता राजपण्डितने राजा, रानी, राजकुमारों और कन्याको उत्तम नीतिका उपदेश देते हुए कहा—'नरेश्वर! आज या दूसरे दिन आप अपनी कन्या किसी-न-किसीको देंगे ही। इस ब्राह्मणको छोड़कर और किसको आप कन्या देना उचित समझते हैं? मैं तो तीनों लोकोंमें इस ब्राह्मणके सिवा दूसरे किसीको कन्यादानका उत्तम पात्र नहीं देखता हूँ। आप मुनिको अपनी पुत्री देकर समस्त सम्पदाओंकी रक्षा कीजिये; अन्यथा राजकन्याके कारण सारी सम्पत्ति नष्ट हो जायगी। शरणागतके सिवा दूसरे किसी भी एक मनुष्यका त्याग करके सर्वस्वकी रक्षा की जा सकती है।' पण्डितजीकी बात सुनकर राजाने बारंबार विलापके पश्चात् राजकन्याको वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करके मुनीन्द्रके हाथमें दे दिया। प्राणवल्लभाको पाकर मुनि प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमको लौट गये। राजा भी शोकके कारण सबका त्याग करके तपस्याके लिये चले गये। पति और पुत्रीके शोकसे सुन्दरी महारानीने अपने प्राणोंको त्याग दिया। राजाके बिना उनके पुत्र, पौत्र और भृत्यगण शोकसे अचेत हो गये। राजा अनरण्य गोलोकनाथ राधावल्लभका चिन्तन और सेवन करते हुए तप करके गोलोकधामको चले गये। उनका ज्येष्ठ पुत्र कीर्तिमान् राजा हुआ। वह भूतलपर समस्त प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करने लगा। (अध्याय ४१) अनरण्यकी पुत्री पद्माकी धर्मद्वारा परीक्षा, सती पद्माका उनको शाप देना तथा उस शापसे उनकी रक्षाकी भी व्यवस्था करना, वसिष्ठजीका हिमवान्को संक्षेपसे सतीके देह-त्यागका प्रसङ्ग सुनाना वसिष्ठजी कहते हैं— गिरिराज! जैसे लक्ष्मी नारायणकी सेवा करती हैं, उसी प्रकार अनरण्यकी कन्या पद्मा मन, वाणी और क्रियाद्वारा भक्तिभावसे पिप्पलादमुनिकी सेवा करने लगी। एक दिन वह सती राजकुमारी स्नान करनेके लिये गङ्गाजीके तटपर गयी। मार्गमें राजाका वेष धारण किये हुए साक्षात् धर्मने उसके मनके भावोंको जाननेके लिये पवित्र भावनासे ही कामी पुरुषकी भाँति कुछ बातें कहीं। उन्हें सुनकर पद्मा बोली—'ओ पापिष्ठ नृपाधम! दूर चला जा, दूर चला जा। यदि तू मेरी ओर कामदृष्टिसे देखेगा तो तत्काल भस्म हो जायगा। जिनका शरीर तपस्यासे परम पवित्र हो गया है; उन मुनिश्रेष्ठ पिप्पलादको छोड़कर क्या मैं तेरे-जैसे स्त्रीके गुलाम तथा रति- लम्पटकी सेवा स्वीकार करूँगी? मैं तेरे लिये माताके समान हूँ तो भी तू भोग्या स्त्रीका भाव लेकर मुझसे बात कर रहा है। इसलिये मैं शाप देती हूँ कि कालक्रमसे तेरा क्षय हो जायगा।'
| ६०४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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सतीका शाप सुनकर देवेश्वर धर्म काँपने लगे और राजाका रूप छोड़ अपनी मूर्ति धारण करके उससे बोले।
धर्मने कहा—मातः ! आप मुझे धर्मज्ञोंके गुरुका भी गुरु धर्म समझिये। पतिव्रते ! मैं सदा परायी स्त्रीके प्रति माताका ही भाव रखता हूँ। मैं आपके आन्तरिक भावको समझनेके लिये ही आया था। यद्यपि आप-जैसी सतियोंका मन कैसा होता है, यह मैं जानता था; तथापि दैवसे प्रेरित होकर परीक्षा करनेके लिये चला आया। साध्वि ! आपने जो मेरा दमन किया है, वह नीतिके विरुद्ध नहीं है; सर्वथा उचित ही है; क्योंकि कुमार्गपर चलनेवालोंके लिये दण्डका विधान साक्षात् परमेश्वर श्रीकृष्णने ही किया है। जो धर्मको भी स्वधर्मका ज्ञान कराने और कालकी भी कलना (गणना) तथा स्रष्टाकी भी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो समयपर संहर्ताका भी संहार करनेकी शक्ति रखते हैं और अनायास ही स्रष्टाकी भी सृष्टि कर सकते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो शत्रुको भी मित्र बना सकते हैं, कलहको भी उत्तम प्रेममें परिणत कर सकते हैं तथा सृष्टि और विनाशकी भी क्षमता रखते हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो सबको शाप, सुख, दुःख, वर, सम्पत्ति और विपत्ति भी देनेमें समर्थ हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जिन्होंने प्रकृतिको प्रकट किया है, महाविष्णु तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर आदिको उत्पन्न किया है; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जिन्होंने दूधको श्वेत, जलको शीतल और अग्निको दाहिका शक्तिसे सम्पन्न बनाया है; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो अत्यन्त तेजःपुञ्जसे प्रकट होते हैं, जिनकी मूर्ति तेजोमयी है तथा जो गुणोंसे श्रेष्ठ एवं निर्गुण हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है और जो सर्वरूप, सर्वबीजस्वरूप, सबके अन्तरात्मा तथा समस्त जीवोंके लिये बन्धुस्वरूप हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है।
यों कहकर जगद्गुरु धर्म पद्माके सामने खड़े हो गये। शैलराज! धर्मका परिचय पाकर वह साध्वी सहसा बोल उठी।
पद्माने कहा—भगवन् ! क्या आप ही सबके समस्त कर्मोंके साक्षी, सबके भीतर रहनेवाले, सर्वात्मा, सर्वज्ञ तथा सर्वतत्त्ववेत्ता धर्म हैं? फिर मेरे मनको जाननेके लिये मुझ दासीकी विडम्बना क्यों करते हैं? धर्मदेव ! आपके प्रति मैंने जो कुछ किया है, वह मेरा अपराध है। प्रभो ! मैंने स्त्री-स्वभाववश आपको न जाननेके कारण क्रोधपूर्वक शाप दे दिया है। उस शापकी क्या व्यवस्था होगी; यही इस समय मेरा चिन्ताका विषय है। आकाश, सम्पूर्ण दिशाएँ और वायु भी यदि नष्ट हो जायँ तो भी पतिव्रताका शाप कभी नष्ट नहीं हो सकता*। मेरे शापसे यदि आप नष्ट हो जाते हैं तो सम्पूर्ण सृष्टिका ही नाश हो जायगा। यह सोचकर मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही हूँ; तथापि आपसे कहती हूँ। देवेश्वर! जैसे पूर्णिमाको चन्द्रमा पूर्ण होते हैं, उसी प्रकार सत्ययुगमें आप चारों चरणोंसे परिपूर्ण रहेंगे। उस युगमें सर्वत्र और सर्वदा दिन-रात आप विराजमान होंगे। किंतु भगवन् ! त्रेतायुग आनेपर आपके एक चरणका नाश हो जायगा। प्रभो! द्वापरमें दो पैर क्षीण होंगे और कलियुगमें आपका तीसरा पैर भी नष्ट हो जायगा। कलिके अन्तमें आपका चौथा चरण भी छिप जायगा। फिर सत्ययुग आनेपर आप चारों चरणोंसे परिपूर्ण हो जायँगे। सत्ययुगमें आप सर्वव्यापी होंगे और उससे भिन्न युगोंमें भी कहीं-कहीं पूर्णरूपमें विद्यमान रहेंगे। प्रभो! जहाँ आपका स्थान या
*आकाशोऽसौ दिशः सर्वा यदि नश्यन्ति वायवः । तथापि साध्वीशापस्तु न नश्यति कदाचन ॥
(४२।३४)
·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०५
आधार होगा, उसे बताती हूँ, सुनिये।
सम्पूर्ण वैष्णव, यति, ब्रह्मचारी, पतिव्रता स्त्री, ज्ञानी पुरुष, वानप्रस्थ, भिक्षु (संन्यासी), धर्मशील राजा, साधु-संत, श्रेष्ठ वैश्यजाति तथा सत्पुरुषोंके संसर्गमें रहनेवाले द्विज, सेवक, शूद्र— इन सबमें आप सदा पूर्णरूपसे विराजमान रहेंगे। युग-युगमें जहाँ भी पुण्यात्मा पुरुष होंगे, वे आपके आधार रहेंगे। पीपल, वट, बिल्व, तुलसी, चन्दन—इन वृक्षोंपर; दीक्षा, परीक्षा, शपथ, गोशाला और गोपद भूमियोंमें; विवाहमें, फूलोंमें, देववृक्षोंमें, देवालयोंमें, तीर्थोंमें तथा साधु पुरुषोंके गृहोंमें आपका सदा निवास होगा। वेद-वेदाङ्गोंके श्रवणकालमें, जलमें, सभाओंमें, श्रीकृष्णके नाम और गुणोंके कीर्तन, श्रवण तथा गानके स्थानोंमें; व्रत, पूजा, तप, न्याय, यज्ञ एवं साक्षीके स्थानोंमें; गोशालाओंमें तथा गौओंमें विद्यमान रहकर आप अपनेको पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित देखेंगे। धर्म! उन स्थानोंमें आप क्षीण नहीं होंगे। इनसे भिन्न स्थानोंमें आपकी कृशता देखी जायगी। जो स्थान आपके लिये अगम्य हैं; उनका वर्णन सुनिये। सम्पूर्ण व्यभिचारिणियोंमें, नरघाती मनुष्योंके घरोंमें, नरहत्या करनेवाले नीच पुरुषोंमें, मूर्ख और दुष्टोंमें, देवता, गुरु, ब्राह्मण, इष्टदेव तथा पालनीय मनुष्योंके धनका अपहरण करनेवालोंमें; दुष्टों, धूर्तों और चोरोंमें, रति-स्थानोंमें; जूआ, मदिरापान और कलहके स्थानोंमें; शालग्राम, साधु, तीर्थ और पुराणोंसे रहित स्थलोंमें; डाकुओंके स्नेहमें, वाद-विवादमें, ताड़की छायामें, गर्वीले मनुष्योंमें, तलवारसे जीविका चलानेवाले तथा स्याहीसे जीवन-निर्वाह करनेवाले, देवालयोंमें पूजाकी वृत्तिसे जीनेवाले तथा ग्राम-पुरोहितोंमें; बैल जोतनेवालों, सुनारों और जीव-हिंसासे जीविका चलानेवालोंमें; भर्तृनिन्दित नारियों तथा नारीके वशमें रहनेवाले पुरुषोंमें; दीक्षा, संध्या तथा विष्णुभक्तिसे हीन द्विजोंमें; अपनी पुत्री तथा पत्नी बेचनेवालोंमें; शालग्राम और देवमूर्तियोंका विक्रय करनेवालोंमें; मित्रद्रोही, कृतघ्न, सत्यनाशक तथा विश्वासघातियोंमें; शरणागतकी रक्षासे दूर रहनेवालों तथा शरणमें आये हुए लोगोंका नाश करनेवालोंमें; सदा झूठ बोलनेवाले, सीमाका अपहरण करनेवाले, काम, क्रोध और लोभवश झूठी गवाही देनेवाले, पुण्यकर्महीन तथा पुण्यकर्मके विरोधी मनुष्योंमें आप नहीं रहेंगे। प्रभो! इन निन्दनीय स्थानोंमें रहनेका आपको अधिकार नहीं होगा। ऐसी व्यवस्था होनेसे मेरी बात भी सच्ची हो जायगी। तात! अब मैं पतिसेवाके लिये जाऊँगी। आप भी अपने घरको पधारिये।
ऐसी बातें कहनेवाली पद्माके वचन सुनकर ब्रह्मपुत्र श्रीमान् धर्मका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा। वे उस पतिव्रतासे अत्यन्त विनयपूर्वक बोले।
धर्मने कहा—मेरी रक्षा करनेवाली देवि! तुम धन्य हो। पतिपरायणा हो। तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। मैं तुम्हें वर देता हूँ; ग्रहण करो। बेटी! तुम्हारे पति युवावस्थासे सम्पन्न तथा रतिकर्ममें समर्थ हों। साध्वि! वे रूपवान् और गुणवान् हों। उनका यौवन सदा ही स्थिर रहे। वत्से! तुम भी उत्तम ऐश्वर्यसे युक्त एवं स्थिरयौवना हो जाओ। तुम्हारे पति मार्कण्डेयके बाद दूसरे चिरंजीवी पुरुष हों। वे कुबेरसे भी धनी और इन्द्रसे भी बढ़कर ऐश्वर्यवान् हों। शिवके समान विष्णुभक्त तथा कपिलके बाद उन्हींकी श्रेणीके सिद्ध हों। तुम जीवनभर पतिके सौभाग्यसे सम्पन्न बनी रहो। साध्वि! तुम्हारे घर कुबेरके भवनसे भी अधिक सुन्दर हों। तुम अपने पतिसे भी अधिक गुणवान् और चिरंजीवी दस पुत्रोंकी माता बनोगी; इसमें संशय नहीं है।
शैलराज! यों कहकर धर्मराज चुपचाप खड़े हो गये। पद्मा उनकी परिक्रमा और प्रणाम करके अपने घरको चली गयी। धर्म भी उसे आशीर्वाद दे अपने धामको गये और प्रत्येक सभामें
३९- शिव-पार्वतीके विवाहका होम, स्त्रियोंका नव-दम्पतिको कौतुकागारमें ले जाना, देवाङ्गनाओंका उनके साथ हास-विनोद, शिवके द्वारा कामदेवको जीवन-दान, वर-वधू और बारातकी विदाई, शिवधाममें पति-पत्नीकी एकान्त वार्ता, कैलासमें अतिथियोंका सत्कार और विदाई, सास-ससुरके बुलानेपर शिव-पार्वतीका वहाँ जाना तथा पार्षदोंसहित शिवका श्वशुर-गृहमें निवास
६०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
पतिव्रताकी प्रशंसा करने लगे। पद्मा अपने तरुण पतिके साथ सदा एकान्तमें मिलन-सुखका अनुभव करने लगी। पीछे उसके दस श्रेष्ठ पुत्र हुए जो उसके पतिसे भी अधिक गुणवान् थे। गिरिराज ! इस प्रकार मैंने सारा पुरातन इतिहास कह सुनाया। अनरण्यने अपनी पुत्री देकर समस्त सम्पत्तिकी रक्षा कर ली। तुम भी सबके ईश्वर भगवान् शिवको अपनी कन्या देकर अपने समस्त बन्धुओं तथा सम्पूर्ण सम्पत्तिकी रक्षा करो। शैलराज ! एक सप्ताह बीतनेपर अत्यन्त दुर्लभ शुभ क्षणमें, जब चन्द्रमा लग्नेश होकर लग्नमें अपने पुत्र बुधके साथ विराजमान होंगे; रोहिणीका संयोग पाकर प्रसन्नताका अनुभव करते होंगे; चन्द्र और तारा सर्वथा शुद्ध होंगे; मार्गशीर्ष मासका सोमवार होगा; लग्न सब प्रकारके दोषोंसे रहित, समस्त शुभग्रहोंकी दृष्टिसे लक्षित और असत् ग्रहोंसे शून्य होगा; उत्तम संतानप्रद, पतिसौभाग्यदायक, वैधव्यनिवारक, जन्म-जन्ममें सुख प्रदान करनेवाला तथा प्रेमका कभी विच्छेद न होने देनेवाला अत्यन्त श्रेष्ठतम योग उपस्थित होगा; उस समय तुम अपनी पुत्री मूलप्रकृति ईश्वरी जगदम्बाको जगत्पिता महादेवजीके हाथमें देकर कृतकृत्य हो जाओ।
गिरिराज ! कल्पान्तरकी बात है; वह मूलप्रकृति ईश्वरी भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे दक्षकन्या सतीके रूपमें आविर्भूत हुई। दक्षने उस देवीको विधि-विधानके साथ शूलपाणि शिवके हाथमें दे दिया। तदनन्तर मेरे पिताके यज्ञमें, जहाँ समस्त देवताओंकी सभा जुड़ी हुई थी, दक्षका उन शूलपाणि महादेवजीके साथ सहसा महान् कलह हो गया। उस कलहसे रुष्ट हो त्रिनेत्रधारी शिव ब्रह्माजीको नमस्कार करके चले गये। दक्षके मनमें भी रोष था; अतः वे भी अपने गणोंके साथ उसी क्षण अपने घरको चल दिये। घर जाकर दक्षने रोषपूर्वक ही यज्ञकी सामग्री एकत्र की और उसके द्वारा महान् यज्ञका आयोजन किया। उस यज्ञमें उन्होंने द्वेषवश शूलपाणि शंकरको भाग नहीं दिया। यह देख सतीके मनमें पिताके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें लाल हो गयीं। उसने व्यथित-हृदयसे पिताको बहुत फटकारा और यज्ञस्थानसे उठकर वह माताके पास गयी। उस परात्परा देवीको तीनों कालोंका ज्ञान था; अतः उसने भविष्यमें घटित होनेवाली घटनाका वहाँ वर्णन किया। यज्ञका विध्वंस, पिता दक्षका पराभव, यज्ञस्थानसे देवताओं, मुनियों, ऋत्विजों तथा पर्वतोंका पलायन, शंकरके सैनिकोंकी विजय, अपनी मृत्यु, पत्नीके विरहसे आतुर-चित्त होकर शोकवश पतिका पर्यटन, उनके नेत्रोंके जलसे सरोवरका निर्माण, भगवान् जनार्दनके समझानेसे उनका धैर्य धारण करना, दूसरे शरीरसे पुनः शिवकी प्राप्ति, उनके साथ विहार तथा अन्य सब भावी वृत्तान्त बताकर सती माता और बहनोंके मना करनेपर भी दुःखी हो घरसे चली गयी। वह सिद्धयोगिनी थी। अतः योगबलसे सबकी दृष्टिसे ओझल हो गयी। गङ्गाजीके तटपर जाकर शंकरके ध्यान और पूजनके पश्चात् उनके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई सुन्दरी सतीने शरीरको त्याग दिया और गन्धमादन पर्वतकी गुफामें विद्यमान उस दिव्य विग्रहमें प्रवेश किया, जिसके द्वारा उसने पूर्वकालमें दैत्योंके समस्त कुलका संहार किया था। वह घटना देख सब देवता अत्यन्त विस्मित हो हाहाकार कर उठे। शंकरके सैनिक दक्ष-यज्ञका विनाश तथा सबका पराभव करके शोकसे व्याकुल हो लौट गये और शीघ्र ही सारा वृत्तान्त अपने स्वामीसे कह सुनाया। वह समाचार सुनकर समस्त रुद्रगणोंसे घिरे हुए संहारकारी महेश्वर गङ्गाजीके उस तटपर गये, जहाँ देवी सतीका शरीर पड़ा था।
(अध्याय ४२)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६०७
शिवका सतीके शवको लेकर शोकवश समस्त लोकोंमें भ्रमण, भगवान् विष्णुका उन्हें समझाना और प्रकृतिकी स्तुतिके लिये कहना, शिवद्वारा की हुई स्तुतिसे संतुष्ट हुई प्रकृतिरूपिणी सतीका शिवको दर्शन एवं सान्त्वना देना
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर महादेवजीने गङ्गाजीके तटपर सोयी हुई दुर्गास्वरूपा सतीकी मनोहर मूर्ति देखी, जिसके मुखारविन्दकी कान्ति अभी मलिन नहीं हुई थी। वह शरीरपर श्वेत वस्त्र धारण किये और हाथमें अक्षमाला लिये दिव्य तेजसे प्रकाशित हो रही थी। उसके अङ्गोंसे तपाये हुए सुवर्णकी-सी कमनीय कान्ति फैल रही थी। सतीके उस प्राणहीन शरीरको देखकर भगवान् शिव विरहकी आगसे जलने लगे। वे मूर्तिमान् तत्त्वराशि होनेपर भी सतीके वियोगमें कभी मूर्च्छित, कभी चेतन होते हुए भाँति-भाँतिसे विलाप करने लगे। तदनन्तर उनके स्वर्णप्रतिम मृत देहको वक्षपर धारण करके सप्तद्वीप, लोकालोक पर्वत तथा सप्तसिन्धुमें भ्रमण करते हुए भारतमें शतशृङ्ग-गिरिके पास जम्बूद्वीपमें निर्जन प्रदेशस्थ अक्षयवटके नीचे नदीतीरपर पहुँचे। वहाँसे महायोगी शंकर विरहाकुलचित्त होकर पूरे एक वर्षतक पृथ्वीपर परिभ्रमण करते रहे। सती देवीके उस मृत देहके अङ्ग-प्रत्यङ्ग जिस-जिस स्थानपर गिरे, वे स्थान कामनाप्रद सिद्धपीठ हो गये। तदनन्तर शंकरने सतीके अवशिष्ट अङ्गोंका संस्कार किया। अस्थियोंकी माला गूँथकर उसे अपना कण्ठभूषण बना लिया और प्रतिदिन सतीका शरीर-भस्म अपने शरीरपर लगाने लगे। इसके बाद वे निश्चेष्ट-से होकर एक वटमूलमें पड़ गये। तब लक्ष्मीपूजित भगवान् नारायण अपने पार्षदों, देवताओं और ऋषि-मुनियोंके साथ वहाँ पधारकर श्रीशंकरको गोदमें लेकर उन्हें समझाने लगे।
श्रीभगवान्ने कहा— स्वात्माराम शिव! मेरी बात सुनो और उसपर ध्यान दो। वह हितकारक, अध्यात्मज्ञानका सार, दुःख-शोकका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अध्यात्मज्ञानका विद्यमान बीज है। यद्यपि तुम स्वयं ज्ञानकी निधि, विधि, सर्वज्ञ तथा स्रष्टाओंके भी स्रष्टा हो, तथापि मैं तुम्हें ज्ञानका उपदेश दे रहा हूँ। प्राण-संकटके समय विद्वान् पुरुष विद्वान्को भी समझा सकता है। लोकमें यह व्यवहार है कि सब लोग सबको परस्पर समझाते-बुझाते हैं। शम्भो! महेश्वर! दुर्दिनमें दुःख, शोक और भयकी प्राप्ति होती है। जब दुर्दिन बीत जाता और सुदिन आ जाता है, तब उनकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? उस समय तो हर्ष और ऐश्वर्यविषयक दर्पकी ही निरन्तर वृद्धि होती है; परंतु विद्वान् पुरुष इन सबको स्वप्नकी भाँति मिथ्या समझते हैं। महादेव! तुम ज्ञानकी उत्पत्तिके कारण तथा सनातन हो। ज्ञान प्राप्त करो—अपने स्वरूपका स्मरण करो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम सचेत होओ—होशमें आओ। निश्चय ही तुम्हें सतीकी प्राप्ति होगी। जैसे शीतलता जलको, दाहिका शक्ति अग्निको, तेज सूर्यको तथा गन्ध पृथ्वीको कभी नहीं छोड़ती है; उसी तरह सती तुम्हें छोड़कर अलग नहीं रह सकती है।
सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप ज्ञाननिधे शंकर! मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो। तुम परात्पर परमेश्वर हो, परंतु शोकवश अपने-आपको भूल गये हो। प्रत्येक जगत्में तथा जन्म-जन्ममें सुदिन और दुर्दिनका चक्र निरन्तर चला करता है। वे सुदिन और दुर्दिन ही समस्त प्राकृत प्राणियोंके लिये सुख-दुःखकी प्राप्तिके मुख्य कारण होते हैं। सुखसे हर्ष, दर्प, शौर्य, प्रमाद, राग, ऐश्वर्यकी अभिलाषा और विद्वेष निरन्तर प्रकट होते रहते
४०- इन्द्रके अभिमान-भङ्गका प्रसङ्ग—प्रकृति और गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रको शाप, गौतम-मुनिके शापसे इन्द्रके शरीरमें सहस्र योनियोंका प्राकट्य, अहल्याका उद्धार, विश्वरूप और वृत्रके वधसे इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण, इन्द्रका मानसरोवरमें छिपना, बृहस्पतिका उनके पास जाना, इन्द्रद्वारा गुरुकी स्तुति, ब्रह्महत्याका भस्म होना, इन्द्रका विश्वकर्माद्वारा नगरका निर्माण कराना, द्विजबालकरूपधारी श्रीहरि तथा लोमश-मुनिके द्वारा इन्द्रका मान-भंजन, राज्य छोड़नेको उद्यत हुए विरक्त इन्द्रका बृहस्पतिजीके समझानेसे पुनः राज्यपर ही प्रतिष्ठित रहना
६०८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
हैं। दुःख, शोक और उद्वेगसे सदा भयकी प्राप्ति होती है। महेश्वर! यदि इनके बीज नष्ट हो जायें तो ये सब स्वतः नष्ट हो जाते हैं। चञ्चल मन ही पुण्य और पापका बीज है। शम्भो! सम्पूर्ण इन्द्रियोंसहित मन मेरा अंश है। सबका जनक जो अहंकार है, उसके अधिष्ठाता चेतन तुम हो और ये ब्रह्मा बुद्धिके अधिष्ठाता हैं। परब्रह्म परमात्मा एक हैं। गुण-भेदसे ही सदा उसके भिन्न-भिन्न रूप होते हैं। वह ब्रह्मतत्त्व एक होनेपर भी अनेक प्रकारका है। शिव! वह सगुण भी है और निर्गुण भी। जो मायारूप उपाधिका आश्रय लेता है, वह सगुण और जो मायातीत है, वह निर्गुण कहलाता है। भगवान् स्वेच्छामय हैं। वे अपनी इच्छासे ही विविध रूपोंमें प्रकट होते हैं। उनकी इच्छाशक्तिका ही नाम प्रकृति है। वह नित्यस्वरूपा और सदा सबकी जननी है। कुछ लोग ज्योतिःस्वरूप सनातन ब्रह्मको एक ही बताते हैं तथा कुछ दूसरे विद्वान् उसे प्रकृतिसे युक्त होनेके कारण द्विविध कहते हैं। जो एक बताते हैं, उनका मत सुनो। ब्रह्म माया तथा जीवात्मा दोनोंसे परे है। उस ब्रह्मसे ही वे दोनों (माया और जीवात्मा) प्रकट होते हैं; अतः ब्रह्म ही सबका कारण है। वह परब्रह्म एक होकर भी स्वेच्छासे दो हो जाता है। उसकी इच्छाशक्ति ही प्रकृति है, जो सदा सम्पूर्ण शक्तियोंकी जननी होती है। उससे संयुक्त होनेके कारण वे परमात्मा 'सगुण' कहे जाते हैं। वे ही सबके आधार, सनातन, सर्वेश्वर, सर्वसाक्षी तथा सर्वत्र फलदाता होते हैं। शम्भो! शरीर भी दो प्रकारका होता है—एक नित्य और दूसरा प्राकृत। नित्य शरीरका विनाश नहीं होता; परंतु प्राकृत शरीर सदा नश्वर होता है। भगवन्! हम दोनोंके शरीर नित्य हैं। हमारे अंशभूत जो अन्य जीव हैं, उनके शरीर त्रिगुणात्मिका प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण प्राकृत कहलाते हैं। प्राकृत शरीर सदा ही विनाशशील हैं। रुद्र आदि तुम्हारे अंश हैं और विष्णुरूपधारी मेरे अंश। मेरे भी दो रूप हैं—द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुज मैं हूँ और वैकुण्ठधाममें लक्ष्मी तथा पार्षदोंके साथ रहता हूँ। द्विभुजरूपसे मैं श्रीकृष्ण कहलाता हूँ और गोलोकमें गोपियों तथा राधाके साथ निवास करता हूँ।
जो ब्रह्मको द्विविध बताते हैं, उनके मतमें दो प्रधान तत्त्व हैं—नित्य पुरुष तथा नित्या प्रकृति ईश्वरी। शिव! वे दोनों सदा परस्पर संयुक्त रहते हैं। वे ही सबके माता-पिता हैं। वे दोनों अपनी इच्छाके अनुसार कभी साकार और कभी निराकार होते हैं। दोनों ही सर्वस्वरूप हैं। जैसे पुरुषकी नित्य प्रधानता है, उसी तरह प्रकृतिकी भी है। शम्भो! यदि तुम सतीको पाना चाहते हो तो प्रकृतिका स्तवन करो। तुमने पूर्वकालमें दुर्वासाको प्रसन्नतापूर्वक जिस स्तोत्रका उपदेश दिया था, वह दिव्य है और उसका कण्वशाखामें वर्णन किया गया है। तुम उसीके द्वारा जगदम्बाकी आराधना करो। शिव! मेरे आशीर्वादसे तुम्हारे शोकका नाश हो। तुम्हें कल्याणकी प्राप्ति हो और तुम्हारे लिये विप्लवका कारण बना हुआ पत्नीके वियोगका यह रोग दूर हो जाय।
गिरिराज! ऐसा कहकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु चुप हो गये। तदनन्तर महेश्वरने प्रकृतिके स्तवनका कार्य आरम्भ किया। उन्होंने स्नान करके श्रीकृष्ण और ब्रह्माको भक्तिपूर्वक हाथ जोड़ नमस्कार किया। उस समय उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा था।
महेश्वर बोले—'ॐ नमः प्रकृत्यै'
ॐ (सच्चिदानन्दमयी) प्रकृतिदेवीको नमस्कार है।
ब्राह्मि! तुम ब्रह्मस्वरूपिणी हो। सनातनि!
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०९
परमात्मस्वरूपे ! परमानन्दरूपिणि ! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। भद्रे ! तुम भद्र अर्थात् कल्याण प्रदान करनेवाली हो। दुर्गे ! तुम दुर्गम संकटका निवारण तथा दुर्गतिका नाश करनेवाली हो। भवसागरसे पार उतारनेके लिये नूतन एवं सुदृढ़ नौकास्वरूपिणी देवि ! मुझपर कृपा करो। सर्वस्वरूपे ! सर्वेश्वरि ! सर्वबीजस्वरूपिणि ! सर्वाधारे ! सर्वविद्ये ! विजयप्रदे ! मुझपर प्रसन्न होओ। सर्वमङ्गले ! तुम सर्वमङ्गलरूपा, सभी मङ्गलोंको देनेवाली तथा सम्पूर्ण मङ्गलोंकी आधारभूता हो; मेरे ऊपर कृपा करो। भक्तवत्सले ! तुम निद्रा, तन्द्रा, क्षमा, श्रद्धा, तुष्टि, पुष्टि, लज्जा, मेधा और बुद्धिरूपा हो; मुझपर प्रसन्न होओ। वेदमातः ! तुम वेदस्वरूपा, वेदोंका कारण, वेदोंका ज्ञान देनेवाली और सम्पूर्ण वेदाङ्ग-स्वरूपिणी हो; मेरे ऊपर कृपा करो। जगदम्बिके ! तुम दया, जया, महामाया, क्षमाशील, शान्त, सबका अन्त करनेवाली तथा क्षुधा-पिपासारूपिणी हो; मुझपर प्रसन्न होओ। विष्णुमाये ! तुम नारायणकी गोदमें लक्ष्मी, ब्रह्माके वक्षः-स्थलमें सरस्वती और मेरी गोदमें महामाया हो; मेरे ऊपर कृपा करो। दीनवत्सले ! तुम कला, दिशा, दिन तथा रात्रिस्वरूपा एवं कर्मोंके परिणाम (फल)-को देनेवाली हो; मुझपर प्रसन्न होओ। राधिके ! तुम सभी शक्तियोंका कारण, श्रीकृष्णके हृदयमन्दिरमें निवास करनेवाली, श्रीकृष्णकी प्राणोंसे भी अधिक प्रिया तथा श्रीकृष्णसे पूजित हो। मेरे ऊपर कृपा करो। देवि ! तुम यशःस्वरूपा, सभी यशकी कारणभूता, यश देनेवाली, सम्पूर्ण देवीस्वरूपा और अखिल नारीरूपकी सृष्टि करनेवाली हो। शुभे ! तुम अपनी कलाके अंशमात्रसे सम्पूर्ण कामिनियोंका रूप धारण करनेवाली, सर्वसम्पत्स्वरूपा तथा समस्त सम्पत्तिको देनेवाली हो; मुझपर प्रसन्न होओ। देवि ! तुम परमानन्दस्वरूपा, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका कारण, यशस्वियोंसे पूजित और यशकी निधि हो; मेरे ऊपर कृपा करो। देवि ! तुम समस्त जगत् एवं रत्नोंकी आधारभूता वसुन्धरा हो, चर और अचरस्वरूपा हो; मुझपर शीघ्र ही प्रसन्न होओ। सिद्धयोगिनि ! तुम योगस्वरूपा, योगियोंकी स्वामिनी, योगको देनेवाली, योगकी कारणभूता, योगकी अधिष्ठात्री देवी और देवियोंकी ईश्वरी हो; मेरे ऊपर कृपा करो। सिद्धेश्वरि ! तुम सम्पूर्ण सिद्धिस্বরূপा, समस्त सिद्धियोंको देनेवाली तथा सभी सिद्धियोंका कारण हो; मुझपर प्रसन्न होओ। महेश्वरि ! विभिन्न मतोंके अनुसार जो समस्त शास्त्रोंका व्याख्यान है, उसका तात्पर्य तुम्हीं हो। ज्ञानस्वरूपे परमेश्वरि ! मैंने जो कुछ अनुचित कहा हो, वह सब तुम क्षमा करो। कुछ विद्वान् प्रकृतिकी प्रधानता बतलाते हैं और कुछ पुरुषकी। कुछ विद्वान् इन दो प्रकारके मतोंमें व्याख्याभेदको ही कारण मानते हैं। पहले प्रलयकालमें एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले महाविष्णुके नाभिदेशसे प्रकट हुए कमलपर, उसीसे उत्पन्न हुए जो ब्रह्माजी बैठे थे, उन्हें महादैत्य मधु और कैटभ खेल-खेलमें ही मारनेको उद्यत हो गये। तब ब्रह्माजी अपनी रक्षाके लिये तुम्हारी स्तुति करने लगे। उन्हें स्तुति करते देख तुमने उन दोनों महादैत्योंके विनाशके लिये जलशायी महाविष्णुको जगा दिया। तब नारायणने तुम शक्तिकी सहायतासे उन दोनों महादैत्योंको मार डाला। ये भगवान् तुम्हारा सहयोग पाकर ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। तुम्हारे बिना शक्तिहीन होनेके कारण ये कुछ भी नहीं कर सकते। सुरेश्वरि ! पूर्वकालमें त्रिपुरोंसे संग्राम करते समय जब मैं आकाशसे नीचे गिर पड़ा, तब तुमने ही विष्णुके साथ आकर मेरी रक्षा की थी। ईश्वरि ! इस समय मैं विरहाग्निसे जल रहा हूँ; तुम मेरी रक्षा करो। परमेश्वरि ! अपने दर्शनके पुण्यसे मुझे क्रीत दास बना लो।
६१०
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
यह कहकर शम्भु मौन हो गये। तब उन्होंने आकाशमें विराजमान उस देवी प्रकृतिको प्रसन्नता-पूर्वक देखा, जो रत्नसारनिर्मित रथपर बैठी थीं। उनके सौ भुजाएँ थीं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए स्वर्णके समान देदीप्यमान थी। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थीं और उनके प्रसन्न-मुखपर मन्द हासकी छटा छा रही थी। उन जगन्माता सतीको देखकर विरहासक्त शंकरने पुनः शीघ्र ही उनकी स्तुति की और रोते हुए अपने विरहजनित दुःखको निवेदन किया। तदनन्तर उन्होंने सतीकी अस्थियोंसे बनी हुई अपनी माला उन्हें दिखायी और उनके शरीरजनित भस्मको, जो शिवने अपने अङ्गोंका भूषण बना रखा था; उसकी ओर भी उनकी दृष्टि आकर्षित
की। फिर अनेक प्रकारसे मनुहार करके उन्होंने सुन्दरी सतीको संतुष्ट किया। उस समय नारायण, ब्रह्मा, धर्म, शेषनाग, देवता और ऋषियोंने भी 'हे ईश्वर! शिवकी रक्षा करो' ऐसा कहकर उन देवीका स्तवन किया। उन सबके स्तवनसे वे देवी तत्काल प्रसन्न हो गयीं तथा शिवकी उन प्राणवल्लभाने प्राणेश्वर शम्भुसे कृपापूर्वक कहा।
प्रकृति बोलीं—महादेव! आप धैर्य धारण करें। प्रभो! आप मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। योगीश्वर! आप ही आत्मा तथा जन्म-जन्ममें मेरे स्वामी हैं। महेश्वर! मैं पर्वतराज हिमालयकी भार्या मेनकाके गर्भसे जन्म लेकर आपकी पत्नी बनूँगी; अतः आप इस विरह-ज्वरको त्याग दीजिये।
यों कह तथा शिवको आश्वासन दे वे अन्तर्धान हो गयीं और देवता भी उन्हें सान्त्वना देकर चले गये। उस समय लज्जासे भगवान् शिवका मस्तक झुका हुआ था। उनका चित्त हर्षसे उत्फुल्ल हो रहा था। वे कैलास पर्वतपर चले गये और शीघ्र ही विरहज्वरको त्यागकर अपने गणोंके साथ प्रसन्नतासे नाचने लगे।
जो मनुष्य शिवद्वारा किये गये इस प्रकृतिके स्तोत्रका पाठ करता है, उसका प्रत्येक जन्ममें अपनी पत्नीसे कभी वियोग नहीं होता। इहलोकमें सुख भोगकर वह शिवलोकमें चला जाता है तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है। (अध्याय ४३)