ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
गणपतिखण्ड ४१५
तुमपर प्रसन्न रहें। श्रीकृष्णमें तथा कल्याणदाता गुरुदेव शिवमें तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति बनी रहे; क्योंकि जिसकी इष्टदेव तथा गुरुमें शाश्वती भक्ति होती है, उसपर यदि सभी देवता कुपित हो जायँ तो भी उसे मार नहीं सकते। तुम तो श्रीकृष्णके भक्त और शंकरके शिष्य हो तथा मुझ गुरूपत्नीकी स्तुति कर रहे हो; इसलिये किसकी शक्ति है जो तुम्हें मार सके। अहो! जो अन्यान्य देवताओंके भक्त हैं अथवा उनकी भक्ति न करके निरंकुश ही हैं, परंतु श्रीकृष्णके भक्त हैं तो उनका कहीं भी अमङ्गल नहीं होता। भार्गव! भला, जिन भाग्यवानोंपर बलवान् चन्द्रमा प्रसन्न हैं तो दुर्बल तारागण रुष्ट होकर उनका क्या बिगाड़ सकते हैं। सभामें महान् आत्मबलसे सम्पन्न सुखी नरेश जिसपर संतुष्ट है, उसका दुर्बल भृत्यवर्ग कुपित होकर क्या कर लेगा? यों कहकर पार्वती हर्षित हो परशुरामको शुभाशीर्वाद देकर अन्तःपुरमें चली गयीं। तब तुरंत हरि-नामका घोष गूँज उठा।
जो मनुष्य इस काण्वशाखोक्त स्तोत्रका पूजाके समय, यात्राके अवसरपर अथवा प्रातःकाल पाठ करता है, वह अवश्य ही अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेता है। इसके पाठसे पुत्रार्थीको पुत्र, कन्यार्थीको कन्या, विद्यार्थीको विद्या, प्रजार्थीको प्रजा, राज्यभ्रष्टको राज्य और धनहीनको धनकी प्राप्ति होती है। जिसपर गुरु, देवता, राजा अथवा बन्धु-बान्धव क्रुद्ध हो गये हों, उसके लिये ये सभी इस स्तोत्रराजकी कृपासे प्रसन्न होकर वरदाता हो जाते हैं। जिसे चोर-डाकुओंने घेर लिया हो, साँपने डस लिया हो, जो भयानक शत्रुके चंगुलमें फँस गया हो अथवा व्याधिग्रस्त हो; वह इस स्तोत्रके स्मरणमात्रसे मुक्त हो जाता है। राजद्वारपर, श्मशानमें, कारागारमें और बन्धनमें पड़ा हुआ तथा अगाध जलराशिमें डूबता हुआ मनुष्य इस स्तोत्रके प्रभावसे मुक्त हो जाता है। स्वामिभेद, पुत्रभेद तथा भयंकर मित्रभेदके अवसरपर इस स्तोत्रके स्मरणमात्रसे निश्चय ही अभीष्टार्थकी प्राप्ति होती है। जो स्त्री वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक दुर्गाका भलीभाँति पूजन करके हविष्यान्न खाकर इस स्तोत्रराजको सुनती है, वह महावन्ध्या हो तो भी प्रसववाली हो जाती है। उसे ज्ञानी एवं चिरजीवी दिव्य पुत्र प्राप्त होता है। छः महीनेतक इसका श्रवण करनेसे दुर्भगा सौभाग्यवती हो जाती है। जो काकवन्ध्या और मृतवत्सा नारी भक्तिपूर्वक नौ मासतक इस स्तोत्रराजको सुनती है, वह निश्चय ही पुत्र पाती है। जो कन्याकी माता तो है परंतु पुत्रसे हीन है, वह यदि पाँच महीनेतक कलशपर दुर्गाकी सम्यक् पूजा करके इस स्तोत्रको श्रवण करती है तो उसे अवश्य ही पुत्रकी प्राप्ति होती है।
(अध्याय ४५)
सबका स्तवन-पूजन और नमस्कार करके परशुरामका जानेके लिये उद्यत होना, गणेश-पूजामें तुलसी-निषेधके प्रसङ्गमें गणेश-तुलसीके संवादका वर्णन तथा गणपतिखण्डका श्रवण-माहात्म्य
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! इस प्रकार परशुरामने हर्षमग्न-चित्तसे दुर्गाकी स्तुति करके पुनः श्रीहरिद्वारा बतलाये गये स्तोत्रसे गणेशका स्तवन किया। तत्पश्चात् नाना प्रकारके नैवेद्यों, धूपों, दीपों, गन्धों और तुलसीके अतिरिक्त अन्य पुष्पोंसे भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की। इस प्रकार परशुरामने भक्तिभावसहित भाई गणेशका भलीभाँति पूजन करके गुरूपत्नी पार्वती और गुरुदेव शिवको नमस्कार किया तथा शंकरकी आज्ञा ले वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए।
४१६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
नारदजीने पूछा— प्रभो! परशुरामने जब विविध नैवेद्यों तथा पुष्पोंद्वारा भगवान् गणेशकी पूजा की थी, उस समय उन्होंने तुलसीको छोड़ क्यों दिया? मनोहारिणी तुलसी तो समस्त पुष्पोंमें मान्य एवं धन्यवादकी पात्र हैं; फिर गणेश उस सारभूत पूजाको क्यों नहीं ग्रहण करते?
श्रीनारायण बोले— नारद! ब्रह्मकल्पमें एक ऐसी घटना घटित हुई थी, जो परम गुह्य एवं मनोहारिणी है। उस प्राचीन इतिहासको मैं कहता हूँ, सुनो। एक समयकी बात है। नवयौवन-सम्पन्ना तुलसीदेवी नारायणपरायण हो तपस्याके निमित्तसे तीर्थोंमें भ्रमण करती हुई गङ्गा-तटपर जा पहुँचीं। वहाँ उन्होंने गणेशको देखा, जिनकी नयी जवानी थी; जो अत्यन्त सुन्दर, शुद्ध और पीताम्बर धारण किये हुए थे; जिनके सारे शरीरमें चन्दनकी खौर लगी थी; जो रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे; सुन्दरता जिनके मनका अपहरण नहीं कर सकती; जो कामनारहित, जितेन्द्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ और योगीन्द्रोंके गुरु-के-गुरु हैं तथा मन्द-मन्द मुस्कराते हुए जन्म, मृत्यु और बुढ़ापाका नाश करनेवाले श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान कर रहे थे; उन्हें देखते ही तुलसीका मन गणेशकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी उनसे लम्बोदर तथा गजमुख होनेका कारण पूछकर उनका उपहास करने लगी। ध्यान-भङ्ग होनेपर गणेशजीने पूछा—'वत्से! तुम कौन हो? किसकी कन्या हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? माता! यह मुझे बतलाओ; क्योंकि शुभे! तपस्वियोंका ध्यान भङ्ग करना सदा पापजनक तथा अमङ्गलकारी होता है। शुभे! श्रीकृष्ण कल्याण करें, कृपानिधि विघ्नका विनाश करें और मेरे ध्यान-भङ्गसे उत्पन्न हुआ दोष तुम्हारे लिये अमङ्गलकारक न हो।'
इसपर तुलसीने कहा— प्रभो! मैं धर्मात्मजकी नवयुवती कन्या हूँ और तपस्यामें संलग्न हूँ। मेरी यह तपस्या पति-प्राप्तिके लिये है; अतः आप मेरे स्वामी हो जाइये। तुलसीकी बात सुनकर अगाध बुद्धिसम्पन्न गणेश श्रीहरिका स्मरण करते हुए विदुषी तुलसीसे मधुरवाणीमें बोले।
गणेशने कहा— हे माता! विवाह करना बड़ा भयंकर होता है; अतः इस विषयमें मेरी बिलकुल इच्छा नहीं है; क्योंकि विवाह दुःखका कारण होता है, उससे सुख कभी नहीं मिलता। यह हरि-भक्तिका व्यवधान, तपस्याके नाशका कारण, मोक्षद्वारका किवाड़, भव-बन्धनकी रस्सी, गर्भवासकारक, सदा तत्त्वज्ञानका छेदक और संशयोंका उद्गमस्थान है। इसलिये महाभागे! मेरी ओरसे मन लौटा लो और किसी अन्य पतिकी तलाश करो। गणेशके ऐसे वचन सुनकर तुलसीको क्रोध आ गया। तब वह साध्वी गणेशको शाप देते हुए बोली—'तुम्हारा विवाह होगा।' यह सुनकर शिव-तनय सुरश्रेष्ठ गणेशने भी तुलसीको शाप दिया—'देवि! तुम निस्संदेह असुरद्वारा ग्रस्त होओगी। तत्पश्चात् महापुरुषोंके शापसे तुम वृक्ष हो जाओगी।' नारद! महातपस्वी गणेश इतना कहकर चुप हो गये। उस शापको सुनकर तुलसीने फिर उस सुरश्रेष्ठ गणेशकी स्तुति की। तब प्रसन्न होकर गणेशने तुलसीसे कहा।
गणेश बोले— मनोरमे! तुम पुष्पोंकी सारभूता होओगी और कलांशसे स्वयं नारायणकी प्रिया बनोगी। महाभागे! यों तो सभी देवता तुमसे प्रेम करेंगे, परंतु श्रीकृष्णके लिये तुम विशेष प्रिय होओगी। तुम्हारे द्वारा की गयी पूजा मनुष्योंके लिये मुक्तिदायिनी होगी और मेरे लिये तुम सर्वदा त्याज्य रहोगी। तुलसीसे यों कहकर सुरश्रेष्ठ गणेश पुनः तप करने चले गये। वे श्रीहरिकी आराधनामें व्यग्र होकर बदरीनाथके संनिकट गये। इधर तुलसीदेवी दुःखित हृदयसे पुष्करमें जा पहुँची
गणपतिखण्ड ४१७
और निराहार रहकर वहाँ दीर्घकालिक तपस्यामें संलग्न हो गयी। नारद! तत्पश्चात् मुनिवरके तथा गणेशके शापसे वह चिरकालतक शङ्खचूडकी प्रिय पत्नी बनी रही। मुने! तदनन्तर असुरराज शङ्खचूड शंकरजीके त्रिशूलसे मृत्युको प्राप्त हो गया, तब नारायणप्रिया तुलसी कलांशसे वृक्षभावको प्राप्त हो गयी। यह इतिहास, जिसका मैंने तुमसे वर्णन किया है, पूर्वकालमें धर्मके मुखसे सुना था। इसका वर्णन अन्य पुराणोंमें नहीं मिलता। यह तत्त्वरूप तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। तदनन्तर महाभाग परशुराम गणेशका पूजन करके तथा शंकर और पार्वतीको नमस्कार कर तपस्याके लिये वनको चले गये। इधर गणेश समस्त सुरश्रेष्ठों तथा मुनिवरोंसे वन्दित एवं पूजित होकर शिव-पार्वतीके निकट स्थित हुए।
जो मनुष्य इस गणपतिखण्डको दत्तचित्त होकर सुनता है, उसे निश्चय ही राजसूययज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। पुत्रहीन मनुष्य श्रीगणेशकी कृपासे धीर, वीर, धनी, गुणी, चिरजीवी, यशस्वी, पुत्रवान्, विद्वान्, श्रेष्ठ कवि, जितेन्द्रियोंमें श्रेष्ठ, समस्त सम्पदाओंका दाता, परम पवित्र, सदाचारी, प्रशंसनीय, विष्णुभक्त, अहिंसक, दयालु और तत्त्वज्ञानविशारद पुत्र पाता है। महावन्ध्या स्त्री वस्त्र, अलंकार और चन्दनद्वारा भक्तिपूर्वक गणेशकी पूजा करके और इस गणपतिखण्डको सुनकर पुत्रको जन्म देती है। जो मनुष्य नियमपरायण हो मनमें किसी कामनाको लेकर इसे सुनता है, सुरश्रेष्ठ गणेश उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं। विघ्ननाशके लिये यत्नपूर्वक इस गणपतिखण्डको सुनकर वाचकको सोनेका यज्ञोपवीत, श्वेत छत्र, श्वेत अश्व, श्वेतपुष्पोंकी माला, स्वस्तिक मिष्टान्न, तिलके लड्डू और देशकालोद्भव पके हुए फल प्रदान करना चाहिये।
(अध्याय ४६)
॥ गणपतिखण्ड सम्पूर्ण ॥
| ४१८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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श्रीकृष्णजन्मखण्ड
नारदजीके प्रश्न तथा मुनिवर नारायणद्वारा भगवान् विष्णु एवं वैष्णवके माहात्म्यका वर्णन, श्रीराधा और श्रीकृष्णके गोकुलमें अवतार लेनेका एक कारण श्रीदाम और राधाका परस्पर शाप
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥
भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर तथा देवी सरस्वतीको नमस्कार करके जय (इतिहास-पुराण आदि)-का पाठ करना चाहिये।
**नारदजीने कहा—**ब्रह्मन्! मैंने सबसे पहले पूज्यपाद पिता ब्रह्माजीके मुखारविन्दसे ब्रह्मखण्डकी मनोहर कथा सुनी है, जो अत्यन्त अद्भुत है। तदनन्तर उन्हींकी आज्ञासे मैं तुरंत आपके निकट चला आया और यहाँ अमृतखण्डसे भी अधिक मधुर प्रकृतिखण्ड सुननेको मिला। तत्पश्चात् मैंने गणपतिखण्ड श्रवण किया, जो अखण्ड जन्मोंका खण्डन करनेवाला है। परंतु मेरा लोलुप मन अभी तृप्त नहीं हुआ। यह और भी विशिष्ट प्रसङ्गको सुनना चाहता है। अतः अब श्रीकृष्णजन्मखण्डका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जो मनुष्योंके जन्म-मरण आदिका खण्डन करनेवाला है। वह समस्त तत्त्वोंका प्रकाशक, कर्मबन्धनका नाशक, हरिभक्ति प्रदान करनेवाला, तत्काल वैराग्यजनक, संसारविषयक आसक्तिका निवारक, मुक्तिबीजका कारण तथा भवसागरसे पार उतारनेवाला उत्तम साधन है। वह कर्मभोगरूपी रोगोंका नाश करनेके लिये रसायनका काम देता है। श्रीकृष्णचरणारविन्दोंकी प्राप्तिके लिये सोपानका निर्माण करता है। वैष्णवोंका तो वह जीवन ही है। तीनों लोकोंको परम पवित्र करनेवाला है। मैं आपका शरणागत भक्त एवं शिष्य हूँ। अतः आप मुझे श्रीकृष्णजन्मखण्डकी कथाको विस्तारपूर्वक सुनाइये। किसकी प्रार्थनासे एकमात्र परिपूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्ण अपने सम्पूर्ण अंशोंसे इस भूतलपर अवतीर्ण हुए? किस युगमें, किस हेतुसे और कहाँ उनका आविर्भाव हुआ? उनके पिता वसुदेव कौन थे अथवा माता देवकी भी कौन थीं? बताइये। किसके कुलमें भगवान्ने मायाद्वारा जन्म-ग्रहणकी लीला की? श्रीहरिने किस रूपसे यहाँ आकर क्या किया? मुने! सुना जाता है कि श्रीकृष्ण कंसके भयसे सूतिकागृहसे गोकुलको चले गये थे। जो स्वयं भयके स्वामी हैं, उन्हें कीटतुल्य कंससे क्यों भय हुआ? उन श्रीहरिने गोप-वेष धारण करके गोकुलमें कौन-सी लीला की? वे तो जगदीश्वर हैं। फिर उन्होंने गोपाङ्गनाओंके साथ क्यों विहार किया? गोपाङ्गनाएँ कौन थीं? अथवा वे ग्वाल-बाल भी कौन थे? यशोदा कौन थीं? नन्दरायजी कौन थे? उन्होंने कौन-सा पुण्य किया था? श्रीहरिकी प्रेयसी गोलोकवासिनी पुण्यवती देवी श्रीराधा क्यों व्रजमें व्रजकन्या होकर प्रकट हुईं? गोपियोंने किस प्रकार दुराराध्य परमेश्वरको प्राप्त किया? श्रीहरि उन सबको छोड़कर मथुरा क्यों चले गये? महाभाग! पृथ्वीका भार उतारकर कौन-सी लीला करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण पुनः परमधामको पधारे? आप उनकी लीला-कथा सुनाइये; क्योंकि उसका श्रवण और कीर्तन पुण्यदायक है। श्रीहरिकी कथा अत्यन्त दुर्लभ है। वह भवसागरसे पार उतारनेके लिये नौकाके तुल्य है। प्रारब्धभोगरूपी बेड़ी तथा क्लेशोंका उच्छेद करनेके लिये कटार है। पापरूपी ईंधन-राशिका दाह करनेके लिये प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान है। इसे सुननेवाले पुरुषोंके करोड़ों जन्मोंकी पापराशिका यह नाश
** श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४१९ कर देती है। भगवान्की कथा शोक-सागरका नाश करनेवाली मुक्ति है। वह कानोंमें अमृतके समान मधुर प्रतीत होती है। कृपानिधे ! मैं आपका भक्त एवं शिष्य हूँ। आप मुझे श्रीहरिकथाका ज्ञान प्रदान कीजिये। तप, जप, बड़े-बड़े दान, पृथ्वीके तीथोंके दर्शन, श्रुतिपाठ, अनशन, व्रत, देवार्चन तथा सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण करनेसे मनुष्यको जो फल मिलता है, वह सब ज्ञानदानकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। पिताजीने मुझे आपके पास ज्ञान प्राप्त करनेके लिये भेजा है। सुधा- समुद्रके पास पहुँचकर कौन दूसरी वस्तु (जल आदि) पीनेकी इच्छा करेगा ? भगवान् नारायण बोले-कुलको पवित्र करनेवाले नारद! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम धन्य हो। पुण्यकी मूर्तिमती राशि हो। लोकोंको पवित्र करनेके लिये ही तुम इनमें भ्रमण करते हो। वाणीसे मनुष्योंके हृदयकी तत्काल पहचान हो जाती है। शिष्य, कलत्र, कन्या, दौहित्र, बन्धु-बान्धव, पुत्र-पौत्र, प्रवचन, प्रताप, यश, श्री, बुद्धि, वैरी और विद्या-इनके विषयमें मनुष्योंके हार्दिक अभिप्रायका पता चल जाता है। तुम जीवन्मुक्त और पवित्र हो। भगवान् गदाधरके शुद्ध भक्त हो। अपने चरणोंकी धूलसे सबकी आधारभूता वसुधाको पवित्र करते फिरते हो। समस्त लोकोंको अपने स्वरूपका दर्शन देकर पवित्र बनाते हो। भगवान् श्रीहरिकी कथा परम मङ्गलमयी है, इसीलिये तुम उसे सुनना चाहते हो। जहाँ श्रीकृष्णकी कथाएँ होती हैं, वहीं सब देवता निवास करते हैं। ऋषि, मुनि और सम्पूर्ण तीर्थ भी वहीं रहते हैं। वे कथा सुनकर अन्तमें अपने निरापद स्थानको जाते हैं। जिन स्थानोंमें श्रीकृष्णकी शुभ कथाएँ होती हैं, वे तीर्थ बन जाते हैं। सैकड़ों जन्मोंतक तपस्या करके जो पवित्र हो गया है, वही इस भारतवर्षमें जन्म पाता है। वह यदि श्रीहरिकी अमृतमयी कथाका श्रवण करे, तभी अपने जन्मको सफल कर सकता है। भगवान्की पूजा, वन्दना, मन्त्र-जप, सेवा, स्मरण, कीर्तन, निरन्तर उनके गुणोंका श्रवण, उनके प्रति आत्मनिवेदन तथा उनका दास्यभाव-ये भक्तिके नौ लक्षण हैं*। नारद ! इन सबका अनुष्ठान करके मनुष्य अपने जन्मको सफल बनाता है। उसके मार्गमें विघ्न नहीं आता और उसकी पूरी आयु नष्ट नहीं होती। उसके सामने काल उसी तरह नहीं जाता है, जैसे गरुड़के सामने सर्प। भगवान् श्रीहरि उस भक्तका सामीप्य एक क्षणके लिये भी नहीं छोड़ते हैं। अणिमा आदि सिद्धियाँ तुरंत उसकी सेवामें उपस्थित हो जाती हैं। भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे उसकी रक्षाके लिये सुदर्शन चक्र दिन- रात उसके पास घूमता रहता है। फिर कौन उसका क्या कर सकता है? यमराजके दूत स्वप्नमें भी उसके निकट वैसे ही नहीं जाते हैं, जैसे शलभ जलती हुई आगको देखकर उससे दूर भागते हैं। उसके ऊपर ऋषि, मुनि, सिद्ध तथा सम्पूर्ण देवता संतुष्ट रहते हैं। वह भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे सर्वत्र सुखी एवं निःशंक रहता है। श्रीकृष्णकी कथामें सदा तुम्हारा आत्यन्तिक अनुराग है। क्यों न हो ? पिताका स्वभाव पुत्रमें अवश्य ही प्रकट होता है। विप्रवर ! तुम्हारी यह प्रशंसा क्या है ? तुम्हारा जन्म ब्रह्माजीके मानससे हुआ है। जिसका जिस कुलमें जन्म होता है, उसकी बुद्धि उसके अनुसार ही होती है। तुम्हारे पिता श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी सेवासे ही विधाताके पदपर प्रतिष्ठित हैं। वे नित्य-निरन्तर नवधा भक्तिका पालन करते हैं। जिसका श्रीकृष्णकी कथामें अनुराग हो,
- अर्चनं वन्दनं मन्त्रजपं सेवनमेव च। स्मरणं कीर्तनं शश्वद् गुणश्रवणमीप्सितम् ॥ निवेदनं तस्य दास्यं नवधा भक्तिलक्षणम्। (श्रीकृष्णजन्मखण्ड १।३३-३४)
४२० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कथा सुनकर जिसके नेत्रोंमें आँसू छलक आते हों और शरीरमें रोमाञ्च छा जाता हो तथा मन उसीमें डूब जाता हो; उसीको विद्वान् पुरुषोंने सच्चा भक्त कहा है। जो मन, वाणी और शरीरसे स्त्री-पुत्र आदि सबको श्रीहरिका ही स्वरूप समझता है, उसे विद्वानोंने भक्त कहा है। जिसकी सब जीवोंपर दया है तथा जो सम्पूर्ण जगत्को श्रीकृष्ण जानता है, वह महाज्ञानी पुरुष ही वैष्णव भक्त माना गया है। जो निर्जन स्थानमें अथवा तीर्थोंके सम्पर्कमें रहकर आसक्तिशून्य हो बड़े आनन्दके साथ श्रीहरिके चरणारविन्दका चिन्तन करते हैं, वे वैष्णव माने गये हैं। जो सदा भगवान्के नाम और गुणका गान करते, मन्त्र जपते तथा कथा-वार्ता कहते-सुनते हैं, वे अत्यन्त वैष्णव हैं। मीठी वस्तुएँ पाकर श्रीहरिको प्रसन्नतापूर्वक भोग लगानेके लिये जिसका मन हर्षसे खिल उठता है, वह ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भक्त है। जिसका मन सोते, जागते, दिन-रात श्रीहरिके चरणारविन्दमें ही लगा रहता है और जो बाह्य शरीरसे पूर्व कर्मोंका फल भोगता है, वह वैष्णव है। तीर्थ सदा वैष्णवोंके दर्शन और स्पर्शकी अभिलाषा करते हैं; क्योंकि उनके सङ्गसे उन तीर्थोंके वे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, जो उन्हें पापियोंके संसर्गसे मिले होते हैं। जितनी देरमें गाय दुही जाती है, उतनी देर भी जहाँ वैष्णव पुरुष ठहर जाता है, वहाँकी धरतीपर उतने समयके लिये सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। वहाँ मरा हुआ पापी मनुष्य निश्चय ही पापमुक्त हो श्रीहरिके धाममें वैसे ही चला जाता है, जैसे अन्तकालमें श्रीकृष्णकी स्मृति होनेपर अथवा ज्ञानगङ्गामें अवगाहन करनेपर मनुष्य परम पदको प्राप्त हो जाता है। तथा जैसे तुलसीवनमें, गोशालामें, श्रीकृष्ण-मन्दिरमें, वृन्दावनमें, हरिद्वारमें एवं अन्य तीर्थोंमें भी मृत्यु होनेपर मनुष्यको परम धामकी प्राप्ति होती है। तीर्थोंमें स्नान करने या गोता लगानेसे पापियोंके पाप धुल जाते हैं। फिर उन तीर्थोंके पाप वैष्णवोंको छूकर बहनेवाली वायुके स्पर्शसे नष्ट होते हैं। जो भगवान् हृषीकेशकी और उनके पुण्यात्मा भक्तकी निन्दा करते हैं, उनके सौ जन्मोंका पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। वैष्णवोंके स्पर्शमात्रसे पातकी मनुष्य पातकसे मुक्त हो जाता है। पातकीके स्पर्शसे उस भक्तमें जो पाप आता है, उसका नाश उसके अन्तः-करणमें बैठे हुए भगवान् मधुसूदन अवश्य कर देते हैं। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने भगवान् विष्णु और वैष्णव भक्तके गुणोंका वर्णन किया है। अब मैं तुम्हें श्रीहरिके जन्मका प्रसङ्ग सुनाता हूँ, सुनो।
श्रीनारायणने कहा— एक बार गोलोकमें श्रीकृष्ण विरजादेवीके समीप थे। श्रीराधाको यह ठीक नहीं लगा। श्रीराधा सखियोंसहित वहाँ जाने लगीं। तब श्रीदामने उन्हें रोका। इसपर श्रीराधाने श्रीदामको शाप दे दिया कि ‘तुम असुरयोनिको प्राप्त हो जाओ।’ तब श्रीदामने भी श्रीराधाको यह शाप दिया कि ‘आप भी मानवी-योनिमें जायँ। वहाँ गोकुलमें श्रीहरिके ही अंश महायोगी रायाण नामक एक वैश्य होंगे। आपका छायारूप उनके साथ रहेगा। अतएव भूतलपर मूढ़ लोग आपको रायाणकी पत्नी समझेंगे, श्रीहरिके साथ कुछ समय आपका विछोह रहेगा।’
इससे श्रीदाम और श्रीराधा दोनोंको ही क्षोभ हुआ। तब श्रीकृष्णने श्रीदामको सान्त्वना देकर कहा कि ‘तुम त्रिभुवनविजेता सर्वश्रेष्ठ शङ्खचूड़ नामक असुर होओगे और अन्तमें श्रीशंकरके त्रिशूलसे भिन्न-देह होकर यहाँ मेरे पास लौट आओगे।’
श्रीराधाको बड़े ही प्रेमके साथ हृदयसे लगाकर भगवान्ने कहा—‘वाराहकल्पमें मैं पृथ्वीपर जाऊँगा और व्रजमें जाकर वहाँके पवित्र काननोंमें तुम्हारे साथ विहार करूँगा। मेरे रहते तुमको क्या भय है?’
उधर विरजादेवी नदी हो गयीं और उनके
३- श्रीराधाके विशाल भवन एवं अन्तःपुरकी शोभाका वर्णन, ब्रह्मा आदिको दिव्य तेजःपुञ्जके दर्शन तथा उनके द्वारा उन तेजोमय परमेश्वरकी स्तुति
·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४२१ श्रीकृष्णके द्वारा जो सात सुन्दर पुत्र हुए थे— वे लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और जलरूप सात समुद्र हो गये (यह सब श्रीराधा और श्रीकृष्णकी लीला ही है, जो व्रजमें परम दिव्य पवित्रतम विलक्षण प्रेमरसधारा बहानेके लिये निमित्तरूपसे की गयी थी)। इसी निमित्तसे लीलामय श्रीराधा और श्रीकृष्ण वाराहकल्पमें पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए। श्रीराधाजी गोकुलमें श्रीवृषभानुके घर प्रकट हुईं। यह कथा प्रसङ्गानुसार पहले भी आ चुकी है। (भगवान्, श्रीराधा- कृष्णके अवतार तथा व्रजकी मधुरतम लीलाका यह एक निमित्त कारणमात्र है।) (अध्याय १-३) पृथ्वीका देवताओंके साथ ब्रह्मलोकमें जाकर अपनी व्यथा-कथा सुनाना, ब्रह्माजीका उन सबके साथ कैलासगमन, कैलाससे ब्रह्मा, शिव तथा धर्मका वैकुण्ठमें जाकर श्रीहरिकी आज्ञासे गोलोकमें जाना और वहाँ विरजातट, शतशृङ्गपर्वत, रासमण्डल एवं वृन्दावन आदिके प्रदेशोंका अवलोकन करना, गोलोकका विस्तृत वर्णन नारदजीने पूछा-वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारायण ! किसकी प्रार्थनासे और किस कारण जगदीश्वर श्रीकृष्णने इस भूतलपर अवतार लिया था ? श्रीनारायणने कहा- प्राचीन कालकी बात है। वाराह-कल्पमें पृथ्वी असुरोंके अधिक भारसे आक्रान्त हो गयी थी; अतः शोकसे अत्यन्त पीड़ित हो वह ब्रह्माजीकी शरणमें गयी। उसके साथ असुरोंद्वारा सताये गये देवता भी थे, जिनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो रहा था। पृथ्वी उन देवताओंके साथ ब्रह्माजीकी दुर्गम सभामें गयी। वहाँ उसने देखा, देवेश्वर ब्रह्मा ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान हो रहे हैं तथा बड़े-बड़े ऋषि, मुनीन्द्र तथा सिद्धेन्द्रगण सानन्द उनकी सेवामें उपस्थित हैं। ब्रह्माजी 'कृष्ण' इस दो अक्षरके परब्रह्मस्वरूप मन्त्रका जप कर रहे थे। उनके नेत्र भक्तिजनित आनन्दके आँसुओंसे भरे थे तथा सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। मुने ! देवताओंसहित पृथ्वीने भक्तिभावसे चतुराननको प्रणाम किया और दैत्योंके भार आदिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। आँसूभरे नेत्रों और पुलकित शरीरसे वह ब्रह्माजीकी स्तुति तथा रोदन करने लगी। तब जगद्धाता ब्रह्माने उससे पूछा- भद्रे ! तुम क्यों स्तुति करती और रोती हो ? बताओ, किस उद्देश्यसे तुम्हारा आगमन हुआ है ? विश्वास करो, तुम्हारा भला होगा। कल्याणि ! सुस्थिर हो जाओ, मेरे रहते तुम्हें क्या भय है? इस प्रकार पृथ्वीको आश्वासन देकर ब्रह्माजीने देवताओंसे आदरपूर्वक पूछा- 'देवगण ! किसलिये तुम्हारा मेरे समीप आगमन हुआ है?' ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर देवतालोग उन प्रजापतिसे बोले- प्रभो ! पृथ्वी दैत्योंके भारसे दबी हुई है तथा हम भी उनके कारण संकटमें पड़ गये हैं। दैत्योंने हमें ग्रस लिया। आप ही जगत्के स्रष्टा हैं, शीघ्र ही हमारा उद्धार कीजिये। ब्रह्मन् ! आप ही इस पृथ्वीकी गति हैं; इसे शान्ति प्रदान करें। पितामह ! यह पृथ्वी जिस भारसे पीड़ित है, उसीसे हम भी दुःखी हैं, अतः आप उस भारका हरण कीजिये।' देवताओंकी बात सुनकर जगत्स्रष्टा ब्रह्माने पृथ्वीसे पूछा- 'बेटी ! तुम भय छोड़कर मेरे पास सुखपूर्वक रहो। पद्मालोचने ! बताओ, किनका ऐसा भार आ गया है, जिसे सहन करनेमें तुम असमर्थ हो गयी हो। भद्रे ! मैं उस भारको दूर करूँगा। निश्चय ही तुम्हारा भला होगा। ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर पृथ्वीके मुखपर और नेत्रोंमें प्रसन्नता छा गयी। वह जिस-जिस
४२२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण कारणसे इस तरह पीड़ित थी, अपनी पीड़ाकी उस कथाको कहने लगी—'तात! सुनिये, मैं अपने मनकी व्यथा बता रही हूँ। विश्वासी बन्धु- बान्धवके सिवा दूसरे किसीको मैं यह बात नहीं बता सकती; क्योंकि स्त्री-जाति अबला होती है। अपने सगे बन्धु, पिता, पति और पुत्र सदा उसकी रक्षा करते हैं; परंतु दूसरे लोग निश्चय ही उसकी निन्दा करने लगते हैं। जगत्पिता आपने मेरी सृष्टि की है; अतः आपसे अपने मनकी बात कहनेमें मुझे कोई संकोच नहीं है। मैं जिनके भारसे पीड़ित हूँ, उनका परिचय देती हूँ, सुनिये। 'जो श्रीकृष्णभक्तिसे हीन हैं और जो श्रीकृष्ण- भक्तकी निन्दा करते हैं, उन महापातकी मनुष्योंका भार वहन करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। जो अपने धर्मके आचरणसे शून्य तथा नित्यकर्मसे रहित हैं, जिनकी वेदोंमें श्रद्धा नहीं है; उनके भारसे मैं पीड़ित हूँ। जो पिता, माता, गुरु, स्त्री, पुत्र तथा पोष्य-वर्गका पालन-पोषण नहीं करते हैं; उनका भार वहन करनेमें मैं असमर्थ हूँ। पिताजी ! जो मिथ्यावादी हैं, जिनमें दया और सत्यका अभाव है तथा जो गुरुजनों और देवताओंकी निन्दा करते हैं; उनके भारसे मुझे बड़ी पीड़ा होती है। जो मित्रद्रोही, कृतघ्न, झूठी गवाही देनेवाले, विश्वासघाती तथा धरोहर हड़प लेनेवाले हैं; उनके भारसे भी मैं पीड़ित रहती हूँ। जो कल्याणमय सूक्तों, साम-मन्त्रों तथा एकमात्र मङ्गलकारी श्रीहरिके नामोंका विक्रय करते हैं; उनके भारसे मुझे बड़ा कष्ट होता है। जो जीवघाती, गुरुद्रोही, ग्रामपुरोहित, लोभी, मुर्दा जलानेवाले तथा ब्राह्मण होकर शूद्रान्न भोजन करनेवाले हैं; उनके भारसे मुझे बड़ा कष्ट होता है। जो मूढ़ पूजा, यज्ञ, उपवास-व्रत और नियमको तोड़नेवाले हैं; उनके भारसे भी मुझे बड़ी पीड़ा होती है। जो पापी सदा गौ, ब्राह्मण, देवता, वैष्णव, श्रीहरि, हरिकथा और हरिभक्तिसे द्वेष करते हैं; उनके भारसे मैं पीड़ित रहती हूँ। विधे! शङ्खचूड़के भारसे जिस तरह मैं पीड़ित थी, उससे भी अधिक दैत्योंके भारसे पीड़ित हूँ। प्रभो! यह सब कष्ट मैंने कह सुनाया। यही मुझ अनाथाका निवेदन है। यदि आपसे मैं सनाथ हूँ तो आप मेरे कष्टके निवारणका उपाय कीजिये।' यों कहकर वसुधा बार-बार रोने लगी। उसका रोदन सुनकर कृपानिधान ब्रह्माने उससे कहा—'वसुधे! तुम्हारे ऊपर जो दस्युभूत राजाओंका भार आ गया है, मैं किसी उपायसे अवश्य ही उसे हटाऊँगा।' पृथ्वीको इस प्रकार आश्वासन देकर देवताओंसहित जगद्धाता ब्रह्मा भगवान् शंकरके निवासस्थान कैलास पर्वतपर गये। वहाँ पहुँचकर विधाताने कैलासके रमणीय आश्रम तथा भगवान् शंकरको देखा। वे गङ्गाजीके तटपर अक्षयवटके नीचे बैठे हुए थे। उन्होंने व्याघ्रचर्म पहन रखा था। दक्षकन्याकी हड्डियोंके आभूषणसे वे विभूषित थे। उन्होंने हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश धारण कर रखे थे। उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। अनेकानेक सिद्धोंने उन्हें घेर रखा था। वे योगीन्द्रगणसे सेवित थे और कौतूहलपूर्वक गन्धर्वोंका संगीत सुन रहे थे। साथ ही अपनी ओर देखती हुई पार्वतीकी ओर प्रेमपूर्वक तिरछी नजरसे देख लेते थे। अपने पाँच मुखोंद्वारा श्रीहरिके एकमात्र मङ्गल नामका जप करते थे। गङ्गाजीमें उत्पन्न कमलोंके बीजोंकी मालासे जप करते समय उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आता था। इसी समय ब्रह्माजी पृथ्वी तथा नतमस्तक देवसमूहोंके साथ महादेवजीके सामने जा खड़े हुए। जगद्गुरुको आया देख भगवान् शंकर शीघ्र ही भक्तिभावसे उठकर खड़े हो गये। उन्होंने प्रेमपूर्वक मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। तत्पश्चात् सब देवताओंने तथा पृथ्वीने भी
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
४२३
भक्तिभावसे चन्द्रशेखर शिवको प्रणाम किया और शिवने उन सबको आशीर्वाद दिया। प्रजापति ब्रह्माने पार्वतीनाथ शिवसे सारा वृत्तान्त कहा। वह सब सुनकर भक्तवत्सल शंकरने तुरंत ही मुँह नीचा कर लिया। भक्तोंपर कष्ट आया सुनकर पार्वती और परमेश्वर शिवको बड़ा दुःख हुआ। तदनन्तर ब्रह्मा और शिवने देवसमूहों तथा वसुधाको यत्नपूर्वक सान्त्वना देकर घरको लौटा दिया। फिर वे दोनों देवेश्वर तुरंत धर्मके घर आये और उनके साथ विचार-विमर्श करकेवे तीनों श्रीहरिके धामको चल दिये। भगवान्के उस परम धामका नाम वैकुण्ठ है। वह जरा और मृत्युको दूर भगानेवाला है। ब्रह्माण्डसे ऊपर उसकी स्थिति है। वह उत्तम लोक मानो वायुके आधारपर स्थित है। (वास्तवमें वह चिन्मय लोक श्रीहरिसे भिन्न न होनेके कारण अपने-आपमें ही स्थित है। उसका दूसरा कोई आधार नहीं है।) उस सनातन धामकी स्थिति ब्रह्मलोकसे एक करोड़ योजन ऊपर है। दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित विचित्र वैकुण्ठधामका वर्णन कर पाना कवियोंके लिये असम्भव है। पद्मराग और नीलमणिके बने हुए राजमार्ग उस धामकी शोभा बढ़ाते हैं। मनके समान तीव्र गतिसे जानेवाले वे ब्रह्मा, शिव और धर्म सब-के-सब उस मनोहर वैकुण्ठधाममें जा पहुँचे। श्रीहरिके अन्तःपुरमें पहुँचकर उन सबने वहाँ उनके दर्शन किये। वे श्रीहरि दिव्य रत्नमय अलङ्कारोंसे विभूषित हो रत्नसिंहासनपर बैठे थे। रत्नोंके बाजूबंद, कंगन और नूपुर उनके हाथ-पैरोंकी शोभा बढ़ाते थे। दिव्य रत्नोंके बने हुए दो कुण्डल उनके दोनों गालोंपर झलमला रहे थे। उन्होंने पीताम्बर पहन रखा था तथा आजानुलम्बिनी वनमाला उनके अग्रभागको विभूषित कर रही थी। सरस्वतीके प्राणवल्लभ श्रीहरि शान्तभावसे बैठे थे। लक्ष्मीजी उनके चरणारविन्दोंकी सेवा कर रही थीं। करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्यलीलासे वे प्रकाशित हो रहे थे। उनके चार भुजाएँ थीं और मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षद उनकी सेवामें जुटे थे। उनका सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित था तथा उनका मस्तक रत्नमय मुकुटसे जगमगा रहा था। वे परमानन्द-स्वरूप भगवान् भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल दिखायी देते थे। मुने! ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंने भक्तिभावसे उनके चरणोंमें प्रणाम किया और श्रद्धापूर्वक मस्तक झुकाकर बड़ी भक्तिके साथ उनकी स्तुति की। उस समय वे परमानन्दके भारसे दबे हुए थे। उनके अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था।
ब्रह्माजी बोले—मैं शान्त, सर्वेश्वर तथा अच्युत उन कमलाकान्तको प्रणाम करता हूँ, जिनकी हम तीनों विभिन्न कलाएँ हैं तथा समस्त देवता जिनकी कलाकी भी अंशकलासे उत्पन्न हुए हैं। निरञ्जन! मनु, मुनीन्द्र, मानव तथा चराचर प्राणी आपसे ही आपके कलाकी अंशकलाद्वारा प्रकट हुए हैं।
भगवान् शंकरने कहा—आप अविनाशी तथा अविकारी हैं। योगीजन आपमें रमण करते हैं। आप अव्यक्त ईश्वर हैं। आपका आदि नहीं है; परंतु आप सबके आदि हैं। आपका स्वरूप आनन्दमय है। आप सर्वरूप हैं। अणिमा आदि सिद्धियोंके कारण तथा सबके कारण हैं। सिद्धिके ज्ञाता, सिद्धिदाता और सिद्धिरूप हैं। आपकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है ?
धर्म बोले—जिस वस्तुका वेदमें निरूपण किया गया है, उसीका विद्वान् लोग वर्णन कर सकते हैं। जिनको वेदमें ही अनिर्वचनीय कहा गया है, उनके स्वरूपका निरूपण कौन कर सकता है ? जिसके लिये जिस वस्तुकी सम्भावना की जाती है, वह गुणरूप होती है। वही उसका स्तवन है। जो निरञ्जन (निर्मल) तथा गुणोंसे पृथक्—निर्गुण हैं; उन परमात्माकी मैं क्या स्तुति करूँ?
४२४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
महामुने! ब्रह्मा आदिका किया हुआ यह स्तोत्र जो छः श्लोकोंमें वर्णित है, पढ़कर मनुष्य दुर्गम संकटसे मुक्त होता और मनोवाञ्छित फलको पाता है।*
देवताओंकी स्तुति सुनकर साक्षात् श्रीहरिने उनसे कहा—तुम सब लोग गोलोकको जाओ। पीछेसे मैं भी लक्ष्मीके साथ आऊँगा। श्वेतद्वीपनिवासी वे नर और नारायण मुनि तथा सरस्वतीदेवी—ये गोलोकमें जायँगे। अनन्तशेषनाग, मेरी माया, कार्तिकेय, गणेश तथा वेदमाता सावित्री—ये सब पीछेसे निश्चित ही वहाँ जायँगे। वहाँ मैं गोपियों तथा राधाके साथ द्विभुज श्रीकृष्णरूपसे निवास करता हूँ। यहाँ सुनन्द आदि पार्षदों तथा लक्ष्मीके साथ रहता हूँ। नारायण, श्रीकृष्ण तथा श्वेतद्वीपनिवासी विष्णु मैं ही हूँ। ब्रह्मा आदि अन्य सम्पूर्ण देवता मेरी ही कलाएँ हैं। देव, असुर और मनुष्य आदि प्राणी मेरी कलाकी अंशकलाकी कलासे उत्पन्न हुए हैं। तुमलोग गोलोकको जाओ। वहाँ तुम्हारे अभीष्ट कार्यकी सिद्धि होगी। फिर हमलोग भी सबकी इष्टसिद्धिके लिये वहाँ आ जायँगे।
इतना कहकर श्रीहरि उस सभामें चुप हो गये। तब उन सब देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और वहाँसे अद्भुत गोलोककी यात्रा की। वह उत्कृष्ट एवं विचित्र परम धाम जरा एवं मृत्युको हर लेनेवाला है। वह अगम्य लोक वैकुण्ठसे पचास करोड़ योजन ऊपर है और भगवान् श्रीकृष्णकी इच्छासे निर्मित है। उसका कोई बाह्य आधार नहीं है। श्रीकृष्ण ही वायुरूपसे उसे धारण करते हैं। वे ब्रह्मा आदि देवता उस अनिर्वचनीय लोककी ओर जानेके लिये उन्मुख हो चल दिये। उन सबकी गति मनके समान तीव्र थी। अतः वे सब-के-सब विरजाके तटपर जा पहुँचे। सरिताके तटका दर्शन करके उन देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ। विरजा नदीका वह तटप्रान्त शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल, अत्यन्त विस्तृत और मनोहर था, मोती-माणिक्य तथा उत्कृष्ट मणिरत्नोंकी खानोंसे सुशोभित था। काले, उज्ज्वल, हरे तथा लाल रत्नोंकी श्रेणियोंसे उद्भासित होता था। उस तटपर कहीं तो मूँगोंके अङ्कुर प्रकट हुए हैं, जो अत्यन्त मनोहर दिखायी देते हैं। कहीं बहुमूल्य उत्तम रत्नोंकी अनेक खानें उसकी शोभा बढ़ाती हैं। कहीं श्रेष्ठ निधियोंके आकर उपलब्ध होते हैं, जिनसे वहाँकी छटा आश्चर्यमें डाल देती है। वह दृश्य विधाताके भी दृष्टिपथमें आनेवाला नहीं है। मुने! विरजाके किनारे कहीं तो पद्मराग और इन्द्रनील मणियोंकी खानें हैं, कहीं मरकतमणिकी खानें श्रेणीबद्ध दिखायी देती हैं, कहीं स्यमन्तकमणिकी तथा कहीं स्वर्णमुद्राओंकी खानें शोभा पाती हैं। कहीं बहुमूल्य पीले रंगकी मणिश्रेणियोंके आकर विरजातटको अलंकृत करते
* ब्रह्मोवाच
नमामि कमलाकान्तं शान्तं सर्वेशमच्युतम्। वयं यस्य कलाभेदाः कलांशकलया सुराः॥
मनवश्च मुनीन्द्राश्च मानुषाश्च चराचराः। कलाकलांशकलया भूतास्त्वत्तो निरञ्जन॥
शङ्कर उवाच
त्वामक्षयमक्षरं वा राममव्यक्तमीश्वरम्। अनादिमादिमानन्दरूपिणं सर्वरूपिणम्॥
अणिमादिकसिद्धीनां कारणं सर्वकारणम्। सिद्धिदं सिद्धिदं सिद्धिरूपं कः स्तोतुमीश्वरः॥
धर्म उवाच
वेदे निरूपितं वस्तु वर्णनीयं विचक्षणैः। वेदेऽनिर्वचनीयं यत्तन्निर्वक्तुं च कः क्षमः॥
यस्य सम्भावनीयं यद् गुणरूपं निरञ्जनम्। तदतिरिक्तं स्तवनं किमहं स्तौमि निर्गुणम्॥
ब्रह्मादीनामिदं स्तोत्रं षट्श्लोकोक्तं महामुने। पठित्वा मुच्यते दुर्गाद्वाञ्छितं च लभेन्नरः॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४। ६२-६८)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४२५
हैं। कहीं रत्नोंके, कहीं कौस्तुभमणिके और कहीं अनिर्वचनीय मणियोंके उत्तम आकर हैं। विरजाके उस तट-प्रान्तमें कहीं-कहीं उत्तम रमणीय विहारस्थल उपलब्ध होते हैं।
उस परम आश्चर्यजनक तटको देखकर वे देवेश्वर नदीके उस पार गये। वहाँ जानेपर उन्हें पर्वतोंमें श्रेष्ठ शतशृंग दिखायी दिया, जो अपनी शोभासे मनको मोहे लेता था। दिव्य पारिजात-वृक्षोंकी वनमालाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। वह पर्वत कल्पवृक्षों तथा कामधेनुओंद्धारा सब ओरसे घिरा था। उसकी ऊँचाई एक करोड़ योजन थी और लंबाई दस करोड़ योजन। उसके ऊपरकी चौरस भूमि पचास करोड़ योजन विस्तृत थी। वह पर्वत चहारदीवारीकी भाँति गोलोकके चारों ओर फैला हुआ था। उसीके शिखरपर उत्तम गोलाकार रासमण्डल है, जिसका विस्तार दस योजन है। वह रासमण्डल सुगन्धित पुष्पोंसे भरे हुए सहस्रों उद्यानोंसे सुशोभित है और उन उद्यानोंमें भ्रमर-समूह छाये रहते हैं। सुन्दर रत्नों और द्रव्योंसे सम्पन्न अगणित क्रीडाभवन तथा कोटि सहस्र रत्नमण्डप उसकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्नमयी सीढ़ियों, श्रेष्ठ रत्ननिर्मित कलशों तथा इन्द्रनीलमणिके शोभाशाली खम्भोंसे उस मण्डलकी शोभा और बढ़ गयी है। उन खम्भोंमें सिन्दूरके समान रंगवाली मणियाँ सब ओर जड़ी गयी हैं तथा बीच-बीचमें लगे हुए मनोहर इन्द्रनील नामक रत्नोंसे वे मण्डित हैं। रत्नमय परकोटोंमें जटित भाँति-भाँतिके मणिरत्न उस रासमण्डलकी श्रीवृद्धि करते हैं। उसमें चारों दिशाओंकी ओर चार दरवाजे हैं, जिनमें सुन्दर किंवाड़ लगे हुए हैं। उन दरवाजोंपर रस्सियोंमें गुँथे हुए आम्रपल्लव बन्दनवारके रूपमें शोभा दे रहे हैं। वहाँ दोनों ओर झुंड-के-झुंड केलेके खम्भे आरोपित हुए हैं। श्वेतधान्य, पल्लवसमूह, फल तथा दूर्वादल आदि मङ्गलद्रव्य उस मण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमयुक्त जलका वहाँ सब ओर छिड़काव हुआ है।
मुने! रत्नमय अलंकारों तथा रत्नोंकी मालाओंसे अलंकृत करोड़ों गोपकिशोरियोंके समूहसे रासमण्डल घिरा हुआ है। वे गोपकुमारियाँ रत्नोंके बने हुए कंगन, बाजूबंद और नूपुरोंसे विभूषित हैं। रत्ननिर्मित युगल कुण्डल उनके गण्डस्थलकी शोभा बढ़ाते हैं। उनके हाथोंकी अंगुलियाँ रत्नोंकी बनी हुई अँगूठियोंसे विभूषित हो बड़ी सुन्दर दिखायी देती हैं। रत्नमय पाशकसमूहों (बिछुओं)-से उनके पैरोंकी अंगुलियाँ उद्भासित होती हैं। वे गोपकिशोरियाँ रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके मस्तक उत्तम रत्नमय मुकुटोंसे जगमगा रहे हैं। नासिकाके मध्यभागमें गजमुक्ताकी बुलाकें बड़ी शोभा दे रही हैं। उनके भालदेशमें सिन्दूरकी बेंदी लगी हुई है। साथ ही आभूषण पहननेके स्थानोंमें दिव्य आभूषण धारण करनेके कारण उनकी दिव्य प्रभा और भी उद्दीप्त हो उठी है। उनकी अङ्गकान्ति मनोहर चम्पाके समान जान पड़ती है। वे सब-की-सब चन्दन-द्रवसे चर्चित हैं। उनके अङ्गोंपर पीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा देती है। बिम्बफलके समान अरुण अधर उनकी मनोहरता बढ़ा रहे हैं। शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाओंकी चटकीली चाँदनी-जैसी प्रभासे सेवित मुख उनके उद्दीप्त सौन्दर्यको और भी उज्ज्वल बना रहे हैं। उनके नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनमें कस्तूरी-पत्रिकासे युक्त काजलकी रेखा शोभा-वृद्धि कर रही है। उनके केशपाश प्रफुल्ल मालती-पुष्पकी मालाओंसे सुशोभित हैं, जिनपर मधुलोलुप भ्रमरोंके समूह मँडरा रहे हैं। उनकी मनोहर मन्दगति गजराजके गर्वका गंजन करनेवाली है। बाँकी भौंहोंके साथ मन्द मुसकानकी शोभासे वे मनको मोह लेती हैं। पके हुए अनारके दानोंकी भाँति चमकीली दन्तपंक्ति उनके मुखकी शोभाको
| ४२६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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बढ़ा देती है। पक्षिराज गरुड़की चोंचकी शोभासे सम्पन्न उन्नत नासिकासे वे सब-की-सब विभूषित हैं। गजराजके युगल गण्डस्थलकी भाँति उन्नत उरोजोंके भारसे वे झुकी-सी जान पड़ती हैं। उनका हृदय श्रीकृष्णविषयक अनुरागके देवता कन्दर्पके बाण-प्रहारसे जर्जर हुआ रहता है। वे दर्पणोंमें पूर्ण चन्द्रमाके समान अपने मनोहर मुखके सौन्दर्यको देखनेके लिये उत्सुक रहती हैं। श्रीराधिकाके चरणारविन्दोंकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहनेका सौभाग्य सुलभ हो, यही उनका मनोरथ है। ऐसी गोपकिशोरियोंसे भरा-पूरा वह रासमण्डल श्रीराधिकाकी आज्ञासे सुन्दरियोंके समुदायद्वारा रक्षित है—असंख्य सुन्दरियाँ उसकी रक्षामें नियुक्त रहती हैं।
श्वेत, रक्त एवं लोहित वर्णवाले कमलोंसे व्यास एवं सुशोभित लाखों क्रीड़ा-सरोवर रासमण्डलको सब ओरसे घेरे हुए हैं, जिनमें असंख्य भ्रमरोंके समुदाय गूँजते रहते हैं। सहस्रों पुष्पित उद्यान तथा फूलोंकी शय्याओंसे संयुक्त असंख्य कुञ्ज-कुटीर रासमण्डलकी सीमामें यत्र-तत्र शोभा पा रहे हैं। उन कुटीरोंमें भोगोपयोगी द्रव्य, कर्पूर, ताम्बूल, वस्त्र, रत्नमय प्रदीप, श्वेत चँवर, दर्पण तथा विचित्र पुष्पमालाएँ सब ओर सजाकर रखी गयी हैं। इन समस्त उपकरणोंसे रासमण्डलकी शोभा बहुत बढ़ गयी है। उस रासमण्डलको देखकर जब वे पर्वतकी सीमासे बाहर हुए तो उन्हें विलक्षण, रमणीय और सुन्दर वृन्दावनके दर्शन हुए। वृन्दावन राधा-माधवको बहुत प्रिय है। वह उन्हीं दोनोंका क्रीडास्थल है। उसमें कल्पवृक्षोंके समूह शोभा पाते हैं। विरजा-तीरके नीरसे भीगे हुए मन्द समीर उस वनके वृक्षोंको शनैः-शनैः आन्दोलित करते रहते हैं। कस्तूरीयुक्त पल्लवोंका स्पर्श करके चलनेवाली मन्द वायुका सम्पर्क पाकर वह सारा वन सुगन्धित बना रहता है। वहाँके वृक्षोंमें नये-नये पल्लव निकले रहते हैं। वहाँ सर्वत्र कोकिलोंकी काकली सुनायी देती है। वह वनप्रान्त कहीं तो केलिकदम्बोंके समूहसे कमनीय और कहीं मन्दार, चन्दन, चम्पा तथा अन्यान्य सुगन्धित पुष्पोंकी सुगन्धसे सुवासित देखा जाता है। आम, नारंगी, कटहल, ताड़, नारियल, जामुन, बेर, खजूर, सुपारी, आमड़ा, नीबू, केला, बेल और अनार आदि मनोहर वृक्ष-समूहों तथा सुपक्व फलोंसे लदे हुए दूसरे-दूसरे वृक्षोंद्वारा उस वृन्दावनकी अपूर्व शोभा हो रही है। प्रियाल, शाल, पीपल, नीम, सेमल, इमली तथा अन्य वृक्षोंके शोभाशाली समुदाय उस वनमें सब ओर सदा भरे रहते हैं। कल्पवृक्षोंके समूह उस वनकी शोभा बढ़ाते हैं। मल्लिका (मोतिया या बेला), मालती, कुन्द, केतकी, माधवी लता और जूही इत्यादि लताओंके समूह वहाँ सब ओर फैले हैं। मुने! वहाँ रत्नमय दीपोंसे प्रकाशित तथा धूपकी गन्धसे सुवासित असंख्य कुञ्ज-कुटीर उस वनमें शोभा पाते हैं। उनके भीतर शृङ्गारोपयोगी द्रव्य संगृहीत हैं। सुगन्धित वायु उन्हें सुवासित करती रहती है। वहाँ चन्दनका छिड़काव हुआ है। उन कुटीरोंके भीतर फूलोंकी शय्याएँ बिछी हैं, जो पुष्पमालाओंकी जालीसे सुशोभित हैं। मधु-लोलुप मधुपोंके मधुर गुञ्जारवसे वृन्दावन मुखरित रहता है। रत्नमय अलंकारोंकी शोभासे सम्पन्न गोपाङ्गनाओंके समूहसे वह वन आवेष्टित है। करोड़ों गोपियाँ श्रीराधाकी आज्ञासे उसकी रक्षा करती हैं। उस वनके भीतर सुन्दर-सुन्दर और मनोहर बत्तीस कानन हैं। वे सभी उत्तम एवं निर्जन स्थान हैं। मुने! वृन्दावन सुपक्व, मधुर एवं स्वादिष्ट फलोंसे सम्पन्न तथा गोष्ठों और गौओंके समूहोंसे परिपूर्ण है। वहाँ सहस्रों पुष्पोद्यान सदा खिले और सुगन्धसे भरे रहते हैं, उनमें मधुलोभी भ्रमरोंके समुदाय मधुर गुञ्जन करते फिरते हैं।
श्रीकृष्णके तुल्य रूपवाले तथा उत्तम रत्न-
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हारसे विभूषित पचास करोड़ गोपोंके विविध विलासोंसे विलसित रमणीय वृन्दावनको देखते हुए वे देवेश्वरगण गोलोकधाममें जा पहुँचे, जो चारों ओरसे गोलाकार तथा कोटि योजन विस्तृत है। वह सब ओरसे रत्नमय परकोटोंद्वारा घिरा हुआ है। मुने! उसमें चार दरवाजे हैं। उन दरवाजोंपर द्वारपालोंके रूपमें विराजमान गोप-समूह उनकी रक्षा करते हैं। श्रीकृष्णकी सेवामें लगे रहनेवाले गोपोंके आश्रम भी रत्नोंसे जटित तथा नाना प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न हैं। उन आश्रमोंकी संख्या भी पचास करोड़ है। इनके सिवा भक्त गोप-समूहोंके सौ करोड़ आश्रम हैं, जिनका निर्माण पूर्वोक्त आश्रमोंसे भी अधिक सुन्दर है। वे सब-के-सब उत्तम रत्नोंसे गठित हैं। उनसे भी अधिक विलक्षण तथा बहुमूल्य रत्नोंद्वारा रचित आश्रम पार्षदोंके हैं, जिनकी संख्या दस करोड़ है। पार्षदोंमें भी जो प्रमुख लोग हैं, वे श्रीकृष्णके समान रूप धारण करके रहते हैं। उनके लिये उत्तम रत्नोंसे निर्मित एक करोड़ आश्रम हैं। राधिकाजीमें विशुद्ध भक्ति रखनेवाली गोपाङ्गनाओंके बत्तीस करोड़ दिव्य एवं श्रेष्ठ आश्रम हैं, जिनकी रचना उत्तम श्रेणीके रत्नोंद्वारा हुई है। उनकी जो किंकरियाँ हैं, उनके लिये भी मणिरत्न आदिके द्वारा बड़े सुन्दर और मनोहर भवन बनाये गये हैं, जिनकी संख्या दस करोड़ है। ये सभी दिव्य आश्रम और भवन वृन्दावनकी शोभाका विस्तार करते हैं।
सैंकड़ों जन्मोंकी तपस्याओंसे पवित्र हुए जो भक्तजन भारतवर्षकी भूमिपर श्रीहरिकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं, वे कर्मोंके शान्त कर देनेवाले हैं—उनके कर्मबन्धन नष्ट हो जाते हैं। मुने! जो सोते, जागते हर समय अपने मनको श्रीहरिके ही ध्यानमें लगाये रहते हैं तथा दिन-रात ‘राधाकृष्ण’, ‘श्रीकृष्ण’ इत्यादि नामोंका जप किया करते हैं; उन श्रीकृष्ण-भक्तोंके लिये भी वहाँ गोलोकमें बड़े मनोहर निवासस्थान बने हुए हैं। उत्तम मणिरत्नोंद्वारा निर्मित वे भव्य भवन भाँति-भाँतिके भोगोंसे सम्पन्न हैं। पुष्प-शय्या, पुष्पमाला तथा श्वेत चामरसे सुशोभित हैं। रत्नमय दर्पणोंकी शोभासे पूर्ण हैं। उनमें इन्द्रनील मणियाँ जड़ी गयी हैं। उन भवनोंके शिखरोंपर बहुमूल्य रत्नमय कलशसमूह शोभा देते हैं। उनकी दीवारोंपर महीन वस्त्रोंके आवरण पड़े हुए हैं। ऐसे भवनोंकी संख्या भी सौ करोड़ है।
उस अद्भुत धामका दर्शन करके वे देवता बड़ी प्रसन्नताके साथ जब कुछ दूर और आगे गये, तब वहाँ उन्हें रमणीय अक्षयवट दिखायी दिया। मुने! उस वृक्षका विस्तार पाँच योजन और ऊँचाई दस योजन है। उसमें सहस्रों तने और असंख्य शाखाएँ शोभा पाती हैं। वह वृक्ष लाल-लाल पके फलोंसे व्याप्त है। रत्नमयी वेदिकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती हैं। उस वृक्षके नीचे बहुत-से गोप-शिशु दृष्टिगोचर हुए, जिनका रूप श्रीकृष्णके ही समान था। वे सब-के-सब पीतवस्त्रधारी और मनोहर थे तथा खेल-कूदमें लगे हुए थे। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे और वे सभी रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे। देवेश्वरोंने वहाँ उन सबके दर्शन किये। वे सभी श्रीहरिके श्रेष्ठ पार्षद थे।
मुने! वहाँसे थोड़ी ही दूरपर उन्हें एक मनोहर राजमार्ग दिखायी दिया, जिसके दोनों पार्श्वमें लाल मणियोंसे अद्भुत रचना की गयी थी। इन्द्रनील, पद्मराग, हीरे और सुवर्णकी बनी हुई वेदियाँ उस राजमार्गके उभय पार्श्वको सुशोभित कर रही थीं। दोनों ओर रत्नमय विश्राम-मण्डप शोभा पाते थे। उस मार्गपर चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे मिश्रित जलका छिड़काव किया गया था। पल्लव, लाजा, फल, पुष्प, दूर्वा तथा सूक्ष्म सूत्रमें गुँथे हुए चन्दन-पल्लवोंकी बन्दनवारसे युक्त सहस्रों कदली-स्तम्भोंके समूह
४- देवताओंद्वारा तेजःपुञ्जमें श्रीकृष्ण और राधाके दर्शन तथा स्तवन, श्रीकृष्णद्वारा देवताओंका स्वागत तथा उन्हें आश्वासन-दान, भगवद्भक्तके महत्त्वका वर्णन, श्रीराधासहित गोप-गोपियोंको ब्रजमें अवतीर्ण होनेके लिये श्रीहरिका आदेश, सरस्वती और लक्ष्मीसहित वैकुण्ठवासी नारायणका तथा क्षीरशायी विष्णुका शुभागमन, नारायण और विष्णुका श्रीकृष्णके स्वरूपमें लीन होना, संकर्षण तथा पुत्रों-सहित पार्वतीका आगमन, देवताओं और देवियोंको पृथ्वीपर जन्म ग्रहण करनेके लिये प्रभुका आदेश, किस देवताका कहाँ और किस रूपमें जन्म होगा—इसका विवरण, श्रीराधाकी चिन्ता तथा श्रीकृष्णका उन्हें सान्त्वना देते हुए अपनी और उनकी एकताका प्रति-पादन करना, फिर श्रीहरिकी आज्ञासे राधा और गोप-गोपियोंका नन्द-गोकुलमें गमन
४२८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
उस राजमार्गके तटप्रान्तकी शोभा बढ़ाते थे। उन सबपर कुंकुम-केसर छिड़के गये थे। जगह-जगह उत्तम रत्नोंके बने हुए मङ्गलघट स्थापित थे, उनमें फल और शाखाओंसहित पल्लव शोभा पाते थे। सिन्दूर, कुंकुम, गन्ध और चन्दनसे उनकी अर्चना की गयी थी। पुष्पमालाओंसे विभूषित हुए वे मङ्गलकलश उभयपार्श्वमें उस राजमार्गकी शोभावृद्धि करते थे। क्रीडामें तत्पर हुई झुंड-की-झुंड गोपिकाएँ उस मार्गको घेरे खड़ी थीं।
उपर्युक्त मनोरम प्रदेश चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे चर्चित थे। बहुमूल्य रत्नोंसे वहाँ मणिमय सोपानोंका निर्माण किया गया था। कुल मिलाकर सोलह द्वार थे, जो अग्निशुद्ध रमणीय चिन्मय वस्त्रों, श्वेत चामरों, दर्पणों, रत्नमयी शय्याओं तथा विचित्र पुष्पमालाओंसे शोभायमान थे। बहुत-से द्वारपाल उन प्रदेशोंकी रक्षा करते थे। उनके चारों ओर खाइयाँ थीं और लाल रंगके परकोटोंसे वे घिरे हुए थे। इन मनोरम प्रदेशोंका दर्शन करके देवता वहाँसे आगे बढ़नेको उद्यत हुए। वे जल्दी-जल्दी कुछ दूरतक गये। तब वहाँ उन्हें रासेश्वरी श्रीराधाका आश्रम दिखायी दिया। नारद! देवताओंकी आदिदेवी गोपीशिरोमणि श्रीकृष्णप्राणाधिका राधिकाका वह निवासस्थान बड़ा ही सुन्दर बनाया गया था। रमणीय द्रव्योंके कारण उसकी मनोहरता बहुत बढ़ गयी थी। वहाँका सब कुछ सबके लिये अनिर्वचनीय था। बड़े-से-बड़े विद्वान् भी उस स्थानका सम्यक् वर्णन नहीं कर सके हैं। वह मनोहर आश्रम गोलाकार बना है तथा उसका विस्तार बारह कोसका है। उसमें सौ मन्दिर बने हुए हैं। वह अद्भुत आश्रम दिव्य रत्नोंके तेजसे जगमगाता रहता है। बहुमूल्य रत्नोंके सार-समूहसे उसकी रचना हुई है। वह दुर्लङ्घ्य एवं गहरी खाइयोंसे सुशोभित है। कल्पवृक्ष उस आश्रमको सब ओरसे घेरे हुए हैं। उसके भीतर सैकड़ों पुष्पोद्यान शोभा पाते हैं। बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित परकोटोंसे वह आश्रममण्डल घिरा हुआ है। उसमें सात दरवाजे हैं, जो सभी उत्तम रत्नोंकी बनी हुई वेदिकाओंसे युक्त हैं। उन दरवाजोंमें विचित्र रत्न जड़े गये हैं और नाना प्रकारके चित्र बने हैं। क्रमशः बने हुए इन सातों द्वारोंको पार करनेपर वह आश्रम सोलह द्वारोंसे युक्त है। देवताओंने देखा—उसकी चहारदीवारी सहस्र धनुष ऊँची है। उत्तम रत्नोंके बने हुए अत्यन्त मनोहर छोटे-छोटे कलशोंके समुदाय अपने तेजसे उस परकोटेको उद्भासित कर रहे हैं। उसे देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। वे उसकी परिक्रमा करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ कुछ दूर और आगे गये। सामने चलते हुए वे इतने आगे बढ़ गये कि वह आश्रम उनसे पीछे हो गया। मुने! तदनन्तर उन्होंने गोपों और गोपिकाओंके उत्तम आश्रम देखे, जिनमें बहुमूल्य रत्न जड़े हुए हैं। उनकी संख्या सौ करोड़ है। इस प्रकार सब ओर गोपों और गोपिकाओंके सम्पूर्ण आश्रमको तथा अन्य नये-नये रमणीय स्थलोंको देखते-देखते उन देवेश्वरोंने समस्त गोलोकका निरीक्षण किया। वह सब देखकर उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। तदनन्तर फिर वही गोलाकार रम्य वृन्दावन, शतशृंग पर्वत तथा उसके बाहर विरजा नदी दिखायी दी। विरजा नदीके बाद देवताओंने सब कुछ सूना ही देखा। वह अद्भुत गोलोक उत्तम रत्नोंसे निर्मित तथा वायुके आधारपर स्थित था। श्रीराधिकाकी आज्ञाका अनुसरण करते हुए परमेश्वर श्रीकृष्णकी इच्छासे उसका निर्माण हुआ है। वह केवल मङ्गलका धाम है और सहस्रों सरोवरोंसे सुशोभित है।
मुने! देवताओंने वहाँ अत्यन्त मनोहर नृत्य तथा सुन्दर तालसे युक्त रमणीय संगीत देखा, जहाँ श्रीराधा-कृष्णके गुणोंका अनुवाद हो रहा था। उस अमृतोपम गीतको सुनते ही वे देवता मूर्च्छित हो गये। फिर क्षणभरमें सचेत हो मन-
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४२९
ही-मन श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए उन्होंने स्थान-स्थानपर परम आश्चर्यमय मनोहर दृश्य देखे। नाना प्रकारके वेश धारण किये समस्त गोपिकाएँ उनके दृष्टिपथमें आयीं। कोई अपने हाथोंसे मृदंग बजा रही थीं तो किन्हींके हाथोंसे वीणा-वादन हो रहा था। किन्हींके हाथमें चँवर थे तो किन्हींके करताल। किन्हींके हाथोंमें यन्त्रवाद्य शोभा पा रहे थे। कितनी ही रत्नमय नूपुरोंकी झनकार फैला रही थीं। बहुतोंकी रत्नमयी काञ्ची बज रही थी, जिसमें क्षुद्रघण्टिकाओंके शब्द गूँज रहे थे। किन्हींके माथेपर जलसे भरे घड़े थे, जो भाँति-भाँतिके नृत्यके प्रदर्शनका मनोरथ लिये खड़ी थीं। नारद! कुछ दूर और आगे जानेपर उन्होंने बहुत-से आश्रम देखे, जो राधाकी प्रधान सखियोंके आवासस्थान थे। वे रूप, गुण, वेश, यौवन, सौभाग्य और अवस्थामें एक-दूसरीके समान थीं। श्रीराधाकी समवयस्का सखियाँ तैंतीस गोपियाँ हैं, जिनकी वेश-भूषा अनिर्वचनीय है।
उनके नाम सुनो—सुशीला, शशिकला, यमुना, माधवी, रति, कदम्बमाला, कुन्ती, जाह्नवी, स्वयंप्रभा, चन्द्रमुखी, पद्ममुखी, सावित्री, सुधामुखी, शुभा, पद्मा, पारिजाता, गौरी, सर्वमङ्गला, कालिका, कमला, दुर्गा, भारती, सरस्वती, गङ्गा, अम्बिका, मधुमती, चम्पा, अपर्णा, सुन्दरी, कृष्णप्रिया, सती, नन्दिनी और नन्दना—ये सब-की-सब समान रूपवाली हैं। इनके शुभ्र आश्रम रत्नों और धातुओंसे चित्रित हैं। नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित होनेके कारण वे अत्यन्त मनोहर प्रतीत होते हैं। उनके शिखर बहुमूल्य रत्नमय कलश-समूहोंसे जाज्वल्यमान हैं। उत्तम रत्नोंद्वारा उनकी रचना हुई है। गोलोक ब्रह्माण्डसे बाहर और ऊपर है। उससे ऊपर दूसरा कोई लोक नहीं है। ऊपर सब कुछ शून्य ही है। वहींतक सृष्टिकी अन्तिम सीमा है। सात रसातलोंसे भी नीचे सृष्टि नहीं है, रसातलोंसे नीचे जल और अन्धकार है, जो अगम्य और अदृश्य है। (अध्याय ४)
श्रीराधाके विशाल भवन एवं अन्तःपुरकी शोभाका वर्णन, ब्रह्मा आदिको दिव्य तेजःपुञ्जके दर्शन तथा उनके द्वारा उन तेजोमय परमेश्वरकी स्तुति
भगवान् नारायण कहते हैं—सम्पूर्ण गोलोकका दर्शन करके उन तीनों देवताओंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। वे फिर श्रीराधाके प्रधान द्वारपर आये। उस द्वारका निर्माण उत्तम रत्नों और मणियोंसे हुआ था। वहाँ दो वेदिकाएँ थीं। हल्दीके रंगकी उत्तम मणिसे, जिसमें हीरेका भी सम्मिश्रण था, बनाये गये श्रेष्ठ रत्न-मणिनिर्मित किवाड़ उस द्वारकी शोभा बढ़ाते थे। देवताओंने देखा, उस द्वारपर रक्षाके लिये परम उत्तम वीरभानुकी नियुक्ति हुई है। वे रत्नोंके बने हुए सिंहासनपर बैठे हैं, पीताम्बर पहने हैं तथा रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके मस्तकपर रत्नमय मुकुट उद्भासित हो रहा है। विचित्र
चित्रोंसे अलंकृत उस अद्भुत एवं विचित्र द्वारकी रक्षा करते हुए द्वारपाल वीरभानुके पास जा देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक अपना सारा अभिप्राय निवेदन किया। तब द्वारपालने निःशंक होकर उन देवेश्वरोंसे कहा—‘देवगण! मैं इस समय आज्ञा लिये बिना आपलोगोंको भीतर नहीं जाने दूँगा’।
मुने! यह कहकर द्वारपालने श्रीकृष्णके स्थानपर सेवकोंको भेजा और उनकी आज्ञा पाकर देवताओंको अंदर जानेकी अनुमति दी। उससे पूछकर वे तीनों देवता दूसरे उत्तम द्वारपर गये, जो पहलेसे अधिक विचित्र, सुन्दर और मनोहर था। नारद! उस द्वारपर नियुक्त हुए चन्द्रभानु नामक द्वारपाल दिखायी दिये, जिनकी अवस्था
४३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण किशोर थी। शरीरकी कान्ति सुन्दर एवं श्याम थी। वे सोनेका बेंत हाथमें लिये रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे। पाँच लाख गोपोंका समूह उनकी शोभा बढ़ा रहा था। उनसे पूछकर देवतालोग तीसरे उत्तम द्वारपर गये, जो दूसरेसे भी अधिक सुन्दर, विचित्र तथा मणियोंके तेजसे प्रकाशित था। नारद! वहाँ द्वारकी रक्षामें नियुक्त सूर्यभानु नामक द्वारपाल दिखायी दिये, जो दो भुजाओंसे युक्त, मुरलीधारी, किशोर, श्याम एवं सुन्दर थे। उनके दोनों गालोंपर दो मणिमय कुण्डल झलमला रहे थे। रत्नकुण्डलधारी सूर्यभानु श्रीराधा और श्रीकृष्णके परम प्रिय एवं श्रेष्ठ सेवक थे। वे सम्राट्की भाँति नौ लाख गोपोंसे घिरे रहते थे। उनसे पूछकर देवतालोग चौथे द्वारपर गये, जो उन सभी द्वारोंसे विलक्षण, रमणीय तथा मणियोंकी दिव्य दीप्तिसे उद्दीप्त दिखायी देता था। अद्भुत एवं विचित्र रत्नसमूहसे जटित होनेके कारण उस द्वारकी मनोहरता और बढ़ गयी थी। उसकी रक्षाके लिये ब्रजराज वसुभानु नियुक्त थे। देवतालोग उनसे मिले। वे किशोर-अवस्थाके सुन्दर एवं श्रेष्ठ पुरुष थे। हाथमें मणिमय दण्ड लिये हुए थे। रमणीय आभूषणोंसे विभूषित हो रत्नसिंहासनपर बैठे थे। पके बिम्बफलके समान लाल ओष्ठ और मन्द-मन्द मुस्कानसे वे अत्यन्त मनोहर दिखायी देते थे। देवतालोग उनसे पूछकर पाँचवें द्वारपर गये। वह हीरेकी दीवारोंपर अङ्कित विचित्र चित्रोंसे अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देता था। वहाँ देवभानु नामक द्वारपाल मिले, जो रत्नमय आभूषण धारण करके मनोहर सिंहासनपर आसीन थे। उनके मस्तकपर मोरपंखका मुकुट शोभा दे रहा था और वे रत्नोंके हारसे अलंकृत थे। कदम्बोंके पुष्पसे सुशोभित, उत्तम रत्नमय कुण्डलोंसे प्रकाशित तथा चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे चर्चित थे। सम्राटोंके समान दस लाख प्रजा उनके साथ थी। हाथमें बेंत धारण करनेवाले द्वारपाल देवभानुसे पूछकर देवतालोग प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े। सामने छठा द्वार था। उसकी विलक्षण शोभा थी। चित्रोंकी श्रेणियोंसे वह द्वार उद्भासित हो रहा था। उसकी दोनों दीवारें वज्रमणि (हीरे)-की बनी थीं और फूलोंकी मालाओंसे सजायी गयी थीं। उस द्वारपर ब्रजराज शक्रभानु नियुक्त थे। देवतालोग उनसे मिले। वे नाना प्रकारके अलंकारोंकी शोभासे सम्पन्न थे। उनके साथ दस लाख प्रजाएँ थीं। चन्दन-पल्लवसे युक्त उनके कपोल कुण्डलोंकी प्रभासे उद्भासित थे। उनसे आज्ञा लेकर देवतालोग तुरंत ही सातवें द्वारपर जा पहुँचे। उसमें नाना प्रकारके चित्र अङ्कित थे। वह पिछले छहों द्वारोंसे अत्यन्त विलक्षण था। वहाँ द्वारपालके पदपर श्रीहरिके परम प्रिय रत्नभानु नियुक्त थे, जिनका सारा अङ्ग चन्दनसे अभिषिक्त था। वे पुष्पोंकी मालासे विभूषित थे। मणि-रत्ननिर्मित मनोहर एवं रमणीय भूषण उनकी शोभा बढ़ाते थे। बारह लाख गोप आज्ञाके अधीन रहकर राजाधिराजकी भाँति उनकी शोभा बढ़ाते थे। उनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला था। वे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे। उनके हाथमें बेंतकी छड़ी शोभा पाती थी। वे तीनों देवेश्वर उनसे बातचीत करके प्रसन्नतापूर्वक आठवें द्वारपर गये। वह पूर्वोक्त सातों द्वारोंसे विलक्षण एवं विचित्र शोभाशाली था। वहाँ उन्होंने सुपार्श्व नामक मनोहर द्वारपालको देखा, जो मन्द मुस्कराहटके साथ बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। वे भालदेशमें धारित चन्दनके तिलकसे अत्यन्त उद्भासित दिखायी देते थे। उनके ओठ बन्धुजीवपुष्प (दुपहरिया)-के समान लाल थे। रत्नोंके कुण्डल उनके गण्डस्थलको अलंकृत किये हुए थे। वे समस्त अलंकारोंकी शोभासे सम्पन्न थे। रत्नमय दण्ड धारण करते थे और उनके साथ बारह लाख गोप थे। वहाँसे
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४३१ अनुमति मिलनेपर वे देवता शीघ्र ही नवें अभीष्ट द्वारपर गये। वहाँ हीरे आदि उत्तम रत्नोंकी चार वेदियाँ बनी थीं। वह द्वार अपूर्व चित्रोंसे सज्जित तथा मालाओंकी जालीसे विभूषित था। वहाँ सुन्दर आकारवाले सुबल नामक द्वारपाल दृष्टिगोचर हुए, जो भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे भूषित, भूषणके योग्य तथा मनोहर थे। उनके साथ बारह लाख व्रजवासी थे। दण्डधारी सुबलसे पूछकर देवताओंने तत्काल दूसरे द्वारको प्रस्थान किया। उस विलक्षण दसवें द्वारको देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। मुने! वहाँका सब कुछ अनिर्वचनीय, अदृष्ट और अश्रुत था- वैसा दृश्य कभी देखने और सुननेमें भी नहीं आया था। वहाँ सुन्दर सुदामा नामक गोप द्वारपालके पदपर प्रतिष्ठित थे। सुदामाका रूप श्रीकृष्णके समान ही मनोहर तथा अवर्णनीय था। उनके साथ बीस लाख गोपोंका समूह रहता था। दण्डधारी सुदामाका दर्शनमात्र करके देवतालोग दूसरे द्वारपर चले गये। वह ग्यारहवाँ द्वार अत्यन्त विचित्र और अद्भुत था। वहाँ सुन्दर चित्र अङ्कित थे। वहाँके द्वारपाल व्रजराज श्रीदामा थे, जिन्हें राधिकाजी अपने पुत्रके समान मानती थीं। वे पीताम्बरसे विभूषित थे, बहुमूल्य रत्नोंद्वारा रचित रम्य सिंहासनपर आसीन थे और अमूल्य रत्नाभरण उनकी शोभा बढ़ाते थे। उनका रूप बड़ा ही मनोहर था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे उनका शृङ्गार हुआ था। वे अपने कपोलोंके योग्य कानोंमें उत्तम रत्नमय कुण्डल धारण करके प्रकाशित हो रहे थे। श्रेष्ठ रत्नोंद्वारा रचित विचित्र मुकुट उनके मस्तककी शोभा बढ़ा रहा था। प्रफुल्ल मालती-पुष्पकी मालाओंसे उनके सारे अङ्ग विभूषित थे। करोड़ों गोपोंसे घिरे होनेके कारण राजाधिराजसे भी अधिक उनकी शोभा होती थी। उनकी अनुमति ले देवतालोग प्रसन्नतापूर्वक बारहवें द्वारपर गये, जहाँ बहुमूल्य रत्नोंकी बनी हुई बहुत-सी वेदिकाएँ प्रकाशित हो रही थीं। वह विचित्र द्वार सबके लिये दुर्लभ, अदृश्य और अश्रुत था। वज्रमयी भीतोंपर अङ्कित चित्रोंके कारण उस द्वारकी सुन्दरता और मनोहरता बहुत बढ़ गयी थी। देवताओंने देखा बारहवें द्वारकी रक्षामें सुन्दरी गोपाङ्गनाएँ नियुक्त हुई हैं। वे सब- की-सब रूप-यौवनसे सम्पन्न, रत्नाभरणोंसे विभूषित, पीताम्बरधारिणी तथा बँधे हुए केश-कलापके भारसे सुशोभित थीं। उनके सारे अङ्ग सुस्निग्ध मालतीकी मालाओंसे अलंकृत थे। रत्नोंके बने हुए कंगन, बाजूबंद तथा नूपुर उन-उन अङ्गोंकी शोभा बढ़ाते थे। उनके दोनों कपोल दिव्य रत्नमय कुण्डलोंसे उद्भासित हो रहे थे। वे चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे अपना शृङ्गार किये हुए थीं। वहाँ सौ कोटि गोपियोंमें एक श्रेष्ठ गोपी थी, जो श्रीहरिको भी परम प्रिय थी। उन करोड़ों गोपिकाओंको देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। मुने! उन सब गोपियोंसे अनुमति ले वे देवता प्रसन्नतापूर्वक दूसरे द्वारपर गये। इस तरह क्रमशः तीन द्वारोंपर उन्होंने देखा-श्रेष्ठ और अत्यन्त मनोहर गोपाङ्गनाएँ उनकी रक्षा कर रही हैं। वे सुन्दरियोंमें भी सुन्दरी, रमणीया, धन्या, मान्या और शोभाशालिनी हैं। सब-की-सब सौभाग्यमें बढ़ी-चढ़ी तथा श्रीराधिकाकी प्रिया हैं। सुरम्य भूषणोंसे भूषित हुई उन गोपसुन्दरियोंके अङ्गोंमें नूतन यौवनका अंकुर प्रकट हुआ है। इस प्रकार वे तीनों द्वार स्वप्नकालिक अनुभवके समान अद्भुत, अश्रुत, अदृष्टपूर्व, अतिरमणीय और विद्वानोंके द्वारा भी अवर्णनीय थे। उन सबको देखकर और उन-उन गोपाङ्गनाओंसे बातचीत करके आश्चर्यचकित हुए वे तीनों देवेश्वर सोलहवें मनोहर द्वारपर गये, जो श्रीराधिकाके अन्तःपुरका द्वार था। वह सब द्वारोंमें प्रधान तथा केवल गोपाङ्गनागणोंद्वारा ही रक्षणीय था। श्रीराधाकी जो तैंतीस समयवयस्का सखियाँ थीं, वे ही इस
४३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण द्वारका संरक्षण करती थीं। उन सबकी वेश- भूषा अवर्णनीय थी। वे नाना प्रकारके सद्गुणोंसे युक्त, रूप-यौवनसे सम्पन्न तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थीं। रत्ननिर्मित कङ्कण, केयूर तथा नूपुर धारण किये हुए थीं। उनके कटिप्रदेश श्रेष्ठ रत्नोंकी बनी हुई क्षुद्र घण्टिकाओंसे अलंकृत थे। रत्ननिर्मित युगल कुण्डलोंसे उनके गण्डस्थलोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। प्रफुल्ल मालतीकी मालाओंसे उनके वक्षःस्थलका मध्यभाग उद्भासित हो रहा था। उनके मुख-चन्द्र शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाओंकी प्रभाको छीने लेते थे। पारिजातके पुष्पोंकी मालाओंसे उनके सुरम्य केशपाश आवेष्टित थे। वे भाँति- भाँतिके सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित थीं। पके बिम्बफलके समान उनके लाल-लाल ओठ थे। मुखारविन्दोंपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। पके अनारके दानोंकी भाँति दन्तपंक्तियाँ उनकी शोभा बढ़ा रही थीं। मनोहर चम्पाके समान गौरवर्णवाली उन गोपकिशोरियोंके कटिभाग अत्यन्त कृश थे। उनकी नासिकाओंमें गजमुक्ताकी बुलाकें शोभा दे रही थीं। वे नासिकाएँ पक्षिराज गरुड़की सुन्दर चोंचकी शोभा धारण करती थीं। उनका चित्त नित्य मुकुन्दके चरणारविन्दोंमें लगा था। द्वारपर खड़े हुए निमेषरहित देवताओंने उन सबको देखा। वह द्वार श्रेष्ठ मणिरत्नोंकी वेदिकाओंसे सुशोभित था। इन्द्रनीलमणिके बहुत-से खम्भे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके बीच-बीचमें सिन्दूरी रंगकी लाल मणियाँ जड़ी थीं। उस द्वारको पारिजात-पुष्पोंकी मालाओंसे सजाया गया था। उन्हें छूकर बहनेवाली वायु वहाँ सर्वत्र सुगन्ध फैला रही थी। राधिकाके उस परम आश्चर्यमय अन्तःपुरके द्वारका अवलोकन करके देवताओंके मनमें श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंके दर्शनकी उत्कण्ठा जाग उठी। उन्होंने उन सखियोंसे पूछकर शीघ्र ही द्वारके भीतर प्रवेश किया। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। भक्तिके उद्रेकसे उनकी आँखें भर आयी थीं। उनके मुख और कंधे कुछ-कुछ झुक गये थे। अब देवताओंने श्रीराधिकाके उस श्रेष्ठ अन्तःपुरको अत्यन्त निकटसे देखा। समस्त मन्दिरोंके मध्यभागमें एक मनोहर चतुःशाला थी, जिसकी रचना बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे की गयी थी। भाँति-भाँतिके हीरक-जटित मणिमय स्तम्भ उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। पारिजात-पुष्पोंकी मालाओंकी झालरोंसे उसे सजाया गया था। मोती, माणिक्य, श्वेत चँवर, दर्पण तथा बहुमूल्य रत्नोंके सारतत्त्वसे बने हुए कलश उस चतुःशालाको विभूषित कर रहे थे। रेशमी सूतमें गुँथे हुए चन्दन-पल्लवोंकी बन्दनवारसे विभूषित मणिमय स्तम्भ-समूह उसके प्राङ्गणको रमणीय बना रहे थे। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा कुंकुमके द्रवका वहाँ छिड़काव हुआ था। श्वेत धान्य, श्वेत पुष्प, मूँगा, फल, अक्षत, दूर्वादल और लाजा आदिके निर्मञ्छन (निछावर)-से उसकी अपूर्व शोभा हो रही थी। फल, रत्न, रत्नकलश, सिन्दूर, कुंकुम और पारिजातकी मालाओंसे उसको सजाया गया था। फूलोंकी सुगन्धसे सुवासित वायु उस स्थानको सब ओरसे सौरभयुक्त बना रही थी। जो सर्वथा अनिर्वचनीय, अनिरूपित और ब्रह्माण्डमात्रमें दुर्लभ द्रव्य एवं वस्तुएँ थीं, उन्हींसे उस भव्य भवनको विभूषित किया गया था। वहाँ अत्यन्त सुन्दर रत्नमयी शय्या बिछी थी, जिसपर महीन एवं कोमल वस्त्रोंका बिछावन था। नारद! करोड़ों रत्नमय कलश तथा रत्ननिर्मित पात्र वहाँ सजाकर रखे गये थे, जो बहुमूल्य होनेके साथ ही बहुत सुन्दर थे। उनसे उस चतुःशालाकी बड़ी शोभा हो रही थी। नाना प्रकारके वाद्योंकी मधुर ध्वनि वहाँ गूँज रही थी। वीणा आदिके स्वर-यन्त्रोंके साथ गोपियोंका सुमधुर गीत सुनायी पड़ता था। मृदंग तथा अन्यान्य वाद्योंकी ध्वनिसे वह स्थान बड़ा मोहक जान पड़ता था। श्रीकृष्ण-तुल्य रूप, रंग और
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४३३
वेश-भूषावाले गोपसमूहोंसे घिरे हुए उस अन्तःपुरको झुंड-की-झुंड गोपाङ्गनाएँ, जो श्रीराधाकी सखियाँ थीं, सुशोभित कर रही थीं। श्रीराधा और श्रीकृष्णके गुणगानसम्बन्धी पदोंका संगीत वहाँ सब ओर सुनायी पड़ता था। ऐसे अन्तःपुरको देखकर वे देवता विस्मयसे विमुग्ध हो उठे। उन्होंने वहाँ मधुर गीत सुना और उत्तम नृत्य देखा। वे सब देवता वहाँ स्थिरभावसे खड़े हो गये। उन सबका चित्त ध्यानमें एकतान हो रहा था। उन देवेश्वरोंको वहाँ रमणीय रत्नसिंहासन दिखायी दिया, जो सौ धनुषके बराबर विस्तृत था। वह सब ओरसे मण्डलाकार दिखायी देता था। श्रेष्ठ रत्नोंके बने हुए छोटे-छोटे कलश-समूह उसमें जुड़े हुए थे। विचित्र पुतलियों, फूलों तथा चित्रमय काननोंसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। ब्रह्मन्! वहाँ उनको एक अत्यन्त अद्भुत और आश्चर्यमय तेजःपुञ्ज दिखायी दिया, जो करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान था। वह दिव्य ज्योतिसे जाज्वल्यमान हो रहा था। ऊपर चारों ओर सात ताड़की दूरीमें उसका प्रकाश फैला हुआ था। सबके तेजको छीन लेनेवाला वह प्रकाशपुञ्ज सम्पूर्ण आश्रमको व्याप्त करके देदीप्यमान था। वह सर्वत्र व्यापक, सबका बीज तथा सबके नेत्रोंको अवरुद्ध कर देनेवाला था। उस तेजःस्वरूपको देखकर वे देवता ध्यानमग्न हो गये तथा भक्तिभावसे मस्तक एवं कंधे झुकाकर बड़ी श्रद्धाके साथ उसको प्रणाम करने लगे। उस समय परमानन्दकी प्राप्तिसे उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये थे और सारे अङ्ग पुलकित हो गये थे। वे ऐसे जान पड़ते थे मानो उनके अभीष्ट मनोरथ पूर्ण हो गये हों। उन तेजःस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार करके वे तीनों देवेश्वर उठकर खड़े हो गये और उन्हींका ध्यान करते हुए उस तेजके सामने गये। ध्यान करते-करते जगत्स्रष्टा ब्रह्माके दोनों हाथ जुड़ गये। नारद! उन्होंने शिवको दाहिने और धर्मको बायें कर लिया तथा वे भक्तिके उद्रेकसे चित्तको ध्यानमग्न करके उन परात्पर, गुणातीत, परमात्मा जगदीश्वर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे।
ब्रह्माजी बोले— जो वर, वरेण्य, वरद, वरदायकोंके कारण तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्तिके हेतु हैं; उन तेजःस्वरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो मङ्गलकारी, मङ्गलके योग्य, मङ्गलस्वरूप, मङ्गलदायक तथा समस्त मङ्गलोंके आधार हैं; उन तेजोमय परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सर्वत्र विद्यमान, निर्लिप्त, आत्मस्वरूप, परात्पर, निरीह और अवितर्क्य हैं; उन तेजःस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है। जो सगुण, निर्गुण, सनातन, ब्रह्म, ज्योतिःस्वरूप, साकार एवं निराकार हैं; उन तेजोरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। प्रभो! आप अनिर्वचनीय, व्यक्त, अव्यक्त, अद्वितीय, स्वेच्छामय तथा सर्वरूप हैं। आप तेजःस्वरूप परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। तीनों गुणोंका विभाग करनेके लिये आप तीन रूप धारण करते हैं; परंतु हैं तीनों गुणोंसे अतीत। समस्त देवता आपकी कलासे प्रकट हुए हैं। आप श्रुतियोंकी पहुँचसे भी परे हैं; फिर आपको देवता कैसे जान सकते हैं? आप सबके आधार, सर्वस्वरूप, सबके आदिकारण, स्वयं कारणरहित, सबका संहार करनेवाले तथा अन्तरहित हैं। आप तेजःस्वरूप परमात्माको नमस्कार है। जो सगुण रूप है, वही लक्ष्य होता है और विद्वान् पुरुष उसीका वर्णन कर सकते हैं। परंतु आपका रूप अलक्ष्य है; अतः मैं उसका वर्णन कैसे कर सकता हूँ? आप तेजोरूप परमात्माको मेरा प्रणाम है। आप निराकार होकर भी दिव्य आकार धारण करते हैं। इन्द्रियातीत होकर भी इन्द्रिययुक्त होते हैं। आप सबके साक्षी हैं; परंतु आपका साक्षी कोई नहीं है। आप तेजोमय परमेश्वरको मेरा नमस्कार
४३४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
है। आपके पैर नहीं हैं तो भी आप चलनेकी योग्यता रखते हैं। नेत्रहीन होकर भी सबको देखते हैं। हाथ और मुखसे रहित होकर भी भोजन करते हैं। आप तेजोमय परमात्माको मेरा नमस्कार है। वेदमें जिस वस्तुका निरूपण है, विद्वान् पुरुष उसीका वर्णन कर सकते हैं। जिसका वेदमें भी निरूपण नहीं हो सका है, आपके उस तेजोमय स्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ।
जो सर्वेश्वर है, किंतु जिसका ईश्वर कोई नहीं है; जो सबका आदि है, परंतु स्वयं आदिसे रहित है तथा जो सबका आत्मा है, किंतु जिसका आत्मा दूसरा कोई नहीं है; आपके उस तेजोमय स्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं स्वयं जगत्का स्रष्टा और वेदोंको प्रकट करनेवाला हूँ। धर्मदेव जगत्के पालक हैं तथा महादेवजी संहारकारी हैं; तथापि हममेंसे कोई भी आपके उस तेजोमय स्वरूपका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं है। आपकी सेवाके प्रभावसे वे धर्मदेव अपने रक्षककी रक्षा करते हैं। आपकी ही आज्ञासे आपके द्वारा निश्चित किये हुए समयपर महादेवजी जगत्का संहार करते हैं। आपके चरणारविन्दोंकी सेवासे ही सामर्थ्य पाकर मैं प्राणियोंके प्रारब्ध या भाग्यकी लिपिका लेखक तथा कर्म करनेवालोंके फलका दाता बना हुआ हूँ। प्रभो! हम तीनों आपके भक्त हैं और आप हमारे स्वामी हैं। ब्रह्माण्डमें बिम्बसदृश होकर हम विषयी हो रहे हैं। ब्रह्माण्ड अनन्त हैं और उनमें हम-जैसे सेवक कितने ही हैं। जैसे रेणु तथा उनके परमाणुओंकी गणना नहीं हो सकती, उसी प्रकार ब्रह्माण्डों और उनमें रहनेवाले ब्रह्मा आदिकी गणना असम्भव है। आप सबके उत्पादक परमेश्वर हैं। आपकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है? जिन महाविष्णुके एक-एक रोम-कूपमें एक-एक ब्रह्माण्ड है, वे भी आपके ही सोलहवें अंश हैं। समस्त योगीजन आपके इस मनोवाञ्छित ज्योतिर्मय स्वरूपका ध्यान करते हैं। परंतु जो आपके भक्त हैं, वे आपकी दासतामें अनुरक्त रहकर सदा आपके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं। परमेश्वर! आपका जो परम सुन्दर और कमनीय किशोर-रूप है, जो मन्त्रोक्त ध्यानके अनुरूप है, आप उसीका हमें दर्शन कराइये। जिसकी अङ्गकान्ति नूतन जलधरके समान श्याम है, जो पीताम्बरधारी तथा परम सुन्दर है, जिसके दो भुजाएँ, हाथमें मुरली और मुखपर मन्द-मन्द मुसकान है, जो अत्यन्त मनोहर है, माथेपर मोरपंखका मुकुट धारण करता है, मालतीके पुष्पसमूहोंसे जिसका शृङ्गार किया गया है, जो चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरके अङ्गरागसे चर्चित है, अमूल्य रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित आभूषणोंसे विभूषित है, बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए किरीट-मुकुट जिसके मस्तकको उद्भासित कर रहे हैं, जिसका मुखचन्द्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको चुराये लेता है, जो पके बिम्बफलके समान लाल ओठोंसे सुशोभित है, परिपक्व अनारके बीजकी भाँति चमकीली दन्तपंक्ति जिसके मुखकी मनोरमताको बढ़ाती है, जो रास-रसके लिये उत्सुक हो केलि-कदम्बके नीचे खड़ा है, गोपियोंके मुखोंकी ओर देखता है तथा श्रीराधाके वक्षःस्थलपर विराजित है; आपके उसी केलि-रसोत्सुक रूपको देखनेकी हम सबकी इच्छा है। ऐसा कहकर विश्वविधाता ब्रह्मा उन्हें बारंबार प्रणाम करने लगे। धर्म और शंकरने भी इसी स्तोत्रसे उनका स्तवन किया तथा नेत्रोंमें आँसू भरकर बारंबार वन्दना की*।
* वरं वरेण्यं वरदं वरदानां च कारणम्। कारणं सर्वभूतानां तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
मङ्गल्यं मङ्गलाहं च मङ्गलं मङ्गलप्रदम्। समस्तमङ्गलाधारं तेजोरूपं नमाम्यहम्॥