भारतकोश
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ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary

आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished737 पृष्ठ

( २२५ ) ग्रहणे यथा¹ रवीन्द्वोः स्पष्टीकरणाच्च मुक्तवत्कृत्वा² एवं पर्वज्ञानं ग्रहणज्ञानं³ स्फुटं गणितात् ॥ ३३ ॥ चत्वारि त्रयुवर्त्तं¹ ग्रहणान्यर्कस्य² सप्तचन्द्रस्य⁴ । द्रष्टो³दयास्तमययोर्क⁵रात्रिदलयोश्च केंद्रस्य ॥ ३४ ॥ सर्वपादानांमंतो¹ तिष्यंतं³ज्ञानमिंदुभास्करयोः । ग्रहणे च क्ते² स्पष्टे जिष्णुसुतब्रह्मगुप्तेन ॥ ३५ ॥

३३. (ग) १. यथरविद्वोः for (यथा रवीन्द्वोः)
२. ज्ञात्वा for (कृत्वा) ३. “ग्रहणज्ञानं” लुप्त पद हैं
(च) ३. ग्रहणज्ञानस्फुटं for (ग्रहणज्ञानं स्फुटं)
(ङ) २. मुक्तवज् ज्ञात्वा for (मुक्तवत् कृत्वा)
३४. (घ) १. त्रपुवर्त्त (ग) त्रपुवत्त for (त्रयुवर्त्तं)
२. ग्रहणान्यर्कस्य (

( २२६ ) दुरभ्रष्टे ग्रहणे श्रेषेणार्यभटविष्णुचन्द्रस्य॑ । दृग्गणितविसंवादः काकतालीयम् ॥ ३६ ॥ स्फुटतिथ्यंतज्ञानं यन्नार्यभटादिभिः कृतमतीतैः । ब्राह्म॑ स्फुटं कृतं तज्जिष्णुसुतब्रह्मगुप्तेन ॥ ३७ ॥ ब्रह्मोक्तोर्केन्दु तदुच्चपातदेशांतरस्फुटीकरणैः । स्फुटसिद्धर्कं ग्रहणाद्वयं स्फुटमतीतोक्तम् ॥ ३८ ॥ विक्षेपाग्रेषु त्रीन्बिन्दून् प्रग्रहणमध्यमोक्षेषु । कृत्वा तन्मन्यद्वयमध्यगयोः सूत्रयोर्योगात् ॥ ३९ ॥

३६. (घ) १. दूरभ्रष्टे (च) (ङ) for (दुरभ्रष्टे)
२. श्रीषेणार्य (ग) खेणार्य (ङ) for (श्रेषेणार्यभट)
३. चंद्रेषु (ग) (च) (ङ) for (चन्द्रस्य)
४. विसंवादात्संवादः (च) for (विसंवादः)
(ग) ५. ग्रहगणितविसंवादात्संवादः for (दृग्गणितविसंवादः)
(च) २. श्रीषेणार्य for (श्रेषेणार्य)
(ङ) ५. ग्रहगणित for (दृग्गणित) ४. विसंवादात् संवादः for (विसंवादः)
६. काकतालीयः for (काकतालीयम्)
३७. (घ) १. यत्रार्य for (यन्नार्य)
३८. (घ) १. मिद्रर्कं (घ) मिद्रर्क for (सिद्धर्कं)
(ग) २. ब्रह्मोक्तार्केंदुस्तदुच्च for (ब्रह्मोक्तोर्केन्दु)
३. स्फुटिकरणैः for (स्फुटीकरणैः) ४. द्वितयं न for (द्वयं)
५. स्फुटमतीवोक्तम् for (स्फुटमतीतोक्तम्)
(च) २. ब्रह्मोक्तार्केंदु for (ब्रह्मोक्तोर्केन्दु) १. मिंद्रर्कं for (सिद्धर्कं)
(ङ) २. ब्राह्मोक्तार्केन्दु for (ब्रह्मोक्तोर्केन्दु) १. मिद्रकं for (सिद्धर्कं)
४. ग्रहणद्वितयं for (ग्रहणाद्वयं)
३९. (घ) १. कृपा for (कृत्वा)
२. तन्मत्स्यद्वय (ग) • तन्मत्स्यद्वय for (तन्मन्यद्वय)
३. मध्यमयोः for (मध्यगयोः)
(च) १. कृत्या for (कृत्वा) २. तन्मत्स्य for (तन्मन्य)
(ङ) २. तन्मत्स्य for (तन्मन्य)

( २२७ ) बिंदु परिलेखरेखा¹ ग्राहकमार्गः प्रसार्य सूत्रे द्वे । आद्यंताभ्यां मध्यम⁴माछेद्य² स्थुल³ एवं⁵ वा ॥ ४० ॥ बिन्दु द्वयांतरं² स्थितिदलेन हृत³मिष्टनाडिका⁴गुणितम् । ग्राह्य⁶फलांगुलस्थं⁵ ग्राह्यमानेन परिलेखः¹ ॥ ४१ ॥ इष्ट ग्रासोर्केन्द्वो¹र्निमोलनोन्मीलनं² च भानुमंतः⁵ । ऋषुवर्त्तः³ प्राग्मध्यात् पश्चाद्विष्टांगुले⁴ स्थेन ॥ ४२ ॥

४०. (घ) १. परिलेषरेखा (ग) for (परिलेखरेखा)
२. माछोद्य (ग) माछाद्य for (माछेद्य)
३. स्थूल (ग) (च) (ङ) for (स्थुल)
(च) १. परिलेषरेखा for (परिलेखरेखा)
(ङ) ४. मध्यग for (मध्यम) २. मुच्छाद्य for (माछेद्य)
५. मेवं वा for (एवं वा)
४१. (घ) १. परिलिख्य (ग) परिख्यः for (परिलेखः)
(ग) २. बिंदुद्वयान्तर for (बिन्दुद्वयांतरं) ३. हृत (च) (ङ) for (हृत)
४. नालिका for (नाडिका) ५. ष्ठा for (स्थं)
(च) १. परिलेख्य for (परिलेखः)
(ङ) १. परिलिख्य for (परिलेखः) ६. ग्राह्य' for (ग्राह्य)
४२. (घ) १. ऽर्केन्द्वो (ग) इष्टग्राकर्केदो for (इष्टग्रासोर्केन्द्वो)
२. मीलने (ग) मिलने for (मीलनं)
३. त्रपुवर्त्तः (ग) (च) for (ऋषुवर्त्तः)
४. पश्चादुद्दिष्ट्रांगुल (ग) (च) for (पन्चाद्विष्टांगुले)
(च) १. ऽर्केन्द्वो for (ऽर्केन्द्वो) २. मीलने (ङ) for (मीलनं)
(ङ) १. ऽर्केन्द्रो for (केंद्धो) ५. भानुमतोः for (भानुमतः)
३. उर्वं रितः for (ऋषुवर्त्तः)
४. पश्चाद्दिष्ट्राङ्गुल for (पश्चाद्विष्टांगुले)

( २२८ ) मध्यस्य दिनांत्य नवांतरं मिष्टघटिकाभिः । स्थित्यर्द्धनाडिकाद्रतमृणधनमूनाधिके मध्ये ॥ ४३ ॥ आद्यन्ते वांकृत्वा विक्षेपः कोटिरुक्तवद्ग्रासः । विक्षेपान्तरमेवं गुणमिष्टग्रासलिप्ताभिः ॥ ४४ ॥ मध्यग्रासकला हतमृणधन चोक्तवत्स्वविक्षेपः । तेन ग्रासात्कालः कालादसकच्च विक्षेपः ॥ ४५ ॥ ग्रहणोत्तरं न देयं शपथैरपि दत्त सुकृतं नाशाद्यैः । ग्रहणं स्फुटमिहास्फुटमार्यभटाद्यैर्यतस्तंत्रैः ॥ ४६ ॥ ४३. (घ) १. मध्यस्याद्येनांत्ये (ग) मध्यस्याद्येनांते for (मध्यस्यदिनांत्य) २. गुणितमिष्ट (ग) गुणीतमिष्ट for (मिष्ट) ३. द्वृत (ग) हृत for (द्रत) (ग) ४. घटिभि for (घटिकाभिः) ३. धनमृण for (मृणधन) (च) १. मध्यस्याद्येनांत्यनवांतरं for (मध्यस्य दिनांत्य नवांतरं) २. गुणितमिष्टघटिकाभिः for (मिष्टघटिकाभिः) ३. हृत for (द्रत) (ङ) १. मध्यस्याद्येनान्तेन for (मध्यस्यदिनांत्य न) २. वान्तरं गुणित for (वांतरं) ३. हृत for (द्रत) ४४. (घ) १. विक्षे (क्षे) यः for (विक्षेपः) (ग) २. वा कृत्वा for (वांकृत्वा) ३. विलिप्ताभिः for (लिप्ताभिः) (ङ) २. च पृष्टत्के for (वांकृत्वा) ४५. (घ) १. हतमृणांधनं (ग) हतमृणाधन (च) for (हतमृणधन) २. विक्षेण (ग) विक्षेपं for (विक्षेपः) ३. दसकृच्च (ङ) (च) for (दसकच्च) (ग) ४. वोक्त for (चोक्त) ५. ख for (स्व) ६. कालदसत्कृच्चविक्षेप for (कालादसकच्च विक्षेपः) (च) २. विक्षे for (विक्षेपः) (ङ) १. हतमृणांधन for (हतमृणधन) ४६. (ग) १. 'स्फुट' लुप्त है। २. 'मिहा' लुप्त है। ३. तंतैः for (तंत्रै) (च) ४. सुक्रत for (सुकृत) १. स्पष्ट for (स्फुट) (ङ) ४. सुकृतनाशाय for (सुकृतनाशाद्यैः) २. मार्यभट for (मिहास्फुट) ५. श्रीषेणाद्यै for (मार्यभटाद्यै) ३. र्यतस्तन्न for (र्यतस्तंत्रैः)

( २२६ ) परिलेखो^१ वलिनज्या^५ विक्षेपाद्येषु षोडषोऽध्यायः^२ । गृहणोत्तरमर्केन्द्वोः^३ षट्चत्वारिं‍शदार्याणाम् ॥ ४७ ॥ ^४इत्ति श्री ब्रह्मगुप्ते ग्रहणाधिकारः षोडशोऽध्यायः समाप्तः

४७. (घ) १. परिलेषो (ग) परिलेष for (परिलेखो)
२. षोडशोऽध्यायः (ङ) for (षोडषोऽध्यायः)
३. मर्केन्द्रो for (मर्केन्द्वोः)
४. 'इति' से 'समाप्तः' तक पाठ अंकित नहीं ।
(ग) ५. वलन for (वलिन)
४. इति श्री ब्रह्मसिद्धांते ग्रहणोत्तराध्यायः षोडशः for (इति श्री ब्रह्मगुप्ते
ग्रहणाधिकारः षोडशोऽध्यायः समाप्तः)
(च) १. परिलेषो for (परिलेखो) ५. वलनद्या for (वलिनज्या)
२. षोडशो for (षोडषो) ३. मर्केंन्द्रोः for (मर्केन्द्वोः)
४. 'इति' से 'समाप्तः' तक लुप्त ।
(ङ) १. परिलेख for (परिलेखो) ५. वलनजीवा for (वलिनज्या)
४. इति श्री ब्राह्मस्फुट सिद्धान्ते ग्रहणोत्तराध्यायः षोडशः for (इति श्री ब्रह्म-
गुप्ते ग्रहणाधिकारः षोडषोऽध्यायः समाप्तः)

( २३० ) अथ शृङ्गोन्नत्युत्तराध्यायः सप्तदशः भुजकोटिशशिमान शुक्लपरिलेखे सूत्रपरिलेखां । प्रतिदिवसं प्रतिघटिकं यो वेत्तींदुद यज्ञः सः ॥ १ ॥ पराच्य परादिगभिमुखं शुक्लेतरपक्षयोर्लिखेतं भूमौ । अपवर्त्तेष्टेनेकेन राशिना कोटिभुजकर्णात् ॥ २ ॥ परिकल्पार्कं बिन्दु तस्माद्बाहुं यथादिशं कृत्वा । बाहुग्रात्प्राच्यपरां कोटिं तिर्यकथं कर्णः ॥ ३ ॥ १. (घ) १. छेदभुजकोटिकर्णशशि (ग) भुजकोटिकर्णशशि for (भुजकोटिशशि) २. परिलेष for (परिलेख) (ग) 'परिलेख' लुप्त है । ३. परिलेषान् (ग) परिलेखात् for (परिलेखान्) (ग) ४. वेत्तं for (वेत्ती) ५. हृदयज्ञः for (दुंदयज्ञः) (च) १. भुजकोटि कर्णशशिमान for (भुजकोटिशशिमान) २. परिलेष for (परिलेख) ३. परिलेषान् for (परिलेखान्) ४. वेत्तीदूंदं for (वेत्तींदुद) (ङ) २. सित for (परिलेख) ३. लेखात् for (लेखान्) ४. वेत्ति for (वेत्ती) ५. स तन्त्रहृदयज्ञः for (दुंदयज्ञः सः) २. (घ) १. प्राच्य (ग) (च) (ङ) for (पराच्य) २. मुंषं for (मुखं) ३. लिषेत (ग) लिखेद्धूमौ for (लिखेत भूमौ) ४. कर्णान् (ङ) (च) for (कर्णात्) (ग) ५. पदिगभि मुखं for (परादिगभिमुखं) ६. तरतर for (तर) ७. अपवर्त्यैकेनेष्टेन (ङ) for (अपवर्त्तेष्टेनेकेन) ८. वाशिना for (राशिना) (च) २. मुंषं for (मुखं) ३. लिषेत् for (लिखेत) (ङ) ४. लिखेत् (लिखेत) ३. (घ) १. बाह्वग्रात् (ग) (ङ) for (बाहुग्रात्) २. तिर्यक् स्थतं (ग) तिर्यक्स्थितं कर्णम् ॥ ३ ॥ (ग) ३. बिंदुं (ङ) for (बिन्दु) ४. यथादिशि (यथादिशं) ५. कोटि for (कोटिं) (च) ६. परिकल्पाक्कं for (परिकल्पार्कं) २. तिर्यक्स्थं for (तिर्यकथं) (ङ) ६. परिकल्प्यार्कं for (परिकल्पार्कं) ७. दत्वा for (कृत्वा) २. तिर्यक्स्थितंकर्णं for (तिर्यकथं कर्णः)

( २३१ ) कर्णाग्रे चन्द्रमसं परिलिख्य^२ सितं प्रवेश्यकर्णेन । शशिबिम्बे^३ शुक्लाग्रात्परिलेखासमेन^४ सूत्रेण ॥ ४ ॥ कर्णांगतस्थेनैन्दो^१ ^३ शुक्लं परिलिख्य^४ पश्चिमाभिमुखः^५ । राशिषु मेषतुलादिषु^२ संशोध्य दिवाकरं^६ चन्द्रात् ॥ ५ ॥ पूर्वाभिमुखः कर्कटमकरादिषु भवति शुक्लसंस्थानम् । एवं वा संस्थानं परिलिख्येन्दुं^१ प्रसाध्य दिशः ॥ ६ ॥ बाहुज्यैंदुदलगुणाकर्णाविभक्ता^२ भुजोन्यदिक् चन्द्रे । कर्णोभुजागतश्चन्द्रमध्यगः^३ पूर्वच्छेषम्^१ ॥ ७ ॥ प्राच्यपरे^१ विपरीते^२ फलकेन्यत्सर्वमुक्तवत्कार्यम्^३ ^६ । शृङ्गोन्नतिपरिलेखाश्चत्वारः शीतकिरणस्य^४ ॥ ८ ॥

४. (घ) १. कर्णाग्र for (कर्णाग्रे) २. परिख्य (ग) परिलिख्य for (परिलिख्य)
(ग) ३. बिंबे सूत्रां for (बिम्बे शुक्ला)
(च) २. परिखेष्य for (परिलिख्य) ४. परिलैष for (परिलिख)
(ङ) २. परिलिख्य for (परिलेख्य)
५. (घ) १. कर्णा गतिस्थे (ग) (ङ) for (कर्णांगतस्थे) २. मेख for (मेष)
(ग) ३. नैशे for (नैन्दो) ४. परिलिख्य (ङ) for (परिलिख्य)
५. मुखम् (ङ) for (मुखः) ६. दिकारं for (दिवाकरं)
(च) १. कर्णागतिस्थेनेदो for (कर्णांगतस्थेनैन्दो)
४. शुक्लं परिलिख्य for (शुक्लं परिलिख्य)
(ङ) ३. नैशे for (नैन्दो) ७. शुक्ले for (शुक्ल)
६. (ग) १. परिलिखेन्दुं for (परिलिख्येन्दुं)
(च) २. कक्र्ट for (कर्कट) १. परिलिख्येंदुं for (परिलिख्येन्दु)
(ङ) ३. मुखं for (मुखः) १. परिलिख्येन्दू for (परिलिख्येन्दुं)
७. (घ) १. पूर्ववच्छेषम् (ग) पूर्ववश्लेषम् for (पूर्वच्छेषम्)
(ग) २. भुजात्य दिक्केन्द्रे for (भुजोन्यदिक् चन्द्रे) ३. मध्यतः (ङ) for (मध्यगः)
(ङ) २. भुजान्यदिक् for (भुजोन्यदिक्) १. पूर्ववच्छेपम् for (पूर्वच्छेषम्)
(च) १. पूर्ववच्छेषं for (पूर्वच्छेषम्)
८. (ग) १. प्राच्यररे for (प्राच्यपरे) २. विपरिते for (विपरीते)
३. मुक्तवच्छेषम् for (मुक्तवत्कार्यम्) ४. सीत for (शीत)
(च) ५. फलकेन्य सर्वमुक्त for (फलकेन्यत्सर्वमुक्त)
(ङ) ६. वच्छेषम् for (वत्कार्यम्)

( २३२ ) गृहयोगेंदुच्छाया गृहदयोस्तमयभगृहयुतीनाम् । तत्स्वक्रान्तिज्याद्युत्तराणि भगृहयुतौ न पृथक् ॥ ६ ॥ इति परिलेखाध्यायः शशांक शृंगोन्नतेर्भुजाद्येषु । शशिभृङ्गोन्नत्युत्तरमार्यादशकेन सप्तदशः ॥ १० ॥ इत्ति सप्तदशाध्यायः समाप्तः

६. (ग) १. ग्रहोदयास्त (च) (ङ) for (ग्रहदयोस्त)
२. मुनिनां for (युतीनाम्) ३. तत्क्रान्तिज्याप्पा (घ) for (तत्क्रान्तिज्याद्यु)
४. पृथक् for (पृथक्)
(च) ५. द्या for (ज्या)
(ङ) २. ग्रह मुनीनां for (ग्रह युतीनां)
३. तत्क्रान्तिज्या for (तत्स्वक्रान्तिज्या)
५. प्रश्नोत्तराणि for (द्युत्तराणि)
१०. (घ) १. भुजोज्येषु (ग) भुजाद्येषु for (भुजाद्येषु)
२. 'इति' से 'समाप्त' तक अंकित नहीं है ।
(ग) ३. : लुप्त हैं ५. शृंगोन्युत्तर for (शृङ्गोन्नत्युत्तर)
६. मार्यादसकेन for (मार्यादशकेन)
२. इति ब्रह्मसिद्धांत सप्तदशोध्यायः for (इत्ति सप्तदशाध्यायः समाप्तः)
४. राशि for (शशि)
(च) २. 'इति' से 'समाप्तः' तक लुप्त
(ङ) २. इति श्रीब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते शृङ्गोन्नत्युत्तराध्यायः सप्तदशः
for
(इत्ति सप्तदशाध्यायः समाप्तः)

( २३३ ) अथ कुट्टकाध्यायः अष्टादशः प्रायेण यतः प्रश्नाः कुद्दाकारादृतेन शक्यंते । ज्ञातुं वक्षामि ततः कुद्दाकारं सह प्रश्नैः ॥ १ ॥ कुद्दकर्ण धनाव्यक्त मध्यमाहरण र्वण्यता वितर्कैः । आचार्यस्तंत्रविदां ज्ञातैर्वर्गं प्रकृत्याच्च ॥ २ ॥ अधिकाग्रभागहारा दूनाग्रछेदभाजिता शेषम् । यत्तत्परस्य हृतं लब्धमध्योधः पृथक् स्थाप्यम् ॥ ३ ॥ शेषं तथेष्टगुणितं यथाग्रयोरन्तरेण संयुक्तम् । शुध्यति गुणकः स्थाप्यो लब्धं चांत्यादुपान्त्यगुणाः ॥ ४ ॥

१. (घ) १. २ कुट्टाकाराहते (ग) कुट्टाकाराहते for (कुद्दाकारादृते)
३. वक्ष्यामि (ग) (च) (ङ) for (वक्षामि)
(ग) ४. प्रश्ना for (प्रश्नाः) ५. कुट्टाकारं (ङ) for (कुद्दाकारं)
(च) २. हृतेन for (दृतेन)
(ङ) १. कुट्टाकाराहते for (कुद्दाकारादृते)
२. (घ) १. कुट्टकर्ण for (कुद्दकर्ण)
(ग) १. कुट्टकखर्णाधना for (कुद्दकर्णधना)
२. कर्णाभावितकैः (ङ) for (र्वण्यतावितर्कैः)
३. विदा for (विदां) ४. वर्ग for (वर्गं)
(च) ५. च for (च्च)
(ङ) १. कुट्टकखर्णा for (कुद्दकर्ण) ६. हरणैक for (माहरण)
३. (घ) १. छेषम् (च) (ङ) for (शेषम्)
२. यत्तत्परस्परहृतं (ग) यत्परस्परहृतं (ङ) for (यत्तत्परस्यहृतं)
३. मध्येधः (ग) मधोऽधः (ङ) for (मध्योधः)
(ग) ४. भावहारा for (भागहारा) ५. प्रथक् for (पृथक्)
(च) ३. मध्येधः for (मध्योधः)
(ङ) ६. दूनाग्रच्छेद for (दूनाग्रछेद)
४. (ग) १. गुणः (ङ) for (गुणाः)
(ङ) २. यथाऽग्रयो for (यथाग्रयो)

( २३४ ) स्तो१द्धर्त्यात्युतो२ग्रान्तो हीनाग्रच्छेदभाजितः शेषम् । अधिकाम्रच्छे३दाहृतमधिकाग्रयुतं भवत्यग्रम् ॥ ५ ॥ छेदवधस्य५ द्वियुग१च्छेद२ वधोयुगतं द्वयोरग्रम्३ । बुधकारेणै४वं त्र्यादिग्रहयुगगतानयनम् ॥ ६ ॥ यो जानाति युगादि२ ग्रहयुगपातै३ः पृथक् पृथक् तिथितै५ः । द्वित्रिचतुः प्रभृत्तिनां१ कुट्टाकारं६ स जानाति७ ॥ ७ ॥ ५. (घ) १. स्वोद्धांतयुतो (ग) स्वोर्थत्यियुतो for (स्तोद्धर्त्यात्युतो) (ग) २. ग्रांतो for (ग्रान्तो) ३. हृत for (हृत) (च) १. स्तोद्धति for (स्तोद्धर्त्य) (ङ) १. स्वोध्र्वोऽन्त्ययुतो for (स्तोद्धर्त्यात्युतो) २. ऽग्रान्तो for (ग्रान्तो) ३. च्छेदहत for (च्छेदाहत) ६. (घ) १. द्वियुगं (ग) (च) (छ) for (द्वियुग) ३. रग्रम् for (रग्रम्) २. युगतं (ग) युगमत्तं for (युगतं) ४. कुधकारेणैवं (ग) कुट्टाकारेणैव (ङ) for (बुधकारेणैवं) (ग) ५. छोदवहो for (छेदवधो) (च) २. युगतं (ङ) for (युगतं) ४. कुद्यकारेणैव˙ for (बुधकारेणैव˙) ७. (घ) १. प्रभृतीनां (ङ) (ग) प्रभृतिनां for (प्रभृत्तिनां) (ग) (वि०—यह श्लोक इस प्रति में श्लोक संख्या १५ पर है) २. युगादीग्रह for (युगादिग्रह) ३. युगजातैः for (युगपातैः) ४. पृथक् २ for (पृथक् पृथक्) ५. कथितैः for (तिथितैः) ६. कुट्टकारं for (कुट्टाकारं) ७. जाति for (जानाति) (च) ३. युगः यातैः for (युगपातैः) ४. पृथक्पृथक्कतित्थितैः for (पृथक् पृथक् तिथितैः) १. प्रभूतीनां for (प्रभृत्तिनां) २. युगादि for (युगादि) ३. ग्रहयुगयातः for (ग्रहयुगपातैः) (वि०—श्लोक संख्या १५ है)

( २३५ ) भगणादिशेषमग्रं छे¹दहृ²तं ख चरै⁵ दिनजशेषहृतम्³ । अनयोरग्रं भगणादि दिनजशेषोद्धृतं⁶ द्युगणः⁴ ॥ ८ ॥ अथवा जि²नजभगणादिशेषं येन गुणं मंडलादि शेषोनं³ । शुध्यति विभाजितं स्वेन भागहारेण सद्युगुणः¹ ॥ ६ ॥ मंडल राश्यंशकला विकलाशेषादभीष्टतः¹ कथितान ॥ आनयति दिनगणं यः कु²ठाकारं स जानाति ॥ १० ॥

८. (घ) १. छेदहृतं (ग) (च) (ङ) for (छेदहृतं)
२. खंच (यहां मूल में 'र' नहीं है) for (खचर)
३. हृतम् (च) (ङ) for (हृतम्)
४. क्वगणः (ग) द्युगणः for (द्युगणः)
(ग) ५. च for (चर)
६. भगणादिधृतं for (भगणादिदिनजशेषोद्धृतं)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ७ है) (ङ)
(च) २. खच for (खचर)          ४. द्युगणः (ङ) for (द्युगणः)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ७ है)
६. (घ) १. गणः for (गुणः)
(ग) २. यह श्लोक 'दिनज' से आरम्भ होता है, (ङ)
३. शेषकयोः (ङ) for (शेषोनं)
दूसरी पंक्ति बिल्कुल भिन्न है—
"सदृशच्छेदो धृतयोस्तद्घातमहर्गण द्यमतः" ॥८॥
(च) १. सद्युगणः for (सद्युगुणः)
(ङ) २. 'अथवा' लुप्त, दिनज for (जिनज)
दूसरी पंक्ति निम्नांकित—
सहशच्छेदोद्धृतयोस्तद्घातमहर्गणाद्यमनः for (शुध्यति विभाजितं स्वेन
भागहारेण सद्युगुणः)
(वि—इसकी क्रमसंख्या ८ है)
१०. (घ) १. दभीष्टतः कथितान् for (दभीष्टतः कथितान)
२. कुट्टाकारं for (कुठाकारं)
(च) १. दभीष्टतः for (दभीष्टतः)     २. कुदाकारं for (कुठाकारं)
(ङ)      श्लोक उपलब्ध नहीं।

( २३६ ) यो जानाति^२ युगगतं कथितार्दयिमास^४ शेषकादिष्टात् । अवभाव^१ शेषतो वा तद्योगाद्वासकुदृज्ञः^३ ॥ ११ ॥ एकेष्टदिवसघटिका विनाडिका मंडलादिशेषकयोः । सदृश^१च्छेदो धृतयो^२स्तद्घात्^३ महर्गणायमतः ॥ १२ ॥ हतयो^३परस्परं यच्छेषं^४ गुणकारभागहारकयोः । तेन हतौ^२ निच्छेदौ^५ तावेव परस्परं हतयोः^१ ॥ १३ ॥ लब्धमध्येधः^३ स्थाप्यं यथेष्ट गुणकारसंगुणं शेषम्^४ । शुध्यति तथैक^१हीनं गुणकः स्थाप्यः पलं^२ चांत्यात्^५ ॥ १४ ॥

११. (घ) १. अवमाव (ग) (च) (ङ) for (अवभाव)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या २५ है)
२. यो युगगतं for (यो जानाति युगगतं)
(च) ३. कुदृज्ञः for (कुदृज्ञः)
(ङ) (वि---श्लोक संख्या २५ है)
२. जानाति यो for (यो जानाति) ४. दधिमास for (दयिमास)
१२. (घ) १. सदृश (च) for (सदृश) २. हृतयो (च) for (धृतयो)
३. स्तद्घात for (स्तद्घात्)
(ग) यह श्लोक इस प्रति में उपलब्ध नहीं है ।
(च) ३. तद्घात् for (तद्घात्)
(ङ) श्लोक अनुपलब्ध है ।
१३. (घ) १. हृतयोः (ग) (ङ) for (हतयोः)
२. हृतौ (ग) (च) for (हतौ)
(ग) ३. हृतयोः (च) for (हतयो)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ६ है) (ङ)
(ङ) ३. हृतयोः for (हतयो) ४. यच्छेषं for (यच्छेषं)
५. निश्छेदौ for (निच्छेदौ)
१४. (घ) १. यथैक (च) (ङ) for (तथैक)
२. स्थाप्यपलं (ग) स्थाप्यफलं for (स्थाप्यः पलं)
(ग) ३. लब्धमध्योध for (लब्धमध्येधः) ४. शेषे for (शेषं)
५. वांत्यात् for (चांत्यात्)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या १० है) (ङ)
(च) ५. चाप्तात् or चात्यात् for (चांत्यात्)
(ङ) ३. लब्धमघोऽधः for (लब्धमध्येधः)

( २३७ ) अग्रांत्य<sup></sup>मुपांत्येना<sup></sup> स्वाद्धों<sup></sup> गुणितोंत्यं<sup></sup> संयुतो भगणः<sup></sup> । छेद्भागहारेणैवं<sup></sup> स्थिरकटुकः<sup></sup> शेषम् ॥ १५ ॥ इष्टभगणादिशेषात् स्वकुटकगुणात्<sup></sup> स्वाभागहार<sup></sup> हृतात्<sup></sup> । शेषं द्युगणोहृत<sup></sup> निरपर्वत<sup></sup> गुणभागहारं<sup></sup> युतः ॥ १६ ॥ १५. (घ) १. अग्रांत (ग) (च) (ङ) for (अग्रांत्य) ३. भक्तः (ग) (च) for (भगणः) ४. निश्छेदभागहारे for (छेद्भागहारे) ५. कुट्टकः (ङ) for (कटुकः) ७. गुणितोप्त (त्प) (च) for (गुणितोंत्य) (ग) २. स्वेधों for (स्वाद्धों) ६. मुपांत्येन (ङ) for (मुपांत्येना) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ११ है) ४. निश्छेद for (छेद) ५. कुदकः for (कटुकः) (ङ) २. स्वोर्ध्वो for (स्वाद्धों) ३. भक्तः for (भगणः) ४. निः शेष for (छेद) १६. (घ) १. कुट्टक (ङ) for (कुटक) २. गुणात्स्वभाग (ग) गुणान् स्वभाग for (गुणात्स्वाभाग) ३. हृताद् (ग) हृतान् for (हृतात्) ४. गत (ग) भगणोगत for (द्युगणोहृत) ५. निरपवर्त्त (ग) (च) (ङ) for (निरपर्वत) ६. भागहारयुतः (ग) गुणभागहारयुता for (गुणभागहारंयुतः) (ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या १२ है) (च) ७. दष्ट for (इष्ट) १. कुदक for (कुटक) २. गुणात्स्वभाग for (गुणात्स्वाभाग) ३. हृताद् for (हृतात्) ४. गत for (हृत) ६. गुणभागहारयुतः (ङ) for (गुणभागहारंयुतः) (ङ) २. गुणात्स्वभाग for (गुणात्स्वाभाग) ४. गत for (हृत)

, and 'य' with 'ू'. Now look at the main text: Does it look like that? No, the main text has "न्यूनास्तप्त"! Wait, but what if the editor read it as "न्यूनास्तप्त" or "त्र्यूनास्तप्त"? Let's look at the standard verse from Bhaskara's Lilavati / Bijaganita / Brahmasphutasiddhanta / Mahabhaskariya? Wait! "बुधदिने सवितुः" - this is an astronomical problem! Wait, who wrote this? "एवं समेषु विषमेष्व..." "ऋणधनयोर्व्यस्तत्वं गुण्यप्रक्षेपयोः कार्यम्" "गुणकच्छेदः छेदो गुणको धनमृणधनं कार्यम्" "वर्गे पदं पदकृति..." "अंशक शेषा..." This is Brahmagupta's Brahmasphutasiddhanta! Chapter 18 (Kuttakadhyaya)! YES! Brahmasphutasiddhanta, Chapter 18! Let's check the verse of Brahmasphutasiddhanta: Brahmasphutasiddhanta 18.17: एवं समेषु विषमेष्वृणं धनं धनमृणं यदुक्तं तत् । ऋणधनयोर्व्यस्तत्वं गुण्यप्रक्षेपयोः कार्यम् ॥ १७ ॥ 18.18: गुणकच्छेदः छेदो

( २३६ ) त्र्यू^५नाधिमासः शेषात्^१ मूलद्ध्व्य^२धिकं विभाजितं षड्भिः । द्यूनं^६ वर्जित^३ मधिकं नवभि र्नवति^४ कदा भवति ॥ २० ॥ अवमावशेष वर्गो^४न्येको^५र्विंशति विभाजितोष्य^१धिकः । अष्टगुणो^६ दशभक्ते^२ द्वियुते^३ ष्टादशकदा भवति ॥ २१ ॥ इष्टभगणादिशेषा^४ द्युगणस्तत्कुट्टकेन संयुक्तः तच्छेद^५दिनेस्तावद्दिनवारो यावदिष्टस्य^२ ३ ॥ २२ ॥

२०. (घ) १. शेषान्मूलं (ग) for (शेषात् मूल) २. द्वयधिकं (ग) (च) for (व्यधिकं)
३. वर्गित (ग) (च) for (वर्जित) ४. न्नवतिः (ग) नवभिः for (नवतिः)
(ग) (वि०-इसकी श्लोक संख्या २८ है)
५. न्यूनाधिमास for (त्र्यूनाधिमास) ६. द्वचूनं २ for (छूनं)
(च) १. शषान्मूलं for (शेषात्मूल) २. द्वयधिकं for (व्यधिकं)
४. न्नवतिः for (नवति)
(ङ) (वि०-इसकी श्लोक संख्या २८ हैं)
५. च्यूनाधिमास for (त्र्यूनाधिमासः)
१. शेषान्मूलं for (शेषात्मूल) २. द्वयधिकं for (ध्यधिकं)
६. द्वचूनं for (छूनं) ३. वर्गित for (वर्जित)
४. नवतिः for (नवति)
२१. (घ) १. द्वयधिकः (ग) (च) (ङ) for (ध्यधिकः)
१. देशभक्तो (ग) (च) for (दशभक्तो)
३. द्वियुतोऽष्टादश (ग) (च) for (द्वियुते)
(ग) (वि०-इसकी श्लोक संख्या २६ है)
४. शेषे for (शेष) ५. व्येको for (न्येको)
६. गुणो for (गुणो)
(ङ) ५. व्येको for (न्येको)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या २६ है)
२२. (ग) १. कुटकेन for (कुट्टकेन) २. दिष्टः for (दिष्ट)
३. स्यात् for (स्य)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या १६ के स्थान में ६ है)
(च) १. कुदकेन for (कुट्टकेन)
(ङ) (वि०-श्लोक संख्या १६ है)
४. शेषाद् for (शेषा) ५. तच्छेद for (तच्छेद)
२. ३. यावदिष्टः स्यात् for (यावदिष्टस्य)

( २४० ) भगणाद्यमिष्टशेषं कदेंदुदिवसे खेर्गुरु दिने वा । ज्ञदिने वायः कथयंति कुदाकारं स जानाति ॥ २३ ॥ ज्ञदिने यदंशशेषं विकलाशेषं कदा न दिंदु दिने । भानोरथवा शशिनो यः कथयति कुटकज्ञः सः ॥ २४ ॥ इष्टेषुमान दिवसे द्विमासान्मून रात्रिशेषे वा । भूयस्ते यः कथयति पृथग् पृथग् वा कुदज्ञः ॥ २५ ॥

२३. (घ) १. कथति (च) for (कथयंति)
२. कुट्टाकारं (ग) कुट्टकारं for (कुदाकारं)
(ग) ३. ज्ञदिनैराशयः for (ज्ञदिनेवायः)
(वि०—इसकी श्लोकसंख्या १६ के स्थान में केवल ६ लिखी है)
(च) १. कुट्टाकारं for (कुदाकारं)
(ङ) (वि०—श्लोकसंख्या १६ है)
३. राशीन् for (वायः) २. कुट्टाकारं for (कुदाकारं)
२४. (घ) १. तर्दिदु (ग) (च) (ङ) for (नदिंदु)
२. कुट्टकज्ञः (ग) for (कुटकज्ञः)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या १७ के स्थान में ७ है)
(च) २. कुदकज्ञः for (कुटकज्ञः)
(ङ) (वि०—क्रमसंख्या १७ है)
१. कुट्टकज्ञः for (कुटकज्ञः)
२५. (घ) १. मासन्मून for (मासान्मून)
२. पृथगपृथग्वा (ग) पृथक् पृथग् वा स for (पृथग् पृथग वा)
३. कुद्दज्ञः (ग) for (कुदज्ञः)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या २६ है)
१. न्यून for (न्मून)
४. दिवसेष्वधिमास for (दिवसे द्विमास)
(च) १. मासन्मून for (मासान्मून) २. पृथगपृथग्वा for (पृथग् पृथगवा)
(ङ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या २६ है)
४. दिवसेष्वधि for (दिवसे द्वि) १. मासन्मून for (मासान्मून)
५. रात्र शेषे for (रात्रिशेषे) २. पृथक् for (पृथग्)
२. पृथग् वा for (पृथग वा) ३. स कुट्टज्ञः for (कुदज्ञः)

( २४१ ) निच्छेदैर्⁴ भागहाराद्राश्यादि कला¹नाहताद्भु³ङ्क्तात् । भगणकलाभिर्लब्धं² मंडलशेषं दिनगणोऽस्मात्⁵ ॥ २६ ॥ एवं राश्यंश³ कला⁴शेषाण्यहर्गणः¹ प्राग्वत् । नष्टस्थानेष्विष्टानं⁵ कान्⁶ कृत्वोक्त⁷ वच्छेषशम्² ॥ २७ ॥ यो राश्यादीन् द्रष्ट्वा⁵ मध्यस्येष्टस्य कथयति द्युगुणम्¹ । ध्व्याधि²ग्रहयोगाद् ग्रहांतराद्वा³ स कुट्टज्ञः⁴ ॥ २८ ॥

२६. (घ) १. कलादिनाहताङ्गुक्तात् (ग) कलादिना हृताद्भुक्तात् for (कलानाहता-
ङ्गुक्तात्)
(ग) (वि० - इसकी श्लोक संख्या २१ है ।) २. (लब्धं भमंडल for (लब्धं मंडल)
(च) १. कलादिनाहताङ्गुक्तात् for (कलानाहताङ्गुक्तात्)
(ङ) (वि० - इसकी क्रम संख्या २१ है
४. निश्छेद for (निच्छेद) १. कलादिना for (कलाना)
३. हताद्भुक्तात् for (हताङ्गुक्तात्)
५. दिनगणोऽस्मात् for (दिनगणोस्मात्)
२७. (घ) १. हर्गणः for (हर्गणः) २. छेषम् for (छेषपम्)
(ग) (वि-इसकी श्लोक संख्या २२ है ।) ३. कलाविकला (ङ) for (कला)
४. शेषादहर्गणः (ङ) for (शेषाण्यहर्गणः)
(च) २. वच्छेषं for (वच्छेषशम्) १. हर्जणः for (हर्गणः)
(ङ) (वि० इसकी क्रम संख्या २२ है)
५. नष्टस्येष्टविष्टान् for (नष्टस्थानेष्विष्टानं)
६. तान् for (कान्) ७. कृत्वा भक्त्वोक्त for (कृत्वोक्त)
२. वच्छेषम् for (वच्छेषशम्)
२८. (घ) १. द्युगणम् (ग) (च) (ङ) for (द्युगुणम्)
२. द्वयादि for (ध्व्याधि) (ग) द्वयादिग्रहसंयोगात् for (ध्व्याधिग्रहयोगाद्)
३. गुहांततराद् (ग) ग्रहांतराद्वा for (ग्रहांतराद्वा)
४. कुट्टकज्ञः (ग) for (कुट्टज्ञः)
(ग) (वि-इसकी श्लोक संख्या २० है परंतु लिखी हुई १० है ।)
५. दृष्ट्वा (च) (ङ) for (द्रष्ट्वा)
(च) २. द्वयादिग्रह for (ध्व्याधिग्रह) ४. कुदज्ञः for (कुट्टज्ञः)
(ङ) (वि०-इसकी क्रम संख्या २० है)
२. द्वयादिग्रह संयोगात् for (ध्व्याधिग्रहयोगाद्)
४. कुदृज्ञः for (कुट्टज्ञः)

( २४२ ) येन गुणे¹ शेषयुते² छेदः³ शुध्यति हृत⁴ स्वगुणकेन । तद्भुक्तं⁵ शेषं फलमेव शेषाद् ग्रहद्युगुणैः⁶ ॥ २६ ॥ राश्यंशकला विकला शेषात्कथितादभीष्टतोनष्टात् । यः साध्यद्युपरिमानं¹ समध्यमा⁴ कुट्टकज्ञः² स ॥ ३० ॥ इति श्री कुट्टक प्रकरणम्⁵

२६. (घ) १. गुण (ग) गुणः for (गुणे) २. युतच्छेद (ग) हृताच्छेदः for (युते छेदः)
३. गणैः (ग) गणौ for (गुणैः)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या २४ है) ४. हृदः for (हृत)
५. न तदुक्तं for (तद्भुक्तं) ६. फलमेवं for (फलमेव)
(च) १. गुणों शेषयुतां for (गुणे शेषयुते)
४. हृतः for (हृत) ३. द्युगणैः for (द्युगुणैः)
(ङ) १. (वि०—इसकी क्रम संख्या २४ है)
१. गुणः for (गुणे) २. युतश्छेदः for (युते छेदः)
४. हृतः for (हृत) ७. शेषाद्ग्रह for (शेषाद्ग्रह)
३. द्युगणौ for द्युगुणैः)
३०. (घ) १. त्युपरिमान् (ग) त्युपरिधमान् for (द्युपरिमान्)
५. वि०—मूल में 'इति श्री' पद नहीं है ।
२. कुट्टकज्ञः (ग) for (कुट्टकज्ञः स)
(ग) (वि—इसकी श्लोक संख्या २३ है)
३. विकलांशशेषात् for (विकलाशेषात्)
४. समध्यमान् for (समध्यमा)
(च) १. साध्यत्युपरिमान् for (साध्यद्युपरिमान्)
४. समध्यमात् for (समध्यमा) ५. 'इति श्री' लुप्त
६. कुदक for (कुट्टक)
(ङ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या २३ है)
७. नष्टान् for (नष्टात्) १. साध्यत्युपरितनान् for (साध्यद्युपरिमान्)
४. समध्यमान् for (समध्यमा)
२. कुट्टकज्ञः for (कुट्टकज्ञः) ५. 'इति - से—णाम्' तक सब लुप्त ।

( २४३ ) <sup></sup> <sup></sup> <sup></sup> अथ धनर्ण श्रुत्यानां संकलना <sup></sup>धनयोर्धनमृणयोर्<sup></sup>धनर्णयोरन्तरं <sup></sup>समैक्य<sup></sup>खं । <sup></sup>वर्गाँक्य<sup>१०</sup>मृणं धनशून्ययोः <sup></sup>दूनं शून्ययोः शून्यम् ॥ ३१ ॥ <sup></sup>ऋणमधिकाद् विशोध्यं धनं धनाहृणमृणादधिकमूनात् । व्यस्तं तदन्तरं <sup></sup>वा <sup></sup>ऋणं <sup></sup>धनं न मृण भवति ॥ ३२ ॥ ३१. (घ) १. शून्यानां for (श्रुत्यानां) २. समैक्यं (ग) for (समैक्य) ३. खर्णैक्य (ग) स्वर्णैक्यमृण for (वर्गाँक्यमृणं) ४. द्धूनं (ग) for (दूनं) (ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ३० है) ५. 'अथ' से 'संकलना' तक लुप्त है। ६. स्वं for (खं) (च) ५. अथधनर्ण्य for (अथधनर्ण) १. शून्यानां संकलनाः for (श्रुत्यानां सकलना) ७. धनर्ण्ययो for (धनर्णयो) २. समैक्यं for (समैक्य) ३. खवर्णैक्य for (वर्गाँक्य) ४. द्धूनं for (दूनं) (ङ) १. शून्यानां for (श्रुत्यानां) ४. “दूनं” लुप्त ६. सङ्कलनम् for (संकलना) ८. +मृण+ २. समैक्यं for (समैक्य) ३. ऋणमैक्यं च for (वर्गाँक्य) १०. धनमृण for (मृणं) ३२. (घ) १. ऊन (ग) (च) (ङ) for (ऋण) २. खाहृणं (ग) (च) for (वा ऋणं) ३. 'ण' को लिखना भूल गया (ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ३१ है) ४. धनं धनमृणं भवति for (धनं न मृणभवति) (च) ३. नमृभति for (न मृणभवति) (ङ) २. स्याहृणं for (वा ऋणं) ३. धनमृणं for (नमृण)

( २४४ ) शून्यविहीनमृणमृणं धनं धनं भवति शून्यमाकाशम् । शोध्ये यदा धनमृणादणं धद्धात्तदश्रेय्यम् ॥ ३३ ॥ प्रत्युत्पन्नः ऋणमृणधनयोर्घाति धनमृणयोर्धनं वधोधनं भवति । शून्यण्योः स्वधनयोः खशून्ययोर्वा वध शून्यम् ॥ ३४ ॥ ३३. (घ) १. दृणं (ग) (च) (ङ) for (दणं) २. धनाद्धा (ग) (ङ) for (धद्धा) ३. क्षेप्यम् (ग) तदा क्षेप्यम् for (तदश्रेय्यम्) (वि०— इसकी क्रमसंख्या ३४ लिखी है) (ग) ४. विहिन for विहीन ५. शोध्यं (च) (ङ) for (शोध्ये) (वि०— इसकी संख्या ३२ है) (च) २. ध्ट्वा for (धद्धा) ३. तदक्षेप्यं for (तदश्रेय्यम्) (वि०— यहां क्रमसंख्या ३४ अंकित है) [L