भारतकोश
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ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary

आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished737 पृष्ठ

( २६४ ) जिनरस गोब्धिरदृग्गुणा^१ ३२४६६२४^४ छशि^५ वसुकृत रसखभुत^२रामहूतान्^३ । इष्टावमशेषाद्यच्छेषं^६ रविभगण शेषं तत् ॥ ६३ ॥ गोर्गेंदुखेश^३ ११०१७६ गुणिताद्भूक्तानन्खपक्षयम^१ रसेषु^५ गुणैः^७ ३५६२२२०^२ । ^६शेषमवमावशेषात्तित्थयो वमशेषकाद्विकलम् ॥ ६४ ॥ भागकलाविकलैक्यं दृष्ट्वा विकलांतरं न^१ के शेषैः^६ । ऐक्यं द्विधांतराधिकहीनं^३ द्विविभाजितं^४ शेषम्^२ ॥ ६५^५ ॥

६३. (घ)    (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६४ है)
१. रदगुणा (ग) रसगुणा for (रद्गुणा)
२. भूत (ग) (ङ) for (भुत)
३. हूतान् । ३५६४८१ (ग) राहूतात् for (रामहूतान्)
(ग) ४. (वि०—संख्या के अंक लुप्त हैं) ५. शशि (ङ) for (छशि)
५. शेषाद्या for (शेषाद्य)
(च) १. रदगुणा for (रद्गुणा)    २. भूत for (भुत)
३. रामहतान् for (रामहूतान्) ७. वि०—यहां क्रमसंख्या ६४ अंकित है)
(ङ) १. गोऽब्धिरद ३२४६६२४ गुणात् for (गोब्धिरदृग्गुणा ३२४६६२४)
३. हूतात् for (हूतान्)    ६. शेषाद्यशेषं for (शेषाद्यच्छेषं)
६४. (घ)    (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६५ है)
१. गुणिताद्भक्ता (ग) (च) (ङ) for (गुणिताद्भूक्ता)
२. '३५६२२२०' दूसरी पंक्ति का आरंभ (य) संख्या लुप्त
(ग) ३. गोगेंदुशेख for (गोर्गेंदुखेश)    ४. संख्या के अंक लुप्त हैं
५. नाख for (न्नख)    ६. शेषावमाव for (शेषमवमाव)
(च) ७. गणैः for (गुणैः)
(वि०—यहां क्रमसंख्या ६५ अंकित है)
(ङ) ३. गोऽगेंदु for (गोगेंदु)
६५. (घ)    (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६६ है)
१. वके शेषे (ग) च के शेषे for (नके शेषैः)
२. शेषे (ग) (ङ) for (शेषम्)
(ग) ३. द्विघातरा for (द्विधांतरा)    ४. द्विभाजितं for (द्विविभाजितं)
(च) १. वकेशेषे for (नके शेषैः)    २. शेषे for (शेषम्)
(वि०--क्रमसंख्या ६६ अंकित है)
(ङ) १. च for (न)    ६. शेषे for (शेषैः)
३. द्विधान्तरा for (द्विधांतरा)    ४. च द्विभाजितं for (द्विभाजितं)

( २६५ ) तद्वर्गांतरमाद्यं तदंतरं चांतरीद्धृतयुतोनम् । वर्गांतरं विभक्तं ताभ्यां शेषोन्यतो द्युगणः ॥ ६६ ॥ कृतिसंयोगाद्विगुण छेद्ययुतिकृति विशोध्य मूलेन । शेष युतियुत हीनाद्विहता शेषे पृथक् युक्त्या ॥ ६७ ॥ शेषवधाद्विऋतिति गुणा छेषांतरवर्गसंयुतान्मूले । शेषांतरीनैयुक्तं दलितं शेषे पृथगभीष्टे ॥ ६८ ॥

६६. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६७ है)
१. चांतरोध्दृत (ग) (ङ) for (चांतरीद्धृत)
२. द्वा द्वाभ्यां for (ताभ्यां) ३. शेषे ततो (ग) (ङ) for (शेषोन्यतो)
(च) १ चांतरोद्धृत for (चांतरीद्धृत) ४. (वि०—क्रमसंख्या ६७ है)
३. शेषो ततो द्युगणः for (शेषोन्यतो द्युगणः)
(ङ) ५. माद्यं for (माद्यं) २. द्वाभ्यां for (ताभ्यां)
६७. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६८ हैं)
१. द्विगुणा (ग) (च) for (द्विगुण)
२. छष for (छेष) (ग) छेष कृतियुति for (छेषयुतिकृति)
३. विहृता (ग) विज्ञता for (द्विहता)
(ग) ४. कृत संयोगा for (कृतिसंयोगा) ५. पृथग्युक्त्या for (पृथक् युक्त्या)
(च) ६. द्विहता for (द्विहता)
६. (वि०—क्रमसंख्या ६८ अंकित)
(ङ) कृतिसंयोगाद् द्विगुणाद्युतिवर्गं प्रोह्य शेषमूलं यत् ।
तेन युतोनो योगो दलितः शेषे पृथगभीष्टे ॥ ६८ ॥
for
(कृतिसंयोगाद्विगुण छेद्ययुतिकृति विशोध्य मूलेन
शेष्युतियुतहीना द्विहता शेषे पृथक् युक्त्या ॥ ६७ ॥)
६८. (घ) (वि—इसकी क्रमसंख्या ६६ है)
१. विकृति (ग) for (द्विऋतिति) मूलम् (ग) (ङ) for (मूले)
३. शेषांतरोन (ग) (ङ) for (शेषांतरीन युक्तं)
४. पृथगभीष्टे (ग) (ङ) for (पृथगभीष्टे)
(ङ) १. कृति for(ऋति) २. मूलं for (मूले)
४. पृथग्भीष्टे for (पृथगभीष्टे)
५. (वि०—क्रमसंख्या ६६ अंकित है)
(ङ) १. वधाद् द्विकृतिगुणात् for (वधाद्विऋतिगुणा) ६. शेषांतर for (छेषान्तर)

( २६६ ) ^२सुखमात्रममी ^६प्रश्ना ^१प्रश्नान्यात्सहस्रशः कुर्यात् । ^३अन्यैर्दत्तात्प्रश्नानुक्तै^४र्वा साधयेत्करणैः^४ ॥ ^५९९ ॥ जन संसदि दैवविदां तेजो नाशयति भानुरिव^२ भानाम् । ^३कुट्टाकार^४प्रश्नैः पठितैरपि किं पुर्नर्जातैः^१ ॥ १०० ॥ प्रतिसूत्रममी^४ प्रश्नाः पठिताः सोद्देशकेषु सूत्रेषु । ^१आयाणां ^२त्र्यधिकशते ^२कुट्टकोष्टादशोऽध्यायः ॥^५१०१॥ ^३इति श्री ब्रह्मगुप्ते अष्टादशोऽध्यायः । ९९ (घ) (वि०—इसकी क्रम संख्या १०० है) १. प्रश्नानन्या (ग) प्रश्तानन्यान् (ङ) for (प्रश्नान्यात्) (ग) देव्यात्र for (सुखमात्र) ३. दंत्तान् for (दंत्तात्) ४. त्करणैः for (करणैः) (च) १. प्रश्नानन्यान्सहस्रशः (प्रश्नान्यात्सहस्रशः) (वि०—इसकी क्रम संख्या १०० अंकित है) (ङ) २. हृदि घात्रममी for (सुखमात्रममी) ६. प्रश्नाः for (प्रश्ना) ३. अन्यैर्दत्तान् for (अन्यैर्दत्तात्) ७. प्रश्नानुक्त्यैवं for (प्रश्नानुक्तैर्वा) ४. करणैः for (करणैः) (वि०—३. 'हृतान्मात्रममी' इति सुधाकरः) १००. (घ) (वि०—इसकी क्रम संख्या १०१ है) १. पुनर्जातैः (ग) (च) for (पुर्नर्जातैः) २. भारिव for (भानुरिव) ३. कुदाकारं for (कुट्टाकार) ४. प्रस्नैः for (प्रश्नैः) (च) ३. कुदाकार प्रश्नैः for (कुट्टाकार प्रश्नैः) ५. (वि०—यहाँ क्रम संख्या १०१ अंकित है) (ङ) १. पुनः शतशः for (पुर्नर्जातैः) १०१. (घ) (वि०—इसकी क्रम संख्या १०२ है) १. आर्याणाम् (ग) आर्या for (आयाणां) २. शतेन कुष्ट for (शते कुट्ट) ३. 'इति' से 'अध्यायः' तक अंकित नहीं है । (ग) २. समी प्रश्नाः for (ममी प्रश्नाः) २. शतेन for (शते) ३. इति श्रीब्रह्मसिद्धांते कुट्टकाध्यायाष्टदशमः ॥ १८ ॥ for (इति श्रीब्रह्मगुप्ते- अष्टादशोऽध्यायः) (च) १. आर्याणां for (आयाणां) ३. "इति" से "अध्यायः" लुप्त (केवल "श्री" अंकित है) ५. (वि०—क्रमसंख्या १०२ अंकित है) (ङ) १. आर्या for (आयाणां) २. त्र्यधिकशतेन for (त्र्यधिकशते) ६. कुह्रश्चाष्टादशो for (कुट्टकोष्टादशो)

( २६७ ) अथ शंकुच्छायादिज्ञानाध्यायः एकोनविंशः दृष्ट्‌वा दिनार्द्धघटिका योर्कजो$^१$ क्षांशकान्वीजा$^३$नाति$^२$ । उदयांतरघटिकाभिर्ज्ञाता$^४$ ज्ञेयं स तन्त्रज्ञः ॥ १ ॥ अस्तांतर्घटिकाभिर्यो$^१$ ज्ञाताज्ज्ञेयमानयति$^६$ तस्मात् । मध्यगति$^२$ ग्रहभगणाननयति$^३$ तया$^४$ स तन्त्रज्ञः ॥ २ ॥ आनयति यस्तमो रविशशांक मानानि दिपं$^१$ कौच्च्यतलात् । शंकुतलांतरभूमिं$^२$ ज्ञाने छायां स तन्त्रज्ञः ॥ ३ ॥ छायाद्वितीयाग्रांतर$^१$ विज्ञाने$^४$ वेत्ति$^२$ दीपोच्च्ये । शंकु छायाज्ञो$^५$ वा$^३$ यच्छायाैच्च्ये स तंत्रज्ञः ॥ ४ ॥

१. (घ) १. ऽर्कज्ञो (ग) (ङ) for (योर्कजो) २. विजानाति (ग) for (वीजानाति)
(च) १. योऽर्क्कजो for (योर्कजो) २. विजानाति for (वीजानाति)
(ङ) ३. ऽक्षांशकान् for (क्षांशकान्) २. विजानाति for (वीजानाति)
४. ज्ञाताज्ज्ञेयं for (ज्ञाता ज्ञेयं)
२. (घ) १. अस्तांतर (ग) for (अस्तांतर्) २. मध्यगतिं (च) (ङ) for (मध्यगति)
(ग) ३. युगम (ङ) for (ग्रहभ) ४. नानयति (च) (ङ) for (ननयति)
५. ततः (ङ) for (तया) (वि०—इसकी क्रम संख्या १ लिखी है)
(च) १. अस्तांतर घटिकाभिर्यो (ङ) for (अस्तांतर्घटिकाभिर्यो)
(ङ) ६. ज्ञाताज्ज्ञेय for (ज्ञाताज्ज्ञेय)
३. (घ) १. दीपाक्चे क्वच्यतलात् (ग) दीपक शिखोन्याः for (दिपकौच्च्यतलात्)
(ग) २. भूमि (ङ) for (भूमिं) (वि०—इसकी क्रमसंख्या २ लिखी है)
(ङ) १. दीपकशिखोच्च्यात् for (दिपकौच्च्यतलात्)
४. (घ) १. छायाद्वितया (ग) for (छायाद्वितीया)
२. भूमिदीपोच्च्ये (ग) दीप्त्यौच्च्ये for (दीपोच्च्ये)
(ग) ३. परभूमेच्छायां for (यच्छायाैच्च्ये) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ५ है)
(च) १. द्वितया for (द्वितीया)
(ङ) १. छायाद्वितीयभाग्रान्तर for (छायाद्वितीयाग्रांतर)
४. विज्ञानेन for (विज्ञाने) २. दीपोच्च्यम् for (दीपोच्च्ये)
५. शङ्कुच्छायाज्ञो for (शंकुच्छायाज्ञो) ३. भूमेश्च्छायां for (यच्छायाैच्च्ये)

( २६८ ) दृष्टि⁴ गृहौच्च्यज्ञो यः स्तदन्तरज्ञो⁶ नराक्रते¹ तुजले² । गृहभित्यग्रे³ दर्शयति दर्पणे⁵ वा स तंत्रज्ञः ॥ ५ ॥ हग्ग्रहतलांतरजले¹ यो⁴ दृष्ट्वाग्रं⁵ गृहस्य² भूमिज्ञः । वेत्ति गृहौच्च्यं³ दृष्ट्वा तैलस्थं वा⁶ स तंत्रज्ञः ॥ ६ ॥ वीक्ष्य⁶ गृहाग्रं¹ सलिले प्रसार्य सलिलं पुनश्चभूज्ञाने⁴ । आनयति जलाद्भू²मि गृहस्य³ चौच्च्यं⁵ स तंत्रज्ञः ॥ ७ ॥ ज्ञातै⁴ छाया पूरुषे⁵ विज्ञातै⁶ तोय कुद्ययो¹ विवरे । कुद्देर्कं² तेजसो यो वेत्थारूढेः³ स तंत्रज्ञः ॥८॥

५. (घ) १. नरात्कृते (ग) for (नराक्रते) २. तु (ग) (ङ) for (तु)
३. गृहभित्यगं (ग) गृहभित्यग्र (ङ) for (ग्रहभित्यग्रे )
(ग) ४. इष्टग्रहौच्च्यज्ञो for (दृष्टिगृहौच्च्यज्ञो) ५. दर्पणो (ङ) for (दर्पणे)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या ४ है)
(च) १. नराकृते for (नराक्रते)
(ङ) ४. इष्टगृहौच्च्यज्ञो for (दृष्टिगृहौच्च्यज्ञो) ६. यस्तदन्तरज्ञो for (यः स्तदंतरज्ञो)
१. निरीक्ष्यते for (नराक्रते)
६. (घ) १. नृगृह हग्ग्रहनलांतर (ङ) for (हग्ग्रह तलांतर)
२. गृहस्य (ग) (च) (ङ) for (ग्रहस्य)
३. गृहोच्च्यं (ग) गृहौच्च्यं (च) (ङ) for (गृहौच्च्यं)
(ग) ४. जलयो for (जले यो) ५. दृष्ट्वाग्रं (ङ) for (दृष्ट्वाग्रं )
६. व for (वा)
(च) १. दृग्ग्रहतलांतर for (हग्ग्रहतलांतर)
(ङ) १. दृष्ट्वा गृहतलान्तर for (हग्ग्रहतलांतर) ४. जालभो for (जले यो)
७. (घ) १. गृहाग्रं (ग) (च) (ङ) for (ग्रहाग्रं) २. भूमिं (ग) (च) (ङ) for (भूमि)
३. गृहस्य (ग) (च) (ङ) for (ग्रहस्य)
(ग) ४. पुनः स्वभूज्ञाने (ङ) for (पुनश्च भू ज्ञाने) ५. वोच्च्यं for (चौच्च्यं)
(ङ) ६. वीक्ष्य for (वीक्ष)
८. (घ) १. कुडद्ययोर्विवरे (ङ) for (कुद्ययोर्विवरे)
२. कुडद्येऽर्कं (ग) कुधेर्का for (कुद्देर्कं)
३. वेत्त्यारूढिं (ग) वेत्त्यारूढेः for (वेत्थारूढः) (ग) ४. ज्ञाते for (ज्ञातै)
५. पुरुषे (ङ) for (पूरुषे) ६. विज्ञाते for (विज्ञातै)
(च) १. कुडद्ययो for (कुद्ययो) २. कुद्देऽर्कं for (कुद्देर्कं)
(ङ) १. ज्ञातैश्छाया for (ज्ञातै छाया)
२. कुडद्ये ऽर्क for (कुद्देर्क) ३. वेत्यारूढ़ि for (वेत्थारूढः)

( २६६ ) इष्ट दिवसाद्धं घटिका घटिका च ^१द^२शकांतंर प्राणाः । तद्दिवसचरप्राणास्तैरक्षं साधयेत्प्राग्वत्^३ ॥ ६ ॥ ज्ञातः सार्द्धा उदयैरस्तांतरनाडिकाभिरधिको नः । ज्ञातात्पूर्वापरयोर्ज्ञेयो ^२भार्द्धोनके ^३ज्ञयः ॥ १० ॥ ^२ज्ञात^३ज्ञेयग्रहयोरुदयंतरनाडिकाभिरधिकोनः^४ । उदयैर्ज्ञातो^५ ज्ञाताज्ञेये^६ प्रागधरयोर्ज्ञेयः^७ ॥ ११ ॥ ज्ञातं कृत्वा मध्यं भूयोन्यदिने तदंतरं भुक्तिः । त्रैराशिकेन मुत्तचा^१ कल्पग्रहमंडलानयनम् ॥ १२ ॥ स्थित्यर्द्धाद्विपरीतं तमः प्रमाणं स्फुटं ग्रहणे^१ । मानोदयाद्र्वौद्धोर्घटिकावयवेन भोदयतः ॥ १३ ॥

६. (घ) १. पंचदशकांतंर for (चदशकांतंर)
(ग) २. दशांतर for (दशकांतंर)
३. प्रास्नात् for (प्राग्वत्)
(ङ) शी० + अथोत्तराणि +
१. २. पंचदशांतंर for (चदशकांतंर)
१०. (च) (वि०— यह श्लोक यहां ११ वीं क्रमसंख्या पर अंकित है)
१. ज्ञेये for (ज्ञेयो) २. भार्द्धोनको for (भार्द्धोनके)
३. ज्ञेयः (ङ) for (ज्ञयः)
(ङ) (वि०— यहां इसकी क्रमसंख्या ११ है)
११. (घ) १. परयो for (धरयो) (ग) प्रागंपरो for (प्रागधरयो)
(ग) २. स्थान रिक्त है, ३. 'ज्ञेय' अक्षर लुप्त है ४. नम् for (नः)
५. ज्ञातो for (ज्ञांतो) ६. ज्ञाताज्ञेय for (ज्ञाताज्ञेये)
७. ज्ञेयः for (ज्ञैयः)
(वि०— इसकी क्रमसंख्या १० है)
(च) १. प्रागपरयो for (प्रागधरयो)
८. (वि०— इसकी क्रमसंख्या १० अंकित है)
(ङ) ६. ज्ञाताज्ज्ञेयः for (ज्ञाताज्ञेये)
१२. (घ) १. भुत्तचा (ग) (च) (ङ) for (मुत्तचा)
१३. (घ) १. शशिग्रहणे for (स्फुटं ग्रहणे)

तातदन्तर" - "हता तदन्तर". If the variant connects them as "हन्तर"? Wait, look at the letter: it's definitely 'ह' (हन्तर)! Wait, look at footnote: "५. हन्तर for (तदन्तर)". Yes, it is हन्तर!

Line-by-line mapping: ( २७० ) दीपफलशंकुतलयोरंतरमिष्टप्रमाणशंकुगुणम् । (Wait, दीपफल or दीपफल? No, दीप"तल"! दीप-तल-शंकु-तलयोः. Yes, दीपफल? No, दीप-त-ल! It's दीप-तल: दी, प, त, ल). दीपशिखौ⁴च्याच्छं¹कुं विशोध्य शेषो²द्धृतं छाया³ ॥ १४ ॥ शंकुवंतरेण गुणिता छाया छायांतरेण भक्ता भूः । स³ छाया शंकुगुणा दीपोच्च्यं¹ छायाया भक्ता² ॥ १५ ॥ ज्ञात्वा शंकुच्छाया³ मनुपातात्²साधयेत्समुच्छ्रायान्⁴ । गृहचैत्यतरु नगानामौच्च्यं⁵ विज्ञायव¹च्छायाम् ॥ १६ ॥ दृष्टि⁴ गृहौच्च्यैवच¹ हतातदन्तर⁵धरादगौच्च्य² गुणि

(ग) (च) (ङ) for (ग्रहाग्रं)? No, the first word is the variant from (ग) (च) (ङ)! Wait: २. गृहाग्रं (ग) (च) (ङ) for (ग्रहाग्रं)? Wait, look at line 2 of the text: Does it say गृहाग्रंorग्रहाग्रं? Look at the foot of 'ग' in line 2: it has ! So it is गृहाग्रं! Wait, then what is in parentheses? for (ग्रहाग्रं)! Why would the footnote say that? Wait, in some editions: variant_reading (manuscripts) for (text_reading)ORmanuscript_reading for (base_text)? Look at footnote 20: ८. च्छिन्नं for (छिन्नं)-> in main text, is itच्छिन्नंorछिन्नं? Main text: छाया पुरुषच्छिन्नं! Look at it: it has च्छि! Wait! It has च्छिin the main text! And in parentheses in the footnote is(छिन्नं)! Look at line 20: २. कुडचान्तर for (कुधांतर)-> in main text, it isकुधांतरं! Look at footnote: for

( २७२ ) अथ छन्दश्चित्युत्तराध्यायो विंशतितमः ऋ¹ग्वर्गः पर्या²र्यः समूह योगो³ वपु⁴क्षु युग्मेषु । सो₈पाः प्रा⁶ग्वत्पादाश्च₅तुष्कका शेष युक्तोंत्यः ॥ १ ॥ एकै³क युत विही¹ना वाद्यंतौ तद्विप²र्ययो⁴ यावत् । वर्गादिष्व⁵ समयुजः क्रमोक्रमाद्वर्द्ध²येत्पादान् ॥ २ ॥ एकैकेनद्वा³द्या न सोयेष्टधिके¹षु तत्प्रविष्टे⁵षु । वर्गादिरीष्टांत² प्रस्तारो भवति यवमध्यात्⁶ ॥ ३ ॥ १. (घ) १. रिग्वर्गः (ग) ऋग्वर्कः for (ऋग्वर्गः) २. पर्यायः (ग) (च) (ङ) for (पर्यार्यः) ३. योगा (ङ) for (योगो) ४. वयुत्कु (ग) वपुक्ष for (वयुक्षु) ५. चतुष्ककाः (ग) (च) (ङ) for (श्चतुष्कका) (ग) ६. प्रागृत for (प्राग्वत्) ७. युक्तोत्यः for (युक्तोंत्यः) (ङ) ८. सोयाः for (सोपाः) ६. प्राप्तादा for (पादा) २. (घ) १. विहीनाद्यंतौ (ग) वाद्यंतै for (वाद्यंतौ) २. क्रमोक्रमाद् (ग) क्रमात् (ङ) for (क्रमोक्रमाद्) (ग) ३. एकादि (ङ) for (एकैक) ४. तद्विपर्यायौ for (तद्विपर्ययो) ५. वर्गादिषु (ङ) for (वर्गादिष्व) ६. विषमयुजाक्रमो for (समभुजः) (च) २. क्रमोक्रमाद्वर्द्धयेत् for (क्रमोक्रमाद्वर्द्धयेत्) (ङ) ४. तद्विपर्ययौ for (तद्विपर्ययो) ६. विषमयुजां for (समभुजः) ३. (घ) १. सोपेश्वधिकेषु for (न सोयेष्टधिकेषु) २. भीष्टां (ग) वर्गादिरभीष्टांतः for (वर्गादिरीष्टांत) (ग) ३. द्वघाव्याः for (द्वाद्या) ४. सोपेप्पधिकेषु for (न सोयेष्टधिकेषु) ५. तत्प्रतिष्ठेषु (ङ) for (तत्प्रविष्टेषु) ६. मध्यः (ङ) for (मध्यात्) (च) १. नसोपेश्वधिकेषु for (नसोयेष्टधिकेषु) (ङ) ३. द्वघाद्वद्याः for (द्वाद्या) १. सोप्पप्पधिकेषु for (न सोपेष्टधिकेषु) २. वर्गाद्विरभीष्टान्तः for (वर्गादिरीष्टांत)

( २७३ ) ^१त्र्यूनोचोद्विपदाग्रं ^४विपदाद्या नामतः पृथक् संख्या । तच्छोधोथे^२व्येकः पृथगंता^५पमूर्द्धं^३ युतम् ॥ ४ ॥ यावत्पादाव्येको ^४गच्छद्रणैष्वथैकं^३ वृद्धेषु । ^५रूपाद्युद्धृतघाते वर्गाद्यानां परा संख्या ॥ ५ ॥ रूपाधिकयोद्धं^१ विषमे^२ पूर्वः समेषु पादार्द्धे । ^३आद्या द्विगुणाव्येकां ^४गुलान्यधस्तस्य सर्वेषाम् ॥ ६ ॥ ^१मध्यैस्तथार्द्धहीनैः क्रमपादैर्व्यस्त^५ तुल्य पादाद्यैः^२ । विषमे^३ष्वेकं मध्ये ^२प्रोह्याद्यान्यतः कुर्यात्^४ ॥ ७ ॥ ४. (घ) १. त्र्यूनोन्यो (ग) त्र्यूनोद्विपादाग्रं for (त्र्यूनो चो) २. ताश्चांधोधोव्येक for (तच्छोधोथेव्येकः) ३. 'धे' लुप्त (ग) ४. त्रिपदाद्यानामधः for (विपदाद्यानामतः) २. व्यव्येकः for (व्येकः) ५. पृथगंताद्रूपमूर्द्धं युतम् for (पृथगंतापमूर्द्धं युतम्) (च) १. त्र्यूनोंचो for (त्र्यूनोचो) २. ताँल्लोधोधे for (तच्छोधोधे) ५. पृथगंताद्रूपमूर्द्धंयुतं for (पृथगंतापमूर्द्धंयुतम्) (ङ) १. सूनोन्त्यो for (त्र्यूनो चो) ४. त्रिपदाद्यानामधः for (विपदाद्यानामतः) २. तच्छोध्यो for (तच्छोधोधे) ५. पृथगन्ताद्रूपमूर्ध्वंयुतम् for (पृथगंतापमूर्द्धंयुतम्) ५. (घ) १. चैक for (थैक) (ग) २. व्येको for (व्येका) ३. गच्छद्रर्णोप्यथैकवृद्धेषु for (गच्छद्रणैष्वथैकवृद्धेषु) (ङ) ४. गच्छाद् for (गच्छेद्) ५. रूपाद्युतघाते for (रूपाद्युद्धृतघाते) ६. (घ) १. रूपाधिकपादार्धे (ङ) (ग) रूपादिकापादार्धे for (रूपाधिकयोद्धं) ३. अज्या for (आद्या) (ग) २. विषमेषूर्द्धं समेषु पादा for (विषमेपूर्वः) ३. अर्द्धाद्विगुणाव्येकां (ङ) for (आद्याद्विगुणाव्येकां) (च) १. रूपाधिकपादार्द्धं for (रूपाधिकयार्द्धं) ३. अद्या for (आद्या) (ङ) २. विषमेषूर्ध्वः for (विषमेपूर्वः) ४. युलान्यधस्तस्य for (गुलान्यधस्तस्य) ७. (घ) १. (मध्यै) (ग) मध्यै for (मध्ये) २. मधे for (मध्ये) २. प्रोच्याद्यान्यन्यतः for (प्रोह्याद्यान्यतः) ४. र्यात् for (कुर्यात्) (ग) ५. व्यस्तुल्य for (व्यस्ततुल्य) (ङ) १. माध्यै for (मध्ये) ६. पादाद्यः for (पादाद्यैः) ७. विषमेरव्येकं for (विषमेष्वेकं)

( २७४ ) सैवक्रमं तुल्याद्यैर्न्यासोऽप्यधिको विशोधितश्चाधः । सांख्यैक्यं तादृक् तादृक् प्रथमस्त्रिरहितो नष्टे ॥ ८ ॥ माध्यैः कृतैश्चदलितै सम संख्यायां क्रमोक्रमात्क्षेप्यम् । विषमायां व्येकायां दलं क्रमादुक्रमात् सैकम् ॥ ६ ॥ समसंख्यायां सोपात् क्रमोक्रमाभ्यां तथैव विषमायाम् । कल्पोपविते दृष्टे प्रथमः शेषाक्षराण्युंते ॥ १० ॥ समदलसम विषमाणां संख्यापादाई सर्वकल्पवधः । स्वाद्य वधोन्यैः पादैः स्वपरस्य प्राग्वधः सैकैः ॥ ११ ॥

८. (घ) १. तुल्याद्यै (ग) (ङ) for (तुल्याद्यै)
२. व्यधिको (ग) र्नासोभ्यधिको (ङ) for (न्यासोप्यधिको)
(ग) ३. सैकक्रमं for (सैवक्रम) ४. संख्यैक्यं (ङ) for (सांख्यैक्यं)
५. तादृक् यादृक्च for (तादृक् तादृक्) ६. यस्त्रि for (प्रथमस्त्रि)
(च) ३. सैकक्रम (ङ) for (सैवक्रम) ४. सोख्यैक्यं for (सांख्यैक्यं)
(ङ) ७. यादृक् for (तादृक्)
९. (घ) १. माध्यैः (ग) मध्यैः for (माध्यैः)
२. क्रमोत्क्रमा (ग) (च) for (क्रमोक्रमा)
३. दुत्क्रमात् (च) for (दुक्रमात्)
(ग) ४. दलितैः (च) (ङ) for (दलितै) ५. त्क्षेप्यम् for (क्षेप्यम्)
(ङ) २. क्रमोत्क्रमात् for (क्रमोक्रमा) ५. क्षेप्पम् for (क्षेप्यम्)
१०. (घ) १. संख्याया for (संख्यायां)
२. क्रमोत्क्रमाभ्यां (ङ) (ग) क्रमत्क्रमाभ्यां for (क्रमोक्रमाभ्यां)
३. कल्पोपवितो (ग) कल्पोपचिते for (कल्पोपविते)
४. शेषात्कारण्यंते for (शेषाक्षराण्युंते)
(ग) ५. डिष्टे for (दृष्टे) ६. शेषाः for (शेषा)
(च) २. क्रमोत्क्रमाभ्यां for (क्रमोक्रमाभ्याम्)
(ङ) ७. सोपान for (सोपात्) ८. विषमाभ्याम् for (विषमायाम्)
३. कल्यापचिते for (कल्पोपविते)
११. (घ) १. संखापाद्धं (ग) सख्यापा for (संख्या)
(ग) २. खाद्य for (स्वाद्य)
(ङ) १. संख्यापादार्धं for (संख्यापादाई)
२. स्वाद्यवधोऽन्यैः for (स्वाद्यवधोन्यैः)

( २७१ ) आद्यादनंतरोधः कल्पोत्य तुल्य माद्य कल्प प्राक् । न्यासो वर्गोन्योन्य प्रस्तारेर्द्ध समविषमाणां ॥ १२ ॥ नष्टांतपास्वाधस्थो न कल्प घातो अर्द्ध तुल्य विषमाणां । व्येकः पृथक् स्ववर्गोद्धृतः फलं तुल्य कल्पानाम् ॥ १३ ॥ उद्दिष्टे कल्प कृतो तीतै प्रथम फलस्वरूपेन्यः । असकृद्वर्गांश युते सैके वार्द्ध सम विषमाणां ॥ १४ ॥

१२. (घ) १. कल्पोऽनु (ग) कल्पोन्य for (कल्पोत्य)
२. न्यासोपवर्गो (ग) न्यासो च गोन्यो न for (न्यासोवर्गो)
३. न्योत for (न्योन्य)
४. प्रस्तारेऽर्ध (ग) (च) for (प्रस्तारेर्द्ध)
(ग) ५. कल्पः for (कल्प)
(च) १. काल्पोऽन्यतुल्य for (कल्पोत्यतुल्य) ३. न्योन for (न्योन्य)
(ङ) ६. दनन्तरोऽधः for (दनंतरोधः)
१. कल्पोऽन्यतुल्यमाद्यः for (कल्पोत्यतुल्यमाद्य)
५. 'कल्प' लुप्त ।
४. प्रस्तारोऽर्ध for (प्रस्तारेर्द्ध)
३. ऽन्योनः for (न्योन्य)
१३. (घ) १. नष्टांत्याश्चोस्थोन for (नष्टांतपास्वाधस्थोन)
२. र्द्धं (ग) (च) (ङ) ऽर्ध for (अर्द्ध) ३. वर्गो for (वर्गो)
(ग) १. नाष्टंत्यात् for (नष्टांत्) ५. ककल्प for (नकल्पा)
६. तुविषमाणां for (तुल्यविषमाणां) ७. द्धृतफलः for (द्धृतः फलं)
(ङ) १. नष्टेन्त्यात् for (नष्टांतपा)
१४. (घ) १. कृतेऽतीतैः (ग) हृतेतीतैः (ङ) for (कृतोतीतै)
२. फले (ङ) for (फल)
३. वर्गांश (ग) व्यसकृद्वर्गांश for (असकृद्वर्गांश)
(ग) ४. उद्दिष्ट for (उद्दिष्टे) ५. चार्ध for (वार्द्ध)
(च) १. कृतेऽतीतैः for (कृतोतीतै)
(ङ) ६. प्रथमः for (प्रथम) ५. वार्ध for (वार्द्ध)

? Look at line 5: विषमे ज्याद्यल यूनो- wait, betweenज्याद्यलandयूनो, is यूनोactually्यूनो? Yes, द्यूनो! ज्याद्यल द्यूनो? No, ज्याद्य ल्यूनो! Wait! In footnote line 20: ४. ज्याद्य for (ज्याद्य)-> wait, look at the second word:(ज्याद्य)? Wait, look at line 21: (च) ४. द्याद्यल for (ज्याद्यल)Ah! In line 5, the text hasज्याद्यल! And in line 20: ४. ज्याद्य for (ज्याद्य)? No, ४. ज्याद्य for (ज्याद्य)? Wait, does line 20 say: ४. ज्याद्य for (ज्याद्य)? Look at the parentheses: for (ज्याद्य). The word inside is (ज्याद्य)or(ज्याद्यल)? No 'ल'! It's (ज्याद्य). Wait, why does line 21 say द्याद्यल for (ज्याद्यल)? Wait, in line 20: does it say ४. ज्याद्य for (ज्याद्य)? No, look at the letter after ज्या: it's द्य? Wait,

( २७७ ) कृत्वा५धोधः कल्पान्ये१ काद्येकोत्तरानधः२ शेषात् । खात्परतां३ तैकमधः प्रस्तारा द्युक्त वदीहाद्यैः४ ॥ १६ ॥ गुरुषष्ट्यैका७ विघटि१ द्विगुणा व्येकांगुलानि८ संख्याद्वा२ । विंशति६ रार्या विंश छंदश्चित्युत्तराध्यायः३ ॥ २० ॥ इत्ति५ ब्रह्म गुप्ते छंद श्चित्युत्तराध्यायः ॥२०॥ अध्यायः समाप्तः विंशतितमः समाप्तः ।

६. (घ) १. कल्पनाका for (कल्पान्येका)
२. धनः (ग) नघस्तेषाम् (ङ) for (नधः शेषात्)
३. खातपतोंत्यैक (ग) खात्परतोत्यैकचमधः for (स्वात्परतो ऽन्यैकचमधः)
४. वदिहाक्षैः (ग) वदेहाद्यैः for (वदीहाद्यैः)
(च) ५. ध्येधः for (धोधः)
१. कल्पनाकेकाद्येकोत्तरानधः for (कल्पान्येकाद्येकोत्तरानधः)
३. परतांत्यैकमधः for (परतांतैकमधः)
४. वदिहाद्यैः for (वदीहाद्यैः)
(ङ) (वि०-इसकी क्रमसंख्या १८ है)
१. कल्पान्येका for (कल्पान्येका) ४. दुक्तवदिहाद्यैः for (द्युक्तवदीहाद्यैः)
२०. (घ) १. विघटी द्विगुणाद्वचे (ग) विघटी for (विघटि) २. स्या (ग) for (द्वा)
३. विशश्छंद (ग) विशच्छंद for (विंशछंद)
४. श्चित्युत्तरोऽध्यायः (ग) (ङ) (श्चित्युत्तरोऽध्यायः)
५. 'इति' से 'समाप्त' तक पाठ उपलब्ध नहीं है । (ग)
(ग) ६. विशति for (विंशति)
(च) १. विघटी for (विघटि) २. संख्याध्या for (संख्याद्वा)
३. श्चित्युत्तराध्यायः for (श्चित्युत्तराध्यायः)
५. 'इति' से 'समाप्त होने तक लुप्त ।
(ङ) (वि०-इसकी क्रससंख्या १६ है)
७. गुरुषष्ट्यैका for (गुरुषष्ट्यैका)
१. निघटीद्विगुणा for (विघटिद्विगुणा)
८. त्येकांगुलानि for (व्येकांगुलानि) २. संख्या स्यात् for (संख्याद्वा)
६. द्राविंशतिरायांणां for (विंशतिरायांविशं)

( २७८ ) अथ गोलाध्यायो नाम एकविंशतितमः ग्रह नक्षत्रभ्रमणं न समं सर्वत्र भवति³ भूस्थानम्¹ । तद्विज्ञानं गोलाद्यतस्ततो गोलमभिधास्ये² ॥ १ ॥ शशि बुध सितार्क⁴ कुज गुरु शनि कक्ष¹विष्टितो²भ कक्षांतः³ । भूगोलः सत्वानां शुभाशुभैः कर्मभिरूपात्तः ॥ २ ॥ खेभूगोलस्तदुपरि मेरौ देवाः स्थितास्तले³ दैत्याः खे¹ भगणाक्षाग्रस्तावु² पर्यूर्ध्वश्च ध्रुवो⁴ तेषाम् ॥ ३ ॥ ध्रुवयो विद्धं¹से व्यगममराणां क्षितिजसंस्थ²मुडुचक्रम् । अपसव्यगमसुराणां भ्रमति प्रवहानि लाक्षिप्तम् ॥ ४ ॥

१. (घ) १. भूस्थानाम् (ङ) for (भूस्थानम्)
२. धास्येः for (धास्ये)
(ग) ३. 'भवति' पद यहां अंकित नहीं है ।
२. (घ) १. कक्ष्या (ग) कक्षा for (कक्ष)
२. चेष्टितो (ग) वेष्टितो for (विष्टितो)
(ग) ३. भक्षांत for (भकक्षांतः)
(च) ४. सितार्कं for (सितार्क)
१. कक्ष्यावेष्टितो for (कक्षविष्टितो)
(ङ) १. कक्षावेष्टितो for (कक्षविष्टितो)
३. (घ) १. षे for (खे)
२. स्थावुपर्य्यध्वश्च (ङ) (ग) तावुपर्य्यध्वश्च for (स्तावुपर्यूर्ध्वश्च)
(ग) ३. स्थिताः स्तले for (स्थितास्तले) ४. ध्रुवौ for (ध्रुवो)
(च) २. क्षाग्रस्थावुपर्य्यूध्वश्च for (क्षाग्रस्तावुपर्यूर्ध्वश्च)
४. (घ) १. वंदंस (ग) बद्धः for (विद्धंस)
(ग) २. क्षिति for (क्षितिज)
(च) १. वंदंस for (विद्धंस)
(ङ) १. बद्ध for (विद्धं)

( २७६ ) अन्यत्र सर्वतो दिशिमुन्नमति^१भयं^२ जरोर्ध्वगो^३ भ्रमति लंकायां^४ । मुहु^५ चक्रं पूर्वापरगं ध्रुवौ क्षितिजे ॥ ५ ॥ देवा सव्यगम सुराः^५ पश्यंत्यपसव्यगं^२ रवि क्षितिजे । विषुवति समपश्चिमगं निरक्ष^३देशा^४स्थिताः पुरुषाः^६ ॥ ६ ॥ • सौम्यमपमण्डलाद्धं^२ मेषाद्यं^३ सव्यगं^४ सदादेवाः । पश्यंति तुलाद्यद्धं दक्षिणमप सव्यगं दैत्याः^१ ॥ ७ ॥ पश्यंति देवदैत्या रविवर्षार्द्धं^३मुदितं सकृत्सूर्यम् । शशिगाः सशि^१मासार्द्धं पितरोभूस्था नराः स्वदिवम्^२ ॥ ८ ॥ भूपरिधि तुर्यभागे^४ लंकाभूमस्तका^६त्क्षितितलाच्च^५ । लंकोत्तरतोवंती^२ भूपरिधेः पंच दशभागैः^३ ॥ ६ ॥ [L1

( २८० ) अक्षांशभूपरिधि¹ वधान्मंडलभागा सयोजनै² विषुवत्³ । तत्भाग⁴ योजनैरेवमुपरिस्तयोन्य⁵ दनुपातात्⁶ ॥ १० ॥ अंबरयोजनपरिधिः शशिभगणाः शून्यखखजिनाग्नि गुणाः² । यस्य भगणै विभक्तास्तत्¹कक्षाकौ³भषष्ट्यंशे⁴ ॥ ११ ॥ भूपरिधि³ समान⁴ षष्ट्या⁵ ख¹ परिधि तुल्यानि कल्परविवर्षैः । गच्छंति योजनानि ग्रहाः स्वकक्षास्तु² तुल्यानि ॥ १२ ॥ भगणास्याधः² शनिगुरु भूमिजरविशुक्र सौम्यचंद्राणाम्¹ । कक्षा³क्रमेण शीघ्राः शनैश्चराद्याः कलाभुक्त्या ॥ १३ ॥

१०. (घ) १. कुपरिधि (ग) (च) (ङ) for (भूपरिधि) २. प्त (ग) (ङ) for (स)
३. विषुवत् (ग) (ङ) for (विषुवत्) ४. नत (ग) (ङ) for (तत्)
५. सूर्योन्य (च) for (स्तयोन्य)
(ग) ६. दनुपात् for (दनुपातात्)
(च) २. भागाप्तयोजनै for (भागासयोजनै)
३. विषुवत् for (विषुवत्) ४. नतभाग for (तत्भाग)
(ङ) (ङ) सूर्योऽन्य for (स्तयोन्य)
११. (घ) १. विभक्तस्तत् कक्षाकौभ for (विभक्तास्तत् कक्षाकौभ)
(ग) २. +३३२४०००+
(च) ३. कक्षाकौभषष्ठयंशे for (कक्षाकौभषष्ट्यंशे)
(ङ) ३. कक्षाकौ for (कक्षाकौ) ४. भषष्ठद्यंशः for (भषष्ट्यंशे)
१२. (घ) १. भ for (ख) २. स्वकक्षासू for (स्वकक्षास्तु)
(ग) ३. भपरिधि for (खपरिधि)
४. समानि (ङ) for (समान)
५. षष्टद्य for (षष्ट्या)
(च) ५. षष्टद्याष for (षष्ट्या ख)
(ङ) २. स्वकक्षांसु for (स्वकक्षास्तु)
१३. (घ) १. चंद्राणां for (चन्द्राणाम्)
(ग) २. भगणस्याधिः for (भगणास्याधः)
(ङ) ३. कक्षाः for (कक्षा)

( २८१ ) लघवोत्पो$^१$ राश्यंशा$^२$ महति महतो$^३$ ऽल्प$^६$वृत्तमल्पेन$^७$ । पूरयंस्तींदुर्महता$^४$ कालेन महाशनैश्चारी$^५$ ॥ १४ ॥ यन्मूलं तध्वासो मंडललिप्ता कृतेर्दशहतायाः$^२$ । तस्यार्द्धं$^३$ व्यासाद्धं$^४$ योजनकर्णप्रमाथार्थम्$^५$$^६$ ॥ १५ ॥ भगणकलाव्यासाद्धं भवति कलाभिर्यतो$^२$ न सकलाभिः$^३$ । ज्यार्द्धानि न स्फुटानि ततः$^१$ कृतं व्यासदलमन्यत् ॥ १६ ॥ राश्यष्टांशेष्टांकांत्यदसंधिभ्यः$^१$ क्रमोक्रमात्कृत्वा$^२$ । बध्‍नीयात् सूत्राणि$^३$ द्वयोर्द्वयो ज्यास्तदर्द्धानि ॥ १७ ॥

१४. (घ) १. लघवोऽल्पे for (लघवोत्पो) २. राशंशा (च) for (राश्यंशा)
३. महांतो (ग) (ङ) for (महतो)
४. पूरयतींदुर्महंता (ग) पूरयतींदुर्महता (ङ) for (पूरयंस्तींदुर्महता)
५. महशनैश्चारी (ग) महच्छनैश्चारी (ङ) for (महाशनैश्चारी)
(ग) ६. ल्पवृत्त for (ऽल्पवृत्त) ७. मन्येन for (मल्पेन)
(च) ४. पूरयंती दुर्महता for (पूरयंस्तींदुर्महता)
५. महशनैश्चारी for (महाशनैश्चारी)
(ङ) १. लघवोऽल्पे for (लघवोत्पो)
१५. (घ) १. तद्वचासो (ग) (ङ) for (तध्वासो) २. कृतेर्दं श (ग) for (कृतेर्दश)
३. नस्यार्द्धं for (तस्यार्द्धं) ४. व्याद्धं for (व्यासाद्धं)
५. कर्णामाणार्थम् (ग) (च) कर्णं प्रमाणार्थम् for (कर्ण प्रमाथार्थम्)
(च) १. तद्वचासो for (तध्वासो) २. ईंशहतायाः for (र्दशहतायाः)
४. दघासाद्धं for (व्यासाद्धं)
(ङ) ६. प्रमाणार्थम् for (प्रमाथार्थम्)
१६. (घ) १. + (च) + (ङ)
(ग) २. यंतोर्यतो for (यं तो न)
(ङ) ३. सविकलं हि for (सकलाभिः)
१७. (घ) १. ष्वंकानपद (ग) for (ष्टांकांत्यद)
२. क्रमोत्क्रमात्कृत्वा (ग) (ङ) for (क्रमोक्रमात्कृत्वा)
३. सूत्राणि (ग) (च) (ङ) for (सुत्राणि)
(च) १. ष्वंकान्यद for (ष्टांकांत्यद) ग. क्रमोत्क्रम। कृत्वा for (क्रमोक्रमा कृत्वा)
(ङ) १. राश्यष्टांशेष्वङ्कान् for (राश्यष्टांशेष्टांकांत्)
४. पदसन्धिभ्यः for (यदसंधिभ्यः)

( २८२ ) ज्यार्द्धानि ज्यार्द्धानां ज्याखंडान्यन्तराणि तन्त्ये¹ च। व्यस्तान्यं³ तदेथ विषुरू² क्रमज्या धनुस्ताभ्याम् ॥ १८ ॥ एक द्वित्रि³ गुणाया व्यासार्द्ध कृतेः¹ पृथक् चतुर्थेभ्यः। मूलान्यष्ट⁴ द्वादश षोडष² षडान्यतो⁵ न्त्यानि ॥ १९ ॥ तुल्यक्रमोक्रम¹ समज्या⁶ खंडक⁴ वर्ग युतिभगिम्²। प्रोह्यानष्टं³ व्यासार्द्धं वर्गंतस्तत्पदे⁵ प्रथमं ॥ २० ॥ तद्दलखण्डानि तदुन¹ जिन समानि द्वितीयमुत्पत्तौ²। कृतयमवैक दिगीशेषु सप्तरसगुणा³ नवादीनाम् ॥ २१ ॥ एवं जीवा खंडान्यल्पानि बहूनि¹ वाद्यखण्डानि²। ज्यार्द्धानि³ वृत्तपरिधेः षष्टचतुर्थत्रिभागानाम् ॥ २२ ॥ १८. (घ) १. तान्येव (ग) (ङ) (च) for (तन्त्ये च) २. वेषु (ग) पाद्यतेषु for (विषुरूक्रमज्या) (ग) ६. व्यस्तान्यत् for (व्यस्तान्यं) ३. व्यस्तान्यताद्य तेषु for (व्यस्तान्यं तदेथ विषु) २. तेषुरुत्क्रमज्या for (विषुरूक्रमज्या) (ङ) ३. व्यस्तान्यन्त्यादथ for (व्यस्तान्यं तदेथ) २. वेषुरुत्क्रमज्या for (विषुरूक्रमज्या) १९ (घ) १. कृतेः (ग) (च) (ङ) for (कृतेः) २. षोडश (ग) (च) (ङ) for (षोडष) (ग) ३. द्विगुणाया for (द्वित्रिगुणाया) ४. मूलात्यष्ट for (मूलान्यष्ट) ५. षंडान्यतो for (षडान्यतो) (ङ) ५. खण्डान्यतोऽन्यानि for (षडान्यतोन्त्यानि) २०. (घ) १. तुल्यक्रमोत्क्रम (ग) (च) (ङ) for (तुल्यक्रमोक्रम) २. चतुभगिम् (ङ) for (भगिम्) ३. प्राज्यानष्टं (ग) प्राह्यानष्टं for (प्रोह्यानष्टं) (ग) ४. खंड for (खंडक) ५. वर्गं स्तत्पदे for (वर्गंतस्तत्पदे) (च) ३. प्रोज्यानष्टं for (प्रोह्यानष्टं) (ङ) ६. ज्यासम for (समज्या) २१. (घ) १. तदून (ग) (च) (ङ) for (तदुन) (ग) २. (वि०—'द्वितीय' पद लुप्त है) (च) ३. गुणनवादीनाम् (ङ) for (गुणानवादीनाम्) २२. (घ) १. बहूनि (ग) (च) (ङ) for (बहूनि) २. षंडानि (च) for (खण्डानि) (ग) ३. ज्यार्धनिवृत्तिपरिधेः for (ज्यार्द्धानिवृत्तपरिधेः) (के) २. वा

as physical lines: Wait, let's count the lines if we keep them separate vs merged. Wait, is४ ५ १really a separate line? Look atकक्षामंडलभूमध्ये: १ २ ३ कक्षामंडलभूमध्ये Here, , are squeezed directly aboveकक्षा, मंडल, भूमध्येof the single compound wordकक्षामंडलभूमध्ये! It is 100% indisputably a set of footnote reference marks for the words below it. If you separate it onto a previous line: १ २ ३ कक्षामंडलभूमध्ये मध्यमः स्वकक्षायाम् । It completely disconnects, , fromकक्षा, मंडल, भूमध्ये. Whereas: कक्षा^१मंडल^२भूमध्ये^३ मध्यमः स्वकक्षायाम् । makes complete sense! Wait, what about the shloka line itself? उक्रम^४ समखण्ड^५ गुणाढ्यास्रादथवा^१ चतुर्थभागाद्यम् । कृत्वोक्त खण्डकानि^२ ज्यार्द्धानयनं^६ नलध्वमस्मात्^३ ॥ २३ ॥