चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २] निदानस्थानम् ४२३
अ० २] निदानस्थानम् ४२३ अतिमात्रा में अथवा शरीर की गरम स्थिति में खाने से, मनुष्य का पित्त प्रकु- पित होजाता है और रक्त अपनी मात्रा से अधिक बढ़ जाता है । पित्त प्रकोप से रक्त का दोष—इस प्रकार प्रमाण में अधिक बढ़ा हुआ रक्त तथा प्रकुपित हुआ पित्त सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है और यकृत् एवं प्लीहा से उत्पन्न होने वाले रक्तवह स्रोतों के बढ़े हुए रक्तके कारण भरे हुए मुखों को पहुँचकर बन्द कर देता है। इस प्रकार संसर्ग द्वारा पित्त रक्त को दूषित कर देता है*॥ ३ ॥ तल्लोहितसंसर्गाल्लोहितप्रदूषणाल्लोहितगन्धवर्णानुविधानाच्च पित्तं लोहितपित्तमित्याचक्षते ॥ ४ ॥ पित्त का रक्त के साथ संसर्ग होने से एवं शरीरस्थरक्त के पित्त के द्वारा दूषित होने से तथा पित्त का रक्त के समान गन्ध एवं रंग होने से पित्त को 'रक्तपित्त' कहते हैं ॥ ४ ॥ तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा—अनन्नाभिलाषो भुक्तस्य विदाहः शुक्ताम्लगन्धरस उद्गारश्छर्देरभीक्ष्णागमनं छर्दितस्य बीभ- त्सता स्वरभेदो गात्राणां सदनं परिदाहो मुखाद्धूमागम इव लोहलोहि- तमत्स्यामगन्धित्वमपि चाऽऽस्यस्य रक्त-हरित-हारिद्रवत्वमङ्गावयवशकृ- न्मूत्र-स्वेद-लाला-सिङ्घाणकास्य-कर्णमल-पिडकोल्लिका-पिडकानामङ्ग- वेदन-लोहित-नील-पीत-श्यावानामर्चिष्मतां च रूपाणां स्वप्ने दर्शनम- भीक्ष्णमिति लोहित-पित्त-पूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ५ ॥ रक्तपित्त के पूर्व रूप ये हैं—भोजन में अनिच्छा, खाये हुए अन्न का न पचना, खट्टे या शुक्त गन्ध अथवा रस की डकार आना, बार २ वमन की अभिरुचि, वमन में आये रक्त आदि पदार्थ की भयंकरता, स्वरभेद, अंगों का टूटना, शरीर में दाह, मुख से धुंए के समान श्वास आना, मुख से लोहा, रक्त, या मछली या कच्चे मांस की गन्ध आना, शरीर के अवयव, मल, मूत्र, पसीना, लार, नासिका का मल, मुख का मल, कान का मल, और नेत्र का मल तथा पिडकाओं का, लाल, हरा अथवा हल्दी के समान होना, अंगों में
- रक्त के बढ़ने से रक्तवह स्रोतो के मुख खुल जाते हैं। परन्तु पित्त के कारण रक्त के दूषित होने से रक्त में घनता बढ़ जाती है। इससे उनका मुख बन्द हो जाता है। पित्त रक्त को दूषित करता है। रक्तवहस्रोतों का प्रभाव स्थान यकृत् और प्लीहा हैं।
वेदना, स्वप्न में लाल, नीले, पीले, काले वा जलते हुए पदार्थों का बार बार दर्शन होना, रक्तपित्त के पूर्वरूप हैं ॥ ५ ॥ उपद्रवास्तु खलु दौर्बल्यारोचकाविपाक-श्वास-कास-ज्वरातीसार- शोफ-शोष-पाण्डुरोगाः स्वरभेदश्च ॥ ६ ॥ रक्तपित्त के उपद्रव—दुर्बलता, अरुचि, अविपाक, श्वास, कास, ज्वर, अतिसार, सूजन, शोष, पाण्डुरोग, और स्वरभेद ये रक्तपित्त के उपद्रव हैं ॥६॥ मार्गौ पुनरस्य द्वावूर्ध्वं चाधश्च । तद्बहुश्लेष्मणि शरीरे श्लेष्मस- सर्गादूर्ध्वं प्रपद्यमानं कर्णनासिकानेत्रास्येभ्यः प्रच्यवते । बहुवाते तु शरीरे वातसंसर्गादधः प्रपद्यमानं मूत्रपुरीषमार्गाभ्यां प्रच्यवते । बहु- वातश्लेष्मणि शरीरे श्लेष्मवातसंसर्गाद् द्वावपि मार्गों प्रपद्यते, तौ मार्गौ प्रपद्यमानं सर्वेभ्य एव यथोक्तेभ्यः खेभ्यः प्रच्यवते शरीरस्य ॥ ७ ॥ रक्तपित्त के दो मार्ग—रक्तपित्त के बाहर आने के दो मार्ग हैं । एक ऊर्ध्वमार्ग और दूसरा अधोमार्ग । जिस समय शरीर में कफ की प्रधानता होती है उस समय शरीर का पित्त कफ से मिलकर ऊर्ध्वगामी बन कर कान, नाक, नेत्र और मुखद्वार से बाहर निकलता है । वातप्रधान शरीर में पित्त वायु से मिलकर अधोगामी होता है । इस अवस्था में वह मल मूत्र के रास्ते से बाहर निकलता है और जब शरीर में वात और कफ दोनों प्रबल होते हैं तब शरीर में वात और कफ से मिलकर ऊर्ध्वमार्ग एवं अधोमार्ग दोनों से बाहर आता है । इन दोनों मार्गों से बाहर निकलता हुआ रक्तपित्त शरीर के सम्पूर्ण छिद्रों से निकलने लगता है ॥ ७ ॥ तत्र यदूर्ध्वभागं तत्साध्यं, विरेचनोपक्रमणीयत्वाद्व बह्वौषधत्वाच्च । यदधोभागं तद्याप्यं, वमनोपक्रमणीयत्वादल्पौषधत्वाच्च । यदुभयभागं तदसाध्यं, वमनविरेचनायोगित्वादनौषधत्वाच्चेति ॥ ८ ॥ साध्य-असाध्य का विचार—इसमें जो रक्तपित्त ऊर्ध्वगामी है, वह साध्य है, क्योंकि इसकी चिकित्सा विरेचन द्वारा होती है और विरेचन की औषधियाँ बहुत हैं । जो रक्तपित्त अधोगामी है वह याप्य अर्थात् कष्टसाध्य है, क्योंकि इस की चिकित्सा वमन द्वारा होती है और वमन की औषधियां कम हैं । जो रक्तपित्त उभय-मार्गगामी अर्थात् ऊर्ध्व-अधोमार्गगामी है वह असाध्य है, क्योंकि इसमें वमन और विरेचन दोनों का उपयोग होता है और ऐसी औष- धियां नहीं हैं ॥ ८ ॥
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२५
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२५ रक्तपित्तप्रकोषस्तु खलु पुरा दक्षयज्ञोद्ध्वंसे रुद्रकोपप्रभवाग्निना १ प्राणिनां परिगतशरीरप्राणानामनु ज्वरमभवत् २ ॥ ६ ॥ तस्याऽऽशुकारिणो दावाग्नेरिवाऽऽपतितस्यात्ययिकस्याऽऽशु प्रशान्तौ यतितव्यं मात्रां देशं कालं चाभिसमीक्ष्य संतर्पणेन वा मृदु-मधुर- शिशिर-तिक्त-कषायैरभ्यवहार्यैः प्रदेह-परिषेकावगाह-संस्पर्शनैर्वमना- द्यैर्वा तत्रावहितेनेति ॥ १० ॥ रक्तपित्त का इतिहास— प्राचीन काल में जिस समय रुद्र के गणों ने दक्ष के यज्ञ ३ का विध्वंस किया था । उस समय रुद्र के कोप से, सम्पूर्ण देहधारी प्राणियों को कष्ट देने वाले ज्वर के पीछे, अग्नि के समान उष्णशक्ति (रक्तपित्त) उत्पन्न हुआ । यह रक्तपित्त शीघ्र कार्य करने वाला, प्राणहारक एवं अग्नि के समान नाश करने वाला है। इसको शान्त करने का शीघ्र उपाय करना चाहिये । मात्रा, देश, काल आदि का विचार करके संतर्पण या अपतर्पण क्रिया द्वारा अथवा मृदु, मधुर, शीत, कटु, कषाय, रसयुक्त-भोजनों से, लेप, परिषेक, अवगाहन, संस्पर्शन, वमन आदि द्वारा सावधानी से चिकित्सा करनी चाहिये ॥१०॥ भवन्ति चात्र— साध्यं लोहितपित्तं तद्यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते । विरेचनस्य योगित्वाद् बहुत्वाद्भेषजस्य च ॥११॥ विरेचनं तु पित्तस्य जयार्थे परमौषधम् । यश्च तत्रान्वयः श्लेष्मा तस्य चानघमं स्मृतम् ॥१२॥ भवेद्योगावहं तत्र मधुरं चैव भेषजम् । तस्मात्साध्यं मतं रक्तं यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते ॥१३॥ ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त साध्य— जो रक्तपित्त ऊर्ध्वमार्गगामी हो, वह साध्य है, क्योकि इसमें विरेचन द्वारा चिकित्सा की जाती है और विरेचन की ओषधियां बहुत हैं। ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त में पित्तदोष प्रधान होता है, और कफ दोष गौण होता है। पित्तदोष को शान्त करने के लिये विरेचन परम श्रेष्ठ क्रिया है। और जो कफ इसमें अनुबन्ध रूप में रहता है, इसके लिये विरेचन मध्यम उपाय है। कषाय और तिक्त रसों के सिवाय मधुर रस भी अन्य १. 'दक्षयज्ञध्वंसे रुद्रकोषामर्षाग्निना' इति पाठः । २. 'मभवज्ज्वरमनु' इति वा पाठः । ३. यह इतिहास आलंकारिक है । दक्ष का यज्ञ इस देह में ही है। रुद्र शिव जाठराग्नि है। उसके विकृत होने से ही रोग उत्पन्न होते हैं।
४२६ चरकसंहिता [ अ० २ औषधियो के साथ मिलकर योगवाही हो जाता है । इसलिये ऊर्ध्वगामी रक्त- पित्त साध्य हैं ॥११-१३॥ रक्तं तु यदधोभागं तद्याप्यमिति निश्चयः । वमनस्याल्पयोगित्वादल्पत्वाद्भेषजस्य च ॥ १४ ॥ वमनं हि न पित्तस्य हरणे श्रेष्ठमुच्यते । यश्च तत्रानुगो वायुस्तच्छान्तौ चावरं मतम् ॥१५॥ तच्चायोगवहं तत्र कषायं तिक्तकानि च । तस्माद्याप्यं समाख्यातं यदुक्तमनुलोमगम् ॥ १६ ॥ अधोगामी रक्तपित्त याप्य—जो रक्तपित्त अधोमार्गगामी है वह याप्य है । क्योंकि पित्त को जीतने के लिये 'वमन' पूर्णरूप से पर्याप्त क्रिया नहीं है और वमन की औषधियां भी कम हैं । कफ दोष के साथ मिश्रित पित्त को निकालने में वमन पर्याप्त है । परन्तु रक्तपित्त के मूलरूप पित्त को निकालने में वमन श्रेष्ठ नहीं है । इसमें अनुबन्ध रूप से रहने वाले वायु को शमन करने के लिये वमन क्रिया निरुपयोगी है । इसी प्रकार कषाय और कटु रस जो रक्तपित्त के नाशक हैं, वे रस वायु को बढ़ाने वाले हैं इसलिये योगों में इनका उपयोग नहीं किया जा सकता इसलिये अधोगामी रक्तपित्त याप्य हो जाता है ॥ १४-१६ ॥ रक्तपित्तं तु यन्मार्गौ द्वावपि प्रतिपद्यते । असाध्यमिति तज्ज्ञेयं पूर्वोक्तादपि कारणात् ॥१७॥ न हि संशोधनं किंचिदस्त्यस्य प्रतिमार्गगम् । प्रतिमार्गं च हरणं रक्तपित्ते विधीयते ॥ १८ ॥ एवमेवोपशमनं सर्वशो नास्य विद्यते । उभयमार्गगामी असाध्य रक्तपित्त—दोनों मार्गों से जाने वाला रक्तपित्त, उपरोक्त कारणों से असाध्य हो जाता है । क्योंकि ( १ ) इसके प्रति- कूल मार्ग के लिये संशोधन-चिकित्सा किसी प्रकार की भी नहीं है । और ( २ ) रक्तपित्त में विरुद्ध मार्ग से संशोधन कार्य गुणकारी होता है । इसलिये सब प्रकार की शान्ति करने वाले कोई भी औषध नहीं है ॥ १७-१८ ॥ संसृष्टेषु च दोषेषु सर्वजिच्छमनं मतम् ॥ १६ ॥ इत्युक्तं त्रिविधोदर्कं रक्तं मार्गविशेषतः । द्वि-दोषों से व त्रि-दोषज रक्तपित्त की चिकित्सा—संसृष्ट दो दोषों या तीनों दोषों से मिश्रित रक्तपित्त में सब दोषों को शमन करने वाली औषधि देनी
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२७
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२७ चाहिये । इस प्रकार से रक्तपित्त के तीन प्रकार बाहर आने के मार्गों के भेदा- नुसार कह दिये ॥ १९ ॥ एभ्यस्तु खलु हेतुभ्यः किंचित्साध्यं न सिध्यति ॥ २० ॥ प्रेष्योपकरणाभावादौरात्म्याद्वैद्यदोषतः । अकर्मतश्च साध्यत्वं कश्चिद्रोगोऽतिवर्तते ॥ २१ ॥ तत्रासाध्यत्वमेकं स्यात्साध्यायाप्यपरिक्रमात् । रक्तपित्तस्य विज्ञानमिदं तस्योपदेक्ष्यते ॥ २२ ॥ साध्य रोग असाध्य हो जाने के कारण—इन निम्नलिखित कारणों से कोई साध्य रोग असाध्य बन जाता है । जैसे भृत्य आदि के अभाव से, अन्य आव- श्यक सामग्री के अभाव से, आत्मसंयम के अभाव से रोगी के दुष्ट आहार- विहार के कारण; वैद्य के दोष से, तथा चिकित्सा न करने से साध्य रोग भी असाध्य हो जाता है । उभय मार्ग से जाने वाला रक्तपित्त असाध्य है। इसी प्रकार साध्य रक्तपित्त का याप्य हो जाना, या याप्य रक्तपित्त का असाध्य हो जाना दोनों ही असाध्य हैं । इसके आगे रक्तपित्त विषयक विज्ञान और अधिक कहते हैं ॥ २०–२२ ॥ यत्कृष्णमथवा नीलं यद्वा शक्रधनुषप्रभम् । रक्तपित्तमसाध्यं तद्वाससो रञ्जनं च यत् ॥ २३ ॥ भृशं पूत्यतिमात्रं च सर्वोपद्रववच्च यत् । बलमांसक्षये यच्च तच्च रक्तमसिद्धिमत् ॥ २४ ॥ येन चोपहतो रक्तं रक्तपित्तेन मानवः । पश्येद् दृश्यं वियच्चैव तच्चासाध्यमसंशयम् ॥ २५ ॥ तत्रासाध्यं परित्यज्य याप्यं यत्नेन यापयेत् । साध्यं चावहितः सिद्धैर्भेषजैः साधयेद्भिषक् ॥ २६ ॥ असाध्य रक्तपित्त के लक्षण—जो रक्तपित्त काला, नीला, अथवा इन्द्र धनुष के समान नाना प्रकार के रंगों वाला हो, और जिसमें वस्त्र पर लगा रक्त का दाग धोने से न मिटे और अतिशय दुर्गन्ध वाला हो, जिसमें सब उप- द्रव हों, जिस के कारण रोगी का बल और मांस क्षीण होगया हो, ये असाध्य रक्तपित्त के लक्षण हैं । रक्तपित्त का रोगी जब सब पदार्थों को लाल लाल ही देखने लगे तब रक्तपित्त निःसंशय असाध्य समझना चाहिये । असाध्य अव- स्था की चिकित्सा आरम्भ ही नहीं करनी चाहिये, दुःसाध्य या याप्यसाध्य रोग
कारी ओषधियों से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २३-२६ ॥
४२८ चरकसंहिता [ अ० ३ की प्रयत्नपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिये । साध्य रोग की सावधान होकर गुण- कारी ओषधियों से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २३-२६ ॥ तत्र श्लोकौ—कारणं नामनिर्वृत्तिं पूर्वरूपाण्युपद्रवान्। मार्गौ दोषानुबन्धं च साध्यत्वं न च हेतुमत् ॥ २७ ॥ निदाने रक्तपित्तस्य व्याजहार पुनर्वसुः । वीत-मोह-रजोदोष-लोभ-मान-मद-स्पृहः ॥ २८ ॥ इति ॥ मोह, रजोगुण, दोष, लोभ, अभिमान, मद, और स्पृहा से रहित पुनर्वसु ने इस अध्याय में, रक्तपित्त की उत्पत्ति का कारण, पूर्वरूप, उपद्रव, इसके दोनों मार्ग, वात आदि दोषों का अनुबन्ध, साध्यासाध्यत्व, हेतु इत्यादि सब विषय वर्णन कर दिये हैं ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने रक्तपित्तनिदानं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः। अथातो गुल्मनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'गुल्मनिदान' का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था १ ॥ १-२ ॥ इह खलु पञ्च गुल्मा भवन्ति । तद्यथा-वातगुल्मः, पित्तगुल्मः, श्लेष्मगुल्मो, निचयगुल्मः, शोणितगुल्मश्चेति ॥ ३ ॥ एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—कथमिह भगवन् ! पञ्चानां गुल्मानां विशेषमभिजानीयाम् नह्यविशेषविद्रोगाणामौष- धविद्पि भिषक् प्रशमनसमर्थो भवतीति ॥ ४ ॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—समुत्थान-पूर्वरूप-लिङ्ग-वेदनोपशय-विशे- षेभ्यो विशेषविज्ञानं गुल्मानां भवत्यन्येषां च रोगाणामग्निवेश ! तत्र खलु गुल्मेषूच्यमानं निबोध ॥ ५ ॥ १. शरीर के भीतर दोष संचित होकर पिण्डाकार होजाते हैं । इससे ये 'गुल्म' कहाते हैं । कुपितानिलमूलत्वाद् गूढमूलोदयादपि । गुल्मवद्वा विशाखत्वाद् गुल्म इत्यभिधीयते ॥ सुश्रुत ॥
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४२६ गुल्म के भेद—गुल्म पांच प्रकार के होते हैं। जैसे ( १ ) वातगुल्म, (२) पित्तगुल्म, ( ३ ) कफगुल्म, ( ४ ) निचयगुल्म और ( ५ ) रक्तगुल्म १ । इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने पूछा कि इन पांच प्रकार के गुल्मों के विषय में विशेष (भेद-ज्ञान) ज्ञान किस प्रकार करूं ? क्योंकि इनके भेदों को सम्पूर्णरूप से जाने बिना, सम्पूर्ण औषध-ज्ञान होने पर भी वैद्य रोगों के शमन करने में समर्थ नहीं होता । भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया—हे अग्निवेश ! उत्पत्ति, पूर्वरूप, लक्षण, वेदना और उपशय इनके भेद से भिन्न-भिन्न गुल्मों का विशेष ज्ञान होता है और इन्हीं साधनों से दूसरे अन्य रोगों का भी पता चलता है। इसलिये गुल्म के लक्षण आदि का वर्णन करते हैं, इसको ध्यान से सुनो और समझो ॥३-५॥ यदा पुरुषो वातलो विशेषेण ज्वर-वमन-विरेचनातीसाराणामन्य- तमेन कर्शनेन कर्शितो वातलमाहारमाहरति शीतं वा विशेषेणातिमात्र- मस्नेहपूर्वं वा वमनविरेचने पिबत्यनुदीर्णां वा छर्दिमुदीरयत्युदीर्णान् वात-मूत्र-पुरीष-वेगान्निरुणद्धत्यत्यशितो वा पिबति नवोदकमतिमात्र- मतिमात्रसंक्षोभिणा वा यानेन यात्यतिव्यवाय-व्यायाम-मद्यरुचिर्वाऽ- भिघातमृच्छति वा विषममशन-शयनासन-स्थान-चङ्क्रमण-सेवी भवत्य- न्यद्वा किंचिदेवंविधं विष२ममतिमात्रं व्यायामजाउमारभते, तस्याप- चाराद्वातः प्रकोपमापद्यते ॥ ६ ॥ वातगुल्म—जब वातप्रकृति का मनुष्य विशेष कर ज्वर, वमन, विरेचन और अतिसार इनमें से किसी एक के कारण कृश हो जाता है, इस स्थिति में जब वह वायुकारक आहार या अति शीतल पदार्थों का सेवन करता है, वा स्नेहन कर्म किये बिना विरेचन का उपयोग करता है, वमन की इच्छा न रहने पर भी बलात्कार से वमन करता है, अधोवायु, मल, मूत्र के उपस्थित वेगों को रोकता है, अधिक भोजन करके नवीन पानी ( बरसात में कुएं आदि का पानी ) अधिक पीता है, बहुत अधिक झकोले वाली गाड़ी वा सवारी से यात्रा करता है, स्त्री-सम्भोग और मद्य के अति उपयोग से, रुचि के अभिघात होने से, विषम स्थिति में बैठने, सोने, चलने या रहने से, इसी प्रकार के अन्य १. इन पांच गुल्मों के सिवाय तीन और भी गुल्म हैं जैसा कि आगे चिकित्सा में कहेंगे—"व्यामिश्रलिङ्गान्परांस्तु गुल्माञ्छीनादिशेद्दोषबकलरनार्थम्' । अर्थात् वातपित्तज, पित्तकफज और वातकफज । इस प्रकार से आठ प्रकार के गुल्म हैं । २. 'विषममतिमात्रं' इति च पाठः ।
४३० चरकसंहिता [ अ० ३ व्यायाम आदि श्रमजनक कार्यों को अधिक मात्रा में करने-से, वायु प्रकुपित हो जाता है ॥ ६ ॥ स प्रकुपितो महास्रोतोऽनुप्रविश्य रौक्ष्यात्कठिनीभूतमाप्लुत्य पिण्डितोऽवस्थानं करोति हृदि वस्तौ पार्श्वयोर्नाभ्यां वा । स शूलमुप- जनयति ग्रन्थींश्चानेकविधान्, पिण्डितश्चावतिष्ठते, स पिण्डितत्वाद् गुल्म इत्युच्यते ॥ ७ ॥ वातगुल्म की सम्प्राप्ति—इस प्रकार से कुपित हुआ वायु महास्रोतों से घुस कर अपने रूक्ष गुण के कारण कठिन होकर कोष्ठ में फैलकर गोल-पिण्डाकार बन जाता है और हृदय, वस्तिभाग, दोनों पार्श्वभाग अथवा नाभि भाग में शूल अथवा अनेक प्रकार की गांठें उत्पन्न कर देता है। वायु गोलाकार बनकर पिण्डाकार होने से 'गुल्म' कहा जाता है। (इसी को 'वायुगोला' कहते हैं, जोकि वातगुल्म का अपभ्रंश है । ) ॥७॥ स मुहुराधमति, मुहुरणुत्वमापद्यते, अनियतविपुलाणुवेदनश्च भवति चलत्वाद्वायोः, पिपीलिकासंप्रचार इवाङ्गेषु, तोद-स्फुरणायाम- संकोच-सुप्ति-हर्ष-प्रलयोदय-बहुलस्तदातुरश्च सूच्येव शङ्कुनेव चाति- विद्धमात्मानं मन्यते, अपि च दिवसान्ते ज्वर्यते शुष्यति चाऽऽस्यम्, उ- च्छ्वासश्चोपरुध्यते । हृष्यन्ति चास्य रोमाणि वेदनायाः प्रादुर्भावे । वातगुल्म के लक्षण—यह वातगुल्म क्षण भर में फैलकर बड़ा हो जाता है और क्षण भर में सिकुड़कर छोटा हो जाता है, इसकी पीड़ा अनिश्चित, कभी अधिक और कभी कम हो जाती है। इसका कारण वायु का चंचल स्वभाव है, शरीर के अवयवों में कीड़ियों के चलने की सी प्रतीति होती है, इसमें तोद (चुभने की सी वेदना), स्फुरण ( धड़कन ), आयाम ( विस्तार ), संकोच (सिकुड़ना), सुप्ति ( स्पर्शज्ञान का अभाव ), हर्ष ( स्पर्शज्ञानका बढ़ना ), प्रलय ( नाश ), उदय ( जन्म ) प्रायः होते हैं अर्थात् कभी तो उत्पन्न होते हैं, और कभी शान्त हो जाते हैं। इस अवस्था में रोगी सुई चुभने या कील आदि से बिंधने का सा अनुभव करता है। सन्ध्याकालमें पीड़ा होती है, रोगी का मुख सूख जाता है, श्वास छुटने या बन्द होने लगता है, वेदना के समय शरीर रोमा- ञ्चित हो जाता है ॥ प्लीहाऽऽटोपान्त्र-कूजनाविपाकोदावर्त्ताङ्गमर्द-मन्या-शिरः-शङ्ख-शूल- ब्रध्नरोगाश्चैनमुपद्रवन्ति, कृष्णारुण-परुषत्वङ्-नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरी- षश्च भवति ।
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४२३
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४२३
प्लीहा, आटोप ( वायु का आध्मान ), आंतो में गुड़-गुड़ ध्वनि, अमेचन,
उदावर्त्त, अंगों का टूटना, मन्याशूल, शिरःशूल, शंखशूल, नख-रोग आदि
नाना उपद्रव होने लगते हैं। रोगी की त्वचा, नख, मुख, मूत्र और मल का
रंग काला या अरुण हो जाता है, तथा ये कर्कश हो जाते हैं।
निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विपरीतानि चोपशेरते—इति
वातगुल्मः ॥ ८ ॥
वातगुल्म के कारणानुकूल आहार-विहार करने से रोग शान्त नहीं होता,
परन्तु रोग के कारण के विपरीत गुणवाले आहार-विहार से रोग शान्त हो
जाता है ! वातगुल्म के ये लक्षण हैं ॥८॥
तैरेव तु कर्शनैः कशितस्याम्ल-लवण-कटुक-क्षारोष्ण-तीक्ष्ण-शुक्त-
ऽव्यापन्न-मद्य-हरित-कफलाम्लानां विदाहिनां च शाक-धान्य-मांसादीना-
मुपयोगादजीर्णाध्यशनाद्रौक्ष्यानुगते चाऽऽमाशये वमनविरेचनमतिवेलं
संधारणं वातातपौ चातिसेवमानस्य पित्तं सह मारुतेन प्रकोपमा-
पद्यते ॥ ६ ॥
बात के साथ पित्त प्रकोप के कारण—वातगुल्म में कहे हुए कारणों से
कर्शित हुआ पुरुष जब खट्टे, नमकीन, कड़वे, क्षार, उष्ण, तीक्ष्ण, शुक्त, सड़े,
खराब हुए, मद्य, या हरी सब्जियां और फल खाता या दाहकारक शाक या
मांस का सेवन करता है, अजीर्ण यां अध्यशन ( भोजन के ऊपर फिर भोजन
करने ). से आमाशय में रूक्षता के उत्पन्न होने से वमन, विरेचन के वेगों को
बहुत देर तक रोकने से, वायु या धूप के अतिसेवन करने से वायु के साथ
पित्त भी कुपित होजाता है ॥ ६ ॥
तत्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संमूच्छ्र्य तानेव वेदनाप्रका-
रानुपजनयति य उक्ता वातगुल्मे, पित्तं त्वेनं विदहति कुक्षौ हृद्युरसि
कण्ठे च, स विदह्यमानः सधूममिवोद्गारमुद्गिरत्यम्लान्वितं, गुल्मा-
वकाशाश्चास्य दह्यते दूयते धूप्यते उष्मायते स्विद्यति क्लिद्यते शिथिल
इव च स्पर्शासहोऽल्परोमाञ्चो भवति । ज्वर-भ्रम-दवथु पिपासा-गल-
वदन-तालु-शोष-प्रमोह-विड्भेदाश्चैनमुपद्रवन्ति, हरित-हारिद्रत्वङ्-नख-
⌈ भवति । निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विप-
रीतानि चोपशेरते—इति पित्तगुल्मः ॥ १० ॥
पित्तगुल्म की सम्प्राप्ति—इस प्रकार से कुपित हुआ पित्त और वायु
आमाशय के एक प्रदेश में मिलकर वातगुल्म में कही हुई वेदनाओं को
४३२ चरकसंहिता [ अ० ३ उत्पन्न करते हैं। १पित्तगुल्म में विशेषता यह है कि प्रकुपित पित्त कुक्षि, हृदय, वक्षःस्थल और कण्ठ इन स्थानों में दाह उत्पन्न करता है। इस दाह के कारण धुंए के समान और खट्टा डकार रोगी को आता है और गुल्म के स्थान में दाह होता है, धूं आ निकलता है, गरमी रहती है, पसीना आता है, क्लिन्नता होती है, शरीर ढीला पड़ा प्रतीत होता है, स्पर्श की असह्यता रहती है और किञ्चित् रोमांच रहता है। ज्वर, भ्रम, दवथु (धक् धक् स्पन्दन), पिपासा, गले मुख और तालु में शुष्कता, मूर्च्छा, मल का पतला आना, ये उपद्रव होजाते हैं। त्वचा, नख, आँख, मूत्र और मल इनका रंग हरा या हल्दी के समान होजाता है। इसके निदान के समान गुण वाली वस्तुओं के उपयोग से रोग बढ़ता है और विपरीत गुणवाली वस्तुओं से कम होता है। यह पित्तगुल्म का वर्णन हुआ ॥ १० ॥ तैरेव तु कर्शनैः कर्शितस्यात्यशनादतिस्निग्ध-गुरु-मधुर-शीताशना- त्पिष्टेक्षु-क्षीर-माष-तिल-गुड-विकृति-सेवनान्मन्दक-मद्यातिपानाद्धरितका- तिप्रणयनादानूपौदक-ग्राम्य-मांसातिभक्षणात्संधारणादतिसुहित्यस्य चाति- ऽवगाढमुदपानात्संक्षोभणाद्वा शरीरस्य श्लेष्मा सह मारुतेन प्रकोप मापद्यते ॥ ११ ॥ वात के साथ कफ-प्रकोप के कारण—वातगुल्म में कहे हुए कारणों से कृश हुए व्यक्ति के अत्यन्त भोजन करने से, अतिस्निग्ध, गुरु, मधुर, शीत पदार्थों के खाने से, पीठी (उड़द आदि को पीसकर), ईख, दूध, उड़द, तिल, गुड़ इनसे बने पदार्थों के अति सेवन से, मन्दक-दही और मद्य के अति- सेवन से, हरे शाक, आनूप या जलचर प्राणियों के अथवा ग्राम्य मांस के अति सेवन से, शरीर को बहुत विक्षोभित करने से, वायु कफ के साथ मिलकर कुपित होजाता है ॥ ११ ॥ तं प्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संमूर्च्छद्य तानेव गाढवेद- नाप्रकारानुपजनयति य उक्ता वातगुल्मे । श्लेष्मा त्वस्य शीतज्वरारो- चकाविपाकाङ्गमर्द-हर्ष-हृद्रोग-च्छर्दि-निद्रालस्य-स्तैमित्य-गौरव-शिरोभि- तापानुपजनयति, अपिच गुल्मस्य स्थैर्य-गौरव-काठिन्यावगाढ-सुप्तताः, १. आमाशय के एकदेश में मूर्च्छित होने से पित्तगुल्म और कफगुल्म बस्ति में नहीं होते। क्योंकि नाभि और स्तनों के बीच के स्थान को आमा- शय कहते हैं। वातगुल्म बस्ति में भी होता है। इसलिये वातगुल्म में 'महास्रोतस्' शब्द पड़ा है। महास्रोतस् शब्द से बस्ति का भी ग्रहण होजाता है।
अ० ३ ] २८ निदानस्थानम् ४३३
अ० ३ ] २८ निदानस्थानम् ४३३ तथा कास-श्वास-प्रतिश्यायान् राजयक्ष्माणं चातिप्रवृद्धः,श्वैत्यं च त्वङ्- नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीषेषूपजनयति । निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, तद्विपरीतानि चोपशेरते—इति श्लेष्मगुल्मः ॥ १२ ॥ कफगुल्म की सम्प्राप्ति—इस प्रकार से कुपित कफ और वायु आमाशय के एक प्रदेश में मिलकर वातगुल्म में कही हुई अनेक प्रकार की तीव्र वेदनायें उत्पन्न करते हैं । प्रकुपित कफ शीतज्वर, अरुचि अविपाक अंगों में वेदना, रोमहर्ष, हृदय-रोग, वमन, निद्रा, आलस्य, स्तिमितता ( भारीपन ), शिर और अंगों में उष्णिमा, ( ताप ) उत्पन्न करता है । इस गुल्म में स्थिरता ( हिलने का अभाव ), भारीपन, कठिनता, स्पर्शज्ञान का एकदम अभाव, ( बधिरता ) रहती है । बहुत बढ़ने पर कास, श्वास, प्रतिश्याय और क्षय रोग उत्पन्न करता है । त्वचा, नख, आंख, मुख, मल, मूत्र, उनका रंग श्वेत हो जाता है । इसके निदान के समान गुण वाले आहार-विहार से रोग बढ़ता है और विपरीत गुणवाली वस्तुओं से कम होता है । यह कफगुल्म का निदान कह दिया है ॥ १२ ॥ त्रिदोष-हेतु-लिङ्ग-सन्निपातात्तु सान्निपातिकं गुल्ममुपदिशन्ति कु- शलाः । स विप्रतिषिद्धोपक्रमत्वादसाध्यो निचयगुल्मः ॥ १३ ॥ सान्निपातिक गुल्म—जिस गुल्म में तीनों दोषों के हेतु और तीनों दोषों के लक्षण मिले होते हैं ; उसको बुद्धिमान् वैद्य 'सान्निपातिक गुल्म' कहते हैं । यह सान्निपातिक गुल्म चिकित्सा में विरोधि होने से चिकित्सा कर्म में असाध्य है ॥ १३ ॥ शोणितगुल्मस्तु खलु स्त्रिया एव भवति; न पुरुषस्य, गर्भकोष्ठार्त- वागमनवैशेष्यात् । पारतन्त्र्याद्वैशारद्यात्सततमुपचारानुरोधाद्वेगानूदीर्णानुपुरुन्धन्त्या आमगर्भे वाऽप्यचिरात्पतितेऽथवाऽप्यचिरप्रजाताया ऋतौ वा वात- प्रकोपणान्यासेवमानायाः क्षिप्रं वातः प्रकोपमापद्यते ॥ १४ ॥ रक्तगुल्म—रक्तगुल्म केवल स्त्रियों को ही होता है, पुरुषों में नहीं होता, क्योंकि स्त्रियों में ही गर्भाशय तथा रजोदर्शन होता है । १स्त्रियां परवश होने से बेगों को रोकती हैं, अशिक्षित होने से, पति आदि की सेवा में तत्पर रहने से और मल मूत्रादि के उपस्थित बेगों को रोकने से, इन कारणों स वा अपक्व १. सामन्यतः रक्त का दूषित होना और दूसरे गुल्मों में भी मिलता है । प्रकार आगे कहेंगे ।
४३४ चरकसंहिता [ अ० ३ गर्भ के गिर जाने से, या बालक प्रसव करने के पीछे अथवा ऋतुकाल में वात- प्रकोपक वस्तुओं के सेवन करने से वायु शीघ्र ही प्रकुपित हो जाता है ॥१४॥ स प्रकुपितो योनिमुखमनुप्रविश्याऽऽर्तवमुपरुणद्धि, मासि मासि तदार्तवमुपरुध्यमानं कुक्षिमभिवर्धयति । तस्याः शूल-कासातीसारच्छ- र्द्यरोचकाविपाकाङ्गमर्द-निद्रालस्य-स्तैमित्य-कफ-प्रसेकाः समुपजायन्ते । स्तनयोश्च स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च काष्ण्यं, ग्लानिश्चक्षुषोर्मूर्च्छा, हृल्लासो, दोहदः, श्वयथुः पादयोरीषदोद्गमो रोमराज्याः, योन्याश्चाटा- लत्वं, अपि च योन्या दौर्गन्ध्यमास्रावश्चोपजायते, केवलञ्चास्या गुल्मः पिण्डित एव स्पन्दते, तामगर्भा' गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः ॥ १५ ॥ रक्तगुल्म की सम्प्राप्ति—यह कुपित वायु योनिमुख में प्रविष्ट होकर आर्तव को रोक देता है। प्रत्येक मास में रुक रुक कर यह आर्तव कोष्ठ को बड़ा कर देता है । इससे स्त्री को शूल, कास, अतीसार, वमन, अरुचि, अविपाक, अंगों का टूटना, निद्रा, आलस्य, कफ का (लार का) मुख से आना, स्तनों में दूध का आना * ओंठ एवं स्तनों के चूचुकों का काला हो जाना, आंखों में ग्लानि, मूर्च्छा, वमन की अभिरुचि, गर्भ के समान अनेक लक्षण, पांव में सूजन, रोमराज़ि में विस्फुरण, योनि का फैल जाना, योनि में दुर्गन्ध आना तथा योनि में से स्राव होना इत्यादि विकार उत्पन्न होजाते हैं। इस प्रकार गुल्म पेट में हिलता है, अज्ञानी लोग गर्भरहित स्त्री को भी गर्भिणी कहने लगते हैं ॥१५॥ एषां तु खलु पञ्चानां गुल्मानां प्रागभिनिवृत्तेरेमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा— अनन्नाभिलषणमरोचकाविपाकावग्निर्वैषम्यं विदाहो भुक्तस्य विपाककाले चायुक्त्या छर्द्युद्गारौ, वातमूत्रपुरीषवेगानाम- प्रादुर्भावः, प्रादुर्भूतानां चाप्रवृत्तिरीषद्रागमनं वा, वातशूलाटोपान्त्र- कूजनापरिकर्षणानिप्रवृत्तपुरीषताऽबुभुक्षा, दौर्बल्यं, सौहित्यस्य चासह- त्वमिति गुल्मपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ १६ ॥
- आर्तव रोग का यह प्रभाव है कि स्तनों में दूध आजाता है। गर्भावस्था में भी आर्तव के रुकने से स्तनों में दूध आता है। गर्भवती स्त्री में जो रस बनता है, उसके तीन कार्य होते हैं। (१) माता के शरीर का पोषण, (२) स्तनों में दूध, (३) बच्चे का पोषण, इसलिये यह आर्तव भी स्तनों में दूध उत्पन्न कर देता है। १. जो स्त्रियां बच्चों के लिये बहुत लालायित रहती हैं उनमें भी ऋतु- धर्म के रुक जाने पर ये लक्षण दीखने लगते हैं। इस अवस्था में यदि सुंघाकर परीक्षा करें तो सिवाय वायु के और कुछ उपलब्ध नहीं होता
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४१५
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४१५ गुल्म का पूर्वरूप-इन पांचो प्रकार के गुल्मों की उत्पत्ति से पूर्व निम्न- लिखित लक्षण होते हैं । यथा-अन्न में अनिच्छा, अरुचि, अविपाक, अग्नि की विषमता ( कभी तेज़ और कभी मन्द ), विदाह ( जलन ), भोजन के पचने के समय जलन, बिना कारण के वमन और डकार आना, अधोवायु, मूत्र व मलों की अप्रवृत्ति अथवा प्रवाहण की प्रवृत्ति होने पर भी मलादि का बाहर न निकलना, अथवा थोड़ा आना, वातशूल, पेट में गुड़-गुड़ाहट, आंतों में अफारा, शरीर में रोमांच, गांठदार मल का आना, भूख का न लगना, कृशता, पेट भर अन्न खाने पर उसका सहन न होना, इत्यादि लक्षण सब प्रकार के गुल्मों के पूर्वरूप हैं ॥ १६ ॥ सर्वेष्वपि च खल्वेतेषु न कश्चिद्वातादृते संभवति गुल्मः ॥ १७ ॥ इन सब प्रकार के गुल्मों का मूलभूत कारण वायु ही है, वायु के बिना कोई भी गुल्म नहीं होता ॥१७॥ तेषां सन्निपातजमसाध्यं ज्ञात्वा नोपक्रमेत । एकदोषजे तु यथा- स्वमारम्भं प्रणयेत् । संसृष्टांस्तु साधारणेन कर्मणोपचरेत् । यच्चान्य- दप्यविरुद्धं मन्येत तदवचारयेद्विभज्य गुरुलाघवमुपद्रवाणां समीक्ष्य, गुरून्उपद्रवांस्त्वरमाणश्चिकित्सेज्जघन्यमितरान् , त्वरमाणस्तु विशेषमनु- पलभ्य गुल्मेष्वात्ययिके कर्मणि वातचिकित्सितं प्रणयेत् , स्नेहस्वेदौ वातहरौ, स्नेहोपसंहितं च मृदुविरेचनं, वस्तींश्चाम्ललवणमधुरांश्च रसान् युक्तितोऽवचारयेत् । मारुते ह्युपशान्ते स्वल्पेनापि प्रयत्नेन शक्योऽन्योपि दोषो नियन्तुं गुल्मेष्विति ॥ १८ ॥ इनमें सन्निपातजन्य गुल्म को असाध्य समझ कर चिकित्सा में हाथ नहीं डालना चाहिये। एक दोष से उत्पन्न गुल्म की यथायोग्य रीति से चिकित्सा करनी चाहिये । दो दोषवाले गुल्मों की चिकित्सा साधारण प्रकार से करनी चाहिये । अथवा वैद्य रोगी के उपद्रवों की गुरुता लघुता को देखकर, दूसरे किसी से चिकित्सा विरुद्ध न पड़े, इस प्रकार से चिकित्सा आरम्भ करनी चाहिये । जो उपद्रव गुरु हों, उनकी तत्काल चिकित्सा करनी चाहिये और जो उपद्रव कम हों, उन की पीछे से चिकित्सा करनी चाहिये । जिस गुल्म में कुछ पता न चलता हो या काम ज़रूरी या जल्दी करना हो तो प्रथम वायु की चिकित्सा करनी चाहिये । क्योंकि वायु को शान्त करने के लिये स्नेहन, मृदु विरेचन, बस्तिकर्म, खट्टा, नमकीन और मधुर रस युक्तिपूर्वक देने चाहिये । वायु के । होजाने पर थोड़े से परिश्रम से दूसरे दोष भी सुगमता से वश में किये जा सकते हैं ॥ १८ ॥
४१६ चरकसंहिता [ अ० ४
भवति चात्र—
गुल्मिनाम निलशान्तिरुपा यैः सर्वशो विधिवदाचरितव्या ।
मारुते ह्यवजितेऽन्यमुदीर्णं दोषमल्पमपि कर्म निहन्यात् ॥ १६ ॥
गुल्मरोग में वायु को शान्त करने के लिये सम्पूर्ण विधि काम में लानी
चाहिये । क्योंकि वायु को शान्त न करने पर दूसरा थोड़ा सा बढ़ा हुआ दोष
भी सम्पूर्ण किये कराये पर पानी फेर देता है ॥ १६ ॥
तत्र श्लोकाः—संख्या निमित्तं रूपाणि पूर्वरूपमथापि च ।
दृष्टं निदाने गुल्मानामेकदेशश्च कर्मणाम् ॥ २० ॥
इस गुल्म निदान में गुल्मों की संख्या, कारण, पूर्वरूप और चिकित्सा
कह दी हैं ॥ २० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने गुल्मनिदानं
नाम तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथातः प्रमेहनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे प्रमेह-निदान का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥२॥
त्रिदोषप्रकोपानिमित्ता विंशतिः प्रमेहा भवन्ति, विकाराश्चापरेऽ-
परिसंख्येयाः । तत्र यथा त्रिदोषप्रकोपः प्रमेहानभिनिर्वर्तयति तथाऽ-
नुव्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥
प्रमेहों की संख्या—वात आदि तीनों दोषों से उत्पन्न होने वाले प्रमेह बीस
प्रकार के हैं, इनके सिवाय दूसरे रोग असंख्य हैं । त्रिदोष के कोप से प्रमेह
किस प्रकार उत्पन्न होते हैं इसका आगे वर्णन करते हैं ॥३॥
इह खलु निदान-दोष-दूष्य-विशेषेभ्यो विकार-विघात-भावाभाव-
प्रतिविशेषा भवन्ति ॥ ४ ॥
निदान, दोष और दूष्य इनके विशेष-भेदों को लेकर रोगों के विघात
अर्थात् रोग का देर में होना, थोड़ा या अधिक विकार होना आदि
भाव-विशेष उत्पन्न होते हैं । इस सूत्रात्मक सिद्धान्त को विस्तार
कहते हैं ॥४॥
अ० ४] निदानस्थानम् ४३७
अ० ४] निदानस्थानम् ४३७
यदा ह्येते त्रयो निदानादिविशेषाः परस्परं नानुबध्नन्ति, अथवा वा कालप्रकर्षाद्बवलीयांसो वाऽनुबध्नन्ति न तदा विकाराभिनिर्वृत्तिः, चिराद्वाऽप्यभिनिर्वर्तन्ते, तनवो वा भवन्त्यथवाऽप्ययथोक्तसर्वलिङ्गाः । विपर्यये विपरीताः; इति सर्वविकार-विघात-भावाभाव-प्रतिविशेषाभि- निर्वृत्त हेतुर्भवत्युक्तः ॥ ५ ॥ रोगों के उत्पन्न होने और न होने का कारण—निदान दोष और दूष्य भावों की भिन्नता से रोग उत्पन्न होते हैं और नहीं भी उत्पन्न होते हैं । जब निदानादि ये तीनों परस्पर नहीं मिलते, अथवा लम्बे समय पीछे मिलते हैं, या निर्बल अवस्था में मिलते हैं, तब रोग उत्पन्न नहीं होता, यदि उत्पन्न भी होता है तो देर में उत्पन्न होता है या निर्बल रूप में या अपूर्ण लक्षणों के साथ उत्पन्न होता है । परन्तु जब निदान, दोष और दूष्य परस्पर समानरूप में मिलते हैं, तब शीघ्र, बलवान् एवं सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त रोग उत्पन्न होता है । सब रोगों की उत्पत्ति में निदान दोष और द्रव्य का होना या न होना कारण होता है ॥५॥ तत्रेमे त्रयो निदानादिविशेषाः श्लेष्मनिमित्तानां प्रमेहाणामाश्र्व- भिनिर्वृत्तिकरा भवन्ति । तद्यथा-हायनक-यवक-चीनकोद्दालक-नैषधै- त्कट-मुकुन्दक-महाव्रीहि-प्रमोदक-सुगन्धकानां नवानामतिवेलमतिप्रमा- णेनोपयोगः, तथा सर्पिष्मतां नवहरेणुमाषसूप्यानां ग्राम्यानूपौदकानां च मांसानां शाक-तिल-पलल-पिष्टान्न-पायस-कृशर-विलेपीक्षुविकाराणां क्षीर-मन्दक-दधि-द्रव-मधुर-तरुणप्रायाणामुपयोगो, मृजा-व्यायाम-वर्जनं, स्वप्नशयनासनप्रसङ्गो यश्च कश्चिद्विधिरन्योऽपि श्लेष्म-मेदो-मूत्र-सञ्जननः स सर्वो निदानविशेषः ॥ ६ ॥ कफजन्य प्रमेह में निदानादि की भिन्नता—निम्न कारणों से कफजन्य प्रमेह मुख्यतः उत्पन्न होता है । यथा हायनक ( धान्य विशेष ), यवक (जौ ), चीनक, उद्दालक, नैषध, इत्कट, मुकुन्दक, महाव्रीहि, प्रमोदक, सुगन्धक इत्यादि जाति के चावलों को अतिमात्रा में वा नूतन चावलों का उपयोग करने से, इसी प्रकार घी के साथ हरेणु ( मटर ), उड़द की दाल, ग्राम्य या आनूप अथवा जलचर प्राणियों का मांस अधिक खाने से, भाजी, तिल, मांस, पिष्टो से बने पदार्थ खीर, खिचड़ी, विलेपी गाढ़ी कांजी), ईखे के रस से बनी वस्तुओं के अति उपयोग करने से, दूध, मन्दक, दही, द्रव, मधुर पदार्थ या नवीन धान्यों के अति उपयोग करने से, शरीर का शोधन न करने से, अंगों को परिचालन न करने से, सोने, बैठने या
[Header: ४५८ चरकसंहिता [ अ० ४ ]
बैठे रहने से, अथवा कफ, मेद व मूत्र को बढ़ाने वाला जो भी कारण होता है वे सब प्रमेहों के विशेष कारण हैं ॥६॥ बहुद्रवः श्लेष्मा दोषविशेषः ॥ ७ ॥ बह्वबद्धं मेदोमांसं शरीरजक्लेदः शुक्रं शोणितं च वसा मज्जा लसीका रसश्चौजःसंख्यात इति दूष्यविशेषाः ॥ ८॥ कफप्रमेह के दूष्य — बहुत तरल ( द्रव ) कफ इसमें दोष होता है, बहुत अबद्ध ( असंहत अर्थात् ढीला-शिथिल ) मेद मांस, शरीरजन्य क्लेद, शुक्र, शोणित, वसा, मज्जा, लसीका, रस और ओज ये दूष्य विशेष हैं अर्थात् इनमें ही दोष अपना बुरा प्रभाव उत्पन्न करता है१ ॥८॥ त्रयाणामेषां निदानादिविशेषाणां सन्निपाते क्षिप्रं श्लेष्मा प्रको- पमापद्यते प्रागभिभूयस्त्वत् , स प्रकुपितः क्षिप्रमेव शरीरे विसृतिं लभते, शरीरशैथिल्यात्स विसर्पञ्छरीरे मेदसैवादितो मिश्रीभावं गच्छति, मेदसश्चैव बह्वबद्धत्वान्मेदसश्च गुणानां गुणैः समानगुणभूयि- ष्ठत्वात्स मेदसा मिश्रीभावं गच्छन् दूषयत्येनद्विकृतत्वात् , स विकृतो दुष्टेन मेदसोपहितः शरीरक्लेदमांसाभ्यां संसर्गं गच्छति, क्लेदमांसयोर- तिप्रमाणाभिवृद्धत्वात् स मांसे मांसप्रदोषात्पूतिमांसपिडकाः शरा- विकाकच्छपिकाद्याः संजनयति, अप्रकृतिभूतत्वात्, शरीरक्लेदं पुन- र्दूषयन्मूत्रत्वेन परिणमयति । मूत्रवहानां च स्रोतसां वङ्क्षणबस्ति- प्रभवाणां मेदःक्लेदोपहितानि गुरूणि मुखान्यासाद्य प्रतिरुध्यते; ततस्तेषां स्थैर्यमसाध्यतां वा जनयति, प्रकृतिविकृतिभूतत्वात् ॥ ६॥ कफप्रमेह की सम्प्राप्ति—निदान, दोष और दूष्य इन तीनों के मिलने से कफ शीघ्र कुपित हो जाता है। क्योंकि रोग उत्पत्तिकाल में कफ अधिक बढ़ा होता है। इस प्रकार से कुपित कफ जल्दी ही शरीर में फैल जाता है। शरीर के शिथिल होने से फैलता हुआ यह कफ सबसे प्रथम शरीर में मेद के साथ १. प्रमेह में सब से प्रथम कफ का ही बिगाड़ होता है । इसलिये यह तो दोष है, और सप्तधातु, रस, रक्त, मांस आदि ये इससे दूषित होते हैं, इसलिये ये दूष्य हैं। इस अवस्था में जिस अपर ओज का परिमाण आधा अञ्जलि कहा है, वह ओज भाग विकृत होता है । क्लेद रक्त का तरल भाग है जिसके दूषित होने से मधुमेह रोगी के व्रण शीघ्र अच्छे नहीं होते। शरीर में त्वचा के नीचे रहने वाला पतला श्वेत, चिकना पदार्थ है जो की रक्षा करता है। ये सब दूष्य हैं।
मिलता है। क्योंकि मेद बहुत अबद्ध अर्थात् शिथिल रूप में होता है। तथा मेद के गुणों के समान गुण ही कफ के हैं और शरीर में मेद का परिमाण भी बहुत है। मेद के साथ मिलकर कफ अपने आप दूषित होने से इस को भी दूषित बना देता है। यह विकृत कफ दुष्ट मेद के साथ मिलकर शरीर के क्लेद भाग और मांस के साथ मिल जाते हैं। शरीर में क्लेद और मांस बहुत मात्रा में बढ़े होते हैं। यह मांस को दूषित करके मांस में उत्पन्न होने वाली पिडकायें, शराविका, कच्छपिका आदि को उत्पन्न करता है। क्योंकि कफ अपनी प्रकृति में नहीं रहता, इसलिये अपनी शक्ति से इनको उत्पन्न करता है। शरीर के क्लेद को दूषित करके मूत्र रूप में बदल देता है। वंक्षण सन्धि तथा बस्ति से उत्पन्न होने वाले मूत्र वह स्रोतों के मुख मेद और क्लेद के भारी होने से बन्द हो जाते हैं। इसलिये इनमें प्रमेह टिक जाता है। या बहुत बढ़कर असाध्य बन जाता है। क्योंकि कफ, मेद और वसा में समान है, परन्तु रक्तादि में असमान होता है; इसलिये प्रकृति विकृति होने से प्रमेह स्थिर बन जाते हैं या असाध्य हो जाते हैं ॥९॥ शरीरक्लेदस्तू श्लेष्म-मेदो-मिश्रः प्रविशन्मूत्राशयं मूत्रत्वमापद्यमानः श्लैष्मिकैरेभिर्दशभिर्गुणैरुपसृज्यते वैषम्ययुक्तः । तद्यथा—श्वेत-शीत- मूर्त-पिच्छिलाच्छ-स्निग्ध-गुरु-प्रसाद-मधुर-सान्द्र-मन्दैः; अत्र येन गुणेनैकेनानेकेन वा भूयस्तरमुपसृज्यते तत्समाख्यं गौणं नामविशेषं प्राप्नोति ॥१०॥ शरीर की आर्द्रता कफ और मेद से मिलकर मूत्राशय में प्रवेश करती है। वहां पर मूत्ररूप होकर विषमतावाले कफ के दस गुणों के साथ मिल जाती है। कफ के दस गुण-श्वेत, शीतल, मूर्त, पिच्छिल, स्निग्ध, गुरु, प्रसाद, मधुर, सान्द्र और मन्द, इनमें से एक गुण की या अनेक गुणों की प्रधानता होने से उसी के अनुसार सामान्य या विशेष नाम मिलता है ॥१०॥ ते तु खल्विमे दश प्रमेहा नामविशेषेण भवन्ति । तद्यथा—उदक- मेहश्चेक्षुवालिकाऱसमेहश्च, सान्द्रमेहश्च, सान्द्रप्रसादमेहश्च, शुक्लमेहश्च, शुक्रमेहश्च, शीतमेहश्च, सिकतामेहश्च, शनैर्मेहश्चाऽऽलाढमेहश्चेति ॥११॥ ते दश प्रमेहाः साध्याः समानगुणमेदाःस्थानत्वात्कफस्य प्राधान्या- त्क्रियत्वाच्च ॥ १२॥ कफजन्य दस प्रमेह—इस प्रकार से कफजन्य प्रमेह दस प्रकार के हैं। नाम (१) उदकमेह, (२) इक्षुवालिकारसमेह, (३) सान्द्रमेह, (४) सान्द्र-
४४० चरकसंहिता [ अ० ४ ]
प्रसादमेह, (५) शुक्लमेह, (६), शुक्रमेह, (७) शीतमेह (८) सिकतामेह (६) शनैर्मेह और (१०) आलालमेह । ये कफजन्य दस प्रमेह साध्य हैं। क्योंकि कफ और मेद के गुण एवं स्थान समान हैं, तथा कफ की प्रधानता होने से और कफ और मेद की चिकित्सा के समान होने से कफप्रमेह साध्य है ॥ १२॥ तत्र श्लोकाः श्लेष्मप्रमेहविज्ञानार्था भवन्ति । कफप्रमेहों को बताने के लिये श्लोक कहते हैं— अच्छं बहुसितं शान्तं निर्गन्धमुदकोपमम् । श्लेष्मकोपान्नरो मूत्रमुदमेही प्रमेहति ॥ १३ ॥ अत्यर्थमधुरं शीतमीषत्पिच्छिलमाविलम् । काण्डेक्षुरससंकाशं श्लेष्मकोपात्प्रमेहति ॥ १४ ॥ यस्य पर्युषितं मूत्रं सान्द्रीभवति भाजने । पुरुषं कफकोपेन तमाहुः सान्द्रमेहिनम् ॥ १५ ॥ यस्य संहन्यते मूत्रं किंचित् किंचित्प्रसीदति । सान्द्रप्रसादमेहीति तमाहुः श्लेष्मकोपतः ॥ १६ ॥ शुक्लं पिष्टनिभं मूत्रमभीक्ष्णं यः प्रमेहति । पुरुषं कफकोपेन तमाहुः शुक्लमेहिनम् ॥ १७ ॥ शुक्राभं शुक्रमिश्रं वा मुहुर्मेहति यो नरः । शुक्रमेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १८ ॥ अत्यर्थशीतमधुरं मूत्रं मेहति यो भृशम् । शीतमेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १६ ॥ मूर्तान्मूत्रगतान्दोषानणन्मेहति यो नरः । सिकतामेहिनं विद्यान्नरं तं श्लेष्मकोपतः ॥ २० ॥ मन्दं मन्दमवेगं तु कृच्छ्रं यो मूत्रयेच्छनैः । शनैर्मेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ २१ ॥ तन्तुबद्धमिवाऽऽलालं पिच्छिलं यः प्रमेहति । आलालमेहिनं विद्यात्तं नरं श्लेष्मकोपतः ॥ २२ ॥ (१) उदकमेह—उदकमेह का रोगी कफ के प्रकोप के कारण बहुत स्वच्छ, बहुत सफेद, शीतल, बिना गन्ध का, पानी के समान मूत्र करता है यह उदक- मेह के लक्षण हैं।
- मूत्रमार्ग से शुक्र का मूत्र से पृथक् रूप में जाना यह शुक्रदोष इसका प्रमेह में अन्तर्भाव नहीं होता ।
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४४१
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४४१
(२) इक्षुबालिकारसमेह— कफ के प्रकोप से अतिशय मधुर, शीतल, थोड़ा चिकास वाला, मैला, अस्वच्छ, गन्ने के रस के समान मूत्र करता है । यह 'इक्षुमेह' का रोगी है । (३) सान्द्रमेह— पहिले दिन का बरतन में रखा हुआ जिसका मूत्र, कफके कारण दूसरे दिन गाढ़ा हो जाता है, उसको 'सान्द्रमेह का रोगी समझना चाहिये । (४) सान्द्र-प्रसादमेह— कफप्रकोप के कारण मूत्र ऊपर जम जाये और नीचे थोड़ा-थोड़ा पतला रहे तो 'सान्द्रप्रसाद मेह' का रोगी समझना चाहिये । (५) शुक्लमेह— कफप्रकोप के कारण जो मनुष्य श्वेत, पिष्ठी के समान मूत्र बार बार करता है उसको 'शुक्लमेह' का रोगी समझना चाहिये । (६) शुक्रमेह— कफप्रकोप के कारण जो मनुष्य शुक्र के समान, या शुक्र से मिला, मूत्र बार-बार करता है उसको 'शुक्रमेह' का रोगी समझना चाहिये । (७) शीतमेह— जो मनुष्य कफप्रकोप से अत्यन्त शीतल, मीठा-मूत्र अधिकतर करता है, उसको 'शीतमेह' का रोगी जानना चाहिये । (८) सिकतामेह— कफप्रकोप से जब मनुष्य के मूत्र में सूक्ष्म, बालू के समान छोटे छोटे कठिन कण जाने लगते हैं, तब उसे 'सिकता-मेह' का रोगी समझना चाहिये । (९) शनैर्मेह— जब मनुष्य कफ के प्रकोप से धीरे-धीरे, बिना वेग के, कठिनाई से, मूत्र करता हो तब इसको शनैर्मेह का रोगी समझना चाहिये । (१०) आलाह्लमेह—जो मनुष्य कफ के प्रकोप से तारवाला या लार के समान चिकना मूत्र करता है तो इसको 'आलाह्लमेह' का रोगी समझना चाहिये ॥ १३-२२ ॥ इत्येते दश प्रमेहाः श्लेष्मप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ इस प्रकार से कफ के प्रकोप से उत्पन्न होने वाले दस प्रकार के प्रमेहों का वर्णन कर दिया है । उष्णाम्ल-लवण-क्षार-कटुकाजीर्ण-भोजनोपसेविनस्तथाऽतितीक्ष्णा- तपाग्नि-संताप-श्रम-क्रोध-विषमाहारोपसेविनश्च तथाऽऽत्मकशरीरस्यैव क्षिप्रं पित्तं प्रकोपमापद्यते ॥ २३ ॥ तत्प्रकुपितं तयैवाऽऽनुपूर्व्या प्रमेहानिमान् षट् क्षिप्रमभिनिर्वर्त- यति ॥ २४ ॥ तेषामपि च पित्तगुणविशेषेण नामविशेषा पूर्ववद् युक्ता भवन्ति । यथा— क्षारमेहश्च, कालमेहश्च, नीलमेहश्च, लोहितमेहश्च, मञ्जिष्ठा- मेहश्च, हारिद्रमेहश्चेति । ते षड्भिरेतैः क्षाराम्ल-लवण-कटुक-विस्त्रोष्णैः
दोष-मेदः-स्थानत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्चेति ॥ २५ ॥
४४२ चरकसंहिता [ अ० ४ पित्तगुणैः पूर्ववत्ससम्बन्धा भवन्ति । सर्वे एव च ते याप्याः, संसृष्ट- दोष-मेदः-स्थानत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्चेति ॥ २५ ॥ पित्तप्रमेह के कारण और सम्प्राप्ति—उष्ण, अम्ल, लवण, क्षार, वा कटु पदार्थों के अति सेवन करने से, अजीर्णावस्था में भोजन करने से, तीव्र धूप, अग्नि, सन्ताप, श्रम, क्रोध वा विषम भोजन के सेवन से, पित्त प्रकृतिवाले पुरुष में पित्त शीघ्रता से प्रकुपित हो जाता है । यह प्रकुपित पित्त, पूर्व वर्णित प्रकार से ही छः प्रकार के प्रमेह उत्पन्न करता है । पित्तजन्य प्रमेह—छः प्रकार के प्रमेह भी, कफप्रमेह के समान ही पित्त के गुण के अनुसार भिन्न २ नाम वाले होते हैं । जैसे—( १ ) क्षारमेह, ( २ ) कालमेह, ( ३ ) नीलमेह, ( ४ ) लोहितमेह, ( ५ ) मञ्जिष्ठामेह और ( ६ ) हारिद्रमेह । ये छः प्रकार के प्रमेह पूर्ववत् क्षार, लवण, कटु, अम्ल, विस्र (दुर्गन्ध) और उष्ण इन पित्त के गुणों से युक्त होते हैं। ये पित्तजन्य प्रमेह सब के सब याप्य हैं। क्योंकि पित्त और मेद इनका स्थान समीप, एवं धर्म परस्पर विरुद्ध हैं, एवं चिकित्सा भी परस्पर विरोधी हैं *॥२३-२५॥ तत्र श्लोकाः पित्तप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति— पित्त प्रमेह को बताने के लिये ये निम्न लिखित श्लोक कहे हैं— गन्धवर्णरसस्पर्शैर्यथा क्षारस्तथात्मकम् । पित्तकोपान्नरो मूत्रं क्षारमेही प्रमेहति ॥ २६ ॥ मसीवर्णमसक्तं यो मूत्रमुष्णं प्रमेहति । पित्तस्य परिकोपेन तं विद्यात्कालमेहिनम् ॥ २७ ॥ चाषपक्षनिभं मूत्रं मन्दं मेहति यो नरः । पित्तस्य परिकोपेन तं विद्यान्नीलमेहिनम् ॥ २८ ॥ विस्रं लवणमुष्णं च रक्तं मेहति यो नरः । पित्तस्य परिकोपेन तं विद्याद्रक्तमेहिनम् ॥ २९ ॥ मञ्जिष्ठारूपि योऽजस्रं भृशं विस्रं प्रमेहति । पित्तस्य परिकोपात्तं विद्यान्माञ्जिष्ठमेहिनम् ॥ ३० ॥
- पित्त का स्थान आमाशय, और मेद का वसाबहुल स्थान आमाशय का एक प्रदेश है । इसलिये दोष एवं दूष्य के नित्यप्रति पास में रहने से याप्य है । पित्त को शान्त करने वाले जो मधुर, शीत आदि पदार्थ हैं, वे मेद लिये अपथ्य हैं और जो मेद के लिये कटु रस आदि वस्तु पथ्य हैं, वे पित्त लिये अपथ्य हैं । इसलिये चिकित्सा परस्पर विरोधी पड़ जाती है ।