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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

कषायवर्ग है ।

अदरक ), अम्लवेतस, मरिच ( काली मिरच ), अजमोदा ( अजवायन ), भल्लातकास्थि ( भिलावे के बीज ), हिंगु-निर्यास ( हींग ), ये दस ‘दीपनीय’ अर्थात् भूख लगाने वाले अग्नि संदीपक हैं ॥ यह छः का बना हुआ कषायवर्ग है । ऐन्द्रयृषभ्यतिरसर्ष्यप्रोक्ता-पयस्याश्वगन्धा-स्थिरा-रोहिणी-बलाति- बला इति दशेमानि बल्यानि भवन्ति ॥ (७)॥ ऐन्द्री, ऋषभी ( कौंच ), अतिरसा ( शतावरी ), ऋष्यप्रोक्ता ( माषपर्णी ), पयस्या ( विदारी ), अश्वगन्धा ( असगन्ध ), स्थिरा ( शालपर्णी ), रोहिणी (कटुकी), बला ( खरैंटी ), अतिबला ( पीतबला ), ये दस 'बल्य' अर्थात् बल कारक हैं ॥ चन्दन-तुङ्ग-पद्मकोशीर-मधुक-मञ्जिष्ठा-सारिवा-पयस्या-सिता- लता इति दशेमानि वर्ण्यानि भवन्ति ॥ (८) ॥ चन्दन ( लाल चन्दन ), तुंग ( लाल नाग केशर ), पद्मक ( पद्माख ), उशीर ( खस ), मधुक ( मुलहठी ), मञ्जिष्ठा ( मजीठ ), सारिवा (अनन्तमूल), पयस्या (विदारी कन्द), सिता (सफेद दूब), और लता १ (लाल दूब या प्रियंगु), ये दस ‘वर्ण्य’ अर्थात् वर्णकारक, वर्ण बढ़ाने वाले हैं ॥ सारिवेक्षुमूल-मधुक-पिप्पली-द्राक्षा-विदारी-कैडर्य-हंसपदी-बृहती- कण्टकारिका इति दशेमानि कण्ठ्यानि भवन्ति ॥ ( ९ ) ॥ सारिवा ( अनन्तमूल ), इक्षुमूल ( ईख की जड़ ), मधुक ( मुलहठी ), पिप्पली, द्राक्षा ( किशमश ), विदारी कन्द, कैडर्य ( नीम ), हंसपदी ( मण्डू- कर्णी या ब्राह्मी ), बृहती ( बड़ी कटेरी ), कण्टकारिका ( छोटी कटेरी ), ये दस औषधियां 'कण्ठ्य' स्वर के लिये हितकारी हैं ॥ आम्राम्रातक-निकुच-करमर्द-वृक्षाम्लाम्लवेतस-कुवल-बदर-दाडिम- मातुलुङ्गानीति दशेमानि हृद्यानि भवन्ति ॥ (१०) ॥ इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ [२] ॥ आम्र ( आम ), आम्रातक ( अम्बाड़ा ), निकुच ( बडु बड़इल ), करमर्द ( करञ्ज ), वृक्षाम्ल ( इमली ); अम्लवेतस, कुवल ( बड़ा बेर ), बदर ( झाड़ी का बेर ), दाडिम ( अनार ), मातुलुंग ( बिजौरा ), ये दस ‘हृद्य’ अर्थात् हृदय के लिये हितकारी हैं ॥ यह चार से बना हुआ कषायवर्ग है । १. जल्पकल्पतरु में 'लता' का अर्थ मंजीठ किया है, परन्तु मंजीठ का कथन भी इसमें है, अतः दूब अर्थ ही उचित है ।

५२ चरकसंहिता [ अ० ४

नागर-चित्रक-चव्य-विडङ्ग-मूर्वा-गुडूची-वचा-मुस्त-पिप्पली-पटोला- नीति दशेमानि तृप्तिघ्नानि भवन्ति ॥ ( ११ ) ॥ नागर (सोंठ), चित्रक (चीतामूल), चव्य (चविका), विडंग (वायविडंग), मूर्वा (मोरवेल), गुडूची (गिलोय), वचा (वच), मुस्त (नागर मोथा), पिप्पली, पटोल (परवल) ये दस 'तृप्तिघ्न' अर्थात् श्लेष्मा जनित तृप्ति को नाश करने वाली हैं ॥ कुटज-बिल्व-चित्रक-नागरातिविषाभया-धन्वयासक-दारुहरिद्रा-वचा- चव्यानीति दशेमान्यर्शोघ्नानि भवन्ति ॥ ( १२ ) ॥ कुटज (कुड़ा), बिल्व (बेलगिरी), चित्रक (चीतामूल), नागर (सोंठ), अतिविषा (अतीस), अभया (बड़ी हरड़), धन्वयासक (धमासा), दारु- हरिद्रा (दारुहल्दी), वच और चव्य (चविका) ये दस औषधियां 'अर्शोघ्न' अर्थात् बवासीर रोग के नाशक हैं ॥ खदिराभयामलक-हरिद्रारुष्कर-सप्तपर्णारग्वध-करवीर-विडङ्ग-जा- तिप्रवाला इति दशेमानि कुष्ठघ्नानि भवन्ति ॥ ( १३ ) ॥ खदिर (खैर), अभया (जंगी हरड़), आमलक (आंवला), हरिद्रा- (हल्दी), अरुष्कर (भिलावा), सप्तपर्ण (सातवन), आरग्वध (अमलतास), करवीर (कनेर), विडंग (वायविडंग), और जातिप्रवाल (चमेली के नवीन कोमल पत्ते) ये दस कुष्ठघ्न अर्थात् कोढ़ रोग के नाशक हैं ॥ चन्दन-नलद-कृतमाल-नक्तमाल-निम्ब-कुटज-सर्षप-मधुक-दारुहरि- द्रा-मुस्तानीति दशेमानि कण्डूघ्नानि भवन्ति ॥ ( १४ ) ॥ चन्दन (लाल चन्दन), नलद (जटामांसी), कृतमाल (अमलतास) नक्त- माल (करंज), निम्ब (नीम के पत्ते), कुटज (कूड़े की छाल), सर्षप (सरसों), मधुक (मुलैहटी), दारु हरिद्रा (दारु हल्दी), और मुस्त (नागर मोथा), ये दस औषधियां 'कण्डूघ्न' अर्थात् खाज नाशक हैं ॥ अक्षीव-मरिच-गण्डीर-केबुक-विडङ्ग-निर्गुण्डी-किणिही-श्वदंष्ट्रा-वृष- पर्णिकाखुपर्णिका इति दशेमानि क्रिमिघ्नानि भवन्ति ॥ ( १५ ) ॥ अक्षीव (सहजन), काली मरिच, गण्डीर (जिमीकन्द), केबुक, विडंग (वायविडंग), निर्गुण्डी (सम्भालु), किणिही (अपामार्ग), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), वृषपर्णी, आखुपर्णिका (मूसाकानी), ये दस कृमिघ्न अर्थात् कृमिनाशक हैं ॥

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५३

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५३ हरिद्रा-मञ्जिष्ठा-सुवहा-सूक्ष्मैला-पालिन्दी-चन्दन-कतक-शिरीष- सिन्धुवार-श्लेष्मातका इति दशेमानि विषघ्नानि भवन्ति ॥ ( १६ ) ॥ इति षट्कः कषायवर्गः ॥ [ ३ ] ॥ हरिद्रा ( हल्दी ), मञ्जिष्ठा ( मंजोट ) सुवहा (निशोथ), सूक्ष्मैला ( छोटी इलायची ), पालिन्दी (काली निशोथ), चन्दन (लाल चन्दन), कतक ( निर्मली का जल को शोधन करने वाला फल ), शिरीष ( सिरस ), सिन्धुवार (सम्भालु, निर्गुण्डी ), श्लेष्मातक ( लिसाड़ा ), ये दस 'विषघ्न' अर्थात् विषनाशक हैं ॥ यह छः से बना हुआ कषायवर्ग है । वीरण-शालि-षष्टिकेशुवालिका-दर्भ-कुश-काश-गुन्द्रेत्कट-कत्तृण-मूला- नीति दशेमानि स्तन्यजननानि भवन्ति ॥ ( १७ ) ॥ वीरण ( खस ), शालि ( हेमन्त ऋतु में पकने वाले धान्य का चावल ), षष्टिक (साटी चावल), ईक्षुवालिका ( ईख ), दर्भ ( दाभ ), कुश ( कुशा ), काश ( सरकण्डा ), गुन्द्रा ( होंगला ) इत्कट, ( तृण विशेष ) कत्तृण ( रोहिष तृण ) ये दस 'स्तन्य-जनन' अर्थात् दूध बढ़ाने वाले हैं। इन में गिलोय को छोड़कर सब के मूल काम में लाने चाहिये ॥ पाठा-महौषध-सुरदारु-मुस्त-मूर्वा-गुडूची-वत्सक-फल-किराततिक्त- क-कटुरोहिणी-सारिवा इति दशेमानि स्तन्यशोधनानि भवन्ति ॥(१८)॥ पाठा ( पाढ़ल ), महौषध ( सोंठ ), सुरदारु ( देवदारु ), मुस्त ( नागर- मोथा ), मूर्वा ( मोर बेल ), गुडूची ( गिलोय ), वत्सक फल ( इन्द्र जौ ), किराततिक्तक ( चिरायता ), कटुरोहिणी ( कटुकी ), सारिवा ( अनन्त मूल ) ये दस 'स्तन्यशोधन' दूध को शुद्ध करने वाले हैं ॥ जीवकर्षभक-काकोली-क्षीरकाकोली-मुद्गपर्णी-माषपर्णी-मेदा-वृद्ध- रुहा-जटिला-कुलिङ्गा इति दशेमानि शुक्रजननानि भवन्ति ॥( १९ )॥ जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीर काकोली, मुद्गपर्णी ( मूंगपर्णी ) माष- पर्णी ( उड़दपर्णी ); मेदा, वृद्धरुहा ( शतावरी ), जटिला ( जटामांसी ), कुलिंग ( उतंगण ) ये दस 'शुक्रजनन' अर्थात् वीर्य-धातु के वर्धक होते हैं १ ॥ १. ( क ) जीवक ऋषभक, मेदा महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि वृद्धि इन के स्थान पर परिभाषा आदेश से, शतावरी, विदारीकन्द अश्वगन्धा और वाराही कन्द प्रयोग करने चाहियें । ( ख ) कुलिंगशब्द धन्व- न्तरि निघण्टु में, 'विष्किर'पक्षियो के लिये और समार्थकों में दूर्वा के लिये आया है ।

इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ [ ४ ] ॥

५४ चरकसंहिता [ अ० ४ कुष्ठैलवालुक-कट्फल-समुद्रफेन-कदम्ब-निर्यासेक्षु-काण्डेक्ष्विक्षुरक- वसुकोशीराणीति दशेमानि शुक्रशोधनानि भवन्ति ॥ ( २० ) ॥ इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ [ ४ ] ॥ कुष्ठ ( कूठ ), एलवालुक, कट्फल ( कायफल ), समुद्रफेन, कदम्ब निर्यास, इक्षु ( गन्ना ), काण्डेक्षु ( मोटा गन्ना ), इक्षुरक ( तालमखाना ); बसुक ( बक- पुष्प ), और उशीर ( खस की जड़ ) ये दस ‘शुक्रशोधन’ अर्थात् वीर्य-धातु को शुद्ध करने वाले हैं॥ यह चार का बना हुआ कषाय वर्ग है । मृद्वीका-मधुक-मधुपर्णी-मेदा-विदारी-काकोली-क्षीरकाकोली-जीवक- जीवन्ती-शालपर्ण्य इति दशेमानि स्नेहोपगानि भवन्ति ॥ ( २१ ) ॥ मृद्वीका ( बड़ी दाख ), मधुक ( मुलहटी ), मधुपर्णी ( गिलोय ), मेदा, विदारी ( विदारी कन्द ), काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, जीवन्ती, शालपर्णी ये दस 'स्नेहोपग' अर्थात् शरीर में कोमलता और चिकनाई उत्पन्न करनेमें सहायक हैं॥ शोभाञ्जनकैरण्डार्क-वृश्चीर-पुनर्नवा-यव-तिल-कुलत्थ-माष-बदरा- णीति दशेमानि स्वेदोपगानि भवन्ति ॥ ( २२ ) ॥ शोभांजन ( सहजन ), एरण्ड, अर्क ( आक ), वृश्चीर ( श्वेत पुनर्नवा ), पुनर्नवा ( रक्त पुनर्नवा ), यव ( जौ ), तिल, कुलत्थ ( कुलथी ), माष ( उड़द ), बदर ( झाड़ी के बेर ) ये दस ओषधियां 'स्वेदोपग' अर्थात् शरीर में पसीना लाने में सहायक हैं॥ मधु-मधुक-कोविदार-कर्बुदार-नीप-विदुल - बिम्बी-शणपुष्पी-सदा- पुष्पी-प्रत्यक्पुष्प्य इति दशेमानि वमनोपगानि भवन्ति ॥ (२३) ॥ मधु ( शहद ), मधुक ( मुलहटी ), कोविदार ( लाल कचनार ), कर्बुदार ( श्वेत कचनार ), नीप ( कदम्ब ); बिदुल ( जल वेतस ), बिम्बी ( कन्दरी), शणपुष्पी ( झनझनिया ), सदापुष्पी ( आक ), प्रत्यक्पुष्पी ( अपामार्ग, चिर- चटा ) ये दस ‘वमनोपग’ अर्थात् वमन में मदद देती हैं॥ द्राक्षा-काश्मर्य-परूषकभयामलक-बिभीतक-कुवल-बदर-कर्कन्धू-पी- लूनीति दशेमानि विरेचनोपगानि भवन्ति ॥ ( २४ ) ॥ द्राक्षा ( किशमिश ), काश्मर्य ( गम्भारी ), परूषक ( फालसा ), अभया ( जंगी हरड़ ), आमलक ( आंवला ), बिभीतक ( बहेड़ा ), कुवल (बड़ा बेर), बदर ( वृक्ष का बेर ), कर्कन्धू ( झाड़ी का बेर ), पीलू ये दस 'विरेचनोपग' अर्थात् विरेचन में सहायक हैं॥

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५५

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५५ त्रिवृद्-बिल्व-पिप्पली-कुष्ठ-सर्षप-वचा- वत्सकफल-शतपुष्पा-मधुक- मदनफलानीति दशेशान्यास्थापनोपगानि भवन्ति ॥ ( २५ ) ॥ त्रिवृत् (निशोथ), बिल्व (बेलगिरी), पिप्पली, कुष्ठ (कूठ), सर्षप (सरसों), वच, वत्सक फल (इन्द्र जौ), शतपुष्पा (सौंफ), मधुक (मुले- हठी) मदनफल (मैनफल) ये दस 'आस्थापनोपग' अर्थात् रूक्ष बस्ति के लिये उपयोगी हैं ॥ रास्ना-सुरदारु-बिल्व-मदन- शतपुष्पा-वृश्चीर-पुनर्नवा-श्वदंष्ट्राग्नि- मन्थ-श्योनाका इति दशेशान्यनुवासनोपगानि भवन्ति ॥ ( २६ ) ॥ रास्ना, सुरदारु (देवदारु), बिल्व (बेलगिरी), मदन (मैनफल), शतपुष्पा (सौंफ), वृश्चीर (श्वेत पुनर्नवा), पुनर्नवा (रक्त पुनर्नवा), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), अग्निमन्थ (अरणी की छाल), श्योनाक (टंटू की छाल) ये दस 'अनुवासनोपग' अर्थात् स्नेहवस्ति के लिये उपयोगी हैं ॥ ज्योतिष्मती-क्षवक-मरिच-पिप्पली-विडङ्ग-शिग्रु-सर्षपापामार्गतण्डुल- श्वेता-महाश्वेता इति दशेशानि शिरोविरेचनापगानि भवन्ति ॥ (२७) ॥ इति सप्तकः कषायवर्गः ॥ [ ५ ] ॥ ज्योतिष्मती (माल कंगनी), क्षवक (नकछिंकनी), मरिच, पिप्पली, विडंग (वायविडंग), शिग्रु (सहजन), सर्षप (सरसों), अपामार्गतण्डुल (चिरचिटे के चावल), श्वेता (अपराजिता श्वेत कोयला), और महाश्वेता (श्वेता का भेद) ये दस 'शिरो-विरेचनोपग' अर्थात् शिरोविरेचन के लिये उपयोगी हैं ॥ यह सात का एक 'कषायवर्ग' हुआ । जम्ब्वाम्रपल्लव - मातुलुङ्गाम्लबदर - दाडिम-यव-यष्टिकोशीर-मृत्लाजा इति दशेशानि छर्द्दिनिग्रहणानि भवन्ति ॥ ( २८ ) ॥ जम्बू (जामुन); और आम्र (आम), इनके पल्लव (पत्ते); मातुलुंग (बिजोरिया-नींबू), अम्ल बदर (खट्टे बेर,), दाडिम (अनार), यव (जौ), यष्टिका (मुलैहठी), उशीर (खस), मृत् (सौराष्ट्र देश की मिट्टी), और लाजा (खीलें) ये दस 'छर्द्दिनिग्रहण' वमन को रोकती हैं ॥ नागर-धन्वयासक-मुस्त-पर्पटक-चन्दन-किराततिक्तक-गुडूची-ह्रीबे- र-धान्यक-पटोलानीति दशेशानि-तृष्णानिग्रहणानि भवन्ति ॥ ( २६ ) ॥ नागर (सोंठ), धन्वयासक (धमासा), मुस्त (नागरमोथा), पर्पटक (पित्तपापड़ा), चन्दन (लाल चन्दन), किराततिक्तक (चिरायता), गुडूची

इति त्रिकः कषायवर्गः ॥ [ ६ ] ॥

( गिलोय ), हीबेर ( नेत्रबाला ), धान्यक ( धनिया ), पटोल ( परबल ) ये दस औषधियां 'तृष्णानिग्रहण' अर्थात् प्यास को रोकने वाली हैं ॥ शटी-पुष्करमूल-बदरबीज-कण्टकारिका-बृहती-वृक्षरूहाभया-पिप्पली- दुरालभा-कुलीरशृङ्गन्य इति दशेमानि हिक्कानिग्रहणानि भवन्ति ॥(३०)॥ इति त्रिकः कषायवर्गः ॥ [ ६ ] ॥ शटी ( कचूर ), पुष्करमूल ( पोहकरमूल ), बदरबीज ( बेर के बीज, गुटली ), कण्टकारिका ( छोटी कटेरी ), बृहती ( बड़ी कटेरी ), वृक्षरूहा ( बन्दा, यह एक पेड़ पर ही पौधा उत्पन्न हो जाता है ) अभया ( जंगी हरड़ ), पिप्पली, दुरालभा ( धमासा ), कुलीरशृंगी ( काकड़ा सींगी ) ये दस 'हिक्का- निग्रहण' अर्थात् हिचकी को शमन करती हैं ॥ यह तीन से बना हुआ कषाय वर्ग है । प्रियङ्गवनन्ताम्रास्थि-कट्वङ्ग-लोध्र-मोचरस-समङ्गा-धातकीपुष्प- पद्मा-पद्मकेशराणीति दशेमानि पुरीषसंग्रहणीयानि भवन्ति ॥ (३१) ॥ प्रियंगु ( फूल प्रियंगु ), अनन्ता ( अनन्तमूल ), आम्रास्थि ( आम की गुठली ), कट्वंग ( श्योनाक की छाल ), लोध्र (पटानी लोध), मोचरस ( सिम्बल का गोंद ), समंगा ( मंजीठ ), धातकी पुष्प ( धाय के फूल ), पद्मा ( भार्गी ), पद्मकेशर (कमल का केशर), यह दस 'पुरीषसंग्रहण' अर्थात् मल को रोकनेवाले हैं॥ जम्बू-शल्लकीत्वक्कच्छुरा-मधुक-शाल्मली-श्रीवेष्टक-भृष्टमृत्पयस्योत्पल- तिलकणा इति दशेमानि पुरीषविरजनीयानि भवन्ति ॥ ( ३२ ) ॥ जम्बु ( जामुन ), शल्लकीत्वक् ( कुन्दुरु की छाल ), कच्छुरा ( कौंच या धमासा ), मधुक ( मुलेहठी ), शाल्मली (सिम्बल का गोंद), श्रीवेष्टक (बिरौजा) भृष्टमृत् ( अग्नि के जलाने से जली हुई मिट्टी, चूल्हे की मिट्टी ), पयस्या ( बिदारी कन्द ), उत्पल ( नील कमल ), तिल कण ये दस 'पुरीषविरजनीय' अर्थात् मल के दूषित रंग को बदलने वाले हैं ॥ जम्बवाम्र-प्लक्ष-वट-कपीतनोदुम्बराश्वत्थ-भल्लातकाश्मन्तक-सोम- वल्का इति दशेमानि मूत्रसंग्रहणीयानि भवन्ति ॥ ( ३३ ) ॥ जम्बु ( जामुन ), आम्र (आम), प्लक्ष ( पिलखन ), वट ( बड़ ), कपीतन (पारस पीपल), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), भल्लातक (भिलावा), अश्म- न्तक, सोमवल्क (खैर सफेद) ये दस 'मूत्र-संग्रहण' अर्थात् मूत्र कोकम करते हैं॥ पद्मोत्पल-नलिन-कुमुद-सौगन्धिक-पुण्डरीक-शतपत्र-मधुक-प्रियङ्ग- धातकीपुष्पाणीति दशेमानि मूत्रविरजनीयानि भवन्ति ॥ ( ३४ ) ॥

अ० ४ । सूत्रस्थानम् ५१

अ० ४ । सूत्रस्थानम् ५१ पद्म (कमल), उत्पल (नीला कमल), नलिन, कुमुद, सौगन्धिक (कमल का एक भेद), पुण्डरीक (श्वेत कमल), शतपत्र, मधुक (मुलैहटी), प्रियंगु (फूल प्रियंगु) धातकी पुष्प (धाय के फूल) ये दस 'मूत्र-विरजनीय' अर्थात् मूत्र में रंग लाते हैं, और दूषित रंग को प्राकृत रूप में लाते हैं ।। वृक्षादनी-श्वदंष्ट्रा-वसुक-वशिर-पाषाणभेद-दर्भ-कुश-काश-गुन्द्रेत्कट- मूलानीति दशेमानि मूत्रविरेचनीयानि भवन्ति ॥ (३५) ॥ इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [७] ॥ वृक्षादनी (बन्दार्क), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), वसुक (पुनर्नवा), वशिर (चिरचिटा), पाषाणभेद, दर्भमूलानि (दाभ), कुश (कुशा), काश (सरकन्डा), गुन्द्रा (दोगला), इत्कट (ईकड़ी), इत्कट का मूल 'मूत्र-विरेचनीय' अर्थात् मूत्र बढ़ाने वाले हैं। यह पांच से बना कषाय वर्ग है । द्राक्षाभयामलक-पिप्पली-दुरालभा-शृङ्गी-कण्टकारिका-वृश्चीर-पुनर्न- वा-तामलक्य इति दशेमानि कासहराणि भवन्ति ॥ (३६) ॥ द्राक्षा (किशमिश), अभया (जंगी हरड़), आमलक (आंवला), पिप्पली, दुरालभा (धमासा), शृङ्गी (काकड़ासिंगी), कण्टकारिका (छोटी कटेरी), वृश्चीर (श्वेत पुनर्नवा), पुनर्नवा (रक्त पुनर्नवा), तामलकी, (भूई आंवला) ये दस 'कासहर' अर्थात् खांसी को शान्त करते हैं ॥ शटी-पुष्करमूलाम्लवेतसैला-हिङ्ग्वगुरु-सुरसा-तामलकी-जीवन्ती- चण्डा इति दशेमानि श्वासहराणि भवन्ति ॥ (३७) शटी (कचूर), पुष्करमूल (पोहकरमूल), अम्लवेतस, एला (छोटी इला- यची), हिंगु (हींग), अगुरु (अगर), सुरसा (तुलसी), तामलकी (भूम्यामलकी), जीवन्ती, चण्डा (चोख) ये दस 'श्वासहर' अर्थात् श्वास रोग के नाशक हैं ॥ पाटलाग्निमन्थ-बिल्व-श्योनाक-काश्मर्य-कण्टकारिका-बृहती-शालप- र्णी-पृश्निपर्णी-गोक्षुरका इति दशेमानि शोथहराणि भवन्ति ॥ (३८) ॥ पाटला (पाढ़ल), अग्निमन्थ (अरणी), बिल्व (बेलगिरी), श्योनाक (टेंटु), काश्मर्य (गम्भारी), कण्टकारिका (छोटी कटेरी), बृहती (बड़ी कटेरी), शालपर्णी, पृश्निपर्णी, गोक्षुरक (गोखरू), ये दस 'शोथहर' अर्थात् सूजन कम करते हैं ॥

५८ चरकसंहिता [ अ० ४ सारिवा-शर्करा-पाठा-मञ्जिष्ठा-द्राक्षा-पीलु-परूषकाभयामलक-बिभी- तकानीति दशेमानि ज्वरहराणि भवन्ति ॥ (३९) ॥ सारिवा ( अनन्तमूल ), शर्करा ( मिश्री ), पाठा ( पाढ़ल ), मंजिष्ठा ( मजीठ ), द्राक्षा ( किशमिश ), पीलु, परूषक ( फालसा ), अभया ( बड़ी हरड़ ), आमलकी ( आंवला ), विभीतक ( बहेड़ा ), ये दस 'ज्वरहर' अर्थात् ज्वर नाशक हैं ॥ द्राक्षा-खर्जूर-पियाल-बदर-दाडिम-फल्गु-परूषकेक्षु-यव-षष्टिका इति दशेमानि श्रमहराणि भवन्ति ॥ (४०) ॥ इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [ ८ ] ॥ द्राक्षा ( किशमिश ), खर्जूर (पिण्डखजूर), पियाल (प्याल चिरौंजी फल), बदर ( बेर ), दाडिम ( अनार ), फल्गु ( अंजीर ), परूषक ( फालसा ), इक्षु ( ईख ), यव ( जौ ), षष्टिक ( साठ चावल ) ये दस 'श्रमहर' अर्थात् थका- वट को मिटाते हैं ॥ यह पाँच से बना 'कषायवर्ग' है । लाजा-चन्दन-काश्मर्यफल-मधुक-शर्करा-नीलोत्पलोशीर-सारिवा-गु- डूची-ह्रीबेराणीति दशेमानि दाहप्रशमनानि भवन्ति ॥ ( ४१ ) ॥ लाजा ( खील ), चन्दन ( श्वेत चन्दन ), काश्मर्य-फल ( गम्भारी फल ) मधुक ( मुलहठी ), शर्करा ( मिश्री ), नीलोत्पल (नीला कमल), उशीर (खस) सारिवा ( अनन्तमूल ), गुडूची ( गिलोय ), ह्रींवेर ( नेत्रवाला ), ये दस 'दाह- प्रशमन' अर्थात् जलन कम करते हैं ॥ तगरागुरु-धान्यक-शृङ्गवेर-भूतीक-वचा-कण्टकारिकाग्निमन्थ-श्यो- नाक-पिप्पल्य इति दशेमानि शीतप्रशमनानि भवन्ति : (४२) ॥ तगर, अगुरु ( अगर ), धान्यक ( धनिया ), शृङ्गवेर ( सोंठ ), भूतीक ( अजवायन ), वचा, कण्टकारिका (छोटी कटेरी) अग्निमन्थ (अरणी), श्योनाक ( टेंटू ), और, पिप्पली, ये दस 'शीत-शप्रशमन' अर्थात् शीतनाशक हैं। तिन्दुक-पियाल-बदर-खदिर-कदर-सप्तपर्णाश्वकर्णार्जुनासनारिमेदा इति दशेमान्युदर्दप्रशमनानि भवन्ति ॥ (४३) ॥ तिन्दुक ( तेंदू), पियाल ( चिरौंजी का फल ), बदर (बेर), खदिर (खैर), कदर ( सफेद खैर १ ), सप्तपर्ण ( सातवन ) अश्वकर्ण ( साल ), अर्जुन, असन १. कदर —'सोमवल्कस्तु रीठायांकदरे कृष्णगर्भेके' । ध० निघण्टु ।

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५६

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५६ ( पीतसाल ), अरिमेद (१विट्खदिर इरिमेद), ये दस 'उदर्द' अर्थात् शीतपित्त रोग को शान्त करते हैं ॥ विदारीगन्धा-पृश्निपर्णी-बृहती-कण्टकारिकैरण्ड-काकोली-चन्दनो- शीरैला-मधुकानीति दशेमान्यङ्गमर्दप्रशमनानि भवन्ति ॥ (४४) ॥ विदारीगन्धा ( शालपर्णी ), पृश्निपर्णी ( पिठवन ), बृहती ( बड़ी कटेरी ) कण्टकारिका ( छोटी कटेरी ) एरण्ड, काकोली, चन्दन ( लाल चन्दन ), उशीर ( खस ), एला, ( छोटी इलायची ), मधुक ( मुलहटी ), ये दस 'अंगमर्द-प्रश- मन' अर्थात् अंगों के टूटने की बेचैनी को मिटाते हैं ॥ पिप्पली-पिप्पलीमूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-मरिचाजमोदाजगन्धाजा- जी-गण्डीराणीति दशेमानि शूलप्रशमनानि भवन्ति ॥ (४५) ॥ इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [ ६ ] ॥ पिप्पली, पिप्पली-मूल, चव्य ( चविका ), चित्रक ( चातामूल ), शृङ्गवेर (सांठ), मरिच, अजमोदा (अजवायन), अजगन्धा (हूल्हू), अजाजी ( जीरा ), गंडीर ये दस 'शूलप्रशमन' अर्थात् तीव्र पीड़ा के नाशक हैं ॥ यह पांच का एक 'कषाय वर्ग' होता है । मधु-मधुक-रुधिर-मोचरस-मृत्कपाल-लोध्र-गैरिक-प्रियङ्गु-शर्करा-लाजा इति दशेमानि शोणित-स्थापनानि भवन्ति ॥ (४६) ॥ मधु ( शहद ), मधुक ( मुलैहटी ), रुधिर ( केशर ), मोचरस ( सिम्बल का गोंद ), मृत्कपाल ( मिट्टी का ठींकरा ), लोध्र ( पठानी लोध), गैरिक (गेरू), प्रियंगु (फूल प्रियंगु), शर्करा (मिश्री), लाजा ( खीलें ) ये दश 'शोणित-स्थापन' अर्थात् रक्ताधिक वा बहते खून को रोकने वाले हैं ॥ शाल-कट्फल-कदम्ब -पद्मक-तुङ्ग-मोचरस-शिरीष-वञ्जुलैलवालुका- शोका इति दशेमानि वेदनास्थापनानि भवन्ति ॥ (४७) ॥ शाल ( साल ), कट्फल (कायफल), कदम्ब, पद्मक (पद्माख), तुंग२ (नाग केशर ) मोचरस ( सिम्बल का गोंद ), शिरीष ( सिरस ), वंजुल ( जलवेतस ), एलवालुक, अशोक ये दस 'वेदनास्थापन' अर्थात् तीव्र वेदना को कम करते हैं ॥ हिङ्गु-कैडर्यारिमेद-वचा-चोरक-वयःस्था-गोलोमी-जटिला-पलङ्कषाशो- करोहिण्य इति दशेमानि संज्ञास्थापनानि भवन्ति ॥ (४८) ॥ हिंगु ( हींग ), कैडर्य ( नीम ). अरिमेद ( रेवां ), वच, चोरक, वयस्था १. विट्खदिर—इस खैर से बदबू आती है । २ तुङ्ग के स्थान पर तुम्ब पाठ होने पर तेजवल लेना चाहिये !

६० चरकसंहिता [ अ० ४ ( ब्राह्मी ), गोलोमी ( वच या दूर्वा ), जटिला (जटामांसी), पलंकषा (गुग्गुलु), अशोकरोहिणी (कुटकी) ये दस 'संज्ञा-स्थापन' अर्थात् संज्ञा उत्पन्न करते हैं ॥ ऐन्द्री-ब्राह्मी-शतवीर्या-सहस्रवीर्यामोघाव्यथा-शिवारिष्टा-वाट्यपुष्पी- विष्वक्सेनकान्ता इति दशेमानि प्रजास्थापनानि भवन्ति ॥(४६)॥ ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतवीर्या ( शतावरी ), सहस्रवीर्या ( महाशतावरी ),अमोघा ( आंवला ), अव्यथा ( गिलोय ), शिवा ( हरीतकी ), अरिष्टा ( कुटकी ), वाट्यपुष्पी ( खरैंटी ), विष्वक्सेनकान्ता ( प्रियंगु ) ये दस 'प्रजास्थापन' अर्थात् संतति जनक हैं ॥ अमृताभया-धात्री-मुक्ता-श्वेता-जीवन्त्यतिरसामण्डूकपर्णी-स्थिरा- पुनर्नवा इति दशेमानि वयःस्थापनानि भवन्ति ॥ (५०) ॥ इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [ १० ] ॥ अमृता ( गिलोय ), अभया ( हरड़ ), धात्री ( आंवला ), मुक्ता ( रास्ना ), श्वेता ( अपराजिता ), जीवन्ती, अतिरसा ( शतावरी ), मण्डूकपर्णी स्थिरा ( शालपर्णी ), और पुनर्नवा ये दस औषधि 'वयःस्थापन' अर्थात् वय को टिकाती है ॥ यह पाँच से बना हुआ कषाय वर्ग है । इति पञ्चकषायशतान्यभिसमस्य पञ्चाशन्महाकषायाः, महतां च कषायाणां लक्षणोदाहरणार्थं व्याख्याता भवन्ति ॥१४॥ इस प्रकार से ( प्रत्येक द्रव्य के गिनने से ) पाँच सौ ( ५०० ) कषाय पूर्ण हो जाते हैं, एवं पचास ( ५० ) 'महाकषाय' भी हो जाते हैं। इन कषायों के लक्षण उदाहरण भी कह दिये गये हैं ॥१४॥ न हि विस्तरस्य प्रमाणमस्ति, न चाप्यतिसंक्षेपोऽल्पबुद्धीनां साम- र्थ्यायोपकल्पते,तस्मादनतिसंक्षेपेणानतिविस्तरेण चोपदिष्टाः। एतावन्तो ह्यलमल्पबुद्धीनां व्यवहाराय बुद्धिमतां च स्वालक्षण्यानुमानयुक्तिकुश- लानामनुक्तार्थज्ञानायेति ॥ १५ ॥ फैलाव की सीमा नहीं है और बहुत थोड़े में कहे हुए अर्थ को थोड़ी बुद्धि वाले नहीं समझ सकते । इसलिये न तो बहुत संक्षेप में और न बहुत विस्तार से यहाँ कहा है । यहां पर जितना भी कहा है वह थोड़ी बुद्धिवालों के व्यवहार चलाने के लिये है ओर जो लक्षण अनुमान, युक्ति में निपुण हैं, उन बुद्धिमानों के लिये न कहे हुए अर्थ को जानने के लिये सहायक होगा ॥१५॥ एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—नैतानि भगवन् !

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ६१

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ६१ पञ्चकषायशतानि पूर्यन्ते, तानि तानि ह्येवाङ्गानि संस्रवन्ते तेषु तेषु महाकषायेष्विति ॥ १६ ॥ इस प्रकार से कहते हुए 'भगवान् आत्रेय' के प्रति अग्निवेश बोले—हे भगवन् ! ये पांच सौ कषाय पूरे नहीं होते। क्योंकि वे ही द्रव्य उन उन महा कषायों में बार-बार आते हैं। अर्थात् एक द्रव्य भिन्न २ कषायों में बार-बार आता है । इस प्रकार से ५०० कषाय पूरे नहीं हो सकते ॥ १६ ॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—नैतदेवं बुद्धिमता द्रष्टव्यमग्निवेश ! एकोऽपि ह्यनेकां संज्ञां लभते कार्यान्तराणि कुर्वन् । तद्यथा—पुरुषो बहूनां कर्मणां करणे समर्थो भवति । स यद्यत्कर्म करोति तस्य तस्य कर्मणः कर्तृकरणकार्यसंप्रयुक्तं तत्तद्गौणं नामविशेषं प्राप्नोति तद्व- दौषधद्रव्यमपि द्रष्टव्यम् । यदि त्वेकमेव किंचिद् द्रव्यमासादयामस्तथा- गुणयुक्तं यत्सर्वकर्मणां करणे समर्थं स्यात् कस्ततोऽन्यदिच्छे दुपधारयि- तुमुपदेष्टुं वा शिष्येभ्य इति ॥ १७ । अग्निवेश के प्रति भगवान् आत्रेय बोले हे अग्निवेश ! बुद्धिमान् व्यक्ति को इस प्रकार से नहीं देखना चाहिये । एक द्रव्य भी दूसरे २ काम करता हुआ भिन्न २ संज्ञा वाला हो जाता है । जिस प्रकार एक पुरुष बहुत से काम करने में समर्थ होता है । वह जो जो भी काम करता है, वह उस कर्म के वह कर्त्ता, करण (साधन) और कार्य के अनुसार वह गुणवाले नाम विशेष को प्राप्त होता है। इस प्रकार से औषध द्रव्य को भी कार्य साधन और कर्त्ता आदि दृष्टि से देखना चाहिये । और यदि किसी ऐसे एक ही द्रव्य को प्राप्त कर लें, जो द्रव्य सब काम करने में समर्थ हो,तो फिर कौन दूसरी औषध को पास में रखने अथवा शिष्यों को उपदेश करने के लिये झंझट करे, इसलिये काम करने में समर्थ शक्ति वाला ऐसा कोई एक द्रव्य नहीं है ॥१७॥ तत्र श्लोकाः । यतो यावन्ति यैर्द्रव्यैर्विरेचनशतानि षट् । उक्तानि संग्रहणेह तथैवेषां षडाश्रयाः ॥ १८ ॥ रसा लवणवर्ज्याश्च कषाय इति संज्ञिताः । तस्मात्पञ्चविधा योनिः कषायाणामुदाहृता ॥ १८ ॥ तथा कल्पनमप्येषामुक्तं पञ्चविधं पुनः । महतां च कषायाणां पञ्चाशत्परिकीर्तिताः ॥ २० ॥ पञ्च चापि कषायाणां शतान्युक्तानि भागशः ।

न चालमतिसंक्षेपः सामर्थ्यायोपकल्पते ।

६२ चरकसंहिता [ अ० ५ लक्षणार्थं, प्रमाणं हि विस्तरस्य न विद्यते ॥ २१ ॥ न चालमतिसंक्षेपः सामर्थ्यायोपकल्पते । अल्पबुद्धेरयं तस्मान्नातिसंक्षेपविस्तरः ॥ २२ ॥ मन्दानां व्यवहाराय बुधानां बुद्धिवृद्धये । पञ्चाशत्को ह्ययं वर्गः कषायाणामुदाहृतः ॥ २३ ॥ तेषां कर्मसु बाह्येषु योगमाभ्यन्तरेषु च । संयोगं च प्रयोगं च यो वेद स भिषग्वरः ॥ २४ ॥ इस विषय में श्लोक हैं— जिन द्रव्यों में से (छः सौ) विरेचन योग होते हैं वे एवं विरेचन योगों के छः आश्रय भी संक्षेप से कह दिये हैं । लवण ( नमक ) को छोड़कर शेष पांच रसोंकी 'कषाय' संज्ञा है । इसलिये कषायों की पांच प्रकार की योनि कही हैं ! एवं इन पांच कषायों की पांच प्रकार की कल्पना ( बनावट ) भी कह दी है और पचास प्रकार के 'महाकषाय' कहे हैं । कषायों के पांच सौ प्रकार भी दिग्दर्शन के लिये, न तो बहुत विस्तार से और न बहुत संक्षेप में कहे हैं । वे थोड़ी बुद्धि वालों को काम देने के लिये पर्याप्त हैं । इसलिये न विस्तार किया है और न बहुत संक्षेप । मन्द बुद्धिवाले व्यवहार कर चला सकें, और बुद्धिमान् की प्रतिभा बढ़ाने के लिये पांच सौ कषायों का वर्ग कह दिया । इन कषायों का बाह्य कर्मों तथा आभ्यन्तर प्रयोगोंमें संयोग, और प्रयोग (योजना) को जो जानता है वह उत्तम वैद्य है१ । १८-२४। इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने भेषजचतुष्के षड्विरेचनशताश्रितीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ इति भेषजचतुष्कः ॥ १ ॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः । अथातो मात्राशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ १-बाह्य प्रयोग प्रलेप आदि में, अन्तःप्रयोग वमन आदि कार्यों में स्वस्थ एवं आतुर दोनों व्यक्तियों के लिये करने में समर्थ एवं संयोग मिश्रण अयोगिक, हानिकारक अनुचित औषधियों को योग में से निकाल देना एवं उचित को न कहने पर भी मिश्रण करना, प्रयोग देश, काल, प्रकृति, व्याधि, रोगी, बल आदि को देख कर योजना करना जो जानता है, वही उत्तम वैद्य है ।

भेषज चतुष्क कहने के अनन्तर 'मात्राशितीय' अध्याय की व्याख्या

भेषज चतुष्क कहने के अनन्तर 'मात्राशितीय' अध्याय की व्याख्या करेंगे । इस प्रकार भगवानात्रेय ने कहा है ॥१-२॥ मात्राशी स्यात् । आहारमात्रा पुनरग्निबलापेक्षिणी । यावद्ध्यस्या- शनमशितमनुपहत्य प्रकृतिं यथाकालं जरां गच्छति तावदस्य मात्रा- प्रमाणं वेदितव्यं भवति ॥ ३ ॥ मात्रा में आहार करने वाला होना चाहिये । आहार¹ की मात्रा जाठर अग्नि के बल की अपेक्षा करती है । जितना खाया हुआ भोजन मनुष्य की प्रकृति, स्वास्थ्य को नुक्सान न पहुंचा कर ठीक समय में जीर्ण हो जाता है भोजन की उतनी मात्रा जाननी चाहिये² ॥ ३ ॥ तत्र शालि-षष्टिक-मुद्ग-लावक-कपिञ्जल-शश-शरभ-शम्बरादीन्या- हार-द्रव्याणि प्रकृतिलघून्यपि मात्रापेक्षाणि भवन्ति, तथा पिष्टेक्षु-क्षीर- विकृति-तिल-माषानूपौदक पिशितादीन्याहारद्रव्याणि प्रकृतिगुरूण्यपि मात्रामेवापेक्षन्ते ॥ ४ ॥ क्योंकि (शालि), हैमन्तिक धान्य, (षष्टिक) साठी चावल. (मुद्ग), मूंग, (लाव) बटेर, (कपिञ्जल) तीतर, (एण) काला मृग, (शश) खरगोश, १. आहार चार प्रकार का है । यथा—भक्ष्य, चोष्य, लेह्य और पेय । भक्ष्य रोटी आदि, चोष्य चूसने योग्य, लेह्य चाटने योग्य, और पेय पानी आदि द्रव । एक ही मनुष्य की शक्ति सदा एक समान नहीं रहती । यौवनावस्था में जितनी जाठराग्नि समर्थ होती है, उतनी बाल्यावस्था या वृद्धावस्था में नहीं होती । इसी प्रकार हेमन्त ऋतु में जितनी अग्नि प्रबल रहती है उतनी वर्षा में नहीं रहती । इस लिये प्रत्येक समय के लिये एक मात्रा एक व्यक्ति के लिये भी निश्चित करना असम्भव है, फिर सब के लिये सामान्य रूप से मात्रा निश्चित करना तो और भी असम्भव है । इसलिये 'मात्रा' का निर्णय प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर ही छोड़ दिया है ! २ (क)-'यथाकालं:-प्रातःकाल का भोजन सायंकाल तक और सायंकाल का भोजन प्रातः कालतक जीर्ण हो जाये । क्योंकि हमारे यहां दो ही समय भोजन का विधान है । यथा— "सायं प्रातर्मनुष्याणां भोजनं विधिनिर्मितम् । नान्तरे भोजनं कुर्याद् अग्निहोत्रसमो विधिः ॥” सर्वांगसुन्दरी टीका ॥

६४ चरकसंहिता [ अ० ५ ( शरभ ) बड़े सींगों वाला पाढ़ा हरिण, ( शम्बर ) हरिण साबर आदि आहार द्रव्य स्वभाव से लघु होने पर भी मात्रा की अपेक्षा करते हैं १ । इसी प्रकार ( पिष्ट ) पिष्टी से बनी हुई वस्तुएं; ( इक्षु ) गुड़ खांड़ आदि से बनी; ( क्षीर-विकृति ) दूध, मावे आद से बनी; तिल, ( माष ) उड़द, (आनूपौदक पिशित) अर्थात् जल प्रदेश में या जल के अन्दर रहने वाले प्राणियों का मांस आदि आहार द्रव्य स्वभाव से ही भारी हैं । ये सब भी मात्रा २ की ही अपेक्षा करते हैं ॥ ४ ॥ न चैवमुक्ते द्रव्ये गुरुलाघवमकारणं मन्येत । लघूनि हि द्रव्याणि वाय्वग्नि-गुण-बहुलानि भवन्ति, पृथिवी-सोम-गुण-बहुलानीतराणि; तस्मात्स्वगुणादपि लघून्यग्नि-संधुक्षण-स्वभावान्यल्प-दोषाणि चोच्य- न्तेऽपि सौहित्योपयुक्तानि, गुरूणि पुनर्नाग्नि-संधुक्षण-स्वभावान्यसामा- न्यात्, अतश्चातिमात्रं दोषवन्ति सौहित्योपयुक्तान्यन्यत्र व्यायामाग्नि- बलान्; सैषा भवत्यग्निबलापेक्षिणी मात्रा ॥ ५ ॥ शालि, सांठी आदि पदार्थ बिना मात्रा में खाने से अहितकर हैं और पिष्टी गुड़ आदि से बने पदार्थ मात्रा में खाने से हितकर होते हैं; यदि मात्रा की ही अपेक्षा से ये हितकर या अहितकर होते हों, तो द्रव्यों का गुरु एवं लघुगुण- (ख)-मनुष्य की प्रकृति के ऊपर मात्रा का निर्णय रखने से, विषम और तीक्ष्ण अग्निवाले व्यक्ति भी अपना भोजन की मात्रा स्वयं निश्चय कर सकते हैं । तीक्ष्ण अग्नि वाले को इतना भोजन करना चाहिए, जो कि ठीक समय में जीर्ण हो जाये, इसी प्रकार विषम अग्नि वाले भी ठीक समय में जीर्ण हो सके ऐसा भोजन करें, यही उनकी मात्रा है । (ग)-‘प्रकृतिमनुपहत्य’—भोजन से कुक्षि का पीड़न न होना, हृदय का न रुकना, पार्श्वों का न फूलना, पेट का न तनना या भारी न होना, श्वास में कठिनाई का न होना, भूख, प्यास की शान्ति, उठने बैठने, चलने फिरने, लेटने या बात-चीत में हलकापन अथवा सुख की प्रतीति होना ही प्रकृति है । देखिये विमानस्थान अध्याय २ । १. एक पदार्थ लघु होता हुआ भी अधिक मात्रा में खाने से 'गुरु' हो जाता है । इसी प्रकार गुरु पदार्थ थोड़ा खाने से 'लघु' हो जाता है । २. मात्रा के साथ 'संस्कार' रांधने की विधि से भी लघु पदार्थ गुरु और गुरु पदार्थ लघु बन जाते हैं ।

अ० ५ ] ५ सूत्रस्थानम् ६५

अ० ५ ] ५ सूत्रस्थानम् ६५ सम्बन्धी ज्ञान करना व्यर्थ है ? ऐसा नहीं, क्योंकि द्रव्यों का गुरु या लघु होना भी अकारण या निष्प्रयोजन नहीं है । वायु और अग्नि के गुणों की अधिकता वाले पदार्थ लघुगुण वाले होते हैं [ आकाश गुण वाले बहुतसे द्रव्य लघु होते हुए भी अग्नि का बढ़ाने वाले नहीं होते, इसलिए इनका ग्रहण नहीं किया ] । पृथ्वी, सोम ( जल ) गुणों की अधिकता वाले पदार्थ गुरु होते हैं । इसलिये लघु पदार्थ वायु एवं अग्नि से बने होने के कारण; और अपने गुणों के कारण से—जैसे वायु रूक्ष लघु, सूक्ष्म, चल, विशद, खर गुण वाला है, इससे भी लघु पदार्थ जाठराग्नि का संदीपन करने वाले एवं तृप्ति पूर्वक मात्रा का व्यतिक्रम करके खाने पर भी थोड़े दोष वाले होते हैं; ये अधिक दोष नहीं करते १ । गुरु द्रव्य अग्नि को संदीपन करने वाले नहीं होते । क्योंकि असमान होने से अग्नि से विपरीत गुण वाले हैं अर्थात् पृथ्वी और जल के गुण वाले होते हैं । अतः तृप्तिपूर्वक पेट भर के खाने से बहुत अधिक दोष कारक होते हैं । व्यायाम अग्निवल और हेमन्त ऋतु आदि में स्वभावतः अग्नि वृद्धि होने के कारण ये विकार नहीं करते; अन्य अवस्थाओं में विकार उत्पन्न करते हैं २ । इसलिये 'मात्रा' अग्नि बल की अपेक्षा करती है गुरु लघु द्रव्य की अपेक्षा नहीं करती ॥५॥ न च नापेक्षते द्रव्यम् । द्रव्यापेक्षया च त्रिभागसौहित्यमर्धसौहित्यं वा गुरूणामुपदिश्यते; लघूनामपि च नातिसौहित्यमग्नेर्युक्त्यर्थम् । मात्रा द्रव्य की अपेक्षा नहीं करती, ऐसा भी नहीं क्योंकि मात्रा की अपेक्षा से गुरु द्रव्यों का तीन हिस्सा या आधे पेट, जिससे कि कुक्षि मे प्रपीड़न, भारी- पन प्रतीत न हो, इतना खाना बताया है । परिमाण या मात्रा से नहीं बताया । इसी प्रकार लघु गुण वाले पदार्थों का भी पेट भर के खाने का आदेश नहीं १. अग्नि भी रूक्ष, लघु, सूक्ष्म चल, विशद, खर है, इसलिये इस गुणवाले पदार्थ अग्नि को बढ़ायेंगे । समान गुण वाले समान गुणों को बढ़ाते हैं । अतः अधिक मात्रा में खाने पर भी लघु पदार्थ अग्नि को बढ़ायेंगे ही । २. व्यायाम करने वाले मनुष्य को विरुद्ध वा अविरुद्ध सब प्रकार का भोजन पच जाता है । क्योंकि व्यायाम से अग्नि बढ़ती है । हेमन्त में अग्नि स्वभावतः प्रबल होती है, अतः गुरु पदार्थ खाने का आदेश दिया है ।

६६ चरकसंहिता [ अ० ५ दिया । इतना खाना चाहिये जिससे कि अग्नि समान रूप से स्थिर रह सके । जीवन के लिये खाना, खाने के लिये जीना नहीं १ । मात्रा में खाने के फल- मात्रावद्ध्यशनमशितमनुपहत्य प्रकृतिं बल-वर्ण-सुखायुषा योजयत्युप- योक्तारमवश्यमिति ॥ ६ ॥ क्योंकि मात्रा में खाया हुआ आहार प्रकृति और स्वास्थ्य को न बिगाड़ कर उपयोग करने वाले मनुष्य को बल, वर्ण ( कान्ति ), सुख, आयु से युक्त करता है, इसलिये मात्रानुसार भोजन करना चाहिये ॥ ६ ॥ भवन्ति चात्र- गुरु पिष्टमयं तस्मात्तण्डुलान् पृथुकानपि । न जातु भुक्तवान् खादेन्मात्रां खादेद् बुभुक्षितः ॥ ७ ॥ वल्लूरं शुष्कशाकानि शालूकानि बिसानि च । नाभ्यसेद् गौरवान्मांसं कृशं नैवोपयोजयेत् ॥ ८ ॥ कूर्चिकांश्च किलाटांश्च शौकरं गव्यमाहिषे । मत्स्यान्दधि च माषांश्च यवकांश्च न शीलयेत् ॥ ९ ॥ इसलिये भोजन कर चुकने पर भारी पिष्टी से बने चावल, चिवड़ा इनको कभी भी नहीं खाये । मात्रा में भी भोजन करने के बाद इनको नहीं खाना चाहिये । भूखे होनेपर इन पदार्थों को मात्रामें ही खाना चाहिये अधिक नहीं । वल्लूर ( सूखा हुआ मांस ); सूखे हुए शाक-कचरी आदि शालूक (कमल का कन्द ) और बिस मृणाल इनका निरन्तर उपयोग नहीं करना चाहिये । क्योंकि ये पदार्थ गुरु हैं। इसी प्रकार दुर्बल, रुग्ण पशु का मांस भी नहीं खाना चाहिये । ( कूर्चिक ) छाछ के साथ पकाया हुआ दूध, ( किलाट ) छाछ के साथ पकाये हुए दूध का घन ठोस भाग, सुअर का मांस, गाय और भैस का मांस, मच्छलियों का मांस, दही, उड़द और शूक धान्य, जई इनको निरन्तर लगातार नहीं खाना चाहिये ॥ ७-६ ॥ षष्टिकाञ्छालिमुद्गांश्च सैन्धवामलके यवान् । आन्तरीक्षं पयः सर्पिर्जाङ्गलं मधु चाभ्यसेत् ॥ १० ॥ १. लघु भोजन अधिक मात्रा में खाने से अग्नि को सन्दीपन करने का गुण रखते हुये भी शरीर के लिये हानिकारक होंगे, क्योंकि शस्त्र पत्थर पर ही तेज होता है, और पत्थर पर अधिक पैनाने से वह खुन्डा भी बन जाता है । आंख तेजोमय है, वही आंख तेज की अधिकता से बिगड़ भी जाती है ।

षष्टिक ( साठी चावल ), शालि ( हेमन्त ऋतु में पकने वाले धान्य ), मुद्ग ( मूंग ), सैन्धव ( सेंधा नमक ), आमलक ( आंवले ), यव ( जौ ), आन्तरिक्ष अर्थात् बरसात का जल, दूध, घी, जंगल में होने वाले मृग आदि का मांस और शहद इनका निरन्तर ( अग्नि बल को देखते हुए उचित मात्रा में ) उपयोग करना चाहिये ॥ १० ॥ तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुवर्तते । अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत् ॥ ११ ॥ जो विशुद्ध क्षीण होते हुए शरीर को पोषण दे और जो न उत्पन्न हुए विकारों वा रोगों को न उत्पन्न करे ऐसा आहार का स्वास्थ्य के लिये नित्यप्रति उपयोग करे । रोगों की उत्पत्ति में 'प्रज्ञापराध' 'परिणाम' और 'असात्म्येन्द्रियार्थ' संयोग ये तीन ही कारण हैं । अतः इनको छोड़कर और सब करना चाहिये, इनका सेवन नहीं करना चाहिये, इनसे बचना चाहिये । ऐसा करने से भावी में रोग उत्पन्न नहीं होंगे ॥ ११ ॥ स्वस्थवृत्त— अत ऊर्ध्वं शरीरस्य कार्यमक्ष्यञ्जनादिकम् । स्वस्थवृत्तमभिप्रेत्य गुणतः संप्रवक्ष्यते ॥ १२ ॥ स्वास्थ्य के लिये आहार विधि को कह कर इस के आगे शारीरिक कार्यों का उपदेश करते हैं । स्वस्थवृत्त अर्थात् स्वास्थ्य की दृष्टि से अञ्जन आदि एवं शारीरिक कार्य उनके गुणों सहित कहते हैं ॥ १२ ॥ सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोः प्रयोजयेत् । पञ्चरात्रेऽष्टरात्रे वा स्रावणार्थे रसाञ्जनम् ॥ १३ ॥ आँख तेजोमय ( अग्नि रूप है ) इसलिये आँख को शरीर के दोष वात, पित्त और कफ इनसे भय बना रहता है । इनमें भी विशेष कर कफ से । इस- लिये श्लेष्मा के जय के लिये पांचवें, छठे दिन तीक्ष्ण अंजन ( रसांजन ) रात्रि में लगाना चाहिये । सौवीराञ्जन को प्रतिदिन आँखों में लगाना चाहिये, क्योंकि यह आँखों के लिये हितकारी है । इससे आँख के तेज की रक्षा होती है, इससे आँखों के दोष दूर नहीं होते । आँखों के दोष दूर करने और आँखों से पानी का दोष निकालने के लिये पांचवें या आठवें दिन दोष के बलाबल की अपेक्षा से रसा- ञ्जन को रात्रि में प्रयोग करना चाहिए ॥ १३ ॥

६८ चरकसंहिता [ अ० ५ चक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषाच्छ्लेष्मतो भयम् । दिवा तन्न प्रयोक्तव्यं नेत्रयोस्तीक्ष्णमञ्जनम् ॥ १४ ॥ विरेकदुर्बला दृष्टिरादित्यं प्राप्य सीदति । तस्मात्स्राव्यं निशायां तु ध्रुवमञ्जनमिष्यते ॥ १५ ॥ ततः श्लेष्महरं कर्म हितं दृष्टेः प्रसादनम् । यथा हि कनकादीनां मणीनां विविधात्मनाम् ॥ १६ ॥ धौतानां निर्मला शुद्धिस्तैल-चेल-कचादिभिः । एवं नेत्रेषु मर्त्यानामञ्जनाश्च्योतनादिभिः ॥ १७ ॥ दृष्टिर्निराकुला भाति निर्मले नभसीन्दुवत् । आँख तेजोमय है, उसे खास करके कफ से भय है । इसलिये विशेषतः दिन में तीक्ष्ण अंजन आँखों में नहीं करना चाहिये । क्योंकि दृष्टि तीक्ष्णांजन के लगाने से एवं दोष के कारण निर्बल होती है, इसलिये सूर्य को नहीं सहती, और यदि सूर्य के सामने अञ्जन दिन में लगाया जाय तो आँख पीड़ित होती है । इसलिए स्रावण अञ्जन को रात्रि में ही लगाना चाहिये १ । श्लेष्मा के निकलने के बाद श्लेष्मा को घटाने वाला और आंख को स्वच्छ करने वाला प्रयोग करना चाहिये । जिस प्रकार की धूल आदि से मैले हुए नाना प्रकार के स्वर्णादि की तैल, ( वस्त्र ), बाल आदि से घिसने पर स्वच्छता होती है इसी प्रकार मनुष्यों की आँख स्रोताञ्जन, निर्मल, ( वातादि दोषों से रहित ) होकर स्वच्छ आकाश में चन्द्रमा के समान चमकती है ॥ १४-१७ ॥ अञ्जन के पीछे दृष्टि के प्रसादन के लिये श्लेष्महर कर्म करने का विधान है । इसलिये अञ्जन के पीछे धूम्रपान कहते हैं । धूम्रप्रयोग की विधि— हरेणुकां प्रियङ्गुं च पृथ्वीकां केशरं नखम् ॥ १८ ॥ ह्रीबेरं चन्दनं पत्रं त्वगेलोशीरपद्मकम् । ध्यामकं मधुकं मांसीं गुग्गुल्वगुरुशर्करम् ॥ १९ ॥ १. कुछ विद्वान् 'सीदति' का अर्थ 'अवजयति' करते हैं । इस प्रकार अर्थ करने से दिन में तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग नहीं करना चाहिये । क्योंकि आँख तेजोमय हैं, इसलिये विरेचन ( रात्रि में स्रावण अंजन लगाने ) से निर्बल हुआ व कफ के निकलने से कमजोर पड़ा हुआ दोष श्लेष्मा, प्रातः सूर्य की किरणों में बाकी बचा निकल जाता है । इसलिये वमन की भांति पूर्वाह्न में सूर्य की किरणों में आँखों का स्रावण करना चाहिये और अंजन रात्रि में ही ।

अ० ५] सूत्रस्थानम् ६६

अ० ५] सूत्रस्थानम् ६६ न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थ-प्लक्ष-लोध्र-त्वचः शुभाः । वन्यं सर्जरसं मुस्तं शैलेयं कमलोत्पले ॥ २० ॥ श्रीवेष्टकं शल्लकीं च शुकबर्हमथापि च । पिष्ट्वा लिम्पेच्छरेषीकां तां वर्तिं यवसन्निभाम् ॥ २१ ॥ अङ्गुष्ठसंमितां कुर्यादष्टाङ्गुलसमां भिषक् । शुष्कां निगर्भां तां वर्तिं धूमनेत्रार्पितां नरः ॥ २२ ॥ स्नेहाक्तामग्निसंप्लुष्टां पिबेतप्रायोगिकीं सुखाम् । हरेणुका ( मेहन्दी के बीज ), प्रियंगु, ( फूल प्रियंगु ), पृथ्वीका ( काला जीरा ), केशर ( नाग केशर ), नख ( नखी, एक सुगन्धित द्रव्य है ), 'ह्रीवेर' ( नेत्रबाला ), चन्दन ( श्वेतचन्दन ), पत्र ( तेज पात ), त्वग् ( दालचीनी ), एला ( छोटी इलायची ), उशीर ( खस ), पद्माक ( पद्माख ), ध्यामक ( गन्ध तृण, सुगन्धित तृण ), मधुक ( मुलैहटी ), मांसी ( जटामांसी ), गुग्गुलु ( गूगल ), अगरु ( अगर ), शर्करा ( शर्करा ), न्यग्रोध ( बड़ की छाल ), उदु- म्बर ( गूलर की उत्तम छाल ), अश्वत्थ ( पीपल की उत्तम छाल ), प्लक्ष ( पिलखन की छाल ) और लोध्र ( लोध वृक्ष की उत्तम छाल ), वन्य ( कैवर्त्त मुस्तक, जल मुस्त ), सर्ज रस ( राल ), मुस्त (नागर मोथा), शैलेय (शिलाह्ला) कमल-उत्पल ( कमल और नील कमल इनका केशर ), श्रीवेष्टक ( धूपविशेष ), शल्लकी ( कुन्दरू धूप विशेष, अथवा शिलारस ); और शुकबर्ह ( स्यौणेयक ) इन सब को जल के साथ पीसकर 'शरैषिका' ( सरकण्डा ) के ऊपर, जौ के समान बीच में से मोटी और पासों पर पतली एवं अंगूठे के बराबर मोटी, आठ अंगुल लम्बी बत्ती बना लेनी चाहिये, उसे सूख जाने पर सरकण्डे पर से बीच से खोखली खींच कर उतारनी चाहिये, बत्ती को घी से स्निग्ध करके सुख पूर्वक नित्य प्रति पान करे । यह प्रायोगिक-नित्य पीने योग्य धूम है ॥१८-२२॥ स्नैहिक धूम— वसा-घृत-मधूच्छिष्टैर्युक्तियुक्तैर्वरौषधैः ॥ २३ ॥ वर्तिं मधुरकैः कृत्वा स्नैहिकीं धूममाचरेत् । वसा ( चर्बी ), घृत ( घी ), मधूच्छिष्ट ( मोम ), इनको जीवनीय गण के साथ वर्त्ती बनने योग्य मात्रा में मिलाकर वर्त्ती बना ले । रूक्ष व्यक्ति स्नेहन करने वाले इस स्नैहिक धूम का पान करे; इस धूम का नित्य व्यवहार नहीं करना चाहिये ॥ २३ ॥

७० चरकसंहिता [अ० ५ शिर में अवरुद्ध कफ को निकालने के लिये स्वस्थ पुरुष के लिये वैरेच- निक धूम— श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालं मनःशिला ॥ २४ ॥ गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमः शीर्षविरेचनम् । श्वेता ( अपराजिता ), ज्योतिष्मती ( माल कंगनी ), हरिताल ( हरताल ), मनःशिला ( मैनसिल ), 'गन्ध अगुरु पत्रादि' ( ज्वर चिकित्सा में 'अगुरुआदि तेल' में कहे हुए अगरू, कुष्ठ, तगर, पत्रज आदि [ इनमें कुष्ठ और तगर को छोड़कर अन्य] द्रव्य लेकर पीसकर पूर्व की भांति बत्ती बना कर पीना चाहिये । यह धूम शिरोविरेचन के लिये वैरेचनिक धूम है ॥ २४ ॥ धूमपान के गुण— गौरवं शिरसः शूलं पीनसार्धावभेदकौ ॥ २५ ॥ कर्णाक्षिशूलं कासश्च हिक्काश्वासौ गलग्रहः । दन्तदौर्बल्यमास्रावः श्रोत्रघ्राणाक्षिदोषजः ॥ २६ ॥ पूतिघ्राणास्यगन्धश्च दन्तशूलमरोचकः । हनुमन्याग्रहः कण्डूः क्रिमयः पाण्डुता मुखे ॥ २७ ॥ श्लेष्मप्रसेको वैस्वर्यं गलशुण्ड्युपजिह्विका । खालित्यं पिञ्जरत्वं च केशानां पतनं तथा ॥ २८ ॥ क्षवथुश्चातितन्द्रा च बुद्धेर्मोहोऽतिनिद्रता । धूमपानात्प्रशाम्यन्ति बलं भवति चाधिकम् ॥ २९ ॥ शिरोरुहकपालानामिन्द्रियाणां स्वरस्य च । न च वातकफात्मानो बलिनोऽप्यूर्ध्वजत्रुजाः ॥ ३० ॥ धूमवक्त्रकपानस्य व्याधयः स्युः शिरोगताः । ( गौरव ) शिर का भारीपन, शिर का दुखना, शिरोवेदना ( पीनस ) नाक की श्लैष्मिक कला का सूजन, ( अर्द्धावभेदक ) आधा-सीसी, ( कर्णशूल ) कान की पीड़ा, ( अक्षिशूल ) आंख का दुःखना, ( कास ) खांसी, ( हिक्का ) हिचकी, ( श्वास ) दमा, ( गलग्रह ) स्वर भंग, ( दन्तदौर्बल्य ) दान्तों की निर्बलता, ( आस्राव ) कान नाक और आंख के रोग स्राव का आना, ( पूतिघ्राण ) नाक से दुर्गन्ध आना, ( आस्यगन्ध ) मुख की बदबू, ( दन्तशूल ) दाँत की पीड़ा, ( अरोचक ) भोजन में अरुचि, अनिच्छा, ( हनुग्रह ) जबाड़ी भिंचना, (मन्या- ग्रह ) गर्दन का जकड़ जाना, इधर-उधर न हिलना, ( कण्डू ) खाज, कृमि, ( मुखपाण्डुता ) चेहरे का पीलापन, ( श्लेष्मप्रसेक ) मुख से पानी का बहना