चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४५१
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४५१ साध्यानामपि ह्युपेक्ष्यमाणानामेषां त्वङ्-मांस-शोणित-लसीका-को- थ-क्लेद-संस्वेदजाः कृमयोऽभिमूर्च्छन्ति । ते भक्षयन्तस्त्वगादीन् दोषांश्च पुनर्दुष्यन्त इमानुपद्रवान् पृथक्पृथगुत्पादयन्ति । साध्य कुष्ठों में भी उपेक्षा करने से त्वचा, मांस, रक्त, लसीका में सड़ना, स्राव और पसीने से कीड़े उत्पन्न होजाते हैं। ये कृमि त्वचा आदि को खाते हैं, और वात आदि दोष और अधिक दूषित होकर नीचे लिखे उपद्रवों को पृथक् पृथक् रूप में उत्पन्न करते हैं। तत्र वातः श्यावारुणवर्णपरुषतामपि च रौक्ष्य-शूल-शोष-तोद-वेपथु- व्यथा-हर्ष-संकोचाऽऽयास-स्तम्भ-सुप्ति-भेद-भङ्गान्, पित्तं पुनर्दाह-स्वेद- क्लेद-कोथ-कण्डू-स्राव-पाक-रागान्, श्लेष्मा त्वस्य श्वैत्य-शैत्य-स्थैर्य- कण्डू-गौरवोत्सेधोपस्नेहोपलेपान्, कृमयस्त्वगादींश्चातुरः शिराः स्नायूनि मांसान्यस्थीन्यपि च तरुणानि खादन्ति ॥ १८ ॥ अस्यामवस्थायामुपद्रवाः कुष्ठिनं स्पृशन्ति । तद्यथा—प्रस्रवण- मङ्गभेदः पतनान्यङ्गावयवानां तृष्णा-ज्वरातिसार-दाह-दौर्बल्यारोचका- विपाकाश्च, तद्विधमसाध्यं विद्यादिति ॥ १९ ॥ उपद्रव—वायु के कोप के कारण रंग लाल, काला, कर्कशता, रूक्षता, शूल चुभने की सी वेदना, बींधने का सा अनुभव, रोमांच, हर्ष, कम्प, संकोच, श्रम, स्तम्भ, अंग का सो जाना, भेदन या भंग अर्थात् अंगों का टूटना—ये उपद्रव होते हैं। पित्तप्रकोप के कारण दाह, पसीना, क्लिन्नता, सड़ना, खाज, स्राव, पकना इत्यादि उपद्रव होते हैं। कफ के प्रकोप के कारण, श्वेत वर्ण, शीतलता, खाज, स्थिरता, भारीपन, उभार, चिकनास, उपलेप होना ये— उपद्रव होते हैं। इस प्रकार से उत्पन्न कीड़े त्वचा आदि चार धातुओ को तथा शिरा, स्नायु, मांस एवं कोमल अस्थियों (जैसे नाक की कोमल अस्थि) को खाने लगते हैं। इस अवस्था में कुष्ठरोगी को निम्न लिखित उपद्रव घेर लेते हैं। यथा-स्राव का बहना, अंगों का फटना या टूटना, अंगों का गिरना, तृष्णा, ज्वर, अतिसार, दाह, निर्बलता, अरुचि, अविपाक ये उपद्रव होते हैं। इस अवस्था में रोग असाध्य हो जाता है ॥ १८-१९ ॥ चात्र—साध्योऽयमिति यः पूर्वं नरो रोगमुपेक्षते । स किंचित्कालमासाद्य मृत एवावबुध्यते ॥ २० ॥ यस्तु प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु च ।
४५४ चरकसंहिता [ अ० ६ भेषजं कुरुते सम्यक् स चिरं सुखमश्नुते ॥ २१ ॥ यथा स्वल्पेन यत्नेन छिद्यते तरुणस्तरुः । स एवातिप्रवृद्धस्तु छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥ २२ ॥ एवमेव विकारोऽपि तरुणः साध्यते सुखम् । विवृद्धः साध्यते कृच्छ्रादसाध्यो वाऽपि जायते ॥ २३ ॥ जो मनुष्य रोग के आरम्भ में 'साध्य' है ऐसा समझ कर उपेक्षा कर देता है, वह थोड़े समय पीछे ही मुर्दा होकर ( असाध्यावस्था में आकर ) ही चेतता है, और रोग के असाध्य होने पर ही उसकी नींद टूटती है । जो मनुष्य-रोग के आक्रमण से पूर्व ही या रोग की नवीन अवस्था में ही औषध उपचार कर लेता है, वह देर तक सुख ( जीवन ) का उपभोग करता है । जिस प्रकार थोड़े से परिश्रम से ही छोटा वृक्ष काटा जा सकता है, वही वृक्ष बड़ा होने पर बहुत परिश्रम से कटता है, इसी प्रकार नवीन अवस्था में रोग भी सुगमता से अच्छा हो जाता है और यही रोग बढ़ने पर कठिनाई से अच्छा होता है, अथवा असाध्य रूप में बदल जाता है ॥२०-२३॥ तत्र श्लोकाः-संख्या द्रव्याणि दोषाश्च हेतवः पूर्वरक्षणम् । रूपाण्युपद्रवाश्चोक्ताः कुष्ठानां कौष्ठिके पृथक् ॥ २४ ॥ इस कुष्ठनामक अध्याय में कुष्ठों की संख्या, द्रव्य, हेतु, दोष, पूर्वरूप, और उपद्रव ये सब विषय पृथक् पृथक् कह दिये हैं ॥ २४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने कुष्ठनिदानं नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ षष्ठोऽध्यायः । अथातः शोषनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब शोष के निदान की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२॥ इह खलु चत्वारि शोषस्याऽऽयतनानि । तद्यथा-साहसं, संधा... क्षयो, विषमाशनमिति ॥ ३ ॥ शोष रोग के चार कारण होते हैं जैसे-( १ ) साहस, ( २ ) सन्...
( मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना ), ( ३ ) क्षय, ( ४ ) विषमाशन ( विषम गुणों वाले अन्नों का भोजन करना ), ॥ ३ ॥ तत्र यदुक्तं साहसं शोषस्याऽऽयतनमिति तदनुव्याख्यास्यामः—यदा पुरुषो दुर्बलो हि सन् बलवता सह विगृह्णाति, अतिमहता वा धनुषा व्यायच्छति, जल्पति वाऽप्यतिमात्रं, अतिमात्रं वा भारमुद्वहति, अप्सु वा प्लवते चातिदूरं, उत्सादनपदाघाताने वाऽतिप्रगाढमासेवते, अति- प्रकृष्टं वाऽध्वानं द्रुतमभिधावति, अभिहन्यते वाऽन्यद्वा किंचिदेवंविधं विषममतिमात्रं वा, व्यायामजातमारभते; तस्यातिमात्रेण कर्मणा उरः क्षण्यते ॥ साहस शोषरोग का कारण है, यह जो कहा है, इसकी व्याख्या करेंगे— जब कोई दुर्बल पुरुष अपने से बलवान् व्यक्ति के साथ कुश्ती आदि करता है, बहुत बड़े धनुष को तानता है, अथवा बहुत अधिक बोलता है, बहुत अधिक बोझ को उठाता है, पानी में बहुत तैरता है, बहुत ऊंचा लम्बा कूदता है, जोर से भूमि पर पांव पटकता है, या बहुत लम्बे या कठिन रास्ते को बहुत तेज़ो से पार करता है, अथवा ऊंचे-नीचे या किसी भारी दुःसह कार्य द्वारा चोट खाता है या और कोई ऐसा ही विषम या बहुत अधिक व्यायाम करता है अथवा आरम्भ किये कार्य को बहुत अधिक करता है; इससे उस की छाती फट पड़ती है ॥ तस्योरःक्षतमुपस्रवते वायुः, स तत्रावस्थितः श्लेष्माणमुरःस्थमुपसं- सृज्य शोषयन् विहरत्यूर्ध्वमधस्तिर्यक् च । योऽशस्तस्य शरीरसंधीना- विशति तेनास्य जृम्भाऽङ्गमर्दो ज्वरश्चोपजायते, यस्त्वमाशयमभ्युपैति तेनास्य वर्चो भिद्यते, यस्तु हृदयमाविशति तेन रोगा भवन्त्युरस्याः, यो रसनां तेनास्यारोचकश्च, यः कण्ठं प्रपद्यते, कण्ठस्तेनोद्ध्वंस्यते स्वरश्चावसीदति, यः प्राणवहानि स्रोतांस्यन्वेति तेन श्वासः प्रतिश्या- यश्चोपजायते, यः शिरस्यवतिष्ठते शिरस्तेनोपहन्यते ॥३॥ इन घावों में वायु प्रवेश कर जाता है । वायु प्रवेश करके छाती में स्थित कफ के साथ मिलकर इसको सुखाकर ऊपर, नीचे या तिर्यक् दशा में स्वयं गमन करने लगता है । इस वायु का जो अंश शरीर की सन्धियों में जाता है, जम्भाई, अंगों का टूटना और ज्वर उत्पन्न हो जाता है और जो अंश में पहुँचता है उससे मल पतला आता है, जो भाग हृदय में पहुँचता हृदय ( छाती ) में अन्य रोग होते हैं । जो जीभ में पहुँचता है उससे
४५६ चरकसंहिता [ अ० ६ अरुचि, जो भाग कण्ठ में पहुँचता है, उससे कण्ठ नष्ट होता तथा स्वरभंग हो जाता है, जो भाग प्राणवह स्रोतों में पहुँचता है उससे श्वास और प्रतिश्याय उत्पन्न होते हैं और जो भाग शिर में पहुंचता है उससे शिरोरोग होता है ॥३॥ ततः क्षणाच्चैबोरसो विषमगतित्वाच्च वायोः कण्ठस्य चोद्ध्वं- सनात्कासः सततमस्य संजायते, स कासप्रसङ्गादुरसि क्षते शोणितं ष्ठीवति, शोणितागमाच्चास्य दौर्गन्ध्यमुपजायते, एवमेते साहसप्रभवाः साहसिकमुपद्रवाः स्पृशन्ति । ततः सोऽप्युपशोषणैरेतैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमान् बलमात्मनः समीक्ष्य तदनुरूपाणि कर्माण्यारहभेत कर्तुं, बलसमाधानं हि शरीरं, शरीरमूलश्च पुरुष इति ॥ ४ ॥ इसके अनन्तर छाती में व्रण होने और वायु की विषम गति होने से तथा कण्ठ के खर्खर बनने से निरन्तर कास (खाँसी), उत्पन्न हो जाता है । कास के होने से छाती में व्रण बनने से थूक में रक्त आ जाता है, रक्त के आने से दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार से साहस करने वाले पुरुष को साहस से उत्पन्न होने वाले उपद्रव घेर लेते हैं । इन शुष्क करने वाले उपद्रवों से आक्रान्त होकर पुरुष भी धीरे-धीरे सूख जाता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपने बल को देखकर तदनुसार कार्य का आरम्भ करे । बल के कारण ही शरीर अच्छे प्रकार से धारण किया जाता है और शरीर ही पुरुष अर्थात् आत्मा का मुख्य आश्रय है ॥ ४ ॥ भवति चात्र-साहसं वर्जयेत्कर्म रक्षञ्जीवितमात्मनः । जीवन् हि पुरुषस्त्विष्टं कर्मणः फलमश्नुते ॥ ५ ॥ अपना जीवन चाहने वाले पुरुष को साहस के कार्य छोड़ देने चाहिये, क्योंकि जीता हुआ पुरुष ही अपने कर्म का इष्टफल भोग सकता है ॥५॥ अथ संधारणं शोषस्याऽऽयतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः- यदा पुरुषो राजसमीपे भर्तृसमीपे वा गुरोर्वा पादमूले द्यूतसभामन्यं सतां समाजं स्त्रीमध्यं वाऽनुप्रविश्य यानैर्वाऽप्युच्चावचैरभियन् भयात् प्रसंगात् ह्रीमत्त्वाद् घृणित्वाद्रा निरुणद्ध्यागतानि वातमूत्रपुरीषाणि, तदा तस्य संधारणाद्वायुः प्रकोपमाद्यते । स प्रकुपितः पित्तश्लेष्माणौ समुदीर्योर्ध्वमधस्तिर्यक् च विहरति । तत्रग्दांशविशेषेण पूर्वं वयवविशेषं प्रविश्य शूलं जनयति, भिनत्ति पुरीषमुच्छोष पार्श्वे चातिरुजति, अंसौ चावमृद्नाति, कण्ठमुरश्चावधमति,
अ० ६ ] निदानस्थानम ४५७
अ० ६ ] निदानस्थानम ४५७ च्छोपहन्ति, कासं श्वासं ज्वरं स्वरभेदं प्रतिश्यायं चोपजनयति । ततः सोऽप्युपशोषणैरेतै रुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमानात्मनः शरीरेष्वेव योगक्षेमकरेषु प्रयतेत । शरीरं ह्यस्य मूलं, शरीरमूलश्च पुरुषो भवतीति ॥ ६ ॥ भवति चात्र—सर्वमन्यत्परित्यज्य शरीरमनुपालयेत् । तद्भावे हि भावानां सर्वाभावः शरीरिणाम् ॥ ७ ॥ इति ॥ ( २ ) वेग सन्धारण मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना शोष का कारण है, यह जो कहा है उसकी व्याख्या करते हैं— जिस समय पुरुष राजा के समीप, स्वामी के समीप, गुरु की चरणसेवा में, जुआखाने मे, अथवा इसी प्रकार दूसरे सज्जन मनुष्यों की सभा में, या स्त्रियों के बीच में घुसकर, या ऊंची-नीची सवारी पर यात्रा करते समय, भय से, प्रसंग से, लज्जा से वा घृणा से वायु मूत्र या मल के उपस्थित वेगों को रोक लेता है, तब उनके रोकने से वायु प्रकुपित हो जाता है । यह प्रकुपित हुआ वायु, पित्त और कफ को कुपित करके ऊपर-नीचे या तिरछे रूप में बहता है और तब किसी भाग से शरीर के अवयव विशेष में प्रवेश करके पूर्व की भांति शूल उत्पन्न करता है, मल का भेदन अथवा शोषण करता है । रोगी के पार्श्वों में पीड़ा उत्पन्न करता है, कन्धों को तोड़ सा डालता है, (कन्धों का आकार बोतल की गर्दन के समान हो जाता है, समकोण नहीं रहता ), कण्ठ और छाती पीड़ित होते हैं, शिर में वेदना होती है । कास, श्वास, ज्वर, स्वरभेद, प्रतिश्याय रोग उत्पन्न हो जाते हैं । रोगी भी इन शोषण करनेवाले उपद्रवों से धीरे-धीरे सूखने लगता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपना शरीर जिस प्रकार से सुखी, स्वस्थ रहे, उस प्रकार का विशेष रूप से प्रयत्न करे, क्योंकि जो भी कोई अमूल्य अलभ्य वस्तु है वह शरीर से ही होती है और पुरुष का शरीर ही आधार है । इसलिये और सब कुछ छोड़कर शरीर को रक्षा करनी चाहिये । शरीर के न रहने पर सब वस्तुओं का होना या न होना एक समान है । शरीर के होने पर ही और सब पदार्थ उपयोगी होते हैं ॥ ६-७ ॥ क्षयः शोषस्याऽऽयतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः—यदा पुरु- । शोक-चिन्ता-परीत-हृदयो भवति, ईर्ष्योत्कण्ठा-भय-क्रोधा- ते, कृशो वा सन् रूक्षान्नपानसेवी भवति, दुर्बल- हारोऽल्पाहारो वाऽऽस्ते, तदा तस्य हृदयस्थायी रसः क्षयमु-
४५८ चरकसंहिता [ अ० ६ पैति, स तस्योपक्षयात्संशोषं प्राप्नोति, अप्रतीकाराच्चानुबध्यते यक्ष्मणा ऽथोपदेक्ष्यमाणरूपेण ॥ ८ ॥ (३) 'क्षय' शोषरोग का कारण है, यह जो पहिले कहा है, उसकी व्याख्या करेंगे—जिस मनुष्य के हृदय में शोक वा चिन्ता, बहुत काम, ईर्ष्या, उत्कण्ठा, भय, क्रोध (लोभ, मोह) आदि भाव मन में बहुत प्रवेश कर जायें वा जो कृश होता हुआ फिर रूखे खान-पान का सेवन करे, शरीर से दुर्बल प्रकृति हो कर उपवास या आवश्यकता से न्यून भोजन ले, तब उस के हृदय में रहनेवाला रस (ओज) क्षय होने लगता है और इस रस (ओज) के क्षय होने से मनुष्य सूखने लगता है और इसका प्रतिकार न करने से पुरुष राजयक्ष्मा रोग से पीड़ित होता है। जैसा कि आगे उपदेश करेंगे ॥ ८ ॥ यदा वा पुरुषोऽतिप्रहर्षात्प्रसक्तभावः स्त्रीष्वतिप्रसङ्गारभते, तस्या- तिमात्रप्रसङ्गाद्रेतः क्षयमुपैति । क्षयमपि चोपगच्छति रेतसि यदि मनः स्त्रीभ्यो नैवास्य निवर्त्तते एव । तस्य चातिप्रणीतसंकल्पस्य मैथुनमा- पद्यमानस्य शुक्रं च न प्रवर्त्तते, अतिमात्रोपक्षीणत्वात् ; अथास्य वायु- र्व्यायच्छमानशरीरस्यैव धमनीरनुप्रविश्य शोणितवाहिनीस्ताभ्यः शोणितं प्रच्यावयति, तच्छुक्रक्षयाच्छुक्रमार्गेण शोणितं प्रवर्त्तते वातानु- सृप्तलिङ्गम् । अथास्य शुक्रक्षयाच्छोणितप्रवर्त्तनाच्च संघयः शिथिलीभ- वन्ति, रौक्ष्यमुपजायते, भूयः शरीरं दौर्बल्यमाविशति, वायुः प्रकोप- मापद्यते । स प्रकुपितोऽवशिष्टं शरीरमनुसर्पन् परिशोषयति मांस- शोणिते, प्रच्यावयति श्लेष्मपित्ते, संसृजति पार्श्वे, चावगृह्णात्यंसौ, कण्ठमुद्ध्वंसयति, शिरः श्लेष्माणमुपक्लेद्य प्रतिपूरयति श्लेष्मणा संधींश्च प्रपीडयन् करोत्यङ्गमर्दमरोचकाविपाकौ च, पित्तश्लेष्मोत्क्ले- शात्प्रतिलोमगत्वाच्च वायुर्ज्वरं कासं स्वरभेदं प्रतिश्यायं चोपजन- यतिः, ततः सोऽप्युपशोषणैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैःशनैरुपशुष्यति । तस्मा- त्पुरुषो मतिमानात्मनः शरीरमनुरक्षन् शुक्रमनुरक्षेत् । परा ह्येषा फल- निर्वृत्तराहारस्येति ॥ ६ ॥ भवति चात्र—आहारस्य परं धाम शुक्रं तद्रक्ष्यमात्मनः । क्षयो ह्यस्य बहून् रोगान्मरणं वा नियच्छति ॥ १० ॥ शुक्रक्षय—जिस समय पुरुष अति कामवेग के ... में आसक्त होकर अति सम्भोग आरम्भ कर देता है, उस का ...
करने से वीर्य का क्षय हो जाता है। वीर्य के क्षय होने पर भी जब मन स्त्रीसंग से नहीं हटता और संग करता ही जाता है तब अति प्रचण्ड कामवासना के कारण मैथुन करने पर भी वीर्य उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि वीर्य बहुत अधिक क्षीण हो चुका होता है। इस समय सम्भोग रूप परिश्रम करते हुए वायु रक्तवाहिनी धम- नियों में प्रवेश करके इनसे रक्त बहाने लगता है। तब शुक्र (वीर्य) के क्षय से शुक्रमार्ग द्वारा वायु के साथ मिला रक्त बाहर आने लगता है। इस अवस्था में वीर्य के क्षय से तथा रक्त के निकलने से शरीर की सन्धियां शिथिल हो जाती हैं, शरीर में रूक्षता आ जाती है, शरीर और अधिक कमजोर हो जाता है और वायु का प्रकोप हो जाता है। इस प्रकार से प्रकुपित वायु शून्य (अशक्त) शरीर में संचार करता हुआ मांस और रक्त को शुष्क कर देता है, कफ और पित्त को बाहर निकालता है, पाश्र्वों में पीड़ा उत्पन्न करता है, कन्धों को दबा देता है, गले को बिगाड़ देता है, कफ को कुपित करके शिर को कफ से भर देता है, सन्धियों को पीड़ित करके अंगों में वेदना उत्पन्न करता है, पित्त और कफ को कुपित करके अरुचि एवं अपचन उत्पन्न करता है। वायु की प्रतिलोम गति होने से ज्वर, कास, श्वास, स्वरभेद और प्रतिश्याय रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इस अवस्था में पुरुष शोषण करने वाले इन उपद्रवों से पीड़ित होकर धीरे धीरे शुष्क हो जाता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपने शरीर की रक्षा करता हुआ शुक्र अर्थात् वीर्य की रक्षा करे। यही शुक्र (वीर्य) आहार का सर्वोत्तम फल होता है। आहार का सर्वोत्कृष्ट सार वीर्य है, इसका रक्षण करना परम आवश्यक है। इसका क्षय बहुत से रोगों वा मृत्यु का भी कारण होता है ॥६-१०॥ विषमाशनं शोषस्याऽयतनमिति यदुक्तं, तदनुव्याख्यास्यामः-यदा पुरुषः पानाशनभक्ष्यलेह्योपयोगान् प्रकृति-करण-संयोग-राशि- देश-कालोपयोग-संस्थोपशय-विषमानासेबते, तदा तस्य बातपित्त- श्लेष्माणो वैषम्यमापद्यन्ते, ते विषमाः शरीरमनुसृत्य यदा स्रोतसाम- यनमुखानि प्रतिवार्यावतिष्ठन्ते तदा जन्तुर्यद्यदाहारजातमाहरति तत्त- दस्य मूत्रपुरीषमेवोपजायते भूयिष्ठं नान्यस्तथा शरीरधातुः, स पुरी- षोपष्टम्भाद्वर्तयति, तस्माच्छुष्यतो विशेषेण पुरीषमनुरक्ष्यं, तथा त्यर्थकृशदुर्बलानां, तस्यानाप्याय्यमानस्य विषमाशनोपचिता स्ते पृथगुपद्रवैर्युञ्जन्तो भूयः शरीरमुपशोषयन्ति । तत्र वातः- कण्ठोद्ध्वंसनं पार्श्वशूलनमंसावमर्दनं स्वरभेदं प्रतिश्यायं
४६० चरकसंहिता [ अ० ६
षोपजनयति, पित्तं पुनर्ज्वरमतीसारमन्तर्दाहं च, श्लेष्मा तु प्रति- श्यायं शिरसो गुरुत्वं कासमरोचकं च । स कासप्रसंगादुरसि क्षते शोणितं ष्ठीवति, शोणितगमनाच्चास्य दौर्बल्यमुपजायते । एवमेते विषमाशनोपचिता दोषा राजयक्ष्माणमभिनिर्वर्तयन्ति । तैरुपशो- षणैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमान् प्र- कृति-करण-संयोग-राशि-देश-कालोपयोग-संस्थोपशयादविषममाहारमा- हरेदिति ॥ ११ ॥ भवति चात्र—हिताशी स्यान्मिताशी स्यात्कालभोजी जितेन्द्रियः । पश्यन् रोगान् बहून्कष्टान्बुद्धिमान्विषमाशनात् ॥ १२ ॥ इति । ( ४ ) विषमाशन—विषमाशन शोष रोग का कारण है, यह जो कहा है अब उस की व्याख्या करेंगे— जब मनुष्य प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोग, संस्था तथा उपशय के विरुद्ध, पान-अशन, भक्ष्य और लेह्य रूप में अन्न-पान का उपयोग करता है, तब उस के वात, पित्त और कफ विषम हो जाते हैं । ये विकृत दोष जिस समय शरीर में फैलकर स्रोतसों वा नाड़ियों के मुखों को घेर लेते हैं तब मनुष्य जो भी भोजन खाता है उस का अधिक भाग मूत्र और मल में बदलकर इन को ही अधिक बढ़ाता है, इस प्रकार शरीर के अन्य धातु नहीं बढ़ते । पुरुष मल के रुकने से ही जीवन धारण किया करता है । इसलिये शुष्क होते हुए पुरुष के मल की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये । इस प्रकार कृश होते हुए मनुष्य के विषम भोजन से बढ़े हुए दोष नाना उपद्रवों से युक्त होकर और भी शरीर को सुखा देते हैं; तब कुपित हुआ वातशूल, अंगों का टूटना, कण्ठभेद, पाश्र्वों में पीड़ा, कन्धों का टूटना, स्वरभेद और प्रतिश्याय उत्पन्न करता है । पित्तज्वर, अतिसार और अन्तर्दाह को उत्पन्न करता है । श्लेष्मा—प्रतिश्याय, शिर का भारीपन, कास और अरुचि उत्पन्न करता है । कास के कारण छाती में व्रण होने से थूक में रक्त आता है । रक्त के निकलने से कमज़ोरी आ जाती है । इस प्रकार से विषम भोजन द्वारा एकत्रित हुए दोष राजयक्ष्मा रोग को उत्पन्न करते हैं। शोषण करने वाले इन उपद्रवों से पीड़ित होने पर धीरे धीरे मनुष्य सूखने लगता है । इसलिये बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोग, संस्था और उपशय के अनुकूल खान पान करे१ ।
१. इस का विस्तार 'रस-विमान' नामक अध्याय में कहेंगे ।
अ० ६ ] निदानस्थानम् ४६१
अ० ६ ] निदानस्थानम् ४६१ बुद्धिमान् मनुष्य विषमाशन के कारण नाना प्रकार के कष्टदायक रोगों की उत्पत्ति को देखकर, हितकारक, परिमित और समय पर भोजन करने वाला और जितेन्द्रिय बने ॥ ११-१२ ॥ एवमेतैरैश्चतुर्भिः शोषस्याऽऽयतनैरभ्युपसेवितैर्वात-पित्त-श्लेष्माणः प्रकोपमापद्यन्ते, ते प्रकुपिता नानाविधैरुपद्रवैः शरीरमुपशोषयन्ति । तं सर्वरोगाणां कष्टतमत्वाद्राजयक्ष्माणमाचक्षते भिषजः । यस्माद्वा पूर्व- मासीद्भगवतः सोमस्योडुराजस्य तस्माद्राजयक्ष्मेति ॥ १३ ॥ राजयक्ष्मा शब्द की निरुक्ति—शोष रोग के कहे हुए इन चार कारणों के सेवन करने से, वात, पित्त, कफ ये तीनों दोष प्रकुपित हो जाते हैं । ये दोष कुपित होकर नाना प्रकार के उपद्रवों से शरीर का शोषण करते हैं । यह रोग सब रोगों में अधिक कष्टसाध्य है, इसलिये वैद्य लोग इस को 'राजयक्ष्मा' कहते है । अथवा यह क्षय पहले नक्षत्रराज चन्द्रमा को रहा, इसलिये इस का नाम 'राजयक्ष्मा' है ॥ १३ ॥ तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा—प्रतिश्यायः क्षवथुरभीक्ष्णं श्लेष्मप्रसेको मुखमाधुर्यमनन्नाभिलाषोऽन्नकाले चाऽस्यासो दोषदर्शन- मदोषेष्वल्पदोषेषु वा पात्रोदकान्न-सूपोपदंश-परिवेशकेषु मुक्तवतो हृल्ला- सस्तथोल्लेखनमाहारस्यान्तरान्तरा मुखस्य पादयोश्च शोषः पाण्योरवा- वेक्षणमत्यर्थमक्ष्णोः श्वेतावभासता चातिमात्रं बाहोश्च प्रमाणजिज्ञासा स्त्रीकामताऽतिघृणित्वं बीभत्सदर्शनता चास्य काये स्वप्ने चाभीक्ष्णं दर्शनमनुदकानामुदकस्थानानां, शून्यानां च ग्राम-नगर-निगमन-जनपदानां शुष्कदग्धावभग्नानां च वनानां कृकलास-मयूर-वानर-शुक-सर्प-काको- लूकादिभिः संस्पर्शनमधिरोहणं वा यानं च श्वोष्ट्र-खर-वराहैः केशास्थि- भस्म-तुषाङ्गार-राशीनां चाधिरोहणमिति शोषपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥१४॥ शोष के पूर्वरूप—शोष रोग के ये पूर्व रूप हैं । यथा—प्रतिश्याय (जुकाम), छींक आना, बार बार कफ का गिरना, मुख में मिठास, भोजन की अनिच्छा, भोजन करते समय थकान की प्रतीति, पात्र, पानी, अन्न, दाल, चटना, शाक आदि निर्दोष या अल्प दोषवाली वस्तुओं में भी दोष देखना, भोजन करते समय जी मचलाना, मुंह में पानी बहुत आना, खाये हुए अन्न का वमन होना, मुख और पांव का सूखना, हाथों को बहुत अधिक देखते रहना, आंखों का जाना ( रक्त की न्यूनता ), भुजाओं में मोटाई, जांचने की प्रवृत्ति, , अपने शरीर से घृणा या अपने शरीर में भयंकर रूप देखना
५६२ चरकसंहिता [ अ० ६. और स्वप्न में पानी से रहित स्थानों में पानी को देखना, शून्य स्थानों में ग्राम, नगर, जनपदों की प्रतीति होना जंगों का जकना, शुष्क होना या टूटना देखना, गिरगट, मोर, बन्दर, तोता, सांप, कौवा, उल्लू आदि के साथ स्पर्श की प्रतीति, कुशा, ऊंट, गधा, सुअर आदि पर चढ़कर सवारी करना, केश, अस्थि, भस्म, भूसा, अंगारे के ढेरों पर चढ़ना आदि देखना, ये शोष रोग के पूर्वरूप हैं ॥ १४ ॥ अत ऊर्ध्वमेकादश रूपाणि तस्य भवन्ति, तद्यथा—शिरसः प्रति- पूरणं कासः श्वासः स्वरभेदः श्लेष्मणश्छर्दनं शोणित-ष्ठीवनं पार्श्वसं- रुजनमंसावमर्दो ज्वरोऽतीसारस्तथाऽरोचक इति ॥ १५ ॥ - ग्यारह रूप—इस के बाद राजयक्ष्मा के ग्यारह लक्षण हो जाते हैं । यथा- ( १ ) शिर का कफ से भरना, ( २ ) कास, ( ३ ) श्वास, ( ४ ) स्वरभेद, ( ५ ) कफ का गिरना, ( ६ ) थूक में रक्त आना, ( ७ ) पाश्र्वों में दर्द, ( ८ ) कन्धों का नीचे दबना, ( ६ ) ज्वर, ( १० ) अतिसार और ( ११ ) अरोचक ( अरुचि ) ॥ १५ ॥ तत्रापरिक्षीण-मांस-शोणितो बलवानजातारिष्टः सर्वैरपि शोषलिङ्गै- रुपद्रुतः साध्यो ज्ञेयः, बलवर्णोपचयोपचितो हि सहिष्णुत्वाद् व्या- ध्यौषधबलस्य कामं सुबहुलिङ्गोऽप्यल्पलिङ्ग एव मन्तव्यः । दुर्बलं त्व- विक्षीण-मांस-शोणितमल्पलिङ्गमप्यजातारिष्टमपि बहुलिङ्गमेव जाता- रिष्टमेव विद्यात्, तदसङ्गत्वद् व्याध्यौषधबलस्य, तं परिवर्जयेत्, क्षणेन हि प्रादुर्भवन्त्यरिष्टानि, अनिमित्तश्चारिष्टप्रादुर्भाव इति ॥१६॥ साध्य और असाध्य रूप—जिस रोगी के मांस और रक्त कम नहीं हुए, और शक्ति बनी हुई है और अरिष्ट-लक्षण उत्पन्न नहीं हुए, ऐसे रोगी को यदि सब उपद्रव भी घेर लें तो भी रोगी साध्य है, क्योंकि जिस रोगी के बल और वर्ण सुरक्षित हैं, यह व्याधि और औषध के बल को सुगमता से सह सकता है । इसलिये इस प्रकार का रोगी बहुत लक्षणों से युक्त होने पर भी थोड़े लक्षणों वाला ही गिनना चाहिये । जो रोगी मांस और रक्त के क्षीण होने से बहुत दुर्बल हो गया हो, इस में लक्षण चाहे थोड़े ही हों और कोई अरिष्ट-लक्षण न भी उत्पन्न हुआ हो तो भी ऐसे रोगी को बहुत लक्षणों वाला और अरिष्ट लक्षणों से युक्त ही गिनना चाहिये, क्योंकि यह रोगी औषधि और रोग के सहन नहीं कर सकता, इसलिये छोड़ देना चाहिये । इस रोगी में
अ० ६ ] -निदानस्थानम् ४६३
अ० ६ ] -निदानस्थानम् ४६३ अन्दर अरिष्ट उत्पन्न हो सकते हैं और बिना कारण ही अरिष्ट लक्षण दीखने लगते हैं ॥ १६ ॥ तत्र श्लोकः—समुत्थानं च लिङ्गं च यः शोषस्यानुबुद्ध्यते । पूर्वरूपं च तत्त्वेन स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥ जो वैद्य शोष की उत्पत्ति, लक्षण और पूर्वरूप भली प्रकार से जानता है वह राजयक्ष्मा की चिकित्सा करने के योग्य है ॥ १७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने शोषनिदानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ सप्तमोऽध्यायः । अथात उन्मादनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब उन्माद निदान का वर्णन करेंगे ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ २ ॥ इह खलु पञ्चोन्मादा भवन्ति । तद्यथा—वात-पित्त-कफ-सन्निपा- ताऽऽगन्तु-निमित्ताः । उन्माद पांच प्रकार के हैं । जैसे—( १ ) वातजन्य, ( २ ) पित्तजन्य, ( ३ ) कफजन्य, ( ४ ) सन्निपातजन्य और ( ५ ) आगन्तुज । इन में से पहिले चार उन्माद दोषजन्य हैं । तत्र दोषनिमित्ताश्चत्वारः पुरुषाणामेवंविधानां क्षिप्रमभिनिर्वर्तन्ते तद्यथा,—भीरूणामुपक्लिष्टसत्त्वानामुत्सन्नदोषाणां च समलविकृतोप- हितान्यनुचितान्याहारजातानि वैषम्ययुक्तेनोपयोगविधिनोपयुञ्जानानां तन्त्रप्रयोगं वा विषममाचरतामन्यां वा चेष्टां विषमां समाचरतामत्यु- पक्षीणदेहानां च व्याधि-वेग-समुदीरितानामुपहतमनसां वा काम- क्रोध-लोभ-हर्ष-भय-मोहायास-शोक-चिन्तोद्वेगादिभिः पुनरभिघा- ताच्चाहतानां वा मनस्युपहते बुद्धौ च प्रचलितायामभ्युदीर्णा दोषाः कुपिता हृदयमुपसृत्य मनोवहानि स्रोतांस्यावृत्य जनयन्त्युन्मादम् ॥ ३ ॥ ( दोषजन्य उन्माद निम्न लक्षणोंवाले व्यक्तियों में शीघ्र उत्पन्न .जो मनुष्य डरपोक हों, जिन के शरीर में सत्त्व गुण न हो,
४६४ चरकसंहिता [ अ० ७
(अपि तु रज और तम हों), जिन में वात आदि दोष बढ़े हुए हों, जो अपवित्र बिगड़े हुए एवं विरोधी गुणवाले पदार्थों से मिले, अथवा कुष्ठ आदि के रोगी मनुष्यों द्वारा खाये हुए अन्न पान खाते हों, विषम रीति से भोजन करने वाले व्यक्तियों में, शास्त्रोक्त विधि के विरुद्ध आचरण करने वाले पुरुषों में, अथवा कोई अन्य प्रकार की विषम चेष्टा करने वाले व्यक्तियों में, जिन का शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया हो, जिनका चित्त रोग के वेग के कारण उद्भ्रान्त हो चुका हो, जिन का मन, काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, भय, मोह, आयास, (थकान), शोक, चिन्ता और उद्वेग आदि द्वारा दुःखित होता है, घाव या चोट के लगने से जिनका मन ठिकाने पर नहीं रहता तथा बुद्धि चलायमान हो गई हो, ऐसे मनुष्यों के वात आदि दोष प्रकुपित होकर, हृदय को दूषित करके (हृदय में पहुंचकर) मनोवह स्रोतों की गति को बन्द करके उन्माद रोग उत्पन्न करते हैं ॥ ३ ॥
उन्मादं पुनर्मनो-बुद्धि-संज्ञा-ज्ञान-स्मृति-भक्ति-शील-चेष्टाचार- विभ्रमं विद्यात् ॥ ४ ॥
उन्माद का लक्षण—मन, बुद्धि, संज्ञा, ज्ञान, स्मृति, भक्ति, शील, आहार, चेष्टा इनका विभ्रम अर्थात् विक्षिप्त होना 'उन्माद' कहाता है, इन के विकार से उन्माद-रोग होता है १ ॥४॥
तस्येमानि पूर्वरूपाणि। तद्यथा—शिरसः शून्यभावश्चक्षुषोराकुलता, स्वनः कर्णयोरुच्छ्वासस्याऽऽधिक्यमास्यसंस्रवणमनन्नाभिलाषोऽरोचका- विपाकौ हृदयग्रहो ध्यानायाससंमोहोद्वेगाश्चास्थाने सततं लोमहर्षो ज्वरश्चाभीक्ष्णमुन्मत्तचित्तत्वमुदीर्तिवमर्दिताकृतिकरणं च व्याधेः स्वप्ने च दर्शनमभीक्ष्णं भ्रान्तचलितावनवस्थितानां च रूपाणामप्रशस्तानां
१. मन चिन्तन का काम करता है, उस के विभ्रम से चिन्तन करने योग्य बातों को नहीं सोचता और चिन्तन न करने योग्य बातों की चिन्ता करता है। बुद्धि के विभ्रम से नित्य को अनित्य और प्रिय को अप्रिय देखने लगता है। संज्ञा, ज्ञान इस के विभ्रम से अग्नि से जलने की प्रतीति नहीं होती। स्मृति के विभ्रम से कुछ स्मरण नहीं होता या उल्टा स्मरण होता है। भक्ति अर्थात् इच्छा, इस के विभ्रम से पहिले जहां इच्छा थी वहां अनिच्छा हो जाती है। शील के विभ्रम से अति क्रोधी वा क्रोध के स्थान में भी जाता है। आचार के विभ्रम से अपवित्र आचरण करता है।
अ० ७] ३० निदानस्थानम् ४५१
अ० ७] ३० निदानस्थानम् ४५१ तिक्ष्णोडक-चक्राधिरोहणं वातकुण्डलिकामिश्नोन्मथनं निमज्जनं कङ्क- षाणामम्भसामावर्तेषु चक्षुषोश्चापसर्पणमिति दोषनिमित्तानामुन्मादानां पूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ५ ॥ उन्माद के पूर्वरूप—उन्माद के पूर्वरूप निम्नलिखित हैं । यथा—शिर (मस्तिष्क) का खालीपन, आंखों में चंचलता, कानों में ध्वनि का होना, श्वास का ज़ोर से चलना, मुख से लार गिरना, भोजन में अनिच्छा, अरुचि अविपाक, हृदयग्रह, बेमौके ध्यान, आयास (थकान), संमोह और उद्वेग होना, अर्थात् जहां पर न करने हों वहां इन का करना, निरन्तर रोमांच रहना, बार बार ज्वर का आना, चित्त का उन्मत्त रहना, उदर्द, कोठ निकलना (अंगों का सूजन या शरीर के उर्ध्व भाग में पीड़ा होना), अर्दित (मुख की आकृति का आधा टेढ़ा बनना), बुद्धि आदि का भ्रम होना, स्वप्न में भ्रान्त, चलित, चंचल या भयंकर स्वरूपों का बार-बार दीखना, अप्रशस्त कोल्हू (जिस यन्त्र से तेल निकाला जाता है) आदि उन पर बैठना, वातकुण्ड- लिका-रोग (मूत्ररोध विकार) का होना, गन्दे, खराब पानी के भवरों में खेलना, डुबकी मारना आदि, आंखों की अस्थिरता और चंचलता, दोषजन्य उन्मादों के ये पूर्वरूप हैं ॥ ५ ॥ ततोऽनन्तरमुन्मादाभिनिर्वृत्तिः, तत्रेहमुन्मादविशेषविज्ञानं भव- ति । तद्यथा परिसर्पणमक्षिभ्रुवोमोष्ठांस-हनु-हस्त-पाद-विक्षेपणमकस्मात्, अनियतानां च सततं गिरामुत्सर्गः, फेनागमनमास्यात्, स्मित-हसित- नृत्य-गीत-वादित्रादिप्रयोगाश्चास्थाने, वीणा-वंश-शङ्ख-शम्या-ताल-शब्दा- नुकरणमसाध्रा, यानमयानैरलङ्करणमनलङ्कारिकैर्द्रव्यैर्लोभोऽभ्यवहा- र्येष्वलव्धेषु, लब्धेषु चावमानस्तात्रं मात्सर्यं, कार्यं, पारुष्यमु- त्पिण्डताऽरुणाक्षता, वातोपशयविपर्ययादनुपशयता चेति वातोन्माद- लिङ्गानि भवन्ति ॥ ६ ॥ इन पूर्वरूपों के प्रकट होने के पीछे उन्माद रोग उत्पन्न होता है । उस समय उन्माद-रोग के विशेष लक्षण ये होते हैं:— (१) वातोन्माद के लक्षण—आंख और भौंहों का चलाते रहना (अस्थि- , जबड़ा (हनु), कन्धा, हाथ और पांव का फेंकना, बिना स्थान ः के) हंसना-मुसकुराना, नाचना, गाना, बजाना, वीणा
५६६ चरकसंहिता [ अ० ७ मुरजी, सनई, ताल १ आदि वाद्यों का बेसुरा अनुकरण करना, ऊंची और न चढ़ने योग्य सवारी पर चढ़ना, जिन वस्तुओं से शरीर का अलंकार नहीं करना चाहिये उन से अलंकार करना, न मिलने वाले खाद्य पदार्थों में इच्छा, क्षोभ, तथा प्राप्त वस्तुओं में तिरस्कार, बहुत अधिक द्वेष, मत्सरता ( ईर्ष्या ), कृशता, कठोरता, आंखों में लाली तथा आंखों का बाहर निकलना, वातवर्धक पदार्थों से रोग का बढ़ना ये वातजन्य उन्माद के लक्षण हैं ॥ ६ ॥ अमर्ष-क्रोध-संरम्भाश्चास्थाने, शस्त्र-लोष्ट्र-काष्ठ-मुष्टिभिरभिहननं स्वेषां परेषां वा, अभिद्रवणं, प्रच्छायशीतोदकामाभिलाषः, संतापोऽ- तिवेलं, ताम्र-हरित-हारिद्र-संरब्धाक्षता, पित्तोपशयविपर्यासादनुपशयता चेति पित्तोन्मादलिङ्गानि भवन्ति ॥ ७ ॥ ( २ ) पित्तजन्य उन्माद के लक्षण—अनुचित स्थान और अवसर में अस- हिष्णुता दिखाना, क्रोध करना या स्तम्भित रह जाना, शस्त्र, मिट्टी का ढेला, लकड़ी या मुट्ठी से अपने को या दूसरों को मारना, इधर-उधर दौड़ना, छाया, शीतलखान पान ( अन्न या पानी ) की इच्छा करना, बहुत समय तक ताप का होना, आंखो का ताम्बे के समान लाल, हरा-पीला एवं खुले रहना और पित्तवर्धक पदार्थों से रोग का बढ़ना ये पित्तजन्य उन्माद के लक्षण हैं ॥७॥ स्थानमेकदेशे, तूष्णींभावो, अल्पशश्चङ्क्रमणं, लालासिङ्घाण- कप्रस्रवणं, अनन्नाभिलाषो, रहस्कामता, बीभत्सत्वं, शौचद्वेषः, स्वप्न- निद्रता, श्वयथुरानने, शुक्ल-स्तिमित मलोपदिग्धाक्षता, श्लेष्मोपशयवि- पर्यासादनुपशयता चेति श्लेष्मोन्मादलिङ्गानि भवन्ति ॥ ८ ॥ (३) कफजन्य उन्माद के लक्षण—एकान्त स्थान में चुपचाप बैठना, थोड़ा चलना फिरना, मुख से लार, नाक से मल का गिरना, भोजन में अनिच्छा, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, भयानक विकृत रूप, स्वच्छता से द्वेष, नींद कम होना, मुख पर सूजन, आंख में सफेदी भारीपन और मल का होना, कफ वर्धक पदार्थों से रोग का बढ़ना ये कफजन्य उन्माद के लक्षण हैं ॥८॥ त्रिदोषलिङ्गसन्निपाते तु सांनिपातिकं विद्यात्, तमसाध्यमित्याच- क्षते कुशलाः ॥ ६ ॥ (४) सांनिपातिक उन्माद—तीनों दोषो के एक साथ मिलने से सन्निपात- जन्य उन्माद रोग हो जाता है। इस को कुशल वैद्य असाध्य कहते हैं ॥ ६ ॥ साध्यानां तु त्रयाणां साधनानि भवन्ति । तद्यथा- १. शम्या दक्षिण हाथ से और ताल वाम हाथ से बजाया
अ० ७ ] निदानस्थानम् ४६७
अ० ७ ] निदानस्थानम् ४६७ वमन-विरेचनास्थापनानुवासनोपशमन-नस्तःकर्म-धूप-धूमपानाञ्जनाव- पीड-प्रधमनाभ्यङ्ग-प्रदेह-परिषेकानुलेपन-वध-बन्धनावरोधन-वित्रासन- विस्मापन-विस्मारणापतर्पण-सिरा-व्यधनानि भोजनविधानं च यथास्वं युक्त्या, यच्चान्यदपि किंचिन्निदानविपरीतमौषधं कार्यं तत्स्या- दिति ॥ १० ॥ उन्माद की चिकित्सा—इन तीन सिद्ध होने वाले उन्मादों की चिकित्सा निम्न प्रकार से करनी चाहिये। यथा—स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, उपशमन, नस्यकर्म, धूप, धूम्रपान, अञ्जन, अव- पीड़न, प्रधमन, अभ्यंग, प्रदेह, परिषेक, अनुलेपन, वध (मारने का भय दिखाना), बन्धन, अवरोधन (कमरे में बन्द करना), वित्रासन (डराना), विस्मारण (नाना प्रकार की बातों में भुलाना), विस्मापन (आश्चर्य से चकित करना), अपतर्पण (उपवास), सिराव्यधन (शिरा वेध आदि से रक्त बाहर करना) से चिकित्सा करनी चाहिये और युक्तिपूर्वक दोषों को देखकर अन्न- पान का स्वयं निश्चय करना चाहिये। इसके सिवाय और भी जो कोई औषध रोगजनक कारण के विपरीत, उसको शान्त करने वाली हो, वह भी अवश्य देनी चाहिये ॥ १० ॥ भवति चात्र—उन्मादान्दोषजान् साध्यान् साधयेद्भिषगुत्तमः । अनेन विधियुक्तेन कर्मणा यत्प्रकीर्तितम् ॥ ११ ॥ इति ॥ श्रेष्ठ वैद्य इस कही हुई विधि से दोषों से उत्पन्न साध्य उन्माद रोग को दूर करे ॥ ११ ॥ यस्तु दोषनिमित्तेभ्य उन्मादेभ्यः समुत्थान-पूर्वरूप-लिङ्ग-वेदनोप- शय-विशेष-समन्वितो भवत्युन्मादस्तमागन्तुमाचक्षते । केचित्पुनः पूर्वकृतं कर्माप्रशस्तमिच्छन्ति तस्य निमित्तं । प्रज्ञापराध एवेति भगवान्पुनर्वसुरात्रेय उवाच । प्रज्ञापराधाद्ध्वयं देवर्षि-पितृ-गन्धर्व- यक्ष-राक्षस-पिशाच-गुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्य-पूज्यानवमत्याहितान्याचरति, अन्यद्वा किंचित्कर्माप्रशस्तमारभते, तमात्मना हतमुपघ्नन्तो देवाद्यः कुर्वन्त्युन्मत्तम् ॥ १२ ॥ गन्तुज उन्माद—जो उन्माद दोषों से उत्पन्न होने वाले उन्माद से ण, वेदना और उपशय में भिन्न होता है, उस को कहते हैं। कुछ आचार्य पूर्वजन्म के अशुभ पाप कर्मों की उत्पत्ति मानते हैं। उस का कारण प्रज्ञापराध ही
५६८ चरकसंहिता [ अ० ७ है—ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने कहा है। प्रज्ञापराध अर्थात् बुद्धि के दोष से ही मनुष्य देवता ऋषि, पितर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच, गुरु, वृद्ध, सिद्ध, आचार्य एवं पूज्य पुरुषो का अपमान करता है। अथवा अन्य किसी प्रकार का निन्दनीय कर्म करता है। अपनी आत्मा द्वारा किये हुए अशुभ कर्म के द्वारा उसी पुरुष को मारने के लिये देव आदि उस को उन्मत्त कर देते हैं ॥ १२ ॥ तत्र देवादिप्रकोपोपनिमित्तेनाऽऽगन्तुकोन्मादेन पुरस्कृतस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति। तद्यथा—देव-गो-ब्राह्मण-तपस्विनां हिंसारुचित्वं कोपनत्वं नृशंसाभिप्रायता अरतिरोजोवर्ण-च्छाया-बल-वपुषामुपतप्तिः, स्वप्ने च देवादिभिरभिभर्त्सनं प्रवर्त्तनं चेत्यागन्तुनिमित्तस्योन्मादस्य पूर्वरूपाणि भवन्ति। ततोऽनन्तरमुन्मादाभिनिर्वृत्तिः ॥ १३ ॥ आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप—देवता आदि के प्रकोप के कारण आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप निम्न प्रकार के होते हैं। जैसे—देव, गौ, ब्राह्मण, तपस्वी पुरुषो की हिंसा करने में रुचि, क्रोधीपन, दूसरे का अपकार करने की इच्छा, उदासीनता, ओज, बल, वर्ण, छाया और शरीर में ताप होना, बिगड़ना, स्वप्न में देवता आदि का तिरस्कार करना, अथवा इन पर क्रोध करना आदि आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप हैं। इस के पीछे उन्माद उत्पन्न हो जाता है ॥ १३ ॥ तत्रायमुन्मादकरणां भूतानामुन्मादयिष्यतामारम्भविशेषः। त- द्यथा—अवलोकयन्तो देवा जनयन्त्युन्मादं, गुरु-वृद्ध-सिद्धर्षयोऽभि- षपन्तः, पितरो धर्षयन्तः, स्पृशन्तो गन्धर्वाः, समाविशन्तो यक्षाः, राक्षसास्त्वामगन्धमाघ्रापयन्तः, पिशाचाः पुनरधिरुह्य वाहयन्तः ॥ १४ ॥ उन्माद का प्रारम्भ—उन्माद को उत्पन्न करने वाले भूतों की उन्माद को प्रारम्भ करने में निम्नलिखित प्रकार से भिन्नता होती है। यथा—देव आँखों से देख कर ही उन्माद उत्पन्न करते हैं, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और ऋषिजन शाप देकर, पितर-लोग धमकाकर, गन्धर्वगण स्पर्श करके, यक्ष शरीर में घुसकर, राक्षस आम (सड़े मांस आदि की) गन्ध को सुंघाकर और पिशाच चढ़कर उन्माद रोग को उत्पन्न करते हैं ॥ १४ ॥ तस्येमानि रूपाणि भवन्ति। तद्यथा—अमर्त्य-बल-वीर्य- पराक्रम-ग्रहण-धारण-स्मरण-ज्ञान-वचन-विज्ञानानि, अनियतश्चो- न्मादकालः ॥ १५ ॥
अ० ७ ] निदानस्थानम् ४८६
अ० ७ ] निदानस्थानम् ४८६ (५) आगन्तुक के लक्षण—आगन्तुक उन्माद के ये लक्षण होते हैं। जैसे—उन्मत्त रोगी में अमानुष बल, वीर्य, पुरुषार्थ, पराक्रम, ग्रहण, धारण, स्मरण, ज्ञान, वाणी और विज्ञान प्राप्त हो जाता है। उन्माद रोग का काल भी अनिश्चित रहता है ॥ १५ ॥ उन्मादयिष्यतामपि खलु देवर्षि-पितृ-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस-पिशाचानां गुरुवृद्धानां वा एष्वन्तरेष्वभिगमनीयाः पुरुषा भवन्ति । तद्यथा— पापस्य कर्मणः समारम्भे, पूर्वकृतस्य वा कर्मणः परिणामकाले, एकस्य वा शून्यगृहवासे, चतुष्पथाधिष्ठाने वा, सन्ध्यावेलायां अप्रयतभावे वा, पर्वसंधिषु वा मिथुनभावे, रजस्वलाभिगमने वा, विगुणे वाऽध्ययन- बलि-मङ्गल-होम-प्रयोगे, नियम-व्रत-ब्रह्मचर्य-भङ्गे वा, देश-कुल-पुर-विनाशे वा, महाग्रहोपगमने वा, स्त्रिया वा प्रजननकाले, विविधभूताशुभाशुचि- स्पर्शने वा, वमन-विरेचन-रुधिर-स्रावाशूचेः, अप्रयतस्य वा चैत्यदेवा- यतनाभिगमने वा, मांस-मधु-तिल-गुड-मद्योच्छिष्टे वा, दिग्वाससि वा, निशि नगर-निगम-चतुष्पथो पवन-श्मशानाघातनाभिगमने वा, द्विज-गुरु- सुरपूज्याभिधर्षणे वा धर्माख्यानव्यतिक्रमे वा, अन्यस्य कर्मणोऽप्रशस्त- स्याऽऽरम्भे चेत्याघातकाला व्याख्याता भवन्ति ॥ १६ ॥ आघात काल—देव, ऋषि, पितर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि निम्नलिखित स्थान या समयों पर मनुष्यों में उन्माद उत्पन्न करते हैं। यथा— पाप कर्म के प्रारम्भ करने के समय; पूर्वजन्मकूत पापकर्म के परिणाम समय पर; निर्जन, एकान्त घर में अकेला होने पर; चौराहे पर खड़े रहने या बैठने पर; सन्ध्या-समय में असावधान या अपवित्र रहने से; पूर्णिमा, अमावस्या में स्त्रीसंग करने से; रजस्वला स्त्री के साथ संग करने से; अव्यवस्थित कार्य करने से; अध्ययन, बलि, मंगल, होम इनको नियम से न करने पर; नियम, व्रत या ब्रह्मचर्य के भंग करने पर; बड़े युद्ध के समय, देश, कुल या नगर के विनाश के समय; बड़े भारी ग्रह के आ जाने पर; प्रसव के समय स्त्री पर; नाना प्रकार के अशुभ पदार्थों के स्पर्श से; वमन, विरेचन, रक्तस्राव आदि अपवित्र काम करके अशुद्ध शरीर से चैत्य ( गांव का तह-खेड़ा ), या देवमन्दिर आदि पवित्र स्थान में जाने से; मांस, मधु, तिल, गुड़, मद्य या जूठन ( उच्छिष्ट ), खाकर; या नग्ना- 「 में, अथवा रात के समय ग्राम, नगर वा चौराहे या उपवन, श्मशान घाने के समीप जाने से; ब्राह्मण, गुरु, सन्यासी, पूज्यपुरुषों को धमकाने उल्लंघन करने से, इसी प्रकार के अन्य अपवित्र, पाप कर्म के
४७० चरकसंहिता [ अ० ७ आरम्भ करने से उन्माद रोग का आक्रमण होता है। इस प्रकार से आघात काल का वर्णन कर दिया है ॥ १६ ॥ त्रिविधं तु खलून्मादकराणां भूतानामुन्मादने प्रयोजनं भवति । तद्यथा—हिंसा, रतिः, अभ्यर्चनं चेति । तेषां तत्प्रयोजनमुन्मत्ताचा- रविशेषलक्षणैर्विद्यात् । तत्र हिंसार्थमुन्माद्यमानोऽग्निं प्रविशत्यप्सु वा निमज्जति, स्थलाच्छ्वभ्रे वा निपतति, शस्त्र-कशा-काष्ठ-लोष्ट-मुष्टिभिर्ह- न्त्यात्मानमन्यच्च प्राणवधार्थमारभते किंचित्, तमसाध्यं विद्यात्, साध्यौ पुनर्द्वावितरौ ॥ १७ ॥ उन्माद उत्पन्न करने का प्रयोजन—उन्माद रोग को उत्पन्न करने वाले भूतों के मनुष्यों को उन्मत्त बनाने में तीन प्रकार के प्रयोजन हैं । यथा—हिंसा, रति और पूजा । इन कार्यों (प्रयोजनों) को उन्मत्त पुरुष के लक्षणों से पहिचानना चाहिये । हिंसा के लिये उन्माद होने पर मनुष्य आग में घुसता है, पानी में डूबता है, ऊंचे स्थान से गड्ढे में गिरता है, हथियार, काष्ठ, कशा, (चाबुक), ढेला (पत्थर), मुक्कों आदि से अपने को मारता है, अथवा अन्य इसी प्रकार के प्राणनाश करने वाले कार्यों को करता है। इसको असाध्य जानना चाहिये । १बाकी के दोनों प्रकार के उन्माद साध्य हैं ॥ १७ ॥ तयोः साधनानि-मन्त्रौषधि-मणि-मङ्गल-बल्युपहार-होम-नियम- व्रत-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्ययन-प्रणिपात-गमनादीनीति । एवमेते पञ्चो- न्मादा व्याख्याता भवन्ति ॥ १८ ॥ ये उन्माद मन्त्र, औषधि, मार्ग, मंगल-पाठ, बलिदान, उपहार, हवन, नियम, व्रत, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपात आदि मंगल कृत्यों से शान्त होते हैं । इस प्रकार से पांचों उन्मादों की व्याख्या करदी ॥ १८ ॥ ते तु खलु निजागन्तुविशेषेण साध्यासाध्यविशेषेण च प्रविभज्य- मानाः पञ्च सन्तो द्वावेव भवतः । तौ परस्परमनुबध्नीतः । कदाचिद्य- थोक्तहेतुसंसर्गादुभयोः संसृष्टमेव पूर्वरूपं भवति, संसृष्टञ्चैव लिङ्गमभि- ज्ञेयम् । तत्रासाध्यसंयोगं साध्यासाध्यसंयोगं वाऽसाध्यं विद्यात् । १. रति प्रयोजन से आक्रान्त होने पर मनुष्य खेलता है, पूजा के लिये पूजा करता है। देव आदि मनुष्य को आक्रान्त नहीं करते । जैसा कि सुश्रुतमें कहा है— "न ते मनुष्यैः सह संविशन्ति न वा मनुष्यान क्वचिदाविशन्ति । ये त्वाविशन्ति वदन्ति मोहात्ते भूतविद्याविषयादपोहाः ॥"
अ० ७ ] निदानस्थानम् ४७१
अ० ७ ] निदानस्थानम् ४७१ साध्यं तु साध्यसंयोगं, तस्य साधनं साधनसंयोगमेव विद्यादिति ॥१६॥ उन्माद के भेद—ऊपर कहे हुए पांच उन्माद निज और आगन्तुज भेदसे या साध्य और असाध्य भेद से, पांच प्रकार के होने पर भी दो प्रकार के होते हैं। कई बार निज दोषजन्य उन्माद के साथ आगन्तुज उन्माद भी पर- स्पर अनुबन्ध रूप से मिला होता है और कभी साध्य और असाध्य दोनों प्रकारके उन्मादों के कारणों का संयोग होता है, इस अवस्था में पूर्वरूप और लक्षण दोनों मिश्रित होते हैं। दोनों प्रकार के लक्षणों के मिलने से रोग असाध्य हो जाता है। इस में भी असाध्य संयोग अथवा साध्य और असाध्य दोनों का संयोग हो तो इसको असाध्य जाने। साध्य लक्षणों का संयोग हो तो साध्य जाने। (अर्थात् मिश्रित लक्षणों वाले उन्माद में संयुक्त औषधियों द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये) ॥१६॥ भवन्ति चात्र—नैव देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । न चान्ये स्वयमक्लिष्टमुपक्लिश्यन्ति मानवम् ॥ २० ॥ ये त्वेनमनुवर्तन्ते क्लिश्यमानं स्वकर्मणा । न तन्निमित्तः क्लेशोऽसौ न ह्यस्ति कृतकृत्यता ॥ २१ ॥ प्रज्ञापराधात्संप्राप्ते व्याधौ कर्मज आत्मनः । नाभिशंसेद् बुधो देवान्न पितॄनापि राक्षसान् ॥ २२ ॥ आत्मानमेव मन्येत कर्तारं सुखदुःखयोः । तस्माच्छ्रेयस्करं मार्गं प्रतिपद्येत नो त्रसेत् ॥ २३ ॥ देवादीनामपचितिर्हितानां चोपसेवनम् । ते च तेभ्यो विरोधश्च सर्वमायत्तमात्मनि ॥ २४ ॥ जो मनुष्य स्वयं अपने दोषों से पीड़ित नहीं होता उसको न तो देवता, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस और न अन्य योनियां क्लेशित करती हैं। अपने कर्मों के कारण देवता आदि द्वारा जो पीड़ा मिलती है; उसका कारण देवता नहीं होते। क्योंकि अशुभ कर्मों के फल स्वरूप उन्माद होता है। इन कर्मों के कर्त्ता देवता आदि नहीं हैं। बुद्धि के अपराध से अपने कर्मों के दोष से रोग उत्पन्न होते हैं, इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि देवता, पितर या राक्षस आदि को दोष न दे, उनको उपालम्भ न दे। अपने को ही सुख और दुःख का कारण माने। इसलिये मनुष्य देव आदि से भय न कर के श्रेयस्कर मार्ग का अनुसरण करे। देव आदि की पूजा, हितकारक पदार्थों का सेवन ...गण से विरोध करना, ये सब बातें अपने हाथ में हैं ॥२०-२४॥ ...—संख्या निमित्तं द्विविधं लक्षणं साध्यतां न च ।
उन्मादानां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम् ॥ २५ ॥ इति।
४७२ चरकसंहिता [नि० ८ उन्मादानां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम् ॥ २५ ॥ इति। 'उन्मादनिदान' नामक अध्याय में उन्माद रोग की संख्या, निमित्त, दो प्रकार के लक्षण, साध्य और असाध्य भेद और चिकित्सासूत्र ये सब बातें कह दी हैं ॥ २५ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने उन्मादनिदानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः। अथातोऽपस्मारनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'अपस्मार-निदान' की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ इह खलु चत्वारोऽपस्मारा भवन्ति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-नि- मित्ताः ॥ ३ ॥ अपस्मार रोग चार प्रकार का होता है। यथा—( १ ) वातजन्य, ( २ ) पित्तजन्य, ( ३ ) कफजन्य और ( ४ ) सन्निपातजन्य ॥ ३ ॥ त एवंविधानां प्राणिभृतां क्षिप्रमभिनिर्वर्तन्ते, तद्यथा—रजस्तमो- भ्यामुपहतचेतसामुद्भ्रान्तविषमबहुदोषाणां समलविकृतोपहितान्यशु- चीन्यभ्यवहारजातानि वैषम्ययुक्तेनोपयोगविधिनोपयुञ्जानानां तन्त्र- प्रयोगमपि च विषममाचरतामन्याश्च शरीरचेष्टा विषमाः समाचरता- मत्युपक्षीणदेहानां वा दोषाः प्रकुपिता रजस्तमोभ्यामुपहतचेतसामन्त- रात्मनः श्रेष्ठतममायतनं हृदयमुपसृत्य पर्यवतिष्ठन्ते, तथेन्द्रियायतनानि। तत्र चावस्थिताः सन्तो यदा हृदयमिन्द्रियायतनानि चेरिताः काम-क्रोध- भय-लोभ-मोह-हर्ष-शोक-चिन्तोद्वेगादिभिर्भूयः सहसाऽभिपुरयन्ति; तदा जन्तुरपस्मरति ॥ ४ ॥ निदान और सम्प्राप्ति—अपस्मार रोग निम्न प्रकार के पुरुषों में बहुत जल्दी होता है। यथा—जिन का मन रज और तम से युक्त होता है, जिन में दोष उद्भ्रान्त, विषम या बहुत बढ़े होते हैं, जिन का मन विक्षिप्त रह अपवित्र, मलिन, विरोधी वस्तुओं से मिश्रित, असंगत विधि से वाले, अनुचित विधि से उपयोग करने वाले, शास्त्र के विरुद्ध