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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

२७।२२ ] तण्हावग्गो [ ३५७ मुक्त हूँ, ( विमल ज्ञानको ) अपने ही जानकर ( मैं अब ) किसको ( अपना गुरु ) बतलाऊँ ? जेतवन सक्क देवराज ३५४-सब्बदानं धम्मदानं जिनाति सब्बं रसं धम्मरसो जिनाति । सब्बं रतिं धम्मरती जिनाति तण्हक्खयो सब्बदुक्खं जिनाति ॥२१॥ ( सर्वदानं धर्मदानं जयति सर्वं रसं धर्मरसो जयति । सर्वां रतिं धर्मरतिर्जयति तृष्णाक्षयः सर्वदुःखं जयति ॥ २१ ॥ ) अनुवाद—धर्मका दान सारे दानोंसे बढ़कर है, धर्मरस सारे रसोंसे प्रबल है, धर्ममें रति सब रतियोंसे बढ़कर है, तृष्णाका विनाश सारे दुःखोंको जीत लेता है । जेतवन ( अपुत्रक श्रेष्ठी ) ३५५-हनन्ति भोगा दुम्मेधं नो चे पारगवेसिनो । भोगतण्हाय दुम्मेधो हन्ति अञ्ञे'व अत्तनं ॥२२॥ ( घ्नन्ति भोगा दुर्मेधसं न चेत् पारगवेषिणः । भोगतृष्णाया दुर्मेधा हन्त्यन्य इवात्मनः ॥ २२ ॥ ) अनुवाद—( संसारको ) पार होनेकी कोशिश न करनेवाले दुर्बुद्धि ( पुरुष ) को भोग नष्ट करते हैं, भोगकी तृष्णामें पड़कर (वह) दुर्बुद्धि परायेकी भाँति अपने हीको हनन करता है ।

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२२. निरयवग्गो (निरय वर्ग)

२४।२६ ] तण्हावग्गो [ १५९ ३५६-तिणदोसानि खेत्तानि इच्छादोसो अयं पजा । ' तस्मा हि विगतित्छेसु दिन्नं होति महप्फलं ॥२६॥ ( तृणदोषाणि क्षेत्राणि, इच्छादोषेयं प्रजा । तस्माद्धि विगतेच्छेषु दत्तं भवति महाफलम् ॥ २६ ॥ ) अनुवाद—खेतोंका दोष तृण है, इस प्रजाका दोष इच्छा है; इसलिये विगतेच्छ(=इच्छारहित)को देनेमें महाफल होता है । २४-तृष्णावर्ग समाप्त

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२५।५ ] भिक्खुवग्गो [ १६१ अनुवाद—कायाका संवर (=संयम ) ठीक है, ठीक है वचनका संवर; मनका संवर ठीक है, ठीक है सर्वत्र (इन्द्रियों)का संवर; सर्वत्र संवर-युक्त भिक्षु सारे दुःखोंसे छूट जाता है । जेतवन हंसघातक (भिक्षु) ३६२—हत्थसञ्‍ञतो पादसञ्‍ञतो वाचाय सञ्‍ञतो सञ्‍ञतुत्तमो । अज्झत्तरतो समाहितो एको सन्तुसितो तमाहु भिक्खू ॥३॥ (हस्तसंयतः पादसंयतो वाचा संयतः संयतोत्तमः । अध्यात्मरतः समाहित एकः सन्तुष्टस्तमाहुर्भिक्षुम् ॥३॥) अनुवाद—जिसके हाथ, पैर और वचनमें संयम है, (जो) उत्तम संयमी है, जो घटके भीतर (=अध्यात्म) रत, समाधियुक्त, अकेला (और) सन्तुष्ट है, उसे भिक्षु कहते हैं । जेतवन कोकालिक ३६३—यो मुखसञ्‍ञतो भिक्खू मन्तभाणी अनुद्धतो । अत्थं धम्मञ्च दीपेति मधुरं तस्स भासितं ॥४॥ (यो मुखसंयतो भिक्षुर्मंत्रमाणी, अनुद्धतः । अर्थं धर्मं च दीपयति मधुरं तस्य भाषितम् ॥४॥) अनुवाद—जो मुखमें संयम रखता है, मनन करके बोलता है, उद्धत नहीं है, अर्थ और धर्मको प्रकट करता है, उसका भाषण मधुर होता है । जेतवन धम्माराम (थेर) ३६४—धम्मारामो धम्मरतो धम्मं अनुविचिन्तयं । धम्मं अनुस्सरं भिक्खू सद्धम्मा न परिहायति ॥५॥ ११

१६२ ] धम्मपदं [ २५।७ ( धर्म्मारामो धर्म्मरतो धर्म्मं अनुविचिन्तयन् । धर्म्ममनुस्मरन् भिक्षुः सद्धर्म्मान्न परिहीयते ॥५॥) अनुवाद—धर्ममें रमण करनेवाला, धर्ममें रत, धर्मका चिन्तन करते, धर्मका अनुसरण करते भिक्षु सच्चे धर्मसे च्युत नहीं होता । राजगृह ( वेणुवन ) विपक्ष-सेवक ( भिक्खु ) ३६५—सलाभं नातिमञ्ञेय्य, नान्नेसं पिहयं चरे । अन्नेसं पिहयं भिक्खू समाधिं नाधिगच्छति ॥६॥ ( स्वलाभं नाऽतिमन्येत, नाऽन्येषां स्पृहयन्, चरेत् । अन्येषां स्पृहयन् भिक्षुः समाधिं नाऽधिगच्छति ॥६॥) अनुवाद—अपने लाभकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। दूसरोंके ( लाभ ) की स्पृहा न करनी चाहिये। दूसरोंके ( लाभकी ) स्पृहा करनेवाला भिक्षु समाधि (=चित्तकी एकाग्रता )को नहीं प्राप्त करता । ३६६—अप्पलाभोपि चे भिक्खू स-लाभं नातिमञ्ञति । तं वे देवा पसंसन्ति सुद्धाजीविं अतन्दितं ॥७॥ ( अल्पलाभोऽपि चेद् भिक्षुः स्वलाभं नाऽतिमन्येत । तं वै देवाः प्रशंसन्ति शुद्धाऽऽजीवं अनन्दितम् ॥७॥) अनुवाद—चाहे अल्प ही हो, भिक्षु अपने लाभकी अवहेलना न करे । उसीकी देवता प्रशंसा करते हैं, ( जो ) शुद्ध जीविकावाला और आलस्यरहित है ।

२५।१० ] भिक्खुवग्गो [ १६३ जेतवन ( पाँच अग्रदायक भिक्षु ) ३६७-सव्वसो नाम-रूपस्मिं यस्स नत्थि ममायितं । असता च न सोचति स वे भिक्खूति वुच्चति ॥८॥ ( सर्वशो नामरूपे यस्य नाऽस्ति ममायितम् । असति च न शोचति सवै भिक्षुरित्युच्यते ॥८॥) अनुवाद—नाम-रूप(=जगत)में जिसकी विल्कुल ही ममता नहीं, न होनेपर ( जो ) शोक नहीं करता, वही भिक्षु कहा जाता है । जेतवन बहुतसे भिक्षु ३६८-मेत्ताविहारी यो भिक्खू पसन्नो बुद्धसासने । अधिगच्छे पदं सन्तं सङ्खारूपसमं सुखं ॥६॥ ( मैत्रीविहारी यो भिक्षुः प्रसन्नो बुद्धशासने । अधिगच्छेत् पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम् ॥९॥) अनुवाद—मैत्री(-भावना) से विहार करता जो भिक्षु बुद्धके उप- देशमें प्रसन्न (=श्रद्धावान् ) रहता है, (वह) सभी संस्कारों को शमन करनेवाले शान्त ( और ) सुखमय पदको प्राप्त करता है । ३६९-सिञ्च भिक्खू ! इमं नावं सित्ता ते लहुमेस्सति । छेत्वा रागञ्च दोसञ्च ततो निब्वाणमेहिसि ॥१०॥ ( सिंच भिक्षो ! इमां नावं सिक्ता ते लघुत्वं एष्यति । छित्त्वा रागं च द्वेषं च ततो निर्वाणमेष्यसि ॥१०॥) ५/२८

१६३ ] धम्मपदं [ २५।१२ अनुवाद—हे भिक्षु ! इस नावको उलीचो, उलीचने पर (यह) तुम्हारे लिये हल्की हो जायेगी। राग और द्वेषको छेदनकर, फिर तुम निर्वाणको प्राप्त होगे। ३७०—पंच छिन्दे पञ्च जहे पञ्चवुत्तरि भावये । पञ्च सङ्गातिगो भिक्खू ओघतिण्णो'ति वुच्चति ॥ ११॥ (पंच छिन्धि पंच जहीहि पंचोत्तरं भावय। पंचसंगाऽतिगो भिक्षुः, 'ओघतीर्ण' इत्युच्यते ॥११॥) अनुवाद—(जो रूप, राग, मान, उद्धतपना और अविद्या इन) पाँचको छेदन करे, (जो नित्य आत्माकी कल्पना, सन्देह, शील-व्रत पर अधिक जोर, भोगोंमें राग, और प्रतिहिंसा इन) पाँचको त्याग करे; उपरान्त (जो श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा) इन पाँचकी भावना करे; (जो, राग, द्वेष, मोह, मान, और झूठी धारणा इन) पाँचके संसर्गको अतिक्रमण कर चुका है; (वह काम, भव दृष्टि और अविद्यारूपी) ओघो (=बाढ़ों) से उत्तीर्ण हुआ कहा जाता है। ३७१—झाय भिक्खू ! मा च पामदो मा ते कामगुणे भमस्सु चित्तं । मा लोहगुळं गिली पमत्तो मा कंदी दुक्खमिदन्ति डय्हमानो ॥१२॥ (ध्याय भिक्षो ! मा च प्रमादः, मा ते कामगुणे भ्रमतु चित्तम् ।

२५।१५ ] भिक्खुवग्गो [ १६५ मा लोहगोलं गिल पमत्तः, मा क्रन्दीः दुखमिदमिति दह्यमानः ॥१२॥) अनुवाद—हे भिक्षु ! ध्यानमें लगो, मत गफलत करो, तुम्हारा चित्त मत भोगोके चक्करमें पडें, प्रमत्त होकर मत लोहेके गोलेको निगलो, '( हाय ! ) यह दुःख' कहकर दग्ध होते ( पीछे ) मत तुम्हें क्रन्दन करना पडे । ३७२–नत्थि झानं अपञ्ञस्स पञ्ञा नत्थि अझायतो । यम्हि झानञ्च पञ्ञा च स वे निब्बाणसन्तिके ॥१३॥ ( नाऽस्ति ध्यानमप्रज्ञस्य प्रज्ञा नाऽस्त्यध्यायतः । यस्मिन् ध्यानं च प्रज्ञा च सवै निर्वाणाऽन्तिके ॥१३॥) अनुवाद—प्रज्ञाविहीन ( पुरुष ) को ध्यान नहीं ( होता ) है, ध्यान ( एकाग्रता ) न करनेवालेको प्रज्ञा नहीं हो सकती । जिसमें ध्यान और प्रज्ञा ( दोनों ) हैं, वही निर्वाणके समीप है । ३७३–सुञ्ञागारं पविट्ठस्स सन्तचित्तस्स भिक्खुनो । अमानुसी रती होति सम्माधम्मं विपस्सतो ॥१४॥ ( शून्यागारं प्रविष्टस्य शान्तचित्तस्य भिक्षोः । अमानुषी रतिर्भवति सम्यग् धर्मं विपश्यतः ॥१४॥) अनुवाद—शून्य (=एकान्त ) गृहमें प्रविष्ट, शान्तचित्त भिक्षुको भली प्रकार धर्मका साक्षात्कार करते, अमानुषी रति (=आनंद ) होती है । ३७४–यतो यतो सम्मसति खन्धानं उदयव्वयं । लभती पीतिपामोज्जं अमतं तं विजानतं ॥१५॥

२३. नागवग्गो (नाग वर्ग)

१६६ ] धम्मपदं [ २५।१७ ( यतो यतः संमृशति स्कन्धानां उदयव्ययम् । लभते प्रीतिप्रामोद्यं अमृतं तद् विजानताम् ॥ १५ ॥) अनुवाद—( पुरुष ) जैसे जैसे ( रूप, वेदना, संज्ञा, सस्कार, विज्ञान इन ) पाँच स्कन्धोंकी उत्पत्ति और विनाश पर विचार करता है, ( वैसे ही वैसे, वह ) ज्ञानियोंकी प्रीति और प्रमोद ( रूपी ) अमृतको प्राप्त करता है । ३७५–तत्रायमादि भवति इध पञ्ञस्स भिक्खुनो । इन्द्रियगुत्ती सन्तुट्ठी पातिमोक्खे च संवरो । मित्ते भजस्सु कल्याणे सुद्धाजीवे अतन्दिते ॥१६॥ ( तत्राऽयमादिर्भवतीह प्राज्ञस्य भिक्षोः । इन्द्रियगुप्तिः सन्तुष्टिः प्रातिमोक्षे च संवरः । मित्राणि भजस्व कल्याणानि शुद्धाजीवान्यतन्द्रितानि ॥१६॥) अनुवाद—यहाँ प्राज्ञ भिक्षुको आदि( में करना ) है—इन्द्रिय- संयम, सन्तोष और प्रातिमोक्ष(=भिक्षुओंके आचार )की रक्षा । ( वह, इसके लिये ) निरालस, शुद्ध जीविकावाले, अच्छे मित्रोंका सेवन करे । ३७६–पटिसन्थारवुत्तस्स आचारकुसलो सिया । ततो पामोज्जबहुलो दुक्खस्सन्तं करिस्सति ॥ १७॥ ( प्रतिसंस्तारवृत्तस्याऽऽचारकुशलः स्यात् । ततः प्रामोद्यबहुलो दुःखस्याऽन्तं करिष्यति ॥१७॥) अनुवाद—जो प्रेम सत्कार स्वभाववाला तथा आचार( शास्त्र)में निपुण है, वह सानन्द दुःखका अन्त करेगा ।

२५।२० ] भिक्खुवग्गो [ १६७ जेतवन पाँच सौ भिक्षु ३७७-वस्सिका विय पुप्फानि मद्दवानि पमुञ्चति । एवं रागञ्च दोसञ्च विप्पमुञ्चेथ भिक्खवो ॥१८॥ ( वर्षिका इव पुष्पाणि मर्दितानि प्रमुंचति । एवं रागं च द्वेषं च विप्रमुंचत भिक्षवः ॥१८॥ अनुवाद—जैसे जूही कुम्हलाये फूलोंको छोड़ देती है, वैसे ही हे भिक्षुओ ! ( तुम ) राग और द्वेषको छोड़ दो । जेतवन ( शान्तकाय थेर ) ३७८-सन्तकायो सन्तवाचो सन्तवा सुसमाहितो । वन्तलोकामिसो भिक्खू उपसन्तो 'ति वुच्चति ॥१९॥ (शान्तकायो शान्तवाक् शान्तिमान् सुसमाहितः । वान्तलोकाऽऽमिषो भिक्षुः 'उपशान्त' इत्युच्यते ॥१९॥ अनुवाद—काया (और) बचनसे शान्त, भली प्रकार समाधियुक्त, शान्ति सहित (तथा) लोकके आमिषको वमन कर दिये हुए भिक्षुको 'उपशान्त' कहा जाता है । जेतवन लङ्कगूल (थेर) ३७६-अत्तना चोदय'त्तानं पटिवासे अत्तमत्तना । सो अत्तगुत्तो सतिमा सुखं भिक्खू विहाहिसि ॥२०॥ ( आत्मना चोदयेदात्मानं प्रतिवसेदात्मानं आत्मना । स आत्मगुप्तः स्मृतिमान् सुखं भिक्षो! विहरिष्यसि ॥२०

१६८ ] धम्मपदं [ २५।२३ अनुवाद—(जो) अपने ही आपको प्रेरित करेगा, अपने ही आपको संलग्न करेगा; वह आत्म-गुप्त (=अपने द्वारा रक्षित) स्मृति-संयुक्त भिक्षु सुखसे विहार करेगा ! ३८०—अत्ता हि अत्तनो नाथो अत्ता हि अत्तनो गति । ’ तस्मा सञ्ञममत्तानं अस्सं भद्रं'व वाणिजो ॥२१॥ (आत्मा ह्यात्मनो नाथ आत्मा ह्यात्मनो गतिः । तस्मात् संयमयात्मानं अश्वं भद्रमिव वणिक् ॥२१॥ अनुवाद—(मनुष्य) अपने ही अपना स्वामी है, अपने ही अपनी गति है; इसलिये अपनेको संयमी बनावे, जैसे कि सुन्दर घोड़ेको बनिया (संयत करता है) । राजगृह (वेणुवन) वक्कलि (थेर) ३८१—पामोज्जबहुलो भिक्खू पसन्नो बुद्धसासने । अधिगच्छे पदं सन्तं सङ्खारूपसमं सुखं ॥२२॥ (प्रामोद्यबहुलो भिक्षुः प्रसन्नो बुद्धशासने । अधिगच्छेत् पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम् ॥२२॥ अनुवाद—बुद्धके उपदेशमें प्रसन्न बहुत प्रमोद्युक्त भिक्षु संस्कारोंको उपशमन करनेवाले सुखमय शान्त पदको प्राप्त करता है। श्रावस्ती (पूर्वाराम) सुमन (सामनेर) ३८२—यो ह वे दहरो भिक्खू युञ्जते । बुद्धसासने । सो इमं लोकं पभासेति अब्भा मुत्तो 'व चन्दिमा ॥२३॥

२५।२३ ] भिक्खुवग्गो [ १६९ (यो ह वै दहरो भिक्खुयुंक्ते बुद्धशासने। स इमं लोकं प्रभासयत्यभ्रान् मुक्त इव चन्द्रमा ॥२३॥) अनुवाद—जो भिक्षु यौवनमें बुद्ध-शासन (=बुद्धोपदेश, बुद्ध-धर्म ) में संलग्न होता है, वह मेघसे मुक्त चन्द्रमाकी भाँति इस लोकको प्रकाशित करता है। २५–भिक्षुवर्ग समाप्त

२६—ब्राह्मणवग्गो जेतवन ( एक बहुत श्रद्धालु ब्राह्मण ) ३८३-छिन्द सोतं परक्कम कामे पनुद ब्राह्मण ।। संखारानं खयं ञत्वा अकतञ्ञूसि ब्राह्मण ! ॥१॥ ( छिन्धि स्रोतः पराक्रम्य कामान् प्रणुद ब्राह्मण ! । संस्काराणां क्षयं ज्ञात्वाऽकृतज्ञोऽसि ब्राह्मण ! ॥१॥ ) अनुवाद—हे ब्राह्मण ! ( तृष्णा रूपी ) स्रोतको छिन्न करदे, पराक्रम कर, ( और ) कामनाओंको भगादे । संस्कृत (=कृत वस्तुओ, ५ उपादानस्कन्धो ) के विनाशको जानकर, तू अकृत (=न कृत, निर्वाण ) को पानेवाला हो जायेगा । जेतवन ( बहुतसे भिक्षु ) ३८४-यदा द्वयेसु धम्मेसु पारगू होति ब्राह्मणो । अथस्स सब्बे संयोगा अत्यं गच्छन्ति जानतो ॥२॥ ( यदा द्वयोर्धर्मयोः पारगो भवति ब्राह्मणः । अथाऽस्य सर्वे संयोगा अस्तं गच्छन्ति जानतः ॥२॥ ) १७० ]

२६।४ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७१ अनुवाद—जब ब्राह्मण दो धर्मों (—चित्त-संयम और भावना) में पारंगत हो जाता है, तब उस जानकारके सभी संयोग (=बंधन ) अस्त हो जाते हैं । जेतवन मार ३८५-यस्स पारं अपारं वा पारापारं न विज्जति । वीतद्दरं विसञ्जुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणम् ॥३॥ ( यस्य पारं अपारं वा पारापारं न विद्यते । वीतदरं विसंयुक्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३॥ ) अनुवाद—जिसके पार (=आँख, कान, नाक, जीभ, काया, मन ), अपार (=रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श, धर्म ) और पारापार (=मैं और मेरा ) नहीं हैं, ( जो ) निर्भय और अनासक्त है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन ( कोई ब्राह्मण ) ३८६-झायिं विरजमासीनं कतकिच्चं अनासवं । उत्तमत्थं अनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥४॥ ( ध्यायिनं विरजसमासीनं कृतकृत्यं अनास्रवम् । उत्तमार्थमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥४॥ ) अनुवाद—( जो ) ध्यानी, निर्मल, आसनबद्ध (=स्थिर ), कृतकृत्य आस्रव (=चित्तमल)-रहित है, जिसने उत्तम अर्थ (=सत्य) को पा लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

२४. तण्हावग्गो (तृष्णा वर्ग)

१७२ ] धम्मपदं [ २६।६ श्रावस्ती ( पूर्वाराम ) आनन्द ( थेर ) ३८७-दिवा तपति आदिच्चो रत्तिं आभाति चन्दिमा । सन्नद्धो खत्तियो तपति झायी तपति ब्राह्मणो । अथ सब्बमहोरत्तिं बुद्धो तपति तेजसा ॥५॥ ( दिवा तपत्यादित्यो रात्रावाभाति चन्द्रमा । सन्नद्धः क्षत्रियस्तपति ध्यायी तपति ब्राह्मणः । अथ सर्वमहोरात्रं बुद्धस्तपति तेजसा ॥५॥ ) अनुवाद—दिनमें सूर्य तपता है, रातको चन्द्रमा प्रकाशता है, कवचबद्ध ( होनेपर ) क्षत्रिय तपता है, ध्यानी ( होनेपर ) ब्राह्मण तपता है, और बुद्ध रात-दिन ( अपने ) तेजसे सब- ( से अधिक ) तपता है । जेतवन ( कोई प्रव्रजित ) ३८८-वाहितपापो 'ति ब्राह्मणो समचरिया समणो'ति वुच्चति । पब्बाजयमत्तनो मलं तस्मा पब्बजितो'ति वुच्चति ॥६॥ ( वाहितपाप इति ब्राह्मणः समचर्य्यः श्रमण इत्युच्यते । प्राब्राजयन्नाऽऽत्मनो मलं तस्मात् प्रव्रजित इत्युच्यते ॥६॥ ) अनुवाद—जिसने पापको ( धोकर ) बहा दिया वह ब्राह्मण है, जो समताका आचरण करता है, वह समण (=श्रमण= संन्यासी ) है, ( चूँकि ) उसने अपने ( चित्त-) मलोको हटा दिया, इसीलिये वह प्रव्रजित कहा जाता है।

२६।८ ब्राह्मणवग्गो [ १७३ जेतवन सारिपुत्त (थेर) ३८६-न ब्राह्मणस्स पहरेय्य नास्स मुंचेय ब्राह्मणो । धि ब्राह्मणस्स हन्तारं ततो धि यस्स मुञ्चति ॥७॥ (न ब्राह्मणं प्रहरेत् नाऽस्मै मुञ्चेद् ब्राह्मणः । धिग् ब्राह्मणस्य हन्तारं ततो धिग् यस्मै मुंचति ॥७॥ ) अनुवाद—ब्राह्मण (=निष्पाप) पर प्रहार नहीं करना चाहिये, और ब्राह्मणको भी उस (प्रहारदाता) पर (कोप) नहीं करना चाहिये, ब्राह्मणको जो मारता है, उसे धिक्कार है, और धिक्कार उसको भी है, जो (उसके लिये) कोप करता है। ३६०-न ब्राह्मणस्सेतदकिञ्चि सेय्यो यदा निषेधो मनसो पियेहि । यतो यतो हिंसमनो निवत्तति ततो ततो सम्मति एव दुक्खं ॥८॥ (न ब्राह्मणस्यैतद् अकिञ्चित् श्रेयो यदा निषेधो मनसा प्रियेभ्यः । यतो यतो हिंस्रमनो निवर्तते ततस्ततः शाम्यत्येव दुःखम् ॥८॥ ) अनुवाद—ब्राह्मणके लिये यह बात कम कल्याण(कारी) नहीं है, जो वह प्रिय (पदार्थों) से मनको हटा लेता है, जहाँ जहाँ मन हिंसासे मुड़ता है, वहाँ वहाँ दुःख (अवश्य) ही शान्त हो जाता है।

१७४ ] धम्मपद [ २६।११ जेतवन महापजापती गोतमी ३६१-यस्स कायेन वाचाय मनसा नत्थि दुक्कतं । संवृतं तीहि ठानेहि तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥६॥ ( यस्य कायेन वाचा मनसा नाऽस्ति दुष्कृतम् । संवृतं त्रिभिः स्थानैः, तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥६॥) अनुवाद-जिसके मन वचन कायसे दुष्कृत (=पाप ) नहीं होते, ( जो इन ) तीनो ही स्थानोसे संवर (=संयम )-युक्त है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूं । जेतवन सारिपुत्त (थेर) ३६२-यम्हा धम्मं विजानेय्य सम्मासम्बुद्धदेसितं । सक्कचं तं नमस्सेय्य अग्गिहुतं 'व ब्राह्मणो ॥१०॥ ( यस्माद् धर्मं विजानीयात् सम्यक्-संबुद्ध-देशितम् । सत्कृत्य तं नमस्येद् अग्निहोत्रमिव ब्राह्मणः ॥१०॥) अनुवाद-जिस (उपदेशक ) से सम्यक्संबुद्ध (=बुद्ध ) द्वारा उपदिष्ट धर्मको जाने, उसे (वैसेही ) सत्कारपूर्वक नमस्कार करे, जैसे अग्निहोत्रको ब्राह्मण । जेतवन जटिल ब्राह्मण ३६३-न जटाहि न गोत्तेहि न जच्चा होति ब्राह्मणो । यम्हि सच्चञ्च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो ॥११॥ ( न जटाभिर्न गोत्रेर्न जात्या भवति ब्राह्मणः । यस्मिन् सत्यं च धर्मश्च स शुचिः स च ब्राह्मणः ॥११॥)

२६।१३ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७५ अनुवाद—न जटासे, न गोत्रसे; न जन्मसे ब्राह्मण होता है, जिसमें सच्य और धर्म हैं, वही, शुचि (=पवित्र ) है, और वही ब्राह्मण है । वैशाली ( कूटागारशाला ) ( पाखण्डी ब्राह्मण ) ३६४-किं ते जटाहि दुम्मेध ! किं ते अजिनसाटिया । अब्भन्तरं ते गहनं बाहिरं परिमज्जसि ॥१२॥ (किं ते जटाभिः दुर्भेध ! किं तेऽजिनशाट्या । आभ्यन्तरं ते गहनं बाहिः परिमार्जयसि ? ॥१२॥) अनुवाद—हे दुर्बुद्धि ! जटाओसे तेरा क्या (बनेगा), (और) मृग- चर्मके पहिननेसे तेरा क्या ? भीतर (दिल) तो तेरा (राग आदि मलोंसे) परिपूर्ण है, बाहर क्या धोता है ? राजगृह ( गृध्रकूट ) किसा गोतमी ३६५-पंसुकूलधरं जन्तुं किसं धमनिसन्थतं । एकं वनस्मिं झायन्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥१३॥ (पांशुकूलधरं जन्तुं कृशं धमनिसन्ततम् । एकं वने ध्यायन्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥१३॥) अनुवाद—जो प्राणी फटे चीथड़ोको धारण करता है, जो दुबला पतला और नसोंसे मढ़े शरीरवाला है, जो अकेला वनमें ध्यानरत रहता है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

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