धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
३० ] धम्मपदं [ ५।७ श्रावस्ती ( जेतवन ) उदायी ( थेर ) ६४-यावजीवम्पि चे बालो पण्डितं पयिरुपासति । न सो धम्मं विजानाति दब्बी सूपरसं यथा ॥ ५॥ ( यावज्जीवमपि चेद् बालः पंडितं पर्युपास्ते । न स धर्मं विजानाति दर्वी सूपरसं यथा ॥५॥ ) अनुवाद—चाहे बाल ( = जड; अज्ञ ) जीवन भर पंडितकी सेवामें रहे ( तो भी ) वह धर्मको ( वैसे ही ) नहीं जान सकता, जैसे कि कलछी ( = दब्बी = दयली ) सूप ( = दाल आदि ) के रसको । श्रावस्ती ( जेतवन ) भद्रवर्गीय ( भिक्षुलोग ) ६५-मुहुत्तमपि चे विञ्ञू पण्डितं पयिरुपासति । खिप्पं धम्मं विजानाति जिह्वा सूपरसं यथा ॥६॥ ( मुहूर्त्तमपि चेद् विज्ञः पंडितं पर्युपास्ते । क्षिप्रं धर्मं विजानाति जिह्वा सूपरसं यथा ॥६॥ ) अनुवाद—चाहे विज्ञ ( पुरुष ) एक मुहूर्त ही पंडितकी सेवामें रहे, ( तो भी वह ) शीघ्र ही धर्मको जान सकता है, जैसे कि जिह्वा सूपके रसको । राजगृह ( वेणुवन ) सुप्पबुद्ध ( कोढ़ी ) ६६-चरन्ति बाला दुम्मेधा अमित्तेनेव अत्तना । करोन्तो पापकं कम्मं यं होति कटुकप्फलं ॥७॥ ( चरन्ति बाला दुर्मेधसोऽमित्रेणेवात्मना । कुर्वन्तः पापकं कर्म यद् भवति कटुकफलम् ॥७॥ )
५।१० ] बालवग्गो [ ३१ अनुवाद—पाप कर्मको—जो कि कटु फल देनेवाला होता है—करते दुष्ट बुद्धि अज्ञ ( जन ) अपने ही अपने शत्रु बनते हैं। जेतवन कोई कस्सप ६७-न तं कम्मं कतं साधु यं कत्वा अनुतप्पति । यस्स अस्सुमुखो रोदं विपाकं पटिसेवति ॥८॥ ( न तत् कर्म कृतं साधु यत् कृत्वाऽनुतप्यते । यस्याश्रुमुखो रुदन् विपाकं प्रतिसेवते ॥८॥ ) अनुवाद—उस कामका करना ठीक नहीं, जिसे करके ( पीछे ) अनुताप करना पड़े, और जिसके फलको अश्रुमुख रोते भोगना पड़े। ( वेणुवन ) सुमन ( माली ) ६८-तञ्च कम्मं कतं साधु यं कत्वा नानुतप्पति । यस्स प्रतीतो सुमनो विपाकं पटिसेवति ॥६॥ ( तच्च कर्म कृतं साधु यत् कृत्वा नानुत्तप्यते । यस्य प्रतीतः सुमना विपाकं प्रतिसेवते ॥९॥ ) अनुवाद—उसी कामका करना ठीक है, जिसे करके अनुताप करना ( = पछताना ) न पड़े, और जिसके फलको प्रसन्न मनसे भोग करे । जेतवन उप्पलवण्णा ( थेरी ) ६६-मधू'व मञ्ञति बालो याव पापं न पच्चति । यदा च पच्चती पापं अथ दुक्खं निगच्छति ॥१०॥
४. पुप्फवग्गो (पुष्प वर्ग)
५२ ] धम्मपदं [ ५।१२ ( मध्विव मन्यते बालो यावत् पापं न पच्यते । यदा च पच्यते पापं अथ दुःखं निगच्छति ॥१०॥ ) अनुवाद—अज्ञ ( जन ) जब तक पापका परिपाक नहीं होता, तब तक उसे मधुके समान जानता है। जब पापका परिपाक होता है, तो दुखी होता है। राजगृह ( वेणुवन ) जम्बुक ( आजीवक साधु ) ७०-मासे मासे कुसग्गेन बालो भुञ्जेथ भोजनं । न सो संखतधम्मानं कलं अग्घति सोळसिं ॥११॥ ( मासे मासे कुशाग्रेण बालो भुंजीत भोजनम् । न स संख्यातधर्माणां कलामर्हति षोडशीम् ॥११॥) अनुवाद—यदि अज्ञ ( पुरुष ) कुशकी नोकसे महीने महीनेपर खाना खाये, तो भी धर्मके जानकारोके सोलहवें भागके भी बराबर ( वह तप ) नहीं हो सकता । राजगृह ( वेणुवन ) अहिपेत ७१-न हि पापं कतं कम्मं सञ्जु खीरं 'व मुच्चति । डहन्तं बालमन्वेति भस्माच्छन्नो 'व पावको ॥१२॥ ( नहि पापं कृतं कर्म सद्यः क्षीरमिव मुंचति । दहन् बालमन्वेति भस्माच्छन्न इव पावकः ॥१२॥) अनुवाद—ताजे दूधकी भाँति किया पाप कर्म, ( तुरन्त ) विकार नहीं लाता, वह भस्मसे ढँकी आगकी भाँति दग्ध करता अज्ञजनका पीछा करता है।
५।१५ ] बालवग्गो [ ३३ राजगृह (वेणुवन) सट्ठिकूट (पेत) ७२-यावदेव अनत्थाय ञत्तं बालस्स जायति । हन्ति बालस्स सुक्कंसं मुद्धमस्स विपातयं ॥१३॥ (यावदेव अनर्थाय ज्ञातं बालस्य जायते । हन्ति बालस्य शुक्लांशं मूर्द्धानमस्य विपातयन् ॥१३॥) अनुवाद—मूर्ख (=बाल) का जितना भी ज्ञान है, (वह उसके) अनर्थके लिये होता है। वह उसकी मूर्धा (=शिर=प्रज्ञा) को गिराकर उसके शुक्ल (=धवल=शुद्ध) अंशका विनाश करता है। जेतवन सुधम्म (थेर) ७३-असतं भावनमिच्छेय्य पुरक्खारञ्च भिक्खुसु । आवासेसु च इस्सरियं पूजा परकुलेसु च ॥१४॥ (असद् भावनमिच्छेत् पुरस्कारं च भिक्षुषु । आवासेषु चैश्वर्यं पूजा परकुलेषु च ॥१४॥) ७४-ममेव कतमञ्ञन्तु गिही पब्बजिता उभो । ममेवातिवसा अस्सु किच्चाकिच्चेसु किस्मिचि । इति बालस्स सङ्कप्पो इच्छा मानो च वड्ढति ॥१५॥ (ममैव कृतं मन्येतां गृहि-प्रव्रजितावुभौ । ममैवातिवशाः स्यातां कृत्याकृत्येषु केषु चित् । इति बालस्य संकल्प इच्छा मानश्च वर्द्धते ॥१५॥) अनुवाद—अप्रस्तुत वस्तुकी चाह करता है, भिक्षुओंमें बडा बनना ३
३४ ] धम्मपदं [ ५।१६ ( चाहता है ), मठो ( और निवासो ) में स्वामीपन (=ऐश्वर्य ) और दूसरे कुलोंमें पूजा ( चाहता है )। गृहस्त और संन्यासी दोनो मेरे ही कियेको मानें, किसी भी कृत्य- अकृत्यमे मेरे ही वशवर्ती हो—ऐसा मूढ़का सकल्प होता है, ( जिससे उसकी ) इच्छा और अभिमान बढ़ते हैं । श्रावस्ती ( जेतवन ) ( बनवासी ) तिस्स ( थेर ) ७५-अञ्ञा हि लाभूपनिसा अञ्ञा निब्बान-गामिनी । एवमेतं अभिञ्ञाय भिक्खू बुद्धस्स सावको ॥ सकारं नाभिनन्देय्य विवेकमनुब्रूहये ॥ १६ ॥ ( अन्या हि लाभोपनिषद् अन्या निर्वाणगामिनी । एवमेतद् अभिज्ञाय भिक्षुर्बुद्धस्य श्रावकः । सत्कारं नाभिनन्देत् विवेकमनुबृंहयेत् ॥१६॥) अनुवाद—लाभका रास्ता दूसरा है, और निर्वाणको लेजानेवाला दूसरा—इस प्रकार इसे जानकर बुद्धका अनुगामी भिक्षु 'सत्कारका अभिनन्दन न करे, और विवेक (=एकान्तचर्या) को बढ़ावे । ५—बालवर्ग समाप्त
६—पण्डितवग्गो जेतवन राध (थेर) ७६—निधीनं'व पत्तारं यं पस्से वज्ज-दस्सिनं । निग्गय्हवादिं मेधाविं तादिसं पण्डितं भजे । तादिसं भजमानस्स सेय्यो होति न पापियो ॥ १ ॥ (निधीनामिव प्रवक्तारं यं पश्येत् वर्ज्यदर्शिनम् । निगृह्यवादिनं, मेधाविनं तादृशं पंडितं भजेत् । तादृशं भजमानस्य श्रेयो भवति न पापीयः ॥ १ ॥ ) अनुवाद—(भूमिमें गुप्त) निधियोंके बतलानेवालेकी तरह, बुराईको दिखलानेवाले ऐसे संयमवादी, मेधावी पंडितकी सेवा करे। ऐसेके सेवन करनेवालेका कल्याण होता है, अमंगल नहीं (होता)। जेतवन अस्सजी, पुनब्बसू ७७—ओवदेय्यानुसासेय्य असब्भा च निवारये । सतं हि सो पियो होति असतं होति अप्पियो ॥ २ ॥ [ २५
१६ ] धम्मपदं [ ६।४ (अववदेदनुशिष्याद् असभ्याच्च निवारयेत् । सतां हि स प्रियो भवति असतां भवत्यप्रियः ॥ २॥ ) अनुवाद—(जो) सदुपदेश देता है, अनुशासन करता है, नीच कर्म- से निवारण करता है, वह सत्पुरुषोंको प्रिय होता है, और असत्पुरुषोंको अप्रिय । जेतवन छन्न (थेर) ७८-न भजे पापके मित्ते न भजे पुरिसाधमे । भजेथ मित्ते कल्याणे भजेथ पुरिसुत्तमे ॥ ३ ॥ (न भजेत् पापानि मित्राणि न भजेत् पुरुषाधमान् । भजेत् मित्राणि कल्याणानि भजेत् पुरुषानुत्तमान् ॥३॥ अनुवाद—दुष्ट मित्रोंका सेवन न करे, न अधम पुरुषोंका सेवन करे । अच्छे मित्रोंका सेवन करे, उत्तम पुरुषोंका सेवन करे । जेतवन महाकप्पिन (थेर) ७६-धम्मपीती सुखं सेति विप्पसन्नेन चेतसा । अरियप्पवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो ॥ ४ ॥ (धर्मपीतीः सुखं शेते विप्रसन्नेन चेतसा । आर्यप्रवेदिते धर्मे सदा रमते पंडितः ॥४॥ ) अनुवाद—धर्म(-रस) का पान करनेवाला प्रसन्न-चित्तहो सुखपूर्वक सोता है; पंडित (जन) आर्योंके बतलाये धर्ममें सदा रमण करते हैं ।
६।७ ] पण्डितवग्गो [ ३७ जेतवन पण्डित सामणेर ८०--उदकं हि नयन्ति नेत्तिका उसुकारा नमयन्ति तेजनं । दारुं नमयन्ति तच्छका अत्तानं दमयन्ति पण्डिता ॥५॥ ( उदकं हि नयन्ति नेतृका इषुकारा नमयन्ति तेजनम् । दारु नमयन्ति, तक्षका आत्मानं दमयन्ति पण्डिताः ॥५॥ ) अनुवाद—नहरवाले पानीको लेजाते हैं, बाण बनानेवाले बाणको ठीक करते हैं, बढ़ई लकड़ीको ठीक करते हैं; और पंडित ( जन ) अपना दमन करते हैं । जेतवन भद्दिय ( थेर ) ८१-सेलो यथा एकघनो वातेन न समीरति । एवं निन्दापसंसासु न समिञ्जन्ति पण्डिता ॥६॥ ( शैलो यथैकघनो वातेन न समीर्यते । एवं निन्दाप्रशंसासु न समीर्यन्ते पण्डिताः ॥६॥ ) अनुवाद—जैसे ठोस पहाड़ हवासे कंपायमान नहीं होता; ऐसे ही पंडित निन्दा और प्रशंसासे विचलित नहीं होते । जेतवन काण-माता ८२-यथापि रहदो गम्भीरो विप्पसन्नो अनाविलो । एवं धम्मानि सुत्वान विप्पसीदन्ति पण्डिता ॥७॥
३८ ] धम्मपद [ ६।९ (यथापि ह्रदो गम्भीरो विप्रसन्नोऽनाविलः । एवं धर्मान् श्रुत्वा विप्रसीदन्ति पण्डिताः ॥७॥ ) अनुवाद—धर्मोंको सुनकर पण्डित ( जन ) अथाह, स्वच्छ, निर्मल सरोवरकी भाँति स्वच्छ ( सन्तुष्ट ) होते हैं। जेतवन पाँच सौ भिक्खु ८३—सब्बत वे सप्पुरिसा वजन्ति न कामकामा लपयन्ति सन्तो । सुखेन फुट्ठा अथवा दुखेन न उच्चावचं पण्डिता दस्सयन्ति ॥८॥ ( सर्वत्र वै सत्पुरुषा व्रजन्ति न कामकामा लपन्ति सन्तः । सुखेन स्पृष्टा अथवा दुःखेन नोच्चावचं पण्डिता दर्शयन्ति॥८॥ अनुवाद—सत्पुरुष सभी जगह जाते हैं, ( वह ) भोगोंके लिए बात नहीं चलाते; सुख मिले या दुःख, पण्डित (जन ) विकार नहीं प्रदर्शन करते । जेतवन धम्मिक ( थेर ) ८४—न अत्तहेतू न परस्स हेतु न पुत्तमिच्छे न धनं न रट्ठं । न इच्छेय्य अधम्मेन समिद्धिमत्तनो सीलवा पञ्ञवा धम्मिको सिया ॥६॥
६।११ ] पण्डितवग्गो [ ३९ ( नात्महेतोः न परस्य हेतोः न पुत्रमिच्छेत् न धनं न राष्ट्रम् । नेच्छेद् अधर्मेण समृद्धिमात्मनः स शीलवान् प्रज्ञावान् धार्मिकः स्यात् ॥९॥ ) अनुवाद—जो अपने लिए या दूसरेके लिये पुत्र, धन, और राज्य नहीं चाहते, न अधर्मसे अपनी उन्नति चाहते हैं; वही सदाचारी ( शीलवान् ) प्रज्ञावान और धार्मिक हैं । जेतवन धर्मश्रवण ८५—अप्पका ते मनुस्सेसु ये जना पारगामिनो । अथायं इतरा पजा तीरमेवानुधावति ॥१०॥ ( अल्पकास्ते मनुष्येषु ये जनाः पारगामिनः । अथेमा इतराः प्रजाः तीरमेवानुधावति ॥१०॥ ) ८६—ये च खो सम्मदक्खाते धम्मे धम्मानुवत्तिनो । ते जना पारमेस्सन्ति मच्चुधेय्यं सुदुत्तरं ॥११॥ ( ये च खलु सम्यगाख्याते धर्मे धर्मानुवर्तिनः । ते जनाः पारमेष्यन्ति मृत्युधेयं सुदुस्तरम् ॥११॥ ) अनुवाद—मनुष्योंमें पार जानेवाले जन विरले ही हैं, यह दूसरे लोग तो तीरे ही तीरे दौड़नेवाले हैं। जो सुव्याख्यात धर्म- का अनुगमन करते हैं, वह मृत्युगृहीत अतिदुस्तर (संसार- सागर) को पार करेंगे।
५. बालवग्गो (बाल वर्ग)
४० ] धम्मपदं [ ६।१४ ' जेतवन पाँच सौ नवागत भिक्षु ८७-काण्हं धम्मं विप्पहाय सुक्कं भावेथ पण्डितो । ओका अनोकं आगम्म विवेके यत्थ दूरमं ॥१२॥ ( कृष्णं धर्मं विप्रहाय शुक्लं भावयेत् पण्डितः । ओकात् अनोकं आगम्य विवेके यत्र दूरमम् ॥१२॥) ८८-तत्रामिरतिमिच्छेय्य हित्वा कामे अकिञ्चनो । परियोदपेय्य अत्तानं चित्तक्लेसेहि पण्डितो ॥१३॥ ( तत्राभिरतिमिच्छेत् हित्वा कामान् अकिंचनः । पर्य्यवदापयेत् आत्मानं चित्तक्लेशैः पण्डितः ॥१३॥) अनुवाद—काले धर्म (=पाप )को छोडकर, पण्डित (जन ) शुक्ल (-धर्म ) का आचरण करें। घरसे बेघर हो दूर जा विवेक ( =एकान्त ) का सेवन करें। भोगोको छोड़, सर्वस्वत्यागी हो वहीं रत रहनेकी इच्छा करें। पण्डित (जन ) चित्त- के मलोंसे अपनेको परिशुद्ध करें। ८९-येसं सम्बोधि-अङ्गेसु सम्मा चित्तं सुभावितं । आदान-पटिनिस्सग्गे अनुपदाय ये रता । खीणासवा जुतीमन्तो ते लोके परिनिब्बुता ॥१४॥ ( येषां सम्बोध्यंगेषु सम्यक् चित्तं सुभावितम् । आदानप्रतिनिःसर्गे अनुपदाय ये रताः । क्षीणास्रवा ज्योतिष्मन्तस्ते लोके परिनिर्वृताः ॥१४॥) अनुवाद—सम्बोधि(=परम ज्ञान )के अंगों(=संयोध्यंगो )में जिनका चित्त भली प्रकार परिभावित (=संस्कृत, ) हो गया है;
६।१४ ] पण्डितवग्गो [ ४१ जो परिग्रहके परित्यागपूर्वक अपरिग्रहमें रत हैं। ऐसे, चित्तके मलोंसे निर्मुक्त (=क्षीणास्रव ), द्युतिमान् ( पुरुष ) लोकमें निर्वाणको प्राप्त हो गये हैं। ६-पण्डितवर्ग समाप्त
७—अरहन्तवग्गो राजगह ( जीवकका आम्रवन ) जीवक ९०-गतद्धिनो विसोकस्स विप्पमुत्तस्स सब्बधि । सब्बगन्थप्पहीणस्स परिळाहो न विज्जति ॥१॥ ( गताध्वनो विशोकस्य विप्रमुक्तस्य सर्वथा । सर्वग्रन्थप्रहीणस्य परिदाहो न विद्यते ॥१॥) अनुवाद—जिसका मार्ग(-गमन ) समाप्त हो चुका है, जो शोक- रहित तथा सर्वथा मुक्त है; जिसकी सभी ग्रंथियाँ क्षीण हो गई हैं ; उसके लिये सन्ताप नहीं है । राजगह ( वेणुवन ) महाकस्सप ६१-उय्युञ्जन्ति सतीमन्तो न निकेते रमन्ति ते । हंसा 'व पल्ललं हित्वा ओकमोकं जहन्ति ते ॥२॥ ( उद्युञ्जते स्मृतिमन्तो न निकेते रमन्ते ते । हंसा इव पल्वलं हित्वा ओकमोकं जहति ते ॥२॥) ७२ ]
७४ ] अरहन्तवग्गो [ ४३ अनुवाद—सचेत हो वह उद्योग करते हैं, (गृह-)सुख में रमण नहीं करते, हंस जैसे क्षुद्र जलाशयको छोड़कर चले जाते हैं, (वैसे ही यह अर्हद् ) गृहको छोड़ जाते हैं। जेतवन बेलट्ठि सीस ६२–येसं सन्निचयो नत्थि ये परिञ्ञातभोजना । सुञ्ञतो अनिमित्तो च विमोक्खो यस्स गोचरो । आकासे 'व सकुन्तानं गति तेसं दुरन्नया ॥३॥ ( येषां सञ्चियो नास्ति ये परिज्ञातभोजनाः । शून्यताऽनिमित्तश्च विमोक्षो यस्य गोचरः । आकाश इव शकुन्तानां गतिः तेषां दुरन्वया ॥३॥) अनुवाद—जो (वस्तुओका) सचय नहीं करते, जिनका भोजन नियत है, शून्यता-स्वरूप तथा कारण-रहित मोक्ष (=निर्वाण) जिनको दिखाई पडता है; उनकी गति (=गन्तव्य स्थान) आकाशमें पक्षियोकी (गतिकी) भांति अज्ञेय है । राजगृह (वेणुवन) अनुरुद्ध (थेर) ६३-यस्सा'सवा परिक्खीणा आहारे च अनिस्सितो । सुञ्ञतो अनिमित्तो च विमोक्खो यस्स गोचरो । आकासे 'व सकुन्तानं पदं तस्स दुरन्नयं ॥४॥ ( यस्यास्रवाः परिक्षीणा आहारे च अनिःसृतः । शून्यताऽनिमित्तश्च विमोक्षो यस्य गोचरः । आकाश इव शकुन्तानां पदं तस्य दुरन्वयम् ॥४॥)
४४ ] धम्मपद [ ७।६ अनुवाद—जिसके आस्रव (=मल) क्षीण हो गये, जो आहारमें पर- तंत्र नहीं, जो शून्यता रूप० । श्रावस्ती (पूर्वाराम) महाकच्चायन ६४-यस्सिन्द्रियाणि समथं गतानि, अस्सा यथा सारथिना सुदन्ता । पहीनमानस्स अनासवस्स, देवापि तस्स पिहयन्ति तादिनो ॥५॥ ( यस्येन्द्रियाणि शमतां गतानि अश्वा यथा सारथिना सुदान्ताः । प्रहीणमानस्य अनास्रवस्य देवा अपि तस्य स्पृहयन्ति तादृशः ॥५॥ ) अनुवाद—सारथीद्वारा सुदान्त (=सुशिक्षित ) अश्वोंकी भाँति जिसकी इन्द्रियाँ शान्त हैं, जिसका अभिमान नष्ट हो गया, ( और ) जो आस्रवरहित है, ऐसे उस ( पुरुष ) की देवता भी स्पृहा करते हैं । जेतवन सारिपुत्त (थेर) ६५-पठवीसमो नो विरुज्झति इन्दखीलूपमो तादि सुव्वतो । रहदो 'व अपेतकद्दमो संसारा न भवन्ति तादिनो ॥६॥
७८ ] अरहन्तवग्गो [ ४५ ( पृथिवीसमो न विरुध्यते इन्द्रकीलोपमस्तादृक् सुव्रतः । ह्रद इवापेतकर्दमः संसारा न भवन्ति तादृशः ॥६॥ ) अनुवाद—वैसा सुन्दर व्रतधारी इन्द्रकीलके समान ( अचल ) तथा पृथिवीके समान जो क्षुब्ध नहीं होता; ऐसे ( पुरुष ) में कर्दमरहित सरोवरकी भाँति संसार (-मल ) नहीं रहता । जेतवन कोसम्बियासित तिस्स (थेर ) ६६—सन्तं तस्स मनं होति सन्ता वाचा च कम्मञ्च । सम्मदञ्ञाविमुत्तस्स उपसन्तस्स तादिनो ॥७॥ ( शान्तं तस्य मनो भवति शान्ता वाक् च कर्म च । सम्यगाज्ञाविमुक्तस्य उपशान्तस्य तादृशः ॥ ७ ॥ ) अनुवाद—उपशान्त और यथार्थ ज्ञानद्वारा मुक्त हुये उस ( अहत् पुरुष ) का मन शान्त होता है, वाणी और कर्म शान्त होते हैं । जेतवन सारिपुत्र (थेर ) ६७—अस्सद्धो अकतञ्ञू च सन्धिच्छेदो च यो नरो । हतावकासो वन्तासो स वे उत्तमपोरिसो ॥८॥ ( अश्रद्धोऽकृतज्ञश्च सन्धिच्छेदश्च यो नरः । हतावकाशो वान्ताशः स वै उत्तम पुरुषः ॥ ८ ॥ ) अनुवाद—जो ( मूढ-) श्रद्धारहित, अकृत (=बिना बनाये=निर्वाण )- ज्ञ, ( संसारकी ) संधिका छेदन करनेवाला, अवकाशरहित,
४६ ] धम्मपदं [ ७।१० ( विषय-) भोगको वमनकर दिया जो नर है, वही उत्तम पुरुष है । जेतवन ( खदिरवनी ) रेवत ( थेर ) ९८–गामे वा यदि वाऽरञ्ञे निम्ने वा यदि वा थले । यत्थारहन्तो विहरन्ति तं भूमिं रामणेय्यकं ॥९॥ ( ग्रामे वा यदि वाऽऽरण्ये निम्ने वा यदि वा स्थले । यत्रार्हन्तो विहरन्ति सा भूमी रमणीया ॥ ९ ॥ ) अनुवाद—गाँवमें या जंगलमें, निम्न या ( ऊँचे ) स्थलमें जहाँ ( कहीं ) अर्हत् ( लोग ) विहार करते हैं, वही रमणीय भूमि है । जेतवन आरण्यक भिक्षु ९९–रमणीयानि अरञ्ञानि यत्थ न रमते जनो । वीतरागा रमिस्सन्ति न ते कामगवेसिनो ॥१०॥ ( रमणीयान्यरण्यानि यत्र न रमते जनः । वीतरागा रंस्यन्ते न ते कामगवेषिणः ॥ १० ॥ ) अनुवाद—( वह ) रमणीय वन, जहाँ ( साधारण ) जन रमण नहीं करते, काम(भोगों)के पीछे न भटकनेवाले वीतराग (वहाँ) रमण करेंगे । ७–अर्हद्वर्ग समाप्त
८—सहस्सवग्गो वेणुवन तम्बदाठिक (चोरघातक) १००—सहस्समपि चे वाचा अनत्थपदसंहिता । एकं अत्थपदं सेय्यो यं सुत्वा उपसम्मति ॥ १॥ (सहस्रमपि चेद् वाचः अनर्थपदसंहिताः । एकमर्थपदं श्रेयो यच्छ्रुत्वोपशाम्यति ॥ १ ॥) अनुवाद—व्यर्थके पदोंसे युक्त सहस्रों वाक्योंसे भी (वह) सार्थक एक पद श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर शान्ति होती है। जेतवन दारुचीरिय (थेर) १०१—सहस्समपि च गाथा अनत्थपदसंहिता । एकं गाथापदं सेय्यो यं सुत्वा उपसम्मति ॥२॥ (सहस्रमपि चेद् गाथा अनर्थपदसंहिताः । एकं गाथापदं श्रेयो यच्छ्रुत्वोपशाम्यति ॥ २ ॥) अनुवाद—व्यर्थके पदोंसे युक्त हज़ार गाथाओंसे भी एक गाथापद श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर० । [ ४७
६. पण्डितवग्गो (पण्डित वर्ग)
४८ ] धम्मपदं [ ८।६ जेतवन कुण्डलकेसी (थेरी) १०२—यो च गाथा सतं भासे अनत्थपदसंहिता । एकं धम्मपदं सेय्यो यं सुत्वा उपसम्मति ॥३॥ ( यश्च गाथाशतं भाषेतानर्थपदसंहितम् । एकं धर्मपदं श्रेयो यच्छ्रुत्वोपशाम्यति ॥ ३ ॥ ) १०३-यो सहस्सं सहस्सेन सङ्गामे मानुसे जिने । एकं च जेय्यमत्तानं स वे सङ्गामजुत्तमो ॥४॥ ( यः सहस्रं सहस्रेण संग्रामे मानुषान् जयेत् । एकं च जयेद् आत्मानं स वै संग्रामजिदुत्तमः ॥ ४ ॥ ) अनुवाद—जो व्यर्थके पदोंसे युक्त सौ गाथायें भी भायें (उससे) धर्मका एक पद भी श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर ० ॥ सग्राममें जो हजारो हजार मनुष्योंको जीत ले, (उससे कहीं अच्छा) एक अपनेको जीतनेवाला उत्तम संग्रामजिद् है। जेतवन अनर्थ-पुच्छक ब्राह्मण १०४-अत्ता ह वे जितं सेय्यो या चायं इतरा पजा । अत्तदन्तस्स पोसस्स निच्चं सञ्ञतचारिनो ॥५॥ ( आत्मा ह वै जितः श्रेयान् या चेयमितराः प्रजा । दान्तात्मनः पुरुषस्य नित्यं संयतचारिणः ॥ ५ ॥ ) १०५-नेव देवो न गन्धब्बो न मारो सह बम्हुना । जितं अपजितं कयिरा तथारूपस्स जन्तुनो ॥६॥
८१८ ] सहस्सवग्गो [ ४९ ( नैव देवो न गन्धर्वो न मारः सह ब्रह्मणा । जितं अपजितं कुर्यात् तथारूपस्य जन्तोः ॥ ६ ॥ अनुवाद—इन अन्य प्रजाओंके जीतनेकी अपेक्षा अपनेको जीतना श्रेष्ठ है । अपनेको दमन करनेवाला, नित्य अपनेको संयम करनेवाला जो पुरुष है। इस प्रकारके प्राणीके जीतेको, न देवता, न गन्धर्व, न ब्रह्मा सहित मार, बेजीता कर सकते हैं । वेणुवन सारिपुत्तके मामा १०६—मासे मासे सहस्सेन यो यजेथ सतं समं । एकञ्च भावितत्तानं मुहुत्तमपि पूजये । सा येव पूजना सेय्यो 'यं चे वस्ससतं हुतं ॥७॥ ( मासे मासे सहस्रेण यो यजेत शतं समान् । एकं च भावितात्मानं मुहूर्तमपि पूजयेत् । सैव पूजना श्रेयसी यच्चेव् वर्षशतं हुतम् ॥ ७ ॥ ) अनुवाद—सहस्र(-दक्षिणा यज्ञ) से जो महीने महीने सौ वर्ष तक यजन करे, और यदि परिशुद्ध मनवाले एक (पुरुष) को एक मुहुर्त ही पूजे ; तो सौ वर्षके हवनसे यह पूजा ही श्रेष्ठ है । वेणुवन सारिपुत्तका भाजा १०७—यो च वस्ससतं जन्तु अग्गिं परिचरे वने । एकं च भावितत्तानं मुहुत्तमपि पूजये । सा येव पूजना सेय्यो यं चे वस्ससतं हुतं ॥८॥ ४