भारतकोश
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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१७२- विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन

३४६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

किया गया धत्तूरके चूर्णके लेपका उबटन लगानेसे मनुष्यके शरीरमें स्थित ग्रीष्मबाधा दूर हो जाती है। प्रातःकाल गरम दूधकी भापसे शरीर-सेंक करनेपर घर्मदोष (स्वेदाधिक्य) नष्ट हो जाता है। काकजंघाका उबटन शरीरके लिये सुन्दर अनुलेपन द्रव्य है।

मुलेठी, शर्करा, अडूसाका रस और मधुका सेवन करनेसे रक्त-पित्त, कामला और पाण्डु रोगका विनाश होता है। अडूसाका रस और मधु पीनेसे रक्त-पित्त-विकार दूर हो जाता है।

प्रातःकाल मात्र जल पीकर भयंकर पीनस रोगको दूर करना चाहिये। हे महेश्वर! बहेड़ा, पिप्पली और सेंधा नमकका चूर्ण, कांजीके साथ पान करनेसे मनुष्यका स्वरभेद दूर हो जाता है। इस दोषके होनेपर मैनसिल, बलामूल, बेरकी पत्ती, गुग्गुल तथा आँवलेका चूर्ण गोदुग्धमें मिलाकर पान करना चाहिये।

हे परमेश्वर ! चमेलीकी पत्ती, बेरकी पत्ती और मैनसिल—इनकी बत्ती बनाकर उसे बेरकी अग्निमें सेंककर धूम्रपान करनेसे कास रोग दूर हो जाता है। त्रिफला और पिप्पलीका चूर्ण मधुके साथ खाना चाहिये। भोजन करनेके पूर्व मधुके साथ प्रयुक्त यह औषधिक योग प्यास और ज्वरके दोषको शान्त करता है। बिल्वकी जड़ तथा गुडूचीका क्वाथ मधुके साथ पान करनेसे तीनों प्रकारके छर्दि रोग विनष्ट हो जाते हैं। चावलके धोवनमें दूर्वारसको मिलाकर पीनेसे भी छर्दि रोग दूर हो जाता है। (अध्याय १९०)


सर्प, बिच्छू तथा अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषकी चिकित्सा

श्रीहरिने कहा— हे वृषध्वज! पुष्यनक्षत्रमें पुनर्नवाकी श्वेत जड़ लाकर जलके साथ पीनेसे पीनेवालेके आस-पास और घरोंमें सर्प नहीं आ सकते। जो मनुष्य भालूके दाँतमें तार्क्ष्य (गरुड)-की मूर्ति बनाकर धारण करता है, वह सर्पोंके लिये जीवनपर्यन्त अदृश्य हो जाता है। हे रुद्र! जो मनुष्य पुष्यनक्षत्रमें सेमरकी जड़को जलमें पीसकर पी लेता है, उसके ऊपर किया गया विषैले सर्पोंके दाँतोंका प्रहार व्यर्थ हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। पुष्यनक्षत्रमें लाजवन्तीकी जड़ हाथमें बाँधनेसे अथवा उसके लेपको लगाकर भी सर्पोंको पकड़ा जा सकता है। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। पुष्यनक्षत्रमें लायी गयी सफ़ेद मन्दारकी जड़को शीतल जलमें पीसकर पान करनेसे सर्पदंश तथा करवीर आदिका विष नष्ट हो जाता है। कांजीके साथ महाकालकी जड़ पीसकर उसका लेप दंश-भागपर लगानेसे वोड्र (गोनस) तथा डुंडुभ (पनिहा) सर्पोंका विष दूर होता है।

चौलाईके मूलको चावलके धोवनमें पीसकर घीके साथ पान करनेपर सभी प्रकारके विष नष्ट हो जाते हैं। नीली तथा लाजवन्तीकी जड़ पृथक्-पृथक् अथवा संयुक्त-रूपसे चावलके धोवनमें पीसकर पान करनेपर सभी प्रकारके सर्पोंके दंशका विष नष्ट हो जाता है। गुड़, शर्करा तथा दुग्धमिश्रित कूष्माण्डके रसका पान सर्पदंशके विषको दूर कर देता है। कोदोकी जड़ पीसकर पान करनेसे विषकी मूर्च्छा दूर हो जाती है। मुलेठीके चूर्णसे युक्त शर्करा और दूध तीन राततक पीकर चूहेके विषको दूर किया जा सकता है। तीन चुल्लू शीतल जल पीनेसे ताम्बूल खानेके कारण जलनयुक्त मुँहसे बहनेवाली लार बंद हो जाती है। शर्करासे युक्त घृतका पान करनेसे मद्यका मद नहीं होता।

हे महेश्वर! कृष्णा (काली तुलसी) और अंकोलकी जड़के क्वाथको तीन राततक पीनेसे

काण्ड ] विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार ३४७


सामान्य अथवा कृत्रिम विषका प्रभाव नष्ट हो जाता है। सेंधा नमकके साथ गरम गोघृतका पान बिच्छूके डंक मारनेसे शरीरमें उत्पन्न विषकी वेदनाको दूर करता है। हे शिव ! कुसुम्भ (कुसुम), कुंकुम, हरिताल, मैनसिल, कंजा और मन्दार-वृक्षकी जड़ पीसकर पान करनेसे मनुष्योंमें चढ़ा हुआ सर्प या बिच्छूका विष नष्ट हो जाता है। हे हर ! दीपकका तेल लगानेसे सामान्य ततैया आदि कीटोंका विष दूर हो जाता है। इससे कनखजूरेका भी विष नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। बिच्छूके डंक लगे हुए स्थानपर सोंठ तथा तगरका लेप लगानेसे विष नष्ट हो जाता है। इसी लेपसे मधुमक्खीके डंकका भी विष दूर किया जा सकता है तथा सोया, सेंधा नमक और घृतका मिश्रित लेप लगानेसे भी वह विष दूर हो जाता है। हे महादेव ! शिरीषके बीजोंको गरम दूधमें घिसकर उसका लेप लगानेसे कुत्तेका विष नष्ट हो जाता है। प्रज्वलित अग्नि और उष्ण जलसे सेंकनेपर मेढकका विष दूर हो जाता है। हे चन्द्रचूड ! धत्तूरके रससे मिश्रित दूध, घी और गुड़का पान कुत्तेके विषको नष्ट कर देता है।

बरगद, नीम और शमी वृक्षकी छालके क्वाथसे सेंक करनेपर मुख और दाँतकी विष-वेदना नष्ट हो जाती है। देवदारु और गैरिकके चूर्णका लेप करनेसे भी इस विषको शान्त किया जा सकता है। हे हर ! नागेश्वर, दारुहल्दी, हल्दी तथा मजीठके मिश्रित लेपसे लूता (मकड़ी)-के काटनेका विष दूर होता है। कंजेके बीज, वरुण-वृक्षके पत्ते, तिल और सरसोंका पिसा हुआ लेप भी विषको दूर कर देता है, इसमें संदेह नहीं है।

हे हर ! नमक और घृतसे युक्त घृतकुमारीके पत्तेका लेप करनेसे घोड़ेके शरीरकी खुजली दस दिनमें दूर हो जाती है। (अध्याय १९१)


विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार, स्मरण तथा मेधाशक्तिवर्धक ब्राह्मी-घृतादिके निर्माणकी विधि

श्रीहरिने कहा— [हे हर !] चित्रक आठ भाग, शूरण (सूरन) सोलह भाग, सोंठ चार भाग, काली मिर्च दो भाग, पिप्पलीमूल तीन भाग, विडंग चार भाग, मुशली आठ भाग और त्रिफला चार भाग लेकर इनके दुगुने गुड़के साथ मोदक बनाना चाहिये। इसके सेवनसे अजीर्ण, पाण्डु, कामला, अतिसार, मन्दाग्नि और प्लीहा नामक रोगोंको दूर किया जा सकता है।

बिल्व (बेल), अग्निमन्थ (गनियारी), श्योनाक (सोना पाढ़ा), पाटला (पाढर), पारिभद्रक (नीम), प्रसारिणी (गन्धप्रसारिणी), अश्वगन्धा, बृहती, कण्टकारी, बला, अतिबला, रास्ना (सर्पसुगन्धा), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), पुनर्नवा, एरण्ड, शारिवा (अनन्तमूल), पर्णी (शालपर्णी), गुडूची, कपिकच्छुका (केवाँच) नामक इन औषधियोंको दस-दस पलकी मात्रामें एकत्र करके शुद्ध जलमें पकाना चाहिये। जब उस जलका चौथाई भाग शेष रह जाय तो उससे तेलको सिद्ध करे। यदि बकरीका दूध अथवा गौका दूध हो तो उसको उस तैलपाकमें चौगुना मिलाकर तेलकी मात्राके समान शतावरी और सेंधा नमक भी मिलाये। इस प्रकार तैलपाकको सिद्ध करनेके पश्चात् उस तेलमें शतपुष्पा (सोया), देवदारु, बला, पर्णी, वचा (वच), अगुरु, कुष्ठ (कूट), जटामांसी, सेंधा नमक और पुनर्नवा एक-एक पल पीसकर मिलाना चाहिये। इस तेलका प्रयोग पीने, नस्य लेने तथा शरीरमें

१७३- त्रिपुराभैरवी तथा ज्वालामुखी आदि देवियोंके पूजनकी विधि

३४८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

मर्दनके काममें करना चाहिये। इसके प्रयोगसे हृदयगत शूल, पार्श्वशूल, गण्डमाला, अपस्मार और वातरक्त नामक रोग दूर हो जाते हैं तथा शरीर शोभा-सम्पन्न हो जाता है। हे हर! इस तेलके प्रयोगसे खच्चरी भी गर्भ-धारण कर सकती है, स्त्रीके विषयमें तो कहना ही क्या? घोड़ा, हाथी और मनुष्योंमें वात-दोष होनेपर इस तेलका प्रयोग करना चाहिये। इतना ही नहीं सभी वात-विकारसे ग्रस्त प्राणियोंके लिये इसका प्रयोग लाभप्रद है।

हिंगु (हींग), तुम्बुरु (धनिया) और शुण्ठी (सोंठ)-के द्वारा सरसोंका तेल सिद्ध करना चाहिये। इस तेलको कानमें डालनेसे कर्णशूल शान्त हो जाता है। सूखी मूली तथा सोंठका क्षार, हींग और हल्दीका चूर्ण समभागमें लेकर उसके चौगुने मट्ठेके साथ पूर्ववर्णित सरसोंके तेलमें पकाना चाहिये। इस तेलको कानोंमें डालनेसे उनके अंदर उत्पन्न बहरापन, शूल, मवादका स्राव और कृमिदोष विनष्ट हो जाता है।

सूखी मूली और सोंठका क्षार तथा हींग, हल्दी, सोया, वच, कूट, दारुहल्दी, सहिजन, रसाञ्जन, काला नमक, यवक्षार, समुद्रफेन, सेंधा नमक, ग्रन्थिक, विडंग, नागरमोथा, मधु, चार गुना शुक्तिभस्म, बिजौरा नीबूका रस और केलेका रस लेकर इन्हींसे सरसोंका तेल सिद्ध करना चाहिये। यह सिद्ध तेल कर्णशूल दूर करनेका अत्युत्तम उपाय है। हे हर! कानमें इसको डालनेसे बहरापन, कर्णनाद, पीबस्राव तथा कृमिदोष सद्यः विनष्ट हो जाता है। इसका नाम क्षारतैल है। इस तेलसे मुख तथा दाँतोंकी गंदगी भी दूर हो जाती है।

चन्दन, कुंकुम, जटामांसी, कर्पूर, चमेलीकी पत्ती, चमेलीका फूल, कंकोल, सुपारी, लौंग, अगरु, कस्तूरी, कुष्ठ, तगर, गोरोचन, प्रियंगु, बला, मेंहदी, सरल, सप्तपर्णी, लाक्षा, आँवला और रक्त कमल—इन औषधियोंको एकत्रकर इनसे तेल सिद्ध करना चाहिये। यह पसीनेके कारण शरीरमें उत्पन्न होनेवाले मल, दुर्गन्ध तथा खुजली और कुष्ठको दूर करनेवाला श्रेष्ठतम औषध है। हे रुद्र! इस तेलका प्रयोग करनेसे पुरुष अधिक पुरुषत्व-सम्पन्न हो जाता है और वंध्या स्त्री भी पुत्र प्राप्त कर सकती है।

यदि यवानी (अजवायन), चित्रक, धनिया, त्रिकटु, जीरा, काला नमक, विडंग, पिप्पलीमूल तथा राजिक (राई सरसों) नामक औषधियोंद्वारा आठ प्रस्थ जलसे युक्त एक प्रस्थ घृतका शोधन किया जाय तो यह सिद्ध घृत अर्श, गुल्म तथा शोथ रोगोंका विनाश करता है और जठराग्निको उद्दीप्त करता है।

काली मिर्च, निशोत, कूट, हरिताल, मैनसिल, देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, जटामांसी, रक्तचन्दन, विशाला (इन्द्रवारुणी), कनेर, मन्दारदुग्ध और गोबरका रस एकत्रकर—इन औषधियोंकी मात्रा एक-एक कर्ष अर्थात् दो-दो तोला हो, किंतु जो औषधियाँ विषैली हैं, उनकी मात्रा आधा पल अपेक्षित है—इन सभी औषधियोंके द्वारा आठ प्रस्थ गोमूत्रके साथ एक प्रस्थ सरसोंका तेल मिट्टीके पात्र अथवा लौहपात्रमें भरकर मन्द-मन्द आँचपर पकाये। जब यह सिद्ध हो जाय तो इस तेलके अभ्यङ्गसे पामा, विचर्चिका, दद्रु, विस्फोटक आदि रोग नष्ट हो जाते हैं और रुग्ण स्थानोंपर शुद्ध एवं कोमल त्वचा आ जाती है। अत्यधिक मात्रामें पहलेसे फैले हुए पुराने श्वेत कुष्ठको भी इस तेलके प्रयोगसे नष्ट किया जा सकता है।

हे शिव! परवलकी पत्ती, कटुकी, मंजीठ, अनन्तमूल, हल्दी, चमेलीकी पत्ती, शमीकी पत्ती, नीमकी पत्ती और मुलेठीके क्वाथसे सिद्ध घृतका लेप करनेसे व्रण पीड़ारहित हो जाता है और उसका बहना भी बंद हो जाता है।

१७४- वायुजय-निरूपण

काण्ड ] विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार ३४९


शंखपुष्पी, वचा, सोमलता, ब्राह्मी, काला नमक, हरीतकी, गुडूची, जंगली अडूसा और वकुची नामक औषधियोंको समानरूपसे एक-एक अक्ष (पल)-की मात्रामें एकत्र करके उनसे एक प्रस्थ घृतको यथाविधि सिद्ध करना चाहिये, साथ ही कण्टकारीका रस एक प्रस्थ तथा गोदुग्ध भी एक प्रस्थ मिलाना चाहिये। इस घृतपाकका नाम ब्राह्मीघृत है। यह स्मृति और मेधाशक्तिको बढ़ानेवाला है।

अग्निमन्थ (गनियारी), वचा, वासा (अडूसा), पिप्पली, मधु तथा सेंधा नमक सात रात सेवन करनेसे मनुष्य किन्नरोंके समान मधुर गीत गानेवाला हो जाता है।

समान भागमें गृहीत अपामार्ग, गुडूची, वचा, कूट, शतावरी, शंखपुष्पी, हरीतकी और विडंगके चूर्णको समान भाग घृतके साथ सेवन करनेसे मात्र तीन दिनमें यह मनुष्यको एक सौ आठ ग्रन्थोंको कण्ठस्थ करनेकी क्षमतावाला बना देता है। जल, दूध या घृतके साथ एक मासपर्यन्त सेवन की गयी वचा तो मनुष्यको श्रुतिधारक विद्वान् बना देती है। चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहणके अवसरपर दूधके साथ एक पल सेवन की गयी वचा मनुष्यको उसी समय श्रेष्ठतम प्रज्ञावान् बना देती है।

चिरायता, नीमकी पत्ती, त्रिफला, पित्तपापड़ा, परवल, मोथा और अडूसासे बने हुए क्वाथका पान विस्फोटक व्रणों और रक्तस्रावको विनष्ट कर सकता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

केतकीका फल, शंखभस्म, सेंधा नमक, त्रिकटु (काली मिर्च, सोंठ तथा पिप्पली), वचा, समुद्रफेन, रसाञ्जन, मधु, विडंग और मैनसिल नामक औषधियोंको एकमें मिलाकर बनायी गयी बत्तीका नेत्रोंमें प्रयोग करनेसे काच, तिमिर तथा पटलदोष नष्ट हो जाते हैं।

दो प्रस्थ अर्थात् आठ सेर उड़द लेकर उससे एक द्रोण अर्थात् सोलह सेर जलमें क्वाथ बनाना चाहिये। चौथाई भाग शेष रहनेपर उस क्वाथके द्वारा एक प्रस्थ अर्थात् चार सेर तेलका पाक करे। तदनन्तर उसमें एक आढक अर्थात् आठ सेर कांजी मिलाकर पिसे हुए पुनर्नवा, गोखरू, सेंधा नमक, त्रिकटु, वचा, काला नमक, देवदारु, मंजीठ और कण्टकारी ओषधियोंका चूर्ण मिश्रित करना चाहिये। हे महेश्वर! इस औषधका नस्य लेनेसे और पान करनेसे भयंकर कर्णशूल नष्ट हो जाता है। इसके अभ्यङ्गसे अर्थात् मालिश करनेसे कानोंका बहरापन एवं अन्य सभी प्रकारके शारीरिक रोग दूर हो जाते हैं।

दो पल सेंधा नमक, पाँच पल सोंठ और चित्रक, पाँच प्रस्थ कांजी* तथा एक प्रस्थ तेलको एकमें पकाना चाहिये। जब यह पाक सिद्ध हो जाय तो इसके नस्य, पान एवं अभ्यङ्गसे असृग्दर (प्रदर), स्वरभंग, प्लीहा और सभी प्रकारके वात रोग विनष्ट हो जाते हैं।

गूलर, बरगद, पाकड़, दोनों प्रकारके जामुन, दोनों प्रकारके अर्जुन, पिप्पली, कदम्ब, पलाश, लोध्र, तिन्दुक, महुआ, आम, राल, बेर, कमल, नागकेशर, शिरीष और बीजडूक्तक—इनको एकमें मिलाकर क्वाथ बनाना चाहिये। तदनन्तर उस क्वाथसे तैलपाक सिद्ध करे। इस सिद्ध तेलका लेप करनेसे अत्यन्त पुराने व्रण नष्ट हो जाते हैं।

(अध्याय १९२)


* एक सेर चावलको हँड़ियामें अच्छी तरह पकाकर ठंडा करे। उसमें चार किलो पानी डालकर मोटे कपड़ेसे मुख बंदकर जमीनमें ढककर रखे। सात दिन बाद पानी छानकर निकाल ले, शेषको फेंक दे, उसीको 'कांजी' कहते हैं।

१७५- उत्तम तथा अधम अश्वोंके लक्षण, अश्वोंके आगन्तुक और त्रिदोषज रोगोंकी चिकित्सा तथा अश्वशान्ति, गजायुर्वेद, गजचिकित्सा और गजशान्ति

३५०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

बुद्धि-शुद्धकर ओषधि, विविध अभ्यङ्गों एवं उपयोगी चूर्णोंके निर्माणकी विधि, विरेचक द्रव्य तथा औषध-सेवनमें भगवान् विष्णुके स्मरणकी महिमा

श्रीहरिने कहा—[हे हर!] प्याज, जीरा, कूट, अश्वगन्धा, अजवायन, वचा, त्रिकटु और सेंधा नमकसे निर्मित श्रेष्ठ चूर्णको ब्राह्मीरससे भावित करके घृत तथा मधुके साथ मात्र एक सप्ताह प्रयुक्त करनेपर यह मनुष्यकी बुद्धिको अत्यन्त निर्मल बना देता है।

सरसों, वचा, हींग, करंज, देवदारु, मंजीठ, त्रिफला, सोंठ, शिरीष, हल्दी, दारुहल्दी, प्रियंगु, नीम और त्रिकटुको गोमूत्रमें घिसकर नस्य, आलेपन तथा उबटनके रूपमें प्रयुक्त करना हितकारी होता है। यह अपस्मार, विषोन्माद, शोथ तथा ज्वरका विनाशक है। इसके सेवनसे भूत-प्रेतादि-जन्य तथा राजद्वारीय भय विनष्ट हो जाता है।

नीम, कूट, हल्दी, दारुहल्दी, सहिजन, सरसोंका तेल, देवदारु, परवल और धनियाको मट्ठेमें घिसकर उबटन बना लेना चाहिये। तदनन्तर शरीरमें तेल लगाकर इस उबटनका प्रयोग करे तो निश्चित ही पामा, कुष्ठ, खुजली ठीक हो जाती है।

सामुद्र लवण, समुद्रफेन, यवक्षार राजिका (गौरसर्षप), नमक, विडंग, कटुकी, लौहचूर्ण, निशोथ और सूरन—इन्हें समान भागमें लेकर दही, गोमूत्र तथा दूधके साथ मन्द-मन्द आँचपर पका करके जलसे पान करना चाहिये। यह चूर्ण अग्नि और बलवर्धक है। पुराना अजीर्ण रोग होनेपर इस चूर्णका सेवन जटामांसी आदिसे युक्त घृतके साथ करना चाहिये। यह इस रोगकी उत्तम ओषधि है। यह चूर्ण नाभिशूल, मूत्रशूल, गुल्म और प्लीहाजन्य जो भी शूल हैं, उन सभी शूलोंको विनष्ट करनेवाला है। यह जठराग्निको उद्दीप्त कर देता है। परिणाम नामक शूलमें तो यह परम हितकारी है।

हरीतकी, आँवला, द्राक्षा, पिप्पली, कण्टकारी, काकड़ासिंगी, पुनर्नवा और सोंठके चूर्णको खानेसे कास रोग विनष्ट हो जाता है।

समान भागमें हरीतकी, आँवला, द्राक्षा, पाढ़ा, बहेड़ा तथा शर्कराका चूर्ण खानेसे ज्वर रोग दूर हो जाता है। त्रिफला, बेर, द्राक्षा और पिप्पलीका चूर्ण विरेचक होता है। हरीतकी, गरम जल और नमकका सेवन करनेसे भी विरेचन होता है।

**श्रीहरि बोले—**हे उमापते! मेरे द्वारा कही गयी ये जितनी भी ओषधियाँ हैं, वे समस्त रोगोंको वैसे ही नष्ट कर देती हैं, जैसे इन्द्रका वज्र वृक्षको नष्ट कर देता है। भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए ओषधिका सेवन करनेसे रोग नष्ट हो जाता है। उनका ध्यान, पूजन और स्तवन करते हुए ओषधिसेवन करना निश्चित ही लाभदायक होता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

(अध्याय १९३)


व्याधिहर वैष्णव कवच

**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! अब मैं समस्त व्याधियोंके विनाशक, कल्याणकारी उस वैष्णव कवचको बताऊँगा, जिसके द्वारा प्राचीन कालमें दैत्योंको विनष्ट करते हुए भगवान् शिवकी रक्षा हुई थी।

अजन्मा, नित्य, अनामय, ईशान, सर्वेश्वर,

काण्ड ]
व्याधिहर वैष्णव कवच
३५१


सर्वव्यापी, जनार्दन, देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुको प्रणाम करके मैं रक्षाके निमित्त अमोघ अप्रतिम वैष्णव कवचको धारण करता हूँ। जो सभी दुःखोंका निवारण करनेवाला और सर्वस्व है, वह कवच इस प्रकार है* —

भगवान् विष्णु मेरी आगेसे रक्षा करें। कृष्ण मेरी पीछेसे रक्षा करें। हरि मेरे सिरकी रक्षा करें। जनार्दन हृदयकी रक्षा करें। मेरे मनकी रक्षा हृषीकेश और जिह्वाकी रक्षा केशव करें। वासुदेव दोनों नेत्रोंकी तथा संकर्षण (बलराम) दोनों कानोंकी रक्षा करें। प्रद्युम्न मेरे नाककी, अनिरुद्ध शरीरके चर्मभागकी रक्षा करें। भगवान्‌की वनमाला मेरे कण्ठप्रदेशके नीचे अन्तःकरणतक और उनका श्रीवत्स मेरे अधोभागकी रक्षा करे। दैत्योंका निवारण करनेवाला चक्र मेरे वामपार्श्वकी रक्षा करे। समस्त असुरोंका निवारण करनेवाली गदा मेरे दक्षिण पार्श्वकी रक्षा करे। मेरे उदरभागकी रक्षा मुसल और पृष्ठभागकी रक्षा लाङ्गल (हल) करे। मेरे ऊर्ध्वभागकी रक्षा शार्ङ्ग नामक धनुष तथा मेरे दोनों जंघा-प्रदेशोंकी रक्षा नन्दक नामक तलवार करे। मेरे पार्ष्णिभागकी रक्षा शंख और दोनों पैरोंकी रक्षा पद्म करे। गरुड सदैव मेरे सभी कार्योंके अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये रक्षा करते रहें। भगवान् वराह जलमें, भगवान् वामन विषम परिस्थितिमें, भगवान् नरसिंह वनमें और भगवान् केशव सब ओरसे मेरी रक्षा करते रहें।

हिरण्यगर्भभगवान् मुझे हिरण्य अर्थात् स्वर्णकी राशि प्रदान करें। सांख्यदर्शनके आचार्य भगवान् कपिल मुनि मेरे शरीरमें स्थित सभी प्रकारके धातुओंमें समानता बनाये रखें। श्वेतद्वीपमें निवास करनेवाले भगवान् अजन्मा विष्णु मुझको भी श्वेतद्वीपमें ले चलें। मधुकैटभका मर्दन करनेवाले विष्णु मेरे सभी शत्रुओंका विनाश करें। मेरे शरीरमें विद्यमान समस्त पापोंको खींच-खींचकर सदैव


* विष्णुर्मामग्रतः पातु कृष्णो रक्षतु पृष्ठतः। हरिर्मे रक्षतु शिरो हृदयं च जनार्दनः॥
मनो मम हृषीकेशो जिह्वां रक्षतु केशवः। पातु नेत्रे वासुदेवः श्रोत्रे सङ्कर्षणो विभुः॥
प्रद्युम्नः पातु मे घ्राणमनिरुद्धस्तु चर्म च। वनमाला गलस्यान्तं श्रीवत्सो रक्षतादधः॥
पार्श्वं रक्षतु मे चक्रं वामं दैत्यनिवारणम्। दक्षिणं तु गदा देवी सर्वसुरनिवारिणी॥
उदरं मुसलं पातु पृष्ठं मे पातु लाङ्गलम्। ऊर्ध्वं रक्षतु मे शार्ङ्गं जङ्घे रक्षतु नन्दकः॥
पार्ष्णी रक्षतु शङ्खश्च पद्मं मे चरणवुभौ। सर्वकार्यार्थसिद्धयर्थं पातु मां गरुडः सदा॥
वराहो रक्षतु जले विषमेषु च वामनः। अटव्यां नरसिंहश्च सर्वतः पातु केशवः॥
हिरण्यगर्भो भगवान् हिरण्यं मे प्रयच्छतु। सांख्याचार्यस्तु कपिलो धातुसाम्यं करोतु मे॥
श्वेतद्वीपनिवासी च श्वेतद्वीपं नयत्वजः। सर्वान् सूदयतां शत्रून् मधुकैटभमर्दनः॥
सदाकर्षतु विष्णुश्च किल्बिषं मम विग्रहात्। हंसो मत्स्यस्तथा कूर्मः पातु मां सर्वतो दिशम्॥
त्रिविक्रमस्तु मे देवः सर्वपापानि कृन्ततु। तथा नारायणो देवो बुद्धिं पालयतां मम॥
शेषो मे निर्मलं ज्ञानं करोत्वज्ञाननाशनम्। वडवामुखो नाशयतां कल्मषं यत्कृतं मया॥
पद्भ्यां ददातु परमं सुखं मूर्ध्नि मम प्रभुः। दत्तात्रेयः प्रकुरुतां सपुत्रपशुबान्धवम्॥
सर्वानरीन् नाशयतु रामः परशुना मम। रक्षोघ्नस्तु दाशरथिः पातु नित्यं महाभुजः॥
शत्रून् हलेन मे हन्याद्रामो यादवन्दनः। प्रलम्बकेशिशाणूरपूतनाकंसनाशनः।
कृष्णस्य यो बालभावः स मे कामान् प्रयच्छतु॥
अन्धकारतमोघोरं पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्। पश्यामि भयसंत्रस्तः पाशहस्तमिवान्तकम्॥
ततोऽहं पुण्डरीकाक्षमच्युतं शरणं गतः। धन्योऽहं निर्भयो नित्यं यस्य मे भगवान् हरिः॥
ध्यात्वा नारायणं देवं सर्वोपद्रवनाशनम्। वैष्णवं कवचं बद्ध्वा विचरामि महीतले॥
अप्रधृष्योऽस्मि भूतानां सर्वदेवमयो ह्यहम्। स्मरणाद्देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः॥ (१९४।४—२२)

१७६- स्त्रियोंके विविध रोगोंकी चिकित्सा, बालकोंकी रक्षाके उपाय तथा बलवर्धक औषधियाँ

३५२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भगवान् विष्णु विनष्ट करते रहें। हंसावतार, मत्स्यावतार तथा कूर्मावतार धारण करनेवाले विष्णु सभी दिशाओंमें मेरी रक्षा करें। भगवान् त्रिविक्रमदेव मेरे समस्त पापोंको काट डालें। भगवान् नारायणदेव मेरी बुद्धिका विकास करें। शेषनारायण मेरे ज्ञानको निर्मल बनायें तथा अज्ञानका विनाश करें। मैंने जो कुछ भी पाप किया है, उस समस्त पापको भगवान् वडवामुख हयग्रीव विनष्ट करें।

भगवान् विष्णु मेरे दोनों पैरोंको और सिरको सुख प्रदान करें। भगवान् दत्तात्रेय मुझे पुत्र और बन्धु-बान्धव तथा पशुओंसे सम्पन्न रखें। भगवान् जामदग्न्य—परशुराम अपने परशुसे मेरे सभी शत्रुओंका विनाश करें। राक्षसोंके निहन्ता दशरथसुत आजानुभुज भगवान् श्रीराम मेरी नित्य रक्षा करें। यादवनन्दन बलराम अपने हलसे मेरे शत्रुओंका विनाश करें। प्रलम्ब, केशी, चाणूर, पूतना तथा कंसका संहार करनेवाला जो बालभाव भगवान् कृष्णका है, वही मेरे समस्त मनोरथोंको पूर्ण करे।

हे देव! मैं अन्धकारके समान तमोगुणसे सम्पन्न, हाथमें पाश धारण करनेवाले यमराजके सदृश काले-पीले वर्णवाले भयंकर पुरुषको देख रहा हूँ, उसके भयसे मैं संत्रस्त हो गया हूँ। हे पुण्डरीकाक्ष भगवान् अच्युत! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आपके इस आश्रयसे मैं धन्य हो उठा हूँ। आपकी शरण ग्रहण करनेसे अब मुझे कोई भय नहीं रह गया है, अतः मैं नित्य निर्भय हो गया हूँ।

समस्त सांसारिक उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाले भगवान् नारायणदेवका ध्यान करके वैष्णव कवचसे आबद्ध मैं पृथ्वीतलपर विचरण करता हूँ। इसीके प्रभावसे मैं सभी प्राणियोंके लिये अजेय हो गया हूँ। इतना ही नहीं, सर्वदेवमय भी हो गया हूँ। अपरिमित तेजसे सम्पन्न देवाधिदेव भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे मेरा समस्त मनोरथ नित्य सिद्ध होता रहे।

भगवान् वासुदेवके चक्रमें जो अरे लगे हैं, वे यथाशीघ्र मेरे समस्त पापोंका विनाश करें और मेरी हिंसा करनेवाले शत्रुओंका संहार करें।

राक्षस एवं पिशाचोंसे तथा गहन वन, प्रान्त, विवाद, राजमार्ग, द्यूतक्रीड़ा, लड़ाई, झगड़ा, नदी पार करनेकी स्थिति, आपत्काल, प्राणोंका संकट-काल, अग्निभय, चौरभय, ग्रहबाधा, विद्युत्-उत्पीड़न, सर्पविषका उद्वेग, रोग, विघ्न, संकट आनेपर तथा भयविह्वल होनेपर इसका जप तो करना ही चाहिये, किंतु नित्य इसका जप करना विशेष लाभप्रद है। यह भगवान् विष्णुका मन्त्ररूपी कवच परम श्रेष्ठ तथा सभी पापोंका विनाशक है।
(अध्याय १९४)


सर्वकामप्रदा विद्या

श्रीहरिने कहा— हे शिव! अब मैं 'सर्वकामप्रदा विद्या' का वर्णन करता हूँ, उसे सुनें। इसकी उपासना मात्र सात रात करनेसे ही सभी कामनाएँ सफल हो जाती हैं। सर्वकामप्रदा विद्या इस प्रकार है*—

हे भगवान् वासुदेव! आपका मैं ध्यान करता


* सर्वकामप्रदां विद्यां सप्तरात्रेण तां शृणु। नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि॥
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च। नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये॥
आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये। त्वद्रूपाणि च सर्वाणि तस्मात्तुभ्यं नमो नमः॥
हृषीकेशाय महते नमस्तेऽनन्तमूर्तये। यस्मिन्निदं यतश्चैतत् तिष्ठत्यग्रेऽपि जायते॥
मृण्मयीं वहसि क्षोणीं तस्मै ते ब्रह्मणे नमः। यन्न स्पृशन्ति न विदुः मनोबुद्धीन्द्रियासवः।
अन्तर्बहिश्च त्वं चरसि व्योमतुल्यं नमाम्यहम्॥
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाभूतपतये सकलसत्त्वभाविव्रीडनिकरकमलरेणूपलनिभधर्माख्यविद्यया चरणारविन्दयुगल परमेष्ठिन् नमस्ते। अवाप विद्याधरतां चित्रकेतुश्च विद्यया॥ (१९५। १—६)

१७७- गो एवं अश्व-चिकित्सा

काण्ड ]
विष्णुधर्माख्यविद्या
३५३


हूँ, आपको नमस्कार है। हे प्रद्युम्न! हे अनिरुद्ध! हे संकर्षण! आपको नमस्कार है। हे परमानन्दस्वरूप! आप मात्र अनुभवजन्य हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप आत्माराम एवं शान्तमूर्ति हैं तथा द्वैत-दृष्टिसे परे हैं, आपको मेरा नमस्कार है। यह समस्त चराचर जगत् आपका ही रूप है, आपको बारंबार प्रणाम है। हे अनन्तमूर्ति भगवान् हृषीकेश! आप महत्त्वस्वरूपको नमस्कार है। प्रलयकालमें यह सारा जगत् जिस मूर्तिमें प्रविष्ट होकर स्थित रहता है और पुनः प्रलयकालके पश्चात् सृष्टिके प्रारम्भमें सबसे पहले उत्पन्न भी होता है तथा जो इस मृण्मयी पृथ्वीको धारण करता है, उस ब्रह्मदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। जिस देवको स्पर्श करने और पहचाननेमें न मन-बुद्धि समर्थ हैं, न ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय और प्राण समर्थ हैं तथा आकाशके समान जो देव समस्त चराचर प्राणियोंके अंदर और बाहर विचरण करते हैं, ऐसे व्योमस्वरूप आप (देव)-को मैं नमस्कार करता हूँ। हे पञ्चभूतोंके स्वामी ऐश्वर्यमूर्ति महापुरुष भगवान् वासुदेव! आपको नमस्कार है। हे परमेष्ठिन्! आपसे सकल सत्त्वोंकी उत्पत्ति होती है तथा आपके चरणारविन्दयुगल मानो शील-समूहरूपी कमलोंकी धर्माख्यविद्यारूप रेणूत्पल हैं, आपको नमस्कार है। चित्रकेतुने इस विद्याके द्वारा विद्याधरत्वको प्राप्त किया था। (अध्याय १९५)


विष्णुधर्माख्यविद्या

श्रीहरिने कहा—हे महेश्वर! जिस 'विष्णुधर्म' नामक विद्याका जप करके देवराज इन्द्रने समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्तकर इन्द्रत्व-पद प्राप्त किया था, उस विद्याको कहता हूँ।

इस विद्याके जपसे पूर्व दोनों पैर, दोनों जानु, दोनों जंघा-प्रदेश, उदर, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और शिरोभागमें ॐकारादि वर्णोंसे यथाक्रम न्यास करना चाहिये। 'नमो नारायणाय' इस मन्त्रद्वारा विपरीत-क्रमसे भी न्यास करे। तदनन्तर द्वादशाक्षर-मन्त्र ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय')-के आदि वर्ण ॐकारसे करन्यास करे। अन्तिम यकारसे अंगुष्ठ आदि अँगुलियोंकी पर्वसंधियोंमें न्यास करके हृदयमें ॐकारका न्यास करना चाहिये। सम्पूर्ण मन्त्रसे मस्तक-भागमें न्यास करे। मूर्धासे प्रारम्भ करके भ्रुवोंके मध्य-भागमें ॐकार-मन्त्रसे न्यास करके शिखा तथा नेत्रादिमें 'ॐ विष्णवे नमः' इस मन्त्रसे न्यास करना चाहिये। अनन्तर अन्तरात्मामें उन परम शक्तियोंसे सम्पन्न परमात्मा शेषनारायणका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—

मम रक्षां हरिः कुर्यान्मत्स्यमूर्तिर्जलेऽवतु ॥
त्रिविक्रमस्तथाकाशे स्थले रक्षतु वामनः।
अटव्यां नरसिंहस्तु रामो रक्षतु पर्वते ॥
भूमौ रक्षतु वराहो व्योम्नि नारायणोऽवतु।
कर्मबन्धाच्च कपिलो दत्तो रोगाच्च रक्षतु ॥
हयग्रीवो देवताभ्यः कुमारो मकरध्वजात्।
नारदोऽन्यर्चनार्नादेवः कूर्मो वै नैर्ऋते सदा ॥
धन्वन्तरिश्चापथ्याच्च नागः क्रोधवशात् किल।
यज्ञो रोगात् समस्ताच्च व्यासोऽज्ञानाच्च रक्षतु ॥
बुद्धः पाषण्डसंघातात् कल्की रक्षतु कल्मषात्।
पायान्मध्यन्दिने विष्णुः प्रातर्नारायणोऽवतु ॥
मधुहा चापराह्ने च सायं रक्षतु माधवः।
हृषीकेशः प्रदोषेऽव्यात् प्रत्यूषेऽव्याज्जनार्दनः ॥
श्रीधरोऽव्यादर्थरात्रे पद्मनाभो निशीथके।
चक्रकौमोदकीबाणा घ्नन्तु शत्रूंश्च राक्षसान् ॥
शंखः पद्मं च शत्रुभ्यः शार्ङ्गं वै गरुडस्तथा।
बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् पान्तु पार्श्वविभूषणः ॥
शेषः सर्पस्वरूपश्च सदा सर्वत्र पातु माम्।
विदिक्षु दिक्षु च सदा नरसिंहश्च रक्षतु ॥
एतद्धारयमाणश्च यं यं पश्यति चक्षुषा।
स वशी स्याद्विपाप्मा च रोगमुक्तो दिवं व्रजेत् ॥
(१९६।६–१६)

३५४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

भगवान् हरि मेरी रक्षा करें। मत्स्यमूर्ति भगवान् जलमें मेरी रक्षा करें। भगवान् त्रिविक्रम आकाशमें और भगवान् वामन स्थलमें मेरी रक्षा करें। वन-प्रान्तमें भगवान् नरसिंह, पर्वतभागमें जामदग्न्य-परशुराम मेरी रक्षा करें। भूमिपर भगवान् वराह, व्योममें भगवान् नारायण मेरी रक्षा करें। कर्मोंके बन्धनसे भगवान् कपिल तथा रोगोंके प्रकोपसे भगवान् दत्तात्रेय मेरी रक्षा करें। भगवान् हयग्रीव देवताओंसे, कुमार कामदेवसे मेरी रक्षा करें। भगवान् नारद अन्य देवोंकी उपासनासे और भगवान् कूर्मदेव नैर्ऋतमें सदैव मेरी रक्षा करें। भगवान् धन्वन्तरि अपथ्य-सेवनसे, भगवान् शेषनाग क्रोधसे, भगवान् यज्ञदेव समस्त रोग-समुदायसे और भगवान् व्यास अज्ञानसे मेरी रक्षा करें। भगवान् बुद्ध पाखण्ड-समूहसे एवं भगवान् कल्किदेव पापसे मेरी रक्षा करें। भगवान् विष्णु मध्याह्नकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् नारायण प्रातःकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् मधुसूदन अपराह्नकाल और भगवान् माधव सायंकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् हृषीकेश प्रदोषकालमें तथा भगवान् जनार्दन प्रत्यूषकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् श्रीधर अर्धरात्रि तथा भगवान् पद्मनाभ निशीथकालमें मेरी रक्षा करें। हे भगवन्! आपका सुदर्शन, कौमोदकी गदा और बाण मेरे शत्रुओं तथा राक्षसादिका संहार करे। आपका शंख, पद्म, शार्ङ्ग धनुष तथा वाहन गरुड भी शत्रुओंसे मेरी रक्षा करें। भगवान् वासुदेवके संनिकट स्थित अलंकारस्वरूप सभी पार्षद मेरे बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राणोंकी रक्षा करें। सर्पका रूप धारण करनेवाले भगवान् शेषनारायण सदैव सर्वत्र मेरी रक्षा करें। भगवान् नरसिंह सदैव सभी दिशाओं और विदिशाओंमें मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार जो व्यक्ति इस विष्णुधर्माख्यविद्याको धारण करता है, वह अपने नेत्रोंसे जिस-जिसको देखता है वह उसीके वशमें हो जाता है और सभी पापोंसे मुक्त तथा रोगरहित होकर वह स्वर्गलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १९६)


विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन

धन्वन्तरिने कहा—अब मैं गरुडके द्वारा कही गयी गारुडी विद्याका वर्णन करता हूँ। इस विद्याको सुमित्रने कश्यपमुनिसे कहा था। यह विद्या सभी प्रकारके विषोंका अपहारक है।

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच तत्त्व हैं। इन पाँचों तत्त्वोंके पृथक्-पृथक् मण्डल होते हैं तथा उन-उन मण्डलोंके अधिष्ठाता ये पृथ्वी आदि देवता ही माने गये हैं। अन्य देवता भी इन मण्डलोंमें स्थित रहते हैं। इनके पृथक्-पृथक् मन्त्र भी हैं। इन मण्डलाधिपति देवताओंके मन्त्रोंका यथाविधि न्यासपूर्वक जप करनेसे अभीष्ट-सिद्धि होती है और विष-बाधा दूर हो जाती है।

साधकको चाहिये कि वह पृथक्-पृथक् पाँचों मण्डलोंके स्वरूप तथा उनके अधिष्ठातृ देवोंका ध्यान करे। मण्डलोंका स्वरूप इस प्रकार है—पृथ्वीमण्डल चौकोर, फैला हुआ, चारों ओर मुखवाला तथा पीले वर्णका कहा गया है तथा यह मण्डल इन्द्रदेवतापरक है। वरुणमण्डल (जलमण्डल) पद्माकार तथा अर्धचन्द्रयुक्त है। इन्द्रनीलमणिके समान कान्तिवाले, सौम्यस्वरूप, स्वस्तिकसे युक्त, त्रिकोण आकारवाले अग्निमण्डलमें ज्वालामालाओंसे समन्वित अग्निका ध्यान करना चाहिये। विभिन्न

काण्ड ] विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन ३५५


ओषधियोंको पीसकर तैयार किये गये सुरमेके समान कान्तिवाले वृत्ताकार बिन्दुयुक्त वायुमण्डलमें वायुका ध्यान करे। आकाशमण्डलका चिन्तन क्षीरसागरमें उठती हुई लहरोंके समान आकारवाले, शुद्ध स्फटिकके सदृश आभावाले तथा सम्पूर्ण संसारको अपनी अमृतमयी रश्मियोंसे आप्लावित करनेवालेके रूपमें करे।

जो अष्ट महानाग कहे गये हैं, उनमेंसे वासुकि और शंखपाल नामक नाग पृथ्वीमण्डलमें स्थित रहते हैं। कर्कोटक तथा पद्मनाभ नामक दो नागोंका वास वरुणमण्डल (जलमण्डल)-में है। कुलिक और तक्षक नामक नाग अग्निमण्डलमें निवास करते हैं। महापद्म तथा पद्म नामक नाग वायुमण्डलमें रहते हैं। साधकको इन नागोंका ध्यान करके पृथ्वी आदि पञ्चभूत-तत्त्वोंका न्यास करना चाहिये। अंगुष्ठसे लेकर कनिष्ठापर्यन्त अंगुलियोंमें अनुलोम और विलोम-रीतिसे न्यास करना चाहिये। अंगुलियोंकी पर्वसंधियोंमें जया तथा विजया नामक दो शक्तियोंका न्यास करना चाहिये।

पुनः अपने शरीरमें शिवषडङ्गन्यास, पञ्चतत्त्वन्यास तथा व्यापक-न्यास करे। देवताके नामके आदिमें 'प्रणव' तथा अन्तमें 'नमः' प्रयुक्त करे, यह विधि स्थापन एवं पूजनादिक-मन्त्रके रूपमें बतलायी गयी है। देवताके नामके आद्य अक्षर भी मन्त्ररूप होते हैं। आठों नागोंके जो मन्त्र हैं, वे उनके संनिधानको प्राप्त करानेवाले हैं। पञ्चतत्त्वोंके साथ आदिमें 'ॐ' और अन्तमें 'स्वाहा' लगानेसे मन्त्र बन जाते हैं। ऐसा करनेसे ये मन्त्र साक्षात् गरुडके समान साधकके सभी अभीष्ट कर्मोंको सिद्ध करनेवाले हो जाते हैं।

स्वर-वर्णोंसे करन्यास करके पुनः उन्हींसे शरीरके अन्य अङ्गोंमें भी न्यास करना चाहिये। तदनन्तर आत्मशुद्धिकारक उद्दीप्त प्राणशक्तिका चिन्तन करना चाहिये। इसके बाद साधकको अमृतकी वर्षा करनेवाले बीजका ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार आप्यायन करके साधकको अपने मस्तिष्कमें आत्मतत्त्वका चिन्तन करना चाहिये। तत्पश्चात् स्वर्णके समान कान्तिवाली, समस्त लोकोंमें फैली हुई तथा लोकपालोंसे समन्वित पृथ्वीका दोनों पैरोंमें न्यास करना चाहिये।

बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि वह भगवती पृथ्वीदेवीका अपने सम्पूर्ण देहमें न्यास करे। इसी प्रकार अपने देहके अङ्गोंमें शेष चार मण्डलों तथा उनमें स्थित देवोंका न्यास करे। इस प्रकार पञ्चभूत-तत्त्वोंका न्यास करके यथाक्रम आठ नागोंका न्यास-ध्यान करना चाहिये।

इसके बाद स्थावर और जंगम प्राणियोंके विष-दोषका विनाश करनेके लिये पक्षिराज गरुडका ध्यान इस प्रकार करना चाहिये—गरुडदेव अपने दोनों पैरों, पंखों तथा चोंचद्वारा पकड़े हुए कृष्णवर्णवाले नागोंसे विभूषित हैं। ग्रह, भूत, पिशाच, डाकिनी, यक्ष, राक्षसका उपद्रव होनेपर विषधर नागोंसे घिरे हुए भगवान् शिवका अपने शरीरमें न्यास करना चाहिये।

यथाविधि ध्यान-पूजन आदि कृत्योंको करके साधकको सभी कर्मोंमें सिद्धि प्राप्त करनेके लिये अभीष्ट रूप धारण करनेवाले, मनपर विजय प्राप्त करनेमें समर्थ, सम्पूर्ण संसारको अपने रसमें आप्लावित करनेवाले एवं सृष्टि तथा संहारके कारण, अपने प्रकाशपुञ्जसे उद्दीप्त और समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त, दस भुजाओं और चार मुखोंवाले, पिङ्गलवर्णके नेत्रवाले, हाथमें शूल धारण करनेवाले, भयंकर दाँतवाले, अत्यन्त उग्र, त्रिनेत्र तथा चन्द्रचूडसे विभूषित और गरुडस्वरूप भैरवका चिन्तन करना चाहिये।

३५६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नागोंका विनाश करनेके लिये उन परमतत्त्वने महाभयंकर गरुडका रूप धारण किया है। विराट्-रूप भगवान् गरुडके दोनों पैर पाताललोकमें स्थित हैं और उनके सभी पंख समस्त दिशाओंमें फैले हुए हैं। सातों स्वर्ग उनके वक्षःस्थलपर विद्यमान हैं। ब्रह्माण्ड उनके कण्ठका आश्रय लेकर अवस्थित है, पूर्वसे लेकर ईशानपर्यन्त आठों दिशाओंको उनका शिरोभाग समझना चाहिये। अपनी तीनों शक्तियोंसे समन्वित सदाशिव इनके शिखामूलमें स्थित हैं। ये तार्क्ष्य (गरुड) साक्षात् परात्पर शिव और समस्त भुवनोंके नायक हैं। त्रिनेत्रधारी, उग्र स्वरूपवाले, नागोंके विषोंके विनाशक, सबको ग्रास बनानेवाले, भीषण मुखवाले, गरुडमन्त्रके मूर्तरूप, कालाग्निके सदृश देदीप्यमान गरुडदेवका अपने समस्त अभीष्ट कर्मोंकी सिद्धिके लिये चिन्तन करना चाहिये। जो मनुष्य न्यास-ध्यानकी विधि सम्पन्न करके इन देवकी पूजा करता है, उसका सब कुछ सिद्ध हो जाता है तथा वह स्वयं गरुडदेवकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। भूत, प्रेत, यक्ष, नाग, गन्धर्व तथा राक्षस आदि तो उसके दर्शनमात्रसे ही भाग जाते हैं। चौथिया आदि ज्वर भी विनष्ट हो जाते हैं। (अध्याय १९७)


त्रिपुराभैरवी तथा ज्वालामुखी आदि देवियोंके पूजनकी विधि

भैरवने कहा—इसके बाद मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली त्रिपुरादेवीकी पूजा आदिका वर्णन करूँगा। उसे आप सुनें।

देवीका यथाविधि 'ॐ ह्रीं आगच्छ देवि'—इस मन्त्रसे आवाहन करके 'ऐं ह्रीं ह्रीं'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए रेखा करके 'ॐ ह्रीं क्लेदिनी भं नमः'—इस मन्त्रसे उन्हें प्रणाम करे तथा उनकी शक्तियोंके साथ महाप्रेतासनपर विराजमान रहनेवाली देवी त्रिपुराभैरवीका पूजन करे। 'ऐं ह्रीं त्रिपुरायै नमः'—इस मन्त्रसे उन्हें नमस्कार करे। देवीके पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व आदि मुखोंको भी नमस्कार करे। 'ॐ ह्रीं पाशाय नमः', 'क्रों अङ्कुशाय नमः', 'ऐं कपालाय नमः' इत्यादि मन्त्रोंसे उनके पाश, अंकुश, कपाल आदि आयुधोंको नमस्कार करे। त्रिपुराभैरवीदेवीकी पूजामें आठ भैरवों तथा उनके साथ मातृकाओंकी भी पूजा करनी चाहिये। असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, चण्डभैरव, क्रोधभैरव, उन्मत्तभैरव, कपालिभैरव, भीषणभैरव तथा संहारभैरव—ये आठ भैरव हैं। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा तथा अपराजिता (दुर्गा)—ये आठ मातृकाएँ हैं।

पूजकको चाहिये कि वह 'ॐ कामरूपाय असिताङ्गाय भैरवाय नमो ब्रह्माण्यै'—इस मन्त्रसे पूर्व दिशामें कामरूप असिताङ्गभैरव और देवी ब्रह्माणीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। उसके बाद 'ॐ स्कन्दाय नमः, रुरुभैरवाय नमः, माहेश्वर्यै नमः' मन्त्रोंद्वारा दक्षिण दिशामें स्कन्ददेव, रुरुभैरव और देवी माहेश्वरीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। 'ॐ चण्डाय नमः, कौमार्यै नमः' इन मन्त्रोंसे पश्चिम दिशामें चण्डभैरव तथा देवी कौमारीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। तत्पश्चात् 'ॐ उल्काय नमः, ॐ क्रोधाय नमः, ॐ वैष्णव्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे उत्तर दिशामें उल्कादेव, क्रोधभैरव और देवी वैष्णवीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। 'ॐ अघोराय नमः, ॐ उन्मत्तभैरवाय नमः, ॐ वाराह्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे अग्निकोणमें अघोरदेव, उन्मत्तभैरव और देवी वाराहीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। तदनन्तर 'ॐ साराय कपालिने भैरवाय नमः,

काण्ड ] वायुजय-निरूपण ३५७

ॐ माहेन्द्र्यै नमः'—इन मन्त्रोंद्वारा नैर्ऋत्यकोणमें समस्त संसारके सारभूत स्वरूप कपालिभैरव और देवी माहेन्द्रीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। उसके बाद साधकको 'ॐ जालन्धराय नमः, ॐ भीषणाय भैरवाय नमः, ॐ चामुण्डायै नमः'—इन मन्त्रोंसे वायुकोणमें जालन्धर, भीषणभैरव और देवी चामुण्डाका आवाहनपूर्वक पूजन करना चाहिये। तदनन्तर 'ॐ वटुकाय नमः, ॐ संहाराय नमः, ॐ चण्डिकायै नमः'—इन मन्त्रोंसे ईशानकोणमें वटुकदेव, संहारभैरव तथा देवी चण्डिकाका आवाहन करके उनकी पूजा करनी चाहिये।

इसके बाद साधकको रतिदेवी, प्रीतिदेवी, कामदेव और उनके पञ्चबाणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। इस प्रकार सदैव ध्यान, पूजा, जप तथा होम करनेसे देवी सिद्ध हो जाती हैं। नित्यक्लिन्ना, त्रिपुरभैरवी और ज्वालामुखी नामक देवियाँ समस्त व्याधियोंकी विनाशिका हैं। अब मैं ज्वालामुखीदेवीके पूजनका क्रम कहूँगा। पद्मके मध्य देवी ज्वालामुखीकी पूजा करनी चाहिये तथा पद्मके बाह्य दलोंमें क्रमशः—नित्या, अरुणा, मदनातुरा, महामोहा, प्रकृति, महेन्द्राणी, कलनाकर्षिणी, भारती, ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा, अपराजिता, विजया, अजिता, मोहिनी, त्वरिता, स्तम्भिनी, जृम्भिणी तथा देवी कालिकाकी पूजा करनी चाहिये। देवी ज्वालामुखीकी यथाविधि पूजा करनेसे विष आदि दोष दूर हो जाते हैं।

भैरवने पुनः कहा—चूडामणि-यन्त्रके द्वारा प्रश्नकर्ताको शुभ एवं अशुभ समयका परिज्ञान हो जाता है। (अध्याय १९८-१९९)


वायुजय-निरूपण

भैरवने कहा—हे देवि ! अब मैं जय-पराजय तथा विदेश-यात्राके शुभाशुभ मुहूर्तका संकेत देनेवाले 'वायुजय' नामक विद्याका वर्णन करूँगा।

वायु, अग्नि, जल और इन्द्रको माङ्गलिक चतुष्टयके नामसे जाना जाता है। प्रायः प्राणीके शरीरमें वायु अधिकतर वाम और दक्षिणभागकी नाड़ियोंसे प्रवाहित होता है। अग्नि शरीरमें ऊर्ध्वगामी होता है और जल अधोगामी। महेन्द्र तत्त्व शरीरके मध्यभागमें स्थित रहता है, किंतु शुक्लपक्षमें वह वामभाग तथा कृष्णपक्षमें दक्षिण-भागकी नाड़ियोंसे होकर शरीरमें प्रवाहित होता है। प्रत्येक पक्षका प्रारम्भिक तीन-तीन दिन इसका उदयकाल है। अर्थात् शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे लेकर तृतीया तिथितक जो वायु नासिकाके वाम छिद्रसे होकर प्रवहमान रहता है और कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे लेकर तृतीया तिथिपर्यन्त जो वायु नासिकाके दक्षिण छिद्रसे होकर प्रवहमान रहता है, वह उदयकालका वायु माना जाता है। यदि इस नियमके अनुसार वायुका प्रवाह होता है तो अच्छा होता है, किंतु विपरीत होनेपर पतन होता है। यदि प्राणीके शरीरमें वायु सूर्यमार्गमें उदित होकर चन्द्रमार्गमें अस्त हो तो गुणोंमें वृद्धि होती है। इसके विपरीत होनेपर शरीरमें विघ्न होता है।

हे वरानने ! दिन और रातमें सोलह संक्रान्तियाँ मानी गयी हैं। आधे-आधे प्रहरके बाद एक-एक संक्रान्तिका परिमाण है। इसी गतिसे शरीरमें प्रवहमान वायुका संक्रमण-काल आता है। जब वायु शरीरके अन्तर्गत आधे प्रहरके बाद ही संक्रान्त होने लगता है, अर्थात् आधे-आधे प्रहरमें वायुका भ्रमण होता है, तो स्वास्थ्यकी हानि अवश्यम्भावी है। भोजन और मैथुनकालमें दाहिने नासापुटसे वायु भ्रमण करे तो हितकर होता है। इस स्थितिमें हाथमें तलवार लेकर योद्धा युद्धमें यथेच्छ शत्रुओंको जीत सकता है। समस्त कार्योंमें यदि वाम नासापुटसे

१७९- व्याकरण-निरूपण

३५८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

वायुका भ्रमण हो तो प्रश्नकर्ताका प्रश्न शुभकर तथा श्रेष्ठ माना गया है। वायुके महेन्द्र तथा वरुण (जल-तत्त्व)-में प्रवाहित होनेपर कोई भी दोष नहीं होता। दाहिनेसे प्रवाहित होनेपर अनावृष्टिका योग तथा बायेंसे प्रवाहित होनेपर वृष्टिका योग होता है। (अध्याय २००)

उत्तम तथा अधम अश्वोंके लक्षण, अश्वोंके आगन्तुज और त्रिदोषज रोगोंकी चिकित्सा तथा अश्वशान्ति, गजायुर्वेद, गजचिकित्सा और गजशान्ति

धन्वन्तरिने कहा—अब मैं अश्वायुर्वेद और अश्वोंके शुभ-अशुभ लक्षणोंका वर्णन करता हूँ।

जो अश्व कौएके समान नुकीले मुँहवाला, काली जीभवाला, वृक्षके समान फैले मुँहवाला, गरम तालुप्रदेशवाला, दोसे अधिक दन्तपङ्क्तियोंसे युक्त, दाँतरहित, सींगवाला, दाँतोंके मध्य रिक्त स्थानवाला, एक अण्डकोशसे युक्त, अण्डकोशसे रहित, कंचुकी (वक्षःस्थलपर कंचुकके लक्षणसे समन्वित), दो खुरोंसे सम्पन्न, स्तनयुक्त, बिलौटेके समान पैरोंवाला, व्याघ्रके सदृश रूप एवं वर्णसे समन्वित, कुष्ठ तथा विद्रधि रोगके रोगी पुरुषके समान, जुड़वाँ उत्पन्न होनेवाला, बौना, बिलौटे और बंदरसदृश नेत्रोंवाला हो, वह दोषयुक्त होनेसे त्याज्य है।

उत्तम जातिका घोड़ा तो वह होता है, जो तुरुष्क प्रदेश (तुर्किस्तान, सिन्धु या अरब देश)-में जन्म लेता है। इसकी ऊँचाई सात हाथ होती है। मध्यम कोटिका घोड़ा पाँच हाथ और तृतीय कोटिका घोड़ा तीन हाथ ऊँचा माना गया है। स्वस्थ घोड़े छोटे-छोटे कानवाले, चितकबरे, प्रभावशाली, उत्साहसम्पन्न और दीर्घजीवी होते हैं।

रेवन्त सूर्यदेवके पुत्र हैं। इनकी पूजा, होम तथा 'ब्राह्मण-भोजन' आदिके द्वारा अश्वोंकी रक्षा करनी चाहिये। चीड़-वृक्षका काष्ठ, नीमकी पत्ती, गुग्गुल, सरसों, घृत, तिल, वचा (वच) और हींगको पोटली आदिमें रखकर घोड़ेके गलेमें बाँधनेसे घोड़ेका सदैव कल्याण होता है।

घोड़ेके शरीरमें उत्पन्न होनेवाला मुख्य दोष व्रण (घाव होना) है। यह दो प्रकारका होता है—एक है आगन्तुज व्रणदोष और दूसरा है वात-पित्त आदि त्रिदोषोंसे उत्पन्न व्रणदोष। वातविकारके कारण उत्पन्न व्रणदोष चिरपाक (देरसे पकनेवाला) होता है और श्लेष्मविकारके कारण उत्पन्न व्रणदोष क्षिप्रपाक (शीघ्र पकनेवाला) होता है। पित्तज दोषके कारण उत्पन्न व्रणदोष घोड़ेके कण्ठ-भागमें दाह और रक्तविकारके कारण उत्पन्न व्रणमें मन्द-मन्द वेदना होती है। आगन्तुज अर्थात् बाहरसे चोट, गिरने या आघात आदिसे उत्पन्न व्रणदोषका शोधन शल्य-चिकित्साके द्वारा करना चाहिये। व्रणकी यह चिकित्सा करके उसमें एरण्डमूल, हल्दी, दारुहल्दी, चित्रक, सोंठ और लहसुन, मट्ठे अथवा काँजीमें पीसकर भर देना चाहिये। तिल, सत्तू, दही, सेंधानमक और नीमकी पत्ती एक साथ पीसकर उस व्रणपर रखनेसे भी घोड़ेको लाभ होता है।

परवल, नीमकी पत्ती, वचा (वच), चित्रक, पिप्पली और अदरकका चूर्ण बनाकर घोड़ेको पिलाना चाहिये। इसके सेवनसे घोड़ेका कृमिदोष, श्लेष्मविकार तथा वायुप्रकोप नष्ट हो जाता है। नीमकी पत्ती, परवल, त्रिफला और खैरका काढ़ा

१८०- व्याकरणसार

काण्ड ] उत्तम तथा अधम अश्वोंके लक्षण, अश्वोंके आगन्तुज और त्रिदोषज रोगोंकी चिकित्सा ३५९


बनाकर यदि घोड़ेको पिलाया जाय तो उसका रक्तस्राव बंद हो जाता है। घोड़ेमें कुष्ठविकार होनेपर तो उसके उपशमनके लिये इसी काढ़ेको तीन दिन देना चाहिये। व्रणयुक्त कुष्ठरोग होनेपर सरसोंका तैल बहुत ही लाभप्रद है। लहसुन आदिका काढ़ा देनेसे उसके खाने-पीनेके दोष दूर हो जाते हैं। बिजौरा नींबूका रस जटामांसीके रसमें मिलाकर नस्य देनेसे तत्काल घोड़ेके वातजनित दोषोंका विनाश होता है।

घोड़ेको प्रथम दिन एक पल औषधीय नस्य देना चाहिये। उसके बाद एक-एक पल प्रतिदिन अधिक बढ़ाते हुए अठारह दिनतक उसका उपयोग करना चाहिये। यह मात्रा उत्तम प्रकारके घोड़ेकी है। मध्यम प्रकारके घोड़ोंकी औषधिकी मात्रा चौदह पल तथा अधम जातिके घोड़ोंकी आठ पल होती है। शरत् और ग्रीष्म-ऋतुमें घोड़ोंको ऐसे विकारोंसे मुक्त करनेके लिये किसी भी प्रकारकी औषधिका नस्य-प्रयोग करना उचित नहीं है। घोड़ेके वातजन्य रोगमें शर्करा, घृत तथा दुग्धसे युक्त तैल, श्लैष्मिक रोगमें त्रिकटुसे युक्त कडुवा तैल और पित्तविकारमें त्रिफलाचूर्ण-समन्वित जलसे नस्य देना चाहिये। साठी चावल और दुग्ध खाने-पीनेवाला घोड़ा अत्यन्त बलशाली होता है। पके हुए जामुनके समान तथा सोनेके सदृश चमकते हुए वर्णवाला अश्व श्रेष्ठ होता है।

भारवाही घोड़ेको आधे-आधे प्रहरपर गुग्गुलका सेवन कराना चाहिये। जो घोड़ा बहुत ही जल्दी थक जानेके कारण रुक जाता हो, उसको खीर या दूध पिलाना चाहिये। वातजनित विकार होनेपर घोड़ेको भोजनमें साठी चावलका भात और दूध देना चाहिये। पित्तविकार होनेपर उसको एक कर्ष अर्थात् दो तोला जटामांसीका रस, मधु, मूँगाका रस और घृतका मिश्रण देनेसे लाभ होता है। कफ-विकार होनेपर मूँग और कुलथी या कडुवा तथा तिक्त भोज्य-पदार्थ देना चाहिये। बधिरता या ग्रासजन्य रोगसे ग्रस्त होनेपर अथवा त्रिदोषजन्य विकारोंके उत्पन्न हो जानेसे दुखित घोड़ेको गुग्गुलकी औषधि देनी चाहिये। सभी प्रकारके रोगोंमें घोड़ेको पहले दिन अन्य प्रकारकी घासोंके साथ एक पल दूर्वा घास देना ही अपेक्षित है। उसके बाद इस मात्राको धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिये। एक दिनमें एक कर्ष अर्थात् दो तोला और अधिकतम पाँच पल दिया जा सकता है। सामान्य स्थितिमें घोड़ेके लिये खाने-पीनेके निमित्त अस्सी पल दूर्वाकी मात्रा श्रेष्ठतम मानी गयी है। उसकी मध्यम मात्रा साठ पल और अधम चालीस पल है।

घोड़ेको व्रण-कुष्ठ तथा खञ्ज-विकार (लँगड़ानेका विकार) होनेपर त्रिफलाके क्वाथमें भोजन मिलाकर देना चाहिये। मन्दाग्नि और शोथ-रोग होनेपर उसको गोमूत्रके साथ भोजन देना चाहिये। वात-पित्तजन्य व्रणविकार अथवा अन्य व्याधि होनेपर गोदुग्ध और घृत मिलाकर घोड़ेको भोजन देना लाभकारी है। दुर्बल घोड़ेको मासी नामक औषधिके साथ भोजन देना पुष्टिकारक होता है। शरत् और ग्रीष्म-ऋतुमें घोड़ेको पाँच पल गुडूचीका रस घीमें मिलाकर अथवा दूधमें मिलाकर प्रातःकाल पिलाना चाहिये। यह घोड़ेके रोगोंका विनाश करनेवाली, उनको शक्तिसम्पन्न बनानेवाली और उनके तेजको बढ़ानेवाली है। गुडूची-कल्पके साथ शतावरी और अश्वगन्धा नामक औषधियोंके रसकी मात्रा क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधमरूपमें चार पल, तीन पल तथा एक पल निश्चित की गयी है।

यदि घोड़ोंमें अकस्मात् एक ही प्रकारका रोग उत्पन्न हो जाय और उपचार होनेपर भी घोड़ेकी मृत्यु हो जाय तो उसे उपसर्ग (कोई दैवीप्रकोप या महामारी) समझना चाहिये। उसकी शान्तिके लिये

३६०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

हवन, पूजन, ब्राह्मण-भोजन आदि कराना चाहिये। हरीतकी-कल्पके सेवनसे भी उपसर्गकी शान्ति होती है। गोमूत्र, सरसोंके तैल और सेंधानमकसे युक्त हरीतकीकी मात्रा प्रारम्भमें पाँच मानी गयी है। तत्पश्चात् प्रतिदिन उसकी पाँच-पाँच मात्रा बढ़ाते हुए सौतक की जा सकती है। घोड़ेके लिये एक सौ हरीतकीकी मात्रा उत्तम है। अस्सी तथा साठ मात्राओंका भी परिमाण है जो मध्यम और अधम मात्राएँ मानी गयी हैं।

धन्वन्तरिजीने पुनः कहा—हे सुश्रुत! अब मैं (अश्वायुर्वेदकी भाँति) गजायुर्वेदका वर्णन करने जा रहा हूँ, आप उसे सुनें। अश्वचिकित्सामें बताये गये औषधिक कल्प हाथियोंके लिये भी हितकारी हैं। हाथीके निमित्त उक्त मात्रा चौगुनी होती है। पूर्ववर्णित औषधियोंके द्वारा भी हाथियोंमें पाये जानेवाले रोगोंको दूर किया जा सकता है। हाथियोंकी उपसर्गजनित व्याधियों (दैवीप्रकोप या महामारी आदि)-के उपशमनके लिये गजशान्तिकर्म करना चाहिये। देवताओं और ब्राह्मणोंकी रत्न आदिके द्वारा पूजा करके उन्हें कपिला गौका दान दे। रक्षा-मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित वचा (वच) और सरसोंको मालामें पिरोकर हाथीके दोनों दाँतोंमें बाँधना चाहिये। सूर्य आदि नवग्रहोंके तथा शिव, दुर्गा, लक्ष्मी और विष्णुके पूजन आदिसे हाथीकी रक्षा होती है। देवादिकी पूजा करनेके पश्चात् प्राणियोंके लिये अन्नादिकी बलि देकर हाथीको चार घड़ोंके जलसे स्नान कराना चाहिये। तदनन्तर मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित भोजन हाथीको देना चाहिये। हाथीके पूरे शरीरपर भस्म लगाना चाहिये। त्रिफला, पञ्चकोल (पीपर, पीपरामूल, चव्य, चित्रकमूल, सोंठ), दशमूल, विडङ्ग, शतावरी, गुडूची, नीम, अड़ूसा और पलाशके चूर्ण अथवा क्वाथ हाथीके रोगोंको विनष्ट करनेमें समर्थ हैं। (अध्याय २०१)


स्त्रियोंके विविध रोगोंकी चिकित्सा, बालकोंकी रक्षाके उपाय तथा बलवर्धक औषधियाँ

श्रीहरिने कहा—हे शिव! पुनर्नवा अथवा अपामार्ग नामक औषधिकी जड़का गुण अद्वितीय है। इसका यथाविधि प्रयोग करनेसे प्रसव-वेदनाका कष्ट दूर हो जाता है। भुइँकुम्हड़ाकी जड़ अथवा साठी चावलको पीसकर एक सप्ताहपर्यन्त दूधके साथ सेवन करनेसे स्त्रियोंके दूधकी वृद्धि होती है। हे रुद्र! इन्द्रवारुणी (इन्द्रायण)-की जड़का लेप करनेसे स्त्रियोंके स्तनोंकी पीड़ा विनष्ट हो जाती है। नीली, परवलकी जड़ तथा तिलको जलमें पीसकर घीके साथ तैयार किया गया लेप ज्वालागर्भ नामक रोगका नाश करता है। पाढ़ाकी जड़को चावलके जलके साथ पीनेसे पाप-रोग विनष्ट हो जाता है। ऐसे रोगका विनाश कुष्ठ नामक औषधिके पीनेसे भी सम्भव है। हे शिव! बासी जलमें मधु मिलाकर पीनेसे वह पाप-रोगको दूर कर देता है। गोघृत और लाक्षारसको समभागमें लेकर दूधके साथ उसे पीनेसे प्रदररोग दूर हो जाता है। हे हर! द्विज्यष्टी (ब्रह्मदण्डी), त्रिकटु (सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली)-का चूर्ण तिलके काढ़ेमें मिलाकर पीनेसे स्त्रियोंका रक्तगुल्म रोग दूर हो जाता है। हे महेश! लाल कमलका कन्द, तिल तथा शर्कराका औषधिक योग, स्त्रियोंमें गर्भधारणकी क्षमता उत्पन्न कर देता है। शर्कराके साथ इन औषधियोंको पीनेसे स्त्रियोंका गर्भपात रुक जाता है तथा शीतल जलके साथ सेवन करनेसे रक्तस्राव भी बंद हो जाता है। हे रुद्र! शरपोङ्खाकी जड़का क्वाथ और काँजी, हींग तथा

१८१- छन्द-विधान

काण्ड ] | औषधियोंके पर्यायवाची नाम | ३६१

सेंधानमक मिलाकर पीनेसे स्त्रियोंको शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। बिजौरा नीबूकी जड़को कटिप्रदेशमें बाँधनेसे भी प्रसव यथाशीघ्र हो जाता है। अपामार्गकी जड़ सिरपर धारण करनेपर स्त्रीको गर्भजनित पीड़ा नहीं होती।

हे हर ! जिस बालकके मस्तकपर गोरोचनका तिलक रहता है और जो बालक शर्करा तथा कुष्ठ नामक औषधिका पान करता है वह विष, भूत, ग्रह तथा व्याधिजनित विकारोंसे दूर रहता है। हे रुद्र ! शंखनाभि (सुगंधित द्रव्यविशेष), वच, कुष्ठ और लोहा (लोहेकी ताबीज या कडुला) बच्चेको सदैव धारण कराना चाहिये। इससे उपसर्गजन्य विपदाओंसे बच्चोंकी रक्षा होती है।

मधुके सहित पलाश, आँवला और विडङ्गका चूर्ण तथा गोघृतका पान करनेसे प्राणी महामति (कुशाग्रबुद्धिवाला) बन जाता है। हे महादेव ! एक मासतक इस औषधिका सेवन करनेसे मनुष्य वृद्धावस्थाजन्य मृत्युके भयसे रहित हो जाता है। हे रुद्र ! पलाशबीज, तिल, मधु और घृत समान भागमें लेकर एक सप्ताह्तक सेवन करनेसे वृद्धावस्था दूर हो जाती है। आँवलेका चूर्ण, मधु, तेल (तिलका) तथा गोघृतके साथ एक मासपर्यन्त सेवन करनेसे मनुष्य युवा हो उठता है और विद्वान् बन जाता है। हे शिव ! आँवलेका चूर्ण मधु अथवा जलके साथ प्रातःकाल सेवन करनेपर नासिकाकी शक्ति बढ़ जाती है। जो मनुष्य घी और मधुके साथ कुष्ठचूर्णका सेवन करता है, वह सुन्दर गन्धसे समन्वित देहवाला हो जाता है और एक हजार वर्षतक जीवित रहता है।

(अध्याय २०२)


गो एवं अश्व-चिकित्सा

**श्रीहरिने कहा—**हे शिव ! जो गौ अपने बछड़ेसे द्वेष करती है, उसे नमकसे युक्त उसीका दूध पिला देना चाहिये। ऐसा करनेसे वह अपने बछड़ेसे प्रेम करने लगेगी। कुत्तेकी हड्डीको भैंस और गायके गलेमें बाँधनेसे उनके शरीरमें पड़े हुए कीड़े गिर जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है। घुँघुचीकी जड़को खिलानेसे भी गायोंके शरीरमें पड़े हुए कीड़े विनष्ट हो जाते हैं। हे शिव ! वरुणफलके रसको हाथसे मथकर उसे घावमें भरनेसे उसके अंदर पड़े हुए चार पैरवाले तथा दो पैरवाले कीड़े नष्ट हो जाते हैं। हे रुद्र ! जया नामक औषधिको घावमें भरनेसे वह सूख जाता है। हाथीका मूत्र पिलानेसे गाय और भैंसोंमें फैलनेवाला उपसर्ग रोग (दैवी आपदाजन्य महामारी आदि) नष्ट हो जाता है। मट्ठेमें मसूर और साठी चावलको घिसकर पिलानेसे भी लाभ होता है।

गाय और भैंसके दूधमें तुलनात्मक दृष्टिसे गायका दूध ही पुरुषके लिये विशेष हितकारी होता है। हे शिव ! शरपोंखाके पत्तेको नमकके साथ खिलानेसे घोड़े तथा हाथियोंका वारिस्फोट नामक रोग नष्ट हो जाता है। हे हर ! घृतकुमारीके पत्तेका नमकके साथ सेवन करानेसे घोड़े आदिकी खुजली दूर हो जाती है।

(अध्याय २०३)


औषधियोंके पर्यायवाची नाम

**सूतजीने कहा—**हे ऋषियो! भगवान् धन्वन्तरिने इस प्रकार महर्षि सुश्रुतको वैद्यकशास्त्र सुनाया था। अब मैं औषधियोंके पर्यायवाची नाम संक्षिप्त रूपमें आप सभीको सुनाऊँगा।

**स्थिरा—**विदारीगन्धा, शालपर्णी तथा अंशुमती एक ही औषधिके नाम हैं। लाङ्गली नामक औषधि

१८२- छन्द-विधान (आर्या आदि वृत्तोंके लक्षण)

३६२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ही कलसी, क्रोष्ट्रापुच्छा तथा गुहा नामसे कही जाती है। पुनर्नवाको वर्षाभू, कठिल्ल्या और करुणा कहा जाता है। उरुवूक, आम तथा वर्द्धमानक—ये एरण्डके नाम हैं। झषा और नागबलाको एक ही औषधि मानना चाहिये। गोक्षुर अर्थात् गोखरूको श्वदंष्ट्रा कहा गया है। शतावरी नामक औषधि वरा, भीरु, पीवरी, इन्दीवरी तथा वरीके नामसे प्रसिद्ध है।

व्याघ्री, कृष्णा, हंसपदी और मधुस्रवा वृहती नामक औषधिके पर्याय हैं। कण्टकारी या कटेरीको क्षुद्रा, सिंही तथा निदिग्धिका कहा जाता है। वृश्चिका, त्र्यमृता, काली और विषघ्नी सर्पदन्ता नामक औषधिके नाम हैं। मर्कटी, आत्मगुप्ता, आर्षेयी तथा कपिकच्छुका—ये शब्द एक ही अर्थके वाचक हैं। मुद्गपर्णी और क्षुद्रसहा मूंगके तथा माषपर्णी एवं महासहा उड़दके पर्याय हैं। दण्डयोन्यङ्क (दण्डिनी)-को त्यजा, परा और महा नामसे स्वीकार किया गया है।

न्यग्रोध और वट बरगदका तथा अश्वत्थ और कपिल पीपलका वाचक है। प्लक्षको गर्दभाण्ड, पर्कटी तथा कपीतन कहा जाता है। अर्जुन वृक्षका नाम पार्थ, ककुभ और धन्वी है। नन्दीवृक्षको प्ररोही तथा पुष्टिकारी कहते हैं। वंजुल और वेतस एक ही औषधिके वाचक हैं। भल्लातक तथा अरुष्कर भिलावाको कहा जाता है। लोध्र सारवक, धृष्ट और तिरीट नामसे अभिहित है तथा बृहत्फला, महाजम्बु और बालफला एक अर्थके वाचक हैं। जलजम्बु नादेयीका नाम है।

कणा, कृष्णा, उपकुंची, शौण्डी और मागधिका—ये नाम पिप्पलीके हैं। उसके जाननेवाले लोग उस औषधिकी मूलको ग्रन्थिक कहते हैं। ऊषण नामक औषधिको मरिच तथा विश्वा नामक महौषधिको शुण्ठी या सोंठ कहा जाता है। व्योष, कटुत्रय तथा त्र्यूषण इसी औषधिका नाम है। लांगलीको हलिनी और शेयसीको गजपिप्पली कहते हैं। त्रायन्तीका त्रायमाणा तथा उत्साका नाम सुवहा है।

चित्रकका नाम शिखी है। इसको वह्नि तथा अग्नि नामसे भी कहा जाता है। षड्ग्रन्था, उग्रा, श्वेता और हैमवती—ये नाम वचाके हैं। कुटजको शक्र, वत्सक तथा गिरिमल्लिका कहा जाता है। उसके बीजोंका नाम कलिङ्ग, इन्द्रयव और अरिष्ट है। मुस्तक और मेघ नाम मोथाके वाचक हैं। कौन्ती नामक औषधि हरेणुका नामसे कही जाती है। एला और बहुला शब्द बड़ी इलायची तथा सूक्ष्मैला एवं त्रुटि शब्द छोटी इलायचीके वाचक हैं। भार्ङ्गीका नाम पद्मा तथा काँजीका नाम ब्राह्मणयष्टिका है। मूर्वा नामक औषधि मधुरसा और तेजनीका नाम तिक्तवल्लिका है। महानिम्बको बृहन्निम्ब तथा दीप्यकको यवानिका (अजवाइन) कहा जाता है। विडङ्गका नाम क्रिमिशत्रु है। हिंगु अर्थात् हींगको रामठ भी कहते हैं। अजाजी जीरक अर्थात् जीरेका पर्यायवाची शब्द है। उपकुंचिकाको कारवी कहा जाता है। कटुला, तिक्ता तथा कटुरोहिणी—ये तीन कटुकी नामक औषधिके वाचक हैं। तगरका नाम नत और वक्र है। चोच, त्वच तथा वराङ्गक, दारुचीनी नामक औषधि कहलाती है। उदीच्यको बालक (मोथा) तथा ह्रीबेरको अम्बुबालकके नामसे अभिहित किया गया है। पत्रक और दल नाम तेजपत्ताके हैं। आरकको तस्कर कहा जाता है। हेमाभ नामक औषधिका नाम नाग भी है। इसलिये इसको लोग नागकेशर कहते हैं। असृक् तथा काश्मीरबाहीक शब्द कुंकुमके वाचक हैं।

पुर, कुटनट, महिषाक्ष तथा पलङ्कषा शब्द गुग्गुलके वाचक हैं। काश्मीरी और कट्फला श्रीपर्णीको कहा जाता है। शल्लकी, गजभक्ष्या, पत्री, सुरभी तथा श्रवा नाम गजारी औषधिके हैं।

काण्ड ]औषधियोंके पर्यायवाची नाम३६३

आँवलाको धात्री और आमलकी तथा अक्ष एवं विभीतक बहेड़ाको कहा जाता है। पथ्या, अभया, पूतना और हरीतकी शब्द हर्रेंके पर्यायवाची हैं। इन तीनों फलोंको एकमें मिलाकर त्रिफला कहा जाता है। करंज या कंजा उदकीर्य तथा दीर्घवृत्तके नामसे भी प्रसिद्ध हैं। यष्टी, यष्ट्याह्वय, मधुक और मधुयष्टी—ये जेठी मधुके वाचक हैं। धातकी, ताम्रपर्णी, समङ्गा तथा कुंजरा धातीफूलके नाम माने गये हैं। सित, मलयज, शीत और गोशीर्षको श्वेतचन्दन कहा जाता है। जो चन्दन रक्तके सदृश लाल होता है उसका नाम रक्तचन्दन है। काकोली नामकी औषधिको वीरा, वयस्या और अर्कपुष्पिकाके नामसे भी कहा जाता है। शृंगी नामक औषधि कर्कटशृंगी तथा महाघोषाके नामसे प्रसिद्ध है। वंशलोचनको तुगाक्षीरी, शुभा और वांशीके नामसे भी जाना जाता है। द्राक्षाका नाम मृद्वीका तथा गोस्तनिका है।

उशीर अर्थात् खस नामक औषधिका नाम मृणाल और लामज्जक है। सारको गोपवल्ली, गोपी और भद्रा कहा जाता है। दन्ती नामक औषधिका नाम कटङ्कटेरी भी है। हल्दीको दारु, निशा, हरिद्रा, रजनी, पीतिका और रात्रि कहा गया है। वृक्षादनी, छिन्नरुहा, नीलवल्ली तथा अमृतरसा नामवाली औषधि ही गुडूची है। वसुकोट, वाशिर और काम्पिल्ल नामक औषधि एक ही हैं। पाषाणभेदक, अरिष्ट, अश्मभित् तथा कुट्टभेदक—ये सभी नाम पत्थरचट्टा या पत्थरचूनाके वाचक हैं। घण्टाकको शुष्कक और सूचकको वचा (वच) नामसे अभिहित किया गया है। पीतशालको सुरस तथा बीजक नामसे कहा जाता है। वज्रवृक्षको महावृक्ष, स्नुहीको स्नुक् (थूहड़) और सुधाको गुडा माना गया है। तुलसीको सुरसा तथा उपस्था कहा जाता है। लोग इसीको कुठेरक, अर्जुनक, पर्णी और सौगन्धिपर्णी भी कहते हैं। नील नामक औषधि सिन्धुवार है और निर्गुण्डीको सुगन्धिका कहा जाता है। सुगन्धिपर्णी नामकी औषधि वासन्ती और कुलजा नामसे जानी जाती है। कालीयक नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं—पीतकाष्ठ तथा कतक। गायत्री नामकी औषधिका नाम खादिर है। कन्दर अर्थात् कत्था उसीका भेद माना गया है। नीलकमलके वाचक इन्दीवर, कुवलय, पद्म तथा नीलोत्पल माने गये हैं। सौगन्धिक, शतदल और अब्ज कमलको कहा जाता है। अजवर्ण, ऊर्ज, वाजिकर्ण तथा अश्वकर्ण एक ही औषधिके नाम हैं। श्लेष्मान्तक, शेलु और बहुवार एक ही अर्थके वाचक हैं।

सुनन्दक, ककुदभद्र, छत्राकी तथा छत्र रास्ना नामकी औषधिके वाचक हैं। कबरी, कुम्भक, धृष्ट, क्षुद्धिा और धनकृत् एक ही औषधिके नाम हैं। कृष्णार्जक तथा कराल नामक औषधि कालमान या काममान नामसे प्रसिद्ध हैं। वरियारा नामक औषधिको प्राची, बला और नदीक्रान्ता कहा जाता है। काकजंघा नामकी औषधिका पर्यायवाची शब्द वायसी है। मूषिकपर्णी नामक औषधि भ्रमन्ती और आखुपर्णीके नामसे जानी जाती है। विषमुष्टि, द्रावण और केशमुष्टि—ये तीनों एक ही औषधिके वाचक हैं। किलिही या किणिहीको कटुकी तथा अन्तकको अम्लवेतस कहा जाता है। अश्वत्था और बहुपत्रा एक ही औषधि है, इसीको लोग आमलकी भी कहते हैं। अरूषक्रका नाम पत्रशूक है। क्षीरीको राजादन नामसे स्वीकार किया गया है। महापत्रका नाम दाडिम है, इसीको करक भी कहा जाता है। मसूरी, विदली, शष्पा तथा कालिन्दी नाम एक ही अर्थके वाचक हैं। कटेरी वृक्षको कण्टका, महाश्यामा और वृक्षपादा कहा जाता है। विद्या, कुन्ती, त्रिभंगी, त्रिपुटी और

१८३- छन्द-विधान (समवृत्तलक्षण)

३६४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

त्रिवृत्—ये सभी शब्द एक औषधिके वाचक हैं। सप्तला, यवतिक्ता, चर्मा और चर्मकसा—ये सभी नाम समान औषधिके माने गये हैं। अक्षिपीलुको शंखिनी, सुकुमारी और तिक्ताक्षी कहा जाता है। अपराजिता नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं गवाक्षी, अमृता, श्वेता, गिरिकर्णी तथा गवादिनी। काम्पिल्लको रक्ताङ्ग, गुण्डा और रोचनिका कहा जाता है। हेमक्षीरी या स्वर्णक्षीरी नामकी औषधिको पीता, गौरी तथा कालदुग्धिका नामसे स्वीकार किया गया है। गाङ्गेरुकी, नागबला, विशाला और इन्द्रवारुणी अर्थात् इन्द्रायण एक ही औषधिके वाचक हैं। रसांजन नामक औषधिके पर्याय हैं तार्क्ष्य, शैल, नीलवर्ण तथा अंजन। शाल्मली या सेमरवृक्षके निर्यासको मोचरसके* नामसे अभिहित किया जाता है। प्रत्यक्पुष्पीको खरी और अपामार्गको मयूरक कहा गया है। जंगली अडूसाका नाम है सिंहास्य वृषवासाक तथा आटरूष। जीवशाक नामक औषधिको जीवक और कर्बुरको शटी नामसे भी कहा गया है। कट्फलका नाम सोमवृक्ष तथा अग्निगन्धाका नाम सुगन्धिका भी है। सौंफको शताङ्ग और शतपुष्पा कहा जाता है। मिसिको मधुरिका माना गया है। पुष्करमूलको पुष्कर तथा पुष्कराह्वय नामसे भी स्वीकार करना चाहिये। यास नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं धन्वयास, दुष्पर्श और दुरालभा। वाकुची अर्थात् वकुची, सोमराजी और सोमवल्ली एक ही औषधिके नाम हैं। भँगरइयाको मार्कव, केशराज तथा भृंगराज कहा जाता है।

एडगज नामक औषधिको आयुर्वेद एवं वनस्पतियोंके विद्वान् चक्रमर्दक या चकवड़ कहते हैं। काकतुण्डी नामक औषधिके वाचक हैं सुरंगी, तगर, स्नायु, कलनाशा और वायसी। महाकालको बेल तथा तण्डुलीयको घनस्तन कहा जाता है। इक्ष्वाकुको तिक्ततुम्बी और तिक्तालापु कहा जाता है। धामार्गवको कोषातकी तथा यामिनी कहा जाता है। कृतभेद नामक इस कोषातकी औषधिका एक अन्य भेद है। देवताडक नामक वृक्षके पर्याय हैं जीमूतक तथा खुड्डक। गृध्रादना, गृध्रनखी, हिङ्गु और काकादनी शब्द हींगके वाचक माने जाते हैं। करवीर (कनेर)-का पर्यायवाची शब्द है अश्वारि तथा अश्ममारक।

सेंधानमकको सिन्धु, सैन्धव, सिन्धूथ तथा मणिमन्थ कहा जाता है। यवक्षार लवणका नाम है क्षार और यवाग्रज। सज्जी या छज्जी मिट्टीका नाम है सर्जिका एवं सर्जिकाक्षार। काशीशके नाम हैं पुष्पकाशीश, नेत्रभेषज, धातुकाशीश और काशी। यह पुष्प एवं धातुभेदसे दो प्रकारका है। पङ्कपर्पटी (गुजराती मिट्टी)-को सौराष्ट्री, मृत्तिकाक्षार तथा काक्षी कहा जाता है। स्वर्णमाक्षिका नामक मिट्टीके पर्याय हैं माक्षिक, ताप्य, ताप्युत्थ और ताप्यसम्भवा। मनःशिला या मैनसिलका नाम है शिला। नेपाली मनःशिलाको कुलटी कहा जाता है। हरितालके लिये आल अथवा मनस्ताल नाम प्रयुक्त होता है। गन्धक, गन्धपाषाण तथा रस पारद या पारा कहलाता है। ताँबेके वाचक हैं ताम्र, औदुम्बर, शुल्ब और म्लेच्छमुख। लोहेको अद्रिसार, अयस्, लोहक तथा तीक्ष्ण भी कहा जाता है।

मधु शब्दके पर्यायवाची हैं माक्षिक, मधु, क्षौद्र और पुष्परस। इसके दो उपभेद हैं—ज्येष्ठी मधु तथा उदकी मधु। काँजीको सुवीरक नामसे अभिहित किया गया है। शर्कराको सिता, सितोपला और मत्स्याण्डीके नामसे कहा जाता है।


* सेमलके गोंदको मोचरस कहते हैं।

काण्ड ] * औषधियोंके पर्यायवाची नाम * ३६५


त्रिसुगन्धि नामक औषधिका निर्माण दारुचीनी नामक वृक्षकी छाल, इलायची तथा तेजपत्ताको समान मात्रामें मिलानेपर होता है, इसे त्रिजातक कहा जाता है, उसमें नागकेशरका मिश्रण कर देनेपर वह चतुर्जातक कहलाता है। पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और नागरके मिश्रित स्वरूपको पञ्चकोल और कोल कहा जाता है।

प्रियंगुको कंगुका (काकुन) तथा कोद्रव या कोदोको कोरदूषके नामसे जानना चाहिये। त्रिपुट्का नाम पुट है और कलापका लङ्कक नाम स्वीकार किया गया है। वेणु अर्थात् बाँसको सतीन तथा वर्तुल भी कहा जाता है।

पिचुक, पित्तल, अक्ष और विडालपदक शब्द तौल-परिमाणमें एक कर्ष (सोलह मासा)-के वाचक हैं। सुवर्ण तथा कवलग्रहका बराबर मान है। पलार्ध अर्थात् आधा पल, एक शुक्ति तथा आठ माषक भारमें समान है। पल,बिल्व और मुष्टिका परिमाण समान होता है। दो पलकी मात्राको प्रसुति अर्थात् एक पसर कहा गया है। अंजलि और कुडवका मान चार पलके बराबर होता है। आठ पलको अष्टमान कहा जाता है, उसे मान भी कहा गया है। चार कुडवका एक प्रस्थ (एक सेर) और चार प्रस्थका एक आढक अर्थात् एक अढैया होता है। इसीको एक काशपात्र कहा गया है। चार आढकका एक द्रोण होता है। एक सौ पलका एक तुला और बीस पलका एक भाग माना गया है। विद्वानोंने प्रस्थ आदिकी मात्रामें प्राप्त होनेवाले द्रव्योंका मान तो इस प्रकारसे कहा है, किंतु द्रव-पदार्थोंकी मात्राको उसका दुगुना स्वीकार किया गया है।

भद्रदारु, देवकाष्ठ तथा दारु देवदारुके वाचक हैं। कुष्ठको आमय और मांसीको नलदंश कहा गया है। शंख नामक औषधिका नाम शुक्तिनख है तथा व्याघ्र नामकी औषधि व्याघ्रनखी या व्याघ्रनख शब्दसे कही गयी है। गुग्गुल नामकी औषधिके वाचक पुर, पलङ्कष तथा महिषाक्ष शब्द हैं। रस गन्ध-रसका पर्यायवाची है, इसीको बोल भी कहा जाता है। सर्ज अर्थात् राल सर्जरसका बोधक है। प्रियङ्गु फलिनी, श्यामा, गौरी और कान्ता—इन नामोंसे अभिहित किया जाता है। करंज या कंजेका नाम नक्तमाल, पूतिक तथा चिरबिल्वक है। शिग्रु शोभाञ्जन तथा रोनमान नामसे प्रसिद्ध है। इसे सहिजन भी कहा जाता है। सिन्धुवार नामक औषधिके वाचक हैं—जया, जयन्ती, शरणी और निर्गुण्डी। मोरटा नामक औषधि पीलुपर्णी (मूर्वा) है तथा तुण्डीका नाम तुण्डिकेरी है।

मदन-वृक्षको गालव बोधा, घोटा और घोटी कहा जाता है। चतुरङ्गुल नामक औषधि सम्पाक तथा व्याधिघातक नामसे भी प्रसिद्ध है। आरग्वधका नाम राजवृक्ष और रैवत है। दन्तीको लोग काकेन्दु, तिक्ता, कण्टकी और विकङ्कत कहते हैं। निम्बको अरिष्ट कहा गया है तथा पटोलका एक नाम कोलका (परवल) है। वयस्थाका नाम विशल्या, छिन्ना और छिन्नरुहा है। गुडूचीके पर्यायवाची हैं—वशा, दन्ती तथा अमृता। किराततिक्तका नाम भूनिम्ब और काण्डतिक्त है।

सूतजीने कहा— हे शौनक ! ये सभी नाम वनमें उत्पन्न होनेवाली औषधियोंके हैं। इन्हीं वनस्पतियोंका वर्णन भगवान् श्रीहरिने शिवजीसे किया था। अब मैं कुमार अर्थात् भगवान् स्कन्दके द्वारा कहे गये व्याकरणशास्त्रको बतलाऊँगा, उसे आप ध्यानपूर्वक सुनें।

(अध्याय २०४)