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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ
४२८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

सूतजीने कहा— प्राचीन कालमें देवर्षि नारदके द्वारा पूछनेपर वृषभध्वज शिवने नारदसे श्रीविष्णुका जैसा वर्णन किया था वैसा मैंने आपसे कर दिया है। हे तात! निरन्तर उन अक्षय, निष्कल, सनातन, अव्यय, ब्रह्मस्वरूप विष्णुका ध्यान करते हुए आप निश्चित ही उनके शाश्वत पदको प्राप्त करेंगे। हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यको जो फल प्राप्त होता है, वह एकाग्रचित्त होकर विष्णुका क्षणमात्र ध्यान करनेसे प्राप्त होनेवाले फलके सोलहवें भागकी भी समानता करनेमें समर्थ नहीं है।

भगवान् शिवसे विष्णुके इस माहात्म्यको सुनकर सिद्ध देवर्षि नारदने उनकी सम्यक् आराधना करते हुए परम पदको प्राप्त किया। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक नित्य इस स्तुतिका पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्ममें किये गये पाप नष्ट हो जाते हैं। महादेवके द्वारा कही गयी यह स्तुति बड़ी दिव्य है। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक इस स्तुतिका नित्य पाठ करता है, वह अमृतत्त्व अर्थात् परम वैष्णव पदको प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय २३२)


मृत्य्राष्टकस्तोत्र*

सूतजीने कहा— हे शौनक! अब मैं मार्कण्डेयमुनिके द्वारा कहे गये स्तोत्रको बतलाता हूँ जो इस प्रकार है—

दामोदरं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
शङ्खचक्रधरं देवं व्यक्तरूपिणमव्ययम्।
अधोक्षजं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
वराहं वामनं विष्णुं नारसिंहं जनार्दनम्।
माधवं च प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
पुरुषं पुष्करक्षेत्रबीजं पुण्यं जगत्पतिम्।
लोकनाथं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
सहस्रशिरसं देवं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्।
महायोगं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
भूतात्मानं महात्मानं यज्ञयोनिमयोनिजम्।
विश्वरूपं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
इत्युदीरितमाकर्ण्य स्तोत्रं तस्य महात्मनः।
अपयातस्ततो मृत्युर्विष्णुदूतैः प्रपीडितः॥
इति तेन जितो मृत्युर्मार्कण्डेयेन धीमता।
प्रसन्ने पुण्डरीकाक्षे नृसिंहे नास्ति दुर्लभम्॥
(२३३।१–८)

मैं भगवान् दामोदरकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं शंखचक्रधारी, व्यक्त, अव्यय, अधोक्षजकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं वराह, वामन, विष्णु, नृसिंह, जनार्दन, माधवके शरणागत हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं पुराणपुरुष, पुष्करक्षेत्रके (मूलतत्त्व) बीजभूत, (मूल पुरुष) महापुण्य, जगत्पति, लोकनाथकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं सहस्र सिरवाले, व्यक्त, अव्यक्त, सनातन, महायोगेश्वरकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैंने प्राणियोंमें 'आत्मा' स्वरूपसे विद्यमान रहनेवाले, महात्मा, यज्ञयोनि, अयोनिज, विश्वरूप भगवान्‌की शरण ग्रहण कर ली है, अब मृत्यु मेरा क्या करेगी? इस प्रकार उन महात्मा


वाक्यातीतं त्रिकालज्ञं विश्वेशं लोकसाक्षिणम्। सर्वस्मादुत्तमं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
ब्रह्मादिदेवगन्धर्वैर्मुनिभिः सिद्धचारणैः। योगिभिः सेवितं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
संसारबन्धनान्मुक्तिमिच्छँल्लोको हृाशेषतः। स्तुत्वैवं वरदं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
संसारबन्धनात् कोऽपि मुक्तिमिच्छन् समाहितः। अनन्तमव्ययं देवं विष्णुं विश्वप्रतिष्ठितम्।
विश्वेश्वरमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥

* मृत्युका निवारक आठ श्लोकोंका स्तोत्र।
(२३२।११–१८)

२१०- आत्मज्ञाननिरूपण

काण्ड ]अच्युतस्तोत्र४२९

मार्कण्डेयमुनिके द्वारा की गयी स्तुतिको सुनकर विष्णु-दूतोंसे संत्रस्त मृत्यु भाग जाती है। इस स्तोत्रका पाठकर बुद्धिमान् श्रीमार्कण्डेयने मृत्युपर विजय प्राप्त कर ली। पुण्डरीकाक्ष श्रीनृसिंह महाविष्णुके प्रसन्न होनेपर कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

यह मृत्वष्टकस्तोत्र महापुण्यशाली है, मृत्युका विनाश करनेवाला और मङ्गलदायक है। मार्कण्डेयमुनिका कल्याण करनेके लिये भगवान् विष्णुने स्वयं इस स्तोत्रको कहा था। जो मनुष्य नित्य तीनों कालोंमें पवित्रतासे भक्तिपूर्वक इस स्तुतिका नियमपूर्वक पाठ करता है, वह विष्णुभक्त अकालमृत्युसे ग्रस्त नहीं होता। जो योगी अपने हृदयकमलमें पुराणपुरुष, सनातन, अप्रमेय तथा सूर्यसे भी अत्यधिक तेजस्वी नारायणका ध्यान करता है, वह मृत्युपर विजय प्राप्त कर लेता है।

(अध्याय २३३)


अच्युतस्तोत्र

सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं अच्युतस्तोत्रका वर्णन करूँगा जो प्राणियोंको सब कुछ प्रदान करनेवाला है। देवर्षि नारदके पूछनेपर ब्रह्माजीने उस सर्वश्रेष्ठ स्तोत्रका जैसा वर्णन किया था, वैसा ही आप मुझसे सुनें।

नारदजीने पूछा—हे ब्रह्मन्! प्रतिदिन पूजाके समय जिस प्रकार अक्षय, अव्यय, वर प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णुकी स्तुति मुझे करनी चाहिये, वह बतानेकी कृपा करें। वे सभी प्राणी धन्य हैं, उन सबका जन्म लेना सफल है, वे ही सब प्रकारका सुख प्राप्त करनेवाले हैं, उन्हीं सज्जनोंका जीवन सार्थक है, जो भगवान् अच्युत विष्णुकी सदैव स्तुति करते हैं।

ब्रह्माजीने कहा—हे मुने! मैं भगवान् वासुदेवका वह स्तोत्र जो प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला है और जिस स्तोत्रके द्वारा पूजाकालमें सम्यक् स्तुति किये जानेपर भगवान् नारायण प्रसन्न होते हैं, उसे आपको सुनाता हूँ, सुनें। वह स्तोत्र इस प्रकार है—

ॐ नमो [ भगवते ] वासुदेवाय नमः सर्वाघहारिणे।
नमो विशुद्धदेहाय नमो ज्ञानस्वरूपिणे॥
नमः सर्वसुरेशाय नमः श्रीवत्सधारिणे।
नमश्चर्मासिहस्ताय नमः पङ्कजमालिने॥
नमो विश्वप्रतिष्ठाय नमः पीताम्बराय च।
नमो नृसिंहरूपाय वैकुण्ठाय नमो नमः॥
नमः पङ्कजनाभाय नमः क्षीरोदशायिने।
नमः सहस्रशीर्षाय नमो नागाङ्गशायिने॥
नमः परशुहस्ताय नमः क्षत्रान्तकारिणे।
नमः सत्यप्रतिज्ञाय ह्यजिताय नमो नमः॥
नमस्त्रैलोक्यनाथाय नमश्चक्रधराय च।
नमः शिवाय सूक्ष्माय पुराणाय नमो नमः॥
नमो वामनरूपाय बलिराज्यापहारिणे।
नमो यज्ञवराहाय गोविन्दाय नमो नमः॥
नमस्ते परमानन्द नमस्ते परमाक्षर।
नमस्ते ज्ञानसद्भाव नमस्ते ज्ञानदायक॥
नमस्ते परमाद्वैत नमस्ते पुरुषोत्तम।
नमस्ते विश्वकृद्देव नमस्ते विश्वभावन॥
नमस्ते स्ताद् विश्वनाथ नमस्ते विश्वकारण।
नमस्ते मधुदैत्यघ्न नमस्ते रावणान्तक॥
नमस्ते कंसकेशिघ्न नमस्ते कैटभार्दन।
नमस्ते शतपत्राक्ष नमस्ते गरुडध्वज॥
नमस्ते कालनेमिघ्न नमस्ते गरुडासन।
नमस्ते देवकीपुत्र नमस्ते वृष्णिनन्दन॥
नमस्ते रुक्मिणीकान्त नमस्तेऽदितिनन्दन।
नमस्ते गोकुलावास नमस्ते गोकुलप्रिय॥
जय गोपवपुः कृष्ण जय गोपीजनप्रिय।
जय गोवर्धनाधार जय गोकुलवर्धन॥
जय रावणवीरघ्न जय चाणूरनाशन।
जय वृष्णिकुलोद्योत जय कालीयमर्दन॥

४३० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

जय सत्य जगत्साक्षिन् जय सर्वार्थसाधक।
जय वेदान्तविद्वेद्य जय सर्वद माधव॥
जय सर्वाश्रयाव्यक्त जय सर्वग माधव।
जय सूक्ष्म चिदानन्द जय चित्तनिरञ्जन॥
जयस्तेऽस्तु निरालम्ब जय शान्त सनातन।
जय नाथ जगत्पुष्ट( पूज्य ) जय विष्णो नमोऽस्तु ते॥
त्वं गुरुस्त्वं हरे शिष्यस्त्वं दीक्षामन्त्रमण्डलम्।
त्वं न्यासमुद्रासमयास्त्वं च पुष्पादिसाधनम्॥
त्वमाधारस्त्वं ह्यनन्तस्त्वं कूर्मस्त्वं धराम्बुजम्।
धर्मज्ञानादयस्त्वं हि वेदिमण्डलशक्तयः॥
त्वं प्रभो छलभृद्रामस्त्वं पुनः स खरान्तकः।
त्वं ब्रह्मर्षिश्च देवस्त्वं विष्णुः सत्यपराक्रमः॥
त्वं नृसिंहः परानन्दो वराहस्त्वं धराधरः।
त्वं सुपर्णस्तथा चक्रं त्वं गदा शङ्ख एव च॥
त्वं श्रीः प्रभो त्वं पुष्टित्वं त्वं माला देव शाश्वती।
श्रीवत्सः कौस्तुभस्त्वं हि शार्ङ्गं त्वं च तथेषुधिः॥
त्वं खड्गचर्मणा सार्धं त्वं दिक्पालास्तथा प्रभो।
त्वं वेदास्त्वं विधाता च त्वं यमस्त्वं हुताशनः॥
त्वं धनेशस्त्वमीशानस्त्वमिन्द्रस्त्वमपाम्पतिः।
त्वं रक्षोऽधिपतिः साध्यस्त्वं वायुस्त्वं निशाकरः॥
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ त्वं मरुद्गणाः।
त्वं दैत्या दानवा नागास्त्वं यक्षा राक्षसाः खगाः॥
गन्धर्वाप्सरसः सिद्धाः पितरस्त्वं महामराः।
भूतानि विषयस्त्वं हि त्वमव्यक्तेन्द्रियाणि च॥
मनोबुद्धिरहङ्कारः क्षेत्रज्ञस्त्वं हृदीश्वरः।
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारः समित्कुशाः॥
त्वं वेदी त्वं हरे दीक्षा त्वं यूपस्त्वं हुताशनः।
त्वं पत्नी त्वं पुरोडाशस्त्वं शाला स्रुक् च त्वं स्रुवः॥
ग्रावाणः सकलं त्वं हि सदस्यस्त्वं सदक्षिणः।
त्वं शूर्पादिस्त्वं च ब्रह्मा मुसलोलूखले ध्रुवम्॥
त्वं होता यजमानस्त्वं त्वं धान्यं पशुयाजकः।
त्वमध्वर्युस्त्वमुद्गाता त्वं यज्ञः पुरुषोत्तमः॥
दिक्पातालमहि व्योम द्यौस्त्वं नक्षत्रकारकः।
देवतियर्ङ्मनुष्येषु जगदेतच्चराचरम्॥
यत्किंचिद् दृश्यते देव ब्रह्माण्डमखिलं जगत्।
तव रूपमिदं सर्वं सृष्ट्यर्थं सम्प्रकाशितम्॥
नाथयन्ते परं ब्रह्म देवैरपि दुरासदम्।
कस्त्वां जानाति विमलं योगगम्यमतीन्द्रियम्॥
अक्षयं पुरुषं नित्यमव्यक्तमजमव्ययम्।
प्रलयोत्पत्तिरहितं सर्वव्यापिनमीश्वरम्॥
सर्वज्ञं निर्गुणं शुद्धमानन्दमजरं परम्।
बोधरूपं ध्रुवं शान्तं पूर्णमद्वैतमक्षरम्॥
अवतारेषु या मूर्तिर्विदूरे देव दृश्यते।
परं भावमजानन्तस्त्वां भजन्ति दिवौकसः॥
कथं त्वामीदृशं सूक्ष्मं शक्नोमि पुरुषोत्तम।
आराधयितुमीशान मनोऽगम्यमगोचरम्॥
इह यन्मण्डले नाथ पूज्यते विधिवत् क्रमैः।
पुष्पधूपादिभिर्यन्त्र तत्र सर्वा विभूतयः॥
सङ्कर्षणादिभेदेन तव यत्पूजितं मया।
क्षन्तुमर्हसि तत्सर्वं यत्कृतं न कृतं मया॥
न शक्नोमि विभो सम्यक् कर्तुं पूजां यथोदिताम्।
यत्कृतं जपहोमादि असाध्यं पुरुषोत्तम॥
विनिष्पादयितुं भक्त्या अतस्त्वां क्षमयाम्यहम्।
दिवा रात्रौ च सन्ध्यायां सर्वावस्थासु चेष्टतः॥
अचला तु हरे भक्तिस्त्वदङ्घ्रियुगले मम।
शरीरे न ( ण ) तथा प्रीतिर्न च धर्मादिकेषु च॥
यथा त्वयि जगन्नाथ प्रीतिरात्यन्तिकी मम।
किं तेन न कृतं कर्म स्वर्गमोक्षादिसाधनम्॥
यस्य विष्णौ दृढा भक्तिः सर्वकामफलप्रदे।
पूजां कर्तुं तथा स्तोत्रं कः शक्नोति तवाच्युत॥
स्तुतं च पूजितं मेऽद्य तत् क्षमस्व नमोऽस्तु ते।
(२३४।५-४९१/२)

मैं उन भगवान् वासुदेवको नमस्कार करता हूँ, जो सभी पापोंको हरण करनेवाले हैं। मैं विशुद्ध देहवाले, ज्ञानस्वरूप, सभी देवताओंके स्वामी, श्रीवत्सधारी*, ढाल और तलवार धारण करनेवाले,


* भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलपर विद्यमान चिह्नविशेष।

२११- गीतासार

काण्ड ] अच्युतस्तोत्र [ ४३१


कमलकी माला धारण करनेवाले, जगत्में प्रतिष्ठित, पीताम्बरसे अलंकृत, नृसिंहस्वरूप और वैकुण्ठमूर्ति श्रीविष्णुको बारम्बार नमन करता हूँ।

मेरा उन देवको प्रणाम है, जिनकी नाभिमें कमल है, जो क्षीरसागरमें शयन करनेवाले हैं, जिनके हजारों सिर हैं, जो शेषशय्यापर शयन कर रहे हैं, जिनके हाथमें परशु है, जो क्षत्रियोंके गर्वका अन्त करनेवाले हैं, जो सत्यप्रतिज्ञ हैं, जो अजित हैं, जो त्रिभुवनके एकमात्र स्वामी और चक्रधारी हैं, उन कल्याणमूर्ति, सूक्ष्मस्वरूप और पुराणपुरुषको मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ। दैत्यराज बलिके राज्यको दानमें ग्रहण करनेके लिये भगवान् वामन तथा पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये यज्ञवराहका अवतार ग्रहण करनेवाले गोविन्द श्रीहरिको मेरा बार-बार प्रणाम है।

हे परमानन्दस्वरूप! हे ज्ञान देनेवाले परम अक्षर ज्ञानस्वरूप! देव! परमाद्वैत! पुरुषोत्तम! विश्वकर्ता! विश्वभावन! विश्वनाथ! विश्वके कारणभूत! मधुदैत्यविनाशक! रावणहन्ता! कंस तथा केशीको मारनेवाले! कैटभ दैत्यको मारनेवाले! आपको नमस्कार है। हे पद्मलोचन! हे गरुडध्वज! कालनेमिके हन्ता! गरुडासन! देवकीपुत्र! वृष्णिनन्दन! रुक्मिणीकान्त! अदितिनन्दन! गोकुलवासी! हे गुरुकुलप्रिय आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है।

हे गोपवपु श्रीकृष्ण, गोपीजनप्रिय, गोवर्धनधारी! हे गोकुलवर्धन! आपकी जय हो। हे दैत्यराज रावणके संहारक! चाणूरदैत्य-विनाशक, वृष्णिवंशके प्रकाशक! कालीयमर्दन! सत्यस्वरूप! संसारके साक्षी! सर्वार्थसाधक! हे वेदान्तविदोंके वेद्य! सब कुछ देनेवाले! माधव! सबके आश्रय! अव्यक्त, सर्वत्र व्याप्त! लक्ष्मीकान्त (माधव), सूक्ष्म, चिदानन्द! चित्त निरञ्जन, निरालम्ब! हे शान्त! हे सनातन! हे नाथ! हे जगत्पूज्य भगवान् विष्णु! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आपको मेरा नमस्कार है।

हे हरे! आप ही गुरु हैं, आप ही शिष्य हैं। आप ही दीक्षामें प्रयुक्त होनेवाले मन्त्र तथा मण्डल हैं। आप ही न्यास, मुद्रा और दीक्षा हैं। आप ही पूजामें प्रयुक्त होनेवाले पुष्पादिक साधन हैं। आप ही आधारशक्ति, अनन्त, कूर्म, पृथिवी, पद्म, धर्म, ज्ञान, वेदी और पूजामण्डलकी शक्तियोंके स्वरूप हैं।

हे प्रभो! आप ही छलका भेदन करनेवाले हैं। आप ही खर-दूषणका संहार करनेवाले राम हैं। आप ही ब्रह्मर्षि, देव, विष्णु, सत्यपराक्रम, नृसिंह, परानन्द, धराको धारण करनेवाले महावराह हैं।

हे प्रभो! आप ही सुपर्ण, शंख, चक्र, गदा हैं। हे देव! आप ही लक्ष्मी, पुष्टि, शाश्वती माला, श्रीवत्स, कौस्तुभ, शार्ङ्गी* तथा तूणीर (तरकस)-रूप हैं।

हे प्रभो! ढाल और खड्गसे युक्त आप इन्द्रादिक दिक्पाल देवता हैं। आप ही विधाता और आप ही ब्रह्मा हैं। आप ही यम, अग्नि, कुबेर, ईशान, इन्द्र, वरुण, राक्षसोंके स्वामी, साध्य, वायु, चन्द्र, सूर्य, वसु, रुद्रगण, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण हैं। आप ही दैत्य, दानव, नाग, यक्ष, राक्षस, पक्षी, गन्धर्व, अप्सरा, सिद्ध, पितृजन तथा देवगण हैं। आप ही पृथ्वी आदि पञ्चमहाभूत, शब्दादि विषयस्वरूप और अव्यक्त इन्द्रिय हैं। आप ही मन, बुद्धि एवं अहंकारतत्त्व हैं। आप ही क्षेत्रज्ञ तथा हृदयेश्वर हैं। आपकी जय हो, आपको मैं प्रणाम करता हूँ।

हे हरे! आप ही यज्ञ, वषट्कार, ॐकार (प्रणव), समिधा और कुश हैं। आप ही यज्ञवेदी,


* 'शार्ङ्ग' नामका धनुष धारण करनेवाले।

२१२- गीतासार

४३२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-

यज्ञीय दीक्षा, यज्ञयूप, अग्नि, यजमानपत्नी, पुरोडाश, यज्ञशाला, स्रुक्, स्रुव तथा सोमरस निकालनेके लिये प्रयुक्त पाषाणविशेष हैं। आप सब कुछ हैं। आप ही यज्ञकी सम्पन्नताके लिये दक्षिणायुक्त सदस्य और आप ही यज्ञके सम्पादनके लिये उपयोगी शूर्पादिक उपकरण, ब्रह्मा (विशेष ऋत्विक्), मूसल तथा ओखली हैं। आप ही निश्चितरूपमें होता, यजमान, धान्य, पशु, याजक, अध्वर्यु, उद्गाता, यज्ञ और आप ही पुरुषोत्तम यज्ञभगवान् हैं। आपको मेरा नमस्कार है।

हे देव! आप ही दिशा, पाताल, पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग एवं नक्षत्रोंके जन्मदाता हैं। आप ही देव, तिर्यक् तथा मनुष्य आदि हैं। यह चराचर जगत् भी आप ही हैं। यह अखिल ब्रह्माण्ड और जगत् आपका ही स्वरूप है। इन सबको सृष्टिके लिये आपने स्वतः प्रकट किया है। हे परब्रह्म! यह आपका स्वरूप उन देवताओंके भी ज्ञानसे परे है। इस संसारमें कौन ऐसा प्राणी है, जो निष्कलुष, योगगम्य, इन्द्रियातीत, अक्षय, पुराणपुरुष, नित्य, अव्यक्त, अजन्मा, अव्यय, प्रलय और उत्पत्तिसे रहित, सर्वव्यापक, ईश्वर, सर्वज्ञ, निर्गुण, शुद्ध, परमानन्द, अजर, बोधरूप, अटल, शान्त, पूर्ण, अद्वैत तथा अक्षर ब्रह्म आपको जान सकता है। हे देव! अवतारोंमें आपके जिस स्वरूपका दर्शन होता है, उसके परम भावको बिना जाने हुए ही देवता लोग आपका भजन करते हैं। वे भी आपके मूलस्वरूपके दर्शनसे वञ्चित रह जाते हैं। हे पुरुषोत्तम! इस प्रकार आपका मनसे भी अगम्य जो अगोचर सूक्ष्मस्वरूप है, उसकी आराधना करनेमें क्या मैं समर्थ हो सकता हूँ?

हे नाथ! यहाँपर इस पूजामण्डलमें यथाविधि पुष्प-धूप आदिके द्वारा संकर्षण आदि नामभेदोंसे आपकी ही मैंने पूजा की है, ये सभी विभूतियाँ आपकी ही हैं। मैंने आपकी इस पूजामें जो कुछ किया है और जो कुछ नहीं किया है, वह सब आप क्षमा करें। हे विभो! यथोक्त रूपसे मैं आपकी सम्यक् पूजा नहीं कर सकता। जो मैंने जप-होमादि किया है, भक्तिपूर्वक उस कार्यका निष्पादन करना मेरे लिये असाध्य है। इसलिये मैं आपसे क्षमा-प्रार्थना करता हूँ। हे प्रभो! दिन, रात और संध्यामें तथा सभी अवस्थाओंमें मेरी चेष्टा-निष्ठा आपकी सेवाके अनुरूप रहे। हे हरे! आपके चरणयुगलमें मेरी एकनिष्ठ अचल भक्ति हो। हे नाथ! मेरी जैसी प्रीति अपने शरीरसे है, वैसी धर्मादि कार्योंमें नहीं। इसलिये हे जगन्नाथ! आप ऐसी कृपा करें कि आपमें मेरी आत्यन्तिकी प्रीति हो जाय। सभी फल देनेवाले भगवान् विष्णुकी जिसने दृढ़ भक्ति कर ली, उसने स्वर्ग और मोक्ष आदिके साधन किन कर्मोंको नहीं किया है? हे अच्युत! आपके पूजन और स्तुति करनेमें कौन समर्थ है? आज मैंने यथासामर्थ्य आपकी जो पूजा और स्तुति की है, उसकी अपूर्णताके लिये मुझे क्षमा प्रदान करें। मेरा आपको प्रणाम है।

हे मुने! मैंने भली प्रकारसे आपको यह चक्रधर (अच्युत)-स्तोत्र सुना दिया है। यदि आप परम वैष्णव पदकी इच्छा करते हैं तो परात्पर विष्णुकी भक्तिपूर्वक यह स्तुति करें।

पूजाके समय जो मनुष्य इस स्तोत्रके द्वारा जगद्गुरु भगवान् विष्णुकी स्तुति करता है, वह शीघ्र ही संसारके बन्धनको काटकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। हे मुने! अन्य जो कोई भी पवित्र होकर भक्तिपूर्वक प्रतिदिन तीनों संध्याओंमें श्रीविष्णुदेवका इस स्तोत्रके अनुसार भजन करता है, वह अपने समस्त अभीष्टोंकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इस स्तोत्रका पाठ करनेसे पुत्र चाहनेवाला व्यक्ति पुत्र प्राप्त करता है, सांसारिक बन्धनसे मुक्त होनेकी

२१३- ब्रह्मगीतासार

काण्ड ] अच्युतस्तोत्र ४३३

इच्छा रखनेवाला उससे मुक्त हो जाता है। इस स्तोत्रके पाठसे रोगी रोगसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है, निर्धन व्यक्ति धनवान् बन जाता है और विद्यार्थी विद्या, भाग्य तथा कीर्ति प्राप्त करता है। जातिस्मरत्व (पूर्वजन्मके वृत्तान्तकी स्मृति) तथा और जो कुछ चित्तमें इच्छा रखता है, भक्त उसे प्राप्त कर लेता है।

वह प्राणी धन्य है, सब कुछ जाननेवाला है, बुद्धिमान् है, साधु है, सभी सत्कर्मोंका कर्ता है, सत्यवादी है, पवित्र है और दाता है, जो भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करता है। इस संसारमें वे प्राणी सम्भाषण करने योग्य नहीं हैं और समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत हैं, जिनका कोई भी सत्कार्य भगवान् हरिके उद्देश्यसे सम्पन्न नहीं होता। वह व्यक्ति दुरात्मा है, उसका मन और वचन शुद्ध नहीं है, जिसकी सब कुछ प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णुमें अचल भक्ति नहीं है।

मनुष्य सब सुख प्रदान करनेवाले भगवान् हरिकी विधिवत् पूजा कर जो कुछ भी कामना करता है उसे प्राप्त कर लेता है। श्रद्धापूर्वक आराधना करनेपर पुरुषोत्तमभगवान् सब कुछ प्रदान करते हैं। समस्त मुनि जिन देवका चिन्तन करते हैं, वे ही शुद्ध ब्रह्म परब्रह्म हैं। जो सभीके हृदयमें विराजमान रहते हैं, जो सब कुछ जानते हैं और जो सभी कृत्योंके साक्षी हैं, जो भय-मरण-विहीन हैं, नित्य-आनन्दस्वरूप हैं, ऐसे अज, अमृत, ईश वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं समस्त संसारके स्वामी, सुप्रसन्न, शाश्वत, अति विमल, विशुद्ध, निर्गुण, आत्मस्वरूप और समस्त सुखोंके मूल भगवान् नारायणकी भावपुष्पसे पूजा करता हूँ। मेरे हृदयकमलमें सर्वसाक्षी सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् विष्णु सदा विराजमान रहें—

सकलमुनिभिराद्यश्चिन्त्यते यो हि शुद्धो
निखिलहृदि निविष्टो वेत्ति यः सर्वसाक्षी।
तमजममृतमीशं वासुदेवं नतोऽस्मि
भयमरणविहीनं नित्यमानन्दरूपम्॥
निखिलभुवननाथं शाश्वतं सुप्रसन्नं
त्वतिविमलविशुद्धं निर्गुणं भावपुष्पैः।
सुखमुदितसमस्तं पूजयाम्यात्मभावं
विशतु हृदयपद्मे सर्वसाक्षी चिदात्मा॥
(२३४।६०-६१)

इस प्रकार मैंने आदि-अन्तसे रहित, परात्पर ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुके महा प्रभावका वर्णन किया। इसलिये मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह भलीभाँति परमेश्वरका चिन्तन करे। इस संसारमें कौन ऐसा योगी है जो उन बोधगम्य पुराणपुरुष, सूर्यके समान तेजस्वी, विमल, विशुद्धात्मा, श्रेष्ठ, अद्वितीय विष्णुका चिन्तन करके उनमें तदाकार नहीं हो जाता ? जो मनुष्य इस स्तुतिका सदैव पाठ करता है, वह श्रीविष्णुके समान ही प्रशान्तचित्त तथा पापसे रहित हो जाता है। जो व्यक्ति अर्थ, धर्म, काम और मोक्षरूप पुरुषार्थकी कामना करता है अथवा सम्पूर्ण सौख्य चाहता है, वह सब कुछ छोड़कर सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष, वरण करने योग्य विष्णुकी शरणमें जाता है, इसीलिये उसका प्रभाव सर्वत्र फैल जाता है और वह विष्णुलोकको चला जाता है।

जो प्राणी विभु, सबके स्वामी, विश्वको धारण करनेवाले, विशुद्धात्मा, समस्त संसारके विनाशके हेतु, विमल, भगवान् वासुदेवकी शरणमें अनासक्त-भावसे जाता है, वह मोक्षपदको प्राप्त करता है—

विभुं प्रभुं विश्वधरं विशुद्ध-
मशेषसंसारविनाशहेतुम् ।
यो वासुदेवं विमलं प्रपन्नः
स मोक्षमाप्नोति विमुक्तसङ्गः॥
(२३४।६६)
(अध्याय २३४)

४३४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग

सूतजीने कहा— [हे शौनक!] अब मैं वेदान्त और सांख्यसिद्धान्तके अनुसार ब्रह्मज्ञानका वर्णन करता हूँ।

'मैं ही ज्योतिर्मय परब्रह्मस्वरूप विष्णु हूँ'—ऐसा चिन्तन करते हुए 'सूर्य, हृदयाकाश और वह्निमें एक ही ज्योति तीन रूपमें स्थित है', ऐसा निश्चय करना चाहिये। जैसे गायोंके शरीरमें घृत रहनेपर भी घृत गायको बल प्रदान नहीं करता, परंतु उसी घृतको निकालकर विधिके अनुसार गायोंके निमित्त प्रयोग करनेपर वह घृत महाबलप्रद हो जाता है, वैसे ही विष्णु सभी जीवोंके शरीरमें विद्यमान रहनेपर भी बिना आराधनाके कल्याणकारी नहीं हो सकते। जो योगरूप वृक्षपर चढ़नेके इच्छुक हैं, उनके लिये कर्मज्ञान आवश्यक है, किंतु जो योगरूपी वृक्षपर आरूढ़ हो चुके हैं, उनके लिये त्याग (वैराग्य) एवं ज्ञान ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है। जो शब्दादि विषयोंको जाननेकी इच्छा करता है, उसमें राग-द्वेषादि प्रादुर्भूत हो जाते हैं, इसी कारण मनुष्य लोभ-मोह तथा क्रोधके वशीभूत होकर पापाचार करता है।

जिसके हाथ, उपस्थ<sup></sup>, उदर और वाक्य—ये चार सुसंयत रहते हैं, वही बुद्धिमानोंके द्वारा विप्र कहा जाता है। जो दूसरेके द्रव्यको ग्रहण नहीं करते, हिंसा नहीं करते, जुएमें अनुरक्त नहीं रहते, वास्तवमें उन्हींके दोनों हाथ सुसंयत रहते हैं। जो दूसरेकी स्त्रीके प्रति कामका भाव नहीं रखता, उसीकी उपस्थेन्द्रिय सुसंयत है। जो लोभरहित होकर परिमित भोजन करते हैं, उन्हींके उदरको संयत कहा जाता है। जो हित-परिमित और सत्य वाक्य बोलता है, उसीकी वाणी संयत कही जाती है। जिसके हाथ आदि संयत रहते हैं, उसके लिये तपस्या या यज्ञादिका कोई प्रयोजन नहीं है अर्थात् तपस्या, यज्ञ आदि तभी सफल होते हैं, जब हाथ, उपस्थ, उदर एवं वाक्य संयत हों।

मन, बुद्धि और इन्द्रियोंका आत्यन्तिक ऐक्य अर्थात् सदा ध्येयतत्त्वमें लगा रहना ध्यान कहलाता है। वह ध्यान दो प्रकारका होता है—सबीज<sup></sup> तथा निर्बीज<sup></sup>

चिन्तनकी मूल आधार-शक्ति 'बुद्धि' भौंहोंके मध्यमें रहती है। इसे यदि जीव विषयोंमें लगाये रहता है तो यही जाग्रत्-अवस्था होती है। जब जीवकी इन्द्रियाँ शान्त हों, केवल मन चञ्चल हो और इसी कारण बाहरी एवं भीतरी विषयोंको केवल स्वप्नमें जीव देखता रहे तो यही स्वप्नावस्था है। जब मन हृदयमें स्थित हो तथा तमोगुणसे मोहित होनेके कारण कुछ भी स्मरण न कर सके, तब सुषुप्ति-अवस्था समझनी चाहिये।

जो जितेन्द्रिय होता है उसको जाग्रत्-अवस्था में तन्द्रा, मोह और भ्रम नहीं उत्पन्न होते। वह शब्दादि विषयोंमें आसक्त नहीं होता।

ज्ञानी इन्द्रियों और मनको विषयोंसे खींचकर बुद्धिके द्वारा अहंकारको एवं प्रकृतिके द्वारा बुद्धिको संयत कर और चित्-शक्तिके द्वारा प्रकृतिको भी संयत कर केवल आत्मरूपमें अवस्थित रहता है। इस स्थितिमें ज्ञानी मनसे स्वप्रकाश आत्मा (परमात्मा)-को देख सकता है। आत्मा स्वप्रकाश है, ज्ञेय है, ज्ञाता है और ज्ञानाधिकरण है। चिद्रूप अमृत शुद्ध निष्क्रिय सर्वव्यापी शिवप्रद आत्माको जानकर मनुष्य तुरीय<sup></sup>-अवस्था में आ जाता है, इसमें संशय नहीं है।


<sup></sup> मूत्रेन्द्रिय।
<sup></sup> अविद्या आदि क्लेश ही बीज हैं। इनका अनुभव होते रहनेपर सबीज ध्यान कहा जाता है।
<sup></sup> क्लेशरूप बीजका अनुभव न हो तो निर्बीज ध्यान कहा जाता है।
<sup></sup> परम शान्त, शिवस्वरूप अद्वैतावस्था।

२१५- गरुडपुराणका माहात्म्य

काण्ड ] ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग ४३५

जीवका अन्तिम लक्ष्य मुक्ति है। यह मुक्ति जीवको तभी प्राप्त होती है, जब वह पुर्यष्टक एवं त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका परित्याग कर देता है। यह पुर्यष्टक एक 'कमल' के रूपमें माना गया है। संसारावस्थामें जीव इसी कमलरूपी पुर्यष्टक की कर्णिकामें स्थित रहता है। तीनों गुणों (सत्त्व, रज एवं तम)-की साम्यावस्थारूप प्रकृति ही पुर्यष्टकरूपी कमलकी कर्णिका है। इस पुर्यष्टकरूप कमलके आठ पत्र (दल) हैं। ये हैं—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, सत्व, रज तथा तम। इस प्रतीकात्मक वर्णनका निष्कर्ष यह है कि जीवको मुक्ति प्राप्त करनेके लिये प्रकृतिसे स्वयंको अलग करना अनिवार्य है इस हेतु शब्द आदि विषयोंके प्रति अनासक्त होना होगा।

प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, धारणा, समाधि और ध्यान—ये छः योगके साधन हैं।

इन्द्रियसंयमसे पापक्षय और पापक्षयसे देवप्रीति सुलभ होती है। देवप्रीति मुक्ति एवं मुक्तिसाधनकी ओर उन्मुख होनेके लिये भी प्रथम एवं अनिवार्य साधन है। योगका मुख्यतम साधन है प्राणायाम। यह दो प्रकारका है—गर्भ और अगर्भ। जप एवं ध्यानयुक्त जो प्राणायाम है, वही गर्भ प्राणायाम है और इससे अतिरिक्त होनेपर अगर्भ प्राणायाम कहा जाता है। जो प्राणायाम छत्तीस मात्रासे युक्त रहता है वही श्रेष्ठ है, जो चौबीस मात्रासे युक्त रहता है वह मध्यम है और जो प्राणायाम बारह* मात्रासे युक्त रहता है वह निम्न है। सदा ॐकारका जप कर प्राणायाम करे। ॐकार परब्रह्मका वाचक है। इस ब्रह्मवाचक ॐकारका परिज्ञान होनेपर वाच्य ब्रह्म प्रसन्न हो जाता है।

'ॐ नमो विष्णवे'—इस षडक्षर और द्वादशाक्षर गायत्रीका जप करना चाहिये। सभी इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति सांसारिक विषयोंकी ओर रहती है। मनके द्वारा इन प्रवृत्तियोंकी निवृत्तिको ही प्रत्याहार कहा गया है। इन्द्रियोंको अपने विषयोंसे समाहरण कर मनको बुद्धिके साथ प्रत्याहारमें स्थित रखते हुए बारह बार प्राणायाम करनेमें जितना समय लगता है, उतने समयतक ब्रह्ममें मनको निविष्ट करना ही द्वादशधारणात्मक ध्यान है—ऐसा ब्रह्माने कहा है। नियतरूपसे ब्रह्माकारवृत्तिमें जो संतुष्टिका अनुभव होता है, उसीको समाधि कहा जाता है। ध्यान करते-करते यदि मन चञ्चल नहीं होता है, सदा ध्यानमें ही प्रवृत्ति रहती है अर्थात् अभीष्ट प्राप्तितक ध्यानसे निवृत्ति नहीं होती तो इसीका नाम धारणा है। मन यदि ध्येयतत्त्वमें ही आसक्त रहता है अर्थात् ध्येयतत्त्वका ही चिन्तन सदा होता रहता है, अन्य किसी भी पदार्थका भान नहीं होता तो इसीको ध्यान कहा जाता है।

ध्यानपरायण मुनिगण, ध्येय पदार्थका चिन्तन करते-करते जब मन उसी ध्येयमें निश्चल हो जाता है तो इसे ही परम ध्यान कहते हैं। ध्यान करते-करते जब सर्वत्र ध्येयपदार्थ ही दिखायी देने लगे, ध्याता भी ध्येयमय प्रतीत हो और किसी प्रकारका द्वैतज्ञान नहीं रहे तो इस अवस्थाको समाधि कहा जाता है। जिसका मन संकल्परहित होकर इन्द्रियोंके विषयचिन्तनसे विरत हो जाता है तथा ब्रह्ममें लीन हो जाता है, वही समाधिमें स्थित कहा जाता है। जिस योगीका मन आत्मामें अवस्थित परमात्माका ध्यान करते-करते तन्मय हो जाता है, वह योगी समाधिस्थ कहा जाता है। चित्तकी अस्थिरता, भ्रान्ति, दौर्मनस्य और प्रमाद—ये सभी योगियोंके दोष कहे गये हैं, ये योगमें विघ्नकारक हैं।

मनके स्थिर होनेके लिये प्रथम ध्येयके स्थूलस्वरूपका चिन्तन करे, इसके बाद मनके


* मात्राका विवेक योगसूत्रसे प्राणायामकी प्रक्रिया समझनेमें स्पष्ट होगा।

४३६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

निश्चल होनेपर तेजःस्वरूप परमात्माके अनुरक्त होकर स्थिर हो जाना चाहिये। जगत्में परमात्माके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, वह परमात्मा ही विश्वरूप है—इस प्रकारका निश्चय कर परमात्मासे अतिरिक्त सभी पदार्थोंको असत् मानकर उनका परित्याग कर देना चाहिये। हृदय-पद्ममें स्थित ॐकाररूपी व्यापक परमब्रह्मका ध्यान करना चाहिये। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञसे रहित तीन मात्रासे युक्त ॐकारका जप करना चाहिये। प्रथम अपने हृदयमें ॐकारस्वरूप प्रधान पुरुषका ध्यान करे। इसके बाद उसके ऊपर कृष्णवर्ण, रक्तवर्ण तथा श्वेतवर्णवाले तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके तीन मण्डलोंका ध्यान कर उनमें जीवात्मा पुरुषका ध्यान करे। मण्डलके ऊपर ऐश्वर्य आदि आठ गुणोंसे युक्त अष्टदल कमलकी भावना की जाती है।

इस कमलकी कर्णिका ज्ञान है, केसर विज्ञान है, नाल वैराग्य है एवं इसका कन्द वैष्णव धर्म है। मुक्तिसाधक व्यक्ति इस हृत्पद्मकी कर्णिकामें स्थित प्रणवरूप ब्रह्मका ध्यान, चेतन निश्चल तथा व्यापक रूपमें करे। इस ॐकारस्वरूप ब्रह्मका ध्यान करते-करते यदि कोई प्राणोंका परित्याग कर देता है तो वह ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करता है। योगी देहगत पद्मके मध्यमें हरिको बैठाकर भक्तिभावसे उनका ध्यान करे। कुछ लोग ध्यान-रूपी चक्षुसे—आत्मासे आत्मा (परमात्मा)-को देखते हैं। सांख्यदर्शन-वेत्तालोग प्रकृति-पुरुषके विवेकसे तथा योगवेत्ता योगके प्रभावसे आत्मदर्शन करते हैं। आत्मा ज्ञानरूप है। वास्तवमें ज्ञानका ही माहात्म्य है। ज्ञान ही ब्रह्मका प्रकाशक है और ज्ञान ही भवबन्धनको काटनेवाला है। इसीलिये ध्यान-साधनमें एकचित्तता ही प्रधान योग है। यही योग योगियोंको मुक्ति प्रदान करता है, इसमें संशय नहीं है। यह एकचित्तताका योग आत्मदर्शनमें ही पर्यवसित है।

जो इन्द्रियादिको जीत कर ज्ञानसे प्रदीप्त हो जाता है, परमात्मामें अवस्थित इसी योगीको मुक्त कहा जाता है। आसन, स्थान आदिकी विधियाँ योगकी साधक नहीं होतीं, प्रत्युत ये तो योगसिद्धिमें विलम्ब करनेवाली हैं। ये सब विधियाँ साधनके विस्तार मात्र हैं। शिशुपालने स्मरणाभ्यासके प्रभावसे सिद्धि-लाभ किया था। योगाभ्यास करनेवाले योगीजन आत्मासे आत्माको देखते हैं। योगीजन सभी प्राणियोंमें करुणाभाव, विषयोंके प्रति विद्वेष एवं शिश्न और उदरकी परायणताका परित्याग करते हुए मुक्ति प्राप्त करते हैं। जब योगी मनुष्य इन्द्रियोंसे इन्द्रियोंके विषयका अनुभव नहीं करता, तब काष्ठकी भाँति सुख, दुःखके अनुभवसे अतीत होकर ब्रह्ममें लीन हो जाता है अर्थात् मुक्त हो जाता है।

मेधावी साधक सभी प्रकारके वर्णभेद, सभी प्रकारके ऐश्वर्यभेद एवं सभी अशुभ तथा पापोंको ध्यानाग्निके द्वारा भस्मसात् कर परमगतिको प्राप्त करता है। जैसे काष्ठसे काष्ठमें घर्षण करनेसे अग्निका दर्शन होता है, वैसे ही ध्यानसे परमात्मस्वरूप हरिका दर्शन किया जा सकता है। जब ब्रह्म और परमात्मस्वरूप हरिका दर्शन किया जाता है, जब ब्रह्म और आत्माके एकत्वका ज्ञान होता है तभी योगका उत्कर्ष जानना चाहिये। किसी भी बाह्य उपायसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं हो सकती, मुक्तिकी प्राप्ति आभ्यन्तरिक यम-नियम आदि उपायोंके द्वारा ही होती है। सांख्यज्ञान, योगाभ्यास और वेदान्तादिके श्रवणसे जो आत्माका प्रत्यक्ष होता है, उसे मुक्ति कहा जाता है। मुक्ति होनेपर अनात्मामें आत्माका और असत्-पदार्थमें सत्-तत्त्वका दर्शन होता है।

(अध्याय २३५)

२१६- वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्योंके बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम

काण्ड ] आत्मज्ञाननिरूपण ४३७

आत्मज्ञाननिरूपण

श्रीभगवान् बोले—हे नारद! अब मैं आत्मज्ञानका तात्त्विक वर्णन करूँगा, सुनिये।

अद्वैत तत्त्व ही सांख्य है और उसमें एकचित्तता ही योग है। जो अद्वैत तत्त्व-योगसे सम्पन्न हैं, वे भवबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। अद्वैत तत्त्वका ज्ञान होनेपर अतीत, वर्तमान और भविष्यके सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति सद्‍विचाररूपी कुल्हाड़ीके द्वारा संसाररूपी वृक्षको काटकर ज्ञान-वैराग्यरूपी तीर्थके द्वारा वैष्णव पद प्राप्त करता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—यह तीन प्रकारकी अवस्था ही माया है जो संसारका मूल है। यह माया जबतक रहती है, तबतक संसार ही सत्यमें अवगत होता है। वास्तवमें शाश्वत अद्वैत तत्त्वमें ही सब कुछ प्रविष्ट है। अद्वैत तत्त्व ही परब्रह्म है। यह परब्रह्म नाम-रूप तथा क्रियासे रहित है। यह ब्रह्म ही इस जगत्‌की सृष्टि कर स्वयं उसीमें प्रविष्ट हो जाता है।

'मैं मायातीत चित्पुरुषको जानता हूँ और मैं भी आत्मस्वरूप हूँ।' इस प्रकारका ज्ञान ही मुक्तिका मार्ग है। मोक्ष-लाभके लिये इससे अतिरिक्त अन्य कोई भी उपाय नहीं है*। श्रवण, मनन और ध्यान—ये सभी ज्ञानके साधन हैं। यज्ञ, दान, तपस्या, वेदाध्ययन और तीर्थसेवामात्रसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं होती है। मुक्ति किसी मतसे दान-ध्यानसे तथा किसीके मतसे पूजादि कर्मोंसे होती है। 'कर्म करो' और 'कर्मका त्याग करो'—ये दोनों वचन वेदमें मिलते हैं। निष्कामभावसे यज्ञादि कर्म मुक्तिके लिये होते हैं, क्योंकि निष्कामभावसे अनुष्ठित यज्ञादि अन्तःकरणकी शुद्धिके साधन हैं। ज्ञान प्राप्त होनेपर एक ही जन्ममें मुक्ति प्राप्त हो जाती है। द्वैत (भेद)-भाव रखनेपर तो मुक्ति सम्भव ही नहीं है। कुयोगी भी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। किसी कारण योगभ्रष्ट होनेपर योगियोंके कुलमें उत्पत्ति हो सकती है। ऐसी स्थितिमें मुक्ति सम्भव है।

कर्मोंसे भवबन्धन और ज्ञान होनेसे जीवकी संसारसे मुक्ति हो जाती है, इसलिये आत्मज्ञानका आश्रय करना चाहिये। जो आत्मज्ञानसे भिन्न ज्ञान हैं, उनको भी अज्ञान कहा जाता है। जब हृदयमें स्थित सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब जीव जीवनकालमें ही अमरत्वकी प्राप्ति कर लेता है, इसमें संशय नहीं है—

यदा सर्वे विमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः।
तदाऽमृतत्वमाप्नोति जीवन्नेव न संशयः॥
(२३६। १२)

व्यापक होनेसे ब्रह्म कैसे जाता है, कौन जाता है और कहाँ जाता है? ऐसे प्रश्नोंके लिये कोई अवसर ही नहीं है। अनन्त होनेके कारण उसका कोई देश नहीं है; अतः किसी भी रूपमें उसकी गति नहीं हो सकती। परब्रह्म अद्वय है, अतः उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। वह ज्ञानस्वरूप है, अतः उसमें जड़ता कैसे हो सकती है? वस्तुतः ब्रह्म आकाशके समान है, इसलिये उसकी गति, अगति और स्थिति आदिका विचार कैसे हो सकता है? जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्था मायाके द्वारा कल्पित हैं अर्थात् मिथ्या हैं।

वस्तुमात्रका सार ब्रह्म ही है। तेजोरूप ब्रह्मको एक अखण्ड परम पुण्यरूप समझना चाहिये। जैसे अपनी आत्मा सबको प्रिय है, वैसे ही ब्रह्म सबको प्रिय है क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है। हे महामुने!


* वेदाहमेतं पुरुषं चिद्रूपं तमसः परम्। सोऽहमस्मीति मोक्षाय नान्यः पन्था विमुक्तये॥ (२३६। ६)

४३८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

सभी तत्त्वज्ञ ज्ञानको सर्वोच्च मानते हैं, इसलिये चित्तका आलम्बन बोधस्वरूप आत्मा ही है। यह आत्मविज्ञान है। यह पूर्ण है, शाश्वत है। जागते, सोते तथा सुषुप्तावस्थामें प्राप्त होनेवाला सुख पूर्ण सुखरूप ब्रह्मका ही एक क्षुद्र अंश समझना चाहिये। जैसे एक मृण्मय वस्तुका (ज्ञान होनेपर) समस्त मृण्मय पदार्थ जान लिया जाता है।

सर्वत्र व्यास शाश्वत तत्त्व ज्ञानस्वरूप ब्रह्म यदि सदा सर्वत्र सभीके हृदयमें विद्यमान नहीं है तो विस्मृत अर्थका स्मरण नहीं होना चाहिये पर होता है। ऐसी स्थितिमें यह स्मरण किसको होता है, निश्चित ही चेतन तत्त्वको ही होता है। इसे ही आत्मा, ब्रह्म, परमात्मा आदिके रूपमें स्वीकार किया गया है। चेतनतत्त्वकी सत्ता—अणु, अशरीरी अथवा परम व्यापक तत्त्व—किसी भी रूपमें स्वीकार किया जाय, पर स्वीकार करना ही है; अन्यथा प्राणीको सुख-दुःखका अनुभव नहीं हो सकेगा। चेतनतत्त्व प्राणिमात्रके हृदयमें साक्षीरूपसे सदा विद्यमान है, इसीलिये यह उसकी प्रत्येक चेष्टाको जानता रहता है और इस जानकारीका फल यह है कि प्राणीके शुभाशुभ कर्मका फल यथासमय मिलता रहता है। यह ब्रह्मतत्त्व सत्य, ज्ञान एवं आनन्दरूप है तथा अनन्त है। सत्य ज्ञानसे पृथक् नहीं होता, अनन्ततासे पृथक् आनन्द नहीं है। वास्तवमें प्रत्येक जीव सत्य, आनन्द एवं ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही है। स्वयंको ब्रह्मरूपमें जानकर जीव अपने वास्तविक स्वरूप सर्वज्ञताको प्राप्त कर लेता है। जैसे एक हेममणि (पारस)-से अनन्त लौहराशि हेममय हो जाती है, उसी प्रकार ईश (ब्रह्म)-का ज्ञान होनेपर ज्ञानीके द्वारा सकल विश्व जान लिया जाता है, जैसे अन्धकारदोषके कारण रस्सी अपने सत्यस्वरूपमें नहीं दिखायी देती, वैसे ही व्यामोहसे ग्रस्त जीवको आत्माका दर्शन नहीं होता। जिस प्रकार प्रत्यक्ष होनेपर भी द्रव्य दृष्टि-दोषके कारण सही नहीं दिखायी देता है, अपितु वह कुरूप प्रतीत होता है। उसी प्रकार आकाशकी सरूपताके कारण वह आत्मतत्त्व असत्य एवं पृथक् प्रतीत होता है। जैसे रज्जुमें सर्पका और सीपमें रजतका आभास होता है और मृगमरीचिकामें जलका आभास होता है, उसी प्रकार विष्णुमें जगत्की प्रतीति होती है।

जैसे कोई द्विज ग्रहाविष्ट होनेके कारण 'मैं शूद्र हूँ' ऐसा मानता है और ग्रह-बाधा नष्ट होनेके पश्चात् वही व्यक्ति पुनः ध्यान करता हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है, वैसे ही मायासे आच्छन्न जीव यह 'मैं ही हूँ' ऐसा स्वीकार करता है। मायारूपी अज्ञानके समाप्त हो जानेपर पुनः वह अपने स्वरूपमें 'मैं ही ब्रह्म हूँ' ऐसा मान लेता है। जैसे ग्रहके नाश हो जानेपर उसको माननेवाला प्राणी उसे क्रूर ग्रहके रूपमें देखता है, वैसे ही अपने स्वरूपका दर्शन होनेपर मायाके अभावमें उसकी मायिक पदार्थोंसे विरक्ति हो जाती है।

जैसे संसार-चक्र अनादि है, वैसे ही उसके मूल भगवान्की माया भी अनादि है। इस मायाके सत् और असत् दो रूप हैं। व्यवहार-कालमें वह सत् और परमार्थतः असत् है। मायाके कारण ही अज परमात्मा भी अपनी मायाके आवेशसे जगत्के रूपमें परिणत होता है। मायाकी इच्छासे ही पति-पत्नी आदिके रूपमें यह सम्पूर्ण जगत् कल्पित है। अट्ठाईस तत्त्वोंका यह त्रिगुणात्मक जगत् और चौरासी लाख योनियोंके नर और नारियोंकी आकृति मायाके द्वारा ही रचित है। त्रिगुणात्मक अट्ठाईस तत्त्वोंके रूपमें मायाके द्वारा ही खण्डशः विश्वकी सृष्टि होती है। वस्तुतः नाम, रूप और क्रिया आदि जगत्की सत्ता मध्यमें ही है आदि और अन्तमें नहीं। इसलिये व्यवहार-कालमें सत्य

कांड ] गीतासार ४३९

प्रतीत होनेपर भी परमार्थतः यह मिथ्या है। जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें रथ आदिकी सत्ता प्रतीत होती है, किंतु वहाँ उनका अस्तित्व रहता नहीं है। उसी प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें भी वे समृद्धियाँ उस प्राणीके पास नहीं रहतीं। परमार्थतः जैसे जाग्रत्-अवस्था और स्वप्न-अवस्थाके पदार्थोंका भावाभाव प्रतीत होता है, वैसे ही मायिक पदार्थ भी व्यवहार और परमार्थमें सत्-असत् हैं। स्वप्न तथा जागृतिकी स्थितिमें ऐसा ही इस परम ब्रह्मका अस्तित्व है, किंतु सुषुप्तावस्थामें प्राणीका चित्त निश्चल होता है। सभी ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियोंके साथ मन उस आत्माके साथ एकाकारकी स्थितिमें रहता है। अतः उस समय सत्-असत्‌का कुछ भी ज्ञान प्राणीको नहीं होता। इसी निश्चेष्टताको अचल और अद्वैत पद कहते हैं। ऐसा ही उस ब्रह्मका स्वरूप है।

मायाका अस्तित्व अविचारके कारण ही सिद्ध होता है। किंतु विचार करनेपर वह अस्तित्वहीन है। यह ब्रह्मके समान निरन्तर विद्यमान रहती है, ऐसा नहीं है। यह तो मात्र कल्पना है। इस प्रकार उस असत् मायाका आत्मसम्बन्धके कारण सत्यत्व सिद्ध होता है। जो सत्य होता है उसीका अस्तित्व माना जाता है और अस्तित्वके कारण ही पदार्थकी सत्यता स्वीकार की जाती है।

हे नारद! मैं अनन्त हूँ। मेरा ज्ञान भी अनन्त है। मैं अपनेमें पूर्ण हूँ। आत्माके द्वारा अनुभूत अन्तःसुख मैं ही हूँ। सात्त्विक, राजस और तामस गुणसे सम्बन्धित भावोंसे मैं नित्य परे रहता हूँ। मेरी उत्पत्ति अशुद्धतासे नहीं हुई है। मैं शुद्ध हूँ। मैं तो अमृतस्वरूप हूँ। मैं ही ब्रह्म हूँ। मैं प्राणियोंके हृदयमें प्रज्वलित वह ज्योति हूँ, जो दीपकके समान उनके अज्ञानरूपी अन्धकारको विनष्ट करती रहती है। यह आत्मज्ञानकी स्थिति है।

(अध्याय २३६)


गीतासार

श्रीभगवान्‌ने कहा— [हे नारद!] अब मैं गीताका सारतत्त्व कहूँगा, जिसे मैंने पूर्वमें अर्जुनको सुनाया था।

अष्टाङ्गयोगयुक्त और वेदान्तपारङ्गत मनुष्योंके लिये आत्म-कल्याण सम्भव है। आत्म-कल्याण ही परम कल्याण है, उस आत्मज्ञानसे उत्कृष्ट और कुछ भी लाभ नहीं है। आत्मा देहरहित, रूप आदिसे हीन, इन्द्रियोंसे अतीत है। मैं आत्मा हूँ, संसारादि सम्बन्धके कारण मुझे किसी प्रकारका दुःख नहीं है। धूमरहित प्रज्वलित अग्निशिखा जैसे प्रकाश प्राप्त करती है, वैसे ही आत्मा स्वयं प्रदीप्त रहता है। जैसे आकाशमें विद्युत्-अग्निका प्रकाश होता है, वैसे ही हृदयमें आत्माके द्वारा आत्मा प्रकाशित होता है। श्रोत्र आदि इन्द्रियोंको किसी प्रकारका ज्ञान नहीं है। वे स्वयंको भी नहीं जान सकती हैं, परंतु सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, क्षेत्रज्ञ आत्मा ही इन्द्रियोंका दर्शन करता है। जब आत्मा उज्ज्वल प्रदीपके समान हृदयपटलपर प्रकाशित होता है, तब पुरुषोंका पापकर्म नष्ट हो जाता है और ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।

जैसे दर्पणमें दृष्टि डालनेपर अपने द्वारा अपनेको देख सकते हैं, वैसे ही आत्मामें दृष्टि करनेपर इन्द्रियोंको, इन्द्रियोंके विषयोंको तथा पञ्चमहाभूतोंका दर्शन किया जा सकता है। मन, बुद्धि, अहंकार और अव्यक्त पुरुष—इन सभीके ज्ञानके द्वारा संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाना चाहिये। सभी

४४०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

इन्द्रियोंका मनमें अभिनिवेश कर उस मनको अहंकारमें स्थापित करना चाहिये। उस अहंकारको बुद्धिमें, बुद्धिको प्रकृतिमें, प्रकृतिको पुरुषमें एवं पुरुषको परब्रह्ममें विलीन करना चाहिये। इस प्रकार करनेसे ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारकी ज्ञान-ज्योतिका प्रकाश होता है। इससे वह पुरुष मुक्त हो जाता है। नौ द्वारोंसे युक्त, तीनों गुणोंके आश्रय तथा आकाश आदि पञ्चभूतात्मक और आत्मासे अधिष्ठित इस शरीरको जो ज्ञानी व्यक्ति जान लेता है, वही श्रेष्ठ है और वही क्रान्तदर्शी है। सौ अश्वमेध या हजारों वाजपेय यज्ञ इस ज्ञानयज्ञके सोलहवें अंशके फलको भी प्रदान नहीं कर सकते। (अध्याय २३७)


गीतासार

श्रीभगवान्ने पुनः कहा— हे अर्जुन! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा तथा समाधि—यह अष्टाङ्गयोग मुक्तिके लिये कहा गया है। शरीर, मन और वाणीको सदा सभी प्राणियोंकी हिंसासे निवृत्त रखना चाहिये; क्योंकि अहिंसा ही परम धर्म है और उसीसे परम सुख मिलता है—

कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा॥
हिंसाविरामको धर्मो ह्यहिंसा परमं सुखम्। (२३८।२-३)

सदा सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिये। कभी भी अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिये, प्रिय-मिथ्या वचन भी नहीं बोलना चाहिये, यही सनातनधर्म है—

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥ (२३८।४)

चोरीसे या बलपूर्वक दूसरेके द्रव्यका अपहरण करना स्तेय है। इसके विपरीत आचरण करना अर्थात् कभी भी चोरी न करना अस्तेय है। स्तेय-कार्य (चोरी) कभी भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि अस्तेय (चोरी न करना) ही धर्मका साधन है—

यच्च द्रव्यापहरणं चौर्याद्वाथ बलेन वा।
स्तेयं तस्यानाचरणमस्तेयं धर्मसाधनम्॥ (२३८।५)

सदा और सभी अवस्थामें कर्म, मन और वाणीके द्वारा मैथुनका परित्याग करना चाहिये। इसीको ब्रह्मचर्य कहा जाता है। आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक द्रव्यका ग्रहण न करना ही अपरिग्रह है। प्रयत्नपूर्वक परिग्रहका परित्याग करना चाहिये। शौच दो प्रकारके हैं—बाह्य और आभ्यन्तर। मृत्तिका और जल आदिके द्वारा बाह्य एवं भाव-शुद्धिके द्वारा आभ्यन्तर शौच होता है। यदृच्छालाभ अर्थात् अनायास-प्राप्तिसे संतुष्ट होना ही संतोष है। यह संतोष ही सभी प्रकारके सुखका साधन है। मन और इन्द्रियोंकी जो एकाग्रता है, वही परम तप है। कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि व्रतोंके द्वारा देहका शोषण भी तपस्या है। पुरुषोंकी सत्त्वशुद्धिके लिये जो वेदान्त, शतरुद्रीयका पाठ और 'ॐ'कार आदिका जप है, पण्डितजन उसे स्वाध्याय कहते हैं।

कर्म, मन और वाणीसे हरिकी स्तुति, नाम-स्मरण, पूजादि कार्य और हरिके प्रति अनिश्चला भक्तिको ही ईश्वरका चिन्तन कहा जाता है। स्वस्तिकासन, पद्मासन और अर्धसन आदि आसन कहे गये हैं। अपने शरीरगत वायुका नाम प्राण है। उस वायुके निरोधको प्राणायाम कहा जाता है। हे पाण्डव! इन्द्रियाँ असद्विषयोंमें विचरण करती हैं। उनको विषयोंसे निवारित करना चाहिये।

२१७- मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म, मृत्युसे पूर्वकी स्थिति तथा कर्मविपाकका वर्णन

काण्ड ] ब्रह्मगीतासार ४४१


साधुगण इस प्रकारके इन्द्रिय-निरोधको प्रत्याहार कहते हैं। मूर्त और अमूर्त ब्रह्म-चिन्तनको ध्यान कहा जाता है। योगारम्भके समय मूर्तिमान् और अमूर्तरूपमें हरिका ध्यान करना चाहिये।

तेजोमण्डलके मध्यमें शंख, चक्र, गदा तथा पद्मधारी चतुर्भुज—कौस्तुभचिह्नसे विभूषित, वनमाली, वायुस्वरूप जो ब्रह्म अधिष्ठित है ‘मैं वही हूँ’। इस प्रकार मनका लय करके श्रीहरिको धारण करना ही धारणा है। ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ और ‘ब्रह्म ही मैं हूँ’ इस प्रकार देशालम्बन-रहित अहं और ब्रह्म पदार्थका तादात्म्य रूप ही समाधि है। (अध्याय २३८)


ब्रह्मगीतासार

ब्रह्माजीने कहा— [हे नारद!] अब मैं ब्रह्मगीतासारका वर्णन करूँगा, जिसे जानकर संसारसे मुक्ति हो जाती है।

‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस वाक्यार्थका ज्ञान होनेसे मनुष्योंको मोक्षकी प्राप्ति होती है। मैं और ब्रह्म—इन दो पदोंके अर्थका ज्ञान होनेपर वाक्यका ज्ञान होता है। विद्वानोंने इन पदोंके अर्थको वाच्य तथा लक्ष्य-रूपमें दो प्रकारका स्वीकार किया है। वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थसे मिला-जुला वाक्यार्थ ही शुद्ध वाक्यार्थ है। वेदोंके द्वारा अहं शब्दसे एक प्राणपिण्डात्मक और दूसरा प्रत्यग्-रूप आत्मा गृहीत होता है। अव्यानन्द चैतन्य परोक्षज्ञानके सहित है और प्राण-पिण्डात्मक चैतन्य उसका दूसरा पक्ष है। अहं पदकी लक्षणासे आत्माका अल्पज्ञत्वादि दोषरहित शुद्ध आत्मा अर्थ होता है।

जो प्राणपिण्डात्मक अर्थ है वह उसका दूसरा भाग है। इसमें परोक्ष अर्थात् लक्ष्यार्थको देखनेके पश्चात् जैसे उस अर्थकी स्थिति आती है, वैसे ही ब्रह्मपदसे प्राणपिण्डात्मक अर्थकी प्रतीति होती है। निष्ठा तथा परोक्षता आदि अर्थ-प्रतीतिके जो गुण हैं, उनका परित्याग करके ऐसा अर्थ किया जाता है। अद्वयानन्द चैतन्य इस अर्थकी प्राप्ति तो लक्ष्यार्थ ब्रह्मपदसे ही हो जाती है। अद्वयानन्द चैतन्यको लक्ष्यार्थ रूपमें देखकर ‘मैं ब्रह्म हूँ’—इन दोनों पदार्थोंकी सिद्धि ‘ब्रह्म मैं हूँ’ और ‘मैं ब्रह्म हूँ’—इन दो स्थितियोंमें होती है। ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस वाक्यसे स्वानुभूतिका फलार्थ प्राणीको प्राप्त होता है। ऐक्यज्ञान तो निश्चित ही वेदान्तसे होता है। उससे यह अर्थ परे है। ज्ञानसे अज्ञानकी जो निवृत्ति होती है, उस निवृत्तिके बाद प्राणीके चित्तकी लक्ष्यसे जो ऐक्यकी स्थिति उत्पन्न होती है, वही मुक्ति है। (अध्याय २३९)


ब्रह्मगीतासार

श्रीभगवान्ने कहा— [हे पाण्डव!] यह सिद्ध है कि परमात्मा है। उसी परमात्मासे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल तथा जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई है, जो इस जगत्-प्रपञ्चकी जन्मदात्री है। तदनन्तर सत्रह तत्त्व उत्पन्न हुए। वाक्, हाथ, पैर, पायु और उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा तथा नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान नामक पाँच प्रकारकी वायु है। मन और बुद्धिरूप अन्तःकरण है। मन

४४२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

संदेही होता है और बुद्धि निश्चयात्मिका होती है। इसका स्वरूप सूक्ष्म होता है। आत्माके रूपमें भगवान् हिरण्यगर्भ अन्तःकरणमें विद्यमान रहते हैं, वही जीवात्मा है। इस प्रकार प्रपञ्चसे परे उस महाप्राण परमात्माके द्वारा पञ्चमहाभूतोंसे बने शरीरकी उत्पत्ति होती है। उन्हीं पञ्चीकृत पञ्चमहाभूतोंसे ब्रह्माण्ड अर्थात् इस जगत्की सृष्टि हुई थी।

पैर आदिसे युक्त शरीर स्थूल शरीर है, यह तो संसारमें प्रसिद्ध ही है। उसके बाद उनमें पञ्चभूत तत्त्व और उनके कार्योंकी जो स्थिति है, वह स्थूल शरीरसे पूर्वका शरीर है। किंतु उसके शरीरसे जो कुछ उत्पन्न होता है, उसको स्थूल ही कहा जाता है। विद्वान् इस प्रकार परमात्मासे स्थित शरीरको तीन प्रकार मानते हैं। स्वतत्त्वके भेदको बतानेवाले भेदवाक्य 'अहं ब्रह्मास्मि' के अनुसार उन दोनों पूर्वस्थूल और स्थूल शरीरमें वह ब्रह्म ही प्रविष्ट रहता है। जलमें सूर्यकी छाया और बेरके समान उस समय उसकी आकृति होती है, जीवस्वरूप वह ब्रह्म उसमें प्राणादि इन शारीरिक तत्त्वोंको धारण करता है। जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्तिकी अवस्थामें किये जानेवाले कार्योंका जो साक्षी है, वही जीव माना गया है।

जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्तिकी अवस्थाओंसे परे वह ब्रह्म अपने निर्गुण स्वभावमें ही रहता है। उस क्रियाशील शरीरके साथ रहने एवं न रहनेकी स्थितिमें भी वह नित्य शुद्ध स्वभाववाला ही है। उसमें कोई विकृति नहीं आती। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिकी जो तीन अवस्थाएँ हैं, इन अवस्थाओंके कारण वह परमात्मा ही तीन प्रकारका मान लिया जाता है। वह अन्तःकरणमें स्थित रहता है और जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिकी स्थितिमें इन्द्रियोंकी क्रियाशीलताको देखता हुआ वह विकारयुक्त हो जाता है।

हे अर्जुन! अब मैं फलयुक्त क्रिया और कारककी जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति-अवस्थाका वर्णन करता हूँ, उसको सुनें। इन्द्रियोंके द्वारा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन तन्मात्राओंका जब मनुष्यको सत्य-रूपमें ज्ञान होता है, तब उसको मनुष्यकी जाग्रत्-अवस्था कहते हैं। उसको विषयासक्त प्राणीके अन्तःकरणमें जागते हुए संस्कारोंका विश्वास भी कहा जा सकता है। स्वप्न एवं सुषुप्तिकी स्थिति तब होती है, जब विषयापेक्षित कार्यमें लगाये जानेवाले साधनकी चिन्तामें बुद्धि एकाग्र हो जाती है। कारण-अवस्थामें ब्रह्मकी स्थिति है। अतः कालके वशमें होनेके कारण वह जीवात्मा बनकर स्वरूप शरीर स्थित रहता है।

यम-नियमादि अष्टाङ्ग मार्गको यथाक्रम पार करते हुए जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थामें विद्यमान वह जीव साक्षी-रूपमें सब कुछ देखता है। अतः मनुष्यको समाधि आरम्भ करनेके पूर्व ही उस परम लक्ष्यकी अवधारणा अपने चित्तमें बना लेनी चाहिये।

इसके बाद मुमुक्षुके अन्तःकरणमें कैवल्य अर्थात् उस परमात्माके साक्षात्कारकी अवस्था आ जाती है। अतः मोक्षार्थीको उस स्थितिमें पाञ्चभौतिक शरीरके अंदर फँसे हुए क्षेत्रज्ञ जीवात्माके विषयमें विचारकर उसको शरीरसे पृथक् समझना चाहिये, क्योंकि आत्मतत्त्वको शरीरसे अतिरिक्त न माननेपर ब्रह्मतत्त्वसे साक्षात्कार करनेमें अनेक बाधाएँ होती हैं, अतः उन बाधाओंको दूर करना अपेक्षित है, जो सांसारिक विषय-वासनाओंके क्षेत्रसे उत्पन्न हैं। उस स्थितिमें तो समस्त क्षेत्रको ही शून्य कर देना आवश्यक होता है। यह पाञ्चभौतिक शरीर घट आदिके समान है, जैसे घटके अंदर आकाश है, उस समय वह घटाकाश कहा जाता है। किंतु उस भ्रमको दूर कर दिया जाय तो अपने उस समग्र रूपमें वह दिखायी देता है। वैसी ही स्थिति जीवात्माकी है। अतः पाञ्चभौतिक शरीरसे उस मोक्षकी साधनामें जीवात्माको पृथक् समझना चाहिये। जिसमें वह आबद्ध है, उस क्षेत्रको ही भली प्रकारसे शेष करना अनिवार्य है। जिस प्रकार घट मिट्टीसे पृथक् नहीं है, उसमें समवाय सम्बन्ध होता है। उसी प्रकार कुम्भकारके द्वारा प्रयुक्त चक्र,

काण्ड ] गरुडपुराणका माहात्म्य [ ४४३

चीवर आदिके कार्योंसे भी वह पृथक् नहीं है, किंतु पञ्चीकृत इन भौतिक तत्त्वोंकी उत्पत्ति अपञ्चीकृत महाभूत परमात्मासे हुई है। अतः कारण अन्तमें वही परमात्मा ही सिद्ध होगा, जो निर्गुण-निराकार अद्वय पञ्चीकृत देहतत्त्वसे परे है। कार्य तो कारणसे पृथक् होता नहीं है। इसलिये कार्य-कारण-सम्बन्धके द्वारा वह बात सिद्ध हो जायगी, जो मुमुक्षुके लिये अपेक्षित है। विद्वज्जन इसी क्रिया-व्यतिरेकके द्वारा सूक्ष्म शरीरकी अवधारणाकी बातको पुष्ट करते हैं।

अपञ्चीकृत महाभूतोंसे सूक्ष्मशरीर पृथक् नहीं है। जैसे आधार पृथ्वीके बिना नहीं होता है, वैसे ही वह पृथ्वी उसके आधारके बिना नहीं रहती है। यह आधार तो तेज अर्थात् अग्नि है, जो वायुके बिना रहता है। वह वायु आकाशके बिना, आकाश उस सत्-मायाच्छिन्न ब्रह्मके बिना और वह मायारहित शुद्ध ब्रह्म आकाशके बिना नहीं रहता है। ध्यानकी ऐसी अवस्थामें पहुँचनेपर ही प्राणीके हृदयमें वह शुद्ध भाव आता है, जो जाग्रत् और स्वप्न आदिकी स्थितिमें उद्भूत नहीं होता, जो प्राप्त हुए आत्मज्ञानके अनुरूप जीवत्वके प्रभावसे मुक्त होता है।

ब्रह्मको नित्य शुद्ध, बुद्ध, सत्य तथा अद्वैत कहा जाता है। वह तत्त्व दो शिष्ट पदोंके बीच स्थित है। उसको ब्रह्मवाचक शब्द 'ॐ'कार कहते हैं। इसमें उकार और अकार दो स्वर एवं मकार एक अनुनासिक व्यञ्जनवर्ण है। इनसे बना हुआ वह पद सामान्य नहीं, अपितु महामन्त्र है, जो अद्वितीय है। 'ब्रह्म मैं हूँ' या 'मैं ब्रह्म हूँ'—ये दोनों वाक्य मनमें ज्ञान और अज्ञान दोनोंको बढ़ानेवाले हैं।

यह आत्मतत्त्व परमज्योतिःस्वरूप है। यह चिदानन्द है। यह सत्य ज्ञान और अनन्त है। यही तत्त्वमसि है। ऐसा वेदोंका भी कथन है। 'मैं ब्रह्म हूँ।' सांसारिक विषयोंसे जो परे रहता है वही मैं निर्लिप्त देव हूँ। जो सर्वत्रगामी परमात्मा है वही मैं हूँ। जो आदित्यस्वरूप देवदेवेश हैं वही मैं हूँ। अरे, मैं तो वही अनादि देवदेवेश्वर परब्रह्म ही हूँ, जिसके आदि और अन्तका ज्ञान किसीको भी नहीं है। यही गीताका सार है। इसीका वर्णन मैंने अर्जुनसे किया था। इसको सुनकर मनुष्य ब्रह्ममें लीन हो सकता है अर्थात् उसको जीवनमुक्ति प्राप्त हो सकती है। (अध्याय २४०)


गरुडपुराणका माहात्म्य

भगवान् हरिने कहा— हे रुद्र! मैंने 'गरुडपुराण'का वह सारभाग आपको सुना दिया, जो भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। यह विद्या, यश, सौन्दर्य, लक्ष्मी, विजय और आरोग्यादिका कारक है। जो मनुष्य इसका पाठ करता है या सुनता है, वह सब कुछ जान जाता है और अन्तमें उसको स्वर्गकी प्राप्ति होती है।

ब्रह्माजीने कहा— हे व्यास! मैंने मुक्तिप्रदायक ऐसे महापुराणको भगवान् विष्णुसे सुना था।

व्यासजीने कहा— सूतजी! भगवान् विष्णुसे इस महापुण्यदायक गरुडपुराणको सुनकर ब्रह्माजीने दक्षप्रजापति, नारद तथा हम सभीको सुनाया और स्वयं उस परात्पर ब्रह्मका ध्यान करते हुए वे वैष्णव पदको प्राप्त हुए। मैंने भी तुम्हें और तुमने शौनकादिको इस सर्वश्रेष्ठ पुराणको सुनाया, जिसे सुनकर सर्वज्ञ बना व्यक्ति अपने अभीष्टको प्राप्त करके अन्तमें ब्रह्मपदका लाभ लेता है। भगवान् विष्णुने गरुडको सारतमभाग सुनाया था, इसलिये यह गरुडके लिये कथित सारतत्त्व 'गरुडमहापुराण'के नामसे प्रसिद्ध हो गया। यह महासारतत्त्व है। यह प्राणीको धर्म, काम, धन और मोक्षादि सभी फलोंको देनेवाला है।

सूतजीने कहा— हे शौनक! आपको मैंने उस श्रेष्ठतम गरुडमपुराणको सुना दिया है, जिस शुभ पुराणको भगवान् व्यासने ब्रह्मासे सुनकर बहुत

४४४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचारकाण्ड ]

समय पहले मुझको सुनाया था। व्यासरूप भगवान् हरिने प्रारम्भमें जो मात्र एक वेद था, उसे चार भागोंमें विभाजित किया और अष्टादश महापुराणोंकी रचना की। उन पुराणोंको महाराज शुकदेवजीने मुझे सुनाया। हे शौनक ! आपके पूछनेपर इस श्रेष्ठ गरुडपुराणको मैंने मुनियोंके सहित आपको सुनाया।

जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस महापुराणका पाठ करता है, सुनता है अथवा सुनाता है, इसको लिखता है, लिखाता है, ग्रन्थके ही रूपमें इसे अपने पास रखता है तो वह यदि धर्मार्थी है तो उसे धर्मकी प्राप्ति होती है, यदि वह अर्थका अभिलाषी है तो अर्थ प्राप्त करता है। यदि वह कामी है तो उसकी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और यदि वह मोक्ष प्राप्त करनेका इच्छुक है तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है। मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, वह सब इस गरुडमहापुराणको सुननेसे प्राप्त हो जाता है।

जो मनुष्य इस महापुराणका पाठ करता है, वह अपने समस्त अभीष्टको सिद्ध करके अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लेता है। इस पुराणके एक श्लोकका एक चरण भी पढ़कर मनुष्य पापरहित हो जाता है। जिस व्यक्तिके घरमें यह महापुराण रहता है, उसको इसी जन्ममें सब कुछ प्राप्त हो जाता है। जिस मनुष्यके हाथमें यह गरुडमहापुराण विद्यमान है, उसके हाथमें ही नीतियोंका कोश है। जो प्राणी इस पुराणका पाठ करता है या इसको सुनता है वह भोग और मोक्ष दोनोंको प्राप्त कर लेता है।

इस महापुराणको पढ़ने एवं सुननेसे मनुष्यके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि हो जाती है। इस महापुराणका पाठ करके या इसे सुन करके पुत्रार्थी पुत्र, कामार्थी काम, विद्यार्थी विद्या, विजिगीषु विजय प्राप्त कर लेता है तथा ब्रह्महत्यादिसे युक्त पापीका पाप नष्ट हो जाता है, वन्ध्या स्त्री पुत्र, कन्या सज्जन पति, क्षेमार्थी क्षेम तथा भोग चाहनेवाला भोग प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार मङ्गलकी कामनासे प्रेरित व्यक्ति अपना मङ्गल, गुणोंका इच्छुक व्यक्ति उत्तम गुण, काव्य करनेका अभिलाषी मनुष्य कवित्वशक्ति, सारतत्त्व चाहनेवाला सार, ज्ञानार्थी ज्ञान प्राप्त करता है।

पक्षिश्रेष्ठ गरुडके द्वारा कहा गया यह गरुडमहापुराण धन्य है। यह सबका कल्याण करनेवाला है। जो मनुष्य इस महापुराणके एक भी श्लोकका पाठ करता है, उसकी अकालमृत्यु नहीं होती। इसके मात्र आधे श्लोकका पाठ करनेसे निश्चित ही दुष्ट शत्रुका क्षय होता है। नैमिषारण्यमें ऋषियोंके द्वारा आयोजित यज्ञमें सूतजी महाराजसे इस महापुराणको सुन करके स्वयं शौनक मुनिने उन्हीं गरुडध्वज भगवान् विष्णुकी कृपासे मुक्तिका लाभ प्राप्त किया था। (अध्याय २४१)

॥ गरुडपुराणान्तर्गत आचारकाण्ड समाप्त ॥

धर्मकाण्ड — प्रेतकल्प (उत्तरखण्ड)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

धर्मकाण्ड—प्रेतकल्प

वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्योंके बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम

श्रीगणेशजीको नमस्कार है। 'ॐ' कारसे युक्त भगवान् वासुदेव हरिको प्रणाम है।

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥

भगवान् श्रीनारायण, नरोत्तम नर एवं भगवती श्रीसरस्वती देवीको नमस्कार करके पुराणका वाचन करना चाहिये। जिन भगवान्‌का धर्म ही मूल है, वेद जिनका स्कन्ध है, पुराणरूपी शाखासे जो समृद्ध हैं, यज्ञ जिनके पुष्प हैं, मोक्ष जिनका फल है—ऐसे भगवान् मधुसूदनरूपी कल्पवृक्षकी जय हो।

देवक्षेत्र नैमिषारण्यमें शौनकादिक श्रेष्ठ मुनियोंने सुखपूर्वक विराजमान श्रीसूतजी महाराजसे कहा—

हे श्रीसूतजी! आप श्रीवेदव्यासजीकी कृपासे सब कुछ जानते हैं। अतः आप हम सभीके संदेहका निवारण करें। कुछ लोगोंका कहना है कि जिस प्रकार कोई जोंक तिनकेसे तिनकेका सहारा लेकर आगे बढ़ती है, उसी प्रकार शरीरधारी जीव एक शरीरके बाद दूसरे शरीरका आश्रय ग्रहण करता है। दूसरे विद्वानोंका कहना है कि प्राणी मृत्युके पश्चात् यमराजकी यातनाओंका भोग करता है, तदनन्तर उसको दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है—इन दोनोंमें क्या सत्य है? यह हमें बतानेकी कृपा करें।

सूतजीने कहा—हे महाभाग! आप लोगोंने अच्छा प्रश्न किया है। आप लोगोंको संदेह हो यह असम्भव है। आप लोगोंने तो लोकहितसे प्रेरित होकर ही ऐसा प्रश्न किया है। हे विप्रगणो! मैं आप सबके हृदयमें अवस्थित उस संदेहको भगवान् श्रीकृष्ण और गरुडके बीच हुए संवादके द्वारा दूर करूँगा। सर्वप्रथम मैं उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ, जिनका आश्रय लेकर मनुष्य इस भवसागरको एक क्षुद्र नदीकी भाँति अनायास ही पार कर जाते हैं।

४४६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

हे मुनियो ! एक बार विनतापुत्र गरुडके हृदयमें इस ब्रह्माण्डके सभी लोकोंको देखनेकी इच्छा हुई। अतः हरिनामका उच्चारण करते हुए उन्होंने सभी लोकोंका भ्रमण किया। पाताल, पृथ्वीलोक तथा स्वर्गलोकका भ्रमण करते हुए वे पृथ्वीलोकके दुःखसे अत्यन्त दुःखित एवं अशान्तचित्त होकर पुनः वैकुण्ठलोक वापस आ गये।

वैकुण्ठलोकमें न रजोगुणकी प्रवृत्ति है, न तमोगुणकी ही प्रवृत्ति है, [मृत्युलोकके समान] रजोगुण तथा तमोगुणसे मिश्रित सत्त्वगुणकी भी प्रवृत्ति वहाँ नहीं है। वहाँ केवल शुद्ध सत्त्वगुण ही अवस्थित रहता है। वहाँ माया भी नहीं है, वहाँ किसीका विनाश नहीं होता। वहाँ राग-द्वेष आदि षड्विकार भी नहीं हैं। वहाँ देव और असुर-वर्गद्वारा पूजित श्यामवर्णकी सुन्दर कान्तिसे सुशोभित राजीवलोचन भगवान् विष्णुके पार्षद विराजमान रहते हैं, जिनके शरीर पीतवसन और मनोहारी आभूषणोंसे विभूषित हैं और मणियुक्त स्वर्णके अलङ्करणोंसे सुशोभित हैं। भगवान्‌के वे सभी पार्षद चार-चार भुजाओंसे युक्त हैं। उनके कानोंमें कुण्डल और सिरपर मुकुट है। उनका वक्षःस्थल सुन्दर पुष्पोंकी मालासे सुशोभित है। मनको मोहित करनेवाली अप्सराओंसे युक्त, महात्माओंके चमकते हुए विमानोंकी पंक्तिकी कान्तिसे वे सभी सदा भास्वरित होते रहते हैं। वहाँ नाना प्रकारके वैभवोंसे समन्वित लक्ष्मी प्रसन्नतापूर्वक भगवान् श्रीहरिके चरणोंकी पूजा करती रहती हैं।

गरुडजीने वहाँ देखा कि श्रीहरि झूलेपर विराजमान हैं। सखियोंद्वारा स्तुत्य लक्ष्मीजी झूलेमें स्थित भगवान्‌की स्तुति कर रही हैं। अपने लाल-लाल बड़े-बड़े नेत्रोंसे युक्त प्रसन्नमुख देवोंके अधिपति, श्रीपति, जगत्पति और यज्ञपति भगवान् श्रीहरि अपने नन्द, सुनन्द आदि प्रधान पार्षदोंको देख रहे थे। उनके सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और वक्षःस्थल श्रीसे सुशोभित था। वे पीताम्बरसे विभूषित थे। उनकी चार भुजाएँ थीं। प्रसन्नमुद्रामें हँसता हुआ उनका मुख था। बहुमूल्य आसनपर विराजमान वे हरि उस समय अपनी अन्यान्य शक्तियोंसे आवृत थे। प्रकृति, पुरुष, महत्, अहंकार, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चज्ञानेन्द्रिय, मन, पञ्चमहाभूत तथा पंचतन्मात्राओंसे निर्मित शरीरवाले अपने ही स्वरूपमें रमण करते हुए उन भगवान् हरिका दर्शन करनेसे विनतासुत गरुडका अन्तःकरण आनन्दविभोर हो उठा। उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। उनके नेत्रोंसे प्रेमाश्रुओंकी धारा बहने लगी। आनन्दमग्न होकर उन्होंने प्रभुको प्रणाम किया। प्रणाम करते हुए अपने वाहन गरुडको देखकर भगवान् विष्णुने कहा—हे पक्षिन्! आपने इतने दिनोंमें इस जगत्‌की किस भूमिका परिभ्रमण किया है?

गरुडने कहा—भगवन्! आपकी कृपासे मैंने समस्त त्रिलोकीका परिभ्रमण किया है। उनमें स्थित जगत्‌के सभी स्थावर और जङ्गम प्राणियोंको भी देखा। हे प्रभो! यमलोकको छोड़कर पृथ्वीलोकसे सत्यलोकतक सब कुछ मेरे द्वारा देखा जा चुका है। सभी लोकोंकी अपेक्षा भूर्लोक प्राणियोंसे अधिक परिपूर्ण है। सभी योनियोंमें मानवयोनि ही भोग और मोक्षका शुभ आश्रय है। अतः सुकृतियोंके लिये ऐसा लोक न तो अभीतक बना है और न भविष्यमें बनेगा। देवता लोग भी इस लोककी प्रशंसामें गीत गाते हुए कहते हैं—‘जो लोग पवित्र भारतकी भूमिमें जन्म लेकर निवास करते हैं, वे धन्य हैं। देवता लोग भी स्वर्ग एवं अपवर्गरूप फलकी प्राप्तिके लिये पुनः भारतभूमिमें मनुष्यरूपमें जन्म लेते हैं'—

गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गस्य फलार्जनाय भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥
(१।२७)

प्रेतकल्प ] वैकुण्ठलोकका वर्णन एवं प्रेतकल्पका उपक्रम ४४७


हे प्रभो! आप यह बतानेकी कृपा करें कि मृत्युको प्राप्त हुआ प्रेत किस कारण पृथ्वीपर डाल दिया जाता है?

उसके मुखमें पञ्चरत्न<sup></sup> क्यों डाला जाता है? मरे हुए प्राणीके नीचे लोग कुश किसलिये बिछा देते हैं? उसके दोनों पैर दक्षिण दिशाकी ओर क्यों कर दिये जाते हैं? मरनेके समय मनुष्यके आगे पुत्र-पौत्रादि क्यों खड़े रहते हैं? हे केशव! मृत्युके समय विविध वस्तुओंका दान एवं गोदान किसलिये दिया जाता है? बन्धु-बान्धव, मित्र और शत्रु आदि सभी मिलकर क्यों क्षमा-याचना करते हैं? किससे प्रेरित होकर लोग मृत्युकालमें तिल, लोहा, स्वर्ण, कपास, नमक, सप्तधान्य<sup></sup>, भूमि और गौका दान देते हैं? प्राणी कैसे मरता है और मरनेके बाद कहाँ जाता है? उस समय वह आतिवाहिक शरीर (निराधार-रूपमें आत्माको वहन करनेवाले शरीर)-को कैसे प्राप्त करता है? अग्नि देनेवाले पुत्र और पौत्र उसे कन्धेपर क्यों ले जाते हैं? शवमें घृतका लेप क्यों किया जाता है? उस समय एक आहुति देनेकी परम्परा कहाँसे चली है? शवको भूमिस्पर्श किसलिये करवाया जाता है? स्त्रियाँ उस मरे हुए व्यक्तिके लिये क्यों विलाप करती हैं? शवके उत्तर दिशामें 'यमसूक्त'का पाठ क्यों किया जाता है? मरे हुए व्यक्तिको पीनेके लिये जल एक ही वस्त्र धारण करके क्यों दिया जाता है? उस समय सूर्य-बिम्ब-निरीक्षण, पत्थरपर स्थापित यव, सरसों, दूर्वा और नीमकी पत्तियोंका स्पर्श करनेका विधान क्यों है? उस समय स्त्री एवं पुरुष दोनों नीचे-ऊपर एक ही वस्त्र क्यों धारण करते हैं? शवका दाह-संस्कार करनेके पश्चात् उस व्यक्तिको अपने परिजनोंके साथ बैठकर भोजनादि क्यों नहीं करना चाहिये? मरे हुए व्यक्तिके पुत्र दस दिनके पूर्व किसलिये पिण्डोंका दान देते हैं? चबूतरे (वेदी)-पर पके हुए मिट्टीके पात्रमें दूध क्यों रखा जाता है? रस्सीसे बँधे हुए तीन काष्ठ (तिगोड़िया)-के ऊपर रात्रिमें गाँवके चौराहेपर एकान्तमें वर्षपर्यन्त प्रतिदिन दीपक क्यों दिया जाता है? शवका दाह-संस्कार तथा अन्य लोगोंके साथ जल-तर्पणकी क्रिया क्यों की जाती है? हे भगवन्! मृत्युके बाद प्राणी आतिवाहिक शरीरमें चला जाता है, उसके लिये नौ पिण्ड देने चाहिये, इसका क्या प्रयोजन है? किस विधानसे पितरोंको पिण्ड प्रदान करना चाहिये और उस पिण्डको स्वीकार करनेके लिये उनका आवाहन कैसे किया जाय?

हे देव! यदि ये सभी कार्य मरनेके तुरंत बाद सम्पन्न हो जाते हैं तो फिर बादमें पिण्डदान क्यों किया जाता है? पूर्व किये गये पिण्डदानके बाद पुनः पिण्डदान या अन्य क्रियाओंको करनेकी क्या आवश्यकता है? दाह-संस्कारके बाद अस्थि-संचयन और घट फोड़नेका विधान क्यों है? दूसरे दिन और चौथे दिन साग्निक द्विजके स्नानका


१-सोना, चाँदी, मोती, लाजावर्त (लाजवर्द) तथा मूँगा—ये पाँच पञ्चरत्न कहलाते हैं।
२-जौ, धान, तिल, कँगनी, मूँग, चना तथा साँवा—ये सप्तधान्य कहलाते हैं।