भारतकोश
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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१८९- तर्पण-विधिको वर्णन

३८४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

साफ करे और अवशिष्ट दतुअनको किसी एकान्त स्थानमें छोड़ दे। तदनन्तर भली प्रकारसे आचमनकर मुखशोधन करे। अमावास्या, षष्ठी, नवमी, प्रतिपदा तिथि तथा रविवारके दिन दतुअन नहीं करनी चाहिये; क्योंकि ये सभी दिन इस कार्यके लिये निषिद्ध माने गये हैं। दतुअनके न होनेपर तथा निषिद्ध तिथिके आ जानेपर मनुष्यको बारह कुल्ला जलके द्वारा मुखको पवित्र कर लेना चाहिये।

दृष्ट और अदृष्ट दोनों प्रकारका हित-सम्पादन होनेके कारण प्रातःकालके स्नानकी प्रशंसा की गयी है। जो व्यक्ति शुद्धात्मा है, जो प्रातःकाल स्नान करता है, वह जपादिक समस्त (ऐहिक और पारलौकिक सुख प्रदान करनेवाली) क्रियाओंको सम्पन्न करनेका अधिकारी है। शरीर अत्यन्त मलिन है। उसमें स्थित नवछिद्रोंसे सदैव मल निकलता ही रहता है। अतः प्रातःकालका स्नान शरीरकी शुद्धिका हेतु, मनको प्रसन्न रखनेवाला तथा रूप और सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला है। यह शोक और दुःखका विनाशक है। अतः मनुष्य प्रातःकाल गङ्गास्नानके समान ही स्नानकी क्रिया सम्पन्न करे। ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षकी हस्त नक्षत्रसे युक्त दशमी तिथिमें दस पापोंको हरण करनेकी सामर्थ्य है। इस पुण्यतिथिमें स्नान करनेसे 'दान न देनेका पाप, विरुद्ध आचरण, हिंसा, परदारोपसेवन, कटु और झूठ भाषण, चुगलखोरी, असम्बद्ध प्रलाप, परद्रव्यापहरण और मनसे अनिष्टचिन्तन करनेसे होनेवाला पाप—इन पापोंके विनाशके लिये आज मैं गङ्गा-स्नान कर रहा हूँ'—यह संकल्प लेकर मनुष्य प्रातःकाल स्नान करे। वानप्रस्थी तथा गृहस्थको प्रातःकाल संक्षिप्त स्नान करना चाहिये। संन्यासीके लिये दिनकी तीनों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) संध्याओंमें स्नान करना अपेक्षित है। ब्रह्मचारीको सकृत्<sup></sup> स्नान करना चाहिये। आचमन करके, तीर्थोंका आवाहन करके, अव्यय भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिये।

शास्त्रोंमें तीन करोड़ मन्देह नामक राक्षस माने गये हैं। वे दुरात्मा राक्षस सदैव प्रातःकाल उदित हो रहे सूर्यदेवको खा जानेकी इच्छा करते हैं। अतः (सूर्योदयसे पूर्व) स्नान करके संध्योपासनकर्म नहीं करना सूर्यदेवका ही घातक है। जो लोग यथाविधि स्नानकर यथाधिकार संध्योपासन करते हैं, वे मन्त्रसे पवित्र किये गये अनलरूपी अर्घ्य (जल)-से उन मन्देह राक्षसोंको जला देते हैं।

दिन और रात्रिका जो संधिकाल है, वही संध्याकाल (४५ मिनट) होता है। यह संध्याकाल सूर्योदयसे पूर्व दो घड़ीपर्यन्त रहता है। संध्या-कर्मके समाप्त हो जानेपर यथाधिकार स्वयं हवन-कार्य करना चाहिये। स्वयं हवन करनेसे जितना फल प्राप्त होता है, उतना अन्य किसीके द्वारा करानेसे नहीं होता। ऋत्विक्, पुत्र, गुरु, भाई, भाँजा और दामादके द्वारा यह कार्य हो सकता है। क्योंकि उन लोगोंके द्वारा किया गया हवन, स्वयंका ही माना गया है।

गार्हपत्य-अग्निको ब्रह्मा, दक्षिणाग्निको शिव और आहवनीय-अग्निको विष्णु तथा कुमार<sup></sup>को सत्यस्वरूप कहा जाता है। यथोचित समयपर हवन करके सूर्यमन्त्रका जप करना चाहिये। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर सावित्री और प्रणव (ॐकार)-मन्त्रका जप करना चाहिये। प्रणव, सप्त-व्याहृति


<sup></sup>सकृत् स्नानका तात्पर्य है—दण्डवत् स्नान। अर्थात् जैसे दण्ड जलमें डालकर निकाल लिया जाता है, वैसे ही स्नान करना चाहिये। गृहस्थकी तरह सुखपूर्वक स्नान नहीं करना चाहिये। सायं, प्रातः अवश्य करणीय अग्निहोत्र आदिके लिये दोनों समय (सायं-प्रातः) स्नानका विधान ब्रह्मचारीके लिये है। (मनु० २। १७६ कुल्लूक भट्टकी टीका)
<sup></sup>यहाँ कुमारका अर्थ हवनकर्ता (ब्रह्मचारी)-को समझना चाहिये।

१९०- बलिवैश्वदेवनिरूपण

काण्ड ] | सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण | ३८५

और त्रिपदा सावित्री मन्त्रका निरन्तर यथासमय नियतरूपसे जप करनेसे संसारमें किसी भी प्रकारका भय नहीं रहता है। जो उपासक प्रातःकाल उठकर नित्य गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह कमलपत्रकी भाँति पापसे संलिप्त नहीं होता। (देवी गायत्रीका स्वरूप इस प्रकार है—)

श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा।
अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा॥ (२१३। ७०)

अर्थात् गायत्रीदेवी श्वेतवर्णवाली हैं, कौशेय (रेशमी)-वस्त्र तथा अक्ष (माला) एवं सूत्र (यज्ञसूत्र—यज्ञोपवीत)-से विभूषित होकर सुन्दर पद्मासनपर विराजमान रहती हैं। इसी रूपमें विधिवत् ध्यान करके 'तेजोसि०'<sup></sup> इस यजुर्वेदके मन्त्रसे आवाहनकर गायत्रीदेवीकी उपासना करनी चाहिये। प्राचीनकालमें देववर्ग तथा मन्त्रोंका साक्षात्कार करनेकी इच्छा रखनेवाले ऋषिगण यजुर्वेदके इसी मन्त्रका प्रयोग करते थे। अतः सूर्यमण्डलके मध्य विराजमान तथा ब्रह्मलोकमें भी निवास करनेवाली देवीका आवाहन करके गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये। तत्पश्चात् नमस्कार करके उनका (गायत्रीदेवीका) विसर्जन करना चाहिये। पूर्वाह्नकालमें देवताओंका पूजन करना चाहिये। भगवान् विष्णुसे बढ़कर अन्य कोई देव नहीं है। अतएव साधकको सदैव उनकी पूजा करनी चाहिये। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन देवोंके प्रति पृथक्-भाव (भेदबुद्धि) न रखे।

इस संसारमें आठ मङ्गल हैं—ब्राह्मण, गौ, अग्नि, हिरण्य (सोना), घृत, सूर्य, जल और राजा। सदैव इनका दर्शन एवं पूजन करना चाहिये और यथासम्भव इन्हें अपने दाहिने करके ही चलना चाहिये। ब्राह्मण पहले वेदका अध्ययन करे, उसके बाद चिन्तन, अभ्यास तथा जप करके उसका दान शिष्योंको दे, अर्थात् अपने शिष्योंको वेदाध्ययन कराये। वेदाभ्यासका यही पाँच प्रकार है।

वेदार्थ, यज्ञकर्मप्रतिपादक शास्त्र और धर्मशास्त्रकी पुस्तकोंका पारिश्रमिक देकर जो लेखनकार्य कराता है और उसे योग्य अधिकारीको प्रदान करता है, वह वैदिक (वेदमें उक्त) लोकको प्राप्त करता है। जो इतिहास-पुराणके ग्रन्थोंको लिखकर दान देता है, वह ब्रह्म (वेद)-दानसे होनेवाले पुण्यका दुगुना पुण्य प्राप्त करता है।

दिनके तीसरे भागमें अपने पोष्य वर्गके प्रयोजनको पूर्ण करना चाहिये। माता, पिता, गुरु, भ्राता, प्रजा, दीन, दुःखी, आश्रितजन, अभ्यागत<sup></sup>, अतिथि<sup></sup> और अग्नि—ये पोष्य वर्ग कहे गये हैं। पोष्य वर्गका भरण-पोषण करना स्वर्गका प्रशस्त साधन है। अतः मनुष्यको पोष्य वर्गका पालन-पोषण प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। इस संसारमें उसी व्यक्तिका जीवन श्रेष्ठ है, जो बहुतोंके जीवनका साधक बनता है। अर्थात् बहुतोंका पालन-पोषण करता है। जो मात्र अपने भरण-पोषणमें लगे रहते हैं, वे जीवित रहते हुए भी मरे हुएके समान हैं; क्योंकि अपना पेटपालन तो कुत्ता भी करता है।<sup></sup>


१-तेजोऽसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि बलमसि बलं मयि धेह्योजोऽस्योजो मयि धेहि मन्युरसि मन्युं मयि धेहि सहोऽसि सहो मयि धेहि॥ (शु०यजु० १९।९)
२-जो अकस्मात् अपने घर आ जाय वह अभ्यागत है।
३-अतिथि उस सन्तको कहते हैं जो तिथि, पर्व, उत्सव आदिका विवेक नहीं करता है और सदा चलता ही रहता है। यहाँ यमका वचन द्रष्टव्य है—तिथि पर्वोत्सवाः सर्वे त्यक्ता येन महात्मना। सोऽतिथिः सर्वभूतानां शेषानभ्यागतान् विदुः॥
४-माता पिता गुरुर्भ्राता प्रजा दीनाः समाश्रिताः॥
अभ्यागतोऽतिथिश्चाग्निः पोष्यवर्गा उदाहृताः। भरणं पोष्यवर्गस्य प्रशस्तं स्वर्गसाधनम्॥
भरणं पोष्यवर्गस्य तस्माद्यत्नेन कारयेत्। स जीवति वरश्चैको बहुभिर्योपजीव्यति॥
जीवन्तो मृतकास्त्वन्ये पुरुषाः स्वोदरम्भराः। स्वकीयोदरपूर्तिश्च कुक्कुरस्यापि विद्यते॥ (२१३। ७९–८२)

१९१- संध्याविधि

३८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

व्यवहारमें अर्थका महत्त्व है। जैसे नदियोंके मूल पर्वत हैं, वैसे ही समस्त कार्योंका मूल अर्थ है; इसीलिये अर्थको उत्पन्न करना एवं बढ़ाना आवश्यक होता है। अर्थ उसे ही कहते हैं, जो हमारे सभी कार्योंकी सम्पन्नतामें अनिवार्यरूपसे उपयोगी हो। इसी दृष्टिसे सभी रत्नोंकी निधि पृथ्वी, धान्य, पशु, स्त्रियाँ आदि अर्थ माने जाते हैं। इस तरह अर्थका महत्त्व होनेपर भी इसके अर्जनमें संयम आवश्यक है; अतएव विशेषकर ब्राह्मणको अपनी जीविकाके लिये अर्थार्जन करते समय यह ध्यानमें रखना चाहिये कि यदि आपत्तिकाल नहीं है तो किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करना पड़े अथवा कम-से-कम द्रोह करना पड़े।

धन तीन प्रकारका माना गया है—शुक्ल, शबल (मिश्रित) और कृष्ण। उस धनके सात विभाग हैं। सभी वर्णोंको प्राप्त होनेवाला धन तीन प्रकारका होता है—१-दायभागके अनुसार वंशपरम्परासे यथाधिकार प्राप्त धन, २-प्रेमके कारण किसीके द्वारा दिया गया धन और ३-यथाविधि विवाहित पत्नीके साथ प्राप्त धन। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणके लिये तीन प्रकारके विशेष धन हैं— याजन (यज्ञ करानेसे प्राप्त), अध्यापनसे प्राप्त तथा विशुद्ध प्रतिग्रह (सत्पात्रसे लिया गया दान)। क्षत्रिय वर्णका विशेष धन भी तीन प्रकारका कहा गया है—करसे प्राप्त धन उसका पहला धन है, दूसरा धन दण्डद्वारा प्राप्त तथा तीसरा धन वह है जो विजयद्वारा प्राप्त हो। वैश्यका भी तीन प्रकारका विशेष धन है—खेतीसे प्राप्त, गोपालनसे प्राप्त तथा व्यापारसे प्राप्त। शूद्रका विशेष धन एक ही प्रकारका है, जो उपर्युक्त वर्णोंकी कृपासे उसको प्राप्त होता है। आपत्तिकालमें ब्राह्मण एवं क्षत्रिय स्वयं ब्याजसे, खेतीसे तथा व्यापारसे धन अर्जित कर सकते हैं, आपत्तिकालमें ऐसा करनेपर पाप नहीं होता है।

ऋषियोंके द्वारा जीवनयापनके लिये बहुत-से उपाय बताये गये हैं, उनमें कुसीद (ब्याज) सभी वर्णोंके लिये बताये गये विशेष उपायोंकी अपेक्षा अधिक है। अनावृष्टि, राजभय तथा चूहा आदि जीव-जन्तुओंके उपद्रवोंसे कृषि आदिमें बाधा आ जाती है, किंतु कुसीद-वृत्तिमें यह बाधा नहीं आती। शुक्लपक्ष हो, कृष्णपक्ष हो, रात्रि हो, दिन हो, गर्मी हो, वर्षा अथवा शीत हो—सभी दशाओंमें कुसीदसे होनेवाली धनवृद्धि रुकती नहीं है। अर्थात् सूदपर दिया गया धन बढ़ता ही रहता है। नाना प्रकारके व्यापारिक कार्योंमें संलग्न वणिक्-जनोंकी जो धनकी अभिवृद्धि दूसरे देशमें जानेसे होती है, वही अभिवृद्धि कुसीद-वृत्ति करनेसे घरमें बैठे-ही-बैठे प्राप्त हो जाती है।

शास्त्रसम्मत विधिसे अर्जित धनके लाभांशसे सभी लोगोंको पितृगण, देवगण तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। ये संतुष्ट होकर धन-अर्जनमें अज्ञानवश हुए दोषको निःसंदेह शान्त कर देते हैं। जो वणिक् ब्याजके द्वारा (धनार्जनके लिये) वस्त्र, गौ तथा स्वर्णादि देता है और जो किसान अन्न, पेय पदार्थ, सवारी, शय्या तथा आसन आदि (ब्याज-वृत्तिमें) देता है, वह (उपार्जित धनका) बीसवाँ भाग और पशु-स्वर्णादिका १००वाँ भाग राजाको देकर शेष बचे हुए धनके चतुर्थांशसे जौ (यव) आदि विभिन्न वस्तुओंका सञ्चय करे। दो-चौथाई अर्थात् आधे धनका उपयोग अपने भरण-पोषण तथा नित्य-नैमित्तिक कार्यके लिये होना चाहिये। जो एक-चौथाई धन शेष बचे, उसका उपयोग मूलधनकी वृद्धिमें करना चाहिये।

विद्या, शिल्प, वेतन, सेवा, गोरक्षा, व्यापार, कृषि, वृत्ति*, भिक्षा और ब्याज—ये दस जीवनयापनके


* वृत्ति—सहायताके रूपमें प्रतिमास दी जानेवाली धनराशि।

काण्ड ] सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण ३८७

साधन हैं। ब्राह्मणको सत्पात्र व्यक्तिसे दानरूपमें प्राप्त धनसे अपना निर्वाह करना चाहिये। क्षत्रिय वर्ण अपने शस्त्रास्त्रोंसे धनार्जन करे। वैश्य वर्ण न्यायोचित ढंगसे धनसंग्रह कर अपना कार्य पूर्ण करे और शूद्र सेवा-भावसे धन अर्जितकर अपने सभी कार्योंको सम्पन्न करे। प्रचुर जलराशिसे परिपूर्ण नदी, शाक, मृत्तिका, समिधा, कुश, पलाश, केला आदिके पत्र, अग्निदेवकी आराधनाके उपकरण और ब्रह्मघोष (स्वाध्याय)—ये ब्राह्मणोंके श्रेष्ठतम धन हैं। यदि अयाचित (स्वतःप्राप्त) धनको ब्राह्मण स्वीकार करे तो दोष नहीं है। देवताओोंने ऐसे धनको अमृतके समान कहा है। अतः बिना याचना किये ही आये धनका परित्याग ब्राह्मणको नहीं करना चाहिये।

गुरुके धनका उद्धार करनेकी इच्छासे देवता और अतिथिकी पूजा करते हुए सभीसे प्रतिग्रह लेना चाहिये, पर उसका उपयोग अपनी तुष्टिके लिये नहीं करना चाहिये। साधुसे अथवा असाधुसे भी केवल उसके कल्याणके लिये प्रतिग्रह लेना चाहिये। यदि प्रतिग्रहीता ब्राह्मण (आचारहीन) कर्मनिष्ठ है तो अल्प दोष होगा। यदि निर्गुण है तो दोषमें डूब जायगा। इस प्रकार तस्करवृत्ति (अपने पुण्यको क्षीण करनेवाली वृत्ति)—से अपना भरण करनेके बाद उत्तम द्विजको अपनी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करना चाहिये। दिनके चौथे भागमें मिट्टी, तिल, पुष्प तथा कुशादि सामग्री लाकर प्रकृतिप्रदत्त जलमें स्नान करना चाहिये।

नित्य, नैमित्तिक, काम्य, क्रियाङ्ग, मलापकर्षण, मार्जन, आचमन और अवगाहन—ये आठ प्रकारके स्नान बताये गये हैं। बिना स्नान किया पुरुष जप, अग्नि और हवन आदि करनेका अधिकारी नहीं है। प्रातःस्नान पूजा-पाठ आदि धार्मिक कृत्यके लिये करना चाहिये। इसीको नित्य-स्नान कहा गया है। चाण्डाल, शव, विष्ठा तथा रजस्वला आदिका स्पर्श करनेके पश्चात् जो स्नान किया जाता है, वह नैमित्तिक-स्नान कहलाता है। ज्योतिषशास्त्रके अनुसार पुष्य आदि नक्षत्रोंमें जो स्नानादिक कृत्य किया जाता है, उसे काम्य-स्नान कहते हैं। निष्काम व्यक्तिको इस प्रकारका स्नान नहीं करना चाहिये। जप-होमादिक कृत्योंको सम्पन्न करनेकी इच्छासे प्रेरित होकर अथवा अन्य अनेक पवित्र कृत्य, देवता तथा अतिथि आदिका पूजन करनेकी इच्छासे जो स्नान किया जाता है, उसको क्रियाङ्ग-स्नानके नामसे अभिहित किया गया है। शारीरिक मलको दूर करनेके लिये सरोवर, देवकुण्ड, तीर्थ और नदियोंमें जो स्नान किया जाता है, वह मलापकर्षण-स्नान है। सामान्य जलसे स्नान करनेपर केवल शरीरकी शुद्धि होती है। तीर्थमें स्नान करनेपर विशिष्ट फलकी प्राप्ति होती है। मज्जन (स्नान)—के लिये विहित मन्त्रोंसे मार्जन करनेसे मनुष्यका पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाता है। नित्य, नैमित्तिक, क्रियाङ्ग तथा मलापकर्षण नामक जो स्नान बताये गये हैं, उन स्नानोंको तीर्थका अभाव होनेपर उष्ण जल अथवा अन्य किसी प्रकारसे प्राप्त कृत्रिम जलसे सम्पन्न कर लेना चाहिये।

भूमिसे निकला हुआ जल पवित्र होता है। इस जलकी अपेक्षा पर्वतसे निकलनेवाले झरनेका जल पवित्र होता है। इससे भी बढ़कर पवित्र जल सरोवरका है और उसकी अपेक्षा नदीका जल पवित्र है। नदीके जलकी अपेक्षा भी तीर्थका जल पवित्र है। इन सभी जलोंकी अपेक्षा गङ्गाका जल परम पवित्र है। गङ्गाका श्रेष्ठतम जल तो जीवनपर्यन्त किये गये प्राणीके सभी पापोंका विनाश अतिशीघ्र ही कर देता है। गया तथा कुरुक्षेत्र नामक तीर्थोंके जलसे भी बढ़कर पवित्र एवं पुण्यदायक जल गङ्गाजीका है—

३८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भूमिष्ठादुद्धृतं पुण्यं ततः प्रस्त्रवणोदकम् ॥
ततोऽपि सारसं पुण्यं तस्मान्नादेयमुच्यते ।
तीर्थतोयं ततः पुण्यं गाङ्गं पुण्यं तु सर्वतः ॥
गाङ्गं पयः पुनात्याशु पापमामरणान्तिकम् ।
गयायां च कुरुक्षेत्रे यत्तोयं समुपस्थितम् ॥
तस्मात्तु गाङ्गमपरं जानीयात्तोयमुत्तमम् ।
(२१३ । ११६-११९)

पुत्रजन्म, कतिपय विशिष्ट योग, मकर आदि राशियोंपर सूर्यकी संक्रान्ति तथा चन्द्र और सूर्यग्रहण होनेपर ही रात्रिमें स्नान करना प्रशस्त है। अन्यथा रात्रिमें स्नान नहीं करना चाहिये। प्रतिदिन उषःकालमें, संध्याकालमें और सूर्यका उदय होते ही जो स्नान किया जाता है, वह स्नान प्राजापत्य यज्ञकी भाँति महापातकका नाश करनेवाला है। बारह वर्षतक प्राजापत्य यज्ञ करनेपर जो फल प्राप्त होता है, वह फल श्रद्धापूर्वक एक वर्षतक प्रातःकाल स्नान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति सूर्य और चन्द्र नामक श्रेष्ठ ग्रहोंके समान प्रचुर भोगोंको प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, वह माघ तथा फाल्गुन—इन दो मासोंमें नित्य प्रातःकाल स्नान करे। जो श्रद्धालु माघमास आनेपर प्रातःकाल स्नान करके हविष्यान्न ग्रहण करता है, वह एक ही मासमें अपने महाघोर और अतिपापोंका विनाश कर देता है। माता, पिता, भ्राता, मित्र अथवा गुरु आदिको उद्देश्य बनाकर जो प्रातःकाल स्नान करता है, उसे शास्त्रनिर्दिष्ट पुण्यका द्वादश गुणित अधिक पुण्य प्राप्त होता है। भगवान् विष्णु एकादशी तिथिको आमलक (आँवला)-के समर्पण एवं दानसे विशेषरूपसे तुष्ट होते हैं। लक्ष्मीकी कामना करनेवाले मनुष्यको सर्वदा आमलकसे स्नान करना चाहिये।

सन्ताप, कीर्ति, अल्पायु, धन, मृत्यु, आरोग्य तथा सभी कामनाओंकी पूर्ति क्रमशः रविवार आदिको तैलका अभ्यङ्ग करनेसे प्राप्त होती है। अर्थात् रविवारको शरीरमें तैलका अभ्यङ्ग करनेपर सन्ताप, सोमवारको तैल-अभ्यङ्गसे कीर्ति, मंगलवारको तैल-अभ्यङ्गसे अल्पायु, बुधवारको तैल-अभ्यङ्गसे धन, बृहस्पतिवारको ऐसा करनेसे मृत्यु, शुक्रवारको तैल-अभ्यङ्गसे आरोग्य और शनिवारको तैल-अभ्यङ्ग करनेपर मनुष्यका सम्पूर्ण अभीष्ट पूर्ण होता है। उपवास करनेवाले व्रतीसे तथा नाईके द्वारा क्षौरकर्म करानेके पश्चात् मनुष्यसे तबतक ही लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं, जबतक वह तैलका स्पर्श नहीं करता है। अतः तैलस्पर्श करनेके पश्चात् मनुष्यको तत्काल स्नान कर लेना चाहिये। व्रतके दिन तो तैलस्पर्श नहीं ही करना चाहिये।

स्नान करनेके बाद मनुष्यको यथाविधान पितृगण, देवगण और मनुष्योंका तर्पण करना चाहिये। नाभिपर्यन्त जलमें स्थित होकर एकाग्र मनसे पितरोंका आवाहन करना चाहिये—

आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्त्वपोऽञ्जलिम् ॥

हे मेरे पितृगण! आप सब इस तीर्थस्थानपर आकर विराजमान हों और मेरे द्वारा दी जा रही जलाञ्जलिको स्वीकार करें।

इस प्रकार आवाहन करके आकाश और दक्षिण दिशामें स्थित पितृगणोंको तीन-तीन जलाञ्जलि प्रदान करे। यदि जलसे बाहर निकलकर तर्पण करना हो तो तर्पणकी विधि जाननेवाले लोगोंको सूखे और स्वच्छ वस्त्र पहनकर समूल कुशाओंपर तर्पण करना चाहिये। पात्र (बर्तन)-में तर्पण नहीं करना चाहिये।

तर्पण-कृत्यमें रक्षोगण प्रतिबन्ध न कर सकें, इसके लिये तर्पण आरम्भ करते समय बायें हाथमें जल लेकर नैर्ऋत्य कोणमें उसे छोड़ना चाहिये और जल छोड़ते समय निम्नलिखित मन्त्र बोलना चाहिये—

यदपां क्रूरमांसाबु यदमेध्यं तु किञ्चन ॥
अशान्तं मलिनं यच्च तत्सर्वमपगच्छतु ।
(२१३ । १३१-१३२)

कांड ] सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण ३८९

कूरमांसके कारण, अपवित्रताके कारण अथवा तर्पणके जलमें अज्ञानवश विद्यमान अशान्तिजनक किसी तत्त्व या मलिनताके कारण जो कुछ भी प्रतिबन्ध है, वह दूर हो जाय।

अन्तमें तर्पणका संक्षेप (उपसंहार) करते समय तीन जलाञ्जलि निम्नलिखित मन्त्रोंसे देनी चाहिये—

निषिद्धभक्षणाद्यत्तु पापाद्यच्च प्रतिग्रहात्॥
दुष्कृतं यच्च मे किञ्चिद्वाङ्मनःकायकर्मभिः।
पुनातु मे तदिन्द्रस्तु वरुणः सबृहस्पतिः॥
सविता च भगश्चैव मुनयः सनकादयः।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत् तृप्यत्विति ब्रुवन्॥
(२१३। १३३-१३५)

निषिद्ध भक्षणसे, जन्मान्तरीय दुष्कर्मोंसे, प्रतिग्रह (दान) लेनेसे और इस जन्ममें शरीर, वाणी एवं कर्मसे जो निषिद्ध आचरण हो गये हैं, उनसे उत्पन्न पापोंके कारण मुझमें जो अपवित्रता है, उसे दूर करके बृहस्पति, इन्द्र तथा वरुण मुझे पवित्र करें। सूर्य, यम (देवताविशेष), सनकादि ऋषि और ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब (अति लघु कीट या तृण) समस्त संसार—ये सभी मेरे तर्पणसे तृप्त हों।

इस प्रकार पितृतर्पण करके संयमी व्यक्तिको ईर्ष्या, द्वेष आदिसे रहित होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि अभीष्ट देवोंकी पूजा करनी चाहिये। विभिन्न देवतालिङ्गक ब्राह्म, वैष्णव, रौद्र, सावित्र एवं मैत्रावरुण-मन्त्रोंसे सभी देवताओंकी नमस्कारपूर्वक अर्चा करनी चाहिये। तदनन्तर पुनः नमस्कारपूर्वक अर्चित देवोंको पृथक्-पृथक् पुष्पाञ्जलियाँ देनी चाहिये। पुनः सर्वदेवमय भगवान् विष्णु और सूर्यकी पूजा करनेका विधान है। इस पूजामें जो अधिकारी मनुष्य पुरुषसूक्तसे भगवान् विष्णुको पुष्प तथा जल समर्पित करता है, वह सम्पूर्ण चराचर विश्वकी पूजाको सम्पन्न कर लेता है। इन देवोंकी पूजा अन्य तान्त्रिक मन्त्रोंसे भी की जा सकती है। पूजामें सबसे पहले आराध्यदेव जनार्दनको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये और सुगन्धित पदार्थसे उनके विग्रहका विलेपन करना चाहिये। तत्पश्चात् उन्हें पुष्पाञ्जलि, धूप, उपहार और फलका नैवेद्य समर्पित करना चाहिये।

जलके मध्य स्नान, जलके द्वारा मार्जन, आचमन, जलमें तीर्थका अभिमन्त्रण तथा अघमर्षण-सूक्तके द्वारा मार्जन नित्य तीन बार करना चाहिये। महात्माओंको स्नानविधिके विषयमें यही अभीष्ट है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको मन्त्रसहित स्नान करना चाहिये। शूद्रवर्णको मौन होकर नमस्कारपूर्वक स्नान करना चाहिये। अध्यापन ब्रह्मयज्ञ, तर्पण पितृयज्ञ, होम देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव भूतयज्ञ तथा अथितिका पूजन मनुष्ययज्ञ है। गौओंके गोष्ठमें दस गुना, अग्निशालामें सौ गुना, सिद्धक्षेत्र-तीर्थ तथा देवालयोंमें क्रमशः एक हजार गुना, एक लाख गुना और एक करोड़ गुना फल इन कर्मोंको करनेसे प्राप्त होता है। जब ये ही कर्म भगवान् विष्णुके सान्निध्यमें किये जाते हैं तो इनसे अनन्त गुना फलोंकी प्राप्ति होती है।

दिनका यथायोग्य पाँच विभाग करके पितृगण, देवगणकी अर्चा और मानवके कार्य करने चाहिये। जो मनुष्य अन्नदान करके सर्वप्रथम ब्राह्मणको भोजन कराकर अपने मित्रजनोंके साथ स्वयं भोजन करता है, वह देहत्यागके बाद स्वर्गलोकके सुखका अधिकारी बन जाता है।

मनुष्यको सर्वप्रथम मधुर, मध्यभागमें नमकीन और अम्लसे युक्त पदार्थ, उसके बाद कडुवा, तीता तथा कसैला भोजन करना चाहिये। भोजनके अनन्तर दुग्धपान करना चाहिये। रातमें शाक तथा कन्दादिक पदार्थोंको अधिक नहीं खाना चाहिये। एक ही प्रकारके रसमें आसक्ति अच्छी नहीं होती है।

३९०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ब्राह्मणका अन्न अमृतके समान, क्षत्रियका अन्न दुग्धके समान, वैश्यका अन्न अन्नके समान और शूद्रका अन्न रक्तके समान होता है। जो अमावास्याका व्रत एक वर्षतक करता है, उसके यहाँ ऐश्वर्य और लक्ष्मीका (अविचल्रूपसे) निवास होता है। द्विजातिके उदरभागमें गार्हपत्याग्नि, पृष्ठभागमें दक्षिणाग्नि, मुखमें आहवनीयाग्नि, पूर्वमें सत्याग्नि और मस्तकमें सर्वाग्निका वास रहता है। जो इन पञ्चाग्नियोंको जान लेता है उसको आहिताग्नि कहा जाता है। शरीरको जल, चन्द्र तथा विविध प्रकारके अन्नके द्वारा साध्य माना गया है। इस शरीरका उपभोग करनेवाले प्राण अग्नि और सूर्य हैं। ये तीनों पृथक्-पृथक् तीन रूपोंमें भी अवस्थित रहकर एक ही हैं।

(भोजनके समय यह भावना करनी चाहिये कि) पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायुतत्त्वसे युक्त इस मेरे स्थूल शरीरकी पुष्टिके लिये प्रयुक्त अन्न शक्ति-सञ्चयके लिये होता है। शरीरमें पहुँचकर जब यह अन्न भूमि, जल, अग्नि और वायुतत्त्वके रूपमें परिणत हो जाता है तो अप्रतिहत—असीम सुखकी अनुभूति होती है।

इसके (भोजनके) बाद मनुष्यको अपने हाथसे मुख आदि स्वच्छकर ताम्बूल अर्थात् पानका भक्षण करना चाहिये। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर इतिहासका श्रवण करना चाहिये। इतिहास और पुराणादिकी कथाओंके द्वारा मनुष्यको दिनके छठे और सातवें भागका समय व्यतीत करना चाहिये। तत्पश्चात् स्नान करके पश्चिम दिशाकी ओर मुख करके सायंकालीन संध्योपासन करना चाहिये।

हे ब्राह्मणदेव ! मेरे द्वारा कहे गये इस विधानके अनुसार अपने कर्त्तव्योंका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य इस सदाचारके अध्यायका पाठ करता है अथवा अपने पुरोहित आदिके द्वारा इसका श्रवण करता है, वह निश्चित ही अपनी मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकको जाता है। हे द्विज ! इन सभी सदाचार एवं धर्मका पालन करनेवाला अधिकारी मनुष्य केशव (साक्षात् विष्णु) ही माना गया है।

(अध्याय २१३)


स्नान तथा संक्षेपमें संध्या-तर्पणकी विधिं

ब्रह्माजीने कहा—अब मैं स्नानकी विधि कहता हूँ, क्योंकि सभी क्रियाएँ स्नानमूलक हैं अर्थात् स्नानके बिना कोई भी क्रिया सफल नहीं हो सकती। स्नानार्थी व्यक्तिको स्नानके पूर्व मिट्टी, गोमय, तिल, कुश, सुगन्धित पुष्प—ये सभी द्रव्य एकत्र कर लेना चाहिये। गन्ध आदि स्नानोपयोगी पदार्थोंको जलके समीप स्वच्छ स्थान—भूमिपर रखना चाहिये।

तदनन्तर विद्वान् व्यक्ति एकत्र किये हुए मिट्टी और गोमयको तीन भागोंमें विभक्त करके मिट्टी और जलके द्वारा दोनों पैर तथा दोनों हाथका प्रक्षालन करे। बायें कंधेपर यज्ञोपवीत रखकर शिखाबन्धनपूर्वक मौन होकर आचमन करे। 'ॐ उरुं हि राजा०'<sup></sup> इत्यादि मन्त्रोंसे दक्षिणभागमें जलको स्थापित करे। फिर 'ॐ ये ते शतं०'<sup></sup> इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करके उस जलका अभिमन्त्रण करे। 'ॐ सुमित्रिया न आप०'<sup></sup> इस मन्त्रसे


१-इस अध्यायमें मन्त्रोंके प्रतीकमात्र दिये गये हैं। जिज्ञासु विभिन्न मन्त्रसंहिताओंसे मन्त्रोंको जान लें।
२-ॐ उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थानमन्वेत वाउ। प्रतिधाता च वक्तारस्ताहृदयाविपश्वित्। नमोऽग्न्यरुणाया भिष्टुतोवरुणस्य पाशः। वरुणाय नमः॥ (२१४।६)
३-ॐ ये ते शतं वरुणये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा॥ (२१४।७)
४-ॐ सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु। दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयं द्विष्मः॥ (२१४।७)

१९३- नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन

काण्ड ] स्नान तथा संक्षेपमें संध्या-तर्पणकी विधि ३९१


अञ्जलिमें जल लेकर पहले मार्जन करे, फिर शेष जलको बाहर फेंके। तदनन्तर दोनों चरण, जंघा और कटिप्रदेशमें तीन-तीन बार मिट्टी लगाये। इसके पश्चात् दोनों हाथ धोकर आचमन करके जलको नमस्कार करे। इसके बाद 'ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०' का पाठ करके 'ॐ भूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा' इत्यादि महाव्याहृतिमन्त्रसे आचमन और 'ॐ इदं विष्णु०' आदि मन्त्रसे मिट्टीद्वारा अङ्गोंका मार्जन करे। फिर सूर्याभिमुख होकर 'ॐ आपो अस्मान्०' इत्यादि मन्त्रसे जलमें डुबकी लगाये। तदनन्तर शरीरको मल-मलकर स्वच्छ करे और धीरे-धीरे डुबकी लगाते हुए स्नान करे।

इसके बाद 'ॐ मा नस्तोके तनये मा न०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करके गोमयके द्वारा अङ्गका लेपन करे। फिर 'ॐ इमं मे वरुण०' इत्यादि वारुणमन्त्रसे यथाक्रम अपने मस्तक आदिका अभिषेक करे। पूर्वोक्त मन्त्रोंसे विधिवत् आत्माभिषेक करके जलमें डुबकी लगाकर पुनः आचमन करे। 'ॐ आपो हि ष्ठा०', 'ॐ इदं आपो हविष्मती०', 'ॐ देवी राप०', 'ॐ द्रुपदादिव०' तथा 'ॐ शं नो देवी०' इत्यादि पावमानी मन्त्रोंसे समाहित होकर मार्जन करे। 'ॐ हिरण्यवर्णा०', 'ॐ पवमानसूक्तम्०', 'ॐ तरत्सामाः०' तथा 'ॐ शुद्धवत्यः०' आदि पवित्र करनेवाले मन्त्रों एवं वारुणमन्त्रोंसे यथाशक्ति जलाभिषेक करे।

ओंकार और व्याहृतिसमन्वित गायत्री-मन्त्रका पाठ करते हुए स्नानके आदि और अन्तमें जलाभिषेक करे। जलके मध्यमें रहकर ही मार्जन करनेका विधान है। जलमें डूबकर अघमर्षण-मन्त्रको तीन बार पढ़ना चाहिये। इसके बाद 'ॐ द्रुपदा०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करके 'ॐ आयं गौः०' इत्यादि तीन ऋचाओंका पाठ करे। तदनन्तर स्मृतियोंमें निर्दिष्ट स्नानाङ्ग-मन्त्रोंका समाहितचित्तसे पाठ करे अथवा महाव्याहृति और प्रणवसे युक्त गायत्रीका जप करे या प्रणवकी आवृत्ति करे अथवा अव्यय विष्णुका स्मरण करे। जल ही विष्णुका आयतन है। विष्णु ही जलके अधिपति कहे गये हैं। जलमें विष्णुका स्मरण करे। 'ॐ तद् विष्णोः परमं पदम्०' इत्यादि कहकर बार-बार स्नान करे। यह वैष्णवी गायत्री विष्णुके सर्वाङ्ग-स्मरणमें निमित्त है। 'ॐ इदमपः प्रवहतः०' इत्यादि पवित्र मन्त्रोंसे अपने मलका निवारण करते हुए मार्जन करे और अपनेको निर्मल शरीरवाला बना ले। फिर 'ॐ तद्विष्णोः परमं पदम्०' इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करे।

यथाविधि स्नानक्रियाको सम्पन्नकर धोये हुए अखण्डित पवित्र दो वस्त्रोंको पहनकर मिट्टी और जलके द्वारा हाथ तथा पैरका प्रक्षालन करके संध्या एवं तर्पण करना चाहिये। स्नान और भोजनके आरम्भमें आचमनकर पुनः मन्त्रके द्वारा अन्तमें आचमन करना चाहिये। आचमनके बाद तीन बार 'ॐ द्रुपदादिव०' इत्यादि मन्त्रका पाठकर जलद्वारा मूर्धाभिषेक तथा अघमर्षण करे। पुनः आचमन और मार्जन तथा तीन बार आचमनकर धीरे-धीरे प्राणायाम करे। इसके बाद अञ्जलिमें जल एवं पुष्प धारण करके सूर्यार्घ्य दे और ऊर्ध्वबाहु होकर समाहितचित्त हो सूर्यका निरीक्षण करते हुए 'ॐ उदु त्यं०', 'ॐ चित्रं देवानां०', तथा 'ॐ तच्चक्षुर्देवहितं०' एवं 'ॐ हंसः शुचिषद्०' इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करते हुए सूर्योपस्थापन करे। इस प्रकार सूर्योपस्थापन करके यथाशक्ति गायत्रीका जप करना चाहिये। इसके पश्चात् 'ॐ बिभ्राट्०' अनुवाक, पुरुषसूक्त, शिवसंकल्पसूक्त, मण्डलब्राह्मण इत्यादि सूर्यके मन्त्रोंका सभी देवताओंकी प्रसन्नताके लिये यथाशक्ति जप करे अथवा जपकी साङ्गोपाङ्ग

१९४- सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि

३१२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

पूर्णताके लिये विधिवत् अध्यात्मविद्याका जप करे। तदनन्तर सव्य होकर तीन बार आचमनकर श्री, मेधा, धृति, क्षिति, वाक्, वागीश्वरी, पुष्टि, तुष्टि, उमा, अरुन्धती, शची, मातृगण, जया, विजया, सावित्री, शान्ति, स्वाहा, स्वधा, धृति, श्रेष्ठ अदिति, ऋषिपत्नियों, ऋषिकन्याओं और अन्य काम्य देवताओंका तर्पण करे। इसके बाद समाहितचित्त होकर सभीकी मङ्गलकामनासे सर्वमङ्गलादेवीको तृप्त करे और ‘ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत् तृप्यत्विति’ इस मन्त्रसे तीन अञ्जलि जल देते हुए तर्पण-क्रियाकी सम्पन्नताकी कामना करे।

(अध्याय २१४)


तर्पण-विधिका वर्णन

ब्रह्माजीने कहा—इसके बाद तर्पणविधिका वर्णन करता हूँ। इस विधिके अनुसार तर्पण करनेसे देवगण और पितृगण तुष्ट होते हैं। सर्वप्रथम ‘ॐ मोदास्तृप्यन्ताम्’ इत्यादि मन्त्रोंसे एक-एक अञ्जलि जल प्रदान करे। तर्पणके मन्त्र इस प्रकार हैं—

ॐ मोदास्तृप्यन्ताम्। ॐ प्रमोदास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुमुखास्तृप्यन्ताम्। ॐ दुर्मुखास्तृप्यन्ताम्। ॐ विघ्नास्तृप्यन्ताम्। ॐ विघ्नकर्तारस्तृप्यन्ताम्। ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्। ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्। ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्। ॐ सनातनस्तृप्यताम्। ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ संवत्सरस्सावयवस्तृप्यताम्। ॐ देवास्तृप्यन्ताम्। ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्। ॐ देवान्धकास्तृप्यन्ताम्। ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्। ॐ नागास्तृप्यन्ताम्। ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम्। ॐ सरिन्मनुष्या यक्षास्तृप्यन्ताम्। ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्। ॐ भूतग्रामाश्चतुर्विधास्तृप्यन्ताम्। ॐ दक्षस्तृप्यताम्। ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्। ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। ॐ पुलहस्तृप्यताम्। ॐ क्रतुस्तृप्यताम्। ॐ नारदस्तृप्यताम्। ॐ भृगुस्तृप्यताम्। ॐ विश्वामित्रस्तृप्यताम्। ॐ कश्यपस्तृप्यताम्। ॐ जमदग्निस्तृप्यताम्। ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। ॐ स्वायम्भुवस्तृप्यताम्। ॐ स्वारोचिषस्तृप्यताम्। ॐ तामसस्तृप्यताम्। ॐ रैवतस्तृप्यताम्। ॐ चाक्षुषस्तृप्यताम्। ॐ महातेजास्तृप्यताम्। ॐ वैवस्वतस्तृप्यताम्। ॐ ध्रुवस्तृप्यताम्। ॐ धवस्तृप्यताम्। ॐ अनिलस्तृप्यताम्। ॐ प्रभासस्तृप्यताम्।

इसके बाद निवीती होकर अर्थात् यज्ञोपवीतको मालाके रूपमें गलेमें धारणकर ‘ॐ सनकस्तृप्यताम्’ इत्यादि निम्न मन्त्रोंसे तर्पण करे—

ॐ सनकस्तृप्यताम्। ॐ सनन्दनस्तृप्यताम्। ॐ सनातनस्तृप्यताम्। ॐ कपिलस्तृप्यताम्। ॐ आसुरिस्तृप्यताम्। ॐ वोढुस्तृप्यताम्। ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम्। ॐ मनुष्याणां कव्यवाहस्तृप्यताम्। ॐ अनलस्तृप्यताम्। ॐ सोमस्तृप्यताम्। ॐ यमस्तृप्यताम्। ॐ अर्यमा तृप्यताम्।

तदनन्तर प्राचीनावीती होकर अर्थात् दाहिने कंधेपर यज्ञोपवीत धारणकर अधोलिखित मन्त्रोंसे तर्पण करे—

ॐ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम्। ॐ सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम्। ॐ बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम्।


* इस अध्यायमें तर्पणकी अवश्यकर्तव्यता एवं उसकी दिशाका संकेतमात्र किया गया है। तर्पणक्रम एवं विधिका ज्ञान अपनी शाखाके ग्रन्थोंसे करना चाहिये। माध्यन्दिन शाखाके लोगोंको ‘नित्यकर्म-पूजाप्रकाश’ (प्रकाशित गीताप्रेस)-से सरलतम प्रामाणिक तर्पणविधि जान लेनी चाहिये।

काण्ड ] बलिवैश्वदेवनिरूपण ३१३


ॐ यमाय नमः। ॐ धर्मराजाय नमः। ॐ मृत्यवे नमः। ॐ अन्तकाय नमः। ॐ वैवस्वताय नमः। ॐ कालाय नमः। ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः। ॐ औदुम्बराय नमः। ॐ दध्नाय नमः। ॐ नीलाय नमः। ॐ परमेष्ठिने नमः। ॐ वृकोदराय नमः। ॐ चित्राय नमः। ॐ चित्रगुप्ताय नमः। ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगत्तृप्यतु। ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः। ॐ पितामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातृभ्यः स्वधा नमः। ॐ पितामहीभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहीभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। तृप्यतामिति।

अधोलिखित मन्त्रोंका पारायण पितरोंका ध्यान करते हुए करे—

'ॐ उदीरतामवर०', 'ॐ अग्निरसो नः०', 'ॐ आयन्तु नः०', 'ॐ ऊर्जां०', 'ॐ पितृभ्य०', 'ॐ ये चेह०' तत्पश्चात् 'ॐ मधुवाता०' इसके बाद 'ॐ नमो वः पितरो०' इत्यादि मन्त्रसे ध्यान करते हुए अधोलिखित मन्त्रसे जल दे—

ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः नमः। ॐ पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। आदि·····।

ये चास्माकं कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः।
ते तृप्यन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥

इस मन्त्रका पाठकर वस्त्रनिष्पीडित जलसे अपने कुलमें उत्पन्न पुत्र-हीनजनोंके लिये तर्पण करे।

(अध्याय २१५)


बलिवैश्वदेवनिरूपण

ब्रह्माजीने कहा— अब मैं वैश्वदेव-बलिविधिक विधान बतलाता हूँ। यह होमका एक प्रारम्भिक उत्तम स्वरूप है। पहले अग्निको जलाकर अग्निका पर्युक्षण करे, तदनन्तर 'ॐ कव्यादमग्निं०' इत्यादि मन्त्रसे अग्निके लिये कुछ हव्यांशका परित्याग करे। इसके बाद 'ॐ पावक वैश्वानर०' मन्त्रको पढ़कर अग्निका आवाहन करे और ॐ प्रजापतये स्वाहा। ॐ सोमाय स्वाहा। ॐ बृहस्पतये स्वाहा। ॐ अग्निषोमाभ्यां स्वाहा। ॐ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहा। ॐ द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा। ॐ इन्द्राय स्वाहा। ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा। ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ अद्भ्यः स्वाहा। ॐ ओषधिवनस्पतिभ्यः स्वाहा। ॐ गृहाय स्वाहा। ॐ देवदेवताभ्यः स्वाहा। ॐ इन्द्राय स्वाहा। ॐ इन्द्रपुरुषेभ्यः स्वाहा। ॐ यमाय स्वाहा। ॐ यमपुरुषाय स्वाहा। ॐ सर्वेभ्यो भूतेभ्यो दिवाचारिभ्यः स्वाहा। ॐ वसुधापितृभ्यः स्वाहा—इन मन्त्रोंसे अग्निमें आहुति दे। तदनन्तर 'ॐ ये भूता॑ प्रचरन्ति०'<sup></sup> का पाठ करते हुए बलि और पुष्टि प्रदान करनेकी प्रार्थना करे। अन्तमें 'ॐ आचाण्डालपतितवायसेभ्यो नमः' इस मन्त्रसे भी काक आदिको बलि प्रदान करे<sup></sup>

(अध्याय २१६)


१-ये भूताः प्रचरन्ति दीनाश्च निमिहन्तो भुवनस्य मध्ये। तेभ्यो बलिं पुष्टिकामो ददामि मयि पुष्टिं पुष्टिपतिर्दधातु॥ (२१६।२)
२-इस अध्यायमें बलिवैश्वदेवकी विधि अन्य शाखाके अनुसार है। माध्यन्दिन शाखाके लोगोंके लिये 'पारस्करगृह्यसूत्र' के अनुसार संक्षिप्त एवं प्रामाणिक 'बलिवैश्वदेवविधि' गीताप्रेससे प्रकाशित 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' में द्रष्टव्य है।

१९५- धर्मसारका कथन

३९४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

संध्याविधि<sup></sup>

श्रीब्रह्माजीने कहा— अब द्विजातियोंके लिये संध्या-विधिका वर्णन करता हूँ। सर्वप्रथम इस मन्त्रसे बाह्य तथा आभ्यन्तर शुद्धि करे— ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
अर्थात् पवित्र हो या अपवित्र किसी भी अवस्थामें क्यों न हो, पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकारकी शुद्धि हो जाती है।

उपनयन-संस्कारके समय जिस गायत्रीमन्त्रका उपदेश प्राप्त होता है, उसीका जप संध्योपासनमें होता है। उपनयनकालमें गायत्रीमन्त्रका विनियोग इस प्रकार होता है—'ॐ गायत्री छन्दः, विश्वामित्र ऋषिस्त्रिष्टुप्, समुद्राः कुक्षिः, चन्द्रादित्यौ लोचनौ, अग्निर्मुखम्, विष्णुर्हृदयम्, ब्रह्मरुद्रौ शिरः, रुद्रः शिखा उपनयने विनियोगः'।

संध्योपासनके समय गायत्रीमन्त्रके जपसे पहले 'ॐ भूः' से पैरमें, 'ॐ भुवः' से जानुओंमें, 'ॐ स्वः' से हृदयमें, 'ॐ महः' से सिरमें, 'ॐ जनः' से शिखामें, 'ॐ तपः' से कण्ठमें और 'ॐ सत्यम्' से ललाटमें न्यास करना चाहिये। आगेके मन्त्रोंसे हृदय, सिर, शिखा, कवच, अस्त्र आदिमें न्यास करे—ॐ हृदयाय नमः, ॐ भूः शिरसे स्वाहा, ॐ भुवः शिखायै वौषट्, ॐ स्वः कवचाय हुम्, ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्। इसके बाद ॐ भूः, ॐ भुवः इत्यादि सप्तव्याहृतियोंके साथ गायत्रीके तृतीय पाद 'ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतम् भूर्भुवः स्वरोम्' का जप करते हुए प्राणायाम करे। प्राणायामके बाद 'ॐ सूर्यश्च०' इस मन्त्रसे प्रातःकालकी, 'ॐ आपः पुनन्तु०' इस मन्त्रसे मध्याह्नकालकी तथा 'ॐ अग्निश्च०' इस मन्त्रसे सायंकालीन संध्यामें आचमन करे। तत्पश्चात् आवाहनपूर्वक भगवती गायत्रीके प्रातः, मध्याह्न तथा सायं-स्वरूपोंका ध्यान करे। फिर 'ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः०' और 'ॐ सुमित्रिया न आपः०' एवं 'ॐ द्रुपदादिव०' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा जलसे मार्जन करे और 'ॐ ऋतं च सत्यं०' इस मन्त्रसे अघमर्षण करे। तदनन्तर गायत्रीजपसे पूर्व गायत्रीमन्त्रका विनियोग इस प्रकार करे—'ॐ गायत्र्या विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः'। 'ॐ उदु त्यं जातवेदसं०', 'ॐ चित्रं देवानां०', 'ॐ तच्चक्षुः०'—ये सूर्योपस्थानके मन्त्र हैं। गायत्रीका जप करनेके अनन्तर 'ॐ विश्वतश्चक्षु०', 'ॐ देवागातु०' तथा 'ॐ उत्तरे शिखरे०' इन मन्त्रोंसे जपसमर्पणपूर्वक गायत्रीदेवीका विसर्जन करे।
(अध्याय २१७)


पार्वणश्राद्धविधि<sup></sup>

श्रीब्रह्माजीने कहा— हे व्यास! अब मैं श्राद्धविधिका वर्णन करता हूँ। इस विधिके अनुसार पितरोंका श्राद्ध करनेसे भोग एवं मोक्षकी प्राप्ति होती है। श्राद्धकर्ता श्राद्धके एक दिन पहले ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। ब्रह्मचारीको निमन्त्रित करनेसे विशेष फल होता है।


<sup></sup>इस अध्यायमें संध्याकी विधि अत्यन्त संक्षिप्त दी गयी है। अतः सविधि विस्तारपूर्वक 'संध्योपासनविधि' जाननेके लिये गीताप्रेससे प्रकाशित 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' पुस्तक देखना चाहिये।
<sup></sup>श्राद्ध दो प्रकारका होता है—सपात्रकश्राद्ध तथा अपात्रकश्राद्ध। सपात्रकश्राद्धमें विश्वेदेव एवं पितरोंके रूपमें साक्षात् ब्राह्मणोंको ही आसनपर बिठाकर समस्त श्राद्धविधि सम्पन्न की जाती है। यहाँ इसी सपात्रकश्राद्धकी विधिका निर्देश किया गया है। ऐसे श्राद्धके लिये पूर्ण सात्त्विक, जाति, विद्या, तप आदिकी दृष्टिसे अति पवित्र एवं उत्कृष्ट ब्राह्मण ही उपादेय है। कलियुगमें ऐसे ब्राह्मण दुर्लभ हैं। इसीलिये अपात्रक-श्राद्ध ही वर्तमानमें किया जाता है। अपात्रकश्राद्धमें साक्षात् ब्राह्मण आसनपर नहीं बिठाये जाते हैं। विश्वेदेव एवं पितरोंके आसनोंपर उनके प्रतिनिधिरूपमें कुश (दण्ड-विधान त्रिकुश, पटवेल एवं मोटक) ही रखा जाता है।

काण्ड ] पार्वणश्राद्धविधि ३१५

सव्य होकर देवताओं (विश्वेदेवों)-को एवं अपसव्य होकर पितरोंको निमन्त्रित (आवाहित) करे। श्राद्धकर्ता 'ॐ स्वागतं भवद्भिः' (भवद्भिः स्वागतं स्वीक्रियताम्) आपलोग मेरा स्वागत स्वीकार करें—यह निवेदन विश्वेदेवों एवं पितरोंसे करे। तदनन्तर 'ॐ सुस्वागतम्' इस प्रकार विश्वेदेवों एवं पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मण बोलें। श्राद्धकर्ता 'ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्य एतत्पादोदकमर्घ्यं स्वाहा' कहकर देव-ब्राह्मणोंके चरणोंपर देवतीर्थसे समूल कुशोंके सहित जल प्रदान करे। यह कुश द्विगुणभुग्न (पितरोंके कार्यके लिये विहित मोटक)-रूपमें नहीं होना चाहिये। इसके बाद दक्षिणाभिमुख होकर दाहिने कंधेपर यज्ञोपवीत रखकर (अपसव्य होकर) पिता, पितामहके नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए 'ॐ एतत्पादोदकमर्घ्यं स्वधा' इस मन्त्रसे पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंके चरणोंमें पितृतीर्थसे द्विगुण-भुग्न कुश (मोटक) एवं पुष्पसहित जल प्रदान करे।

इसी प्रकार मातामह आदिके लिये उद्दिष्ट ब्राह्मणोंके चरणोंमें पादोदक और अर्घ्य समर्पित करे। इसके बाद 'ॐ एतदाचमनीयं स्वाहा' कहकर ब्राह्मणके हाथमें जल एवं 'ॐ एष वोऽर्घ्यः' मन्त्रसे अर्घ्य तथा पुष्प दे। तत्पश्चात् 'ॐ सिद्धमिदमासनम्' से (सिद्धमिदमासनं गृह्यताम्)—आसन सम्पन्न है, कृपया ग्रहण करें—ऐसा निवेदन करे। 'इह सिद्धमिदमासनम्।' (यहाँ हम लोगोंके लिये आसन सम्पन्न है) ऐसा कहकर प्रतिनिधि ब्राह्मण प्रतिवचन दें।

इसके बाद 'ॐ भूः', 'ॐ भुवः' इत्यादि सव्याहृतियोंका पाठकर देव-ब्राह्मणको पूर्वमुख और पितृब्राह्मणको उत्तरमुख बैठाकर निम्नलिखित मन्त्रका तीन बार जप करे—

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ते॥
(२१८।६)

तदनन्तर मास, पक्ष, तिथि, देश तथा पिता, पितामहका नाम एवं गोत्रका उच्चारण कर 'विश्वेदेवपूर्वकं श्राद्धं करिष्ये' यह संकल्प करे तथा 'ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा' का उच्चारण करे। इसके बाद 'ॐ विश्वेदेवानावाहयिष्ये' से प्रार्थना करके 'ॐ आवाहय' के द्वारा ब्राह्मणकी आज्ञा प्राप्त होनेपर 'ॐ विश्वेदेवा०', 'ॐ ओषधयः०' एवं—

आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः।
ये अत्र विहिताः श्राद्धे सावधाना भवन्तु ते॥
(२१८।७)

—इत्यादि मन्त्रोंसे श्राद्धकर्ता विश्वेदेवोंका आवाहन करे तथा 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः'—मन्त्रका तीन बार उच्चारणकर यव बिखेरे। श्राद्धकर्ता 'ॐ पात्रमहं करिष्ये' इस वाक्यसे अनुज्ञा प्राप्त करे तथा 'ॐ कुरुष्व' इससे ब्राह्मणोंके द्वारा अनुज्ञात होकर अग्रभागसे युक्त दो कुश ग्रहण करे। एक प्रादेश* (लम्बे) कुशके दो पत्रोंको लेकर 'ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ०' आदि मन्त्रसे दूसरे कुशपत्रके द्वारा उसका छेदन करे। इसके बाद 'ॐ विष्णोर्मनसा पूतेस्थ' से उन दो कुशपत्रोंका अभ्युक्षण कर दूसरे कुशपत्रके द्वारा त्रिर्वेष्टनपूर्वक उसे अर्घ्यपात्रमें स्थापित करे। तत्पश्चात् 'ॐ शं नो देवीरभिष्टय०' से उस पात्रमें जल तथा 'ॐ यवोऽसि०' इत्यादि मन्त्रसे जौ एवं 'ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां०' से उसी पात्रमें चन्दन प्रदान करे। फिर 'ॐ या दिव्या आपः पयसा०' इस मन्त्रके पाठके साथ 'ॐ एषोऽर्घो नमः' से ब्राह्मणोंके हाथमें अर्घ्यपात्रसे जल दे।

तदनन्तर श्राद्धकर्ता अर्घ्यपात्रस्थ अवशिष्ट संस्रवजल और पवित्रकको ग्रहणकर (अर्घ्यपात्रमें रखकर) ब्राह्मणके दक्षिणपार्श्वमें रखे और अर्घ्यपात्रको


*अँगूठे और तर्जनीको पूरा फैलानेपर बीचकी दूरीको प्रादेश कहते हैं।

१९६- प्रायश्चित्तनिरूपण, चान्द्रायणादि विभिन्न व्रतोंके लक्षण तथा पञ्चगव्य-विधान

३९६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ऊर्ध्वमुख कुशके ऊपर स्थापित करके उसमें जल तथा पवित्रक भी (जो ब्राह्मणके दक्षिणपार्श्वमें रखा था) रख दे।

तत्पश्चात् 'ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्य एतानि गन्धपुष्पधूपदीपवासोयुग्मयज्ञोपवीतानि नमः' से विश्वेदेवोंको गन्धादि प्रदानकर समर्पित गन्ध आदिकी पूर्णताकी कामना 'गन्धादिदानमच्छिद्रमस्तु'—कहकर करे। विश्वेदेवोंके प्रतिनिधि ब्राह्मण 'ॐ अस्तु' से समर्पित चन्दनादिकी परिपूर्णता स्वीकार करे। ऋत्विक् ब्राह्मण 'ॐ अस्तु' से प्रत्युत्तर दे। श्राद्धकर्ता 'पितृपितामहप्रपितामहानां मातामह-प्रमातामहवृद्धप्रमातामहानां सपत्नीकानां श्राद्धमहं करिष्ये' ऐसा कहकर पितरोंके श्राद्धकी अनुज्ञा माँगे। ब्राह्मणोंके द्वारा 'कुरुष्व' इस वाक्यसे अनुज्ञात होनेपर 'ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च०' मन्त्रका तीन बार जप करे।

तदनन्तर पित्रादि एवं मातामहादिका नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए 'इदमासनं स्वधा' पदसे ब्राह्मणोंके वामपार्श्वमें आसन दानकर 'ॐ पितॄन् आवाहयिष्ये' से ब्राह्मणोंसे अनुज्ञाकी प्रार्थना करे और 'ॐ आवाहय' इस वाक्यसे ब्राह्मणोंके द्वारा अनुज्ञात होकर 'ॐ उशन्तस्त्वा०' एवं 'ॐ आयान्तु नः पितरः०' इत्यादि मन्त्रोंसे पितरोंका आवाहन करे। 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः' मन्त्रसे तिलका विकरण करे। पूर्वकी भाँति क्रमसे स्थापित अर्घ्यपात्रमें उदक दे तथा 'ॐ तिलोऽसि सोमदेवत्यो०' आदि मन्त्रोंसे तिल-दान करे।

इसके बाद दोनों हाथसे गन्ध, पुष्प प्रदानकर पितृपात्रको उठाकर 'ॐ या दिव्या०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करके अन्तमें पित्रादिका गोत्र, नामका उल्लेख कर 'एष तेऽर्घ्यः स्वधा' से पवित्रीके साथ अर्घ्यपात्रको ग्रहण करनेके बाद वामपार्श्वमें कुशाके ऊपर 'ॐ पितृभ्यः स्थानमसि' मन्त्रसे अधोमुख अर्घ्यपात्रको स्थापित करे, फिर 'ॐ शुन्धन्तां लोकाः पितृसदनाः०' का पाठकर उस अधोमुख पात्रका स्पर्श करना चाहिये। इसके बाद पितृतीर्थसे पित्रादिके आसनपर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप वस्त्रयुग्म एवं यज्ञोपवीतादि देकर गोत्रनामोच्चारणपूर्वक सपत्नीक पितृ, पितामह एवं प्रपितामहको 'एतानि गन्धपुष्पधूपदीपवासोयुग्मसोत्तरीययज्ञोपवीतानि वः स्वधा' इस वाक्यको पढ़कर पितृतीर्थसे जल छोड़े। 'गन्धादिदानम् अक्षय्यम् अस्तु' ऐसा श्राद्धकर्ताके कहनेपर 'संकल्पसिद्धिरस्तु' इस प्रकार ब्राह्मण कहे। इसी प्रकार मातामहादिके लिये भी अनुज्ञापनादि कर्म करे। 'ॐ या दिव्या०' इस मन्त्रसे भूमिका सम्मार्जन करे। तदनन्तर घृतमिश्रित अन्न ग्रहणकर सव्य होकर 'ॐ अग्नौ करणमहं करिष्ये' द्वारा पितृब्राह्मणकी सेवामें अनुज्ञाकी प्रार्थना करे। 'ॐ कुरुष्व' इस वाक्यसे ब्राह्मणके द्वारा अनुज्ञात हो, 'ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा' मन्त्रसे पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मणके हाथमें दो आहुति प्रदान करे। अवशिष्ट अन्न पिण्डार्थ स्थापित करके अन्नका आधा भाग पित्रादिके पात्रमें और मातामहादिके पात्रमें समर्पित करे।

इसके बाद जलपात्र मुद्रादि दक्षिणास्थापनपूर्वक भोजनपात्रके ऊपर कुशदान कर अधोमुख दोनों हाथोंके द्वारा भोजनपात्र स्पर्श करे। 'ॐ पृथिवी ते पात्रं०' इत्यादि मन्त्रपाठपूर्वक उस पात्रको अभिमन्त्रितकर उसपर अन्न परोसते हुए 'ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०' मन्त्रका पाठ करे। 'विष्णो हव्यं रक्षस्व' से अन्नके मध्यमें अधोमुख अंगुष्ठसे स्पर्श करके 'ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः' मन्त्रसे तीन बार जौ एवं 'ॐ निहन्मि सर्वं०' से पीली सरसोंका विकरण करना चाहिये। तदनन्तर 'धूरिलोचनसंज्ञकेभ्यो देवेभ्य एतदन्नं सघृतं पानीयं सव्यञ्जनं स्वाहा' कहकर विश्वेदेवोंको अन्न निवेदन

कांड ] पार्वणश्राद्धविधि ३१७

करते हुए उसके ऊपर सजल कुशपत्र रखकर श्राद्धकर्ता ‘ॐ अन्नमिदम् अक्षय्यम् अस्तु’ ऐसा उच्चारण करे एवं निमन्त्रित ब्राह्मण ‘ॐ सङ्कल्पसिद्धिरस्तु’ इस प्रकार कहें।

तत्पश्चात् अपसव्य होकर पित्रादि-पात्रमें व्यञ्जनसहित घी मिले हुए अन्नको परोसकर उसके ऊपर भूमि-संलग्न कुशका स्थापन कर दोनों उत्तान हाथोंसे भोजनपात्र स्पर्श करते हुए ‘ॐ पृथिवी ते पात्रं०’ मन्त्रका पाठ करे। ‘ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०’ एवं ‘ॐ विष्णोः कव्यं रक्षस्व’ इन मन्त्रोंसे समर्पित अन्नमें अंगुष्ठका स्पर्श करे। ‘ॐ अपहतासुरा रक्षांसि वेदिषदः’ से अन्नके ऊपर तिल फैलाकर पृथ्वीपर बायाँ घुटना टिकाकर ‘अमुकगोत्रेभ्यः अस्मत् पितृपितामहेभ्यः सपत्नीकेभ्यः एतदन्नं सघृतं सपानीयं सव्यञ्जनं प्रतिषिद्धवर्जितं स्वधा’ इत्यादि वाक्यसे सपत्नीक पिता-पितामहादिको नाम-गोत्र-उच्चारणपूर्वक अन्नका निवेदन करे। अन्नका संकल्प करके ‘ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं०’ मन्त्रसे दक्षिणमुख होकर जलकी धारा प्रदान करे। ‘ॐ श्राद्धमिदमच्छिद्रमस्तु एवं ॐ सङ्कल्पसिद्धिरस्तु’—इन दोनों मन्त्रोंका पाठकर ‘ॐ भूर्भुवः स्वः०’—इस व्याहृति-मन्त्रसे युक्त गायत्रीका उच्चारण कर विसर्जन करे। तदनन्तर ‘ॐ मधुवाता०’ मन्त्रका पाठकर तीन बार ‘मधु’ शब्दका उच्चारण करना चाहिये।

इसके साथ ‘यथासुखं वाग्यता जुषध्वम्’ का पाठकर ब्राह्मणोंके भोजन करते समय भक्तिपूर्वक ‘सप्तव्याधा०’ इत्यादि पितृस्तोत्रका पाठ करे<sup></sup>। इसके बाद ‘तृप्यस्व’ इस वाक्यका उच्चारण कर दक्षिणाभिमुख अपसव्य होकर ‘ॐ अग्निदग्धाश्च०<sup></sup> मन्त्रको पढ़कर भूमिमें कुशके ऊपर घीके साथ जलयुक्त अन्नको विकरित करे।

तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको मुखप्रक्षालनके लिये जल देकर प्रणवपूर्वक व्याहृतिके साथ गायत्री तथा ‘ॐ मधुवाता०’ इत्यादि मन्त्रोंका पाठकर मधु शब्दका तीन बार उच्चारण करे। ‘ॐ रुचितां भवद्भिः’ यह कहकर देव-ब्राह्मणोंसे विनम्रभावपूर्वक भोजनके रुचिपूर्ण (स्वादिष्ट) होनेका प्रश्न करे। देव-ब्राह्मणोंके द्वारा ‘सुरुचितम्’ यह उत्तर देनेपर ‘ॐ शेषमन्नम्’ यह विनम्रतासे प्रश्न करनेपर ब्राह्मण ‘ॐ इष्टैः सह भोजनम्’ अर्थात् इष्टजनोंके साथ आप भी भोजन करें—यह प्रत्युत्तर दें। तदनन्तर वामोपवीती (अपसव्य) होकर पित्रादि ब्राह्मणोंसे ‘ॐ तृप्ताः स्थ’ यह जिज्ञासा करे और उनके द्वारा ‘ॐ तृप्ताः स्मः’ इस वाक्यसे अनुज्ञात होकर भूमिका अभ्युक्षण और चतुष्कोण मण्डल बनाकर उसमें तिल विकरित करे। ‘ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः अमुकदेवशर्मन् सपत्नीकः एतत्ते पिण्डासनं स्वधा’ ऐसा कहकर पिण्डके लिये आसन दे और रेखाकरण करे। सप्रणव तथा व्याहृतिके साथ गाय्रीमन्त्र और ‘ॐ मधुवाता०’ आदि मन्त्रका पाठकर तीन बार ‘मधु’ शब्दका उच्चारण करते हुए घृतयुक्त अन्नसे पिण्डका निर्माण कर ‘ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः०’ इत्यादि वाक्यसे कुशोंके ऊपर पिता आदिके लिये पिण्ड प्रदान करे। पुनः रेखामध्यमें पहलेके समान पितामहको पिण्डदान तथा व्याहृतिपूर्वक गायत्री और ‘मधुवाता०’ का तीन बार जप करके पिण्डके समीपमें शेषान्नका विकरण करके ‘ॐ लेपभुजः पितरः प्रीयन्ताम्’ इस वाक्यसे (पिण्डाधार कुशमें)


१-सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ। चक्रवाकाः शरद्ीपे हंसाः सरसि मानसे॥
तेऽभिजाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः। प्रस्थिता दूरमध्वानं यूयं किमवसीदथ॥ (२१८।२०-२१)
२-अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु पराङ्गतिम्॥ (२१८।२२)

३१८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

हाथका मार्जन करे। प्रक्षालित पिण्डजलसे 'ॐ अमुकगोत्र अस्मत्पितः०' इत्यादि वाक्यसे जलद्वारा पिण्डसेचन कर पिण्डपात्रको अधोमुख करके कृताञ्जलिपूर्वक 'ॐ पितरो मादयध्वं०' मन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् जलस्पर्श करते हुए वामावर्तसे उत्तरमुख होकर प्राणवायुका तीन बार संयम करके 'ॐ षड्भ्य ऋतुभ्यो नमः' इस मन्त्रका पाठ करे।

इसके बाद वामावर्तसे दक्षिणमुख होकर भोजनपात्रमें पुष्प तथा 'अक्षतं चारिष्टं चास्तु०' से अक्षत दे। 'अमी मदन्तः पितरो यथाभागमावृषायिषत' इस मन्त्रका पाठ करते हुए वस्त्रको शिथिलकर अञ्जलि बनाकर 'ॐ नमो वः पितरो नमो वः०' इस मन्त्रका पाठ करे। तत्पश्चात् 'गृहान्नः पितरो दत्त' इस मन्त्रसे गृहका निरीक्षण करे। 'सदा वः पितरो द्वेष्मः' इस मन्त्रसे निरीक्षणकर 'एतद्वः पितरो वासः' यह मन्त्र पढ़कर 'अमुकगोत्र पितः एतत्ते वासः स्वधा' वाक्यसे पिण्डपर सूत्रदान करे।

तदनन्तर बायें हाथसे उदकपात्र ग्रहणकर 'ऊर्जं वहन्ती०' मन्त्रसे पिण्डके ऊपर जलधारा देकर पूर्वमें स्थापित अर्घ्यपात्रके बचे हुए जलसे प्रत्येक पिण्डका सेचन करे। फिर पिण्डावाहनपूर्वक पिण्डोंके ऊपर गन्ध और कुशदानकर 'अक्षन्नमीमदन्त०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करे। मातामहादिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंको आचमन कराये। 'ॐ सुप्रोक्षितमस्तु' इस वाक्यसे श्राद्धभूमिका भलीभाँति अभ्युक्षणकर 'अपां मध्ये स्थिता देवा सर्वमप्सु०' का उच्चारण करके 'शिवा आपः सन्तु' कहकर ब्राह्मणोंके हाथमें जल दे। 'लक्ष्मीर्वसति०' आदिका पाठकर 'ॐ सौमनस्यमस्तु' यह मन्त्र पढ़कर ब्राह्मणोंके हाथमें पुष्प समर्पित करे। इसके बाद 'अक्षतं चास्तु०' इत्यादि मन्त्रका पाठकर 'अक्षतं चारिष्टं चास्तु' यह कहते हुए यव और तण्डुल भी ब्राह्मणोंके हाथमें दे। तदनन्तर 'अमुकगोत्राणामस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां सपत्नीकानामिदमन्नपानादिकमक्षय्यमस्तु' इस वाक्यसे पित्रादि ब्राह्मणके हाथमें तिल और जलका दान करे। ब्राह्मण 'अस्तु' कहकर प्रतिवचन बोलें। इसी क्रममें मातामह आदिको अक्षत आदि दानकर उनसे आशीर्वादकी प्रार्थना करे। तत्पश्चात् 'ॐ अघोराः पितरः सन्तु', 'गोत्रं नो वर्द्धतां०', 'दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे।

श्राद्धकर्ता 'सौमनस्यमस्तु' इस वाक्यका उच्चारण करे। ब्राह्मण 'अस्तु' यह कहें। तदनन्तर दिये गये पिण्डोंके स्थानमें अर्घ्यपात्रोंमें पवित्रकोंको छोड़ दे। बादमें कुशनिर्मित पवित्रक लेकर उससे पितरोंके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंका स्पर्शकर 'ॐ स्वधां वाचयिष्ये' इस वाक्यसे स्वधावाचनकी आज्ञा प्राप्त करे। ब्राह्मणोंके द्वारा 'ॐ वाच्यताम्' इस वचनसे अनुज्ञात हो श्राद्धकर्ता 'ॐ पितृपितामहेभ्यो यथानामशर्मभ्यः सपत्नीकेभ्यः स्वधा उच्चताम्' ऐसा कहे। तदनन्तर ब्राह्मण 'अस्तु स्वधा' का उच्चारण करें।

श्राद्धकर्ता 'अस्तु स्वधा' इस वाक्यसे अनुज्ञात हो 'ऊर्जं वहन्तीरमृतं०' इस मन्त्रसे पिण्डके ऊपर जलधारा दे। फिर 'ॐ विश्वेदेवा अस्मिन् यज्ञे प्रीयन्ताम्' से देव-ब्राह्मणोंके हाथमें यव और जल प्रदान करे। 'ॐ प्रीयन्ताम्' इस वाक्यसे ब्राह्मणद्वारा अनुज्ञात होकर 'ॐ देवताभ्यः०' मन्त्रका तीन बार जप करे।

अधोमुख होकर पिण्डपात्रको हिलाकर आचमनपूर्वक दक्षिणोपवीती (सव्य) होकर पूर्वाभिमुख 'ॐ अमुकगोत्राय अमुकदेवशर्मणे०' इत्यादि मन्त्रसे देव-ब्राह्मणको दक्षिणा दे। तत्पश्चात् पितृ-ब्राह्मणोंकी सेवामें 'ॐ पिण्डाः सम्पन्नाः' यह निवेदन करनेपर 'ॐ सुसम्पन्नाः' इस प्रकार

१९७- भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण, पुराणों तथा उपपुराणों और अठारह विद्याओंका परिगणन, चारों युगोंके धर्मोंका कथन एवं कलियुगमें नामसंकीर्तनका माहात्म्य

काण्ड ]नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन३९९

ब्राह्मणसे अनुज्ञात हो पिण्डके ऊपर श्राद्धकर्ता दुग्धधारा प्रदान करे। फिर पिण्डको हिलाकर पिण्डके समीप रखे अर्घ्यपात्रको सीधा स्थापित कर दे। इसके बाद 'ॐ वाजे वाजे०' मन्त्रसे पिण्डके अधिष्ठाता पितरोंका विसर्जन करे। 'आमा वाजस्य०' आदि मन्त्रसे देव तथा 'अभिरम्यताम्' से पितृ-ब्राह्मणका विसर्जन करके ब्राह्मणसे अनुज्ञा प्राप्तकर गौ आदिको पिण्ड प्रदान करे। इस प्रकार यहाँ श्राद्धविधि बतलायी गयी। इसका पाठ करनेमात्रसे भी पापका नाश होता है। किसी भी स्थानमें उक्त विधिके अनुसार श्राद्ध करनेपर पितरोंको अक्षय स्वर्ग एवं ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है<sup></sup>

(अध्याय २१८)


नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन

**श्रीब्रह्माजीने कहा—**अब मैं नित्यश्राद्धका वर्णन करता हूँ। पूर्वमें जिस तरह श्राद्धविधि कही गयी है, उस विधिके अनुसार ही नित्यश्राद्ध करे। विशेषता यह है कि नित्यश्राद्धमें 'ॐ अमुकगोत्राणामस्मत्पितृपितामहानाम् अमुकशर्मणां सपत्नीकानां श्राद्धं सिद्धान्नेन युष्मास्वहं करिष्ये' ऐसा कहकर श्राद्धका संकल्प करना चाहिये। आसन-दानादि सभी कार्य पूर्ववत् करे। इस श्राद्धमें विश्वेदेव वर्जित हैं।

अब मैं वृद्धिश्राद्धका विधान बतलाता हूँ। वृद्धिश्राद्धमें<sup></sup> भी श्राद्धकी ही भाँति प्रायः सभी कार्य करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जो विशेष है, उसे कहता हूँ। पैदा हुए पुत्रके मुखको देखनेके पहले वृद्धिश्राद्ध करना चाहिये। यह श्राद्ध पूर्वाभिमुख और दक्षिणोपवीती (सव्य) होकर यव, बेर, कुश, देवतीर्थके द्वारा नमस्कार तथा दक्षिणा आदि उपचारपूर्वक करे।

दक्षिण जाँनु<sup></sup>को ग्रहण कर विश्वेदेवोंका ब्राह्मणोंमें आवाहन करे। आमन्त्रणसे पूर्व ब्राह्मणोंसे अनुज्ञा प्राप्त करनेके लिये इस प्रकार ब्राह्मणोंसे निवेदन करे—अपने कुलके अमुककी उत्पत्तिके शुभ अवसरपर अपने पितृपक्ष एवं मातृपक्षके पितरोंका श्राद्ध करनेके लिये वसु, सत्य नामके विश्वेदेवोंका आप लोगोंमें आवाहन कर सिद्ध अन्नसे उनका श्राद्ध करना चाहता हूँ। ब्राह्मणोंके द्वारा अपनेमें विश्वेदेवोंके आवाहनकी आज्ञा मिलनेपर उन ब्राह्मणोंमें वसु, सत्य नामके विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहिये। (यहाँ मूल ग्रन्थके अनुसार संस्कृतवाक्योंका ही प्रयोग होना चाहिये।) इसी प्रकार अन्य ब्राह्मणोंमें पितरोंका भी आवाहन करना चाहिये। बादमें 'ॐ विश्वेदेवा स आगत०' इत्यादि मन्त्रसे वसु तथा सत्य नामवाले विश्वेदेवोंका आवाहन कर उन्हें आसन तथा गन्धादि दानकर 'अच्छिद्रावधारण<sup></sup>' का वाचन करे। इसके बाद प्रपितामही आदिका अनुज्ञापन, आसनदान, गन्धादि-दान और अच्छिद्रावधारण-वाचन करना चाहिये।

इसी प्रकार पितामही, माता और प्रपितामहकी अनुज्ञा ग्रहणकर आसन, आवाहन और गन्धादि-दान तथा अच्छिद्रावधारण करके प्रपितामह एवं वृद्धप्रमातामह आदिकी अनुज्ञा ग्रहण कर आसन, आवाहन एवं गन्धादिका दान करे। तदनन्तर


१-इस अध्यायसे पार्वणश्राद्ध करनेकी प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिये। श्राद्धकी विधि, सम्पूर्ण मन्त्र एवं क्रमका ज्ञान श्राद्धकी पद्धतियोंसे करना चाहिये।
२-इस श्राद्धको माङ्गलिक, आभ्युदयिक तथा नान्दीमुखश्राद्ध भी कहते हैं।
३-जानु जङ्घाको कहते हैं। बायें जङ्घेको मोड़कर और दाहिने जङ्घेको ऊपरकर बैठनेसे दाहिने जङ्घेपर दाहिना हाथ होता है। यहाँ इसी आसनसे तात्पर्य है।
४-श्राद्धमें समर्पित वस्तुकी पूर्णताका वचन ब्राह्मणोंसे लेना ही 'अच्छिद्रावधारणवचन' है।

४०० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-

'ॐ वसुसत्यसंज्ञकेभ्यः०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर इसी प्रकार पितामही और मातामह, प्रमातामहके लिये अन्नसंकल्पनादि क्रिया करनी चाहिये।

एकोद्दिष्टश्राद्धमें<sup></sup> पूर्वके समान सभी कार्य करना चाहिये। इसमें विशेष यह है कि प्रथम ब्राह्मण-निमन्त्रण, पादप्रक्षालन, आसनदान करके 'अद्य अमुकगोत्रस्य मत्पितुरमुकदेवशर्मणः प्रतिसांवत्सरिकमेकोद्दिष्टश्राद्धं सिद्धान्नेन युष्मास्वहं करिष्ये' इस संकल्प-वाक्यसे अनुज्ञाग्रहणपूर्वक आसनदान और गन्धादि तथा पक्वान्न प्रदान करना चाहिये।

इसके बाद रुचिर-स्तवादिका पाठकर तथा यज्ञसूत्र (यज्ञोपवीत) कण्ठमें धारणकर उत्तराभिमुख होकर अतिथिश्राद्ध करे। पितरोंकी तृप्ति जानकर दक्षिणाभिमुख हो वामोपवीती (अपसव्य) होकर कर्मसे उच्छिष्ट अन्नके समीपमें 'अग्निदग्धाश्च०' इत्यादि मन्त्रसे अन्न विकरण करे। तदनन्तर 'अमुकगोत्र मत्पितः०' से मण्डलरेखाके ऊपर जलधारा दे। अन्य कार्य पूर्वके समान ही समझना चाहिये। (अध्याय २१९)


सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि

श्रीब्रह्माजीने कहा— हे व्यासजी! अब मैं सपिण्डीकरणश्राद्धका वर्णन करता हूँ। मृत्युके सालभर बाद मृत्यु-तिथिपर यह श्राद्ध करना चाहिये। इस श्राद्धको यथासमय विधिवत् करनेसे प्रेतको पितृलोककी प्राप्ति होती है। सपिण्डीकरणश्राद्ध अपराह्नमें करना चाहिये, सभी अनुष्ठान प्रायः अन्य श्राद्धोंके समान करे। (इसमें जो विशेष है वही कहा जा रहा है।) पितामहादिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंको निमन्त्रित कर 'ॐ पुरूरवोमाद्रवसंज्ञकेभ्यो०' से वामपार्श्वमें आसन रखकर पुरूरवा और माद्रव नामके विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहिये। 'पितामहप्रपितामहानां०' इत्यादि वाक्यसे श्राद्धकी पितामह आदिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंसे अनुज्ञा ग्रहणकर तीन पात्र स्थापित करे। उन पात्रोंके ऊपर कुश रखकर दूसरे पात्रसे उन्हें ढक दे और आवाहन करे। इसके बाद अन्य श्राद्धोंके समान अच्छिद्रावधारणतककी<sup></sup> क्रिया करके सपत्नीक पिताको प्रेतपद अन्तमें प्रयुक्तकर उनका नाम उच्चारण करे। श्राद्धकी अनुज्ञा ले ले। तदनन्तर देव<sup></sup> पात्राच्छिद्रावधारण करे। यथाविधान कार्योंको सम्पन्नकर पितामह, प्रपितामह, वृद्धप्रपितामहके पात्रोंका क्रमसे संचालन और उद्घाटनकर 'ॐ ये समानाः समनसो०' इत्यादि मन्त्रोंसे पितृपात्रका जल पितामह और प्रपितामहके पात्रमें छोड़े। वृद्धप्रपितामहके पात्रको छोड़कर पितामह, प्रपितामहके पात्रका जल और पवित्रक पितृ-पात्रमें निक्षिप्त करे। तदनन्तर पितृ-ब्राह्मणके हाथमें अर्घ्यपात्रस्थ पवित्रक देकर उसमें स्थित पुष्प ब्राह्मणोंके सिर, हाथ और चरणोंमें समर्पित करना चाहिये। इसके बाद ब्राह्मणोंके हाथमें जल देकर दोनों हाथोंसे अर्घ्यपात्र उठाकर 'ॐ या दिव्या०' इत्यादि मन्त्रका पाठकर 'अमुक गोत्र मत्पितामह०' इस वाक्यसे पितृ-पात्रसे कुछ अर्घ्योदक पितामहके प्रतिनिधि ब्राह्मणके हाथमें प्रदान करे तथा पवित्रकके सहित अवशिष्ट कुछ जल पिण्डसेचनके लिये रखकर अन्य पात्रसे आच्छादितकर पितृ-ब्राह्मणके


१-इस श्राद्धका भी यथोचित क्रम एवं विस्तृत विवरण श्राद्धपद्धतियोंमें देखना चाहिये।
२-पितरोंके उद्देश्यसे की गयी विधिकी पूर्णताकी प्रार्थना ही 'अच्छिद्रावधारण' है।
३-अर्घ्यपात्रके छिद्ररहित होनेका निश्चय करना ही 'देवपात्राच्छिद्रावधारण' है।

काण्ड ] सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि ४०१

वामपार्श्वमें दक्षिणाग्रकुशके ऊपर 'पितृभ्यः स्थानमसि' यह पढ़कर अधोमुख स्थापित करे।

इसके बाद पितामह-प्रपितामह आदिको गन्धादि देकर 'अग्नौकरणं'<sup></sup> करे तथा अवशिष्ट अन्नको प्रपितामह आदिके पात्रमें डाल दे। इसी प्रकार पितामहादिका पात्राभिमन्त्रणपर्यन्त कर्म सम्पन्नकर ब्राह्मणपात्राभिमन्त्रण, अंगुष्ठनिवेशन, तिल-विकरणपूर्वक 'अमुक गोत्र०' इत्यादि वाक्य कहकर घृताक्त अन्न आदिका निवेदन करे।

तत्पश्चात् देवादिक्रमसे ब्राह्मणके हाथमें जल प्रदान करे, यही 'अपोशन' विधि है। अतिथिके आनेपर अतिथिश्राद्ध करते हुए इस समय भी विकरणके लिये अन्न प्रदान करना चाहिये। पितामहादि ब्राह्मणसे 'ॐ स्वदितं भवद्भिः' से सुतृप्तिकी जिज्ञासा कर संतुष्टिका आश्वासन प्राप्त करे। 'अमुक गोत्र०' इत्यादि वाक्यसे पिण्डदान और 'पिण्डपात्रमच्छिद्रमस्तु' कहकर सभी कार्योंकी समाप्तिके बाद पिण्डके दो हिस्से कर 'ये समानाः समनसः०' आदि मन्त्रोंका पाठ करे और पितामह, वृद्धप्रपितामह-पिण्डके साथ पिताका पिण्ड मिला दे। पिण्डके ऊपर गन्धादि रखकर पिण्डचालन करना चाहिये। अतिथि और ब्राह्मणसे स्वदितादि (सुतृप्ति)-का प्रश्न करके ब्राह्मणोंको आचमन एवं ताम्बूल प्रदान करे।

तदनन्तर यजमान 'सुप्रोक्षितमस्तु', 'शिवा आपः सन्तु'—इन दो मन्त्रोंका उच्चारण करके वृद्धप्रपितामहादि-क्रमसे ब्राह्मणके हाथमें जल प्रदान करे और 'गोत्रस्याक्षय्यमस्तु' से पितृ-ब्राह्मणके हाथमें अक्षय्यदान करके 'उपत्तिष्ठताम्' आदि वाक्यसे सतिल जल देना चाहिये।

तत्पश्चात् 'अघोराः पितरः सन्तु' इस वाक्यका उच्चारण करनेपर ब्राह्मण 'अस्तु' इस वाक्यसे प्रतिवचन प्रदान करें एवं 'स्वधां वाचयिष्ये' इस पदका उच्चारण करनेपर ब्राह्मण 'ॐ वाच्यताम्' इस अनुज्ञा-वाक्यसे प्रत्युत्तर दें। 'पितामहादिभ्यः स्वधा उच्चताम्' इस प्रकार यजमानके कहनेपर 'अस्तु स्वधा' ऐसा ब्राह्मण बोलें। फिर 'पितृभ्यः स्वधा उच्चताम्' ऐसा कहकर आज्ञा प्राप्त करे।

तदनन्तर 'ॐ ऊर्जं वहन्ती०' इत्यादि मन्त्रसे दक्षिणाभिमुख होकर जलधारा दे, पुनः 'ॐ विश्वेदेवा अस्मिन् यज्ञे प्रीयन्ताम्' यह मन्त्र पढ़कर देवब्राह्मणके हाथमें यव और जल देकर 'ॐ देवताभ्यः०' इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करे। पिण्डपात्रोंको परिचालितकर आचमनपूर्वक पितामहादि-क्रमसे दक्षिणा दे। पितृ-ब्राह्मणसे 'आशिषो मे प्रदीयन्ताम्' इस वचनसे आशीर्वादकी प्रार्थना करे। ब्राह्मण 'प्रतिगृह्यन्ताम्' इस वाक्यसे प्रत्युत्तर प्रदान करें। पुनः 'दातारो नोऽभिवर्धन्ताम्०' आदि मन्त्रका पाठकर अर्घ्यपात्रको ऊर्ध्वमुख कर 'वाजे वाजे०' इत्यादि मन्त्रसे देवब्राह्मण एवं 'अभिरम्यताम्' इस मन्त्रसे पितृब्राह्मणका विसर्जन करना चाहिये।

हे व्यास! मैंने आपको सपिण्डीकरणश्राद्धका विधान बताया। श्राद्ध, श्राद्धकर्ता और श्राद्धफल—इन तीनोंको विष्णुरूप जानना चाहिये<sup></sup>

(अध्याय २२०)


१-अग्नौकरण—एक विशेष विधि है। इसमें अपसव्य होकर जलमें दो आहुति दी जाती है।
२-सपिण्डीकरणश्राद्धकी विस्तृत विधि श्राद्धपद्धतियोंसे जानना चाहिये। यहाँ संक्षिप्तरूपमें वर्णन है।

१९८- नैमित्तिक तथा प्राकृतिक प्रलय और भगवान् विष्णुसे पुनः सृष्टिका प्रादुर्भाव

४०२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

धर्मसारका कथन

श्रीब्रह्माजीने कहा— हे शंकर! अब मैं सभी पापोंका विनाश करनेवाले तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले अतिशय सूक्ष्म धर्मसारको संक्षेपमें कहता हूँ, आप सुनें।

शोक शास्त्रीय ज्ञान, धर्म, बल, धैर्य, सुख और उत्साह—इन सबका हरण कर लेता है। अर्थात् शोकके प्रभावसे सभी सात्त्विक वृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं। इसीलिये सर्वतोभावसे शोकका परित्याग करना चाहिये।

कर्म ही दारा (स्त्री) है, कर्म ही लोक है, कर्म ही सम्बन्धी है, कर्म ही बान्धव है। (अर्थात् स्त्री, लोक, सम्बन्धी एवं बान्धव आदि कर्मके अनुसार ही मिलते हैं।) कर्म ही सुख-दुःखका मूल कारण है। (अतः उत्तम कर्म करनेके लिये सदा सावधान रहना चाहिये।) दान ही परमधर्म है। दानसे ही पुरुषको सभी अभीष्ट प्राप्त होते हैं। दान ही पुरुषको स्वर्ग और राज्य प्रदान करता है। इसलिये मनुष्यको दान अवश्य करना चाहिये—

दानमेव परो धर्मो दानात्सर्वमवाप्यते।
दानात्स्वर्गश्च राज्यं च दद्याद्दानं ततो नरः॥
(२२१।४)

विधिपूर्वक प्रशस्त दक्षिणाके साथ दान तथा भयभीत प्राणीकी प्राणरक्षा—ये दोनों समान हैं। यथाविधि तपस्या, ब्रह्मचर्य, विविध यज्ञ एवं स्नानमें जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य भयभीत प्राणीके प्राणोंकी रक्षासे प्राप्त होता है। जो लोग धर्मका नाश करते हैं, वे नरकमें जाते हैं।

जो होम, जप, स्नान, देवतार्चन आदि सत्कार्यमें तत्पर रहकर सत्य, क्षमा, दया आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न रहते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं<sup></sup>। कोई भी किसीको सुख या दुःख नहीं देता है और न किसीका सुख-दुःख हरण कर सकता है। सभी अपने किये हुए कर्मके अनुसार सुख-दुःखका भोग करते हैं—

न दाता सुखदुःखानां न च हर्तास्ति कश्चन।
भुङ्क्ते स्वकृतान्येव दुःखानि च सुखानि च॥
(२२१।८)

जो धर्मकी रक्षाके लिये जीवनदान करता है, वह सभी विषम परिस्थितियों (कठिनाइयों)-को पार कर जाता है। जिनका चित्त सदा संतुष्ट रहता है, वे फल, मूल, शाक आदिके द्वारा जीवनधारण करके भी सुखकी अनुभूति करते हैं—

धर्मार्थं जीवितं येषां दुर्गाण्यतितरन्ति ते।
सन्तुष्टः को न शक्नोति फलमूलैश्च वर्तितुम्॥
(२२१।९)

सुखकी लालसामें सभी मनुष्य संकटकी स्थितिमें पड़ते हैं। यह लोभका ही परिणाम है, जो अत्यन्त दुष्कर है।

मनुष्यके चित्तमें लोभ उपस्थित होनेसे ही क्रोध उत्पन्न होता है। लोभके कारण ही मनुष्य हिंसा आदि गर्हित कार्योंमें प्रवृत्त होता है। मोह, माया, अभिमान, मात्सर्य, राग, द्वेष, असत्यभाषण एवं मिथ्याचरण—ये सभी लोभसे उत्पन्न होते हैं। लोभसे ही मनुष्य मोह और मदसे उन्मत्त हो जाता है। (इसलिये लोभका परित्याग करना चाहिये) जो शान्त व्यक्ति लोभका परित्याग करता है, वह सभी प्रकारके पापोंसे रहित होकर परमलोकको प्राप्त करता है<sup></sup>


१-ये च होमजपस्नानदेवतार्चनतत्पराः। सत्यक्षमादयायुक्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः॥ (२२१।७)
२-लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभाद् द्रोहः प्रवर्तते। लोभान्मोहश्च माया च मानो मत्सर एव च॥
रागद्वेषानृतक्रोधलोभमोहमदोज्झितः। यः स शान्तः परं लोकं याति पापविवर्जितः॥ (२२१।११-१२)

१९९- कर्मविपाकका कथन

काण्ड ] धर्मसारका कथन ४०३


हे महादेव! देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व, गुह्यकगण—ये सभी धार्मिकोंकी पूजा करते हैं, धनाढ्य और कामी व्यक्तिकी अर्चना कोई भी नहीं करता है—

देवता मुनयो नागा गन्धर्वा गुह्यका हर।
धार्मिकं पूजयन्तीह न धनाढ्यं न कामिनम्॥
(२२१।१३)

अनन्त बल, वीर्य, प्रज्ञा और पौरुषके द्वारा किसी दुर्लभ वस्तुको यदि मनुष्य प्राप्त कर लेता है तो इसके कारण किसीको ईर्ष्यावश शोकाकुल या दुःखी नहीं होना चाहिये।

सभी प्राणियोंके प्रति दयाका भाव रखना, सभी इन्द्रियोंका निग्रह करना और सर्वत्र अनित्यबुद्धि रखना यह प्राणियोंके लिये परम श्रेयस्कर है। मृत्यु सामने वर्तमान है, यह समझकर जो व्यक्ति धर्माचरण नहीं करता, उसका जीवन बकरीके गलेमें स्थित स्तनके समान निरर्थक है—

सर्वसत्त्वदयालुत्वं सर्वेन्द्रियविनिग्रहः।
सर्वत्रानित्यबुद्धित्वं श्रेयः परमिदं स्मृतम्॥
पश्यन्निवाग्रतो मृत्युं यो धर्मं नाचरेन्नरः।
अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम्॥
(२२१।१५-१६)

हे वृषध्वज! इस लोकमें गोदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। जो न्यायोपार्जित धनसे प्राप्त गौका दान करते हैं, वे अपने सम्पूर्ण कुलको तार देते हैं।


हे वृषध्वज! अन्न-दानसे श्रेष्ठ और कुछ भी दान नहीं है; क्योंकि सम्पूर्ण चराचर जगत् अन्नके द्वारा ही प्रतिष्ठित है<sup></sup>। कन्यादान, वृषोत्सर्ग, जप, तीर्थ, सेवा, वेदाध्ययन, हाथी, घोड़ा, रथ आदिका दान, मणिरत्न और पृथ्वीदान—ये सभी दान अन्नदानके सोलहवें अंशकी भी बराबरी नहीं कर सकते हैं। अन्नसे ही प्राणियोंके प्राण, बल, तेज, वीर्य, धृति और स्मृति—ये सभी प्रतिष्ठित रहते हैं। जो कूप, वापी, तडाग और उपवनका निर्माणकर लोगोंकी संतुष्टिके लिये प्रदान करते हैं, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धारकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं<sup></sup>

साधुओंका दर्शन करना अतिशय पुण्यदायक है। यह सभी प्रकारके तीर्थोंसे भी उत्तम है। तीर्थ तो समय आनेपर फल प्रदान करता है, किंतु सज्जनोंका संग उसी क्षण फल प्रदान कर देता है—

साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थादपि विशिष्यते।
कालेन तीर्थं फलति सद्यः साधुसमागमः॥
(२२१।२३)

सत्य, दम, तपस्या, शौच, संतोष, क्षमा, सरलता, ज्ञान, शम, दया और दान—इनको सनातनधर्म माना गया है—

सत्यं दमस्तपः शौचं सन्तोषश्च क्षमार्जवम्।
ज्ञानं शमो दया दानमेष धर्मः सनातनः॥
(२२१।२४)
(अध्याय २२१)


<sup></sup>-न गोदानात्परं दानं किञ्चिदस्तीति मे मतिः। या गौर्न्यायार्जिता दत्ता कृत्स्नं तारयते कुलम्॥
नान्नदानात्परं दानं किञ्चिदस्ति वृषध्वज। अन्नेन धार्यते सर्वं चराचरमिदं जगत्॥ (२२१।१८-१९)
<sup></sup>-कूपवापीतडागादीनारामांश्चैव कारयेत्। त्रिसप्तकुलमुद्धृत्य विष्णुलोके महीयते॥ (२२१।२२)